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Talash E Haq Abdul Rehman Faislabadi (Hindi)

Talash E Haq Abdul Rehman Faislabadi (Hindi)

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Published by Asbah Siddique
मुतलाशी ए हक़ को मंज़िल मिल ही जाया करती है। जिन के दिल में तलाश ए हक़ की तड़प होती है आख़िर उन्हे मंज़िल ए मुराद मिल ही जाया करती है । एक ऐसे आलिम की हक़ को तलाश करने की दासतान जिसने ग़ैर जानिबदारी से किताब ओ सुन्नत का मुताअला किया और हक़ को पा लिया और हक़ को पा लेने के बाद उस पर जम गया चाहे इसके लिए उसे अपने मस्लक को छौड़ना पड़ा लेकिन उस ने हक़ को छोड़ना गवारा न किया
मुतलाशी ए हक़ को मंज़िल मिल ही जाया करती है। जिन के दिल में तलाश ए हक़ की तड़प होती है आख़िर उन्हे मंज़िल ए मुराद मिल ही जाया करती है । एक ऐसे आलिम की हक़ को तलाश करने की दासतान जिसने ग़ैर जानिबदारी से किताब ओ सुन्नत का मुताअला किया और हक़ को पा लिया और हक़ को पा लेने के बाद उस पर जम गया चाहे इसके लिए उसे अपने मस्लक को छौड़ना पड़ा लेकिन उस ने हक़ को छोड़ना गवारा न किया

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Published by: Asbah Siddique on Sep 13, 2013
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04/15/2014

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 ΜΤ]Ψ Z Ϋξ 
 
 मœने Ɛोंऔर कसे हक़ क़बूल िकया 
 
इलामक दावाअ सेटर, रायप  ुर 
 
www.facebook.com/idcRaipur
 मौलाना अɨ   ु ल रहमान फसलाबादी 
 
 एक ऐसे आिलम की हक़ को तलाश करने की कहानी िजसने ग़ैर जािनबदारी से िकताब ओ सुɄत का मुताअला िकया और हक़ को पा िलया 
 
 तलाश ए हक़  मœने Ɛोंऔर कसे हक़ क़बूल िकया 
 
 मौलाना अɨल रहमान फसलाबादी 
 
 िजन किदल मŐ तलाश ए हक़ की तड़प होती है आिख़र उɎे मंिज़ल ए मुराद िमल ही जाया करती है । हज़रत  सलमान फारसी रिज़ जͅबा ए सादीक़ा से तलाश ए हक़ िलये घर से िनकले सफर की मुİʭलŐ झेलते, िगरते पड़ते, आिख़र उɎŐ मंिज़ले मक़सूिज़यारत हज़रत मोहʃद सʟाहो अलैहे वसʟम की सूरत मŐ िमल गई इसी तरह हमारे ममदूअ जʊद आिलमे दीन फािज़ल दाŜलउलूम दवबंद (भारत) हज़रत मौलाना अɨुल रहमान फसलाबादी रह. भी अपने आबाई मसलक हनफी देवबंदी से मुतमइन ना थे। तलाश ए हक़  की जुˑजमŐ लगे रहे आिख़रकार अʟाह ने उनको भी राहे िहदायत नसीब फरमा दी हज़रत मौलाना इस  व˫ अʟाह को ɗारहो चुकहœ । अʟाह ताअला उɎे जɄतुल िफरदौस मŐ आला मुक़ाम अता फरमाए (आमीन) उɎोने मˠकऐहले हदीस Ɛोंऔर कसे क़   ु बुल िकया ये आप को उनकी अपनी ही तैहरीर पढ़  कर ही मालूम होगा जो हम आप की िख़दमत मŐ हफत रोज़ा अहले हदीस लाहोर िजʗ नɾर 16 शुमारा  नɾर 46 से उन को शुिŢया कसाथ पेश करने की सआदत हािसल कर रहे हœ । उʃीद है कमौलाना  मरšम की ये ख़ुद नोʱ बŠत से मुक़ʟेदीन भाईयोंिलये भी िहदायत का बाईस बनेगी – इ̢शा अʟाह 
 मœ अहले हदीस ƐŠआ 
?
 बंदा हनफी वबंदी मˠक का पैरोकार था और दŜलऊलूम दवबंद से फाįरग़ होकर अरसा दराज़  तक इसी मसलक पर अमल पैरा रहा िफर ग़ैरजािनबदाराना तहक़ीक़ कर क1966 ई. मŐ मसलकअहले हदीस को इİƢयार िकया और इस का बाक़ायदा अख़बारात मŐ ऐलान भी िकया िफर भी  बŠत से लोग पूछते हœ तुमने ऐसा Ɛोिकया 
?
  इस कजवाब मŐ ये चंद लाइन तहरीर कर रहा š। िजसमŐ अपनी िज़Ƚगी कमुख़तिलफ दौर बताए  हœ िजन से गुज़र कर ये आिजज़ तैहक़ीक़ कबाद इस मुक़ाम पर पŠंचा िजसका एलान करना ज़Ŝरी  समझा नीज़ ये भी बताया है कजहां तक सही मसलक का ताʟुक़ है तो वो िसफŊ मसलकअहले हदीस है।
 
 मसलक अहले हदीस ये है कोई बात 
 उस व˫ तक 
 तसलीम की जाए जब तक वो  करान व हदीस कमुतािबक़ न हो और अगर क़   ु रान और हदीस िख़लाफ िकसी बड़से बड़आिलम की बात भी आ जाए 
 तो वो भी क़ािबले क़बूनही। हम अʟाह 
ताअला और 
 उस करसूल सʟाहो अलैहवसʟम कमुक़ाबले मŐ ना िकसी आिलम की बात को 
सनद और दलील और ना ही 
 िकसी इमाम की ज़ाती राय को शįरयत मानते हœ बİʋ 
सहाबा िकराम 
 रिज़. भी िसफŊ वही इरशादात क़ािबले क़   ु बूहœ जो िकताब अʟाह और सुɄते रसूल अʟाह सʟाहो अलैहे
 
 वसʟम को मुतािबक़ होंयही मेरा 
मसलक है।
 मेरी िज़Ƚगी का पहला दौर 
 
 मœ एक िकसान घराने मŐ पैदा Šआ जब से होश सʉाला 
 वािलदन और माहौल से ये तीन अक़ीदसीखे1.
 
 हमारा ख़ािलक़ अʟाह ताअला है और उस का कोई 
 शरीक नही 2.
 
 हमारपैग़ɾर हज़रत मुहʃद 
 
 सʟाहो अलैहे वसʟम है और हम आप कउʃती हœ
3.
 
 मरने कबाद दोबारा अʟाह ताअला 
 
 िज़Ƚा कर हमारअमलोंका िहसाब िकताब लेगा और िफर बिहʱ या दोज़ख़ मŐ भेज देगा ।
  इसी तरह 
 मœन
 
 उन से ये अक़ीदा भी हािसल िकया कहम हनफी हœ
, और हमारा मज़हब हनफी है, यानी हम इमाम अबु हनीफा रह.
 कमुक़İʟद हœ । कम उमरी कवƅ ज़हन मŐ न िकसी तनक़ीद 
 
 की क़ािबलीयत होती है और न ही कोई इɌान मौŜसी अक़ायद पर त̢क़ीद करना पसȽ करता है सो मœ भी इɎी अक़ायद को मौŜसी तौर पर इ͂तेयार करने िलये तैयार रहा औइन से िदली  वाबˑगी पैदा कर ली और यही वो अक़ीदा है िजनकी िबना पर एक आदमी अपने आप को 
 मुसलमान समझता है
 कलमा तʊबा तो हम तबŜŊकन पढ़तहै अलफाज़ का मतलब नही 
 समझते
। मैने भी तबŜŊकन ये कलमा पढ़ 
 ना अपने माहोल से सीख िलया और माना व मतलब से
 कोई ग़रज़ न रखी, इस बाद मœ इˠामी तालीम हािसल करने किलये घर से Ŝख़सत हो गया और 
 मुख़तिलफ असातज़ा कराम से
 बेशुमार उलूनूपढ़ता रहा सफŊ, नŠ, मंतक़, फलसफा, फलिकयात, िफक़ा, ऊसूले िफक़ा, वग़ैरा और जब इन ऊलम कबारमŐ असातज़ा से पछा जाता क हम ये ऊलूम Ɛोपढ़ रहे है तो वो ये बताते इन ऊलूम कज़įरये करान और हदीस को इɌान अDžी तरह समझ सकता 
 है, गोया इन ऊलूम की तालीम क़   ु रान व हदीस को समझने िलये दी 
 जा रही थी । इस पर मुझबारहा अपने असातज़ा से ये अज़Ŋ करना पढ़ता आप इन ऊलूम कसाथ 
 साथ क़   ु रान व हदीस 
 
भी पढ़ाए तो जवाब ये िमलता कइन सब से फाįरग़ हो कर तुम आख़री साल  दौरा हदीस पढ़ोगे तो उस व˫ आप को क़   ु रान व हदीस का इʝ हािसल हो सकगा।
 
 ये पहला मौक़ा था कमेरिदल को इस तज़ő अमल से एक धचका सा लगा मगर ये व˫ी हादसा था  जो िदल मŐ आया और गुज़र गया और मेरअसातज़ा का इस मŐ कोई क़सूभी न था इस िलये क
 सारे मुआशर
 मŐ वह िनसाब तालीम पढ़ा और पढ़ाया जा रहा था 
 जो शाहजहाँ दौर मŐ एक सरकारी 

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