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तत पीडीएफ़ ई  ु-बक  ु– रचनाकार (http://rachanakar.blogspot.com) क तत  ु.
 पी 
-
वास 
 
डॉ 
 
सरोिजनी 
 
साह  ू
 
 
बह  ु
-
चचत 
 
उड़या उपयास 
 
का हद अनवाद  ु अनवाद  ु
:-
दनेश 
 
कमार  ु
 
माल 
 
 
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ाक ाक ाक ाकथन थन थन थन 
 
सरोिजनी साह  ूका नाम न केवल हमारे देश केवरन  ्अंतराीय तर कगने-चने ुसाहयकार मलया जाता है। अंतराीय यात ा इस महान नारवाद लेखका क ओडया भाषा म अब तक दस कहानी-संह तथा दस उपयास काशत हो चके ुह। नारव से संबंधत वभन समयाओं को उजागर करनेमपवादता व पारदशता केलयेसाहय जगत म उहने अपनी एक अमट छाप छोडी है। आपकेउपयास  व कहानी- संह देश-वदेश क वभन भाषाओं जैसे बंगाल, मलयालम, अंेजी व च म अनदत   ूहये ुहै।आपक बहचचत  ुकहानयां हापर कालस, नेशनल बक  ुट, साहय अकादमी व ानपीठ सेकाशत होती रह है। संत ओडशा केएक डी काँलेज म अयापन कायम रत होने केअलावा अंेजी-पका ‘इंडयन  ऐज’ क सह-संपादका तथ यमेन  ूकाँलेज, केरल ारा काशत ‘इंडयन जनआँफ पोट कोलोनयल  लटरेचर’, कसलाहाकार मंडल क वश सदया है। पााय जगत म आपको 'इंडयन सीमोन डी बीवोर' केनाम से जाना जाता है। साहय म आपकेउक  ृयोगदान केलयेउडीसा साहय अकादमी, झंकार परकार   ु,भवनेर  ुपतक  ुमेला परकार  ु, जातं परकार  ुएवं नेशनल एलायंआँफ वमेन  ूआगनाइजेशन  ारा समय-समय पर समानत होती रह है।लेखका अपने अंेजी लाँग 'सस एंड ससअलट   ु' म सनातन काल से मानव मितक पर अधकार जमाये हये ुधामक आडबर व सामािजक ढ़कोसल, चाहे वे पााय जगत केहो या हमारे देश के, का खंडन करतेहये ुमानव-मन क सष  ु अंतस इछाओंका िजस पारदशता व नडरता केसाथ वेषण कया  है, क व का कोई भी बजीवी  ुवगउनक वसनीयता व सयता को अपनाने से इंकार नहंकर सकता।यह वह लाँग था, िजससे मेरे अंदर एक वैचारक मंथन पैदा हआ  ुतपात  ्उनकेअंेजी अनदत   ूउपयास 'डाकएबोड' कहानी संह -'वेटंग फाँर मना' एवं 'सरोिजनी साहज   ूटोरज' पढ़ने का अवसर ा हआ। ुठक िजस कार से हद केस उपायसकार देवक नंदन खी क कत  ृ'चकांता संतत' को पढ़ने केलये  कई वदेशी हद भाषा क ओर आक  ृहये ु, ठक उसी कार लेखका क अय मौलक रचनाओंको ओड़या भाषा म सनने ुव समझने क ती अभलाषा मझम ुपैदा हई। ुयह मेरे लये परम सौभाय क बात थी क वगत पह साल से मओड़शा क लोक-संकत  ृ, साहय व समाज सेपरचत रहा ह। ू ँअतः यह मेर हादक इछा थी क ससम  ुओडया साहय को राभाषा हद म अनवाद  ुकर उकल भम  ूत अपना आभार य क, साथ ह साथ हद जगत को इस अनमोल धरोहर से परचत करा सक ूइस पनीत  ुकार  ्य लये, मैने सरोिजनी साह   ूबहचचत  ुउपयास ‘पी-वास’ तथा उनक चनंदा  ुे कहानयां, जो मेरे लाँग (http://sarojinisahoostories.blogspot.com) पर उपलध है, को चना। ुईर क असीम कपा  ृसेयह य सपन हआ  ुतथा अनवाद  ुे म मेरा थम यास आपकहाथ मे है। लेखका का उपयास 'पी-वास' केबारे म सं म कहा जाये तो कोई अतशयो नहं होगी--''देखन म छोटो लागे, पर घाव करे गभीर''. सह शद म ,'पी-वास' एक छोटा-सा उपयास होने कबावजद  ूभी िजन बहआयामी  ुपहेलआँ ूएवं यावहारक परय क पभम  ृपाठक केसम तत  ुकरता है,क कोई भी सधी  ुपाठक अंतमन से भावत हये ुबना नहं रह सकता है।
 
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भले ह, ओडशा ांत तरह-तरह क ाकतक  ृसंपदाओंसेभरपर   ूहै, फरभी यहां का आम आदमी कस कदर भख  ूसे जीवन यापन करता है, उसका ममातक चण लेखका ने ओड़शा ांत कपिमी  इलाक जैसे कोरापट  ु, बोलांगीर आद िजल म रहने वाले आदवासय केजीवन पर गहन शोध कर अपनेउपयास 'पी-वास' मायम से पेश कया है। जंगल म रहने वाले ऐसे ह कछ  ुसतनामी सदाय के वाशदे ं, ओड़शा केपिमी इलाको से लेकर दर  ू-दराज छीसगढ़ केबतर तक फैले हये ुह। इस सदाय का पतैनी  ुधंधा गाव म घम  ू-घमकर  ूजानवर क अिथ, मांस-मजा इकत कर मशदाबाद  ुपठान को बेचकर अपनी आजीवका कमाना है।यह उपयास एक ऐसे ह गरब आदमी कपरवार केइद-गद घमता  ूहै, जो क नन ेणी का यह कायकरतेहये ुभी अयामवाद क पराकाा को अपनेभीतर संजोये रखता है। उसका वह दशन, वह  अयामवाद उसकजीवन म आयी तकलताओं ूम भी समदश होकर डटे रहने का आहान करता है। वषम परिथतय सेएक सखी  ुपरवार केसारे सपने बर  ुतरह से छन-भन हो जाते ह, बढ़ापे ुक लाठ टट  ू जाती है और बची रह जाती है वावथा  ृक मायसी  ू, अस अकलापन, बेसहारा व बेबस िजंदगी।उपयास मलभत  ू से एक मानवीय चीकार है उस परवार क, िजसम कवल दःख  ुकाले बादल मडराते ँह रहतेहै। कोई भी परवार का पतैनी  ुधंधा अपनाना नहं चाहता है। पहला बेटा ‘सयासी’ बचपन मफादर इमानअल  ुसाहब केधमातरण पवम ‘टोफर’ बन जाता है, बड़ा होकर जापान चला जाताहै, फर  कभी लौटता ह नहं है। दसरा  ूबेटा ‘डाटर’बंधआ  ुमजदर  ूबनकर गाँव से गायब हो जाता है तीसरा बेटा ‘वकल’नसल म भत हो जाता है और जंगल म पलस  ु-मठभेड़  ुम मारा जाता है। सबसे छोट इकलौती बेट परबा पापी पेट क खातर रायपर  ुकोठे म पहंच  ुजाती है, जहाँसे उसका लौट आना संभव ह नहं है। उपयास का वतार भोपाल सेजापान, कसंडा से रायपर  ु, सडंगागड़ा  ुसे सीनापाल तक है।आधे से यादा ओडशा ांत म फैले नसल आंदोलन केमलभत   ू कारण जैसेगरब व अमीर मबढ़ती खाई, सरकार आला अधकारय क -वत  ृआद को उजागर करने वाला यह उपयास अपने आप मएक अलग अहमयत रखता है। जहाँजंगल केवाशद   ंको यह पता नहं, क सरकार कौन है ? सरकार कहांहै? वहांसरकार उनकेलयेभवनेर   ुदल से ढाँचागत सवधाय ुजैसे सडके, कय ुऔर बीपीएल चावल महैया  ु कराने क यवथा करती है। पर गाँव तक पहचते ु ँ-पहचते ु ँसब चोर हो जाते है। चोर हो जाते है, गाँक यवक  ु-यवतयां ुगायब होते-होतेपरा  ूगाँव सना  ुपड़ जाता है। फर भी सरकार तं सय रहता है, सरकार सवधाओं ुका लफ  ुउठातेसरकार कमचार, अधकारगण गांवो म घम   ू-घमकर  ूभख  ूसे बेहाल, बलबलाते नबल बजग  ु सेउनकेघर क जन-गणना का हसाब लेतेहै। खाल गाँव पाकर कहतेहै बच को मत बेचो। आम क गठलयाँ ुमांड का सेवन मत करो, वरना पेट खराब हो जायेगा। "पर उपदेश, कशल   ुबहतेरे ु" क तज पर पोषक तव से य  ुखाना खाने का उपदेश देते ह। परत  ुवातवकता तो यह है क फोरेट-गाडजैसे  दरंदे, भख  ूसेतड़पती परबा जैसी यवतय  ुको मी  ुभर चावल कबदले अपनी हवस का शकार बना लेते है।यह उपयास अपने आप म एक कवता ह है. एक वोह क कवता, एक असफल ोध क कवता, जो पाठक को पहंचा  ुदेती है राजधानओं,शहर तथा कब क 'सॉटवेर संकत  ृ' से दर  ूबसे एक अलग भारतवष म।
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पक्षीवास मैं पूरा पढ़ चुकी हूँ। निश्चित ही यह एक बेहतरीन उपन्यास है। सरोजिनी साहू जी की भाषा में जो सतत प्रवाह है वह उपन्यास को कहीं भी बोझिल या उबाऊ महसूस नहीं होने देता। यह उपन्यास एक बार में अपने को पूरा पढ़वा लेता है। बेहद मार्मिक कथा ! समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार , शोषण और राजनीति के शिकार भोले भाले ग्रामीणों की व्यथा कथा बड़ी बारीकी से बुनी गई है और पाठक के मन को द्रवित किए बिना नहीं रहती। शुभकामनाएँ इला प्रसाद

दिनेश माली जी, पक्षीवास मैं पूरा पढ़ चुकी हूँ। निश्चित ही यह एक बेहतरीन उपन्यास है। सरोजिनी साहू जी की भाषा में जो सतत प्रवाह है वह उपन्यास को कहीं भी बोझिल या उबाऊ महसूस नहीं होने देता। यह उपन्यास एक बार में अपने को पूरा पढ़वा लेता है। बेहद मार्मिक कथा ! समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार , शोषण और राजनीति के शिकार भोले भाले ग्रामीणों की व्यथा कथा बड़ी बारीकी से बुनी गई है और पाठक के मन को द्रवित किए बिना नहीं रहती।शुभकामनाएँ इला प्रसाद

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