गले
भट
जन
-
जन
िमले
,
र
-
र
जा
रु नाथ।।अहम्
याग
िनछल
िमल
,
मन
का
आा
छोड़।आज
िदवाली
िमलन
की
,
लगी
ह ु ई
ह ै
होड़।।खेल
रह े
ह ै
द ेश
की
इजत
से
शैतान।बुर े
ल
हाील ी ी ी ी ी ी ी ी ी ी ी ी ी ी
म
आज
कल
,
ह ु ँ चा
िहद ु तान।राजत ं
गुडा
ह ु आ
,
न ेता
तानाशाह।पजात ं
ब ेहाल
ह ै
,
जनता
रही
कराह।जनता
क े
ारा
चु न
,
जनता
की
सरकार
।जनता
र
बरसा
रही
,
िनत
नए
अयाचार
। िनधन
का
शोषण
बु रा
,
मत
द े
उनको
ास।उनकी
आह
म
िछा
,
रहता
ह ै
संास।न ै ितकता
रही
नही
,
िजस
मनु य
क े
ास।उससे
करना
छोिड़य े
,
कभी
भले
की
आए।गुण
िबन
शु
की
तरह
नर
,
कही
न
ाव ै
मान।गुण
ू जा
जाता
सदा
,
जानत
सकल
जहान। िदशाहीन
ीढ़ी
ह ु ई
,
भू ल
रह े
सकम।द ेख
िसन ेमा
सीिरयल
,
सब
हो
रए
ब ेशम।तुम
म
उनम
भ ेद
या
,
एक
खू न
का
र ंग।जाित
धम
म
फक
कर
,
मत
भड़काओ
ज ंग।यिद
चाहो
तुम
िमले
,
लोग
का
साव।तो
िफर
रखना
छोड़
दो
,
लोग
से
द ु भव।सु खा
रही
िदल
की
तन
,
द ु खयार
क े
नीर। िकससे
जाकर
क े
कह
,
सबक े
सब
ब ेीर।।हार
गया
सो
मर
गया
,
सिदय
की
यह
सीख।मर
जायगे
भू ख
से
,
तऊँ
न
मगे
भीख।।वो
अजमान े
म
लगी
,
अन े
बल
का
भार।
हमन े
भी
ह ँ सकर
सही
,
मंहगाई
की
मार।।करन े
वाला
एक
ह ै
खान े
वाले
च। िच
जलाकर
ह ंस
रही
लललल
मँ ंहगाई ं ं ं ं ं ं ं ं ं ं ं ं ं ं
की
आंच।।धीरज
क े
बंध
ढह
गए
,
द ेख
भू ख
क े
हाल।
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