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Shri Narayan Stut i

Shri Narayan Stut i

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03/17/2012

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अनुम 
ीमद्भागवत महापुाणांतगत  ी नाायण तुत 
 
नवेदन 
'
ीमद्भागवत 
'
केनवम कध मं ेभगवान वयंकहतेहं  ै- सावो दयंमंसाधूनांदयंवहम् मदयत्तेन जानत नाहंतेयो मनागप।। अथात् मेे ेमी भ तो मेा दय हं  ै औ उन ेमी भों का दय वयं मं  ै हँ ू। वे मेे अति औ कुछ नहीं जानतेतथा मं  ैउनकेअति औ कुछ भी नहींजानता। पुाणशोमण 
'
ीमद् भागवत 
'
ाजी, देवताओं, शुकदेवजी, शवजी, सनकाद मुनयों, देवष नाद, वृासु, दैयाज बल, भीम पतामह, माता कुती, भ ाद, ुव, अू आद कई भु ेमी भों ाा ी नाायण  भगवान की की गयी तुतयों का महान भडा है। तुपुतक ुव, ाद, अू आद कुछ उम पम  भागवतोंकी तुतयोंका संकलन है, जसके वण, पठन एवं मनन सेआप-हम हमाा दय पावन कं े, वषय स  का नहीं अपतु भगवद स का आवादन के, भगवान के दय गुणों को अपने जीवन मं े उता क अपना जीवन  उनत बनायं े। भगवान की अनुपम महमा औ पम अनुह का यान कके इन भों को जो आासन मला है, सचा माधुय एवं सची शांत मली है, जीवन का सचा माग मला है, वह आपको भी मले इसी साथना के साथ इस पुतक को ककमलोंमं ेदान कतेहुए समत आनंद का अनुभव कती है हेसाधक बंधुओ 
!
इस काशन केवषय मं ेआपसेतयाएँवीकायहं  ै ी योग वेदात सेवा समत,अमदावाद आम।
अनुम 
यासजी ाा मंगल तुत।कुती ाा तुत।शुकदेव जी ाा तुत। ाजी ाा तुत।देवताओंाा तुत। ुव ाा तुत।महााज पृथुाा तुत।  ाा तुत।ाद ाा तुत।गजे ाा तुत।अूजी ाा तुत।नादजी ाा तुत।द जापत ाा तुत।देवताओंाा गभ-तुत। वेदोंाा तुत। चतुःोकी भागवत।ाथना का भाव।
यासजी ाा मंगल तुत 
भगवान सव, सवशमान एवं सचदानंदवप हं  ै। एकमा वे ही समत ाणयों केदय मं ेवाजमान आमा  हं  ै। उनकी लीला अमोघ है। उनकी श औ पाम अनन है। महष यासजी ने
'
ीमद् भागवत 
'
के माहाय तथा थम कंध के थम अयाय के ाभ मं े मंगलाचण के प मं े भगवान ीकृण की तुत इस का से की हैसचदानंदपाय वोपयादहेतवे तापयवनाशाय ीकृणाय वयंनुमः।।
'
सचदानंद भगवान ीकृण को हम नमका कते हं  ै, जो जगत की उप, थत एवं लय के हेतु तथा  आयामक, आधदैवक औ आधभौतक – इन तीनोंका केतापोंका नाश कनेवालेहं  ै
'
(ीमद्भागवत मा. 1.1)जमाय यतोऽवयादतताथेवभः वाट्तेने दा य आदकवयेमुत यसूयः। तेजोवािमृदांयथा वनमयो य सगऽमृषा 
 
धाना वेन सदा नतकुहकंसयंपंधीमह।।
'
जससे इस जगत का सजन, पोषण एवं वसजन होता है योंक वह सभी सत् प पदाथं मं े अनुगत है औ  असत् पदाथं से पृथक है; ज नहीं, चेतन है; पतं नहीं, वयं काश है; जो ा अथवा हयगभ नहीं, युत  उहं े अपने संकप से ही जसने उस वेदान का दान कया है; जसके सबध मं े बे-बे वान भी मोहत हो  जाते हं  ै; जैसे तेजोमय सूयमयों मं े जल का, जल मं े थल का औ थल मं े जल का म होता है, वैसे ही  जसमं े यह गुणमयी जात-वन-सुषपा सृ मया होने प भी अधान-सा से सयवत् तीत हो ही है, उस अपनी वयं काश योत से सवदा औ सवथा माया औ मायाकाय से पूणतः मु हने वाले सयप  पमामा का हम यान कतेहं  ै
'
(ीमद्भागवतः 1.1.1)अनुम ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
कुती ाा तुत 
अथामा ने पांडवों के वंश को न कने के लए ा का योग कया था। उा उस अ को अपनी ओ आता देदेवाधदेव, जगदी भु ीकृण से ाथना कने लगी क 
'
हे भो 
!
आप सवशमान हं  ै। आप ही  नज श माया से संसा की सृ, पालन एवं संहा कते हं  ै। वामन्
!
यह बाण मुझे भले ही जला डाले, पंतु मेे गभ को न न के – ऐसी कृपा कीजये
'
भवसल भगवान ीकृण ने अपने भ की कण पुका सुन  पाडवोंकी वंश पपा चलानेकेलए उा केगभको अपनी माया केकवच सेढक दया। यप ा अमोघ हैऔ उसके नवाण का कोई उपाय भी नहीं है, फ भी भगवान ीकृण के तेज के सामने आक वह शांत हो गया। इस का अभमयुकी पी उा गेगभमं ेपीत की ा क जब भगवान ीकृण  ािका जाने लगेष तब पाडु पी कुती ने अपने पुों तथा ौपदी के साथ भगवान ी कृण की बे मधु शदों मं ेइस का तुत कीः
'
हे भो 
!
आप सभी जीवों के बाह औ भीत एकस थत हं  ै, फ भी इयों औ वृयों से देखे नहीं जाते योंक आप कृत सेपेआदपुष पमे हं  ै। मं  ैआपको बाबा नमका कती हँ ू। इयोंसेजो कुछ जाना  जाता है, उसकी तह मं े आप ही वमान हते हं  ै औ अपनी ही माया के पद े से अपने को ढके हते हं  ै। मं  ै अबोध  नाी आप अवनाशी पुषोम को भला, कैसेजान सकती हँ ू
?
अनुम हे लीलाध 
!
जैसेमू लोग दूसा भेष धाण कयेहुए नट को य देखक भी नहींपहचान सकते, वैसेही आप  दखते हुए भी नहीं दखते। आप शु दय वाले, वचाशील जीवमु पमहंसो के दय मं े अपनी ेममयी भ  का सृजन कने के लए अवतीण हुए हं  ै। फ हम अपबु याँ आपको कैसे पहचान सकती हं  ै
?
आप ीकृण,वासुदेव, देवकीनदन, नदगोप लाडलेलाल गोवद को हमाा बाबा णाम है जनकी नाभ से ा का जमथान कमल कट हुआ है, जो सुद कमलों की माला धाण कते हं  ै, जनके ने  कमल के समान वशाल औ कोमल हं  ै, जनके चमकमलों मं े कमल का च है, ऐसे ीकृण को मेा बा-बा  नमका है। षकेष 
!
जैसे आपने दु कंस के ाा कैद की हुई औ चकाल से शोकत देवकी ा की थी, वैसे ही आपने मेी भी पुों के साथ बा-बा वपयों से ा की है। आप ही हमाे वामी हं  ै। आप सवशमान  हं  ै। ीकृण 
!
कहाँ तक गनाऊँ
?
वष से, लाागृह की भयानक आग से, हडब आद ासों की  से, दुोंकी  ूत-सभा से, वनवास की वपयों से औ अनेक बा के युों मं े अनेक महाथयों के शाों से औ अभी-अभी  इस अथामा केा सेभी आपनेही हमाी ा की है वपदः सतुन श त जगद्गुो। भवतो दशनंययादपुनभवदशनम्।। हे जगदगुो 
!
हमाेजीवन मं ेसवदा पग-पग प वपयाँ आती हं े, योंक वपयों मं ेही नत प से आपके दशन हुआ कतेहं  ैऔ आपकेदशन हो जानेप फ जम-मृयुकेचक मं ेनहींआना पता।अनुम  (ीमद्भागवतः 1.8.25)ऊँचे कुल मं े जम, ऐय, वा औ सप के काण जसका घमंड ब हा है, वह मनुय तो आपका नाम भी  नहीं ले सकता, योंक आप तो उन लोगों को दशन देते हं  ै, जो अकंचन हं  ै। आप नधनों के पम धन हं  ै। माया  का पंच आपका पश भी नहीं क सकता। आप अपने-आप मं े ही वहा कने वाले एवं पम शांतवप हं  ै। आप  ही कैवय मो के अधपत है। मं  ैआपको अनाद, अनत, सवयापक, सबके नयता, कालप, पमे समझती  हँ ू औ बाबा नमका कती हँ ूसंसा के समत पदाथ औ ाणी आपटका क वषमता के काण  पप व हो हे हं  ै, पंतुआप सबमं े समान प सेवच हे हं  ै। भगवन्
!
आप जब मनुयों जैसी लीला कतेहं  ै, तब आप या कना चाहते हं  ै यह कोई नहीं जानता। आपका कभी कोई न य है औ न अय। आपके सबध मं ेलोगों की बु ही वषम हुआ कती है। आप व के आमा हं  ै, वप हं  ै। न आप जम लेतेहं  ै औ  न कम कते हं  ै। फ भी पशु-पी, मनुय, ऋष, जलच आद मं े आप जम लेते हं  ै औ उन योनयों के अनुप  आपनेदूध की मटकी फोक यशोदा मैया को खजा दया था औ उहोंनेआपको बाँधनेकेलए हाथ मं ेसी ली  थी, तब आपकी आँखों मं े आँसू छलक आये थे, काजल कपोलों प बह चला था, ने चंचल हो हे थे औ भय की 

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