भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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मुक्त ज्ञानकोष िविकपीिडया से
मौिलक अिधकार , राज्य के नीित िनदे श क िसद्धां त और
मौिलक कतर् व् य भारत के संिवधान के अनुच्छे द हैं िजनमें अपने
नागिरकों के ूित राज्य के दाियत्वों और राज्य के ूित नागिरकों
के कतर्व्यों का वणर्न िकया गया है .[note 1] इन अनुच्छे दों में
सरकार के द्वारा नीित-िनमार्ण तथा नागिरकों के आचार एवं
व्यवहार के संबध
ं में एक संवध
ै ािनक अिधकार िवधेयक शािमल
है . ये अनुच्छे द संिवधान के आवँयक तत्व माने जाते हैं , िजसे
भारतीय संिवधान सभा द्वारा 1947 से 1949 के बीच िवकिसत
िकया गया था.

मौिलक अिधकारों को सभी नागिरकों के बुिनयादी मानव

अिधकार के रूप में पिरभािषत िकया गया है . संिवधान के भाग
III में पिरभािषत ये अिधकार नःल, जन्म ःथान, जाित, पंथ या
िलंग के भेद के िबना सभी पर लागू होते हैं . ये िविशष्ट ूितबंधों
के अधीन अदालतों द्वारा ूवतर्नीय हैं .

राज्य के नीित िनदे शक िसद्धांत सरकार द्वारा कानून बनाने के

िलए िदशािनदे श हैं . संिवधान के भाग IV में विणर्त ये ूावधान
अदालतों द्वारा ूवतर्नीय नहीं हैं , लेिकन िजन िसद्धांतों पर ये
आधािरत हैं , वे शासन के िलए मौिलक िदशािनदे श हैं िजनको
राज्य द्वारा कानून तैयार करने और पािरत करने में लागू करने की
आशा की जाती है .

मौिलक कतर्व्यों को दे शभिक्त की भावना को बढ़ावा दे ने तथा

भारत के संिवधान की ूःतावना - भारत के मौिलक और
सवोर्च्च कानून

भारत की एकता को बनाए रखने के िलए भारत के सभी
नागिरकों के नैितक दाियत्वों के रूप में पिरभािषत िकया गया है .
संिवधान के चतुथर् भाग में विणर्त ये कतर्व्य व्यिक्तयों और राष्टर् से संबिं धत हैं . िनदे शक िसद्धांतों की तरह, इन्हें कानूनी
रूप से लागू नहीं िकया जा सकता.

1 इितहास
2 मौिलक अिधकार
2.1 समानता का अिधकार

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2.2 ःवतंऽता का अिधकार
2.3 शोषण के िखलाफ अिधकार
2.4 धमर् की ःवतंऽता का अिधकार
2.5 सांःकृ ितक और शैिक्षक अिधकार
2.6 संवध
ै ािनक उपचारों का अिधकार
3 राज्य के नीित िनदे शक िसद्धांत
4 मौिलक कतर्व्य
5 आलोचना और िवश्लेषण
6 मौिलक अिधकारों, िनदे शक िसद्धांतों और मौिलक कतर्व्यों के बीच संबध

7 इन्हें भी दें खें
8 नोट्स
9 फुटनोट्स
10 संदभर्
11 आगे पढ़ें
12 बाहरी िलंक्स

इन्हें भी दे खें: Indian independence movement एवं Constituent Assembly of India
मौिलक अिधकारों और िनदे शक िसद्धांतों का मूल भारतीय ःवतंऽता आंदोलन में था, िजसने ःवतंऽ भारत के लआय के

ै ािनक अिधकारों का
रूप में समाज कल्याण और ःवतंऽता के मूल्यों को ूाप्त करने के िलए संघषर् िकया.[1] भारत में संवध
िवकास इं ग्लैंड के अिधकार िवधेयक, अमेिरका के अिधकार िवधेयक तथा ृांस द्वारा मनुंय के अिधकारों की घोषणा से
ूेिरत हुआ.[2] िॄिटश शासकों और उनकी भारतीय ूजा के बीच भेदभाव का अंत करने के भारतीय राष्टर्ीय कांमेस
(आईएनसी (INC)) के एक उद्दे ँय के साथ-साथ नागिरक अिधकारों की मांग भारतीय ःवतंऽता आंदोलन का एक
महत्वपूणर् िहःसा थी. आईएनसी (INC) द्वारा 1917 से 1919 के बीच अपनाए गए संकल्पों में इस मांग का ःपष्ट उल्लेख
िकया गया था.[3] इन संकल्पों में व्यक्त की गई मांगों में भारतीयों को कानूनी रूप से बराबरी का अिधकार, बोलने का
अिधकार, मुकदमों की सुनवाई करने वाली जूरी में कम से कम आधे भारतीय रखने, रीजनीितक शिक्त तथा िॄिटश

नागिरकों के समान हिथयार रखने का अिधकार दे ना शािमल था.[4]

ूथम िवश्व युद्ध के अनुभवों, 1919 के असंतोषजनक मोंटे ग-चेम्सफोडर् सुधारों सुधार और भारतीय ःवतंऽता आंदोलन में
एम.के. गांधी उभरते ूभाव के कारण नागिरक अिधकारों के िलए मांगें तय करने के संबध
ं में उनके नेताओं के दृिष्टकोण
में उल्लेखनीय पिरवतर्न आया. उनका ध्यान भारतीयों और अंमेजों के बीच समानता का अिधपकार मांगने से हट कर

सभी भारतीयों के िलए ःवतंऽता सुिनिश्चत करने पर केंिित हो गया.[5] 1925 में एनी बीसेंट द्वारा तैयार िकए गए भारत
के राष्टर्मंडल िवधेयक में सात मौिलक अिधकारों की िवशेष रूप से मांग की गई थी - व्यिक्तगत ःवतंऽता, िववेक की
ःवतंऽता, अिभव्यिक्त की ःवतंऽता, एकऽ होने की ःवतंऽता, िलंग के आधार पर भेद-भाव न करने, अिनवायर् ूाथिमक

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िशक्षा और सावर्जिनक ःथलों के उपयोग की ःवतंऽता.[6] 1927 में, कांमेस ने उत्पीड़न के िखलाफ िनगरानी ूदान करने
वाले अिधकारों की घोषणा के आधार पर, भारत के िलए ःवराज संिवधान का मसौदा तैयार करने के िलए एक सिमित के
गठन का संकल्प िलया. 1928 में मोतीलाल नेहरू के नेतत्ृ व में एक 11 सदःयीय सिमित का गठन िकया गया. अपनी
िरपोटर् में सिमित ने सभी भारतीयों के िलए की मौिलक अिधकारों की गारं टी सिहत अनेक िसफािरशें की थीं. ये अिधकार
अमेिरकी संिवधान और युद्ध के बाद यूरोपीय दे शों द्वारा अपनाए गए अिधकारों से िमलते थे तथा उन में से कई 1925 के
िवधेयक से अपनाए गए थे. इन ूावधानों के अनेकों को बाद में मौिलक अिधकारों एवं िनदे शक िसद्धांतों सिहत भारत के
संिवधान के िविभन्न भागों में ज्यों का त्यों शािमल कर िलया गया था.[7]

1931 में भारतीय राष्टर्ीय कांमेस ने अपने कराची अिधवेशन में शोषण का अंत करने, सामािजक सुरक्षा ूदान करने और
भूिम सुधार लागू करने के घोिषत उद्दे ँयों के साथ ःवयं को नागिरक अिधकारों तथा आिथर्क ःवतंऽता की रक्षा करने के
ूित समिपर्त करने का एक संकल्प पािरत िकया. इस संकल्प में ूःतािवत अन्य नए अिधकारों में राज्य के ःवािमत्व
का िनषेध, सावर्भौिमक वयःक मतािधकार, मृत्युदंड का उन्मूलन तथा तथा आवागमन की ःवतंऽता शािमल थे.[8]
जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार िकए गए संकल्प के मसौदे , जो बाद में कई िनदे शक िसद्धांतों का आधार बना, में
सामािजक सुधार लागू करने की ूाथिमक िजम्मेदारी राज्य पर डाली गई और इसी के साथ ःवतंऽता आंदोलन पर

समाजवाद तथा गांधी दशर्न के बढ़ते ूभाव के िचह्न िदखाई दे ने लगे थे.[9] ःवतंऽता आंदोलन के अंितम चरण में 1930
के दशक के समाजवादी िसद्धांतों की पुनरावृित्त िदखाई दे ने के साथ ही मुख्य ध्यान का केंि अल्पसंख्यक अिधकार - जो
उस समय तक एक बड़ा राजनीितक मुद्दा बन चुका था - बन गए िजन्हें 1945 में सूू िरपोटर् में ूकािशत िकया गया था.
िरपोटर् में अल्पसंख्यकों के अिधकारों की रक्षा करने पर जोर दे ने के अलावा "िवधाियकाओं, सरकार और अदालतों के िलए
ऐचरण के मानक" िनधार्िरत करने की भी मांग की गई थी.[10]

अंमेजी राज के अंितम चरण के दौरान, भारत के िलए 1946 के कैिबनेट िमशन ने सत्ता हःतांतरण की ूिबया के भाग के
रूप में भारत के भारत के िलए संिवधान का मसौदा तैयार करने के िलए संिवधान सभा का एक मसौदा तैयार िकया.[11]
िॄिटश ूांतों तथा राजसी िरयासतों से परोक्ष रूप से चुने हुए ूितिनिधयों से बनी भारत की संिवधान सभा ने िदसंबर

1946 में अपनी कायर्वाही आरं भ की और नवंबर 1949 में भारत के संिवधान का मसौदा पूणर् िकया.[12] कैिबनेट िमशन
की योजना के मुतािबक, मौिलक अिधकारों की ूकृ ित और सीमा, अल्पसंख्यकों की रक्षा तथा आिदवासी क्षेऽों के
ूशासन के िलए सलाह दे ने हे तु सभा को सलाह दे ने के िलए एक सलाहकार सिमित का गठन होना था. तदनुसार,
जनवरी 1947 में एक 64 सदःयीय सलाहकार सिमित का गठन िकया गया, इनमें से ही फरवरी 1947 में मौिलक

अिधकारों पर जे. बी. कृ पलानी की अध्यक्षता में एक 12 सदःयीय उप-सिमित का गठन िकया गया.[13] उप सिमित ने
मौिलक अिधकारों का मसौदा तैयार िकया और सिमित को अूैल 1947 तक अपनी िरपोटर् ूःतुत करदी और बाद में
उसी महीने सिमित ने इसको सभा के सामने ूःतुत कर िदया, िजसमें अगले वषर् तक बहस और चचार्एं हुईं तथा िदसंबर

1948 मे अिधकांश मसौदे को ःवाकार कर िलया गया.[14] मौिलक अिधकारों का आलेखन संयुक्त राष्टर् महासंघ द्वारा

मानव अिधकारों की सावर्भौिमक घोषणा को ःवीकार करने, संयुक्त राष्टर् मानवािधकार आयोग की गितिविधयों[15] के
साथ ही साथ अमेिरकी संिवधान में अिधकार िवधेयक की व्याख्या में अमेिरकी सवोर्च्च न्यायालय द्वारा िदए गए िनणर्यों
से ूभािवत हुआ था.[16] िनदे शक िसद्धांतों का मसौदे , िजसे भी मौिलक अिधकारों पर बनी उप सिमित द्वारा ही तैयार
िकया गया था, में भारतीय ःवतंऽता आंदोलन के समाजवादी उपदे शों का समावेश िकया गया था और वह आयिरश

संिवधान में िवद्यमान ऐसे ही िसद्धांतों से ूेिरत था.[17] मौिलक कतर्व्य बाद में 1976 में संिवधान के 42वें संशोधन द्वारा

जोड़े गए थे.[18]

मुख्य लेख : Fundamental Rights in India
संिवधान के भाग III में सिन्निहत मौिलक अिधकार, सभी भारतीयों के िलए नागिरक अिधकार सुिनिश्चत करते हैं और
सरकार को व्यिक्तगत ःवतंऽता का अितबमण करने से रोकने के साथ-साथ नागिरकों के अिधकारों की समाज द्वारा

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अितबमण से रक्षा करने का दाियत्व भी राज्य पर डालते हैं .[19] संिवधान द्वारा मूल रूप से सात मौिलक अिधकार ूदान
िकए गए थे- समानता का अिधकार, ःवतंऽता का अिधकार, शोषण के िवरुद्ध अिधकार, धमर्, संःकृ ित एवं िशक्षा की

ःवतंऽता का अिधकार, संपित्त का अिधकार तथा संवध
ै ािनक उपचारों का अिधकार.[20] हालांिक, संपित्त के अिधकार को
1978 में 44वें संशोधन द्वारा संिवधान के तृतीय भाग से हटा िदया गया था.[21][note 2]

मौिलक अिधकारों का उद्दे ँय व्यिक्तगत ःवतंऽता तथा समाज के सभी सदःयों की समानता पर आधािरत लोकतांिऽक

िसद्धांतों की रक्षा करना है .[22] वे, अनुच्छे द 13 के अंतगर्त िवधाियका और कायर्पािलका की शिक्तयों की पिरसीमा के रूप
में कायर् करते हैं [note 3] और इन अिधकारों का उल्लंघन होने पर भारत के सवोर्च्च न्यायालय तथा राज्यों के उच्च
न्यायालयों को यह अिधकार है िक ऐसे िकसी िवधायी या कायर्कारी कृ त्य को असंवध
ै ािनक और शून्य घोिषत कर

सकें.[23] ये अिधकार राज्य, िजसमें अनुच्छे द 12 में दी गई व्यापक पिरभाषा के अनुसार न केवल संघीय एवं राज्य
सरकारों की िवधाियका एवं कायर्पािलका ःकंधों बिल्क ःथानीय ूशासिनक ूािधकािरयों तथा सावर्जिनक कायर् करने

वाली या सरकारी ूकृ ित की अन्य एजेंिसयों व संःथाओं के िवरुद्ध बड़े पैमाने पर ूवतर्नीय हैं .[24] हालांिक, कुछ अिधकार
- जैसे िक अनुच्छे द 15, 17, 18, 23, 24 में - िनजी व्यिक्तयों के िवरुद्ध भी उपलब्ध हैं .[25] इसके अलावा, कुछ मौिलक
अिधकार - जो अनुच्छे द 14, 20, 21, 25 में उपलब्ध हैं , उन सिहत - भारतीय भूिम पर िकसी भी राष्टर्ीयता वाले व्यिक्त
पर लागू होते हैं , जबिक अन्य - जैसे जो अनुच्छे द 15, 16, 19, 30 के अंतगर्त उपलब्ध है - केवल भारतीय नीगिरकों पर

लागू होते हैं .[26][27]
साँचा:Rights

मौिलक अिधकार संपण
ू र् नहीं होते तथा वे सावर्जिनक िहतों की रक्षा के िलए आवँयक उिचत ूितबंधों के अधीन होते

हैं .[24] 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के मामले में[note 4] सवोर्च्च न्यायालय ने अपने 1967 के पूवर्
िनणर्य को रद्द करते हुए िनणर्य िदया िक मौिलक अिधकारों में संशोधन िकया जा सकता है , यिद इस तरह के िकसी

संशोधन से संिवघान के बुिनयादी ढांचे का उल्लंघन होता हो, तो न्याियक समीक्षा के अधीन.[28] मौिलक अिधकारों को
संसद के ूत्येक सदन में दो ितहाई बहुमत से पािरत संवध
ै ािनक संशोधन के द्वारा बढ़ाया, हटाया जा सकता है या

अन्यथा संशोिधत िकया जा सकता है .[29] आपात िःथित लागू होने की िःथित में अनुच्छे द 20 और 21 को छोड़कर शेष
मौिलक अिधकारों में से िकसी को भी राष्टर्पित के आदे श द्वारा अःथाई रूप से िनलंिबत िकया जा सकता है .[30]
आपातकाल की अविध के दौरान राष्टर्पित आदे श दे कर संवध
ै ािनक उपचारों के अिधकारों को भी िनलंिबत कर सकते हैं ,
िजसके पिरणामःवरूप िसवाय अनुच्छे द 20 व 21 के िकसी भी मौिलक अिधकार के ूवतर्न हे तु नागिरकों के सवोर्च्च

न्यायालय में जाने पर रोक लग जाती है .[31] संसद भी अनुच्छे द 33 के अंतगर्त कानून बना कर, उनकी सेवाओं का
समुिचत िनवर्हन सुिनिश्चत करने तथा अनुशासन के रखरखाव के िलए भारतीय सशस्तर् सेनाओं और पुिलस बल के
सदःयों के मौिलक अिधकारों के अनुूयोग को ूितबंिधत कर सकती है .[32]

समानता का अिधकार
समानता का अिधकार संिवधान की ूमुख गारं िटयों में से एक है . यह अनुच्छे द 14-16 में सिन्निहत हैं िजसमें सामूिहक
रूप से कानून के समक्ष समानता तथा गैर-भेदभाव के सामान्य िसद्धांत शािमल हैं ,[33] तथा अनुच्छे द 17-18 जो

सामूिहक रूप से सामािजक समानता के दशर्न को आगे बढ़ाते हैं .[34] अनुच्छे द 14 कानून के समक्ष समानता की गारं टी
दे ता है , इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यिक्तयों को कानून का समान संरक्षण ूदान करता है .[note 5]
इस में कानून के ूािधकार की अधीनता सबके िलए समान है , साथ ही समान पिरिःथितयों में सबके साथ समान

व्यवहार.[35] उत्तरवतीर् में राज्य वैध ूयोजनों के िलए व्यिक्तयों का वगीर्करण कर सकता है , बशतेर् इसके िलए यथोिचत
आधार मौजूद हो, िजसका अथर् है िक वगीर्करण मनमाना न हो, वगीर्करण िकये जाने वाले लोगों में सुगम िवभेदन की
एक िविध पर आधािरत हो, साथ ही वगीर्करण के द्वारा ूाप्त िकए जाने वाले ूयोजन का तकर्संगत संबध
ं होना आवँयक
है .[36]

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अनुच्छे द 15 केवल धमर्, मूलवंश, जाित, िलंग, जन्म ःथान, या इनमें से िकसी के ही आधार पर भेदभाव पर रोक
लगाता है . अंशतः या पूणर्तः राज्य के कोष से संचािलत सावर्जिनक मनोरं जन ःथलों या सावर्जिनक िरसोटर् में िनशुल्क
ूवेश के संबध
ं में यह अिधकार राज्य के साथ-साथ िनजी व्यिक्तयों के िखलाफ भी ूवतर्नीय है .[37] हालांिक, राज्य को
मिहलाओं और बच्चों या अनुसूिचत जाित व अनुसूिचत जनजाित सिहत सामािजक और शैिक्षक रूप से िपछड़े वगोर्ं के
नागिरकों के िलए िवशेष ूावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है . इस अपवाद का ूावधान इसिलए िकया गया है

क्योंिक इसमें विणर्त वगोर् के लोग वंिचत माने जाते हैं और उनको िवशेष संरक्षण की आवःयकता है .[38] अनुच्छे द 16
सावर्जिनक रोजगार के संबध
ं में अवसर की समानता की गारं टी दे ता है और राज्य को िकसी के भी िखलाफ केवल धमर्,
नःल, जाित, िलंग, वंश, जन्म ःथान या इनमें से िकसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है . िकसी भी िपछड़े
वगर् के नागिरकों का सावर्जिनक सेवाओं में पयार्प्त ूितिनिधत्व सुनुिश्चत करने के िलए उनके लाभाथर् सकारात्मक
कारर् वाई के उपायों के कायार्न्वयन हे तु अपवाद बनाए जाते हैं , साथ ही िकसी धािमर्क संःथान के एक पद को उस धमर् का
अनुसरण करने वाले व्यिक्त के िलए आरिक्षत िकया जाता है .[39]

अःपृँयता की ूथा को अनुच्छे द 17 के अंतगर्त एक दं डनीय अपराध घोिषत कर िकया गया है , इस उद्दे ँय को आगे

बढ़ाते हुए नागिरक अिधकार संरक्षण अिधिनयम 1955 संसद द्वारा अिधिनयिमत िकया गया है .[34] अनुच्छे द 18 राज्य
को सैन्य या शैक्षिणक िविशष्टता को छोड़कर िकसी को भी कोई पदवी दे ने् से रोकता है तथा कोई भी भारतीय नागिरक
िकसी िवदे शी राज्य से कोई पदवी ःवीकार नहीं कर सकता. इस ूकार, भारतीय कुलीन उपािधयों और अंमेजों द्वारा ूदान
की गई और अिभजात्य उपािधयों को समाप्त कर िदया गया है . हालांिक, भारत रत्न पुरःकारों जैसे, भारतरत्न को सवोर्च्च
न्यायालय द्वारा इस आधार पर मान्य घोिषत िकया गया है िक ये पुरःकार माऽ अलंकरण हैं और ूप्तकतार् द्वारा पदवी के
रूप में इःतेमाल नहीं िकया जा सकता.[40][41]

ःवतं ऽ ता का अिधकार
संिवधान के िनमार्ताओं द्वारा महत्वपूणर् माने गए व्यिक्तगत अिधकारों की गारं टी दे ने की दृिष्ट से ःवतंऽता के अिधकार
को अनुच्छे द 19-22 में शािमल िकया गया है और इन अनुच्छे दों में कुछ ूितबंध भी शािमल हैं िजन्हें िवशेष
पिरिःथितयों में राज्य द्वारा व्यिक्तगं ःवतंऽता पर लागू िकया जा सकता है . अनुच्छे द 19 नागिरक अिधकारों के रूप में

छः ूकार की ःवतंऽताओं की गारं टी दे ता है जो केवल भारतीय नागिरकों को ही उपलब्ध हैं .[42] इनमें शािमल हैं भाषण
और अिभव्यिक्त की ःवतंऽता, एकऽ होने की ःवतंऽता, हिथयार रखने की ःवतंऽता, भारत के राज्यक्षेऽ में कहीं भी
आने-जाने की ःवतंऽतता, भारत के िकसी भी भाग में बसने और िनवास करने की ःवतंऽता तथा कोई भी पेशा अपनाने
की ःवतंऽता. ये सभी ःवतंऽताएं अनुच्छे द 19 में ही विणर्त कुछ उिचत ूितबंधों के अधीन होती हैं , िदन्हें राज्य द्वारा उन
पर लागू िकया जा सकता है . िकस ःवतंऽता को ूितबंिधत िकया जाना ूःतािवत है , इसके आधार पर ूितबंधों को लागू
करने के आधार बदलते रहते हैं , इनमें शािमल हैं राष्टर्ीय सुरक्षा, सावर्जिनक व्यवःथा, शालीनता और नैितकता,
न्यायालय की अवमानना, अपराधों को भड़काना और मानहािन. आम जनता के िहत में िकसी व्यापार, उद्योग या सेवा का
नागिरकों के अपवजर्न के िलए राष्टर्ीयकरण करने के िलए राज्य को भी सशक्त िकया गया है .[43]

अनुच्छे द 19 द्वारा गारं टीशुदा ःवतंऽताओं की आगे अनुच्छे द 20-22 द्वारा रक्षा की जाती है .[44] इन अनुच्छे दों के िवःतार,
िवशेष रूप से िनधार्िरत ूिबया के िसद्धांत के संबध
ं में, पर संिवधान सभा में भारी बहस हुई थी. िवशेष रूप से बेनेगल
नरिसंह राव ने यह तकर् िदया िक ऐसे ूावधान को लागू होने से सामािजक कानूनों में बाधा आएगी तथा व्यवःथा बनाए

रखने में ूिबयात्मक किठनाइयां उत्पन्न होंगी, इसिलए इसे पूरी तरह संिवधान से बाहर ही रखा जाए.[45] संिवधान
सभा ने 1948 में अंततः "िनधार्िरत ूिबया" शब्दों को हटा िदया और उनके ःथान पर “कानून द्वारा ःथािपत ूिबया” को
शािमल कर िलया.[46] पिरणाम के रूप में एक, अनुच्छे द 21, जो िविध द्वारा ःथािपत ूिबया के अनुसार होने वाली

कायर्वाही को छोड़ कर, जीवन या व्यिक्तगत संवतंऽता में राज्य के अितबमण से बचाता है ,[note 6] के अथर् को 1978 तक
कायर्कारी कायर्वाही तक सीिमत समझा गया था. हालांिक, 1978 में, मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में
सवोर्च्च न्यायालय ने अनुच्छे द 21 के संरक्षण को िवधाई कायर्वाही तक बढ़ाते हुए िनणर्य िदया िक िकसी ूिबया को
िनधार्िरत करने वाला कानून उिचत, िनंपक्ष और तकर्संगत होना चािहए,[47] और अनुच्छे द 21 में िनधार्िरत ूिबया को

ूभावी ढं ग से पढ़ा.[48] इसी मामले में सुूीम कोटर् ने यह भी कहा िक अनुच्छे द 21 के अंतगर्त "जीवन" का अथर् माऽ एक

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"जीव के अिःतत्व" से कहीं अिधक है ; इसमें मानवीय गिरमा के साथ जीने का अिधकार तथा वे सब पहलू जो जीवन को

"अथर्पण
ू र्, पूणर् तथा जीने योग्य" बनाते हैं , शािमल हैं .[49] इस के बाद की न्याियक व्याख्याओं ने अनुच्छे द 21 के अंदर
अनेक अिधकारों को शािमल करते हुए इसकी सीमा का िवःतार िकया है िजनमें शािमल हैं आजीिवका, ःवच्छ पयार्वरण,

अच्छा ःवाःथ्य, अदालतों में तेविरत सुनवाई तथा कैद में मानवीय व्यवहार से संबिं धत अिधकार. [50] ूाथिमक ःतर
पर िशक्षा के अिधकार को 2002 के 86वें संवध
ै ािनक संशोधन द्वारा अनुच्छे द 21ए में मौिलक अिधकार बनाया गया
है .[51]

अनुच्छे द 20 अपराधों के िलए दोषिसिद्ध के संबध
ं में संरक्षण ूदान करता है , िजनमें शािमल हैं पूवव्र् यापी कानून व दोहरे

दं ड के िवरुद्ध अिधकार तथा आत्म-दोषारोपण से ःवतंऽता ूदान करता है .[52] अनुच्छे द 22 िगरफ्तार हुए और िहरासत
में िलए गए लोगों को िवशेष अिधकार ूदान करता है , िवशेष रूप से िगरफ्तारी के आधार सूिचत िकए जाने, अपनी पसंद
के एक वकील से सलाह करने, िगरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर एक मिजःशे ट के समक्ष पेश िकए जाने और मिजःशे ट के
आदे श के िबना उस अविध से अिधक िहरासत में न रखे जाने का अिधकार.[53] संिवधान राज्य को भी अनुच्छे द 22 में

उपलब्ध रक्षक उपायों के अधीन, िनवारक िनरोध के िलए कानून बनाने के िलए अिधकृ त करता है .[54] िनवारक िनरोध
से संबिं धत ूावधानों पर संशयवाद तथा आशंकाओं के साथ चचार् करने के बाद संिवधान सभा ने कुछ संशोधनों के साथ

1949 में अिनच्छा के साथ अनुमोदन िकया था.[55] अनुच्छे द 22 में ूावधान है िक जब एक व्यिक्त को िनवारक िनरोध
के िकसी भी कानून के तहत िहरासत में िलया गया है , ऐसे व्यिक्त को राज्य केवल तीन महीने के िलए परीक्षण के िबना
िगरफ्तार कर सकता है , इससे लंबी अविध के िलए िकसी भी िनरोध के िलए एक सलाहकार बोडर् द्वारा अिधकृत िकया
जाना आवँयक है . िहरासत में िलए गए व्यिक्त को भी अिधकार है िक उसे िहरासत के आधार के बारे में सूिचत िकया
जाएगा, और इसके िवरुद्ध िजतना जल्दी अवसर िमले अभ्यावेदन करने की अनुमित दी जाएगी.[56]

शोषण के िखलाफ अिधकार
शोषण के िवरुद्ध अिधकार, अनुच्छे द 23-24 में िनिहत हैं , इनमें राज्य या व्यिक्तयों

द्वारा समाज के कमजोर वगोर्ं का शोषण रोकने के िलए कुछ ूावधान िकए गए हैं .[57]
अनुच्छे द 23 के ूावधान के अनुसार मानव तःकरी को ूितबिन्धत है , इसे कानून
द्वारा दं डनीय अपराध बनाया गया है , साथ ही बेगार या िकसी व्यिक्त को पािरौिमक
िदए िबना उसे काम करने के िलए मजबूर करना जहां कानूनन काम न करने के िलए
या पािरौिमक ूाप्त करने के िलए हकदार है , भी ूितबंिधत िकया गया है . हालांिक,
यह राज्य को सावर्जिनक ूयोजन के िलए सेना में अिनवायर् भतीर् तथा सामुदाियक

राइट्स के अंतगर्त शोषण के
िखलाफ बाल ौम और िभक्षु क
िनिषद्ध हो गए.

सेवा सिहत, अिनवायर् सेवा लागू करने की अनुमित दे ता है .[58][59] बंधुआ ौम
व्यवःथा (उन्मूलन) अिधिनयम, 1976, को इस अनुच्छे द में ूभावी करने के िलए

संसद द्वारा अिधिनयिमत िकया गया है .[60] अनुच्छे द 24 कारखानों, खानों और अन्य
खतरनाक नौकिरयों में 14 वषर् से कम उॆ के बच्चों के रोजगार पर ूितबंध लगाता
है . संसद ने बाल ौम (िनषेध और िविनयमन) अिधिनयम, 1986 अिधिनयिमत
िकया है , िजसमें उन्मूलन के िलए िनयम ूदान करने, और बाल ौिमक को रोजगार दे ने पर दं ड के तथा पूवर् बाल

ौिमकों के पुनवार्स के िलए भी ूावधान िदए गए हैं .[61]

धमर् की ःवतं ऽ ता का अिधकार
इन्हें भी दे खें: Secularism in India
धमर् की ःवतंऽता का अिधकार अनुच्छे द 25-28 में िनिहत है , जो सभी नागिरकों को धािमर्क ःवतंऽता ूदान करता है
और भारत में धमर्िनरपेक्ष राज्य सुिनिश्चत करता है . संिवधान के अनुसार, यहां कोई आिधकािरक राज्य धमर् नहीं है और

राज्य द्वारा सभी धमोर्ं के साथ िनंपक्षता और तटःथता से व्यवहार िकया जाना चािहए.[62] अनुच्छे द 25 सभी लोगों को

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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िववेक की ःवतंऽता तथा अपनी पसंद के धमर् के उपदे श, अभ्यास और ूचार की ःवतंऽता की गारं टी दे ता है . हालांिक,
यह अिधकार सावर्जिनक व्यवःथा, नैितकता और ःवाःथ्य तथा राज्य की सामािजक कल्याण और सुधार के उपाय
करने की शिक्त के अधीन होते हैं .[63] हालांिक, ूचार के अिधकार में िकसी अन्य व्यिक्त के धमार्ंतरण का अिधकार

शािमल नहीं है , क्योंिक इससे उस व्यिक्त के िववेक के अिधकार का हनन होता है .[64] अनुच्छे द 26 सभी धािमर्क
संूदायों तथा पंथों को सावर्जिनक व्यवःथा, नैितकता तथा ःवाःथ्य के अधीन अपने धािमर्क मामलों का ःवयं ूबंधन
करने, अपने ःतर पर धमार्थर् या धािमर्क ूयोजन से संःथाएं ःथािपत करने और कानून के अनुसार संपित्त रखने, ूाप्त
करने और उसका ूबंधन करने के अिधकार की गारं टी दे ता है . ये ूावधान राज्य की धािमर्क संूदायों से संबिं धत संपित्त

का अिधमहण करने की शिक्त को कम नहीं करते.[65] राज्य को धािमर्क अनुसरण से जुड़ी िकसी भी आिथर्क, राजनीितक

या अन्य धमर्िनरपेक्ष गितिविध का िविनयमन करने की शिक्त दी गई है .[62] अनुच्छे द 27 की गारं टी दे ता है िक िकसी भी
व्यिक्त को िकसी िवशेष धमर् या धािमर्क संःथा को बढ़ावा दे ने के िलए टै क्स दे ने के िलए मजबूर नहीं िकया जा
सकता.[66] अनुच्छे द 28 पूणर्तः राज्य द्वारा िवत्तपोिषत शैिक्षक संःथाओं में धािमर्क िशक्षा का िनषेध करता है तथा राज्य
से िवत्तीय सहायता लेने वाली शैिक्षक संःथाएं, अपने िकसी सदःय को उनकी (या उनके अिभभावकों की) ःवाकृ ित के
िबना धािमर्क िशक्षा ूाप्त करने या धािमर्क पूजा में भाग लेने के िलए मजबूर नहीं कर सकतीं.[62]

सां ः कृ ितक और शै ि क्षक अिधकार
अनुच्छे द 29 व 30 में िदए गए सांःकृ ितक और शैिक्षक अिधकार, उन्हें अपनी िवरासत का संरक्षण करने और उसे
भेदभाव से बचाने के िलए सक्षम बनाते हुए सांःकृितक, भाषाई और धािमर्क अल्पसंख्यकों के अिधकारों की रक्षा के

उपाय हैं .[67] अनुच्छे द 29 अपनी िविशष्ट भाषा, िलिप और संःकृ ित रखने वाले नागिरकों के िकसी भी वगर् को उनका
संरक्षण और िवकास करने का अिधकार ूदान करता है , इस ूकार राज्य को उन पर िकसी बाह्य संःकृित को थोपने से

रोकता है .[67][68] यह राज्य द्वारा चलाई जा रही या िवत्तपोिषत शैिक्षक संःथाओं को, ूवेश दे ते समय िकसी भी नागिरक
के साथ केवल धमर्, मूलवंश, जाित, भाषा या इनमें से िकसी के आधार पर भेदभाव करने से भी रोकता है . हालांिक, यह
सामािजक और शैिक्षक रूप से िपछड़े वगोर्ं के िलए राज्य द्वारा उिचत संख्या में सीटों के आरक्षण तथा साथ ही एक
अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा चलाई जा रही शैिक्षक संःथा में उस समुदाय से संबिं धक नागिरकों के िलए 50 ूितशत तक
सीटों के आरक्षण के अधीन है .[69]

अनुच्छे द 30 सभी धािमर्क और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी ःवयं की संःकृ ित को बनाए रखने और िवकिसत करने
के िलए अपनी पसंद की शैिक्षक संःथाएं ःथािपत करने और चलाने का अिधकार ूदान करता है और राज्य को, िवत्तीय
सहायता दे ते समय िकसी भी संःथा के साथ इस आधार पर िक उसे एक धािमर्क या सांःकृितक अल्पसंख्यक द्वारा

चलाया जा रहा है , भेदभाव करने से रोकता है .[68] हालांिक शब्द "अल्पसंख्यक" को संिवधान में पिरभािषत नहीं िकया
गया है , सवोर्च्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार इसका अथर् है कोई भी समुदाय िजसके सदःयों की संख्या,
िजस राज्य में अनुच्छे द 30 के अंतगर्त अिधकार चािहए, उस राज्य की जनसंख्या के 50 ूितशत से कम हो. इस
अिधकार का दावा करने के िलए, यह जरूरी है िक शैिक्षक संःथा को िकसी धािमर्क या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा
ःथािपत और ूशािसत िकया गया हो. इसके अलावा, अनुच्छे द 30 के तहत अिधकार का लाभ उठाया जा सकता है , भले
ही ःथािपत की गई शैिक्षक संःथा ःवयं को केवल संबिं धत अल्पसंख्यक समुदाय के धमर् या भाषा के िशक्षण तक

सीिमत नहीं रखती, या उस संःथा के अिधसंख्य छाऽ संबिं धत अल्पसंख्यक समुदाय से संबध
ं नहीं रखते हों.[70] यह
अिधकार शैिक्षक मानकों, कमर्चािरयों की सेवा की शतोर्ं, शुल्क संरचना और दी गई सहायता के उपयोग के संबध
ं में
उिचत िविनयमन लागू करने की राज्य की शिक्त के अधीन है .[71]

सं वै ध ािनक उपचारों का अिधकार
संवध
ै ािनक उपचारों का अिधकार नागिरकों को अपने मौिलक अिधकारों के ूवतर्न या उल्लंघन के िवरुद्ध सुरक्षा के िलए

भारत के सवोर्च्च न्यायालय में जाने की शिक्त दे ता है .[72] अनुच्छे द 32 ःवयं एक मौिलक अिधकार के रूप में, अन्य
मौिलक अिधकारों के ूवतर्न के िलए गारं टी ूदान करता है , संिवधान द्वारा सवोर्च्च न्यायालय को इन अिधकारों के रक्षक

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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के रूप में नािमत िकया गया है .[73] सवोर्च्च न्यायालय को मौिलक अिधकारों के ूवतर्न के िलए बंदी ूत्यक्षीकरण ,
परमादे श , िनषेध , उत्ूेषण और पृच्छा ूादे श जारी करने का अिधकार िदया गया है , जबिक उच्च न्यायालयों को
अनुच्छे द 226 - जो एक मैिलक अिधकार नहीं है - मौिलक अिधकारों का उल्लंघन न होने पर भी इन िवशेषािधकार

ूादे शों को जारी करने का अिधकार िदया गया है .[74] िनजी संःथाओं के िखलाफ भी मौिलक अिधकार को लागू करना
तथा उल्लंघन के मामले में ूभािवत व्यिक्त को समुिचत मुआवजे का आदे श जारी करना भी सवोर्च्च न्यायालय के
क्षेऽािधकार में है . सवोर्च्च न्यायालय दवारा ःवूेरणा से या जन िहत यािचका के आधार पर अपने क्षेऽािधकार का ूयोग

कर सकता है .[72] अनुच्छे द 359 के ूावधानों जबिक आपातकाल लागू हो, को छोड़ कर यह अिधकार कभी भी िनलंिबत
नहीं िकया जा सकता.[73]

मुख्य लेख : Directive Principles in India
संिवधान के चतुथर् भाग में सिन्निहत राज्य के नीित िनदे शक िसद्धांतों, में संिवधान की ूःतावना में ूःतािवत आिथर्क

और सामािजक लोकतंऽ की ःथापना हे तु मागर्दशर्न के िलए राज्य को िनदे श िदए गए हैं .[75] वे संिवधान सभा द्वारा

भारत में पिरकिल्पत सामािजक बांित के लआय रहे मानवीय और समाजवादी िनदे शों को बताते हैं .[76] राज्य से यह
अपेक्षा की गई है िक हालांिक ये ूकृित में न्यायोिचत नहीं हैं , कानून और नीितयां बनाते समय इन िसद्धांतों को ध्यान में
रखा जाएगा. िनदे शक िसद्धांतों को िनम्निलिखत ौेिणयों के अंतगर्त वगीर्कृत िकया जा सकता है : वे आदशर् िजन्हें ूाप्त
करने के िलए राज्य को ूयास करने चािहएं; िवधायी और कायर्कारी शिक्तयों के ूयोग के िलए िनदे श और नागिरकों के
अिधकार िजनकी सुरक्षा करना राज्य का लआय होना चािहए.[75]

न्यायोिचत न होने के बावजूद िनदे शक िसद्धांत राज्य पर एक रोक का काम करते हैं ; इन्हें मतदाताओं एवं िवपक्ष के हाथों

में एक मानदं ड के रूप में माना गया है िजससे वे चुनाव के समय सरकार के कायर्ूदशर्न को माप सकें.[77] अनुच्छे द 37,
यह बताते हुए िक िनदे शक िसद्धांत कानून की िकसी भी अदालत में ूवतर्नीय नहीं हैं , उन्हें "दे श के शासन के िलए

बुिनयादी" घोिषत करता है और िवधान के मामलों में इन्हें लागू करने का दाियत्व भी राज्य पर डालता है .[78] इस ूकार
वे संिवधान के कल्याणकारी राज्य के मॉडल पर जोर दे ने का काम करते हैं और सामािजक, आिथर्क और राजनीितक
न्याय को ःवीकार करते हुए लोगों के कल्याण को ूोत्साहन दे ने के िलए, साथ ही अनुच्छे द 38 के अनुसार आय
असमानता से लड़ने और व्यिक्तगत गिरमा को सुिनिश्चत करने के िलए राज्य के सकारात्मक कतर्व्यों पर जोर दे ते
हैं .[79][80]

अनुच्छे द 39 राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीितयों के कुछ िसद्धांत तय करता है , िजनमें सभी नागिरकों के िलए
आजीिवका के पयार्प्त साधन ूदान करना, स्तर्ी और पुरुषों के िलए समान कायर् के िलए समान वेतन, उिचत कायर् दशाएं,
कुछ ही लोगों के पास धन तथा उत्पादन के साधनों के संकेंिन में कमी लाना और सामुदाियक संसाधनों का “सावर्जिनक

िहत में सहायक होने” के िलए िवतरण करना शािमल हैं .[81] ये धाराएं, राज्य की सहायता से सामािजक बांित लाकर,
एक समतावादी सामािजक व्यवःथा बनाने तथा एक कल्याणकारी राज्य की ःथापना करने के संवध
ै ािनक उद्दे ँयों को
िचह्नांिकत करती हैं और इनका खिनज संसाधनों के साथ-साथ सावर्जिनक सुिवधाओं के राष्टर्ीयकरण को समथर्न दे ने के

िलए उपयोग िकया गया है .[82] इसके अलावा, भूसंसाधनों के न्यायसंगत िवतरण के सुिनिश्चत करने के िलए, संघीय एवं
राज्य सरकारों द्वारा कृ िष सुधारों और भूिम पट्टों के कई अिधिनयम बनाए गए हैं .[83]

अनुच्छे द 41-43 जनादे श राज्य को सभी नागिरकों के िलए काम का अिधकार, न्यूनतम मजदरू ी, सामािजक सुरक्षा,
मातृत्व राहत और एक शालीन जीवन ःतर सुरिक्षत करने के ूयास करने के अिधकार दे ते हैं .[84] इन ूावधानों का

उद्दे ँय ूःतावना में पिरकिल्पत एक समाजवादी की राज्य की ःथापना करना है .[85] अनुच्छे द 43 भी राज्य को कुटीर
उद्योगों को ूोत्साहन दे ने की िजम्मेदारी दे ता है और इसको आगे बढ़ाते हुए संघीय सरकार ने राज्य सरकारों के समन्वय

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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से खादी, हैं डलूम आिद को ूोत्साहन दे ने के िलए अनेक बोडोर्ं की ःथापना की है .[86] अनुच्छे द 39ए के अनुसार राज्य को
आिथर्क अथवा अन्य अयोग्यताओं पर ध्यान िदए िबना िनशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करवाकर यह सुिनिश्चत
करना है िक सभी नागिरकों को न्याय ूाप्त करने के अवसर िमलें.[87] अनुच्छे द 43ए राज्य को उद्योगों के ूबंधन में

ौिमकों की भागीदारी सुिनिश्चत करने की िदशा में काम करने के िलए अिधकार दे ता है .[85] अनुच्छे द 46 के तहत, राज्य
को अनुसूिचत जाितयों व अनुसूिचत जनजाितयों के िहतों को ूोत्साहन दे ने और उनके आिथर्क ःतर को ऊपर उठाने के
िलए काम करने और उन्हें भैद-भाव तथा शोषण से बचाने का अिधकार िदया गया है . इस ूावधान को ूभावी बनाने के
िलए दो संिवधान संशोधनों सिहत कई अिधिनयम बनाए गए हैं .[88]

अनुच्छे द 44 दे श में वतर्मान में लागू िविभन्न िनजी कानूनों में िवसंगितयों को दरू करके सभी नागिरकों के िलए समान
नगगिरक संिहता बनाने के िलए राज्य को ूोत्सािहत करता है . हालांिक, सवोर्च्च न्यायालय द्वारा ूावधानों को लागू
करने के िलए अनेक अनुःमारक िदए जाने के बावजूद यह एक अंधपऽ होकर रह गया है .[89] अनुच्छे द 45 द्वारा मूल रूप
में राज्य को 6 से 14 वषर् की आयु के बच्चों को िनशुल्क तथा अिनवायर् िशक्षा ूदान करने का अिधकार िदया गया
था;[90] लेिकन बाद में 2002 में 86वें संिवधान संशोधन के बाद इसे मौिलक अिधकार में पिरवितर्त कर िदया गया है

और छः वषर् तक की आयु के बच्चों के बचपन की दे खभाल सुिनिश्चत करने का दाियत्व राज्य पर डाला गया है .[51]
अनुच्छे द 47 जीवन ःतर ऊंचा उठाने, सावर्जिनक ःवाःथ्य में सुधार करने तथा ःवाःथ्य के िलए हािनकारक नशीले पेय

और दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की ूितबद्धता राज्य को सौंपी गई है .[91] पिरणाम के रूप में कई राज्यों में आंिशक

या संपण
ू र् िनषेध लागू कर िदया गया है , लेिकन िवत्तीय मजबूिरयों ने इसको पूणर् रूप से लागू करने से रोक रखा है .[92]
अनुच्छे द 48 के द्वारा भी राज्य को नःल सुधार कर तथा पशुवध पर रोक लगा कर आधुिनक एवं वैज्ञािनक तरीके से कृ िष
और पशुपालन को संगिठत करने की िजम्मेदारी दी गई है .[93] अनुच्छे द 48ए राज्य को पयार्वरण की रक्षा और वनों तथा
वन्यजीवों के संरक्षण का आदे श दे ता है , जबिक अनुच्छे द 49 राष्टर्ीय महत्त्व के ःमारकों और वःतुओं का संरक्षण

सुिनिश्चत करने का दाियत्व राज्य को सौंपता है .[94] अनुच्छे द 50 के अनुसार राज्य को न्याियक ःवतंऽता सुिनिश्चत
करने के िलए सावर्जिनक सेवाओं में न्यायपािलका का कायर्पािलका से अलगाव सुिनिश्चत करना है और संघीय कानून

बनाकर इस उद्दे ँय को ूाप्त कर िलया गया है .[95][96] अनुच्छे द 51 के अनुसार, राज्य को अंतरराष्टर्ीय शांित और सुरक्षा
के संवधर्न हे तु ूयास करने चािहएं तथआ अनुच्छे द 253 के द्वारा संसद को अंतरार्ष्टर्ीय संिधयां लागू करने के िलए कानून
बनाने का अिधकार िदया गया है .[97]

नागिरकों के मौिलक कतर्व्य 1976 में सरकार द्वारा गिठत ःवणर्िसंह सिमित की

िसफािरशों पर, 42वें संशोधन द्वारा संिवधान में जोड़े गए थे.[18][98] मूल रूप से
संख्या में दस, मौिलक कतर्व्यों की संख्या 2002 में 86वें संशोधन द्वारा ग्यारह
तक बढ़ाई गई थी, िजसमें ूत्येक माता-िपता या अिभभावक को यह सुिनिश्चत
करने का कतर्व्य सौंपा गया िक उनके छः से चौदह वषर् तक के बच्चे या वाडर् को

भारतीय राष्टर्ीय ध्वज के ूित कोई भी
अनादर कायर् गै र कानूनी है .

िशक्षा का अवसर ूदान कर िदया गया है .[51] अन्य मौिलक कतर्व्य नागिरकों को
कतर्व्यबद्ध करते हैं िक संिवधान सिहत भारत के राष्टर्ीय ूतीकों का समेमान करें ,
इसकी िवरासत को संजोएं, इसकी िमिौत संःकृ ित का संरक्षण करें तथा इसकी
सुरक्षा में सहायता दें . वे सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा
दे ने, पयार्वरण और सावर्जिनक संपित्त की रक्षा करने, वैज्ञािनक सोच का िवकास
करने, िहं सा को त्यागने, और जीवन के सभी क्षेऽों में उत्कृ ष्टता की िदशा में ूयास

करने के कतर्व्य भी सौंपते हैं .[99] नागिरक इन कतर्व्यों का पालन करने के िलए संिवधान द्वारा नैितक रूप से बाध्य हैं .
हालांिक, िनदे शक िसद्धांतों की तरह, ये भी न्यायोिचत नहीं हैं , उल्लंघन या अनुपालना न होने पर कोई कानूनी कायर्वाही

नहीं हो सकती.[98][100] ऐसे कतर्व्यों का उल्लेख मानव अिधकारों की सावर्भौिमक घोषणा तथा नागिरक एवं राजनीितक
अिधकारों पर अंतरार्ष्टर्ीय ूितज्ञापऽ जैसे अंतरार्ष्टर्ीय लेखपऽों में है , अनुच्छे द 51ए भारतीय संिवधान को इन संिधयों के

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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अनुरूप लाता है .[98]

अब कम ही बच्चे खतरनाक वातावरण में कायर्रत हैं , लेिकन गैर खतरनाक नौकिरयों में उनका रोजगार, घरे लू नौकर के
रूप में ूचलन, कई आलोचकों और मानव अिधकार अिधवक्ताओं की नजरों में संिवधान की भावना का उल्लंघन करता
है . एक करोड़ पैंसठ लाख से अिधक बच्चे रोजगार में हैं .[101] सरकारी अिधकािरयों और राजनीितज्ञों में मौजूद ॅष्टाचार

के ःतर के अनुसार 2005 में भारत 159 दे शों की सूची में 88वें ःथान पर था.[102] वषर् 1990-1991 को बीआर अम्बेडकर
की ःमृित में "सामािजक न्याय वषर्" घोिषत िकया गया था.[103] सरकार िचिकत्सा एवं अिभयांिऽकी पाठ्यबमों के
अनुसूिचत जाित एवं जनजाित के छाऽों को िनशुल्क पाठ्यपुःतकें ूदान करती है . 2002-2003 के दौरान रुपये 4.77

करोड़ (477 लाख) इस उद्दे ँय के िलए जारी िकए गए थे.[104] अनुसूिचत जाितयों और जनजाितयों को भेदभाव से बचाने
के िलए, सरकार ने ऐसे कृ त्यों के िलए कड़े दं डों का ूावधान करते हुए 1995 में अत्याचार िनवारण अिधिनयम
अिधिनयिमत िकया था.[105]

1948 का न्यूनतम मजदरू ी अिधिनयम सरकार को संपण
ू र् आिथर्क क्षेऽ में काम कर रहे लोगों की न्यूनतम मजदरू ी तय

करने का अिधकार दे ता है .[106] उपभोक्ता संरक्षण अिधिनयम 1986 उपभोक्ताओं को बेहतर सुरक्षा ूदान करता है .
अिधिनयम का उद्दे ँय उपभोक्ताओं की िशकायतों का सरल, त्विरत और सःता समाधान ूदान करना और जहां उपयुक्त

पाया जाए राहत और मुआवजा िदलाना हैं .[कृ पया उद्धरण जोड़ें ] समान पािरौिमक अिधिनयम 1976 मिहलाओं और पुरुषों
दोनों को समान कायर् के िलए समान वेतन ूदान करता है .[107] सम्पूणर् मामीण रोजगार योजना (यूिनवसर्ल मामीण
रोजगार कायर्बम) 2001 में मामीण गरीबों को लाभदायक रोजगार ूदान करने के उद्दे ँय से शुरू िकया गया था.
कायर्बम पंचायती राज संःथाओं के माध्यम से कायार्िन्वत िकया गया था.[108]

िनवार्िचत माम पिरषदों का एक तंऽ पंचायती राज के नाम से जाना जाता है , यह लगभग भारत के सभी राज्यों और

केंिशािसत ूदे शों में लागू है .[109] पंचायती राज में ूत्येक ःतर पर कुल सीटों की संख्या की एक ितहाई मिहलाओं के
िलए आरिक्षत की गई हैं , िबहार के मामले में आधी सीटें मिहलाओं के िलए आरिक्षत हैं .[110][111] जम्मू एवं काँमीर

तथा नागालैंड को छोड़ कर सभी राज्यों और ूदे शों में न्यायपािलका को कायर्पािलका से अलग कर िदया गया है .[104]
भारत की िवदे श नीित िनदे शक िसद्धांतों से ूभािवत है . भारतीय सेना द्वारा संयुक्त राष्टर् के शांित कायम करने के 37
अिभयानों में भाग लेकर भारत ने संयुक्त राष्टर् संघ के शांित ूयासों में सहयोग िदया है .[112]

सभी नागिरकों के िलए एक समान नागिरक संिहता का कायार्न्वयन राजनैितक दलों और िविभन्न धािमर्क समूहों के बड़े
पैमाने पर िवरोध के कारण हािसल नहीं िकया जा सका है . शाह बानो मामले (1985-1986) ने भारत में एक राजनीितक
तूफान भड़का िदया था जब सवोर्च्च न्यायालय ने कहा िक एक मुिःलम मिहला शाह बानो िजसे 1978 में उसके पित
द्वारा तलाक दे िदया गया था, सभी मिहलाओं के िलए लागू भारतीय िविध के अनुसार अपने पूवर् पित से गुजारा भत्ता ूाप्त
करने की हकदार थी. इस फैसले ने मुिःलम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी िजसने मुिःलम पसर्नल लॉ लागू करने की
मांग की और ूितिबया में संसद ने सवोर्च्च न्यायालय के फैसले को उलटते हुए मुिःलम मिहला (तलाक पर अिधकार

संरक्षण) अिधिनयम 1986 पािरत कर िदया.[113] इस अिधिनयम ने आगे आबोश भड़काया, न्यायिवदों, आलोचकों और
नेताओं ने आरोप लगाया िक धमर् या िलंग के बावजूद सभी नागिरकों के िलए समानता के मौिलक अिधकार की िविशष्ट
धािमर्क समुदाय के िहतों की रक्षा करने के िलए अवहे लना की गई थी. फैसला और कानून आज भी गरम बहस के ॐोत
बने हुए हैं , अनेक लोग इसे मौिलक अिधकारों के कमजोर कायार्न्वयन का एक ूमुख उदाहरण बताते हैं .[113]

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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िनदे शक िसद्धांतों को मौिलक अिधकारों के साथ िववाद की िःथित में कानून की संवध
ै ािनक वैधता को बनाए रखने के
िलए इःतेमाल िकया गया है . 1971 में 25वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छे द 31सी में ूावधान है िक अनुच्छे द
39(बी)-(सी) में िनदे शक िसद्धांतों को ूभावी बनाने के िलए बनाया गया कोई भी कानून इस आधार पर अवैध नहीं होगा
िक वे अनुच्छे द 14, 19 और 31 द्वारा ूदत्त मौिलक अिधकारों से अवमूिल्यत हैं . 1976 में 42वें संशोधन द्वारा इस
अनुच्छे द का सभी िनदे शक िसद्धांतों पर िवःतार िकया गया था लेिकन ने इस िवःतार को शून्य घोिषत कर िदया क्योंिक
इससे संिवधान के बुिनयादी ढांचे में पिरवतर्न होता था.[114] मौिलक अिधकार और िनदे शक िसद्धांत दोनों का संयुक्त

इःतेमाल सामािजक कल्याण के िलए कानूनों का आधार बनाने में िकया गया है .[115] केशवानंद भारती मामले में फैसले
के बाद सवोर्च्च न्यायालय ने यह दृिष्टकोण अपना िलया है िक मौिलक अिधकार और िनदे शक िसद्धांत एक दस
ू रे के पूरक
हैं , दोनों एक कल्याणकारी राज्य बनाने के िलए सामािजक बांित के एक ही लआय के िलए कायर् करते हैं .[116] इसी ूकार,
सवोर्च्च न्यायालय ने मौिलक कतर्व्यों का ूयोग मौिलक कतर्व्यों मे िदए गए उद्दे ँयों को ूोत्सािहत करने वाले कानूनों

की संवध
ै ािनक वैधता बनाए रखने के िलए िकया है .[117] इन कतर्व्यों को सभी नागिरकों के िलए अिनवायर् ठहराया गया

है , बशतेर् राज्य द्वारा उनका ूवतर्न एक वैध कानून के द्वारा िकया जाए.[99] सवोर्च्च न्यायालय ने एक नागिरक को अपने
कतर्व्य के उिचत पालन के िलए ूभावी और सक्षम बनाने हे तु ूावधान करने की दृिष्ट से राज्य को इस संबध
ं में िनदे श
जारी िकए हैं .[117]

भारतीय कानून में ूादे श
भारत में मानवािधकार
संवध
ै ािनक अथर्शास्तर्
उच्चतम क़ानून के अनुसार शासन

1. ↑ According to Articles 12 and 36, the term State, for
the purposes of the chapters on Fundamental Rights
and Directive Principles, includes all authorities within
the territory of India. It includes the Government of
India, the Parliament of India, the Government and
legislature of the states of India. It also includes all
local or other authorities such as Municipal
Corporations, Municipal Boards, District Boards,
Panchayats etc. To avoid confusion with the term
states, the administrative divisions, State
(encompassing all the authorities in India) has been
capitalized and the term state is in lowercase.
2. ↑ The right to property is still a Constitutionally
recognised right, but is now contained outside the
Part on Fundamental Rights, in Article 300A which
states:
No person shall be deprived of his property save
by authority of law.

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भारत

यह लेख यह ौेणी के सम्बन्ध में है:

भारत की राजनीित

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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3. ↑ According to Article 13,
The State shall not make any law which takes
away or abridges the rights conferred by this
Part and any law made in contravention of this
clause shall, to the extent of the contravention,
be void.
The term law has been defined to include not only
legislation made by Parliament and the legislatures of
the states, but also ordinances, rules, regulations, bye
laws, notifications, or customs having the force of law.
4. ↑ His Holiness Kesavananda Bharati v. State of Kerala,
AIR 1973 SC 1461. This was popularly known as the
Fundamental Rights Case.
5. ↑ Article 14 states:
The State shall not deny to any person equality
before the law or the equal protection of the laws
within the territory of India.
6. ↑ Article 21 states:
No person shall be deprived of his life or
personal liberty except according to procedure
established by law.

1. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 50
2. ↑ तायल बी.बी. और जेकब, ए. (2005), इं िडयन िहःशी, वल्डर्

डे वलपमेंट्स एंड िसिवक्स , पृष्ठ. ए-23
3. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 52–53
4. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 53
5. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 53–54
6. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 54
7. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 54–55

भारत सरकार
सं ि वधान
भारत का संिवधान
[[मूलभूत अिधकार, नीित िनदेर् शक तत्व,
नीित िनदेर् शक तत्व
एवं नागिरकों के कतर्व्य]]
कायर् प ािलका
भारत सरकार
ूधानमंऽी
मनमोहन िसंह
मंऽीमंडल
िवधाियका
संसद
राष्टर्पित
ूितभा पािटल
उपराष्टर्पित
हािमद अंसारी
लोकसभा
लोकसभा अध्यक्ष
सोमनाथ चटजीर्
राज्यसभा
राज्यसभा के अध्यक्ष
न्यायपािलका
सवोर्च्च न्यायालय
न्यायाधीश
के जी बालाकृ ंणन
उच्च न्यायालय
िजला न्यायालय

8. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 56
9. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 56–57
10. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 57
11. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 15
12. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 19

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ःथानीय
पंचायती राज
भारतीय चु न ाव

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

http://hi.wikipedia.org/wiki/भारत_के_मौिलक_अिधकार,_िनदे शक_िसद्धां...

13. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 61–62
14. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 62–63
15. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 59
16. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 73
17. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 73–74
18. ↑ 18.0 18.1 Basu 1993, पृष्ठ 131
19. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 50–51
20. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 51
21. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 79
22. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 114
23. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 78–79

2007 राष्टर्पित चुनाव
2004 आमचुनाव
चुनाव आयोग
मुख्य िनवार्चन अिधकारी
ूां तीय चुनाव
राजनै ितक दल
राजनै ितक कां ड
िवदे श संबंध
Other countries • ूवेशद्वार:राजनीित
ूवेशद्वार:भारत सरकार

24. ↑ 24.0 24.1 Basu 2003, पृष्ठ 35
25. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 86–87
26. ↑ तायल बी.बी. और जेकब, ए. (2005), इं िडयन िहःशी, वल्डर्

डे वलपमेंट्स एंड िसिवक्स , पृष्ठ. ए-25
27. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 85
28. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 1647–1649
29. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 1645
30. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 1615–1616
31. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 1617–1618
32. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 129–130
33. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 90
34. ↑ 34.0 34.1 Basu 1993, पृष्ठ 93–94
35. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 56–57
36. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 88
37. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 90–91
38. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 91
39. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 133–134
40. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 94–95
41. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 164
42. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 167–168
43. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 96–97

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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44. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 167
45. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 101–102
46. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 104–105
47. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 258
48. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 105–106
49. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 259
50. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 260–261
51. ↑ 51.0 51.1 51.2 86वीं अमेंडमेंट एक्ट, 2002. (http://indiacode.nic.in/coiweb/amend/amend86.htm)
52. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 102
53. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 282–284
54. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 106
55. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 110–112
56. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 107
57. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 110
58. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 110–111
59. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 325
60. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 326
61. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 327
62. ↑ 62.0 62.1 62.2 Basu 1993, पृष्ठ 111
63. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 327–328
64. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 330
65. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 336–337
66. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 343
67. ↑ 67.0 67.1 Basu 2003, पृष्ठ 345
68. ↑ 68.0 68.1 Basu 1993, पृष्ठ 115
69. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 346–347
70. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 348–349
71. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 354–355
72. ↑ 72.0 72.1 Basu 2003, पृष्ठ 391
73. ↑ 73.0 73.1 Basu 1993, पृष्ठ 122
74. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 123
75. ↑ 75.0 75.1 Basu 1993, पृष्ठ 137

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http://hi.wikipedia.org/wiki/भारत_के_मौिलक_अिधकार,_िनदे शक_िसद्धां...

76. ↑ Austin 1999, पृष्ठ 75
77. ↑ Basu 1999, पृष्ठ 140–142
78. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 140
79. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 141
80. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 448
81. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 448–449
82. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 449–450
83. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 143
84. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 454–456
85. ↑ 85.0 85.1 Basu 2003, पृष्ठ 456
86. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 144
87. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 453
88. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 457–458
89. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 456–457
90. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 457
91. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 459
92. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 144–145
93. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 459–460
94. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 460
95. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 145
96. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 461
97. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 461–462
98. ↑ 98.0 98.1 98.2 Basu 2003, पृष्ठ 465
99. ↑ 99.0 99.1 Basu 1993, पृष्ठ 131
100. ↑ तायल बी.बी. और जेकब, ए. (2005), इं िडयन िहःशी, वल्डर् डे वलपमेंट्स एंड िसिवक्स , पृष्ठ. ए-35
101. ↑ "Child labour in India" (http://www.indiatogether.org/photo/2006/chi-labour.htm) . India
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102. ↑ शांसपैरेंसी इं टरनैशनल द्वारा ॅष्टाचार की धारणा का सूचकांक ूकािशत.
103. ↑ "Dr. Bhimrao Ambedkar" (http://ambedkarfoundation.nic.in/html/bharat.htm) . Dr. Ambedkar
Foundation (http://ambedkarfoundation.nic.in/) . http://ambedkarfoundation.nic.in
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104. ↑ 104.0 104.1 तायल बी.बी. और जेकब, ए. (2005), इं िडयन िहःशी, वल्डर् डे वलपमेंट्स एंड िसिवक्स , पृष्ठ. ए-45
105. ↑ "Prevention of Atrocities Act, 1995" (http://www.hrw.org/reports/1999/india/India994-18.htm) .

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भारत के मौिलक अिधकार, िनदे शक िसद्धांत और मौिलक कतर्व्य - िविकपीिडया

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109. ↑ "Panchayati Raj in India" (http://www.empowerpoor.org/backgrounder.asp?report=164) .
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110. ↑ 73वीं अमेंडमेंट एक्ट, 1992 (http://indiacode.nic.in/coiweb/amend/amend73.htm) .
111. ↑ "Seat Reservation for Women in Local Panchayats" (http://www.newpaltz.edu/asianstudies
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http://www.newpaltz.edu/asianstudies/nycas
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112. ↑ "India and United Nations" (http://www.un.int/india/india_and_the_un_pkeeping.html) .
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113. ↑ 113.0 113.1 “Shah Bano legacy (http://www.hinduonnet.com/thehindu/2003/08/10/stories
/2003081000221500.htm) ”, पृष्ठ 1। अिभगमन ितिथ: 2006-09-11।
114. ↑ Basu 1993, पृष्ठ 142
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116. ↑ Basu 2003, पृष्ठ 444
117. ↑ 117.0 117.1 Basu 2003, पृष्ठ 466

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Human and People's Right of 1981.

युिनवसर्ल िडक्लेरेशन ऑफ़ ह्युमन राइट्स एंड इं टरनैशनल कोवेनैंट ऑन िसिवल एंड पॉिलिटकल राइट्स का लेख
29.

इस लेख से सम्बंिधत िवकीसोसर् के पास
मूल पाठ हैं :

फं डामें ट ल राइट्स
डाइरे ि क्टव िूं ि सपल्स और
फं डामें ट ल ड्यु ि टज़
भारत के िवषय

[िदखाएँ ]

"http://hi.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_
%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4
%95_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0,_%E0
%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%95_%E0%A4%B8
%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4
%A4_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0
%A4%95_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A5%8D
%E0%A4%AF&oldid=1802136" से िलया गया
ौेिणयाँ: लेख िजनमें September 2010 से मृत किड़याँ हैं
लेख िजनमें September 2010 से dmy ितिथ format ूयोग करने की आवशकता है भारत का संिवधान
राष्टर्ीय मानव अिधकार के साधन
अिन्तम पिरवतर्न 22:52, 22 माचर् 2012।
यह साममी िबयेिटव कॉमन्स ऍशीब्यूशन/शेयर-अलाइक लाइसेंस के तहत उपलब्ध है ; अन्य शतेर् लागू हो सकती
हैं । िवःतार से जानकारी हे तु दे खें उपयोग की शतेर्ं

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