सोऽहं – तनज

ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

सोऽहं
साधक"व व)ृ k हे तु साlाह
साlाहक
lाहक आaयािcमक पm,का
ईमेल: soham@vedicupasana.com | www.vedicupasana.com
nलॉग – www.tanujathakur.com
|| pी गणेशाय नमः ||
|| pी गुरवे नमः||
नमः||
‘उपासना हद ू धम!"थान सं$थान’
थान’ क& '$त(ु त
)'य +म,- एवं साधक-,
‘सोऽहं’ का 'सार करने हे तु इसे आप अपने ईमेल आईडी ारा अय +म,-के साथ साझा कर8 , साथ ह9 यद आपके
कोई +म, ‘सोऽहं’ के ऑनलाइन सद$य बनना चाहते ह=, तो उह8 अपना मेल आईडी

soham@vedicupasna.com पर

भेजनेके +लए कह8 | ऐसा करनेसे आपको धम'सार करनेक& संPध +मलेगी और आप ईSर9य कृपाके पा, ह-गे |
लेख-के मV
ु य शीषक:
१. सव
ु चन
२. गुZ सं$मरण
३. 'ायोPगक साधनाके संदभम8 मागदशन
४. साधक-क& अनभ
ु ू(तयां
५. अ(न^ श_`से संबंPधत आaयािcमक उपाय,
उपाय, 'd एवं अनभ
ु ू(तयां
६. शंका समाधान
७. साधक-ारा आaयािcमक उन(त हे तु 'यास
८. धम'सार एवं धमया,ाके मaयम8 हुई अhछj और क^'द अनभ
ु ू(तयां

1

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

९. साधना हे तु सैkां(तक जानकार9
१०.
१०. वैदक सनातन धमम8 ऐसा uय- ?

१. सव
ु चन
अ. pीगुZ उवाच

परम पw
डॉ. जयंत बालाजी आठवले
ू य डॉ. 
हंदओ
ु ंका ऐसा सोचना yक mबना आaयािcमक बल हम कुछ भी कर सकते ह=, यह अzानता और अहंके ल{ण ह=
| अतः इस 'कारका अयो|य })^कोण न रख8 और आaयािcमक {मता बढाने हे तु साधना कर8 ! - परम पw
ू य डॉ.
जयंत बालाजी आठवले |

आ. शा€ वचन
रोहते सायकै)वkं वनं परशुना हतम ्
वाचा दZ
ु `ं भीभcसं न स‚ोह(त वाu{तम ्
- महाभारत, उƒोगपव
अथ : धनुषारा yकये गए आघातके घाव भर सकते ह=, कु…हाड़ीसे काट9 गयी जंगल पन
ु ः प…ल)वत हो सकती है
परं तु शnद-बाणारा yकया गया कटा{को भल
ू ना संभवतः कठन है |

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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

इ. धमधारा
१. जम हद ु और कम हदम
ु 8 uया भेद है ?
जम हद ु अथात जो समझता है yक मा, हद ु कुलम8 जम लेनेसे म= हद ू कहलाने यो|य हो गया और
उसे लगता है हंद ु धम $वयंभू है अतः वह न^ नह9ं हो सकता अतः समाजम8 हो रहे धम|ला(नको दे खकर
वह मौन रहता है और न ह9 वह धमाचरण करता है |
कम हद ु वह है

जो अपने ह9न गण
ु -का अथात $वभावदोष और अहं को दरू करने हे तु 'य‰शील रहता है

और अपने )वषय वासनाओंको (नयंm,त कर शा€ वचन-को अपने जीवनम8 उतारनेका 'यास करते हुए हद ु
धम र{णाथ yŠयाशील रहता है, हद ु धम आज तक इस संसारम8 ऐसे ह9 हंदओ
ु ंके सcकमके कारण
)वƒमान है |

२. जबसे इस दे शके {m,य-ने अहंसाका पाठ पढा है (स‚ाट अशोकके कालसे यह आरं भ हुआ) तबसे इस दे शपर
बा आŠमणकाŽरय-क& यहांपर 'भ"ु व करनेक& इhछा बलवती होती चल9 गई और अनेक शतक-से हम पर कोई
न कोई राज करता आ रहा है | आज ^ नेता, गुंडे और नपस
ुं क 'व)ृ के नेताओंने इस दे शक& आतंŽरक और
बा दोन- ह9 सुर{ाको खतरे म8

डाल द9 है !

३. आज अPधकांश मस 
या तो बल 'योगसे या लालचके कारण या अय
ु लमान या ईसाई जो भारतीय ह= उनके पूवज
yकसी पŽरि$थ(तवश धमा‘तŽरत हुए, वा$त)वकता यह है yक ऐसे सभी ’य_`म8 धमा+भमानक& कमी थी; परं तु आज वे
लोग ह9 हद ु धमके +लए सबसे बड़ा खतरा बन गए ह=, ऐसा uय- ? uय-yक अय क”रपंPथय-ने उह8 अपने
तथाकPथत धमक& घु”ी )पलाकर, उनम8 अपने पंथके '(त क”रता जागत
ृ कर उह8 हद ु धमका द•ु मन बना दया |
अतः हंदओ
ु ं यद अपनी अगल9 पीढ़9को हद ु दे खना चाहते हो तो धम+श{ण —हण करो और अय हंदओ
ु ंको भी दो,
अयथा हमार9 अगल9 पीढ9 जो नाममा, हंद ु रह जाएगी उसे धमा‘तŽरत होनेम8 अPधक समय नह9ं लगेगा |
४. ै त भावय`
ु भ_`म8 )वयोग हो सकता है , अै तम8 आनंद ह9 आनंद होता है |
५. दाह- सं$कार हेतु मत
ृ शर9रको ले जाते समय ‘राम नाम सcय है’ uय- कहते ह= ?
मcृ युके उपरांत प˜च 'ाण दे ह छोड़ ™šा›डम8 )वल9न हो जाते ह= िजनक& साधना और पु›याई अhछj होती है
उह8 तरु ं त ग(त +मलती है और वे मcृ यु उपरांतक& या,ा तय करने हे तु अपने आगेका 'वास आरभ कर दे ते ह=;
परतु क+ल यग
ु म8 अPधकांश ’य_`क& साधना इतनी 'ग…भ नह9ं होती और मcृ युके उपरांत अचानक ह9 शर9रको
3

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

न पाकर कुछ +लंगदे ह अपनी वासनाक& त(ृ l हेतु दस
ू रे शर9रम8 'वेश करनेका 'यास करने लगती ह= और ऐसेम8
उनके आप-पास उपि$थत ’य_`म8 वे सरलतासे 'वेश कर सकती ह= अतः रामका नाम लेनेसे 'ेत$थलपर उपि$थत
’य_`के ऊपर कवच (नमाण होता है और उनका र{ण होता है | साथ ह9 +लंगदे ह और मत
ृ दे हसे '{े)पत होने
वाल9 काल9 श_`से भी र{ण होता है |
६. हद9 भाषाके आलेख-म8 उद ू और अं—ेज़ी शnद-का 'योग uय- नह9ं करना चाहए और लेखनी 'भावशाल9 हो इस
हे तु uया 'यास करना चाहए ?
सं$कृत(नž हंद9 ह9 हमार9 राŸ भाषा है " अतः सभी हंदओ
ं े शुk सं$कृत(नž हंद9 +लखने
ु न

और बोलनेके

'यास आरभ करने चाहए | यद बोलते या +लखते समय उद ू शnद या अं—ेज़ी शnद आये

तो उसके

$थानपर शुk हंद9 शnद सोचकर उसका 'योग करना चाहए | उद ू एवं अं—ेज़ी भाषाएँ तमोगण
ु ी ह= इनके
'योगसे सं$कृत(नž हंद9 भाषाक& साि"वकता कम
+लखते समय भाषाम8 चैतय 'वाहत हो
'भावशाल9 हो जाती है

हो जाती है

|

इस हे तु मां सर$वतीसे 'ाथना करनेपर आलेख $वतः ह9

|

७. शभ
ु कामनाएं मaय राm,म8 uय- नह9ं दे ना चाहए ?
संaया कालके आरभ होते ह9 रज-तमका 'भाव वातावरणम8 बढ़ने लगता है

अतः इस कालम8 संaया या आरती

जैसी धा+मक कृ(त क& जाती है uय-yक संaया कालम8 yकये गए धमाचरण हम8

उस रज-तमके आवरणसे बचाता

है | परतु आजकल तमोगण
ु ी पा¢ाcय सं$कृ(तका अंधा अनुकरण करनेके चŠ’यूहम8 फंसे हंद ु इन बात-का मह"व
नह9ं समझते | मल
ू तः हमार9 भारतीय सं$कृ(तम8 कोई भी शुभ काय मaय राm, नह9ं yकया जाता है ; परतु
वतमान समयम8 मaयराm,म8 ह9 शभ
ु कामनाएं दे नेक& पैशाPचक कु'था आरभ हो गयी है और फल$व¤प उन
शभ
ु कामनाओंका कोई 'भाव नह9ं पडता |
८.

शnदातीत अaयाcमक& अनभ
ु ू(त हो जानेपर शnद-का कोई मह"व नह9ं रह जाता ! परं तु यह भी एक कटु सcय है
yक आaयािcमक या,ाक& शुZआत शnदजय जानकार9से ह9 होती है |

९. संत-क& पर9{ा लेनेके +लए हमारा आaयािcमक $तर उनसे ऊंचा होना चाहए uय-yक पर9{कका $तर पर9{ाथ¥से
अPधक होना चाहए यह तो सामाय ’यावहाŽरक zान है |

१०. जब तक संत या ईSरक& इhछा न हो तब तक कोई खरे संतको पहचान नह9ं सकता |
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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

ई. गीता सार
नाि$त ब)ु kरय`
ु $य न चायु`$य भावना ।
न चाभावयतः शाितरशात$य कुतः सख
ु म् ॥
अथ : न जीते हुए मन और इि¨य-वाले पZ
ु षम8 (न¢यािcमका ब)ु k नह9ं होती और उस अय`
ु मनु©यके अतःकरणम8
भावना भी नह9ं होता तथा भावनाह9न मनु©यको शाित नह9ं +मलती और शाितरहत मनु©यको सुख कैसे +मल सकता
है ?
भावाथ : िजस ’य_`का मन सतत )वषय-वासन-म8 आस` हो उसम8 )ववेक जागत
ृ हो ह9 नह9ं सकता | (न¢यािcमका ब)ु k
अथात )ववेक है | उपरो` ªोकम8 भावना शnदका भावाथ ‘भाव’ से है िजसके मनम8 वासनाओंका 'ाब…य हो उसम8 ईSरके
'(त भाव कैसे जागत
ृ हो सकता है ? शां(तक& 'ा(l हे तु साधना करना आव•यक है uय-yक सांसाŽरक )वषय-से {«णक
सख
ु +मल सकता है, Pचरं तन आनंद और शां(तक& 'ा(l नह9ं होती | सख
ु से 'ाl व$तु ह9 दख
ु का कारण होता है जैसे
पु,क& 'ा(lपर सख
ु 'ाl होता है और प,
ु सदै व अ$व$थ रहता हो तो दख
ु 'ाl होता है | आनंद और शां(तक& 'ा(l तभी
संभव है अब साधक भावय`
ु साधना और भ_` करता है , व$तत
ु ः ऐसे ह9 ’य_`को शां(त +मल सकती है | संसारके
yकतने भी सख
ु और साधन उपलnध ह- यद ’य_`का मन शांत नह9ं होता तो वह खरे

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अथ¬म8 वह सुखी नह9ं होता !

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

२. गZ
ु सं$मरण
संत-का आpम होता है रामराwय समान
संत-का आpम रामराwय होता है यद वहां yकसी पण
ू " व 'ाl संतका वास होता हो तो | वष २००४ म8 'मख
ु सेवक-के
अंतगत शु)kकरण अ+भयान आरं भ हुआ था और उसीके माaयमसे हमार9 अहं

(नमल
ू नक& साधना आरं भ हुई | इस

'yŠयाके अंतगत हमार9 चूक सावज(नक $तरपर बतायी जाती थी | हमारे एक सह-साधक थे िजनसे मेरा छोटे भाई
समान $नेह था; परं तु राम जाने कब उनके मनम8 मेरे '(त ई©या (नमाण हो गयी, उह-ने अंदर ह9 अंदर मेरे )वZk कुछ
साधक-को भडकाना आरं भ कर दया, म= उनके इस ’यवहारसे थोड़ी आहत हुई yकतु मझ
ु े मेरे pीगZ
ु के यायपर पण
ू 
)वSास था | म=ने yकसीसे कुछ नह9ं कहा, सब कुछ ईSर इhछा अनस
ु ार हो रहा है यह })^कोण रख, सब कुछ सहन कर,
चप
ु चाप उस 'yŠयाम8 सहभागी होती गयी | आठ मह9नेके प¢ात हमारे उस गZ
ु बंधुने साधना छोड़ द9 और जब म=
pीगुZके पास गोवा गई तो उह-ने मेर9 ओर दे खकर कहा “ ---- (उस साधकका नाम ) लेकर उसे अब कोई गZ
ु कभी
नह9ं $वीकार कर8 ग”े | म=ने अपनी मनक& ’यथा yकसीसे नह9ं कह9 थी; परं तु हमारे सवz स¯Z
ु को जैसे सब पता था,
उनके pीमुखसे उस साधकके +लए इतना कडा दं ड सन
ु , मेरे आंख-म8 आंसू आ गए, म=ने उह8 उस साधकको {मा करनेके
+लए मन ह9 मन 'ाथना क& | ऐसे ह9 तीन और 'संग हुए जब म=ने, उन साधक-ारा गलत दोषारोपण करनेपर भी उसे
गZ
ु ल9लाका भाग मान, अपने सारे चक
ू $वीकार कर +लए; परं तु मेरे साथ छल करनेवाले तीन- साधकको हमारे गZ
ु के
आpमसे बाहर कर दया गया और ‘दै (नक सनातन 'भात’ म8 छापा गया yक उनम8 साधकcव नह9ं है अतः वे सनातनके
साधक पŽरवारके अंग नह9ं है | और उनके बाहर होनेके

+लए म= कारणीभूत भी नह9ं थी | इससे मझ
ु े समझम8 आया yक

संत- का आpम राम राwय समान होता है जहां गंद9 राजनी(त नह9ं चलती और सरल °दयवाले भ`का ईSर र{ण भी
करते ह= और जो उनके साथ छल करनेका 'यास करे उसे दं ड भी दया जाता है |

pीगZ
ु ने समाl कर द9 मो{'ा(l के सं$कार
+सतबर १९९९ म8 गोवा आpमम8 pीगZ
ु के पास जानेका सौभा|य +मला | (उस समय झारख›डम8 धम'सारक& सेवाम8 रत
थी अतः वष म8 एक बार तीन -चार दन-के +लए उनके पास गोवा आpम जानेका सौभा|य 'ाl होता था |) इसी दौरान
तीन दन वे मा, मझ
ु े ह9 दो-दो घंटेका सcसंग दे ते थे मेरे आनंदक& सीमा नह9ं थी तीसरे दन उह-ने सcसंग समाl
होनेके प¢ात पछ
ू ा और uया ?

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ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

म=ने सोचा यह9 सुवण संPध है अपने मनक& बात बतानेका , म=ने cवŽरत ह9 कहा " इस जमम8

ह9 ईSर 'ा(l

करना है दोबारा नह9ं आना इस संसारम8 " ! वे «खल«खलाके हं स पड़े बोले " ऊपर जाकर uया कर8 गी वहां तो कुछ
काम ह9 नह9ं, एक सह± (हज़ार ) वष प¢ात पन
ु ः आना होगा " | म= कुछ नह9ं बोल9 चुपचाप सcसंग समाl होनेपर
कमरे म8 आ गयी | उनके इस सुवचनके दो भावाथ समझम8 आए,पहला yक साधना पथपर गुZसेवा, यह एकमा, ल²य
साधकका होना चाहए और दस
ू रा वे धमसं$थापक ह= और हम उनक& वानर सेना जब-जब धमक& |ला(न होगी तो वे
अवतŽरत ह-गे और हम, जो उनक& वानर सेना ह= उसे तो आना ह9 होगा ! उस दनके प¢ात मा, गुZसेवा करनी है और
आनंदम8 रहना है , यह ह9 जीवनका ल²य रहा | इस घटनके कुछ दन उपरात एक संत +ल«खत —थक& कुछ पं_`य-पर
aयान गया िजसम8 +लखा था " हे 'भ,ु आपने जो इस तh
ु छ जीवको इतना कुछ दे दया, इसके $थानपर यद सौ जम
लेकर भी संपण
ू  जगतम8 ’याl तेरे इस $वZपक& सेवा क¤ँ, तो वह भी कम होगा अतः अब तो मो{ भी नह9ं चाहए,
मा,

तेर9 सेवा करता रहूं, इतनी ह9 इस भ`क& इhछा है " | यह पढ़कर मेरा मन गुZके '(त कृतz हो उठा, इसी

मनोभावको उह-ने एक वाuयम8 yकतने अ³त
ु 'कारसे बता दया था |

गZ
ु जब आzा दे ते ह= तो उस आzाका पालन करनेक& श_` भी दे ते ह= |
मई १९९७ म8 मुंबईम8 जब pी गुZके 'थम दशनका सौभा|य 'ाl हुआ तब उह-ने कहा था yक अhछा है , आप mबहारसे
ह= वहां लोग-को धम और अaयाcम बतानेक& अcयाPधक आव•यकता है , आप जब भी वहां जाय8गी तब वहां 'सार
क&िजयेगा | तब mबहार और झारख›ड एक ह9 था | उसके प¢ात जब म= भी म= अपने माता-)पतासे +मलने mबहार जाती
थी तब वहां अपने पŽरPचत- के बीचम8 'वचन लेती थी और इसम8 हमारे माता-)पता अcयPधक आनंदपव 
सहयोग
ू क

करते

थे | जनवर9 १९९९ म8 हमारे माता- )पताक& एक दघ 
नाम8 मcृ यु हो गयी और pाkके प¢ात भी मझ
ु ट
ु े mबहारम8 कुछ दन
रहना था uय-yक छोटे भाईक& बारहवींक& बोडक& पर9{ा थी अतः मुझे वहां तीन मह9ने Zकना था (म= भाई बहन-म8
सबसे बड़ी हूं ) |
जब माता -)पताका तेरह दनका pाk चल रहा था तब चौथे दन मेरे मनम8 )वचार आने लगा yक परम पूwय गुZदे वने
कहा था yक जब भी mबहार जाएं तब वहांके लोग-को धम-+श{ण दे ना | मझ
ु े लगा संभवत: इसके प¢ात मेरे mबहारम8
आना और )वशेषकर धनबादम8 आना न हो पाए अतः िजतना समय ह= उसम8 यहांके लोग-को धम+श{ण दे ना है uय-yक
+श©यके सभी गण
ु -का राजा तो आzा पालन है अतः मझ
ु े यह तो करना ह9 होगा | माता- )पताके pाkके आमं,ण प,के
पीछे म8 नामजपके )वषयम8 छपवा दया |

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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

pाkका एक (नमं,ण प, म=ने गोवा म8 pीगZ
ु को भी भेजा था, उस (नमं,ण प,को मेरे pीगुZने गोवाम8 संभाल कर
रखा था और कुछ साधक- एवं संत-को दखाया भी | एक साधकने बताया yक एक संतको उह-ने उस pाkके (नमं,ण
प,को दखाते हुए कहा yक हमारे साधक )ववाहके (नमं,ण प,म8 धम 'सार तो करते ह9 ह= , एक साधक ऐसी है िजसके
घर एक ´दय )वदारक घटना होनेपर भी उस {ण वह धम- 'सार करना नह9ं भल
ू 9 ! वा$त)वकता तो यह yक हम चारभाई-बहन-को इस भयंकर )वप)को सहनेक& श_` pीगुZने ह9 द9 थी और और माता-)पतासे अcयPधक 'ेम होते हुए भी
हम8 उस घटनाम8 न सख
ु का भान हो रहा था न ह9 दःु खका और संभवतः उस समय हमार9 यह अव$था ह9 गZ
ु कृपा थी
! इतना ह9 नह9ं उह8 जैसे ह9 इस दख
ु द घटनाके बारे म8 हमारे pीगुZको पता चला, तुरंत ह9 एक wये ž साधकको हम8
दे खनेके +लए गोवासे भेज दया |
चौथे दन धम'सार करना है जब यह बात म=ने अपने wये ž साधकसे कह9 तो वे मेरे मख
ु से यह सब सन
ु कर
आ¢यचyकत हो गए ! म=ने कहा " मझ
ु े तो इतना भान है

yक संभवत: अब म= धनबाद कभी नह9ं आउं गी िजस

$थानपर मेरा जम हुआ है इस $थानके '(त ऋण चक
ु ानेका यह सबसे

यो|य समय है और गZ
ु आzा भी है अतः

आपक& अनम
ु (त चाहए " | वे मझ
ु से कहने लगे yक इस समय यह बात त
ु हारे aयानम8 कैसे आई , म=ने कहा "इसम8
मेरा , इस $थानका , मेरे भाई- बहनका और मेरे $वगवासी माता - )पताका सबका क…याण है , मझ
ु े तो
पता है " |

इतना ह9

यह सन
ु और मेर9 तडप दे ख उह-ने हामी भर द9 और माता )पता के दे हांतके बीसव8 दन म=ने धनबादम8

पहला 'वचन +लया ऐसा करनेपर कुछ लोग-ने पागल तो कुछ लोग- ने और भी कुछ अपशnद कहे , परतु समाज uया
कहता है इसका aयान मझ
ु े कभी रहा ह9 नह9ं, मझ
ु े तो मा, गुZसेवा करनी है और यह जीवन उनके कायको सम)पत है
इतना ह9 पता था !!
मेर9 अंतराcमाने मझ
ु े सह9 ह9 बताया था yक yक वष १९९९ के प¢ात मेरा धनबादम8 रहना नह9ं हो पाया परतु आज
मेरे pीगZ
ु के मागदशनम8 साधना करनेवाले साधक-क& एक छोट9 सी बPगया वहां अव•य है ! आज जब पीछे मड़
ु कर
दे खती हूं तो भान होता है yक अ…पायम
ु 8 अपने माता -)पता को खो दे नेपर, यद मेरे जीवनम8 pीगZ
ु का पदापण नह9ं हुआ
होता तो म= संभवत: अध)व¶{l ि$थ(तम8 होती uय-yक मेरे जीवनम8 मेर9 एक ह9 आस_` तो थी और वह थी मेरे माता )पता , उह8 एक साथ खोकर अपनी मान+सक संतुलनको बनाये रखते हुए pीगZ
ु का आzापालन कर, धम 'सार करना
तो मा, गुZकृपा ह9 हो सकती है ! अतः'+श©य' —थ म8 उनक& +लखी वाणीको उह-ने $वयं ह9 +सk कर द9 yक जब गZ

आदे श दे ते ह= तो +श©यको उस आzाको +सk करने yक श_` और भ_` भी दे ते ह= !!

8

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

३. 'ायोPगक साधनाके संदभम8 मागदशन
हमार9 आaयािcमक {मताके अनस
ु ार संत हम8 साधना बताते ह= इसे ह9 $तरके अनस
ु ार साधना कहते ह= | इसके संदभम8
दो 'ेरक 'संग बताना चाहती हूं |
एक बार एक संत अपने कुछ +श©य-के साथ •मशान भू+मके पाससे जा रहे थे | एक ’य_` अपनी )पताक& Pचताके
अवशेषपर फूट-फूट कर रो रहा था | संतने धीरे से और 'ेमसे उस ’य_`के +सरको $पश yकया और पछ
ू ा “ uया हुआ,
इतना )वलाप uयो’’ ? उस ’य_` सुबकते हुए कहने लगा, “मेरे )पताका दे हावसान हो गया म= उनके mबना कैसे रह
पाउं गा” ? संतने अcयंत 'ेमसे कहा “ जो आया है उसे तो एक दन जाना ह9 है, इस Pचरं तन सcयको $वीकार करो और
चलो मेरे साथ” | इतना कह, उसे अपने साथ चल रहे +श©य-क& टोल9म8 सहभागी कर +लया | एक दस
ू रा ’य_` जो अपने
)पताक& Pचताको अि|न सं$कार कर लौटने वाला था, उसने यह सब दे खा तो उसे भी लगा yक यह सब माया है अतः जब
संत उनके (नकट पहुंचे तो कहने लगा “ बाबा आप मझ
ु े भी अपने शरणम8 ले ल8, म= भी इस माया मोहसे तंग आ गया हूं
मझ
ु े भी सयासी बनना है ” | बाबा मु$कुराते हुए बोले “घरम8 कौन-कौन है ?” उस ’य_` ने कहा ,” प‰ी है, चार बhचे ह=
और वk
ृ मां है “ |

बाबा बोले, “तो जाओ उनक& दे खभाल करो, यह त
ु हार9 साधना है, तम
ु सयास ले लोगे तो उनका

uया होगा” ? इतना कह उसे वा)पस घर भेज दया |
इस 'संगम8 एक ’य_`को सयासके +लए 'ेŽरत कर उसे सयासी बना दया और दस
ू रे को गह
ृ $थ धम (नभानेक& +श{ा
द9 ऐसा संतने uय- yकया ? पहले ’य_`क& साधना और आaयािcमक $तर अhछj थी और वह सयास ले साधना-पथपर
अ—सर हो सकता था; परं तु अzानताके कारण मोहने उसे जकड़ रखा था और वह9ं दस
ू रा ’य_` अपनी दख
ु -से छुटकारा
पाने हेतु भगोडेपनक& व)ृ से सयास लेना चाहता था, यƒ)प वह सयासका पा, नह9ं था |
हमारे pीगुZने इस संदभम8 एक अcयंत मह"वपूण })^कोण बताई है yक ४०% आaयािcमक $तरके नीचेके ’य_` या
साधकने सयास नह9ं लेना चाहए uय-yक ऐसे ’य_`को )वषय-वासनाका (नयं,ण करना संभव नह9ं होता और 'ारnध भी
ती¹ होता है अतः ऐसे लोग यद यो|य गुZके शरणम8 सयास न ल8 तो समाजम8 अनेक उhछृंखलता जम लेती है |
अतः ऐसे ’य_`ने गह
ृ $थ आpमम8 'वेश कर अपनी इhछाओंक& पू(त करते हुए साधनारत रहना का 'यास करना चाहए |
५०% आaयािcमक $तरके ’य_`को यद साधनाम8 अcयPधक ZPच हो और वह yकसी यो|य गZ
ु के शरणम8 साधना कर रहा
हो तो वह बु)kसे (नणय ले )ववाह न चाहे तो नह9ं करे तो भी )वषय-वासनाको साधनाके माaयमसे (नयंm,त कर सकता
है और ६०% से अPधक आaयािcमक $तरके ’य_`का यद ती¹ 'ारnध न हो तो या तो उनका )ववाह नह9ं होता या
)ववाहके कुछ समय उपरांत वे सय$त समान जीवन ’यतीत करते ह= | ऐसे साधक )ववाहके इhछुक नह9ं होते या वे
उhच कोटके संतके मागदशनम8 साधना करते हुए सयासी समान जीवन ’यतीत करते ह= या यद गह
ृ $थ हो तो भी
सदाचारपण
ू  वतन करते हुए आcम(नयं,णक& 'yŠयाका अºयास करते ह= | ऐसे साधक साधना करनेपर अपने )वषयवासनाओंको सहज ह9 (नयंm,त कर सकते ह= |

9

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

‘’जैसे हो अPधकार (पा,ता) वैसे कर8 उपदे श’’ इस कथन अनस
ु ार संत मागदशन करते ह= | एक बार हमारे pीगुZने एक
सcसंगम8 एक छोट9 सी 'ेरक कथा सन
ु ाई थी वह आपको बताती हूं |
एक बार $वामी रामकृ©ण परमहंसके पास एक भ` आया | वह थोड़ा )वच+लत था, $वामीजी ने पूछा, ‘’uया हुआ ?’’
भ`ने कहा, “चौराहे पर एक ’य_` आपको अपशnद कह रहा है, $वामीजीने कहा, “वह त
ु हारे गZ
ु को अपशnद कह रहा था
और तम
ु सन
ु कर आ गए, जाओ उसे रोको और वह शांत न हो तो एक थ»पड़ लगाना’’ | अभी वह (नकल कर गया था
yक एक दस
ू रा भ` आया उसके +सरसे खन
ू बह रहा था, $वामीजीने पूछा, “त
ु ह8 uया हुआ, यह चोट कैसे लगी” ? दस
ू रे
भ`ने कहा “ चौराहे पर एक ’य_` आपको अपशnद कह रहा था मझ
ु े सहन नह9ं हुआ और म=ने उसे मारा और इसी
हाथापाईम8 मुझे चोट लग गयी” | $वामीजीने 'ेमसे «झड़कते हुए और उसके चोटके खन
ू को साफ करते हुए कहा “yकतनी
बार कहा है त
ु ह8 yक सभीम8 काल9 मांका अि$त"व है, इस 'कार yकसीपर हाथ नह9ं उठाते !!” +श©यने +सर झुका
$वामीजीसे {मा मांगी | ऐसा $वामीजीने uय- yकया ?
पहले भ`क& ग¤
ु पर (नžा कम थी अतः $वामीजीने उसे जो भी उसके गुZका )वरोध करे उसका )वरोध करनेक& 'ेरणा द9
| दस
ू रे भ`का 'वास सगण
ु से (नगण
ु क& ओर हो रहा था अतः $वामीजीने उसे सव, काल9के $व¤पको दे खने सीख द9 !!
uया इतना सू²म अºयास करनेवाला अaयाcमशा€ अय धम!म8 है !!!

४. साधक-क& अनभ
ु ू(तयां
pी कोठयाल क& अनभ
ु ू (त :
१. इस वष तनुजा द9द9का द…ल9म8 "गुZप«ू णमा" के पावन पवपर 'वचन आयोिजत था |

कुछ दन पहले ह9 मनम8

यह )वचार आया yक uय- न अब तक िजतने भी सोऽहं सब साधक- तक पहुंचे ह=, उनका एक संकलन (नकालकर
"गZ
ु प«ू णमा" पर )वतŽरत yकया जाए | एक +म,से इसपर चचा भी हुई yक द9द9से इस )वषयम8 बातक& जाए,
yकतु yफर सोचा yक द9द9को "surprise" दया जाए | yकतु कुछ ह9 दन प¢ात द9द9ने दरू भाषपर कहा yक
"गZ
ु प«ू णमा" पर सोऽहंके सभी अंक-का संकलन (नकालना है !
२. तनुजा द9द9ने इस वष माचम8 अपने द…ल9-'वासके मaयम8 सनातन सं$थाारा 'का+शत कुछ —थ पढने हे तु 
दए थे | '(तदन 'यास रहता है yक सोनेसे पव
ू  इनम8से yकसी भी —थके कुछ पž
ृ अव•य पढ सकंू | इन
—ंथ-को पढते समय मन अcयPधक शांत रहता है और असीम आनंदक& अनभ
ु ू(त तो होती ह9 है |

10

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

अनभ
ु ू(तका )वªेषण : उhच कोटके संत-ारा +लखे —ंथ-म8 चैतयका 'माण सौ '(तशत होता है अतः उह8
पढ़नेपर आनंद और शां(तक& अनभ
ु ू(त होती है | ये सारे —ंथ हमारे pीगुZारा

+ल«खत एवं संक+लत ह= |

pी सभ
ु ाष pी(नवास के एक पŽरPचतक& अनभ
ु ू(त :
जब तनज
ु ा द9द9 दस
ू र9 बार चेनईम8 मेरे घर आयीं, तब म= उह8 एक +म,के घर ले कर गया जो मेरे पडोसी भी ह= | वे
एक वै©णव सं'दायसे जड़
ु े हुए ह=, म=ने उह8 द9द9के बारे अPधक कुछ नह9ं बताया था तब भी उह-ने द9द9का अपने घरपर
भावपण
ू  $वागत yकया और द9द9 उनके घर दस +मनटके +लए ह9 Zक& थीं | उह-ने द¶{ण भारतीय सं$कृ(त अनुसार
द9द9को )वदा करते समय नाŽरयल, केला, पान, ह…द9, कुमकुम और उनके आaयािcमक काय हे तु कुछ पैसे अपण yकए |
चूंyक द9द9को तुरंत ह9 yकसी दस
ू रे कायŠमके (न+म कह9ं बाहर जाना था अतः द9द9ने साधना )वषयक कुछ )वशेष बात
भी नह9ं क& |
द9द9के जानेके प¢ात हमारे +म,क& प‰ी दोपहरक& झपक& लेनेके +लए लेट ग½ | उह8 $व»नम8 एक }^ांत हुआ
| $व»नम8 उह8 तनज
ु ा द9द9 महाल²मीके ¤पम8 दखीं | उस }^ांतके प¢ात उनक& नींद खल
ु ग½ और वे दौड़कर द9द9से
पन
ु ः +मलने हमारे घर आयीं, यह बताने yक उह8 द9द9ने महाल²मीके ¤पम8 दशन दये थे | वे द9द9के कायŠमसे लौटने
तक मेरे घरपर Zक& रह9ं और द9द9से आशीवाद लेकर ह9 ग½ | इस घटनाके प¢ात उनके जीवनम8 अनेक सख
ु द पŽरवतन
आए ह= |
गो¾डाक& nयट
ू 9 कु मार9क& अनभ
ु ू(त :
भावक& पराकाžा
एक दन म= अपने गांवके काल9 मंदरम8 एक दसवीं क{ाक& बाल साPधका nयट
ू 9 कुमार9पर कुछ कारणवश मेरा हाथ उठ
गया, म= बहुत दख
ु ी हो घर आ रह9 थी और सोच रह9 थी yक यह कैसे हो गया और म= ईSरसे {मा मांग रह9 थी परं तु
ईSरका संदेश था yक इस कृ(तक& कता म= नह9ं

अतः मझ
ु े इस बारे म8 दख
ु ी नह9ं होना चाहए, म= उनसे तक कर रह9 थी

yक मारा तो म=ने ह9 है yफर म= इस कृ(तक& कता कैसे नह9ं हूं | यह सब तक करते हुए म= अपने (नवास $थान पहुंची |
पांच +मनटके प¢ात िजस साPधकाको म=ने मारा था वह संकोच करते हुए आई और मझ
ु े एक कागजका टुकड़ा दे कर भाग
गयी | उसम8 उसक& अनभ
ु ू(त इस 'कार +लखी हुई थी |
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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

" म=ने परम पw
ू य गुZदे व डॉ. जयंत आठवले ारा +ल«खत —ंथ "+श©य " पढ़ा | उसम8 +लखा था yक जब गZ
ु अपने
+श©यको डांटते है तो वे उह8 अपना समझकर ऐसा करते ह= और ऐसे साधकको गZ
ु +श©यके ¤पम8 अपना लेते ह= "| तब
म=ने गांवके काल9 मदरम8 काल9 मांको 'ाथना क&, yक तनुजा द9द9 मुझे सबके सामने थ»पड़ मारे और इस 'कार वे मझ
ु े
अपना ल8गी और ऐसा ह9 हुआ, जब द9द9 मझ
ु े थ»पड़ मार रह9 थीं तब मझ
ु े उनम8 परम पw
ू य डॉ. जयंत आठवले का
दशन हुआ और मझ
ु े उनके थ»पड़ मारनेके प¢ात आनंद हो रहा है " |
यह पढनेके प¢ात मझ
ु े समझम8 नह9ं आ रहा था yक म= उसे डांटूँ yक उसने काल9 मांसे यह uया मांगा या उसके pेž
भावके कारण उसे »यार क¤ँ; परं तु यह (नि¢त हो गया था yक मेरा उसको था»»ड मारना ईSर 'ेŽरत था और वा$त)वक
¤प म= उस कृ(तक& कता नह9ं थी |

५. अ(न^ श_`से संबंPधत आaयािcमक उपाय,
उपाय, 'd एवं अनभ
ु ू(तयां
)पछले अंकसे ह9 हमने इस शीषकके अंतगत अ(न^ श_`से संबिधत 'd और अनभ
ु ू(तयां लेना आरं भ कर दया है |
आजका प, चेनईके pी राजगोपालनने भेजा है |
म= फेसबक
ु पर आपके लेख (नय+मत पढ़ते रहता हूं | म= और मेर9 प‰ी मेरे प,
ु से अcयPधक Pचं(तत ह= | उसक& पढ़ाईम8
ZPच पण 
: समाl हो गयी है , वह मा, स,ह वषका है | वह अcयPधक '(तभाशाल9 है, वह $प^ कहता है yक मझ
ू त
ु े
पढ़नेका मन नह9ं करता, परं तु घरके सभी काय करता है | हमने अनेक wयो(तषीसे भी संपक yकए परं तु कोई कुछ यो|य
समाधान नह9ं बता पा रहा है | हम अपने बhचेके पढ़ाईम8 ZPच पन
ु ः जागत
ृ हो इस हे तु uया कर8 यह बताएं |
उर : आपके घरम8 ती¹ $तरका )पत ृ दोष है और आपके प,
ु का आaयािcमक $तर अhछा है अतः अ(न^ श_`यां भी उसे
क^ दे रह9 है | आप वा$तु शु)kके और )पतद
ृ ोष (नवारणके सारे 'यास कर8 | साथ ह9 दा,ेय दे वतासे इस 'कार 'ाथना
कर8 “ हे दा,ेय दे वता, जो भी अतl 
एवं अ(न^ श_` मेरे प,
ू ज
ु के(उसका नाम ल8 ) )वƒाजनम8 )व¿न उ"पन कर
ृ पव
उसक& बु)kको +मत कर रहे ह= उनसे आप उसका र{ण कर8 और वह अपनी अaययन aयानपव 
कर पाये ऐसी आप
ू क
कृपा कर8 ” |

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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

साथ ह9 ‘सोहम’ के एक अंक म8 बhच-क& पढ़ाईम8 मनक& एका—ता साaय कैसे हो इसपर +लखा लेख पढ़8 और जो संभव हो
वह सब 'यास कर8 | वा$तु श)ु k, )पत ृ दोष (नवारणाथ 'यास एवं पढ़ाईम8 मनक& एका—ताके )वषयम8 जानकार9 हे तु
(नन+ल«खत +लंकपर जाएं और िजतना संभव हो सव 'यास कर8 |
)पत ृ दोष (नवारणाथ उपाय - http://www.tanujathakur.com/?p=4866
वा$तु शु)kके उपाय - http://www.tanujathakur.com/?p=1789
पढ़ाई संबिधत क^ और उसके उपाय -

http://www.tanujathakur.com/?p=4988

अ(न^ श_`से संबिधत अनभ
ु ू(त
आज हम महाराŸके pी सतीश कुलकण¥क& अनभ
ु (ू त दे ख8गे |
म= अपने कायालयीन दौरे पर गया था और या,ाके मaयम8 अपने +म,से पूर9 रात अaयाcमके )वषयपर चचा कर रहा था |
मेरा +म, सब कुछ aयानपव 
सन
ू क
ु रहा था | या,ा समाl कर हम तीन बजे

होटल पहुंच गए और मेरा +म, तुरंत ह9

सो गया; परं तु मझ
ु े लगभग ४५ +मनट तक नींद नह9ं आई | मेर9 आख8 जैसे ह9 लगी ह9 थी yक मझ
ु े लगा कोई मेर9
पीठको $पशकर लेटा हो | म= डर कर चीख पडा और म= ‘pीगुZदे व द’ जप करने लगा तो उसका आभास समाl हो
गया | म=ने अपने मaवनीम8 (मोबाइल) द9द9ारा yकए गए pीगZ
ु दे व द मं,जप लगाकर सो गया और म= चार घंटे
(न)व¿न सो पाया |
अनभ
ु ू(तका )वªेषण : साधारणत: होटलके कमरे म8 सभी 'कारके लोग आते ह= और कई 'कारके कुकम भी होते ह= अतः
साधक-क& साधनाका लाभ लेकर ग(त पाने हे तु या साधकको क^ दे ने हेतु +लए आस-पासक& अ(न^ श_`यां साधकपर
आŠमण कर दे ती है उनके +लए नींदम8 यह करना और भी सरल होता है |
जब भी हम yकसी होटलम8 Zकते ह= तो सोनेसे पहले (नन+ल«खत आaयािcमक उपाय कर सोना चाहए |

१. 'वासके समय अपने ओढने और mबछानेवाल9 चादर अपने साथ अव•य रख8 | होटलके mबछावनपर न
सोय8, चाहे वह yकतना भी महं गा एवं $वhछ uय- न हो |
२. (नधाŽरत $थलपर पहुंचते ह9, अपने इ^का या गुZका Pच, होटलके कमरे म8 लगा द8 |
वहांके वा$तुक& शु)k होने लगेगी और वा$तु कुछ $तरतक प)व, हो जायेगा |
13

इससे

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

३. सबसे महcवपूण है yक सोनेसे पूव mबछावनपर बैठकर १५ +मनट अपने गुZमं,का या इ^दे वताका मं,
जपकर सोय8 और 'ाथना इस 'कार कर8 , “हे भगवन, अभी १५ +मनट जो म= जप करने जा रह9 हूं / जा
रहा हूं, उस जपसे आज संपण
ू  राm, मेरा अ(न^ श_`य-से र{ण हो और म= सब
ु ह (नधाŽरत समयपर
उठ पाऊं और सपण
ू  राm, मेरे चार- आपके अ€ एवं श€से कवच-(नमाण हो, ऐसी आप कृपा कर8 |'
aयानम8 रख8 yक लेटकर यह कवच हे तु जप न कर8 , uय-yक यह जप पूण करनेसे पहले ह9 अ(न^
श_`यां हम8 सुला दे ती ह=, िजससे

उनका आŠमणका काय राm,म8 सरलतासे होता रहे

और वे हम8

संपूण राm, क^ दे ते रह8 |
४. अपने mबछावनके चार- ओर दे वताओंके साि"वक नामजपक& प”यां लगा सकते ह= इसे भी अपने
साथ लेकर या,ा कर8 | (यह हमारे पास उपलnध ह=)
५.

राm,म8 अपने लैपटॉपपर या सीडी »लयेरपर,

साि"वक नामजपक&

सीडी ‘Žरपीट’ पर लगाकर सो सकते ह= |

(यह हमारे पास उपलnध ह= )
६. yकसी यzक& )वभू(त या मंदरसे 'ाl )वभू(त भी साथ लेकर चल8 |

हथेल9पर चुटक&भर )वभू(त रखकर

अपने mबछवानके चारोओर सोनेसे पव
ू  फंू ककर सोएँ | ऐसा करनेसे mबछावनके चारो ओरका काला आवरण न^
हो जाता है |
७. )वभ(ू तका ट9का लगाकर सो सकते ह= |

६. शंका समाधान
मेरे गZ
ु आसारामजी बापू ह= मझ
ु े सामू हक द9{ाम8 जो गZ
ु मं, दया गया है उसे जपती हूं | मेरा 'd है yक पहले पाँच
माला जपते समय मुझे उबा+सयां आती ह=, उसके प¢ात मेरा जप अcयंत $फू(तसे होता है और पन
ु ः दसव8 माला जपतेजपते मझ 
जप होता है | '(तदन ऐसा ह9 होता
ु े नींद आने लगती ह= और पन
ु ः एक दो माला जपनेके प¢ात $फू(तपव
ू क
अथात जप करते समय कभी नींद आना और कभी उcसाह लगना यह दोन- अनभ
ु ू(त होती है ऐसा uय- होता है यह
जानना चाहती हूँ | - अंजु चेटयार, मंब
ु ई
उर : आपको अ(न^ श_`य-का क^ है | वतमान समय म8 ५०% साधारण ’य_` को और ७०% '(तशत अhछे
साधकको अ(न^ श_`य-का क^ है | जप करते समय एक 'कारका यk
ु होता है और इस कारण आपको कभी नींद आती
है और कभी उcसाह लगता है | जब अ(न^ श_`यां आपपर हावी होती ह= तब आपको नींद आती है और जब आप उनपर
हावी होती है तब आपको उcसाह लगता है | जप बढ़ाएं और नमक पानीका (नय+मत उपाय कर8 | सcसंगम8 (नय+मत
जाएं, संत +ल«खत —थ-का वाचन कर8 और यथाश_` गुZकायम8 अपना योगदान द8 |

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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

७. साधक-ारा आaयािcमक उन(त हे तु 'यास
’य)^ साधनाके बलपर दो वषम8 १ '(तशत आaयािcमक 'ग(त साaय करे नवाल9 गो¾डाक& साPधका pीमती
¤परानी ठाकुर
म= जब भी गो¾डासे बाहर धमया,ाके +लए जानेवाल9 होती हूं तो pीमती ¤परानी ठाकुर का मेरे पास अव•य ह9
दरू भाष आता है yक uया म= या,ाके +लए कुछ अ…पाहार बना दं ू | वैसे ह9 जब एक-डेढ़ मह9ने प¢ात म= अपने
पैतक
ृ गांव लौटती हूं तब भी उनका 'यास होता है म= उनके घर (जो मेरे गांवके मागम8 पडता है ) से उनके
हाथका भोजन —हण कर जाऊं | कोई भी ¹त–cयोहार हो तो मेरे +लए जो भी वे )वशेष ’यंजन बनाती ह= उसे
अव•य ह9 भेज दे ती ह= | भोजन म8 यद कोई भी कमी हो या कोई चूक हो तो म= उह8 $प^ ¤पसे बता दे ती हूँ
और वे उसे अcयंत सहजता से $वीकार कर उसम8 अगल9 बार सध
ु ार करती है | नामजप अPधकसे अPधक करने
का 'यास करती ह=, वे एक आदश गृ हणी भी ह=, और अपने सेवा-भावसे सास-ससुर या प(त एवं अपने सगेसंबंPधय-को भी वे 'सन रखती ह=, हं समख
ु $वभावक& यह साPधका वैसे तो हमउ‚ और मेर9 (नकट संबंधी ह=
और Žर•तेसे मेर9 चाची लग8 गी; परं तु उनका भाव अcयंत अhछा है |

माच २०१२ म8 मझ
ु े ईSरसे संदेश आया

yक उनक& एक '(तशत आaयािcमक 'ग(त हो गयी है और आ¢य जब म= एक मह9नेक& धमया,ा पण
ू  कर
गांव पहुंची तो वे मेरे पास +मलने आयीं और कहने लगीं yक मुझे आपको नमन करनेक& इhछा हो रह9 है तब
मुझे समझम8 आ गया yक उनक& 'ग(त ’य)^ भावके कारण १ '(तशत हो गयी |

८. धम'सार एवं धमया,ाके मaयम8 हुई अhछj और क^'द अनभ
ु (ू तयां 
द…ल9 गुZपू«णमाके दन दो 'संग हुए | मुझे pी र)व गोयल गुZपू«णमा $थलपर ले जानेके +लए आए | मेरे
पास गुZपू«णमा $थलपर ले जानेके +लए तीन-चार थै+लयां थीं अतः म=ने उह8 पहल9 मंिजलम8 अपने कमरे म8
बुलाया | जैसे ह9 समान रखकर उह-ने गाड़ी शु¤ क&, वह नह9ं शु¤ हो पायी | उनके अनुसार गाडीक& बैटर9
_ड$चाज हो गया था | उनका कहना था ऐसा हो नह9ं सकता uय-yक गाड़ी सlाहम8 दो-तीन बार (नकलती है
और उस गाडीने आज तक धोखा नह9ं दया था |
जब गुZप«ू णमा $थलपर पहुंची तो पता चला yक सभागारका एसी काम नह9ं कर रहा था और वहां एक भी पंखा
नह9ं था और दो दन पूव तक वहांके 'बधक साधक-के साथ अcयंत सहयोग कर रहे थे; परतु उस दन
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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

उसके हाव-भाव पŽरव(तत हो चुके थे | सपूण दवस सभी साधक पसीनेसे भीगते हुए सेवा करते रहे | संaया
सवा पांच बजे तक +म€ी ठjक करने नह9ं पहुंचा था | अंतम8 स²
ू म श€ युk करना पडा और कायŠमसे पांच
+मनट पव
ू  एसी ठjक हो गया | श€ युk अथात जो भी अ(न^ श_` धमकायम8 या हमार9 साधनाम8 )व¿न
डालती ह= उह8 हम न^ करने हे तु या उनक& श_` कम करने हे तु अपने अराaय दे वतासे श€के माaयमसे युk
करने के +लए 'ाथना करते ह= और जो भी )वशेष क^ हो रहा है वह भी उह8 बताते ह=

| जैसे एसी संबिधत

क^के +लए श€ युk हे तु 'ाथना इस 'कार कर रह9 थी “हे pीकृ©ण जो भी अ(न^ श_` गुZपू«णमा महोcसवके
कायŠमम8 )व¿न डालने हे तु एसीको ठjक नह9ं होने दे रह9 है , उह8 आपके असंVय श€ लगे और उनक& श_` 
यून हो जाए और कायŠमके आभ होनेसे पूव +म€ी उसे ठjक कर पाये और गुZपू«णमा महोcसव (न)व¿न
सपन हो ऐसी आपके pीचरण-म8 'ाथना है | ऐसी 'ाथना करनेसे परम पूwय गुZदे वके संक…पके कारण
दे वताके श€ धमकाय या साधना म8 बाधा डालने वाल9 अ(न^ श_` को लगने लगती है और हमार9 अडचन दरू
हो जाती है |

९. साधना हे तु सैkां(तक जानकार9 
हद ू धमम8 ३३ कोट दे वी-दे वता ह= | ऐसेम8 कुलदे वताके जपसे जपसे शीÍ आaयािcमक 'ग(त कैसे संभव है, इस
mबदप
ु र हम )वचार कर8 गे |
यद हमने yकसी संत या गुZसे गZ
ु मं, +लया है तो उसका जप करना चाहए और यद नह9ं +लया है तो गुZ
ढूंढनेका 'य‰ नह9ं चाहए, uय-yक क+लयग
ु म8 ९८ '(तशत गुZ ढ-गी होते ह= और कोई अaयाcम)वद संत ह= या नह9ं, इसे
समझनेके +लए या तो हमारे पास स²
ू मका zान हो या साधनाका ठोस आधार हो, जो साधनाक& आरं +भक अव$थाम8 हम8
नह9ं होता है |

अतः गुZ बनानेके फेरम8 पड़नेके $थानपर, अaयाcमशा€ अनस
ु ार साधना करनेका 'यास करना चाहए

और सनातन धमम8 इसका अcयंत स
ु दर )वधान है | सभीको अपने कुलदे वताका जप करना चाहए |
कुलदे वताके नामजपका मह"व :
१. सव'थम कुलदे वताका ’यcु प) और अथ दे ख ल8गे | कुल अथात मल
ू और मल
ू का सबध मल
ू ाधार चŠ श_` या
कु›ड+लनीसे होता है | कुल + दे वता , अथात िजस दे वताक& उपासनासे मल
ू ाधार चŠ जागत
ृ होता है अथात
आaयािcमक उन(त आरभ होती है उह8 कुलदे वता कहते ह= | कुलदे वताका जप आरं भ करनेसे हमार9 कंु ड+लनी
$वतः ह9 जागत
ृ हो जाती है |
कंु ड+लनी श_` एक स²
ू म श_` होती है जो एक स²
ू म सप समान एक सामाय ’य_`म8 सl
ु ाव$थाम8
होती है | हमार9 आaयािcमक 'याससे यह जागत
ृ हो जाती है और हमार9 आaयािcमक 'ग(तके +लए उरदायी
16

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

होती है | हमारे शर9रम8 ७२००० स²
ू म ना_ड़यां होती ह= िजसमे तीन ना_ड़यां मV
ु य होती है | हमारे र9ढक& ह¾डीम8
एक सू²म नाडी होती है िजसे हम सुष
ु ना नाडी कहते ह=, सुष
ु न नाडीके बा½ ओर च¨ नाडी होती है और दाहने
ओर सय
ू  नाडी होती है | कंु ड+लनी जागत
ु ना नाडीम8 कंु ड+लनी जागत
ृ होनेपर इस सुष
ृ हो ऊपरक& दशाक& ओर
बढने लगती है और उस नाडीम8 ि$थत छह चŠ-का(मल
ू ाधार, $वाPधžान, म«णपुर, अनाहत, )वशुk और आzा )
भेदन कर सह±ार चŠ अथात आaयािcमक 'ग(तके अं(तम चŠ तक पहुंच जाती है और तब हमार9 साधना पूण
हो जाती है | कुलदे वताके जपसे मल
ू ाधार चŠका भेदन हो जाता है और हमार9 आaयािcमक या,ा आरं भ हो जाती
है |
२. हम गंभीर बीमार9म8 $व(नधाŽरत औषPध नह9ं लेते ; उस {े,के अPधकार9 ’य_`, अथात डॉuटरके मतानुसार लेते
ह= | उसी 'कार भवसागरम8 फंसनेके गंभीर रोगसे बचनेके +लए अaयाcम)वदके मागदशन अनस
ु ार साधना करना
आव•यक है | ऐसे सcपुZष समाजम8 कम ह9 +मलते ह= | ऐसेम8 'd उठता है yक yकस दे वताका नामका जप yकया
जाय ? ईSरने हमार9 इस अड़चनका भी (नराकरण yकया है उह-ने 'cयेक ’य_`क& उसक& उन(तके +लए उसे
यो|य तथा आव•यक कुलम8 जम दया है | हम बीमार9म8 अपने (नय+मत (फॅ+मल9 ) डॉuटरके पास जाते ह=
uय-yक उह8 हमार9 शर9र'कृ(त व रोगक& जानकार9 रहती है | यद yकसी कायालयम8 शीÍ काम करवाना हो, तो
हम पŽरPचत ’य_`के पास जाते ह= | उसी 'कार ३३ करोड़ दे वताओंम8 से कुलदे वताके '(त ह9 हम8 अपनापन
लगता है; वह9 हमार9 पक
ु ार सन
ु नेवाले व आaयािcमक उन(तके +लए उरदायी होते ह= | जब ™šा›डके सव त"व
)पंडम8 आ जाते ह= तब साधना पण
ू  होती है | सव 'ा«णय-म8 केवल गायम8 ह9 ™šा›डके सव दे वताओंक& तरं ग-को
—हण करनेक& {मता है इसी+लए कहा गया है yक गायके उदरम8 ३३ करोड़ दे वता वास करते ह= | उसी 'कार
™šा›डके सव त"व-को आक)षत कर उनमे ३०% तक लानेक& {मता केवल कुलदे वताके नामजपम8 है | इसके
)वपर9त शंकर, )व©ण,ु गणप(त, ल²मी इcयाद दे वताओंका नामजप केवल )व+श^ त"वको बढ़ानेके +लए होता है |
३. कुलदे वता पÐृ वी त"वके दे वता ह= इस+लए उनक& उपासनासे साधना आरभ करनेपर क^ नह9ं होता | पांच त"व ह=
पÐ
ृ वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश | {मता न होते हुए सीधे ह9 तेज त"वक& उपासना (उदा. गाय,ी मं,जप )
करनेसे क^क& संभावना रहती है | वतमान समयम8 लोग-क& साि"वकता (नन $तरपर पहुंच गयी है ऐसेम8
कुलदे वताका जप, पÐ
ृ वी त"वसे संबिधत होनेके कारण साधना आरं भ करनेपर क^ नह9ं होता अ)पतु शीÍ ह9
अनभ
ु ू(तयां होने लगती ह= और हमार9 आaयािcमक या,ाको ग(त +मलती है |
४. िजस 'कार इस $थल
ू शर9रके माता –)पता होते ह= उसी 'कार हमारे जीवनम8 गुZके 'वेश होनेसे पूव इस स²
ू म
शर9रके माता–)पता कुलदे वता होते ह= |
५. कुलदे वता हमारे भौ(तक एवं आaयािcमक 'ग(त हेतु उरदायी दे वता ह= | िजनके घरपर कुलदे वताक& कृपा होती है
और )पतर शांत होते ह= उस घरम8 धन-धाय, सख
ु -ऐSय इcयादम8 कोई कमी नह9ं होती |
६. उनका जप पण
ू  होनेपर गुZ $वत: ह9 हमारे जीवनम8 'वेश करते ह= |
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सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४

यहां एक )वशेष मÑ
ु ा $प^ करना चाहूंगी क& यद yकसी साधकका आaयािcमक $तर ५०% से अPधक हो तो ऐसे
साधकने कुलदे वताक& अपे{ा yकसी उhच कोटके दे वता जैसे राम, कृ©ण, दग
ु ा, +शव, हनम
ु ान, द, गणप(तम8 से जो उनके
आराaय ह-, उनका जप करना चाहए |
वतमान समयम8 सौ '(तशत जनसंVयाको मaयमसे ती¹ $तरका )पत ृ दोष है | ऐसेम8 सव'थम )पत ृ दोषके क^के
(नवारणाथ ‘pी गुZदे व द’ जप चारसे छह घंटे जप8 तcप¢ात सपूण दवस अपने कुलदे वताका जप कर8

| वतमान

कालम8 ५०% साधारण ’य_`य-को और ७०% अhछे साधक-को अ(न^ श_`के कारण ती¹ क^ है | इस हे तु सात नाम
जपका

'योग

कर

यो|य

नाम

जप

करनेका

'यास

कर8

|

इस

हे तु

इस

+लंकपर

जाएं

|

http://www.tanujathakur.com/?p=4968

१०. वैदक सनातन

धमम8 ऐसा uय- ?

१.शभ
ु दनम8 नए व€ पहनने का कारण :
कुछ )वशेष दन जैसे cयोहारके दन दे वताके त"व पÐृ वीपर '{े)पत होते ह= और वे अPधक yŠयाशील भी रहते ह=
| ऐसे दवसपर नए व€ पहननेसे , व€ दे वताके तरं ग-को —हण कर लेते ह= और साि"वक हो जाते ह= |
फल$व¤प ’य_`का स²
ू म दे ह इन तरं ग-के कारण शुk हो जाते ह= और वे इह8 —हण भी कर पाते ह= | ऐसे
व€-को धारण करनेसे सपण
ू  वष उह8 लाभ +मलता है |
२. दे वताको
ताको व€ अपण कर तcप¢ात उसे पहननेका शा€ :
जब हम ईSरको कुछ भी अपण कर उसे 'सादके ¤पम8 —हण करते ह=, हम8 उसम8 (नहत
चैतयका लाभ 'ाl होता है |

३. नए व€को धोकर पहननेका शा€ :
व€के (नमाण होनेक& 'yŠयाके समय वह अनेक हाथ-से गुजरता है | फल$व¤प व€म8 साि"वकता —हण
करनेक& {मता कम हो जाती है | जब उसे दक
ु ानम8 भी रखा जाता है तो भी अनेक लोग उसे $पश करते ह=
| इससे उसपर अ(न^ श_`के आŠमणक& संभावना बढ़ जाती है | पŽरणाम$व¤प ऐसे व€को पहननेवाल-को
क^

होनेक&

संभावना

| अतः नए व€को पहननेसे पूव  उसे धोना चाहए |
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बढ़

जाती

है

सोऽहं – तनज
ु ा ठाकुर ारा सपादत वष- १ अंक – १४




गंदे और पहने हुए व€को पन
ु ः पहननेका पŽरणाम uया होता है ?
धुले हुए व€ पहननेका पŽरणाम uया होता है ?
गंदे और mबना धल
ु े हुए व€ पहननेसे पूव  उसपर इ, डालकर पहननेका पŽरणाम uया होता है?
नए कपड़े पहनने से पव
ू  उसे yकसे पहनने दे ना चाहए ?

उपय`
ु

'd-के

उर

और

इस

संदभम8

और

जानकार9के

+लए

‘सनातन सं$था’ ारा 'का+शत —ंथ पढ़ सकते ह= |
—ंथ पानेके +लए संपक कर8 – www.sanatan@sanatan.org
आप इस +लंकपर भी भ8 ट दे कर इस )वषयके बारे म8 और जानकार9 'ाl कर सकते ह=
http://www.hindujagruti.org/hinduism/knowledge/article/why--are
are--new
new--clothes
clothes--worn
worn--on
on--an
an--auspiscious
auspiscious-http://www.hindujagruti.org/hinduism/knowledge/article/why
day.html

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पढ़8 :

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