नागा साधुओॊ की अनोखी ऩयॊ ऩया

साधू संतों की मंडली मे एक मंडली नागा साधुओं की होती है जब जब कु म्भ मेले पड़तें हैं तब तब नागा
साधुओं की रहस्यमयी जीवन शैली देखने को ममलती है । पूरे शरीर मे भभूत मले , मनववस्त्र तथा बड़ी
बड़ी जटाओं वाले नागा साधू कु म्भ स्नान का प्रमुख अकषवण होते हैं । कु म्भ के सबसे पमवत्र शाही स्नान
मे सब से पहले स्नान का ऄमधकार आन्हे ही ममलता है , पहले वषो कड़ी तपस्या और वैरागी जीवन जीते
हैं आसके बाद नागा जीवन की मवलझण परं परा से दीमित होते है । ये लोग ऄपने ही हांथों ऄपना ही
श्राद्ध और पपड दान करते हैं , जब की श्राद्ध अदद का कायव मरणोंपरांत होता है , ऄपना श्राद्ध और पपड
दान करने के बाद ही साधू बनते हैऔर सन्यासी जीवन की ईच्चतम परकास्ठा तथा ऄत्यंत मवकट
परंपरा मे शाममल होने का गौरव प्राप्त होता है ।
भगवान मशव से जुड़ी मान्यताओं मे मजस तरह से ईनके गणो का वणवन है ठीक ईन्ही की तरह ददखने
वाले, हाथो मे मिलम मलए और िरस का कश लगते हुए आन साधुओं को देख कर अम अदमी एक
बारगी हैरत और मवस्मयकारी की ममलीजुली भावना से भर ईठता है । ये लोग ईग्र स्वभाओ के होते हैं,
साधु संतो के बीि आनका एक प्रकार का अतंक होता है , नागा लोग हटी , गुस्सैल , ऄपने मे मगन
और ऄमड़यल से नजर अते हैं , लेदकन सन्यामसयों की आस परंपरा मे शामील होना बड़ा कठठन होता है
और ऄखाड़े दकसी को असानी से नागा रूप मे स्वीकार नहीं करते ।वषो बकायदे परीिा ली जाती है
मजसमे तप , ब्रहमियव , वैराग्य , ध्यान ,सन्यास और धमव का ऄनुसासन तथा मनस्ठा अदद प्रमुखता से
परखे-देखे जाते हैं। दिर ये ऄपना श्रध्या , मुंडन और पपडदान करते हैं तथा गुरु मंत्र लेकर सन्यास धमव
मे दीमित होते है आसके बाद आनका जीवन ऄखाड़ों , संत परम्पराओं और समाज के मलए समर्पपत हो
जाता है,ऄपना श्रध्या कर देने का मतलब होता है सांसठरक जीवन से पूरी तरह मवरक्त हो जाना ,
आं दियों मे मनयंत्रण करना और हर प्रकार की कामना का ऄंत कर देना होता है कहते हैं की नागा जीवन
एक आतर जीवन का सािात ब्यौरा है और मनस्सारता , नश्वरता को समझ लेने की एक प्रकट झांकी है ।
नागा साधुओं के बारे मे ये भी कहा जाता है की वे पूरी तरह मनववस्त्र रह कर गुिाओं , कन्दराओं मे
कठोर ताप करते हैं । प्राच्य मवद्या सोसाआटी के ऄनुसार “नागा साधुओं के ऄनेक मवमशष्ट संस्कारों मे ये
भी शाममल है की आनकी कामेमन्ियन भंग कर दी जाती हैं”। आस प्रकार से शारीठरक रूप से तो सभी
नागा साधू मवरक्त हो जाते हैं लेदकन ईनकी मानमसक ऄवस्था ईनके ऄपने तप बल मनभवर करती है ।
धूनी मल कर , नग्न रह कर और गुिाओं मे तप करने वाले नागा साधुओं का ईल्लेख पौरामणक ग्रन्थों मे
ममलता है । प्रािीन मववरणो के ऄनुसार संकरािायव ने बौद्ध और जैन धमव के बढ़ते प्रिार को रोकने के
मलए और सनातन धमव की रिा के मलए सन्यासी संघो का गठन दकया था । कालांतर मे सन्यामसयों के
सबसे बड़े जूना अखाठे मे सन्यामसयों के एक वगव को मवशेष रूप से शस्त्र और शास्त्र दोनों मे पारं गत
करके संस्थागत रूप प्रदान दकया । ईद्देश्य यह था की जो शास्त्र से न माने ईन्हे शस्त्र से मनाया जाय । ये
नग्ना ऄवस्था मे रहते थे , आन्हे मत्रशूल , भाला ,तलवार,मल्ल और छापा मार युद्ध मे प्रमशमिण ददया

ऄटल .2. बाकी तो ना वेदान्त जानते हैं और न ही सच्चे ऄथो मे वरागी हैं । परंतु यह सत्य है की नागा के धमव मे दीमित होने के बाद कठोरता से ऄनुसासन और वैराग्य का पालन करना होता है . सोमवार. कु छ साधुओं ने वस्त्र पहने का मवकल्प िुन मलया है .ऄमग्न .13 . िाहे वह भोजन मे हो या दिर मविारों मे। ऄपने अध्यामत्मक मसद्धांतों और मनस्संग आरादों की बीहड़ता मे रमे कइ नागा लोगो के बीि ऄब कइ नागा साधू एसे भी हैं जो ऄपनी मानताओं मे बदलाओ ला रहे हैं . यदद कोइ दोषी पाया गया तो ईसके मखलाि कारवाही की जाती है और दुबारा ग्रहस्थ अश्रम मे भेज ददया जाता है । दकस ग्रहयोग में होता है प्रयागराज का स्नान पवव: प्रयागराज (आलाहबाद) में कुं भ महापवव. आनके जीवन का मूल मंत्र है अत्ममनयंत्रण.2. अज संतो के तेरह ऄखाड़ों मे सात सन्यासी ऄखाड़े (शैव) ऄपने ऄपने नागा साधू बनाते हैं :. ददनांक. ददनांक. तक िलेगा। आस कुं भ महापवव के तीन शाही स्नान: (1) मकर संिांमत पवव. मकर में सूयव व वृष के बृहस्पमत में मनाया जाता है। आस प्रमाण से देव गुरु बृहस्पमत ददनांक 17 मइ 2012 इ.ये हैं जूना . ददनांक.13 (3) बसंत पंिमी. गुरुवार.जाता था । आस तरह के भी ईल्लेख ममलते हैं की औरं गजेब के मखलाि युद्ध मे नागा लोगो ने मशवाजी का साथ ददया था .पौष शुक्ल तृतीया. मलहाजा ऄब नागा साधू धमावथव और कल्याण कारी कायो मे लगे हैं । प्रश्न ये है की क्या ये वास्तव मे आतने वैरागी और तपस्वी हैं मजतना दावा दकया जाता है ? शायद दो प्रमतशत सच्चे नागा होंगे .ध्यान योग . अनंद और अवाहन अखाडा । जूना के ऄखाड़े के संतों द्वारा तीनों योगों. और मंत्र योग का पालन दकया जाता है यही कारण है की नागा साधू महमालय के उंिे मशखरों पर शून्य से कािी नीिे के तापमान पर भी जीमवत रह लेते हैं.14. यंहा तक की कइ नागा साधुओं के पास मोबाआल िोन और लैपटॉप तक देखे जा सकते हैं। धमव की रझा के मजस ईद्देश्य से नागा परंपरा की स्थापना की गयी थी ऄब वो ईद्देश्य तो रह नहीं गया है .माघ कृ ष्ण ऄमावस्या.1. तक मकर रामश में मविरण करें गे। आससे यह कुं भ महापवव मत्रवेणी संगम प्रयागराज में मकर संिांमत 14 जनवरी 2013 से शुरू होकर अगामी दो मास तक ऄथावत 11 मािव 2013 इ.माघ शुक्ल ितुथी.13 (2) माघी मौनी ऄमावस्या.15. रमववार. महामनववणी . को प्रातः 9:35 पर वृष रामश में प्रवेश कर िुके हैं तथा सूयवदव े ददनांक 14 जनवरी 2013 से 12 िरवरी 2013 इ. मनरंजनी .10. दिया योग .

6.13 (3) षटमतला एकादषी.13 (12) महा मशवरामत्र.27.11.13 (7) भीष्माष्टमी.12.18. सोमवार . रमववार . मंगलवार .2.22.13 (2) पौषी पूर्पणमा.2. सोमवार . शुिवार .2.आस कुं भ महापवव के ऄंगभूत स्नान- (1) पुत्रदा एकादशी.13 (11) मवजया एकादशी.9.3.13 (6) सूयव रथ सप्तमी. यमुना और ऄदृश्य सरस्वती के संगम पर होने जा रहा महाकु म्भ मवश्व के सबसे मवशालतम धार्पमक जमावड़े में से एक होगा। यह पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला होगा। मब्रठटश और भारतीय शोधकतावओं के दल ने देखा दक मेले के दौरान लोग एक-दूसरे के साथ दकस तरह से व्यवहार करते हैं. रमववार . रमववार. सोमवार .21.17.3.25. शुिवार . गुरुवार .13 (10) माघी पूर्पणमा.8. भीड़ का ईनका क्या ऄनुभव है और आस भीड़ का ईनके रोजमराव के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। महाकु म्भ के दौरान धमवगुरुओं का जुलूस तथा राख लपेटे नगा साधु सभी के अकाषवण का कें ि क्यों होते हैं। .13 भारतीय शोधकतावओं ने 4 साल के ऄध्ययन के बाद कहा है दक साल 2013 आलाहाबाद में गंगा.13 (13) सोमवती ऄमावस्या. बुधवार.2.2.1. शमनवार .13 (8) जया एकादशी.13 (5) कुं भ संिांमत पुण्यकाल. मंगलवार .2.13 (4) महोदय योग.1.2.3.2.10.22.13 (9) भीष्म द्वादशी.

हाथ में बंदक ू मलए ये ऄखाड़े के साधु दकसी दिल्म के डाकू से कम नहीं लगते हैं और जहां ईनके मुंह से वेद मंत्र मनकलने िामहए वहां ऄपने प्रमतद्धंदी ऄखाड़े वाले दूसरे साधुओं के मलए गामलयां मनकलती हैं। हमथयारों से लैश ये ऄखाड़िी साधु पमवत्र कुं भ स्थल पर ऐसे िायटरग करते है जैसे भारत-पादकस्तान के बीि युद्ध हो रहा हो। और आनकी दंभ भरी िायटरग में कइ बार मनदोष जनता की जान िली जाती है। पर जटा-जुट धारी दैत्यों जैसे ददखाने वाले आन साधुओं के ककमित दुख नहीं होता। पता नहीं ये दकस ममट्टी के बने होते हैं। आन्हें ऄखाड़ों में कै सी मशिा-दीिा दी जाती है दक ये अम जनता का दुख-ददव समझना तो दूर की बात है ईनसे प्रेम से बात तक नहीं करते। आनकी वाणी आतनी ककव श और ऄहंकार भरी होती दक कुं भ में स्नान और साधु संतो के दशवन के मलए देश के कोने-कोने से अइ जनता आनसे . अरएएि और सेना के जवान में ऄपने नेतृत्व में अगे बढ़ाएंगे। सभी प्रमुख रास्तों पर बैरीके पडग कर भीड़ को डायवटव दकया जाएगा। एसएसपी कुं भ के मीमडया प्रभारी सुनील दत्त दुबे कहते हैं दक भीड़ को रोकना खतरनाक होगा। मलहाजा.कुं भ के दौरान संगम नगरी में सबकु छ गोलमाल नजर अएगा। स्टेशन से महज 4 दकमी की दूरी पर मस्थत संगम की दूरी 25 से 30 दकमी तक की हो जाएगी। ऐसा आसमलए होगा क्योंदक कुं भ को सकु शल सम्पन्न कराने के मलए शहर के मवमभन्न प्रवेश द्वारों से संगम के घाटों तक पहुंिने के मलए स्नानार्पथयों को भूलभुलैयानुमा बैठरके टटग से गुजरना होगा। संगम िेत्र में लगभग 25 दकमी. के दायरे में िै ली आस भूलभुलैया से होते हुए देश-मवदेश से अए श्रद्धालु घंटों भ्रमण करते हुए संगम तट के घाटों तक पहुंिेंगे। प्रमुख स्नान पवों पर यह सबकु छ पुमलस और प्रशासन के िाईड मैनजमेंट प्लान के तहत होगा। कुं भ के दौरान दारागंज से लेकर ऄरैल तक कु ल 27 स्नान घाट बनाए जाएंगे। प्रमुख स्नान पवों पर तीन से िार करोड़ श्रद्धालु के यहां अने का ऄनुमान है। ऐसे में सात ििों में बनाए गए सुरिा घेरे िाईड मैनेजमेंट के मलहाज से भी कािी कारगर होंगे। श्रद्धालुओं के शहर में प्रवेश करते ही पुमलस. हम श्रद्धालुओं को अगे बढ़ाते जाएंगे। कु म्भ महापवव के स्नान पवों के दौरान अम जनता से तो नहीं पर साधु और संत समाज से ये ऄपेिा की जा सकती हैं दक वे शास्त्र सम्मत जीवन मबताएं और समाज के सामने अदशव प्रस्तुत करें। कुं भ के पावन मौके पर सबसे से ज्यादा पीड़ा कु छ ऄखाड़ों के साधु-संतों के व्यवहार. बमल्क शहर के ऄलगऄलग रास्तों पर ईतार देंगे। स्नान घाटों पर जैसे-जैसे भीड़ कम होती जाएगी. पीएसी. हम भीड़ को रोकें गे नहीं. गणवेश और दंभ को देखकर होती है। लेदकन कुं भ में कु छ ऄखाड़े वाले साधुओं की ऄकड़ देखकर ऐसा लगता है ‘परामाथव के कारणें संतन धरा शरीर’ की बात छलावा है। घोड़े पर सवार. काला िश्मा लगाए.

ददगंबर ऄखाड़ा. ऄमग्न ऄखाड़ा अदद ऄखाड़ों के साधुओं का प्रमतमनमधत्व वैष्णव ऄखाड़ा करता है। शाही स्नान के पश्चात आन ऄखाड़ों की भव्य झांकी अयोमजत की जाती है. मनमवल पंिायती ऄखाड़ा. पंिायती ऄखाड़ा. सैकड़ों बंदक ू ें . दंभी साधु से सामना न हो। महाकुं भ का मुख्य अकषवण शाही स्नान होता है। हजारों. मपस्तौलों से िायटरग की जाती है। गोली िलाने वाले साधुओं के हाव-भाव और दंभ देखकर लगता है दक ये दूसरे ऄखाड़े के साधुओं से खुद को श्रेष्ठ सामबत करने के मलए दकसी हद तक जा सकते हैं। सवाल ईठता है दक ऄहंकार ददखाने. गोली िलाने और मनदोष जनता का खून बहा कर कोइ ऄखाड़ा कभी श्रेष्ठ बन सकता है ? क्या ऄखाड़ों की झांकी मबना शमक्त प्रदशवन के शांमत और सौम्यता से नहीं मनकाली जा सकती ? क्या साधु-संत अम जनता से प्रेमपूववक बात नहीं कर सकते ? क्या जरूरी है दक शाही स्नान में पहला हक मसिव आन ऄखाड़िी साधुओं का है? क्या ये सभी ऄखाड़े वाले और प्रशासन के कतावधताव ममल कर देश के कोने-कोने से अइ भोली-भाली गृहस्थ जनता को सबसे पहले शाही स्नान का हक नहीं दे सकते? ऐसे कइ सवाल हैं जो महाकुं भ के साधुओं का दंभ देखकर मन में ईठते हैं और हमें सोिने पर मजबूर करते हैं। . पंिदशनाम जूना ऄखाडा.कोसो दूर भागती है। और भगवान से प्राथवना करती है दक कुं भ में दकसी ऄहंकारी. ईदासीन पंिायती ऄखाड़ा. महामनवावणी पंिायत ऄखाड़ा. मनमोही ऄखाड़ा. मजसमें साधुओं की शोभायात्रा को देखने के मलए भारी संख्या में श्रद्धालु सड़क के दोनों ओर जुटते हैं। यह परपंरा हजारों वषो से िली अ रही है। सबसे दुख की ��ाा��� है दक मजन साधु संतों को जनता देव तुल्य समझती है वही साधु-संत पावन कुं भ मेले में लड़ते-झगड़ते ददखाइ देते हैं। शाही स्नान पहले करने को लेकर ऄखाड़ों के बीि मारकाट मि जाती है। एक संत दूसरे संत को जान से मार देता है। ऄमृतमयी कुं भ में खून की धारा बह जाती है। मजन साधु-संतों की जनता पूजा करती है ईन्हें जत्थे बनाकर अपस में लड़ता देखकर जनता को बहुत दुख होता है। श्रद्धालुओं की रूह कांप जाती है। ईनका हृदय रो पड़ता है। जब ऄखाड़ों की भव्य झांकी मनकलती है तो कइ ऄखाड़े के साधु शमक्त प्रदशवन करने के मलए हवा में गोमलयां िलाते हैं. पंि ऄटल ऄखाड़ा. लाखों की संख्या में साधु संतों की टोली एक साथ पमवत्र नदी में स्नान के मलए मनकलती है। आस स्नान में 18 ऄखाड़ों के साधु एकमत्रत होते हैं। तपोमनमध मनरंजनी ऄखाड़ा. मनवावणी ऄखाड़ा.

इस ऩय हभें ववचाय कयना होगा. इस्राभ औय ईसाई भतावरॊफी क्मा बायतीम याष्ट्र के अॊग नह ॊ-? मा वे इस याष्ट्र के अॊगबत ू नह ॊ होना चाहते-! महद वे मह सभझते हो कक सेकुरय के नाभ ऩय वे हभेसा अरगावफाद के यास्ते ऩय चरेगे तो बायत को बी इस ऩय ववचाय कयना होगा. अबी आज कौन सा ऐसा ऩऺ है जो कुम्ब भें साभभर नह ॊ होता मानी बायतीम याष्ट्र भें सजम्रत नह ॊ होना चाहता. आभ बायतीम सॊतो की टोर ववभबन्न अखाड़े बायतीम सबी ऩन्थो के सॊत भहॊ त भहाभॊडरेश्वय ववभबन्न सॊप्रदाम के जगद्गुरु. उदासी. अघोय ऩॊथी. ऩूय ऩयॊ ऩया भें क्मा-क्मा ऩरयवतवन कयना है सफ कुम्ब भें होता है . जैन औय फौद्ध भतावरॊफी कुम्ब भें उऩजस्थत होकय ऩूये वषव बय का ववचाय बफभषव कयते है . बायतीम सभाज भें क्मा कयना है कौन सा शॊदेश दे ना है -? कौन सी ऩयॊ ऩया हभाये सभाज को नुकसान ऩॊहुचा यह है -? सबी ववषमो ऩय ववचाय कय ऩरयवतवन ककमा जाता था मह सबी को स्वीकामव था साधू-सन्माभसमों के भाध्मभ से हहन्द ू सभाज के सबी घटकों भें इसका ऩारन कयामा जाता था. शाक्त. वैष्ट्णव.वहीं दूसरी तरि 18 पीठ के शंकरािायों ने भले ही ऄपने कु नबों के मसपहसालार से लेकर सेनापमतयों के पाप गंगा में धो ददए होंगे पर क्या आन्होंने खुद सेनापमत होने तक का दामयत्व मनभाया या नहीं ये ििाव का मवषय है। कुं भ स्नान से दकसको िायदा होता है यह भी ििाव का मवषय है। प्रयाग शहर की िकािौंध से लेकर गंगाजल की गंदगी से ईत्पन्न तबाही तक का नजारा यही सोिने पर मजबूर करता है दक क्या अज का कुं भ सिमुि पहदू सभ्यता और पहदू धमव के संस्कारों के मापदंड की पराकाष्ठा है या दिर धमव के नामपर पनप रहे आस ईद्योग की सबसे बड़ी त्रासदी है? क्मा है कुब औय भहाकुम्ब --? मे केवर भेरा नह ॊ अथवा कोई ऩयॊ ऩयागत त्मौहाय बी नह ॊ तो मे क्मा है --? हभाये ऩूवज व ों ने ऐसा क्मा ककमा--? जजसभे बफना ककसी प्रचाय-प्रसाय के राखों ह नह ॊ कयोणों की सॊख्मा भें आते हैं ऩॊचाॊग के एक राइन ऩय. भसक्ख. सभम फदरेगा कबी . (एक फाय कुछ ऩजश्चभ भतावरॊफी कुम्ब भें आमे वे भहाभना भदन भोहन भारवीम से भभरे उन्होंने ऩूछा की इतनी फड़ी सॊख्मा भें रोग आमे है तो ववऻाऩन भें तो फड़ा ह धन खचव रगा होगा भारवीम जी ने अऩनी जेफ से दो आने वारा ऩॊचाॊग हदखा हदमा फस इतना खचव हुआ ) हभेसा सवव सहभनत से ह सबी ववषमो का चमन होना हभाये स्वबाव भें यहा है इस नाते ककसी को बायत को रोकतॊत्र भसखाने की जरुयत नह -ॊ -! कुम्ब हभाय याष्ट्र मता का प्रतीक है सबी ऩॊथ औय सॊप्रदाम इसभें सजम्रत हभ बायतीम एक है इसकी गवाह दे ते औय साक्ष्म फनते है शैव. सबी शॊकयाचामव अऩने-अऩने अखाड़ो सहहत महाॉ आते हैं मह शॊकयाचामों के उत्तयाधधकारयमों का चमन भहाभॊडरेश्वयों का चन ु ाव व ननमुजक्तमा होती है ऐसा रगता है की सम्ऩूणव बायत उभड़ यहा हो ऐसी ऩयॊ ऩया क्मों ऩड़ी मा डार गमी--? बायत भें मह सहज व स्वाबाववक प्रकिमा है महाॉ रोकतॊत्र कोई नमा नह ॊ है .

ऩयु ानो की कथा है की सभद्र ु भॊथन से जफ अभत ृ करश ननकरा बफतयण को रेकय दे वताओ औय याऺसों भें नछना. बायतीम सभाज को इनका सभावेश हो इस ऩय ववचाय ----! इन्हें (ईसाई-भुसरभान ) अऩने दोनों हाथो को पैराकय कुम्ब की हदसा भें फढ़ना चाहहए ववदे शी ववचाय छोड़कय बायतीम सॊस्कृनत भें सभयस होकय एक यस हों. इन्हें इस ववषम ऩय धचॊतन कयना. ऩॊथ औय सॊप्रदाम के रोग अऩनी य ती रयवाज औय सभाज उत्थान की दृजष्ट्ट से बफना ककसी बेद-बाव से इकठ्ठा होते है हभें क्मा-क्मा सध ु य कयना है . कपय क्मा होगा इन ववदे शी भतावरॊबफमो का --? इन बफधभभवमो को बायतीम फनने के भरए ववचाय कयना होगा औय बायतीम कुम्ब भें साभभर होना होगा. क्षऺप्रा नद के ककनाये उज्जैन औय गोदावय तट ऩय नाभसक है . बाषा औय ऺेत्र से ऊऩय उठकय सॊत दशवन औय सॊगभ स्नान हे तु आते है वे ककसी से न तो अऩनी जाती फताते हैं न ह दस ु ये से ऩूछते हैं मह दनु नमा का अनूठा उदहायण है जो राखों वषों से सभाज के धचॊतन के आधाय ऩय चरा आ यहा है . गॊगा -मभुना जी का सॊगभ प्रमाग. कुम्ब हभाये याष्ट्र ननभावण औय सभाज ब्मवस्था का एक हहस्सा है जो हभाये सभाज को ननत्म नत ू न फनामे यखने भें ननयॊ तय सचेत कयता यहता है .ॊ १२ याभशमाॉ इनके भभरन बफॊद ु को रेकय १२ स्थानों ऩय कुम्ब रगते थे जजसभे एक स्थान भक्का बी था.झऩट हुई --जहाॉ-जहाॉ अभत ृ छरका धगया वहाॊ-वहाॊ कुम्ब रगने रगा वास्तव भें मह सभयसता का अनित प्रमोग औय सभयसता का भहाकुम्ब है जजसका उदहायण शामद कह ॊ भभरे ककसी बी सभाज को राब्भे सभम तक यहना होता है तो उसभे ननत्म नए-नए प्रमोग सभाज को एक जुट यखने सभयस यखने बफचाय को ननत्म नूतन फनामे यखने नमी चेतना औय उजाव फनामे यखने हे तु सभाज को धचयस्थामी फने हे तु कुम्ब बायतीम सभाज का आधाय है जहाॉ एक तयप सबी भत. वह ीँ सबी जानत. आज जजन प्रभुख स्थानों ऩय कुम्ब रगता है वे स्थान गॊगा जी के ककनाये हहभारम भें हरयद्वाय. कबी तो बायतीम सभाज जागेगा ह .? सफ ववषमो ऩय ववचाय कयते हैं. ऋतुए. जजससे बायतीम याष्ट्र भें सजम्रत हो सकें तबी कुम्ब की साथवकता सववत होगी. कार ऩरयजस्थनतमाॊ फदर हहन्द ू सभाज दफ व हुआ ऩरयणाभ हभ फहुत कुछ बूर गए कुछ नमी य ती रयवाज प्रायॊ ब ककमे गए ु र कुछ ऩुयाने य ती रयवाज फॊद हो गए. कहते है कक मह कुम्ब दान का बी ऩवव है चिवती सम्राट हषव वधवन ने इस कुम्ब को ववस्ताय हदमा वे प्रत्मेक वषव सफ -कुछ दनकय वाऩस घय जाते थे आज बी दान की ऩयॊ ऩया जाय है . रेककन कुछ प्रभाणों से कहना है की बायत भें १२ नऺत्र. .तो कोई याष्ट्रफाद बायत का नेतत्ृ व कये गा ह .

उनकी आध्माजत्भक दशा के स्तयबेदानुसाय चाय कोहटमाॉ हुआ कयती हैं जजन्हें िभश: कुट चि. ऩूवव भें गोवधवन भठ तथा ऩजश्चभ भें शायदाभठ नाभों के थे। इन चायों के ऩथ ृ क् -ऩथ ृ क् आचामव िभश: हस्ताभरक. ऩाॊचार. सौवीय. द्रववड़.दशनाभी सम्प्रदाम दशनामी शब्द सॊन्माभसमों के एक सॊगठनववशेष के भरए प्रमुक्त होता है औय प्रभसद्ध है कक उसे सववप्रथभ स्वाभी शॊकयाचामव ने चरामा था. भहावाक्म "प्रऻानॊ ब्रह्भ" है . धगरय ऩववत एवॊ अयण्म तथा तीथव एवॊ आश्रभ जैसे उक्त दशनाभों के सफॊधधत होने की बी चचाव की जाती है । इन चायों भें से श्रग ृ ेय भठ का ऺेत्र आॊध्र. बायती एवॊ सयस्वती. ऩद्मऩादाचामव एवॊ स्वरूऩाचामव फतराए जाते हैं औय इनकी ववभबन्न ऩयॊ ऩयाओॊ के ह साथ िभश: ऩुय . 16 ऩुरयमों की. गोत्र "आनॊदवय" है तथा इसके ब्रह्भचाय बी "आनॊद" कहे जाते हैं। इसी प्रकाय गोवधवनभठ का ऺेत्र बी अॊग. कॊफोज एवॊ नतब्फत आहद आ जाते हैं. अधधक से अधधक सात घयों से भबऺा ग्रहण कयना. भहावाक्म "अहॊ ब्रह्भाजस्भ" है . सयस्वनतमों तथा बायतीमों भें से आधे अथावत ् साढ़े तीन "दॊ डी" औय शेष छह "गोसाई" कहे जाते हैं। दशनाभी साधुओॊ के प्रत्मेक वगव भें . इसका वेद मजुवेद है . फहूदक. इसका तीथवस्थान फदरयकाश्रभ है . वॊग. जो उनके अनॊतय दक्षऺण बायत के श्रॊग ृ ीम आचामव थे ("ए हहस्र ऑव दशनाभी नागा सॊन्मासीज़ ऩ. भहावाक्म "अमभात्भा ब्रह्भ" है . फस्ती से फाहय ननवास कयना. सैयाष्ट्र एवॊ भहायाष्ट्र तक चरा जाता है । इसका वेद साभवेद है . वेद अथवववेद है . ककसी को प्रणाभ न कयना औय न ककसी की ननॊदा कयना तथा केवर सॊन्मासी का ह अभबनॊदन कयना आहद ववशेष रूऩ से उल्रेखनीम हैं। जो दशनाभी साधु ककसी वैसे भठधाय का चेरा फनकय उसका उत्तयाधधकाय हो जाता है उसे प्रफॊधाहद बी कयने ऩड़ते हैं। . भशखासूत्र का ऩरयत्माग कयना होगा तथा द ऺाभॊत्र के प्रनत ऩूणव ननष्ट्ठा यखनी होगी। सॊन्मास ग्रहण कय रेने ऩय वे ववयक्त होकय तीथवभ्रभण कयते हैं औय कबी-कबी अऩने साॊप्रदानमक भठों भें बी यहा कयते हैं। इनके दै ननक आचाय सॊफॊधी ननमभों भें यात औय हदन भभराकय केवर एक ह सभम बोजन कयना. इसका तीथवस्थान ऩुय है. आश्रभों. इसका तीथवस्थान याभेश्वयभ ् है . ऺबत्रम वा वैश्म वणव के ह हुआ कयते हैं। उन्हें कनतऩम ववधधमों के अनुसाय अनुष्ट्ठान कयना ऩड़ता है औय उन्हें फतरा हदमा जाता है कक तुम्हें गैरयक वस्त्र. हॊ स एवॊ ऩयभहॊ स कहा जाता है औय इनभें से प्रथभ दो को कबी-कबी "बत्रदॊ डी" की बी सॊऻा द जाती है । द ऺा के सभम ब्रह्भचारयमों की अवस्था प्राम: 17-18 से कभ की नह ॊ यहा कयती औय वे ब्राह्भण. ववबूनत एवॊ रुद्राऺ को धायण कयना ऩड़ेगा. भहावाक्म "तत्वभभस" है . कश्भीय.ृ 50")। ृ ेय भठ के तत [ऩरयचम कहते हैं. गोत्र "बोगवय" है तथा इसके ब्रह्भचाय "प्रकाश" कहे जाते हैं जहाॉ शायदाभठ का ऺेत्र भसॊधु. 4 वनों की तथा 1 राभा की कह जाती है औय तीथों. शॊकय ने अऩने भत के प्रचायाथव बायतभ्रभण कयते सभम चाय भठों की स्थाऩना की थी जजनभें उक्त श्रॊग ृ ेय भठ के अनतरयक्त उत्तय भें जोशीभठ. गोत्र "कीटवय" है तथा इसके ब्रह्भचाय बी "स्वरूऩ" कहे जाते हैं जो दस ू यों से सववथा भबन्न है । दशनाभभमों की 52 गहढ़माॉ बी प्रभसद्ध हैं जजनभें से 27 धगरयमों की. गोत्र "बूरयवय" है औय इसके ब्रह्भचाय "चैतन्म" कहराते हैं जहाॉ जोशी भठ के ऺेत्र भें उत्तय के कुरु. इसका वेद ऋग्वेद है . कणावटक एवॊ केयर प्रदे शों तक सीभभत सभझा जाता है . उत्कर एवॊ फफवय तक ववस्तत ृ है . 4 बायतीमों की. भगध. ककॊ तु इसका श्रेम कबी-कबी स्वाभी सुयेश्वयाचामव को बी हदमा जाता है . केवर ऩथ् ृ वी ऩय ह शमन कयना. कभरॊग. त्रोटकाचामव.

जमऩयु जैसी कनतऩम रयमासतों का सॊयऺण ऩाकय. उन्हें सभम सभम ऩय सहामता ऩहुॉचाई हैं। दशनाभभमों भें कुछ गहृ स्थ बी होते हैं जजन्हें "गोसाई" कहते हैं। .उद्देश्म दशनाभी सॊन्माभसमों का उद्देश्म धभवप्रचाय के अनतरयक्त धभवयऺा का बी जान ऩड़ता है । इस दस ू ये उद्देश्म की भसवद्ध के भरए उन्होंने अऩना सॊगठन ववभबन्न अखाड़ों के रूऩ भें बी ककमा है । ऐसे अखाड़ों भें से "जूना अखाड़ा" (काशी) के इष्ट्टदे व कारबैयव अथवा कबी कबी दत्तात्रेम बी सभझे जाते हैं औय "आवाहन" जैसे एकाध अन्म अखाड़े बी उसी से सॊफॊधधत हैं। इसी प्रकाय "ननयॊ जनी अखाड़ा" (प्रमाग) के इष्ट्टदे व कानतवकेम प्रभसद्ध हैं औय इसकी बी "आनॊद" जैसी कई शाखाएॉ ऩाई जाती हैं। "भहाननवावणी अखाड़ा" (झायखॊड) की ववशेष प्रभसवद्ध इस कायण है कक इसने ऻानवाऩी मुद्ध. औयगॊजेफ के ववरुद्ध ठान हदमा था। इसके इष्ट्टदे व कवऩर भुनन भाने जाते हैं तथा इसके साथ अटर जैसे एकाध अन्म अखाड़ों का बी सॊफॊध जोड़ा जाता है । इन अखाड़ों भें शस्त्राभ्मास कयाने की व्मवस्था यह है औय इनभें प्रभशक्षऺत होकय नागों ने अनेक अवसयों ऩय काभ ककमा है । इनके प्रभुख भहॊत को "भॊडरेश्वय" कहा जाता है जजसके नेतत्ृ व भें मे ववभशष्ट्ट धाभभवक ऩवो के सभम एक साथ स्नान बी कयते हैं तथा इस फात के भरए ननमभ ननहदवष्ट्ट है कक इनकी शोबामात्रा का िभ क्मा औय ककस रूऩ भें यहा कये । दशनाभभमों के जैसे अन्म नागाओॊ के कुछ उदाहयण हभें दाद ू ऩॊथ आहद के धाभभवक सॊगठनों भें बी भभरते हैं जजनके रोगों ने.

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