पेम चं द

1

कथा-कम
आतमाराम
दगु ार का मंिदर
बडे घर की बेटी
पंच- परमेशवर
शंखनाद
नाग पूजा

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आतमाराम
वेदो-गाम मे महादेव सोनार एक सुिवखयात आदमी था। वह अपने सायबान मे
पात: से संधया तक अँगीठी के सामने बैठा हु आ खटखट िकया करता था। यह लगातार
धविन सुनने के लोग इतने अभयसत हो गये थे िक जब िकसी कारण से वह बंद हो जाती,
तो जान पडता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह िनतय-पित एक बार पात:काल अपने
तोते का िपंजडा िलए कोई भजन गाता हु आ तालाब की ओर जाता था। उस धँधले
पकाश मे उसका जजर र शरीर, पोपला मुँह और झुकी हु ई कमर देखकर िकसी अपिरिचत
मनुषय को उसके िपशाच होने का भम हो सकता था। जयो ही लोगो के कानो मे आवाज
आती—‘सत गुरदत िशवदत दाता,’ लोग समझ जाते िक भोर हो गयी।
महादेव का पािरवािरक जीवन सूखमय न था। उसके तीन पुत थे, तीन बहु ऍं थी,
दजर नो नाती-पाते थे, लेिकन उसके बोझ को हलका करने-वाला कोई न था। लडके कहते
—‘तब तक दादा जीते है, हम जीवन का आनंद भोग ले, िफर तो यह ढोल गले पडेगी
ही।’ बेचारे महादेव को कभी-कभी िनराहार ही रहना पडता। भोजन के समय उसके घर मे
सामयवाद का ऐसा गगनभेदी िनघोष होता िक वह भूखा ही उठ आता, और नािरयल का
हु कका पीता हु आ सो जाता। उनका वयापसाियक जीवन और भी आशांितकारक था।
यदिप वह अपने काम मे िनपुण था, उसकी खटाई औरो से कही जयादा शुिदकारक और
उसकी रासयिनक िकयाऍं कही जयादा कषसाधय थी, तथािप उसे आये िदन शककी और
धैयर-शूनय पािणयो के अपशबद सुनने पडते थे, पर महादेव अिविचिलत गामभीयर से िसर
झुकाये सब कुछ सुना करता था। जयो ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर
देखकर पुकार उठता—‘सत गुरदत िशवदतदाता।’ इस मंत को जपते ही उसके िचत
को पूणर शांित पाप हो जाती थी।

एक िदन संयोगवश िकसी लडके ने िपंजडे का दार खोल िदया। तोता उड गया।
महादेव ने िसह उठाकर जो िपंजडे की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन-से हो गया।
तोता कहॉँ गया। उसने िफर िपंजडे को देखा, तोता गायब था। महादेव घबडा कर उठा
और इधर-उधर खपरैलो पर िनगाह दौडाने लगा। उसे संसार मे कोई वसतु अगर पयारी
थी, तो वह यही तोता। लडके-बालो, नाती-पोतो से उसका जी भर गया था। लडको की
चुलबुल से उसके काम मे िवघन पडता था। बेटो से उसे पेम न था; इसिलए नही िक वे
िनकममे थे; बिलक इसिलए िक उनके कारण वह अपने आनंददायी कुलहडो की िनयिमत
संखया से वंिचत रह जाता था। पडोिसयो से उसे िचढ थी, इसिलए िक वे अँगीठी से आग
िनकाल ले जाते थे। इन समसत िवघन-बाधाओं से उसके िलए कोई पनाह थी, तो यही
तोता था। इससे उसे िकसी पकार का कष न होता था। वह अब उस अवसथा मे था जब
मनुषय को शांित भोग के िसवा और कोई इचछा नही रहती।
तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने िपंजरा उतार िलया और उसे िदखाकर
कहने लगा—‘आ आ’ सत गुरदत िशवदाता।’ लेिकन गॉँव और घर के लडके एकत हो
कर िचलाने और तािलयॉँ बजाने लगे। ऊपर से कौओं ने कॉँव-कॉँव की रट लगायी? तोता
उडा और गॉँव से बाहर िनकल कर एक पेड पर जा बैठा। महादेव खाली िपंजडा िलये
उसके पीछे दौडा, सो दौडा। लोगो को उसकी दुितगािमता पर अचमभा हो रहा था। मोह
की इससे सुनदर, इससे सजीव, इससे भावमय कलपना नही की जा सकती।
दोपहर हो गयी थी। िकसान लोग खेतो से चले आ रहे थे। उनहे िवनोद का अचछा
अवसर िमला। महादेव को िचढाने मे सभी को मजा आता था। िकसी ने कंकड फेके,
िकसी ने तािलयॉँ बजायी। तोता िफर उडा और वहाँ से दरू आम के बाग मे एक पेड की
फुनगी पर जा बैठा । महादेव िफर खाली िपंजडा िलये मेढक की भॉँित उचकता चला।
3

पानी की बूँद भी उसके कंठ मे न गयी. तो मोहरे थी। उसने एक मोहरे बाहर िनकाली और दीपक के उजाले मे देखा। हॉँ मोहर थी। उसने तुरत ं कलसा उठा िलया. और मुझे अकेला देख कर मोहरे छीन ले। उसने कुछ मोहर कमर मे बॉँधी. और कई आदमी बैठे हु ए आपस मे कुछ बाते कर रहे है। वे सब िचलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर कर िदया। उचच सवर से बोला—‘सत गुरदत िशवदत दाता’ और उन आदिमयो की ओर िचलम पीने चला गया. एक दस ू रे वृक के नीचे एक धुँधला दीपक जल रहा है. कभी िपंजडे के दार पर बैठे अपने दाना-पानी की पयािलयो को देखता. पकडो-पकडो !’ चोरो ने पीछे िफर कर न देखा। महादेव दीपक के पास गया. ऐसा न हो. डर रहा है। वह िपंजडे को छोड कर आप एक दस ू रे पेड की आड मे िछप गया। तोते ने चारो ओर गौर से देखा. पर अिभलाषाओं ने अपना काम शुर कर िदया। एक पकका मकान बन गया. शुषक और सूना जान पडता था। वह िदन-रात काम करता था. और न िपंजडे ही मे आ सकता है. िकनतु िजस पकार बंदक ू की आवाज सुनते ही िहरन भाग जाते है उसी पकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर भागे। कोई इधर गया. जो उसे चेतना की याद िदलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का देह-तयाग करना था। महादेव िदन-भर का भूख-पयासा. अतरा और आ कर िपंजडे के ऊपर बैठ गया। महादेव का हदय उछलने लगा। ‘सत गुरदत िशवदत दाता’ का मंत जपता हु आ धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका िक तोते को पकड ले. न पयास ! तोते के िबना उसे अपना जीवन िनससार. ये सब चोर है। वह जारे से िचला उठा —‘चोर-चोर. उनहे माहरो से भर कर िमटटी से ढँक िदया। ४ महादेव के अतनेतो के सामने अब एक दस ू रा जगत् था. सराफे की एक भारी दक ू ान खुल गयी. और िफर उड जाता। बुडा अगर मूितर मान मोह था. कोई उधर। महादेव िचलाने लगा —‘ठहरो-ठहरो !’ एकाएक उसे धयान आ गया. िफर पेड पर आ बैठा। शाम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता. चोर लौट आवे. िचंताओं और कलपना से पिरपूणर। यदिप अभी कोष के हाथ से िनकल जाने का भय था. 4 . लेिकन उसे न भूख थी. िसर चककर खा रहा था। जब जरा सावधान हु आ. रह-रह कर झपिकयॉँ ले लेता था. तो उसे एक मलसा रखा हु आ िमला जो मोचे से काला हो रहा था। महादेव का हदय उछलने लगा। उसने कलसे मे हाथ डाला. इसिलए िक यह उसकी अंत:पेरणा थी. िनशशंक हो गया. िफर एक सूखी लकडी से जमीन की की िमटटी हटा कर कई गडे बनाये. िफर भी वह उस जगह से िहलने का नाम न लेता था। आज उसने िदन भर कुछ नही खाया। रात के भोजन का समय भी िनकल गया. तो िफर िपंजडा उठा कर कहने लगे—‘सत गुरदत िशवदत दाता’ तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पी आ बैठा. िकनतु तोता हाथ न आया. जीवन के और काम इसिलए करता था िक आदत थी। इन कामो मे उसे अपनी सजीवता का लेश-मात भी जान न होता था। तोता ही वह वसतु था.बाग मे पहु ँचा तो पैर के तलुओं से आग िनकल रही थी. थका-मॉँदा. तो तोता मूितर मयी माया। यहॉँ तक िक शाम हो गयी। माया और मोह का यह संगाम अंधकार मे िवलीन हो गया। ३ रात हो गयी ! चारो ओर िनिबड अंधकार छा गया। तोता न जाने पतो मे कहॉँ िछपा बैठा था। महादेव जानता था िक रात को तोता कही उडकर नही जा सकता. और दीपक बुझा िदया और पेड के नीचे िछप कर बैठ रहा। साह से चोर बन गया। उसे िफर शंका हु ई. िकनतु एक कण मे िफर चौक कर ऑंखे खोल देता और उस िवसतृत अंधकार मे उसकी आवाज सुनायी देती—‘सत गुरदत िशवदत दाता।’ आधी रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पा कर चौका। देखा. िकनतु महादेव की ओर सशंक नेतो से ताक रहा था। महादेव ने समझा. कभी उस डाल पर। कभी िपंजडे पर आ बैठता.

िचिडयॉँ गाने लगी। सहसा महादेव के कानो मे आवाज आयी— ‘सत गुरदत िशवदत दाता. और वहॉँ से लौट कर बडे समारोह से यज. बहभोज हु आ। इसके पशचात एक िशवालय और कुऑं बन गया. उसी पकार उसके मुँह से यह बोल िनकलता था। िनरथर क और पभाव-शूनय। तब उसका हदय-रपी वृक पत-पलव िवहीन था। यह िनमर ल वायु उसे गुज ं िरत न कर सकती थी. पर उनका धािमर क भाव कभी भी उसके अनत:कारण को सपशर न करता था। जैसे िकसी बाजे से राग िनकलता है. मालमू नही. कही चोर आ जायँ . नही तो मुझ पापी. उसके पैरो मे पर लग गये है। िचंता शांत हो गयी। इनही कलपनाओं मे रात वयतीत हो गयी। उषा का आगमन हु आ. तो अभी कुछ अँधेरा था। रासते मे एक कुते के िसवा और िकसी से भेट न हु ई. तो मै भागूँगा कयो-कर? उसने परीका करने के िलए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हु आ चला गया। जान पडता था. बगल मे कलसा दबाया और घर चला। ५ महादेव घर पहु ँचा. कया कहते हो। जानते नही.िनज समबिनधयो से िफर नाता जुड गया. हम इस समय पूजा पर रहते है। महादेव ने कहा—महाराज. दाना भी मयससर होगा या नही। रष हो कर पूछा—कया है जी. पितत पाणी कब इस कृपा के योगय था ! इस पिवत भावो से आतमा िवनहल हो गयी ! वह अनुरक हो कर कह उठा— ‘सत गुरदत िशवदत दाता. आज मेरे यहॉँ सतयनाराण की कथा है। पुरोिहत जी िविसमत हो गये। कानो पर िवशवास न हु आ। महादेव के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी. पर मेरा जीवन भी सफल कर िदया। अब तुमहे चॉँदी के िपंजडे मे रखूंगा और सोने से मढ दँगू ा।’ उसके रोम-रोम के परमातमा के गुणानुवाद की धविन िनकलने लगी। पभु तुम िकतने दयावान् हो ! यह तुमहारा असीम वातसलय है. और कुते को मोहरो से िवशेष पेम नही होता। उसने कलसे को एक नाद मे िछपा िदया. एक बाग भी लग गया और वह िनतयपित कथा-पुराण सुनने लगा। साधु-सनतो का आदर-सतकार होने लगा। अकसमात उसे धयान आया. राम के चरण मे िचत लागा।’ उसने एक हाथ मे िपंजडा लटकाया. गुंिजत हो गया। अरणोदय का समय था। पकृित एक अनुरागमय पकाश मे डू बी हु ई थी। उसी समय तोता पैरो को जोडे हु ए ऊँची डाल से उतरा. हवा जागी. ऐसा इचछा हु ई िक आज भगवान की कथा सुन लूँ। पभात ही से तैयारी होने लगी। वेदो के िनकटवती गॉँवो मे सूपारी िफरी। कथा के उपरांत भोज का भी नेवता था। जो सुनता आशचयर करता आज रेत मे दबू कैसे जमी। 5 . जैसे आकाश से कोई तारा टू टे और आ कर िपंजडे मे बैठ गया। महादेव पफुिलत हो कर दौडा और िपंजडे को उठा कर बोला —आओ आतमाराम तुमने कष तो बहु त िदया. पर अब उस वृक मे कोपले और शाखाऍं िनकल आयी थी। इन वायु-पवाह से झूम उठा. राम के चरण मे िचत लगा।’ यह बोल सदैव महादेव की िजहा पर रहता था। िदन मे सहसो ही बार ये शबद उसके मुँह से िनकलते थे. िजतनी अपने घर से िकसी िभखारी के िलए भीख िनकालना। पूछा—आज कया है? महादेव बोला—कुछ नही. और कोयले से अचछी तरह ढँक कर अपनी कोठरी मे रख आया। जब िदन िनकल आया तो वह सीधे पुरािहत के घर पहु ँचा। पुरोिहत पूजा पर बैठे सोच रहे थे —कल ही मुकदमे की पेशी है और अभी तक हाथ मे कौडी भी नही—यजमानो मे कोई सॉँस भी लेता। इतने मे महादेव ने पालागन की। पंिडत जी ने मुँह फेर िलया। यह अमंगलमूितर कहॉँ से आ पहु ँची. िवलास की सामिगयॉँ एकितत हो गयी। तब तीथर -याता करने चले.

इसिलए आज कथा होने दीिजए। मै एक महीने तक आपकी राह देखँगू ा। इसके पीछे तीथर याता करने चला जाऊँगा। आप सब भाइयो से मेरी िवनती है िक आप मेरा उदार करे। एक महीने तक महादेव लेनदारो की राह देखता रहा। रात को चोरो के भय से नीद न आती। अब वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु -अभयागत जो दार पर आ जाते. तो आप लोग उससे जाकर कह दीिजए. आप लोग अपना-अपना िहसाब भूल गये है. िकतने खरे को खोटा िकया. िजसकी जमा मैने मार ली हो. जब जी चाहे. हजारो को टोटल हो जायगा। एक ठाकुर ने ठठोली की—और जो लोग सुरधाम चले गये। महादेव ने उतर िदया—उसके घर वाले तो होगे। िकनतु इस समय लोगो को वसूली की इतनी इचछा न थी. वह ‘सत गुरदत’ कहता हु आ अंतधयारन हो गया. तो दोचार रपये का नुकसान हु आ होगा। बेचारे से पचास रपये ऐंठ िलए। नारायण का भी डर नही। बनने को पंिडत. तो दरू ही से एक सुनहला कलस िदखायी देता है। वह ठाकुरदारे का कलस है। उससे िमला हु आ एक पकका तालाब है. आये और अपना िहसाब चुकता कर ले। गवाही-साखी का काम नही। सब लोग सनाटे मे आ गये। कोई मािमर क भाव से िसर िहला कर बोला—हम कहते न थे। िकसी ने अिवशवास से कहा—कया खा कर भरेगा. पर यथारथ 6 . वह मेरे मुँह की कािलख को िमटाना चाहते है। मै आप सब भाइयो से ललकार कर कहता हू ँ िक िजसका मेरे िजममे जो कुछ िनकलता हो. उनका यथायोगय सतकार करता। दरू -दरू उसका सुयश फैल गया। यहॉँ तक िक महीना पूरा हो गया और एक आदमी भी िहसाब लेने न आया। अब महादेव को जान हु आ िक संसार मे िकतना धमर . पर अब भगवान ने मुझ पर दया की है. िजतनी यह जानने की िक इसे इतना धन िमल कहॉँ से गया। िकसी को महादेव के पास आने का साहस न हु आ। देहात के आदमी थे. िजसमे खूब कमल िखले रहते है। उसकी मछिलयॉँ कोई नही पकडता. वह आकर अपनी एकएक कौडी चुका ले. तालाब के िकनारे एक िवशाल समािध है। यही आतमाराम का समृित-िचनह है. तुमने कई माशे तौल मे उडा िदये थे। महादेव—हॉँ. गडे मुदे उखाडना कया जाने। िफर पाय: लोगो को याद भी न था िक उनहे महादेव से कया पाना है. िकतना सदवयवहार है। अब उसे मालूम हु आ िक संसार बुरो के िलए बुरा है और अचछे के िलए अचछा। ६ इस घटना को हु ए पचास वषर बीत चुके है। आप वेदो जाइये. पर िनयत ऐसी खराब राम-राम ! लोगो को महादेव पर एक शदा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया पर उन सहसो मनुषयो मे से एक भी खडा न हु आ। तब महादेव ने िफर कहॉँ —मालूम होता है. कोई कहता. अगर कोई यहॉँ न आ सका हो. मैने एक कंठा बनाने के िलए सोना िदया था. तो महादेव खडा होकर उचच सवर मे बोला—भाइयो मेरी सारी उम छल-कपट मे कट गयी। मैने न जाने िकतने आदिमयो को दगा दी. और पंिडत जी अपने िसंहासन पर िवराजमान हु ए. उसके समबनध मे िविभन िकंवदंितयॉँ पचिलत है। कोई कहता है.संधया समय जब सब लोग जमा हो. वह रतनजिटत िपंजडा सवगर को चला गया. िजसके चोखे माल का खोटा कर िदया हो. कल से एक महीने तक. बहु त हो. आपका िकतना नुकसान हु आ होग। पुरोिहत—पचास रपये से कम न होगा। महादेव ने कमर से दो मोहरे िनकाली और पुरोिहत जी के सामने रख दी। पुरोिहतजी की लोलुपता पर टीकाऍं होने लगी। यह बेईमानी है. और ऐसे पिवत अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका मुँह बनद िकये हु ए था। सबसे बडी बात यह थी िक महादेव की साधुता ने उनही वशीभूत कर िलया था। अचानक पुरोिहत जी बोले—तुमहे याद है. याद है.

राम के चरण मे िचत लागा।’ महादेव के िवषय मे भी िकतनी ही जन-शुितयॉँ है। उनमे सबसे मानय यह है िक आतमाराम के समािधसथ होने के बाद वह कई संनयािसयो के साथ िहमालय चला गया. आधी रात को अभी तक तालाब के िकनारे आवाज आती है— ‘सत गुरदत िशवदत दाता. और वहॉँ से लौट कर न आया। उसका नाम आतमाराम पिसद हो गया। 7 .यह है िक उस पकी-रपी चंद को िकसी िबली-रपी राहु ने गस िलया। लोग कहते है.

कभी छिवमयी हिरयाली को और कभी सामने मैदान मे खेलते हु ए लडको को। एकाएक उनहे सामने घास पर कागज की एक पुिडया िदखायी दी। माया ने िजजासा की—आड मे चलो. पर उनके पालन मे इस समय कुशल न िदखायी दी। मुदई और मुदालेह.ू तो न जाने िकसकी नजर पडे. देखे इसमे कया है। बुिद ने कहा—तुमसे मतलब? पडी रहने दो। लेिकन िजजासा-रपी माया की जीत हु ई। बजनाथ ने उठ कर पुिडया उठा ली। कदािचत् िकसी के पैसे पुिडया मे िलपटे िगर पडे है। खोल कर देखा. दोनो को एक ही लाठी हॉँका. पुरे आठ िनकले। कुतूहल की सीमा न रही। बजनाथ की छाती धडकने लगी। आठो सावरेन हाथ मे िलये सोचने लगे . पडी िमली है। 8 . बोली—अरे तो अब कया संधया को भी पढतेही रहोगे? जरा दम तो ले लो। बज०--उठा तो न जाएगा. और बगुले डािलयो पर बैठे िहंडोले झूल रहे थे। बजनाथ एक बेच पर आ बैठे और िकताब खोली। लेिकन इस गंथ को अपेका पकृित-गंथ का अवलोकन अिधक िचताकषर क था। कभी आसमान को पढते थे. तो मुझ पर कोई दोष न रहेगा. तो सच बताओ कहॉँ िमली? िकसकी है? बज०—सच कहता हू ँ.द गु ार का मिनदर बाबू बजनाथ कानून पढने मे मग थे. सावरेन थे। िगना. इनहे कया करँ? अगर यही रख दँ . तो कया होगा ! कुछ मैने ही तो उनकी नौकरी नही िलखायी! बजनाथ से कोई जवाब न देते बन पडा। कोध पानी के समान बहाव का मागर न पा कर और भी पबल हो जाता है। यदिप बजनाथ नैितक िसदांतो के जाता थे. तो वही से गरजती हु ई आओगी िक हाय-हाय ! बचचे को मार डाला ! भामा—तो मै कुछ बैठी या सोयी तो नही हू ँ। जरा एक घडी तुमही लडको को बहलाओगे. और उनके दोनो बचचे लडाई करने मे। शयामा िचलाती. बैठी-बैठी वही से कानून बघारोगी ! अभी एक-आध को पटक दगं ू ा. कभी पितयो को. तो हदय मे एक गुदगुदी-सी हु ई। पूछा िकसकी है? बज०--मेरी। भामा—चलो. सोचा—चलूं भामा से एक िदलगी करँ। भोजन तैयार होगा। कल इतमीनान से थाने जाऊँगा। भामा ने सावरेन देखे. िक मुनू मेरी गुिडया नही देता। मुनु रोता था िक शयामा ने मेरी िमठाई खा ली। बजनाथ ने कुद हो कर भामा से कहा—तुम इन दषु ो को यहॉँ से हटाती हो िक नही? नही तो मै एक-एक की खबर लेता हू ँ। भामा चूलहे मे आग जला रही थी. मै तो अपने उतरदाियतव से मुक हो जाऊँगा। माया ने परदे की आड से मंत मारना शुर िकया। वह थाने नही गये . और दोनो को रोते-िचलाते छोड कानून का गंथ बगल मे दबा कालेज -पाकर की राह ली। २ सावन का महीना था। आज कई िदन के बाद बादल हटे थे। हरे-भरे वृक सुनहरी चादर ओढे खडे थे। मृद ु समीर सावन का राग गाता था. कही हो न ! बज०—पडी िमली है। भामा—झूठ बात। ऐसे ही भागय के बली हो. न मालूम कौन उठा ले जाय ! नही यहॉँ रखना उिचत नही। चलूँ थाने मे इतला कर दँ ू और ये सावरेन थानेदार को सौप दँ।ू िजसके होगे वह आप ले जायगा या अगर उसको न भी िमले .

आज तीस तारीख है। कल शाम को तुमहे रपये िमल जायँगे। बजनाथ बडे आदमी तो न थे. मै इसकी इतला करने थाने जाता हू ँ। भामा का मुख मिलन हो गया। बोली—पडे हु ए धन की कया इतला? बज०—हॉँ. इन आठ िगिनयो के िलए ईमान िबगाडू ँगा? भामा—अचछा तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे. ओर अपनी पािरवािरक दिु शचंताओं की िवसमृित की रामकहानी सुना कर अतयंत िवनीत भाव से बोले —भाई साहब. तुमसे न कहते बने. मै अपने िलए एक गुलूबद ं बनवा लूँ. इसिलए जब बजनाथ पर इस पकार का संकट आ पडता था. बहाना ही सही। बज०—तो मै उनसे कया कह दँ ू ! भामा—कह दो घर मे रपये नही है. तो आने मे देर होगी। बजनाथ ने भी सोचा. लेिकन भामा को इस िवषय मे उनसे सहानुभूित न थी. बहाना कर रहे है। भामा--समझेगे. लेिकन अभी कपडे पहन ही रहे थे िक उनके एक िमत मुंशी गोरेवाला आ कर बैठ गये . िकनतु बडपपन की हवा बॉँध रखी थी। यह िमथयािभमान उनके सवभाव की एक दबु र लता थी। केवल अपने वैभव का पभाव डालने के िलए ही वह बहु धा िमतो की छोटी-मोटी आवशयकताओं पर अपनी वासतिवक आवशयकताओं को िनछावर कर िदया करत थे. यही अचछा। थानेवाले रात को तो कोई कारवाई करेगे नही। जब अशिफरयो को पडा रहना है. मै अपने पास रख लूँ। बज०—रहने दो. तो भामा ने हँस कर कहा—आया धन कयो छोडते हो? लाओ.भामा—मेरी कसम? बज०—तुमहारी कसम। भामा िगनयो को पित के हाथ से छीनने की चेषा करने लगी। बजनाथ के कहा—कयो छीनती हो? भामा—लाओ. बहाना करती हो। भामा—अचछा. बहु त िदनो से जी तरस रहा है। माया ने इस समय हासय का रप धारण िकया। बजनाथ ने ितरसकार करके कहा—गुलूबद ं की लालसा मे गले मे फॉँसी लगाना चाहती हो कया? ३ पात:काल बजनाथ थाने के िलए तैयार हू ए। कानून का एक लेकचर छूट जायेगा. तो समझा करे। 9 . इस समय मै इन झंझटो मे ऐसा फँस गया हू ँ िक बुिद कुछ काम नही करती। तुम बडे आदमी हो। इस समय कुछ सहायता करो। जयादा नही तीस रपये दे दो। िकसी न िकसी तरह काम चला लूँगा. लेिकन उनहे िवशवास न आयेगा। समझेगे. तब जेसे थाना वैसे मेरा घर। िगिनयॉँ संदक ू मे रख दी। खा-पी कर लेटे. और कया. तब थोडी देर के िलए उनकी पािरवािरक शांित अवशय नष हो जाती थी। उनमे इनकार करने या टालने की िहममत न थी। वह सकुचाते हु ए भामा के पास गये और बोले—तुमहारे पास तीस रपये तो न होगे? मुंशी गोरेलाल मॉँग रहे है। भामा ने रखाई से रहा—मेरे पास तो रपये नही। बज०—होगे तो जरर. तो मै पदे की आड से कह दँ।ू बज०--कहने को तो मै कह दँ ू. कोई हरज नही। वह इलाहाबाद के हाईकोटर मे अनुवादक थे। नौकरी मे उनित की आशा न देख कर साल भर से वकालत की तैयारी मे मग थे.

बज०—मुझसे ऐसी बमुरौवती नही हो सकती। रात-िदन का साथ ठहरा. घर भर के आदमी घबराये है. लेिकन हदय कॉँप रहा था िक कही वह रासते मे आते हु ए न िमल जायँ . और िगिनयॉँ जेब मे रख कर घर की राह ली। ४ आज पहली तारीख की संधया है। बजनाथ दरवाजे पर बैठे गोरेलाल का इंतजार कर रहे है। पॉँच बज गये. इस समय फुरसत नही है. थोडी देर मे आना। उसने कहा--बाबू जी. लेिकन केवल मुझे लिजजत करने के िलए इनकार कर रही है। दरु ागह ने संकलप को दढ कर िदया। संदक ू से दो िगिनयॉँ िनकाली और गोरेलाल को दे कर बोले —भाई. मेरे पास रपये नही। बजनाथ मन मे बहु त िखन हु ए। उनहे िवशवास था िक भामा के पास रपये है . िनकल गये। बस दो बाते हो सकती है. रात को कौन जाय. पडोस का एक कँु जडा तार पढाने आया है। उससे बोले—भाई. लेिकन िफर वही धोखा ! िफर वही भांित ! तब सोचले लगे िक इतनी देर कयो हो रही है? कया अभी तक वह कचहरी से न आये होगे ! ऐसा कदािप नही हो सकता। उनके दफतर-वाले मुदत हु ई. मै इसी समय देने जा रहा था --यिद कल रपये न पहु ँचे तो मुझे बहु त लिजजत होना पडेगा. लेिकन पढने मे जी नही लगता था। हर तीसरे िमनट रासते की ओर देखने लगते थे. लेिकन सोचते थे—आज वेतन िमलने का िदन है। इसी कारण आने मे देर हो रही है। आते ही होगे। छ: बजे. देना न चाहते होगे. गोरेलाल अभी तक नही आये। बजनाथ की ऑंखे रासते की तरफ लगी हु ई थी। हाथ मे एक पत था. उधर कदम बढाये. कल शाम को कचहरी से आते ही रपये दे जाना। ये एक आदमी की अमानत है. और सरसरी नजर से देख कर बोले—कलकते से आया है। माल नही पहु ँचा। कँु जडे ने डरते-डरते कहा— बाबू जी. सडक पर दोनो तरफ िनगाह दौडायी। कही पता नही। दो-तीन बार दरू से आते हु ए इकको को देख कर गोरेलाल का भम हु आ। आकांका की पबलता ! सात बजे. गोरेलाल के घर चलूँ. समझे होगे. इतना और देख लीिजए िकसने भेजा है। इस पर बजनाथ ने तार फेक िदया और बोले--मुझे इस वक फुरसत नही है। 10 . तो समझे िक थोडे-से रपयो के िलए इतने वयाकुल हो गये। थोडी ही दरू गये िक िकसी को आते देखा। भम हु आ . या तो उनहोने कल आने का िनशचय कर िलया. तो जो मन मे आवे. मुडे और सीधे बरामदे मे आकर दम िलया. िचराग जल गये। सडक पर अँधेरा छाने लगा। बजनाथ सडक पर उिदग भाव से टहलने लगे। इरादा हु आ. लेिकन िनकट आने पर जात हु आ िक कोई और है। आशा की किलपत मूितर दरु ाशा मे बदल गयी। बजनाथ का िचत िखन होने लगा। वह एक बार कुरसी से उठे । बरामदे की चौखट पर खडे हो. जरा एक िनगाह देख लीिजए। िनदान बजनाथ ने झुँझला कर उसके हाथ से तार ले िलया. कैसे इनकार करँ? भामा—अचछा. सो करो। मै एक बार कह चुकी. उस समय उनको गरज थी. लैप जलाया और पत िलखने बैठे. गोरेलाल है. वही है। इसी तरफ आ रहे है। अपने हदय से एक बोझा-सा उतरता मालूम हु आ. या जान-बूझ कर बैठे होगे. इस समय मुझे गरज है। मै ही िकसी को कयो न भेज दँ ू? लेिकन िकसे भेजँ?ू मुनू जा सकता है। सडक ही पर मकान है। यह सोच कर कमरे मे गये. कही मुँह िदखाने योगय न रहू ँगा। गोरेलाल ने मन मे कहा—अमानत सी के िसवा और िकसकी होगी. गोरे लाल का पता नही। कचहरी के कमर चारी एक-एक करके चले आ रहे थे। बजनाथ को कोई बार धोखा हु आ। वह आ रहे है। जरर वही है। वैसी ही अचनक है। वैसे ही टोपी है। चाल भी वही है। हॉँ. मगर ऑंखे दार ही की ओर लगी हु ई थी। अकसमात् िकसी के पैरो की आहट सुनाई दी। परनतु पत को एक िकताब के नीचे दबा िलया और बरामद मे चले आये। देखा.

यह सोचकर लौट पडे. अंधेरा था। वह आशा-रपी दीपक बुझ गया था। एक िमनट तक दिु वधा मे खडे रहे। कया करँ। अभी बहु त सबेरा है। इतनी जलदी थोडे ही सो गए होगे ? दबे पॉँव बरामदे पर चढे। दार पर कान लगा कर सुना. चारो ओर ताक रहे थे िक कही कोई देख न ले। कुछ बातचीत की भनक कान मे पडी। धयान से सुना। सी कह रही थी-रपये तो सब उठ रए. मुझी को सताया करते है. यिद कुछ िदन कानून छोडकर अनुवाद करने मे पिरशम करँ. आज ही जाना चािहए. लेिकन पग-पग पर रकते जाते थे। गोरेलाल का घर दरू से िदखाई िदया. तो रपये िमल सकते है। कम-से-कम एक मास का किठन पिरशम है। ससते अनुवादको के मारे दर भी तो िगर गयी है ! हा िनदर यी ! तूने बडी दगा की। न जाने िकस जनम का बैर चुकाया है। कही का न रखा ! दस ू रे िदन बजनाथ को रपयो की धुन सवार हु ई। सबेरे कानून के लेकचर मे सिममिलत होते. मुझे कया देगे। हॉँ. धारा अपना मागर नही छोडती। गोरेलाल का घर आ गया। दार बंद था। बजनाथ को उनहे पुकारने का साहस न हु आ. वेतन मे इतनी गुज ं ाइश नही। दस-पॉँच रपये की बात होती तो कतर बयोत करता। तो कया कर? िकसी से उधार लूँ। मगर मुझे कौन देगा। आज तक िकसी से मॉँगने का संयोग नही पडा. लेिकन दार पर पहु च ं े तो. और धीरे-धीरे टहलते हु ए एक मील तक चले गए। नौ बजने की आवाज कान मे आयी। गोरेलाल भोजन कर चुके होगे. धैयरहीन समझेगे। नही. ओछा. जैसे कोई िदन-भर का थका-मॉंदा पिथक हो। ५ बजनाथ रात-भर करवटे बदलते रहे। कभी गोरेलाल की धुतरता पर कोध आता था. और अपना कोई ऐसा िमत है भी नही। जो लोग है. यह बहाना कुछ भदा-सा पतीत होता है। साफ कलई खुल जायगी। ऊंह ! इस झंझट की जररत ही कया है। वह मुझे देखकर आप ही समझ जायेगे। इस िवषय मे बातचीत की कुछ नौबत ही न आवेगी। बजनाथ इसी उधेडबुन मे आगे बढते चले जाते थे जैसे नदी मे लहरे चाहे िकसी ओर चले. बला से बुरा मानेगे। इसकी कहॉँ तक िचंता करँ सपष कह दँगू ा मेरे रपये दे दो। भलमानसी भलेमानसो से िनभाई जा सकती है। ऐसे धूतो के साथ भलमनसी का वयवहार करना मूखरता है अचकन पहनी. संधया को कचहरी से तजवीजो का पुिलंदा घर लाते और आधी रात बैठे अनुवाद िकया करते। िसर उठाने की मुहलत न िमलती ! कभी एक-दो भी बज जाते। जब मिसतषक िबलकुल िशिथल हो जाता तब िववश होकर चारपाई पर पडे रहते। 11 . कभी अपनी सरलता पर.आठ बज गये। बजनाथ को िनराशा होने लगी—मुनू इतनी रात बीते नही जा सकता। मन मे िनशचय िकया. घर मे जाकर माया से कहा—जरा एक काम से बाहर जाता हू ँ. बजनाथ को कहॉँ से दोगे? गोरेलाल ने उतर िदया-ऐसी कौन सी उतावली है. िकवाडे बनद कर लो। चलने को तो चले. रपयो की आतचीत करँ? कहू गं ा—भाई घर मे बडी देर से पेट ददर कर रहा है। तुमहारे पास पुराना तेज िसरका तो नही है मगर नही. िकस गरीब के रपये है। उस पर कया बीती होगी ! लेिकन अब कोध या खेद रो कया लाभ? सोचने लगे--रपये कहॉँ से आवेगे? भाभा पहले ही इनकार कर चुकी है. समझे खाना खा रहे होगे। दरवाजे के सामने से िनकले. िफर दे देगे। और दरखवासत दे दी है. मालूम नही. लैप जल रहा था। िठठक गये और सोचने लगे चल कर कया कहू ँगा? कही उनहोने जाते-जाते रपए िनकाल कर दे िदये. और देर के िलए कमा मॉँगी तो मुझे बडी झेप होगी। वह मुझे कुद. कल मंजूर हो ही जायगी। तीन महीने के बाद लौटेगे तब देखा जायगा। बजनाथ को ऐसा जान पडा मानो मुँह पर िकसी न तमाचा मार िदया। कोध और नैराशय से भरे हु ए बरामदे मे उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पडते थे.

मंिदर के सामने वाले वृको से. तो संसार का काम ही बनद हो जाता। बजनाथ इस बाधाकारी वयंग का उतर न देते. िदन िनकलते ही िफर वही चरखा ले बैठते। यहॉँ तक िक तीन सपाह बीत गये और पचीस रपये हाथ आ गए। बजनाथ सोचते थे--दो तीन िदन मे बेडा पार है. मुझ पर दया करो। उसे ऐसा जात हु आ. शययासेवी बन गए। भादो का महीना था। भाभा ने समझा. औषिधयो से िनराश होकर देवताओं की शरण लेते है। भाभा ने भी देवताओं की शरण ली। वह जनमाषमी. रपयेवाले ने कुछ कर धर िदया हो ! जरर यही बात है. बडे धमारतमा बने हो। तुमहारे जैसे दस-पॉँच आदमी और होते. तेरा भला होगा। भाभा उठ बैठी। उसकी ऑंखो मे िनमर ल भिक का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पिवत पेम बरसा पडता था। देवी ने कदािचत् उसे अपनी पभा के रंग मे डू बा िदया था। इतने मे दस ू री एक सी आई। उसके उजजल केश िबखरे और मुरझाए हु ए चेहरे के दोनो ओर लटक रहे थे। शरीर पर केवल एक शवेत साडी थी। हाथ मे चूिडयो के िसवा और कोई आभूषण न था। शोक और नैराशय की साकात् मूितर मालूम होती थी। उसने भी देवी के सामने िसर झुकाया और दोनो हाथो से ऑंचल फैला कर बोली—देवी. लेिकन इककीसवे िदन उनहे पचंड जवर चढ आया और तीन िदन तक न उतरा। छुटी लेनी पडी. नही तो औषिध से लाभ कयो नही होता? संकट पडने पर हम धमर -भीर हो जाते है.लेिकन इतने पिरशम का अभयास न होने के कारण कभी-कभी िसर मे ददर होने लगता। कभी पाचन-िकया मे िवधन पड जाता. और हाथ जोड कर करण सवर से बोली—माता. उसका सवर नाश करो। जैसे िसतार िमजराब की चोट खा कर थरथरा उठता है. िसंहासन के ऊपर जलते हु ए दीपक से और देवी के 12 . मंिदर के सतंभो से. लेिकन जब एक सपाह तक डाकटर की औषिध सेवन करने पर भी जवर न उतरा तब घबरायी। बजनाथ पाय: जवर मे बक-झक भी करने लगते। भाभा सुनकर डर के मारे कमरे मे से भाग जाती। बचचो को पकड कर दस ू रे कमरे मे बनद कर देती। अब उसे शंका होने लगती थी िक कही यह कष उनही रपयो के कारण तो नही भोगना पड रहा है ! कौन जाने. लेट भी रहो. िवशुद भाव-पूणर भय का उदय हो आया। उसने ऑंखे बनद कर ली। घुटनो के बल बैठ गयी. नेतो से भीषण जवाला िनकल रही थी। भाभा के अनत:करण मे सवर था आकाश से. उसी पकार भाभा का हदय अिनष के भय से थरथरा उठा। ये शबद तीव शर के समान उसके कलेजे मे चुभ गए। उसने देवी की ओर कातर नेतो से देखा। उनका जयोितमर य सवरप भयंकर था. मानो देवी मुसकराई। उसे उन िदवय नेतो से एक जयोित-सी िनकल कर अपने हदय मे आती हु ई मालूम हु ई। उसके कानो मे देवी के मुँह से िनकले ये शबद सुनाई िदए—पराया धन लौटा दे. कभी जवर चढ आता। ितस पर भी वह मशीन की तरह काम मे लगे रहते। भाभा कभी-कभी झुँझला कर कहती--अजी. पकोप है. िजसने मेरा धन िलया हो. िपत का. िशवराित का किठन वत शुर िकया। आठ िदन पूरे हो गए। अंितम िदन आया। पभात का समय था। भाभा ने बजनाथ को दवा िपलाई और दोनो बालको को लेकर दगु ार जी की पूजा करने के िलए चली। उसका हदय आराधय देवी के पित शदा से पिरपूणर था। मिनदर के ऑंगन मे पहु ँची। उपासक आसनो पर बैठे हु ए दगु ारपाठ कर रहे थे। धूप और अगर की सुगंध उड रही थी। उसने मिनदर मे पवेश िकया। सामने दगु ार की िवशाल पितमा शोभायमान थी। उसके मुखारिवंद पर एक िवलकण दीप झलक रही थी। बडे -बडे उजजल नेतो से पभा की िकरणे िछटक रही थी। पिवतता का एक समॉँ-सा छाया हु आ था। भाभा इस दीपवणर मूितर के सममुख साधी ऑंखो से ताक न सकी। उसके अनत:करण मे एक िनमर ल.

उसमे से पचास रपए दे दँगू ी। भामा रपये कया होगे. यह आनंद गवर से बाहर िनकला पडता है। तुलसी का आशीवारद सफल हु आ। आज पूरे तीन सपाह के बाद बजनाथ तिकए के सहारे बैठे थे। वह बार-बार भामा को पेम-पूणर नेतो से देखते थे। वह आज उनहे देवी मालूम होती थी। अब तक उनहोने उसके बाह सौदयर की शोभ देखी थी. लेिकन भामा ने एक पडोसी के हाथ अपने कानो के झुमके बेचकर रपये जुटाए है। िजस समय झुमके बनकर आये थे. वह आनंद लजजा के भीतर िछपा हु आ था. कोई उससे अचछी चीज दो। वृदा--बेटी और कया दँ ू जब तक जीऊँगी. तुमहारा यश गाऊँगी। भामा--नही. उसकी थाती लौटाने जा रही है। बजनाथ के बडे पिरशम की कमायी जो डाकटर की भेट हो चुकी है. भामा बहु त पसन हु ई थी। आज उनहे बेचकर वह उससे भी अिधक पसन है। जब बजनाथ ने आठो िगिनयॉँ उसे िदखाई थी. कब और कहॉँ िगर पडे। आठ िगिनयॉँ थी। भामा--अगर वे तुमहे िमल जायँ तो कया दोगी। वृदा--अिधक नही.िवकराल मुँह से ये शबद िनकलकर गूँजने लगे--पराया धन लौटा दे. इसकी मुझे आवशयकता नही ! वृदा--बेटी. तुमहारा धन िकसी ने ले िलया है? वृदा ने इस पकार उसकी ओर देखा. और अंगो पर िकलोल कर रहा है. वह परलोक िसधारे। अब मुझे सरकार से आठ रपए साल पेनशन िमलती है। अककी दो साल की पेनशन एक साथ ही िमली थी। खजाने से रपए लेकर आ रही थी। मालूम नही. उसके हदय मे एक गुदगुदी-सी हु ई थी. नही तो तेरा सवर नाश हो जायगा। भाभा खडी हो गई और उस वृदा से बोली-कयो माता. यह आतमा का आनंद है. वह अचछे हो जायँ। वृदा--कया उनही को रपये िमले है? भामा--हॉँ. इसके िसवा मेरे पास कया है? भामा--मुझे आशीवाद दो। मेरे पित बीमार है. वह इंिदयो का आनंद था. और ऑंचल फैला कर किमपत सवर से बोली--देवी ! इनका कलयाण करो। भामा ने िफर देवी की ओर सशंक दिष से देखा। उनके िदवय रप पर पेम का पकाश था। ऑंखो मे दया की आनंददाियनी झलक थी। उस समय भामा के अंत:करण मे कही सवगर लोक से यह धविन सुनाई दी--जा तेरा कलयाण होगा। संधया का समय है। भामा बजनाथ के साथ इकके पर बैठी तुलसी के घर. मानो डू बते को ितनके का सहारा िमला। बोली—हॉं बेटी ! भाभा--िकतने िदन हु ए ? वृदा--कोई डेढ महीना। भामा--िकतने रपये थे? वृदा--पूरे एक सौ बीस। भामा--कैसे खोए? वृदा--कया जाने कही िगर गए। मेरे सवामी पलटन मे नौकर थे। आज कई बरस हु ए. वह उसी िदन से तुमहे खोज रहे है। वृदा घुटनो के बल बैठ गई. लेिकन यह हषर मुख पर आने का साहस न कर सका था। आज उन िगिनयो को हाथ से जाते समय उसका हािदर क आननद ऑंखो मे चमक रहा है. कपोलो को रंग रहा है. आज वह उसका आितमक सौदयर देख रहे है। 13 . ओठो पर नाच रहा है.

सदा के िलए ‘कान’ तो हो गये। 14 . रपये हािजर है। इस िवलमब के िलए अतयंत लिजजत हू ँ। बजनाथ का कोध शांत हो गया। िवनय मे िकतनी शिक है ! बोले-जी हॉँ. गालो की झुिरर यॉँ िमटती दीख पडी। ऐसा मालूम होता थ.तुलसी का घर एक गली मे था। इकका सडक पर जाकर ठहर गया। बजनाथ इकके पर से उतरे. और अपनी छडी टेकते हु ए भामा के हाथो के सहारे तुलसी के घर पहु ँचे। तुलसी ने रपए िलए और दोनो हाथ फैला कर आशीवारद िदया--दगु ार जी तुमहारा कलयाण करे। तुलसी का वणर हीन मुख वैसे ही िखल गया. आपको मेरे कारण वयथर कष उठाना पडा। यिद इस समय आपको असुिवधा हो. जैसे वषार के पीछे वृको की पितयॉँ िखल जाती है। िसमटा हु आ अंग फैल गया. और मै िकसी तरह तीन महीने की छुटी लेकर घर भागा। वहॉँ की िवपित-कथा कहू ँ. लेिकन आपकी बीमारी की शोक-समाचार सुन कर आज भागा चला आ रहा हू ँ। ये लीिजये. बीमार तो था. गोरेलाल दे गये। भामा ने कहा--ये मरे रपये नही तुलसी के है. मानो उसका कायाकलूप हो गया। वहॉँ से आकर बजनाथ अपवने दार पर बैठे हु ए थे िक गोरेलाल आ कर बैठ गए। बजनाथ ने मुँह फेर िलया। गोरेलाल बोले--भाई साहब ! कैसी तिबयत है? बजनाथ--बहु त अचछी तरह हू ँ। गोरेलाल--मुझे कमा कीिजएगा। मुझे इसका बहु त खेद है िक आपके रपये देने मे इतना िवलमब हु आ। पहली तारीख ही को घर से एक आवशयक पत आ गया. एक बार पराया धन लेकर सीख गयी। बज०--लेिकन तुलसी के पूरे रपये तो दे िदये गये ! भामा--दे िदये तो कया हु आ? ये उसके आशीवारद की नयोछावर है। बज०-कान के झुमके कहॉँ से आवेगे? भामा--झुमके न रहेगे. तो समाप न हो. तो बजनाथ रपये िलये हु ए भीतर आये और भामा से बोले--ये लो अपने रपये. न सही. लेिकन अब अचछा हो गया हू ँ. तो रपये िफर दे दीिजएगा। मै अब उऋण हो गया हू ँ। कोई जलदी नही है। गोरेलाल िवदा हो गये.

उनही के कीितर -सतंभ थे। कहते है इस दरवाजे पर हाथी झूमता था.ए. बिलक उसका िवचार था िक यिद बहु त कुछ सहने और तरह देने पर भी पिरवार के साथ िनवारह न हो सके. सभी यहॉँ िवदमान थे। नाम था भूपिसंह। बडे उदार-िचत और पितभाशाली पुरष थे. बिलक वह बहु धा बडे जोर से उसकी िनंदा और ितरसकार िकया करते थे। इसी से गॉँव मे उनका बडा सममान था। दशहरे के िदनो मे वह बडे उतसाह से रामलीला होते और सवयं िकसी न िकसी पात का पाटर लेते थे। गौरीपुर मे रामलीला के वही जनमदाता थे। पाचीन िहंद ू सभयता का गुणगान उनकी धािमर कता का पधान अंग था। सिममिलत कुटु मब के तो वह एक-मात उपासक थे। आज-कल िसयो को कुटु मब को कुटु मब मे िमल-जुल कर रहने की जो अरिच होती है. कयोिक एक न एक आदमी हॉँडी िलए उसके िसर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव िसंह अपनी आधी से अिधक संपित वकीलो को भेट कर चुके थे। उनकी वतर मान आय एक हजार रपये वािषर क से अिधक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बडे का नाम शीकंठ िसंह था। उसने बहु त िदनो के पिरशम और उदोग के बाद बी. बहरी-िशकरे. हाथ समेट िलया। आनंदी चौथी लडकी थी। वह अपनी सब बहनो से अिधक रपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपिसंह उसे बहु त पयार करते थे। सुनदर संतान को कदािचत् उसके माता-िपता भी अिधक चाहते है। ठाकुर साहब बडे धमर -संकट मे थे िक इसका िववाह कहॉँ करे? न तो यही चाहते थे िक ऋण का बोझ बढे और न यही सवीकार था िक उसे अपने को भागयहीन समझना पडे। एक िदन शीकंठ उनके पास िकसी चंदे का रपया मॉँगने आये। शायद नागरी-पचार का चंदा था। भूपिसंह उनके सवभाव पर रीझ गये और धूमधाम से शीकंठिसंह का आनंदी के साथ बयाह हो गया। 15 . की िडगी पाप की थी। अब एक दफतर मे नौकर था। छोटा लडका लाल-िबहारी िसंह दोहरे बदन का.बडे घर की बे ट ी बेनीमाधव िसंह गौरीपुर गॉँव के जमीदार और नमबरदार थे। उनके िपतामह िकसी समय बडे धन-धानय संपन थे। गॉँव का पकका तालाब और मंिदर िजनकी अब मरममत भी मुिशकल थी. िजसके शरीर मे अिसथ-पंजर के िसवा और कुछ शेष न रहा था. पर पंदह-बीस हजार रपयो का कजर िसर पर हो गया. तीन कुते. पर दध ू शायद बहु त देती थी. आनरेरी मिजसटर ेट और ऋण. झाड-फानूस. उसे वह जाित और देश दोनो के िलए हािनकारक समझते थे। यही कारण था िक गॉँव की ललनाऍं उनकी िनंदक थी ! कोई-कोई तो उनहे अपना शतु समझने मे भी संकोच न करती थी ! सवयं उनकी पतनी को ही इस िवषय मे उनसे िवरोध था। यह इसिलए नही िक उसे अपने सास-ससुर.चौडी छाती। भैस का दो सेर ताजा दध ू वह उठ कर सबेरे पी जाता था। शीकंठ िसंह की दशा िबलकुल िवपरीत थी। इन नेतिपय गुणो को उनहोने बी०ए०--इनही दो अकरो पर नयोछावर कर िदया था। इन दो अकरो ने उनके शरीर को िनबर ल और चेहरे को कांितहीन बना िदया था। इसी से वैदक गंथो पर उनका िवशेष पेम था। आयुवेिदक औषिधयो पर उनका अिधक िवशवास था। शाम-सबेरे उनके कमरे से पाय: खरल की सुरीली कणर मधुर धविन सुनायी िदया करती थी। लाहौर और कलकते के वैदो से बडी िलखा-पढी रहती थी। शीकंठ इस अँगरेजी िडगी के अिधपित होने पर भी अँगरेजी सामािजक पथाओं के िवशेष पेमी न थे. पर दभ ु ारगय से लडका एक भी न था। सात लडिकयॉँ हु ई ं और दैवयोग से सब की सब जीिवत रही। पहली उमंग मे तो उनहोने तीन बयाह िदल खोलकर िकये . बाज. जो एक पितिषत तालुकेदार के भोगय पदाथर है. तो आये-िदन की कलह से जीवन को नष करने की अपेका यही उतम है िक अपनी िखचडी अलग पकायी जाय। आनंदी एक बडे उचच कुल की लडकी थी। उसके बाप एक छोटी-सी िरयासत के तालुकेदार थे। िवशाल भवन. तो ऑंखे खुली. सजीला जवान था। भरा हु आ मुखडा. देवर या जेठ आिद घृणा थी. एक हाथी. अब उसकी जगह एक बूढी भैस थी.

तो नौ लाख का। वहॉँ इतना घी िनतय नाई-कहार खा जाते है। लालिबहारी जल गया. िकफायत कया जाने। उसने सब घी मांस मे डाल िदया। लालिबहारी खाने बैठा. मान और मयारदा पित तक है। उसे अपने पित के ही बल और पुरषतव का घमंड होता है। आनंदी खून का घूँट पी कर रह गयी। ३ शीकंठ िसंह शिनवार को घर आया करते थे। वृहसपित को यह घटना हु ई थी। दो िदन तक आनंदी कोप-भवन मे रही। न कुछ खाया न िपया. मार भी सह लेती है. उस पर हाथ साफ कर िलया करता था। खडाऊँ उठाकर आनंदी की ओर जोर से फेकी. थाली उठाकर पलट दी. उसी तरह कुधा से बावला मनुषय जरा-जरा सी बात पर ितनक जाता है। लालिबहारी को भावज की यह िढठाई बहु त बुरी मालूम हु ई. बोला-दाल मे घी कयो नही छोडा? आनंदी ने कहा--घी सब मॉँस मे पड गया। लालिबहारी जोर से बोला--अभी परसो घी आया है। इतना जलद उठ गया? आनंदी ने उतर िदया--आज तो कुल पाव--भर रहा होगा। वह सब मैने मांस मे डाल िदया। िजस तरह सूखी लकडी जलदी से जल उठती है. कुछ देश-काल संबध ं ी समाचार तथा कुछ नये मुकदमो आिद की चचार करने लगे। यह वातारलाप दस बजे रात तक होता रहा। गॉँव के भद पुरषो को इन बातो मे ऐसा आनंद िमलता था िक खाने-पीने की भी सुिध न रहती थी। शीकंठ को िपंड छुडाना मुिशकल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे आनंदी ने बडे कष से काटे ! िकसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी। एकांत हु आ. और बोला--जी चाहता है. मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया वयंजन बनाने बैठी। हांडी मे देखा. िकनतु आनंदी ने थोडे ही िदनो मे अपने को इस नयी अवसथा के ऐसा अनुकूल बना िलया. न दीवार पर तसवीरे। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहसथी का मकान था. वह यहां नाम-मात को भी न थी। हाथी-घोडो का तो कहना ही कया. पर मैके की िनंदा उनसे नही सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली--हाथी मरा भी. उसे भी देखँग ू ा और तुमहे भी। आनंदी ने हाथ से खडाऊँ रोकी. पर यहॉँ बाग कहॉँ। मकान मे िखडिकयॉँ तक न थी. ितनक कर बोला--मैके मे तो चाहे घी की नदी बहती हो ! सी गािलयॉँ सह लेती है. उजड ठाकुर से न रहा गया। उसकी सी एक साधारण जमीदार की बेटी थी। जब जी चाहता. मानो उसने िवलास के सामान कभी देखे ही न थे। २ एक िदन दोपहर के समय लालिबहारी िसंह दो िचिडया िलये हु ए आया और भावज से बोला--जलदी से पका दो. िसर बच गया. बोली--वह होते तो आज इसका मजा चखाते। अब अपढ.आनंदी अपने नये घर मे आयी. तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। िजस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पडी हु ई थी. आप जरा भाभी 16 . जीभ पकड कर खीच लूँ। आनंद को भी कोध आ गया। मुँह लाल हो गया. कोई सजी हु ई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी सलीपर साथ लायी थी. न जमीन पर फशर . पर अँगली मे बडी चोट आयी। कोध के मारे हवा से िहलते पते की भॉँित कॉँपती हु ई अपने कमरे मे आ कर खडी हो गयी। सी का बल और साहस. तो लालिबहारी ने कहा--भैया. तो घी पाव-भर से अिधक न था। बडे घर की बेटी. उनकी बाट देखती रही। अंत मे शिनवार को वह िनयमानुकूल संधया समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधरउधर की बाते. तो दाल मे घी न था. और बोला--िजसके गुमान पर भूली हु ई हो.

परनतु दभ ु ारगय. झुँझलाहट के मारे बदन मे जवाला-सी दहक उठी। बोली--िजसने तुमसे यह आग लगायी है. मुँह झुलस दँ।ू शीकंठ--इतनी गरम कयो होती हो. वह सच है या झूठ। शीकंठ की ऑंखे लाल हो गयी। बोले --यहॉँ तक हो गया. उसे पाऊँ. वहॉँ तक मै सह सकता हू ँ िकनतु यह कदािप नही हो सकता िक मेरे ऊपर लात-घूँसे पडे और मै दम न मारँ। बेनीमाधव िसंह कुछ जवाब न दे सके। शीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढा ठाकुर अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला--बेटा. कयोिक ऑंसू उनकी पलको पर रहते है। शीकंठ बडे धैयरवान् और शांित पुरष थे। उनहे कदािचत् ही कभी कोध आता था. तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नही। आनंदी--परसो तुमहारे लाडले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी मे पाव-भर से अिधक न था। वह सब मैने मांस मे डाल िदया। जब खाने बैठा तो कहने लगा--दल मे घी कयो नही है? बस. िजसको चपरासिगरी करने का भी शऊर नही. पर तुमने आजकल घर मे यह कया उपदव मचा रखा है? आनंदी की तयोिरयो पर बल पड गये. इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा--मुझसे न रहा गया। मैने कहा िक वहॉँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते है. अब इस घर मे मेरा िनबाह न होगा। इस तरह की िवदोह-पूणर बाते कहने पर शीकंठ ने िकतनी ही बार अपने कई िमतो को आडे हाथो िलया था.को समझा दीिजएगा िक मुँह सँभाल कर बातचीत िकया करे. तुम बुिदमान होकर ऐसी बाते करते हो? िसयॉं इस तरह घर का नाश कर देती है। उनको बहु त िसर चढाना अचछा नही। 17 . तो िसर फट जाय। उसी से पूछो. नही तो एक िदन अनथर हो जायगा। बेनीमाधव िसंह ने बेटे की ओर साकी दी--हॉँ. यह मेरे भागय का फेर है ! नही तो गँवार छोकरा. तो हम भी कोई कुमी-कहार नही है। शीकंठ ने िचंितत सवर से पूछा--आिखर बात कया हु ई? लालिबहारी ने कहा--कुछ भी नही. आज उनहे सवयं वे ही बाते अपने मुँह से कहनी पडी ! दस ू रो को उपदेश देना भी िकतना सहज है! बेनीमाधव िसंह घबरा उठे और बोले--कयो? शीकंठ--इसिलए िक मुझे भी अपनी मान--पितषा का कुछ िवचार है। आपके घर मे अब अनयाय और हठ का पकोप हो रहा है। िजनको बडो का आदर--सममान करना चािहए. बहू -बेिटयो का यह सवभाव अचछा नही िक मदो ं के मूँह लगे। लालिबहारी--वह बडे घर की बेटी है. िसयो के ऑंसू पुरष की कोधािग भडकाने मे तेल का काम देते है। रात भर करवटे बदलते रहे। उिदगता के कारण पलक तक नही झपकी। पात:काल अपने बाप के पास जाकर बोले--दादा. मुझे खडाऊँ से मार कर यो न अकडता। शीकंठ--सब हाल साफ-साफ कहा. बात तो कहो। आनंदी--कया कहू ँ. वे उनके िसर चढते है। मै दस ू रे का नौकर ठहरा घर पर रहता नही। यहॉँ मेरे पीछे िसयो पर खडाऊँ और जूतो की बौछारे होती है। कडी बात तक िचनता नही। कोई एक की दो कह ले. मैने जो कुछ कहा है. और िकसी को जान भी नही पडता। बस इतनी सी बात पर इस अनयायी ने मुझ पर खडाऊँ फेक मारी। यिद हाथ से न रोक लूँ. यो ही आप ही आप उलझ पडी। मैके के सामने हम लोगो को कुछ समझती ही नही। शीकंठ खा-पीकर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा--िचत तो पसन है। शीकंठ बोले--बहु त पसन है. इस छोकरे का यह साहस ! आनंदी िसयो के सवभावानुसार रोने लगी.

शीकंठ--इतना मै जानता हू ँ. या मै ही। आपको यिद वह अिधक पयारा है. इसी गॉँव मे कई घर सँभल गये. मै अपना भार आप सॅभ ं ाल लूँगा। यिद मुझे रखना चाहते है तो उससे किहए. इसीिलए वह दबबू है। उसने िवदा पढी. पॉँच रपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हदय-िवदारक बात सुनकर लालिबहारी को बडी गलािन हु ई। वह फूट-फूट कर रोने लगा। इसमे संदेह नही िक अपने िकये पर पछता रहा था। भाई के आने से एक िदन पहले से उसकी छाती धडकती थी िक देखँू भैया कया कहते है। मै उनके सममुख कैसे 18 . यह उनकी मूखरता है। इन महानुभावो की शुभकामनाऍं आज पूरी होती िदखायी दी। कोई हु कका पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद िदखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधव िसंह पुराने आदमी थे। इन भावो को ताड गये। उनहोने िनशचय िकया चाहे कुछ ही कयो न हो. तो उनहोने पुलिकत होकर अखाडे मे ही जा कर उसे गले लगा िलया था. इसिलए वह िकताबो का कीडा है। बेनीमाधव िसंह उसकी सलाह के िबना कोई काम नही करते. इन दोिहयो को ताली बजाने का अवसर न दँगू ा। तुरत ं कोमल शबदो मे बोले--बेटा. जो इस कुल की नीितपूणर गित पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे—शीकंठ अपने बाप से दबता है. लेिकन यह नही सवीकार करना चाहते थे िक लालिबहारी ने कोई अनुिचत काम िकया है। इसी बीच मे गॉँव के और कई सजजन हु कके-िचलम के बहाने वहॉँ आ बैठे। कई िसयो ने जब यह सुना िक शीकंठ पतनी के पीछे िपता से लडने की तैयार है. अब तो लडके से अपराध हो गया। इलाहाबाद का अनुभव-रिहत झलाया हु आ गेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे िडबेिटंग-कलब मे अपनी बात पर अडने की आदत थी. उसे तुम बडे होकर कमा करो। शीकंठ—उसकी इस दषु ता को मै कदािप नही सह सकता। या तो वही घर मे रहेगा. उसकी कूरता और अिववेक के कारण। दोनो कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लडके का कोध शांत करना चाहते थे. उसके पित ऐसा घोर अनयाय और पशुवत् वयवहार मुझे असह है। आप सच मािनए. बुिदमान लोग मूखो ं की बात पर धयान नही देते। वह बेसमझ लडका है। उससे जो कुछ भूल हु ई. तो उसके िलए कोई न कोई वसतु अवशय लाते। मुगदर की जोडी उनहोने ही बनवा दी थी। िपछले साल जब उसने अपने से डौढे जवान को नागपंचमी के िदन दंगल मे पछाड िदया. इन हथकंडो की उसे कया खबर? बाप ने िजस मतलब से बात पलटी थी. हु कका पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। शीकंठ का भी उस पर हािदर क सनेह था। अपने होश मे उनहोने कभी उसे घुडका तक न था। जब वह इलाहाबाद से आते. शीकंठ—लालिबहारी को मै अब अपना भाई नही समझता। बेनीमाधव िसंह--सी के पीछे ? शीकंठ—जी नही. तो उनहे बडा हषर हु आ। दोनो पको की मधुर वािणयॉँ सुनने के िलए उनकी आतमाऍं ितलिमलाने लगी। गॉँव मे कुछ ऐसे कुिटल मनुषय भी थे. तो मुझे िवदा कीिजए. मेरे िलए यही कुछ कम नही है िक लालिबहारी को कुछ दंड नही होता। अब बेनीमाधव िसंह भी गरमाये। ऐसी बाते और न सुन सके। बोले --लालिबहारी तुमहारा भाई है। उससे जब कभी भूल--चूक हो. जहॉँ चाहे चला जाय। बस यह मेरा अंितम िनशचय है। लालिबहारी िसंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खडा बडे भाई की बाते सुन रहा था। वह उनका बहु त आदर करता था। उसे कभी इतना साहस न हु आ था िक शीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाय. आपके आशीवारद से ऐसा मूखर नही हू ँ। आप सवयं जानते है िक मेरे ही समझाने-बुझाने से. उसके कान पकडो लेिकन. मै तुमसे बाहर नही हू ँ। तमहारा जो जी चाहे करो. वह उसकी समझ मे न आया। बोला— लालिबहारी के साथ अब इस घर मे नही रह सकता। बेनीमाधव—बेटा. पर िजस सी की मान-पितषा का ईशवर के दरबार मे उतरदाता हू ँ.

लेिकन अब मन मे पछता रही थी वह सवभाव से ही दयावती थी। उसे इसका तिनक भी धयान न था िक बात इतनी बढ जायगी। वह मन मे अपने पित पर झुँझला रही थी िक यह इतने गरम कयो होते है। उस पर यह भय भी लगा हु आ था िक कही मुझसे इलाहाबाद चलने को कहे .जाऊँगा. और शीघता से दरवाजे की ओर बढा। अंत मे आनंदी कमरे से िनकली और उसका हाथ पकड िलया। लालिबहारी ने पीछे िफर कर देखा और ऑंखो मे ऑंसू भरे बोला--मुझे जाने दो। आनंदी कहॉँ जाते हो? लालिबहारी--जहॉँ कोई मेरा मुँह न देखे। आनंदी—मै न जाने दँगू ी? लालिबहारी—मै तुम लोगो के साथ रहने योगय नही हू ँ। आनंदी—तुमहे मेरी सौगंध अब एक पग भी आगे न बढाना। लालिबहारी—जब तक मुझे यह न मालूम हो जाय िक भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया. मेरी ऑंखे उनके सामने कैसे उठे गी। उसने समझा था िक भैया मुझे बुलाकर समझा देगे। इस आशा के िवपरीत आज उसने उनहे िनदर यता की मूितर बने हु ए पाया। वह मूखर था। परंतु उसका मन कहता था िक भैया मेरे साथ अनयाय कर रहे है। यिद शीकंठ उसे अकेले मे बुलाकर दो-चार बाते कह देते. उनसे कैसे बोलूँगा. तो उसका रहा-सहा कोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के िलए नयन-जल से उपयुक और कोई वसतु नही है। शीकंठ को देखकर आनंदी ने कहा—लाला बाहर खडे बहु त रो रहे है। शीकंठ--तो मै कया करँ? आनंदी—भीतर बुला लो। मेरी जीभ मे आग लगे ! मैने कहॉँ से यह झगडा उठाया। शीकंठ--मै न बुलाऊँगा। आनंदी--पछताओगे। उनहे बहु त गलािन हो गयी है. इसिलए अब मै जाता हू ँ। उनहे िफर मुँह न िदखाऊँगा ! मुझसे जो कुछ अपराध हु आ. उसी समय शीकंठ िसंह भी ऑंखे लाल िकये बाहर से आये। भाई को खडा देखा. उसे कमा करना। यह कहते-कहते लालिबहारी का गला भर आया। ४ िजस समय लालिबहारी िसंह िसर झुकाये आनंदी के दार पर खड था. मुझसे जो कुछ अपराध हु आ. तो कैसे कया करँगी। इस बीच मे जब उसने लालिबहारी को दरवाजे पर खडे यह कहते सुना िक अब मै जाता हू ँ. तब तक मै इस घर मे कदािप न रहू ँगा। आनंदी—मै ईशवर को साकी दे कर कहती हू ँ िक तुमहारी ओर से मेरे मन मे तिनक भी मैल नही है। अब शीकंठ का हदय भी िपघला। उनहोने बाहर आकर लालिबहारी को गले लगा िलया। दोनो भाई खूब फूट-फूट कर रोये। लालिबहारी ने िससकते हु ए कहा—भैया. लालिबहारी से सहा न गया ! वह रोता हु आ घर आया। कोठारी मे जा कर कपडे पहने. इसिलए मै भी अपना मुँह उनहे न िदखाऊँगा। लालिबहारी इतना कह कर लौट पडा. भैया ने िनशचय िकया है िक वह मेरे साथ इस घर मे न रहेगे। अब वह मेरा मुँह नही देखना चाहते . अब 19 . पर भाई का यह कहना िक अब मै इसकी सूरत नही देखना चाहता. इतना ही नही दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदािचत् उसे इतना द ु:ख न होता. ऐसा न हो. और कतरा कर िनकल गये। मानो उसकी परछाही से दरू भागते हो। आनंदी ने लालिबहारी की िशकायत तो की थी. तो घृणा से ऑंखे फेर ली. िजसमे कोई यह न समझे िक रोता था। तब आनंदी के दार पर आकर बोला—भाभी. कही चल दे। शीकंठ न उठे । इतने मे लालिबहारी ने िफर कहा--भाभी. भैया से मेरा पणाम कह दो। वह मेरा मुँह नही देखना चाहते. कमा करना. ऑंखे पोछी.

तो िफर ऐसा अवसर न आवेगा। बेनीमाधव िसंह बाहर से आ रहे थे। दोनो भाइयो को गले िमलते देखकर आनंद से पुलिकत हो गये। बोल उठे —बडे घर की बेिटयॉँ ऐसी ही होती है। िबगडता हु आ काम बना लेती है। गॉँव मे िजसने यह वृतांत सुना.कभी मत कहना िक तुमहारा मुँह न देखँग ू ा। इसके िसवा आप जो दंड देगे. मै सहषर सवीकार करँगा। शीकंठ ने कॉँपते हु ए सवर मे कहा--ललू ! इन बातो को िबलकुल भूल जाओ। ईशवर चाहेगा. उसी ने इन शबदो मे आनंदी की उदारता को सराहा—‘बडे घर की बेिटयॉँ ऐसी ही होती है।‘ 20 .

और अलगू जब कभी बाहर जाते. केवल िवचार िमलते थे। िमतता का मूलमंत भी यही है। इस िमतता का जनम उसी समय हु आ. तो यह मानकर संतोष कर लेना िक िवदोपाजर न मे मैने यथाशिक कोई बात उठा नही रखी. और जुममन के पूजय िपता. गुर जी की कृपा-दिष चािहए। अतएव यिद अलगू पर जुमराती शेख के आशीवारद अथवा सतसंग का कुछ फल न हु आ. तो जुममन शेख अपनी अनमोल िवदा से ही सबके आदरपात बने थे। २ जुममन शेख की एक बूढी खाला (मौसी) थी। उसके पास कुछ थोडी-सी िमलिकयत थी. मै अपना पका-खा लूँगी। जुममन ने घृषता के साथ उतर िदया—रपये कया यहाँ फलते है? 21 .सी की गयी. गुर के आशीवारद से। बस. िवदा उसके भागय ही मे न थी. उनहे िशका पदान करते थे। अलगू ने गुर जी की बहु त सेवा की थी. न धमर का नाता. तब अपना घर अलगू को सौप गये थे. पर रिजसटर ी की मोहर ने इन खाितरदािरयो पर भी मानो मुहर लगा दी। जुममन की पतनी करीमन रोिटयो के साथ कडवी बातो के कुछ तेज. उतने से तो अब तक गॉँव मोल ले लेते। कुछ िदन खालाजान ने सुना और सहा. कयोिक पतयेक िचलम अलगू को आध घंटे तक िकताबो से अलग कर देती थी। अलगू के िपता पुराने िवचारो के मनुषय थे। उनहे िशका की अपेका गुर की सेवा-शुशूषा पर अिधक िवशवास था। वह कहते थे िक िवदा पढने ने नही आती. तब तक खालाजान का खूब आदर-सतकार िकया गया. तो जुममन पर अपना घर छोड देते थे। उनमे न खाना-पाना का वयवहार था. तीखे सालन भी देने लगी। जुममन शेख भी िनठु र हो गये। अब बेचारी खालाजान को पाय: िनतय ही ऐसी बाते सुननी पडती थी। बुिढया न जाने कब तक िजयेगी। दो-तीन बीघे ऊसर कया दे िदया.पं च परमे श वर जुममन शेख अलगू चौधरी मे गाढी िमतता थी। साझे मे खेती होती थी। कुछ लेन देन मे भी साझा था। एक को दस ू रे पर अटल िवशवास था। जुममन जब हज करने गये थे . तो कैसे आती? मगर जुमराती शेख सवयं आशीवारद के कायल न थे। उनहे अपने सोटे पर अिधक भरोसा था. पर जब न सहा गया तब जुममन से िशकायत की। तुममन ने सथानीय कमर चारी—गृहसवांमी—के पबंध देना उिचत न समझा। कुछ िदन तक िदन तक और यो ही रो-धोकर काम चलता रहा। अनत मे एक िदन खाला ने जुममन से कहा—बेटा ! तुमहारे साथ मेरा िनवारह न होगा। तुम मुझे रपये दे िदया करो. जुमराती. जो कुछ होता है. और उसी सोटे के पताप से आज-पास के गॉँवो मे जुममन की पूजा होती थी। उनके िलखे हु ए रेहननामे या बैनामे पर कचहरी का मुहिररर भी कदम न उठा सकता था। हलके का डािकया. उनहे खूब सवािदष पदाथर िखलाये गये। हलवे-पुलाव की वषार. मानो मोल ले िलया है ! बघारी दाल के िबना रोिटयॉँ नही उतरती ! िजतना रपया इसके पेट मे झोक चुके. खूब पयाले धोये। उनका हु कका एक कण के िलए भी िवशाम न लेने पाता था. कांसटेिबल और तहसील का चपरासी--सब उनकी कृपा की आकांका रखते थे। अतएव अलगू का मान उनके धन के कारण था. परनतु उसके िनकट संबिं धयो मे कोई न था। जुममन ने लमबे-चौडे वादे करके वह िमलिकयत अपने नाम िलखवा ली थी। जब तक दानपत की रिजसटर ी न हु ई थी. जब दोनो िमत बालक ही थे.

कल दस ू रा िदन. तुम भी दम भर के िलये मेरी पंचायत मे चले आना। अलगू—मुझे बुला कर कया करोगी? कई गॉँव के आदमी तो आवेगे ही। खाला—अपनी िवपद तो सबके आगे रो आयी। अब आनरे न आने का अिखतयार उनको है। अलगू—यो आने को आ जाऊँगा. और िकसी ने इस अनयाय पर जमाने को गािलयाँ दी। कहा—कब मे पॉँव जटके हु ए है. पर हवस नही मानती। अब तुमहे कया चािहए? रोटी खाओ और अलाह का नाम लो। तुमहे अब खेती-बारी से कया काम है? कुछ ऐसे सजजन भी थे. परनतु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। िफर उसे कोई जीत नही सकता। अलगू इस सवाल का काई उतर न दे सका. िजनहोने इस अबला के दख ु डे को गौर से सुना हो और उसको सांतवना दी हो। चारो ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी के पास आयी। लाठी पटक दी और दम लेकर बोली—बेटा. िजनहे हासय-रस के रसासवादन का अचछा अवसर िमला। झुकी हु ई कमर. कया िबगाड के डर से ईमान की बात न कहोगे? हमारे सोये हु ए धमर -जान की सारी समपित लुट जाय. तो उसे खबर नही होता. उसके अनुगहो का ऋणी न हो. पर उसके हदय मे ये शबद गूँज रहे थेकया िबगाड के डर से ईमान की बात न कहोगे? ४ संधया समय एक पेड के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुममन ने पहले से ही फशर िबछा रखा था। उनहोने पान. िजस तरह कोई िशकारी िहरन को जाली की तरफ जाते देख कर मन ही मन हँसता है। वह बोले — हॉँ. उनहोने पंचायत करने की धमकी दी। जुममन हँसे. िजसके समाने बुिढया ने द ु:ख के ऑंसू न बहाये हो। िकसी ने तो यो ही ऊपरी मन से हू ँ-हॉँ करके टाल िदया. ऐसा कौन था. हु कके-तमबाकू आिद का पबनध भी िकया था। हॉँ. तब हँसी कयो न आवे? ऐसे नयायिपय. आज मरे. इस िवषय मे जुममन को कुछ भी संदेह न थ। आस-पास के गॉँवो मे ऐसा कौन था. इलायची. सन के-से बाल इतनी सामगी एकत हो. जरर पंचायत करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात-िदन की खटखट पसंद नही। पंचायत मे िकसकी जीत होगी. मगर पंचायत मे मुँह न खोलूँगा। खाला—कयो बेटा? अलगू—अब इसका कया जवाब दँ ?ू अपनी खुशी। जुममन मेरा पुराना िमत है। उससे िबगाड नही कर सकता। खाला—बेटा. जो उसका सामना कर सके? आसमान के फिरशते तो पंचायत करने आवेगे ही नही। ३ इसके बाद कई िदन तक बूढी खाला हाथ मे एक लकडी िलये आस-पास के गॉँवो मे दौडती रही। कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दभ ू र था. तब दवे हु ए सलाम से उसका सवागत करते थे। जब सूयर असत हो गया और िचिडयो की 22 . जो उसको शतु बनाने का साहस कर सके? िकसमे इतना बल था. दीन-वतसल पुरष बहु त कम थे. दयालु.खाला ने नमता से कहा—मुझे कुछ रखा-सूखा चािहए भी िक नही? जुममन ने गमभीर सवर से जवाब ़ िदया—तो कोई यह थोडे ही समझा था िक तु मौत से लडकर आयी हो? खाला िबगड गयी. मगर बात आ पडी थी। उसका िनणर य करना जररी था। िबरला ही कोई भला आदमी होगा. पोपला मुँह. वह सवय अलबता अलगू चौधरी के साथ जरा दरू पर बैठेजब पंचायत मे कोई आ जाता था.

करो। जुममन को पूरा िवशवास था िक अब बाजी मेरी है। अलग यह सब िदखावे की बाते कर रहा है। अतएव शांत-िचत हो कर बोले--पंचो. तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पडा. दोनो हमारी िनगाह मे बराबर हो। तुमको पंचो से जो कुछ अजर करनी हो. दोसती के िलए कोई अपना ईमान नही बेचता। पंच के िदल मे खुदा बसता है। पंचो के मुँह से जो बात िनकलती है. मै उनही को सरपंच बदती हू ँ। जुममन शेख आनंद से फूल उठे . तो उसे समझाओं. खुदा से डरो। पंच न िकसी के दोसत होते है. तो बूढी खाला ने उनसे िवनती की-‘पंचो. वह बोली--बेटा. उसी राह पर चलूँ। अगर मुझमे कोई ऐब देखो. तब यहॉँ भी पंचायत शुर हु ई। फशर की एक-एक अंगुल जमीन भर गयी. बोले—जुममन िमयां िकसे पंच बदते हो? अभी से इसका िनपटारा कर लो। िफर जो कुछ पंच कहेगे. वह खुदा की तरफ से िनकलती है।’ अलगू चौधरी सरपंच हु एं रामधन िमश और जुममन के दस ू रे िवरोिधयो ने बुिढया को मन मे बहु त कोसा। अलगू चौधरी बोले--शेख जुममन ! हम और तुम पुराने दोसत है ! जब काम पडा. तुमहारी सेवा करते रहे है. मैने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुममन के नाम िलख दी थी। इसे आप लोग जानते ही होगे। जुममन ने मुझे ता-हयात रोटी-कपडा देना कबूल िकया। साल-भर तो मैने इसके साथ रो-धोकर काटा। पर अब रात-िदन का रोना नही सहा जाता। मुझे न पेट की रोटी िमलती है न तन का कपडा। बेकस बेवा हू ँ। कचहरी दरबार नही कर सकती। तुमहारे िसवा और िकसको अपना द ु:ख सुनाऊँ? तुम लोग जो राह िनकाल दो. आज तीन साल हु ए. तीन साल हु ए खालाजान ने अपनी 23 . िजसे चाहो. लो. पंच बदो। खालाजान जुममन के आकेप को समझ गयी. अलगू चौधरी को तो मानते हो. कयो एक बेकस की आह लेता है ! मै पंचो का हु कम िसर-माथे पर चढाऊँगी।’ रामधन िमश. परनतु भावो को िछपा कर बोले--अलगू ही सही. पर अिधकांश दशर क ही थे। िनमंितत महाशयो मे से केवल वे ही लोग पधारे थे. िजनसे िकसी न िकसी कारण उनका वैमनसय था। जुममन बोले—पंचो का हु कम अलाह का हु कम है। खालाजान िजसे चाहे.कलरवयुक पंचायत पेडो पर बैठी. मगर इस समय तुम और बुढी खाला. िजनके कई असािमयो को जुममन ने अपने गांव मे बसा िलया था. तुम जानती हो िक मेरी जुममन से गाढी दोसती है। खाला ने गमभीर सवर मे कहा--‘बेटा. वही मानना पडेगा। जुममन को इस समय सदसयो मे िवशेषकर वे ही लोग दीख पडे. तो जाने दो. मेरे िलए जैसे रामधन वैसे अलगू। अलगू इस झमेले मे फँसना नही चाहते थे। वे कनी काटने लगे। बोले--खाला. िजनहे जुममन से अपनी कुछ कसर िनकालनी थी। एक कोने मे आग सुलग रही थी। नाई ताबडतोड िचलम भर रहा था। यह िनणर य करना असमभव था िक सुलगते हु ए उपलो से अिधक धुऑं िनकलता था या िचलम के दमो से। लडके इधर-उधर दौड रहे थे। कोई आपस मे गाली-गलौज करते और कोई रोते थे। चारो तरफ कोलाहल मच रहा था। गॉँव के कुते इस जमाव को भोज समझकर झुंड के झुंड जमा हो गए थे। पंच लोग बैठ गये. उसे बदे। मुझे कोई उज नही। खाला ने िचलाकर कहा--अरे अलाह के बनदे ! पंचो का नाम कयो नही बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो। जुममन ने कोध से कहा--इस वक मेरा मुँह न खुलवाओ। तुमहारी बन पडी है. ने िकसी के दशु मन। कैसी बात कहते हो! और तुमहारा िकसी पर िवशवास न हो. तो मेरे मुँह पर थपपड मारी। जुममन मे बुराई देखो.

इसे समय के हेर-फेर के िसवा और कया कहे? िजस पर पूरा भरोसा था. जो फैसला चाहे. करे। अलगू चौधरी को हमेशा कचहरी से काम पडता था। अतएव वह पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुममन से िजरह शुर की। एक-एक पशन जुममन के हदय पर हथौडी की चोट की तरह पडता था। रामधन िमश इस पशनो पर मुगध हु ए जाते थे। जुममन चिकत थे िक अलगू को कया हो गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठी हु आ कैसी-कैसी बाते कर रहा था ! इतनी ही देर मे ऐसी कायापलट हो गयी िक मेरी जड खोदने पर तुला हु आ है। न मालूम कब की कसर यह िनकाल रहा है? कया इतने िदनो की दोसती कुछ भी काम न आवेगी? जुममन शेख तो इसी संकलप-िवकलप मे पडे हु ए थे िक इतने मे अलगू ने फैसला सुनाया-जुममन शेख तो इसी संकलप-िवकलप मे पडे हु ए थे िक इतने मे अलगू ने फैसला सुनाया-जुममन शेख ! पंचो ने इस मामले पर िवचार िकया। उनहे यह नीित संगत मालूम होता है िक खालाजान को माहवार खचर िदया जाय। हमारा िवचार है िक खाला की जायदाद से इतना मुनाफा अवशय होता है िक माहवार खचर िदया जा सके। बस. तो देश मे आपितयो का पकोप कयो होता? यह हैजा-पलेग आिद वयािधयॉँ दषु कमो ं के ही दंड है। मगर रामधन िमश और अनय पंच अलगू चौधरी की इस नीित-परायणता को पशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे कहते थे--इसका नाम पंचायत है ! दध ू का दध ू और पानी का पानी कर िदया। दोसती. वह शतु का वयवहार करे और गले पर छुरी फेरे. पर बुरे कामो की िसिद मे यह बात नही होती. आज तक मैने खालाजान को कोई तकलीफ नही दी। मै उनहे अपनी मॉँ के समान समझता हू ँ। उनकी िखदमत करना मेरा फजर है . मुझे यही कहना है। आइंदा पंचो का अिखतयार है. िकनतु धमर का पालन करना मुखय है। ऐसे ही सतयवािदयो के बल पर पृथवी ठहरी है. मगर उसी तरह जैसे तलवार से ढाल िमलती है। जुममन के िचत मे िमत की कुिटलता आठो पहर खटका करती थी। उसे हर घडी यही िचंता रहती थी िक िकसी तरह बदला लेने का अवसर िमले। ५ अचछे कामो की िसिद मे बडी दरे लगती है. तो िहबवानामा रद समझा जाय। यह फैसला सुनते ही जुममन सनाटे मे आ गये। जो अपना िमत हो. जुममन को भी बदला लेने का अवसर जलद ही िमल गया। िपछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलो की एक बहु त अचछी गोई मोल लाये थे। बैल पछाही जाित के 24 . दोसती की जगह है. मगर औरतो मे जरा अनबन रहती है. उसने समय पडने पर धोखा िदया। ऐसे ही अवसरो पर झूठे-सचचे िमतो की परीका की जाती है। यही किलयुग की दोसती है। अगर लोग ऐसे कपटीधोखेबाज न होते. नही तो वह कब की रसातल को चली जाती। इस फैसले ने अलगू और जुममन की दोसती की जड िहला दी। अब वे साथ-साथ बाते करते नही िदखायी देते। इतना पुराना िमतता-रपी वृक सतय का एक झोका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की ही जमीन पर खडा था। उनमे अब िशषाचार का अिधक वयवहार होने लगा। एक दस ू रे की आवभगत जयादा करने लगा। वे िमलते-जुलते थे.जायदाद मेरे नाम िहबबा कर दी थी। मैने उनहे ता-हयात खाना-कपडा देना कबूल िकया था। खुदा गवाह है. वह पंचो से िछपी नही। उससे इतना मुनाफा नही होता है िक माहवार खचर दे सकँू । इसके अलावा िहबबानामे मे माहवार खचर का कोई िजक नही। नही तो मै भूलकर भी इस झमेले मे न पडता। बस. उसमे मेरा कया बस है? खालाजान मुझसे माहवार खचर अलग मॉँगती है। जायदाद िजतनी है. यही हमारा फैसला है। अगर जुममन को खचर देना मंजरू न हो.

नथनो मे लकडी ठू ँ स दी. वह इकका-गाडी हॉँकते थे। गॉँव के गुड-घी लाद कर मंडी ले जाते. गाडी मे दोडाया. यह बैल हाथ लगे तो िदन-भर मे बेखटके तीन खेप हो। आज-कल तो एक ही खेप मे लाले पडे रहते है। बैल देखा. पोछता और सहलाता था। कहॉँ वह सुख-चैन. पर था वह पानीदार. पर खुदा नेक-बद सब देखता है। अलगू को संदेह हु आ िक जुममन ने बैल को िवष िदला िदया है। चौधराइन ने भी जुममन पर ही इस दघ ु र टना का दोषारोपण िकया उसने कहा--जुममन ने कुछ कर-करा िदया है। चौधराइन और करीमन मे इस िवषय पर एक िदन खुब ही वादिववाद हु आ दोनो देिवयो ने शबद-बाहु लय की नदी बहा दी। वयंगय. और गॉँव मे बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उनहोने सोचा. कभी-कभी घी का सवाद भी चखने को िमल जाता था। शाम-सबेरे एक आदमी खरहरे करता. वकोिक अनयोिक और उपमा आिद अलंकारो मे बाते हु ई।ं जुममन ने िकसी तरह शांित सथािपत की। उनहोने अपनी पतनी को डॉँट-डपट कर समझा िदया। वह उसे उस रणभूिम से हटा भी ले गये। उधर अलगू चौधरी ने समझाने-बुझाने का काम अपने तकर-पूणर सोटे से िलया। अब अकेला बैल िकस काम का? उसका जोड बहु त ढू ँढा गया. बाल-भौरी की पहचान करायी. िफर कया था. गाया। िफर हु कका िपया। इस तरह साह जी आधी रात तक नीद को बहलाते रहे। अपनी जान मे तो वह 25 . पर न िमला। िनदान यह सलाह ठहरी िक इसे बेच डालना चािहए। गॉँव मे एक समझू साहु थे . पर देहात का रासता बचचो की ऑंख की तरह सॉझ होते ही बंद हो जाता है। कोई नजर न आया। आस-पास कोई गॉँव भी न था। मारे कोध के उनहोने मरे हु ए बैल पर और दरु े लगाये और कोसने लगे--अभागे। तुझे मरना ही था. बडे-बडे सीगोवाले थे। महीनो तक आस-पास के गॉँव के लोग दशर न करते रहे। दैवयोग से जुममन की पंचायत के एक महीने के बाद इस जोडी का एक बैल मर गया। जुममन ने दोसतो से कहा--यह दगाबाजी की सजा है। इनसान सब भले ही कर जाय. मार की बरदाशत न थी। एक िदन चौथी खेप मे साहु जी ने दन ू ा बोझ लादा। िदन-भरका थका जानवर. पर साहु जी को जलद पहु ँचने की िफक थी. तो लगे उसे रगेदने। वह िदन मे तीन-तीन. वहॉँ कुछ सूखा भूसा सामने डाल िदया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाया था िक िफर जोत िदया। अलगू चौधरी के घर था तो चैन की बंशी बचती थी। बैलराम छठे -छमाहे कभी बहली मे जोते जाते थे। खूब उछलते-कूदते और कोसो तक दौडते चले जाते थे। वहॉँ बैलराम का राितब था. नमक भर लाते. न पानी की. अतएव उनहोने कई कोडे बडी िनदर यता से फटकारे। बैल ने एक बार िफर जोर लगाया. खोलकर अलग िकया. साफ पानी. मंडी से तेल. दली हु ई अरहर की दाल और भूसे के साथ खली. मोल-तोल िकया और उसे ला कर दार पर बॉँध ही िदया। एक महीने मे दाम चुकाने का वादा ठहरा। चौधरी को भी गरज थी ही. बस खेपो से काम था। मंडी ले गये. अतएव छोड कर जा भी न सकते थे। लाचार वेचारे गाडी पर ही लेटे गये। वही रतजगा करने की ठान ली। िचलम पी. कहॉँ यह आठो पहर कही खपत। महीने-भर ही मे वह िपस-सा गया। इकके का यह जुआ देखते ही उसका लहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दभ ू र था। हिडडयॉँ िनकल आयी थी. घाटे की परवाह न की। समझू साहु ने नया बैल पाया. तो घर पहु ँचकर मरता ! ससुरा बीच रासते ही मे मर रहा। अब गडी कौन खीचे ? इस तरह साहु जी खूब जले-भुने। कई बोरे गुड और कई पीपे घी उनहोने बेचे थे. टॉँग पकडकर खीचा. दो-ढाई सौ रपये कमर मे बंधे थे। इसके िसवा गाडी पर कई बोरे नमक थे. चार-चार खेपे करने लगे। न चारे की िफक थी. पर कही मृतक भी उठ सकता है? तब साहु जी को कुछ शक हु आ। उनहोने बैल को गौर से देखा. और यही नही.सुंदर. पैर न उठते थे। पर साहु जी कोडे फटकारने लगे। बस. बैल कलेजा तोड का चला। कुछ दरू दौडा और चाहा िक जरा दम ले लूँ. और सोचने लगे िक गाडी कैसे घर पहु ँचे। बहु त चीखेिचलाये. और ऐसा िगरा िक िफर न उठा। साहु जी ने बहु त पीटा. पर अबकी बार शिक ने जवाब दे िदया। वह धरती पर िगर पडा.

सतयानाश हो गया. िफर अलगू चौधरी को गािलयॉँ देने लगी-िनगोडे ने ऐसा कुलचछनी बैल िदया िक जनम-भर की कमाई लुट गयी। इस घटना को हु ए कई महीने बीत गए। अलगू जब अपने बैल के दाम मॉँगते तब साहु और सहु आइन. तो रामधन िमश ने कहा-अब देरी कया है ? पंचो का चुनाव हो जाना चािहए। बोलो चौधरी . सतयानाशी बैल गले बॉँध िदया. उसे सवीकार कर लो। साहु जी राजी हो गए। अलगू ने भी हामी भर ली। ६ पंचायत की तैयािरयॉँ होने लगी। दोनो पको ने अपने-अपने दल बनाने शुर िकए। इसके बाद तीसरे िदन उसी वृक के नीचे पंचायत बैठी। वही संधया का समय था। खेतो मे कौए पंचायत कर रहे थे। िववादगसत िवषय था यह िक मटर की फिलयो पर उनका कोई सवतव है या नही. और जब तक यह पशन हल न हो जाय. िकस-िकस को पंच बदते हो। अलगू ने दीन भाव से कहा-समझू साहु ही चुन ले। समझू खडे हु ए और कडकर बोले-मेरी ओर से जुममन शेख। जुममन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा धक्-धक् करने लगा. तब दाम लेना। न जी मानता हो. तो थैली गायब ! घबरा कर इधर-उधर देखा तो कई कनसतर तेल भी नदारत ! अफसोस मे बेचारे ने िसर पीट िलया और पछाड खाने लगा। पात: काल रोते-िबलखते घर पहँचे। सहु आइन ने जब यह बूरी सुनावनी सुनी. उस पर दाम मॉँगने चले है ! ऑंखो मे धूल झोक दी. दोनो ही झलाये हु ए कुते की तरह चढ बैठते और अंड-बंड बकने लगते—वाह ! यहॉँ तो सारे जनम की कमाई लुट गई.जागते ही रहे. पर पौ फटते ही जो नीद टू टी और कमर पर हाथ रखा. जब वह सवयं मंितमंडल मे सिममिलत होता है। मंडल के भवन मे पग धरते ही उसकी लेखनी िकतनी ममर ज. जब उनहे सवयं अपने िमतो से दगां करने मे भी संकोच नही होता। पंचायत बैठ गई. िकतनी नयाय-परायण हो जाती है। इसका कारण उतर-दाियतव का जान है। नवयुवक युवावसथा मे िकतना उदंड रहता है। माता-िपता 26 . ऐसे बुद ू कही और होगे। पहले जाकर िकसी गडहे मे मुँह धो आओ. हमे िनरा पोगा ही समझ िलया है ! हम भी बिनये के बचचे है. िकतनी िवचारशील. तो हमारा बैल खोल ले जाओ। महीना भर के बदले दो महीना जोत लो। और कया लोगे? चौधरी के अशुभिचंतको की कमी न थी। ऐसे अवसरे पर वे भी एकत हो जाते और साहु जी के बराने की पुिष करते। परनतु डेढ सौ रपये से इस तरह हाथ धो लेना आसान न था। एक बार वह भी गरम पडे। साहु जी िबगड कर लाठी ढू ँढने घर चले गए। अब सहु आइन ने मैदान िलया। पशनोतर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहु ँची। सहु आइन ने घर मे घुस कर िकवाड बनद कर िलए। शोरगुल सुनकर गॉँव के भलेमानस घर से िनकाला। वह परामशर देने लगे िक इस तरह से काम न चलेगा। पंचायत कर लो। कुछ तय हो जाय. तब पहले तो रोयी. मुझे कया उज होगा? अपने उतरदाियतव का जान बहु धा हमारे संकुिचत वयवहारो का सुधारक होता है। जब हम राह भूल कर भटकने लगते है तब यही जान हमारा िवशवसनीय पथ-पदशर क बन जाता है। पत-संपादक अपनी शांित कुटी मे बैठा हु आ िकतनी धृषता और सवतंतता के साथ अपनी पबल लेखनी से मंितमंडल पर आकमण करता है: परंतु ऐसे अवसर आते है. इनहे दामो की पडी है। मुदार बैल िदया था. तब तक वे रखवाले की पुकार पर अपनी अपसनता पकट करना आवशयकत समझते थे। पेड की डािलयो पर बैठी शुकमंडली मे वह पशन िछडा हु आ था िक मनुषयो को उनहे वेसुरौवत कहने का कया अिधकार है. मानो िकसी ने अचानक थपपड मारा िदया हो। रामधन अलगू के िमत थे। वह बात को ताड गए। पूछा-कयो चौधरी तुमहे कोई उज तो नही। चौधरी ने िनराश हो कर कहा-नही.

उसकी ओर से िकतने िचितित रहते है! वे उसे कुल-कलंक समझते हैपरनतु थौडी हीीी समय मे पिरवार का बौझ िसर पर पडते ही वह अवयविसथत-िचत उनमत युवक िकतना धैयरशील. तो आज समझू उसे फेर लेने का आगह न करते। बैल की मृतयु केवल इस कारण हु ई िक उससे बडा किठन पिरशम िलया गया और उसके दाने-चारे का कोई पबंध न िकया गया। रामधन िमश बोले-समझू ने बैल को जान-बूझ कर मारा है. उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे िदए जाते. वह देववाणी के सदश है-और देववाणी मे मेरे मनोिवकारो का कदािप समावेश न होना चािहए। मुझे सतय से जौ भर भी टलना उिचत नही! पंचो ने दोनो पको से सवाल-जवाब करने शुर िकए। बहु त देर तक दोनो दल अपनेअपने पक का समथर न करते रहे। इस िवषय मे तो सब सहमत थे िक समझू को बैल का मूलय देना चािहए। परनतु वो महाशय इस कारण िरयायत करना चाहते थे िक बैल के मर जाने से समझू को हािन हु ई। उसके पितकूल दो सभय मूल के अितिरक समझू को दंड भी देना चाहते थे. यह भी उतरदाियतव के जान का फल है। जुममन शेख के मन मे भी सरपंच का उचच सथान गहण करते ही अपनी िजममेदारी का भाव पेदा हु आ। उसने सोचा. पर आज मुझे जात हु आ िक पंच के पद पर बैठ कर न कोई िकसी का दोसत है . अतएव उससे दंड लेना चािहए। जुममन बोले-यह दस ू रा सवाल है। हमको इससे कोई मतलब नही ! झगडू साहु ने कहा-समझू के साथं कुछ िरयायत होनी चािहए। जुममन बोले-यह अलगू चौधरी की इचछा पर िनभर र है। यह िरयायत करे. िजससे िफर िकसी को पशुओं के साथ ऐसी िनदर यता करने का साहस न हो। अनत मे जुममन ने फैसला सुनायाअलगू चौधरी और समझू साहु । पंचो ने तुमहारे मामले पर अचछी तरह िवचार िकया। समझू को उिचत है िक बैल का पूरा दाम दे। िजस वक उनहोने बैल िलया. न दशु मन। नयाय के िसवा उसे और कुछ नही सूझता। आज मुझे िवशवास हो गया िक पंच की जबान से खुदा बोलता है। अलगू रोने लगे। इस पानी से दोनो के िदलो का मैल धुल गया। िमतता की मुरझाई हु ई लता िफर हरी हो गई। 27 . मै इस वक नयाय और धमर के सवोचच आसन पर बैठा हू ँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ िनकलेगा. यह उनही की मिहमा है। पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है? थोडी देर बाद जुममन अलगू के पास आए और उनके गले िलपट कर बोले-भैया. पंच मे परमेशवर वास करते है. कैसा शांतिचत हो जाता है. जब से तुमने मेरी पंचायत की तब से मै तुमहारा पाण-घातक शतु बन गया था. तो उनकी भलमनसी। अलगू चौधरी फूले न समाए। उठ खडे हु ए और जोर से बोल-पंच-परमेशवर की जय! इसके साथ ही चारो ओर से पितधविन हु ई-पंच परमेशवर की जय! यह मनुषय का काम नही.

इस कष के िलए चौधरीसाहब कुछ फीस जरर लेते थे। यिद िकसी अवसर पर फीस िमलने मे असुिवधा के कारण उनहे धीरज से काम लेना पडता तो गॉँव मे आफत मच जाती थी. वहॉँ केसर जमा दे। तीसरे लडके का नाम गुमान था। वह बडा रिसक. कयोिक अदालत और कानून के मामले िबतान के हाथो मे थे। वह कानून का पुतला था। कानून की दफाएँ उसकी जबान पर रखी रहती थी। गवाह गढने मे वह पूरा उसताद था। मँझले लडके शान चौधरी कृिष-िवभाग के अिधकारी थे। बुिद के मंद. कभी न पसीजता ! इन माहशय के अतयाचार का दंड उसकी 28 . कयोिक उनके धीरज और दरोगा जी के कोध मे कोई घिनष समबनध था। सारांश यह है िक चौधरी से उनके दोसत-दशु मन सभी चौकने रहते थे। २ चौधरी माहशय के तीन सुयोगय पुत थे। बडे लडके िबतान एक सुिशिकत मनुषय थे। डािकये के रिजसटर पर दसतखत कर लेते थे। बडे अनुभवी. उन सब पर िवचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता। िकसी को अदालत जाने की जररत न पडी। हॉँ. िकनतु यह घाव रात भर से अिधक न रहता। भोर होते ही थकना के साथ ही यह पीडा भी शांत हा जाती। तडका हु आ. तहकीकात होने लगती गवाह और सबूत के िसवा िकसी अिभयोग को सफलता सिहत चलाने मे िजन बातो की जररत होती है. बडे नीित कुशल। िमजर ई की जगह कमीज पहनते. लेिकन शरीर से बडे पिरशमी। जहॉँ घास न जमती हो. कभी-कभी िसगरेट भी पीते. चाहे. भावजो का रंग देख रहे हो। तुमहारे भी लडके बाले है. पर अपनी धुन का पूरा बॉँका गुमान उन लोगो के बीच से इस तरह अकडता चला जाता. उसने हाथ-मुँह धोया. उनका भार कैसे सँभालोगे ? खेती मे जी न लगे. तो रंग जम जाता। उसे दंगल का ऐसा शौक था िक कोसो तक धावा मारता. िशका और उपदेश. पर आलसय वह राज रोग है िजसका रोग कभी नही सँभलता। ऐसा कोई िबराल ही िदन जाता होगा िक बॉँक गुमान को भावजो के कटु वाकय न सुनने पडते हो। ये िबषैले शर कभी-कभी उसे कठोर हदय मे चुभ जाते. कािसट-िबली मे भरती करा दँ ू ? बाँका गुमनान खडा-खडा यह सब सुनता. िजससे उनका गौरव बढता था। यदिप उनके ये दवु यर सन बूढे चौधरी को नापसंद थे. सनेह और िवनय. लेिकन पतथर का देवता था.शं ख नाद भानु चौधरी अपने गॉँव के मुिखया थे। गॉँव मे उनका बडा मान था। दारोगा जी उनहे टाटा िबना जमीन पर न बैठने देते। मुिखया साहब को ऐसी धाक बँधी हु ई थी िक उनकी मजी िबना गॉँव मे एक पता भी नही िहल सकता था। कोई घटना. चाहे मेड या खेत का झगडा. वह सास-बहु का िववाद हो. साथ ही उदंड भी था। मुहरर म मे ढोल इतने जोरो से बजाता िक कान के पदे फट जाते। मछली फँसाने का बडा शौकीन था बडा रँगील जवान था। खँजडी बजा-बजाकर जब वह मीठे सवर से खयाल गाता. वह तुरनत घटना सथल पर पहु ँचते. पर घरवाले कुछ ऐसे शुषक थे िक उसके इन वयसनो से तिलक भी सहानुभूित न रखते थे। िपता और भाइयो ने तो उसे ऊसर खेत समझ रखा था। घुडकीधमकी. चौधरी साहब के शासनािधकारी को पूणररप से सचते करने के िलए काफी थी. पर बेचारे िववश थे. बूढे चौधरी पैतरे बदलते रहते और भाई लोग तीखी िनगाह से देखा करते. भावजे अभी तक उसकी ओर से िनराश न हु ई थी। वे अभी तक उसे कडवी दवाइयॉँ िपलाये जाती थी. िकसी का उस पर कुछ भी असर नही हु आ। हॉँ. बंशी उठायी और तालाब की ओर चल खडा हु आ। भावजे फूलो की वषार िकया करती. जैसे कोई मसत हाथी कुतो के बीच से िनकल जाता है। उसे सुमागर पर लाने के िलए कया-कया उपाय नही िकये गये। बाप समझाता-बेटा ऐसी राह चलो िजसमे तुमहे भी पैसे िमले और गृहसथी का भी िनवारह हो। भाइयो के भरोसे कब तक रहोगे ? मै पका आम हू ँ-आज टपक पडा या कल। िफर तुमहारा िनबाह कैसे होगा ? भाई बात भी न पूछेगे.

कोई ऐसी राह िनकालो िक घर डू बने से बचे। मै तो चाहता था िक जब तक चोला रहे. वाकय बाणो से छे दा करती। एक बार जब वह पित से कई िदन रठी रही. न इतना कलेजा। हम अपनी झोपडी अलग बना लेगे। हॉँ. तुमने आज देखा िक बात की बात मे सैकडो रपयो पर पानी िफर गया। अब इस तरह िनवारह होना असमभव है। तुम समझदार हो. सबको समेटे रहू ँ. परनतु हदय की आग जयो की तयो दहकती रही। अंत मे एक िदन बूढे चौधरी ने घर के सब मेमबरो को एकत िकया और गूढ िवषय पर िवचार करने लगे िक बेडा कैसे पार हो। िबतान से बोले. वे उसी के िसर थोपे जाते। उपले पाथती. वह हमको िमलना चािहए। बॉँट-बखरा कर दीिजए। बला से चार आदमी हँसेगे. उनहे कंचन के कौर िखलाओ और चॉँदी के िहंडाले मे झुलाओ। हममे न इतना बूता है. तो एक िदन कानूनदाँ िबतान की पतनी गुमनाम के सारे कपडे उठा लायी और उन पर िमटी का तेल उँ डेल कर आग लगा दी। जवाला उठी. 29 . उसकी आधी भी नही हो सकती। मै तो साफ कहती हू ँ —गुमान को तुमहारी कमाई मे हक है.बेटा. जमुना-तट री. दस-पाँच गाढे िमत जमे हु ए है. मुझे नैनसुख का कुरता भी न िमले. तो बॉँके गुमान कुछ नमर हु ए। बाप से जाकर बोले-मुझे कोई दक ू ान खोलवा दीिजए। चौधरी ने परमातमा को धनयवाद िदया। फूले न समाये। कई सौ रपये लगाकर कपडे की दक ू ान खुलवा दी। गुमान के भाग जगे। तनजेब के चुनटदार कुरते बनवाये . और िसर पीट िलया। यह देषािग है। घर को जलाकर तक बुझेगी। ३ यह जवाला तो थोडी देर मे शांत हो गयी. कंु ए से पानी लाती. गाढे का एक कुरता भी नसीब न हो. भावजो ने घोर आनदोलन मचाया—अरे राम ! हमारे बचचे और हम चीथडो को तरसे. आटा पीसती और ितस पर भी जेठानािनयॉँ सीधे मुँह बात न करती. मुकदमे-मामले करते हो. जो कुछ हमारा हो. और इतनी बडी दक ू ान इस िनखटू का कफन बन गई। अब कौन मुँह िदखायेगा? कौन मुँह लेकर घर मे पैर रखेगा? िकंतु बॉँके गुमान के तेवर जरा भी मैले न हु ए। वही मुँह िलए वह िफर घर आया और िफर वही पुरानी चाल चलने लगा। कानूनदां िबताने उनके ये ठाट-बाट देकर जल जाता। मै सारे िदन पसीना बहाऊँ. अब कहॉँ तक दिु नया की लाज ढोवे? नीितज िबतान पर इस पबल वकृता का जो असर हु आ. भाइयो को उतनी कया.सी बेचारी को भोगना पडता था। मेहनत के घर के िजतने काम होते . यह अपािहज सारे िदन चारपाई तोडे और यो बन-ठन कर िनकाले? एसे वस तो शायद मुझे अपने बयाह मे भी न िमले होगे। मीठे शान के हदय मे भी कुछ ऐसे ही िवचार उठते थे। अंत मे यह जलन सही न गयी. मगर भगवान् के मन मे कुछ और ही है। िबतान की नीितकुशलता अपनी चतुर सहागािमनी के सामने लुप हो जाती थी। वह अभी उसका उतर सोच ही रहे थे िक शीमती जी बोल उठी—दादा जी! अब समुझानेबुझाने से काम नही चलेगा. मलमल का साफा धानी रंग मे रँगवाया। सौदा िबके या न िबके. वह उनके िवकािसत और पुमुिदत चेहरे से झलक रहा था। उनमे सवयं इतना साहस न था िक इस पसताव का इतनी सपषता से वयक कर सकते। नीितज महाशय गंभीरता से बोले—जायदाद मुशतरका. सारे कपडे देखत-देखते जल कर राख हो गए। गुमान रोते थे। दोनो भाई खडे तमाशा देखते थे। बूढे चौधरी ने यह दशय देखा. उसे लाभ ही होना था! दक ू ान खुली हु ई है. चरस की दम और खयाल की ताने उड रही है— चल झपट री. यहॉँ तक िक सारी लागत लाभ हो गयी। टाट के टु कडे के िसवा और कुछ न बचा। बूढे चौधरी कुऍं मे िगरने चले. खडो. नटखट री। इस तरह तीन महीने चैन से कटे। बॉँके गुमान ने खूब िदल खोल कर अरमान िनकाले. सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया। बेटे की िजतनी पीर बाप को होगी. और अिग भडकी.

तुमहे भी यह मंजूर है ? अभी कुछ नही िबगडा। यह आग अब भी बुझ सकती है। काम सबको पयारा है. बैलो के पीछे ऑंखे बंद करके चलने वाला. िकनतु िमषाभाषी 30 . परनतु इस देश की सामािजक और राजनीितक सभाओं की तरह इसमे भी कोई पयोजन िसद नही होता था। दो-तीन िदन गुमान ने घर पर खाना नही खाया। जतन िसंह ठाकुर शौकीन आदमी थे . लेिकन गुरदीन के खोचे मे ऐसा पबल आकषर ण था िक उसकी ललकार सुनते ही उनका सारा जान वयथर हो जाता साधारण बचचो की तरह यिद सोते भी हो. तेरह उधार नही’ वाली कहावत अनुभव-िसद ही कयो न हो. आप के हीन-हायात तकसीम की जा सकती है. मचलती. इसकी नजीरे मौजूद है। जमीदार को सािकतुलिमिलकयत करने का कोई इसतहकाक नही है। अब मंदबुिद शान की बारी आयी. चाम िकसी को नही। बोलो. वहॉँ गुरदीन के पास माताओं के िलए इससे भी जयादा मीठी बाते थी। मॉँ िकतना ही मना करती रहे.मनकूला या गैरमनकूला. िकनतु आस-पास मे उसका नाम उपदवी लडको के िलए हनुमान-मंत से कम न था। उसकी आवाज सुनते ही उसके खोचे पर लडको का ऐसा धावा होता िक मिकखयो की असंखय सेना को भी रण-सथल से भागना पडता था। और जहॉँ बचचो के िलए िमठाइयॉँ थी. बार-बार पैसा न रहने का बहाना करे पर गुरदीन चटपट िमठाईयो का दोनो बचचो के हाथ मे रख ही देता और सनहे-पूणर भाव से कहता---बहू जी. उनही की चौपाल मे पडा रहता। अंत मे बूढे चौधरी गये और मना के लाये। अब िफर वह पुरानी गाडी अडती. कया कहते हो ? कुछ काम-धंधा करोगे या अभी ऑंखे नही खुली ? गुमान मे धैयर की कमी न थी। बातो को इस कान से सुन कर उस कान से उडा देना उसका िनतय-कमर था। िकंतु भाइयो की इस जन-मुरीदी पर उसे कोध आ गया। बोला— भाइयो की जो इचछा है. संखयाऍं और िदनो के नाम याद हो गए थे। गुरदीन बूढा-सा. िफर िमलते रहेगे. वही मेरे मन मे भी लगी हु ई है। मै भी इस जंजाल से भागना चाहता हू ँ। मुझसे न मंजूरी हु ई. कही भागे थोडे ही जाते है। नारायण ने तुमको बचचे िदए है. उसके िसवा और दस ू रा उपाय नही। कोई तो कलेजा तोड-तोड कर कमाये मगर पैसे-पैसे को तरसे. तन ढॉँकने को वस तक न िमले. चाहे. पैसो की कोई िचनता न करो. चौधरी के धर मे बचचे भी सयाने थे। उनके िलए घोडे िमटी के घोडे और नावे कागज की नावे थी। फलो के िवषय मे उनका जान असीम था. हाथ बढा-बढा के खाय! ऐसी अंधेरे नगरी मे अब हमारा िनबाह न होगा। शान चौधरी ने भी इस पसताव का मुककंठ से अनुमोदन िकया। अब बूढे चौधरी गुमान से बोले—कयो बेटा. उनही की बदौलत मेरे बाल-बचचे भी जीते है। अभी कया. तो मुझे भी उनकी नयोछावर िमल जाती है. िफर देखना कैसा ठनगन करता हू ँ। गुरदीन का यह वयवहारा चाहे वािणजय-िनयमो के पितकूल ही कयो न हो. िहलती चलने लगी। ४ पांडे घर के चूहो की तरह. मै कयो अपना िसर ओखली मे दँ ू ? मै तो िकसी से काम करने को नही कहता। आप लोग कयो मेरे पीछे पडे हु ए है। अपनी-अपनी िफक कीिजए। मुझे आध सेर आटे की कमी नही है। इस तरह की सभाऍं िकतनी ही बार हो चुकी थी. ऐसे गूढ िवषय पर कैसे मुँह खोलता। दिु वधा मे पडा हु आ था। तब उसकी सतयवका धमर पतनी ने अपनी जेठानी का अनुसरण कर यह किठन कायर समपन िकया। बोली—बडी बहन ने जो कुछ कहा. मैला-कुचैला आदमी था. पर बेचारा िकसान. ईशवर इनका मौर तो िदखावे. न होगी। िजसके भागय मे चककी पीसना बदा हो. वह पीसे! मेरे भागय मे चैन करना िलखा है. तो चौक पडते थे। गुरदीन उस था। गॉँव मे सापािहक फेरे लगाता था। उसके शुभागमन की पतीका और आकांका मे िकतने ही बालको को िबना िकंडरागाटर न की रंगीन गोिलयो के ही. गूलर और जंगली बेर के िसवा कोई ऐसा फल न था िजसे बीमािरयो का घर न समझते हो. ‘नौ नगद सही. और कोई सुख की नीद सोये.

चाहे वह कैसा ही कूर और कठोर कयो न हो. तो वह बॉँके गुमान का लडका धान था। यह किठन था िक बालक धान अपने भाइयो-बहनो को हँस-हँस और उलल-उछल कर िमठाइयॉँ खाते देख कर सब कर जाय! उस पर तुरार यह िक वे उसे िमठाइयॉँ िदखिदख कर ललचाते और िचढाते थे। बेचारा धान चीखता और अपनी मात का ऑंचल पकड-पकड कर दरवाजे की तरफ खीचता था. तो कयो दस ू रो का मुँह देखना पडता. धेले की िमठाई दी और धेले का आशीवारद। लडके दोनो िलए उछलतेकूदते घर मे दािखल हु ए। अगर सारे गॉँव मे कोई ऐसा बालक था िजसने गुरदीन की उदारता से लाभ उठाया हो.गुरदीन को कभी अपने इस वयवहार पर पछताने या उसमे संशोन करने की जररत नही हु ई। मंगल का शुभ िदन था। बचचे बडे बेचैनी से अपने दरवाजे पर खडे गुरदीन की राह देख रहे थे। कई उतसाही लडके पेड पर चढ गए और कोई-कोई अनुराग से िववश होकर गॉँव के बाहर िनकल गए थे। सूयर भगवान् अपना सुनहला गाल िलए पूरब से पिशचम जा पहु ँचे थे. ईषयार ओर कोभ. मै इससे अचछी िमठाई बाजार से मँगवा दँगू ी. रोओ मत. अबकी गुरदीन आवेगा तो तुमहे बहु त-सी िमठाई ले दँगू ी. कयो दस ू रो के धकके खाने पडते ? उठा िलया और पयार से िदलासा देने लगी— बेटा. संतोष और लोभ. उतकृष और कोमल भाव िछपे रहते है। गुमान की ऑंखे भर आयी। ऑंसू की बूँदे बहु धा हमारे हदय की मुिलनता को उजजवल कर देती है। गुमान सचेत हो गया। उसने जा कर बचचे का गोद मे उठा िलया और अपनी पतनी से करणोतपादक सवर मे बोला—बचचे पर इतना कोध कयो करती हो ? तुमहारा दोषी मै हू ँ. इतने मे ही गुरदीन आता हु आ िदखाई िदया। लडको ने दौडकर उसका दामन पकडा और आपस मे खीचातानी होने लगी। कोई कहता था मेरे घर चलो. तुम िकतनी िमठाई खाओग! यह कहते कहते उसकी ऑंखे भर अयी। आह! यह मनहू स मंगल आज ही िफर आवेगा. फुसलाया. जेठािनयो की िनषुरता पर और सबसे जयादा अपने पित के िनखटूपन पर कुढ-कुढ कर रह जाती थी। अपना आदमी ऐसा िनकममा न होता. पर वह अबला कया करे। उसका हदय बचचे के िलए ऐंठ-ऐंठ कर रह जाता था। उसके पास एक पैसा भी नही था। अपने दभ ु ारगय पर. कोई अपने घर का नयोता देता था। सबसे पहले भानु चौधरी का मकान पडा। गुरदीन अपना खोचा उतार िदया। िमठाइयो की लूट शुर हो गयी। बालको और िसयो का ठट लग गया। हषर और िवषाद. तो मॉँ की गोद से जमीन पर उतर कर लोठने लगा और रो-रो कर दिु नया िसर पर उठा ली। मॉँ ने बहु त बहलाया. उसी तरह मनुषय के हदय मे भी. दो। परमातमा ने चाहा तो कल से लोग इस घर मे मेरा 31 . और िफर ये ही बहाने करने पडेगे! हाय. यहॉँ तक िक उसे बचचे के इस हठ पर कोध भी आ गया। मानव हदय के रहसय कभी समझ मे नही आते। कहॉँ तो बचचे को पयार से िचपटाती थी. देष और जलन की नाटशाला सज गयी। कनूनदॉँ िबतान की पतनी अपने तीनो लडको को िलए हु ए िनकली। शान की पतनी भी अपने दोनो लडको के साथ उपिसथत हु ई। गुरदीन ने मीठी बाते करनी शुर की। पैसे झोली मे रखे. मुझको जो दंड चाहो. ऐसी झलायी की उसे दो-तीन थपपड जोर से लगाये और घुडकर कर बोली—चुप रह आभगे! तेरा ही मुँह िमठाई खाने का है ? अपने िदन को नही रोता. िमठाई खाने चला है। बाँका गुमान अपनी कोठरी के दार पर बैठा हु आ यह कौतुक बडे धयान से देख रहा था। वह इस बचचे को बहु त चाहता था। इस वक के थपपड उसके हदय मे तेज भाले के समान लगे और चुभ गया। शायद उसका अिभपाय भी यही था। धुिनया रई को धुनने के िलए तॉँत पर चोट लगाता है। िजस तरह पतथर और पानी मे आग िछपी रहती है. अपना पयारा बचचा धेले की िमठाई को तरसे और घर मे िकसी का पतथर-सा कलेजा न पसीजे! वह बेचारी तो इन िचंताओं मे डू बी हु ई थी ओर धान िकसी तरह चुप ही न होता था। जब कुछ वश न चला.

और मेरे बाल-बचचो का भी आदर करेगे। तुमने आज मुझे सदा के िलए इस तरह जगा िदया. मानो मेरे कानो मे शंखनाद कर मुझे कमर -पथ मे पवेश का उपदेश िदया हो। 32 .

उनहे कोई चीज रचती ही न थी? अब उनका भोजन कौन बानयेगा ? मुझसे इनको देखे िबना कैसे रहा जायगा? यहॉँ 33 . िववाह हु आ. भाईबंद. कभी िकसी फूल पर पडी हु ई जल की बूँदो को िहलाकर अपने मुँह पर उनके शीतल छीटे डालती। लाज बीरबहू िटयॉँ रेग रही थी। वह उनहे चुनकर हथेली पर रखने लगी। सहसा उसे एक काला वृहतकाय सॉँप रेगता िदखायी-िदया। उसने िपलाकर कहा—अममॉँ. पर जरा भी नही ताकते। आज तक कोई चुिहया भी नही पकडी। ितलोतमा—तो खाते कया होगे ? मॉँ—बेटी. यह लोग हवा पर रहते है। इसी से इनकी आतमा िदवय हो जाती है। अपने पूवरजनम की बाते इनहे याद रहती है। आनेवाली बातो को भी जानते है। कोई बडा योगी जब अहंकार करने लगता है तो उसे दंडसवरप इस योिन मे जनम लेना पडता है। जब तक पायिशचत पूरा नही होता तब तक वह इस योिन मे रहता है। कोई-कोई तो सौ-सौ. कैसी बचचो की-सी बाते करती हो। नाराज हो जायँ तो िसर पर न जाने कया िवपित आ पडे। तेरे जनम के साल पहले-पहल िदखायी िदये थे। तब से साल मे दस-पॉँच बार अवशय दशर न दे जाते है। इनका ऐसा पभाव है िक आज तक िकसी के िसर मे ददर तक नही हु आ। २ कई वषर हो गये। ितलोतमा बािलका से युवती हु ई। िववाह का शुभ अवसर आ पहु ँचा। बारात आयी. चली जाती थी तो वे रो-रोकर वयिथत हो जाती थी। अब यह जीवनपयर नत का िवयोग कैसे सहेगी ? उनके िसर मे ददर होता था जब तक मै धीरे-धीरे न मलूँ. ितलोतमा के पित-गृह जाने का मुहूतर आ पहु ँचा। नयी वधू का शृगं ार हो रहा था। भीतर-बाहर हलचल मची हु ई थी. हवा खाने िनकले होगे। ितलोतमा—गिमर यो मे कहॉँ चले जाते है ? िदखायी नही देते। मॉँ—कही जाते नही बेटी. हमारे देवता है और कही कयो जायेगे ? तुमहारे जनम के साल से ये बराबर यही िदखायी देते है। िकसी से नही बोलते। बचचा पास से िनकल जाय. नागजी जा रहे है। लाओ थोडा-सा दध ू उनके िलए कटोरे मे रख द।ं ू अममॉँ ने कहा—जाने दो बेटी. ऐसा जान पडता था भगदड पडी हु ई है। ितलोतमा के हदय मे िवयोग द ु:ख की तरंगे उठ रही है। वह एकांत मे बैठकर रोना चाहती है। आज माता-िपता. दो-दो सौ वषर तक जीते रहते है। ितलोतमा—इसकी पूजा न करो तो कया करे। मॉँ—बेटी.नाग-पूज ा पात:काल था। आषढ का पहला दौगडा िनकल गया था। कीट-पतंग चारो तरफ रेगते िदखायी देते थे। ितलोतमा ने वािटका की ओर देखा तो वृक और पौधे ऐसे िनखर गये थे जैसे साबुन से मैने कपडे िनखर जाते है। उन पर एक िविचत आधयाितमक शोभा छायी हु ई थी मानो योगीवर आनंद मे मग पडे हो। िचिडयो मे असाधारण चंचलता थी। डाल-डाल. पात-पात चहकती िफरती थी। ितलोतमा बाग मे िनकल आयी। वह भी इनही पिकयो की भॉँित चंचल हो गयी थी। कभी िकसी पौधे की देखती. सिखयॉँ-सहेिलयॉँ सब छूट जायेगी। िफर मालूम नही कब िमलने का संयोग हो। न जाने अब कैसे आदिमयो से पाला पडेगा। न जाने उनका सवभाव कैसा होगा। न जाने कैसा बतारव करेगे। अममाँ की ऑंखे एक कण भी न थमेगी। मै एक िदन के िलए कही. उनहे िकसी तरह कल-चैन ही न पडती थी। बाबूजी को पान बनाकर कौन देगा ? मै जब तक उनका भोजन न बनाऊँ. अपनी बॉँबी मे पडे रहते है। ितलोतमा—और कही नही जाते ? मॉँ—बेटी.

अब दया और करणा की। थोडे ही िदनो मे उसे जात हो गया िक मै पित-िवहीन होकर संसार के सब सुखो से वंिचत हो गयी। ३ एक वषर बीत गया। जगदीशचंद पकके धमारवलमबी आदमी थे. मै वयथर ही इसमे बैठा. राह इतनी िहल कयो रही है.. नख काले हो गये. िजसे लुटेरा और डाकू समझ रही थी.. बुझा हु आ। एक वृक था... पर अकसमात् नाव को भँवर मे पडते देख कर उसके मसतूल से िचपट जाता है.. वही दशा ितलोतमा की हु ई। अभी तक वह िवयोगी द ु:ख मे ही मग थी. तुमसे एक बात कहने की याद न रही। वहॉं नाग-पूजा अवशय करती रहना। घर के और लोग चाहे मना करे .. ससुराल के कषो और दवु यर वसथाओं की िचंताओं मे पडी हु ई थी। पर. एक कण मे हाहाकर मच गया। भंयकर शोक-घटना हो गयी। वर को सौप ने काट िलया। वह बहू को िबदा कराने आ रहा था। पालकी मे मसनद के नीचे एक काला साँप िछपा हु आ था। वर जयो ही पालकी मे बैठा. फल-फूल िवहीन। अभी एक कण पहले वह दस ू रो की इषयार का कारण थी. तो अममॉँ कहती थी. पर मुझे तो उनहोले बडा िवकाल रप िदखाया। बडा भंयक ं र सवपन था। मॉँ—देखना.? सहसा उनकी माता ने आकर कहा-बेटी. िजसे देख कर लोगो को द ु:ख होता था। पहले तो मॉँ भी इस सामािजक अतयाचार पर सहमत न हु ई. कही आराम से बैठने की जगह नही. उधर िटमिटमाता हु आ दीपक बुझ गया। जैसे कोई मनुषय बोरो से लदी हु ई नाव पर बैठा हु आ मन मे झुँझलाता है िक यह और तेज कयो नही चलती .. डाकटर बुलाये गये.. पर तुम इसे अपना कतर वय समझना। अभी मेरी ऑंखे जरा-जरा झपक गयी थी। नाग बाबा ने सवपन मे दशर न िदये। ितलोतमा—अममॉँ. कुछ अिभमान अवशय है। कहो उनका सवाभाव िनठु र हु आ तो. िदन भर खाट पर पडी रहती है। वे (पित) तो बहु त सुशील मालूम होते है। हॉँ. मुझे भी उनके दशर न हु ए है.. पर िवष घातक था। जरा देर मे वर के होठ नीले पड गये. पर ितलोतमा का वैधवय उनसे न सहा गया। उनहोने ितलोतमा के पुनिवर वाह का िनशचय कर िलया। हँसनेवालो ने तािलयॉँ बाजायी पर जगदीश बाबू ने हदय से काम िलया। ितलातमा पर सारा घर जान देता था। उसकी इचछा के िवरद कोई बात न होने पाती यहॉँ तक िक वह घर की मालिकन बना दी गई थी। सभी धयान रखते िक उसकी रंज ताजा न होने पाये। लेिकन उसके चेहरे पर उदासी छायी रहती थी. वह अब िकतना पयारा था। उसके िबना अब जीवन एक दीपक था. सोने दो। कचची नीद जाग जायगी तो िसर मे पीडा होने लगेगी। वहॉँ वयंग सुनने पडेगे . मूछार आने लगी। देखते-देखते शरीर ठंडा पड गया। इधर उषा की लािलमा ने पकृित को अलोिकत िकया. लेिकन िबरादरीवालो का िवरोध जयो-जयो बढता गया उसका िवरोध ढीला पडता गया। िसदांत रप से तो पाय: 34 . बहू आलसी है.. साँप ने काट िलया। चारो ओर कुहराम मच गया। ितलातमा पर तो मनो वजपात हो गया। उसकी मॉँ िसर पीट-पीट रोने लगी। उसके िपता बाबू जगदीशचंद मूिचछर त होकर िगर पडे। हदयरोग से पहले ही से गसत थे। झाड-फँू क करने वाले आये. तुमहारे धर मे कोई सॉँप न मारने पाये। यह मंत िनतय पास रखना। ितलोतमा अभी कुछ जवाब न देने पायी थी िक अचानक बारात की ओर से रोने के शबद सुनायी िदये.जरा िसर मे ददर भी होता था तो अममॉं और बाबूजी घबरा जाते थे। तुरत ं बैद-हकीम आ जाते थे। वहॉँ न जाने कया हाल होगा। भगवान् बंद घर मे कैसे रहा जायगा ? न जाने वहॉँ खुली छत है या नही। होगी भी तो मुझे कौन सोने देगा ? भीतर घुट-घुट कर मरँगी। जगने मे जरा देर हो जायगी तो ताने िमलेगे। यहॉँ सुबह को कोई जगाता था. अब उसे होश आया की इस नाव के साथ मै भी डू ब रही हू ँ। एक कण पहले वह कदािचत् िजस पुरष पर झुँझला रही थी..

मॉँ ने सहमी हु ई ऑंखो से देख कर कहा—बेटी कैसी अशगुन की बात मुँह से िनकाल रही हो। तुमहारे मन मे भय समा गया है. पर अवसथा ऐसी आ पडी है िक िबना मुँह खोले रहा नही जाता। आप बाबूजी को मना कर दे। मै िजस दशा मे हू ँ संतुष हू ँ। मुझे ऐसा भय हो रहा है िक अबकी िफर वही शोक घटना. वह हो चुकी। अब कया ईशवर कया तुमहारे पीछे पडे ही रहेगे ? ितलोतमा—हॉँ. तुमहे ऐसी शंका कयो होती है ? ितलोतमा—न जाने कयो ? कोई मेरे मन मे बैठा हु आ कह रहा है िक िफर अिनष होगा। मै पया: िनतय डरावने सवपन देखा करती हू ँ। रात को मुझे ऐसा जान पडता है िक कोई पाणी िजसकी सूरत सॉँप से बहु त िमलती-जुलती है मेरी चारपाई के चारो ओर घूमता है। मै भय के मारे चुपपी साध लेती हू ँ। िकसी से कुछ कहती नही। मॉँ ने समझा यह सब भम है। िववाह की ितिथ िनयत हो गयी। यह केवल ितलोतमा का पुनसरसकार न था. समय नाजुक था। वह िकसी तरह घर से बाहर िनकल जाना चाहती थी। उसके िसर पर तलवार लटक रही थी। रोने और सहेिलयो से गले िमलने मे कोई आनंद न था। िजस पाणी का फोडा िचलक रहा हो उसे जरारह का घर बाग मे सैर करने से जयादा अचछा लगे.. पॉँव िचनगािरयो पर पड गया। देखा तो एक काला साँप जूते मे से िनकलकर रेगता चला जाता था। देखते-देखते गायब हो गया। वर ने एक सदर आह भरी और बैठ गया। ऑंखो मे अंधेरा छा गया। एक कण मे सारे जनवासे मे खबर फैली गयी.िकसी को आपित न थी िकनतु उसे वयवहार मे लाने का साहस िकसी मे न था। कई महीनो के लगातार पयास के बाद एक कुलीन िसदांतवादी. िववाह वैिदक रीित से हु आ। मेहमानो ने खूब वयाखयान िदये। पतो ने खूब आलोचनाऍं की। बाबू जगदीशचंद के नैितक साहस की सराहना होने लगी। तीसरे िदन बहू के िवदा होने का मुहूतर था। जनवासे मे यथासाधय रका के सभी साधनो से काम िलया गया था। िबजली की रोशनी से सारा जनवास िदन-सा हो गया था। भूिम पर रेगती हु ई चीटी भी िदखाई देती थी। केशो मे न कही िशकन थी.. िकतनी दढता. बिलक समाज-सुधार का एक िकयातमक उदाहरण था। समाजसुधारको के दल दरू से िववाह सिममिलत होने के िलए आने लगे. मुझे तो ऐसा मालूम होता है ? मॉँ—कयो.. लोग दौड पडे। औषिधयॉँ पहले ही रख ली गयी थी। सॉँप का मंत जाननेवाले कई आदमी बुला िलये गये थे। सभी ने दवाइयॉँ दी। झाड-फँू क शुर हु ई। औषिधयॉँ भी दी गयी. सुिशिकत वर िमला। उसके घरवाले भी राजी हो गये। ितलोतमा को समाज मे अपना नाम िबकते देख कर द ु :ख होता था। वह मन मे कुढती थी िक िपताजी नाहक मेरे िलए समाज मे नककू बन रहे है। अगर मेरे भागय मे सुहाग िलखा होता तो यह वज ही कयो िगरता। तो उसे कभी-कभी ऐसी शंका होती थी िक मै िफर िवधवा हो जाऊँगी। जब िववाह िनिशचत हो गया और वर की तसवीर उसके सामने आयी तो उसकी ऑंखो मे ऑंसू भर आये। चेहरे से िकतनी सजजनता.. पर भावी पबल होती है। पात:काल के चार बजे थे। तारागणो की बारात िवदा हो रही थी। बहू की िवदाई की तैयारी हो रही थी। एक तरफ शहनाइयॉँ बज रही थी। दस ू री तरफ िवलाप की आतरधविन उठ रही थी। पर ितलोतमा की ऑंखो मे ऑंसू न थे. पर काल के समान िकसी का वश न चला। शायद मौत सॉँप का वेश धर कर आयी थी। ितलोतमा ने सुना तो िसर पीट िलया। वह िवकल होकर जनवासे की तरफ दौडी। चादर ओढने की भी सुिध न रही। वह अपने 35 .. इसी से यह भम होता है। जो होनी थी.. िकतनी िवचारशीलता टपकती थी। वह िचत को िलए हु ए माता के पास गयी और शमर से िसर झुकाकर बोली-अममॉं..... न िसलवट और न झोल। शािमयाने के चारो तरफ कनाते खडी कर दी गयी थी। िकसी तरफ से कीडो-मकोडो के आने की संमभावना न थी... मुँह मुझे तो न खोलना चािहए. तो कया आशचयर है। वर को लोगो ने जगया। बाजा बजने लगा। वह पालकी मे बैठने को चला िक वधू को िवदा करा लाये। पर जूते मे पैर डाला ही था िक चीख मार कर पैर खीच िलया। मालूम हु आ.

पलके खुली रह जाती. माथे पर बल पड जाते. यह कया माजरा है। आतमवाद के भक जातभाव से िसर िहलाते थे मानो वे िचतकालदशी है। जगदीशचनद ने नसीब ठोक िलया। िनशचय हो गया िक कनया के भागय मे िवधवा रहना ही िलखा है। नाग की पूजा साल मे दो बार होने लगी। ितलोतमा के चिरत मे भी एक िवशेष अंतर दीखने लगा। भोग और िवहार के िदन भिक और देवाराधना मे कटने लगे। िनराश पािणयो का यही अवलमब है। तीन साल बीत थे िक ढाका िवशविवदालय के अधयापक ने इस िकससे को िफर ताजा िकया। वे पशु-शास के जाता थे। उनहोने साँपो के आचार-वयवहार का िवशेष रीित से अधययन िकया। वे इस रहसय को खोलना चाहते थे। जगदीशचंद को िववाह का संदेश भेजा। उनहोने टाल-मटोल िकया। दयाराम ने और भी आगह िकया। िलखा. गृिहणी हो तो ऐसी हो। दस ू रो की दिष मे इस दमपित का जीवन आदशर था. जाने दो। पित का दशर न तो कर ले। यह अिभलाषा कयो रह जाय। उसी शोकािनवत दशा मे ितलोतमा जनवासे मे पहु ँची. उनहोने एक िवशेष पयतन यह िकया िक ढाके मे ही िववाह हो। अतएब वे अपने कुटु िमबयो को साथ ले कर िववाह के एक सपाह पहले गये। चलते समय अपने संदक ू . िबसतर आिद खूब देखभाल कर रखे िक सॉँप कही उनमे उनमे िछप कर न बैठा जाय। शुभ लगन मे िववाह-संसकार हो गया। ितलोतमा िवकल हो रही थी। मुख पर एक रंग आता था. िकनतु आं तिरक दशा कुछ और ही थी। उनके साथ शयनागार मे जाते ही उसका मुख िवकृत हो जाता. वह मुझे काट कर आप ही मर जायेगा। अगर वह मुझे काट भी ले तो मेरे पास ऐसे मंत और औषिधयॉँ है िक मै एक कण मे उसके िवष को उतार सकता हू ँ। आप इस िवषय मे कुछ िचंता न िकिजए। मै िवष के िलए अजेय हू ँ। जगदशीचंद को अब कोई उज न सूझा। हॉँ. मुख पर कािलमा छा जाती और यदिप सवरप मे कोई िवशेष अनतर न िदखायी देखायी देता. भौहे तन जाती. पर ऐसे िचंितत थे जैसे कोई आदमी सराय मे खुला हु आ संदक ू छोड कर बाजार चला जाय। ितलोतमा के सवभाव मे अब एक िविचत रपांतर हु आ। वह औरो से हँसती-बोलती आराम से खाती-पीती सैर करने जाती.पित के चरणो को माथे से लगाकर अपना जनम सफल करना चाहती थी। घर की िसयो ने रोका। माता भी रो-रोकर समझाने लगी। लेिकन बाबू जगदीशचनद ने कहा-कोई हरज नही. िथयेटरो और अनय सामािजक सममेलनो मे शरीक होती। इन अवसरो पर पोफेसर दया राम से भी बडे पेम का वयवहार करती. मैने वैजािनक अनवेषण के िलए यह िनशचय िकया है। मै इस िवषधर नाग से लडना चाहता हू ँ। वह अगर सौ दॉँत ले कर आये तो भी मुझे कोई हािन नही पहु ँचा सकता. शरीर अिग की भॉँित जलने लगता. पर वहॉँ उसकी तसकीन के िलए मरनेवाले की उलटी सॉँसे थी। उन अधखुले नेतो मे असह आतमवेदना और दारण नैराशय। ४ इस अदत ु घटना का सामाचार दरू -दरू तक फैल गया। जडवादोगण चिकत थे. उनके आराम का बहु त धयान रखती। कोई काम उनकी इचछा के िवरद न करती। कोई अजनबी आदमी उसे देखकर कह सकता था. नेतो से जवाला-सी िनकलने लगती और उसमे से झुलसती हु ई लपटे िनकलती. यह कोई नािगन है। कभी –कभी वह फँु कारने भी लगती। इस िसथित मे दयाराम को उनके समीप जाने या उससे कुछ बोलने की िहममत न पडती। वे उसके रप-लावणय पर मुगध थे. पर रहसय कुछ समझ मे न आया. िकनतु इस अवसथा मे उनहे उससे घृणा होती। उसे इसी उनमाद के आवेग मे छोड कर बाहर िनकल आते। डाकटरो से सलाह ली. उनहे भौितक िवजान मे अपनी अलपजता सवीकार करनी पडी। 36 . एक रंग जाता था. पर संसकार मे कोई िवधन-बाधा न पडी। ितलोतमा रो धो-कर ससुराल गयी। जगदीशचंद घर लौट आये. पर न जाने कयो भम होने लगता. सवयं इस िवषय की िकतनी ही िकताबो का अधययन िकया.

िवकृत मुखाकृित उनके धयान से न उतरते। डर लगता िक कही यह मुझे मार न डाले। न जाने कब उनमाद का आवेग हो। यह िचनता हदय को वयिथत िकया करती। िहपनािटजम. उलटे रात-िदन जान का खटका। यह कया माया है। वह सॉँप कोई पेत तो नही है जो इसके िसर आकर यह दशा कर िदया करता है। कहते है िक ऐसी अवसथा मे रोगी पर चोट की जाती है. वह सपर िवष से अिधक घातक थी। इस दशा मे उनहे यह शोकमय िवचार उतपन हु आ। यह भी कोई जीवन है िक दमपित का उतरदाियतव तो सब िसर पर सवार. पर जहॉँ बुिद और तकर का कुछ वश नही चलता. वह जाता रहा। चूहा उनमत दशा मे काट लेता है तो जान के लाले पड जाते है। भगवान् ? िकतन िवकराल सवरप है ? पतयक नािगन मालूम हो रही है। अब उलटी पडे या सीधी इस दशा का अंत करना ही पडेगा। उनहे ऐसा जान पडा िक अब िगरा ही चाहता हू ँ। ितलोतमा बार-बार सॉँप की भॉँित फँु कार 37 . ितलोतमा के िसर पर भूत सवार हो गया था। वह बैठी हु ई आगये हु ई नेतो के दारा की ओर ताक रही थी। उसके नयनो से जवाला िनकल रही थी. वह पेत पर ही पडती है नीचे जाितयो मे इसके उदाहरण भी देखे है। वे इसी हैसंबस ै मे पडे हु ए थे िक उनका दम घुटने लगा। ितलातमा के हाथ रससी के फंदे की भॉँित उनकी गरदन को कस रहे थे वे दीन असहाय भाव से इधर-उधर ताकने लगे। कयोकर जान बचे. साहब चुपके से लौट आये। अपने कमरे मे जा कर िकसी औषिध की एक खुराक पी और िपसतौल तथा साँगा ले कर िफर ितलोतमा के कमरे मे पहु ँचे। िवशवास हो गया िक यह वही मेरा पुराना शतु है। इतने िदनो मे टोह लगाता हु आ यहॉँ आ पहु ँचा। पर इसे ितलोतामा से कयो इतना सनेह है। उसके िसरहने यो बैठा हु आ है मानो कोई रससी का टु कडा है। यह कया रहसय है ! उनहोने साँपो के िवषय मे बडी अदभूत कथाऍं पढी और सुनी थी.उनहे अब अपना जीवन असह जान पडता। अपने दसु साहस पर पछताते। नाहक इस िवपित मे अपनी जान फँसायी। उनहे शंका होने लगी िक अवशय कोई पेत-लीला है ! िमथयावादी न थे. पैर थरथराने लगे। सहसा ितलोतमा ने उनके बाँहो की ओर मुँह बढाया। दयाराम कॉँप उठे । मृतयु ऑंखे के सामने नाचने लगी। मन मे कहा—यह इस समय मेरी सी नही िवषैली भयंकर नािगन है: इसके िवष से जान बचानी मुिशकल है। अपनी औषिध पर जो भरोसा था. पर ऐसी कुतूहलजनक घटना का उलेख कही न देखा था। वे इस भॉँित सशसत हो कर िफर कमरे मे पहु ँचे तो साँप का पात न था। हॉँ. िजसकी ऑंच दो गज तक लगती। इस समय उनमाद अितशय पचंड था। दयाराम को देखते ही िबजली की तरह उन पर टू ट पडी और हाथो से आघात करने के बदले उनहे दॉँतो से काटने की चेषा करने लगी। इसके साथ ही अपने दोनो हाथ उनकी गरदन डाल िदये। दयाराम ने बहु तेरा चाहा. वहॉँ मनुषय िववश होकर िमथयावादी हो जाता है। शनै:-शनै: उनकी यह हालत हो गयी िक सदैव ितलोतमा से सशंक रहते। उसका उनमाद. देह िशिथल पड गयी. कोई उपाय न सूझ पडता था। साँस लेना। दसु तर हो गया. लेिकन जब यह योग भी िनषफल हो गया तो वे िनराश हो गये। ५ एक िदन पोफेसर दयाराम िकसी वैजिनक सममेलन मे गए हु ए थे। लौटे तो बारह बज गये थे। वषार के िदन थे। नौकर-चाकर सो रहे थे। वे ितलोतमा के शयनगृह मे यह पूछने गये िक मेरा भोजन कहॉँ रखा है। अनदर कदम रखा ही था िक ितलोतमा के िसरंहाने की ओर उनहे एक अितभीमकाय काला सॉँप बैठा हु आ िदखायी िदया। पो. उसका सुख नाम का नही. ऐडी-चोटी तक का जोर लगा िक अपना गला छुडा ले . िवदुतशिक और कई नये आरोगयिवधानो की परीका की गयी । उनहे िहपनािटजम पर बहु त भरोसा था. लेिकन ितलोतमा का बाहु पाश पितकण साँप की केडली की भॉँित कठोर एवं संकुिचत होता जाता था। उधर यह संदेह था िक इसने मुझे काटा तो कदािचत् इसे जान से हाथ धोना पडे। उनहोने अभी जो औषिध पी थी.

इस िवचार से कुछ तसकीन होती थी िक सपर पेत मर गया है तो उसकी जान बच गयी होगी। इस आशा और भय की दशा मे वे अनदर गये तो ितलोतमा आईने के सामने खडी केश सँवार रही थी। दयाराम को मानो चारो पदाथर िमल गये। ितलोतमा का मुख-कमल िखला हु आ था। उनहोने कभी उसे इतना पफुिलत न देखा था। उनहे देखते ही वह उनकी ओर पेम से चली और बोली—आज इतनी रात तक कहॉँ रहे ? दयाराम पेमोनत हो कर बोले—एक जलसे मे चला गया था। तुमहारी तबीयत कैसी हे ? कही ददर नही है ? ितलोतमा ने उनको आशचयर से देख कर पूछा—तुमहे कैसे मालूम हु आ ? मेरी छाती मे ऐसा ददर हो रहा है. ऑंखो से िचनगािरयॉँ िनकलने लगी। दयाराम ने दस ू री गोली दाग दी। यह चोट पूरी पडी। ितलोतमा का बाहु -बंधन ढीला पड गया। एक कण मे उसके हाथ नीचे को लटक गये. िसर झुक गया और वह भूिम पर िगर पडी। तब वह दशय देखने मे आया िजसका उदाहराण कदािचत् अिलफलैला चंदकांता मे भी न िमले। वही फलँग के पास.मार कर जीभ िनकालते हु ए उनकी ओर झपटती थी। एकाएक वह बडे ककरश सवर से बोली—‘मूखर ? तेरा इतना साहस िक तू इस सुदरं ी से पेमिलंगन करे।’ यह कहकर वह बडे वेग से काटने को दौडी। दयाराम का धैयर जाता रहा। उनहोने दिहना हाथ सीधा िकया और ितलोतमा की छाती पर िपसतौल चला िदया। ितलोतमा पर कुछ असर न हु आ। बाहे और भी कडी हो गयी. जमीन पर एक काला दीघर काय सपर पडा तडप रहा था। उसकी छाती और मुँह से खून की धारा बह रही थी। दयाराम को अपनी ऑंखो पर िवशवास न आता था। यह कैसी अदभुत पेत-लीला थी! समसया कया है िकससे पूछूँ ? इस ितलसम को तोडने का पयतन करना मेरे जीवन का एक कतरवय हो गया। उनहोने सॉँगे से सॉँप की देह मे एक कोचा मारा और िफर वे उसे लटकाये हु ए ऑंगन मे लाये। िबलकुल बेदम हो गया था। उनहोने उसे अपने कमरे मे ले जाकर एक खाली संदक ू मे बंदकर िदया। उसमे भुस भरवा कर बरामदे मे लटकाना चाहते थे। इतना बडा गेहुँवन साँप िकसी ने न देखा होगा। तब वे ितलोतमा के पास गये। डर के मारे कमरे मे कदम रखने की िहममत न पडती थी। हॉँ. जैस िचलक पड गयी हो। 38 .

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