पेम चं द

कम
िवशवास
नरक का मागर
सी और पुरष
उधदार

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कोई अपनी दीनता पर—अगर हम लोगो मे अगडने का जरा भी सामथयर होता तो मजाल थी िक यह कर लगा िदया जाता. शिक और कीितर का कुछ और ही रहसय था। सारा नगर ही नही . जो िकसी जमाने मे सतारा के महाराज का िनवास-सथान था। वहॉँ सारे िदन नगर के रईसो. इसिलए जो लोग उनके पेम को कलुिषत कहते है. राजकमचािरयो का तांता लगा रहता था। वह सारे पांत के धन और कीितर के उपासको की देवी थी। अगर िकसी को िखताब का खबत था तो वह िमस जोशी की खुशामद करता था। िकसी को अपने या संबधी के िलए कोई अचछा ओहदा िदलाने की धुन थी तो वह िमस जोशी की अराधना करता था। सरकारी इमारतो के ठीके . घोडो पर सवार. नमक. मानो साफ मैदान है। िमस जोशी के ऊंचे बरामदे मे नगर के सभी बडे-बडे रईस और राजयािधकारी तमाशा देखने के िलए बैठे हु ए थे। िमस जोशी मेहमानो का आदर-सतकार कर रही थी और िमसटर जौहरी. जो कुछ होता था उसी के हाथो होता था। िजस वक वह अपनी अरबी घोडो की िफटन पर सैर करने िनकलती तो रईसो की सवािरयां आप ही आप रासते से हट जाती थी. शराब. हंसती तो अनोखी छिव से. इस जन-समूह को घृणा और भय की दिष से देख रहे थे। सहसा सभापित महाशय आपटे एक िकराये के तांगे पर आते िदखाई िदये। चारो तरफ हलचल मच गई. लेिकन नगर मे उससे बढकर रपवती रमिणयां भी थी। वह सुिशिकता थी. लेिकन इन गुणो मे उसका एकािधपतय न था। उसकी पितषा. जनता के बीच मे िनशशंक भाव से घोडे दौडाते िफरते थे. लोहे-लकडी. बोलती तो िनराली घटा से. राजो. उतना दबते जायेगे. जलसो मे िमस जोशी के साथ साये की भॉँित रहते है। और कभीकभी उनकी मोटर रात के सनाटे मे िमस जोशी के मकान से िनकलती हु ई लोगो को िदखाई देती है। इस पेम मे वासना की माता अिधक है या भिक की. लोग उठ-उठकर उनका सवागत करने दौडे और उनहे ला कर मंच पर 3 . कोई देश की िसथित पर.िवशवास उ न िदनो िमस जोसी बमबई सभय-समाज की रािधका थी। थी तो वह एक छोटी सी कनया पाठशाला की अधयािपका पर उसका ठाट-बाट. सारे पानत का बचचा जानता था िक बमबई के गवनर र िमसटर जौहरी िमस जोशी के िबना दामो के गुलाम है।िमस जोशी की आं खो का इशारा उनके िलए नािदरशाही हु कम है। वह िथएटरो मे दावतो मे. हाथ मे हंटर िलए. गाने मे िनपुण. अिधकािरयो का घर से बाहर िनकलना मुिशकल हो जाता। हमारा जररत से जयादा सीधापन हमे अिधकािरयो के हाथो का िखलौना बनाए हु ए है। वे जानते है िक इनहे िजतना दबाते जाओ. यह कोई नही जानता । लेिकन िमसटर जौहरी िववािहत है और िमस जौशी िवधवा. चौडे मैदान मे हरी-भरी घास पर बमबई की जनता उपनी फिरयाद सुनाने के िलए जमा थी। अभी तक सभापित न आये थे. इसिलए लोग बैठे गपशप कर रहे थे। कोई कमर चारी पर आकेप करता था. िसर नही उठा सकते। सरकार ने भी उपदव की आं शका से सशस पुिलस बुला ली।ैै उस मैदान के चारो कोनो पर िसपािहयो के दल डेरा डाले पडे थे। उनके अफसर. अफीम आिद सरकारी चीजो के ठीके . वे उन पर कोई अतयाचार नही करते। बमबई की वयवसथािपका-सभा ने अनाज पर कर लगा िदया था और जनता की ओर से उसका िवरोध करने के िलए एक िवराट सभा हो रही थी। सभी नगरो से पजा के पितिनिध उसमे सिममिलत होने के िलए हजारो की संखया मे आये थे। िमस जोशी के िवशाला भवन के सामने. आराम-कुसी परलेटे. वकचतुर थी. ताकती तो बांकी िचतवन से . बडे दक ु ानदार खडे हो-हो कर सलाम करने लगते थे। वह रपवती थी. कल-पुरजे आिद के ठीके सब िमस जोशी ही के हाथो मे थे। जो कुछ करती थी वही करती थी. मान-सममान बडी-बडी धनरािनयो को भी लिजजत करता था। वह एक बडे महल मे रहती थी.

न पांव मे जूते थे. जहां पजा तो भूखी मरती हो और पधान कमर चारी अपनी पेम-िकडा मे मग हो. भूखो मरते है. वेशचाओं पर कंचन की वषार करे। संसार मे और ऐसा कौन ऐसा देश होगा. हमारा ही अपराध है िक हमने अपने सेवको को इतना अिधकार दे रखा है। आज हम उचच सवर से कह देना चाहते है िक हम यह कूर और कुिटल वयवहार नही सह सकते।यह हमारे िलए असह है िक हम और हमारे बाल-बचचे दानो को तरसे और कमर चारी लोग. कोई न जाने पाए। यह िवदोहातम वयाखयान है। िमसटर जौहरी ने पुिलस के अफसर को इशारे पर बुलाकर कहा—और िकसी को िगरफतार करने की जररत नही। आपटे ही को पकडो। वही हमारा शतु है। 4 . मेवे खाये और इटली और सपेन की िमठाइयां चले! यह िकसका अपराध है? कया सेवको का? नही. जो छाती फाड कर धरती से धन िनकालते है. दबु ले-पतले आदमी थे.बेठा िदया। आपटे की अवसथा ३०-३५ वषर से अिधक न थी . न िसर पर टोपी। इस अदनर ग. मेवे और फल. िजनहे हमने अपने सुख और शाित की वयवसथा करने के िलए रखा है . उसकेपैरोैे पर िसर रगडती थी। इस एक पाणी क हाथो मे इतनी शिक थी िक वह कण मात मे सारी िमलो को बंद करा सकता था. िनषकलंक. जहां िसयां गिलयो मे ठोकरे खाती िफरती हो और अधयािपकाओं का वेष धारण करने वाली वेशयाएं आमोद-पमोद के नशे मे चूर हो---३ ए काएक सशस िसपािहयो के दल मे हलचल पड गई। उनका अफसर हु कम दे रहा था —सभा भंग कर दो. रात को सोते-सोते चौक पडते थे। उससे जयादा भंयकर जनतु अिधकािरयो की दिषमे दस ू रा नथा। ये पचंड शासन-शिक उस एक हडी के आदमी से थरथर कांपती थी. मुख पर िचनता का गाढा रंग-चढा हु आ था। बाल भी पक चले थे. उधर अनाज पर कर लगाया जा रहा है. पर मुख पर सरल हासय की रेखा झलक रही थी। वह एक सफेद मोटा कुरता पहने थे. िनसतेज पाणी मे न जाने कौल-सा जाद ू था िक समसत जनता उसकी पूजा करती थी. कदािप नही. उसके पैरो मे न जाने कौन सा जाद ू था िक समसत जरत उसकी पूजा करती थी. नेताओं को पकड लो. नाच-रंग की महिफले सजाये. दबु र ल. हमारे सवामी बने हु ए शराबो की बोतले उडाते है। िकतनी अनोखी बात है िक सवामी भूखो मरे और सेवक शराबे उडाये. िवलास मे डू बे हु ए हमारे करण-कनदन की जरा भी परवा न करत हु ए िवहार करे। यह असह है िक हमारे घरो मे चूलहे न जले और कमर चारी लोग िथएटरो मे ऐश करे. और वे लोग. दावते उडाये. शहर का सारा कारोबार िमटा सकता था। अिधकािरयो को उसके भय से नीद न आती थी. बफर और शराब की रेल-पेल थी। वे लोग इन अभागो को देख-देख हंसते और तािलयां बजाते थे। जीवन मे पहली बार आपटे की जबान काबू से बाहर हो गयी। मेघ की भांित गरज कर बोले— ‘इधर तो हमारे भाई दाने-दाने को मुहताज हो रहे है. कयोिक उस हडी मेएक पिवत. बलवान और िदवय आतमा का िनवास था। २ आ पटे ने मंच पर खडे होकरह पहले जनता को शांत िचत रहने और अिहंसा-वत पालन करने का आदेश िदया। िफर देश मे राजिनितक िसथित का वणर न करने लगे। सहसा उनकी दिष सामने िमस जोशी के बरामदे की ओर गई तो उनका पजा-दख ु पीिडत हदय ितलिमला उठा। यहां अगिणत पाणी अपनी िवपित की फिरयाद सुनने के िलए जमा थे और वहां मेजो पर चाय और िबसकुट. केवल इसिलए िक राजकमर चािरयो के हलवे-पूरी मे कमी न हो। हम जो देश जो देश के राजा है.

लेिकन तुमहारी इचछा है तो आजमा देखो।’ िम 5 . उसको राकस के रप मे िदखाना चाहती हू ।ं ‘ऐसा कोई पुरष नही है. िकसी को कानोकान खबर न होगी।’ ‘मुझे तो अब भी भय है िक वह तुमहे संदेह की दिष से देखेगा और तुमहारे पंजे मे न आयेगा. तो मुझे कोई आपित नही है। मै तो केवल उसे दंड देना चाहता हू ।ं ’ ‘तो हु कम दे दीिजए िक वह इसी वक छोड िदया जाय।’ ‘जनता कही यह तो न समझेगी िक सरकार डर गयी?’ ‘नही. िजनका पयोग करने मे हमारी जाित िसदहसत है. राज-दोह कामुकदमा चलाकर कम से कम १० साल के िलए अंडमान भेजूगां। िमस जोशी—इससे कया फायदा? ‘कयो? उसको अपने िकए की सजा िमल जाएगी।’ ‘लेिकन सोिचए. वह सारे संसार मे फैलेगी और हम कही मुंह िदखाने लायक नही रहेगे। आप अखबारो मे संवाददाताओं की जबान तो नही बंद कर सकते।’ ‘कुछ भी हो मै इसे जोल मे सडाना चाहता हू ।ं कुछ िदनो के िलए तो चैन की नीद नसीब होगी। बदनामी से डरना ही वयथर है। हम पांत के सारे समाचार-पतो को अपने सदाचार का राग अलापने के िलए मोल ले सकते है। हम पतयेक लांछन को झूठ सािबत कर सकते है. उसके आं तिरक भावो और िवचारो की थाह लेकर आपके सामने रख दगं ू ी। मै ऐसे पमाण खोज िनकालना चाहती हू िं जनके उतर मे उसे मुंह खोलने का साहस न हो. केवल संसार की नैितक सहानुभूित पाप करने के िलए जमाहु ए थे. मेरे खयाल मे तो जनता पर इस वयवहार का बहु त अचछा असर पडेगा। लोग समझेगे िक सरकार ने जनमत का सममान िकया है।’ ‘लेिकन तुमहे उसेक घर जाते लोग देखेगे तो मन मे कया कहेगे?’ ‘नकाब डालकर जाऊंगी. और संसार की सहानुभूित उसके बदले हमारे साथ हो। चारो ओर से यही आवाज आये िक यह कपटी ओर धूतर था और सरकर ने उसके साथ वही वयवहार िकया है जो होना चािहए। मुझे िवशवास है िक वह षंडंतकािरयो को मुिखया है और मै इसे िसद कर देना चाहती हू ।ं मै उसे जनता की दिष मे देवता नही बनाना चाहती हू ं.पुिलस ने डंडे चलने शुर िकये। और कई िसपािहयो के साथ जाकर अफसर ने अपटे का िगरफतार कर िलया। जनता ने तयौिरयां बदली। अपने पयारे नेता को यो िगरफतार होते देख कर उनका धैयर हाथ से जाता रहा। लेिकन उसी वक आपटे की ललकार सुनाई दी—तुमने अिहंसा-वत िलया है ओर अगर िकसी ने उस वत को तोडा तो उसका दोष मेरे िसर होगा। मै तुमसे सिवनय अनुरोध करता हू ं िक अपने-अपने घर जाओं। अिधकािरयो ने वही िकया जो हम समझते थे। इस सभा से हमारा जो उदेशय था वह पूरा हो गया। हम यहां बलवा करने नही . िजस पर युवती अपनी मोिहनी न डाल सके।’ ‘अगर तुमहे िवशवास है िक तुम यह काम पूरा कर िदखाओंगी. हमे उसका िकतना मूलय देना पडेगा। अभी िजस बात को िगने-िगनाये लोग जानते है. आपटे पर िमथया दोषारोपरण का अपराध लगा सकते है।’ ‘मै इससे सहज उपाय बतला सकती हू ।ं आप आपटे को मेरे हाथ मे छोड दीिजए। मै उससे िमलूगं ी और उन यंतो से. और हमारा उदेशय पूराहो गया। एक कण मे सभा भंग हो गयी और आपटे पुिलस की हवालात मे भेज िदए गये ४ सटर जौहरी ने कहा—बचचा बहु त िदनो के बाद पंजे मे आए है.

लेिकन उसके वस बहु त साधारण थे और आभूषण के नाम शरीर पर एक धागा भी नथा। अलंकार-िवहीन हो कर उसकी छिव सवचछ. मेरी रका करने वाला कोई नही है? कया आपको उिचत था िक एक अबला पर िमथयारोपण करे? अगर मै पुरष होती तो आपसे डूल खेलने काक आगह करती । अबला हू ं. िवषादमय सवरप उसकी आं खो मे समाया हु आ था। ५ त:काल िमस जोशी अपने भवन से िनकली. जल की भांित और भी िनखर गयी। उसने सडक पर आकर एक तांगा िलया और चली। अपटे का मकान गरीबो के एक दरू के मुहले मे था। तांगेवाला मकान का पता जानता था। कोई िदककत न हु ई। िमस जोशी जब मकान के दार पर पहु च ं ी तो न जाने कयो उसका िदल धडक रहा था। उसने कांपते हु ए हाथो से कंु डी खटखटायी। एक अधेड औरत िनकलकर दार खोल िदय। िमस जोशी उस घर की सादगी देख दंग रह गयी। एक िकनारे चारपाई पडी हु ई थी. इसिलए आपकी सजजनता को सपशर करना ही मेरे हाथ मे है। आपने मुझ पर जो लांछन लगाये है. बैठा एक टू टे हु ए ताले की मरममत कर रहा था और एक पांच-छ वषर का तेजसवी बालक आपटे की पीठ पर चढने के िलए उनके गले मे हाथ डाल रहा था।आपटे इसी लोहार के साथ उसी घर मे रहते थे। समाचार-पतो के लेख िलखकर जो कुछ िमलता उसे दे देते और इस भांित गृह-पबंध की िचंताओं से छुटी पाकर जीवन वयतीत करते थे। िमस जोशी को देखकर आपटे जरा चौके. वे सवर था िनमूरल है। आपटे ने दढता से कहा---अनुमान तो बाहरी पमाणो से ही िकया जाता है। पा 6 .यह कहकर िमसटर जौहरी ने िमस जोशी को पेममय नेतो से देखा. िफर खडे होकर उनका सवागत िकया ओर सोचने लगे िक कहां बैठाऊं। अपनी दिरदता पर आज उनहे िजतनी लाज आयी उतनी और कभी न आयी थी। िमस जोशी उनका असमंजस देखकर चारपाई पर बैठ गयी और जरा रखाई से बोली---मै िबना बुलाये आपके यहां आने के िलए कमा मांगती हू ं िकंतु काम ऐसा जररी था िक मेरे आये िबना पूरा न हो सकता। कया मै एक िमनट के िलए आपसे एकांत मे िमल सकती हू ।ं आपटे ने जगनाथ की ओर देख कर कमरे से बाहर चले जाने का इशारा िकया। उसकी सी भी बाहर चली गयी। केवल बालक रह गया। वह िमस जोशी की ओर बार-बार उतसुक आं खो से देखता था। मानो पूछ रहा हो िक तुम आपटे दादा की कौन हो? िमस जोशी ने चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठते हु ए कहा---आप कुछ अनुमान कर सकते है िक इस वक कयो आयी हू ।ं आपटे ने झेपते हु ए कहा---आपकी कृपा के िसवा और कया कारण हो सकता है? िमस जोशी---नही. सुखद वायु चल रही थी. संसार इतना उदार नही हु आ िक आप िजसे गांिलयां दे. जो उसी अधेड औरत का पित था. एक टू टी आलमारी मे कुछ िकताबे चुनी हु ई थी. हाथ िमलाया और चले गए। आकाश पर तारे िनकले हु ए थे. लेिकन िमस जोशी को ऐसा मालूम हु आ मानो आपटे मंच पर खडा बोल रहा है। उसक शांत. शीलवान. फशर पर िखलने का डेसक था ओर एक रससी की अलगनी पर कपडे लटक रहे थे। कमरे के दस ू रे िहससे मे एक लोहे का चूलहा था और खाने के बरतन पडे हु ए थे। एक लमबा-तगडा आदमी. सामने के चौडे मैदान मे सनाटा छाया हु आ था. िवदान आदमी से मुझे ऐसी आशा न थी। मै अबला हू ं. वह आपको धनयवाद दे। आपको याद है िक कल आपने अपने वयाखयान मे मुझ पर कया-कया आकेप िकए थे? मै आपसे जोर देकर कहती हू ं िकवे आकेप करके आपने मुझपर घोर अतयाचार िकया है। आप जैसे सहदय. चैत की शीतल. सौमय.

िवशवासघात िकया. यहां तक िक िकतनी ही बार कुधासे वयाकुल होकर भीख मांगी। मजदरू ी करने को बुरा नही समझता.है। िमस जोशी—बाहरी पमाणो से आप िकसी के अंतसतल की बात नही जान सकते । आपटे—िजसका भीतर-बाहर एक न हो. मोची का काम िकया. तो वह आपका भम है और मै चाहती हू ं िक आप उस कलंक को िमटा दे जो आपने मुझ पर लगाया है। आप इसके िलए पायिशचत करेगे? आपटे---अगर न करं तो मुझसे बडा दरु ातमा संसार मे न होगा। िमस जोशी—आप मुझपर िवशवास करते है। आपटे—मैने आज तक िकसी रमणी पर िवशवास नही िकया। िमस जोशी—कया आपको यह संदेह हो रहा है िक मै आपके साथ कौशल कर रही हू ं? आपटे ने िमस जोशी की ओर अपने सदय. िजनके िचकने-चुपडे शबदो मे मतलब छुपा हु आ था। आपटे के सरल िवशवास पर उसका िचत आनंद से गदगद हो गया। शायद वह गंगा मे खडी होकर अपने अनय िमतो से यह कहती तो उसके फैशनेबुल िमलने वालो मे से िकसी को उस पर िवशवास न आता। सब मुंह के सामने तो ‘हां-हां’ करते. पर बाहर िनकलते ही उसका मजाक उडाना शुर करते। उन कपटी िमतो के सममुख यह आदमी था िजसके एक-एक शबद मे सचचाई झलक रही थी. उसको संतोष हो जाए िक यह भी कलुिषत आतमा है। बोले—मै जनम से अभागा हू ।ं माता-िपता का तो मुंह ही देखना नसीब न हु आ. यहां तक िक चोरी के अपराध मे कैद की सजा भी पायी। िमस जोशी ने सजल नयन होकर कहा—आज यह सब बाते मुझसे कयो कर रहे है ? मै इनका उलेख करके आपको िकतना बदनाम कर सकती हू ं. यह भी नही जानता िक मेरा िपता कौन था. िजसके शबद अंतसतल से िनकलते हु ए मालूम होते थे। आपटे उसे चुप देखकर िकसी और ही िचंता मे पडे हु ए थे।उनहे भय हो रहा था अब मै चाहे िकतना कमा मांगू. तो मेरा अपराध रहा ही कहाँ. िजस दयाशील मिहला ने मुझे आशय िदया था. िमस जोशी के सामने िकतनी सफाइयां पेश करं. िकंतु िजस देवी के दया-वृक की छाया मे मेरा पालन-पोषण हु आ उनकी पेम-मूितर आज तक मेरी आं खो के सामने है और नारी के पित मेरी भिक को सजीव रखे हु ए है। मै उन शबदो को मुंह से िनकालने के िलए अतयंत द ु :खी और लिजजत हू ं जो आवेश मे िनकल गये. वह शदा से कम नही है. सजल. मेरे आकेपो का असर कभी न िमटेगा। इस भाव ने अजात रप से उनहे अपने िवषय की गुप बाते कहने की पेरणा की जो उनहे उसकी दिष मे लघु बना दे. आपसे मुझे भय नही है। िमस जोशी—अगर मै आपसे बदला लेना चाहू ं. मै गंवार और अिशष पाणी हू ।ं लेिकन नारी-जाित के िलए मेरे हदय मे जो आदर है. िजससे वह भी उनहे नीच समझने लगे. और मै आज ही समाचार-पतो मे खेद पकट करके आपसे कमा की पाथर ना करंगा। िमस जोशी का अब तक अिधकांश सवाथी आदिमयो ही से सािबका पडा था. एक होटल मे बरतन मांजता रहा. िजसका आप मुझसे बदला लेगी। इससे तो मुझे भय होता है िक 7 . सरल नेतो से देख कर कहा—बाई जी. इसका आपको भय नही है? आपटे ने हंसकर कहा—नही. लेिकन मैने उस अवसथा मे ऐसे-ऐसे कमर िकए. घोडे की साईसी की. िजनहे कहते लजजा आती है—चोरी की. तो? आपटे---जब मै अपने अपराध पर लिजजत होकर आपसे कमा मांग रहा हू ं. जो मुझे देवताओं पर है। मैने अपनी माता का मुख नही देखा. आज भी मजदरू ी ही करता हू ।ं भीख मांगनी भी िकसी-िकसी दशा मे कमय है. उसे देख कर भम मे पड जाना सवाभािवक िमस जाशी—हां. वह भी मुझे १३ वषर की अवसथा मे अनाथ छोडकर परलोक िसधार गयी। उस समय मेरे िसर पर जो कुछ बीती उसे याद करके इतनी लजजा आती हे िक िकसी को मुंह न िदखाऊं। मैने धोबी का काम िकया.

. यह लडका खो गया था। मुझे रासते मे िमला। मै पूछता-पूछता इसे यहां लाया। उसी िदन से इन लोगो से मेरा इतना पेम हो गया िक मै इनके साथ रहने लगा। िमस जोशी---आप अनुमान कर सकते है िक आपका वृतानत सुनकर मै आपको कया समझ रही हू ।ं आपटे---वही. जो मेरी आतमा को चारो तरफ से जकडे हु ए है. मुझ पर दया कीिजए। यह कहते-कहते वह उनके पैरो पर िगर पडी। आपटे ने उसे उठा िलया और बोले---ईशवर के िलए मुझे लिजजत न करो। िमस जोशी ने गदगद कंठ से कहा---आप इन दषु ो के हाथ से मेरा उदार कीिजए। मुझे इस योगय बनाइए िक आपकी िवशवासपाती बन सकूं। ईशवर साकी है िक मुझे कभी-कभी अपनी दशा पर िकतना दख ु होता है। मै बार-बार चेषा करती हू ं िक अपनी दशा सुधारं. वह आदमी नही देवता है। भगवन्. जो मै वासतव मे हू ं---नीच. आपने मुझ पर जो आकेप िकये वह सतय है। मै आपके अनुमान से कही भष हू ।ं मै इस योगय भी नही हू ं िक आपकी ओर ताक सकंू । आपने अपने हदय की िवशालता िदखाकर मेरा असली सवरप मेरे सामने पकट कर िदया। मुझे कमा कीिजए.. उसका यह पिरणाम होना सवाभािवक-सा मालूम होता है। मेरी उचच िशका ने गृिहणी-जीवन से मेरे मन मे घृणा पैदा कर दी। मुझे िकसी पुरष के अधीन रहने का िवचार असवाभािवक जान पउै़ता था। मै गृिहणी की िजममेदािरयो और िचंताओं को अपनी 8 .आपने मुझे कमा नही िकया। लेिकन यिद मैने आपसे कमा न मांगी तो मुझसे तो बदला न ले सकती। बदला लेने वाले की आं खे यो सजल नही हो जाया करती। मै आपको कपट करने के अयोगय समझता हू ।ं आप यिद कपट करना चाहती तो यहां कभी न आती। िमस जोशी—मै आपका भेद लेने ही के िलए आयी हू ।ं आपटे---तो शौक से लीिजए। मै बतला चुका हू ं िक मैने चोरी के अपराध मे कैद की सजा पायी थी। नािसक के जेल मे रखा गया था। मेरा शरीर दबु र ल था.इस िवलािसता के जाल को तोड दं ू.. मानो िसपािहयो से उनकी रका कर रहा है। िमस जोशी---आपका रकक तो बडा बहादरु मालूम होता है। आपटे----इसकी भी एक कथा है। साल-भर होता है. जेल की कडी मेहनत न हो सकती थी और अिधकारी लोग मुझे कामचोर समझ कर बेतो से मारते थे। आिखर एक िदन मै रात को जेल से भाग खडा हु आ। िमस जोशी—आप तो िछपे रसतम िनकले! आपटे--.ऐसा भागा िक िकसी को खबर न हु ई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ५०० र0 का इनाम भी है। िमस जोशी----तब तो मै आपको जरर पकडा दगं ू ी। आपटे---तो िफर मै आपको अपना असल नाम भी बता देता हू ।ं मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुिलस से बचने के िलए रख छोडा है। बालक अब तक तो चुपचाप बैठा हु आ था। िमस जोशी के मुंह से पकडाने की बात सुनकर वह सजग हो गया। उनहे डांटकर बोला—हमाले दादा को कौन पकडेगा? िमस जोशी---िसपाही और कौन? बालक---हम िसपाही को मालेगे। यह कहकर वह एक कोने से अपने खेलने वाला डंडा उठा लाया और आपटे के पास वीरोिचता भाव से खडा हो गया. आप मुझ पर िफर अनयाय कर रहे है। पहला अनयाय तो कमा कर सकती हू ं. इतना सदय हो. पर दबु र ल आतमा अपने िनशचय पर िसथत नही रहती। मेरा पालन-पोषण िजस ढंग से हु आ. यह अनयाय कमा नही कर सकती। इतनी पितकूल दशाओं मे पडकर भी िजसका हदय इतना पिवत. कमीना धूतर. िमस जोशी---नही. इतना िनषकपट.

या पूवर संसकारो से । पिरिसथितयो का तयाग करने से ही बच सकता है. वह सवयं अपना भला-बुरा सोच सकती है. पयास से तडपते हु ए मनुषय को नदी का तट नजर आने लगा था। ६ 9 . उनकी राय िकसी बात पर न िमलती थी। िपता िवदान् थे. हवामे उडी जा रही है. नही तो मै न जाने कहां उडकर पहु च ं ा होता। उनके िवचार मे सारा दोष माता की अिशका के िसर था। वह अपनी एकमात पुती को मूखार माता से संसगर से दरू रखना चाहते थे। माता कभी मुझसे कुछ कहती तो िपताजी उन पर टू ट पडते—तुमसे िकतनी बार कह चुका िक लडकी को डांटो मत. मै पुरषो की भांित सवतंत रहना चाहती थी। कयो िकसी की पांबद होकर रहू ं? कयो अपनी इचछाओं को िकसी वयिक के सांचे मे ढालू? कयो िकसी को यह अिधकार दं ू िक तुमने यह कयो िकया. उसकी जलवायु ही दिू षत है। वहां सभी मुझे कीचड मे लतपत देखना चाहते है।. िजसने मुझसे िनषकपट वयवहार िकया है। ईशवर के िलए अब मुझे भूल न जाइयेगा। आपटे ने िमस जोशी की ओर वेदना पूणर दिष से देखकर कहा—अगर मै आपकी कुछ सेवा कर सकूं तो यह मेरे िलए सौभागय की बात होगी। िमस जोशी! हम सब िमटी के पुतले है. मै आपकी राह देखती रहू गं ी। अपने रकक को भी लाइएगा। यह कहकर उसने बालक को गोद मे उठाया ओर उसे गले से लगा कर बाहर िनकल आयी। गवर के मारे उसके पांव जमीन पर न पडते थे। मालूम होता था. ईशवर ने चाहातो कुहरा भी फट जाएगा। लेिकन सबसे पहले उन पिरिसथितयो का तयाग करने को तैयार हो जाइए। िमस जोशी—यही आपको करना होगा। आपटे ने चुभती हु ई िनगाहो से देख कर कहा—वैद रोगी को जबरदसती दवा िपलाता है। िमस जोशी –मै सब कुछ करगी। मै कडवी से कडवी दवा िपयूगं ी यिद आप िपलायेगे। कल आप मेरे घर आने की कृपा करेगे. ईशवर उनहे सदगित दे. संसकारो से िगरने वाले मनुषय का मागर इससे कही किठन है। आपकी आतमा सुनदर और पिवत है. कोई िनदोषर नही। मनुषय िबगडता है तो पिरिसथितयो से. तुमहारे डांटने से उसके आतम-सममान का िकतनाधकका लगेगा. कालेजो के शौिकन पोफेसर िवदािथर यो पर कोई अचछा असर नही डाल सकते । मै इस वक ऐसी बात आपसे कह रही हू ।ं पर अभी घर जाकर यह सब भूल जाऊंगी। मै िजस संसार मे हू ं. यह तुम नही जान सकती। आिखर माताजी ने िनराश होकर मुझे मेरे हाल पर छोड िदया और कदािचत् इसी शोक मे चल बसी। अपने घर की अशांित देखकर मुझे िववाह से और भी घृणा हो गयी। सबसे बडा असर मुझ पर मेरे कालेज की लेडी िपंिसपल का हु आ जो सवयं अिववािहत थी। मेरा तो अब यह िवचार है िक युवको की िशका का भार केवल आदशर चिरतो पर रखना चािहए। िवलास मे रत. शाम को? आपटे---अवशय आऊंगा। िमस जोशी ने िवदा देते हु ए कहा---भूिलएगा नही. माता के िलए ‘काला अकर भैस बराबर’ था। उनमे रात-िदन वाद-िववाद होता रहता था। िपताजी ऐसी सी से िववाह हो जाना अपने जीवन का सबसे बडा दभ ु ारगय समझते थे। वह यह कहते कभी न थकते थे िक तुम मेरे पांव की बेडी बन गयी.मानिसक सवाधीनता के िलए िवष-तुलय समझती थी। मै तकरबुिद से अपने सीतव को िमटा देना चाहती थी. मेरे िवलासासक रहने मे ही उनका सवाथर है। आप वह पहले आदमी है िजसने मुझ पर िवशवास िकया है. वह कयो िकया? दामपतय मेरी िनगाह मे तुचछ वसतु थी। अपने माता-िपता की आलोचना करना मेरे िलए अिचत नही. केवल पिरिसथितयो ने उसे कुहरे की भांित ढंक िलया है। अब िववेक का सूयर उदय हो गया है.

िजधर िनकल जाती थी मालूम होता था. उस पर फबितयां उडानी शुर की। लेिकन आपटे इस कला मे भी एक ही िनकला। बात मुंह से िनकली ओर उसने जवाब िदया. मगर इन आनदोलनकारी िवदािहयो को बकवास करने के िसवा और कया सूझ सकती है। चार ही बजे मेहमान लोग आने लगे। नगर के बडे -बडे अिधकारी. बडे-बडे िवदान. कही कदम िफसले और कहकहे लगाये पर आपटे मंचे हु ए िखलाडी की भांित. पर आप िकतने ही नािसतको को आिसतक बना देती है। िमसटर जौहरी---आपने लाख की बात की कही मंहत जी! िमसेज भरचा—कयो महंत जी. िचत को पसन करने वाले भावो मे डू बा होता था। िमस जोशी उसकी वाकयचातुरी पर फुल उठती थी? सोराब जी---आपने िकस यूिनविसर टी से िशका पायी थी? आपटे---यूिनविसर टी मे िशका पायी होती तो आज मै भी िशका-िवभाग का अधयक होता। िमसेज भरचा—मै तो आपको भयंककर जंतु समझती थी? आपटे ने मुसकरा कर कहा—आपने मुझे मिहलाओं के सामने न देखा होगा। सहसा िमस जोशी अपने सोने के कमरे मे गयी ओर अपने सारे वसाभूषण उतार फेके। उसके मुख से शुभ संकलप का तेज िनकल रहा था। नेतो से दबी जयोित पसफुिटत हो रही थी. सजीला आदमी है। मुख से शौयर िनकल रहा था. समाचार-पतो के समपादक. आपको िमस जोशी ही न आिसतक बनाया है कया? सहसा आपटे लोहार के बालक की उं गली पकडे हु ए भवन मे दािखल हु ए। वह पूरे फैशनेबुल रईस बने हु ए थे। बालक भी िकसी रईस का लडका मालूम होता था। आज आपटे को देखकर लोगो को िविदत हु आ िक वह िकतना सुदरं .दू सरे िदन पात:काल िमस जोशी ने मेहमानो के नाम दावती काडर भेजे और उतसव मनाने की तैयािरयां करने लगी। िमसटर आपटे के सममान मे पाटी दी जा रही थी। िमसटर जौहरी ने काडर देखा तो मुसकराये। अब महाशय इस जाल से बचकरह कहां जायेगे। िमस जोशी ने ने उनहे फसाने के िलए यह अचछी तरकीब िनकाली। इस काम मे िनपुण मालूम होती है। मैने सकझा था. अरण पकाश की छटा चली आरही है। भवन मे चारो ओर सुगंध की लपटे आ रही थी और मधुर संगीत की धविन हवा मे गूंज रही थी। पांच बजते-बजते िमसटर जौहरी आ पहु च ं े और िमस जोशी से हाथ िमलाते हु ए मुसकरा कर बोले—जी चाहता है तुमहारे हाथ चूम लू।ं अब मुझे िवशवास हो गया िक यह महाशय तुमहारे पंजे से नही िनकल सकते। िमसेज पेिटट बोली---िमस जोशी िदलो का िशकार करने के िलए ही बनाई गई है। िमसटर सोराब जी---मैने सुना है. सभयता कहां से आती? िमसटर भरचा---आज उसे खूब बनाना चािहए। महंत वीरभद डाढी के भीतर से बोले---मैने सुना है नािसतक है। वणारशम धमर का पालन नही करता। िमस जोशी---नािसतक तो मै भी हू ।ं ईशवर पर मेरा भी िवशवास नही है। महंत---आप नािसतक हो. जो कदम उठाता था वह सधा हु आ. बडे-बडे वयापारी. मालूम होता था वह इसी समाज मे पला है। लोग देख रहे थे िक वह कही चूके और तािलयां बजाये. सवचछ . आपटे िबलकुल गंवार-सा आदमी है। िमसटर भरचा---िकसी यूिनविसर टी मे िशका ही नही पायी. अपनी-अपनी मिहलाओं के साथ आने लगे। िमस जोशी ने आज अपने अचछे -से-अचछे वस और आभूषण िनकाले हु ए थे. पोर-पोर से िशषता झलकती थी. अब उससे ईषयार करने लगे. जो हाथ िदखलाता था वह जमा हु आ। लोग उसे पहले तुचछ समझते थे . आपटे चालाक आदमी होगा. पर उसके जवाब मे मािलनय या कटु ता का लेश भी न होता था। उसका एक-एक शबद सरल. मानो िकसी देवता ने उसे वरदान िदया हो। उसने सजे हु ए कमरे को घृणा से 10 .

मानो उनहे अपने कानो पर िवशवास नही है। िमस जोशी—महाराज आपटे ने डकैितयां की और कर रहे है--अब की िकसी ने ताली न बजायी.देखा... हतयारा कहे. दमन के दोही. यहां तक िक अब मै िनराधार हू ं और उनके चरणो के िसवा मेरे िलए कोई आशय नही है। पाणधार! इस अबला को अपने चरणो मे सथान दो... लेिकन आपटे को नही छोडू गां। इस रोडे को रासते से हटा दगं ू ा.. अिभमान के दोही--चारो ओर सनाटा छा गया। लोग िविसमत होकर एक दस ू रे की ओर ताकने लगे। िमस जोशी---गुप रप से शस जमा िकए है और गुप रप से हतयाऍं की है. जो मैने पूरी नही की इसी ने मुझसे बेवफाई की। नही. िमसटर जौहरी ने तािलयां बजायी और तािलयां का दौगडा िफर बरस गया। िमस जोशी—लेिकन िकस की हतया? द ु:ख की.. लोग सुनना चाहते थे िक देखे आगे कया कहती है। ‘उनहोने मुझ पर भी हाथ साफ िकया है. मेरे एक ही िनशाने पर िगर पडे। मै उन रहसयो के खोलने मे अब िवलंब न करंगी. इसने मेरे साथ ऐसी दगा की! मैने इसके िलएकया कुछ नही िकया? इसकी कौन-सी इचछा थी. पजा के कषो की.’ िमसटर जौहरी ने ताली बजायी ओर तािलयो के हॉल गूज ं उठा। िमस जोशी---लेिकन राज के दोही नही. कभी नही. हठधमी की ओर अपने सवाथर की। चारो ओर िफर सनाटा छा गया और लोग चिकत हो-हो कर एक दस ू रे की ओर ताकने लगे.. पुिलस रोज दस-पांच आदिमयां को पकडती थी। समाचार-पतो मे जोरो के साथ वाद-िववाद हो रहा था। रात के नौ बज गये थे। िमसटर जौहरी राज-भवन मे मेज पर बैठे हु ए सोच रहे थे िक िमस जोशी को कयो कर वापस लाएं ? उसी िदन से उनकी छाती पर सांप लोट रहा था। उसकी सूरत एक कण के िलए आं खो से न उतरती थी। वह सोच रहे थे. चाहे मुझे पद से हाथ धोना पडे. इस कांटे को पहलू से िनकाल बाहर करंगा। ए 11 .. वह इतना भंयकर है िक उसका वृतांत सुनकर शायद आप लोगो को मूछार आ जायेगी। अब मुझे लेशमात भी संदेह नही है िक यह महाशय पकके देशदोही है. िकंतु िमसटर जौहरी बगले बजाने लगे। िमस जोशी ने इसे फंसाने के िलए यह कोई नया सवांग रचा है। ‘िमतो! आपको याद है. आप लोग अधीर हो रहे होगे। मैने जो कुछ देखा. मेरा सब कुछ अपहरण कर िलया है. उसे डू बने से बचाओ। मै जानती हू ं तुम मुझे िनराश न करोगे।’ यह कहते-कहते वह जाकर आपटे के चरणो मे िगर पडी। सारी मणडली सतंिभत रह गयी। ७ क सपा गुजर चुका था। आपटे पुिलस की िहरासत मे थे। उन पर चार अिभयोग चलाने की तैयािरयां चल रही थी। सारे पांत मे हलचल मची हु ई थी। नगर मे रोज सभाएं होती थी. अनयाय के दोही. मै इसके बगैर िजंदा नही रह सकता। दिु नया चाहे मुझे बदनाम करे.. अपने आभूषणो को पैरो से ठु करा िदया और एक मोटी साफ साडी पहनकर बाहर िनकली। आज पात:काल ही उसने यह साडी मंगा ली थी। उसे इस नेय वेश मे देख कर सब लोग चिकत हो गये। कायापलट कैसी? सहसा िकसी की आं खो को िवशवास न आया.. परसो महाशय आपटे ने मुझे िकतनी गांिलयां दी थी। यह महाशय खडे है । आज मै इनहे उस दवु यर वहार का दणड देना चाहती हू ।ं मै कल इनके मकान पर जाकर इनके जीवन के सारे गुप रहसयो को जान आयी। यह जो जनता की भीड गरजते िफरते है.. दिरदता की.

वह िदन दरू नही है. यह सोच रहे थे िक शायद िमस जोशी ने िनराश होकर मेरे पास आयी है. वह मुझे िमल गयी। उसे पाकर अब तीनो लोक की समपदा मेरी आं खो मे तुचछ है। मै उनके िवयोग मे चाहे पाण दे दं ू. तो? िमस जोशी ने सीने से िपसतौल िनकाल कर कहा---तो पहले आप की लाश जमीन पर फडर कती होगी और आपके बाद मेरी . कुछ रखे.सहसा कमरे का दरवाजा खुला और िमस जाशी ने पवेश िकया। िमसटर जौहरी हकबका कर कुसी पर से उठ खडे हु ए. तुमहारी याद मे बैठा था। तुम िकतनी ही बेवफाई करो. मेरी आतमा को कलुिषत करते थे। कभी आपको यह खयाल आया िक इसकी आतमा पर कया बीत रही होगी? आप मुझे आतमशुनय समझते थे। इस देवपुरष ने अपनी िनमर ल सवचछ आतमा के आकषर ण से मुझे पहली ही मुलाकात मे खीच िलया। मै उसकी हो गयी और मरते दम तक उसी की रहू गं ी। उस मागर से अब आप हटा नही सकते। मुझे एक सचची आतमा की जररत थी . यह पेम है! आिखर आप मुझसे कया चाहते है? अगर आप समझ रहे हो िक इन सिखतयो से डर कर मै आपकी शरण आ जाऊंगी तो आपका भम है। आपको अिखतयार है िक आपटे को काले पानी भेज दे. जब तक मै समझता हू ं िक तुम मेरी हो। अगर तुम मेरी नही हो सकती तो मुझे इसकी कया िचंता हो सकती है िक तुम िकस िदशा मे हो? िमस जोशी—यह आपका अंितम िनणर य है? िमसटर जौहरी—अगर मै कह दं ू िक हां. जब तुम इस भवन की सवािमनी होगी। आपटे ने मुझे पेम के केत मे नही. पर तुमहारी याद मेरे िदल से नही िनकल सकती। िमस जोशी---आप केवल जबान से कहते है। िमसटर जौहरी—कया िदल चीरकर िदखा दं ू? िमस जोशी—पेम पितकार नही करता.बोिलए। यह आपका अंितम िनणर य िनशचय है? यह कहकर िमस जोशी ने जौहरी की तरफ िपसतौल सीधा िकया। जौहरी कुसी से उठ खडे हु ए और मुसकर बोले—कया तुम मेरे िलए कभी इतना साहस कर सकती थी? जाओं. कमाशील नही होता । मेरे िलए तुम सवर सव हो. मै उनको अपना सवामी समझती हू ।ं उनहोने अपनी िवशाल उदारता से मेरा उदार िकया । आप मुझे िवषय के फंदो मे फंसाते थे. फांसी चढा दे. लेिकन इसका मुझ परकोई असर न होगा।वह मेरे सवमी है. पेम मे दरु ागह नही होता। आप मरे खून के पयासे हो रहे है. मै तुमहारी याद करता हू ।ं आपने मेरे सवामी को िहरासत मे डाल रखा है. उस पर भी आप कहते है. पर आपके काम नही आ सकती। िमसटर जौहरी---िमस जोशी । पेम उदार नही होता. लेिकन नम भाव से बोले---आओ बाला. राजनीित के केत मे भी परासत कर िदया। सचचा आदमी एक मुलाकात मे ही जीवन बदल सकता है. यह आज िसद हो गया। 12 . आतमा को जगा सकता है और अजान को िमटा कर पकाश की जयोित फैला सकता है. तुमहारा आपटे तुमहे मुबारक हो। उस पर से अिभयोग उठा िलया जाएगा। पिवत पेम ही मे यह साहस है। अब मुझे िवशवास हो गया िक तुमहारा पेम पिवत है। अगर कोई पुराना पापी भिवषयवाणी कर सकता है तो मै कहता हू ं.

दशर नीय है.नरक का मागर ” पढते-पढते न जाने कब नीद आ गयी। कैसे-कैसे महातमा थे िजनके रातिलए“भकमाल भगवत्-पेम ही सब कुछ था. आं खो मे गडने वाली िकरिकरी. यहां तो इनको देखकर आं खे फूटती है. यहां तो इसका नाम सुनकर जवर-सा चढ आता है। कल पगली सुशीला ने िकतनी उमंगो से मेरा शृंगार िकया था. अपने हाथो घर का सारा कामकाज करती है . तुम मेरे रोम-रोम का हाल जानते हो। मै चाहती हु ं िक उनहे अपना इष समझूं. कपडे नही है.कदािचत् शतु को भी देखकर िकसी का मन इतना कलांत नही होता होगा। उनके आने के समय िदल मे धडकन सी होने लगती है। दो-एक िदन के िलए कही चले जाते है तो िदल पर से बोझ उठ जाता है। हंसती भी हू ं. पुरष मे जो उतम है.धन-दौलत पर जो पाण देता हो वह जाने. सारा दोष मेरे नसीबो ही का है। लेिकन यह सब जानते हु ए भी जब उनहे आते देखती हू ं. वह तो देखकर न जलेगे। वह तो हमारे मन का हाल जानते है। २ भगवान! मै अपने मन को कैसे समझाऊं! तुम अंतयारमी हो. िसर भारी हो जाता है. और कुछ नही. िकसी वयवहार से नाममात. कोमल हदय उसके पैरो तल रौदे जा रहे है? युवित के िलए पित कैसी-कैसी मधुर कलपनाओं का सोत होता है. उनहे मेरी िकसी बात से. न उनका दोष है. कलेजे मे खटकनेवाला कांटा. िकतने पेम से बालो मे फूल गूंथे। िकतना मना करती रही. बात तक करने को जी नही चाहता. यह मै नही कह सकती। मुझे तो ऐसा जान पडता है िक पूवरजनम मे हम दोनो मे बैर था. जो कुछ मेरे भागय मे था वह हु आ. जी चाहता है इनकी सूरत न देखंू. मुह पर मुरदनी सी-छा जाती है. भाडे के ननहेसे मकान मे रहती है. उसी बैर का बदला लेने के िलए उनहोने मुझेसे िववाह िकया है. भी द ु:ख न हो। वह िनदोष है. उनके इशारे पर चलूं. शेष है. उनके चरणो की सेवा करं. उसकी सजीव मूितर इस शबद के धयान मे आते ही उसकी नजरो के सामने आकर खडी हो जाती है।लेिकन मेरे िलए यह शबद कया है। हदय मे उठने वाला शूल. इसी मे मग रहते थे। ऐसी भिक बडी तपसया से िमलती है। कया मै वह तपसया नही कर सकती? इस जीवन मे और कौन-सा सुख रखा है? आभूषणो से िजसे पेम हो जाने . गहने नही है. िफर भी उसे रोतेनहीैे देखती अगर अपने बस की बात होती तो आज अपने धन को उसकी दिरदता से बदल लेती। अपने पितदेव को मुसकराते हु ए घर मे आते 13 . उससे कही जयादा रोयी। संसार मे ऐसी भी कोई सी है. तुमहारे रंग-ढंग कहे देते है---और मनुषय उसका िदल िवष खा लेने को चाहे। भगवान्! संसार मे ऐसे भी मनुषय है। आिखर मै नीचे चली गयी और ‘भिकमाल’ पढने लगी। अब वृंदावन िबहारी ही की सेवा करंगी उनही को अपना शृगं ार िदखाऊंगी. न माता-िपता का. तो मेरा िदल बैठ जाता है. िकतने अिभलाषाओं से लहराते हु ए. िजसका पित उसका शृंगार देखकर िसर से पांव तक जल उठे ? कौन ऐसी सी है जो अपने पित के मुंह से ये शबद सुने—तुम मेरा परलोग िबगाडोगी. न मानी। आिखर वही हु आ िजसका मुझे भय था। िजतनी देर उसके साथ हंसी थी. अंत:करण को बेधने वाला वयंग बाण! सुशीला को हमेशा हंसते देखती हू ।ं वह कभी अपनी दिरदता का िगला नही करती. वही पुराने संसकार हमारे मन मे बने हु ए है। नही तो वह मुझे देख-देख कर कयो जलते और मै उनकी सूरत से कयो घृणा करती? िववाह करने का तो यह मतलब नही हु आ करता! मै अपने घर कही इससे सुखी थी। कदािचत् मै जीवन-पयर नत अपने घर आनंद से रह सकती थी। लेिकन इस लोक-पथा का बुरा हो. जो अभािगन कनयाओं को िकसी-न-िकसी पुरष के गले मे बांध देना अिनवायर समझती है। वह कया जानता है िक िकतनी युवितयां उसके नाम को रो रही है. बोलती भी हू ं. जीवन मे कुछ आनंद आने लगता है लेिकन उनके आने का समाचार पाते ही िफर चारो ओर अंधकार! िचत की ऐसी दशा कयो है.

देखकर उसका सारा द ु:ख दािरदय छूमंतर हो जाता है. िफर भी इतना संदेह! यह अपमान असह है। कया मुझे अपनी आबर पयारी नही? यह मुझे इतनी िछछोरी कयो समझते है. कही आती नही. इनहे मुझपर संदेह करते लजजा भी नही आती? काना आदमी िकसी को हंसते देखता है तो समझता है लोग मुझी पर हंस रहे है। शायद इनहे भी यही बहम हो गया है िक मै इनहे िचढाती हू ।ं अपने अिधकार के बाहर से बाहर कोई काम कर बैठने से कदािचत् हमारे िचत की यही वृित हो जाती है। िभकुक राजा की गदी पर बैठकर चैन की नीद नही सो सकता। उसे अपने चारो तरफ शुत िदखायी देगे। मै समझती हू ं. इनहे मुझ पर इतना संदेह कयो होता है। जब से नसीब इस घर मे लाया है. पर अपनी बुिद के अनुसार अवशय करती थी। आज से िकसी चीज को भूलकर भी छूने की कसम खाती हू ।ं यह मै जानती हू ।ं कोई पुरष घर की चौकसी के िलए िववाह नही करता और इन महाशय ने िचढ कर यह बात मुझसे कही। लेिकन सुशीला ठीक कहती है. इनहे सी के िबना घर सुना लगता होगा. िफर देखती मेरा कया कर लेते। इनहे मेरा उदास और िवमन रहने पर आशचयर होता है। मुझे मन-मे कृतघन समझते है। अपनी समणमे इनहोने मरे से िववाह करके शायद मुझ पर एहसान िकया है। इतनी बडी जायदाद और िवशाल समपित की सवािमनी होकर मुझे फूले न समाना चािहए था. िजस पर तीनो लोक का धन नयोछावर कर द।ं ू ३ ज मुझसे जबत न हो सका। मैने पूछा—तुमने मुझसे िकसिलए िववाह िकया था? यह पशन महीनो से मेरे मन मे उठता था. कोई उसको देखने वाला न था। तो अब मालूम हु आ िक मै इस घर की चौकसी के िलए लाई गई हू ।ं मुझे इस घर की रका करनी चािहए और अपने को धनय समझना चािहए िक यह सारी समपित मेरी है। मुखय वसतु समपित है. गृहसथी का भार उठाने के िलए. िकसी से बोलती नही. जरा ठाकुर जी की झांकी देखने जाती हू ।ं इतना सुनते ही तयोिरयां चढाकर बोले—तुमहारे जाने की कुछ जररत नही। जो अपने पित की सेवा नही कर सकती. सभी शादी करने वाले बुडढो का यही हाल है। आज सुशीला के कहने से मै ठाकुर जी की झांकी देखने जा रही थी। अब यह साधारण बुिद का आदमी भी समझ सकता हैिक फूहड बहू बनकर बाहर िनकलना अपनी हंसी उडाना है. पर मन को रोकती चली आती थी। आज पयाला छलक पडा। यह पशन सुनकर कुछ बौखला-से गये. और नही कया भोग-िवलास के िलए? घरनी के िबना यह आपको भूत का डेरा-सा मालूम होता था। नौकर-चाकर घर की समपित उडाये देते थे। जो चीज जहां पडी रहती थी. इनहे बराबर संदेह-मूलक कटाक करते देखती हू ।ं कया कारण है? जरा बाल गुथवाकर बैठी और यह होठ चबाने लगे। कही जाती नही. मै तो केवल चौकी दािरन हू ।ं ऐसे घर मे आज ही आग लग जाये! अब तक तो मै अनजान मे घर की चौकसी करती थी. छाती गज-भर की हो जाती है। उसके पेमािलंगन मे वह सुख है. उसे देवताओं के दशर न से पुणय के बदले पाप होता। मुझसे उडने चली हो । मै औरतो की नस-नस पहचानता हू ।ं ऐसा कोध आया िक बस अब कया कहू ।ं उसी दम कपडे बदल डाले और पण कर िलया िक अब कभ दशर न करने जाऊंगी। इस अिवशवास का भी कुछ िठकाना है! न जाने कया सोचकर रक गयी। उनकी बात का जवाब तो यही था िक उसी कण घरसे चल खडी हु ई होती. लेिकन आप उसी वक न जाने िकधर से टपक पडे और मेरी ओर ितरसकापूणर नेतो से देखकर बोले—कहां की तैयारी है? मैने कह िदया. उसी तरह जैसे िपंजरे मे िचिडया को न देखकर िपंजरा सूना लगता है। यह हम िसयो का भागय! ४ लूम नही. खीसे िनकालकर बोले—घर संभालने के िलए. िजतना वह चाहते है उतना न सही. आठो आ मा 14 . बगले झाकने लगे.

चारपाइयां तक नही. मै िकसी का रोना नही सुन सकती थी। वही मै हू ं िक आज तीन िदन से उनहे बगल के कमरे मे पडे कराहते सुनती हू ं और एक बार भी उनहे देखने न गयी. लेिकन यहां इसकी परवाह नही। िजसकाह जी चाहे जायदाद ले. इसी चोट के िलए मेरा मन तडपता रहता है. जब मेरा मन उनहे कुितसत नही समझता ।इनके जीवन मे िकतना उतसाह है।आं खे मुसकराती रहती है. पर सुशीला िकतने आनंद से रहती है। उसका उलास देखकर मेरे मन मे भी भांित-भांित की कलपनाएं उठने लगती है---उनहे कुितसत कयो कहु ं. चाहे उनहे परदेश मे बरसो लग जाएं । मै यही पेम चाहती हू ं. आं खो मे आं सू का िजक ही कया। मुझे ऐसा मालूम होता है. िजसका नशा िनतय छाया रहे। ती आ 15 . कोई सजावट न सामान. िनमोिनया हो गया है। पर मुझे न जाने कयो इनका गम नही है। मै इनती वज-हदय कभी न थी।न जाने वह मेरी कोमलता कहां चली गयी। िकसी बीमार की सूरत देखकर मेरा हदय करणा से चंचल हो जाता था. पर मै अपने को जो कुछ समझती हू ं वह समझती हू ।ं मैने चूिडया नही तोडी. अब भी नही डालती। बूढे बाबा का िकया-कमर उनके सुपुत ने िकया. जो मुझे लात से मारे उसक पैरो का चूंमू। मुझे तो मालूम हो रहा था। ईशवर इनहे इस पाप का दणड दे रहे है। मै िनससकोच होकर कहती हू ं िक मेरा इनसे िववाह नही हु आ है। सी िकसी के गले बांध िदये जाने से ही उसकी िववािहता नही हो जाती। वही संयोग िववाह का पद पा सकता है। िजंसमे कम-से-कम एक बार तो हदय पेम से पुलिकत हो जाय! सुनती हू ं. ओठो पर मधुर हासय खेलता रहता है. अपनी बीमारी का सारा बुखार मुझ पर िनकालते है. उनकी याद सदैव पफुिलत करती रहेगी. मुझे इसकी जररत नही! ६ ज तीन िदन हु ए. बचने की कोई आशा नही. बातो मे पेम का सोत बहताहु आजान पडता है। इस आनंद से. यहां इसकी िचंता नही। उनहे िचढाने को मै भी रंग=िबरंगी सािडया पहनती हू ं. इस िमजराब की चोट हदय के तारो को अंतकाल तक मधुर सवरो मे कंिपत रखसकती है। एक िदन मैने सुशीला से कहा---अगर तेरे पितदेव कही परदेश चले जाए तो रोत-रोते मर जाएगी! सुशीला गंभीर भाव से बोली—नही बहन. कोई मेरे गुथ ं े हु ए बालो को देखकर नाक िसंकोडता है. मै िवधवा हो गयी. पर मुझे तो यह कहने मे लेशमात भी संकोच नही है िक इनकी बीमारी से मुझे एक पकार का ईषयारमय आनंद आ रहा है। इनहोने मुझे यहां कारावास दे रखा था—मै इसे िववाह का पिवत नाम नहीदेना चाहती---यह कारावास ही है। मै इतनी उदार नही हू ं िक िजसने मुझे कैद मे डाल रखा हो उसकी पूजा करं. कयो तोडू ? कयो तोडू ? मांग मे सेदरु पहले भी न डालती थी. उसी समृित अंत तक के िलए काफी हो जाती है. कोई मेरे आभूषणो पर आं ख मटकाता है. मरगी नही .पहरइनका यशगान करते रहना चािहये था। मै यह सब कुछ न करके उलटे और मुंह लटकाए रहती हू ।ं कभी-कभी बेचारे पर दया आती है। यह नही समझते िक नारी-जीवन मे कोई ऐसी वसतु भी है िजसे देखकर उसकी आं खो मे सवगर भी नरकतुलय हो जाता है। ५ न िदन से बीमान है। डाकटर कहते है. मै भी ऐसी ही समृित चाहती हू ं िजससे िदल के तार सदैव बजते रहे. और भी बनती-संवरती हू ं. जीवन सफल हो जाता है. महाशय अपने कमरे मे पडे-पडे मुझे कोसा करते है. इनसे मेरा कोई नाता ही नही मुझे चाहे कोई िपशाचनी कहे. चाहे कुलटा. धन ले. चाहे वह िकतना ही किणक हो. मै पास न फटकी। घर मे मुझ पर मनमानी आलोचनाएं होती है. मुझे जरा भी द ु:ख नही है। मै तो कैद से छूट गयी। इधर कई िदन सुशीला के घर गयी। छोटा-सा मकान है. कम-से-कम लोग यही कहते है। िजसका जो जी चाहे कहे. िफर उसे कोई भूल नही सकता.

िचत ऐसा चंचल हो रहा था िक कही उड जाऊं। आजकल भिक के गंथो की ओर ताकने को जी नही चाहता.। मेरे हदय मे पचंड जवाला उठी हु ई है। घर के सारे आदमी सो रहे है थे। मै चुपके से नीचे उतरी . तुम वह चीज चाहती हो जो संसार मे होते हु ए सवगर की है.गुलर का फूल है और अमावसा का चांद है। लेिकन मेरे मंत मे वह शंिक है जो भागय को भी संवार सकती है। तुम पेम की पयासी हो. पेम की तंरगो पर कीडा करती हु ई तुमहे पार उतार दे। मैने उतकंिठत होकर पूछा—माता. सवाथी माता-िपता ने मुझे कुएं मे ढकेला. उनके पित मेरे मन मे बार-बार दषु कामनाएं उठती है। मै उनहे लिजजत करना चाहती हू ।ं मै अपने मुंह मे कािलख लगा कर उनके मुख मे कािलख लगाना चाहती हू ं मैअपने पाणदेकर उनहे पाणदणड िदलाना चाहती हू ।ं मेरा नारीतव लुप हो गया है. वह मंत बता देती हू ं िक िजसकी जो इचछा जो वह पूरी हो जाये। मैने कहा---मुझे न धन चािहए न संतान। मेरी मनोकामना तुमहारे बस की बात नही है। बुिढया हंसी—बेटी. जो आकाश कुसुम है. िजनहे संतान की इचछा है उनहे संतान. वे आज दध ू की कुिलयां कर रही है। इसीिलए इतनी रात गये िनकलती हू िक अपने हाथो िकसी अभािगन का उदार हो सके तो करं। िकसी से कुछ नही मांगती. यही काम करते इतनी उम गुजर गयी। इसी बुिढया की बदौलत जो नदी मे कूदने जा रही थी. बस औरकया कहू ं. जैसे कोई पाणी गमी से वयाकुल होकर घर से िनकले और िकसी खुली हु ई जगह की ओर दौडे।उस मकान मे मेरा दम घुट रहा था। सडक पर सनाटा था. भगवान् का िदया सब कुछ घर मे है. जो देवताओं के वरदान से भी जयादा आनंदपद है. दक ु ाने बंद हो चुकी थी। सहसा एक बुिढयां आती हु ई िदखायी दी। मै डरी कही यह चुडल ै न हो। बुिढया ने मेरे समीप आकर मुझे िसर से पांव तक देखा और बोली ---िकसकी राह देखरही हो मैने िचढ कर कहा---मौत की! बुिढया---तुमहारे नसीबो मे तो अभी िजनदगी के बडे-बडे सुख भोगने िलखे है। अंधेरी रात गुजर गयी. वे आज फूलो की सेज पर सो रही है. तुमहारा घर कहां है। बुिढया---बहु त नजदीक है बेटी. मेरा एक-एक अंग मेरी आं तिरक वेदना का आतर नाद हो रहा है। मेरे िचत की चंचलता उस अंितम दशा को पहंच गयी है. िजस पाषाण-हदय पाणी ने मेरी मांग मे सेदरु डालने का सवांग िकया. कही सैर करने जाने की भी इचछा नही होती. अकल से पढती हू ं. मै अपनी भावनाओं को संजीव मूितर है. जो तुम चाहती हो वह मै जानती हू ं. जब मनुषय को िनंदा की न लजजा रहती है और न भय। िजन लोभी. जो जहर का पयाल पीने को तैयार थी. जहां बगूलो के िसवा हिरयाली का नाम नही। घर फाडे खाता था.७ त रोते-रोते िहचिकयां बंध गयी। न-जाने कयो िदल भर आता था। अपना जीवन सामने एक बीहड मैदान की भांित फैला हु आ मालूम होता था. धूप मे चूडे नही सुफेद िकये है।। तुमहारे िदन गये और अचछे िदन आ रहे है। हंसो मत बेटी. आसमान पर सुबह की रोशनी नजर आ रही है। मैने हंसकर कहा---अंधेरे मे भी तुमहारी आं खे इतनी तेज हैिक नसीबो की िलखावट पढ लेती है? बुिढया---आं खो से नही पढती बेटी. मै तुमहे उस नाव पर बैठा सकती हू ं जो पेम के सागर मे. कया चाहती हू ं वह मै सवयं भी नही जानती। लेिकन मै जो जानती वह मेरा एक-एक रोम-रोम जानता है. दार खोला और घर से िनकली. तुम चलो तो मै अपनी आं खो पर बैठा कर ले चलू।ं मुझे ऐसा मालूम हु आ िक यह कोई आकाश की देवी है। उसेक पीछ-पीछे चल पडी। ८ रा 16 . केवल यही इचछा है उनहे धन.

मै िफर कहती हू ं िक अब भी अपनी बािलकाओ के िलए मत देखो धन. मेरे िलए अब इस जीवन मे कोई आशा नही । इस अधम दशा को भी उस दशा से न बदलूगं ी.आ ह! वह बुिढया. मत देखो जायदाद. अगर नही सह सकती तो अपने यौवन-काल की उं मगो का कुचला जाना। रही मै. गंदे िवषाक नाले मे िगर पडी वह वसतु न िमलनी थी. पर िकसी बूढे खूसट से मत बयाहो। सी सबकुछ सह सकती है। दारण से दारण द ु:ख. मेरे माता-िपता और उस बूढे पर है जो मेरा सवामी बनना चाहता था। मै यह पंिकयां न िलखती. गला घोट डालो. कुलटाओं की िवषय-वासना नही। लेिकन जीवन-पथ मे एक बार उलटी राह चलकर िफर सीधे मागर पर आना किठन है? लेिकन मेरे अध:पतन का अपराध मेरे िसर नही. िवष िमला. मत देखो कुलीनता. िनमर ल सवचछ पेम की पयासी थी. बडे से बडा संकट. जहर दे कर मार डालो. लेिकन इस िवचार से िलख रही हू ं िक मेरी आतम-कथा पढकर लोगो की आं खे खुले. न िमली। मै सुशीला का –सा सुख चाहती थी. केवल वर देखो। अगर उसके िलए जोडा का वर नही पा सकते तो लडकी को कवारी रख छोडो. नरक की डाइन िनकली। मेरा सवर नाश हो गया। मै अमृत खोजती थी. िजससे िनकल कर आयी हू ।ं 17 . िजसे मै आकाश की देवी समझती थी.

तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात िनकली और िववाह का मुहूतर आया। वधू आभूषणो से सजी हु ई मंडप मे आयी तो िविपन को उसके हाथ-पांव नजर आये। िकतनी सुद ं र उं गिलया थी. िचपटी नाक. वह िदन भी समीप आ गया था. मानो दीप-िशखाएं हो. अंगो की शोभा िकतनी मनोहािरणी थी। िविपन फूले न समाये। दस ू रे िदन वधू िवदा हु ई तो वह उसके दशर नो के िलए इतने अधीर हु ए िक जयो ही रासते मे कहारो ने पालकी रखकर मुंह-हाथ धोना शुर िकया. बसंत की छिव. मैने अपनी आं खो से देखा है. पुषप की कोमलता. माधुयर और अलंकारो की सजीव पितमा थी। जबान पर सी का नाम आते ही उनकी आं खे जगमगा उठती थी. कान खडे हो जाते थे. लेकन िविपन को यह शुतुरगमज-से मालूम होते। वह िदल से चाहती थी िक उनहे िव िव 18 . और फुले हु ए गालो वाली कुरपा सी थी। रंग गोरा था. पालकी से िसर िनकाले बाहर झांक रही थी। िविपन की िनगाह उस पर पड गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी िजसकी उनहोने कलपना की थी. तरह-तरह से बाल संवारती. और िफर रंग कैसा ही सुंदर हो. कोयल की धविन— वह किव विणर त सभी उपमाओं से िवभूिषत होगी। वह उस किलपत मूित के उपासक थे. आप चुपके से वधू के पास जा पहु च ं े। वह घूघ ं ट हटाये . किवताओं मे उसका गुण गाते. कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरपा िसयां भी संसार मे है. इस सी के साथ कैसे मै बोलूगा. लेिकन जब उनके मांमू ने िवशवास िदलाया िक लडकी बहु त ही रपवती है. जब उनकी आशाएं हरे-हरे पतो से लहरायेगी. लेिकन वह चौडा-सा मुंह! भगवान्! कया तुमहे मुझी पर यह वजपात करना था। ३ िपन हो अपना जीवन नरक-सा जान पडता था। वह अपने मांमू से लडा। ससुर को लंबा खरार िलखकर फटकारा. उसमे ऊषा की पफुलता होगी. तभी से उनहोने उस सुंदरी की कलपना करनी शुर की जो उसके हदय की रानी होगी. उनकी मुरादे पूरी हो होगी। कालेज की अंितम परीका समाप हो गयी थी और िववाह के संदेशे आने लगे थे। २ वाह तय हो गया। िबिपन बाबू ने कनया को देखने का बहु त आगह िकया. रप की कमी नही पूरी कर सकता। िविपन का सारा उतसाह ठंडा पड गया---हां! इसे मेरे ही गले पडना था। कया इसके िलए समसत संसार मे और कोई न िमलता था? उनहे अपने मांमू पर कोध आया िजसने वधू की तारीफो के पुल बांध िदये थे। अगर इस वक वह िमल जाते तो िविपन उनकी ऐसी खबर लेता िक वह भी याद करते। जब कहारो ने िफर पालिकयां उठायी तो िविपन मन मे सोचने लगा. पर उसमे लाली के बदले सफदी थी.सी और पुर ष बाबू के िलए सी ही संसार की सुनदर वसतु थी। वह किव थे और उनकी किवता िविपन के िलए िसयो के रप और यौवन की पशसा ही सबसे िचंताकषर क िवषय था। उनकी दिष मे सी जगत मे वयाप कोमलता. इसका मुझे अब तक पता न था। कया मुंह ईशवर ने बनाया है. मां-बाप से हु जजत की और जब इससे शांित न हु ई तो कही भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवशय आती थी। वह अपने का समझाता िक इसमे उस बेचारी का कया दोष है. मानो िकसी रिसक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला. कंु दन की चमक. उसने जबरदसती तो मुझसे िववाह िकया नही। लेिकन यह दया और यह िवचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके रोम-रोम मे वयाप हो जाती थी। आशा अपने अचछे -से-अचछे कपडे पहनती. कया आं खे है! मै और सारे ऐबो की ओर से आं खे बंद कर लेता. िजसकी वह बरसो से कलपना कर रहे थे---यह एक चौडे मुंह. घंटो आइने के सामने खडी होकर अपना शृंगार करती.

लेिकन दध ू की मकखी नही समझता। िविपन ने झुंझला कर कहा—कयो नाहक िसर खाती हो. िकन तुमने िकसी मदर को केवल रपहीन होने के कारण कवांरा रहते देखा है. बाल बनवाता. पसिलयो की हिडयां िनकल आयी आं खो के इदर -िगदर गढे पड गये। अब वह पहले से कही जयादा शोक करता. िफर तुम कयो मुझसे हु जजत करती हो ? आशा यह िझडकी सुन कर चली गयी। उसे मालूम हो गया िक इनहोने मेरी ओर से सदा के िलए हदय कठोर कर िलया है। ४ िपन तो रोज सैर-सपाटे करते. िकनतु मुख पर कांित न थी. देह भी कीण होने लगी. यहां तुमहे िकसने बुलाया था ? आशा— आिखर इस मजर की दवा कौन करेगा ? िविपन— इस मजर की दवा नही है। जो काम ईशचर से ने करते बना उसे आदमी कया बना सकता है ? आशा – यह तो तुमही सोचो िक ईशवर की भुल के िलए मुझे दंड दे रहे हो। संसार मे कौन ऐसा आदमी है िजसे अचछी सूरत बुरी लगती हो. िनतय तेल लगता. अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का िववाह करता। अब वह और भी खुल खेला। पहले आशा से कुछ दबता था. लेिकन िविपन उससे भागा-भागा िफरता था। अगर कभी भेट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बाते करने लगता िक आशा रोती हु ई वहां से चली जाती। सबसे बुरी बात यह थी िक उसका चिरत भष होने लगा। वह यह भूल जाने की चेषा करने लगा िक मेरा िववाह हो गया है। कई-कई िदनो क आशा को उसके दशर न भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजे बाहर से आती हु ई सुनती. उनकी सेवा करने के िलए अवसर खोजा करती थी. कम-से-कम उसे यह धडका लगा रहता था िक कोई मेरी चाल-ढाल पर िनगाह रखने वाला भी है। अब वह धडका छुट गया। कुवासनाओं मे ऐसा िलप हो गया िक मरदाने कमरे मे ही जमघटे होने लगे। लेिकन िवषय-भोग मे धन ही का सवर नाश होता. इससे कही अिधक बुिद और बल का सवर नाश होता है। िविपन का चेहरा पीला लगा. उसका पित उप पर पाण ने देता हो. सेवा करना तो दरू रहा। इतना ही नही. कपडे बदलता. वह िदल मे मानता था िक वह मर जाती तो गला छुटता. रपहीन लडिकयां भी मां-बाप के घर नही बैठी रहती। िकसी-न-िकसी तरह उनका िनवारह हो ही जाता है. मै तुमसे बहस तो नही कर रहा हू ।ं िदल पर जब नही िकया जा सकता और न दलीलो का उस पर कोई असर पड सकता है। मै तुमहे कुछ कहता तो नही हू ं. िफर भी वह मन को न रोक सकी। िविपन को बुला भेजा। िविपन को भी उस पर कुछ दया आ गयी आ गयी। आकार सामने खडे हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर देखा तो चौक पडी। िव 19 .पसन करं. रंगरोगन से कया हो सकता ? एक िदन आशा बरामदे मे चारपाई पर लेटी हु ई थी। इधर हफतो से उसने िविपन को न देखा था। उनहे देखने की इचछा हु ई। उसे भय था िक वह सन आयेगे . झरोखे से देखती िक वह दोसतो के गले मे हाथ डाले सैर करने जा रहे है और तडप कर रहे जाती। एक िदन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दशर न ही नही होते। मेरे कारण घर छोड दीिजएगा कया ? िविपन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हू ।ं आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसिलए दौड-धूप जयादा करनी पडती है। आशा—िकसी डाकटर से मेरी सूरत कयो नही बनवा देते ? सुनती हू ं. आजकल सूरत बनाने वाले डाकटर पैदा हु ए है। िविपन— कयो नाहक िचढती हो. कभी-कभी रात को गायब रहते। इधर आशा िचंता और नैराशय से घुलते-घुलते बीमार पड गयी। लेिकन िविपन भूल कर भी उसे देखने न आता.

वह इतने दबु र ल हो गये थे िक पहचनाना मुिशकल था। बोली—तुम भी बीमार हो कया? तुम तो मुझसे भी जयादा घुल गये हो। िविपन—उं ह. जो मैने. पर इसकी उसे जरा भी परवा न थी। १५ िदनो बाद िविपन की हालत कुछ समभली। उनका दािहना पैर तो लुज ं पड गया था. फािलज था। ५ िलज के भयंकर रोग मे रोगी की सेवा करना आसान काम नही है। उस पर आशा महीनो से बीमार थी। लेिकन उस रोग के सामने वह पना रोग भूल गई। 15 िदनो तक िविपन की हालत बहु त नाजुक रही। आशा िदन-के-िदन और रात-की-रात उनके पास बैठी रहती। उनके िलए पथय बनाना. जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातो से भी िनराशा टपकती थी। अकखडपन या कोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हु आ िक उनकी आं खो मे आं सू भरे हु ए है। िविपन चारपाई पर बैठते हु ए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुमहे जलाने के िलए नही कहता। ईशवर जानता है. मूछार-सी आ जाती है। यह कहते-कहते एकाएक वह कांप उठे । सारी देह मे सनसनी सी दौड गयी। मूिछर त हो कर चारपाई पर िगर पडे और हाथ-पैर पटकने लगे। मुंह से िफचकुर िनकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो गयी। आशा का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनो से िबसतर न छोड सकी थी। पर इस समय उसके िशिथल अंगो मे िविचत सफुितर दौड गयी। उसने तेजी से उठ कर िविपन को अचछी तरह लेटा िदया और उनके मुख पर पानी के छीटे देने लगी। महरी भी दौडी आयी और पंखा झलने लगी। पर भी िविपन ने आं खे न खोली। संधया होते-होते उनका मुंह टेढा हो गया और बायां अंग शुनय पड गया। िहलाना तो दरू रहा. तुमहारे साथ िकए है। आशा ने पित की ओर कोमल भाव से देखकर कहा−−मै तो आपको अब भी उसी िनगाह से देखती हु ।ं मुझे तो आप मे कोई अनतर नही िदखाई देता। ६ फा 20 . िजंदगी मे रखा ही कया है िजसके िलए जीने की िफक करं ! आशा—जीने की िफक न करने से कोई इतना दबु ला नही हो जाता। तुम अपनी कोई दवा कयो नही करते? यह कह कर उसने िविपन का दािहन हाथ पकड कर अपनी चारपाई पर बैठा िलया। िविपन ने भी हाथ छुडाने की चेषा न की। उनके सवाभाव मे इस समय एक िविचत नमता थी. मूंह से बात िनकालना भी मुिशकल हो गया। यह मूछार न थी. जो मैने तुमहारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा से मुंह फेर लो तो मुझेसे उस दवु यर वहार का बदला लो. मै तुमहे चोट नही पहु च ं ाना चाहता। मै अब जयादा िदनो तक न िजऊंगा। मुझे िकसी भयंकर रोग के लकण िदखाई दे रहे है। डाकटर ने भी वही कहा है। मुझे इसका खेद है िक मेरे हाथो तुमहे कष पहु च ं ा पर कमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा िदल डू ब िदल डू ब जाता है. जवर से देह तपा करती. उनके जरा-जरा से इशारो को समझाना उसी जैसी धैयशाली सी का काम था। अपना िसर ददर से फटा करता. लेिकन चलने−िफरने की ताकत न थी। एक िदनो लेटे−लेटे उनहे कया खयाल आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरप आदमी उनहोने कभी न देखा था। आिहसता से बोले−−आशा. पर तोतली भाषा मे कुछ बोलने लगे थे। सबसे बुरी गत उनके सुनदर मुख की हु ई थी। वह इतना टेढा हो गया था जैसे कोई रबर के िखलौने को खीच कर बढा दे। बैटरी की मदद से जरा देर के िलए बैठे या खडे तो हो जाते थे . उनहे गोद मे समभाल कर दवा िपलाना. ईशवर ने मुझे गरर की सजा दे दी। वासतव मे मुझे यह उसी बुराई का बदला िमला है.

पैरो मे इतनी शिक आ गई िक अब वह चलने−िफरने लगे। आशा ने पित की बीमारी मे देवी की मनौती की थी। आज उसी की पुजा का उतसव था। मुहले की िसयां बनाव−िसंगार िकये जमा थी। गाना−बजाना हो रहा था। एक सेहली ने पुछा−−कयो आशा. यह वही देवी है। 21 . बनदर का−सा मुंह हो गया है. बाते बनाती हो।’ ‘नही बहन. रप के बदले मुझे उनकी आतमा िमल गई जो रप से कही बढकर है।’ िविपन कमरे मे बैठे हु ए थे। कई िमत जमा थे। ताश हो रहा था। कमरे मे एक िखडकी थी जो आं गन मे खुलती थी। इस वक वह बनदव थी। एक िमत ने उसे चुपके से खोल िदया। एक िमत ने उसे चुपके िदया और शीशे से झांक कर िविपन से कहा−− आज तो तुमहारे यहां पािरयो का अचछा जमघट है। िविपन−−बनदा कर दो। ‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरते है ! तुमहे इन सबो मे कौन सबसे अचछी मालूम होती है ? िविपन ने उडती हु ई नजरो से देखकर कहा−−मुझे तो वही सबसे अचछी मालूम होती है जो थाल मे फुल रख रही है। ‘वाह री आपकी िनगाह ! कया सूरत के साथ तुमहारी िनगाह भी िबगड गई? मुझे तो वह सबसे बदसुरत मालूम होती है।’ ‘इसिलए िक तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आतमा देखता हू ।ं ’ ‘अचछा. तुम कहती हो िक कोई अनतर ही नही। िविपन मै तो अब कभी बाहर न िनकलूगं ा। ईशवर ने मुझे सचमुच दंड िदया। बहु त यतन िकए गए पर िविपन का मुंह सीधा न हु आ। मुखय का बायां भाग इतना टेढा हो गया था िक चेहरा देखकर डर मालूम होता था। हां.−−वाह. अब तो तुमहे उनका मुंह जरा भी अचछा न लगता होगा। आशा ने गमभीर होकर कहा−−मुझे तो पहले से कही मुंह जरा भी अचछा न लगता होगा। ‘चलो. यही िमसेज िविपन है?’ ‘जी हां. सच कहती हु ं.

यह उसके िलए ‘कमपलसरी’ िवषय नही. खाओं कमाओं. लेिकन लडको को देखो तो जैसे सूखो का रोग लगा हो और लडकी शुकल पक का चांद हो रही थी। बहु त दौड−धूप करने पर बचारे को एक लडका िमला। बाप आबकारी के िवभाग मे ४०० र० का नौकर था. लेिकन कनया का िववाह तो करना ही पडेगा. भाई−बंधुओं के िलए संसार मे मुंह िदखाने को नही रहता। कोई अपमान इससे दसु सह. िदन दन ू ी रात चौगुनी. िशकण का भार था. उसको कलंिकत करने का िकसी का साहस नही. कोई बूढे के गले कनया का मढ कर अपना गला छुडाता है. बहु त िकफायत करने पर भी माकूल बचत न हो सकती थी। समबिनधयो का आदर−सतकार न करे तो नही बनता. बिलक कनया के िववाह मे जो तावान उठाया था उसे चक−वृिद बयाज के साथ बेटे के िववाह मे वसूल करने पर किटबद हो जाते है। िकतने ही माता−िपता इसी िचंता मे गहण कर लेता है. कोई िवपित इससे भीषण नही। िकसी भी वयािध की इससे भयंकर कलपना नही की जा सकती। लुतफ तो यह है िक जो लोग बेिटयो के िववाह की किठनाइयो को भोगा चुके होते है वही अपने बेटो के िववाह के अवसर पर िबलकुल भुल जाते है िक हमे िकतनी ठोकरे खानी पडी थी. वह भी खाती थी. इतनी िचंताजनक.उदार की वैवािहक पथा इतनी दिु षत. लडका तो िमला और घरबार−एक भी काटने योगय नही. लडका सुिशिकत। सी से आकार बोले. उनका पालन−पोषण. उदार हदय. जरा भी सहानुभूित नही पकट करते. इतनी भयंकर हो गयी है िहंदिकू समाज कुछ समझ मे नही आता. कया करते ! पहली कनया का िववाह टेढी खीर हो रहा था। यह आवशयक था िक िववाह अचछे घराने मे हो. पात−कुपात के िवचार करने का मौका कहां. अनयथा लोग हंसेगे और अचछे घराने के िलए कम−से−कम पांच हजार का तखमीना था। उधर पुती सयानी होती जाती थी। वह अनाज जो लडके खाते थे . उससे भागकर कहां जायेगे ? अगर िववाह मे िवलमब हु आ और कनया के पांव कही ऊंचे नीचे पड गये तो िफर कुटु मब की नाक कट गयी. नही कह देगे−−बेटा. अब मामुली−मामुली िववाह भी तीन−चार हजार के नीचे तय नही होते । खचर का तो यह हाल है और िशिकत समाज की िनधर नता और दिरदता िदन बढती जाती है। इसका अनत कया होगा ईशवर ही जाने। बेटे एक दजर न भी हो तो माता−िपता का िचंता नही होती। वह अपने ऊपर उनके िववाह−भार का अिनवायर नही समझता. टाट बाहर कर िदया गया। अगर वह इस दघ ु र टना को सफलता के साथ गुप रख सका तब तो कोई बात नही. पावस−काल के जल−गुजरे िक एक या दो हजारो तक नौबत पहु च ं गई है। अभी बहु त िदन नही गुजरे िक एक या दो हजार रपये दहेज केवल बडे घरो की बात थी. कमाई हो तो िववाह कर लेना। बेटो की कुचिरतता कलंक की बात नही समझी जाती. पर खानदानी आदमी थे. पर किठनाई यही है िक लडका 22 . लेिकन अभागयवश यिद वह इसे िछपा न सका. भंडाफोड हो गया तो िफर माता−िपता के िलए. ठे लमठे ल है। मुंशी गुलजारीलाल ऐसे ही हतभागे िपताओं मे थे। यो उनकी िसथित बूरी न थी। दो−ढाई सौ रपये महीने वकालत से पीट लेते थे. उसका सुधार कयोकर हो। िबरले ही ऐसे माता−िपता होगे िजनके सात पुतो के बाद एक भी कनया उतपन हो जाय तो वह सहषर उसका सवागत करे। कनया का जनम होते ही उसके िववाह की िचंता िसर पर सवार हो जाती है और आदमी उसी मे डु बिकयां खाने लगता है। अवसथा इतनी िनराशमय और भयानक हो गई है िक ऐसे माता−िपताओं की कमी नही है जो कनया की मृतयु पर हदय से पसन होते है. वह पितत हो गया. ‘आपशनल’ िवषय है। होगा तो कर देगे. छोटी−छोटी शािदयो पांच सौ से एक हजार तक तय हो जाती थी. िमतो की खाितरदारी न करे तो नही बनता। िफर ईशवर के िदये हु ए दो पुत थे. मानो िसर से बाधा टली। इसका कारण केवल यही है िक देहज की दर.

सादर पणाम। मै आज बहु त असमंजस मे पडकर यह पत िलखने का साहस कर रहा हू ।ं इस धृषता को कमा कीिजएगा। आपके जाने के बाद से मेरे िपताजी और माताजी दोनो मुझ पर िववाह करने के िलए नाना पकार से दबाव डाल रहे है। माताजी रोती है. बस यही कहता है. वह आज िववश होकर आपसे पकट करता हू ं और आपसे सागह िनवेदन करता हू ं िक आप इसे गोपनीय समिझएगा और िकसी दशा मे भी उन लोगो के कानो मे इसकी भनक न पडने दीिजएगा। जो होना है वह तो होगा है .ं पर वह दशा और भी भयंकर होगी. अनयथा आपको पछताना पडेगा। सेवक इ 23 . मै कभी िववाह न करंगा। समझ मे नही आता. उन दोनो ही से मैने अपनी आरोगय−परीका करायी और दोनो ही ने सपष कहा िक तुमहे िसल है। अगर माता−िपता से यह कह दं ू तो वह रो−रो कर मर जायेगे। जब यह िनशचय है िक मै संसार मे थोडे ही िदनो का मेहमान हू ं तो मेरे िलए िववाह की कलपना करना भी पाप है। संभव है िक मै िवशेष पयतन करके साल दो साल जीिवत रहू . पर करे कया? यो उनहोने फलदान तो रख िलया है पर मुझसे कह िदया है िक लडका सवभाव का हठीला है. मैने िकतना समझाया. आजकल के लौडे सैलानी होते है। अंगरेजी पुसतको मे पढते है िक िवलायत मे िकतने ही लोग अिववािहत रहना ही पसंद करते है। बस यही सनक सवार हो जाती है िक िनदरद रहने मे ही जीवन की सुख और शांित है। िजतनी मुसीबते है वह सब िववाह ही मे है। मै भी कालेज मे था तब सोचा करता था िक अकेला रहू गं ा और मजे से सैर−सपाटा करंगा। सी−−है तो वासतव मे बात यही। िववाह ही तो सारी मुसीबतो की जड है। तुमने िववाह न िकया होता तो कयो ये िचंताएं होती ? मै भी कवांरी रहती तो चैन करती। २ सके एक महीना बाद मुंशी गुलजारीलाल के पास वर ने यह पत िलखा−− ‘पूजयवर. िपताजी नाराज होते है। वह समझते है िक मै अपनी िजद के कारण िववाह से भागता हू ।ं कदािचता उनहे यह भी सनदेह हो रहा है िक मेरा चिरत भष हो गया है। मै वासतिवक कारण बताते हु ए डारता हू ं िक इन लोगो को द ु:ख होगा और आशचयर नही िक शोक मे उनके पाणो पर ही बन जाय। इसिलए अब तक मैने जो बात गुप रखी थी. कयोिक अगर कोई संतान हु ई तो वह भी मेरे संसकार से अकाल मृतयु पायेगी और कदािचत् सी को भी इसी रोग−राकस का भकय बनना पडे। मेरे अिववािहत रहने से जो बीतेगी. पहले ही से कयो उनहे शोक मे डु बाऊं। मुझे ५−६ महीनो से यह अनुभव हो रहा है िक मै कय रोग से गिसत हू ।ं उसके सभी लकण पकट होते जाते है। डाकटरो की भी यही राय है। यहां सबसे अनुभवी जो दो डाकटर है. लेिकन िबना कुछ कहे उठाकर चला गया। सी−−देखो. औरो ने समझाया. पर वह टस से मस नही होता। कहता है. इस लडकी के पीछे कया−कया झेलना पडता है? गुलजारीलाल−−कुछ नही. मै अपना िववाह न करंगा। बाप ने समझाया. अगर न मानेगा तो फलदान आपको लौटा िदया जायेगा। सी ने कहा−−तुमने लडके को एकांत मे बुलावकर पूछा नही? गुलजारीलाल−−बुलाया था। बैठा रोता रहा. िफर उठकर चला गया। तुमसे कया कहू ं.कहता है. उसके पैरो पर िगर पडा. मेरी इचछा। मां बाप का एकलौता लडका है। उनकी परम इचछा है िक इसका िववाह हो जाय. िववाह से कयो इतनी घृणा करता है। कोई कारण नही बतलाता. मुझ पर बीतेगी। िववािहत हो जाने से मेरे साथ और कई जीवो का नाश हो जायगा। इसिलए आपसे मेरी पाथर ना है िक मुझे इस बनधन मे डालने के िलए आगह न कीिजए.

िकसी डाकटर को कुछ दे िदलाकर िलखा िलया होगा। शादी के िलए तो इतना आगह हो रहा था. अममां जी दो−एक रोज शोक से िनराहार रह जायेगी. तो? आजकल डाकटरी से सनद ले लेना कौन−सा मुिशकल काम है। सोचेगे. कोई िचंता नही। अगर माता−िपता के इतने कष से एक युवती की पाण−रका हो जाए तो कया छोटी बात है? यह सोचकर वह धीरे से उठा और आकर िपता के सामने खडा हो गया। रात के दस बज गये थे। बाबू दरबारीलाल चारपाई पर लेटे हु ए हु कका पी रहे थे। आज उनहे सारा िदन दौडते गुजरा था। शािमयाना तय िकया. उस अबला पर घोर अतयाचार न करंगा. मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो न रोयेगा। कयो न चलकर िपताजी से कह दं ू? वह एक−दो िदन द ु:खी रहेगे. उसे वैधवय की आग मे न जलाऊंगा। मेरी िजनदगी ही कया. कोई िकसी का भागय थोडे ही पढे बैठा है। गुलजारीलाल−−यही तो मै सोच रहा हू ।ं सी−−न हो िकसी डाकटर से लडके को िदखाओं । कही सचमुच यह बीमारी हो तो बेचारी अमबा कही की न रहे। गुलजारीलाल−तुम भी पागल हो कया? सब हीले−हवाले है। इन छोकरो के िदल का हाल मै खुब जानता हू ।ं सोचता होगा अभी सैर−सपाटे कर रहा हू ं. मेहमान आते−जाते थे और हजारीलाल घर से भागा−भागा िफरता था। कहां चला जाऊं? िववाह की कलपना ही से उसके पाण सूख जाते थे। आह ! उस अबला की कया गित होगी ? जब उसे यह बात मालूम होगी तो वह मुझे अपने मन मे कया कहेगी? कौन इस पाप का पायिशचत करेगा ? नही. लेिकन एक बािलका का जीवन तो सफल हो जाएगा. यिद उन लोगो को उस पर भी िवशवास न आया. आज न मरा कल मरंगा. मगर िकसी ने उसकी बालो पर िवशवास न िकया। मां−बाप से अपनी बीमारी का हाल कहने का उसे साहस न होता था। न जाने उनके िदल पर कया गुजरे . बाजे वालो को बयाना िदया. आितशबाजी. कल नही तो परसो. फुलवारी आिद का पबनध िकया। घंटो बाहमणो के साथ िसर मारते रहे. सारी िवपितयो का अनत कर द।ं ू िपता जी रोयेगे.‘हजारीलाल।’ पत पढकर गुलजारीलाल ने सी की ओर देखा और बोले−−इस पत के िवषय मे तुमहारा कया िवचार है। सी−−मुझे तो ऐसा मालूम होता है िक उसने बहाना रचा है। गुलजारीलाल−−बस−बस. इस वक जरा कमर सीधी कर रहे थे िक सहसा हजारीलाल को सामने देखकर चौक 24 . अममां पाण तयाग देगी. ठीक यही मेरा भी िवचार है। उसने समझा है िक बीमारी का बहाना कर दगं ू ा तो आप ही हट जायेगे। असल मे बीमारी कुछ नही। मैने तो देखा ही था. चेहरा चमक रहा था। बीमार का मुंह िछपा नही रहता। सी−−राम नाम ले के िववाह करो. िववाह हो जायगा तो यह गुलछरे कैसे उडेगे! सी−−तो शुभ मुहूतर देखकर लग िभजवाने की तैयारी करो। ३ हजारीलाल बडे धमर −सनदेह मे था। उसके पैरो मे जबरदसती िववाह की बेडी डाली जा रही थी और वह कुछ न कर सकता था। उसने ससुर का अपना कचचा िचटा कह सुनाया. न जाने कया कर बैठे? कभी सोचता िकसी डाकटर की शहदत लेकर ससूर के पास भेज दं ू . उधर डाकटरो ने सपष कह िदया था िक अगर तुमने शादी की तो तुमहारा जीवन−सुत और भी िनबर ल हो जाएगा। महीनो की जगह िदनो मे वारा−नयारा हो जाने की समभावाना है। लग आ चुकी थी। िववाह की तैयािरयां हो रही थी. तो कयो न आज ही मर जाऊं। आज ही जीवन का और उसके साथ सारी िचंताओं को. मगर िफर धयान आता.

पर एक ऐसी बात है. इस इशा मे तो िववाह करना और भी आवशयक है। ईशवर न करे िक हम वह बुरा िदन देखने के िलए जीते रहे. आिद या और कोई नई बात ? हजारीलाल−−जी नही नई बात है। मै आपकी आजा पालन करने के िलए सब पकार तैयार हू ं. िजसे मैने अब तक िछपाया था. मै इसके अयोगय हू ं. पर िववाह हो जाने से तुमहारी कोई िनशानी तो रह जाएगी। ईशवर ने कोई संतान दे दी तो वही हमारे बुढापे की लाठी होगी. पर हजारीलाल कुछ िनशचय न कर सका। िववाह की तैयािरयो मे रखे जा चुके थे। मंतेयी की पूजा हो चूकी थी और दार पर बाजो का शोर मचा हु आ था। मुहले के लडके जमा होकर बाजा सुनते थे और उलास से इधर−उधर दौडते थे। संधया हो गयी थी। बरात आज रात की गाडी से जाने वाली थी। बराितयो ने अपने वसाभूषण पहनने शुर िकये। कोई नाई से बाल बनवाता था और चाहता था िक खत ऐसा साफ हो जाय मानो वहां बाल कभी थे ही नही. भाड मे झोकना है. बेडी मेरी गदर न को तोड देगी. हम जो कुछ करते है. करने दो। भगवान चाहेगे तो सब कलयाण ही होगा। हजारीलाल ने इसका कोई उतर नही िदया। आं खे डबडबा आयी. यह कौन कह सकता है ? डाकटर िकसी की कमर −रेखा तो नही पढते. जीवन का कुछ आधार तो रहेगा। िफर आगे कया होगा. डाकटरो की राय भी बयान की और अनत मे बोले−−ऐसी दशा मे मुझे पूरी आशा है िक आप मुझे िववाह करने के िलए बाधय न करेगे। दरबारीलाल ने पुत के मुख की और गौर से देखा. कर अपनी पुती का वैधवय् के 25 . अपनी उमंग मे इनहे इतना भी नही सूझता िक वधु पर कया गुजरेगी। वधू के माता−िपता िकतने अदरू शी है. पर अपना अिवशवास िछपाने और अपना हािदर क शोक पकट करने के िलए वह कई िमनट तक गहरी िचंता मे मग रहे। इसके बाद पीिडत कंठ से बोले−−बेटा. तबीयत तो अचछी है न? कुछ उदास मालूम होते हो। हजारीलाल−−मै आपसे कुछ कहना चाहता हू ं. कंु द छुरे से रेतना है। कोई यातना इतनी दसु सह. डाकटर उसे नही समझ सकते । तुम िनिशचंत होकर बैठो. कंठावरोध के कारण मुंह तक न खोल सका। चुपके से आकर अपने कमरे मे लेट रहा। तीन िदन और गुजर गये. मै यह भार सह नही सकता. कहे जदी का नाम न था. जान कर नही जानते। कया यह िववाह है? कदािप नही। यह तो लडकी का कुएं मे डालना है. उसे भी पकट कर देना चाहता हू ।ं इसके बाद आप जो कुछ िनशचय करेगे उसे मै िशरोधायर करंगा। हजारीलाल ने बडे िवनीत शबदो मे अपना आशय कहा. कोई सुनने वाला न था। उसने सोचा हमारे माता−िपता िकतने अदरु दशी है. बुढे अपने पके बाल को उखडवा कर जवान बनने की चेषा कर रहे थे। तेल. कया करं? अिनतम िनशचय की घडी िसर पर खडी थी। अब एक कण भी िवलमब करने का मौका न था। अपनी वेदना िकससे कहे. उबटन की लूट मची हु ई थी और हजारीलाल बगीचे मे एक वृक के नीचे उदास बैठा हु आ सोच रहा था.पडे। उसका उतरा हु आ चेहरा सजल आं खे और कंु िठत मुख देखा तो कुछ िचंितत होकर बोले−−कयो लालू. उसी का मुंह देखरेख कर िदल को समझायेगे. इस कथन पर िवशवास न आया. साबुन. अपनी उमंग मे भी इतने अनधे हो रहे है िक देखकर भी नही देखते. वही पुरानी बात है न ? उसके िसवा कोई दस ू री बात हो शौक से कहो। हजारीलाल−−खेद है िक मै उसी िवषय मे कुछ कहना चाहता हू ।ं दरबारीलाल−−यही कहना चाहता हो न मुझे इस बनधन मे न डािलए. ईशवर की लीला अपरमपार है. पर भय होता है िक कही आप अपसन न हो। दरबारीलाल−−समझ गया.

जीवनदाता. छावनी रेलवे से एक मील पिशचम की ओर सडक पर कुछ हिडयां िमली। लोगो को अनुमान हु आ िक हजारीलाल ने गाडी के नीचे दबकर जान दी. कसाई है. पुिलस मे हु िलया गया. हतयारे है। कया इनके िलए कोई दणड नही ? जो जान−बूझ कर अपनी िपय संतान के खुन से अपने हाथ रंगते है. उसके िलए कोई दणड नही? समाज भी उनहे दणड नही देता. कोई कुछ नही कहता। हाय ! यह सोचकर हजारीलाल उठा और एक ओर चुपचाप चल िदया। उसके मुख पर तेज छाया हु आ था। उसने आतम−बिलदान से इस कष का िनवारण करने का दढ संकलप कर िलया था। उसे मृतयु का लेश−मात भी भय न था। वह उस दशा का पहु च ं गया था जब सारी आशाएं मृतयु पर ही अवलिमबत हो जाती है। उस िदन से िफर िकसी ने हजारीलाल की सूरत नही देखी। मालूम नही जमीन खा गई या आसमान। नािदयो मे जाल डाले गए. पर कही पता न चला । कई हफतो के बाद. देवता थे. मुझे अथाह जल मे डु बने से बचाने वाले.अिग−कंु ड मे डाल देते है। यह माता−िपता है? कदािप नही। यह लडकी के शतु है. िजसने अपने कलयाण के िनिमत अपने पाण तक समपर ण कर िदए। पित ने पूछा−−दरबारी लाल तुमहारी चचा है। अमबा−−हां। पित−−इस पत मे हजारीलाल का नाम िलखा है. बिधक है. बडी उमंगो से वत रखा था। सहसा उसके पित ने अनदर आ कर उसे सहास नेतो से देखा और बोला−−मुंशी दरबारी लाल तुमहारे कौन होते है. कुओं मे बांस पड गए. मुझे सौभागय का वरदान देने वाले। पित ने इस भाव कहा मानो कोई भूली हु ई बात याद आ गई हो−−आह! मै समझ गया। वासतव मे वह मनुषय नही देवता थे। 26 . यह उनके यहां से तुमहारे िलए तीज पठौनी आयी है। अभी डािकया दे गया है। यह कहकर उसने एक पासर ल चारपाई पर रख िदया। दरबारीलाल का नाम सुनते ही अमबा की आं खे सजल हो गयी। वह लपकी हु यी आयी और पासर ल समृितयां जीिवत हो गयी. हदय मे हजारीलाल के पित शदा का एक उद्−गार−सा उठ पडा। आह! यह उसी देवातमा के आतमबिलदान का पुनीत फल है िक मुझे यह िदन देखना नसीब हु आ। ईशवर उनहे सद्−गित दे। वह आदमी नही. मेरे परम दयालु उदारक. समाचार−पतो मे िवजिप िनकाली गई. यह कौन है? अमबा−−यह मुंशी दरबारी लाल के बेटे है। पित−−तुमहारे चचरे भाई ? अमबा−−नही. पर िनिशचत रप से कुछ न मालुम हु आ। भादो का महीना था और तीज का िदन था। घरो मे सफाई हो रही थी। सौभागयवती रमिणयां सोलहो शृंगार िकए गंगा−सनान करने जा रही थी। अमबा सनान करके लौट आयी थी और तुलसी के कचचे चबूतरे के सामने खडी वंदना कर रही थी। पितगृह मे उसे यह पहली ही तीज थी.

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