पेम चं द

कम
िनवारसन
नैराशय लीला
कौशल़
सवर ग की देवी
आधार

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मै भेजने का पबनध नही कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी है. िफर आगह िकस मुंह से करती? यह बात भी है िक बहु त-सी 3 . मै अपने गहने बेचकर अदा कर दगं ू ी? मयारदा—सब िसयां कहने लगी.. तुमहारेक घर के लोग कही खो तो नही गए है? मैने कहा—हां। तब उसने तुमहारा नाम. िफर अवसर न िमलेगा? परशुराम—हां. पर तुम न िदखाई िदये। परशुराम – अचछा तब? मयारदा—तब मै एक िकनारे बैठकर रोने लगी. िकसके साथ रही. कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रपए िमल जाते। मयारदा—आदमी तो नही थे। परशुराम—तुमने यह कहा था िक खचर की कुछ िचनता न कीिजए. जब तक मेला न खतम हो जाए और सब खोयी हु ई िसयां एकत न हो जाएं . पता. कुछ मेरे नौकरी या मजूर नही है. मै पीछे िफर-िफर कर तुमहे देखता जाता था. िकससे कहू ं. नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौडने लगे। मै भी धकके मे पडकर जाने िकधर चली गई। जरा भीड कम हु ई तो तुमहे ढू ंढने लगी। बासू का नाम ले-ले कर पुकारने लगी. कुछ सूझ ही न पडता िक कहां जाऊं. घबरायी कयो जाती हो? यहां िकस बात का डर है। हम सभी जलद अपने घर पहु च ं ना चाहती है. आदिमयो से डर लगता था। संधया तक वही बैठी रोती रही।ैै परशुराम—इतना तूल कयो देती हो? वहां से िफर कहां गयी? मयारदा—संधया को एक युवक ने आ कर मुझसे पूछा. लेिकन वह यह कहते रहे. मै तुमहे तुमहारे घर भेज दगं ू ा। परशुराम—वह आदमी कौन था? मयारदा—वहां की सेवा-सिमित का सवयंसेवक था। परशुराम –तो तुम उसके साथ हो ली? मयारदा—और कया करती? वह मुझे सिमित के कायर लय मे ले गया। वहां एक शािमयाने मे एक लमबी दाढीवाला मनुषय बैठा हु आ कुछ िलख रहा था। वही उन सेवको का अधयक था। और भी िकतने ही सेवक वहां खडे थे। उसने मेरा पता-िठकाना रिजसटर मे िलखकर मुझे एक अलग शािमयाने मे भेज िदया. यही बात है। तुम सनान करके नदी से तो मेरे साथ ही िनकली थी। मेरे पीछे -पीछे कुछ देर तक आयी भी. कया मुझमे कुछ छूत लग गई! परशुराम—पहले यह बताओं तुम इतने िदनो से कहां रही. जहां और भी िकतनी खोयी हु ई िसयो बैठी हु ई थी। परशुराम—तुमने उसी वक अधयक से कयो न कहा िक मुझे पहु च ं ा दीिजए? पयारदा—मैने एक बार नही सैकडो बार कहा.िफर एकाएक तुम कहां गायब हो गयी? मयारदा – तुमने देखा नही. िठकाना पूछा। उसने सब एक िकताब पर िलख िलया और मुझसे बोला—मेरे साथ आओ. मगर कया करे? तब मै भी चुप हो रही। परशुराम – और सब िसयां कुएं मे िगर पडती तो तुम भी िगर पडती? मयारदा—जानती तो थी िक यह लोग धमर के नाते मेरी रका कर रहे है. िकस तरह रही और िफर यहां िकसके साथ आयी? तब.िनवारस न परशुराम –वही—वही दालान मे ठहरो! मयारदा—कयो..देखी जाएगी। मयारदा—कया इन बातो को पूछने का यही वक है. तब िवचार. न इतना धन? परशुराम—धन की तुमहे कया कमी थी.

शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगो को ले कर सटेशन पर आए। परशुराम—मगर तुम तो आज सातवे िदन आ रही हो और वह भी अकेली? मयारदा—सटेशन पर एक दघ ु र टना हो गयी। परशुराम—हां. जब एक मिहला के पेट मे ददर होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएं िपलाने आए थे। परशुराम—िनकली न वही बात!मै इन धूतो ं की नस-नस पहचानता हू ।ं िवशेषकर ितलक-मालाधारी दिढयलो को मै गुर घंटाल ही समझता हू ।ं तो वे महाशय कई बार दवाई देने गये? कयो तुमहारे पेट मे तो ददर नही होने लगा था. चली जाओं. कोई कष न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हु आ होगा? मयारदा—गाना बजाना तो नही. गोरे-गोरे लमबे-से खूबसूरत आदमी है. हां. तुम रात-भर वहां रही। दस ू रे िदन कया हु आ? मयारदा—दस ू रे िदन भी वही रही। एक सवयंसेवक हम सब िसयो को साथ मे लेकर मुखय-मुखय पिवत सथानो का दशर न कराने गया। दो पहर को लौट कर सबो ने भोजन िकया। परशुराम—तो वहां तुमने सैर-सपाटा भी खूब िकया. तुम बाबूजी को जानते हो? वह हंसकर बोला. सब अपना-अपना दख ु डा रोती रही. जब यह लोग पहु च ं ाने की कहते ही है तो तार कयो दं ू? परशुराम—खैर. वह दाढी वाला अधयक तो जरर ही देखभाल करने गया होगा? मयारदा—हां. यह तो मै समझ ही रहा था। कया दघ ु र टना हु ई? मयारदा—जब सेवक िटकट लेने जा रहा था. झवाई टोले मे। तुमहारा हु िलया उसने ऐसा ठीक बयान िकया िक मुझे उसस पर िवशवास आ गया। मै सामने आकर बोली. वहां सब देवता ही देवता जमा थे। खैर. जब हम सबो ने खाने से इनकार कर िदया तो वह चला गया और िफर कोई न आया। मै रात-भर जगती रही। परशुराम—यह मै कभी न मानूंगा िक इतने युवक वहां थे और कोई अनदर न गया होगा। सिमित के युवक आकाश के देवता नही होत। खैर. वह आते थे। पर दार पर से पूछ-पूछ कर लौट जाते थे। हां. रात को तुम वही रही। युवक बार-बार भीतर आते रहे होगे? मयारदा—केवल एक बार एक सेवक भोजन के िलए पूछने आयास था. जानता नही हू ं तो तुमहे तलाश कयो करता िफरता हू ।ं तुमहारा बचचा रो-रो कर हलकान हो रहा है। सब औरते कहने लगी. तो एक आदमी ने आ कर उससे कहा —यहां गोपीनाथ के धमर शाला मे एक आदमी ठहरे हु ए है.? मयारदा—तुम एक साधु पुरष पर आकेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे. तुमहारे सवामीजी घबरा रहे होगे। सवयंसेवक ने उससे दो-चार बाते पूछ कर मुझे उसके साथ कर िदया। मुझे कया मालूम था िक मै िकसी नर-िपशाच के हाथो पडी जाती हू ।ं िदल मै खुशी थी िकअब बासू को देखंग ू ी तुमहारे दशर न करंगी। शायद इसी उतसुकता ने मुझे असावधान कर िदया। परशुराम—तो तुम उस आदमी के साथ चल दी? वह कौन था? 4 . तुमने मुझे तार कयो न िदलवा िदया? मयारदा—मैने समझा. इससे बढकर तसकीन की और कया बात हो सकती थी? अचछा. उनकी सी खो गयी है. दस ू रे आं खे नीची िकए रहने के िसवाय कभी िकसी पर सीधी िनगाह नही करते थे। परशुराम—हां. वहां के िदन तसकीन का आननद उठाती रही? मेला तो दस ू रे ही िदन उठ गया होगा? मयारदा—रात.िसयो को वहां देखकर मुझे कुछ तसली हो गईग् परशुराम—हां. उनका भला-सास नाम है.भर मै िसयो के साथ उसी शािमयाने मे रही। परशुराम—अचछा. लखनऊ मकान है.

मयारदा—कया बतलाऊं कौन था? मै तो समझती हू ं. मगर यहां कोई तुमहारी मदद को न आयेगा। तुमहाराएक घर डू ट गया। हम तुमहे उससे कही अचछा घर देगे जहां तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। लब मैने देखा िकक यहां से िकसी तरह नही िनकल सकती तो मैने कौशल करने का िनशचय िकया। परशुराम—खैर. उसने मुझे तांगे पर बैठाया और एक तंग गली मे. वह तो अभी रोते-रोते सो गया। भाभी—कुछ मयारदा का पता िमला? अब पता िमले तो भी तुमहारे िकस काम की। घर से िनकली िसयां थान से छूटी हु ई घोडी है। िजसका कुछ भरोसा नही। परशुराम—कहां से कहां लेकर मै उसे नहाने लगा। भाभी—होनहार है. तो मै जाती हू ।ं मयारदा—(बाहर आकर) होनहार नही हू ं. भैया होनहार। अचछा. तुम मेरे िलए िफर वह नही िनकल सकती जो पहले थी। इस घर मे तुमहारे िलए सथान नही है। मयारदा—सवामी जी. कोई दलाल था? परशुराम—तुमहे यह न सूझी िक उससे कहती. तुम यही बैठो. मुमहारे बाबूजी यही आयेगे। अब मुझे िविदत हु आ िक मुझे धोखा िदया गया। रोने लगी। वह आदमी थोडी देर बाद चला गया और एक बुिढया आ कर मुझे भांित-भांित के पलोभन देने लगी। सारी रात रो-रोकर काटी दस ू रे िदन दोनो िफर मुझे समझाने लगे िक रो-रो कर जान दे दोगी. देवी-देवताओं को पहले ही िवदा कर चुका:पर िजस सी पर दस ू री 5 . िक मैने उसे अपना अंग भी सपशर नही करने िदया। पराशुराम—उसका हु िलया बयान कर सकती हो। मयारदा—सांवला सा छोटे डील डौल काआदमी था।नीचा कुरता पहने हु ए था। परशुराम—गले मे ताबीज भी थी? मयारदा—हां. यह अनयाय न कीिजए.थी तो। परशुराम—वह धमर शाले का मेहतर था।मैने उसे तुमहारे गुम हो जाने की चचार की थी। वहउस दषु ने उसका वह सवांग रचा। मयारदा—मुझे तो वह कोई बहण मालूम होता था। परशुराम—नही मेहतर था। वह तुमहे अपने घर ले गया? मयारदा—हां. पर मेरा हदय तुमसे घृणा करता है. तुमहारी चाल है। वासुदेव को पयार करने के बहाने तुम इस घर पर अिधकार जमाना चाहती हो। परशुराम –बको मत! वह दलाल तुमहे कहां ले गया। मयारदा—सवामी. जा कर बाबू जी को भेज दो? मयारदा—अिदन आते है तो बुिद भष हो जाती है। परशुराम—कोई आ रहा है। मयारदा—मै गुसलखाने मे िछपी जाती हू ।ं परशुराम –आओ भाभी. मै आपकी वही सी हू ं जो पहले थी। सोिचए मेरी दशा कया होगी? परशुराम—मै यह सब सोच चुका और िनशचय कर चुका। आज छ: िदन से यह सोच रहा हू ।ं तुम जानती हो िक मुझे समाज का भय नही। छूत-िवचार को मैने पहले ही ितलांजली दे दी. कया अभी सोयी नही. सुन चुका। मै तुमहारा ही कहना मान लेता हू ं िक तुमने अपने सतीतव की रका की. दस तो बज गए होगे। भाभी—वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया. मुझे कहते लजज आती है। परशुराम—यहां आते तो और भी लजज आनी चािहए थी। मयारदा—मै परमातमा को साकी देती हू ं. एक छोटे.से मकान के अनदर ले जाकर बोला. यह न पूिछए. कया सो गया? परशुराम—हां.

तुमहारी इचछा हो तो दरू से देख सकती हो। मयारदा—तो जाने दो. मेरा दोष नही। मयारदा—मेरी िववशमा पर आपको जरा भी दया नही आती? परशुराम—जहां घृणा है. न देखूंगी। समझ लूगं ी िक िवधवा हू ं और बांझ भी। चलो मन. िकसी मुसलमान ने जबरदसती मुझे अपना उिचछट भोलन िखला िदयया होता तो मुझे सवीकार करती? मयारदा—वह.. रहे तो जनम-जनमानतर तक रहे: टू टे तो कण-भर मे टू ट जाए। तुमही बताओं .. अब इस घर मे तुमहारा िनबाह नही है। चलो जहां भागय ले जाय। 6 . वहां तकर और नयाय से काम नही चलता। यहां तक अगर कोई कह दे िक तुमहारे पानी को मेहतर ने छू िनया है तब भी उसे गहण करने से तुमहे घृणा आयेगी। अपने ही िदन से सोचो िक तुमहारेसाथ नयाय कर रहा हू ं या अनयाय। मयारदा—मै तुमहारी छुई चीजे न खाती. उसे अंगीकार करना मेरे िलए असमभव है। अगर अनयाय है तो ईशवर की ओर से है.िनगाहे पड चुकी. तुमसे पृथक रहती पर तुमहे घर से तो न िनकाल सकती थी। मुझे इसिलए न दतु कार रहे हो िक तुम घर के सवामी हो और िक मै इसका पलन करतजा हू ।ं परशुराम—यह बात नही है। मै इतना नीच नही हू ।ं मयारदा—तो तुमहारा यही अितमं िनशचय है? परशुराम—हां. तुमहे अन-वस का कष न होगा पर तुम मेरी सी नही हो सकती। मयारदा—मै अपने पुत का मुह न देखूं अगर िकसी ने सपशर भी िकया हो। परशुराम—तुमहारा िकसी अनय पुरष के साथ कण-भर भी एकानत मे रहना तुमहारे पितवत को नष करने के िलए बहु त है। यह िविचत बंधन है. तो दस ू री बात है। परशुराम—नही.जानते हो इसका पिरणाम कया होगा? परशुराम—जानता भी हू ं और नही भी जानता। मयारदा—मुझे वासुदेव ले जाने दोगे? परशुराम—वासुदेव मेरा पुत है। मयारदा—उसे एक बार पयार कर लेने दोगे? परशुराम—अपनी इचछा से नही. एक ही बात है। जहां भावो का समबनध है. जो एक सपाह तक न-जाने कहां और िकस दशा मे रही. वह. वहां दया कहां? मै अब भी तुमहारा भरण-पोषण करने को तैयार हू ।ं जब तक जीऊगां. अंितम। मयारदा-...

अचछी िशका पायी थी। संसार का काफी तरजुरबा था. पित के िवचार उसके िवचार और पित की इचछा उसकी इचछा थी. पर िकयातमक शिकत् से विचत थे. िजतने समानयत: िशिकत लोग हु आ करते है। इसका कदािचत् यह कारण था िक एक कनया के िसवा उनके और कोई सनतान न थी। उनका िववाह तेरहवे वषर मे हो गया था और माता-िपता की अब यही लालसा थी िक भगवान इसे पुतवती करे तो हम लोग नवासे के नाम अपना सब-कुछ िलख िलखाकर िनिशचत हो जाये। िकनतु िवधाता को कुछ और ही मनजूर था। कैलाश कुमारी का अभी गौना भी न हु आ था. इस वजाघात ने उसके हदय को टु कडे-टु कडे कर डाला है। एक िदन हदयनाथ ने जागेशवरी से कहा—जी चाहता है घर छोड कर कही भाग जाऊं। इसका कष अब नही देखा जाता। जागेशवरी—मेरी तो भगवान से यही पाथनार है िक मुझे संसार से उठा ले। कहां तक छाती पर पतथर कीस िसल रखूं। 7 . दोनो धमर िनष थे। उससे कही अिधक .नै र ाशय लीला पं िडत हदयनाथ अयोधया के एक सममािनत पुरष थे। धनवान तो नही लेिकन खाने िपने से खुश थे। कई मकान थे. वह आप ही मेरे िलए एक न एक चीज िनतय लाते रहते है? कया मै अब कुछ और हो जाऊगी? इधर माता का यहा हाल था िक बेटी की सूरत देखते ही आं खो से आं सू की झडी लग जाती। बाप की दशा और भी करणाजनक थी। घर मे आना-जाना छोड िदया। िसर पर हाथ धरे कमरे मे अकेले उदास बैठे रहते। उसे िवशेष द ु:ख इस बात का था िक सहेिलयां भी अब उसके साथ खेलने न आती। उसने उनके घर लाने की माता से आजा मांगी तो फूट-फूट कर रोने लगी माता-िपता की यह दशा देखी तो उसने उनके सामने जाना छोड िदया. शायद यह लोग इसिलए रोते है िक कही मै कोई ऐसी चीज न मांग बैठूं िजसे वह दे न सके। तो मै ऐसी चीज मांगूगी ही कयो? मै अब भी तो उन से कुछ नही मांगती. सीयां पित के मरने पर इसिलए राती है िक वह उनका और बचचो का पालन करता है। मेरे घर मे िकस बात की कमी है ? मुझे इसकी कया िचनता है िक खायेगे कया. पर कैलाशकुमारी भौचककी हो-हो कर सबके मुंह की ओर ताकती थी। उसकी समझ मे यह न आता था िक ये लोग रोते कयो है। मां बाप की इकलौती बेटी थी। मां -बाप के अितिरक वह िकसी तीसरे वयिक को उपने िलए आवशयक न समझती थी। उसकी सुख कलपनाओं मे अभी तक पित का पवेश न हु आ था। वह समझती थी. सब कुछ न जानते थे। समाज उनकी आं खो मे एक भयंकर भूत था िजससे सदैव डरना चािहए। उसे जरा भी रष िकया तो िफर जाने की खैर नही। उनकी सी जागेशवरी उनका पितिबमब. बैठी िकससे कहािनयां पढा करती। उसकी एकांतिपयता का मां-बाप ने कुछ और ही अथर समझा। लडकी शोक के मारे घुली जाती है. मां के पेम से । कभी सोचती. वह अभी तक यह भी न जानने पायी थी िक िववाह का आशय कया है िक उसका सोहाग उठ गया। वैधवय ने उसके जीवन की अिभलाषाओं का दीपक बुझा िदया। माता और िपता िवलाप कर रहे थे. उनही के िकराये पर गुजर होता था। इधर िकराये बढ गये थे. पहनेगे कया? मुढरे िजस चीज की जररत होगी बाबूजी तुरनत ला देगे. पती के शोक से नही. दोनो पािणयो मे कभी मतभेद न होता था। जागेशचरी िखव की उपासक थी। हदयनाथ वैषणव थे. उनहोने अपनी सवारी भी रख ली थी। बहु त िवचार शील आदमी थे . अममा से जो चीज मागूगं ी वह दे देगी। िफर रोऊं कयो?वह अपनी मां को रोते देखती तो रोती. घर मे कुहराम मचा हु आ था.

इ 8 . तीथर -वत है. अचछे -अचछे दशय जमा करगां। गामोफोन तो अज ही मगवाये देता हू ।ं बस उसे हर वक िकसी न िकसी कात मे लगाये रहना चािहए। एकातंवास शोक-जवाला के िलए समीर के समान है। उस िदन से जागेशवरी ने कैलाश कुमारी के िलए िवनोद और पमोद के समान लमा करनेशुर िकये। कैलासी मां के पास आती तो उसकी आं खो मे आसू की बूद ं े न देखती. िजसमे शोकमय िवचार आने ही न पाये। हम लोगो को द ु:खी और रोते देख कर उसका द ु:ख और भी दारण हो जाता है। जागेशवरी—मेरी तो बुिद कुछ काम नही करती। हदयनाथ—हम लोग यो ही मातम करते रहे तो लडंकी की जान पर बन जायेगी। अब कभी कभी िथएटर िदखा िदया. कभी घर मे गाना-बजाना करा िदया। इन बातो से उसका िदल बहलता रहेगा। जागेशवरी—मै तो उसे देखते ही रो पडती हू ।ं लेिकन अब जबत करंगी तुमहारा िवचार बहु त अचछा है। िवना िदल बहलाव के उसका शोक न दरू होगा। हदयनाथ—मै भी अब उससे िदल बहलाने वाली बाते िकया करगां। कल एक सैरबी लाऊगा. तुमहे आज काशमीर के दशय िदखाऊं: कभी गामोफोन बजाकर उसे सुनाते। कैलासी इन सैर-सपाटो का खूब आनद उठाती। अतने सुख से उसके िदन कभी न गुजरे थे। 2 स भांित दो वषर बीत गये। कैलासी सैर-तमाशे की इतनी आिद हो गयी िक एक िदन भी िथएटर न जाती तो बेकल-ससी होने लगती। मनोरंजन नवीननता का दास है और समानता का शतु। िथएटरो के बाद िसनेमा की सनक सवार हु ई। िसनेमा के बाद िमसमेिरजम और िहपनोिटजम के तमाशो की सनक सवार हु ई। िसनेमा के बाद िमसमेिरजम और िहपनोिटजम के तमाशो की। गामोफोन के नये िरकाडर आने लगे। संगीत का चसका पड गया। िबरादरी मे कही उतसव होता तो मां-बेटी अवशसय जाती। कैलासी िनतय इसी नशे मे डू बी रहती. चलो देख आये। कभी गंगा-सनान की ठहरती. वहां मांबेटी िकशती पर बैठकर नदी मे जल िवहार करती. होठो पर हंसी की आभा िदखाई देती। वह मुसकरा कर कहती –बेटी. िकसी से बाते करती तो वही िथएटर की और िसनेमा की। भौितक संसार से अब कोई वासता न था. चलती तो कुछ गुनगुनती हु ई. आज िथएटर मे बहु त अचछा तमाशा होने वाला है. िकसी के द :ु ख पर जरा दया न आती। सवभाव मे उचछृंखलता का िवकास हु आ. अब उसका िनवास कलपना संसार मे था। दस ू रे लोक की िनवािसन होकर उसे पािणयो से कोई सहानुभूित न रही. कभी दोनो संधया-समय पाकै की ओर चली जाती। धीरे-धीरे सहेिलयां भी आने लगी। कभी सब की सब बैठकर ताश खेलती। कभी गाती-बजाती। पिणडत हदय नाथ ने भी िवनोद की सामिगयां जुटायी। कैलासी को देखते ही मग होकर बोलते—बेटी आओ. यहां के लोग मूखर है.हदयनाथ—िकसी भाितं इसका मन बहलाना चािहए. मानो िकसी बात की िचंता ही नही। यहां िकसी को इसका रस ही नही। िजनहे भगवान ने सामथयर भी िदया है वह भी सरंशाम से मुह ढांक कर पडे रहमे है। सहेिलयां कैलासी की यह गवर -पूणर बाते सुनती और उसकी और भी पशंसा करती। वह उनका अपमान करने के आवेश मे आप ही हासयासपद बन जाती थी। पडोिसयो मे इन सैर-सपाटो की चचार होने लगी। लोक-सममित िकसी की िरआयत नही करती। िकसी ने िसर पर टोपी टेढी रखी और पडोिसयो की आं खो मे खुबा कोई जरा अकड कर चला और पडोिसयो ने अवाजे कसी। िवधवा के िलए पूजा-पाठ है. अपनी सुरिच पर गवर करने लगी। सहेिलयो से डीगे मारती. यह िसनेमा की कद कया करेगे। इसकी कद तो पिशचम के लोग करते है। वहां मनोरंजन की सामािगयां उतनी ही आवशयक है िजतनी हवा। जभी तो वे उतने पसनन-िचत रहते है.

कोई कहां तक बाते करे? दस ू री देवी ने आं खे मटकाते हु ए कहा—अरे.मोटा खाना पहनना है. लेिकन मां कैसी है। उसको जरा भी िवचार नही िक दिु नयां कया कहेगी। कुछ उनही की एक दल ु ारी बेटी थोडे ही है . दिु नया मे िकतना ही उपहास हो रहा हो. वैसा िदल चािहए। तुमहे तो कोई राजिसंहासन पर िबठा दे तब भी तसकीन न होगी। तब और भी हाय-हाय करोगी। इस पर एक वृदा ने कहा—नौज ऐसा िदल: यह भी कोई िदल है िक घर मे चाहे आग लग जाय. राग और रंग की कया जररत? िवधाता ने उसके दार बंद िर िदये है। लडकी पयारी सही. तो यह तो बदे की बात है। सभी के िदन हंसी-खुंशी से कटे तो रोये कौन। यहां तो सुबह से शाम तक चककी-चूलहे से छुटी नही िमलती: िकसी बचचे को दसत आ रहे तो िकसी को जवर चढा हु आ है: कोई िमठाइयो की रट कहा है: तो कोई पैसो के िलए महानामथ मचाये हु ए है। िदन भर हाय-हाय करते बीत जाता है। सारे िदन कठपुतिलयो की भांित नाचती रहती हू ।ं तीसरी रमणी ने इस कथन का रहसयमय भाव से िवरोध िकया—बदे की बात नही. तुमही मजे मे हो िक हंसी-खुसी मे िदन काट देती हो। हमुं तो िदन पहाड हो जाता है। न कोई काम न धंधा. लेिकन आदमी अपने राग-रंग मे मसत रह। वह िदल है िक पतथर : हम गृिहणी कहलाती है. लेिकन शमर और हया भी कोई चीज होती है। जब मां-बाप ही उसे िसर चढाये हु ए है तो उसका कया दोष? मगर एक िदन आं खे खुलेगी अवशय।मिहलाएं कहती. इस भांितमन बढाना अचछा नही। कुद िदनो तक तो यह िखचडी आपस मे पकती रही। अंत को एक िदन कई मिहलाओं ने जागेशवरी के घर पदापर ण िकया। जागेशवरी ने उनका बडा आदर-सतकार िकया। कुछ देर तक इधर-उधर की बाते करने के बाद एक मिहला बोली—मिहलाएं रहसय की बाते करने मे बहु त अभयसत होती है—बहन. उसे िवनोदऔर िवलास. हमारा काम है अपनी गृहसथी मे रत रहना। आमोद-पमोद मे िदन काटना हमारा काम नही। और मिहलाओं ने इन िनदर य वयंगय पर लिजजत हो कर िसर झुका िलया। वे जागेशवरी की चटु िकयां लेना चाहती थी। उसके साथ िबली और चूहे की िनदर यी कीडा करना चाहती थी। आहत को तडपाना उनका उदेशय था। इस खुली हु ई चोट ने उनके पर-पीडन पेम के िलए कोई गुज ं ाइश न छोडी: िकंतु जागेशवरी को ताडना िमल गयी। िसयो के िवदा होने के बाद उसने जाकर पित से यह सारी कथा सुनायी। हदयनाथ उन पुरषो मे न थे जो पतयेक अवसर पर अपनी आितमक सवाधीनता का सवांग भरते है. बाप तो मदर है. हठधमी को आतम-सवातनतय के नाम से िछपाते है। वह सिचनत भाव से बोले---तो अब कया होगा? जागेशवरी—तुमही कोई उपाय सोचो। हदयनाथ—पडोिसयो ने जो आकेप िकया है वह सवथार उिचत है। कैलाशकुमारी के सवभाव मे मुझे एक सिविचत अनतर िदखाई दे रहा है। मुझे सवंम जात हो रहा है िक उसके मन बहलाव के िलए हम लोगो ने जो उपाय िनकाला है वह मुनािसब नही है। उनका यह कथन सतय है िक िवधवाओं के िलए आमोद-पामोद विजर त है। अब हमे यह पिरपाटी छोडनी पडेगी। जागेशवरी—लेिकन कैलासी तो अन खेल-तमाशो के िबना एक िदन भी नही रह सकती। हदयनाथ—उसकी मनोवृितयो को बदलना पडेगा। 3 9 .

संसम उपासना मे मां-बेटी रत रहने लगी। कैलासी को गुर जी ने दीका दी. भिक और उपासना से होगा। कुछ िदनो के बाद उसकी धािमर क वृित इतनी पबल हो गयी. हमको तो है। हमे तो तुमहारा ही सहरा है। तुमने जो संयास िलया तो हम िकस आधार पर िजयेगे? कैलाशकुमारी—परमातमा ही सबका आधार है। िकसी दस ू रे पाणी का आशय लेना भूल है। दस ं गयी। जब कोई अवसथा असाधय ू रे िदन यह बात मुहले वालो के कानो मे पहु च हो जाती है तो हम उस पर वयंग करने लगते है। ‘यह तो होना ही था. महिरयो से दरू रहती. बिलक सनान करने के िलए। मंिदरो मे िनतय जाती। दोनां एकादशी का िनजर ल वम रखने लगी। कैलासी को गुरजी िनतय संधया-समय धमोपदेश करते। कुछ िदनो तक तो कैलासी को यह िवचारपिरवर तन बहु त कषजनक मालूम हु आ. फूले न समाते थे िक लडकी ने कुल का नाम उजजवल कर िदया। पुराण पढती है. िवराग. तुमहे न हो . सहेिलयो से गले तक न िमलती. पर धमर िनषा नािरयो का सवाभािवक गुण है. मुहले और िबरादरी की िसयां आयी. उपिनषद् और वेदांत का पाठ करती है. िदन मे दो-दो तीन-तीन बार सनान करती. लिडिकयो को इस तरह सवछं द नही कर िदया जाता. धािमर क समसयाओं पर ऐसी-ऐसी दलीले करती है िक बडे -बडे िवदानो की जबान बंद हो जाती है तो अब कयो पछताते है?’ भद पुरषो मे कई िदनो तक यही आलोचना हाती रही। लेिकन जैसे अपने बचचे के दौडते-दौडते –धम से िगर पडने पर हम पहले कोध के आवेश 10 . िक अनय पािणयो से वह पृथक् रहने लगी। िकसी को न छूती. जीवोदर का साधन है। मेरा उदार तयाग. थोडे ही िदनो मे उसे धमर से रची हो गयी। अब उसे अपनी अवसथा का जान होने लगा था। िवषय-वासना से िचत आप ही आप िखंचने लगा। पित का यथाथर आशय समझ मे आने लगा था। पित ही सी का सचचा पथ पदशर क और सचचा सहायक है। पितिवहीन होना िकसी घोर पाप का पायिशचत है। मैने पूवर-जनम मे कोई अकमर िकया होगा। पितदेव जीिवत होते तो मै िफर माया मे फंस जाती। पायिशचत कर अवसर कहां िमलता। गुरजी का वचन सतय है िक परमातमा ने तुमहे पूवर कमो ं के पायिशचत का अवसर िदया है। वैधवय यातना नही है.श नै:शैने यह िवलोसोलमाद शांत होने लगा। वासना का ितरसकार िकया जाने लगा। पंिडत जी संधया समय गमोफोन न बजाकर कोई धमर -गंथ सुनते। सवाधयाय. हमेशा कोई न कोई धमर -गनथ पढा करती। साधु –महातमाओं के सेवा-सतकार मे उसे आितमक सुख पाप होता। जहां िकसी महातमा के आने की खबर पाती. अभी तुमहारी उम ही कया है िक तुम ऐसी बाते सोचती हो। कैलाशकुमारी—माया-मोह से िजतनी जलद िनवृित हो जाय उतना ही अचछा। हदयनाथ—कया अपने घर मे रहकर माया-मोह से मुक नही हो सकती हो? मायामोह का सथान मन है. उनके दशर नो के िलए कवकल हो जाती। उनकी अमृतवाणी सुनने से जी न भरता। मन संसार से िवरक होने लगा। तलीनता की अवसथा पाप हो गयी। घंटो धयान और िचंतन मे मग रहती। समािजक बंधनो से घृण हो गयी। घंटो धयान और िचंतन मे मग रहती। हदय सवािधनता के िलए लालाियत हो गया: यहां तक िक तीन ही बरसो मे उसने संनयास गहण करने का िनशचय कर िलया। मां-बाप को यह समाचार जात हु आ ता होश उड गये। मां बोली—बेटी. नयी बात कया हु ई. उतसव मनाया गया। मां-बेटी अब िकशती पर सैर करने के िलए गंगा न जाती. घर नही। जागेशवरी—िकतनी बदनामी होगी। कैलाशकुमारी—अपने को भगवान् के चरणो पर अपर ण कर चुकी तो बदनामी कया िचंता? जागेशवरी—बेटी.

इतने पितत हो गए है िक भोलीभाली युवितयो को बहकाने मे संकोच नही करते तो सवर नाश होने मे रह ही कया गया। हदयनाथ—यह िवपित तो मेरे िसर ही पडी हु ई है। आप लोगो को तो मालूम होगा। पहले महाशय –आप ही के िसर कयो. कुछ लोगो की सलाह है िक िवधवाओं से अधयापको का काम लेना चािहए। यदिप मै इसे भी बहु त अचछा नही समझता. वह सुरमय पाकृितक दशय वहिहमरािश की जानमय जयोित. इसके बाद गोद मे िबठाकर आं सू पोछते और फुसलाने का लगते है: उसी तरह इन भद पुरषो ने वयगय के बाद इस गुतथी के सुलझाने का उपाय सोचना शुर िकया। कई सजजन हदयनाथ के पास आये और िसर झुकाकर बैठ गये। िवषय का आरमभ कैसे हो? कई िमनट के बाद एक सजजन ने कहा –ससुना है डाकटर गौड का पसताव आज बहु मत से सवीकृत हो गया। दस ू रे महाशय बोले—यह लोग िहंद ू-धमर का सवर नाश करके छोडेगे। कोई कया करेगा. सेवा वतधरी अपने को परमाथर की वेदी पर बिल दे देता है। इसका गौरव कही अिधक है। देखो. वह पवर तो की गुफा.मे उसे िझडिकयां सुनाते है. अनय मुहलो की कनयाएं भी आने लगी। ४ 11 . आिद। उनहोने इस कथन की उपिनषदो और वेदमंतो से पुिष की यहां तक िक धीरे-धीरे कैलासी के िवचारो मे पिरवतनर होने लगा। पंिडत जी ने मुहले वालो की लडिकयो को एकत िकया. और कहां बािलकाओं को िचिडयो की भांित पढाना। लेिकन हदयनाथ कई िदनो तक लगातार से वा धमर का माहातमय उसके हदय पर अंिकत करते रहे। सेवा ही वासतिवक संनयस है। संनयासी केवल अपनी मुिक का इचछुक होता है. पाठशाला का जनम हो गया। नाना पकार के िचत और िखलौने मंगाए। पंिडत जी सवंय कैलाशकुमारी के साथ लडिकयो को पढाते। कनयाएं शौक से आती। उनहे यहां की पढाई खेल मालूम होता। थोडे ही हदनो मे पाठशाला की धूम हो गयी. जब हमारे साधु-महातमा. गुिडयां आिद इनाम िमलता रहे तो बडे शौक से आयेगी। लडकी का मन तो लग जायेगा। हदयनाथ—देखना चािहए। भरसक समझाऊगां। जयो ही यह लोग िवदा हु ए: हदयनाथ ने कैलाशकुमारी के सामने यह तजवीज पेश की कैलासी को सुनयसत के उचच पद के सामने अधयािपका बनना अपमानजनक जान पडता था। कहां वह महातमाओं का सतसंग. वह मानसरावर और कैलास की शुभ छटा.पर संनयािसनी बनने से तो कही अचछा है। लडकी अपनी आं खो के सामने तो रहेगी। अिभपाय केवल यही है िक कोई ऐसा कामा होना चािहए िजसमे लडकी का मन लगे। िकसी अवलमब के िबना मनुषय को भटक जाने की शंका सदैव बनी रहती है। िजस घर मे कोई नही रहता उसमे चमगादड बसेरा कर लेते है। दस ू रे महाशय –सलाह तो अचछी है। मुहले की दस-पांच कनयाएं पढने के िलए बुला ली जाएं । उनहे िकताबे. सेवा तयाग है. हम सभी के िसर पडी हु ई है। दस ू रो महाशय –समसत जाित के िसर किहए। हदयनाथ—उदार का कोई उपाय सोिचए। पहले महाशय—अपने समझाया नही? हदयनाथ—समझा के हार गया। कुछ सुनती ही नही। तीसरे महाशय—पहले ही भूल हु ई। उसे इस रासते पर उतरना ही नही चािहए था। पहले महाशय—उस पर पछताने से कया होगा? िसर पर जो पडी है. उसका उपाय सोचना चािहए। आपने समाचार-पतो मे देखा होगा. वह आतमदशर न की िवशाल कलपनाएं . हिरशचंद की जो कीितर है. िहंद ू-जाित के सतंभ है. ऋिषयो मे दधीिच का जो यश है.

जीन मिहने उसकी सेवा करने को तैयार हू ।ं आिखर यह देह िकस काम आएगी। हदयनाथ—तो कनयाएं कैसे पढेगी? कैलासी—दो एक िदन मे वह अचछी हो जाएगी. आप वयथर मे झुझलाते है। उस बेचारी की जान बच जाय. लडिकयो को न पढाया करो? जागेशवरी –इसके िसवा और हो कया सकता है। कैलाशकुमारी दो िदन बाद लौटी तो हदयनाथ ने पाठशाला बंद कर देने की समसया उसके सामने रखी। कैलासी ने तीव सवर से कहा—अगर आपको बदनामी का इतना भय है तो मुझे िवष देदीिजए। इसके िसवा बदनामी से बचने का और कोई उपाय नही है। हदयनाथ—बेटी संसार मे रहकर तो संसार की-सी करनी पडेगी। 12 . लडकी दस ू रो के घर जाती है और कई-कई िदन पडी रहती है। कया करं. तब तक आप लरा इन लडिकयो की देखभाल करते रिहएगा। हदयनाथ—यह बीमारी छूत फैलाती है। कैलासी—(हंसकर) मर जाऊंगी तो आपके िसर से एक िवपित टल जाएगी। यह कहकर उसने उधर की राह ली। भोजन की थाली परसी रह गयी। तब हदयनाथ ने जागेशवरी से कहा---जान पडता है. चेचक िनकल आयी। कैलासी उसे देखने गई। मां-बाप ने बहु त मना िकया. पर उसने न माना। कहा. कभी उनके साथ खेलती. उधर बह जाती है। हदयनाथ—जो रासता िनकालता हू ं वही कुछ िदनो के बाद िकसी दलदल मे फंसा देता है। अब िफर बदनामी के समान होते नजर आ रहे है। लोग कहेगे . कह दं ू. मै तीन िदन नही. कभी सीना-िपरोना िसखाती। पाठशाला ने पिरवार का रप धारण कर िलया। कोई लडकी बीमार हो जाती तो तुरनत उसके घर जाती.कै लास कुमारी की सेवा-पवृित िदनो-िदन तीव होने लगी। िदन भर लडिकयो को िलए रहती: कभी पढाती. उसकी सेवा-सुशूषा करती. असपताल से कोई नसर बुला ले। कैलसकुमारी-दादा. कहां कैलासी को देखते ही सारे कष भाग गये। कैलासी एक घंटे तक वहां रही। लडकी बराबर उससे बाते करती रही। लेिकन जब वह चलने को उठी तो लडकी ने रोना शुर कर िदया। कैलासी मजबूर होकर बैठ गयी। थोडी देर बाद वह िफर उठी तो िफर लडकी की यह दशा हो गयी। लडकी उसे िकसी तरह छोडती ही न थी। सारा िदन गुजर गया। रात को भी रात को लडकी ने जाने न िदयां। हदयनाथ उसे बुलाने को बार-बार आदमी भेजते. गा कर या कहािनयां सुनाकर उसका िदल बहलाती। पाठशाला को खुले हु ए साल-भर हु आ था। एक लडकी को. िजससे वह बहु त पेम करती थी. दाने मुरझाने लगे है. लडकी रो-रो कर जान दे रही है। हदयनाथ ने कहा—कह दो. बहु त जलद यह पाठशाला भी बनद करनी पडेगी। जागेशवरी—िबना मांझी के नाव पार लगाना बहु त किठन है। िजधर हवा पाती है. तुरनत लौट आऊंगी। लडकी की हालत खराब थी। कहां तो रोतेरोते तालू सूखता था. पर वह लडकी को छोडकर न जा सकती। उसे ऐसी शंका होती थी िक मै यहां से चली और लडकी हाथ से गयी। उसकी मां िवमाता थी। इससे कैलासी को उसके ममतव पर िवशवास न होता था। इस पकार तीन िदनो तक वह वहां राही। आठो पहर बािलका के िसरहाने बैठी पंखा झलती रहती। बहु त थक जाती तो दीवार से पीठ टेक लेती। चौथे िदन लडकी की हालत कुछ संभलती हु ई मालूम हु ई तो वह अपने घर आयी। मगर अभी सनान भी न करने पायी थी िक आदमी पहु च ं ा—जलद चिलए.

अनंतकाल तक जीिवत रहता है। कैलाशकुमारी अब तक यह वत रखती आयी थी। अब उसने िनशचय िकया मै वत न रखूंगी। मां ने तो माथा ठोक िलया। बोली—बेटी. आतम सममान नही है। नारी हदय के कोमल भाव. सेवा न करे. मै अपने को अभािगनी नही समझती। मै अपने आतम-सममान की रका आप कर सकती हू ।ं मै इसे घोर अपमान समझती हू ं िक पग-पग पर मुझ पर शंका की जाए. मानो सी को िवधाता ने इसिलए बनाया है िक पुरषो के अिधन रहं यह सोचकर वह समाज के अतयाचार पर दांत पीसने लगती थी। पाठशाला तो दस ू रे िदन बनद हो गयी. जड कयोकर बन जाऊ। मुझसे यह नही हो सकता िक अपने को अभाहगन. जागेशवरी से भी िबना एक आख देखे रहा नह जाता। लेिकन कैलाशकुमारी कभी भूलकर भी इन जालूसो को न देखती। कोई बरात या िववाह की बात चलाता तो वह मुहं फेर लेती। उसकी दिष मे वह िववाह नही. दिु खया समझूं और एक टु कडा रोटी खाकर पडी रहू ।ं ऐसा कयो करं? संसार मुझे जो चाहे समझे. िकनतु उसी िदन कैलाशकुमारी को पुरषो से जलन होने लगी। िजस सुख-भोग से पारबध हमे वंिचत कर देता है उससे हमे देष हो जाता है। गरीब आदमी इसीलए तो अमीरो से जलता है और धन की िननदा करता है। कैलाशी बार-बार झुझ ं लाित िक सी कयो पुरष पर इतनी अवलिमबत है? पुरशष कयो सी के भगय का िवधायक है? सी कयो िनतय पुरषो का आशय चाहे. उनका मुंह ताके? इसिलए न िक िसयो मे अिभमान नही है. िमठाईयां और िखलौने आया करते थे।अबकी भी आए। यह िववािहता िसयो का वत है। इसका फल है पित का कलयाण। िवधवाएं भी अस वत का यथेिचत रीित से पालन करती है। ित से उनका समबनध शारीिरक नही वरन् आधयाितमक होता है। उसका इस जीवन के साथ अनत नही होता. तो उसका िनवारह कैसे हो। एक िदन उसने अपने बाल गूथ ं े और जूडे मे एक गुलाब का फूल लगा िलया। मां ने देखा तो ओठं से जीभ दबा ली। महिरयो ने छाती पर हाथ रखे। इसी तरह एक िदन उसने रंगीन रेशमी साडी पहन ली। पडोिसनो मे इस पर खूब आलोचनाएं हु ई।ं उसने एकादशी का वत रखनाउ छोड िदया जो िपछले आठ वषो ं से रखमी आयी थी। कंघी और आइने को वह अब तयाजय न समझती थी। सहालग के िदन आए। िनतय पित उसके दार पर से बराते िनकलती । मुहले की िसयां अपनी अटािरयो पर खडी होकर देखती। वर के रंग –रप. आकर-पकार पर िटकाएं होती. यह वत रखना धमर है। कैलाशकुमारी-पुरष भी िसयो के िलए कोई वत रखते है? जागेशवरी—मदो ं मे इसकी पथा नही है। ती 13 . िनतय कोई चरवाहो की भांित मेरे पीछे लाठी िलए घूमता रहे िक िकसी खेत मे न जाने बूडू। यह दशा मेरे िलए असह है। यह कहकर कैलाशकुमारी वहां से चली गयी िक कही मुंह से अनगर ल शबद न िनकल पडे। इधर कुछ िदनो से उसे अपनी बेकसी का यथारथ जान होने लगा था सी पुरष की िकतली अधीन है. भोली-भाली कनयाओं का िशकार था। बरातो को वह िशकािरयो के कुते समझती। यह िववाह नही बिलदान है। ५ ज का वत आया। घरो की सफाई होने लगी। रमिणयां इस वत को तैयािरयां करने लगी। जागेशवरी ने भी वत का सामान िकया। नयी-नयी सािडया मगवायी। कैलाशकुमारी के ससुराल से इस अवसर पर कपडे . उसे कुते का दम ु िहलाना मालूम होने लगे। पेम कैसा। यह सब ढोग है.कैलासी तो कुछ मालूम भी तो हो िक संसार मुझसे कया चाहता है। मुझमे जीव है. उसकी खुशमद न करे. चेतना है. सी पुरष के अिधन है.

पर गवर शील पािणयो मे वह पिरमािजर त रप गहण कर लेता है। यहां पर हदयगत कोमल भावो को अपहरण कर लेता है—चिरत मे असवाभािवक िवकास उतपन कर देता है—मनुषय लोक-लाज उपवासे और उपहास की ओर से उदासीन हो जाता है. पर उसे जबान पर नही ला सकता 14 . नैितक बनधन टू ट जाते है। यह नैराशय की अितंम अवसथा है। हदयनाथ इनही िवचारो मे मग थे िक जागेशवरी ने कहा –अब कया करनाउ होगा? जागेशवरी—कोई उपाय है? हदयनाथ—बस एक ही उपाय है. दिु नया कया कहेगी? कैलाशकुमारी –िफर वही दिु नया? अपनी आतमा के िसवा मुझे िकसी का भय नही। हदयनाथ ने जागेशवरी से यह बाते सुनी तो िचनता सागर मे डू ब गए। इन बातो का कया आशय? कया आतम-सममान को भाव जागत हु आ है या नैरशय की कूर कीडा है? धनहीन पाणी को जब कष-िनवारण का कोई उपाय नही रह जाता तो वह लजजा को तयाग देता है। िनससंदेह नैराशय ने यह भीषण रप धारण िकया है। सामानय दशाओं मे नैराशय अपने यथाथर रप मे आता है.कैलाशकुमारी—इसिलए न िक पुरषो की जान उतनी पयारी नही होती िजतनी िसयो को पुरषो की जान ? जागेशवरी—िसयां पुरषो की बराबरी कैसे कर सकती है? उनका तो धमर है अपने पुरष की सेवा करना। कैलाशकुमारी—मै अपना धमर नही समझती। मेरे िलए अपनी आतमा की रका के िसवा और कोई धमर नही? जागेशवरी—बेटी गजब हो जायेगा.

इस वक इस हार के बनवाने मे ६०० रपये लगेगे। अगर १ र० पित सैकडा बयाज रखिलया जाय ता – वषर मे ६०० र० के लगभग १००० र० हो जायेगे। लेिकन ५ वषर मे तुमहारा हार मुिशकल से ३०० र० का रह जायेगा। इतना बडा नुकसान उठाकर हार पहनने से कया सुख? सह हार वापस कर दो . खपरैल पर से उतरे है। मेरी नीदं खुली तो कोई मेरे ऊपर झुका हु आ था। हाय रे. िकनतु पिणडत जी हीला-हवाला करते रहते थे। यह तो साफ-साफ ने कहते थे िक मेरे पास रपये नही है —इनसे उनके पराकम मे बटा लगता था—तकरनाओं की शरण िलया करते थे। गहनो से कुछ लाभ नही एक तो धातु अचछी नही िमलती. पर दख ु िकससे कहे। यिद पिणडत जी जयादा मेहनत करने के योगय होते तो यह मुिशकल आसान हो जाती । पर वे आलसी जीव थे .नही.चोर. बहु त पसंद आया। तुमहे िदखाने के िलए पहन कर चली आई। बस. कहां? दौडो. घर मे चोर . पिणडत—तुमने हार उतार कयां न िदया था? माया-मै कया जानती थी िक आज ही यह मुसीबत िसर पडने वाली है. लेिकन िनदा की माता मे कमी न कर सकते थे। एक िदन पिणडत जी पाठशाला से आये तो देखा िक माया के गले मे सोने का हार िवराज रहा है। हार की चमक से उसकी मुख-जयोित चमक उठी थी। उनहोने उसे कभी इतनी सुनदर न समझा था। पूछा –यह हार िकसका है? माया बोली—पडोस मे जो बाबूजी रहते है उनही की सी का है। आज उनसे िमलने गयी थी. उपर से बदनामी भी हो। माया—मैतो ऐसा ही हार लूगी। २० तोले का है। पिणडत—िफर वही िजद। माया—जब सभी पहनती है तो मै ही कयो न पहनूं? पिणडत—सब कुएं मे िगर पडे तो तुम भी कुएं मे िगर पडोगी। सोचो तो. मुझे घसीटे िलए जाते है। पिणडत जी हकबका कर उठे और बोले –कहा. इन युिकयो के सामने िनरतर हो जाती थी। पडोिसनो को देखदेख कर उसका जी ललचा करता था.हाय. पहने-पहने सो गई थी। मुए ने गले से िनकाल िलया । हाय भगवान. यह हार देखा . 15 .कौशल पंिडत बलराम शासी की धमर पतनी माया को बहु त िदनो से एक हार की लालसा थी और वह सैकडो ही बार पंिडत जी से उसके िलए आगह कर चुकी थी. अिधकांश समय भोजन और िवशाम मे वयितत िकया करते थे। पतनी जी की कटू िकयां सुननी मंजरू थी. कोई सेध पडी है कया? माया—नही. यह तो हार ही ले गया. जरा मेरी लकडी उठा लेना। माया—मुझसे तो डर के उठा नही जाता। कई आदमी बाहर से बोले—कहां है पिणडत जी. हाय भगवान्.श् उस पर सोनार रपसे के आठ-आठ आने कर देता है और सबसे बडी बात यह है िक घर मे गहने रखना चोरो को नेवता देन है। घडी-भर शृगांर के िलए इतनी िवपित िसर पर लेना मूखो का काम है। बेचारी माया तकर –शास न पढी थी.दौडो। माया—मेरी कोठारी मे गया है। मैने उसकी परछाई ं देखी । पिणडत—लालटेन लाओं. भोजन करो और आराम से पडी रहो। यह कहते हु ए पिणडत जी बाहर चले गये। रात को एकाएक माया ने शोर मचाकर कहा –चोर. ऐसा ही एक हार मुझे बनवा दो। पिणडत—दस ू रे की चीज नाहक मांग लायी। कही चोरी हो जाए तो हार तो बनवाना ही पडे.

तब तक हमे चैन न आयेगा। २ िणडत बालकराम को अब िनतय ही िचंता रहने लगी िक िकसी तरह हार बने। यो अगर टाट उलट देते तो कोई बात न थी । पडोिसन को सनतोष ही करना पडता. छत पर चढकर देखा. कही चोर का पता न था। एक पडोसी—िकसी जानकार आदमी का काम है। दस ू रा पडोसी—िबना घर के भेिदये के कभी चोरी नही होती। और कुछ तो नही ले गया? माया—और तो कुड नही गया। बरतन सब पडे हु ए है। सनदक ू भी बनद पडे है। िनगोडे को ले ही जाना था तो मेरी चीजे ले जाता । परायी चीज ठहरी। भगवान् उनहे कौन मुंह िदखाऊगी। पिणडत—अब गहने का मजा िमल गया न? माया—हाय. और कुछ तो न ले गया? पडोसी लालटेन िलए आ पहु च ं े। घर मे कोना –कोना देखा। किरयां देखी. िकनतु पिणडत जी बाहणतव के गौरव को इतने ससते दामो न बेचना चाहते थे। आलसय छोडंकर धनोपाजर न मे दतिचत हो गये। छ: महीने तक उनहोने िदन को िदन और रात को रात नही जाना। दोपहर को सोना छोड िदया. न जाने कब कया हो जाए। अब आयी समझ मे मेरी बात. अब देखूं भगवान कैसे लाज रखते है। माया—अभागे मेरे घर का एक-एक ितनका चुन ले जाते तो मुझे इतना द ु:ख न होता। अभी बेचारी ने नया ही बनावाया था। पिणडत—खूब मालूम है. पडोिसन से कह देना. बाहण से डाडं कौन लेता . अगवाडे-िपछवाडे देखा. नही तो इस घडी भर गले मे डाल लेने से ऐसा कौन-सा बडा सुख िमल गया? मै हू ं ही अभािगनी। पिणडत—अब पछताने और अपने को कोसने से कया फायदा? चुप हो के बैठो. वषर -फल आिद बनाया करते। पात:काल मिनदर मे ‘दगु ार जी का पाठ करते । माया पिणडत जी का अधयवसाय देखकर कभी-कभी पछताती िक कहां से मैने यह िवपित िसर पर ली कही प 16 . तुम न मानी. २० तोले का था? माया—२० ही तोले को तो कहती थी? पिणडत—बिधया बैठ गई और कया? माया—कह दगं ू ी घर मे चोरी हो गयी। कया लेगी? अब उनके िलए कोई चोरी थोडे ही करने जायेगा। पिणडत तुमहारे घर से चीज गयी. शौच गृह मे झाका. रात को भी बहु त देर तक जागते। पहले केवल एक पाठशाला मे पढाया करते थे। इसके िसवा वह बाहण के िलए खुले हु ए एक सौ एक वयवसायो मे सभी को िनंदिनय समझते थे। अब पाठशाला से आकर संधया एक जगह ‘भगवत्’ की कथा कहने जाते वहां से लौट कर ११-१२ बजे रात तक जनम कंु डिलयां. तुमहे देनी पडेगी। उनहे इससे कया पयोजन िक चोर ले गया या तुमने उठाकर रख िलया। पितययेगी ही नही। माया –तो इतने रपये कहां से आयेगे? पिणडत—कही न कही से तो आयेगे ही. यह अपजस बदा था। पिणडत—िकतना समझा के हार गया. तुमहारी चीज जब तक लौटा न देगे.नही तो लाज कैसे रहेगी: मगर की तुमने बडी भूल । माया—भगवान् से मंगनी की चीज भी न देखी गयी। मुझे काल ने घेरा था. देखो. भगवान्.पिणडत—अब हाय-हाय करने से कया होगा? अपने कमो ं को रोओ। इसीिलए कहा करता था िक सब घडी बराबर नही जाती. न मानी। बात की बात मे ६००र० िनकल गए. घबराओं नही.

बदला सही। माया—बदला भी नही है। पिणडत िफर कया है। माया—तुमहारी . चाहे खुशी हो या नाखुशी। माया—यह ऋण नही है। पिणडत—और कया है.िनशानी? पिणडत—तो कया ऋण के िलए कोई दस ू रा हार बनवाना पडेगा? माया—नही-नही. वह हार चारी नही गया था। मैने झूठ-मूठ शोर मचाया था। पिणडत—सच? माया—हां. सच कहती हू ।ं पिणडत—मेरी कसम? माया—तुमहारे चरण छूकर कहती हू ।ं पिणडत—तो तमने मुझसे कौशल िकया था? माया-हां? पिणडत—तुमहे मालूम है. पिणडत—इससे कया मतलब? ऋण तो चुकाना ही पडेगा. जेब से पुिडया िनकाल कर उसके सामने फेक दी और बोले—लो. आज तुमहारे ऋण से मुक हो गया। माया ने पुिडया खोली तो उसमे सोने का हार था. उसकी सुनदर बनावट देखकर उसके अनत:सथल मे गुदगदी –सी होने लगी । मुख पर आनद की आभा दौड गई। उसने कातर नेतो से देखकर पूछा—खुश हो कर दे रहे हो या नाराज होकर 1.बीमार पड जाये तो लेने के देने पडे। उनका शरीर कीण होते देखकर उसे अब यह िचनता वयिथत करने जगी। यहां तक िक पांच महीने गुजर गये। एक िदन संधया समय वह िदया-बित करने जा रही थी िक पिणडत जी आये.. उसकी चमक-दमक. तुमहारे कौशल का मुझे कया मूलय देना पडा। माया—कया ६०० र० से ऊपर? पिणडत—बहु त ऊपर? इसके िलए मुझे अपने आतमसवातंतय को बिलदान करना पडा। 17 .

जब कोई मेरे समझाने से माने तब तो? मां---मानेगी कयो नही. उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के िलए सुयोगय वर खोजने मे कोई बात उठा नही रखी। लेिकन जैसा घर-घर चाहते थे. जायजा भी िमला तो शते तय न हो सकी। इस तरह मजबूर होकर भारतदास को लीला का िववाह लाला सनतसरन के लडके सीतासरन से करना पडा। अपने बाप का इकलौता बेटा था. थोडी बहु त िशका भी पायी थी. समपित के साथ िशका भी हो तो कया पूछना ! ऐसा घर बहु त ढढा पर न िमला तो अपनी िवरादरी के न थे। िबरादरी भी िमली. आसमान िसर पर उठा लेती। उनहे बकने का मजर था। दाल मे नमक का जरा तेज हो जाना उनहे िदन भर बकने के िलए काफी बहाना था । मोटी-ताजी मिहला थी. कयो ? तू भी अपने को मदर कहता कहेगा ? यह मदर कैसा िक औरत उसके कहने मे न रहे। िदन-भर घर मे घुसा रहता है। मुंह मे जबान नही है ? समझता कयो नही ? सीतासरन कहता---अममां. सब खराब है। जायदाद के िवषय मे जमीदार साहब नये-नये दफो का वयवहार करते थे. सारे िदन बरोठे मे माची पर बैठीैे रहती थी। कया मजाल िक घर मे उनकी इचछा के िवरद एक पता भी िहल जाय ! बहू की नयी-नयी आदते देख देख जला करती थी। अब काहे की आबर होगी। मुंडेर पर खडी हो कर झांकती है। मेरी लडकी ऐसी दीदा-िदलेर होती तो गला घोट देती। न जाने इसके देश मे कौन लोग बसते है ! गहने नही पहनती। जब देखो नंगी – बुचची बनी बैठी रहती है। यह भी कोई अचछे लचछन है। लीला के पीछे सीतासरन पर भी फटकार पडती। तुझे भी चॉँदनी मे सोना अचछा लगता है. साहसी आदमी था . वहां अपना कोई अिखतयार न था . वैसा न पा सके। वह लडकी को सुखी देखना चाहते थे. यहां उसके सामने मुंह खोलना भी पाप था। बचपन से िसखाया गया था रोशनी ही जीवन है. तो जायजा न िमला!. गुससेवर आदमी थे. लेिकन सामािजक पथाओं के कटटर पकपाती थे। सीतासरन अपने बाप को जो करते या कहते वही खुद भी कहता था। उसमे खुद सोचने की शिक ही न थी। बुिद की मंदता बहु धा सामािजक अनुदारता के रप मे पकट होती है। २ ला ने िजस िदन घर मे वॉँव रखा उसी िदन उसकी परीका शुर हु ई। वे सभी काम. या कभी छत पर टहल सके । पलय आ जाता. नयी िजतनी बाते है. िकंतु इसके िलए उनकी समझ मे समपित ही सबसे जररी चीज थी। चिरत या िशका का सथान गौण था। चिरत तो िकसी के माथे पर िलखा नही रहता और िशका का आजकल के जमाने मे मूलय ही कया ? हां. नाक पर मकखी न बैठने देते। धूतरता और छलकपट से ही उनहोने जायदाद पैदा की थी। और उसी को सफल जीवन का मंत समझते थे। उनकी पतनी उनसे भी दो अंगुल ऊंची थी। मजाल कया है िक बहू अपनी अंधेरी कोठरी के दार पर खडी हो जाय. बिलष. या उनके नायबो –बहण—ने तय कर दी. छीट का घाघरेदार लंहगा पहने. तू मदर है िक नही ? मदर वह चािहए िक कडी िनगाह से देखे तो औरत कांप उठे । ली 18 . कमा और दया ईशवरीय गुण बताये गये थे.सवगर की दे व ी भा गय की बात ! शादी िववाह मे आदमी का कया अिखतयार । िजससे ईशवर ने . गहनो से लदी हु ई. पसन मुख. पानदान बगल मे रखे. मगर िवचार वही बाबा आदम के जमाने के थे। पुरानी िजतनी बाते है. यहां इनका नाम लेने की भी सवाधीनता थी। संतसरन बडे तीखे. सब अचछी . यहां रोशनी के दशर न दभ ु र भ थे। घर पर अिहंसा. िजनकी उसके घर मे तारीफ होती थी यहां विजर त थे। उसे बचपन से ताजी हवा पर जान देना िसखाया गया था. मामलेमुकदमे समझता था और जरा िदल का रंगीला भी था । सबसे बडी बात यह थी िक रपवान. जैसा हर एक िपता का धमर है . बातचीत सलीके से करता था.

तो मै भी तो उसकी बातो का जबाब नही दे पाता। देखती नही हो िकतनी दबु र ल हो गयी है। वह रंग ही नही रहा। उस कोठरी मे पडे-पडे उसकी दशा िबगडती जाती है। बेटे के मुंह से ऐसी बाते सुन माता आग हो जाती और सारे िदन जलती . िकनतु उसकी कौन सुनता था। बचचो की माता होकर उसकी अब गणना ही न रही थी। जो कुछ थे बचचे थे . बाहर बैठो। लीला—यह गमी तो उन तानो से अचछी है जो अभी सुनने पडेगे। सीतासरन—आज अगर बोली तो मै भी िबगड जाऊंगा। लीला—तब तो मेरा घर मे रहना भी मुिशकल हो जायेगा। सीतासरन—बला से अलग ही रहेगे ! लीला—मै मर भी लाऊं तो भी अलग रहू ं । वह जो कुछ कहती सुनती है . जो वह मुझे झेलवाना चाहती है। उनके सवासथय पर उन कषो का जरा भी असर नही पडा। वह इस ६५ वषर की उम मे मुझसे कही टांठी है। िफर उनहे कैसे मालूम हो िक इन कषो से सवासथय िबगड सकता है। सीतासरन ने उसके मुरझाये हु ए मुख की ओर करणा नेतो से देख कर कहा— तुमहे इस घर मे आकर बहु त द ु:ख सहना पडा। यह घर तुमहारे योगय न था। तुमने पूवर जनम मे जरर कोई पाप िकया होगा। लीला ने पित के हाथो से खेलते हु ए कहा—यहां न आती तो तुमहारा पेम कैसे पाती ? ३ च साल गुजर गये। लीला दो बचचो की मां हो गयी। एक लडका था. बुिढया चार िदन मे मर जायगी तब मै मालिकन हो ही जाउँ गी सीतासरन --.यहां तो बडी गमी है. अपनी समझ से मेरे भले ही के िलए कहती-सुनती है। उनहे मुझसे कोई दशु मनी थोडे ही है। हां. सांस फाड खाती थी। पां 19 . वह कुछ न थी। उसे िकसी बचचे को डाटने का भी अिधकार न था. मुंह िचढा देना तो उनके िलए मामूली बात थी। िदनभर खाते और आये िदन बीमार पडे रहते। लीला ने खुद सभी कष सह िलये थे पर बचचो मे बुरी आदतो का पडना उसे बहु त बुरा मालूम होता था. पर यहां पसेिरयो आटा थेपना पडता. यह दस ू री बात है।उनहोने खुद वह सब कष झेले है. लेिकन लीला के सामने जाते ही उसकी मित बदल जाती थी। वह वही बाते करता था जो लीला को अचछी लगती। यहां तक िक दोनो वृदा की हंसी उडाते। लीला को इस मे ओर कोई सुख न था । वह सारे िदन कुढती रहती। कभी चूलहे के सामने न बैठी थी . कभी भागय को कोसती. मजूरो और टहलुओं के िलए रोटी पकानी पडती। कभी-कभी वह चूलहे के सामने बैठी घंटो रोती। यह बात न थी िक यह लोग कोई महाराज-रसोइया न रख सकते हो. पर घर की पुरानी पथा यही थी िक बहू खाना पकाये और उस पथा का िनभाना जररी था। सीतासरन को देखकर लीला का संतप हदय एक कण के िलए शानत हो जाता था। गमी के िदन थे और सनधया का समय था। बाहर हवा चलती. लडका दादी से । दोनो शोख और शरीर थे। गाली दे बैठना. भीतर देह फुकती थी। लीला कोठरी मे बैठी एक िकताब देख रही थी िक सीतासरन ने आकर कहा--. हमे उनकी बाते अचछी न लगे. दस ू री लडकी । लडके का नाम जानकीसरन रखा गया और लडकी का नाम कािमनी। दोनो बचचे घर को गुलजार िकये रहते थे। लडकी लडकी दादा से िहली थी.सीतासरन -----तुम तो समझाती ही रहती हो । मां ---मेरी उसे कया परवाह ? समझती होगी. कभी समय को । सीतासरन माता के सामने तो ऐसी बाते करता .

यहां तक िक घर छोडकर भागा जाता था. दस ू री तरफ खरबूजे । इन दोनो फलो की ऐसी अचछी फसल कभी न हु ई थी अबकी इनमे इतनी िमठास न जाने कहा से आयी थी िक िकतना ही खाओ मन न भरे। संतसरन के इलाके से आम औरी खरबूजे के टोकरे भरे चले आते थे। सारा घर खूब उछल-उछल खाता था। बाबू साहब पुरानी हडी के आदमी थे। सबेरे एक सैकडे आमो का नाशता करते. जहॉँ न हवा का गुजर था. संतान का ली 20 . अब तो वह और भी बेजान हो गयी। उठने-बैठने की शिक भी न रही। हरदम खोयी सी रहती.सबसे बडी आपित यह थी िक उसका सवासथय अब और भी खराब हो गया था। पसब काल मे उसे वे भी अतयाचार सहने पडे जो अजान. पर िकसी को कभी कोई िशकायत न होती थी। कभी पेट मे िगरानी मालूम हु ई तो हड की फंकी मार ली। एक िदन बाबू संतसरन के पेट मे मीठा-मीठा ददर होने लगा। आपने उसकी परवाह न की । आम खाने बैठ गये। सैकडा पूरा करके उठे ही थे िक कै हु ई । िगर पडे िफर तो ितल-ितल करके पर कै और दसत होने लगे। हैजा हो गया। शहर के डाकटर बुलाये गये. न बाहर से । जहां बैठती. उसका कोमल शरीर सूख गया। एक बार जो कसर रह गयी वह दस ू री बार पूरी हो गयी। चेहरा पीला पड गया. िकसी के रोने की आवाज भी सुनायी न देती थी। रोता ही कौन ? ले-दे के कुल दो पाणी रह गये थे। और उनहे रोने की सुिध न थी। ४ ला का सवासथय पहले भी कुछ अचछा न था. न पकाश का. लेिकन आने के पहले ही बाबू साहब चल बसे थे। रोनापीटना मच गया। संधया होते-होते लाश घर से िनकली। लोग दाह-िकया करके आधी रात को लौटे तो मालिकन को भी कै दसत हो रहे थे। िफर दौड धूप शुर हु ई. लेिकन सूयर िनकलते-िनकलते वह भी िसधार गयी। सी-पुरष जीवनपयरत एक िदन के िलए भी अलग न हु ए थे। संसार से भी साथ ही साथ गये. न खाने-पीने की । उसे न घर से वासता था. सूयारसत के समय पित ने पसथान िकया. िसर मे तेल न डालती बचचे ही उसके पाणो के आधार थे। जब वही न रहे तो मरना और जीना बराबर था। रात-िदन यही मनाया करती िक भगवान् यहां से ले चलो । सुख-द ु:ख सब भुगत चुकी। अब सुख की लालसा नही है. आं खे घंस गयी। ऐसा मालूम होता. दो-तीन कलमी आम भी रखे थे। इन पर मिकखयां िभनक रही थी। जानकी ने एक ितपाई पर चढ कर दोनो चीजे उतार ली और दोनो ने िमलकर खाई। शाम होत-होते दोनो को हैजा हो गया और दोनो मां-बाप को रोता छोड चल बसे। घर मे अंधेरा हो गया। तीन िदन पहले जहां चारो तरफ चहल-पहल थी. चारो और दगु र नध. सूयोदय के समय पतनी ने । लेिकन मुशीबत का अभी अंत न हु आ था। लीला तो संसकार की तैयािरयो मे लगी थी. मूखरता और अंध िवशवास ने सौर की रका के िलए गढ रखे है। उस काल-कोठरी मे. न कपडे-लते की सुिध थी. मकान की सफाई की तरफ िकसी ने धयान न िदया। तीसरे िदन दोनो बचचे दादादादी के िलए रोत-रोते बैठक मे जा पंहुचे। वहां एक आले का खरबूजज कटा हु आ पडा था. लेिकन जयो-जयो िदन गुजरते थे बचचो का शोक उसके िदल से िमटता था. लेिकन बुलाने से मौत िकसी को आयी है ? सीतासरन भी पहले तो बहु त रोया-धोया. और सील और गनदगी भरी हु ई थी. बदन मे खून ही नही रहा। सूरत ही बदल गयी। गिमर यो के िदन थे। एक तरफ आम पके. वहां अब सनाटा छाया हु आ था. वही बैठी रह जाती। महीनो कपडे न बदलती. िफर पसेरी-भर खरबूज चट कर जाते। मालिकन उनसे पीछे रहने वाली न थी। उनहोने तो एक वक का भोजन ही बनद कर िदया। अनाज सडने वाली चीज नही। आज नही कल खचर हो जायेगा। आम और खरबूजे तो एक िदन भी नही ठहर सकते। शुदनी थी और कया। यो ही हर साल दोनो चीजो की रेल-पेल होती थी. न सफाई का.

लेिकन जो है उसे न जाने दगं ू ी। आ. उसके दीवाने होने मे कया संदेह है ! मेरे चले जाने से इनका सवर नाश हो जायेगा। इनहे बचाना मेरा धमर है। हां.अचछे कपडे पहने कैसे उछलते िफरते! वही न रहे तो कहां की तीज और कहां के तयोहार। सहसा सीतासरन ने आकर कहा – कया िदन भर रोती ही रहोगी ? जरा कपडे तो बदल डालो . मेरे सवामी मेरे हाथ से िनकले जा रहे है। उन पर िवषय का भूत सवार हो गया है और कोई समझाने वाला नही। वह अपने होश मे नही है। मै कया करं. मानो उसका आशय नही समझी। िफर मुंह फेर कर रोने लगी। सीतासरन – मै अब इस मनहू सत का अनत कर देना चाहता हू ।ं अगर तुमहारा अपने िदल पर काबू नही है तो मेरा भी अपने िदल पर काबू नही है। मै अब िजंदगी – भर मातम नही मना सकता। लीला—तुम रंग-राग मनाते हो. कहां अब उसे उदास और शोक-मग देखकर झुंझला उठता। िजंदगी रोने ही के िलए तो नही है। ईशवर ने लडके िदये थे. मुझे अपना शोक भूल जाना होगा। रोऊंगी.द ु:ख तो कुछ माता ही को होता है। धीरे-धीरे उसका जी संभल गया। पहले की भॉँित िमतो के साथ हंसी-िदलगी होने लगी। यारो ने और भी चंग पर चढाया । अब घर का मािलक था. ईशवर ने ही छीन िलये। कया लडको के पीछे पाण दे देना होगा ? लीला यह बाते सुनकर भौचक रह जाती। िपता के मुंह से ऐसे शबद िनकल सकते है। संसार मे ऐसे पाणी भी है। होली के िदन थे। मदारना मे गाना-बजाना हो रहा था। िमतो की दावत का भी सामान िकया गया था । अंदर लीला जमीन पर पडी हु ई रो रही थी तयाहोर के िदन उसे रोते ही कटते थे आज बचचे बचचे होते तो अचछे . रोना तो तकदीर मे िलखा ही है— रोऊंगी. ऐ टू टे हु ए हदय ! आज तेरे टु कडो को जमा करके एक समािध बनाऊं और अपने शोक को उसके हवाले कर द।ं ू ली 21 . कोई उसका हाथ रोकने वाला नही था। सैर’-सपाटे करने लगा। तो लीला को रोते देख उसकी आं खे सजग हो जाती थी. लेिकन हंस-हंस कर । अपने भागय से लडू ंगी। जो जाते रहे उनके नाम के िसवा और कर ही कया सकती हू ं. अगर मै चली जाती हू ं तो थोडे ही िदनो मे सारा ही घर िमटी मे िमल जाएगा और इनका वही हाल होगा जो सवाथी िमतो के चुंगल मे फंसे हु ए नौजवान रईसो का होता है। कोई कुलटा घर मे आ जाएगी और इनका सवर नाश कर देगी। ईशवा ! मै कया करं ? अगर इनहे कोई बीमारी हो जाती तो कया मै उस दशा मे इनहे छोडकर चली जाती ? कभी नही। मै तन मन से इनकी सेवा-सुशूषा करती. तुमहे मेरी कया िफक पडी है। सीतासरन—कया दिु नया मे और िकसी के लडके नही मरते ? तुमहारे ही िसर पर मुसीबत आयी है ? लीला—यह बात कौन नही जानता। अपना-अपना िदल ही तो है। उस पर िकसी का बस है ? सीतासरन मेरे साथ भी तो तुमहारा कुछ कतर वय है ? लीला ने कुतूहल से पित को देखा. तुमहारे घर मे न रोउं गी। 5 ला ने देखा. देवताओं की मनौितयां करती। माना इनहे शारीिरक रोग नही है. जो चाहे कर सकता था. लेिकन मानिसक रोग अवशय है। आदमी रोने की जगह हंसे और हंसने की जगह रोये. मै तुमहे मना तो नही करती ! मै रोती हू ं तो कयूं नही रोने देते। सीतासरन—मेरा घर रोने के िलए नही है ? लीला—अचछी बात है. आदमी बन जाओ । यह कया तुमने अपनी गत बना रखी है ? लीला—तुम जाओ अपनी महिफल मे बैठो. ईशवर से पाथर ना करती.

ओ रोने वाली आं खो. सारी देह मे एक जवाला-सी दौड गयी। िमत लोग िवदा हो गये थे। समािजयो का पता न था। केवल एक रमणी मसनद पर लेटी हु ई थी और सीतासरन सामने झुका हु आ उससे बहु त धीरे -धीरे बाते कर रहा था। दोनो के चेहरो और आं खो से उनके मन के भाव साफ झलक रहे थे। एक की आं खो मे अनुराग था. ऐसा दतु कारं वह भी याद करे. मेरे आभूषणो. मेरा अपराध कमा करो। तुम मेरे भले िदनो के साकी हो. मगर देखो दगा न करना . अब इस अंधेरी कोठरी को भी देख लो। सीतासरन ने जिजजत होकर कहा—उसे अंधेरी कोठरी मत कहो लीला वह पेम का मानसरोवर है ! इतने मे बाहर से िकसी िमत के आने की खबर आयी। सीताराम चलने लगे तो लीला ने हाथ उनका पकडकर हाथ कहा—मै न जाने दगं ू ी। सीतासरन-. कहां भागूं ? लीला ने अपने हदय की ओर उं गली िदखकर कहा –-यहा आ बैठो बहु त भागे िफरते हो. कैशो मे यह फूल गूंथने के पहले आं खो मे िकतने मोती िपरोये है। उनहोने एक नवीन पेमोतसाह से उठकर उसे गले लगा िलया और मुसकराकर बोले—आज तो तुमने बडे-बडे शास सजा रखे है. आओ. हाव-भाव मे. अब तुमहे बांधकर रखूगी । बाग की बहार का आनंद तो उठा चुके. तुमने मेरे साथ बहु त िवहार िकए है.अभी आता हू ।ं लीला—मुझे डर है कही तुम चले न जाओ। सीतासरन बाहर आये तो िमत महाशय बोले –आज िदन भर सोते हो कया ? बहु त खुश नजर आते हो। इस वक तो वहां चलने की ठहरी थी न ? तुमहारी राह देख रही है। सीतासरन—चलने को तैयार हू ं. बिलक जवाला ! लीला उसी वक आइने के सामने गयी । आज कई महीनो के बाद उसने आइने मे अपनी सूरत देखी। उस मुख से एक आह िनकल गयी। शोक न उसकी कायापलट कर दी थी। उस रमणी के सामने वह ऐसी लगती थी जैसे गुलाब के सामने जूही का फूल ६ तासरन का खुमार शाम को टू टा । आखे खुली तो सामने लीला को खडे मुसकरातेदेखा।उसकी अनोखी छिव आं खो मे समा गई। ऐसे खुश हु ए मानो बहु त िदनो के िवयोग के बाद उससे भेट हु ई हो। उसे कया मालूम था िक यह रप भरने के िलए िकतने आं सू बहाये है. मैने बहु त िदनो तक तुमहारा अपमान िकया है. मेरे आसुंओं को अपनी िवहंिसत छटा मे िछपा लो। आओ. खडे-. लेिकन लीला जाने नही देगी। िमत—िनरे गाउदी ही रहे। आ गए िफर बीवी के पंजे मे ! िफर िकस िबरते पर गरमाये थे ? सी 22 . जाग उठा और िवकल करने लगा। पर उसने जबत िकया। वेग मे दौडती हु ई तृषणाएं अकसमात् न रोकी जा सकती थी। वह उलटे पांव भीतर लौट आयी और मन को शांत करके सोचने लगी—वह रप रंग मे.खडे िनकाल द।ं ू वह पतनी भाव जो बहु त िदनो से सो रहा था. अब इस संकट मे मेरा साथ दो . दस ू री की आं खो मे कटाक ! एक भोला-भोला हदय एक मायािवनी रमणी के हाथो लुटा जाता था। लीला की समपित को उसकी आं खो के सामने एक छिलनी चुराये जाती थी। लीला को ऐसा कोध आया िक इसी समय चलकर इस कुलटा को आडे हाथो लूं. या सो गये ? एकाएक सनाटा कयो छा गया। जाकर दहलीज मे खडी हो गयी और बैठक मे झांककर देखा. मेरे भेदो को िछपाए रखना। िपछले पहर को पहिफल मे सनाटा हो गया। हू -हा की आवाजे बंद हो गयी। लीला ने सोचा कया लोग कही चले गये. अंग-अंग मे सफूितर भरी हु ई है. नखरे-ितले मे उस दषु ा की बराबरी नही कर सकती। िबलकुल चांद का टु कडा है. पोर-पोर मे मद छलक रहा है। उसकी आं खो मे िकतनी तृषणा है। तृषणा नही.

तो लौटा लेता। लीला वासतव मे सवगर की देवी है! 23 . तब आशय ढू ढता – िफरता था। अब उसने दार खोल िदये है और खडी बुला रही है। िमत—आज वह आनंद कहां ? घर को लाख सजाओ तो कया बाग हो जायेगा ? सीतासरन—भई.सीतासरन—लीला ने घर से िनकाल िदया था. वह मै ही जानता हू ।ं िजस संतान शोक मे उसने अपने शरीर को घुला डाला और अपने रप-लावणय को िमटा िदया उसी शोक को केवल मेरा एक इशारा पाकर उसने भुला िदया। ऐसा भुला िदया मानो कभी शोक हु आ ही नही ! मै जानता हू ं वह बडे से बडे कष सह सकती है। मेरी रका उसके िलए आवशयक है। जब अपनी उदासीनता के कारण उसने मेरी दशा िबगडते देखी तो अपना सारा शोक भूल गयी। आज मैने उसे अपने आभूषण पहनकर मुसकराते हु एं देखा तो मेरी आतमा पुलिकत हो उठी । मुझे ऐसा मालूम हो रहा है िक वह सवगर की देवी है और केवल मुझ जैसे दबु र ल पाणी की रका करने भेजी गयी है। मैने उसे कठोर शबद कहे. घर बाग नही हो सकता. वे अगर अपनी सारी समपित बेचकर भी िमल सकते. पर सवगर हो सकता है। मुझे इस वक अपनी कदता पर िजतनी लजजा आ रही है.

रात को बसती मे घुस आता और खूंटो से बंधे बैलो को सीगो से मारता। कभीिकसी की गीली दीवार को सीगो से खोद डालता. नही तो िफर लोट आयेगा। मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हु ए उतर िदया—अब लौटकर न आयेगा। 2 लिचलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाये िलए जाता था। दोनो पसीने से तर थे। सांड बार-बार गांव की ओर घूमने की चेषा करता. दध ू पीता. लेिकन तुम कानो मे तेल डाले बैठे हो. कहो तो गांव मे रहे. हम आज सांड को भगा देगे। एक आदमी ने कहा—दरू तक भगाना. झािडयो मे धोती फट गई थी. ताल-तलैया सूखी पडी थी। जोरो की लू चलने लगी थी। गॉँव मे कही से एक सांड आ िनकला और गउओं के साथ हो िलया। सारे िदन गउओं के साथ रहता.आधार सा रे गॉँव मे मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी । मसे भीग रही थी। गउएं चराता. पर अभी कोई बाल-बचचा न था। घर मे कई हल की खेती थी. सारे िदन सीचते-सीचते मरते थे। यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतो मे पहु च ं जाता और खेत का खेत तबाह कर देता । लोग उसे डंडो से मारते. और तुम अपने रंग मे मसत हो। अगर भगवान ने तुमहे बल िदया है तो इससे दस ू रो की रका करनी चािहए. कई छोटे-बडे भाई थे। वे सब िमलचुलकर खेती-बारी करते थे। मथुरा पर सारे गॉँव को गवर था. यह नही िक सबको पीस कर पी जाओ । सांड तुमहारी गायो के कारण आता है और उसे भगाना तुमहारा काम है .? तुमहारी गायो के पीछे हमारा सतयानाश हु आ जाता है. लेिकन जरा देर मे गायो मे पहु च ं जाता। िकसी की अकल काम न करती थी िक इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव के बीच मे था. लेिकन मथुरा उसका इरादा ताडकर दरू ही से उसकी राह छे क लेता। सांड कोध से उनमत होकर कभी-कभी पीछे मुडकर मथुरा पर तोड करना चाहता लेिकन उस समय मथुरा सामाना बचाकर बगल से ताबड-तोड इतनी लािठयां जमाता िक सांड को िफर भागना पडता कभी दोनो अरहर के खेतो मे दौडते. कसरत करता. कुशती लडता था और सारे िदन बांसुरी बजाता हाट मे िवचरता था। बयाह हो गया था. घर का कूडा सीगो से उडाता। कई िकसानो ने साग-भाजी लगा रखी थी. कभी झािडयो मे । अरहर की खूिटयो से मथुरा के पांव लहू -लुहान हो रहे थे. पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के िसवा और कोई सुध न थी। गांव पर गांव आते थे और िनकल जाते थे। मथुरा ने िनशचय कर िलया िक इसे नदी पार भगाये िबना दम न लूगं ा। उसका कंठ सूख गया था और आं खे लाल हो िच 24 . मानो तुमसे कुछ मतलब ही नही। मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुषय पाय: दयालु होता है। बोला —अचछा जाओ. जो मन मे आये कर लो. कही तो िनकल जाएं । जब खेती ही न बचेगी तो रहकर कया करेगे . इसिलए उसके खेतो को सांड से कोई हािन न पहु च ं ती थी। गांव मे उपदव मचा हु आ था और मथुरा को जरा भी िचनता न थी। आिखर जब धैयर का अंितम बंधन टू ट गया तो एक िदन लोगो ने जाकर मथुरा को घेरा और बौले—भाई. जब उसे जॉँिघये-लंगोटे. मथुरा तो अखाडा छोडकर हांकने न जायेगे ! पर उसका डील-डौल देखकर िकसी को उससे उलझने की िहममत न पडती । लोग गम खा जाते गिमर यो के िदन थे. गॉँव के बाहर भगा आते. नाल या मुगदर के िलए रपये-पैसे की जररत पडती तो तुरनत दे िदये जाते थे। सारे घर की यही अिभलाषा थी िक मथुरा पहलवान हो जाय और अखाडे मे अपने सवाये को पछाडे। इस लाड – पयार से मथुरा जरा टरार हो गया था। गाये िकसी के खेत मे पडी है और आप अखाडे मे दंड लगा रहा है। कोई उलाहना देता तो उसकी तयोिरयां बदल जाती। गरज कर कहता.

ततवो के िवरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था िक यह दौड उसके िलए मौत की दौड होगी ! कौन जानता था िक मौत ही सांड का रप धरकर उसे यो नचा रही है। कौरन जानता था िक जल िजसके िबना उसके पाण ओठो पर आ रहे थे. घर के कामो मे कुशल. अगर वह लौट पडा तो इतनी मेहनत वयथर हो जाएगी और गांव के लोग मेरी हंसी उडायेगे। दोनो अपने – अपने घात मे थे। सांड ने बहु त चाहा िक तेज दौडकर आगे िनकल जाऊं और वहां से पीछे को िफरं. पर अभािगनी िवधवा के आं सू कैसे पुंछते । वह हरदम रोती रहती। आं खे चांहे बनद भी हो जाती. जरा देर मे दरू हो जाएगा। लेिकन ददर बढने लगा और मथुरा का आगे जाना किठन हो गया। वह एक पेड के नीचे बैठ गया और ददर से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता. एक हाथ भी चूका और पाण भी गए. लेिकन वह एक कण के िलए भी दम न लेता था। दो ढाई घंटो के बाद जाकर नदी आयी। यही हार-जीत का फैसला होने वाला था. यही से दोनो िखलािडयो को अपने दांव-पेच के जौहर िदखाने थे। सांड सोचता था. अगर नदी मे उतर गया तो यह मार ही डालेगा. दौड कर पानी पीने से ऐसा ददर अकसर हो जाता है. िजस पर वह घमंड करे । घरवालो को यह गवारा न था िक वह कोई दस ू रा घर करे। इसमे बदनामी थी। इसके िसवाय ऐसी सुशील. पर हदय िनतय रोता रहता था। इस घर मे अब कैसे िनवारह होगा ? िकस आधार पर िजऊंगी ? अपने िलए जीना या तो महातमाओं को आता है या लमपटो ही को । अनूपा को यह कला कया मालूम ? उसके िलए तो जीवन का एक आधार चािहए था. लेन-देन के मामलो मे इतनी चतुर और रंग रप की ऐसी सराहनीय सी का िकसी दस ू रे के घर पड जाना ही उनहे असहय था। उधर अनूपा के अ ए 25 . उसकी खबर लेता। दरू तक कोई गांव नही. िजसके िलए वह िलये. उसके िलए िवष का काम करेगा। संधया समय उसके घरवाले उसे ढू ंढते हु ए आये। देखा तो वह अनंत िवशाम मे मग था। ४ क महीना गुजर गया। गांववाले अपने काम-धंधे मे लगे । घरवालो ने रो-धो कर सब िकया. न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के सनाटे मे तडप-तडप कर मर गया। हम कडे से कडा घाव सह सकते है लेिकन जरा सा-भी वयितकम नही सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था. पयास न बुझ ं ी . जरा पैर िफसला और िफर उठना नशीब न होगा। आिखर मनुषय ने पशु पर िवजय पायी और सांड को नदी मे घुसने के िसवाय और कोई उपाय न सूझा। मथुरा भी उसके पीछे नदी मे पैठ गया और इतने डंडे लगाये िक उसकी लाठी टू ट गयी। ३ ब मथुरा को जोरो से पयास लगी। उसने नदी मे मुंह लगा िदया और इस तरह हौकहौक कर पीने लगा मानो सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन मे कभी पानी इतना अचछा न लगा था और न कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नही. एक बार जान लडा कर लौटने की कोिशश करनी चािहए। मथुरा सोचता था. पर वहां कौन बैठा था जो. रोम-रोम से िचनगािरयां सी िनकल रही थी. पांच सेर पी गया या दस सेर लेिकन पानी गरम था. जरा देर मे िफर नदी मे मुंह लगा िदया और इतना पानी पीया िक पेट मे सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल िदया। लेिकन दस की पांच पग चला होगा िक पेट मे मीठा-मीठा ददर होने लगा। उसने सोचा. पर मथुरा ने उसे मुडने का मौका न िदया। उसकी जान इस वक सुई की नोक पर थी.गयी थी. पर ददर बढता ही जाता था। अनत मे उसने जोर-जोर से कराहना और रोना शुर िकया. दम उखड गया था . िजसे वह अपना सवर सव समझे. कभी खडा हो जाता कभी बैठ जाता.

लेिकन अनूप की आं खे डबडबा गयी. िदल से कहती हो ? सास—भगवान् जानते है ! अनूपा—आज यह मेरे हो गये ? सास—हां सारा गांव देख रहा है । अनूपा—तो भैया से कहला भैजो. लेिकन यह सारी आशंकाएं िनमूलर िनकली। अनूपा को िकसी ने अपने वत से िवचिलत होते न देखा। िजस हदय मे सेवा को सोत बह रहा हो—सवाधीन सेवा का— 26 . तो एक िदन अनूपा का भाई उसे िवदा कराने आ पहु च ं ा। अब तो घर मे खलबली मची। इधर कहा गया.तब मै करंगा मां—अचछा. साल-दो-साल मे इसका जी ऊब जाएगा और िकसी तरफ का रासता लेगी. दध ू रोटी मल-मल के िखलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत मे जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थौडे की िदनो मे उससे िहल-िमल गया िक एक कण भी उसे न छोडता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता. मै उनके साथ न जाऊंगी। अनूपा को जीवन के िलए आधार की जररत थी। वह आधार िमल गया। सेवा मनुषय की सवाभािवक वृित है। सेवा ही उस के जीवन का आधार है। अनूपा ने वासुदेव को लालन-पोषण शुर िकया। उबटन और तैल लगाती.मैककवाले एक जगह बातचीत पककी कर रहे थे। जब सब बाते तय हो गयी. वासुदेव को छाती से लगाते हु ए बोली ---अममा. पर उनहोने जो नही िदया उसमे अपना कया बस . कहा-सुनाद माफ करना। जी मे तो था िक इसी घर मे पडी रहू ं. पर भगवान को मंजरू नही है। यह कहते-कहते उसकी जबान बनद हो गई। सास करणा से िवहवल हो उठी। बोली—बेटी. खेल मे मार खाता तो रोता हु आ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती. उससे पूछ. घर जाये. अनूपा ही जगाती. तुझसे बयाह करेगी। वासुदेव अनूप की गोद मे जा बैठा और शरमाता हु आ बोला—हमसे बयाह करोगी ? यह कह कर वह हंसने लगा. दो-चार बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेिकन उस वक जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आिखर उसकी िवदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की िसया उसे देखने आयी। अनूपा उठ कर अपनी सांस के पैरो मे िगर पडी और हाथ जोडकर बोली—अममा. हम िवदा न करेगे । भाई ने कहा. जहां जाओं वहां सुखी रहो। हमारे भागय ही फूट गये नही तो कयो तुमहे इस घर से जाना पडता। भगवान का िदया और सब कुछ है. पंचायत होने लगी। यह िनशचय हु आ िक अनूपा पर छोड िदया जाय. जी चाहे रहे। यहां वालो को िवशवास था िक अनूपा इतनी जलद दस ू रा घर करने को राजी न होगी. जब तेरे साथ बयाह हो जायगी तो कयो जायगी ? वासुदेव-. बीमार हो तो अनूपा ही गोद मे लेकर बदलू वैध के घर जाती. हम िबना िवदा कराये मानेगे नही। गांव के आदमी जमा हो गये . बस आज तुमहारा देवर सयाना होता तो िबगडी बात बन जाती। तुमहारे मन मे बैठे तो इसी को अपना समझो : पालोपोसो बडा हो जायेगा तो सगाई कर दगं ू ी। यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लडके वासुदेव से पूछा—कयो रे ! भौजाई से शादी करेगा ? वासुदेव की उम पांच साल से अिधक न थी। अबकी उसका बयाह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला—तब तो दस ू रे के घर न जायगी न ? मा—नही. इस दध ु मुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी. और दवाये िपलाती। गांव के सी-पुरष उसकी यह पेम तपसया देखते और दांतो उं गली दबाते। पहले िबरले ही िकसी को उस पर िवशवास था। लोग समझते थे.

उसका िदल बैठा जाता था। अपने जीवन मे इतने बडे पिरवतर न की कलपना ही से उसका कलेजा दहक उठता था। िजसे बालक की भॉित पाला-पोसा. उसी तरह अब उसके बाल-बचचो को पालूगं ी। 27 . उसे पित बनाते हु ए. कया है ? अनूपा—मै सगाई न करंगी। सास—कैसी बात करती है बेटी ? सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेगे तो कया कहेगे ? अनूपा—जो चाहे कहे. िजसने १४ वषर पहले वासुदेव को पित भाव से देखा था. उजाले मे नही। वासुदेव को भी कसरत का शोक था। उसकी शकल सूरत मथुरा से िमलती-जुलती थी. अब उस भाव का सथान मातृभाव ने िलया था। इधर कुछ िदनो से वह एक गहरे सोच मे डू बी रहती थी। सगाई के िदन जयो-जयो िनकट आते थे. लजजा से उसका मुंख लाल हो जाता था। दार पर नगाडा बज रहा था। िबरादरी के लोग जमा थे। घर मे गाना हो रहा था ! आज सगाई की ितिथ थी : सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा—अममां मै तो लाज के मारे मरी जा रही हू ।ं सास ने भौचककी हो कर पूछा—कयो बेटी. िजनके नाम पर १४ वषर बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहू गं ी। मैने समझा था मरद के िबना औरत से रहा न जाता होगा। मेरी तो भगवान ने इजजत आबर िनबाह दी। जब नयी उम के िदन कट गये तो अब कौन िचनता है ! वासुदेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला. डील-डौल भी वैसा ही था। उसने िफर अखाडा जगाया। और उसकी बांसुरी की ताने िफर खेतो मे गूजने लगी। इस भाँित १३ बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा मे सगाई की तैयारी होने लगी। ले ५ िकन अब अनूपा वह अनूपा न थी. आधारहीन पािणयो पर ही होता है चोर की अंधेरे मे ही चलती है.उसमे वासनाओं के िलए कहां सथान ? वासना का वार िनमर म. आशाहीन.