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Kanpur, India-208005

नव रात्री मे मााँ दर्
ु ाा के नव रूप –नवरात्रत्र पज
ू ा

(http://hindi.devotionalonly.com/ के सौजन्य से )

नवरात्रत्र का त्योहार नौ ददनों तक चलता है । इन नौ ददनों में तीन दे ववयों पावाती, लक्ष्मी और
सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है । पहले तीन ददन पावाती के तीन स्वरुपों
(कुमार, पावाती और काली), अर्ले तीन ददन लक्ष्मी माता के स्वरुपों और आखिरी के तीन
ददन सरस्वती माता के स्वरुपों की पूजा करते हैं।

वासन्न्तक नवरात्रत्र के नौ ददनों में आददशन्तत माता दर्
ु ाा के उन नौ रूपों का भी पूजन ककया

जाता है । माता के इन नौ रूपों को नवदर्
ु ाा के नाम से भी जाना जाता है । नवरात्रत्र के इन्हीीं

नौ ददनों पर माीं दर्
ु ाा के न्जन नौ रूपों का पज
ू न ककया जाता है वे हैं – पहला शैलपत्र
ु ी, दस
ू रा

ब्रह्माचाररणी, तीसरा चन्रघन्टा, चौथा कूष्माण्डा, पााँचवा स्कन्द माता, छठा कात्याययनी,
सातवााँ कालरात्रत्र, आठवााँ महार्ौरी, नौवाीं ससविदात्री।

Pt. Aditya Narain Mulla
Spiritual Healer, Grand Master & Multi Reiki/Multi Modality Master/Teacher/Healer, Pendulum
Dowser, Parapsychologist, Dash Maha Vidya Sadhak.Email:anmulla@gmail.com
Mob: +919839456911 http://health.groups.yahoo.com/group/Adityanarainmulla/

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प्रथम दर्
ु ाा : श्री शैलपुत्री

नवरात्री प्रथम ददन माता शैलपुत्री की पूजा ववधि
वन्दे

वाींयछत

लाभाय

वष
ृ ारूढा शूलिराीं शैलपुत्री यशन्स्वनीम॥

चन्रार्दावकृत

शेिराम।

श्री दर्
ु ाा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पवातराज दहमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री
कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम ददन इनकी पूजा और आरािना की जाती है । धर्ररराज दहमालय

की पुत्री होने के कारण भर्वती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है , न्जनकी आरािना से प्राणी
सभी मनोवाींयछत फल प्राप्त कर लेता है ।

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र्दववतीय दर्
ु ाा : श्री ब्रह्मचाररणी

नवरात्री दस
ू रा ददन माता ब्रह्मचाररणी की पूजा ववधि
“दिना

कर

पर्दयाभयाींक्षमाला

कमण्डलम।

दे वी प्रसीदमयी ब्रह्मचाररण्यनुत्तमा॥“
श्री दर्
ु ाा का र्दववतीय रूप श्री ब्रह्मचाररणी हैं। यहाीं ब्रह्मचाररणी का तात्पया तपश्चाररणी है ।
इन्होंने भर्वान शींकर को पयत रूप से प्राप्त करने के सलए घोर तपस्या की थी। अतः ये

तपश्चाररणी और ब्रह्मचाररणी के नाम से ववख्यात हैं। नवरात्रत्र के र्दववतीय ददन इनकी पूजा
और अचाना की जाती है ।

जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवीं कमींडल िारण करती है । वे सवाश्रेष्ठ मााँ भर्वती
ब्रह्मचाररणी मझ
ु से पर अयत प्रसन्न हों। मााँ ब्रह्मचाररणी सदै व अपने भततो पर कृपादृन्ष्ट
रिती है एवीं सम्पण
ू ा कष्ट दरू करके अभीष्ट कामनाओ की पयू ता करती है ।

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तत
ु ाा : श्री चींरघींटा
ृ ीय दर्

नवरात्री तीसरा ददन माता चींरघींटा की पूजा ववधि
“वपण्डजप्रवरारूढा
प्रसादीं तनुते मर्दयीं चन्रघण्टे यत ववश्रत
ु ा॥“

चण्डकोपास्त्रकैयुता।

श्री दर्
ु ाा का तत
ृ ीय रूप श्री चींरघींटा है । इनके मस्तक पर घींटे के आकार का अिाचींर है , इसी
कारण इन्हें चींरघींटा दे वी कहा जाता है । नवरात्रत्र के तत
ृ ीय ददन इनका पूजन और अचाना

ककया जाता है । इनके पूजन से सािक को मखणपुर चक्र के जाग्रत होने वाली ससवियाीं स्वतः
प्राप्त हो जाती हैं तथा साींसाररक कष्टों से मुन्तत समलती है ।

इनकी आरािना से मनुष्य के हृदय से अहीं कार का नाश होता है तथा वह असीम शाींयत की
प्रान्प्त कर प्रसन्न होता है । मााँ चन्रघण्टा मींर्लदायनी है तथा भततों को यनरोर् रिकर उन्हें
वैभव तथा ऐश्वया प्रदान करती है । उनके घींटो मे अपव
ू ा शीतलता का वास है ।

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चतुथा दर्
ु ाा : श्री कूष्माींडा

नवरात्री चौथे ददन माता कूष्माण्डा की पूजा ववधि
”सरु ासम्पण
ा लशीं
ू क

दिानाहस्तपर्दयाभयाीं कुष्माण्डा शुभदास्तु में ॥“

रूधिराप्लत
ु मेव

च।

श्री दर्
ु ाा का चतुथा रूप श्री कूष्माींडा हैं। अपने उदर से अींड अथाात ् ब्रह्माींड को उत्पन्न करने

के कारण इन्हें कूष्माींडा दे वी के नाम से पुकारा जाता है । नवरात्रत्र के चतथ
ु ा ददन इनकी पूजा
और आरािना की जाती है । श्री कूष्माींडा की उपासना से भततों के समस्त रोर्-शोक नष्ट हो
जाते हैं।

इनकी आरािना से मनुष्य त्रत्रववि ताप से मुतत होता है । मााँ कुष्माण्डा सदै व अपने भततों
पर कृपा दृन्ष्ट रिती है । इनकी पूजा आरािना से हृदय को शाींयत एवीं लक्ष्मी की प्रान्प्त होती
हैं।

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पींचम दर्
ु ाा : श्री स्कींदमाता

नवरात्री पींचमी ददन स्कींदमाता की पूजा ववधि
“ससींहासनर्ता

यनत्यीं

पर्दयान्चचतकरर्दवया।

शुभदास्तु सदा दे वी स्कन्दमाता यशन्स्वनी॥“
श्री दर्
ु ाा का पींचम रूप श्री स्कींदमाता हैं। श्री स्कींद (कुमार कायताकेय) की माता होने के कारण
इन्हें स्कींदमाता कहा जाता है । नवरात्रत्र के पींचम ददन इनकी पूजा और आरािना की जाती है ।
इनकी आरािना से ववशुि चक्र के जाग्रत होने वाली ससवियाीं स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

इनकी आरािना से मनुष्य सुि-शाींयत की प्रान्प्त करता है । ससह के आसन पर ववराजमान
तथा कमल के पुष्प से सुशोसभत दो हाथो वाली यशन्स्वनी दे वी स्कन्दमाता शुभदाययनी है ।

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षष्ठम दर्
ु ाा : श्री कात्यायनी

नवरात्री पूजा - छठे ददन माता कात्यायनी की पूजा ववधि
“चन्रहासोज्जवलकरा
कात्यायनी शुभीं दर्दयादे वी दानव घायतनी॥“

शादा ल
ू ावरवाहना।

श्री दर्
ु ाा का षष्ठम ् रूप श्री कात्यायनी। महवषा कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर

आददशन्तत ने उनके यहाीं पुत्री के रूप में जन्म सलया था। इससलए वे कात्यायनी कहलाती हैं।
नवरात्रत्र के षष्ठम ददन इनकी पूजा और आरािना होती है ।

इनकी आरािना से भतत का हर काम सरल एवीं सर्
ु म होता है । चन्रहास नामक तलवार के
प्रभाव से न्जनका हाथ चमक रहा है , श्रेष्ठ ससींह न्जसका वाहन है , ऐसी असरु सींहारकाररणी
दे वी कात्यायनी कल्यान करें ।

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सप्तम दर्
ु ाा : श्री कालरात्रत्र

नवरात्री पज
ू ा - सप्तमी ददन माता कालरात्रत्र की पज
ू ा ववधि
“एकवेणी
लम्बोष्ठी

जपाकणापरू ा

नग्ना

कखणाकाकणी

िरान्स्थता।
तैलाभयततशरीररणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक
विान्मूिध्
ा वजा कृष्णा कालरात्रत्रभायींकरी॥“

भूषणा।

श्रीदर्
ु ाा का सप्तम रूप श्री कालरात्रत्र हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इससलए कालरात्रत्र
कहलाती हैं। नवरात्रत्र के सप्तम ददन इनकी पूजा और अचाना की जाती है । इस ददन सािक
को अपना धचत्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में न्स्थर कर सािना करनी चादहए।

सींसार में कालो का नाश करने वाली दे वी ‘कालरात्री’ ही है । भततों र्दवारा इनकी पूजा के

उपराींत उसके सभी द:ु ि, सींताप भर्वती हर लेती है । दश्ु मनों का नाश करती है तथा
मनोवाींयछत फल प्रदान कर उपासक को सींतुष्ट करती हैं।

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अष्टम दर्
ु ाा : श्री महार्ौरी

नवरात्री की अष्टमी ददन माता महार्ौरी की पूजा ववधि
“श्वेत

वष
ृ े

समारूढा

श्वेताम्बर

महार्ौरी शभ
ु ीं दर्दयान्महादे व प्रमोददा॥“

िरा

शधु च:।

श्री दर्
ा ः र्ौर है , इससलए ये महार्ौरी
ु ाा का अष्टम रूप श्री महार्ौरी हैं। इनका वणा पूणत

कहलाती हैं। नवरात्रत्र के अष्टम ददन इनका पूजन ककया जाता है । इनकी उपासना से असींभव
काया भी सींभव हो जाते हैं।

मााँ महार्ौरी की आरािना से ककसी प्रकार के रूप और मनोवाींयछत फल प्राप्त ककया जा
सकता है । उजले वस्त्र िारण ककये हुए महादे व को आनींद दे वे वाली शुिता मूती दे वी
महार्ौरी मींर्लदाययनी हों।

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नवम ् दर्
ु ाा : श्री ससविदात्री

नवरात्री पूजा की नवमी ददन माता ससविदात्री की पूजा ववधि
“ससिर्ींिवायक्षादौर
सेव्यमाना सदाभूयात ससविदा ससविदायनी॥“

सुरैरमरै

रवव।

श्री दर्
ु ाा का नवम ् रूप श्री ससविदात्री हैं। ये सब प्रकार की ससवियों की दाता हैं, इसीसलए ये
ससविदात्री कहलाती हैं। नवरात्रत्र के नवम ददन इनकी पूजा और आरािना की जाती है ।

ससविदात्री की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की ससविया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता
है । माकाण्डेयपुराण में अखणमा, मदहमा, र्ररमा, लयघमा, प्रान्प्त, प्राकाम्य, ईसशत्व एवीं वसशत्वये

आठ ससवियााँ बतलायी र्यी है । भर्वती ससविदात्री उपरोतत सींपूणा ससवियााँ अपने उपासको
को प्रदान करती है । मााँ दर्
ु ाा के इस अींयतम स्वरूप की आरािना के साथ ही नवरात्र के
अनष्ु ठान का समापन हो जाता है ।

इस ददन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रत्र के अर्ले ददन अथाात दसवें
ददन को रावण पर राम की ववजय के रूप में मनाया जाता है । दशम ् यतधथ को बुराई पर

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अच्छाकई की ववजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार ववजया दशमी यायन दशहरा
मनाया जाता है । इस ददन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।

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