सोलह सोमवार

मृ यु लोक म

मण करने क इ छा करके एक बार

करतेअमरावती नगर
समान सब

त कथा

ी भूतनाथ महादे व जी माता पावती के साथ

मण

वग के करते वदभ दे शांतगत अमरावती नाम क अती रमणीक नगर म पहुँचे ।-

कार के सुख से प रपूण थी । उसम वहां के महाराज का बन◌ाया हुआ अित रमणीक िशवजी का

म दर बना था । उसम कैलाशपित अपनी धमप ी के साथ िनवास करने लगे । एक समय माता पावती
ाणपित को

स न दे ख के मनो वनोद करने क इ छा से बोली – हे महाराजआज तो हम आप दोन चौसर !

खेल । िशवजी ने
का पुजार

ाण या क बात को मान िलया और चौसर खेलने लगे । उसी समय इस

ा ण म दर मे पूजा करने को आया । माताजी ने

क इस बाजी म दोन म कसक जीत होगी । पुजार
होगी । थोड़ दे र म बाजी समा
बोलने के अपराध के कारण
उ ह ने

बना वचारे ह शी

हो गई और पावती जी क

कया क पुजार जी बताओ
बोल उठा क महादे वजी क जीत

वजय हुई । अब तो पावती जी

ा ण को झूठ

ाप दे ने को उघत हुई । तब महादे व जी ने पावती जी को बहुत समझाया पर तु

ा ण को कोढ़ होने का

कोढ़ पैदा हो गया । इस

ाहमण से

थान पर म दर

ाप दे दया । कुछ समय बाद पावती जी के

कार पुजार अनेक

ापवश पुजार के शर र म

कार से दख
ु ी रहने लगा । इस तरह के क

दन हो गये तो दे वलोक क अ सराय िशवजी क पूजा करने उसी म दर म आ

पातेपाते जब बहुत -

और पुजार के क

को

दे खकर बड़े दया भाव से उससे रोगी होने का कारण पूछने लगीं – पुजार ने िनःसंकोच सब बाते उनसे कह द
। वे अ सराय बोलीं – हे पुजार अब तुम अिधक दख
ु ी मत होना !, भगवान िशवजी तु हारे क
। तुम सब
वन

त म

षोडश सोमवार का

भाव से षोडश सोमवार
के साथ

त कर, व छ व

त क

त भ

भाव से करो । तब पुजार अ सराओं से हाथ जोड़कर

विध पूछने लगा । अ सराय बोली क जस दन सोमवार हो उस दन

पहन, आधा सेर गेहूँ का आटा ले उसके तीन अंगा बनाये और घी, गुड़, द प,

नैवेघ, पुंगीफल, बेलप , जनेऊ का जोड़ा, च दन, अ त, पु पा द के

ारा

दोष काल म भगवान शंकर का विध

से पूजन कर त प ात अंगाओं म से एक िशवजी को अपण कर बाक दो को िशवजी क
उप थत जन म बांट द और आप भी
सोमवार के दन सवा सेर प व

साद पाव । इस विध से सोलह सोमवार

साद समझकर

त कर । त प ात ् स हव

गेहूं के आटे क बाट बनाय । तदअनुसार घी और गुड़ िमलाकर चूरमा बनाव

। और िशवजी का भोग लगाकर उप थत भ

म बांटे, पीछे आप सकुटु ं ब

कृ पा से उसके मनोरथ पूण हो जाते है । ऐसा कहकर अ सराय
षोडश सोमवार

को दरू कर दगे

त कयातब भगवान िशवजी क कृ पा से रोग मु

साद ल तो भगवान िशवजी क

वग को चली गयी ।

ा ण ने यथा विध

होकर आन द से रहने लगा । कुछ दन .

बाद जब फर िशवजी और पावती उस म दर म पधारे , तब पुजार को िनरोग दे खकर पावती ने पुजार से रोग

मु

का कारण पूछा तो पुजार ने सोलह सोमवार
ा ण से

त क

त कथा कह सुनाई । तब तो पावती जी अित

विध पूछकर

त करने को तैयार हुई ।

त करने के बाद उनक मनोकामना पूण हुई तथा उनके
आ ाकार पु

स न हो

ठे हुये पु

वामी काितकेय

वयं माता के

हुए पर तु काितकेय जी को अपने वचार प रवतन का रह य जानने क इ छा हुई और माता

से बोले – हे माताजी आपने ऐसा कौन सा उपाय कया जससे मेरा मन आपक ओर आक षत हुआ । तब !
पावती जी ने वह षोड़श सोमवार
काितकजी बोले

य क मेरा

य िम

त कथा उनको कह सुनाई ।

ा ण दःु खी दल से परदे श चला गया है । मै भी इस

हम उससे िमलने क बहुत इ छा है । तब काितकेयजी ने भी इस
िम

त को कया और उनको िम

ने इस आक मक िमलन का भेद काितकेयजी से पूछा त◌ो वे बोले – हे िम

इ छा करके सोलह सोमवार का
। काितकेयजी से

त क

त कया था । अब तो

विध पूछ और यथा विध

वदे श गया तो वहाँ के राजा क लड़क का
म सब

कार

क कृ पा से

ाहमण िम
त कया ।

वयंवर था । राजा ने

त को क ं गा िमल गया ।

। हमने तु हारे िमलने क

को भी अपने ववाह क बड़ इ छा हुई
त के

भाव से जब वह कसी कायवश

ण कया था क जस राजकुमार के गले


ं ृ ा रत हिथनी माला डालेगी म उसी के साथ अपनी यार पु ी का ववाह कर दं ग
ू ा । िशवजी

ाहमण भी

वयंवर दे खने क इ छा से राजसभा म एक ओर बैठ गया । िनयत समय पर हिथनी

आई और उसने जयमाला उस
का ववाह उस

ा ण ् के गले म डाल द । राजा क

ा ण के साथ कर दया और

ित ा के अनुसार बड़ धूमधाम से क या

ा ण को बहुतसा धन और स मान दे कर संतु

कया । -

ा ण सु दर राजक या पाकर सुख से जीवन यतीत करने लगा । एक दन राजक या ने अपने पित से
कया । हे

ाणनाथसा बड़ा पु य कया जसके

छोड़कर आपको वरण कया? ाहमण बोला – हे
सोमवार का व ्रत कया था जसके

भाव से हिथनी ने सब राजकुमार को -आपने ऐसा कौन !
ाण येमने अपने िम

भाव से मुझे तुम जैसी

सुनकर राजक या को बड़ा आ य हुआ और वह भी पु

जब पु
पु

उ प न हुआ । माता पता दोन उस दे व पु

तको विध स हत पु

के स मुख

को -

राजा के दे वलोक जाने पर यह

ा ण बालक ग

था । रा य का अिधकार होकर भी वह
ने अपनी

ा ण युवक के साथ करके बड़ा सुख

ा ण पु

कट कया । पु

त को रा यािधकार पाने क

त करने लगा । उसी समय एक दे श के वृ

ववाह ऐसे सवगुण स प न

पु

त क म हमा को

त करने लगी । िशवजी क दया

त को सब तरह के मनोरथ पूण करने वाला सुना तो वह भी इस

सोमवार आया तो व

हुई ।

कया क मां तूने कौनसा तप कया है जो मेरे जैसा -

तेरे गभ से उ प न हुआ । माता ने सोलह सोमवार

इ छा से हर सोमवार को यथा विध
वृ

ाि

कार से करने लगे ।- स न हुए । और उनका लालन पाकर अित

समझदार हुआ तो एक दन अपने माता से

ने ऐसे सरल

पवान ल मी क

क कामना करके

से उसके गभ से एक अित सु दर सुशील धमा मा व ान पु
पालन भली

काितकेयजी के कथनानुसार सोलह !

राजा ने अपनी पु ी का

कया ।

पर बठाया गया, य क दवंगत भूप के कोई पु

अपने सोलह सोमवार के

नह ं

त को कराता रहा । जब स हवां

यतमा से सब पूजन साम ी लेकर िशवालय म चलने के िलये कहा ।

पर तु राजक या ने उसक आ ा क परवाह नह ं क । दासदािसय

ारा सब सामि याँ िशवालय पहुँचवा द -

और

वयं नह ं गई । जब राजा ने िशवजी का पूजन कया, तब एक आकाशवाणी हुई क हे राजाअपनी इस !

को राज महल से िनकाल दो रानी, नह तो यह तु हारा सवनाश कर दे गी। वाणी को सुनकर राजा के आ य
का ठकाना नह ं रहा और त काल ह मं णागृह म आकर अपने सभासद को बुलाकर पूछने लगा क हे
मं य । मुझे आज िशवजी क वाणी हुई है क राजा तू अपनी इस रानी को िनकाल दे नह ं तो तेरा सवनाश
कर दे गी । मं ी आ द सब बड़े व मय और दःु ख म डू ब गये

य क जस क या के साथ रा य िमला है ।

राजा उसी को िनकालने का जाल रचता है , यह कैसे हो सकेगा । अंत म राजा ने उसे अपने यहां से िनकाल
दया । रानी दःु खी

दय भा य को कोसती हुई नगर के बाहर चली गई । बना पद ाण, फटे व

पहने, भूख

से दख
ु ी धीरे धीरे चलकर एक नगर म पहुँची । वहाँ एक बु ढ़या सूत कातकर बेचने को जाती थी । रानी क क ण दशा दे ख बोली चल तू मेरा सूत बकवा दे । म वृ

हूँ, भाव नह ं जानती हूँ । ऐसी बात बु ढ़या क सुत

रानी ने बु ढ़या के सर से सूत क गठर उतार अपने सर पर रखी । थोड़ दे र बाद आंधी आई और बु ढ़या का
सूत पोटली के स हत उड़ गया । बेचार बु ढ़या पछताती रह गई और रानी को अपने साथ से दरू रहने को कह
दया । अब रानी एक तेली के घर गई, तो तेली के सब मटके िशवजी के
दशा दे ख तेली ने रानी को अपने घर से िनकाल दया । इस

कोप के कारण चटक गये । ऐसी

कार रानी अ यंत दख
ु पाती हुई स रता के तट

पर गई तो स रता का सम त जल सूख गया । त प ात ् रानी एक वन म गई, वहां जाकर सरोवर म सीढ़ से
उतर पानी पीने को गई । उसके हाथ से जल

पश होते ह सरोवर का नीलकमल के स

य जल असं य क ड़

से भर गया ।
रानी ने भा य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पान करके पेड़ क शीतल छाया म व ाम करना चाहा,
वह रानी जस पेड़ के नीचे जाती उस पेड़ के प े त काल ह िगरते चले गये । वन, सरोवर के जल क ऐसी
दशा दे खकर गऊ चराते वाल ने अपने गुंसाई जी से जो उस जंगल म

थत मं दर म पुजार थे कह ।

गुंसाई जी के आदे शानुसार वाले रानी को पकड़कर गुंसाई के पास ले गये । रानी क मुख कांित और शर र
शोभा दे ख गुंसाई जान गये क यह अव य ह कोई विध क गित क मार कोई कुलीन अबला है । ऐसा सोच
पुजार जी ने रानी के
तुम को कसी

ित कहा क पु ी म तुमको पु ी के समान रखूंगा । तुम मरे आ म म ह रहो । म

कार का क

नह ं होने दं ग
ू ा। गुंसाई के ऐसे वचन सुन रानी को धीरज हुआ और आ म म
रहने लगी ।

पर तु आ म म रानी जो भोजन बनाती उसम क ड़े पड़ जाते, जल भरकर लाती उसम क ड़े पड़ जाते । अब तो
गुंसाई जी भी दःु खी हुए और रानी से बोले क हे बेट । तेरे पर कौन से दे वता का कोप है , जससे तेर ऐसी
दशा है । पुजार क बात सुन रानी ने िशवजी के पूजा करने को न जाने क कथा सुनाई तो पुजार िशवजी
महाराज क अनेक

कार से

तुित करते हुए रानी के
भाव से अपने क

ित बोले क पु ी तुम सब मनोरथ के पूण करने वाले

सोलह सोमवार

त को करो । उसके

से मु

हो सकोगी । गुंसाई क बात सुनकर रानी ने

सोलह सोमवार

त को विधपूवक स प न कया और स हव सोमवार को पूजन के

भाव से राजा के

दय म

वचार उ प न हुआ क रानी को गए बहुत समय यतीत हो गया । न जाने कहांकहां भटकती होगी-, ढू ं ढना
चा हये । यह सोच रानी को तलाश करने चार

दशाओं म दत
ू भेजे । वे तलाश करते हुए पुजार के आ म म

रानी को पाकर पुजार से रानी को मांगने लगे, पर तु पुजार ने उनसे मना कर दया तो दत
ू चुपचाप लौटे और
आकर महाराज के स मुख रानी का पता बतलाने लगे । रानी का पता पाकर राजा
गये और पुजार से

वयं पुजार के आ म म

ाथना करने लगे क महाराज । जो दे वी आपके आ म म रहती है वह मेर प ी ह ।

िशवजी के कोप से मने इसको

याग दया था । अब इस पर से िशवजी का

कोप शांत हो गया है । इसिलये

म इसे िलवाने आया हूँ । आप इसे मेरे साथ चलने क आ ा दे द जये । गुंसाई जी ने राजा के वचन को
स य समझकर रानी को राजा के साथ जाने क आ ा दे द । गुंसाई क आ ा पाकर रानी
के महल म आई । नगर म अनेक

स न होकर राजा

कार के बाजे बजने लगे । नगर िनवािसय ने नगर के दरवाजे पर तोरण

ब दनवार से व वधघर म मंगल- विध से नगर सजाया । घर- गान होने लगे । पं ड़त ने व वध वेद मं
उ चारण करके अपनी राजरानी का आवाहन कया । इस
महाराज ने अनेक

कार से

याचक को धन था-धा य दया । नगर म
था । इस

ा ण को दाना द दे कर संतु

वेश कया ।

कया ।

थान-न पर सदा त खुलवाये । जहाँ भूख को खाने को िमलता

कार से राजा िशवजी क कृ पा का पा

करते सोमवार

कार रानी ने पुनः अपनी राजधानी म

का

हो राजधानी म रानी के साथ अनेक तरह के सुख का भोग

त करने लगे । विधवत ् िशव पूजन करते हुए, लोक के अनेकानेक सुख को भोगने के प ात

िशवपुर को पधारे । ऐसे ह जो मनु य मनसा वाचा कमणा

ारा भ

स हत सोमवार का

विधवत ् करता है वह इस लोक म सम त सुख क को भोगकर अ त म िशवपुर को
सब मनोरथ को पूण करने वाला

त पूजन इ या द
होता है । यह

त है ।

कैसे कर सोलह सोमवार पूजन
शु ल प

के

थम सोमवार से सोलह सोमवार का

ार भ कर सकते ह, पर तु

ार भ कया जाता है वैसे तो कभी भी इस

ावण, काितक, माघ अथवा बैशाख मास के शु ल प

का आर भ अिधक फ़ल दायक कहा गया है आप कसी भी अिभ
करयह कारण .इस बात का वशेष
है क इस

के

त का .

थम सोमवार से

.◌ाय हे तु कसी भी मास से यह


ार भ

यान रख क आप पूजन एक ह िशविलंग अथवा एक ह मूित का करगे .

त के साधक मं दर म जाकर िशव आराधना करने के

िशविलंग क पूजा अिधक करते है ◌ंब उस

थान पर अपने घर म ह मूित अथवा

ितमा को अपने जससे य द कभी घर से दरू जाना पड़ जाये त .
.साथ ले जा सक

सोलह सोमवार के

त म माता पावती और िशवजी का पूजन कया जाता है िशवजी क पूजा आराधना म .

धतूरे के फ़ूल -पूजा म आक .गंगाजल से

नाना और भ म अपण का वशेष मह व है , बेलप , धतूरे के फ़ल,

सफ़ेद च दन, भ म आ द का
त का उ ापनअिधकांश य

योग अिनवाय है .

तो सोलह सोमवार को लगातार

.वैसे यह

त रखने के बाद

त का उ ापन कर लेते

त नौ अथवा चौदह वष भी कया जा सकता है .ह

-

उ ापन वाले दन िशव जी क पूजा -आराधना हे तु चार
पंचा र मं

से भगवान िशव को वहाँ

.उसम पानी भरे हुये पा

गंध . था पत कर, पु प, धूप, नैवे , फ़ल, द
अ पत कर .को पंचग य का

ार का म ड़प बनायवेद बनाकर

ा दक दे वताओं .

को रख .का आ ान करके कलश

णा, ता बूल, दपण और छ

थापना कर

आ द सब व तुओं को दे वताओं को

ाशन तथा िशवजी के भजन और कथाओं से सार रात जागरण कर रात .

पलाश क सिमधा . ातःकाल दे वेश क

फ़र पूजा कर और फ़र विधपूवक पूजन कर, स प, पायस, ितल, ी ह,

जौ, मधु और दव
ू ा इन आठ

मपूवक

.भूषण तथा द
इसी

कार आठ

य से

ी सोमेश को एक सौ आठ आहूित दहवन क समाि

णा आ द से आचाय का पूजन कर तथा

त क पूित के िलये आचाय को गऊ का दान द

ा ण को व , अलंकार और च दन आ द से पूजन करके द

णा स हत आठ कलश पकवान

के भरे हुये अलग - अलग द और उसी समय यह कह -' पकवान से भरे हुये घड़े को द
दे ता हूँ .आप इसको

हण क जये ! हे

पर .

.‘इसके प ात

णा स हत आपको

ा ण को भोजनकराकर कुटु बीजन स हत

मौन होकर आप भी भोजन कर.

मंगलवार
ाचीन काल म केशवद
केशवद

नामक

के घर म धन-संप

ा ण अपनी प ी अंजली के साथ ऋ ष नगर म रहता था।

क कोई कमी नह ं थी। नगर म सभी

थे, ले कन केशवद
दोन

ा ण द प

ा ण का स मान करते

संतान नह ं होने से बहुत िचंितत रहता था।

ित मंगलवार को मं दर म जाकर हनुमानजी क पूजा करते थे। विधवत ्

ापूवक मंगलवार का

त करते हुए कई वष बीत गए।
उसने

कुछ दन के बाद केशवद

त करना नह ं छोड़ा।

त करने लगी। दोन पित-प ी पु - ाि

का विधवत
पूवक

ा ण बहुत िनराश हो गया, ले कन

हनुमानजी क पूजा करने के िलए जंगल म चला गया। उसक प ी

अंजली घर म रहकर मंगलवार का

ा णी घर म ह भ

तकथा

के िलए मंगलवार

त पूजन करने लगे।

ीहनुमान जी क आराधना करती थी। मंगलवार के दन

भोजन बनाकर हनुमान जी भोग लगाने के बाद

त करके अ त म

वयं भोजन करती थी। एक बार मंगलवार के दन

ा णी गृह काय क अिधकता से हनुमान जी को भोग न लगा सक तो उसे बहुत दख
ु हुआ। उसने कुछ

भी नह खाया और अपने मन म
भोग लगाकर अ न-जल

ण करके सो गई क अब तो अगले मंगलवार को ह हनुमान जी का

हण क ं गी।

ा णी रोजाना भोजन बनाती थी, पर तु

थी और मन ह मन हनुमान जी क आराधना करती थी। इसी

कार छः दन गुजर गये और

अंजली अपने िन य के अनुसार भूखी- यासी रह । अगले मंगलवार को
िगर पड़ । उसक भ

के

भाव से हनुमान जी

स न हूँ। तू वर मांग। अंजली बोली - हे

स न हुये और

वयं भोजन नह करती

ा णी

ा णी

ातःकाल मुिछत होकर

कट होकर बोले - म तेर भ

से

भु, मेरे कोई संतान नह है । कृ पा करके मुझे एक संतान

दान कर। ीमहावीर जी बोले - तेर इ छा पूण होगी। ऐसा कह वह अ तधान हो गये।

ीहनुमान जी क कृपा से वह

ा णी गभवती हुई और दसव मह ने म उसे बहुत ह सु दर पु

हुई। मंगलवार को ज म लेने के कारण उस ब चे का नाम मंगल साद रखा गया। कुछ दन बाद

अंजिल का पित केशवद

भी घर लौट आया। उसने मंगल को दे खा तो अंजली से पूछा- 'यह

सुंदर ब चा कसका है ?' अंजली ने खुश होते हुए हनुमानजी के दशन दे ने और पु
वरदान दे ने क सार कथा सुना द । ले कन केशवद

होने का

को उसक बात पर व ास नह ं हु आ।

उसके मन म पता नह ं कैसे यह कलु षत वचार आ गया क अंजली ने उसके साथ व ासघात
कया है । अपने पाप को िछपाने के िलए अंजली झूठ बोल रह है ।
केशवद

ने उस ब चे को मार डालने क योजना बनाई। एक दन केशवदत

पर गया। मंगल भी उसके साथ था। केशवद

नान के िलए कुएँ

ने मौका दे खकर मंगल को कुएँ म फक दया और

घर आकर बहाना बना दया क मंगल तो कुएँ पर मेरे पास पहुँचा ह नह ं। केशवद

के इतने

कहने के ठ क बाद मंगल दौड़ता हुआ घर लौट आया।

केशवद

मंगल को दे खकर बुर तरह है रान हो उठा। उसी रात हनुमानजी ने केशवद

म दशन दे ते हुए कहा- 'तुम दोन के मंगलवार के

त करने से

मने दया था। फर तुम अपनी प ी को कुलटा

उसी समय केशवद

ने अंजली को जगाकर उससे

व न

स न होकर, पु ज म का वर
य समझते हो!'

मा माँगते हुए

दे ने क सार कहानी सुनाई। केशवद ने अपने बेटे को

को

व न म हनुमानजी के दशन

दय से लगाकर बहुत यार कया। उस

दन के बाद सभी आनंदपूवक रहने लगे।
मंगलवार का विधवत

त करने से केशवद और उनके सभी क

पु ष विधवत मंगलवार का
म धन-संप

दरू हो गए। इस तरह जो

त करके तकथा सुनते ह, हनुमानजी उनके सभी क

का भंडार भर दे ते ह। शर र के सभी र

वकार के रोग भी न

ी-

दरू करके घर

हो जाते ह।

बुधवार

तकथा

ाचीन काल म कु डलपुर नामक नगर म एक साहू कार था| वह बहुत धनवान था। साहूकार का ववाह

क सुंदर और गुणवंती लड़क से हुआ था। एक बार वो अपनी प ी को लेने बुधवार के दन

नगर

ससुराल गया।

प ी के माता- पता से वदा कराने के िलए कहा। माता- पता बोले- 'बेटा, आज बुधवार है । बुधवार को कसी भी
शुभ काय के िलए या ा नह ं करते।' साहूकार बोला क - ये सब वहम क बात है और म ऐसी बात को नह
मानता. ऐसा कह वह अपनी प ी के साथ घर के िलये

दोन ने बैलगाड़ से या ा
दोन ने पैदल ह या ा शु

थान कर गया.

ारं भ क । दो कोस क या ा के बाद उसक गाड़ का एक प हया टू ट गया। वहाँ से
क । रा ते म प ी को यास लगी। साहू कार उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने
चला गया।

थोड़ दे र बाद जब वो कह ं से जल लेकर वापस आया तो वह बुर तरह है रान हो उठा
पास उसक ह श ल-सूरत का एक दस
ू रा य

बैठा था। प ी भी

दोन म कोई अंतर नह ं कर पाई। साहूकार ने उस य

बैठे हो ?' साहूकार क बात सुनकर उस य

य क उसक प ी के

साहूकार को दे खकर है रान रह गई। वह

से पूछा- 'तुम कौन हो और मेर प ी के पास

ने कहा- 'अरे भाई, यह मेर प ी है । म अपनी प ी को ससुराल

से वदा करा कर लाया हूँ। ले कन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा

कर रहे हो?'

साहूकार ने लगभग गु से से चीखते हुए कहा- 'तुम ज र कोई चोर या ठग हो। यह मेर प ी है । म इसे पेड़
के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।' इस पर उस य

ने कहा- 'अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो।

अपनी प ी को यास लगने पर जल लेने तो म गया था। मने तो जल लाकर अपनी प ी को पला भी दया
है । वह लगभग साहूकार को फ़टकाते हुये बोला- अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो। नह ं तो कसी िसपाह
को बुलाकर तु ह पकड़वा दँ ग
ू ा।'

गु से से आगबबूला होते हुये दोन एक-दस
ू रे से लड़ने लगे। उ ह लड़ते दे ख बहुत से लोग वहाँ एक

हो गए।

नगर के कुछ िसपाह भी वहाँ आ गए। िसपाह उन दोन को पकड़कर राजा के पास ले गए। सार कहानी

सुनकर राजा भी कोई िनणय नह ं कर पाया। प ी भी उन दोन म से अपने वा त वक पित को नह ं पहचान
पा रह थी।

राजा ने दोन को कारागार म डाल दे ने के िलए कहा। राजा के फैसले पर असली साहुकार भयभीत हो उठा। तभी
आकाशवाणी हुई- साहुकार तूने माता- पता क बात नह ं मानी और बुधवार के दन अपनी ससुराल से
कया। यह सब भगवान बुधदे व के

साहुकार ने भगवान बुधदे व से

ाथना क

कोप से हो रहा है ।'

क 'हे भगवान बुधदे व मुझे

मा कर द जए। मुझसे बहुत बड़ गलती

हुई। भ व य म अब कभी बुधवार के दन या ा नह ं क ँ गा और सदै व बुधवार को आपका

साहुकार के

ाथना करने से भगवान बुधदे व ने उसे

थान

मा कर दया। तभी द स
ू रा य

त कया क ँ गा।'

राजा के सामने से गायब

हो गया। राजा और दस
ू रे लोग इस चम कार को दे ख है रान हो गए। भगवान बुधदे व क इस अनुक पा से राजा
ने साहुकार और उसक प ी को स मानपूवक वदा कया।

कुछ दरू चलने पर रा ते म उ ह बैलगाड़ िमल गई। बैलगाड़ का टू टा हुआ प हया भी जुड़ा हुआ था। दोन
उसम बैठकर नगर क ओर चल दए। साहुकार और उसक प ी दोन बुधवार को
जीवन-यापन करने लगे।

भगवान बुधदे व क अनुक पा से उनके घर म धन-संप
ह खुिशयाँ भर ग । बुधवार का

त करने से

त करते हु ए आनंदपूवक

क वषा होने लगी। ज द ह उनके जीवन म खुिशयाँ

ी-पु ष के जीवन म सभी मंगलकामनाएँ पूर होती ह।

बृह पितवार

त कथा

एक सेठ था, जसके घर म अ न और धन क कोई कमी नह थी पर तु उसक

ी बहुत ह कृ पण थी, वह कसी भी

िभ ाथ को कभी कुछ नह दे ती थी. सारे दन घर के काम काज म ह लगी रहती थी. एक समय साधु महा मा
बृह तवार के दन उसके

ार पर आये और िभ ा क याचना क .

ी उस समय घर आंगन को लीप रह थी. इस

कारण साधु महाराज से कहने लगी महाराज इस समय तो म लीप रह हूँ. आपको कुछ नह दे सकती, फ़र कसी
अवकाश के समय आना. साधु महा मा खाली हाथ चले गये. कुछ दन के प ात वह साधु फ़र आये और उसी तरह
िभ ा मांगी. सेठानी उस समय लड़के को

खला रह थी. कहने लगी क - हे ! महाराज

या क

अवकाश ह नह है ,

इसिलये आपको कुछ नह दे सकती. तीसर बार महा मा आये तो उसी तरह उनको टालना चाहा, पर तु महा मा कहने
लगे क य द तुमको ब कुल अवकाश हो जाये तब तो तुम मुझको िभ ा दोगी. सेठानी कहने लगी क हाँ महाराज य द
ऐसा हो जाये तो बहुत ह कृपा होगी. साधु महा मा कहने लगे क अ छा म तुमको एक उपाये बताता हूँ.
बृह पितवार को दन चढ़ने पर उठो और सारे घर म झाडू आ द लगाकर कूड़ा एक तरफ़ इक ठा करके रख दो, घर म
चौका मत लगाओ. फ़र

नान आ द करके घर वाल को कह दो क वह हजामत आ द अव य बनवाय. रसोई बनाकर

चू हे के पीछे रखा करो. सामने कभी न रखो. सायंकाल को बहुत अंधेरा होने के प ात द पक जलाया करो तथा
बृह पितवार को पीले व

कभी मत धारण करो, न ह पीले रं ग क चीज का भोजन करो. य द ऐसा करोगी तो तुमको

घर का कोई काम नह करना पड़े गा. सेठानी ने ऐसा ह

कया. वृह पितवार को खूब दन चढ़ने पर उठ , झाडू आ द

लगाकर कूड़े को एकतरफ़ इक ठा कर दया. पु ष ने भी हजामत आ द बनवाई भोजन बनवाने के प ात चू हे के पीछे
रख दया. उसके प ात वह सब वृह पितवार को ऐसा ह करती रह . अब कुछ दन के बाद उसके घर म खाने तक को
दाना भी नह रहा और भोजन के िलये दोन समय तरसने लगे. सेठ सेठानी से कहने लगा क सेठानी तुम यहाँ रहो, म
दस
ू रे दे श को जाऊं, य क यहाँ पर सब मनु य मुझे जानते ह. इसिलये कोई काय भी नह कर सकता. 'दे श चोर परदे स
भीख बराबर है .' ऐसा कहकर सेठ परदे स चला गया. वहाँ जंगल मे जाता और लकड़ काट कर लाता तथा शहर म बेचता.
इस

कार जीवन यतीत करने लगा.

सेठ के घर सेठानी और दासी दख
ु ी रहने लगी. कसी दन भोजन िमलता और कसी दन पानी पीकर रह जाती. एक बार
जब सेठानी को बना भोजन कये सात दन यतीत हो गये तो सेठानी ने अपनी दासी से कहा - हे दासी! यहाँ पास के
नगर म मेर बहन रहती है , वह बड़ धनवान है . इस कारण तू उसके पास जा और वहाँ से पाँच सेर बेझर ला, जससे कुछ
समय के िलये गुजर हो जायेगी. इस
क बहन पूजा कर रह थी

कार सेठानी क आ ा मानकर दासी उसक बहन के पास गई. उस समय सेठानी

य क उस दन वृह पितवार था. जब दासी ने सेठानी क बहन को दे खा तो वह बोली - हे

रानी मुझे आपक बहन ने भेजा है , मेरे िलये पाँच सेर बेझर दे दो. इस
उ र न दया

य क वह उस समय बृह पितवार के

कार दासी ने कई बार कहा पर तु रानी ने कुछ

त क कथा सुन रह थी. इस

कार जब बाँद को कसी

कार का

उ र न िमला तो वह बहुत दख
ु ी हुई तथा

ोध भी आया और लौट कर अपने गाँव म सेठानी से बोली- हे सेठानी!

तु हार बहन तो बहुत बड़ रानी है वह छोटे मनु य से बात नह करती. जब मैने उससे सब कहा तो उसने कसी
का उ र नह

कार

दया. सेठानी बोली क उसका कोई दोष नह है . जब बुरे दन आते ह तब बुरे दन आते ह तब कोई

सहारा नह दे ता. अ छे बुरे का पता आप काल म ह लगता है . जैसी ई र क इ छा होगी, वह होगा. यह सब हमारे
भा य का दोष है . उधर उस रानी ने दे खा क मेर बहन क दासी आई थी पर तु म उससे नह बोली. इससे वह बहुत
दख
ु ी हुई होगी. यह सोचकर कहानी को सुनकर और व णु भगवान का पूजन समा
द और वहाँ जाकर अपनी बहन से कहने लगी- हे ब हन! म वृह पितवार का

करके वह अपनी बहन के घर चल

त कर रह थी. तु हार दासी आई, पर तु

जब तक कथा होती है तब तक न उठते ह और न बोलते ह. इसिलये म नह बोली. दासी

य गई थी? सेठानी बोली-

बहन हमारे घर अनाज नह था. वैसे तुमसे कोई बात िछपी नह है , इस कारण मने दासी को तु हारे पास पाँच सेर बेझर
लेने को भेजा था. रानी बोली- बहन दे खो! वृह पित भगवान सबक मनोकामना पूण करते ह. शायद तु हारे घर म अनाज
रखा हो. इस

कार के वचन सेठानी ने सुने तो वह घर के अ दर गई और वहाँ उसे एक घडा बेझर िमल गया. तब वह

सेठानी और दासी

स न हुई. दासी कहने लगी - हे रानी! दे खो वैसे ह हमको भोजन नह िमलता इसिलये हम आज ह

त करते ह. अगर इनसे

त क

विध और कथा पूछ ली जाये तो उसे हम भी कया कर. तब उस सेठानी ने अपनी

बहन से पूछा क बहन! वृह पितवार के
क हे बहन! गु

केव

या है ? तथा वह

त कैसे करना चा हये? सेठानी क बहन ने कहा

त म चने क दाल, मुन का से व णु भगवान का, केले क जड़ म पूजन कर तथा द पक जलाय.

पीला भोजन कर तथा कहानी सुन. इस
पूण करते ह. इस

त क कथा

कार करने से गु

भगवान

स न होते ह. अ न, पु , धन दे ते ह. मनोकामना

कार से सेठानी और दासी दोन ने िन य कया क वह वृह पित भगवान का पूजन अव य करगे.

सात रोज बाद जब वृह पितवार आया तो उ ह ने

त रखा. घुड़साल म जाकर चना बीन तथा उसक दाल से केले क जड़

का तथा व णु भगवान का पूजन कया. अब पीला भोजन कहाँ से आये? बेचार बहुत दख
ु ी हुई पर तु उ ह ने
था. इस कारण गु

भगवान

त कया

स न हुये और दो थाल म सु दर पीला भोजन लेकर आये और दासी को दे कर बोले - हे

दासी! यह तु हारे और सेठानी के िलये भोजन है , तुम दोन करना. दासी भोजन पाकर बड़

स न हुई और सेठानी से

बोली - भोजन कर लो. सेठानी को इस वषय म कुछ पता नह था. इसिलये वह बोली-अर दासी ! तू ह भोजन कर,
य हमार

यथ म हँ सी उड़ाती है . दासी बोली-एक महा मा भोजन दे गया है . सेठानी कहने लगी- भोजन तेरे िलये दे

गया है , तू ह भोजन कर. दासी कहने लगी-वह महा मा हम दोन को दो थािलय म भोजन दे गया है . इसिलये हम और
तुम दोन ह साथ-साथ भोजन करगी. इस
ार भ कया तथा वह

कार सेठानी और दासी दोन ने गु

येक वृह पितवार को गु

भगवान का

भगवान को नम कार करके भोजन

त और व णु भगवान का पूजन करने लगी. बृह पित

भगवान क कृपा से सेठानी और दासी के पास फ़र काफ़ धन हो गया तो सेठानी फ़र उसी
तब दासी बोली- दे खो सेठानी! तुम फ़र उसी
सभी धन न

कार आल य करने लगी.

कार आल य कया करती थीं, तु ह धन रखने म क

हो गया. अब पुनः भगवान क कृपा से धन

होता था, इस कारण

हुआ है . तो फ़र तु ह आल य होता है . बड़ मुसीबत के

बाद हमने यह धन पाया है . इसिलये हम दान पु य करना चा हये तथा भूखे मनु य को भोजन करवाओं, याऊ लगवाओ,
ा ण को दान दो, कुआँ तालाब बावड़ आ द का िनमाण करवाओ, मं दर पाठशाला बनवाकर दानदो. कुँवार क याओं का
ववाह करवाओ. धन को शुभ काय म खच करो जससे तु हारा यश फ़ैलेगा तथा

वग

होगा.

जब सेठानी ने इस
जाने सेठ कस
राजा को

कार के कम करने आर भ कये तब उसका यश फ़ैलने लगा. सेठानी और दासी वचारने लगी क न

कार से ह गे. उनक कोई खबर नह िमली. गु

भगवान से उ ह ने

ाथना क और भगवान ने रा

व न म कहा- हे सेठ! उठ! तेर सेठानी तुझे याद करती है . अपने दे श को चलो. सेठ

वचार करने लगा क

ातःकाल उठा और

ी जाित खाने और पहनने क संिगनी होती है पर भगवान क आ ा मानकर वह अपने नगर के

िलये चलने को तैयार हुआ. इससे पूव
लगा था और उ ह शहर म

जब सेठ परदे स चला गया था तो

ित दन जंगल म से लकड़ बीन कर लाने

बेचकर अपने दख
ु ी जीवन को क ठनाई से यतीत करता था. एक दन सेठ दख
ु ी होकर

पुरानी बात को याद करके रोने लगा. तब उस जंगल म से वृह पितदे व एक साधु का

प धारण करके आ गये और राजा

के पास आकर बोले - हे लकड़हारे ! तुम इस जंगल म कस िच ता म बैठे हो, मुझको बताओ. यह सुनकर सेठ ने
आंसू भर लाया और बोला - हे

यह दशा हुई, अब तुम कसी

भो ! आप सब कुछ जानने वाले हो, इतना कह साधु को अपनी स पूण कहानी बता द .

महा मा दयालु होते ह, वे उससे बोले- हे सेठ ! तु हार
ने गु वार का

ी ने वृह पितदे व का अपमान कया था. जसके कारण तु हार

कार क िच ता मत करो. भगवान तु हे पहले से अिधक धनवान करे गा. दे खो, तु हार

त आर भ कर दया है और तुम मेरा कहना मानकर वृह पितवार का

त करके चने क दाल, गुड़, जल

को लोटे म ड़ालकर केले का पूजन करो फ़र कथा कहो और सुनो. भगवान तेर सब मनोकामनाओं को पूण करगे. साधु
को

स न दे ख सेठ बोला- हे

बचा सकूँ. मैने रा

भो! मुझे लकड़ बेचकर इतना पैसा नह िमलता क जससे भोजन करने के उपरा त कुछ

म अपनी सेठानी को याकुल दे खा है . मेरे पास कुछ भी नह है . जससे कम से कम उसक खबर
मंगा सकूँ और म कौन सी कथा कहूँ यह मुझको मालूम नह है .

साधु ने कहा- हे सेठ! तुम कसी

कार क िच ता मत करो. वृह पितवार के दन रोजाना क तरह लक ड़याँ लेकर शहर

जाओ. तुमको उस दन रोज से दग
ु ुना धन

होगा. जससे तुम भली

कार भोजन कर लोगे. जब वृह पितवार का

दन आया तो सेठ जंगल से लकड़ काटकर शहर बेचने गया. उसे उस दन और दन से अिधक पैसा िमला. सेठ ने
चना, गुड़ आ द लाकर गु वार का
का दन आया तो वह सेठ
वशाल य

त कया. उस दन से उसक सब क ठनाइयाँ दरू होने लगीं पर तु जब दब
ु ारा गु वार

त करना भूल गया. इस कारण बृह पित भगवान नाराज हो गये. उस दन नगर के राजा ने

का आयोजन कया तथा शहर म यह घोषणा करवा द

क कोई भी मनु य अपने घर भोजन न बनावे.

सम त जनता मेरे यहाँ भोजन करने आवे. इस आ ा को जो न मानगे उसके िलये फ़ाँसी क सजा द जायेगी.
राजा क आ ानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गये ले कन लकड़हारा कुछ दे र से पहुँचा. इसिलये राजा उसको
अपने साथ िलवा ले गये और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी क

उस खूंट पर पड़ . जस पर उसका हार

लटका रहता था. वह वहाँ पर दखाई न दया. रानी ने िन य कया क मेरा हार इसने चुरा िलया है . उसी समय
िसपा हय को बुलाकर उसे जेलखाने म ड़ाल दया गया. जब सेठ जेलखाने म पड़ गया और बड़ा दख
ु ी होकर वचार करने
लगा क न जाने कस पूव ज म के कम से मेरे िलये दख

म िमला था. उसी समय त काल बृह पित साधु के

प म

हुआ है और उसी साधु को याद करने लगा जो क जंगल
कट हो गये और उसक दशा को दे खकर कहने लगे - अरे

मूख! तूने बृह पित दे वता क कथा नह ं क इस कारण तेरे िलये दख

हुआ है . अब िच ता मत कर, बृह पित के

दन जेलखाने के दरवाजे पर चार पैसे पड़े िमलगे उनसे तू बृह पितवार का पूजन करना, तेरे सभी क

दरू हो जायगे.

बृह पितवार के दन उसे चार पैसे िमले. सेठ ने कथा क , तो उसी रा

को वृह पितदे व ने उस नगर के राजा को

व न

म कहा- हे राजा! तुमने जस आदमी को जेलखाने म ब द कर दया है वह िनद ष है , उसे छोड़ दे ना, रानी का हार उसी
खूंट पर टं गा हुआ है , अगर तू नह छोड़े गा तो म तेरे रा य को न
राजा

कर दं ग
ू ा. इस

ातः काल उठा और खूँट पर हार को दे खकर लकड़हारे को बुलाकर

कार के रा

के

व न को दे खकर

मा माँगी तथा सेठ को यथायो य सु दर व

आभूषण दे कर वदा कया.
सेठ जब नगर के िनकट पहुँचा तो उसे बहुत ह आ य हुआ. नगर म पहले से अिधक बाग, तालाब और कुएँ ह, बहुत सी
धमशाला, मं दर आ द बन गये ह. सेठ ने पूछा-ये कसका बाग और धमशाला है ? तो नगर के लोग कहते ह क यह सब
सेठानी और बाँद के ह. तो सेठ को और आ य हुआ तथा गु सा भी आया. जब सेठानी ने यह खबर सुनी क सेठ आ
रह ह तो उसने अपनी बाँद से कहा क हे दासी ! दे ख, सेठ हमको कतनी बुर हालत म छोड़कर गये थे. कह हमार
ऐसी हालत दे खकर लौट न जाय इसिलये तू दरवाजे पर जाकर खड़ हो जा. आ ानुसार दासी दरवाजे पर खड़ हो गई
और सेठ जब आ

तब उ ह िलवा लाई. तब सेठ ने

तु ह कैसे

ोध करके अपनी तलवार िनकाली और पूछने लगा क यह धन

हुआ. तो उ ह ने कहा- हम यह वृह पितदे व के

भाव से

हुआ है .

अब सेठ ने िन य कया क सभी बृह पितवार को बृह पितदे व का पूजन कया करगे.
इस

कार वृह पितदे व ऐसे दे व ह जनक

ाभाव से

त व कथा करने से सभी क मनोकामनाय पूण होती है .

पूजन विध बृह पितवार

त म केले का ह पूजन कर। कथा और पूजन के समय मन, कम और वचन से शु

के िलये वृह पितदे व से
नमक न खाएं, पीले व

होकर मनोकामना पूित

ाथना करनी चा हये। दन म एक समय ह भोजन कर । भोजन चने क दाल आ द का कर,
पहन, पीले फल का

योग कर, पीले चंदन से पूजन कर । पूजन के बाद भगवान वृह पित क

कथा सुननी चा हये । त प ात ्

ापूवक सप रवार आरती करनी चा हये ।

संतोषी माता

त कथा

एक बु ढय़ा के सात बेटे थे। छह कमाने वाले थे। एक िन कमा था। बु ढय़ा माँ छहो बेट क रसोई बनाती,
भोजन कराती और जो जूठन बचता वह सातव को दे दे ती थी, पर तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन म कुछ

वचार नह ं करता था। एक दन वह बहू से बोला- दे खो मेर माँ का मुझ पर कतना

ेम है । वह बोली- य

नह ,ं सबका झूठा बचा हुआ जो तुमको खलाती है । वह बोला- ऐसा नह ं हो सकता है । म जब तक आंख से न
दे ख लूं मान नह ं सकता। बहू ने हं स कर कहा- दे ख लोगे तब तो मानोगे? कुछ दन बात
सात

यौहार आया, घर म

कार के भोजन और चूरमे के ल डू बने। वह जांचने को िसर दख
ु ने का बहाना कर पतला व

िसर पर

ओढ़े रसोई घर म सो गया, वह कपड़े म से सब दे खता रहा। छह भाई भोजन करने आए। उसने दे खा, माँ ने

उनके िलए सु दर आसन बछा विभ न

कार क रसोई परोसी और

ेम पूवक उ ह खलाया। छह भोजन कर

उठे तब माँ ने उनक झूठ थािलय म से ल डु ओं के टु कड़े उठाकर एक ल डू बनाया। छोटा बेटा अ दर से सब
दे ख रहा था । जूठन साफ कर माँ ने उसे पुकारा- बेटा, सभी भाईय ने भोजन कर िलया । अब तू ह बाक है ,
उठ तू भी खा ले। वह कहने लगा- माँ मुझे भोजन नह ं करना, मै अब परदे स जा रहा हूं। माँ ने कहा- कल
जाता हो तो आज चला जा। वह बोला- हां आज ह जा रहा हूँ ।

यह कह कर वह घर से िनकल गया। चलते समय

ी क याद आ गई। वह गौशाला म क डे थाप रह थी।

वहाँ जाकर अपनी प ी से बोला- म परदे स जा रहा हूँ और कुछ समय बाद ह वा पस आऊंगा। तुम संतोष
पूवक यह ं रहकर अपने धम का पालन करना। वह बोली- आप बना मेर िच ता कये आराम से जाओ,

भगवान तु हार मदद करगे। बस मुझे मत भूलना, अगर हो सके तो मुझे अपनी एक िनशानी दे ते जाओ। वह

बोला- मेरे पास तो कुछ नह ,ं यह अंगूठ है सो ले और तुम भी अपनी कुछ िनशानी मुझे दे दो। वह बोली- मेरे
पास

या है , यह गोबर भरा हाथ है । यह कह कर उसक पीठ पर गोबर के हाथ क थाप मार द । वह चल

दया, चलते-चलते दरू दे श पहुंचा। वहां एक साहूकार क दक
ु ान थी। वहाँ जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकर

पर रख लो। साहूकार को ज रत थी, सो साहूकार ने उसे अपने यहां नौकर पर रख िलया। साहूकार क नौकर

िमलने के बाद बु ढ़या का वह बेटा बहुत ह मेहनत और ईमानदार के साथ वहाँ नौकर करने लगा। कुछ दन
म दक
ु ान का सारा लेन-दे न, हसाब- कताब, ाहक को माल बेचना सारा काम करने लगा।

सेठ ने उसक मेहनत और इमानदार से

भा वत होकर, तीन मह ने म ह उसे आधे मुनाफे का ह सेदार बना

िलया। वह कुछ वष म ह नामी सेठ बन गया और मािलक सारा कारोबार उस पर छोड़कर चला गया। अब बहू
पर

या बीती? सो सुन , सास ससुर उसे द:ु ख दे ने लगे।

सार गृह थी का काम कराके उसे लकड़ लेने जंगल म भेजते। इस बीच घर के आटे से जो भूसी िनकलती

उसक रोट बनाकर रख द जाती और फूटे ना रयल क नारे ली मे पानी। इस तरह दन बीतते रहे । एक दन
वह लकड़ लेने जा रह थी, रा ते मे बहुत सी

यां संतोषी माता का

होकर कथा सुनने लगी और पूछा- बहन तुम कस दे वता का

त करती दखाई द । वह वहां खड़

त करती हो और उसके करने से

या फल

िमलता है ? इस

त को करने क

या विध है ? य द तुम अपने इस

तो मै तु हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनम से एक

त का वधान मुझे समझा कर कहोगी

ी बोली- सुन , यह संतोषी माता का

त है । इसके

करने से िनधनता, द र ता का नाश होता है । ल मी आती है । मन क िच ताएं दरू होती है । घर म सुख होने

से मन को

स नता और शा त िमलती है । िनपूती को पु

िमलता है , ीतम बाहर गया हो तो शी

घर आता

है , कवांर क या को मन पसंद वर िमले, राज ारे म बहुत दन से मुकदमा चल रहा हो ख म हो जाता है ,

कलह

लेश क िनवृित हो सुख-शा त हो। घर म धन जमा हो, पैसा जायदाद का लाभ होता है , सभी रोग दरू

हो जाते ह तथा और जो कुछ मन म कामना हो सभी संतोषी माता क कृ पा से पूर हो जाती ह, इसम संदेह
नह ं। वह पूछने लगी- यह

तब उस

त कैसे कया जाए यह भी बताओ तो बड़ कृ पा होगी।

ी ने उसे संतोषी माता क सार

त विध समझा द . सब कुछ

यान पूवक सुन बु ढय़ा के लड़के

क बहू चल द । रा ते म उसने लकड़ का एक ग ठे बेच दया और उन पैस से गुड़-चना ले माता के

त क

तैयार कर आगे चली और सामने मं दर दे खकर पूछने लगी- यह मं दर कसका है ? सब कहने लगे यह संतोषी
माता का मं दर है ।

यह सुनकर वह माता के चरण म बैठकर रोने लगी। द न हो वनती करने लगी- माँ म िनपट अ ानी हूं।

के कुछ भी िनयम नह ं जानती, म द:ु खी हूं, हे माता जगत जननी मेरा द:ु ख दरू कर, म तेर शरण म हूँ।

माता को दया आई – एक शु वार बीता क दस
ू रे को उसके पित का प

आया और तीसरे शु वार को उसका

भेजा हुआ पैसा आ पहुँचा। यह दे ख जेठ- जठानी मुँह िसकोडऩे लगे। इतने दन म इतना पैसा आया, इसम
या बड़ाई? लड़के ताने दे ने लगे- काक के पास प

आने लगे, पया आने लगा, अब तो काक क खाितर

बढ़े गी, अब तो काक बोलने से भी नह ं बोलेगी। बेचार सरलता से कहती- भैया कागज आवे

पया आवे हम

सब के िलए अ छा है । ऐसा कह कर आंख म आंसू भरकर संतोषी माता के मं दर म आ माते र के चरण
म िगरकर रोने लगी। माँ मैने तुमसे पैसा कब माँगा है । मुझे पैसे से

काम है । मै तो अपने

वामी के दशन माँगती हूँ। तब माता ने

या काम है ? मुझे तो अपने सुहाग से

स न होकर कहा-जा बेट , तेरा

वामी आएगा।

यह सुनकर खुशी से बावली होकर घर म जा काम करने लगी। अब संतोषी माँ वचार करने लगी, इस भोली

पु ी को मैने कह तो दया क तेरा पित आएगा, पर कैसे? वह तो इसे

व न म भी याद नह ं करता। उसे याद

दलाने को मुझे ह जाना पड़े गा। इस तरह माता जी उस बु ढय़ा के बेटे के पास जा

व न म

कट हो कहने

लगी- साहूकार के बेटे, सो रहा है या जागता है । वह कहने लगा- माता सोता भी नह ,ं जागता भी नह ं हूँ कहो
या आ ा है ?

माँ कहने लगी- तेरे घर-बार कुछ है क नह ?
ं वह बोला- मेरे पास सब कुछ है माँ-बाप है बहू है

माँ बोली- भोले पु

तेर बहू घोर क

उठा रह है , तेर माँ-बाप उसे बहुत

या कमी है ।

ास दे रहे ह। वह तेरे िलए तरस रह

है , तू उसक सुध ले। वह बोला- हाँ माता जी यह तो मालूम है , परं तु जाऊं तो कैसे? परदे श क बात है , लेन-दे न
का कोई हसाब नह ,ं कोई जाने का रा ता नह ं आता, कैसे चला जाऊं? माँ कहने लगी- मेर बात मान, सवेरे
नहा धोकर संतोषी माता का नाम ले, घी का द पक जला द डवत कर दक
ु ान पर जा बैठ। दे खते-दे खते सारा
लेन-दे न चुक जाएगा, जमा का माल बक जाएगा, सांझ होते-होते धन का भार ढ़े र लग जाएगा। अब सवेरे

ज द उठ भाई-बंधुओं से सपने क सार बात कहता है । वे सब उसक अनसुनी कर द लगी उड़ाने लगे। कभी
सपने भी सच होते ह। एक बूढ़ा बोला- दे ख भाई मेर बात मान, इस

कार झूठ
ं -सांच करने के बदले माता ने

जैसा कहा है वैसा ह करने म तेरा

या जाता है । अब बूढ़े क बात मानकर वह नहा धोकर संतोषी माता को

द डवत धी का द पक जला दक
ु ान पर जा बैठता है । थोड़ दे र म

या दे खता है क दे ने वाले

पया लाने लगे,

लेने वाले हसाब लेने लगे। कोठे म भरे सामान के खर ददार नकद दाम दे सौदा करने लगे। शाम तक धन का
भार ढ़े र लग गया। मन म माता का नाम ले चम कार दे ख

स न हो घर ले जाने के वा ते गहना, कपड़ा

सामान खर दने लगा। यहां काम से िनपट तुरंत घर को रवाना हुआ।

बु ढ़या क छोट बहु बेचार जंगल म लकड़ लेने जाती है । लौटते व

वह तो उसके

ित दन

कने का जो

माताजी क मं दर म व ाम करती है ।

थान ठहरा, धूल उड़ती दे ख वह माता से पूछती है - हे माता, यह धूल कैसे

उड़ रह है ? माता कहती है - हे पु ी तेरा पित आ रहा है । अब तू ऐसा कर लक डय़ के तीन ग ठर बना ले,
एक नद के कनारे रख और दस
ू रा मेरे मं दर पर व तीसरा अपने िसर पर रख। तेरे पित को लक डय़ का

ग ठर दे ख मोह पैदा होगा, वह यहाँ

केगा, ना ता-पानी खाकर माँ से िमलने जाएगा, तब तू लक डय़ का बोझ

उठाकर जाना और चौक मे ग ठर डालकर जोर से आवाज लगाना- लो सासू माँ, लक डय़ का ग ठर लो, भूसी
क रोट दो, ना रयल के खेपड़े म पानी दो, आज मेहमान कौन आया है ? बहुत अ छा। माताजी से कहकर वह

स न मन से लक डय़ के तीन ग ठर ले आई। एक नद के कनारे पर और एक माताजी के मं दर पर रखा।
इतने म मुसा फर आ पहुँचा। सूखी लकड़ दे ख उसक इ छा उ प न हुई क हम यह पर व ाम कर और

भोजन बनाकर खा-पीकर गांव जाएं। इसी तरह

क कर भोजन बना, व ाम करके गांव को गया। सबसे

ेम से

िमला। उसी समय िसर पर लकड़ का ग ठर िलए वह उतावली सी आती है । लक डय़ का भार बोझ आंगन म
डालकर जोर से तीन आवाज दे ती है - लो सासूमाँ, लक डय़ का ग ठर लो, भूसी क रोट दो। आज मेहमान

कौन आया है ? यह सुनकर उसक सास बाहर आकर अपने दए हुए क

को भुलाने हे तु कहती है - बहु ऐसा

य कहती है ? तेरा मािलक ह तो आया है । आ बैठ, मीठा भात खा, भोजन कर, कपड़े -गहने प हन। उसक
आवाज सुन उसका पित बाहर आता है ।

अंगूठ दे ख याकुल हो जाता है । माँ से पूछता है - माँ यह कौन है ? माँ कहती है -बेटा यह तेर बहु है । आज १२
बष हो गए, जब से तू गया है तब से सारे गांव म जानवर क तरह भटकती फरती है । घर का काम-काज

कुछ करती नह ,ं चार पहर आकर खा जाती है । अब तुझे दे ख भूसी क रोट और ना रयल के खोपड़े म पानी

मांगती है । वह ल जत हो बोला- ठ क है माँ मैने इसे भी दे खा और तु ह भी दे खा है , अब दस
ू रे घर क ताली

दो, उसम रहूंगा। अब माँ बोली-ठ क है बेटा, जैसी तेर मरजी हो सो कर। यह कह ताली का गु छा पटक दया।
उसने ताली लेकर दस
ू रे मकान क तीसर मं जल का कमरा खोल सारा सामान जमाया। एक दन म राजा के

महल जैसा ठाट-बाट बन गया। अब
से कहा- मुझे संतोषी माता के

या था? बहु सुख भोगने लगी। इतने म शु वार आया। उसने अपने पित

त का उ ापन करना है । उसका पित बोला -अ छा, खुशी से कर लो। वह

उ ापन क तैयार करने लगी। जठानी के लड़क को भोजन के िलए कहने गई। उ ह ने मंजूर कया पर तु
पीछे से जठानी ने अपने ब च को िसखाया, दे खो रे , भोजन के समय सब लो खटाई मांगना, जससे उसका

उ ापन पूरा न हो। लड़के जीमने आए खीर खाना पेट भर खाया, परं तु बाद म खाते ह कहने लगे- हम खटाई
दो, खीर खाना हमको नह ं भाता, दे खकर अ िच होती है । वह कहने लगी- भाई खटाई कसी को नह ं द

जाएगी। यह तो संतोषी माता का

साद है । लड़के उठ खड़े हुए, बोले- पैसा लाओ, भोली बहु कुछ जानती नह ं
थी,

उ ह पेसे दे दए। लड़के उसी समय हठ करके इमली खटाई ले खाने लगे। यह दे खकर बहु पर माताजी ने कोप
कया। राजा के दत
ू उसके पित को पकड़ कर ले गए। जेठ जेठानी मन-माने वचन कहने लगे। लूट-लूट कर

धन इक ठा कर लाया है , अब सब मालूम पड़ जाएगा जब जेल क मार खाएगा। बहु से यह वचन सहन नह ं
हुए। रोती हुई माताजी के मं दर गई, कहने लगी- हे माता, तुमने

लगी? माता बोली- बेट तूने उ ापन करके मेरा

या कया, हँ सा कर अब भ

को

लाने

त भंग कया है । इतनी ज द सब बात भुला द ? वह कहने

लगी- माता भूलती तो नह ,ं न कुछ अपराध कया है , मैने तो भूल से लड़क को पैसे दे दए थे, मुझे

मा

करो। मै फर तु हारा उ ापन क ं गी। माँ बोली- अब भूल मत करना। वह कहती है - अब भूल नह ं होगी, अब
बतलाओ वे कैसे आएंगे? माँ बोली- जा पु ी तेरा पित तुझे रा ते म आता िमलगा। वह िनकली, राह म पित

आता िमला। वह पूछती है - तुम कहाँ गए थे? वह कहने लगा- इतना धन जो कमाया है उसका टै स राजा ने
मांगा था, वह भरने गया था। वह

स न हो बोली- भला हुआ, अब घर को चलो। घर गए, कुछ दन बाद फर

शु वार आया। वह बोली- मुझे फर माता का उ ापन करना है । पित ने कहा- करो। बहु फर जेठ के लड़क
को भोजन को कहने गई। जेठानी ने एक दो बात सुनाई और सब लड़क को िसखाने लगी। तुम सब लोग
पहले ह खटाई मांगना। लड़के भोजन से पहले कहने लगे- हमे खीर नह ं खानी, हमारा जी बगड़ता है ,

कुछ खटाई खाने को दो। वह बोली- खटाई कसी को नह ं िमलेगी, आना हो तो आओ, वह

लाकर भोजन कराने लगी, यथा श

ा ण के लड़के

णा क जगह एक-एक फल उ ह दया। संतोषी माता

माता क कृपा होते ह नव मास म उसके च

मा के समान सु दर पु

माता जी के मं दर को जाने लगी। माँ ने सोचा- यह रोज आती है , आज

दे खूँ तो सह । यह वचार कर माता ने भयानक

हुआ। पु

स न हुई।

को पाकर

ित दन

य न इसके घर चलू?
ँ इसका आसरा

प बनाया, गुड़-चने से सना मुख, ऊपर सूंड के समान होठ, उस

पर म खयां िभ न-िभ न कर रह थी। दे हली पर पैर रखते ह उसक सास िच लाई- दे खो रे , कोई चुडैल
डा कन चली आ रह है , लड़क इसे भगाओ, नह ं तो कसी को खा जाएगी।

लड़के भगाने लगे, िच लाकर खड़क बंद करने लगे। बहु रौशनदान म से दे ख रह थी, स नता से पगली बन
िच लाने लगी- आज मेर माता जी मेरे घर आई है । वह ब चे को दध
ू पीने से हटाती है । इतने म सास का
ोध फट पड़ा। वह बोली-

य इतनी उतावली हुई है ? ब चे को पटक दया। इतने म माँ के

ह लड़के नजर आने लगे। बहु सास से बोली- माँ मै जसका

ताप से लड़के

त करती हूँ यह वह संतोषी माता है । इतना

कहकर झट से सारे कवाड़ खोल दए। सबने माता जी के चरण पकड़ िलए और वनती कर कहने लगे- हे

माता, हम मूख ह, अ ानी ह, तु हारे
जग माता आप हमारा अपराध

त क

विध हम नह ं जानते, त भंग कर हमने बड़ा अपराध कया है ,

मा करो। इस

कार माता

स न हुई। बहू को

वैसा माता सबको दे , जो पढ़े उसका मनोरथ पूण हो।

संतोषी माता विध
ह द ु धम म शु वार का

स न हो जैसा फल दया,

त -

त तीन तरह से कया जाता है . इस दन भगवान शु , माता संतोषी तथा वैभव

ल मी का पूजन कया जाता है . तीन ह

त क

के िलए

विधयाँ अलग - अलग ह. संतोषी माता का

त – विध इस

कार है .

त करने वाल

धािमक मा यताओं के अनुसार माता संतोषी भगवान

ीगणेश क पु ी ह. इसिलए उनक

सुख-शा त तथा मन कामनाओं क पूित कर शोक वप

ता प रवार म

िच ता परे शािनय को दरू कर दे ती ह.

सुख-सौभा य क कामना से माता संतोषी के 16 शु वार तक

त कये जाने का वधान है .

- सूय दय से पहले उठकर घर क सफ़ाई इ या द पूण कर ल.
- नाना द के प ात घर म कसी सु दर व प व

जगह पर माता संतोषी क

ितमा या िच

था पत कर.

- माता संतोषी के संमुख एक कलश जल भर कर रख. कलश के ऊपर एक कटोरा भर कर गुड़ व चना रख.
- माता के सम

एक घी का द पक जलाएं.

- माता को अ त, फ़ूल, सुग धत गंध, ना रयल, लाल व

या चुनर अ पत कर.

- माता संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ.
- संतोषी माता क जय बोलकर माता क कथा आर भ कर.
- इस

त को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ म गुड़ और भुने चने रख.
- कथा क समा ी के प ात

- कथा व आरती के प ात हाथ का गुड़

व चना गौमाता को खलाएं, तथा कलश पर रखा हुआ गुड़ चना सभी को
के

इस

ापूवक सप रवार आरती कर.

प म बांट द.

- कलश के जल का पूरे घर म िछड़काव कर और बचा हुआ जल तुलसी क

कार विध पूवक

ा और

ेम से

शाद

यार म ड़ाल द.

स न होकर 16 शु वार तक िनयिमत उपवास रख. (उपवास म एक समय मीठे
भोजन का वधान है )

शी

ववाह क कामना, यवसाय व िश ा के

म कामयाबी और मनोवांिछत फ़ल क

दोनो क एक समान यह
इस

के िलए म हला व पु ष

त धारण कर सकत ह.

त म बरत वशेष सावधानीः-

- इस दन न तो ख ट व तु खाएं और न ह
- इस दन केवल

ाि

पश कर.

तधार के िलए ह नह अ पतु प रवार के हरे क सद य के िलए ख ट व तु व जत मानी गयी गई है .
इसिलए घर म ख ट व तु बननी ह नह चा हए.

- ख ट व तु का यहाँ तक

योग व जत माना गया है क पूजा व घर म ख टे फ़ल को भी इ तेमाल नह करना चा हए.

- प रवार म ह नह अ पतु कसी बाहर

को भी

इस दन ख ट व तु नह दे ना चा हए.

उ ापनः16 शु वार का

त करने के बाद, अंितम शु वार को

त का उ ापन करना चा हए. इसके िलए उपरो

विध से माता

संतोषी क पूजा कर 8 बालक (लड़को) को भोजन के िलए आमं त कर. अढ़ाई सेर आटे का खाजा, अढ़ाई सेर चावल क
खीर तथा अढ़ाई सेर चने के साग का भोजन पकाना चा हए. यह भोजन बालक को बहुत ह

केले का

शाद द.(बालक को एक दन पहले ह बता द क आज के दन अथात ् पूजा वाले दन वह कोई ख ट व तु न

खाएं, और

वयं भी

यथाश
इस

ा व यार से कराएं, तथा

यान रख क न तो कोई ख ट चीज़ खाएं और न कसी को खाने को द.) भोजन के प ात उ ह

णा द. द

णा म उ ह पैसे न दे कर कोई व तु द

कार विध- वधान से पूजन करने से माता

स न होकर अपने भ

मनोकामनाएँ पूण करती ह.

णा म दे कर वदा कर.
के दःु ख दा र य को दरू कर, उनक

ी शिनवार

त कथा

पूवकाल म इस पृ वी पर एक राजा रा य करता था। उसके पु

का नाम धमगु

था। उसने

अपने श ुओं को अपने वश म कर िलया । दै व गित से राजा और राजकुमार पर शिन क दशा
आई । राजा को उसके श ुओं ने मार दया । राजकुमार भी बेसहारा हो गया । राजगु को भी
श ुओं ने मार दया । उसक
राजकुमार धमगु

वधवा

ा णी तथा उसका पु

को अपने साथ ले िलया और अपने पु

शुिच त रह गया ।

ा णी ने

को साथ लेकर नगर को छोड़कर चल

द ।
गर ब

ा णी दोन कुमारो का बहुत क ठनाई से िनवाह कर पाती थी । कभी कसी शहर म और

कभी कसी नगर म दोन कुमार को िलए घूमती रहती थी । एक दन वह

ा णी जब दोन

कुमार को िलए एक नगर से दस
ू रे नगर म जा रह थी क उसे माग म मह ष शां ड य के दशन
हुए ।

ा णी ने दोन बालक के साथ मुिन के चरण मे

णाम कया और बोली- मह ष! म

आज आपके दशन कर कृ ताथ हो गई । यह मेरे दोन कुमार आपक शरण है , आप इनक र ा
कर । मुिनवर ! यह शुिच त मेरा पु

है और यह धमगु

राजपु

है और मेरा धमपु

सभी घोर दा र य म पड़े हुये ह, आप हमारा उ ार क जए। मुिन शां ड य ने

बात सुनी और बोले-दे वी! तु हारे ऊपर शिनदे व का

है । हम

ा णी क सब

कोप है । अतः आप शिनवार के दन

करके भगवान िशवजी क आराधना कया करो, इससे तु हारा क याण होगा ।
ा णी और दोन कुमार मुिन को

णाम कर िशव मं दर के िलए चल दए । शिनवार के दन

दोन कुमार ने मुिन के उपदे श अनुसार शिन का
िशवजी का पूजन कया. इस

त कया तथा पीपल के वृ

कार दोन कुमार को शिनवार का

क पूजा करके

त करते -करते चार मास

यतीत हो गये।
एक दन शुिच त

नान करने के िलए गया । उसके साथ राजकुमार नह ं था । क चड़ म उसे

एक बहुत बड़ा कलश दखाई दया । शुिच त ने उसको उठाया और दे खा तो उसम धन था ।

शुिच त उस कलश को लेकर घर आया और मां से बोला- हे मां! िशवजी ने इस कलश के
धन दया है ।

प म

माता ने आदे श दया- बेटा! तुम दोन इसको बांट लो । मां का वचन सुनकर शुिच त बहुत ह
स न हुआ और धमगु

से बोला- भैया! अपना ह सा ले लो । परं तु िशवभ

राजकुमार धमगु

ने कहा-मां! म हसा लेना नह ं चाहता, य क जो कोई अपने सुकृत से कुछ भी पाता है , वह उसी
का भाग है और उसे आप ह भोगना चा हये । भोले र िशवजी मुझ पर भी कभी कृ पा करगे ।
त प ात ् धमगु

ेम और भ

के साथ शिन का

त करके पूजा करने लगा । इस कार उसे

एक वष यतीत हो गया । बसंत ऋतु का आगमन हुआ । राजकुमार धमगु

तथा

ा ण पु

शुिच त दोन ह वन म घूमने गए । दोन वन म घूमते-घूमते काफ दरू िनकल गए । उनको
वहां सैकड़ गंधव क याएं खेलती हुई िमलीं ।

चा हए क वे
को
एक

ा ण कुमार बोला- भैया! च र वान पु ष को

य से बचकर रह । ये मनु य को शी

ह मोह लेती ह । वशेष

प से

चार

य से न तो भाषण करना व िमलना नह चा हये चा हए। पर तु गंधव क याओं के बीच
धान सु दर उस राजकुमार को दे खकर मो हत हो गई और अपने संग क स खय से बोली

क यहाँ से थोड़ दरू पर एक सु दर वन है , उसम नाना

कार के सु दर फ़ूल खल ह तुम सब

जाकर उन सब सु दर फ़ूल को तोड़कर ले आओ. तब तक म यहाँ बैठ हूँ. स खयाँ आ ा पाकर
चली गई और वह सु दर गंधव क या राजकुमार पर

जमाकर बैठ गई।

उसे अकेला दे खकर राजकुमार भी उसके पास चला आया। राजकुमार को दे खकर गंधव क या उठ
और बैठने के िलए प लव का आसन दया । राजकुमार आसन पर बैठ गया । गंधव क या ने
पूछा- आप कौन है ? कस दे श के रहने वाले ह तथा आपका आगमन कैसे हुआ है ? राजकुमार ने

कहा- म वदभ दे श के राजा का पु

हूं, मेरा नाम धमगु

चुके ह । श ुओं ने मेरा रा य छ न िलया है । म राजगु

है । मेरे माता- पता वगलोक िसधार
क प नी के साथ रहता हूं, वह मेर

धम माता ह । फर राजकुमार ने उस गंधव क या से पूछा- आप कौन है ? कसक पु ी ह और
कस काय से यहां पर आपका आगमन हुआ है ?
गंधव क या बोली- व वक नामक गंधव क म पु ी हूं । मेरा नाम अंशुमित है । आपको आता
दे ख आपसे बत करने क इ छा हुई, इसी से म स खय को अलग भेजकर अकेली रह गई हूं ।

गंधव कहते ह क मेरे बराबर संगीत व ा म कोई िनपुण नह ं है । भगवान शंकर ने हम दोन
पर कृ पा क है , इसिलए आपको यहां पर भेजा है । अब से लेकर मेरा-आपका

ेम कभी न टू टे ।

ऐसा कहकर क या ने अपने गले का मोितय का हार राजकुमार के गले म डाल दया ।
राजकुमार धमगु

ने कहा- मेरे पास न राज है , न धन । आप मेर भाया कैसे बनगी? आपके

पता है , आपने उनक आ ा भी नह ं ली । गंधव क या बोली- अब आप घर जाएं और परस
ातःकाल यहां

आएं, आपक आव यकता होगी। राजकुमार से ऐसा कहकर गंधव क या अपनी

सहे िलय के पास चली गई । राजकुमार धमगु

शुिच त के पास चला आया और उसे सब

समाचार कह सुनाया । फ़र दोन ने स पूण समाचार अपनी माँ को जाकर बता दया.
उसके बाद से तीसरे दन शुिच त को साथ लेकर राजकुमार धमगु
दे खा क

उसी वन म गया । उसने

वयं गंधवराज व वक उस क या को साथ लेकर उप थत ह। गंधवराज ने दोन

कुमार का अिभवादन कया और दोन को सुंदर आसन पर बठाकर राजकुमार से कहा
राजकुमार! म परस कैलाश पर गौर शंकर के दशन करने गया था । वहां क णा पी सुधा के
सागर भोले शंकरजी महाराज ने मुझे अपने पास बुलाकर कहा- गंधवराज! पृ वी पर धमगु
का राज
गु

राजकुमार है । उसके प रवार के लोग को बै रय ने समा

के कहने से शिनवार का

नाम

कर दया है । वह बालक

त करता है और सदा मेर सेवा म लगा रहता है । तुम उसक

सहायता करो, जससे वह अपने श ुओं पर वजय

कर सके। गौर शंकर क आ ा को

िशरोधाय करके म अपने घर को चला आया । घर पर मेर पु ी अंशुमित ने भी ऐसी ह

ाथना

क । िशवशंकर क आ ा तथा अंशुमित के मन क बात जानकर म ह इसको इस वन म लाया
हूं । म इसे आपको स पता हूं । म आपके श ुओं को परा त कर आपको आपका रा य दला दं ग
ू ा

ऐसा कहकर गंधवराज ने अपनी क या का ववाह राजकुमार के साथ कर दया तथा अंशुमित क
सहे ली क शाद

ा ण कुमार शुिच त के साथ कर दया। राजकुमार क सहायता के िलए गंधव

क चतुरंिगणी सेना भी द । धमगु
अधीनता

के श ुओं ने जब यह समाचार सुना तो उ होने राजकुमार क

वीकार कर ली और रा य भी लौटा दया । धमगु

धम भाई शुिच त को मं ी िनयु
राजमाता बनाया । इस

कया । जस

कार शिनवार के

त के

िसंहासन पर बैठा । उसने अपने

ा णी ने उसे पु

क तरह पाला था, उसे

भाव और िशवजी क कृ पा से धमगु

फर से

वदभराज हुआ ।
ीकृ ण भगवान बोले- हे पांडुनंदन! आप भी यह
होगा और सभी
युिध र ने शिनवार
इसी

त के

कार के सुख क

ाि

त क कथा सुनकर

होगी । आपके बुरे दन क शी

समाि

होगी ।

ीकृ ण भगवान क पूजा क और त आरं भ कया ।

भाव से महाभारत म पांडव ने

कया- सबसे बढ़कर उ ह

त कर तो कुछ समय बाद आपको रा य

ोण, भी म और कण जैसे महारिथय को परा त

ीकृ ण जैसा यो य सारथी िमला तथा िछना हुआ रा य

तक उसका सुख भोगा और फर दे ह

यागकर

वग क

ाि

क ।

कर वष

र ववार

तकथा

ाचीन काल म कंचनपुर म एक बु ढ़या रहती थी। र ववार के दन गोबर से अपने घर को
लीपना उस बु ढ़या का अटल िनयम था. वह बु ढ़या र ववार को दन भर िनराहार

त रहकर

शाम को अ न-िनिमत खा

साद को

तथा फ़ल भगवान सूयदे व को अ पत करती तथा उस

सूया त होने से पहले ह धारण कर लेती थी. भगवान सूयदे व क अनुक पा से थोड़े ह
बु ढ़या का घर धन-धा य से प रपूण हो गया. उस बु ढ़या क आिथक दशा म

दन म

गित दे खकर

उसक एक पड़ोिसन उससे उससे जलन करने लगी. उसक पड़ोसन अपने मन म सोचने लगी क
मेर गाय के गोबर से अपने घर को लीपने-पोतने के कारण ह बु ढ़या समृ शाली बन गयी है .
अब उसक पड़ोिसन अपनी गाय का गोबर बु ढ़या को नह दे ना चाहती थी. इसिलये वह अपनी
गाय को घर के भीतर ह बाँधे रखती.
दस
ू रे र ववार के दन अपना घर लीपने के िलये बु ढ़या गोबर न पा सक , इसिलये उसे बड़
असु वधा हुई. अपने िनयम म बाधा पड़ने के कारण वह बु ढ़या बहुत उदास हो गयी. मानिसक
िच ता के कारण बु ढया उस दन भगवान सूयदे व को कुछ भी अ पत न कर सक और न तो
वयं ह

शाद

प म कुछ

हण कया. शाम को वह भूखी- यासी िच तातुर अव था म सो
गई.

रा

म भगवान सूय नारायण ने उस बु ढ़या को

पूछा. बु ढ़या

व न म दशन दे कर उसके दःु ख का कारण

ने दख
ु ी होकर कहा क आज गोबर न िमलने का कारण म िनयमानुसार आपका

पूजन न कर सक . मेरा िनयम भंग हो गया. इसी एक बात से म अ य त दख
ु ी हूँ.
बु ढ़या क बात से दया

होकर सूय भगवान ने कहा क, म तु ह एक गाय दे ता हूँ. जससे

तु हार इ छा पूण होगी. म तु हारे

त-पालन क िन ा से अ य त

स न होकर तु ह वरदान

दे ना चाहता हूँ. अथात ् अब से सदै व सदै व तु हारा घर धन पु ा द से स प न रहे गा. इतना कह
भगवान सूयदे व वह ं अ तधान हो गये.

सुबह उठने पर बु ढया ने अपने आँगन म एक बछड़े वाली गाय को दे खा. रा

म दे खे हुये

व न

क बात बु ढ़या को याद आने लगी. बु ढ़या ने गाय को घर से बाहर बाँध कर उसके चारे क
यव था क .
बु ढ़या के दरवाजे पर बँधी हुई गाय को दे खकर उसक ई यालु पड़ोिसन के आ य का पारावार
न रहा. उस गाय के
पड़ोिसन ने उस

वणमय गोबर के प र याग से उसक पडोिसन व मत हो गयी. उसक

व णम गोबर के

थान पर अपनी गाय का

वभा वक गोबर रखकर उसे उठा

िलया पर तु बु ढ़या उसके कपट इस कपटाचरण का भेद न जान सक .
बु ढया के इस अ ानता पर भगवान सूयदे व ने वचार कया क, मेर गाय से इस बु ढ़या का
उपकार नह हो रहा है . इसिलये भगवान ने अपनी माया से भयंकर झंझावात (आँधी-तूफ़ान)
उ प न कर दया. जसके फ़ल व प बड़े -बड़े वशाल वृ
इस वनाशकार
गाय से बु ढ़या को

भी टू ट-टू ट कर भूिम पर िगरने लगे.

य को दे खकर बु ढ़या ने अपनी गाय को भीतर बाँध दया.
व णम गोबर

हुआ. बु ढया अ य त

ातःकाल उस

स न हुई और उसक सुर ा के

िलये िन य ह गाय को भीतर बाँधती. बु ढ़या क सावधानी से अब उसक पड़ोिसन का कोई वश
नह चलता था.
एक दन पड़ोिसन ने बु ढ़या क गाय छ न लेने के उ े य से एक चाल चली. उसने राजा के
पास उप थत होकर राजा से िनवेदन कया क - महाराज ! मेर पड़ोिसन बु ढ़या के पास एक
अ त
ु गाय है . जो

वणमय गोबर दे ती है . अतः वह गाय य द महाराज के पास रहे तो जनता
को लाभ हो सकता है .

राजा ने उसके

लोभन म आकर अपने िसपा हय को आदे श दया क तुम लोग जाकर उस गाय

को यहाँ लाओ. िसपा हय ने आ ा का पालन कया. अब वह गाय र क क दे ख -रे ख म रहने
लगी. र क के िलये राजा क आ ा हुई क कोई भी गाय का गोबर उठाकर न ले जाने पावे.
आदे श दे कर राजा महल म चले गये. उस दन क रात म राजा को
आई. राजा सुबह होने क
वहाँ

स नता के कारण नींद न

ित ा उ सुकता पूवक करने लगा. सुबह गाय के पास जाकर दे खा -

वाभा वक गोबर के अित र

कुछ न था. राजा क
पकड़वा मँगाया.

ोधा न भड़क उठ उ ह ने बु ढ़या को

राजा ने बु ढया से पूछा -

या तु हार गाय सोने का गोबर दे ती है ? इसी बात क सूचना पर

मने तु हार गाय मँगवायी थी. फ़र

या कारण है क गाय वैसा गोबर न दे सक ? बु ढ़या ने

उ र दया-महाराज, गाय के गोबर से घर लीपना मेरा िन य का काम है . म दन भर
सायं काल भगवान सूय को नैवे

अ पत कर उसी

साद को

त रहकर

हण करती हूँ . मेरे पास जब

अपनी गाय न थी तो म पड़ोिसन क गाय के गोबर से घर लीपती थी. दै वयोग से गोबर के
अभाव म म एक दन अपने िनयम का पालन न कर सक . उस दन म रा
गई. रा

म भगवान ने

व न दे कर मुझे यह

म भूखे ह सो

दान क . मेर ई यालु पड़ोिसन ने आपको सूचना

दे कर मेर गाय मुझसे िछनवा ली. गाय के स ब ध म म बस इतना ह जानती हूँ .
बु ढ़या क बात से संतु

होकर राजा ने कहा - बूढ़ माँ, मुझे

मा करो. मैने अ ानतावश

तु हार गाय मंगा ली है . अब म तु हार गाय तु हारे घर भेज दे ता हूँ. इस काय के िनिम
तु हार पड़ोिसन अपरािधन है और उसे इसका द ड़ िमलाना चा हये.
अपनी गाय वा पस पाकर बु ढ़या

स न होकर अपने घर चली गयी. इसके बाद राजा ने उसक

अपरािधनी पड़ोिसन को बुलवाकर उसे उिचत द ड दया.
उस दन से राजा ने अपने नगर म घोषणा कर द
त रहकर सूयदे व का पूजन कर. राजा
इस

त को करने वाले पर भगवान सूय

रोग से मु

कर दे ते ह. इस

त के

क र ववार के दन सभी नगरवासी दनभर

वयं भी र ववार

त के िनयम पालन करने लगा.

स न होकर उसे धन-धा य से समृ

और स पूण

भाव से अ धे और कु ी मनु य को वशेष लाभ होता है .

हरतािलका तीज
कहते ह िक इस

त कथा

त दस महा मय िक कथा भगवान शव ने पारवती जी को उनके पूव ज म ड के

मरण करवाने के मकसद से इस

हे गौर ! पवतराज िहमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बा य वा ता मे अधोमुखी होकर घोर ताप िकया था. इस अव ध मे तुमने

अ न न खा कर केवल हवा का ह सेवन िकया था. इस अव ध मे तुमने अ न न खा कर केवल हवा का ह सेवन िकया था. इतनी अवधी
तुमने सूखे प े चबा कर काटा था.
माघ क शीतलता मे तुमने नरं तर जल मे

वेश कर ताप िकया था. वैशाख क जला दे ने वाली गम मे पंचा न से शार र को तपाया.

ावन क मुसलाधार वषा मे खुले असमान के नचे बना अ न जल हण िकये यतीत िकया.
कार से कह थी-तु हार इस क दायक तप या को दे ख कर तु हारे पता बहुत दख
ु ी हुए और नाराज़ होते थे. तब एक िदन तु हार तप या और पता क
नाराजगी को दे ख कर नारद जी तु हारे घर पधारे .
तु हारे पता

ारा आने का कारण पूछने पर नारद जी बोले - हे ग रराज! मै भगवान ् व णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ . आपक क या

क घोर तप या से
कर

ीमान यिद

स न होकर वह उससे ववाह करना चाहते ह इस बारे मै म आपक राय जाना चाहता हूँ . " नारद जी क बात सुन

वयं व णु मेर क या का वरण करना चाहते ह तोह मुझे

पता क इ छा होती है क उसक पु ी सुख स पदा से यु
नारद जी तु हारे पता क

या आप त हो सकती ह . ये तोह

वयं

ा है . यह तो हर

प त के घर क ल मी बने . "

वीकृ त पाकर व णु जी के पास गए और उ ह ने ववाह तय होने का समाचार सुनाया. पर तु जब तु हे इस

ववाह के बारे म पता चला तो तु हारे दःु ख का िठकाना ना रहा . तु हे इस

कार से दख
ु ी दे ख कर तु हार एक सहे ली ने तु हारे दःु ख का

कारण पूछने पतुमने बताया - क मने स चे मन से भगवान ् शव का वरण िकया है , िक तु मेरे पता ने मेरा ववाह व णु जी के साथ
तय कर िदया है . म व च

ह समझदार थी. उसने कहा
क साथकता इ सी मै है क

धम संकट मै हूँ अब मेरे पास
ाण छोरने का यहाँ कारण ह

जससे मान से प त

ाण

याग दे ने के अलावा कोई और उपाय नह ं बचा है . तु हार सखी बहुत

या है ? संकट के समय धेय से काम लेना चािहए . भारतीय नार के जीवन

प से एक बार वरण कर लया, जीवन पयत उ सी से नवाह कर. सची अव था और

एक न ां के सम त भगवान ् भी असहाय ह . मै तु हे घनघोर वन मै ले चलती हूँ , जो साधना थल भी है और जहा तु हारे पता तु हे
खोज भी नह ं पाएंगे , मुझे पूण व ास है क इ र अव य ह तु हार सहायता करगे.
तुमने ऐसा ह िकया , तु हारे पता तु हे घर मै न पा कर बड़े

तत और दख
ु ी हुए. वह सोचने लगे क मने तोह व णु से अपनी पु ी

का ववाह तय िकया है तभी भगवान ् व णु बारात ले कर आ गये और और क या घर पर नह ं मली तोह बहुत अपमान होगा , ऐसा
वचार कर पवत राज ने चारो ओर तु हार खोज सु

करव द इधर तु हार खोज होती रह उधर तुम अपनी सहे लुई के साथ तट पर एक

गुफा मै मै मेर आराधना मै लीं रहने लगी, भा पद तृतीय शु ल का ह त न
रात भर मेर

था. उस िदन तुमने रे त क

पंहुचा और तुमसे वर मागने को कहा तब अपनी तप या के फली भीत मुझे अपने सम
के
मे

शव लं का नमाण िकया

तुती मे गीत गा कर जागरण िकया तु हार इस कठोर तप या से मेरा आसन िहल उठा और मे शी

प मे वरण कर चुक हूँ . यिद आप यहाँ स चे मान से मेर तप या से

ह मे तु हारे पास

पाकर तुमने कहा मे आप क सचे मन से प त

सन हो कर यहाँ पधारे ह तो मुझे अपनी अधागनी के

वीकार कर ली जये . तब तथा तु कह कर मे कैलाश पवत पर लौट गया, ातः होते ह तुमने पूजा क सम त साम ी नद मे

वािहत कर के अपनी सखी सिहत

त का वरण िकया उसी समय गर राज अपने बंधू बांधव के साथ तु हे खोजते हुए वहा पहुचे.

तु हार दशा दे ख कर अ यंत दख
ु ी हुए और तु हार इस कठोर तप या का कारण पूछा . तब तुमने कहा - पता जी मने अपने जीवन का
अ धकांश व त कठोर तप या मे बताया िहया . मेर इस तप या मे केवल उ

े य महादे व जी को प त

प मे

करना था. आज मे

अपनी तप या क कसोट पर खर उतर चुक हूँ चुक आप मेरा ववाह व णु जी से करने का न य कर चुके थे , इ सी लए मै अपने

आरा य क तलाश मै घर से चली गयी थी . अब मै आप के साथ घर इस शत पर चलूंगी क आप मेरा ववाह महादे व जी के साथ करगे
पूण वराम . पवतराज जी ने मेर इ छा

वीकार कर ली और तु हे घर वापस ले आये . कुछ समय बाद उ ह ने पुरे व ध वधान के

साथ हमारा ववाह िकया , भगवान ् शव ने आके कहा - है पारवती! भा पद क शु ल तृतीय क तुमने मेर आराधना कर के जो
था उसी के प रणाम
येक

व प हम दोन का व वः संभव हो सका. इस वरात का मह व यह है क मै इस

ी को मंवां चत फल दे ता हूँ . इस वरत को हरता लका इस लए कहा जाता है

से हर कर जंगल मै ले गयी थी. हरत

त क पूण न ां से करने वाली

यक पारवती जी क सखी उ ह पता और

अथात हरण करना और ता लका अथत सखी .

भगवान ् शव ने पारवती जी से कहा िक इस वरात को जो भी

ी पूण

त क

धा से करे गी उससे तु हार तरह अचल सुहाग

होगा.

दे श

करवा चौथ

त कथा

ाचीन समय क बात है । एक साहूकार के सात बेटे और उनक एक बहन करवा थी। सभी सात भाई अपनी बहन से बहुत
यार करते थे। यहाँ तक क वे पहले उसे खाना खलाते और बाद म

वयं खाते थे। एक बार उनक बहन ससुराल से मायके

आई हुई थी।
शाम को भाई जब अपना यापार यवसाय बंद कर घर आए तो दे खा उनक बहन बहुत याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आ ह करने लगे, ले कन बहन ने बताया क उसका आज करवा चौथ का िनजल

त है और

वह खाना िसफ चं मा को दे खकर उसे अ य दे कर ह खा सकती है । चूँ क चं मा अभी तक नह ं िनकला है , इसिलए वह भूखयास से याकुल हो उठ है ।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन क हालत दे खी नह ं जाती और वह दरू पीपल के पेड़ पर एक द पक जलाकर चलनी क ओट
म रख दे ता है । दरू से दे खने पर वह ऐसा

तीत होता है क जैसे चतुथ का चाँद उ दत हो रहा हो।

इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है क चाँद िनकल आया है , तुम उसे अ य दे ने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन
खुशी के मारे सी ढ़य पर चढ़कर चाँद को दे खती है , उसे अ य दे कर खाना खाने बैठ जाती है ।
वह पहला टु कड़ा मुँह म डालती है तो उसे छ ंक आ जाती है । दस
ू रा टु कड़ा डालती है तो उसम बाल िनकल आता है और जैसे
ह तीसरा टु कड़ा मुँह म डालने क कोिशश करती है तो उसके पित क मृ यु का समाचार उसे िमलता है । वह बौखला जाती है ।
उसक भाभी उसे स चाई से अवगत कराती है क उसके साथ ऐसा

य हुआ। करवा चौथ का

त गलत तर के से टू टने के

कारण दे वता उससे नाराज हो गए ह और उ ह ने ऐसा कया है ।
स चाई जानने के बाद करवा िन य करती है क वह अपने पित का अंितम सं कार नह ं होने दे गी और अपने सती व से उ ह
पुनज वन दलाकर रहे गी। वह पूरे एक साल तक अपने पित के शव के पास बैठ रहती है । उसक दे खभाल करती है । उसके
ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एक त करती जाती है ।
एक साल बाद फर करवा चौथ का दन आता है । उसक सभी भािभयाँ करवा चौथ का
आशीवाद लेने आती ह तो वह

त रखती ह। जब भािभयाँ उससे

येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहािगन बना दो' ऐसा

आ ह करती है , ले कन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आ ह करने का कह चली जाती है ।
इस

कार जब छठे नंबर क भाभी आती है तो करवा उससे भी यह बात दोहराती है । यह भाभी उसे बताती है क चूँ क सबसे

छोटे भाई क वजह से उसका

त टू टा था अतः उसक प ी म ह श

है क वह तु हारे पित को दोबारा जी वत कर सकती

है , इसिलए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तु हारे पित को जंदा न कर दे , उसे नह ं छोड़ना। ऐसा कह
के वह चली जाती है ।
सबसे अंत म छोट भाभी आती है । करवा उनसे भी सुहािगन बनने का आ ह करती है , ले कन वह टालमटोली करने लगती है ।
इसे दे ख करवा उ ह जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जंदा करने के िलए कहती है । भाभी उससे छुड़ाने के िलए
नोचती है , खसोटती है , ले कन करवा नह ं छोड़ती है ।
अंत म उसक तप या को दे ख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोट अँगुली को चीरकर उसम से अमृत उसके पित के मुँह
म डाल दे ती है । करवा का पित तुरंत

ीगणेश

ीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है । इस

मा यम से करवा को अपना सुहाग वापस िमल जाता है । हे

ी गणेश माँ ग◌ौर

कार
जस

वरदान आपसे िमला है , वैसा ह सब सुहािगन को िमले।

भु कृ पा से उसक छोट भाभी केकार करवा को िचर सुहागन का

अ यंत मंगलकार और िशवकृपा

दोष

दान करने वाला "

दोष

योदशी को कया जाता है । यह एक ऐसा
बताया गया है . र ववार के दन
के दन
मु

दोष

येक मास के कृ ण व शु ल प

वा

त रखा जाए तो

य िमलता है । बुधवार का

त से श ु का नाश होता है । शु

दोष

होती है । इस दन सूया त के समय
से

त करने वाला सदा िनरोगी रहता ह। सोमवार

त कामना िस

त सौभा य म वृ

योदशी -

के िलये होता है । वृह पित वार के
दोष

त से पु

कर डाला । यह दे ख वृ ासुर अ य त

दोष-समय म एक बार भोजन कर।

दोष

और रा राज वृ ासुर क सेना म घनघोर यु

उसने वकराल

त रखने से सभी रोगो से

नान करके, लाल कनेर के पु प, लाल च दन और धूप-द पा द

वृह पित

कर न -

दोष

करता है , तो शिन

ापूवक भगवान िशव का पूजन कर। िशवपूजन करके

एक बार इ

त है जसम सभी वार क अलग- अलग कथा व मह व

त धारण करने से सभी इ छाय फ़िलत होती ह। मंगलवार को

तथा अ छा

ाि

त"

हुआ । दे वताओं ने दै य-सेना को परा जत

ोिधत हो

वयं यु

को उ त हुआ । आसुर माया से

प धारण कर िलया । सभी दे वता भयभीत हो गु दे व बृह पित क शरण म पहुँचे ।

बृह पित दे व बोले- पहले म तु हे वृ ासुर का वा त वक प रचय दे दं ू । वृ ासुर बड़ा तप वी और कमिन
है । उसने ग धमादन पवत पर घोर तप या कर िशव जी को

स न कया । पूव समय म वह िच रथ

नाम का राजा था । एक बार वह अपने वमान से कैलाश पवत चला गया । वहां िशव जी के वाम अंग
म माता पावती को वराजमान दे ख वह उपहासपूवक बोला- 'हे
हम

य के वशीभूत रहते ह । क तु दे वलोक म ऐसा

भो! मोह-माया म फंसे होने के कारण

गोचर नह ं हुआ क

ी आिलंगनब

हो सभा

म बैठे।' िच रथ के यह वचन सुन सव यापी िशवशंकर हं सकर बोले- 'हे राजन! मेरा यावहा रक

कोण

पृथक है । मने मृ युदाता-कालकूट महा वष का पान कया है , फर भी तुम साधारण जन क भांित मेरा
उपहास उड़ाते हो! माता पावती

ोिधत हो िच रथ से संबोिधत हुई- 'अरे द ु ! तूने सव यापी महे

र के

साथ ह मेरा भी उपहास उड़ाया है । इसिलये म तुझे वह िश ा दं ग
ू ी क फर तू कभी ऐसे संत के
उपहास का द ु साहस नह ं करे गा- अब तू दै य

व प धारण कर वमान से नीचे िगर, म तुझे शाप दे ती

हूं । जगद बा भवानी के अिभशाप से िच रथ रा स योिन को

हो

व ा नामक ऋ ष के

उ प न हो वृ ासुर बना । गु दे व बृह पित आगे बोले- वृ ासुर बा यकाल से ह िशवभ

तुम बृह पित

कर बृह पित

दोष

दोष

त कर शंकर भगवान को

त कया । गु

दोष

त के

तप से

रहा है । अतः हे

स न करो। दे वराज ने गु दे व क आ ा का पालन
ताप से इ

ने शी

ली और दे वलोक म सुख शा त छा गई ।

ह वृ ासुर पर वजय

कर

स यनारायण

त कथा

पूजन साम ी:
केले के ख बे, कलश, पाँच र ,चावल, धुप, पु प माला, अंग व , नैवै य, आम के प ,े व , सोने क
ितमा, कपूर, गुलाब के फूल, द प, तुलसी, पान, पंचामृतघी), दह , शहद, तुलसी का प ा, श कर(, साद
आटे ), घी और श कर से बना(
त करने वाला पू णमा,सं ांत या एकादसी के दन,सं या
आसन पर बैठकर और
संक प करे क म
स यनारायण

ी गणेश,गौर ,व ण, व णुजी आ द नव दे वताओं का

ी स यनारायण

वामी का

नान आ द से िनवृ

वामी का पूजन तथा

यान करे |पु प,धुप,द प,नैवे

थान म

यान करके,पूजन करे और

वण सदै व क ँ गा| पु प हाथ म लेकर, ी

आ द से यु

ा पूवक फल,जल,आ द सब साम ी आपको अपण क है ;इसे
क जये, मेरा आपको बार बार नम कार है | इसके बाद

होकर,पूजा

होकर

तुित कर|'हे भगवन,मने

वीकार क जये,आपदाओं से मेर र ा

ी स यनारायण क कथा पढ़े अथवा

वण कर|

कथा
पहला अ याय
एक समय नेिमशारणय तीथ म शौिनक आ द अठासी हज़ार ऋ षय ने
कलयुग म व ा र हत मनु य को

भु भ

कस

अब म उस

ाता

हो तथा मनोवांिछत फल िमले|

ी सूतजी बोले, "हे वै णव म पू य- आप सब ने सव
त को आप लोगो म कहूँगा, जस
ी ल मीपित ने मुिन

भु! इस

कार िमलेगी तथा उनका उ ार कैसे होगा? इसिलए हे

मुिन े , कोई ऐसा तप क हये जस से थोड़े समय म पु य
सवशा

ी सूतजी से पूछा- "हे

ा णय के हत क बात पूछ है |

त को नारदजी ने

नारद से कहा था,सो

ी ल मीनारायण से पूछा था और

यान से सुिनये|

मुिननाथ सुनो यह स यकथा सब काल हं होय महासुखदाई | ताप हरे , भाव दरू करे , सब काज सरे सुख क
अिधकाई ||

अित संकट म दःु ख दरू करे सब ठौर कुठौर म होत सुहाई | भु नाम च रत गुणगान कये बन कैसे
महाकिल पाप नसाई ||

एक समय,योगीराज नारद जी दस
ू र के हत क इ छा से, अनेक लोक म घूमते हुए मृ युलोक म आ
पहुँचे| वहाँ बहुत योिनय म ज मे हुए
दे खकर कस य
को गये | वहाँ
और प

ायः सभी मनु य को अपने कम के

ारा अनेक दख
से पी ड़त

के करने से िन य ह इनके दख
का नाश हो सकेगा, ऐसा मन म सोचकर व णुलोक

ेत वण और चार भुजाओं वाले दे व के ईश नारायण को ( जनके हाथ म शंख, च , गदा

थे, तथा वनमाला पहने हुए थे) दे खकर

तुित करने लगे | "हे भगवन, आप अ यंत श

संप न ह | मन तथा वाणी भी आपको नह ं पा सकती, आपका आ द, म य और अंत नह ं है , िनगुण

कार

के आ द, भूत व भ

के दख
को न

से
व प

करने वाले ह, आपको मेरा नम कार है |" नारदजी से इस

तुित सुनकर व णु भगवान बोले क "हे मुिन े -आपके मन म

या है ? आपका यहाँ कस काम

के िलए आगमन हुआ है ? िनःसंकोच कहो|" तब नारदमुिन बोले, "मृ यु लोक म सब मनु य जो अनेक
योिनय म पैदा हुए ह, अपने अपने कम के

ारा अनेक

कार के दख
से दख

ु ी हो रहे ह| हे नाथ, मुझपर

दया रखते ह तो बतलाय क उन मनु य के सब दःु ख थोड़े से ह

से कैसे दरू हो सकते ह?" ी

व णु भगवानजी बोले क "हे नारद, मनु य क भलाई के िलए तुमने यह बहुत अ छ बात पूछ | जस
काम के करने से मनु य मोह से छूट जाता है , वह मै कहता हूँ, सुनो| बहुत पु य का दे ने वाला, वग तथा
मनु य लोक दोन म दल
ु भ एक

त है | आज म

ेमवश तुमसे कहता हूँ | ी स यनारायणजी का

अ छ तरह वधान पूवक करके मनु य तुरंत ह यहाँ सुख भोगकर मरने पर मो
व णु भगवान के वचन सुनकर नारद जी ने पुछा क उस
कसने यह

त कया है और कस दन यह

त का

को

होता है |" ी

या फल है , या वधान है , और

त करना चा हए, कृ पा करके व तार से बताइए| ी व णु

भगवान ने कहा, "दःु ख शोक आ द को दरू करने वाला, धन धा य को बढ़ाने वाला, सौभा य तथा संतान को
दे ने वाला, सब
दन, मनु य

थान पर वजय करने वाला, ी स यनारायण

त है | भ

और

ा के साथ कसी भी

ी स यनारायण क शाम के समय, ा ण और बंधुओ के साथ धमपरायण होकर पूजा करे .

भाव से नैव , केले का फल, शहद, घी, श कर अथवा गुड़, दध
ू , और गेहूं का आटा सवाया लेवे (गहू के

अभाव म साठ का चूरन भी ले सकते है )| इन सबको भ
स हत

भाव से भगवान ् को अपण कर| ब धुबांधव

ा ण को भोजन करावे | इसके प ात ् वयं भोजन कर | रा

ी स यनारायण भगवान का

म नाम संक तन का आयोजन कर

मरण करता हुआ समय यतीत करे | इस तरह जो मनु य

त करे ग,े

उनका मनोरथ िन य ह पूण होगा. हे भ राज ! तुमसे तो वकराल किलकाल के कम िछपे नह ं है |
खान-पान और आचार- वचार को चाहते हुए भी प व ता न रख पाने के कारण, यो क जीव मेरा नाम
मरण करके ह अपना लोक-परलोक संवार सकगे, इसिलए वशेष

प से किलकाल म मृ युलोक म यह

एक लघु और आसान उपाय है , जससे अ प समय और अ प धन म

येक जीव को महान पु य

हो सकता है |
|| इित

ी स यनारायण

त कथा का

ारं भ अ याय स पूण ||

तीय अ याय
सूतजी ने कहा- हे ऋ षय , ज ह ने पहले समय म इस
सब

त को कया है , उनका इितहास कहता हूँ, आप

यान से सुने | सुंदर काशीपुर नगर म एक अ यंत िनधन

यास से बैचैन होकर िन य पृ वी पर घूमता था| ा ण से
को दख
ु ी दे खकर एक दन बूढ़े

ा ण का

ेम करने वाले

प धारण कर िनधन

! तुम िन य ह दख
ु ी होकर पृ वी पर

चाहता हूँ | द र

ा ण रहता था| वह

ा ण ने कहा - मै िनधन

य घूमते हो? हे

ा ण भूख और

ी व णु भगवान ् ने

ा ण

ा ण के पास जाकर आदर से पूछा - हे

ा ण यह सब मुझे कहो, मै सुनना

ा ण हूँ, िभ ा के िलए पृ वी पर फरता हूँ| हे भगवन ् य द

आप इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते हो तो कृपा कर मुझे बताएं | मै आपक शरण म हूँ | वृ
ा ण का

प धारण कये

ी व णु भगवान ् ने कहा - हे

ा ण!

ी स यनारायण भगवान मनोवांिछत

फल दे ने वाले ह. इसीिलए तुम उनका पूजन करो, जसके करने से मनु य सब दख
से मु

इसी के साथ द र

ा ण को

त का सारा वधान बतलाकर बूढ़े

स यनारायण भगवान ् अंत यान हो गए| जस
सोचकर वह द र
ज द उठा और

त को वृ

ा ण घर चला गया, पर तु उस रा
ी स यनारायण भगवान ् का

ा ण का

हो जाता है |

प धारण करने वाले

ा ण ने बताया है , उसे मै अव य क ँ गा, यह
उस

ा ण को नींद नह ं आई | अगले दन वह

त करने का िन य कर िभ ा मांगने चल दया| उस दन

उसको िभ ा म बहुत धन िमला, जससे उसने पूजा का सब सामान ख़र दा और घर आकर अपने ब धुबांधव के साथ भगवान ्
दख
से छूटकर अनेक

ी स यनारायण का

कार क संप य से यु

लगा | स यनारायण भगवान ् के
मो

को

त कया | इसके करने से वह द र

त को जो शा

हो गया | उस समय से वह व
विध के अनुसार

व , अब आप और

त करे गा, वह सब दख
से

ी स यनारायण भगवान ् का कहा हुआ यह

त मने तुमसे कहा | हे

त को कया, हम सब सुनना चाहते है | इसके िलए हमारे मन म

है | ी सूतजी ने कहा - हे मुिनय ! जस जस

ाणी ने इस

त को कया है उन सबक कथा सुनो |

ा ण धन और ऐ य के अनुसार बंध-ु बांधव के साथ अपने घर पर

उसी समय एक लकड़ बेचने वाला बुढा य
रख दया और व

त करने

या सुनना चाहते ह, मुझे बताएं? ऋ षय ने कहा - हे मुनी र ! संसार म इस व

से सुनकर और कस कस ने इस
एक समय वह

हर मास

कार के

ा पूवक करे गा, सब पाप से छूटकर

होगा | आगे जो मनु य पृ वी पर भगवान ् स यनारायण का

छूट जायेगा | इस तरह नारदजी से

ा ण सब

त कर रहा था|

वहाँ आया| उसने सर पर रखा लक ड़य का ग ठर बाहर

के घर म चला गया | यास से दख
ु ी लकडहारे ने व

को

त करते दे खा | वह यास

को भूल गया | उसने व
इस

त को करने से

को नम कार कया और पूछा - हे व

या फल िमलता है ? कृ पया मुझे बताएं | ा ण ने कहा - सब मनोकामनाओं को

पूरा करने वाला यह भगवान ्
वृ

हुई है | व

! आप यह कसका पूजन कर रहे ह?

से इस

ी स यनारायण का

त है इनक ह कृपा से मेरे यहाँ धन-धा य आ द क

त के बारे म जानकर वह लकडहारा बहुत

स न हुआ | भगवान ् का चरणामृत

ले और भोजन करने के प ात ् वह अपने घर को चला गया | अगले दन लकडहारे ने अपने मन म
संक प कया क आज गाँव म लकड़ बेचने से जो धन िमलेगा, उसी से भगवान ् स यनारायण का उ म
त क ँ गा | यह मन म वचार कर वह लकडहारा अपने सर पर लक ड़य का ग ठर रखकर जस नगर
म धनवान लोग रहते थे, ऐसे सुंदर नगर म गया | उस दन उसे उन लक ड़य का दाम पहले के दन से
चौगुना िमला | तब वह लकड़हारा अित
आद

ी स यनारायण भगवान ् के

स न होकर पके केले, श कर, शहद, घी, दध
ू , दह , गेहूं का चूण

त क सार साम ी लेकर अपने घर पर आ गया | फर उसने अपने

बंधु-बांधव को बुलाकर विध- वधान के साथ भगवान ् का पूजन और
वह बुढा लकडहारा धन, पु

आ द से यु

|| इित

त कया | उस

त के

भाव से

हुआ और संसार के सम त सुख भोगकर बैकुंठ को चला गया |

ी स यनारायण

त कथा का

तीय अ याय स पूण ||

तृतीय अ याय
ी सूतजी ने कहा - हे

ऋ षय ! अब आगे क एक कथा कहता हूँ | पूव काल म उ कामुख नाम का

एक महान बु मान राजा था | वह स यव ा और जते
गर ब को धन दे कर उनके क

य था | ित दन दे व थान पर जाता तथा

दरू करता था | उनक प ी कमल के समान मुख वाली और सती सा वी

थी | भ शीला नद के तट पर उन दोन ने

ी स यनारायण भगवान ् का

त कया | उस समय वहां

साधु नामक एक वै य आया | उसके पास यापार के िलए बहुत-सा धन था | वह वै य नाव को कनारे
पर ठहराकर राजा के पास आया | राजा को

यु

िच

से यह आप

त करते दे खकर उसने वनय के साथ पूछा - हे राजन !

या कर रहे ह ? मेर भी सुनने क इ छा है , कृ या यह आप मुझे भी बताइए

| महाराजा उ कामुख ने कहा - हे साधु वै य ! मै अपने बंध-ु बांधव के साथ पु ा द क
महाश

मान स यनारायण भगवान का

ाि

के िलए

त व पूजन कर रहा हूँ | राजा के वचन सुनकर साधु नामक

वै य ने आदर से कहा - हे राजन ! मुझे भी इसका वधान बताय | मै भी आपके कथनानुसार इस

को क ँ गा | मेरे भी कोई संतान नह ं है | मुझे व ास है , इससे िन य ह मेर भी संतान होगी | राजा से
सब वधान सुन, यापार से िनवृ
संतान दे ने वाले उस

हो, वह वै य आनंद के साथ अपने घर आया | वै य ने अपनी प ी को

त का समाचार सुनाया और

ण कया क जब मेर भी संतान होगी तब मै इस

त को क ँ गा | साधु ने यह वचन अपनी प ी लीलावती से भी कहे | एक दन उसक प ी लीलावती
आनं दत हो सांसा रक धम क

वृ

हो

ी स यनारायण भगवान ् क कृपा से गभवती हो गयी | दसव

मह ने म उसने सुंदर क या को ज म दया | दन दन वह क या इस तरह बढ़ने लगी जैसे शु ल प
का चं मा बढ़ता है | क या का नाम कलावती रखा गया | तब लीलावती ने मीठे श द म अपने पित को
मरण दलाया क आपने जो भगवान ् का
साधु वै य ने कहा- हे

त करने का संक प कया था अब आप उसे पूरा क जये |

ये ! मै क या के ववाह के समय इस

त को क ँ गा| इस कार अपनी प ी को

आ ासन दे वह यापार करने चला गया| कलावती पतृ गृह म वृ

को

हो गई | लौटने पर जब

साधु ने नगर म स खय के साथ अपनी पु ी को खेलते दे खा तो दत
ू को बुलाकर कहा क उसक पु ी के
िलए कोई सुयो य वर दे खकर लाओ | साधु नामक वै य क आ ा पाकर दत
ू कंचन नगर पहुंचा और
खोजकर और दे खभाल कर वै य क लड़क के िलए एक सुयो य वा णक पु
को दे खकर साधु नामक वै य ने अपने बंध-ु बांधव स हत
साथ कर दया | दभ
ु ा य से वह ववाह के समय भी
इसपर

ी स यनारायण भगवान

स निच

ले आया| उस सुयो य लड़के

होकर अपनी पु ी का ववाह उसके

ी स यनारायण भगवान ् का

ोिधत हो गए | उ ह ने वै य को

त करना भूल गया |

ाप दया क तु हे दा ण दःु ख

होगा | अपने काय म कुशल साधु नामक वै य अपने जामाता स हत नाव को लेकर यापार करने के
िलए समु

के समीप

थत र सारपुर नगर म गया | दोन ससुर-जमाई चं केतु राजा के उस नगर म

यापार करने लगे | एक बार स यनारायण भगवान ् क माया से

े रत एक चोर राजा का धन चुराकर

भगा जा रहा था | राजा के दत
ू को अपने समीप वेग से आते दे खकर चोर ने घबराकर राजा के धन को
वह नाव म चुपचाप रख दया, जहा वे ससुर-जमाई ठहरे हुए थे और भाग गया | जब दत
ू से उस साधु
नामक वै य के पास उस धन को रखा दे खा तो ससुर-जामाता दोन को बांधकर ले गए और राजा के
समीप जाकर बोले - हम ये दो चोर पकड़कर लाय है , दे खकर आ ा द | तब राजा ने बना उनक बात
सुने ह उ ह कारागार म डालने क आ ा दे द | इस कार राजा क आ ा से उ ह क ठन कारावास म
डाल दया गया और उनका धन भी छ न िलया गया| स यनारायण भगवान के

ाप के कारण लीलावती

और उसक पु ी कलावती भी घर पर बहुत दख
ु ी हुई | उनका धन भी चोर चुरा कर ले गए | शार रक
और मानिसक पीड़ा से तथा भूख- यास से अित द ु खत हो भोजन क िचंता म कलावती क या एक
ा ण के घर गई| उसने
साद

ा ण को भी स यनारायण भगवान ् का

त करते दे खा| उसने कथा सुनी तथा

हण कर रात को घर आई| माता ने कलावती से पूछा-हे पु ी! तू अब तक कहाँ रह व तेरे मन म

या है ? कलावती बोली - हे माता ! मने आज एक

ा ण के घर

ी स यनारायण भगवान ् का

त होते

दे खा है | क या के वचन सुनकर लीलावती ने स यनारायण भगवान के पूजन क तैयार क | उसने
प रवार और बंधुओं स हत स यनारायण भगवान ् का
और दामाद शी

ह घर लौट आय | साथ ह

स यनारायण भगवान ् इस

त से संतु

त एवं पूजन कया और वर माँगा क मेरे पित

ाथना क

क हमारे सरे अपराध

हो गए | उ ह ने राजा चं केतु को

राजन ! जन दोन वै य को तुमने बंद बना रखा है , वे िनद ष ह | उ ह

मा कर दो | ी

व न म दशन दे कर कहा- हे
ात: ह छोड़ दो | उनका सब

धन जो तुमने

हण कया है , लौटा दो | अ यथा म तु हारा धन, पु ा द सब न

कर दं ग
ू ा | राजा से ऐसे

वचन कहकर भगवान ् अंत यान हो गए | ातः काल राजा चं केतु ने सभा म सबको अपना
सुनाया और सैिनको को आ ा द
ने आते ह राजा को
क ठन से क ठन दःु ख

क दोन व णक पु

को कैद से मु

व न

कर सभा म लाया जाया | दोन

णाम कया| राजा ने कोमल वचन म कहा- हे महानुभाव ! तु हे भावावेश ऐसा

हुआ है | अब तु हे कोई भय नह ं है , तुम मु

हो | इसके बाद राजा ने उनको

नए - नए व ाभूषण पहनवाय तथा उनका जतना धन िलया था, उससे दन
ू ा लौटा कर आदर से वदा
कया | दोन वै य अपने घर को चल दए |
|| इित

ी स यनारायण

त कथा का तृतीय अ याय स पूण ||
चतुथ अ याय

ी सूतजी ने आगे कहा - वै य ने मंगलाचार करके या ा आर भ क और अपने नगर को चला| उनके
थोड़ दरू आगे बढ़ने पर दं ड वेशधार

ी स यनारायण भगवान ् ने उससे पूछा - हे साधु ! तेर नाव म

या है अिभमानी व णक हँ सता हुआ बोला- हे दं ड ! आप

य पूछते है ? या धन लेने क इ छा है ?

मेर नाव म बेल प ा द भरे हुए है | वै य के कठोर वचन सुनकर दं ड वेशधार

ी स यनारायण भगवान

ने कहा- तु हारा वचन स य हो ! ऐसा कहकर वे वहां से चले गए और कुछ दरू जाकर समु
बैठ गए | दं ड महाराज के जाने के प ात ् वै य ने िन य

के कनारे

या से िनवृत होने के बाद नाव को ऊँची उठ

दे खकर अच भा कया तथा नाव म बेल प े आ द दे खकर मूिछत हो धरती पर िगर पड़ा | मूछा खुलने
पर अ यंत शोक

कट करने लगा | तब उसके जमाता ने कहा - आप शोक न कर | यह दं ड महाराज का

ाप है | अतः उनक शरण म ह चलना चा हए, तभी हमार मनोकामना पूर होगी | जमाता के वचन
सुनकर वह साधु नामक वै य साधु महाराज के पास पहुंचा और अ यंत भ
मने जो आपसे अस य वचन कहे थे, उनके िलए मुझे
लगा | तब दं ड भगवान ् बोले - हे वा णक पु

-भाव से

मा कर | ऐसा कहकर महान शोकातुर हो रोने

! मेर आ ा से बार- बार तुझे दःु ख

पूजा से वमुख हुआ है | साधु नामक वै य ने कहा - हे भगवान ् ! आपक माया से
आपके

णाम करके बोला-

प को नह ं जान पाते, तब मै अ ानी भला कैसे जान सकता हूँ | आप

हुआ है , तू मेर
ा आ द दे वता भी

स न होइए, मै आपनी

साम य के अनुसार आपक पूजा क ँ गा | मेर र ा करो और पहले के समान मेर नौका को धन से पूण
कर दो| उसके भ

यु

वचन सुनकर

ी स यनारायण भगवान ् स न हो गए और उसक इ छानुसार वर

दे कर अंत यान हो गए | तब ससुर और जमाता दोन ने नाव पर आकर दे खा क नाव धन से प रपूण है
| फर वह भगवान ् स यनारायण का पूजन कर सािथय स हत अपने नगर को चला | जब वह अपने नगर
के िनकट पहुंचा तब उसने एक दत
ू को अपने घर भेजा | दत
ू ने साधु नामक वै य के घर जाकर उसक
प ी को नम कार कया और कहा- आपके पित अपने दामाद स हत इस नगर के समीप आ गए है |

लीलावती और उसक क या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रह थीं | दत
ू का वचन सुनकर
साधु क प ी ने बड़े हष के साथ स यदे व का पूजन पूण कया और अपनी पु ी से कहा- मै अपने पित
के दशन को जाती हूँ, तू काय पूण कर शी

आ जाना | पर तु कलावती पूजन और

पित के दशन को चली गई | साद क अव ा के कारन स यदे व ने

साद छोड़कर अपने

हो, उसके पित को नाव स हत

पानी म डू बा दया | कलावती अपने पित को न दे खकर रोती हुई जमीन पर िगर पड़ | नौका को डू बा
हुआ तथा क या को रोती हुई दे खकर साधु नामक वै य द ु खत हो बोला- हे
से जो भूल हुई है , उसे

मा करो | उसके द न वचन सुनकर स यदे व भगवान

आकाशवाणी हुई- हे वै य ! तेर क या मेरा
य द वह घर जाकर
घर पहुँच कर

भु ! मुझसे या मेरे प रवार
स न हो गए |

साद छोड़कर आई है , इसिलए इसका पित अ

य हुआ है |

साद खाकर लौटे तो इसका पित अव य िमलेगा | आकाशवाणी सुनकर कलावती ने

साद खाया और फर अपने पित के दशन कये | त प ात साधू वै य ने वह बंध-ु बांधव

स हत स यदे व का विध-पूवक पूजन कया | वह इस लोक का सुख भोगकर अंत म
|| इित

ी स यनारायण

वगलोक को गया |

त कथा का चतुथ अ याय स पूण ||
पंचम अ याय

ी सूतजी ने आगे कहा - हे ऋ षय ! म एक और भी कथा कहता हूँ, सुनो तुंग वज नाम का एक राजा था | उसने भगवान ् स यदे व का
समय राजा वन म व य पशुओं को मारकर बड़ के वृ
से बंध-ु बांधव स हत

साद

जापालन म लीन

यागकर बहुत दःु ख पाया | एक

के नीचे आया | वहां उसने वाल को भ

ी स यनारायण जी पूजन करते दे खा | पर तु राजा दे खकर भी अिभमानवश न तो

वहां गया और न ह स यदे व भगवान ् को नम कार कया | जब वाल ने भगवान ् का
सामने रखा तो वह
सब कुछ न

साद

साद उसके

यागकर अपने नगर को चला गया | नगर म पहुंचकर उसने दे खा क उसका

हो गया है | वह समझ गया क भगवान ् स यदे व ने ह

वापस आया और वाल के समीप गया और विधपूवक पूजन कर

कया है | तब वह उसी

थान पर

साद खाया | तो स यनारायण

भगवान ् क कृ पा से सबकुछ पहले जैसा ह हो गया और द घ काल तक सुख भोगकर मरने पर
को चला गया | जो मनु य इस परम दल
ु भ
धन- धा य क

ाि

होगी | बंद बंधन से मु

होकर िनभय हो जाता है | संतानह न को संतान

कया अंत म उनके दस
ू रे ज म क कथा भी सुिनए | शतानंद नामक वृ
प म ज म लेकर

ी कृ ण क भ

त के पु य से राजा दशरथ बने और
नामक वै य ने स य ित

वगलोक

त को करे गा , ी स यनारायण भगवान ् क कृ पा से उसे

होती है तथा सब मनोरथ पूण होकर अंत म वह बैकुंठ धाम को जाता है | ज होने पहले इस
सुदामा के

-भाव

कर मो

ने भी इस

त को

त को कया, जसने

कया | उ कामुख नामक महाराज इस

ी रं गनाथ का पूजन कर मृ यु के बाद बैकुंठ को

राजा मोर वज बनकर अपने पु

को आरे से चीरकर मो

हुए | साधु
कया | वह भी

इसी

त का फल था | इसी तरह महाराज तुंग वज

क भ

म लीन कर मो

वयंभू मनु हुए ज ह ने बहुत से लोग को भगवान ्

कया | लकडहारा भील अपने अगले ज म म गुह नामक िनषाद राजा

हुआ, जसने भगवान ् राम के चरण क सेवाकर मो
|| इित

ी स यनारायण

कया |

त कथा का पंचम अ याय स पूण ||

ी स यनारायण भगवान क आरती
जय ल मीरमणा, ी जय ल मीरमणा । स यनारायण

वामी, जनपातक हरणा ॥ ॐ जय… र

िसंहासन, अ त
ु छ व राजे । नारद करत िनराजन, घंटा

विन बाजे ॥ ॐ जय… गट भये किल कारण,

ज को दरश दयो। बूढ़ो

ा ण बनकर, कंचन महल कयो ॥ ॐ जय… दब
ु ल भील कठारो, इन पर कृपा

कर । चं चूड़ एक राजा, जनक
भो यो

भुजी, फर

ज ड़त

वप

हर ॥ ॐ जय… वै य मनोरथ पायो,

तुित क नी ॥ ॐ जय… भाव भ

के कारण िछन-िछन

क नी, ितनको काज सरयो ॥ ॐ जय… वाल बाल संग राजा, वन म भ
द नदयाल हर ॥ ॐ जय… चढ़त

ा तज द नी । सो फल
प धरयो ।

ा धारण

कर ॥ मनवांिछत फल द हो,

साद सवाया, कदली फल मेवा ॥ धूप द प तुलसी से, राजी स यदे वा ॥

ॐ जय… स यनारायण क आरित, जो कोइ नर गावे । कहत िशवानंद
जय…

वामी, वांिछत फल पावे ॥ ॐ

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