भारत के ४ राषर ीय पर्वर

अरुण कुमार उपर्ाध्याय, कटक (मो.) ९४३७०३४१७२
arunupadhyay30@yahoo.in www.scribd.com/Arunupadhyay
१. राषर ीय पर्वर -समाज के एकीकरण के िलिये भारत मे ४ राषरीय पर्वर है-होलिी, दगु ारपर्ूजा, दीपर्ावलिी, रक्षा-बन्धन। समाज
मे व्यवसायों की उन्नतित के िलिये भी ४ वणर थे-ब्राह्मण, क्षित्रिय, वैश्य, शूदचातुवरण्यर मया सृषं गुणकमर िवभागशः (गीता ४/१३)
ज्ञान के द्वारा न केवलि सभी प्रकार की उन्नतित होती है , वरन् समाज उसी िदशा मे चलिता है जैसा पर्ढ़ाया जाता है। जैसे
अंग्रेजी िशक्षा ने हमे मन से अंग्रेज बना िदया है जो मेकालिे का उद्देश्य था। अतः ज्ञान की रक्षा और वृिद्धि करने वालिे
ब्राह्मण को मुख (स्रोत) कहा गया है। समाज तभी सुचारु रूपर् से कायर कर सकता है, जब वह सुरिक्षत रहे। आन्तिरक
और बाह्य सुरक्षा करने वालिे को क्षित्रिय कहा गया है , जो क्षत (आघात) से त्रिाण करे। समाज को िवश कहते है, जो
इसका कृिष-गोरक्ष-वािणज्य से पर्ालिन करे वह वैश्य है। ये सभी काम तभी कु शलिता से हो सकते है जब तकनीकी रूपर्
से कुशलि व्यिक्ति हर क्षेत्रि मे हों। ये दक्षता तथा तेजी से कायर करते है (आशु+दवित), अतः शूद है।
इन गुणों जैसे ४ पर्वर हैब्राह्मण-रक्षा बन्धन, क्षित्रिय-दगु ार पर्ूजा, वैश्य-दीपर्ावलिी, शूद -होलिी।
२. रक्षा बन्धन-(क) ब्राह्मण का अथर -हम उसी का िवश्वास करते है जो स्वयं अपर्ने भीतर सन्तुष हो। लिोभी व्यिक्ति
पर्ैसा या शिक्ति के लिोभ मे कोई भी झूठ कह सकता है। अतः ब्राह्मण मे भी पर्ुरोिहती का कमर िनन्दनीय माना गया था।
हम उन्हीं किवयों की वाणी का अनुसरण करते है, जो संन्यासी थे जैसे कबीर, तुलिसीदास आिद। जो अपर्ने द्वारा अपर्ने
भीतर ही सन्तुष हो, उसी की बात समाज को प्रभािवत कर एक कर सकती हैप्रजहाित यदा कामान् सवारन् पर्ाथर मनोगतान्। आत्मन्येवात्मने तुषः ितपस्थतप्रज्ञस्तदोच्यते॥ (गीता २/५५)
यहां जहाित शब्द का प्रयोग कामनाओं की हत्या के िलिये िकया गया है। इसी अथर मे कुरान मे अरबी शब्द जहाित का
प्रयोग है, िजसका अथर िजहाद है। जो अपर्ने आवरण (शमर या चमर ) के भीतर सन्तुष रहे वह शमर न् है जो ब्राह्मण की
उपर्ािध होती है। शमर का अथर सुख भी हैस्यादानन्द थुरानन्द शम्मर शातसुखािन च। (अमरकोष, १/४/२५)=आनन्द, शमर , सुख आिद पर्यारयवाची है।
तस्मा अिग्निर्भाररतः शमर यं सत् (ऋग्वेद, ४/३५/४), सायण भाष्य-शमर = सुख
स नः शमारिण वीतयेऽग्निग्निर्यरच्छतु शन्तमा। (ऋग्वेद ३/१३/४) सायण भाष्य-शमारिण शमर शब्दो गृहवाची, छाया शमेित
तन्नतामसु पर्ाठात्।
वाग्वै शमर । अिग्निर्वै शमारण्यन्नताद्यािन यच्छित (ऐतरेय ब्राह्मण २/४०, ४१)
= यह अिग्निर् हमारी शाितपन्त के िलिये शमर (आश्रय, आवरण) दे। वाक् (शब्द, ज्ञान) भी हमारी रक्षा करते है, अतः शमर है।
४ वणो ं को शमार, वमार (कवच द्वारा रक्षा), गुप्त (धन द्वारा रक्षा), दास (कमर द्वारा रक्षा) इसी अथर मे कहते हैततश्च नाम कुवीत िपर्तैव दशमेऽग्नहिन। देवपर्ूवर नराख्यं िह शमर वमारिद संयत
ु म्। शमेित ब्राह्मणस्योक्तिं वमेित क्षत्रिसंश्रयम्। गुप्त
दासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्य शूदयोः। (िवष्णु पर्ुराण २/१०/८९)
(ख) अदृश्य रक्षा-हाथ पर्र बान्धने वालिा रक्षा-सूत्रि हमारी रक्षा ४ सूत्रिों से करता है -(१) एक पर्ीढ़ी से अगलिी पर्ीढ़ी तक
ज्ञान की पर्रम्पर्रा, (२) समाज तथा देश को एक करने का ज्ञान, (३) िविवध व्यवसायों का समन्वय और रक्षा, (४)
प्रकृित तथा मनुष्य की पर्रस्पर्र िनभर रता = आिधदैिवक िवपर्ित्तियों से रक्षा।
यथोक्तिान्यिपर् कम्मारिण पर्िरहाय िद्वजोत्तिमः। आत्मज्ञाने शमे च स्यात् वेदाभ्यासे च यत्नवान्॥९२॥
एतिद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य िवशेषतः। प्राप्यैतत् कृतकृत्यो िह िद्वजो भवित नान्यथा॥९३॥

िपर्तृ-देव-मनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम्।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिमित ितपस्थितः॥९४॥ (मनुस्मृित, अध्याय १२)
= शास्त्रमों मे विणर त कत्तिरव्यों को छोड़कर भी ब्राह्मण को इितपन्दय-जय, आत्मज्ञान, तथा वेद अध्ययन करना चािहये। तभी
उसका ब्राह्मण जन्म साथर क है। िपर्तर, देअ, मनुष्य सभी का नेत्रि वेद ही है, जो सनातन, अपर्ौरुषेय है।
(ग) एकता सूत्रि -वैिदक मन्त्रियदाबध्नन् दाक्षायणा िहरण्यं शतानीकस्य सुमनस्यमानाः।
तत्तिे बध्नाम्यायुषे वचर से बलिाय दीघारयत्त्ु वाय शतशारदाय॥१॥
नैनं रक्षांिस न िपर्शाचाः सहन्ते देवानामोजः प्रथमं ह्येतत्।
यो िबभित्तिर दाक्षायणं िहरण्यं स जीवेषु कृणुते दीघर मायुः॥२॥
अपर्ां तेजो ज्योितरोजो बलिं च वनस्पर्तीनामुत वीय्यारिण।
इन्द इवेितपन्दयाण्यिध धारयामो अितपस्मन् तद् दक्षमाणो िबभरिद्धिरण्यम्॥३॥
समानां मासामृतुिभष्ट्वा वयं सम्वत्सररूपर्ं पर्यसा िपर्पर्िमर ।
इन्दाग्निर्ी िवश्वे देवास्तेऽग्ननुमन्यन्तामहृणीयमानाः॥४॥ (अथवर वेद १/३५)
हाथ पर्र सूत्रि बान्धते समय पर्हलिा मन्त्रि पर्ढ़ा जाता है। (१) आकाश मे सूयर अपर्ने से १०० व्यास की दरू ी पर्र हमे रखॆ
हु ये है (दाक्षायन), इसका िहरण्य (तेज स्रोत) हमे वचर स (मानिसक शिक्ति), बलि, १०० वषर की आयु देता है। (२)
राक्षस, भूत, िपर्शाच उस व्यिक्ति का तेज नहीं सह पर्ाते िजसमे देवताओं का ओज इस दाक्षायण िहरण्य द्वारा रिक्षत है।
(३) दािहने हाथ के इस सूत्रि से हम जलि, तेज, ज्योित, ओज, बलि वनस्पर्ित से पर्ाते है। (४) हम, मास (चन्द से),
ऋतु, समा (वषर ) से सम्वत्सर रूपर् पर्य का पर्ान करते है (हमारे सभी यज्ञ या उत्पर्ादन इसी चक्र मे है), उनसे आकाश
के इन्द तथा पर्ृथ्वी पर्र की अिग्निर् का तेज पर्ाते है।
पर्ौरािणक मन्त्रि-येन बद्धिो बिलि राजा दानवेन्दो महाबलिः । तेन त्वां प्रितबध्नािम रक्षे ! मा चलि मा चलि॥
= मै तुमको उसी प्रेम के बन्धन से बान्धता हू ं िजससे महाबलिी अस्र राजा बिलि भी बन्ध गया था। यह सूत्रि हमारी रक्षा
से नहीं हटे।
(घ) उपर्ाकमर -मनुस्मृित के अनुसार श्रावण या भादपर्द से आरम्भ कर साढ़े ५ मास पर्ौष मास तक उपर्ाकमर = वेद
अध्ययन होता है। शुक्लि पर्क्षमे वेद, कृष्ण पर्क्ष मे वेदाङ्ग पर्ढ़ते है-सैद्धिाितपन्तक, व्यावहािरक ज्ञान है। बाकी वषर मे इनका
उपर्योग होता है।
श्रावण्यां प्रोष्ठपर्द्यां वाप्युपर्ाकृत्य यथािविध। युक्तिश्छन्दांस्यधीयीत मासान् िवप्रोऽग्नधर पर्ञ्चमान्॥९५॥
पर्ुष्ये तु छन्दसां कुय्यारद ् बिहरुत्सजर नं िद्वजः। माघशुक्लिस्य वा प्राप्ते पर्ूवारह्णे प्रथमेऽग्नहिन॥९६॥
यथाशास्त्रमं तु कृत्वैवमुत्सगर छन्दसा बिहः। िवरमेत् पर्िक्षणीं राित्रिं तदेवक
ै महिनर शम्॥९७॥
अत ऊर्ध्वर तु छन्दांिस शुक्लिेषु िनयतः पर्ठे त्। वेदाङ्गान् च सवारिण कृष्ण पर्क्षेषु सम्पर्ठे त्॥९८॥
(मनुस्मृित, अध्याय ४)
उपर्ाकमर के िदन ऋिष तपर्र ण कर अपर्राह्ण मे कपर्ास या रेशम की शुद्धि रक्षा बान्धते हैउपर्ाकम्मर िदने प्रोक्तिमृषीणाञ्चैव तपर्र णम्। ततोऽग्नपर्राह्ण समये ’रक्षापर्ोटिलिकां’ शुभाम्॥१॥
कारयेदक्षतैः सस्तैः िसद्धिाथैः हेमभूिषताम्। वस्त्रमैिवर िचत्रिैः कापर्ारसैः क्षोमैव्वार मलिवितपज्जर तःै ॥२॥
िविचत्रिं ग्रिथतं सूत्रिं स्थापर्येत् भाजनोपर्िर। (भिवष्योत्तिर पर्ुराण)

(ङ) स्वितपस्तक-शकुन (शुभ िचह, पर्क्षी) के िलिये जमीन को गोबर से लिीपर् कर उसपर्र स्वितपस्तक िचह बनाते है िजसका
मन्त्रि हैस्वितपस्त न इन्दो वृद्धिश्रवा स्वितपस्त नः पर्ूषा िवश्ववेदाः।
स्वितपस्त नस्ताक्ष्यो अिरषनेिमः स्वितपस्त नो बृहस्पर्ितदर धातु॥ (यजु २५/१९)
यह आकाश के वृत्ति (पर्ृथ्वी कक्षा) की ४ िदशा है-ज्येष्ठा नक्षत्रि का स्वामी इन्द, रेवती का पर्ूषा, श्रवण का गोिवन्द जो
अिरष की नेिम या सीमा (दरू करने वालिे) है, तथा पर्ुष्य का बृहस्पर्ित। यह जीवन के ४ उद्देश्य (पर्ुरुषाथर = धमर , अथर ,
काम, मोक्ष) पर्ूरा करता है-समाज के क्रम (श्रवा) मे श्रेष्ठ अथारत् वृद्धिश्रवा इन्द की रक्षा मे ही धमर पर्ालिन होता है। िवश्व
को पर्ाने या जानने से हमारी पर्ुिष पर्ूषा द्वारा होती है। हमारी इच्छा (काम) गोिवन्द से पर्ूरी होती है तथा मोक्ष ज्ञान से
होता है िजसका स्रोत बृहस्पर्ित है।
(च) शुभ पर्क्षी-द्वा सुपर्णार सयुजा सखाया समानं वृक्षं पर्िरषस्वजाते।
तयोरन्यः िपर्प्पर्लिं स्वाद्वित्ति अनश्नन्नतन्योऽग्निभचाकशीित। (ऋक् १/१६४/२०)
= समान वृक्ष पर्र दो पर्क्षी एक साथ रहते है, िजनमे एक तो फलिों को स्वाद से खाता है, दस
ू रा िबना खाये केवलि
देखभालि करता है। शरीर के भीतर इनको आत्मा (दशर क) जीव (कत्तिार) कहा गया है िजनको बाइिबलि मे आदम, ईव
कहा है। सभी जीवों मे मितपस्तष्क के ये २ भाग िनयन्त्रिण करता है-एक कायर करता है, दस
ू रा सुधार।
किनक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयित वाचमितरेव नावम्।
सुमङ्गलिश्च शकुने! भवािस मा त्वा कािचदिभभा िवश्व्या िवदत ॥ (ऋक् २/४२/१)
= हे किपर्ञ्जलि शकुन! अपर्ने स्वर से भिवष्य की सूचना देकर जीवन को िदशा देते हो। तुम िशकारी के भय से मुक्ति
होकर िवचरो।
मा त्वा श्येन उद् वधीन्मा सुपर्णो मा त्वा िवदिदषु मान् वीरो अस्ता।
िपर्त्र्यामनु प्रिदशं किनक्रदत् सुमङ्गलिो भदवाही वदेह॥ (ऋक् २/४२/२)
= कोई िशकारी पर्क्षी, गरुड़ या व्याध का बाण उड़ते समय आक्रमण नहीं करे। दिक्षण िदशा मे िपर्तर रक्षा करे।
अव क्रन्द दिक्षणतो गृहाणां सुमङ्गलिो भदवादी शकुन्ते।
मा नः स्तेन ईशत माघशंसो बृहद् वदेम िवदथे सुवीराः॥ (ऋक् २/४२/३)
= हे शकुन! घर की दिक्षण िदशा से शुभ स्वर दो, िजससे हम चोर, आतङ्की से सुरिक्षत रहे तथा वीरता से बड़ी बात
कहे।
प्रदिक्षिणदिभ गृणितपन्त कारवो वयो वदन्त ऋतुथा शकुन्तयः।
उभे वाचो वदित सामगा इव गायत्र्यं च त्रिैषुभं चानु राजित॥(ऋक् २/४३/१)
= हे शकुन! दिक्षण िदशा से (साम वेदके) उद्गाता जैसा गान करो। तेरा स्वर ऋतु (क्षेत्रि) २ प्रकार से शुभ हो-गायत्रि
साम (२४ अक्षर का मन्त्रि या मनुष्य से २

२४

गुणा बड़ी पर्ृथ्वी) पर्र तथा ित्रिषु पर्् (४४ अक्षर, शिन तक का क्षेत्रि) अन्तिरक्ष

को शुभ करे।
उद्गातेव शकुने साम गायिस ब्रह्मपर्ुत्रि इव सवनेषु शंसिस।
वृषेव वाजी िशशुमतीरपर्ीत्या सवर तो नः शकुने भदमा वद िवश्वतो नः शकुने पर्ुण्यमा वद॥ (ऋक् २/४३/२)
= हे शकुन! उद्गाता की तरह साम द्वारा हमे ब्रह्म-पर्ुत्रि (ऋितपत्वक, ज्ञानी) करो। वैसे ही प्रसन्नत हो जैसा घोड़े का बच्चा
अपर्नी मां के पर्ास जाकर होता है। हमे भद तथा पर्ुण्य के िलिये प्रेरणा दो।
आवदंस्त्वं शकुने भदमा वद तूष्णीमासीनः सुमितं िचिकिद्धि नः।

यदत्ु पर्तन् वदिस ककरिरयर था बृहद् वदेम िवदथे सुवीराः॥ (ऋक् २/४३/३)
= हे शकुन! हमारे िलिये अच्छे शब्द कहो, बैठ कर सुमित दो (इससे घर मे ितपस्थरता होती है), उड़ते समय कठफोड़वा
की तरह बोलिो, िजससे हम जीवन मे दक्ष रहे।
३. िवजया-दशमी- (क) शिक्ति के १० रूपर्-यह शिक्ति की पर्ूजा है। िवश्व का मूलि स्रोत एक ही है पर्र वह िनमारण के
िलिये २ रूपर्ों मे बंट जाता है, चेतन तत्त्व पर्ुरुष है, पर्दाथर रूपर् श्री या शिक्ति है। शिक्ति माता है अतः पर्दाथर को मातृ
(matter) कहते है। सभी राषरीय पर्वो ं की तरह यह पर्ूरे समाज के िलिये है पर्र क्षित्रियों के िलिये मुख्य है , जो समाज का
क्षत से त्रिाण करते हैक्षतात् िकलि त्रिायत इत्युदग्रः शब्दस्य अथर ः भुवनेषु रूढः। (रघुवंश, २/५३)
वेद मे १० आयाम के िवश्व का वणर न है अतः दश, दशा, िदशा-ये समान शब्द है। १० आयाम कई प्रकार से है(१) ५ तन्मात्रिा = भौितक िवज्ञान मे मापर् की ५ मूलि इकाइयां। इनके सीिमत और अनन्त रूपर् ५-५ प्रकार के है।
(२) आकाश के ३ आयाम, पर्दाथर , कालि, चेतना या िचित, ऋिष (रस्सी-दो पर्दाथो ं मे सम्बन्ध), वृत्रि या नाग (गोलि
आवरण), रन्ध्र (घनत्व मे कमी-बेशी, आनन्द या रस।
(३) ३ गुणों (सत्व, रज, तम) के १० प्रकार के समन्वय-क, ख, ग,कख, खक, कग, गक, खग, गख, कखग।
(ख) महािवद्या-१० आयाम की तरह १० महा-िवद्या है, जो ५ जोड़े है(१) कालिी-कालिा रंग, तारा-श्वेत।
(२) ित्रिपर्ुरा के २ रूपर्-सुन्दरी, भैरवी (शान्त, उग्र)।
(३) कमलिा-िवष्णु-पर्त्नी, स्थायी सम्पर्ित्ति, युवती, सुन्दर, रोिहणी नक्षत्रि, इन्द-लिक्ष्मी-कुबेर
धूमावती-िवधवा, चञ्चलि-दषु , वृद्धिा, कुरूपर्, ज्येष्ठा नक्षत्रि, वरुण-अलिक्ष्मी-यम।
(४) भुवनेश्वरी भुवन का िनमारण करती है, िछन्नतमस्ता काटती है।
(५) मातङ्गी वाणी को िनकालिती है, बगलिामुखी (वल्गा = लिगाम) रोकती है।
१० महािवद्या के आयाम है(१) तारा-शून्य िवन्द ,ु इसकी िदशा रेखा रूपर् मे प्रथम आयाम।
(२) भैरवी-उग्र रूपर्-सतह रूपर् मे दस
ू रा आयाम।
(३) ित्रिपर्ुरा-३ आयाम।
(४) भुवनेश्वरी-भुवन का िनमारण-४ मुख के ब्रह्मा की तरह।
(५) कालिी-कालि रूपर् मे ५वां आयाम। पर्िरवतर न का आभास कालि है।
(६) कमलिा-िवष्णु चेतना रूपर् मे ६ठा आयाम, उनकी पर्त्नी।
(७) बगलिामुखी-वल्गा, रस्सी, एक रोकता है, दस
ू रा जोड़ता है।
(८) मातङ्गी=हाथी, वृत्रि घेरकर कता है, हाथी को रोकना (वारण) किठन है।
(९) िछन्नतमस्ता-काटना रन्ध्र बनाता है।
(१०) धूमावती-१०वां आयाम अस्पर्ष है, धूम जैसा।
िवश्व के रचना स्तरों के अनुसार इनके रूपर् है(१) कालिी-पर्ूणर िवश्व, िजसमे १ खवर ब्रह्माण्ड तैर रहे है।
(२) तारा-ब्रह्माण्ड के तारा।
(३) ित्रिपर्ुरा (षोड़शी)-सूयर के तेज से यज्ञ हो रहा है, यह १६ कलिा का पर्ुरुष है, िक्रया षोड़शी है।

(४) भुवनेश्वरी-क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड) तथा रोदसी (सौर मण्डलि) के बीच मे सूयर।
(५) िछन्नतमस्ता-सूयर से िनकलिा तेज।
(६) भैरवी-िनमारण मे लिगी शिक्ति।
(७) धूमावती-िबखरी शिक्ति िजसका प्रयोग नहीं हु आ।
(८) बगलिामुखी-पर्ृथ्वी द्वारा रोकी या शोिषत शिक्ति।
(९) मातङ्गी-सूयर के िवपर्रीत िदशा मे पर्ृथ्वी का राित्रि भाग।
(१०) कमलिा-पर्ृथ्वी पर्र की सृिष।
आध्याितपत्मक रूपर्-शरीर के चक्रों मे इनका स्थान है(१) कालिी-यह मूलिाधार मे सोयी हु ई कुण्डिलिनी शिक्ति है।
(२) तारा-स्वािधष्ठान चक्र का समुद और चन्दमा है। पर्श्यन्ती वाक् के रूपर् मे यह तारा है। इसका देवता रािकनी है जो
तारक मन्त्रि रं (राम) है।
(३) ित्रिपर्ुर सुन्दरी-यह सहस्रार मे १६ कलिा के चन्द जैसा िवहार करती है। वहां सुधा-िसन्धु है (भौितक रूपर् मे
मितपस्तष्क का दव)।
(४) भुवनेश्वरी-बीज मन्त्रि ह्रीं है िजसका अथर हृदय है। यह हृदय के अनाहत चक्र के नीचे िचन्तामिण पर्ीठ पर्र
िवराजमान है, इसके सभी रूपर् भुवनेश्वर मे है, अतः इस नगर का यह नाम हैसुधा-िसन्धोमर ध्ये सुर-िवटपर्-वाटी पर्िरवृते, मिणद्वीपर्े नीपर्ो-पर्वन-वित िचन्तामिण गृहे।
िशवाकारे मञ्चे पर्रम िशव पर्यर ङ्क िनलियां, भजितपन्त त्वां धन्याः कितचन िचदानन्द लिहरीम्॥ (सौन्दयर लिहरी, ८)
सुधा-िसन्धु = िबन्दस
ु ागर। मिणद्वीपर्-उसके िनकट िलिङ्गराज। नीपर् (वट वृक्ष) का उपर्वन-मूलि = बरगढ़, तना -यज्ञाम
= जगामरा, मुण्ड = बरमुण्डा, दुम से दुम = दम
ु दम
ु ा। िचन्तामिण गृह = िचन्तामणीश्वर। िशव रूपर्ी मञ्च = मञ्चेश्वर।
पर्रमिशव = िलिङ्गराज।
(५) ित्रिपर्ुरा भैरवी-मूलिाधार मे कुण्डिलिनी का जाग्रत रूपर्।
(६) िछन्नतमस्ता-आज्ञा चक्र मे ३ नािड़यों का िमलिन-इड़ा, िपर्ङ्गलिा, सुषुम्ना।
(७) धूमावती-मूलिाधार के धूम रूपर् स्वयम्भू िलिङ्ग को घेरे हु ये।
(८) बगलिामुखी-कण्ठ मे वाणी तथा प्राण का िनयन्त्रिण-जालिन्धर बन्ध द्वारा।
(९) मातङ्गी-यह कण्ठ के ऊर्पर्री भाग मे है, जहां से वाणी िनकलिती है।
(१०) कमलिा-यह नािभ का मिणपर्ूर चक्र है िजसे मिण-पर्द्म कहते है।
(ग) नवराित्रि- नवम आयाम रन्ध्र या कमी है िजसके कारण नयी सृिष होती है , अतः नव का अथर नया, ९-दोनों है-नवो
नवो भवित जायमानो ऽग्नहा केतुरूपर्ं मामेत्यग्रम्। (ऋक् १०/८५/१९)
सृिष का स्रोत अव्यक्ति है, उसे िमलिाकर सृिष के १० स्तर है , िजनक् दश-होता, दशाह, दश-राित्रि आिद कहा गया हैयज्ञो वै दश होता। (तैित्तिरीय ब्राह्मण २/२/१/६)
िवराट् वा एषा समृद्धिा, यद् दशाहािन। (ताण्ड्य महाब्राह्मण ४/८/६)
िवराट् वै यज्ञः। ...दशाक्षरा वै िवराट् । (शतपर्थ ब्राह्मण १/१/१/२२, २/३/१/१८, ४/४/५/१९)
िवराट् एक छन्द है िजसके प्रित पर्ाद मे १० अक्षर है। पर्ुरुष (मनुष्य या िवश्व) का कत्तिार रूपर् भी अक्षर है, जो १०
प्रकार से कायर करता हैअन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः। (तैित्तिरीय ब्राह्मण २/२/६/१)

अथ यद् दशरात्रिमुपर्यितपन्त। िवश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते। (शतपर्थ ब्राह्मण १२/१/३/१७ )
प्राणा वै दशवीराः। (यजु १९/४८, शतपर्थ ब्राह्मण १२/८/१/२२)
वषर के ३६० िदनों मे ४० नवरात्रि होंगे। अतः यज्ञ के वेद यजुवेद मे ४० अध्याय है , तथा ४० ग्रह है (ग्रह = जो ग्रहण
करे)यद् गृह्णाित तस्माद् ग्रहः। (शतपर्थ ब्राह्मण १०/१/१/५)
षट् ित्रिंशाश्च चतुरः कल्पर्यन्तश्छन्दांिस च दधत आद्वादशम्।
यज्ञं िवमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वत्तिरयितपन्त। (ऋक् १०/११४/६)
४० नवरात्रिके िलिये महाभारत मे युद्धि के बाद ४० िदन का शोक बनाया गया था, जो आज भी इस्लिाम मे चलि रहा है।
आजकलि वषर मे चन्दमा की १३ पर्िरक्रमा के िलिये १३ िदन का शोक मनाते है। ४० नवरात्रिों मे ४ मुख्य है(१) दैव नवरात्रि-उत्तिरायण के आरम्भ मे जो प्रायः २२ िदसम्बर को होता है। भीष्म ने इसी िदन देह त्याग िकया था। वे
५८ िदन शर-शय्या पर्र थे-युद्धि के ८ िदन बाकी थे, ४० िदन का शोक, ५ िदन राज्यािभषेक, ५ िदन उपर्देश।
(२) िपर्तर नवरात्रि-दिक्षणायन आरम्भ-प्रायः २३ जून को।
(३) वासितपन्तक नवरात्रि-उत्तिरायण मे जब सूयर िवषुव रेखा पर्र हो।
(४) शारदीय नवरात्रि-दिक्षणायन मागर मे जब सूयर िवषुव रेखा पर्र हो।-ये दोनों मानुष नवरात्रि है।
सभी नवरात्रि इन समयों के चान्द मास के शुक्लि पर्क्ष मे होते है-पर्ौष, आषाढ़, चैत्रि, आितपश्वन। आितपश्वन मास का नवरात्रि
सबसे अच्छा मानते है क्योंिक यह देवों की अद्धिर-राित्रि है। राित्रि की शाितपन्त मे ही सृिष होती है। मनुष्य का भी भोजन और
कमर िदन मे होता है, पर्र शरीर का िवकास राित्रि मे सोते समय ही होता है।
शरत् कालिे महापर्ूजा िक्रयते या च वािषर की। (दगु ार सप्तशती १२/१२)
आितपश्वन शुक्लि प्रितपर्दा (१ ितिथ) के एक िदन पर्हलिे आितपश्वन अमावास्या को महालिया होता है , जो िवश्व के अव्यक्ति
स्वरूपर् का प्रतीक है और इस िदन िपर्तरों की पर्ूजा होती है। उसके बाद नवराित्रि के ९ िदन सृिष के ९ सगो ं के प्रतीक
है। ७वे िदन चन्दमा मूलि नक्षत्रि मे रहता है, जो ब्रह्माण्ड (galaxy) का केन्द है और इस िदन महाकालिी की पर्ूजा होती
है। अगलिे नक्षत्रि आषाढ़ के २ भाग है-पर्ूवर, उत्तिर। इन िदनों महा-लिक्ष्मी, महा-सरस्वती की पर्ूजा होती है।
दगु ार पर्ूजा मे दगु ार-सप्तशती का पर्ाठ होता है, जो माकरण्डेय पर्ुराण का अंश है।
(घ) २ द ब
ु र लिता-राजा सुरथ ने मन्त्रिी-शत्रिु के राजनीितक षड्यन्त्रि से राज्य खोया। समािध वैश्य ने पर्िरवार के षड्यन्त्रि
से सम्पर्ित्ति खोयी।
अमात्यैबरिलििभदर षु ैदर बु र लिस्य दरु ात्मिभः। कोशो बलिं चापर्हृतं तत्रिािपर् स्वपर्ुरे ततः॥८॥
पर्ुत्रिदारैिनर रस्तश्च धनलिोभादसाधुिभः। िवहीनश्च धनैदाररःै पर्ुत्रिैरादाय मे धनम्॥२२॥ (दगु ार सप्तशती, १)
इन समस्याओं के साथ वे सुमेधा ऋिष के पर्ास गये , िजन्होंने िमिथलिा के धनुष यज्ञ के बाद महेन्द पर्वर त पर्र पर्रषुराम को
भी दीक्षा दी थी। उनका उपर्देश ३ िवशालि खण्डों मे ित्रिपर्ुरा-रहस्य है। सुमेधा ऋिष को ही बौद्धि ग्रन्थों मे सुमेधा बुद्धि कहा
गया है, िजनका स्थान ओिड़शा मे बौध िजलिा है। १० महािवद्या को बौद्धि १० प्रज्ञा-पर्ारिमता कहते है।
अपर्नी दबु र लिता दरू करने के िलिये आन्तिरक तथा बाहरी शत्रिुओं से युद्धि करना पर्ड़ता है िजसके िलिये समाज मे एकता
होनी चािहये। िवश्व तथा एकत्व की प्रतीक दगु ार है। देवी तथा उनके आयुधों का िनमारण ही देवों की सितपम्मिलित शिक्ति से
हु आ। युद्धि मे शुम्भ ने जब आक्षेपर् िकयािक तुम दस
ू रों के सहारे क्यों लिड़ रही हो तो देवी ने कहा िक उनके अितिरक्ति
और कोई नहीं है तथा सभी शिक्तियां पर्ुनः उनके शरीर मे ही समा गयीं।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः। िनगर तं सुमहत्तिेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥

अतीव तेजसः कूटं ज्वलिन्तिमव पर्वर तम्। ददृशुस्ते सुरास्तत्रि ज्वालिाव्याप्त िदगन्तरम्॥१२॥
अतुलिं तत्रि तत्तिेजः सवर देवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नतारी व्याप्तलिोकत्रियं ितपत्वषा॥१३॥ (सप्तशती, अध्याय २)
बलिावलिेपर्ाद्दषु े त्वं मा दगु े गवर मावह् । अन्यासां बलिमािश्रत्य युद्ध्यसे याितमािननी॥३॥ देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्रि िद्वतीया का ममापर्रा। पर्श्यैता दषु मय्येव िवशन्त्यो मिद्वभूतयः॥५॥ (अध्याय १०)
४. दीपर्ावलिी-(क) २ प्रकार की लिक्ष्मी पर्ूज ा-यह काित्तिरक अमावास्या को होती है, जो आिथर क वषर का आरम्भ था।
िवक्रमािदत्य ने भी ५७ ई.पर्ू. मे पर्षुपर्ितनाथ मे चैत्रि शुक्लि से िवक्रम सम्वत् आरम्भ िकया। उसके ७ महीने बाद
सोमनाथ मे काित्तिरक मास से सम्वत् आरम्भ िकया। सोमनाथ समुद तट पर्र है, वहां से दिक्षणी ध्रुव तक और कोई द्वीपर्
नहीं है। काित्तिरक मास मे समुदी तूफान शान्त हो जाते है , जब व्यापर्ार के िलिये यात्रिा शुरु होती है। स्थलि पर्र भी वषार के
बाद यात्रिा सहज है। आज भी व्यापर्ारी इसी िदन अपर्ने बही-खाता की पर्ूजा करते है। दगु ारपर्ूजा मे व्यिक्ति तथा समाज की
शिक्ति की पर्ूजा है, दीपर्ावलिी मे उस शिक्ति का प्रयोग उत्पर्ादन और उपर्भोग के िलिये है। अक्षर पर्ुरुष या िनमारण कतार
िवष्णु की २ पर्ितपत्नयां कहते है-दृश्य सम्पर्ित्ति लिक्ष्मी (लिक्ष = देखना) है। अदृश्य सम्पर्ित्ति जैसे प्रसन्नतता, सनोष, मैत्रिी,
बुिद्धि आिद श्री हैश्रीश्च ते लिक्ष्मीश्च पर्त्न्यौ, अहोरात्रिे पर्ाश्वे, नक्षत्रिािण रूपर्ं अितपश्वनौ व्यात्तिम्।
इष्णन् इषाण अमुं म इषाण सवर लिोकं म इषाण॥ (यजुवेद ३१/२२)
सूयर रूपर्ी िवष्णु वषर मे २ बार गित की िदशा बदलिते है-६ मास उत्तिर तथा ६ मास दिक्षण िदशा मे। यह िदन-रात रूपर्ी
उनके २ पर्ाश्वर है। सभी नक्षत्रि सूयर जैसे है, जो िवष्णु के शरीर है। सूयर की कक्षा (क्राितपन्त वृत्ति) िवषुव रेखा को २
स्थान्ंं पर्र काटती है जो २ अितपश्वन है। या सौर मण्डलि मे तापर् तथा तेज क्षेत्रि (१००, १००० सौर व्यास तक) का
क्षेत्रि है िजसमे क्रतु या िनमारण होता है।
(ख) सरस्वती-एक गलित धारणा है िक सरस्वती तथा लिक्ष्मी मे िवरोध है। वस्तुतः सरस्वती से ही लिक्ष्मी का जन्म
होता है। आकाश मे ब्रह्माण्ड का क्षेत्रि सरस्वान् समुद है, उसका प्रितरूपर् मनुष्य का मितपस्तष्क है-उसमे उतनी ही
कोिषका है िजतने ब्रह्माण्ड मे तारा। ब्रह्माण्ड मे ही सूयर का जन्म होता है, िजसके प्रतीक रूपर् हम दीपर् जलिाते है। सौर
मण्डलि के अणर व समुद का िनमारण लिक्ष्मी है। मनुष्य की श्री (तेज) उसके मितपस्तष्क मे है अतः उसे िशर (श्री का स्थान)
कहते है। उसके सही उपर्योग से ही लिक्ष्मी आती है। उसके ठीक उपर्भोग के िलिये भी बुिद्धि चािहये। अतः सरस्वती के
साथ ही लिक्ष्मी रह सकती है। िवभीषण ने भी रावण को यही समझाया था िक क्रोध से सुख -धमर का नाश होता है, धमर
पर्ूवरक सीता को वापर्स करने से ही सुख पर्ूवरक पर्िरवार के साथ जीिवत रह सकते हैजहाँ सुमित तहँ सम्पर्ित नाना। जहाँ कुमित तहँ िवपर्ित िनदाना॥ (रामचिरतमानस, सुन्दरकाण्ड ३९/३)
त्यजाशु कोपर्ं सुख-धमर -नाशनं, भजस्व धमर रित-कीितर -वधर नम्।
प्रसीद जीवेम सपर्ुत्रि-बान्धवाः, प्रदीयतां दाशरथाय मैिथलिी॥ (वाल्मीिक रामायण, युद्धिकाण्ड ९/२२)
वेद मे भी कहा है िक मन से शुद्धि की गयी वाणी बोलिने से ही सािथयों से मैत्रिी होती है तथा लिक्ष्मी आती है , जैसे चलिनी
से चालिने पर्र सत्तिू पर्िवत्रि होता हैसक्तिुिमव िततउना पर्ुनन्तो यत्रि धीरा मनसा वाचमक्रत।
अत्रिा सखायः सख्यािन जानते भदैषां लिक्ष्मीिनर िहतािध वािच॥ (ऋग्वेद १०/७१/२, ज्ञान-सूक्ति)
(ग) अलिक्ष्मीघ्न सूक्ति -ऋिष-िशिरितपम्बठः भारद्वाजः। िविनयोग-अलिक्ष्मीघ्नम्। देवता-२-३ ब्रह्मणस्पर्ितः, ५-िवश्वेदेवाः।
छन्द-अनुषुपर््।
अरािय काणे िवकटे िगिरं गच्छ सदान्वे। िशिरितपम्बठस्य सत्विभस्तेभीष्ट्वा चातयामिस॥१॥

चत्तिो इतश्चत्तिामुतः सवार भ्रूणान्यारुषी। अराय्यं ब्रह्मणस्पर्ते तीक्ष्णशृङ्गोदृषिन्नतिह॥२॥
अदो यद्दारु प्लिवते िसन्धोः पर्ारे अपर्ूरुषम्। तदा रभस्व दहु र णो तेन गच्छ पर्रस्तरम्॥३॥
यद्धि प्राचीरजगन्तोरो मण्डू रधािणकीः। हता इन्दस्य शत्रिवः सवे बुददु याशवः॥४॥
पर्रीमे गामनेषत पर्यर िग्निर्महृषत । देवेष्वक्रत श्रवः क इमाँ आ दधषर ित॥५॥
= (१) अलिक्ष्मी कुछ नहीं देती (अरािय), काण ( कुरूपर्, १ आं ख का), िवकृत अंग वालिी, क्रोधी है तथा सच्चाई नही
देखती है। (२) अलिक्ष्मी जैसे गुणों से गभर के भीतर, इस जीवन मे तथा मरने के बाद भी मनुष्य नष होता है।
ब्रह्मणस्पर्ित (ब्रह्माण्ड की प्रितमा, िवद्वान्) की तीव्र बुिद्धि ही कृपर्णता दरू कर सकती है। (३) संसार सागर मे जो
अपर्ौरुषेय दारु (दारु-ब्रह्म जगन्नताथ) तैर रहा है उस दलि
ु र भ दारु को पर्ाकर ही मनुष्य सागर पर्ार कर सकता है। (४) जब
पर्ूवर से प्रकाश आता है (सूयोदय, ज्ञान), तो इन्द के शत्रिु (िहंसा, कठोरता) पर्ानी के बुलिबुलिों की तरह नष हो जाते है।
(५) गौ (यज्ञ, माता रूपर् पर्शु) चारों तरफ हो तथा बीच मे अिग्निर् (अग्री = नेता, घना पर्दाथर या तेज) हो। उससे देवों को
भोजन िमलिता है और वे अजेय हो जाते है।
(घ) गो-सभी िनमारण का स्थान और साधन गो है। प्रथम िनमारण ब्रह्माण्ड का है। उसका िनमारण क्षेत्रि उसका १० गुणा
बड़ा गोलिोक है िजसके भीतर िवराट् बालिक रूपर् ब्रह्माण्ड पर्ैदा होता है (ब्रह्म-वैवत्तिर पर्ुराण, प्रकृित खण्ड, अध्याय ३)।
वेद मे इसे कूमर कहा गया है, क्यों िक यह काम करता है, इस आकार का पर्शु भी कूमर है। सूयर का तेज भी गो है िजससे
जीवन चलिता है। पर्ृथ्वी पर्र भी गो दग्ु ध से ही हमारा पर्ालिन होता है, उससे कृिष होती है। अतः िनधर नता दरू करने के
िलिये तथा लिक्ष्मी के िलिये गो की ही पर्ूजा होती हैगावो लिोकास्तारयितपन्त क्षरन्त्यो गावश्चान्नतं संजयितपन्त लिोके।
यस्तं जानन् न गवां हाद्दरमेित स वै गन्ता िनरयं पर्ापर्चेताः॥
(महाभारत, अनुशासन पर्वर , ७१/५२ नािचकेत-यमराज-सम्वाद)
िवश्व को क्षय से गौ बचाती है तथा अन्नत का उत्पर्ादन करती है। यह जानकर भी जो गाय की श्रद्धिा नहीं करता , वह
महापर्ापर्ी है।
जब च्यवन ऋिष मछुये के जालि मे फंस गये थे तो उनकी मुिक्ति के िलिये उनके मूल्य के रूपर् मे पर्ूरा राज्य कम था, गौ ही
उनका पर्ूणर मूल्य थीच्यवन उवाच-अधर राज्यं समग्रं च मूल्यं नाहारिम पर्ािथर व। सदृशं दीयतां मूल्यमृिषिभः सह िचन्त्यताम्॥१३॥
ब्राह्मणानां गवां चैव कुलिमेकं िद्वधा कृतम्। एकत्रि मन्त्रिाितपस्तष्ठितपन्त हिवरन्यत्रि ितष्ठित॥
अनघेया महाराज िद्वजा वणेषु चोत्तिमाः। गावश्च पर्ुरुषव्याघ्र गौमूरल्यं पर्िरकल्प्यताम्॥२२॥
(महाभारत, अनुशासन पर्वर , ५१)
महाभारत, अनुशासन पर्वर , अध्याय ८३ मे इन्द को ब्रह्मा ने उपर्देश िदया है िक अपर्ना राज्य वापर्स पर्ाने के िलिये गौ की
पर्ूजा करे।
वेद मे गौ को रुद की माता, वसु की पर्ुत्रिी, आिदत्य की बहन, अमृत की नािभ कहा है। गौ की कोई भी प्रशंसा अिधक
नहीं हो सकती तथा गौ हत्या िबल्कुलि नहीं होमाता रुदाणां दिु हता वसूनां स्वसािदत्यानाममृतस्य नािभः।
प्र नु वोचं िचिकतुषे जनाय मा गामनामिदतं विधष॥ (ऋग्वेद ८/१०१/१५)

आकाश मे-अमृत गोलिोक का केन्द, गो रूपर्ी िकरण से सूयर का रौद तेज होता है (रुद-माता), सौर तेज की बहन, वसु
रूपर्ी सूयर की पर्ुत्रिी है। पर्ृथ्वी पर्र-अमृत दग्ु ध-अन्नत का केन्द, रुद रूपर्ी इितपन्दय या तेज की माता, आिदत्य रूपर्ी समाज की
बहन, वसु रूपर्ी घास आिद की पर्ुत्रिी है िजससे गौ का जीवन चलिता है।
गो सूक्ति-आ गावो अग्मन्नतुत भदमक्रन् सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्स्वमे।
प्रजावतीः पर्ुरुरूपर्ा इह स्युः, इन्दाय पर्ूवीरुषसो दहु ानाः।।१॥
गावो भगो गाव इन्दो मे अच्छात्, गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षः।
इमा या गावः स जनास इन्दः, इच्छामीद् वृद्धिा मनसा िचिदन्दम्॥२॥
यूयं गावो मेदयथा कॄशं िचत्, अश्लिीलिं िचत् कृणुथा सुप्रतीकम्।
भदं गृहं कृणुथ भदवाचः, बृहद्वो वय उच्यते सभासु॥३॥
प्रजावतीः स्नवयसं रुशन्तीः, शुद्धिा अपर्ः सुप्रपर्ाणे िपर्बन्तीः।
मा वः स्तेन ईशत माऽग्नघशंसः, पर्िर वो हेती रुदस्य वृञ्ज्यान्॥४॥ (तैित्तिरीय ब्राह्मण २/८/८)
= (१) गौ हमारे पर्ास आकर उन्नतित करे। गोशालिा मे रह कर हमारा घर सुखद बनाये। बछड़े उत्पर्न्नत करे, दध
ू आिद दे
जो इन्द को अपर्र ण हो सके। (२) गौ ही सम्पर्ित्ति है तथा इन्द जैसा पर्ालिन करती है। वह सोम युक्ति है अतः उनकी रक्षा
के िलिये इन्द की प्राथर ना करते है। (३) गौ हमारे बच्चों को पर्ुष तथा सुन्दर करे। हमारे घर, वाणी के िलिये शुभ है तथा
िवद्वान् इसकी चचार करते है। (४) गौ और उनकी सन्तान अच्छा अन्नत खाये तथा स्वच्छ जलि िपर्ये। उनके आशीवारद से
हम पर्ापर् मुक्ति हों तथा उनकी रक्षा कर सके।
(ङ) समुद मन्थन-समुद-मन्थन से उत्पर्न्नत १४ रत्नों मे एक लिक्ष्मी भी थी। आकाश के िवशालि समुद मे ब्रह्माण्ड का
अक्ष-भ्रमण ही समुद-मन्थन है िजससे दृश्य जगत् (लिक्ष्मी) बनता है। पर्ृथ्वी पर्र जलि, स्थलि, वायु, जैव िवस्तार ४ समुद
है। स्थलि समुद के मन्थन या खान से रत्न िनकलिते है। बिलि ने जब इन्द के ३ लिोक वापर्स कर िदये , तो कई असुर
असन्तुष थे िक युद्धि मे देवता उनको नहीं जीत सकते थे। िछटपर्ुट युद्धि चलिते रहे। उसे रोकने के िलिये कूमर अवतार ने
िमलिकर समुद मन्थन करने की सलिाह दी। भारत मे झारखण्ड मे मुख्यतः असुरों ने खुदाई मे सहयोग िकया जहां
िसंहभूिम से भागलिपर्ुर के गंगा-तट तक का लिम्बा पर्वर त मन्दराचलि कहलिाता है। आज भी असुरों की उपर्ािध वही है जो
ग्रीक भाषा मे खिनजों के नाम है-औरम = स्वणर , हेम्ब्रम = पर्ारद, खालिको = ताम अयस्क, मुण्डा = लिोहा, टोप्पर्ो =
टोपर्ाज, आिद। देवता िवरलि धातुओं के शोधन मे दक्ष थे, वे िजम्बाबवे (जाम्बूनद स्वणर ) तथा मेितपक्सको (मािक्षकः =
चान्दी) गये।
वेद मे भी समुद मन्थन करने वालिे को कूमर कहा है-यो वै स एषां लिोकानां-अप्सु प्रिवद्धिानां पर्राङ् रसोऽग्नत्यक्षरत्-स एष
कूम्मर ः। तस्य यदधर-कपर्ालिं, अयं स लिोकः। तत् प्रितिष्ठतिमव भवित। अथ यदत्ति
ु रं, सा द्यौः। तद् व्यवगृहीतान्तिमव
भवित। एतद् वै रूपर्ं कृत्वा प्रजापर्ितः प्रजा असृजत। यदसृजत-अकरोत्-तत्। यदकरोत्-तस्मात् कूम्मर ः। कश्यपर्ो वै
कूमर ः। तस्मादाहु ः-सवारः प्रजाः काश्यप्यः-इित। स यः कूम्मर ः-असौ स आिदत्यः। (शतपर्थ ब्राह्मण ७/५/१/१-६)
िवष्णु पर्ुराण के १४ रत्न मे ७ िनजीव, ७ सजीव है। िनजीव रत्न-चक्र, रथ, मिण, खड्ग, रत्न, केतु (झण्डा), िनिध
(खजाना) ।
७ सजीव है-भायार (घर का भार वहन करने वालिी), पर्ुरोिहत (प्रितिनिध), सेनानी, रथी (सारिथ), क्षत्तिा (रक्षक), अश्व,
कलिभ (रसोइया)।
चक्रं रथो मिणः खड्ग चम्मर रत्नञ्च पर्ञ्चमम्। केतुिनर िधश्च सप्तैवमप्राणािग्निर् प्रचक्षते॥
भाय्यार पर्ुरोिहतश्चैव सेनानी रथकृच्च यः। पर्त्न्यश्वौ कलिभश्चैव प्रािणनः सप्त कीितर ताः॥

(िवष्णु पर्ुराण ४/१२/१-२)
शतपर्थ ब्राह्मण (५/३/३) मे भी यही सूची है।
(छ) द्यूत (जुआ )-कई लिोग दीपर्ावलिी मे जुआ खेलिना शुभ मानते है। पर्र सभी शास्त्रमों मे इसे मना िकया गया है।
िकन्ते द्यूतेन राजेन्द ! बहु दोषेण मानद।
देवने बहवो दोषास्तस्मात्तित् पर्िरवजर येत्॥ (महाभारत, िवराट् पर्वर ६८/३३)
= (युिधिष्ठर ने कङ्क रूपर् मे राजा िवराट् से कहा)-आपर्को जुआ छोड़ देना चािहये क्योंिक इसमे कई दोष है।
द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राषरािन्नतवारयेत्। राजान्तकरणावेतौ द्वौ दोषौ पर्ृिथवीिक्षताम्॥२२१॥
प्रकाशमेतत्तिास्कयर यद् देवनसमाह्वयौ। तयोिनर त्यं प्रतीघाते नृपर्ितयर त्नवान्भवेत्॥२२२॥
अप्रािणिभयर ितपत्क्रयते तल्लोके द्यूतमुच्यते। प्रािणिभः िक्रयते यस्तु स िवज्ञेयः समाह्वयः॥२२३॥
(मनुस्मृित, अध्याय ९)
= राजा को द्यूत (जुआ) तथा समाह्वय (पर्शुओं पर्र बाजी लिगानेवालिे ) करने वालिों को देश से िनकालि देना चािहये
क्योंिक इससे राज्य नष हो जाता है। ये खुलिे आम देश को लिूटते है, अतः राजा को इनसे सावधान रहना चािहये।
अक्षैमार दीव्यः कृिषिमत् कृषस्व िवत्तिे रमस्व बहु मन्यमानः।
तत्रि गावः िकतव ! तत्रि जाया तन्मे िव चषे सिवतायमय्यर ः॥ (ऋक् १०/३४/१३)
= जुआरी! पर्ासा कभी मत खेलिो। यिद खेलिना ही है तो सिवता से कृिष रूपर् मे पर्ासा खेलिो िजसमे लिाभ ही लिाभ है।
उससे सम्पर्ित्ति, जाया आिद पर्ाकर उसका उपर्भोग करो।
ऋग्वेद का पर्ूरा (१०/३४) सूक्ति िकतव (जुआरी) सूक्ति कहलिाता है। समाज का पर्ालिन वैश्य करता है , पर्र कृिष,
उत्पर्ादन, वािणज्य-इन सभी मे कई प्रकार का अिनश्चय रहता है। यही सिवता के साथ जुआ है। अलिग से जुआ
खेलिकर अपर्ने को नष नहीं करना है। वैश्य के कमो ं मे सबसे अिधक अिनश्चय रहता है, इस अथर मे वे जुआ खेलिते है।
(ज) अलिक्ष्मी-लिक्ष्मी धन की देवी रूपर् मे इन्द, कुबेर से सम्बितपन्धत है। अलिक्ष्मी का सम्बन्ध वरुण, यम से है। काित्तिरक
कृष्ण पर्क्ष की १३वीं ितिथ को िनर्ऋित (ऋत = धन, िनर्ऋित = धूिलि आिद) की सफाई होती है तथा यम के िलिये
दीपर् जलिाते है। अगलिे िदन यम या नरक-चतुदरशी होती है। अमावास्या को मुख्य दीपर्ावलिी है। उसके बाद शुक्लि पर्क्ष की
१ ितिथ को अन्नत-कूट मे इन्द पर्ूजा होती है जैसा कृष्ण ने गोवधर न पर्ूजा मे िकया था। ितिथ २ को यम-िद्वतीया को बहन
द्वारा भाई की पर्ूजा होती है, यम = यमलि या जोड़ा, भाई बहन को यम-यमी कहते है। यह अलिक्ष्मी से लिक्ष्मी की िदशा
मे गित है।
चण्डी पर्ाठ मे भी श्री की अलिक्ष्मी रूपर् मे स्तुित है। सज्जनों के घर मे लिक्ष्मी अलिक्ष्मी या अदृश्य सम्पर्ित्ति = मैत्रिी, बुिद्धि
आिद के रूपर् मे रहती है। अन्य अथर है िक वे सम्पर्ित्ति का िदखावा नहीं करते िजससे ईष्यार, द्वेष होता है।
या श्रीः स्वयं सुकृितनां भवनेष्वलिक्ष्मीः पर्ापर्ात्मनां कृतिधयां हृदयेषु बुिद्धिः।
श्रद्धिा सतां कुलिजनप्रभवस्य लिज्जा, ता त्वां नताः स्म पर्िरपर्ालिय देिव िवश्वम्॥ (दगु ार सप्तशती ४/५)
५. होलिी-(क) शब्द का अथर - इसका मूलि रूपर् हु लिहु लिी (शुभ अवसर की ध्विन) है जो ऋ-ऋ-लिृ का लिगातार
उच्चारण है। आकाश के ५ मण्डलि है, िजनमे पर्ूणर िवश्व तथा ब्रह्माण्ड हमारे अनुभव से पर्रे है। सूयर , चन्द, पर्ृथ्वी का
अनुभव होता है, जो िशव के ३ नेत्रि है। इनके िचह ५ मूलि स्वर है-अ, इ, उ, ऋ, लिृ। िशव के ३ नेत्रिों का स्मरण ही
होलिी है।
अिग्निर्मर ूधार चक्षुषी चन्द सूयौ िदशः श्रोत्रिे वाितपग्ववृताश्च वेदाः। (मुण्डक उपर्िनषद्, २/१/४)
चन्दाकर वैश्वानर लिोचनाय, तस्मै वकाराय नमः िशवाय (िशव पर्ञ्चाक्षर स्तोत्रि)

िवजय के िलिये उलिुलिय (होलिी) का उच्चारण होता हैउद्धिषर तां मघवन् वािजनान्युद वीराणां जयतामेतु घोषः।
पर्ृथग् घोषा उलिुलियः एतुमन्त उदीरताम्। (अथवर ३/१९/६)
(ख) अिग्निर् का पर्ुन ः ज्वलिन-सम्वत्सर रूपर्ी अिग्निर् वषर के अन्त मे खचर हो जाती है , अतः उसे पर्ुनः जलिाते है, जो
सम्वत्-दहन हैअिग्निर्जारगार तमृचः कामयन्ते, अिग्निर्जारगार तमु सामािन यितपन्त।
अिग्निर्जारगार तमयं सोम आह-तवाहमितपस्म सख्ये न्योकाः। (ऋक् ५/४४/१५)
यह फाल्गुन मास मे फाल्गुन नक्षत्रि (पर्ूिणर मा को) होता है, इस नक्षत्रि का देवता इन्द हैफाल्गुनीष्वग्निर्ीऽग्नआदधीत। एता वा इन्दनक्षत्रिं यत् फाल्गुन्यः। अप्यस्य प्रितनाम्न्यः। (शतपर्थ ब्राह्मण २/१/२/१२)
मुखं वा एतत् सम्वत्सररूपर्यत् फाल्गुनी पर्ौणर मासी। (शतपर्थ ब्राह्मण ६/२/२/१८)
सम्वत्सर ही अिग्निर् है जो ऋतुओं को धारण करता हैसम्वत्सरः-एषोऽग्निग्निर्ः। स ऋतव्यािभः संिहतः। सम्वत्सरमेवत
ै त् -ऋतुिभः-सन्तनोित, सन्दधाित। ता वै नाना समानोदकारः।
ऋतवो वाऽग्नअसृज्यन्त। ते सृषा नानैवासन्। तेऽग्नब्रुवन्-न वाऽग्नइत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजनियतुम्। रूपर्ैः समायामेित। ते
एकैकमृतुं रूपर्ैः समायन्। तस्मादेकैकितपस्मन्-ऋतौ सवेषां ऋतूनां रूपर्म्। (शतपर्थ ब्राह्मण ८/७/१/३,४)
िजस ऋतु मे अिग्निर् िफर से बसती है वह वसन्त हैयितपस्मन् कालिे अिग्निर्कणाः पर्ािथर वपर्दाथेषु िनवसन्तो भवितपन्त, स कालिः वसन्तः।
फल्गु = खालिी, फांका। वषर अिग्निर् से खालिी हो जाता है, अतः यह फाल्गुन मास है। अंग्रेजी मे भी होलिी (Holy =
िशव = शुभ) या हौलिो (hollow = खालिी) होता है। वषर इस समय पर्ूणर होता है अतः इसका अथर पर्ूणर भी है। अिग्निर्
जलिने पर्र पर्ुनः िविवध (िविचत्रि) सृिष होती है, अतः प्रथम मास चैत्रि है। आत्मा शरीर से गमन करती है उसे गय-प्राण
कहते है। उसके बाग शरीर खालिी (फल्गु) हो जाता है, अतः गया श्राद्धि फल्गु तट पर्र होता है।
(ग) कामना-काम (कामना) से ही सृिष होती है, अतः इससे वषर का आरम्भ करते हैकामस्तदग्रे समवतर तािध मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसित िनरिवन्दन् हृिद प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ (ऋक् १०/१२९/४)
इस ऋतु मे सौर िकरण रूपर्ी मधु से फलि-फूलि उत्पर्न्नत होते है, अतः वसन्त को मधुमास भी कहते है(यजु ३७/१३) प्राणो वै मधु। (शतपर्थ ब्राह्मण १४/१/३/३०) = प्राण ही मधु है।
(यजु ११/३८) रसो वै मधु। (शतपर्थ ब्राह्मण ६/४/३/२, ७/५/१/४) = रस ही मधु है।
अपर्ो देवा मधुमतीरगृम्भणिन्नतत्यपर्ो देवा रसवतीरगृह्णिन्नतत्येवत
ै दाह। (शतपर्थ ब्राह्मण ५/३/४/३)
= अपर्् (ब्रह्माण्ड) के देव सूयर से मधु पर्ाते है।
ओषिध (जो प्रित वषर फलिने के बाद नष होते है) का रस मधु है-ओषधीनां वाऽग्नएष पर्रमो रसो यन्मधु। (शतपर्थ ब्राह्मण
२/५/४/१८) पर्रमं वा एतदन्नताद्यं यन्मधु। (ताण्ड्य महाब्राह्मण १३/११/१७)
सवर वाऽग्नइदं मधु यिददं िकं च। (शतपर्थ ब्राह्मण ३/७/१/११, १४/१/३/१३)
हम हर रूपर् मे मधु की कामना करते हैमधु वाता ऋतायते, मधु क्षरितपन्त िसन्धवः। माध्वीनर ः सन्त्वोषधीः॥६॥
मधुनक्तिमुतोषसो, मधुमत् पर्ािथर वं रजः। मधु द्यौरस्तु नः िपर्ता॥७॥
मधुमान्नतो वनस्पर्ित- मर धुमाँ अस्तु सूयरः। माध्वीगारवो भवन्तु नः॥८॥ (ऋक् १/९०)

= मौसमी हवा (वाता ऋता) मधु दे, निदयां मधु बहाये, हमारी ओषिध मधु भरी हों। राित्रि तथा उषा मधु दे, पर्ृथ्वी,
आकाश मधु से भरे हों। वनस्पर्ित, सूयर, गाये मधु दे।
मधुमतीरोषधीद्यारव आपर्ो मधुमन्नतो अन्तिरक्षम्।
क्षेत्रिस्य पर्ितमर धुमन्नतो अस्त्विरष्यन्तो अन्वेनं चरेम॥ (ऋक् ४/५७/३)
= ओषिध, आकाश, जलि, अन्तिरक्ष, िकसान-सभी मधु युक्ति हों।
(घ) दोलि-पर्ूि णर म ा-वषर का चक्र दोलिन (झूलिा) है िजसमे सूयर-चन्द रूपर्ी २ बच्चे खेलि रहे है, िजस िदन यह दोलि पर्ूणर
होता है वह दोलि-पर्ूिणर मा हैयास्ते पर्ूषन् नावो अन्तः समुदे िहरण्मयीरन्तिरक्षे चरितपन्त।
तािभयारिस दत्ू यां सूय्यर स्य कामेन कृतश्रव इच्छमानः॥ (ऋक् ६/५८/३)
पर्ूवारपर्रं चरतो माययैतै िशशू क्रीडन्तौ पर्िर यन्तो अध्वरम् (सम्वत्सरम्) ।
िवश्वान्यन्यो भुवनािभचष ऋतूरन्यो िवदधज्जायते पर्ुनः॥ (ऋक् १०/८५/१८)
कृष्ण (Blackhole) से आकिषर त हो लिोक (galaxy) वतर मान है, उस अमृत लिोक से सूयर उत्पर्न्नत होता है िजसका
तेज पर्ृथ्वी के मत्यर जीवों का पर्ालिन करता है। वह रथ पर्र घूम कर लिोकों का िनरीक्षण करता है आकृष्णेन रजसा वतर मानो िनवेशयन्नतमृतं मत्यर च।
िहरण्ययेन सिवता रथेना देवो याित भुवनािन पर्श्यन्। (ऋक् १/३५/२, यजु ३३/४३)
(ङ) िवषुव सं क्र ाितपन्त-होलिी के समय सूयर उत्तिरायण गित मे िवषुव को पर्ार करता है। इस िदन सभी स्थानों पर्र िदनरात बराबर होते है। िदन राित्रि का अन्तर, या इस रेखा का अक्षांश शून्य (िवषुव) है, अतः इसे िवषुव रेखा कहते है।
इसको पर्ार करना संक्राितपन्त है िजससे नया वषर होलिी के बाद शुरु होगा।

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