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काश गर्भर स्थ िशशु बोल सकता, यदिदि वह बोलता तो शायददि वह अपने शरीर को चीरते औजारों को रोक

सकता और कहता 'माँ, मुझे भी जीना है।' लेिकन शायददि उस वक्त भी उसकी आवाज को वो िनदिर यदी माँबाप नहीं सुन पाते, जो रजामंदिी से उसकी हत्यदा को अंजाम दिे रहे है। मेरा यदह प्रश्न उन सभी लोगर्ों से है,
जो कभी न कभी कन्यदा भ्रूण हत्यदा के िजम्मेदिार रहे है।
बािलका पिरवार के आँ गर्न का वो नन्हा सा फूल है, जो उलाहना के थपेड़ों से िबखरता है, त्यदागर् की
रासायदिनक खादि से फलता-फूलता है िफर भी दिःु ख रूपी पतझड़ मे अपने बूते पर खड़ा रहता है।
बािलका, िजसके जन्म से ही उसके जीवन के जंगर् की शुरुआत हो जाती है। नन्ही उम्र मे ही उसे बेिड़यदाँ
पहनकर चलने की आदित-सी डाल दिी जाती है। यदेन केन प्रकारेण उसे बार-बार यदादि िदिलायदा जाता है िक
वह एक औरत है, उसे सपने दिेखने की इजाजत नहीं है। कैदि ही उसका जीवन है।
हमे यदह सोचना चािहए िक िवकास के सोपानों पर चढ़ने के बावजूदि भी आिखर क्यदों आज इस दिेश की
बािलका भ्रूण हत्यदा, बाल िववाह, दिहेज मृत्यदु के रूप मे समाज मे अपने औरत होने का दिंश झेल रही है?
बािलका पिरवार के आँ गर्न का वो नन्हा सा फूल है, जो उलाहना के थपेड़ों से िबखरता है, त्यदागर् की
रासायदिनक खादि से फलता-फूलता है िफर भी दिख
ु रूपी पतझड़ मे अपने बूते पर खड़ा रहता है।
बािलका, िजसके जन्म से ही उसके जीवन के जंगर् की शुरुआत हो जाती है।
लोगर्ों के सामने तो हम बड़ी-बड़ी बाते करते है िक बािलका भी दिेश का भिवष्यद है लेिकन जब हम अपने
िगर्रेबान मे झाँकते है तब महसूस होता है िक हम भी कहीं न कहीं प्रत्यदक्ष यदा परोक्ष रूप से इसकी हत्यदा
के भागर्ी रहे है। यदही कारण है िक आज दिेश मे घरेलू िहंसा व भ्रूण हत्यदा संबंधी कानून बनाने की
आवश्यदकता महसूस हु ई।
अिशिक्षत ही नहीं बि ऊल्क ऊँचे ओहदिे वाले िशिक्षत पिरवारों मे भी गर्भर मे बािलका भ्रूण का पता चलने पर
अबाशर न के रूप मे एक जीिवत बािलका को गर्भर मे ही कुचलकर उसके अि ऊस्तत्व को समाप्त िकयदा जा रहा
है। हालाँिक भ्रूण का िलंगर् परीक्षण करना कानूनी अपराध परंतु िफर भी नोटों व पहचान के जोर पर कई
िचिकत्सकों के यदहाँ चोरी-िछिपे िलंगर् परीक्षण का अपराध िकयदा जा रहा है।
यदिदि हम अकेले म.प्र. की बात करे तो यदहाँ प्रित हजार लड़कों पर लड़िकयदों का अनुपात िनरंतर घटता
जा रहा है। वहीं दिस
ू री ओर हमारी सरकार दिलील दिेती है िक अब गर्ाँव-गर्ाँव मे शत-प्रितशत िशक्षा पहु ँच
चुकी है व लोगर्ों मे जागर्रूकता आई है। मेरा उनसे प्रश्न है िक यदिदि बािलका िशक्षा का लक्ष्यद पूरा हु आ है
तो िफर म.प्र. मे वषर

1991

मे प्रित हजार लड़कों पर

952

बािलकाएँ थीं, वो वषर

2001

मे घटकर

933

कैसे रह

गर्ई ं? िभंड और मुरन
ै ा िजले मे तो यदह ि ऊस्थित दिस
ू रे िजलों की तुलना मे और भी अिधक भयदावह है।

जननी है. जो हमारे अि ऊस्तत्व का प्रमाण है। इसकी रक्षा करना हमारा कत्रव्यद है इसिलए आज ही संकल्प ले और कन्यदा भ्रूण हत्यदा पर अंकुश लगर्ाकर नन्ही बेिटयदों को भी जीने का अिधकार दिे .आज कई जाितयदों मे यदे ि ऊस्थितयदाँ बन रही है िक वहाँ लड़के ज्यदादिा और लड़िकयदाँ कम है इसिलए मजबूरन उन्हे दिस ू री जाित मे अपने लड़के का िरश्ता तयद करना पड़ रहा है। यदिदि आज यदह ि ऊस्थित है तो कल क्यदा होगर्ा. यदह तो सवर िविदित है। यदिदि हम अब भी नहीं जागर्े तो शायददि बहु त दिेर हो जाएगर्ी और प्रकृित के िकसी सुंदिर िवलुप्त प्राणी की तरह बेिटयदों की प्रजाित भी िवलुिप्त के कगर्ार पर पहु ँच जाएगर्ी। बेिटयदाँ भी घर का िचरागर् है। वे भी एक इनसान है.