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Hindi Soham Vol2 Issue5

Hindi Soham Vol2 Issue5

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Published by M K Mishra
Tanuja Thakur spiritual discourses news letter
Tanuja Thakur spiritual discourses news letter

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Categories:Types, Research
Published by: M K Mishra on May 11, 2013
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07/19/2015

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1

सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५







१ ११ १. .. . स

वचन स

वचन स

वचन स

वचन
२ २२ २. .. . सग

ण ग

³के Îनग

ण सग

ण ग

³के Îनग

ण सग

ण ग

³के Îनग

ण सग

ण ग

³के Îनग

ण Îनराले Îनराले Îनराले Îनराले मा²यम मा²यम मा²यम मा²यम
३ ३३ ३. .. . अ²याcम अ²याcम अ²याcम अ²याcम
४ ४४ ४. .. . 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग
५ ५५ ५. .. . साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां
६ ६६ ६. .. . साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ




सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं
साधकïव व

Í@ हे तु सा साधकïव व

Í@ हे तु सा साधकïव व

Í@ हे तु सा साधकïव व

Í@ हे तु साBाÍह BाÍह BाÍह BाÍहक आ²यािcमक पͳका क आ²यािcमक पͳका क आ²यािcमक पͳका क आ²यािcमक पͳका
ईमेल ईमेल ईमेल ईमेल: : : : soham@vedicupasana.com | www.vedicupasana.com
संपक संपक संपक संपक : ९९९९८६१९०८
«लॉग «लॉग «लॉग «लॉग – www.tanujathakur.com
|| ÷ी गणे शाय नमः ||
|| ÷ी गु रवे नमः ||



2

सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५

१ ११ १. .. . स

वचन स

वचन स

वचन स

वचन

परम पू7य डॉ परम पू7य डॉ परम पू7य डॉ परम पू7य डॉ. . . . जयं त बालाजी आठवले जयं त बालाजी आठवले जयं त बालाजी आठवले जयं त बालाजी आठवले
÷ी गु³ उवाच ÷ी गु³ उवाच ÷ी गु³ उवाच ÷ी गु³ उवाच : : : :
अपने पदके अहंकारम ÎलB राजनेताओं§ारा स+पू ण 9शासÎनक ¯यव1था, अथा त सरकार| कम चार|, अÎधकार| एवं पु Îलस,
इनके मा²यमसे समाज, राç एवं धम Íवरोधी क

Îत करते ह | इसÎलए ¯यÍñ एवं समाजपर अ7याय होता है , फल1वFप
राç और धम क| अcयÎधक हाÎन होती है | अनेक बार सरकार| कम चार|, अÎधकार| एवं पु Îलस, यÍद इ7ह राç एवं
धम -Íवरोधी क

Îत करनेक| इ¯छा नह|ं होती, तब भी उ7ह राजनेताओंके दबावम आकर ऐसा करना पडता है | ऐसे
9सं ग|म सरकार| कम चार|, अÎधकार| एवं पु Îलस§ारा पापकम नह|ं घÍटत होता, यह ²यान रख | राजनेताओं समान दु ज न
9व

Íô रखनेपर उनके पापकम म सहभागी होनेसे वे भी पापके भागीदार होते ह |
उसी 9कार उनक| आ²यािcमक हाÎनके साथ ह| पारलौÍकक अधःपतन होता है | इस पतनको रोकने हे तु आव°यकता
पडने पर 1थानां तरण ह

आ तो भी कोई बात नह|ं , पदो7नÎत नह|ं Îमल|, तो भी कोई बात नह|ं ; परं तु अयो¹य क

Îत नह|ं
कर गे , इस 9कारका मनोबल रखना चाÍहए | ऐसा मनोबल एवं TÍ8कोण रखनेसे अ7य सहयोÎगय|को 9ेरणा Îमलती है और
राजनेताओंका मनोबल टूटता है | नौकर| करते समय ¯यÍñ समाज, राç और धम Íवरोधी क

Îत न करनेसे उनका कम योग
अनु सार साधना होती है और इस कारण उ7ह मानÎसक शांÎतके साथ ह| ई+रका आशीवाद भी 9ाB होता है |
- परम पू7य डॉ. जयं त बालाजी आठवले |



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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
शाU शाU शाU शाU वचन वचन वचन वचन :
स यथेमा न²यः 1य7दमानाः समु5ायणाः समु 5ं 9ा¯या1तं ग¯छि7त Îभ²येते तासां नाम³पे समु5 इcये वं 9ो¯यते ।
एवमेवा1य पÍर58ु Íरमाः षोडशकलाः पु ³षायणाः पु³षं 9ा¯या1तं ग¯छि7त Îभ²येते चासां नाम³पे पु ³ष इcये वं 9ो¯यते स
एषोऽकलोऽम

तो भवÎत तदे ष Hोकः ॥
- 9÷ोपÎनषद
अथ : िजस 9कार समु5क| ओर बहती ह

ई यह नÍदयां समु5म पह

ं च कर उसीम Íवल|न हो जाती ह , उनके नाम-Fप न8
हो जाते ह , और वे ‘समु 5’, ऐसा कहकर ह| पुकार| जाती ह । उसी 9कार इस सव 58ाक| यह सोलह कलाएं (भी), िजनका
अÎध8ान पु ³ष ह| है , उस पु ³षको 9ाB होकर ल|न हो जाती ह । उनके नाम-Fप न8 हो जाते ह और वे ‘पु³ष’ ऐसा
कहकर ह| पुकार| जाती ह । वह Íव§ान् कलाह|न और अमर हो जाता है । इस स+ब7धमे यह Hोक 9Îस@ है ॥

-------
धम धारा धम धारा धम धारा धम धारा
• जो भी Uी लोक लाजका cयाग कर अं ग 9दश न कर अ7य|म वासनाको जाग

त करती ह वह भी महापापक| अÎधकाÍरणी
होती है ! िUय|का नै सÎग क अलंकार उसक| Uी-सु लभ ल7जा है , यÍद वह समाB हो गयी, तो सब कु छ समाB हो गया !
इÎतहास साHी है , अÎधकां श अं ग-9दश न करने वाल| 9Îस@ Uी कलाकार|के ¯यावहाÍरक जीवन, पै से और तथाकÎथत
9Îत8ा होने पर भी 4लेश9द, अि1थर एवं मानÎसक सं ताप युñ रहा है !! क

छने तो आcमहcया भी क| है और अनेक
म²पान और अ7य 9कारके ¯यसनक| Îशकार हो गयी ह ; अतः अं ग 9दश न करनेवाल| िUयां समाजक| आदश नह|ं हो
सकती ह !!

• क

छ भñ एक ह| शंका या सम1याका समाधान दो-तीन सं त|से पू छते ह और उसके प°ात HÎमत हो जाते ह , 4य|Íक
सं त|ने िजस योगमाग अनु सार साधनाक| होती है , वे उसी अनु सार उनका माग दश न करते ह !! ²यान रहे , एक खरे सं त


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
आपको मोH Íदलानेक| Hमता रखते ह ; अतः ¯यास लगी हो तो एक ह| 1थानपर गqढा कर गे तो शीU पानीका Pोत
Îमलेगा, अनेक 1थानपर हाथ मारनेसे क

छ नह|ं Îमलता !! एक साधे सब सधे , सब साधे सब जाये !!

• परUीको मात

शÍñके Fपम दे खने पर मोHके §ार खु ल जाते ह और वैसे ह|, जै से परUीको अयो¹य TÍ8से दे खनेपर नक का
भोग प

³वीपर ह| भोगने को Îमल जाता है ! इसÎलए हमारे यहां नवराͳम Uीको मात

शÍñका 9तीक मानकर उनक|
उपासनाक| जाती है |

• उपवासक| ¯युcपÍô उप + वाससे ह

ई है ! ‘उप’ का अथ है Îनकट और वासका अथ है रहना, अथा त शर|रको अपेHाक


कम और सािïवक भोजन दे कर उसक| शुÍ@ करते ह

ए, उसे क8 दे ना, यह एक 9कारका हठयोग होता है, िजससे ई+रका
1मरण रहे , परं तु आज dतके समय ई+रका वास कम और उपवासम कौन सा सािïवक आहार कर , इसका वास अÎधक
रहने लगा है !

• हमार| धम Îनरपे H ¯यव1थाम , िजसे धम 5ोह| कहना अÎधक यो¹य होगा, Íव²ाÎथ य|को ÎनयÎमत पाçयHम अं तग त यौन
ÎशHाद| जाती है ; परं तु वासनाको Îनयंͳत करने हे तु नै Îतक मू~य और साधना सं बि7धत 7ान नह|ं Íदया जाता है , ऐसेम
इस दे श चह

ं ओर Uीके चÍर³का हनन हो तो आ°य 4या ! िजस समाजम धम का आधार न हो, वैसा समाजका पशुसे भी
Îनक

8 वत न करना 1वाभाÍवक है , पशु भी मा³ 9जनन यो¹य साथीसे 9जननके Îलए और ऋतु कालम शार|Íरक संबंध
1थाÍपत करते ह | धम Îनरपे H समाजम तो ÍवÍHB Uी, Íवधवा, व

@ एवं बाÎलकाओंके भी न

शंस एवं अमानवीय
9कारसे शील हरण Íकया जा रहा है ! Îनि°त ह| यह घ

Íणत एवं Îनं दनीय 9सं ग Íवनाशकार| कालके आगमनक| सूचनादे
रहा है , जब महाकाल| अपने मारक अवतारम सभी दु ज न|का संहार कर गी !


• दे Íखये ! इस दे शके रHक (पुÎलस) Íद~ल|म एक न7ह|सी ब¯चीके साथ ह

ए न

शंस बलाcकारका Îशकायत Îलखवानेवाले
माता-Íपताको कहते ह Íक आप Îशकायत न Îलखाएं , इससे आपक| ब¯ची और आपके पÍरवारका समाजम अपमान
होगा और आपको Îतर1कार सहना पडे गा !! िजसका बलाcकार ह

आ, उसका अपमान कै से ह

आ रHक महोदय !! आपका
शहर बलाcकाÍरय|का शहर बन गया है और Îतर1कारके पा³ आप और वह बलाcकार| है !



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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
• आजकलके Íह7दू माता-Íपता अपने ब¯चेका नाम सामा7य न हो, इस कारण अरबी, फारसी, उदू , अq0ेज़ी, 9 च और न
जाने कौन-कौन सी भाषाम रखने लगे ह | पहले माता-Íपता अपने ब¯च|के नाम, जानबू झ कर दे वी -दे वता, अवतार, ऋÍष-
मुÎन, यु गपु ³ष, महापु³ष, राçपु ³ष, गुणवं ती िUय| इcयाÍदके नाम चु नते थे और वह सािcवक हो, सं 1क

तके या तcसम
भाषा हो, यह ²यान रख नाम रखा करते थे और वत मान समयम असामा7य करनेक| लालसाम अपनी सं 1क

Îतसे Íवमुख
होना, सबसे बडा फ़ै शन है !! वाह रे पालकcव ! तेर| जय हो !

• कु छ समय पूव एक 1वामीजीसे Îमल| थी | 1वामीजी कु छ वष Íवदे श रहकर अ²याcमका 7ान बांटते थे | मु झे भी
महाक

ं भके म²य क

छ Íदवस उनका साि7न²य Îमला | म ने पाया Íक जब भी वे अपने भñ|से बात करते थे तो आपके
भारत, आपके दे शम - इस 9कार कहते थे और Íवदे शोम सब क

छ Íकतना अ¯छा है , यह बताते थे , अथा त हमारा दे श
Íकस 9कार पा°ाcय दे श|से Îनक

8 है , यह वे बताते | लगभग दस बार सु ननेके प°ात मेरा राçाÎभमान उनक| §ाराक|
जाने वाल| इस ¹लाÎनको सहन नह|ं कर पाया | म ने उनसे नHता पूव क पूछा, "4या आपने Íवदे शी नागÍरकताले ल| है ?"
उ7ह|ने पूछा, " आप ऐसा 4य| पूछ रह| ह ?" म ने कहा, "आप बार-बार सबको ‘आपका दे श, आपका भारत’ इस 9कार
बोल रहे ह इसÎलए मुझे लगा Íक अब आप सं भवतः भारतीय नागÍरक नह|ं है " | उ7ह|ने कहा, " नह|ं , म अभी भी
भारतीय ह| ह

ं " |
जो मनसे Íवदे शी बन जाये , उनका तनसे भारतीय रहना Íकस कामका ! िजस अ²याcमÍवदको भारत जै सी पुÞय
भूÎमका महcव समझम नह|ं आता और अपने अनु याÎयय|म राç 9ेम जाग

त नह|ं कर सकते , उनके अ²याcमÍवद होनेपर
ह| 9÷Îच7ह Îनमा ण हो जाता है | यह सच है Íक आज भारतम अनेक सम1याएं ह; परं तु जो भारतम है , वह अ7य³ कह|ं
नह|ं है और सम1याओंके कारण अपने राçको नीचा Íदखाना, यह उपाय नह|ं , उसके Îलए सबको Îमलकर कु छ करना
चाÍहए, िजससे ि1थÎतम सु धार आए, यह महcवपू ण है और भारतीय होते ह

ए, क

छ वष भारतम रहनेपर ‘आपका भारत’
कहना, यह तो एक 9कारसे अपराध है , अपनी मात

भू Îमके 9Îत मानÎसक 1तरका राç5ोह है | िजस मां क| धरतीपर ज7म
ले कर, उसक| भूÎमपर उपजाए अ7नसे हमारे शर|रका पोषण ह

आ है , िजसके जलसे हमार| ¯यास बुझी है , उसे पराया कै से
कर सकते ह | यह सं1कार अ²याcम हम नह|ं Îसखाता !!

• साधना और यो¹य साधनाम भेद :
आज अÎधकां श ¯यÍñ कु छ-न-कु छ साधना तो करते ह ; परं तु धम ÎशHणके अभावम यो¹य साधना नह|ं करते ; फल1वFप
साधना करने पर िजतनी आ²यािcमक 9गÎत होनी चाÍहए, उतनी नह|ं होती | आज अÎधकां श Íहं दु ओंक| ि1थÎत ऐसी है Íक


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
जैसे बायां हाथ टूटा हो और दाÍहने हाथम ¯ला1टर लगाकर कर घू म रहे ह , और कह रहे ह| Íक बाएं हाथक| वेदना ठ|क
नह|ं हो रह| है; अतः अ²याcमशाUको जानने एवं समझनेक| अcयÎधक आव°यकता है और इस हे तु यथाशÍñ
सभीको Îमलकर धम 9सार करना चाÍहए |

• सभी एले 4çोÎनक चै नलवाल|क| आंख|क| लाज न8 हो गयी ह, तभी इतनी बि¯चयोपर हो रह| बलाcकारक| घटनाओंको
जानने के प°ात भी Íकसीने कामुक Íव7ापन और धारावाÍहक बंद नह|ं Íकए ह , पता नह|ं और Íकतनी बह

-बेÍटय|के
शील हरणका वे 9तीHा कर रहे ह ! आजका यह 1वाथ| समाज 'पर दु ख: शीतल :' (दू सर|के दु खसे मनको शीतलता
Îमलना) का Îस@ा7त पालन करने लगा है ! Íकतना Îगर गया है हमारा यह समाज !!! परं तु ²यान रहे , यह स

Í8
कम Îस@ां तपर चलती है, इन सभी Îनल 7ज ¯यÍñय| पर शीU आनेवाले Íह7दू राçम कठोर कारवाईक| जाएगी ! इ7ह भीख
मां गनेपर कोई भीख न दे , ऐसी ि1थÎत हम Îनमा ण कर गे !!

• हनु मानजीम ७०% 9कट शÍñ है , इसÎलए असुर|क| नगर| लंकाम एक भी असुर उनका क

छ भी नह|ं Íबगाड सके ,
अÍपतु उ7ह|ने ह| 1वण क| मायावी लंका नगर|को ह| उq²व1त कर Íदया ! परं तु धमा Îभमानके अभावम आज अÎधकां श
Íह7दू मज़ारपर जाते ह !! मज़ारक| अपे Hा कई गुणा अÎधक शÍñ हनु मानके मंÍदरम है | अÎन8 शÍñसे पीÍडत Íह7दु
मज़ारपर जाकर वहां अपनी इ¯छा 9कट करते ह और वहां उपि1थत Hु5 मायावी शÍñयां Íहं दु ओंको पथH8 और धम H8
करने हे तु उनक| इ¯छाक| पू Îत करते ह , िजससे वे पु नः वहां जाय !! आजका धम ÎनरपेH (धम से Íवमु ख) Íह7दु इस छोट|
सी बातको नह|ं समझता !! मज़ारके धनसे 4या होता है , यह तो स+पू ण Íव+ जानता है और Íह7दु वहां जाकर अपनी
गाढ| कमाई अप ण करते ह !! िजस 9माणम Íह7दु मज़ारम जाते ह , उसी 9माणम अ7य Íकसी धम|को Íहं दु ओंके Íकसी भी
दे वालय या समाÎध1थल पर जाकर उपासना करते दे खा है 4या !! यह है आजके Íहं दु ओंका धमाÎभमान (धम H8ता) !!! यह
²यान रहे , मा³ सनातन धम के Îस@ा7तपर चलने वाले Îस@, योगी और महापु ³षने पू ण cव (ई+रसे पूण एकFपता) को
9ाB Íकया, शेष Íकसी भी धम या पं थके Îस@|को पूण cवक| 9ाÎB नह|ं ह

ई और वे सू +म जगतक| बला¢य आसुर| शÍñके
Îनयं ³णम चले गए, ऐसे म वे आपको सू Hम जगतक| अÎन8 शÍñसे कै से बचा पाएं गे, क

पया सोच !!!

• जैसे मा³ सूय के अि1तcव मा³से सं सार जग कर काय रत हो जाता है उसी 9कार उ¯च कोÍटके सं तके अि1तcव
मा³से उनके काय पू ण हो जाते ह !



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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
दे व 1तुÎत दे व 1तुÎत दे व 1तुÎत दे व 1तुÎत : : : :
आदौ रामतपोवनाÍदगमनं हcवा म

गं का¯चनम्
वैदे ह|हरणं जटायु मरणम् सु 0ीवसंभाषणम् |
वाल|Îनद लनं समु5तरणं लqकापुर|दाहनम्
प°ा5ावणक

+भकण हननं एतÍ@रामायणम् |
इÎत ÷ीरामायणसू³ ||
9भु ÷ी रामका वनवास गमनसे आरं भ होना, तcप°ात 1वण म

गका हनन, सीताका हरण, जटायुका मरण, सु 0ीवसे
Îम³ता, बाल|का संहार, समु5का तरण, लं काका दहन और उसके प°ात रावण, कु ं भकरणका हनन, यह है स+पूण
रामायणका 9सं ग ! यह रामायणके मु Eय Íब7दु ह |
-------
अम

तवाणी अम

तवाणी अम

तवाणी अम

तवाणी
माला फे रत जु ग भया , गया न मन का फे र ।
कर का मनका डा Íर दे , मन का मनका फे र॥
- सं त कबीर
अथ : यÍद अपने 1वभावदोष और अहं के लHण दू र करने हे तु सतक तासे 9यास न Íकया जाये तो स+पू ण जीवन माला
फे रनेपर भी कोई Íवशे ष 9भाव नह|ं पडता ! अतः साधकको दोष|का अ¹यास कर, उसे दू र करनेका 9यास करना चाÍहए,
अ7यथा जै से Îछ5 युñ घडे म कभी भी पानी एकͳत नह|ं रह सकता, उसी 9कार साधक§ारा दोषोके कारण होनेवाल| चू क
उसके माला§ारा Íकया गए जपको ¯यथ कर दे ता है ! ‘मन एव मनु*यानां कारण बं ध मोHयो:’ मन ह| हमारे बं धन और
मोHका कारण है ; अतः आ²यािcमक 9गÎत हे तु सतह| 1तरपर माला जपने के साथ ह| मनके दोष और अहंके लHण दू र
करने चाÍहए | वैसे भी माला ले कर जप करनेसे मनक| एका0ता सा²य नह|ं हो सकती, वह तो मा³ साधकम नामजपका


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
सं1कार डालने हे तु उपयोगी है ! वैखर| वाणी, अथा त िजस नामजपसे ²वÎन आती हो, ह|ठ Íहलते ह|, उससे आ²यािcमक
9गÎत नह|ं होती, के वल अंश मा³ मन अनु शाÎसत होता है, आ²यािcमक 9गÎत हे तु मानÎसक जपका होना अथात म²यमा
वाणीका जप होना आव°यक है ; अतः साधकको अ²याcमम सदै व अगले-अगले चरणम जाने हेतु 9यासरत रहना चाÍहए !
-------
२ २२ २. .. . सग

ण ग

³के Îनग

ण Îनराले मा²यम सग

ण ग

³के Îनग

ण Îनराले मा²यम सग

ण ग

³के Îनग

ण Îनराले मा²यम सग

ण ग

³के Îनग

ण Îनराले मा²यम
सनातन 9भात सनातन 9भात सनातन 9भात सनातन 9भात – –– – मेरे सगु ण गु³के Îसखाने मेरे सगु ण गु³के Îसखाने मेरे सगु ण गु³के Îसखाने मेरे सगु ण गु³के Îसखाने के के के के Îनगु ण Îनगु ण Îनगु ण Îनगु ण, ,, , Îनरा Îनरा Îनरा Îनराला ला ला ला मा²यम मा²यम मा²यम मा²यम
मेर| मां मुझे बचपनसे पां चवीं कHा तक मेरे ने³|म काजल लगाती थीं और म जब थोडी बडी और समझदार हो गयी तो
उनसे कई बार पू छती Íक वे ऐसा 4य| करती ह ? वे 9ेमसे कहती थीं , ‘इससे Íकसीक| बु र| TÍ8 नह|ं लगती है और
आंख|क| 7योÎत बढती है ’ | उस काजलको वह नवराͳके महा8मीक| राͳ मां दु गाका जागरण करते समय नामजप कर
बनाती थीं और काजलको , कपडे क| बातीको क

छ आयुवÍदक जडी-बूट|के रसम Îभगो कर, उसे पहले सु खाती थीं , यह
म ने बचपनसे उ7ह करते दे खा था | बालमनपर माता–Íपताके सं1कार|का गहरा 9भाव पडता है | मां क| म

cयु के प°ात भी
म ने काजल उसी भावसे बनाती और लगाती रह|, मा³ वह जडी-बूट| मु झे Îमलती नह|ं , अतः म नह|ं डाल पाती ह

ं |
एक Íदवस म अपने महाÍव²ालयीन कालके कु छ Îच³ दे ख रह| थी तो म ने पाया Íक उस समय मे र| आं खे बडी-बडी थीं
और अब अपेHाक

त छोट| हो ग( ह, जबÍक म पहले भी घरका बना काजल लगाती थी और आज भी वै सा ह| करती ह


| मु झे िज7ासा ह

ई, म ने पु नः उन आं ख|को दे खा और वत मान समयके Îच³म अपनी आं ख|को दे खा और मु झे अcयÎधक
आ°य हो रहा था Íक मे र| आं ख|का आकार तो पÍरवÎत त हो ह| गया था, उससे Îनकलनेवाले 1पं दन भी पÍरवÎत त हो गए
ह | मेरे 9÷का उôर मुझे अंदरसे Îमल चुका था; परं तु मुझे उसक| पुÍ8 करनी थी | आ°य यह है Íक इस 9सं गके आनेके
दो Íदवस प°ात मराठ| दै Îनक सनातन 9भातम एक लेख छपा था, िजसम ने³के आकार और अ²याcमका संबं ध बताया


आ था और यह बताया गया था Íक आ²यािcमक 9गÎत होनेपर ने³के आकारम कब, कै से , पÍरवत न आता है | म ने
अपने ÷ीगु³के इस Îनगु ण Îनराले मा²यमके 9Îत क

त7ता ¯यñक| और मु झे जानकर आनंद ह

आ Íक मेरे अं दरसे आया


आ उôर शत-9Îतशत सह| था और उस ले खके अनु Fप था |
आप इस Îलं कपर जाकर हमारे ÷ीगु³के इस Îनगु ण Îनराले मा²यमके बारे मराठ|, Íह7द| और अq0ेजीम पढ सकते ह |
मराठ| दै Îनक सनातन 9भात – http://dainiksanatanprabhat.blogspot.in/


9

सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
Íह7द| माÎसक सनातन 9भात – http://hindisanatanprabhat.blogspot.in/
अq0ेज़ी माÎसक सनातन 9भात –
http://englishsanatanprabhat.blogspot.in/
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३ ३३ ३. . . . अ²याcम अ²याcम अ²याcम अ²याcम
हमारे ÷ीगु³ (परम पू 7य डॉ. जयं त बालाजी आठवले) §ारा 9ÎतपाÍदत 1तरानु सार साधनाक| 9चीÎत दे नेवला एक और
9सं ग !
Íदनांक २९ जनवर| २०१३ को महाकु ं भम एक 9Îस@ सं तसे आशीवा द लेने गयी, उ7ह दे खते ह| समझम आ गया Íक वे
एक उ7नत ह (उ7नत|का आ²यािcमक 1तर ५० से ६९ % के म²य होता है , सं त नह|ं (सं तका आ²यािcमक 1तर ७० %
से अÎधक होता है ) | म ने सू +मसे उनका आ²यािcमक 1तर Îनकाला तो पता चला Íक उनका 1तर ६० % है | बात ह|
बातम वे बोल पडे , “राजनीÎतम मत जाना, न ह| उसम उलझना और न ह| उसके Íवषयम बोलना ”| उनके इस वा4यने
उनके आ²यािcमक 1तरक| पु Í8 कर द| |
जब तक धम सôाका राजसôापर अं क

श नह|ं रहता, वह अÎनयंͳत और Íदशाह|न रहती है – यह हमारा धम शाU कहता है
और 9cये क सं तका यह मू ल कत ¯य है Íक समाज ¯यव1था सुवयवि1थत रहे , इस हे तु वे उसम न भी पडे , तब भी
समाजको यो¹य माग दश न अव°य करे | जब तक हमारे दे शम ñाHण वण (जाÎत नह|ं ) क| Íदशाम Hͳय वण के (जाÎत
नह|ं ) साधक रा7य कर रहे थे , तब तक यह दे श सोने क| ÎचÍडया कहलाता था | परं तु कालां तर धम का [ास ह

आ और
वण ¯यव1था Íबखर गयी और उसी समयसे इस दे शका पतन आरं भ हो गया | िजस अ²याcमÍवदको सनातन धम का यह
मौÎलक Îस@ा7त नह|ं पता, वे सं त कै से हो सकते ह ? अ²याcमÍवदको यÍद पू ण cवक| 9ाÎB न ह

ई हो, या वे पू ण cव 9ाB
सÿ

³के शरणम रहकर साधना नह|ं करते , तो उनके TÍ8कोणम इस 9कारका ³ु Íटपूण TÍ8कोण सहज ह| झलकता है |
इन सं तके भी कोई गु³ नह|ं ह और एक अ²याcमÍवदके माग दश नम साधना कर रहे थे और उनसे मतभेद हो जाने पर
उ7ह|ने उनके माग दश नम साधना छोड द| | ²यान रहे , सÿ

³से मतभेद हो नह|ं सकता, यÍद होता है तो दोन|म से


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

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र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
Íकसी एकम कोई कमी है | उ7ह लगा, उनके सÿ

³ने उनके साथ 7याय नह|ं Íकया ! (सÿ

³ अपने Îश*यके साथ अ7याय
कभी कर ह| नह|ं सकते !!!)


पया उन अ²याcमÍवदका नाम न पू छ , म यह सब Íकसीका उपहास करनेके Îलए नह|ं Îलख रह| ह

ं , अÍपतु समाज एवं
अ²याcमÍवद|के TÍ8कोणको यो¹य Íदशा Îमले इसÎलए Îलख रह| ह

ं ; अतः उनका नाम पू छकर मेरा समय ¯यथ न कर ,
यह नH Íवनती है !
-------
४ ४४ ४. . . . 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग 9ेरक 9सं ग
तीथ या³ा करते समय हमार| 9व

Íôका अं तमु ख होना आव°यक तीथ या³ा करते समय हमार| 9व

Íôका अं तमु ख होना आव°यक तीथ या³ा करते समय हमार| 9व

Íôका अं तमु ख होना आव°यक तीथ या³ा करते समय हमार| 9व

Íôका अं तमु ख होना आव°यक ! !! !
भÍñमाग|के Îलए तीथ या³ाका अcयÎधक महïव है। पहले के समय या³ाम जाना भी कÍठन था । पैदल या तो बै लगाडीम
या³ाक| जाती थी। थोडे -थोडे समयपर ³कना होता था। इसी Hमम ÍवÍवध 9कारके ¯यÍñसे Îमलना होता था, समाजसे
अनेक Íवषय सीखनेको Îमलते थे । ÍवÍवध बोÎलयां और ÍवÍवध परं पराओं एवं र|Îतय|से पÍरचय होता था। कं ई
कÍठनाईय|से गु जरना पडता था, कई अनु भव भी 9ाB होते थे ।
एक बार तीथ या³ापर जानेवाले क

छ ¯यÍñय|के सं घने , संत तु कारामजीके पास जाकर उनके साथ चलनेक| 9ाथ ना क|।
सं त तुकारामजीने अपनी असमथ ता बताई। उ7ह|ने तीथ याͳय|को एक कडवा क£ू दे ते ह

ए कहा, “म तो आप लोग|के साथ
आ नह|ं सकता, परं तु आप इस क£ूको साथ ले जाइये और जहां –जहां भी 1नान कर , इसे भी पÍव³ जलम 1नान करा
लाएं ।”
लोग|ने उनके सू +म भावाथ पर ²यान Íदये Íबना ह| वह क£ू ले Îलया और जहां -जहां गए, 1नान Íकया, वहां –वहां उसे भी
1नान करवाया; मं Íदरम जाकर दश न Íकया तो उसे भी दश न करवाया। इस 9कार या³ा पूण कर, सब वापस आए और
उन लोग|ने वह क£ू संत तु कारामजीकोदे Íदया। उ7ह|ने सभी तीथ याͳय|को 9ीÎतभोजपर आमंͳत Íकया। तीथ याͳय|को
ÍवÍवध पकवान परोसे गए। तीथ म घू मकर आये ह

ए तीथ याͳय|के Îलए क£ूक| स«जी Íवशेष Fपसे बनवायी गयी थी। सभी
याͳय|ने भोजन शुF Íकया और सबने कहा Íक “यह स«जी कडवी है ।” सं त तुकारामजीने आ°य ¯यñ करते ह

ए कहा Íक
“यह तो उसी क£ू से बनी स«जी है , जो तीथ 1नान कर आया है । यह तीथाटनके पू व कडवा था, परं तु तीथ -दश न तथा
1नानके प°ात भी इसीम कडवाहट है !”


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

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र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
यह सु न सभी याͳय|को बोध हो गया Íक ‘हमने तीथाटन Íकया है; परं तु अपने मनको शु@ करने हे तु यो¹य साधना
नह|ंक| और न ह| 1वभावको सु धारा | ऐसेम तो तीथ या³ाका अÎधक लाभ है ह| नह|ं । हम भी एक कडवे क£ू जैसे ,
कडवे रहकर वापस आये ह |


५ ५५ ५. . . . साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां साधक|क| अन



Îतयां
Íद~ल| सेवाके 75क| ÷ीमती जू ह| चौहान क| अनु भू Îत :
अनु भू Îत – “Íदनांक २७ अ9ैल २०१३ को जब हम Íद~ल| सेवाक 5से अल|गढ जानेके Îलए अपनी एक छह वष और एक
तीन वष क| पुͳय|के साथ गोमती ए4स9ेसम चढे तो उसम अcयÎधक भीड थी, यहां तक Íक अंदर घुसनेके Îलए भी
1थान नह|ं था और गÎलयारा भी भरा ह

आ था । हम जै से-तै से चढ गए और म ने सोचा Íक ब¯चोको तो कोई बैठा ह|
लगा और मेरा 4या है, परम पू 7य डॉ. आठवले और पू7य तनुजा मांके चरण|म ²यान लगा कर, नामजप करते ह


आनंदम या³ा कट जाएगी, तभी एक ¯यÍñ आकर बोले Íक दू सर| बोगीम मेर| एक सीट आरÍHत है , आप अपने ब¯च|के
साथ वहां जाकर बैठ जाइए । उ7ह|ने हमे अपनी सीट तक पह

ं चा Íदया और हमसे क

छ मां गा भी नह|ं । ऐसा लगा मानो
ई+र 1वयं आए ह| मेर| सहायता करने । ऐसे होते है सÿ

³, िज7ह तÎनक भी हमारा क8 सहन नह|ं होता और हमार|
9cये क क

Îतपर उनका ²यान रहता है । क

त7ता उनको बारं बार” ।
-----


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

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र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
‘उपासना’ के Íद~ल| से वके 75म झारखंडसे क

छ Íदवसके Îलए आई एक साÎधकाक| अनु भूÎतयां िज7ह अÎन8 शÍñका क8
है |
१. मु झे गाडीम कभी भी कोई शार|Íरक क8 नह|ं होता था; परं तु जै से ह| पू7य तनुजा द|द|के साथ चार पÍहये
वाहनम बै ठ कर गोqडासे जसीडीह रे ~वे 1टे शन, Íद~ल|के Îलए çे नपर बै ठने हे तु आ रह| थी, मु झे वाहनम ह| अcयÎधक
क8 होने लगा और तीन बार Îमतल| आई और उ~ट| ह

ई | जब पू 7य द|द|ने मु झे बताया Íक नामजप करते रहो और
अपने ऊपर भगवान Îशवसे कवच मां गो तो म ने नामजप आरं भ कर Íदया और म ने अपने ऊपर कवच मां गा तो मेरा क8
एक घंटे म पूर| तरह समाB हो गया।
अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण : इन साÎधकाको जो शÍñ क8दे रह| थी, उसे से वाके 75के चैत7यका भान सू +मसे हो गया था; अतः
वे इ7ह वहां जानेसे रोकनेका 9यास करने हे तु क8दे रहे थे ; परं तु अपनी Hा³व

Íôके कारण वह साÎधका क8पर मात पाने म
सफल रह| |
२. जब म २३.१२.२०१३ के Íदन Íद~ल| जाने हे तु çे नम बै ठ| तो पूरे समय नामजप करती रह| और मु झे कोई क8 नह|ं


आ । परं तु जै से ह| २४.१२.२०१३ को म Íद~ल| सेवाके 75 पह

ंची तो धीरे -धीरे मेरा क8 बढने लगा । से वाके 75 पह

ं चनेपर
अ~पाहार कर, जै से ह| म ने सोचा Íक म थोडी दे रके Îलए सोने गई तो मु झे नींद नह|ं आई और मु झे ऐसा लगने लगा Íक
म यहांसे भाग जाऊं , तो म ने नामजप आरं भ कर Íदया और मुझे बह

त क8 होने लगा, तो मु झे पू 7य तनु जा द|द|ने
बुलाया । जब म उनके पास गई तो म अcयÎधक रोने लगी, 4य|Íक मु झे अcयÎधक अÎधक क8 हो रहा था और मुझे
नींद आ रह| थी । तब मुझे पू7य द|द|ने अÎभमंͳत जल पीनेके Îलये Íदया और Îम÷ी भी द|। जब म ने पानी Íपया और
Îम÷ी खाई, उसके प°ात मेरा क8 समाB हो गया।
अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण : सेवा के 75के चैत7यसे साÎधकाको क8 होने लगा और यो¹य 9कारसे आ²यािcमक उपाय करनेपर
ताcकाÎलक समाधान हो गया |
३. जब २५.१२.२०१३ को म सेवाक 5म दू सरे Íदन नामजप करनेके Îलए बै ठ| तो मु झे पु नः क8 होने लगा और बह


अÎधक पेटम वेदना होने लगी, तब म ने नमक पानीका उपाय Íकया । आरं भम तो ऐसा लगा Íक नमक पानीका उपाय
छोड दू ं , परं तु म उसे Tढ़तासे करती रह|, धीरे -धीरे मेरा क8 समाB हो गया ।


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

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र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण अनु भूÎतका ÍवHे षण : नमक पानीके उपायसे साÎधकाको क8 दे नेवाल| अÎन8 शÍñको क8 होने लगा; अतः उ7ह लगा Íक
वे उपाय करना समाB कर दे , परं तु क8 होनेपर भी Hा³व

Íôके साथ साधना करते रहनेसे अÎन8 शÍñक| शÍñका Hरण
होता है और साधकके क8 कम हो जाते ह |
४॰ जब म ने सेवाक 5म से वा करना आरं भ Íकया तो मु झे ऐसा लगने लगा Íक म सदै व यह|ं आ÷मम ह| रह

ँ, कभी भी
यहां से न जाऊं । मु झे जो आनंद सेवामे Îमला, वह पहले कभी भी नह|ं Îमला है ।
अनु भूÎतका ÍवHे अनु भूÎतका ÍवHे अनु भूÎतका ÍवHे अनु भूÎतका ÍवHे षण षण षण षण : जब साधक मन: पूव क सेवा करते ह , तब अÎन8 शÍñ उ7ह क8 नह|ं दे पाती है और ऐसे म
साधकको आनं दक| अनु भू Îत होती है |
५. हम पू 7य तनु जा द|द|के साथ एक सcसंगम जाना था; परं तु पू7य द|द|का 1वा1³य अचानक Íबगड गया और हमारा
वहां जाना र£ हो गया | म ने परम पू7य गु³दे वसे 9ाथ नाक| और म थोडी दु खी हो गयी Íक पू7य द|द|का सcसं ग नह|ं
Îमल सके गा, तभी पता चला Íक हम जा रहे ह और म ने परम पू 7य गु³दे वके 9Îत क

त7ता ¯यñक|।
---------
६. साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ साधक|§ारा आ²यािcमक 9गÎत हे त

Íकए जानेवाले 9यõ
एक वष से भी कम अवÎधम एक 9Îतशत आ²यािcमक 9गÎत करने वाले Íद~ल|के साधक ÷ी रÍव गोयलके क


अनुकरणीय गु ण|के बारे म बताना चाह

ं गी |
÷ी रÍव गोयलसे मेरा पÍरचय 9थम बार जू न २०१३ म उनके काया लयम ह

आ, उ7ह दे खकर उसी Hण 7ात हो गया Íक
उनका आ²यािcमक 1तर अ¯छा है और वह अभी तक सू +मसे Íकसी माग दश कक| राह दे ख रहे थे , मु झे समझते दे र न
लगी उनके घर उ7ह|ने अपनी साधनाके बलसे आक

8 Íकया है , य²Íप उनके घर जानेका मा²यम कोई और बना और म
उनक| पõीसे पÍरÎचत ह

ई | उ7ह|ने तुरं त साधनाम न ³Îच Íदखाई और न ह| साधना आरं भक|; परं तु मु झे पता था,
वे आगे Îनि°त ह| साधना कर गे | उनके क

छ गुण जो म ने दे खे , वह बताती ह

ं |
• 9थम बार उनके घर जाने पर मु झे अcयÎधक शार|Íरक क8 ह

आ, 4य|Íक उनके काया लयम Íकसी शÍñशाल| अÎन8
शÍñका क8 था और य²Íप वे मु झसे पहल| बार Îमल रहे थे और म उनक| पõीसे एक बार Îमल चुक| थी; परं तु मुझे हो


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
रहे क8से वे तुरं त ¯यÎथत हो गए | यह उनके 9े मभावको दशा ता है और उ7ह ¹लाÎन ह

ई Íक उनके कारण मुझे क8


आ और मु झसे Hमा मां गने लगे, यह भाव 1प8 Fपसे उनक| भाव-भं Îगमा और बातचीतम झलक रहा था | मेरे कारण
दू सर|को दु ख न हो, यह साधकcवका लHण है |
• उनका 1वभाव अcयÎधक Îमलनसार है , वे कु छ Hण|म Íकसीको अपना बनानेक| कला जानते ह | 9ेमभाव यह 9ीÎतका
आरं Îभक चरण है , यह गु ण उनम ह | ऐसे साधक यÍद भÍñयोग अनुसार साधना करते ह तो शीU आ²यािcमक 9गÎत
करते ह |
• पूव संÎचत और ई+र|य क

पासे मां ल+मीक| क

पा उनपर है ; परं तु अÎधकां शतः म ने पाया है Íक चाहे Íकसीके पास धन
हो, या न हो, आजकल लोग|म धनके cयागक| भावना अcयÎधक कम है ; परं तु उनम ऐसा नह|ं है | उनसे cयाग सहज ह|
होता है , उसके Îलए उ7ह शाU नह|ं बताना पड़ा है , यह म ने Íपछले वष गु ³ पूÍण माके समय जब वे मु झसे अं श मा³ ह|
पÍरÎचत ह|गे, तब भी वे सभी काय म अपना धनसे तो योगदानदे ह| रहे थे , शर|रसे भी सेवा कर रहे थे और यह तब
सं भव होता है जब मनम ऐसी भावना हो |
• आÎत³य सं1कार, िजसका आज सवाÎधक Hरण ह

आ है, वह उनम कू ट-कू ट कर भरा है , िजस Íदनसे उ7ह पता चला है
Íक मु झे फल Í9य है, उस Íदनसे ले कर आज तक वे मु झे 1वयं फल खर|द कर और काट कर Íखलाना नह|ं भू लते , या
सेवाके 75म फल लाना नह|ं भू लते , वैसे वे सभीको Íखलाते ह , यह न समझ Íक मा³ मु झे Íखलाते ह , इसक| 9चीÎत
उनसे संपक म आनेवाले सभी साधक|ने ल| है | जब भी कोई काय Hम हो, तो उनका और उनक| पõीका आÎत³य भाव
दे खते ह| बनता है | आजके सभी साधक|को उनसे यह गुण सीखना चाÍहए | अÎतÎथ ऋण, पांच ऋण|म से एक ऋण है ,
जो पांच महाय7के अं तग त आता है , िजसका पालन करनेसे अ7नपू ण मांक| सदै व उस क

लपर क

पा रहती है |
• वे ‘उपासना’ से मनःपू व क कब जु ड गए, कब से वा करने लगे कब cयाग करने लगे , यह म आपको नह|ं बता सकती;
परं तु म ने अपनी 1वभाव अनु Fप जै से ह| चूक बताना आरं भ Íकया, उ7ह|ने उसे सहज 1वीकार Íकया | चूक 1वीकार
करना, यह साधकcव है |
• उनका मन, बालकके समान Îन°ल है और इसक| 9चीÎत मुझे इंदौरम एक सं तके आ÷मम Îमल| जहां वे सबके समH
अपने मनके §ं §, 1वीकार कर, एक छोटे ब¯चे समान रोने लगे | एक पु ³षका इस 9कार सबके समH रोना, यह उनके
भोले भावको दशा ता है और इस कारण उनक| भाव जाग

Îत भी हो गयी | (सामा7य 1तरपर पां च-दस वष लगातार साधना


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सोऽहं सोऽहं सोऽहं सोऽहं – त तत तनुजा नुजा नुजा नुजा ठाक

र ठाक

र ठाक

र ठाक

र §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत §ारा स+पाÍदत वष - २ अंक - ५
करनेपर ह| भाव जाग

Îत होती है,) ई+रको चतुर, क

त¯न और चालाक ¯यÍñ अ¯छे नह|ं लगते , भोले और सरल (दयवाले
उ7ह Í9य होते ह |
• य²Íप वे एक सफल ¯यवसायी ह; परं तु साधना और ¯यवसाय दोन|म भल|-भांÎत समंज1य 1थाÍपत करते ह और
9cये क पÍरि1थÎतम वे सेवा हे तु तcपर रहते ह |
• 9ातः काल शीU उठना, अपने 1वा1³यके 9Îत सतक रहना, ग

ह काय म भी यथाशÍñ योगदान दे ना, साधना, पÍरवार
और ¯यवसायम समतोल बनाए रखना, यह सब उनके उ¯च 9बं धनके गुण|को दशा ता है |
• Íपछले वष गोवा जाते समय, जब म ने सनातनके तीस सं त|के Îलए क

छ अप ण भेजने हे तु उ7ह क

छ भ ट लेनेके Îलए
कहा, तो उ7ह|ने 1वयं भी उन सभी संत|के Îलए भटल| और म ने उ7ह जो म ने भ ट लेने के Îलए कहा था, उसके भी
नाम मा³ पैसे Îलए | सं त|के 9Îत भाव Îनमाण करने हे तु मु झे इतने पापड बेलने होते ह , वह म आपको बता नह|ं सकती;
परं तु उ7ह यह सब क

छ बताना ह| नह|ं पडा, न ह| वे मेरे ले ख पढते ह , या पढे ह, न ह| इससे पू व कोई सcसं ग,
9वचनम ÎनयÎमत गए ह , और न ह| Íकसी सं तक| सेवाक| है , तब भी उनके cयागक| व

Íô ऐसी है , इससे उनके पू व
ज7मक| साधनाका ठोस आधार ²यानम आता है | ²यान रहे , हमारे अंदर cयाग, 9ेमभाव, सेवाभावक| व

Íô िजतनी अÎधक
होती है , हमार| साधना भी उतनी ह| ठोस होती है |
• म ने उ7ह कु छ भी उपासनाके से वाके 75 हे तु खर|दनेके Îलए बताया, वे उस पै सेको अपना पै सा मानकर, एक-एक पैसेक|
बचत कर, यो¹य सामान, यो¹य दु कान और 1थानसे लाए, चाहे उसके Îलए उ7ह Íदन भर अपने ¯य1त काया लयीन
सेवाका cयाग करना पडा हो | मेरे काय हे तु जो धन अप णम आता है , वह ई+रने Íदया है , अतः जब साधक उसका
उपयोग यो¹य 9कारसे करते ह तो उनपर ई+र|य क

पा तो होनी ह| है |
• उ7होने अभी तक जो सा²य Íकया है , उसम उनक| जीवन-संÎगनी और उपासनाक| साÎधका, ÷ीमती अं Îतमा गोयलका
महcवपूण योगदान है , यÍद म यह उ~ले ख न कFँ , तो यह ले ख अधूरा रहे गा | दोन| पÎत–पõी अ²याcम पÎथक बन,
साधनारत रह और उतारोôर आ²यािcमक 9गÎत कर, एकFपता सा²य कर , यह ÷ीगु³चरण|म मंगलकामना है !

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