पर्वर -त्यौहार

Festivals Parv Tyohar-8 Hindi

दत्तात्रेय जयन्ती
दत्तात्रेय जयन्ती प्रतितवषर मागर शीषर माह की कृष्ण पर्क की दशमी ितिथ को मनाई जाती है. दत्तात्रेय के संबंध
मे प्रतचलिलित है िक इनके तीन िसर है और छ: भुजाएँ है. इनके भीतर ब्रह्मा, िवष्णु तथा महेश तीनो का ही
संयक
ु रुपर् से अंश मौजूद है. इस िदन दत्तात्रेय जी के बालिरुपर् की पर्ूजा की जाती है.

दत्तात्रेय जी के सं बं ध मे कथा

प्रताचलीन ग्रंथो के अनुसार एक बार तीनो देिवयो पर्ावर ती, लिक्ष्मी तथा सािवत्री जी को अपर्ने पर्ितव्रत धमर पर्र
बहु त घमण्ड होने लिगा. नारद जी को जब इनके घमण्ड के बारे मे पर्ता चललिा तो वह इनका घमण्ड चलूर करने
के िलिए बारी-बारी से तीनो देिवयो के पर्ास पर्हु चल
ं े. सवर प्रतथम नारद जी पर्ावर ती जी के पर्ास पर्हु चल
ं े और अित्र
ऋषिष की पर्त्नी देवी अनुसूया के पर्ितव्रत धमर का गुणगान करने लिगे. देवी ईष्यार से भर उठी और नारद जी के
जाने के पर्श्चलात भगवान शंकर से अनुसूया का सतीत्व भंग करने की िजद करने लिगी.
उसके बाद नारद जी लिक्ष्मी जी के पर्ास गए और लिक्ष्मी जी के समक भी देवी अनुसूया के सतीत्व की बात
आरम्भ करके उनकी प्रतशंसा करने लिगे. लिक्ष्मी जी को भी उनकी तारीफ सुनना िबलिकुलि भी अच्छा नही
लिगा. नारद जी के जाने के बाद वह भी िवष्णु जी से अनुसूया देवी का सतीत्व भंग करने की िजद पर्कड़कर
बैठ गई.
िवष्णुलिोक से नारद जी सीधे ब्रह्मलिोक जा पर्हु चल
ं े और देवी सािवत्री के सामने देवी अनुसूया की प्रतशंसा का
राग अलिापर्ने लिगे. देवी सािवत्री को उनकी प्रतशंसा सुनना कतई भी रास नही आया. घमण्ड के कारण वह
जलिने-भुनने लिगी. नारद जी के चललिे जाने के बाद वह भी देवी अनुसूया के पर्ितव्रत धमर को भंग करने की
बात ब्रह्मा जी से करने लिगी.
ब्रह्मा, िवष्णु तथा महेश तीनो को अपर्नी पर्ियोत्नयो के सामने हार माननी पर्डी़़ और वह तीनो ही देवी
अनुसूया की कुिटिया के सामने एक साथ िभखारी के वेश मे जाकर खडे़़ हो गए. तीनो का एक ही मकसद
होने से अनुसूया के द्वार पर्र एक साथ ही समागम हु आ. जब देवी अनुसूया इन्हे िभका देने लिगी तब इन्होने
िभका लिेने से मना कर िदया और भोजन करने की ईच्छा प्रतकटि की.
देवी अनुसूया ने अितिथ सत्कार को अपर्ना धमर मानते हु ए उनकी बात मान लिी और उन्हे स्नान करने के
िलिए बोलिकर स्वयं भोजन की तैयारी मे लिग गई. तीनो देव जब नहाकर आए तब अनुसूया श्रद्धा तथा प्रतेम
भाव से भोजन की थालिी पर्रोस लिाई. लिेिकन तीनो देवो ने भोजन करने से इन्कार करते हु ए कहा िक जब
तक आपर् नग होकर भोजन नही पर्रोसेगी तब तक हम भोजन नही करेगे. देवी अनुसूया यह सुनते ही पर्हलिे
तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी. लिेिकन अपर्ने पर्ितव्रत धमर के बलि पर्र उन्होने तीनो की मंशा जान
लिी.
उसके बाद देवी ने ऋषिष अित्र के चलरणो का जलि तीनो देवो पर्र िछड़क िदया. जलि िछड़कते ही तीनो ने
बालिरुपर् धारण कर िलिया. बालिरुपर् मे तीनो को भरपर्ेटि भोजन कराया. देवी अनुसूया उन्हे पर्ालिने मे िलिटिाकर
अपर्ने प्रतेम तथा वात्सल्य से उन्हे पर्ालिने लिगी. धीरे-धीरे िदन बीतने लिगे. जब काफी िदन बीतने पर्र भी ब्रह्मा,
िवष्णु तथा महेश घर नही लिौटिे तब तीनो देिवयो को अपर्ने पर्ितयो की िचलन्ता सताने लिगी.

एक िदन उन तीनो को नारद जी से पर्ता चललिा िक यह तीनो देव माता अनुसूया के घर की ओर गए थे. यह
सुनते ही तीनो देिवयाँ अित्र ऋषिष के आश्रम मे पर्हु चल
ं ी और माता अनुसूया से अपर्ने-अपर्ने पर्ित के िवषय मे
पर्ूछने लिगी. अनुसूया माता ने पर्ालिने की ओर इशारा करते हु ए कहा िक यह रहे तुम्हारे पर्ित! अपर्ने-अपर्ने
पर्ितयो को पर्हचलानकर उन्हे अपर्ने साथ लिे जाओ. लिक्ष्मी जी ने चलतुरता िदखाते हु ए िवष्णु जी को
पर्हचलानकर उठाया लिेिकन वह भगवान शंकर िनकलिे. इस पर्र सभी उनका उपर्हास करने लिगे.
तीनो देिवयो को अपर्नी भूलि पर्र पर्छतावा होने लिगा. वह तीनो ही माता अनुसूया से कमा मांगने लिगी. तीनो ने
उनके पर्ितव्रत धमर के समक अपर्ना िसर झुकाया. माता अनुसूया ने कहा िक इन तीनो ने मेरा दध
ू पर्ीया है,
इसिलिए इन्हे बालिरुपर् मे ही रहना ही होगा. यह सुनकर तीनो देवो ने अपर्ने – अपर्ने अंश को िमलिाकर एक
नया अंश पर्ैदा िकया. इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया. इनके तीन िसर तथा छ: हाथ बने. तीनो देवो को
एकसाथ बालिरुपर् मे दत्तात्रेय के अंश मे पर्ाने के बाद माता अनुसूया ने अपर्ने पर्ित अित्र ऋषिष के चलरणो का
जलि तीनो देवो पर्र िछड़का और उन्हे पर्ूवरवत रुपर् प्रतदान कर िदया.

महावीर जयं त ी
वधर मान महावीर का जन्मिदन महावीर जयन्ती के रुपर् मे मनाया जाता है. वधर मान महावीर जैन धमर के
प्रतवतर क भगवान श्री आिदनाथ की पर्रंपर्रा मे चलौबीस वे तीथरकर हु ए थे. इनका जीवन कालि पर्ांचल सौ ग्यारह से
पर्ांचल सौ सत्ताईस ईस्वी ईसा पर्ूवर तक माना जाता है. वधर मान महावीर का जन्म एक कित्रय राजकुमार के रूपर्
मे एक राज पर्िरवार मे हु आ था. इनके िपर्ता का नाम राजा िसद्धाथर एवं माता का नाम िप्रतयकािरणी था.
उनका जन्म प्रताचलीन भारत के वैशालिी राज्य मे हु आ था.
तीस वषर की उम मे इन्होने घर-बार छोड़ िदया और कठोर तपर्स्या द्वारा कैवल्य ज्ञान प्रताप िकया. महावीर ने
पर्ाश्वर नाथ के आरंभ िकए तत्वज्ञान को पर्िरभािषत करके जैन दशर न को स्थायी आधार िदया. महावीर स्वामी
जी ने श्रद्धा एवं िवश्वास द्वारा जैन धमर की पर्ुन: प्रतितष्ठा स्थािपर्त की तथा आधुिनक कालि मे जैन धमर की
व्यापर्कता और उसके दशर न का श्रेय महावीर स्वामी जी को जाता है इन्हे अनेक नामो से पर्ुकारा जाता हैअहर त, िजन, िनग्ररथ, महावीर, अितवीर इत्यािद .

महावीर जीवन पर्िरचलय
भगवान महवीर का जन्म वैशालिी के एक कित्रय पर्िरवार मे राजकुमार के रुपर् मे चलैत्र शुक्लिपर्क त्रयोदशी को
बसोकंु ड मे हु आ था. इनके बचलपर्न का नाम वधर मान था यह िलिच्छवी कुलि के राजा िसद्दाथर और रानी

ित्रशलिा के पर्ुत्र थे. संसार को ज्ञान का संदेश देने वालिे भगवान महावीर जी ने अपर्ने कायो ं सभी का कल्याण
करते रहे.
जैन श्रद्धालिु इस पर्ावन िदवस को महावीर जयन्ती के रूपर् मे पर्रंपर्रागत तरीके से हषोल्लास और श्रद्धाभिक
पर्ूवरक मनाते आ रहे है. जैन धमर के धिमर यो का मानना है िक वधर मान जी ने घोर तपर्स्या द्वारा अपर्नी इियोन्द्रियो
पर्र िवजय प्रताप कर लिी थी िजस कारण वह िवजेता और उनको महावीर कहा गया और उनके अनुयायी जैन
कहलिाए.

महावीर जयं त ी पर्वर
तपर् से जीवन पर्र िवजय प्रताप करने का पर्वर महावीर जयंती के रूपर् मे मनया जाता है. श्रद्धालिु मंिदरो मे
भगवान महावीर की मूितर को िवशेष स्नान कराते है, जो िक अिभषेक कहलिाता है. तदपर्ु रांत भगवान की मूितर
को िसंहासन या रथ पर्र िबठा कर उत्साह और हषोउल्लास पर्ूवरक जुलिूस िनकालिते है, िजसमे बड़ी संख्यां मे
जैन धमारवलिम्बी शािमलि होते है. इस सुअवसर पर्र जैन श्रद्धालिु भगवान को फलि, चलावलि, जलि, सुगियोन्धत
द्रिव्य आिद वस्तुएं अिपर्र त करते.
चलौबीस ‍तीथरकरो के अंितम तीथरकर महावीर के जन्मिदवस प्रतित वषर चलैत्र शुक्लि त्रयोदशी को मनाया जाता
है. महावीर जयंती के अवसर पर्र जैन धमारवलिंबी प्रतात: कालि प्रतभातफेरी िनकालिते है तथा भव्य जुलिूस के
साथ पर्ालिकी यात्रा का आयोजन िकया जाता है. इसके पर्श्चलात महावीर स्वामी का अिभषेक िकया जाता है
तथा िशखरो पर्र ध्वजा चलढ़ाई जाती है. जैन समाज द्वारा िदन भर अनेक धािमर क कायर क्रमो का आयोजन
िकया जाता है महावीर का जन्मोत्सव संपर्ूणर भारत मे धूमधाम से मनाया जाता है.
वधर मान महावीर जी को 42 वषर की अवस्था मे जूिभका नामक गांव मे ऋषजूकूलिा नदी के िकनारे घोर त्पर्स्या
करते हु ए जब बहु त समय व्यतीत हु आ तब उन्हे मनोहर वन मे सालि वृक के नीचले वैशाख शुक्लि दशमी की
पर्ावन ितिथ के िदन उन्हे कैवल्य ज्ञान की प्रतािप हु ई िजसके पर्श्चलात वह महावीर स्वामी बने.
महावीर जी के समय समाज व धमर की ियोस्थित मे अनेक िवषमताएं मौजूद थी धमर अनेक आडंबरो से िघरा
हु आ था और समाज मे अत्याचलारो का बोलिबालि था अत: ऐसी ियोस्थित मे भगवान महावीर जी अपर्ना
महत्वपर्ूणर योगदान िदया उन्होने देश भर मे भमर ण करके लिोगो के मध्य व्याप कुरूितयो एवं अंधिवश्वासो को
दरू करने का प्रतयास िकया उन्होने धमर की वास्तिवकता को स्थािपर्त िकया सत्य एवं अिहंसा पर्र बलि िदया.

महावीर जी के उपर्दे श

महावीर जी ने अपर्ने उपर्देशो द्वारा समाज का कल्याण िकया उनकी िशकाओं मे मुख्य बाते थी िक सत्य का
पर्ालिन करो, अिहंसा को अपर्नाओ, िजओ और जीने दो. इसके अितिरक उन्होने पर्ांचल महाव्रत, पर्ांचल
अणुव्रत, पर्ांचल सिमित, तथा छ: आवश्यक िनयमो का िवस्तार पर्ूवरक उल्लेख िकया. जो जैन धमर के प्रतमुख
आधार हु ए और पर्ावापर्ुर मे काितर क कृष्ण अमावस्या को महावीर जी ने देह त्याग करके िनवारण प्रताप िकया.

नृि सं ह जयं त ी
वैशाख मास के शुक्लि पर्क की चलतुदरशी को नृिसंह जयंती के रूपर् मे मनाया जाता है. भगवान श्री नृिसंह शिक
तथा पर्राक्रम के प्रतमुख देवता है, पर्ौरािणक मान्यता एवं धािमर क ग्रंथो के अनुसार इसी ितिथ को भगवान
िवष्णु ने नृिसंह अवतार लिेकर दैत्यो के राजा िहरण्यकिशपर्ु का वध िकया था.
िहन्द ू पर्ंचलांग के अनुसार नरिसंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्लि पर्क की चलतुथी ितिथ को िकया जाता
है. पर्ुराणो मे विणर त कथाओं के अनुसार इसी पर्ावन िदवस को भक प्रतहलिाद की रका करने के िलिए भगवान
िवष्णु ने नृिसंह रूपर् मे अवतार िलिया तथा दैत्यो का अंत कर धमर िक रका की. अत: इस कारणवश यह िदन
भगवान नृिसंह के जयंती रूपर् मे बड़े ही धूमधाम और हसोल्लास के साथ संपर्ूणर भारत वषर मे मनाया जाता है.

नरिसं ह जयं त ी कथा
नृिसंह अवतार भगवान िवष्णु के प्रतमुख अवतारो मे से एक है. नरिसंह अवतार मे भगवान िवष्णु ने आधा
मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यो के राजा िहरण्यकिशपर्ु का वध िकया था. धमर ग्रंथो मे
भगवान के इस अवतरण के बारे िवस्तार पर्ूवरक िववरण प्रताप होता है जो इस प्रतकार है- प्रताचलीन कालि मे
कश्यपर् नामक ऋषिष हु ए थे उनकी पर्त्नी का नाम िदित था. उनके दो पर्ुत्र हु ए, िजनमे से एक का नाम
हिरण्याक तथा दस
ू रे का िहरण्यकिशपर्ु था.
िहरण्याक को भगवान श्री िवष्णु ने पर्ृथ्वी की रका हेतु वाराह रूपर् धरकर मार िदया था. अपर्ने भाई िक मृत्यु
से दख
ु ी और क्रोिधत िहरण्यकिशपर्ु ने भाई की मृत्यु का प्रतितशोध लिेने के िलिए अजेय होने का संकल्पर् िकया.
सहस्त्रो वषो ं तक उसने कठोर तपर् िकया, उसकी तपर्स्या से प्रतसन हो ब्रह्माजी ने उसे ‘अजेय’ होने का
वरदान िदया. वरदान प्रताप करके उसने स्वगर पर्र अिधकार कर िलिया, लिोकपर्ालिो को मार भगा िदया और
स्वत: सम्पर्ूणर लिोको का अिधपर्ित हो गया.

देवता िनरूपर्ाय हो गए थे वह असुर को िकसी प्रतकार वे पर्रािजत नही कर सकते थे अहंकार से युक वह प्रतजा
पर्र अत्याचलार करने लिगा. इसी दौरान िहरण्यकिशपर्ु िक पर्त्नी कयाधु ने एक पर्ुत्र को जन्म िदया, िजसका
नाम प्रतह्लाद रखा गया एक राकस कुलि मे जन्म लिेने पर्र भी प्रतह्लाद मे राकसो जैसे कोई भी दगु र ुण मौजूद नही थे
तथा वह भगवान नारायण का भक था तथा अपर्ने िपर्ता के अत्याचलारो का िवरोध करता था.
भगवान-भिक से प्रतह्लाद का मन हटिाने और उसमे अपर्ने जैसे दगु र ुण भरने के िलिए िहरण्यकिशपर्ु ने बहु त
प्रतयास िकए, नीित-अनीित सभी का प्रतयोग िकया िकंतु प्रतह्लाद अपर्ने मागर से िवचलिलित न हु आ तब उसने
प्रतह्लाद को मारने के षड्यंत्र रचले मगर वह सभी मे असफलि रहा. भगवान िवष्णु की कृपर्ा से प्रतह्लाद हर संकटि से
उबर आता और बचल जाता था.
इस बातो से कुब्ध िहरण्यकिशपर्ु ने उसे अपर्नी बहन होिलिका की गोद मे बैठाकर िजन्दा ही जलिाने का प्रतयास
िकया. होिलिका को वरदान था िक अिग उसे नही जलिा सकती पर्रंतु जब प्रतल्हाद को होिलिका की गोद मे
िबठा कर अिग मे डालिा गया तो उसमे होिलिका तो जलिकर राख हो गई िकंतु प्रतह्लाद का बालि भी बांका नही
हु आ.
इस घटिना को देखकर िहरण्यकिशपर्ु क्रोध से भर गया उसकी प्रतजा भी अब भगवान िवष्णु को पर्ूजने लिगी,
तब एक िदन िहरण्यकिशपर्ु ने प्रतह्लाद से पर्ूछा िक बता, तेरा भगवान कहाँ है? इस पर्र प्रतह्लाद ने िवनम भाव से
कहा िक प्रतभु तो सवर त्र है, हर जगह व्याप है. क्रोिधत िहरण्यकिशपर्ु ने कहा िक ‘क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ
(खंभे) मे भी है? प्रतह्लाद ने हाँ, मे उत्तर िदया.
यह सुनकर क्रोधांध िहरण्यकिशपर्ु ने खंभे पर्र प्रतहार कर िदया तभी खंभे को चलीरकर श्री नृिसंह भगवान प्रतकटि
हो गए और िहरण्यकिशपर्ु को पर्कड़कर अपर्नी जाँघो पर्र रखकर उसकी छाती को नखो से फाड़ डालिा और
उसका वध कर िदया. श्री नृिसंह ने प्रतह्लाद की भिक से प्रतसन होकर उसे वरदान िदया िक आज के िदन जो
भी मेरा व्रत करेगा वह समस्त सुखो का भागी होगा एवं पर्ापर्ो से मुक होकर पर्रमधाम को प्रताप होगा अत: इस
कारण से िदन को नृिसंह जयंती-उत्सव के रूपर् मे मनाया जाता है.

भगवान नृि सं ह जयं त ी पर्ूज ा
नृिसंह जयंती के िदन व्रत-उपर्वास एवं पर्ुजा अचलर ना िक जाती है इस िदन प्रतातः ब्रह्म मुहूतर मे उठकर स्नान
आिद से िनवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चलािहए तथा भगवान नृिसंह की िवधी िवधान के साथ पर्ूजा
अचलर ना करे. भगवान नृिसंह तथा लिक्ष्मीजी की मूितर स्थािपर्त करना चलािहए तत्पर्श्चलात वेदमंत्रो से इनकी
प्रताण-प्रतितष्ठा कर षोडशोपर्चलार से पर्ूजन करना चलािहभगवान नरिसंह जी की पर्ूजा के िलिए फलि, पर्ुष्पर्,

पर्ंचलमेवा, कुमकुम केसर, नािरयलि, अकत व पर्ीताम्बर रखे. गंगाजलि, कालिे ितलि, पर्ञ गव्य, व हवन सामग्री
का पर्ूजन मे उपर्योग करे.
भगवान नरिसंह को प्रतसन करने के िलिए उनके नरिसंह गायत्री मंत्र का जापर् करे. पर्ूजा पर्श्चलात एकांत मे कुश
के आसन पर्र बैठकर रुद्रिाक की मालिा से इस नृिसंह भगवान जी के मंत्र का जपर् करना चलािहए. इस िदन व्रती
को सामथ्यर अनुसार ितलि, स्वणर तथा वस्त्रािद का दान देना चलािहए. इस व्रत करने वालिा व्यिक लिौिकक
दःु खो से मुक हो जाता है भगवान नृिसंह अपर्ने भक की रका करते है व उसकी समस्त मनोकामनाएं पर्ूणर
करते है.

नरिसं ह मं त्र
ॐ उग्रं वीरं महािवष्णुं ज्वलिन्तं सवर तोमुखम् I
नृिसंहं भीषणं भद्रिं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम् II
ॐ नृम नृम नृम नर िसंहाय नमः ।
इन मंत्रो का जापर् करने से समस्त दख
ु ो का िनवारण होता है तथा भगवान नृिसंह की कृपर्ा प्रताप होती है.

चलामुण् डा शिकपर्ीठ
तंत्र िवधा के शास्त्री चलामुण्डा का अथर ब्रह्मािवधा बतलिाते है, जबिक माकरण्डेय पर्ुराण मे चलण्ड-मुण्ड का वध
करने के कारण “चलामुण्डा” शब्द की िसिद्ध होती है.
“यस्माच्चलण्डं य मुण्डं चल गृ़्हीत्वा त्वमुपर्ागता
चलामुण्डेित लितो लिोके ख्याता देिव भिवष्यिस”

माकर ण्डे य पर्ुर ाण-द गु ार सपशती
दगु ार कवचल मे चलामुण्डा को शववहना कहा गया है. भगवती महासुंदरी का पर्ंचलासन भी सदािशव का है. उल्लेख
है िक श्रीयंत्र के आवरण- अचलर न मे भूपर्ूर की दस
ू री रेखा मे चलामुण्डा का ही अचलर न होता है. वतर मान मथुरा
नगर के उत्तर पर्ियोश्चलम मे वृंदावन-मथुरा रेलि लिाइन पर्र मसानी स्टिेशन है, िजसके आस-पर्ास का केत्र अंिबका
वन कहलिाता है.

“मसानी’ श्मशान का अपर्भ्रंश है. शायद कभी यहां श्मशान रहा होगा. मसानी का मंिदर अब भी मौजूद है.
इसी अंिबका वन मे नंद बाबा के साथ ब्रजवािसयो ने सरस्वती नदी मे स्नान करके जगदम्बा की पर्ूजाचलर ना
की थी. ऎसा उल्लेख श्री मदभागवत मे िमलिता है.
मधुरा-वृंदावन के बीचल िदल्ली-मथुरा बडी लिाईन पर्र भूतेश्वर नामक रेलिवे स्टिेशन के पर्ास भूतेश्वर मंिदर के
प्रतांगण मे ियोस्थत देवी चलामुण्डा के शिकपर्ीठ को तंत्र चलूडामिण मे “मौलिी शिकपर्ीठ कहा गया है. कहा जाता है,
िक यहां महिषर शाियोण्डल्य ने साधना की थी. यहां सती के केशपर्ाश का िनपर्ात हु आ था. यहां भी शिक
‘उमा” तथा भैरव ‘भूतेश” माने गए है.

शिकपर्ीठ स्थापर्ना कथा
51 और एक अन्य मत से 52 शिकपर्ीठो से जुडी एक पर्ौरािणक कथा के अनुसार एक प्रतजापर्ित पर्ुत्री सती ने
भगवान िशव को पर्ित रुपर् मे पर्ाने के िलिये कठोर तपर्स्या की. उनकी तपर्स्या से प्रतसन होकर, भगवान िशव
ने उन्हे पर्त्नी रुपर् मे स्वीकार िकया. सती और िशव के िववाह से सती के िपर्ता प्रतजापर्ित प्रतसन नही थे.
इस कारण से वे देवी सती और भगवान िशव का समय-समय पर्र दोनो का अपर्मान करने से नही चलूकते थे.
दोनो का अपर्मान करने के उद्देश्य से राजा प्रतजापर्ित ने एक हवन का आयोजन िकया. हवन मे सभी
देवताओं को आमंित्रत िकया गया. पर्रन्तु भगवान िशव को जानबूझ कर नही बुलिाया गया.
इस हवन-यज्ञ की जानकारी जब भगवान िशव और देवी सती को हु ई तो, उन्हे बहु त बुरा लिगा. देवी सती ने
भगवान िशव से इस हवन मे शािमलि होने की आज्ञा मांगी. देवी सती के आग्रह को देखते हु ए, भगवान िशव ने
उन्हे इस हवन मे जाने की आज्ञा दे दी.
देवी सती जब अपर्ने घर पर्हु चल
ं ी तो वहां िबना बुलिाए पर्हु चल
ं ने के कारण उनका अपर्मान िकया गया. अपर्ने िपर्ता
के द्वारा अपर्मान होने पर्र देवी सती ने हवन की अिग मे कूद पर्र आत्मदाह कर िलिया. सती के आत्मदाह की
सूचलना भगवान िशव को प्रताप होने पर्र भगवान िशव क्रोध रुपर् धारण कर हवन मे पर्हंचले और हवन से देवी
सती का शव िनकालि कर कंधो पर्र डालिा और ब्रह्माण्ड मे इधर-उधर भटिकने लिगे.
भगवान िशव के क्रोध को देखते हु ए, श्री िवष्णु ने अपर्ने सुदशर न चलक्र से देवी सती के 51 और एक अन्य मत
से 52 टिु कडे कर िदए. देवी सती के ये अंग और आभूषण िजन स्थानो पर्र िगरे, उन स्थानो पर्र शिकपर्ीठ की
स्थापर्ना हो गई.

नागे श् वर ज्योितिलिर ग
भारत के 12 ज्योितिलिरगो मे से एक नागेश्वर ज्योितिलिरग है. यह ज्योितिलिरग भारत के गुजरात राज्य के
बाहरी केत्र मे द्वािरका स्थान मे ियोस्थत है. धमर शास्त्रो मे भगवान िशव नागो के देवता है. तथा नागेश्वर का
पर्ूणर अथर नागो का ईश्वर है. भगवान िशव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है. द्वारका पर्ुरी से भी नागेश्वर
ज्योितिलिर ग की दरू ी 17 मीलि की है. इस ज्योितिलिरग की शास्त्रो मे अद्वभुत मिहमा कही गई है.
इस ज्योितिलिर ग की मिहमा मे कहा गया है, िक जो व्यिक पर्ूणर श्रद्वा और िवश्वास के साथ यहां दशर नो के िलिए
आता है. उसे जीवन के समस्त पर्ापर्ो से मुिक िमलिती है.

नागे श् वर ज्योितिलिर ग कथा
नागेश्वर ज्योितिलिर ग के संम्बन्ध मे एक कथा प्रतिसद्ध है. कथा के अनुसार एक धमर कमर मे िवश्वास करने
वालिा व्यापर्ारी था. भगवान िशव मे उसकी अनन्य भिक थी. व्यापर्ािरक कायो मे व्यस्त रहने के बाद भी वह
जो समय बचलता उसे आराधना, पर्ूजन और ध्यान मे लिगाता था.
उसकी इस भिक से एक दारुक नाम का राकस नाराज हो गया. राकस प्रतवृ़्ित का होने के कारण उसे
भगवान िशव जरा भी अच्छे नही लिगते थे.
वह राकस सदा ही ऎसे अवसर की तलिाश मे रहता था, िक वह िकस तरह व्यापर्ारी की भिक मे बाधा पर्हु चल
ं ा
सके. एक बार वह व्यापर्ारी नौका से कही व्यापर्ािरक कायर से जा रहा था. उस राकस ने यह देख िलिया, और
उसने अवसर पर्ाकर नौका पर्र आक्रमण कर िदया. और नौका के याित्रयो को राजधानी मे लिे जाकर कैद कर
िलिया. कैद मे भी व्यापर्ारी िनत्यक्रम से भगवान िशव की पर्ूजा मे लिगा रहता था.
बंदी गृ़्ह मे भी व्यापर्ारी के िशव पर्ूजन का समाचलार जब उस राकस तक पर्हु चल
ं ा तो उसे बहु त बुरा लिगा. वह
क्रोध भाव मे व्यापर्ारी के पर्ास कारागार मे पर्हु चल
ं ा. व्यापर्ारी उस समय पर्ूजा और ध्यान मे मग था. राकस ने
उसपर्र उसी मुद्रिा मे क्रोध करना प्रतारम्भ कर िदया. राकस के क्रोध का कोई प्रतभाव जब व्यापर्ारी पर्र नही
हु आ तो राकस ने अपर्ने अनुचलरो से कहा िक वे व्यापर्ारी को मार डालिे.
यह आदेश भी व्यापर्ारी को िवचलिलित न कर सके. इस पर्र भी व्यापर्ारी अपर्नी और अपर्ने सािथयो की मुिक
के िलिए भगवान िशव से प्रताथर ना करने लिगा. उसकी भिक से प्रतसन होकर भगवान िशव उसी कारागार मे एक

ज्योितिलिरग रुपर् मे प्रतकटि हु ए. और व्यापर्ारी को पर्ाशुपर्त- अस्त्र स्वयं की रका करने के िलिए िदया. इस अस्त्र
से राकस दारूक तथा उसके अनुचलरो का वध कर िदया. उसी समय से भगवान िशव के इस ज्योितिलिरग का
नाम नागेश्वर के नाम से प्रतिसद्ध हु आ.

नागे श् वर ज्योितिलिर ग है द राबाद और अल्मोडा मे
भारत के कुछ अन्य स्थानो मे ियोस्थत ज्योितिलिरगो को भी नागेश्वर ज्योितिलिर ग का नाम िदया जाता है. इस
संबन्ध मे कई मत सामने आते है. हैदराबाद, आन्घ प्रतदेश का ज्योितिलिर म्ग भी नागेश्वर ज्योितिलिरग के नाम
से जाना जाता है. इसके अितिरक उत्तराखंड के अल्मोडा नामक स्थान मे भी योगेश या जागेश्वर िशविलिंग
है, भक जन इसे भी नागेश्वर के नाम से बुलिाते है.
पर्रन्तु िशवपर्ुराण मे केवलि द्वारका के नागेश्वर ज्योितिलिरग को ही एक मात्र नागेश्वर ज्योितिलिर ग माना गया है.
एक अन्य धािमर क शास्त्र के अनुसार भारत के दस ज्योितिलिर गो मे नागेश दारूकावने का नाम आता है. यह
स्थान आज जागेश्वर के नाम से जाना जाता है. नागेश्वर का नाम योगेश्वर या जोगेश्वर िकस प्रतकार बना
इसका कारण स्थान पर्िरवतर न के कारण शब्दो मे पर्िरवतर न से है.

लिोकमान्यताएं
नागेश्वर ज्योितिलिरग अल्मोडा के िवषय मे यह लिोकमान्यताएं है, पर्हाडी इलिाको मे एक नाग प्रतजाती रहती
है. वहां से प्रताप प्रताचलीन अवशेषो मे नाग मूितर या, सांपर् के कुछ िचलन्ह प्रताप हु ए है. नाग पर्ूजा को आज भी यहां
िवशेष महत्व िदया गया है. अल्मोडा मे जहां यह मंिदर ियोस्थत है, वहां आसपर्ास के केत्रो के नाम प्रताचलीन
कालि से ही नागो के नाम पर्र आधािरत है. इन्ही मे से कुछ नाम वेरीनाग, धौलिेनाग, कािलियनाग आिद है. भूत
प्रतेतो से मुिक के िलिए भी नाग पर्ूजा की जाती है.

घृष् णे श् वर मियोन्दर
घृष्‍णेश्‍वर महादेव का प्रतिसद्ध मंिदर महाराषर के औरंगाबाद शहर के समीपर् दौलिताबाद के पर्ास ियोस्थत है .
घृष्णेश्वर मियोन्दर भगवान िशव के बारह ज्योितिलिरगो मे से एक है. इसे घुसृणेश्वर एवं घृष्णेश्वर के नाम से भी
जाना जाता है. इस मंिदर का िनमारण अिहल्याबाई होल्कर द्वारा करवाया गया था. शहर के शोर से से दरू
ियोस्थत यह मंिदर शांित एवं सादगी से पर्िरपर्ूणर है. दरू -दरू से लिोग यहां दशर न के िलिए आते है और आियोत्मक
शांित प्रताप करते है. भगवान िशव के द्वादश ज्योितिलिरगो मे से यह अंितम ज्योितिलिरग है. बौद्ध िभकुओं द्वारा

िनिमर त एलिोरा की प्रतिसद्ध गुफाएँ इस मंिदर के समीपर् ियोस्थत है. यही पर्र श्री एकनाथ जी गुरु श्री जनादर न
महाराज जी की समािध भी है.

घृष् णे श् वर मियोन्दर पर्ौरािणक कथा
इस ज्योितिलिरग के बारे मे एक कथा प्रतचलिलित है कहते है भारत के दिकण प्रतदेश के देविगिर पर्वर त के िनकटि
सुकमार नामक ब्राह्मण और उसकी पर्त्नी सुदेश िनवास करते थे. दोनो ही भगवान िशव के पर्रम भक थे. पर्रंतु
इनके कोई संतान सन्तान न थी इस कारण यह बहु त दख
ु ी रहते थे िजस कारण उनकी पर्ियोत्न उन्हे दस
ू री
शादी करने का आग्रह करती थी अत: पर्ियोत्न के जोर देने सुकमार ने अपर्नी पर्त्नी की बहन घुश्मा के साथ
िववाह कर िलिया.
घुश्मा भी िशव भगवान की अनन्य भक थी और भगवान िशव की कृपर्ा से उसे एक पर्ुत्र की प्रतािप हु ई. पर्ुत्र
प्रतािप से घुश्मा का मान बढ़ गया पर्रंतु इस कारण सुदेश को उससे ईष्या होने लिगी जब पर्ुत्र बड़ा हो गया तो
उसका िववाह कर िदया गया यह सब देखकर सुदेहा के मन मे और अिधक ईषार पर्ैदा हो गई. िजसके कारण
उसने पर्ुत्र का अिनष करने की ठान लिी ओर एक िदन राित्र मे जब सब सो गए तब उसने घुश्मा के पर्ुत्र को
चलाकू से मारकर उसके शरीर के टिु कड़े कर िदए और उन टिु कड़ो को सरोवर मे डालि िदया जहाँ पर्र घुश्मा
प्रतितिदन पर्ािथर व िलिंग का िवसजर न िकया करती थी. शव को तालिाब मे फेककर वह आराम से घर मे आकर
सो गई.
रोज की भाँित जब सभी लिोग अपर्ने कायो ं मे व्यस्त हो गए और िनत्यकमर मे लिग गये तब सुदेहा भी
आनन्दपर्ूवरक घर के काम-काज मे जुटि गई. पर्रंतु जब बहू नीद से जागी तो िबस्तर को ख़ून मे सना पर्ाया
तथा मांस के कुछ टिु कड़े िदखाई िदए यह भयानक दृश्य देखकर व्याकुलि बहू अपर्नी सास घुश्मा के पर्ास
जाकर रोने लिगी और पर्ित के बारे मे पर्ूछने लिगी और िवलिापर् करने लिगी. सुदेहा भी उसके साथ िवलिापर् मे
शािमलि हो गई ताकी िकसी को भी उस पर्र संदेह न हो बहू के क्रन्दन को सुनकर घुश्मा जरा भी दख
ु ी नही
हु ई और अपर्ने िनत्य पर्ूजन व्रत मे लिगी रही व सुधमार भी अपर्ने िनत्य पर्ूजा-कमर मे लिगे रहे. दोनो पर्ित-पर्ियोत्न
भगवान का पर्ूजन भिक के साथ िबना िकसी िवघ्न, िचलन्ता के करते रहे. जब पर्ूजा समाप हु ई तब घुश्मा ने
अपर्ने पर्ुत्र की रक से भीगी शैय्या को देखा यह िवभत्स दृश्य देखकर भी उसे िकसी प्रतकार का िवलिापर् नही
हु आ.
उसने कहा की िजसने मुझे पर्ुत्र िदया है वही िशव उसकी रका भी करेगे वह तो स्वयं कालिो के भी कालि है,
सत्पर्ुरूषो के आश्रय है और वही हमारे संरकक है. अत: िचलन्ता करने से कुछ न होगा इस प्रतकार के िवचलार

कर उसने िशव भगवान को याद िकया धैयर धारण कर शोक से मुक हो गई .ं और प्रतितिदन की तरह िशव मंत्र
ऊँ नम: िशवाय का उच्चलारण करती रही तथा पर्ािथर व िलिंगो को लिेकर सरोवर के तटि पर्र गई जब उसने
पर्ािथर व िलिंगो को तालिाब मे प्रतवािहत िकया तो उसका पर्ुत्र सरोवर के िकनारे खड़ा हु आ िदखाई पर्ड़ा अपर्ने
पर्ुत्र को देखकर घुश्मा प्रतसनता से भर गई इतने मे ही भगवान िशव उसके सामने प्रतकटि हो गये.
भगवान िशव घुश्मा की भिक से बहु त प्रतसन हु ए और वरदान मांगने को कहा भगवाने ने कहा यिद वो चलाहे तो
वो उसकी बहन को ित्रशूलि से मार डालिे. पर्रंतु घुश्मा ने श्रद्धा पर्ूवरक महेश्वर को प्रतणाम करके कहा िक सुदेहा
बड़ी बहन है अत: आपर् उसकी रका करे उसे कमा करे. घुश्मा ने िनवेदन िकया की मै दष्ु कमर नही कर सकती
और बुरा करने वालिे की भी भलिाई करना ही अच्छा माना जाता है. अत: भगवान िशव घुश्मा के भिकपर्ूणर
िवचलारो को सुनकर अत्यन्त प्रतसन हो उठे और कहा घुश्मा तुम कोई और वर मांग सकती हो घुश्मा ने कहा
हे महादेव मुझे वर देना ही चलाहते है तो लिोगो की रका और कल्याण के िलिए आपर् यही सदा िनवास करे
घुश्मा की प्रताथर ना से प्रतसन महेश्वर िशवजी ने उस स्थान पर्र सदैव वास करने का वरदान िदया तथा तालिाब
के समीपर् ज्योतिलिरग के रूपर् मे वहां पर्र वास करने लिगे और घुश्मेश्वर के नाम से प्रतिसद्ध हु ए उस तालिाब का
नाम भी तब से िशवालिय हो गया.

घृष् णे श् वर ज्योितिलिर ग महत्व
मान्यता है की िशवालिय सरोवर का दशर न करने से सब प्रतकार के अभीष प्रताप होते है. िनसंतानो को संतान
की प्रतािप होती है. घुश्मेश्वर ज्योितिलिरग का दशर न व पर्ूजन करने से सब प्रतकार के सुखो की वृिद्ध होती है.
जगद्गुरु आिद शंकराचलायर ने भी घुश्मेश्वर ज्योितिलिरग की पर्ूजा अराधना की थी.

दे व ी कात्यायनी
माँ दगु ार के छठे रूपर् को माँ कात्यायनी के नाम से पर्ूजा जाता है. महिषर कात्यायन की किठन तपर्स्या से
प्रतसन होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पर्ुत्री के रूपर् मे पर्ैदा हु ई थी. महिषर कात्यायन ने इनका पर्ालिनपर्ोषण िकया तथा महिषर कात्यायन की पर्ुत्री और उन्ही के द्वारा सवर प्रतथम पर्ूजे जाने के कारण देवी दगु ार को
कात्यायनी कहा गया.
देवी कात्यायनी अमोद फलिदाियनी है इनकी पर्ूजा अचलर ना द्वारा सभी संकटिो का नाश होता है, माँ
कात्यायनी दानवो तथा पर्ािपर्यो का नाश करने वालिी है. देवी कात्यायनी जी के पर्ूजन से भक के भीतर
अदत
ु शिक का संचलार होता है. इस िदन साधक का मन ‘आज्ञा चलक्र’ मे ियोस्थत रहता है. योग साधना मे इस

आज्ञा चलक्र का अत्यंत महत्वपर्ूणर स्थान है. साधक का मन आज्ञा चलक्र मे ियोस्थत होने पर्र उसे सहजभाव से
मां कात्यायनी के दशर न प्रताप होते है. साधक इस लिोक मे रहते हु ए अलिौिकक तेज से युक रहता है.

कात्यायनी कथा
देवी कात्यायनी जी के संदभर मे एक पर्ौरािणक कथा प्रतचलिलित है िजसके अनुसार एक समय कत नाम के
प्रतिसद्ध ॠषिष हु ए तथा उनके पर्ुत्र ॠषिष कात्य हु ए, उन्ही के नाम से प्रतिसद्ध कात्य गोत्र से, िवश्वप्रतिसद्ध ॠषिष
कात्यायन उत्पर्न हु ए थे. देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषिषयो के संकटिो को दरू करने िलिए महिषर
कात्यायन के आश्रम मे उत्पर्न होती है. महिषर कात्यायन जी ने देवी पर्ालिन पर्ोषण िकया था. जब मिहषासुर
नामक राकस का अत्याचलार बहु त बढ़ गया था, तब उसका िवनाश करने के िलिए ब्रह्मा, िवष्णु और महेश ने
अपर्ने अपर्ने तेज और प्रततापर् का अंश देकर देवी को उत्पर्न िकया था और ॠषिष कात्यायन ने भगवती जी
िक किठन तपर्स्या, पर्ूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलिायी.
महिषर कात्यायन जी की इच्छा थी िक भगवती उनके घर मे पर्ुत्री के रूपर् मे जन्म लिे. देवी ने उनकी यह
प्रताथर ना स्वीकार की तथा अियोश्वन कृष्ण चलतुदरशी को जन्म लिेने के पर्श्चलात शुक्लि सपमी, अषमी और नवमी,
तीन िदनो तक कात्यायन ॠषिष ने इनकी पर्ूजा की, दशमी को देवी ने मिहषासुर का वध िकया ओर देवो को
मिहषासुर के अत्याचलारो से मुक िकया.

माँ कात्यायनी की पर्ूज ा िविध
जो साधक कुण्डिलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना मे समिपर्र त है उन्हे दगु ार पर्ूजा के छठे िदन माँ
कात्यायनी जी की सभी प्रतकार से िविधवत पर्ूजा अचलर ना करनी चलािहए िफर मन को आज्ञा चलक्र मे स्थािपर्त
करने हेतु मां का आशीवारद लिेना चलािहए और साधना मे बैठना चलािहए. इस प्रतकार जो साधक प्रतयास करते है
उन्हे भगवती कात्यायनी सभी प्रतकार के भय से मुक करती है. माँ कात्यायनी की भिक से मनुष्य को अथर ,
कमर , काम, मोक की प्रतािप हो जाती है.
दगु ार पर्ूजा के छठे िदन भी सवर प्रतथम कलिश और उसमे उपर्ियोस्थत देवी देवता की पर्ूजा करे िफर माता के
पर्िरवार मे शािमलि देवी देवता की पर्ूजा करे जो देवी की प्रतितमा के दोनो तरफ िवरजामन है. इनकी पर्ूजा के
पर्श्चलात देवी कात्यायनी जी की पर्ूजा िक जाती है. पर्ूजा की िविध शुरू करने पर्र हाथो मे फूलि लिेकर देवी को
प्रतणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान िकया जाता है

देवी की पर्ूजा के पर्श्चलात महादेव और पर्रम िपर्ता की पर्ूजा करनी चलािहए. श्री हिर की पर्ूजा देवी लिक्ष्मी के
साथ ही करनी चलािहए.
माँ कात्यायनी का स्वरूपर् अत्यन्त िदव्य और स्वणर के समान चलमकीलिा है. यह अपर्नी िप्रतय सवारी िसंह पर्र
िवराजमान रहती है. इनकी चलार भुजाये भको को वरदान देती है, इनका एक हाथ अभय मुद्रिा मे है, तो
दस
ू रा हाथ वरदमुद्रिा मे है अन्य हाथो मे तलिवार तथा कमलि का फूलि है.

दे व ी कात्यायनी मं त्र
चलन्द्रिहासोज्जवलिकरा शाईलिवरवाहना।
कात्यायनी शुभं ददाद्देवी दानवघाितनी।।
या देवी सवर भू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपर्ेण संियोस्थता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ध्यान
वन्दे वांिछत मनोरथाथर चलन्द्रिाघर कृत शेखराम्।
िसंहरूढ़ा चलतुभर ुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वणारआज्ञा चलक्र ियोस्थतां षषम दगु ार ित्रनेत्राम्।
वराभीत करां षगपर्दधरां कात्यायनसुतां भजािम॥
पर्टिाम्बर पर्िरधानां स्मेरमुखी नानालिंकार भूिषताम्।
मंजीर, हार, केयूर, िकंिकिण रत्नकुण्डलि मियोण्डताम्॥
प्रतसनवदना पर्ञ्वाधरां कांतकपर्ोलिा तुगं कुचलाम्।
कमनीयां लिावण्यां ित्रवलिीिवभूिषत िनम्न नािभम॥

स्तोत्र पर्ाठ

कंचलनाभा वराभयं पर्द्मधरा मुकटिोज्जवलिां।
स्मेरमुखी िशवपर्त्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पर्टिाम्बर पर्िरधानां नानालिंकार भूिषतां।
िसंहियोस्थतां पर्दमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
पर्रमांवदमयी देिव पर्रब्रह्म पर्रमात्मा।
पर्रमशिक, पर्रमभिक,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवचल
कात्यायनी मुखं पर्ातु कां स्वाहास्वरूिपर्णी।
लिलिाटिे िवजया पर्ातु मािलिनी िनत्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पर्ातु जया भगमािलिनी॥

प्रतदोष कालि
प्रतदोष कालि वह समय कहलिाता है िजस समय िदन और राित्र का िमलिन होता है. भगवान िशव की पर्ूजा एवं
उपर्वास- व्रत के िवशेष कालि और िदन रुपर् मे जाना जाने वालिा यह प्रतदोष कालि बहु त ही उत्तम समय होता
है. प्रतदोष ितिथ का बहु त महत्व है, इस समय िक गई भगवान िशव की पर्ूजा से अमोघ फलि की प्रतािप होती है.
प्रतदोष कालि मे की गई पर्ूजा एवं व्रत सभी इच्छाओं की पर्ूितर करने वालिा माना गया है. इसी प्रतकार प्रतदोष कालि
व्रत हर माह के शुक्लि पर्क एवं कृष्ण पर्क के तेरहवे िदन या त्रयोदशी ितिथ के समय रखा जाता है. कुछ
िवद्वानो के अनुसार द्वादशी एवं त्रयोदशी की ितिथ भी प्रतदोष ितिथ मानी गई है.

प्रतदोष कालि महत्व
भगवान िशव को तमोगुणी व िवनाशक शिकयो का स्वामी भी माना गया है और राित्र भी अंधाकार से युक
तमोगुण िलिए होती है, िजसमे बुरी शिकयां ज्यादा हावी मानी गई है, जो अशुभ एवं पर्ीड़ादायी हो सकती है
शास्त्रो मे भगवान िशव को भूतगणो का ही स्वामी और भूतभावन कहा गया है, िजन पर्र भगवान िशव का

िनयंत्रण है. अत: प्रतदोष कालि मे िक गई भगवान शंकर की पर्ूजा एवं अराधना इन बुरी शिकयो के प्रतभाव को
समाप कर देती है और वातावरण को शुद्ध एवं पर्िवत्र बनाती है.
शैव ग्रंथो मे सूयर को िशव का ही रूपर् कहा गया है, इस प्रतकार सूयर रूपर्ी िशव के प्रतभाव से िदन मे बुरी शिकयां
कमजोर हो जाती है िकंतु सूयर के अस्त हो जाने पर्र अंधकार रुपर्ी तमोगुण प्रतकटि एवं सशक हो जाते है तथा
तामसीक भाव हावी होने लिगते है, अत: इन बुरे िवचलारो व पर्ापर् नाश के िलिए राित्र के आरंभ मे अथारत प्रतदोष
कालि मे भगवान िशव की पर्ूजा शुभ फलिदायक होती है तथा सभी संकटिो एवं िवपर्दाओं का नाश करती है.
एक मान्यता यह भी है िक भगवान आशुतोष राित्र के स्वामी है तथा प्रतदोष कालि मे भगवान शंकर भ्रमण पर्र
िनकलिते है एक पर्ौरािणक मान्यता अनुसार कहा जाता है िक ज्योितर िलिंग का प्रतादभ
ु ारव भी अद्धरराित्र को माना
जाता है िजस कारण प्रतदोष कालि को बहु त ही पर्िवत्र समय माना जाता है.

प्रतदोष व्रत
प्रतदोष व्रत प्रतत्येक माह मे दो बार शुक्लि पर्क और कृष्ण पर्क की त्रयोदशी को आता है और यिद इन ितिथयो
को सोमवार का िदन हो तो उसे सोम प्रतदोष व्रत कहा जाता है. मंगलिवार का िदन होतो उसे भौम प्रतदोष व्रत
कहते है तथा शिनवार होतो उसे शिन प्रतदोष व्रत व्रत कहा जाता है. इस िदन व्रत रखने का िवधान है, प्रतदोष
व्रत पर्र जपर्, दान, व्रत इत्यािद से पर्ुण्य की प्रतािप होती है.
इस व्रत के समय िशवजी िक पर्ूजा का िवधान है, प्रतदोष व्रत के िदन िनराहार रहकर सायंकालि मे िशव का
पर्ूजन िकया जाता है, इस व्रत मे व्रती िनजर लि रहकर भी व्रत रख सकता है. प्रतात: कालि स्नान करके भगवान
िशव की बेलि पर्त्र, गंगाजलि अकत धूपर् दीपर् सिहत पर्ूजा करनी चलािहए तथा संध्या समय पर्ुन: स्नान करके
भगवान िशव जी की-पर्ूजा करनी चलािहए. इस प्रतकार प्रतदोष व्रत को करने से हर प्रतकार का दोष िमटि जाता है.

ऋषिष अित्र
िहंद ू धमर के प्रतमुख ऋषिषयो मे से एक ऋषिष अत्री एक महान किव और िवद्वान थे. अत्री मुिन नौ प्रतजापर्ितयो मे
से एक तथा ब्रह्मा जी के मानस पर्ुत्र थे. अत्री एक गोत्र भी है िजस कारण इस गोत्र मे जन्मे व्यिक अत्री ऋषिष
के वंशज माने गए. ऋषिष अत्री का स्थान सपऋषिषयो मे िलिया जाता है उनकी महानता एवं िवद्वता से प्रताचलीन
ग्रंथ भरे पर्डे़़ है. संपर्ूणर ऋषग्वेद दस मण्डलिो मे से एक ऋषग्वेद के पर्ंचलम मण्डलि के मंत्र द्रिषा महिषर अित्र है
िजस कारण इसे आत्रेय मण्डलि कहा जाता है.

ऋषिष अत्री कथा
मुिन अित्र ब्रह्मा के मानस पर्ुत्र थे जो ब्रह्मा जी के नेत्रो से उत्पर्न हु ए थे. यह सोम के िपर्ता थे जो इनके नेत्र से
आिवभूरत हु ए. इन्होने कदर म की पर्ुत्री अनुसूया से िववाह िकया था जो एक महान पर्ितव्रता के रूपर् मे िवख्यात
हु ई ं है. पर्ुत्रोत्पर्ित्त के िलिए इन्होने ऋषक पर्वर त पर्र पर्त्नी अनुसूया के साथ घोर तपर् िकया था िजस कारण इन्हे
ित्रमूितर यो की प्रतािप हु ई िजनसे ित्रदेवो के अशं रूपर् मे दत्त (िवष्णु) दवु ारसा (िशव) और सोम (ब्रह्मा) उत्पर्न
हु ए.
इस तथ्य पर्र एक कथा आधािरत है जो इस प्रतकार है ऋषिष अत्री और माता अनुसूइया अपर्ने दाम्पर्त्य जीवन
को बहु त सहज भाव के साथ व्यतीत कर रहे थे. देवी अनुसूइया जी की पर्ितव्रतता के आगे सभी के
नतमस्तक हु आ करते थे. इनके जीवन को देखकर देवता भी प्रतसन होते थे जब एक बार देवी लिक्ष्मी, पर्ावर ती
और सरस्वती को ऋषिष अित्र की पर्ियोत्न अनुसूइया के िदव्य पर्ितव्रत के बारे मे ज्ञात होता है तो वह उनकी
पर्रीका लिेने का िवचलार करती है और तीनो देिवयां अपर्ने पर्ितयो भगवान िवष्णु, शंकर व ब्रह्मा को अनुसूइया
के पर्ितव्रत की पर्रीका लिेने को कहती है.
िववश होकर ित्रदेव अपर्ने रूपर् बदलिकर एक साधू रूपर् मे ऋषिष अित्र के आश्रम जाते है और अनुसूइया से
िभका की मांग करते है. पर्र वह एक शतर रखते है िक िभका िनवर स्त्र होकर देनी पर्ड़ेगी इस पर्र देवी अनुसूइया
जी धमर सक
ं टि मे फँस जाती है. यिद िभका न दी तो गलित होगा और देती है तो पर्ितव्रत का अपर्मान होता है
अत: वह उनसे कहती है की वह उन्हे बालिक रूपर् मे ही यह िभ़़का दे सकती है तथा हाथ मे जलि लिेकर
संकल्पर् द्वारा वह तीनो देवो को िशशु रूपर् मे पर्िरवितर त कर देती है और िभका देती है.
इस प्रतकार तीनो देवता ऋषषी अित्र के आश्रम मे बालिक रूपर् मे रहने लिगते है और देवी अनसूइया माता की
तरह उनकी देखभालि करती है कुछ समय पर्श्चलात जब ित्रदेिवयो को इस बात का बोध होता है तो वह अपर्ने
पर्ितयो को पर्ुन: प्रताप करने हेतु ऋषिष अित्र के आश्रम मे आती है और अपर्नी भूलि के िलिए कमा याचलना करती
है.
इस तरह से ऋषिष अत्री के कहने पर्र माता अनुसूइया ित्रदेवो को मुक करती है. अपर्ने स्वरूपर् मे आने पर्र
तीनो देव ऋषिष अित्र व माता अनुसूइया को वरदान देते है िक वह कालिाम्तर मे उनके घर पर्ुत्र रूपर् मे जन्म
लिेग और ित्रदेवो के अशं रूपर् मे दत्तात्रेय , दवु ारसा और सोम रुपर् मे उत्पर्न हु ए थे.

वै ि दक मन्त्रद्रिषा

महिषर अित्र वैिदक मन्त्रद्रिषा ऋषिष माने गए है अनेक धािमर क ग्रंथो मे इनके आिवभारव तथा चलिरत्र का सुन्दर
वणर न िकया गया है. महिषर अित्र को ज्ञान, तपर्स्या, सदाचलार, भिक एवं मन्त्रशिक के ज्ञाता रूपर् मे व्यक िकया
जाता है.

ऋषिष अित्र और श्री राम
भगवान श्री राम अपर्ने भक महिषर अित्र एवं देवी अनुसूया की भिक को सफलि करने के िलिए स्वयं उनके
आश्रम पर्र पर्धारते है और माता अनुसूइया देवी सीता को पर्ितव्रत का उपर्देश भी देती है. उन्हे िदव्य वस्त्र
एवं आभूषण प्रतदान करती है महिषर अित्र तीनो गुणो सत्त्व, रजस, तमस गुणो से पर्रे थे वह गुणातीत थे महिषर
अित्र सदाचलार का जीवन व्यतीत करते हु ए िचलत्रकूटि के तपर्ोवन मे रहा करते थे.

ऋषिष अित्र जीवन वृत ांत
वेदो मे विणर त है िक ऋषिष अित्र को अियोश्वनीकुमारो की कृपर्ा प्रताप थी इस पर्र एक कथा भी प्रताप होती है िक
एक बार जब महिषर अित्र समािधस्थ थे, तब दैत्यो ने इन्हे उठाकर शतद्वार यन्त्र मे डालि देते है और जलिाने
का प्रतयत्न करते है पर्रंतु समाधी मे होने के कारण इन्हे इस बात का ज्ञान नही होता तभी उिचलत समय पर्र
अियोश्वनीकुमार वहाँ पर्हु ँचलकर ऋषिष अित्र को उन दैत्यो के चलंगुलि से बचलाते है यही कथा ऋषग्वेद के प्रतथम
मण्डलि मे भी बताई गई है. ऋषग्वेद के दशम मण्डलि मे महिषर अित्र के तपर्स्या अनुष्ठान का वणर न है एवं
अियोश्वनीकुमारो ने इन्हे यौवन प्रतदान िकया इस तथ्य को व्यक िकया गया है.
ऋषग्वेद के पर्ंचलम मण्डलि मे वसूयु, सपविध नामक अनेक पर्ुत्रो को ऋषिष अित्र के पर्ुत्र कहा गया है. ऋषग्वेद के
पर्ंचलम ‘आत्रेय मण्डलि′, ‘कल्याण सूक’ ऋषग्वेदीय ‘स्वियोस्त-सूक’ महिषर अित्र द्वारा रिचलत है यह सूक
मांगिलिक कायो ं, शुभ संस्कारो तथा पर्ूजा, अनुष्ठानो मे पर्िठत होते है इन्होने अलिकर, प्रतह्लाद आिद को िशका
भी दी थी. महिषर अित्र त्याग, तपर्स्या और संतोष के गुणो से युक एक महान ऋषिष हु ए.

विशष्ठ ऋषिष
विशष्ठ ऋषषी प्रताचलीन वैिदक कालि के पर्ूणरज्ञानी, महान तेजस्वी, ित्रकालिदशी, तपर्स्वी तथा मंत्र यज्ञ िवदा के
ज्ञानी थे िजनके बारे मे प्रताचलीन िहंद ु धमर ग्रंथो मे िवस्तार पर्ूवरक उल्लेख िकया गया है वेदो, पर्ुराणो से लिेकर
रामायण, महाभारत आिद मे ऋषिष विसष्ठ के महत्व तथा उनकी कायर कुशलिता को अिभव्यक िकया गया है

ऋषिष विशष्ठ को वेदो मे िमत्र एवं वरुण के पर्ुत्र कहे गए है विशष्ठ ऋषिष संस्कृित सृषाओं मे एक अपर्ूवर सृषा कहे
गए है. मुिन विसष्ठ को ब्रह्मा का मानस पर्ुत्र कहा गया तथा प्रतजापर्ितयो मे एक कहा गया है,

विशष्ठ ऋषिष जन्म कथा | Birth Story of Rishi vashiatha
वेद, इितहास, पर्ुराणो मे महिषर विशष्ठ की उत्पर्ित्त का वणर न िविभन रूपर्ो मे प्रताप होता है, कुछ मे इन्हे ब्रह्मा
के मानस पर्ुत्र कहा गया है तो कही िमत्रावरुण के पर्ुत्र और कही अिगपर्ुत्र कहा गया है, स्वयंभू मन्वंतर मे इन्हे
ब्रह्मा की प्रताणवायु से उत्पर्न माना गया बाद के वैवस्वत मन्वंतर मे ब्रह्मा के मानस पर्ुत्र के रूपर् मे अिग के
मध्य भाग से उत्पर्न हु ए माना गया तो दस
ू री ओर यज्ञ के ऋषियोत्वज पर्द को लिेकर िनिमराजा एवं इनके मध्य
मतभेद उत्पर्न होते है िजसके पर्िरणाम स्वरूपर् दोनो एक दस
ू रे को श्रापर् देते हे और दोनो की आत्मा शरीर
त्याग कर ब्रह्मलिोक मे चललिी जाती है इसके अितिरक ऋषिष विसष्ठ का अन्य जन्म, िमत्रावरुण के द्वारा होता है
जब यह उवर शी को देखकर उसपर्र मोिहत हो जाते है और इस प्रतकार इनका जन्म होता है.

विसष्ठ ऋषिष की जीवनी
विशष्ठ ऋषिष के अनेक महत्वपर्ूणर कायो ं का वणर न धमर ग्रंथो मे देखा जा सकता है इसमे एक बार जब ब्रह्मा जी
ने इन्हे मृत्युलिोक मे जाकर सृिष का िवस्तार करने तथा सूयरवंश का पर्ौरोिहत्य कमर करने की आज्ञा दी, तब
इन्होने इस कायर को करने मे अपर्नी असमथर ता व्यक करते है अत: ब्रह्मा जी उनसे कहते है िक इसी वंश मे
आगे चललिकर यह पर्ौरोिहत्य कमर ही तुम्हारी मुिक का मागर होगा और उन्होने पर्ृथ्वी पर्र अवतिरत होते है.
ऋषिष विशष्ठ ने सूयर वंश की अन्य शाखाओं का पर्ुरोिहत कमर छोड़कर केवलि इक्ष्वाकु वंश के राज-गुरु
पर्ुरोिहत के रूपर् मे कायर िकया महिषर विसष्ठ ने सूयरवंश का पर्ौरोिहत्य करते हु ए अनेक लिोक-कल्याणकारी
कायो ं को पर्ूणर िकया तथा दशरथ से पर्ुत्रेिष यज्ञ संपर्न करवाया कराया िजसके द्वारा राजा दशरथ को पर्ुत्र
रत्न रूपर् मे राम, लिक्ष्मण, भरत और शत्रुघन चलार पर्ुत्र प्रताप होते है,
इसके अितिरक ऋषिष विशष्ठ ने अनेको बार अपर्ने तपर्ोबलि से राजा एवं प्रतजा की रका की इन्ही के उपर्देश के
बलि पर्र प्रतेिरत हो कर भगीरथ ने अपर्ने अथक प्रतयासो द्वारा पर्ितत पर्ावन गंगा नदी को पर्ृथ्वी लिोक मे
अवतिरत कराकर लिोगो को मुिक का मागर िदखलिाया, कामघेनु के िलिये विसष्ठ और िवश्वािमत्र के मध्य द्वंद
चललिता रहा, श्री रामजी को ज्ञान एवं शस्त्र शास्त्र की िशका दी तथा भगवान श्री राम के वनवास से लिौटिने के
पर्श्चलात इन्ही के द्वारा उनका राज्यािभषेक हु आ और रामराज्य की स्थापर्ना संभव हो सकी.

विशष्ठ ऋषिष की रचलनाएं
ऋषिष विशष तेजस्वी तपर्स्वी थे ऋषग्वेद के अनेक मंत्रो के द्रिषा विसष्ठ है, सपम मंडलि के द्रिषा भी यही ही माने
जाते है, विसष्ठ के अनेक ग्रंथ देखे जा सकते है योगवािसष्ठ महारामायण, विसष्ठ धमर सूत्र (विसष्ठ स्मृित),
विसष्ठ संिहता जो िक एक शाक ग्रंथ है इसमे ज्योितष के िवषयो पर्र भी िवचलार प्रतस्तुत िकया गया है,
विशष्ठ पर्ुराण, विशष्ठ श्राद्धकल्पर्, विसष्ठ िशका, विशष्ठ तंत्र आिद ग्रंथ देखे जा सकते है. महिषर विशष्ठ जी ने
िहन्द ू धमर एवं सांस्कृितक पर्रम्पर्रा को सुदृढ िकया है सपिषर मे स्थान प्रताप करने वालिे विशष्ठ भारतीय
संस्कृित के सूयर है, इितहास-पर्ुराणो मे महिषर विसष्ठ के चलिरत्र का िवस्तृत वणर न िमलिता है.

पर्ल्हना मं ि दर
पर्ल्हना मंिदर उत्तर प्रतदेश के आजमगढ़ मे ियोस्थत है. पर्ल्हना मंिदर देवी दगु ार के प्रतमुख िसद्ध पर्ीठो मे से एक है
जहां देवी दगु ार माँ पर्ल्हमेश्वरी देवी जी के नाम से जानी जाती है. मां दगु ार के रुपर्ो मे इस तेजो मय रूपर् के
दशर न पर्ाकर श्रद्धालिु भक जन समस्त दख
ु ो से दरू हो एक आियोत्मक शांित को प्रताप करते है. मां के दशर नो की
एक झलिक प्रताप करने के िलिए अनेको भक गण देश के कोने-कोने से यहाँ पर्हु ँचलते है.
माँ पर्ल्हमेश्वरी देवी िसद्ध पर्ीठ माता के भको का अनुपर्म धाम है. यहां मां की अलिौिकक जोत सवर दा
प्रतज्विलित रहती है. मां के मंिदर मे सुबह शाम भको का आना जाना लिगा ही रहता है सभी श्रद्धालिु लिोग माता
की आरती समय मां के भजनो का स्मरण कर अपर्ने िलिए सुख एवं शांित की कामना करते है. भावनाओं का
ज्वार उमड़ता रहता है और संपर्ूणर वातावरण भिक के रस मे डू बा रहता है.

पर्ल्हना दे व ी कथा
पर्ल्हना मंिदर माँ दगु ार के प्रतमुख िसद्ध पर्ीठ स्थान है िजससे मां के अदभुत रूपर् के दशर न प्रताप होते है. माता के
इस पर्िवत्र स्थलि से एक पर्ौरािणक कथा भी जुडी हु ई है िजसके अनुसार यहाँ पर्र मां का िदव्य रूपर् प्रतकटि
होता है मां के शिक रूपर् के दशर न होते है. मान्यता है की इस स्थान पर्र माता के चलरणो का िहस्सा िजसे
िपर्ंडिलियो वालिा िहस्सा कहा गया िगरा था.
कहा जाता है िक पर्ौरािणक कालि के कृष्ण युग मे जब मथुरा नरेश कंस अपर्नी मृत्यु के भय से ग्रस्त थे िक
देवकी का आठवां पर्ुत्र उसका कालि बनेगा इस पर्र वह अपर्नी ही बहन देवकी को कारागार मे डालि देता है

और उसकी हर संतान का वध करने लिगता है. जब उसे देवकी के आठवी संतान होने का पर्ता चललिता है तो
कंस उस बच्चले को मारने के िलिए भागा भागा कारागार मे जाता है.
पर्रंतु जब उसे पर्ता चललिता है िक आठवी संतान कन्या रूपर् मे हु ई है तो वह इसे भगवान िवष्णु की चलालि
समझ कर उस कन्या को मारने को उद्दत होता है तथा उस बच्चले को मारने के िलिए आगे बढ़ता है और
कन्या को मारने के िलिए उसे पर्त्थर पर्र पर्टिकने लिगता है तभी उसी कण वह कन्या कंस के हाथो से मुक हो
आकाश मे उड़ जाती है व आकाशवाणी होती है.
हे कंस िजसे तू मारने के िलिए तड़पर् रहा था वह जन्म लिे चलुका है और वही तेरा कालि बनेगा मुझे मारकर तुझे
कुछ भी प्रताप न होगा इतना कहते ही माया रूपर् वह देवी चलारो ओर खंड रूपर् मे िबखर जाती है ओर जहांजहां माता के वह खंड या अंग िगरे थे वह स्थलि िसद्ध पर्ीठ के रूपर् मे पर्ूजे जाने लिगे. अत: उन सब मे एक माँ
पर्ल्हमेश्वरी देवी िसद्ध पर्ीठ भी है जो आजमगढ़ मे ियोस्थत है.

पर्ल्हना मं ि दर कथा
मां पर्ल्हमेश्वरी देवी का यह पर्ल्हना मंिदर सभी भको के िलिए एक पर्ावन धाम है. यह मंिदर माता के उसी
स्थान पर्र बना है जहां माता की पर्ालिथी िगरी थी. मंिदर के संदभर मे एक कथा प्रतचलिलित है िक यहां के पर्ूजा
करने वालिे ब्राह्मणो के पर्ूवरजो को एक बार मां ने सपर्ने मे दशर न देकर आदेश िदया था की वह लिोग इस स्थान
पर्र मंिदर का िनमारण करे
तथा मां की पर्ूजा भिक िक जाए तथा ऐसा होने पर्र इस स्थान का मान बढ़ेगा और उनके वंशजो का कल्याण
होगा तथा सभी भको पर्र मेरी कृपर्ा बरसेगी इस आदेश के पर्श्चलात ब्रह्माणो के पर्ूवरजो ने यहां माता के मंिदर
का िनमारण करवाया. और जो इस मंिदर के पर्ुजारी है उन्ही के वंशज सालिो से इस मंिदर मे पर्ूजा करते आए
है. यही लिोग माँ भगवती की पर्ूजा अचलर ना एवं शृंगार करते है.

पर्ल्हना मं ि दर महत्व
माता के इस मंिदर मे वषर भर श्रद्धालिुओं का तांता लिगा रहता तथा नवरात्रो के पर्ावन समय तो यहां की
रौनक देखते ही बनती है चलारो तरफ मां के जयकारो की गूज
ं सुनाई पर्डती है. नवरात्र के समय भजन,
कीतर न एवं जागरण का आयोजन िकया जाता है. िजसमे सभी लिोग शािमलि होते है इस अवसर पर्र भंडारे
लिगाए जाते है दरू -दरू से लिोग माता के दशर नो के िलिए आते रहते है. मान्यता है की यहां सभी की मनते पर्ूरी
होती है जो माँगो वो वर प्रताप होता है.

राधोपर्िनषद
राधोपर्िनषद देवी राधा जी पर्र आधािरत है उनके रूपर् िचलत्रण एवं शिक स्वरूपर्ा होने का बखान इस
उपर्िनषद मे बहु त ही प्रतभावशालिी रूपर् मे िकया गया है. राधा का नाम प्रतेम के स्वरूपर् को पर्िरभािषत करता है
राधा जी िनश्छलि प्रतेम भिक की एक अदभूत अवधारना है उन्ही के स्वरूपर् को प्रताप करके संपर्ूणर सृिष का
रूपर् िनखरता है. वह जीवो मे आत्म शिक रूपर् मे िवराजमान है उन्ही का आधार पर्ाकर समस्त चललि –
अचललि तत्वो को गुण प्रताप होता है राधा जी ही आदशिक है सृिष का केन्द्रि है.
राधोपर्िनषद मे राधा जी को शिक रूपर् कहा गया है और उनकी उपर्ासना के महत्व को पर्िरलििकत िकया गया
है. ऋषग्वेदीय पर्रंपर्रा से संबंिधत यह राधोपर्िनषद एक महत्वपर्ूणर उपर्िनषद है इसमे सनकािद ऋषिषयो एवं ब्रह्मा
जी के संवाद द्वारा राधा जी के पर्रम शिक रूपर् को व्यक िकया गया है िजसमे सनािदक ऋषिष, ब्रह्माजी के
पर्ास आकर ब्रह्माण की पर्रम शिक के िवषय मे प्रतश्न करते है ऋषिषयो की ज्ञान इच्छा की पर्ूितर करते हु ए ब्रह्मा
जी उन्हे पर्रम शिक के िवषय मे बताते है.

राधोपर्िनषद ज्ञान
सनकािदक ऋषिषयो के प्रतश्न के उत्तर मे ब्रह्मा जी उनसे कहते है िक भगवान श्री कृष्ण जो वृंन्दावन अधीश्वर
है वही जगत के सवेश्वर भी है उन्ही के द्वारा इस संसार को आधार प्रताप हु आ है सभी बंधनो से मुक िनत्य
है, प्रतथम देव मानते हु ए उनकी शिक श्रीराधा जी को सवर श्रेष्ठ शिक कहते है, सवेश्वर कृष्ण की अनेक
शिकयां है जैसे सियोन्धनी, आह्लािदनी ,ज्ञान इच्छा, िक्रया जैसी अनेक शिकयां है और इन सभी मे से
आह्लािदनी शिक को प्रतमुख माना गया है और यही शिक श्री कृष्ण की अंतरंगभूता ‘श्री राधा’ जी है.
श्री राधा जी भगवान श्रीकृष्ण भी इन्हे पर्ूजते है और इनके द्वारा आरािधत होने के कारण इन्हे रािधका कहा
गया है, राधा जी की मिहमामयी शिकय अपर्ार है श्री राधा जी के िचलन्तन-मनन से सभी का कल्याण होता है
साधक इन्हे पर्ूजकर मोक को पर्ाकर पर्रम धाम जाता है. श्री राधा जी शिक स्वरूपर्ा होकर सभी जीवो को
शिक प्रतदान करती है इन्ही के तेज से तीनो लिोक प्रतकाशमान है संसार मे ियोस्थरता का वास है.
श्री राधा जी को अनेक नामो से पर्ूजा जाता है उनके समस्त रूपर् जीव के कल्याण मे सहायक है, प्रतकृित का
संपर्ूणर स्वरूपर् इन्ही मे िनिहत है इन्हे प्रताप करने वालिा जन्म जन्म को पर्ापर्ो से मुक हो सुख व शांित को पर्ाता
है ब्रह्माजी कहते है िक राधा के इन मनोहािरणी स्वरूपर् की स्तुित वेदो मे भी गायी गई है इनके अनेक नामो
के स्मरण द्वारा जीवन मुक हो जाता है.

श्री राधा जी शिक रूपर् मे सृिष की कारण भूता है वह सत, रज, तम के रूपर् मे बिहरंग होने के कारण जड़
कही जाती है इन्हे लिीलिाशिक भी कहा जाता है यह अिवदा रूपर् मे प्रतािण को भौितक बन्धनो मे जकड़ कर
माया का रूपर् लिेती है अत: यह माया रूपर् भी कही गयी है, यह शिक को भगवान की िक्रया शिक है जीसके
द्वारा प्रतभु अनेक लिीलिाएं करते है और संसार को चललिायमान रखते है.

राधोपर्िनषद महत्व
राधोपर्िनषद एक महत्वपर्ूणर उपर्िनषद है िजसमे राधा जी को पर्रम शिक रूपर् मे उल्लेिखत िकया गया है. श्री
कृष्ण के साथ इनका संबंध अटिू टि है इन्ही की प्रतमुख शिक है राधा जी है, राधा प्रतकाश रूपर्ी उज्ज्वलि स्वरूपर्
है िजनके तेज को प्रताप करके संसार को चललिायमान बनाए हु ए है. राधोपर्िनषद का श्रवण मनन करने से
समस्त पर्ापर्ो का कय हो जाते है तथा पर्ुण्य की प्रतािप होती है.

प्रतश्नोपर्िनषद
अथवर वेद की िपर्प्पर्लिाद शाखा के ब्राह्मण भाग से िलिए गए इस उपर्िनषद मे प्रतश्नो को आधार बनाकर इस ग्रंथ
की रूपर् रेखा तैयार िक गई है. इस उपर्िनषद मे ऋषिषयो की िजज्ञासा को दरू करते हु ए महिषर िपर्प्पर्लिाद उनके
सभी प्रतश्नो के उत्तर देते है तथा उन्हे सत्य का बोध कराते है. यह छ: भागो मे िवभािजत है िजसके प्रतत्येक
अध्याय के दो खण्ड है इन छह प्रतश्नो मे िपर्प्पर्लिाद जी ने संपर्ूणर ज्ञान को व्यक िकया है जो अथर की स्पर्षता
के साथ अथर की गंभीरता को भी बनाए रखता है.

प्रतश्नोपर्िनषद प्रतथम प्रतश्न
एक बार सत्यकाम, सुकेशा, भागर व, आश्रलिायन, कबंधी एवं सौयारयणी ऋषिषगण ब्रह्म के ज्ञान को जानने हेतु
तथा वेदो के अध्ययन संबन्धी िजज्ञासा को पर्ूणर करने के िलिए वह ऋषिष िपर्प्पर्लिाद के आश्रम मे आते है.
िपर्प्पर्लिाद ऋषिष उन ऋषिषयो से कहते है िक हे ऋषिषवर आपर् सभी एक वषर तक यहां पर्र िनवास करे तथा
ब्रह्मचलयर व्रत का पर्ालिन करके ध्यान साधना मे िलिप रहे तब मै अपर्को इन सभी प्रतश्नो के उत्तर प्रतदान करूँगा.
िपर्प्पर्लिाद ऋषिष के कथन को सुन कत्य ऋषिष के प्रतपर्ौत्र कबंधी उनसे पर्ूछते है िक हे ऋषिष िपर्प्पर्लिाद मिहम
श्रेष्ठ कृपर्ा कर यह बताएं िक इस सृिष का िनमारण िकसके द्वारा संभव हो पर्ाया, िकसने वास्तव मे जीव को
उत्पर्न िकया कैसे िकसके िवधान द्वारा यह हो पर्ाया कौन इस तत्व का कारण बना है.

महिषर िपर्प्पर्लिद कहते है जीव की उत्पर्ित एवं प्रतजा िक वृिद्ध की इच्छा रखने वालिे प्रतजापर्ित ब्रह्मा जी ने एक
रिय और एक प्रताण नाम के युगलि की रचलना की तथा उनके द्वारा प्रतजा उत्पर्न कराई गई प्रताण का कायर गित
प्रतदान करना था वह गित उत्पर्न करने वालिा चलेतन तत्त्व बना तथा रिय ने उसे धारण िकया और धारण करके
िविवध रूपर् देकर प्रतकृित का िनमारण िकया संसार के समस्त पर्दाथर रिय से ही हु ए. प्रताण एवं रिय के योग से
ब्रह्मा ने िमथुन कमर द्वारा सृिष को उत्पर्न िकया जो उनकी सबसे भव्य रचलना मानी गई है.
यह सूरज वास्तव मे है प्रताण है रिय वास्तव मे चलंद्रिमा है तथा जो सकलि या सूक्ष्म है आकारमय जलि, तेज,
धरा व वायु, व्योम यह पर्ांचल भौितक तत्व मूतर है संसार मे यह सभी रिय है. सूयर का प्रतकश जो पर्ूवर से उिदत
होता िनत्य ही वह चलारो िदशा मे अपर्नी रियोश्मयो को फैलिाता है इसी के द्वारा सभी मे प्रताण का संचलार हो पर्ाता
है समस्त लिोको को अपर्नी िकरनो से मुखिरत करता है इसी के ओज से समस्त जग प्रतकाश मान है जीवन
का आधार है.
जठरािग जो है प्रतािणयो मे ियोस्थत है वह अिग रूपर् मे यह सूयर का ही अंश उन्ही की शिक है. सूयर की िनष्पर्न
शिक द्वारा ही िवश्व मे ियोस्थरता का वास है उसी मे ही सभी कुछ व्यक है आिदत्य के िबना तो संसार मे
जीवन का अियोस्तत्व ही समाप हो जाएगा इसकी शिक अव्यक है. सृिष का आधार है सूयर यह प्रताणो का अित
आिद स्रोत है संसार के सभी प्रताणी सूयर िबन िनष्प्रताण है.
प्रतत्येक महीना वषर का प्रतजापर्ित का रूपर् है रिथ (रिय) उसका कृष्ण पर्क है व शुक्लि प्रताण स्वरुपर् है. इसी
प्रतकार रात व िदन दोनो प्रतजापर्ित है रात्री रिय है व िदन प्रताण है और जो व्यिक अपर्ने को काम, लिोभ मे ही
रत रखता है उसे प्रतभु की प्रतािप नही हो पर्ाती और न ही मुिक प्रताप होती है वह अपर्ने प्रताणो को अपर्ने कीण
करके अपर्ने सभी उिचलत मागर खो बैठता है पर्रंतु जो जीव अपर्ने कत्वर यो को शास्त्रोक िविध द्वारा संपर्न
करता है वही श्रेष्ठता को पर्ाता है.
अन ही है प्रतजापर्ित का रूपर् है यह अन ही जीव का प्रताण है तथा इस अन से ही वीयर का िनमारण हो पर्ाता है
िजससे प्रताणी की उत्पर्ित होती है. िजनमे ब्रह्मचलयर एवं सत्य िनष्ठा पर्ूणर वास होता है उन्हे ही इस ब्रह्म लिोक के
दशर न हो पर्ाते है तथा जो छलि कपर्टि एवं प्रतपर्ंचल िबना राग द्वेष से दरू रहकर मोह माया का त्याग करते है उन्हे
ही ईश्वर की प्रतािप होती है वही मोक के भागी बनते है.

प्रतश्नोपर्िनषद िद्वतीय प्रतश्न
िद्वतीय प्रतश्न मे प्रताण के रूपर् िनरूपर्ण िकया गया है तथा उसे देह का प्रतकाशक धारियता एवं सब इंिद्रियो से
श्रेष्ठ माना गया है. महिषर िपर्प्पर्लिाद के िवचलारो को सुनकर मुनी कुछ शांत हु ए उनके एक प्रतश्न का उत्तर तो

उन्हे प्रताप हो चलुका था अत: अब ऋषिष भागर व जी िपर्प्पर्लिाद जी से पर्ूछते है िक हे ऋषिषवर अब आपर् हमे यह
बताइए की प्रतजा को धारण करने वालिे देवगणो की िकतनी संख्या है तथा इन सभी देवो मे कौन है जो सबसे
विरष्ठ है.
इस प्रतश्न क उत्तर देते हु ए महिषर िपर्प्पर्लिाद कहते है िक जलि, अिग, वायु, आकाश, पर्ृथ्वी, मन, प्रताण, श्रोत्र
वाणी और नेत्र आिद सभी देवता है यही जीव और जीवन के के आश्रयदाता है. और जो इन सभी को बांधे
रखता है वही सबसे श्रेष्ठ है और वह सभी देवताओं मे प्रताण ही सवर श्रेष्ठ है. सभी इियोन्द्रियां प्रताण के आश्रय मे ही
रहती है . प्रताण अित श्रेष्ठतम है प्रताण स्वयं को ही पर्ांचल भागो मे िवभािजत कर देता है तथा अन्य उसे धारण
करके उसी को जीते है इसी से प्रताण प्रतमुख होता है तथा प्रताण की प्रतभुता िसद्ध है मन ,श्रोत्र ,वाणी , नेत्र सभी
देव उनके स्वत्व से आबद्ध है.
अिग रूपर् मे प्रताण ही िदनमान है वायु इन्द्रि पर्ृथ्वी, देव रिय भी प्रताण ही है. सत असत से भी श्रेष्ठ जो पर्रमात्मा
है वह भी प्रताण है सृिष जग की समस्त साियोत्वक पर्िवत्र िक्रयाये प्रताण मे ही िवलिीन है. हे प्रताण तू ही त्रैलिोक का
स्वामी है तू ही इन्द्रि है संहार कतार है प्रतलिय है तू ही रूद्रि है सूयर तू, पर्ृ़्थ्वी तू, चलन्द्रि, तारे, आकाश भी तू ही
है सभी का रकक एवं पर्ोषक तू ही सभी मे िवदमान है समस्त लिोको मे, दृश्य जगत मे जो भी कुछ दृषव्य है
वह सभी कुछ प्रताण के ही अधीन है और प्रताण ही उसका गंतव्य है.
अत: प्रताण से यही िवनती है हे प्रताण तुम कल्याणमय होकर रहो सभी मे ियोस्थत रहो तुम रका करो, पर्ोषण
करो, कायर कमता दो तथा प्रतज्ञा का संप्रतेषण करो यही आपर्से िवनती है हमारी.

प्रतश्नोपर्िनषद तीसरा प्रतश्न
अब कौसल्य आश्वलिायन जी महिषर िपर्प्पर्लिाद से पर्ूछते है की सबसे श्रेष्ठ इस प्रताण की उत्पर्ित्त कहां से होती
है. िकस प्रतकार प्रताण देह मे प्रतवेश कर पर्ाता है तथा प्रताण कैसे शरीर से बाहर िनकलि जाता है तथा कैसे दोनो
के मध्य रहता है.
इस प्रतश्न को सुन महिषर िपर्प्पर्लिाद उनसे कहते है िक हे मुनीवर यह श्रेष्ठ तत्व प्रताण आत्मा द्वारा उत्पर्न होता
है िजस प्रतकार शरीर की छाया उसी से उत्पर्न होकर उसी मे समाती है वैसे ही प्रताण आत्मा से प्रतकटि होता है
तथा अंत मे उसी मे िविलिन हो जाता है. यह प्रताण मन के संकल्पर् से शरीर मे प्रतवेश प्रताप कर पर्ाता है और
मृत्यु समय प्रताण आत्मा के साथ ही देह से बाहर िनकलिकर अन्य योिनयो मे समाने चललिा जाता है.

चलन्द्रि षष्ठी
यह व्रत भाद्रिपर्द माह मे कृष्णपर्क की षष्ठी को मनाया जाता है. यह व्रत कंु वारी कन्याओं द्वारा रखा जाता है.
कई स्थानो पर्र वह लिड़िकयाँ भी इस व्रत को रखती है िजनके िववाह का पर्हलिा वषर होता है.

व्रत िविध
इस िदन कंु वारी लिड़िकयाँ और िववाह के पर्हलिे सालि वालिी लिड़िकयाँ सुबह सूयर िनकलिने से पर्हलिे उठ
जाती है. िफर िकसी तालिाब, कुएं , जोहड़ अथवा बावडी़़ पर्र नहाती है. वतर मान समय मे अिधकतर
लिड़िकयाँ अब घर मे ही स्नान करती है. नहा-धोकर मंिदर मे पर्ूजा करती है. सारा िदन उपर्वास रखती है.
संध्या समय मे लिकडी़़ के एक पर्ाटिे पर्र जलि का लिोटिा अथवा छोटिा सा कलिश रखती है. उस लिोटिे अथवा
कलिश पर्र सितया बनाया जाता है. लिोटिे पर्र सात सितये बना सकते है. एक सितया बनाकर सात िबन्दी भी
लिगा सकते है. उसके बाद हाथ मे गेहूं अथवा चलावलि के दाने लिेकर कहानी सुनी जाती है.
कई स्थानो पर्र हाथ मे गेहूँ के सात दाने लिेकर कहानी सुनी जाती है. कहानी सुनते समय कुछ दिकणा भी
जलि के लिोटिे पर्र रखी जाती है. कहानी सुनने के पर्श्चलात दिकणा ब्राह्मण को दे दी जाती है. कहानी सुनने के
बाद लिोटिे के जलि को एक सुरिकत स्थान पर्र रखा जाता है. राित्र मे उसी जलि से चलन्द्रिमा को अध्यर िदया
जाता है. अध्यर देने के बाद ही भोजन ग्रहण िकया जाता है.

व्रत का महत्व
यह व्रत कंु वारी लिड़िकयो द्वारा रखा जाता है. वह इस व्रत को अच्छा घर तथा वर पर्ाने के िलिए करती है.
िववाह के पर्हलिे सालि वालिी लिड़िकयाँ भी इस व्रत को करती है. वह इसे अपर्ने सुख तथा सौभाग्य मे वृिद्ध की
कामना के िलिए करती है.

चलन्द्रि षष्ठी की कथा
प्रताचलीन समय मे िकसी नगर मे एक साहू कार अपर्नी पर्त्नी के साथ रहता था. साहू कारनी मािसक धमर होने
पर्र भी घर के सभी बतर नो को स्पर्शर करती रहती थी. समय बीतने पर्र दोनो मर जाते है. साहू कार बैलि योिन

मे जाता है और साहू कारनी कुितया की योिन मे जाती है. बैलि और कुितया की योिन मे दोनो अपर्ने ही पर्ुत्र के
घर मे रहने लिगते है. बैलि सारा िदन खेतो मे काम करता है और कुितया घर की रखवालिी करती है.
एक िदन उस लिड़के के िपर्ता अथारत साहू कार का श्राद्ध आया. लिड़के की बहु ने खीर पर्ूरी बनाई. जब वह
दस
ू रा काम कर रही थी तब एक चलीलि आई और मरा हु आ साँपर् खीर मे डालिकर चललिी गई. कुितया यह सब
देख रही थी. उसने सोचला िक जो भी ब्राह्मण इस खीर को खाएगा, वह मर जाएगा. यह सोचलकर वह कुितया
िचलल्लाने लिगी. बहु ने देखा तो वह कुछ समझ नही पर्ाई और उसने सोचला िक कुितया ने जलिती हु ई खीर मे
मुँह डालि लिी है और इसी कारण वह िचललिा रही है. उसने गुस्से मे जलिती हु ई लिकडी़़ उठाई और कुितया
की रीढ़ की हड्डी पर्र दे मारी. इससे कुितया की रीढ़ की हड्डी टिू टि गई. बहु ने सारा खाना फेक िदया और
दबु ारा खाना बनाया. सभी ब्राह्मण खाना खाकर चललिे गए.
उस िदन बहु ने गुस्से मे कुितया को खाना नही िदया. रात मे कुितया तथा बैलि आपर्स मे बाते करने लिगे.
कुितया कहने लिगी िक आज तुम्हारा श्राद्ध था. तुम्हे तो खाना िमलि गया लिेिकन मुझे आज भूखा ही रहना
पर्डा़़. बैलि कहने लिगा िक आज तो मुझे भी खाना नही िमलिा है और आज पर्हलिे की तुलिना मे अिधक काम
करना पर्डा़़. उन दोनो की यह बाते बहु तथा बेटिा सुन रहे थे. दोनो सुबह पर्ियोण्डत के पर्ास गए और पर्ूछा िक
हमारे माँ-बापर् कौन सी योिन मे है. पर्ियोण्डत ने कहा िक आपर्के िपर्ता बैलि योिन मे और माता कुितया योिन मे
है. तब उन्होने बैलि तथा कुितया योिन मे अपर्ने माता-िपर्ता को भरपर्ेटि भोजन कराया.
पर्ियोण्डत जी से उनकी योिन छूटिने का उपर्ाय बेटिे ने पर्ूछा तो पर्ियोण्डत जी ने बताया िक भाद्रिपर्द माह मे कृष्ण
पर्क की षष्ठी ितिथ को लिड़िकयाँ चलन्द्रि षष्ठी का व्रत करती है और रात मे चलन्द्रिमा को अध्यर देती है. जब वह
अध्यर दे तब आपर् अपर्ने माता-िपर्ता को उस जलि के नीचले खडा़़ कर दे. उस जलि के प्रतभाव से इनको
अपर्नी इस योिन से छुटिकारा िमलि जाएगा. बेटिे ने ऎसा ही िकया. उसके माता-िपर्ता को बैलि तथा कुितया की
योिन से छुटिकारा िमलि गया और उन्हे मोक की प्रतािप हु ई. बाद मे उन्हे मनुष्य की योिन िमलि गई. ऎसा माना
जाता है िक जो भी इस कहानी को पर्ढ़ता या सुनता है उन्हे भगवान का आशीवारद िमलिता है और मुिक प्रताप
होती है.

भीष्म पर्ं चल क
भीष्म पर्ंचलक को पर्ंचल भीखू के नाम से भी जाना जाता है. काितर क माह मे भीष्म पर्ंचलक व्रत का िवशेष महत्व है.
यह व्रत काितर क शुक्लि एकादशी से आरंभ होता है तथा पर्ूिणर मा तक चललिता है. इस बार 6 नवंबर से भीष्म
पर्ंचलक व्रत का आरंभ होगा और दस नवंबर पर्ूिणर मा तक यह व्रत रहेगा. काितर क स्नान का बहु त महत्व होता

है. अत: काितर क सनान करने वालिे सभी लिोग इस व्रत को करते है. भीष्म िपर्तामह जी ने भी इस व्रत को
िकया था इसिलिए यह भीष्म पर्ंचलक नाम से प्रतिसद्ध हु आ

भीष्म पर्ं चल क व्रत कथा
महाभारत युद्ध के बाद जब पर्ांण्डवो की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पर्ांण्डवो को भीष्म िपर्तामह के
पर्ास लिे गये और उनसे अनुरोध िकया िक वह पर्ांण्डवो को ज्ञान प्रतदान करे. शर सैय्या पर्र लिेटिे हु ए सूयर के
उत्तरायण होने की प्रतितका कर रहे भीष्म ने कृष्ण के अनुरोध पर्र कृष्ण सिहत पर्ाण्डवो को राज धमर , वणर
धमर एवं मोक धमर का ज्ञान िदया. भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम एकादशी से लिेकर पर्ूिणर मा ितिथ यािन पर्ांचल
िदनो तक चललिता रहा. भीष्म ने जब पर्ूरा ज्ञान दे िदया तब श्री कृष्ण ने कहा िक आपर्ने जो पर्ांचल िदनो मे ज्ञान
िदया है यह पर्ांचल िदन आज से अित मंगलिकारी हो गया है. इन पर्ांचल िदनो को भिवष्य मे भीष्म पर्ंचलक व्रत के
नाम से जाना जाएगा.

भीष्म पर्ं चल क व्रत पर्ूज ा िविध
भीष्म पर्ंचलम व्रत मे चलार द्वार वालिा एक मण्डपर् बनाया जाता है. मंडपर् को गाय को गोबर से लिीपर् कर मध्य मे
एक वेदी का िनमारण िकया जाता है. वेदी पर्र ितलि रखकर कलिश स्थािपर्त िकया जाता है. इसके बाद
भगवान वासुदेव की पर्ूजा की जाती है. इस व्रत मे काितर क शुक्लि एकादशी से लिेकर काितर क पर्ूिणर मा ितिथ
तक घी के दीपर्क जलिाए जाते है. भीष्म पर्ंचलक व्रत करने वालिे को पर्ांचल िदनो तक संयम एवं साियोत्वकता का
पर्ालिन करते हु ए यज्ञािद कमर करना चलािहए. इस व्रत मे गंगा पर्ुत्र भीष्म की तृिप के िलिए श्राद्ध और तपर्र ण का
भी िवधान है.

पर्ं चल भीखू कथा
पर्ंचल भीखू व्रत मे एक कथा का भी उल्लेख आता है. इस कथा के अनुसार एक नगर मे एक साहू कार था. इस
साहू कार की पर्ुत्रवधु बहु त ही संस्कारी थी. वह काितर क माह मे बहु त ही पर्ूजा-पर्ाठ िकया करती थी. काितर क
माह मे वह ब्रह्म मुहुतर मे ही गंगा स्नान के िलिए जाती थी. िजस नगर मे वह रहती थी, उस नगर के राजा का
बेटिा भी गंगा स्नान के िलिए जाता था. उसके अंदर बहु त अहंकार भरा था. वह कहता िक कोई भी व्यिक
उससे पर्हलिे गंगा स्नान नही कर सकता है.

जब काितर क स्नान के पर्ांचल िदन रहते है तब साहू कार की पर्ुत्रवधु स्नान के िलिए जाती है. वह जल्दबाजी मे
हार भूलि जाती है और वह हार राजा के लिड़के को िमलिता है. हार देखकर वह उस स्त्री को पर्ाना चलाहता है.
इसके िवषय मे यह कहा गया है िक वह तोता रखता तािक वह उसे बता सके िक साहू कार की पर्ुत्रवधू आई
है. लिेिकन साहू कार की पर्ुत्रवधु भगवान से अपर्ने पर्ितव्रता धमर की रका करने की प्रताथर ना करती है.
भगवान उसकी रका करते है और रोज रात मे साहू कार के बेटिे को नीद आ जाती है. जब सुबह तोते से
पर्ूछता है तब वह कहता है िक वह स्नान करने आई थी. पर्ांचल िदन स्नान करने बाद वह तोते से कहती है िक
मै पर्ांचल िदन तक स्नान कर चलुकी हू ं तुम अपर्ने स्वामी से मेरा हार लिौटिाने को कह देना. राजा के पर्ुत्र को
समझ आया िक वह िकतनी श्रद्धालिु है. कुछ समय बाद उसे कोढ़ हो जाता है.
राजा को जब कोढ़ होने का कारण पर्ता चललिता हे तब वह इसके िनवारण का उपर्ाय ब्राह्मणो से पर्ूछता है.
ब्राह्मण कहते है िक यह साहू कार की पर्ुत्रवधु को अपर्नी बहन बनाए और उसके नहाए हु ए पर्ानी से स्नान करे
तब यह ठीक हो सकता है. राजा की प्रताथर ना को साहू कार की पर्ुत्रवधु स्वीकार कर लिेती है और राजा का पर्ुत्र
ठीक हो जाता है.

पर्ं चल भीखू व्रत महत्व
यह व्रत अित मंगलिकारी और पर्ुण्यदायी होता है. जो श्रद्धापर्ूवरक इस व्रत को रखेगे उन्हे मृत्य पर्श्चलात उत्तम
गित प्रताप होगी. यह व्रत पर्ूवर संिचलत पर्ापर् कमो ं से मुिक प्रतदान करने वालिा और कल्याणकारीहोता है. जो भी
यह व्रत रखता है वह सदैव स्वस्थ रहता है तथा उसे प्रतभु का आशीवारद प्रताप होता है. स्वयं भीष्म िपर्तामह
जी ने भी इस व्रत को िकया था.

करक चलतुथ ी
करक चलतुदरशी व्रत काितर क माह की कृष्ण पर्क की चलतुथी के िदन मनाया जाता है. करक चलतुदरशी को करवा
चलौथ के नाम से भी जाना जाता है. करक चलतुदरशी का यह पर्िवत्र पर्वर सौभाग्यवती(सुहािगन) िस्त्रयाँ मनाती
है. पर्ित की दीघारयु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्रतािप के िलिए इस िदन चलंद्रिमा की पर्ूजा की जाती है. इसी के
साथ देवी गौरी भगवान िशव एवं गणेश जी की पर्ूजा अचलर ना की जाती है. करवाचलौथ के िदन उपर्वास रखकर
राित्र समय चलन्द्रिमा को अ‌घ्यर देने के उपर्रांत ही भोजन करने का िवधान है. करक चलतुदरशी या करवा चलौथ
मुख्यत: भारत के अनेक िविभन भागो मे उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस वषर करक चलतुदरशी या
करवाचलौथ 2 नवम्बर िदन शुक्रवार को मनाया जाएगा.

करक चलतुथ ी कथा
करक चलतुदरशी के संदभर मे एक कथा प्रतचलिलित है िजसके अनुसार, करवा नाम की एक स्त्री थी वह बहु त
पर्ितव्रता थी. वह अपर्ने पर्ित के साथ तुगं भद्रिा नदी के पर्ास एक गाँव मे रहती थी. एक बार करवा का पर्ित
नदी के िकनारे कपर्ड़े धो रहा था होता है. तभी अचलानक वहां एक मगरमच्छ आता है और वह उसके पर्ित
का पर्ाँव अपर्ने मुँह मे दबा लिेता है तथा उसे नदी मे खीचलकर लिे जाने लिगता है. तब उसका पर्ित जोर जोर से
अपर्नी पर्ियोत्न को करवा, करवा, करवा कह के मदद के िलिए पर्ुकारने लिगता है. पर्ित की आवाज सुन कर
करवा भागी भागी वहां पर्हु चल
ं ी है.
पर्ित को मगर के चलंगुलि मे फंसा देख मगर को कच्चले धागे से बाँध देती है व यमराज से पर्ित के जीवन की रका
करने को कहती है. करवा की कुरूण व्यथा देख कर यमराज उनसे कहते है की वह मगर को मृत्यु नही दे
सकते क्योिक उसकी आयु शेष है, पर्रंतु करवा के पर्ित-धमर को देख यमराज मगरमच्छ को यमपर्ुरी भेज देते
है. करवा के पर्ित को दीघारयु प्रताप होती है तथा यमराज करवा को प्रतसन हो उसे वरदान देते है. िक जो भी
स्त्री काितर क कृष्ण पर्क की चलतुथी को व्रत का पर्ालिन करेगी वह सौभाग्यवती होगी. तब से करवा-चलौथ व्रत
को मनाने की पर्रंपर्रा चललिी आ रही है.
धमर ग्रंथो मे एक महाभारत से संबंिधत अन्य पर्ौरािणक कथा का भी उल्लेख िकया गया है. इसके अनुसार
पर्ांडव पर्ुत्र अजुरन तपर्स्या करने नीलििगरी पर्वर त पर्र चललिे जाते है व दस
ू री ओर पर्ांडवो पर्र कई प्रतकार के
संकटिो से आन पर्ड़ते है. यह सब देख द्रिौपर्दी िचलंता मे पर्ड़ जाती है वह भगवान श्री श्रीकृष्ण से इन सभी
समस्याओं से मुक होने का उपर्ाय पर्ूछती है
श्री कृष्ण द्रिौपर्दी से कहते है िक यिद वह काितर क कृष्ण चलतुथी के िदन करवा चलौथ का व्रत रहे तो उसे इन
सभी संकटिो से मुिक िमलि सकती है. भगवान कृष्ण के कथन अनुसार द्रिौपर्दी िविध िवधान सिहत करवा
चलौथ का व्रत रखती है िजससे उनके समस्त कष दरू हो जाते है

करक चलतुथ ी । करवा चलौथ पर्ूज ा
काितर क माह िक कृष्ण चलन्द्रिोदयव्यािपर्नी चलतुथी के िदन िकया जाने वालिा करक चलतुथी व्रत िस्त्रयां अखंड़
सौभाग्य की कामना के िलिए करती है. इस व्रत मे िशव-पर्ावर ती, गणेश और चलन्द्रिमा का पर्ूजन िकया जाता है.
इस शुभ िदवस के उपर्लिक्ष्य पर्र सुहािगन िस्त्रयां पर्ित की लिंबी आयु की कामना के िलिए िनजर लिा व्रत रखती
है. पर्ित-पर्त्नी के आियोत्मक िरश्ते और अटिू टि बंधन का प्रततीक यह करवाचलौथ या करक चलतुथी व्रत संबंधो मे

नई ताजगी एवं िमठास लिाता है. करवा चलौथ मे सरगी का काफी महत्व है. सरगी सास की तरफ से अपर्नी
बहू को िद जाने वालिी आशीवारद रूपर्ी अमूल्य भेटि होती है
सरगी के रूपर् मे सास अपर्नी बहू को िविभन खाद पर्दाथर एवं वस्त्र इत्यािद देती है. यह सरगी, सौभाग्य और
समृिद्ध का रूपर् होती है. सरगी के रूपर् मे खाने की वस्तुओं को जैसे फलि, मीठाई आिद को व्रती मिहलिाएं
व्रत वालिे िदन सूयोदय से पर्ूवर प्रतात: कालि मे तारो की छांव मे ग्रहण करती है. तत्पर्श्चलात व्रत आरंभ होता है.
इस िदन िस्त्रयां साज, श्रृंगार करती है हाथो मे मेहदी रचलाती है और पर्ूजा के समय नए वस्त्र पर्हनती है
शाम को कथा सुनने के बाद अपर्नी सासु माँ के पर्ैर छूकर आशीवारद लिेती है और उन्हे करवा समेत अनेक
उपर्हार भेटि करती है. राित्र समय चलांद िनकलिने के पर्श्चलात अनेक पर्कवानो से करवा चलौथ की पर्ूजा की जाती
है तथा चलांद को अध्यर देकर उसकी पर्ूजा करते है. चलंद्रि दशर न के बाद पर्ित का चलेहरा देखकर पर्त्नी, पर्ित के
हाथो से जलि पर्ीती है और अपर्ने व्रत को पर्ूणर करती है.

नवरात्र मे कन्या-पर्ूज न
श्री दगु ार पर्ूजा वषर मे दो बार चलैत्र व अियोश्वन माह के शुक्लि पर्क की प्रतितपर्दा से आरंभ होकर नवमी ितिथ तक
मनाई जाती है. चलैत्र मास के नवरात्र को ‘वािषर क नवरात्र’ और अियोश्वन माह के नवरात्र को शारदीय नवरात्र
कहा जाता है. इन िदनो नवरात्र मे शास्त्रो के अनुसार कन्या या कुमारी पर्ूजन िकया जाता है. जो इस प्रतकार
है, एक कन्या का पर्ूजन करने से ऐश्वयर की प्रतािप होती है, दो कन्याओं का पर्ूजन करने से भोग और मोक की
प्रतािप होती है.
तीन कन्याओं की पर्ूजा करने से धमर , अथर व काम, चलार कन्याओं की पर्ूजा से राज्यपर्द, पर्ांचल कन्याओं की
पर्ूजा करने से िवदा, छ: कन्याओं की पर्ूजा द्वारा छ: प्रतकार की िसिद्धयां प्रताप होती है. सात बािलिकाओं की
पर्ूजा द्वारा राज्य की, आठ कन्याओं की पर्ूजा करने से धन-संपर्दा तथा नौ कन्याओं की पर्ूजा से पर्ृथ्वी
प्रतभुत्व की प्रतािप होती है, कुमारी पर्ूजन मे दस वषर तक की कन्याओं का िवधान है.

पर्ूज न िविध
नवराित्र के पर्ावन अवसर पर्र अषमी तथा नवमी के िदन कुमारी कन्याओं का पर्ूजन िकया जाता है. कन्या या
कंजक पर्ूजन मे सामथ्यर के अनुसार इन नौ िदनो तक अथवा नवराित्र के अंितम िदन कन्याओं को भोजन के
िलिए आमंित्रत करते है. एक से दस वषर तक की कन्याओं का पर्ूजन िकया जाता है. इससे अिधक उम की

कन्याओं को देवी पर्ूजन मे विजर त माना गया है. कन्याओं की संख्या नौ हो तो उत्तम होती है अन्यथा कम से
कम दो कन्या तो अवश्य होनी ही चलािहए.

कु मारी पर्ूज न
दो वषर की कन्या को कुमारी कहा जाता है. इनका पर्ूजन करने से द ु:ख-दिरद्रिता दरू हो जाती है.

ित्रमूि तर पर्ूज न
तीन वषर की कन्या को ित्रमूितर कहते है. ित्रमूितर पर्ूजा से धमर , अथर , काम की िसिद्ध प्रताप होती है.
नमस्कार मंत्र – ित्रमूतयै नम:
ित्रमूितर के पर्ूजन का मंत्र – सत्त्‍‌वािदिभिस्त्रमूितर यारतिै हर नानास्वरूिपर्णी।
ित्रकालिव्यािपर्नीशिकिस्त्रमूितर पर्ूजयाम्यहम्॥

कल्याणी पर्ूज न
चलार वषर की बािलिका को कल्याणी कहा जाता है. कल्याणी की पर्ूजा द्वारा िवदा, िवजय तथा समस्त
कामनाओं की पर्ूितर होती है.
नमस्कार मंत्र – कल्याण्यै नम:
कल्याणी के पर्ूजन का मंत्र- कल्याणकािरणीिनत्यंभकानांपर्ूिजतािनशम्।
पर्ूजयािमचलतांभक्त्याकल्याणीम्सवर कामदाम्॥

रोिहणी पर्ूज न
पर्ांचल वषर की कन्या को रोिहणी कहते है. रोिहणी की पर्ूजा करने से अच्छे स्वास्थ्य की प्रतािप होती है तथा
रोग दरू होते है.
नमस्कार मंत्र – रोिहण्यै नम:

रोिहणी का पर्ूज न का मं त्र
रोहयन्तीचलबीजािनप्रताग्जन्मसंिचलतािनवै।या देवी सवर भूतानांरोिहणीम्पर्ूजयाम्यहम्॥

कािलिका पर्ूज न
छ:वषर की कन्या को कािलिका कहा जाता है. शत्रु का शमन तथा िवरोिधयो को पर्रास्त करने के िलिए
कािलिका का पर्ूजन करना चलािहए.
नमस्कार मंत्र – कािलिकायै नम:
कािलिका के पर्ूजन का मंत्र- कालिी कालियतेसवर ब्रह्माण्डंसचलराचलरम्।कल्पर्ान्तसमयेया
तांकािलिकाम्पर्ूजयाम्यहम॥

चलियोण्डका पर्ूज न
सात सालि की कन्या को चलियोण्डका कहते है. इनके पर्ूजन से धन-सम्पर्ित्त की प्रतािप होती है,
नमस्कार मंत्र- चलियोण्डकायै नम:

चलियोण्डका पर्ूजन का मंत्र
चलियोण्डकांचलण्डरूपर्ांचलचलण्ड-मुण्डिवनािशनीम्।तांचलण्डपर्ापर्हिरणीचलियोण्डकांपर्ूजयाम्यहम्॥

शाम्भवी पर्ूज न
आठ वषर की कन्या को शाँभवी कहा जाता है. शांभवी की पर्ूजा द्वारा िनधर नता दरू होती है, व्यिक को वादिववाद मे िवजय प्रताप होती है.
नमस्कार मंत्र – शाम्भव्यै नम:

शाम्भवी पर्ूज न मं त्र
अकारणात्समुत्पर्ित्तयर न्मयै:पर्िरकीितर ता।यस्यास्तांसुखदांदेवीशाम्भवीपर्ूजयाम्यहम्॥

द गु ार पर्ूज न
नौ वषर की कन्या को दगु ार कहते है, जो भको को संकटि से बचलाती है, किठन कायर को िसिद्ध करती है, इनकी
पर्ूजा करने से साधक को िकसी प्रतकार का भय नही सताता.
नमस्कार मंत्र – दगु ारयै नम:

द गु ार पर्ूज न मं त्र
दगु ारत्त्रायितभकंया सदा दगु ारितर नािशनी।दज्
ु रञेयासवर देवानांतांदगु ारपर्ूजयाम्यहम्॥

सुभ द्रिा पर्ूज न
दस वषर की कन्या को सुभद्रिा कहते है यह भको का कल्याण करती है. इनकी पर्ूजा से लिोक-पर्रलिोक दोनो मे
सुख प्रताप होता है.
नमस्कार मंत्र – सुभद्रिायै नम:

सुभ द्रिा के पर्ूज न का मं त्र
सुभद्रिािण चलभकानांकुरुतेपर्ूिजतासदा। अभद्रिनािशनीदेवीसुभद्रिांपर्ूजयाम्यहम्॥
यह नौ कन्याएं नवदगु ार की साकात् प्रतितमूितर है.
कन्या पर्ूजन मे सवर प्रतथम कन्याओं के पर्ैर धुलिाकर उन्हे आसन पर्र एक पर्ंिक मे िबठाते है. मंत्र द्वारा कन्याओं
का पर्ंचलोपर्चलार पर्ूजन करते है. िविधवत कंु कुम से ितलिक करने के उपर्रांत छोटिी बच्चलीयो की कलिाईयो पर्र
कलिावा बांधा जाता है. इसके पर्श्चलात उन्हे हलिवा, पर्ूरी तथा रुिचल के अनुसार भोजन कराते है. पर्ूजा करने के
पर्श्चलात जब कन्याएं भोजन ग्रहण कर लिे तो उनसे आशीवारद प्रताप करे तथा यथासामथ्यर कोई भी भेटि तथा

दिकणा दे कर िवदा करे.इस प्रतकार िविध-िवधान द्वारा कन्या पर्ूजन करने से माँ भगवती अत्यंत प्रतसन होती
है तथा भको को सांसािरक कषो से मुिक प्रतदान करती है.

बै कु ण्ठ चलतुदर श ी
काितर क माह की शुक्लि पर्क की चलतुदरशी को बैकुण्ठ चलतुदरशी के नाम से जाना जाता है. इसे वैकुण्ठ चलौदस
भी कहते है. इस िदन श्रद्धालिुजन व्रत रखते है. यह व्रत काितर क शुक्लि चलतुदरशी, जो अरुणोदयव्यािपर्नी हो,
के िदन मनाया जाता है. इस चलतुदरशी के िदन यह व्रत भगवान िशव तथा िवष्णु जी की पर्ूजा करके मनाया
जाता है. िजस राित्र मे चलतुदरशी अरुणोदयव्यािपर्नी हो, उस राित्र मे व्रत-उपर्वास रखा जाता है. अगलिे
अरुणोदय मे इस व्रत की पर्ूजा तथा पर्ारणा की जाती है.

बै कु ण्ठ चलतुदर श ी की पर्ूज ा
इस िदन सुबह-सवेरे िदनचलयार से िनवृत होकर स्नान आिद करे. उसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करे. भगवान
िवष्णु की िविधवत रुपर् से पर्ूजा – अचलर ना करे. उसके बाद धूपर्-दीपर्, चलन्दन तथा पर्ुष्पर्ो से भगवान का पर्ूजन
तथा आरती करे. इस भको को भगवान िवष्णु की कमलि पर्ुष्पर्ो के साथ पर्ूजा करनी चलािहए और भगवान
िवष्णु का िनमर लि मन से ध्यान करना चलािहए. इस िदन िवष्णु जी के मंत्र जापर् तथा स्तोत्र पर्ाठ करने से
बैकुण्ठ धाम की प्रतािप होती है.

बै कु ण्ठ चलतुदर श ी की कथा
एक बार की बात है िक नारद जी पर्ृथ्वीलिोक से घूमकर बैकुण्ठ धाम पर्ंहुचलते है. भगवान िवष्णु उन्हे
आदरपर्ूवरक िबठाते है और प्रतसन होकर उनके आने का कारण पर्ूछते है. नारद जी कहते है िक – प्रतभु! आपर्ने
अपर्ना नाम कृपर्ािनधान रखा है. इससे आपर्के जो िप्रतय भक है वही तर पर्ाते है. जो सामान्य नर-नारी है, वह
वंिचलत रह जाते है. इसिलिए आपर् मुझे कोई ऎसा सरलि मागर बताएं , िजससे सामान्य भक भी आपर्की भिक
कर मुिक पर्ा सके. यह सुनकर िवष्णु जी बोलिे – हे नारद! मेरी बात सुनो, काितर क शुक्लि पर्क की चलतुदरशी को
जो नर-नारी व्रत का पर्ालिन करेगे और श्रद्धा – भिक से मेरी पर्ूजा करेगे, उनके िलिए स्वगर के द्वार साकात
खुलिे होगे.

इसके बाद िवष्णु जी जय-िवजय को बुलिाते है और उन्हे काितर क चलतुदरशी को स्वगर के द्वार खुलिा रखने का
आदेश देते है. भगवान िवष्णु कहते है िक इस िदन जो भी भक मेरा थोडा़़ सा भी नाम लिेकर पर्ूजन करेगा,
वह बैकुण्ठ धाम को प्रताप करेगा.

काितर क बै कु ण्ठ चलौदस का महत्व
काितर क शुक्लि चलतुदरशी का बैकुण्ठ चलौदस नाम भगवान िशव का िदया गया है. यह व्रत िवष्णु जी तथा िशव
जी के “ऎक्य” का प्रततीक है. प्रताचलीन मतानुसार एक बार िवष्णु जी काशी मे िशव भगवान को एक हजार स्वणर
कमलि के पर्ुष्पर् चलढा़़ने का संकल्पर् करते है. जब अनुष्ठान का समय आता है, तब िशव भगवान, िवष्णु जी
की पर्रीका लिेने के िलिए एक स्वणर पर्ुष्पर् कम कर देते है. पर्ुष्पर् कम होने पर्र िवष्णु जी अपर्ने “कमलि नयन”
नाम और “पर्ुण्डरी काक” नाम को स्मरण करके अपर्ना एक नेत्र चलढा़़ने को तैयार होते है. भगवान िशव
उनकी यह भिक देखकर प्रतकटि होते है. वह भगवान िशव का हाथ पर्कड़ लिेते है और कहते है िक तुम्हारे
स्वरुपर् वालिी काितर क मास की इस शुक्लि पर्क की चलतुदरशी “बैकुण्ठ चलौदस” के नाम से जानी जाएगी.
भगवान िशव, इसी बैकुण्ठ चलतुदरशी को करोडो़़ सूयो ं की कांित के समान वालिा सुदशर न चलक्र, िवष्णु जी को
प्रतदान करते है. इसी िदन िशव तथा िवष्णु जी कहते है िक इस िदन स्वगर के द्वार खुलिे रहेगे. मृत्युलिोक मे
रहना वालिा कोई भी व्यिक इस व्रत को करता है, वह अपर्ना स्थान बैकुण्ठ धाम मे सुिनियोश्चलत करेगा.
इसी िदन िपर्तामह भीष्म ने भगवान कृष्ण से वर प्रताप िकया था. इसिलिए इस व्रत को भीष्म पर्ंचलमी या पर्ंचल
भीखू भी कहा गया है. भीष्म पर्ंचलमी का व्रत काितर क शुक्लि एकादशी से आरम्भ होकर पर्ूिणर मा तक चललिता है.
काितर क शुक्लि चलौदस के िदन ही भगवान िवष्णु ने “मत्स्य” रुपर् मे अवतार िलिया था. इसके अगलिे िदन
काितर क पर्ूिणर मा के व्रत का फलि दस यज्ञो के समान फलि देने वालिा माना गया है.

राधाषमी व्रत
यह व्रत िहन्द ु कैलिेण्डर के अनुसार प्रतितवषर भाद्रिपर्द माह की शुक्लि पर्क की अषमी को मनाया जाता है.
राधाजी का जन्म उत्तर प्रतदेश के बरसाना नामक स्थान पर्र हु आ था. बरसाना स्थान मथुरा से 50
िकलिोमीटिर दरू है और गोवधर न से 21 िकलिोमीटिर दरू ियोस्थत है. बरसाना पर्वर त के ढलिान वालिे िहस्से मे बसा
हु आ है. िजस पर्वर त पर्र यह ियोस्थत है उस पर्वर त को ब्रह्मा पर्वर त के नाम से जाना जाता है.

राधाषमी के िदन श्रद्धालिु बरसाना की ऊँचली पर्हाडी़़ पर्र पर्र ियोस्थत गहवर वन की पर्िरक्रमा करते है. इस
िदन रात-िदन बरसाना मे बहु त रौनक रहती है. िविभन प्रतकार के सांस्कृितक कायर क्रमो का आयोजन िकया
जाता है. धािमर क गीतो तथा कीतर न के साथ उत्सव का आरम्भ होता है.

राधा जी का जन्म
राधाजी, वृषभानु गोपर् की पर्ुत्री थी. राधाजी की माता का नाम कीितर था. इनकी माता के िलिए “वृषभानु
पर्त्नी” शब्द का प्रतयोग िकया जाता है. राधाजी की को श्रीकृष्ण की प्रतेिमका माना जाता है. िकसी-िकसी ग्रंथ
मे पर्त्नी भी माना गया है. पर्द्मपर्ुराण मे राधाजी को राजा वृषभानु की पर्ुत्री बताया गया है. इस ग्रंथ के अनुसार
जब राजा यज्ञ के िलिए भूिम साफ कर रहे थे तब भूिम कन्या के रुपर् मे इन्हे राधाजी िमलिी थी. राजा ने इस
कन्या को अपर्नी पर्ुत्री मानकर इसका लिालिन-पर्ालिन िकया.
इसके साथ ही यह कथा भी िमलिती है िक भगवान िवष्णु ने कृष्ण अवतार मे जन्म लिेते समय अपर्ने पर्िरवार
के अन्य सदस्यो से पर्ृथ्वी पर्र अवतार लिेने के िलिए कहा था. तब िवष्णु जी की पर्त्नी लिक्ष्मी जी, राधा के रुपर्
मे पर्ृथ्वी पर्र आई थी. ब्रह्म वैवतर पर्ुराण के अनुसार राधाजी, श्रीकृष्ण की सखी थी. लिेिकन उनका िववाह
रापर्ाण या रायाण नाम के व्यिक के साथ सम्पर्न हु आ था. ऎसा कहा जाता है िक राधाजी अपर्ने जन्म के
समय ही वयस्क हो गई थी.

राधाषमी के िदन पर्ूज ा िविध
इस िदन सुबह उठकर स्नान आिद से िनवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करे. व्रत का पर्ालिन शुद्ध मन से करे.
पर्ूजा आरम्भ करते हु ए सबसे पर्हलिे राधाजी की मूितर को पर्ंचलामृत से स्नान कराएँ . स्नान कराने के बाद
उनका श्रृगं ार करे. शरीर को शुद्ध करके मण्डपर् के अंदर मण्डलि बनाकर उसके मध्य मे िमट्टी अथवा ताँबे का
बतर न रखकर उस पर्र दो वस्त्रो से ढकी हु ई राधा जी की सोने या िकसी अन्य धातु से बनी हु ई सुंदर मूितर
स्थािपर्त करनी चलािहए. इसके पर्श्चलात मध्यान्ह के समय श्रद्धा तथा भिक से राधाजी की आराधना करनी
चलािहए. धूपर्-दीपर् आिद से आरती करनी चलािहए. अंत मे भोग लिगाना चलािहए.
जो व्यिक व्रत करने के इच्छुक है वह इस िदन व्रत भी रख सकते है. व्रत रखने के अगलिे िदन सुयोग्य िस्त्रयो
को भोजन कराना चलािहए. िजस मूितर की स्थापर्ना की गई थी, उसे दान मे दे देना चलािहए. अंत मे स्वयं
भोजन ग्रहण करना चलािहए. जो व्यिक इस व्रत को िविधवत तरीके से करते है वह सभी पर्ापर्ो से मुिक पर्ाते है.

कई ग्रंथो मे राधाषमी के िदन राधा-कृष्ण की संयक
ु रुपर् से पर्ूजा की बात कही गई है. इसके अनुसार सबसे
पर्हलिे राधाजी को पर्ंचलामृत से स्नान कराना चलािहए और उनका िविधवत रुपर् से श्रृगं ार करना चलािहए. इस
िदन मंिदरो मे 27 पर्ेड़ो की पर्ित्तयो और 27 ही कंु ओं का जलि इकठ्ठा करना चलािहए. सवा मन दध
ू , दही, शुद्ध
घी तथा बूरा और औषिधयो से मूलि शांित करानी चलािहए. अंत मे कई मन पर्ंचलामृत से वैिदक मम्त्रो के साथ
“श्यामाश्याम” का अिभषेक िकया जाता है.

िविभन स्थानो पर्र राधाषमी
ब्रज मे राधाषमी
ब्रज मे जन्माषमी की तरह राधाषमी भी एक बड़े त्यौहार के रूपर् मे मनाई जाती है। वृंदावन मे भी यह उत्सव
बडे़़ ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। नारद पर्ुराण के अनुसार ‘राधाषमी’ का व्रत करनेवालिे भकगण
ब्रज के दलि
ु र भ रहस्य को जान लिेते है।

बरसाना मे राधाषमी
मथुरा, वृन्दावन, बरसाना, रावलि और मांटि के राधा रानी मंिदरो इस िदन को उत्सव के रुपर् मे मनाया जाता
है। वृन्दावन के ‘राधा बल्लभ मंिदर’ मे राधा जन्म की खुशी मे गोस्वामी समाज के लिोग भिक मे झूम उठते है।
मंिदर का पर्िरसर “राधा प्यारी ने जन्म िलिया है, कंु वर िकशोरी ने जन्म िलिया है” के सामूिहक स्वरो से गूंज
उठता है, मंिदर मे बनी हौिदयो मे हल्दी िमिश्रत दही को इकठ्ठा िकया जाता है और इस हल्दी िमलिी दही को
गोस्वािमयो पर्र उड़ेलिा जाता है. इस पर्र वह और अिधक झूमने लिगते है और नृत्य करने लिगते है.
राधाजी के भोग के िलिए मंिदर के पर्टि बन्द होने के बाद, बधाई गायन के होता है. इसके बाद दशर न खुलिते ही
दिधकाना शुरु हो जाता है. इसका समापर्न आरती के बाद होता है। मंिदर के अनुसार वैिदक मंत्रो के मध्य
मंिदर मे मुख्य श्री िवग्रह का प्रतातः साढ़े पर्ांचल बजे से सात बजे तक अिभषेक होता है. इसके बाद मंगलिा
आरती होती है।

वृन् दावन मे राधाषमी
वृन्दावन मे राधाषमी के िदन राधा दामोदर मंिदर, राधा श्याम सुन्दर मंिदर, कृष्ण-बलिराम मंिदर और राधा
रमण मंिदर मे वैिदक मंत्रो के मध्य अिभषेक होता है. भको का ताँता सुबह से ही लिग जाता है.

रावलि मे राधाषमी
राधाजी के जन्म स्थान रावलि मे वैिदक मंत्रो के साथ कई मन दध
ू , दही, बूरा, शहद तथा शुद्ध घी से
श्यामाश्याम का अिभषेक िकया जाता है. प्रतसाद का िवतरण िकया जाता है. मंिदर के सामने मेलिा लिगता है.
इस िदन केशवदेव मंिदर मे ठाकुर जी का श्रृंगार श्रीराधा जी के रुपर् मे िकया जाता है. इस िदन हजारो व्यिक
गोवधर न पर्वर त की पर्िरक्रमा भी करते है.

मांटि मे राधाषमी
मांटि मे राधाषमी के िदन िवशेष पर्ूजन अचलर ना के बाद भको मे प्रतसाद बांटिा जाता है। इस िदन बांके िबहारी
मंिदर मे िदनभर रासलिीलिा होती है. राधा-वल्लभ मंिदर से राधा-कृष्ण की शोभायात्रा िनकालिी जाती है.
शोभायात्रा के दौरान जगह-जगह पर्ुष्पर् वषार और आरती करके भकजनो द्वारा राधा-कृष्ण का स्वागत िकया
जाता है।

राधा जी की सिखयाँ
धािमर क ग्रंथो मे राधाजी के साथ-साथ उनकी आठ सिखयो का वणर न भी िमलिता है. वृंदावन मे राधाजी की
इन आठ सिखयो का प्रतिसद्ध अषसखी मंिदर भी बना हु आ है. इनकी आठ सिखयो के नाम है – लििलिता,
िवशाखा, िचलत्रा, इन्दलि
ु ेखा, चलम्पर्कलिता, रंगदेवी, तुगं िवदा, सुदेवी.

राधा जी की आरती
आरती राधा जी की कीजै -2
कृष्ण संग जो करे िनवासा, कृष्ण करे िजन पर्र िवश्वासा, आरित वृषभानु लिलिी की कीजै।।<br/आरती राधा
जी की कीजै -2
कृष्ण चलन्द्रि की करी सहाई, मुह
ं मे आिन रूपर् िदखाई, उसी शिक की आरती कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2
नन्द पर्ुत्र से प्रतीित बढाई, जमुना तटि पर्र रास रचलाई, आरती रास रचलाई की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2

प्रतेम राह िजसने बतलिाई, िनगुरण भिक नही अपर्नाई, आरती ! श्री ! जी की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2
दिु नया की जो रका करती, भकजनो के दख
ु सब हरती, आरती द ु:ख हरणी जी की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2
कृष्ण चलन्द्रि ने प्रतेम बढाया, िविपर्न बीचल मे रास रचलाया, आरती कृष्ण िप्रतया की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2
दिु नया की जो जनिन कहावे, िनज पर्ुत्रो की धीर बंधावे, आरती जगत मात की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2
िनज पर्ुत्रो के काज संवारे, आरती गायक के कष िनवारे, आरती िवश्वमात की कीजै।।
आरती राधा जी की कीजै -2

काितर क माह मे तुलि सी िववाह
काितर क माह का िहन्द ु धमर मे बहु त ही महत्वपर्ूणर स्थान है. इस माह मे श्रद्धालिु सुबह – सवेरे नदी, तालिाब
तथा सरोवरो मे स्नान करते है. इस माह सुबह स्नान तथा काितर क माह की कथा सुनने का बडा़़ ही
महत्व माना गया है. पर्द्मपर्ुराण के अनुसार काितर क माह की शुक्लि पर्क की नवमी को तुलिसी िववाह रचलाया
जाता है. इस िदन भगवान िवष्णु की प्रतितमा बनाकर उनका िववाह तुलिसी जी से िकया जाता है. िववाह के
बाद नवमी, दशमी तथा एकादशी को व्रत रखा जाता है और द्वादशी ितिथ को भोजन करने के िवषय मे
िलिखा गया है. कई प्रताचलीन ग्रंथो के अनुसार शुक्लि पर्क की नवमी को तुलिसी की स्थापर्ना की जाती है. कई
श्रद्धालिु काितर क माह की एकादशी को तुलिसी िववाह करते है और द्वादशी को व्रत अनुष्ठान करते है.
काितर क माह की देवोत्थान एकादशी से(इसे देवउठनी एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रतबोिधनी एकादशी आिद
नाम से भी जाना जाता है) ही िववाह आिद से संबंिधत सभी मंगलि कायर आरम्भ हो जाते है. इसिलिए इस
एकादशी के िदन तुलिसी िववाह रचलाना उिचलत भी है. कई स्थानो पर्र िवष्णु जी की सोने की प्रतितमा बनाकर
उनके साथ तुलिसी का िववाह रचलाने की बात कही गई है. िववाह से पर्ूवर तीन िदन तक पर्ूजा करने का िवधान
है. तुलिसी िववाह करने से कन्यादान के समान पर्ुण्यफलि की प्रतािप होती है.

तुलि सी िववाह व्रत कथा
प्रताचलीन ग्रंथो मे तुलिसी िववाह व्रत की अनेक कथाएं दी हु ई है. उन कथाओं मे से एक कथा िनम्न है. इस
कथा के अनुसार एक कुटिु म्ब मे ननद तथा भाभी साथ रहती थी. ननद का िववाह अभी नही हु आ था. वह
तुलिसी के पर्ौधे की बहु त सेवा करती थी. लिेिकन उसकी भाभी को यह सब िबलिकुलि भी पर्सन्द नही था. जब
कभी उसकी भाभी को अत्यिधक क्रोध आता तब वह उसे ताना देते हु ए कहती िक जब तुम्हारा िववाह होगा
तो मै तुलिसी ही बाराितयो को खाने को दगं ू ी और तुम्हारे दहेज मे भी तुलिसी ही दगं ू ी.
कुछ समय बीत जाने पर्र ननद का िववाह पर्क्का हु आ. िववाह के िदन भाभी ने अपर्नी कथनी अनुसार
बाराितयो के सामने तुलिसी का गमलिा फोड़ िदया और खाने के िलिए कहा. तुलिसी की कृपर्ा से वह फूटिा हु आ
गमलिा अनेको स्वािदष पर्कवानो मे बदलि गया. भाभी ने गहनो के नाम पर्र तुलिसी की मंजरी से बने गहने
पर्हना िदए. वह सब भी सुन्दर सोने – जवाहरात मे बदलि गए. भाभी ने वस्त्रो के स्थान पर्र तुलिसी का जनेऊ
रख िदया. वह रेशमी तथा सुन्दर वस्त्रो मे बदलि गया.
ननद की ससुरालि मे उसके दहेज की बहु त प्रतशंसा की गई. यह बात भाभी के कानो तक भी पर्हु चल
ं ी. उसे
बहु त आश्चलयर हु आ. उसे अब तुलिसी माता की पर्ूजा का महत्व समझ आया. भाभी की एक लिड़की थी. वह
अपर्नी लिड़की से कहने लिगी िक तुम भी तुलिसी की सेवा िकया करो. तुम्हे भी बुआ की तरह फलि िमलिेगा.
वह जबदर स्ती अपर्नी लिड़की से सेवा करने को कहती लिेिकन लिड़की का मन तुलिसी सेवा मे नही लिगता था.
लिड़की के बडी़़ होने पर्र उसके िववाह का समय आता है. तब भाभी सोचलती है िक जैसा व्यवहार मैने
अपर्नी ननद के साथ िकया था वैसा ही मै अपर्नी लिड़की के साथ भी करती हू ं तो यह भी गहनो से लिद
जाएगी और बाराितयो को खाने मे पर्कवान िमलिेगे. ससुरालि मे इसे भी बहु त इज्जत िमलिेगी. यह सोचलकर
वह बाराितयो के सामने तुलिसी का गमलिा फोड़ देती है. लिेिकन इस बार गमलिे की िमट्टी, िमट्टी ही रहती है.
मंजरी तथा पर्त्ते भी अपर्ने रुपर् मे ही रहते है. जनेऊ भी अपर्ना रुपर् नहीम बदलिता है. सभी लिोगो तथा
बाराितयो द्वारा भाभी की बुराई की जाती है. लिड़की के ससुरालि वालिे भी लिड़की की बुराई करते है.
भाभी कभी ननद को नही बुलिाती थी. भाई ने सोचला मै बहन से िमलिकर आता हू ँ. उसने अपर्नी पर्त्नी से कहा
और कुछ उपर्हार बहन के पर्ास लिे जाने की बात कही. भाभी ने थैलिे मे ज्वार भरकर कहा िक और कुछ नही
है तुम यही लिे जाओ. वह दख
ु ी मन से बहन के पर्ास चललि िदया. वह सोचलता रहा िक कोई भाई अपर्ने बहन के
घर जुवार कैसे लिे जा सकता है. यह सोचलकर वह एक गौशलिा के पर्ास रुका और जुवार का थैलिा गाय के
सामने पर्लिटि िदया. तभी गाय पर्ालिने वालिे ने कहा िक आपर् गाय के सामने हीरे-मोती तथा सोना क्यो डालि

रहे हो. भाई ने सारी बात उसे बताई और धन लिेकर खुशी से अपर्नी बहन के घर की ओर चललि िदया. दोनो
बहन-भाई एक-दस
ू रे को देखकर अत्यंत प्रतसन होते है.

तुलि सी पर्ूज ा
िहन्दओ
ु ं के संस्कार अनुसार सभी कायो ं मे तुलिसी का पर्त्ता अिनवायर माना गया है. प्रतितिदन तुलिसी मे जलि
देना तथा उसकी पर्ूजा करना अिनवायर माना गया है. तुलिसी के पर्ौधे को अध्यर देने के बाद शुद्ध घी का दीया
जलिाना चलािहए. धूपर्, िसंदरू , चलंदन लिगाना चलािहए. िफर नैवेद तथा पर्ुष्पर् अिपर्र त करने चलािहए. तुलिसी घरआँ गन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवधर क बनाती है.

तुलि सी जी के नाम
तुलिसी जी को कई नामो से पर्ुकारा जाता है. इनके आठ नाम मुख्य है – वृंदावनी, वृद
ं ा, िवश्व पर्ूिजता, िवश्व
पर्ावनी, पर्ुष्पर्सारा, नियोन्दनी, कृष्ण जीवनी और तुलिसी.

तुलि सी नामाषक
तुलिसी को देवी रुपर् मे हर घर मे पर्ूजा जाता है. इसकी िनयिमत पर्ूजा से व्यिक को पर्ापर्ो से मुिक तथा पर्ुण्य
फलि मे वृिद्ध िमलिती है. यह बहु त पर्िवत्र मानी जाती है और सभी पर्ूजाओं मे देवी तथा देवताओं को अिपर्र त
की जाती है. तुलिसी पर्ूजा करने के कई िवधान िदए गए है. उनमे से एक तुलिसी नामाषक का पर्ाठ करने का
िवधान िदया गया है. जो व्यिक तुलिसी नामाषक का िनयिमत पर्ाठ करता है उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान
पर्ुण्य फलि िमलिता है. इस नामाषक का पर्ाठ पर्ूरे िवधान से करना चलािहए. िवशेष रुपर् से काितर क माह मे इस
पर्ाठ को अवश्य ही करना चलािहए.

नामाषक पर्ाठ
वृन्दा वृन्दावनी िवश्वपर्ूिजता िवश्वपर्ावनी.
पर्ुष्पर्सारा नन्दनीचल तुलिसी कृष्ण जीवनी.
एतभामांषक चलैव स्तोत्रं नामथर संयत
ु म.

य: पर्ठे त तां चल सम्पर्ूज सौs श्रमेघ फलिंलिमेता.

फाल्गुन पर्ूि णर मा
िहंद ू पर्ंचलांग अनुसार वषर का बारहवाँ तथा अंितम महीना फाल्गुन का महीना कहलिाता है. इसे बसंत ऋषतु का
महीना भी कहा जाता है. इस समय मे न अिधक गमी होती है और न अिधक सदी होती है. इस माह मे
अनेक महत्वपर्ूणर पर्वर मनाए जाते है इसी मे से प्रतमुख है फागुन पर्ूिणर मा के िदन मनाया जाने वालिा ‘होलिी’ का
त्यौहार.
िहंद ु धमर मे फाल्गुन पर्ूिणर मा के िदन होिलिकोत्सव के साथ ही बसंतोत्सव भी बहु त हषोउल्ल्स के साथ
मनाया जाता है. बसंत पर्ंचलमी से लिेकर फाल्गुन पर्ूिणर मा तक प्रतकृित मे एक नवीन पर्िरवतर न देखा जाता है.
बसंत का आगमन होते ही उत्सवो का िसलििसलिा फाल्गुन पर्ूिणर मा से लिेकर चलैत्र कृष्ण रंगपर्ंचलमी तक चललिता
है.

फागुन पर्ूि णर मा पर्ूज ा
फाल्गुन पर्ूिणर मा के अवसर पर्र भगवान सत्यनारायण जी िक कथा की जाती है. भगवान नारायण की पर्ूजा मे
केलिे के पर्त्ते व फलि, पर्ंचलामृत, सुपर्ारी, पर्ान, ितलि, मोलिी, रोलिी, कुमकुम, दवू ार का उपर्योग िकया जाता है.
सत्यनारायण की पर्ूजा के िलिए दध
ू , शहद केलिा, गंगाजलि, तुलिसी पर्त्ता, मेवा िमलिाकर पर्ंचलामृत तैयार िकया
जाता है, इसके साथ ही साथ आटिे को भून कर उसमे चलीनी िमलिाकर चलूरमे का प्रतसाद बनाया जाता है तथा
इस का भोग लिगता है.
सत्यनारायण की कथा पर्श्चलात प्रतभु का पर्ूजन होता है, इसके बाद देवी लिक्ष्मी समेत अन्य देवो की स्तुित िक
जाती है. तथा पर्ूजा समाप होने पर्र चलरणामृत एवं प्रतसाद सभी को िदया जाता है. फाल्गुन पर्ूिणर मा मे
प्रतात:कालि िकसी पर्िवत्र नदी, पर्ोखर, कुआं , या घर पर्र ही स्नान करके भगवान िवष्णु की पर्ूजा करनी चलािहए.
फाल्गुन माह मे ब्राह्मण को भोजन कराना, दिकणा देनी चलािहए फाल्गुन पर्ूिणर मा के िदन स्नान – दान करने से
सुख-सौभाग्य, धन-संतान िक प्रतािप होती है.

फाल्गुन माह

फाल्गुऩ माह सुख, शांित को अपर्नाने के साथ कामनाओं पर्र संयम का संदेश भी देता है. इस माह से एक
पर्ौरािणक कथा भी जुडी़़ है िजसके अनुसार कहा जाता है िक फागुन माह मे ही कामदेव ने भगवान िशव
को काम आसक करने का प्रतयास करते है. िजसके पर्िरणाम स्वरूपर् भगवान िशव ने क्रोिधत हो ित्रनेत्र
खोलिकर कामदेव को भस्म कर िदया था.
पर्रंतु ऎसा होने से प्रतकृित का सृजन चलक्र थम जाता है तब कामदेव की पर्त्नी रती, भगवान िशव से अपर्ने पर्ित
को पर्ुन: प्रताणदान देने की प्रताथर ना करती है रती की प्रताथर ना पर्र भगवान कामदेव को पर्ुन: जीिवत कर देते है
और प्रतकृित मे िफर से नव रंग और प्रतेम भर जाता है.
इस दौरान फाग महोत्सव भी मनाया जाता है. रंगो का त्योहार होलिी भी फाल्गुन मास की पर्ूिणर मा को ही
मनाया जाता है रंग, उत्साह, मस्ती और उल्लास के त्योहार रूपर् मे फागुन की मस्ती एवं रंगो का सुरूर जीवन
को उत्सािहत कर देता है तथा प्रतकृित भी हमारे साथ-साथ फागुन का आनंद लिेती नजर आती है.
फागुन का उत्सवी माहौलि इसे अन्य महीनो से िभन और िवशेष बनाता है. फाल्गुन मास से हम यह सीख
लिेते है िक जैसे पर्ेड़ो से पर्ुराने जीणर पर्त्ते टिू टिते है, तथा नई कोपर्लिो का आगमन होता है उसी प्रतकार हम भी
बुरे िवचलारो से मुक होकर शुभ िवचलारो एवं गुणो को अपर्नाना चलािहए.

फाल्गुन पर्ूि णर म ा महत्व
फागुन पर्ूिणर मा के िदन स्नान एवं दान का बहु त महत्व होता है. यिद फाल्गुनी पर्ूिणर मा को फाल्गुनी नकत्र हो
तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है इससे सौभाग्य की प्रतािप होती है. फाल्गुन पर्ूिणर मा के िदन ही ऋषिष
कश्यपर् तथा अिदित से अयर मा की पर्ूजा हु ई थी और अित्र और अनुसूया से चलन्द्रिमा की उत्पर्ित्त फाल्गुनी
पर्ूिणर मा को ही िदन हु ई थी अत: इस अवसर पर्र चलन्द्रिोदय के समय चलंद्रि देव की पर्ूजा करनी चलािहए. फाल्गुन
मे यिद द्वादशी को श्रवण नकत्र हो तो उसे फाल्गुन श्रवण द्वादशी कहते है इस शुभ िदन व्रत करके भगवान
िवष्णु का पर्ूजन करना चलािहए ऐसा करने से पर्ुण्य की प्रतािप होती है.

होलिी
फाल्गुन माह की पर्ूिणर मा को एक प्रतमुख त्यौहार होलिी मनाया जाता है. रंगो का त्योहार कहा जाने वालिा यह
पर्वर पर्ारंपर्िरक रूपर् से दो िदन मनाया जाता है िजसमे पर्हलिे िदन को होिलिका दहन होता है और दस
ू रे
िदन होलिी मनाई जाती है िजसे धुलिेडी, धुरखेलि या धूिलिवंदन कहा जाता है, इस िदन लिोग एक दस
ू रे
पर्र रंग, गुलिालि इत्यािद रंग फेकते है तथा ढोलि बजा कर होलिी के गीत गाये जाते है.

होलिी एकता का पर्वर है, िजसमे सभी नर-नारी, बच्चले, बुढ़े, जाित, वणर को भूलिकर, इस पर्वर को बड़े उत्साह
के साथ मनाते है. फाल्गुन मास से हम यह िश़़अ पर्ाते है जैसे पर्ेड़ो से पर्ुराने जीणर पर्त्ते टिू टिते है, तथा नई
कोपर्लिो का आगमन होता है उसी प्रतकार हम भी बुरे िवचलारो से मुक होकर शुभ िवचलारो एवं गुणो को अपर्नाना
चलािहए.
भारतीय समाज मे इसी प्रतकार फाल्गुनी पर्ूिणर मा के िदन दिकण भारत मे ‘उित्तर’ नामक मियोन्दरोत्सव का भी
आयोजन िकया जाता है. और ब.गालि मे दोलियात्रा का उत्सव और दोलिात्सव भी इसी िदन मनाया जाता है.
इस उत्सव समय ठाकुर जी को फूलिो के िहंडोलिे पर्र झुलिाया जाता है.

आं वलिा नवमी
काितर क मास के शुक्लि पर्क की नवमी को आं वलिा नवमी के रूपर् मे मनाया जाता है. आँ वलिा नवमी को अकय
नवमी भी कहते है. आँ वलिा नवमी के िदन स्नान, पर्ूजन, तपर्र ण तथा अनदान करने का बहु त महत्व होता है.
इस िदन िकया गया जपर्, तपर्, दान इत्यािद व्यिक को सभी पर्ापर्ो से मुक करता है तथा सभी इच्छाओं की
पर्ूितर करने वालिा होता है. मान्यता है िक सतयुग का आरंभ भी इसी िदन हु आ था. इस िदन आं वलिे के वृक
की पर्ूजा करने का िवधान है. धािमर क मान्यताओं के अनुसार आं वलिे के वृक मे सभी देवताओं का िनवास
होता है तथा यह फलि भगवान िवष्णु को भी अित िप्रतय है.

आं वलिा नवमी कथा
प्रताचलीन समय की बात है, काशी नगरी मे एक वैश्य रहता था. वह बहु त ही धमर कमर को मानने वालिा धमारत्मा
पर्ुरूष था. िकंतु उसके कोई संतान न थी. इस कारण उस विणक की पर्त्नी बहु त दख
ु ी रहती थी. एक बार
िकसी ने उसकी पर्त्नी को कहा िक यिद वह िकसी बच्चले की बिलि भैरव बाबा के नाम पर्र चलढा़़ए तो उसे
अवश्य पर्ुत्र की प्रतािप होगी. स्त्री ने यह बात अपर्ने पर्ित से कही पर्रंतु विणक ने ऐसा कायर करने से मना कर
िदया. िकंतु उसकी पर्त्नी के मन मे यह बात घर कर गई तथा संतान प्रतािप की इच्छा के िलिए उसने िकसी
बच्चले की बलिी दे दी, पर्रंतु इस पर्ापर् का पर्िरणाम अच्छा कैसे हो सकता था अत: उस स्त्री के शरीर मे कोढ़
उत्पर्न हो गया और मृत बच्चले की आत्मा उसे सताने लिगी.
उस स्त्री ने यह बात अपर्ने पर्ित को बताई. पर्हलिे तो पर्ित ने उसे खूब दत्ु कारा लिेिकन िफर उसकी दशा पर्र
उसे दया भी आई. वह अपर्नी पर्त्नी को गंगा स्नान एवं पर्ूजन के िलिए कहता है. तब उसकी पर्त्नी गंगा के
िकनारे जा कर गंगा जी की पर्ूजा करने लिगती है. एक िदन माँ गंगा वृद्ध स्त्री का वेश धारण िकए उस स्त्री के

समक आती है और उस सेठ की पर्त्नी को कहती है िक यिद वह मथुरा मे जाकर काितर क नवमी का व्रत एवं
पर्ूजन करे तो उसके सभी पर्ापर् समाप हो जाएं गे. ऎसा सुनकर विणक की पर्त्नी मथुरा मे जाकर िविध िवधान
के साथ नवमी का पर्ूजन करती है और भगवान की कृपर्ा से उसके सभी पर्ापर् कय हो जाते है तथा उसका
शरीर पर्हलिे की भाँित स्वस्थ हो जाता है, उसे संतान रूपर् मे पर्ुत्र रत्न की प्रतािप होती है.

आँ वलिा नवमी पर्ूज ा
प्रतात:कालि स्नान कर आं वलिे के वृक की पर्ूजा की जाती है. पर्ूजा करने के िलिए आँ वलिे के वृक की पर्ूवर िदशा
की ओर उन्मुख होकर शोड्षोपर्चलार पर्ूजन करना चलािहए. दािहने हाथ मे जलि, चलावलि, पर्ुष्पर् आिद लिेकर व्रत
का संकल्पर् करे. आं वलिे की जड़ मे दध
ू चलढा़़एं, कपर्ूरर वितर का से आरती करते हु ए वृक की सात बार
पर्िरक्रमा करे. आं वलिे के वृक के नीचले ब्राह्मणो को भोजन कराएं तथा दान आिद दे तथा कथा का श्रवण करे.
घर मे आं वलिे का वृक न हो तो िकसी बगीचले मे या गमलिे मे आं वलिे का पर्ौधा लिगा कर यह कायर सम्पर्न करना
चलािहए.

आँ वलिा नवमी महत्व
काितर क शुक्लि पर्क की आं वलिा नवमी का धािमर क महत्व बहु त माना गया है. आं वलिा नवमी की ितिथ को
पर्िवत्र ितिथ माना गया है. इस िदन िकया गया गौ, स्वणर तथा वस्त्र का दान अमोघ फलिदायक होता है. इन
वस्तुओं का दान देने से ब्राह्मण हत्या, गौ हत्या जैसे महापर्ापर्ो से बचला जा सकता है. चलरक संिहता मे इसके
महत्व को व्यक िकया गया है. िजसके अनुसार काितर क शुक्लि नवमी के िदन ही महिषर च्यवन को आं वलिा के
सेवन से पर्ुननर वा होने का वरदान प्रताप हु आ था.

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