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गुरुत्व कामाारम द्राया प्रस्तुत भाससक ई-ऩत्रिका

NON PROFIT PUBLICATION

जून- 2013

FREE
E CIRCULAR

गुरुत्व ज्मोसतष ऩत्रिका
जून 2013
सॊऩादक

सिॊतन जोशी
सॊऩका
गुरुत्व ज्मोसतष त्रवबाग

गुरुत्व कामाारम

92/3. BANK COLONY,
BRAHMESHWAR PATNA,
BHUBNESWAR-751018,
(ORISSA) INDIA

ई- जन्भ ऩत्रिका
अत्माधुसनक ज्मोसतष ऩद्धसत द्राया
उत्कृ ष्ट बत्रवष्मवाणी के साथ
१००+ ऩेज भं प्रस्तुत

पोन

91+9338213418,
91+9238328785,
ईभेर

gurutva.karyalay@gmail.com,
gurutva_karyalay@yahoo.in,

वेफ

www.gurutvakaryalay.com
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ऩत्रिका प्रस्तुसत

सिॊतन जोशी,
स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
पोटो ग्राफपक्स

सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक आटा
हभाये भुख्म सहमोगी

स्वस्स्तक.ऎन.जोशी (स्वस्स्तक
सोफ्टे क इस्न्डमा सर)

E HOROSCOPE
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Excellent Prediction
100+ Pages
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फहॊ दी/ English भं भूल्म भाि 750/GURUTVA KARYALAY
BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA
Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785
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अनुक्रभ
बायतीम सॊस्कृ सत भं शॊख का भहत्व

7

साभुफिक शास्त्र भं शसन ये खा का भहत्व

39

दस्ऺणावता शॊख का धासभाक भहत्व

9

शसन के त्रवसबन्न ऩाम का पर

41

दस्ऺणावता शॊख से जुड़े गूढ़ यहस्म

12

श्री शसन िारीसा

44

शॊख नाद एक अद्भत
ु यहस्म

14

शसनग्रह से सॊफसॊ धत योग

45

हभाये जीवन भं शॊख का भहत्व

16

शसनदे व की कृ ऩा प्रासद्ऱ के सयर उऩाम

46

सशवसरॊग ऩूजन भं शॊख सनषेद्ध क्मो?

19

शसन के त्रवसबन्न भॊि

48

शॊख ऩूजन से वास्तुदोष सनवायण

20

भहाकार शसन भृत्मुज
ॊ म स्तोि

49

इष्ट आयाधना भं शॊख अभोघ परदामी हं ।

21

॥ शनैश्चयस्तवयाज्॥

52

॥ शनैश्चयस्तोिभ ् ॥

53

॥शसनवज्रऩॊजयकविभ ्॥

53

शॊख अऩनामे योग, द्ु ख, दरयिता, दब
ु ााग्म बगामे
शसनदे व का ऩरयिम

23
24

शसनवाय व्रत

30

दशयथकृ त-शसन-स्तोि

54

शसन प्रदोष व्रत का भहत्व

36

शसन अष्टोत्तयशतनाभावसर्

58

शसन-साढ़े साती के शाॊसत उऩाम

37

गुरु ऩुष्माभृत मोग

59

हभाये उत्ऩाद
भॊि ससद्ध दर
ा साभग्री एवॊ भारा
ु ब

18

त्रवसबन्न दे वता एवॊ काभना ऩूसता मॊि सूसि

बाग्म रक्ष्भी फदब्फी

19

त्रवसबन्न दे वी एवॊ रक्ष्भी मॊि सूसि

भॊि ससद्ध ऩन्ना गणेश

20

याशी यत्न

70
71

भॊि ससद्ध रूिाऺ

72

श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि / कवि

73
74

भॊि ससद्ध स्पफटक श्री मॊि

69

भॊि ससद्ध भॊगर गणेश

22
35

भॊि ससद्ध घोड़े की नार

38

याभ यऺा मॊि

त्रवद्या प्रासद्ऱ हे तु सयस्वती कवि औय मॊि

40

जैन धभाके त्रवसशष्ट मॊि

सवा कामा ससत्रद्ध कवि

60

घॊटाकणा भहावीय सवा ससत्रद्ध भहामॊि

75
76

हभाये त्रवशेष मॊि

61

अभोद्य भहाभृत्मुॊजम कवि

77

सवाससत्रद्धदामक भुफिका

62

याशी यत्न एवॊ उऩयत्न

77

100 से असधक जैन मॊि
द्रादश भहा मॊि

62
63

ऩुरुषाकाय शसन मॊि एवॊ शसन तैसतसा मॊि

भॊि ससद्ध साभग्री

86-89

सवा योगनाशक मॊि/

93

66

भॊि ससद्ध कवि

95

नवयत्न जफड़त श्री मॊि

67

YANTRA LIST

96

वाहन दघ
ा ना नाशक भारुसत मॊि
ु ट

68

GEM STONE

98

श्री हनुभान मॊि

68

PHONE/ CHAT CONSULTATION

99

स्थामी औय अन्म रेख
सॊऩादकीम

4

दै सनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका

89

जून 2013 भाससक यासश पर

78

फदन-यात के िौघफडमे

90

जून 2013 भाससक ऩॊिाॊग

82

फदन-यात फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक

91

जून 2013 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय

84

ग्रह िरन जून 2013

92

जून 2013-त्रवशेष मोग

89

हभाया उद्दे श्म

102

त्रप्रम आस्त्भम
फॊध/ु फफहन
जम गुरुदे व
शॊख की उत्ऩत्रत्त के त्रवषम भं शास्त्रं भं उल्रेख है फक सभुि भॊथन के सभम िौदह प्रकाय के यत्नं भं शॊख बी
सनकरा।
भुख्म रुऩ से शॊख की उत्ऩत्रत्त जर से ही होती है । जर ही जीवन का आधाय है मही कायण हं की सृत्रष्ट की

उत्ऩत्रत्त बी जर से हुई है । अत: जर से उत्ऩत्रत्त के कायण शॊख की भहत्वता सवाासधक यही हं । अनेकं दे वी-दे वता के
एक हाथ भं शॊख शोबामभान होता हं । मही कायण हं कई की सफदमं से शॊख का उऩमोग त्रवसबन्न धासभाक अनुष्ठानं भं
त्रवशेष रूऩ से फकमा जाता है ।
शॊख का इसतहास बायतीम सॊस्कृ सत भं असत प्रासिन एवॊ दे वकारीन मुग से िरा आयहा है । त्रवऻानीक िष्टी कोण से
सभझे तो शॊख सभुि भं ऩाए जाने वारे एक प्रकाय के जीव घंघे का खोर होता है । मह खोर घंघे अऩनी सुयऺा के
सरए फनाता है ।
त्रवद्रानो ने अऩने अनुबवं एवॊ अनुशॊधान से ऩामा हं की ऩौयास्णक कार से ही सभुिी जीवं का मह खोर अथाात शॊख
भनुष्म के सरए त्रवसबन्न प्रकाय से उऩमोगी यहा हं । शॊख की आध्मास्त्भक उऩमोगीता के साथ ही इसके िूणा, बस्भ
आफद का औषसधम रुऩ भं बी त्रवशेष रुऩ से प्रमोग होता यहा हं ।
फहन्द ू सॊस्कृ सत भं शॊख को अत्मॊत भहत्त्वऩूणा भाना जाता है । त्रवसबन्न धभाग्रॊथं भं शॊख की त्रवसबन्न उऩमोगीताओॊ का
त्रवस्तृत वणान सभरता हं ।

ब्रह्मवैवता ऩुयाण भं उल्रेख सभल्ता है :

शॊख िन्िाकादै वत्मभ ् भध्म वरुणदै वतन ्।
ऩृष्ठे प्रजाऩसता त्रवद्यादग्रे गॊगा सयस्वतीभ ्॥

िैरोक्मे मासन तीथाात्रऩ वासुदेवस्म िाऻमा।

शॊखे सतष्ठस्न्त त्रवप्रेन्ि तस्भा शॊख प्रऩुजमेत ्।।
दशानेन फह शॊखस्म की ऩुन्

त्रवरमॊ मासतॊ ऩाऩसन फहभवद् बास्कयोदमे्।।

अथाात: मह शॊख िॊि औय सूमा के सभान दे व स्वरूऩ है । इसके भध्म बाग भं वरुण, ऩृष्ठ बाग भं ब्रह्मा औय अग्र बाग
भं गॊगा औय सयस्वती के साथ-साथ साये तीथं का वास है । मह कुफेय का बी स्वरूऩ हं अत् इसका ऩूजन अवश्म
कयना िाफहए। इसके दशान भाि से सबी कष्ट दयू हो जाते हं । स्जस प्रकाय सूमा के आने ऩय फपा त्रऩघर जाती है । फपय
स्ऩशा की तो फात ही व्मथा है । शॊख का स्वरूऩ कुफेय के सभान है , अत् मह ऩूजनीम है ।

शॊख से श्रीकृ ष्ण मा रक्ष्भी आफद दे वी-दे वता(शास्त्रं भं शॊख से सशवसरॊग ऩूजन वस्जात भाना गमा हं ।) के त्रवग्रह
ऩय जर मा ऩॊिाभृत असबषेक कयने ऩय दे वता शीघ्र प्रसन्न होते हं ।
जानकाय त्रवद्रानं का अनुबव हं की एक उत्तभ दोष यफहत शॊख जो भनुष्म के सरए सबी प्रकाय से ऩयभ ्

कल्माणकायी हं । मह भनुष्म को दै सनक जीवन भं इष्ट आयाधना, ऩूजा-अिाना आफद के सरए प्रेरयत कयता है ।

सुख-सभृत्रद्ध, धन-सॊऩत्रत्त, रयत्रद्ध-ससत्रद्ध एवॊ ऐश्वमा की प्रासद्ऱ के सरए हभाये धभा शास्त्रं भे दस्ऺणावता शॊख का
अत्मासधक भहत्व फतामा गमा हं । दस्ऺणावता शॊख का भुख दामीॊ औय से खुरा होता हं ।
शास्त्रोक्त भान्मता हं की स्जस घय भं त्रवसध-त्रवधान से दस्ऺणावता शॊख का ऩूजन होता हं , उस घय भं धन, सुख,

सभृत्रद्ध, मश-फकसता की वृत्रद्ध होती हं । उस घय भं रक्ष्भी स्स्थत होती हं ।

आज वैऻासनक अनुसॊधान से मह सात्रफत हो गमा हं की सनमसभत शॊखनाद कयने से उसके सकायात्भक प्रबाव से
वातावयण भं व्माद्ऱ हासनकायक सूक्ष्भ जीवाणुओॊ का नाश होता हं ।
जनकायं का भानना हं की शॊखनाद के दौयान वामुभॊडर भं कुछ त्रवशेष प्रकाय की तयॊ गे उत्ऩन्न होती हं , जो
ब्रह्माॊड की कुछ अन्म तयॊ गं के साथ सभरकय अल्ऩ ऺणं भं ही सभग्र ब्रह्माॊड की ऩरयक्रभा कय रेती हं । उनका भानना
हं की ब्रह्माण्ड की ऩरयक्रभा कयते हुवे जफ फकसी एक तयॊ ग को जफ दस
ू यी अनुकूर तयॊ गं प्राद्ऱ होती हं तफ दोनं तयॊ गं

के सभनवम से भनुष्म को आत्भ फर-प्रेयणा दे ने वारी, योग, शोक आफद से यऺा कयने वारी, उसकी भनोकाभनाएॊ ऩूणा
कयने वारी तयॊ गे उठने रगती हं , औय भनुष्म अऩने कामा उद्दे श्म भं शीघ्र सपरता प्राद्ऱ कय रेता हं ।
जानकायं का भानना हं की तयॊ गे इतनी शूक्ष्भ होती हं की उसका प्रबाव हभं सयरता से िष्टी गोिय नहीॊ हो
ऩाता! शॊखनाद के सनयॊ तय प्रमोग से ही इन तयॊ गं के प्रबावं को सभझा जा सकता हं ।
त्रवसबन्न शोध से मह ससद्ध हो िुका हं की वाद्यं व ध्वसनमं का छोटे -फड़े सबी जीवं ऩय फहोत ही गहया प्रबाव
ऩड़ता हं । उसी प्रकाय शॊख ध्वसन के प्रबाव एवॊ भहत्वता को आजका आधुसनक त्रवऻान बी भान िुका हं ।
फहन्द ू धभा के सबी भाॊगसरक कामं भं शॊख का त्रवशेष रुऩ से प्रमोग फकमा जाता है । दस्ऺणावतॉ शॊख को दे वी
रक्ष्भी का प्रतीक भाना जाता है , दस्ऺणावतॉ शॊख की ऩूजा दे वी भहारक्ष्भी को प्रसन्न कयने वारी है । इससरए ऐसी
भान्मता हं की स्जस स्थान ऩय सनमसभत रूऩ से शॊख की ऩूजा होती है उस स्थान ऩय कबी धन अबाव नहीॊ यहता।
शॊख को त्रवसबन्न दे वी-दे वता का प्रतीक भानकय बी ऩूजा जाता है व शॊख के भाध्मभ से अबीष्ट कामं की ऩूसता की
जाती है ।
रक्ष्भी सॊफहता, बागवत ऩुयाण, त्रवश्वासभि सॊफहता, गोयऺा सॊफहता, कश्मऩ सॊफहता, शॊख सॊफहता, ऩुरस्त्म सॊफहता,
भाकंडे म आफद धभा ग्रॊथं भं दस्ऺणावतॉ शॊख को आमुवद्ध
ा क औय सभृत्रद्ध दामक होने का उल्रेख सभरता हं ।
8 जून 2013 को शसन जमॊती, शनैश्चयी अभावस्मा, शसन अभावस्मा का दर
ा सॊमोग होने के कायण ऩाठकं के भागादशान
ु ब
हे तु शसनदे व से सॊफॊसधत ऩुयाने रेखं का ऩुन् प्रकाशन फकमा गमा हं ।

इस अॊक भं प्रकासशत शॊख से सॊफॊसधत जानकायीमं के त्रवषम भं साधक एवॊ त्रवद्रान ऩाठको से अनुयोध हं , मफद दशाामे
गए शॊख के राब, प्रबाव इत्मादी के सॊकरन, प्रभाण ऩढ़ने, सॊऩादन भं, फडजाईन भं, टाईऩीॊग भं, त्रप्रॊफटॊ ग भं, प्रकाशन
भं कोई िुफट यह गई हो, तो उसे स्वमॊ सुधाय रं मा फकसी मोग्म ज्मोसतषी, गुरु मा त्रवद्रान से सराह त्रवभशा कय रे ।
क्मोफक त्रवद्रान ज्मोसतषी, गुरुजनो एवॊ साधको के सनजी अनुबव त्रवसबन्न कविो शॊख के प्रबावं का वणान कयने भं बेद
होने ऩय शॊख की, ऩूजन त्रवसध एवॊ उसके प्रबावं भं सबन्नता सॊबव हं ।

आऩका जीवन सुखभम, भॊगरभम हो शसनदे व की कृ ऩा आऩके ऩरयवाय ऩय
फनी यहे । शसनदे व से मही प्राथना हं …
सिॊतन जोशी

6

जून 2013

***** शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत सूिना *****
 ऩत्रिका भं प्रकासशत शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक भं शॊख से सॊफॊसधत रेख गुरुत्व कामाारम के असधकायं के साथ ही
आयस्ऺत हं ।

 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक भं वस्णात रेखं को नास्स्तक/अत्रवश्वासु व्मत्रक्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हं ।

 शॊख भहत्व का त्रवषम आध्मात्भ से सॊफॊसधत होने के कायण इसे बायसतम धभा शास्त्रं से प्रेरयत होकय
प्रस्तुत फकमा हं ।

 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत त्रवषमो फक सत्मता अथवा प्राभास्णकता ऩय फकसी बी प्रकाय की
स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हं ।
 शॊख भहत्व से सॊफॊसधत सबी जानकायीकी प्राभास्णकता एवॊ प्रबाव की स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक
की नहीॊ हं औय ना हीॊ प्राभास्णकता एवॊ प्रबाव की स्जन्भेदायी के फाये भं जानकायी दे ने हे तु कामाारम
मा सॊऩादक फकसी बी प्रकाय से फाध्म हं ।
 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत रेखो भं ऩाठक का अऩना त्रवश्वास होना आवश्मक हं । फकसी बी
व्मत्रक्त त्रवशेष को फकसी बी प्रकाय से इन त्रवषमो भं त्रवश्वास कयने ना कयने का अॊसतभ सनणाम स्वमॊ का
होगा।
 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत फकसी बी प्रकाय की आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।
 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ अनुशध
ॊ ान के आधाय ऩय फदए गमे हं ।
हभ फकसी बी व्मत्रक्त त्रवशेष द्राया प्रमोग फकमे जाने वारे, भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी
स्जन्भेदायी नफहॊ रेते हं । मह स्जन्भेदायी भॊि-मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोको कयने वारे व्मत्रक्त फक
स्वमॊ फक होगी।
 क्मोफक इन त्रवषमो भं नैसतक भानदॊ डं, साभास्जक, कानूनी सनमभं के स्खराप कोई व्मत्रक्त मफद नीजी
स्वाथा ऩूसता हे तु प्रमोग कताा हं अथवा प्रमोग के कयने भे िुफट होने ऩय प्रसतकूर ऩरयणाभ सॊबव हं ।
 शॊख भहत्व त्रवशेषाॊक से सॊफॊसधत जानकायी को भाननने से प्राद्ऱ होने वारे राब, राब की हानी मा
हानी की स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक की नहीॊ हं ।
 हभाये द्राया ऩोस्ट फकमे गमे सबी शॊख भहत्व की जानकायी एवॊ भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय
स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधुगण ऩय प्रमोग फकमे हं स्जस्से हभे हय प्रमोग मा कवि, भॊि-मॊि मा
उऩामो द्राया सनस्श्चत सपरता प्राद्ऱ हुई हं ।

असधक जानकायी हे तु आऩ कामाारम भं सॊऩका कय सकते हं ।
(सबी त्रववादो केसरमे केवर बुवनेश्वय न्मामारम ही भान्म होगा।)

जून 2013

7

बायतीम सॊस्कृ सत भं शॊख का भहत्व

 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
शॊख का इसतहास बायतीम सॊस्कृ सत भं असत प्रासिन एवॊ

बाग भं गॊगा औय सयस्वती के साथ-साथ साये तीथं का

दे वकारीन मुग से िरा आयहा है । त्रवऻानीक िष्टी कोण

वास है । मह कुफेय का बी स्वरूऩ हं अत् इसका ऩूजन

से सभझे तो शॊख सभुि भं ऩाए जाने वारे एक प्रकाय के

अवश्म कयना िाफहए। इसके दशान भाि से सबी कष्ट दयू

जीव घंघे का खोर होता है । मह खोर घंघे अऩनी सुयऺा
के सरए फनाता है ।

हो जाते हं । स्जस प्रकाय सूमा के आने ऩय फपा त्रऩघर

जाती है । फपय स्ऩशा की तो फात ही व्मथा है । शॊख का

जानकाय त्रवद्रानो ने अऩने अनुबवं एव ्ॊ अनुशॊधान

स्वरूऩ कुफेय के सभान है , अत् मह ऩूजनीम है ।

से ऩामा हं की ऩौयास्णक कार से ही सभुिी जीवं का मह

शॊख से श्रीकृ ष्ण मा रक्ष्भी आफद दे वी-दे वता(शास्त्रं

खोर अथाात शॊख भनुष्म के सरए त्रवसबन्न प्रकाय से

भं शॊख से सशवसरॊग ऩूजन वस्जात भाना गमा हं ।) के

उऩमोगी यहा हं । शॊख की आध्मास्त्भक उऩमोगीता के

त्रवग्रह ऩय जर मा ऩॊिाभृत असबषेक कयने ऩय दे वता

साथ ही इसके िूण,ा बस्भ आफद का औषसधम रुऩ भं

शीघ्र प्रसन्न होते हं ।

बी त्रवशेष रुऩ से प्रमोग होता यहा हं ।

जानकाय त्रवद्रानं का अनुबव हं की

कुछ त्रवद्रानं का भानना हं की

एक उत्तभ दोष यफहत शॊख जो भनुष्म के

बायत भं जगन्नाथऩुयी (उड़ीसा) को शॊख

सरए सबी प्रकाय से ऩयभ ् कल्माणकायी

ऺेि

कहा

जगन्नाथऩुयी

जाता
का

है ,

बौगोसरक

क्मंफक

हं । मह भनुष्म को दै सनक जीवन भं इष्ट

आकाय

आयाधना, ऩूजा-अिाना आफद के सरए

शॊख के सभान सदृश्म है ।

शॊख का धासभाक भहत्व:
फहन्द ू सॊस्कृ सत भं शॊख को अत्मॊत भहत्त्वऩूणा

भाना जाता है । त्रवसबन्न धभाग्रॊथं भं शॊख की त्रवसबन्न

प्रेरयत कयता है ।
शॊख को सनातन धभा का प्रतीक
भाना गमा है , इस सरए फहन्द ू धभा भं ऩूजा

स्थर ऩय शॊख यखने की ऩयॊ ऩया है

त्रवशेष रुऩ से

उऩमोगीताओॊ का त्रवस्तृत वणान सभरता हं ।

प्रिसरत हं ।

ब्रह्मवैवता ऩुयाण भं उल्रेख सभल्ता है :

शॊख की भाॊगसरक आकृ सत वारे सिन्ह ऩूजास्थर भं होने

शॊख िन्िाकादै वत्मभ ् भध्म वरुणदै वतन ्।
ऩृष्ठे प्रजाऩसता त्रवद्यादग्रे गॊगा सयस्वतीभ ्॥

िैरोक्मे मासन तीथाात्रऩ वासुदेवस्म िाऻमा।

शॊखे सतष्ठस्न्त त्रवप्रेन्ि तस्भा शॊख प्रऩुजमेत ्।।
दशानेन फह शॊखस्म की ऩुन्

त्रवरमॊ मासतॊ ऩाऩसन फहभवद् बास्कयोदमे्।।

अथाात: मह शॊख िॊि औय सूमा के सभान दे व स्वरूऩ है ।
इसके भध्म बाग भं वरुण, ऩृष्ठ बाग भं ब्रह्मा औय अग्र

फहन्द ू धभा की भान्मताओॊ के अनुसाय शॊख मा

से बवन के सबी प्रकाय के अरयष्टं एवॊ असनष्टं का स्वत्
नाश हो जाता है औय उस बवन भं सनयॊ तय सुख,
सौबाग्म की वृत्रद्ध होती है । कुछ जानकाय त्रवद्रानं ने शॊख
को सनसध का प्रतीक कहा है ।
धभाशास्त्र भं शॊख का अष्टससत्रद्ध एवॊ नवसनसध भं

भहत्त्वऩूणा स्थान फतामा गमा है । धासभाक भान्मता के
अनुसाय शॊख के स्ऩशा से साधायण जर बी गॊगाजर के
सभान ऩत्रवि हो जाता हं , मही कायण हं की फहन्द ू धभा भं

त्रवसबन्न प्रकाय की धासभाक फक्रमाओॊ भं शॊख के जर का

जून 2013

8

प्रमोग त्रवशेष रुऩ से फकमा जाता है । फहन्द ू भॊफदयं भं शॊख

इष्ट आयाधना के दौयान शॊख की ध्वसन हभाये

भं शुद्ध जर बयकय दे वी-दे वता की आयती की जाती है ।

सबतय श्रद्धा वा आस्था का सॊिाय कयती हं औय मुद्ध के

आयती की सभासद्ऱ ऩय शॊख का जर उऩस्स्थत बक्तं ऩय

दौयान शॊख की ध्वसन मोद्धाओॊ के जोश भं वृत्रद्ध कयती हं ।

सछड़का जाता हं ।

धभाशास्त्रं के जानकायं का कथन हं की मुद्ध भं

त्रवद्रानं का कथन हं की जो भनुष्म बगवान श्री

प्रथभ फाय शॊख का उऩमोग दे व-असुय के त्रफि के मुद्ध भं

कृ ष्ण को शॊख भं जर, पूर औय अऺत यखकय उन्हं

फकमा गमा था, फतामा जाता हं की इस मुद्ध भं सबी

अध्मा दे ता है , उसे अनन्त ऩुण्म परं की प्रासद्ऱ होती है ।

दे व-दानव अऩने-अऩने शॊखं के साथ मुद्ध बूसभ भं आए

शॊख भं जर बयकय इष्ट भॊिं का उच्िायण कयते

हुए बगवान श्री कृ ष्ण को स्नान कयाने से भनुष्म के
सकर ऩाऩं का नाश होता है ।

कुछ त्रवद्रानं का कथन हं

थे। उस मुद्ध के दौयान शॊखं फक ध्वसन के साथ मुद्ध
आयॊ ब होता औय ध्वसन के साथ ही मुद्ध ख़त्भ होता था।

ऐसी शास्त्रोक्त भान्मता हं की दे व-दानव के उस मुद्ध के

की अनेक ऩूजा,

फाद से ही प्राम् हय दे वी-दे वता अऩने साथ शॊख यखते है ।

अनुष्ठान, मऻ आफद भं शॊख का प्रमोग असनवामा भाना

असधकाॊश शॊख वाभावतॉ होते हं औय वाभावतॉ

गमा हं , वह धासभाक कामा शॊख के त्रफना ऩूणा नहीॊ भाना
जाता है ।
कुछ त्रवसशष्ट साधनाओॊ भं बी शॊख

शॊख

फाज़ाय

भं

आसानी

से

उऩरब्ध

हो

जाते

हं ,

दस्ऺणावतॉ शॊख को असत दर
ा भाना जाता
ु ब
हं ।

का त्रवशेष रुऩ से प्रमोग फकमा जाता हं ।

वाभावतॉ शॊख को बगवान श्री त्रवष्णु का

भान्मता हं की शॊख भनुष्म की इस्च्छत

स्वरुऩ भान कय उसे ऩूजा जाता है औय

भनोकाभनाएॊ शीघ्र ऩूणा कयने भं सहामक

दस्ऺणावतॉ शॊख को दे वी भहारक्ष्भी का

होते हं । कुछ जानकायं का तो महा तक

स्वरुऩ भान कय उसे ऩूजन फकमा जाता

कथन हं की जो भनुष्म को सुख, सभृत्रद्ध से

है ।

मुक्त सुखभम जीवन व्मसतत कयना िाहते

त्रवद्रानं का कथन हं की स्जस घय भं

हं उन्हं अऩने ऩूजा स्थान भं शॊख अवश्म
स्थात्रऩत कयना िाफहए। त्रवसबन्न शास्त्रं भं शॊख को
त्रवजम, सुख, सभृत्रद्ध, ऐश्वमा, कीसता औय रक्ष्भी का प्रतीक
फतामा गमा है ।

दस्ऺणावतॉ शॊख होता हं उस घय भं सदा
दे वी भहारक्ष्भी का वास यहता है ।
कुछ तॊि त्रवद्याके जानकायं के कथन अनुसाय
दस्ऺणावतॉ शॊख का मफद ऩूणा त्रवसध-त्रवधान से ऩूजन

शॊख सत मुग से रेकय क्रभश् िेता मुग द्राऩय

फकमा जामे, औय दस्ऺणावतॉ शॊख को रार कऩड़े भं

मुग औय कसर मुग भं बी रोगं को अऩनी औय आकत्रषात

रऩेटकय अऩने घय के ऩूजन स्थान भं स्थात्रऩत कयने से

कयते यहे है , सत मुग से रेकय आज तक उसकी

घय की त्रवसबन्न ऩये शासनमाॊ दयू होती है ।

भहत्वता एवॊ उऩमोगीता अत्मॊत अद्भत
ु यही हं स्जस के

दस्ऺणावतॉ शॊख को अऩनी सतज़ोयी भे यखने से

कायण ही इसे दे व, दानव औय भानव सबी ने शॊख को

घय भं सनयॊ तय सुख-सभृत्रद्ध फढ़ती है । इसी सरए जानकाय

अऩने राबाथा इस्तेभार कयते आमे हं । शॊख की भहत्वता

त्रवद्रान घय भं दस्ऺणावतॉ शॊख को स्थात्रऩत कयना

इतनी असधक हं की इसका अनुभान इसी फात से रगा

अत्मॊत शुब एवॊ भॊगरकायी भानते है ।

सकते हं की शॊख भुख्मत् इष्ट आयाधना से रेकय मुद्ध
बूसभ तक अऩना त्रवशेष भहत्त्व औय स्थान यखता है ।

***

जून 2013

9

दस्ऺणावता शॊख का धासभाक भहत्व

 सिॊतन जोशी, स्वस्स्तक.ऎन.जोशी
त्रवद्रानो ने 3 तोरे के शॊख को उत्तभ औय 25

सछि यहीत अवस्था भं भोड़ कय कान के ऩास यखा जामे

तोरे से फड़ा असत उत्तभ फतामा हं । ऩूजन हे तु उज्जवर

तो बी हभं ॐकाय की ध्वसन आसानी से सुनाई दे सकती

वणा का शॊख असत उत्तभ होता हं ।

हं ।

ऩौयास्णक भान्मताओॊ के अनुशाय शॊख की ऩयख

इस सरए शॊख की ऩयख फकसी जानकाय से कयवाना

ऩानी भं नभक डार कय उस ऩानी भं शॊख को डार कय

उसित होगा मा फकसी त्रवश्वस्त व्मत्रक्त मा सॊस्था से ही

सात फदन यखने ऩय नकरी शॊख टू ट जाता हं मा उसभं

प्राद्ऱ कयं ।

दयाये हो जाती हं , जफकी असरी शॊख अऩनी

शॊख के राबकायी प्रमोग:

वास्तत्रवक स्स्थती भं यहता हं ।
शॊख मफद असरी होगा तो दोनं
अॊगूठे के नाखून ऩय यखने से वह

शयीय ऩय सछड़कने से ऩाऩं का ऺम

कुछ हदतक गोर धुभता हं ।

होता है ।

मफद शॊख असरी हो तो उसे कान के

ऩास यखने से उसभं से ॐकाय की

हं , औय अऩनी कृ ऩा फनाएॊ यखती हं ।

सछि हो तो ॐकाय की ध्वसन सुनाई

नहीॊ दे ती। इस सरमे मह सबी ऩुयातन
असरी शॊख प्राद्ऱ कयना आभ व्मत्रक्त के सरए दस्
ु साध्म
कामा हं ।

त्रवशेष नोट:
आजकर आधुसनक तकनीकी उऩकयणो की भदद से
कृ त्रिभ अथाात नकरी शॊख फनामे जाते हं । जो नभक वारे
ऩानी भं डारने ऩय नातो टू टते हं औय नाहीॊ उसभे दयाये
ऩड़ती हं , स्जस कायण ऩौयास्णक ऩद्धत्रत्त से असरी नकरी
की ऩहिान साधायण व्मत्रक्त की ऩहुॊि के फाहय हं ।

दोनं अॊगूठे के नाखून ऩय अन्म वस्तु मा नकरी शॊख बी
धूभ सकते हं ।
ॐकाय की ध्वसन नकरी शॊखं भं से बी आसकती हं मफद
उसभं कोई सछि नहो तो। ॐकाय की ध्वसन तो सछि
यहीत फकसी बी छोटे भुख वारे रॊफे ऩाि मा ग्रास से बी
आसकती हं , मफद अऩनी हथेरी को कटोयी के सभान

शॊख भं जर रेकय ऩूजन कयने

ऩय दे वी भहारक्ष्भी शीध्र प्रसन्न होती

ध्वसन सुनाई दे ती हं . मफद शॊख भं

उऩामो को अऩना कय शॊख की जाॊि कयना औय

शॊख भं जर बयकय भस्तक औय

कुछ जानकाय त्रवद्रानं का अनुबव

यहा हं की शॊख भं दध
ू बयकय मफद वन्ध्मा

स्त्री को ऩीरामा जामे तो उसे बी सॊतान की प्रासद्ऱ हो
सकती हं ।
 स्जस घय भं शॊख होता हं उस घय भं सनवास कतााओॊ
का सबी प्रकाय से भॊगर होता हं । उसके सबी योग,
शोक का नाश होता हं उसके भान-सम्भान एवॊ ऩदप्रसतष्ठा भं वृत्रद्ध होती हं ।

दस्ऺणावसता शॊख की ऩूजन त्रवसध:
प्रात् स्नान आफद से सनवृत्त हो कय, स्वच्छ कऩड़े ऩहन
कय, प्रथभ दध
ू से फपय शुद्ध जर से शॊख को स्नान

कयामे। फपस स्वच्छ रार वस्त्र से उसे ऩोछे । फपय शॊख
को सोने मा िाॊदी के ऩि से भढ़ना िाफहए (अथाात शॊख
की उऩयी सतह को सोने मा िाॊदी के ऩि का आवयण
रगाकय ढ़क दे ना िाफहए), मफद सोने िाॊदी का ऩि

जून 2013

10

रगाना सॊबव न हो तो सोने मा िाॊदी की वयक (वयख,
वका, वखा, ऩणा, ऩन्नी Foil आफद नाभं से जाना जाता
हं ) बी िढ़ा सकते हं । फपय शॊख का अष्ट िव्मं से
षोडशोऩिाय ऩूजन कयं ।

उक्त भि का उच्िायण कयते हुवे शॊख को अष्ट िव्म व

सुगॊसधत इि िढ़ाएॊ। िाॊदी के फयतन भं दध
ू भं िीनी,
केसय, फादाभ, इरामिी सभरा कय नैवेद्य तैमाय कयं ।
सॊबव हो तो साथ भं पर बी यखं।
कऩूय से आयती कयं ।

शॊख का ऩूजन
सॊकल्ऩ

हाथ भं आिभनी भं रज रेकय नीिे दे मे भॊि से सॊकल्ऩ
कयं (जहाॊ अभुक के स्थान ऩय सॊफॊसधत वषा, भास आफद

ध्मान भॊि:

ॐ ह्रीॊ श्रीॊ क्रीॊ श्रीधय कयस्थाप्म ऩमोसनसध

का उच्िायण कयं ।)

जाताम रक्ष्भी सहोदयाम सिस्न्तभाथा सॊऩादकाम

अभुक सतथौ अभुख वायसे शुब नऺि कयण मोग

श्रीॊ

सभृत्रद्ध प्राप्त्मथे श्री दस्ऺणावतॉ शॊखस्म ऩूजनभ ्

काभधेनु सिन्ताभस्णनव सनसधरूऩाम ितुदाश यत्न

अथाात: आजके अभुक वषा, अभुक भास, अभुक ऩऺ,

दे वता

ॐ अिाद्य अभुक वषे अभुक भासे अभुक ऩऺे

श्री श्रीदस्ऺणावता शॊखाम श्री कयाम, ऩूज्माम क्रीॊ

रग्ने भभ ससद्धमथे फहयण्म गोदासा वाहना फह

प्रशस्मान्गोऩान्गसॊमत
ु ाम

अहॊ करयष्मे।

ऩरयवृत्ताम अष्टादश भहाससत्रद्ध सफहताम श्रीरक्ष्भी

अभुक सतसथ, अभुक वाय को भेये कामा की ससत्रद्ध के सरए

शॊखभहासनधमे नभ्।

सुवणा, गाम, दास, वाहन आफद सभृत्रद्ध की प्रासद्ऱ के सरए
भं श्री दस्ऺणावतॉ शॊख जा ऩूजन कय यहा हूॊ।

(उक्त भॊि उिायण कय शॊखका जर ऩािे भं छोड़ दे )

ऩूजन भॊि:

ह्रीॊ

कृ ष्णदे व

सवााबयण

कल्ऩवृऺाम

कयतर

बूत्रषताम

स्स्थताम

रसरताम

फीज भॊि अथवा ऩाॊि जन्म गामिी शॊख भॊि का ग्मायह
भारा जऩ कयना बी आवश्मक है ।

जऩ भॊि:

नभ्।

प्रबवाम नभ्।

ॐ ह्रीॊ श्रीॊ क्रीॊ ब्रूॊ दस्ऺण शॊखसनधमे सभुि

भॊि ससद्ध दर
ा साभग्री
ु ब
हत्था जोडी- Rs- 370

घोडे की नार- Rs.351

भामा जार- Rs- 251

त्रफल्री नार- Rs- 370

भोसत शॊख-Rs- 550 से 1450

धन वृत्रद्ध हकीक सेट Rs-251

ससमाय ससॊगी- Rs- 370

श्री

ध्मान भॊि आवाहन अथाात ् स्तुसत भॊि है । इसके असतरयक्त

ॐ ह्रीॊ श्रीॊ क्रीॊ श्रीधय कयस्थाप्ममोसनसध जाताम
श्रीदस्ऺणावता शॊखम ह्रीॊ श्रीॊ क्रीॊ श्रीकयाम ऩूज्माम

नभ्

दस्ऺणावतॉ शॊख- Rs- 550

इन्ि जार- Rs- 251

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फीज भॊि:

शॊख का ऩूजन फदन के प्रथभ प्रहय भं कयने से याज्म ऩऺ

सभुिप्रबवाम नभ्।

शॊख का ऩूजन फदन के फद्रतीम प्रहय भं कयने से धन,

ॐ ह्रीॊ श्रीॊ क्रीॊ ब्रूॊ दस्ऺणभुखाम शॊखसनधमे

से सम्भान की प्रासद्ऱ होती हं ।
सॊऩत्रत्त व रक्ष्भी की प्रासद्ऱ होती हं एवॊ फुत्रद्ध का त्रवकास

शॊख का शाफय भॊि:

ॐ दस्ऺणावते शॊखाम भभ ् गृह धनवषाा कुरु कुरु
नभ्॥

होता हं ।
शॊख का ऩूजन फदन के तृतीम प्रहय भं कयने से सभाज भं
मश, कीसता एवॊ फुत्रद्ध की वृत्रद्ध होती हं ।

शॊख गामिी भॊि:

ॐ ऩान्िजन्माम त्रवद्महे । ऩावभानाम धीभफह।
तन्न शॊख् प्रिोदमात ्।

प्रसतफदन उक्त फकसी एक भॊि का शॊख के सम्भुख फैठकय
1, 3, 5, 7, 11 भाराएॊ जऩ कयना िाफहए। जऩ की
सभासद्ऱ ऩय जर को आकाश की ओय सछड़के।
ऋत्रद्ध-ससत्रद्ध तथा सुख-सभृत्रद्ध की प्रासद्ऱ के सरए हे तु मह
प्रमोग अत्मॊत राब प्रद हं ।
दोष यफहत दस्ऺणावतॉ शॊख का उऩयोक्त त्रवसध से ऩूजन

शॊख का ऩूजन फदन के ितुथा प्रहय भं कयने से सॊतान की
प्रासद्ऱ एवॊ वृत्रद्ध होती हं ।
त्रवशेष: फदन औय यािी के िाय-िाय प्रहय होते हं , कुर
आठ प्रहय का एक फदन होता हं । अथाात एक प्रहय तीन
घॊटे का होता है । सूमोदम के सभम से प्रथन प्रहय की
गणना कयनी िाफहए। सूमोदम सभम भं 3 घॊटे का सभम
जोड़ने ऩय दस
ू या प्रहय प्रायॊ ब होगा ऐसे तीन-तीन घॊटे
जोडकय क्रभश् तीसया औय िौथा प्रहय जान सकते हं ।

***

कयना अत्मॊत राबप्रद होता हं ।

भॊि ससद्ध त्रवशेष दै वी मॊि सूसि
आद्य शत्रक्त दग
ु ाा फीसा मॊि (अॊफाजी फीसा मॊि)

सयस्वती मॊि

खोफडमाय मॊि

सद्ऱसती भहामॊि(सॊऩूणा फीज भॊि सफहत)

नव दग
ु ाा मॊि

खोफडमाय फीसा मॊि

भहान शत्रक्त दग
ु ाा मॊि (अॊफाजी मॊि)

कारी मॊि

अन्नऩूणाा ऩूजा मॊि

सॊकट भोसिनी कासरका ससत्रद्ध मॊि

श्भशान कारी ऩूजन मॊि

एकाॊऺी श्रीपर मॊि

िाभुॊडा फीसा मॊि ( नवग्रह मुक्त)

दस्ऺण कारी ऩूजन मॊि

त्रिशूर फीसा मॊि

नवाणा फीसा मॊि

फगरा भुखी मॊि

याज याजेश्वयी वाॊछा कल्ऩरता मॊि

नवाणा मॊि (िाभुॊडा मॊि)

फगरा भुखी ऩूजन मॊि

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जून 2013

12

दस्ऺणावता शॊख से जुड़े गूढ़ यहस्म

 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, ऩॊ.श्री बगवानदास त्रिवेदी जी,
सुख-सभृत्रद्ध, धन-सॊऩत्रत्त, रयत्रद्ध-ससत्रद्ध एवॊ ऐश्वमा की

 स्जस स्त्री को सॊतान नहीॊ हो यही हो, सॊतान जीत्रवत

प्रासद्ऱ के सरए हभाये धभा शास्त्रं भेभ दस्ऺणावता शॊख का

न यहती हो, भृत सॊतान का जन्भ हो यहा हो ऐसी

अत्मासधक भहत्व फतामा गमा हं । दस्ऺणावता शॊख का

स्त्री को दस्ऺणावता शॊख का ऩूजन कयके स्जस गाम

भुख दामीॊ औय से खुरा होता हं ।

के फछ़डे जीत्रवत हो ऐसी गाम का दध
ू शॊख भं बय

शास्त्रोक्त भान्मता हं की स्जस घय भं त्रवसध-त्रवधान
से दस्ऺणावता शॊख का ऩूजन होता हं , उस घय भं धन,
सुख, सभृत्रद्ध, मश-फकसता की वृत्रद्ध होती हं । उस घय भं
रक्ष्भी स्स्थत होती हं ।

रं। 108 फाय भॊि फोर कय शॊख का दध
ू को प्रसाद के
रुऩ भं सेवन कयं । मह प्रमोग दध
ू के फदरे घी (थोड़ा

गयभ कयरे) का इस्तेभार कय सकते हं , इस प्रमोग
से स्त्रीको सॊतान होने की सॊबावनाएॊ फढ़ सकती हं ।

असरी नकरी ऩहिान के सरए शॊख को ऩाॊि फदन

 जो रोग नदी मा तीथा तक नहीॊ जा सकते ऐसे रोग

औय ऩाॊि यात तक ठॊ डे ऩानी भं यखे, मफद नकरी शॊख

दस्ऺणावता शॊख भं नदी मा तीथा का जर के छीॊटे

होगा तो टू ट जामेगा। इस प्रकाय असरी नकरी की ऩयख

अऩने भस्तक ऩय सछडकने, तथा अऩने त्रऩतृओॊ का

कयके शॊख का ऩूजन भं प्रमोग कयं ।

नाभ रेकय शॊख से तऩाण कयने से उसके सबी ऩाऩ

दहीॊ मा दे शी घी के सभान यॊ ग वारा शॊख उत्तभ
होता हं , धूसभर मा धुएॊ जैसे यॊ ग वारे शॊख को शॊस्खणी
(अथाात स्त्री जाती का शॊख) कहाॊ जाता हं ।
2.5 तोरा अथाात िीस ग्राभ से असधक वजन का
शॊख ऩूजन हे तु उत्तभ सभझे औय 2 तोरा मा उस्से कभ
वजन के शॊख को साधायण सभझे।

नष्ट हो जाते हं , तथा त्रऩतृओॊ का उद्धाय होता हं ,
उनको सद्दगसत प्राद्ऱ होती हं ।
 त्रवद्रानं का कथन हं की दस्ऺणावता शॊख भं जर बय
कय उससे बगवान त्रवष्णु का ऩूजन कयने से उसके
सात जन्भ के ऩाऩं का नाश होता हं ।
 स्जसके घय भं दस्ऺणावता शॊख होता हं उसके आमुष्म,

 त्रवद्रानं का भत हं की स्जस घय भं दस्ऺणावता शॊख

कीसता तथा धन की वृत्रद्ध होती हं । जो शॊख के जर

का ऩूजन होता हं उस घय भं सवादा भाॊगसरक कामा

को भस्तक ऩय सछड़कता हं उसके घयभं रक्ष्भी स्स्थय

सॊऩन्न होते हं , उस घय भं भाॊगसरक कामं के दौयान

होती हं ।

फकसी प्रकाय का त्रवघ्न-फाधाएॊ, त्रवरॊफ मा अशुब नहीॊ
होता हं ।
 शॊख के ऩीछे के फहस्से को सोने से जड़वाना उत्तभ होता हं ।
 दस्ऺणावता शॊख को ऩूजा स्थान भं स्थात्रऩत कय के
प्रसतफदन स्नानाफद के ऩश्चमात स्वच्छ वस्त्र धायण कय
प्रसतफदन ऩूजन कयं ।

 स्जस स्थान ऩय शॊखनाद होता हं वहाॊ रक्ष्भी का
स्स्थय सनवास होता हं ।
 जो दस्ऺणावता शॊख के जर से स्नान कयता हं उसे
सबी तीथं के स्नान का पर सभरता हं ।
 शास्त्रं भं शॊख को त्रवष्णु स्वरुऩ भाना गमा हं , शॊख
भं बगवान त्रवष्णु का वास होता हं । इस सरए जहाॊ

 ऩूवा फदशा भं फहनेवारी नदी भं स्नान कय नदी के

दस्ऺणावता शॊख होता हं वहाॊ बगवान त्रवष्णु का वास

जर को दस्ऺणावता शॊख भं बय कय अऩने भस्तक

होता हं जहाॊ बगवान त्रवष्णु का वास होता हं वहाॉ भाॉ

ऩय उस जर की धाय सगयाने से सबी प्रकाय के ऩाऩं

रक्ष्भी सनवास कयती हं । स्जससे जहाॉ भाॉ रक्ष्भी

का नाश होता हं ।

जून 2013

13

सनवास कयती वहाॉ योग, दोष, द्ु ख, दरयिता आफद
घयभं यह नहीॊ सकतं।

 शॊख को रस्क्ष्भ प्रासद्ऱ का उत्तभ साधन भाना गमा हं ।
 स्जस स्थान ऩय दस्ऺणावता शॊख होता हं वहाॊ बूत-प्रेत
आफद सबी प्रकाय के उऩिवं से यऺा होती हं ।
 शास्त्रं भं शॊख को सूमा िॊिभाॊ के सभान फदव्म गुणं
से मुक्त फतामा गमा हं ।
 धासभाक भान्मता हं की तीनं रोक भं स्जतने तीथा हं

वह सफ बगवान त्रवष्णु की आऻा से शॊख भं सनवास
कयते हं । शॊख के दशान से ऩाऩं का नाश होता हं ।

शॊख ध्वसन एवॊ शॊख जर के त्रवशेष राब:

आज तोऩ के गोरे मा फभ के शोय का जो असय
होता हं वहीॊ असय प्रािीन कार भं शॊख ध्वसन से होता

जर को सॊफॊसधत व्मत्रक्त ऩय सछड़कने से उसे ऩाऩं से
भुत्रक्त सभरती हं ।
 दस्ऺणावतॉ शॊख का जर जाद-ू टोना, नज़य, काभणटू भण जैसे असबिाय वारे कभं के दष्ु प्रबावं को नष्ट
कयने भं सभथा हं ।

दस्ऺणावता शॊख के प्रकाय:
शास्त्रं भं दस्ऺणावता शॊख के दं बेद फतामे हं : दस्ऺणावता
ऩुरुष शॊख औय दस्ऺणावता स्त्री शॊख।

छोटे आकायं वारे कभ वजन के दस्ऺणावता शॊख को स्त्री
दस्ऺणावता शॊख कहाॊ जाता हं , धुध
ॊ रे यॊ ग वारे शॊखं को
बी स्त्री दस्ऺणावता शॊख भाना जाता हं ।
वणा के अनुशाय दस्ऺणावता शॊख िाय प्रकाय के फतामे गमे हं ।
1- ब्राह्मण दस्ऺणावता शॊख:

था। शॊख ध्वसन से शिुओॊ की सेना का भनोफर टू ट जाता हं ।

जो शॊख हये मा सपेद यॊ ग का हो, छूने ऩय उसकी सतह

मफद जॊगर भं जहाॊ शॊख ध्वसन होती हं वहाॊ से

कोभर भहसूस हो, शॊख वजन भं हल्का हो उस शॊख को

शेय-फाध जैसे फहॊ सक ऩशु आने की फहम्भत नहीॊ कयते।

ब्राह्मण दस्ऺणावता शॊख कहाॊ गमा हं ।

जहयी जीवजॊतु बी वहाॊ से दयू यहते हं ।

2- ऺत्रिम दस्ऺणावता शॊख:

कुछ जानकायं का भानना हं की योग कायक शूक्ष्भ

जो शॊख हल्का यक्त वणा हो, शॊख के अॊश को अरग कयने

जीवाणु मा त्रवषाणु हवा भं होते हं स्जसे वामयस कहते हं ,

वारी कुछ ये खाएॊ फनी हो, शॊख की ध्वसन ककाश हो उस

जहाॊ प्रसतफदन प्रात् एवॊ सॊध्मा शॊख ध्वसन होती हं , वहाॊ

शॊख को ऺत्रिम दस्ऺणावता शॊख कहाॊ गमा हं ।

जीवाणु मा त्रवषाणु अथाात वामयस का उऩिव पैरता नहीॊ हं ।

3- वैश्म दस्ऺणावता शॊख:

 दस्ऺणावतॉ शॊख को धन के बॊडाय भं यखने से धन

जो शॊख भोटा हो, शॊख के हय अॊश ऩय ये खा हो तथा वह

की वृत्रद्ध, अन्न-बॊडाय भं यखने से अन्न की वृत्रद्ध,
वस्त्र के बॊडाय भं यखने से वस्त्र की वृत्रद्ध, अध्ममन व
ऩूजन कऺ भं यखने से ऻान की वृत्रद्ध, शमन कऺ भं
यखने से सुख-शाॊसत की वृत्रद्ध होती हं ।
 दस्ऺणावतॉ शॊख भं शुद्ध जर बयकय व्मत्रक्त, वस्तु,
बूसभ-बवन आफद ऩय सछड़कने से दब
ु ााग्म, असबशाऩ,
असबिाय, ग्रहं की अशुबता इत्माफद सभाद्ऱ हो जाती हं ।
 त्रवद्रानं कथन हं की ब्रह्म हत्मा, गो हत्मा जैसे
भहाऩातकं से भुत्रक्त ऩाने के सरए दस्ऺणावतॉ शॊख के

ऩीरे यॊ ग की हो उस शॊख को वैश्म दस्ऺणावता शॊख कहाॊ गमा हं ।
4- शुि दस्ऺणावता शॊख:
जो शॊख कठोय हो, शॊख का आकाय टे ड़ा भेड़ा हो, वजन
भं बायी हो, शॊख की ध्वसन ककाश, यॊ ग थोडा कारा हो
उस शॊख को शुि दस्ऺणावता शॊख कहाॊ गमा हं ।

दस्ऺणावता शॊख के भुख्म तीन गुण भाने गमे हं ।
1- आकाय भं गोराकाय हो, 2- शॊख की सतह भुरामभ
हो तथा 3- सनभार हो
मफद ऐसा शॊख फकसी कायण से टू ट जामे तो टू टे हुवे
बाग को सोने की वयख मा सोने के ऩत्तय से उसे ढॊ क
दे ना िाफहए।

जून 2013

14

शॊख नाद एक अद्भत
ु यहस्म

 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, फदऩक.ऐस.जोशी
आज वैऻासनक अनुसॊधान से मह सात्रफत हो गमा

त्रवद्रानं ने शॊख ध्वसन भं सभग्र ब्रह्माॊड को सनफहत

हं की सनमसभत शॊखनाद कयने से उसके सकायात्भक

भाना है । उनका भानना हं फक, अस्खर ब्रह्माॊड के सॊस्ऺद्ऱ

का नाश होता हं ।

ध्वसन है ।

प्रबाव से वातावयण भं व्माद्ऱ हासनकायक सूक्ष्भ जीवाणुओॊ

रूऩ को प्रकट कयने वारी मफद कोई शत्रक्त हं तो वह शॊख

जनकायं का भानना हं की शॊखनाद के दौयान

ऩौयास्णक कार भं शॊखनाद के भाध्मभ से मुद्धायॊ ब

वामुभॊडर भं कुछ त्रवशेष प्रकाय की तयॊ गे उत्ऩन्न होती हं ,

की

जो ब्रह्माॊड की कुछ अन्म तयॊ गं के साथ सभरकय अल्ऩ

आध्मास्त्भक कामं भं बी शॊख ध्वसन अऩना त्रवशेष

ऺणं भं ही सभग्र ब्रह्माॊड की ऩरयक्रभा कय रेती हं । उनका

भहत्व यखती हं ।

भानना हं की ब्रह्माण्ड की ऩरयक्रभा कयते हुवे जफ फकसी

घोषणा

औय

उत्साहवधान

फकमा

जाता

था।

शास्त्रं भं उल्रेख हं की भहाबायत के मुद्ध भं शॊख

एक तयॊ ग को जफ दस
ू यी अनुकूर तयॊ गं प्राद्ऱ होती हं तफ

का अत्मसधक उऩमोग हुवा था। मुद्ध के सभम के प्रभुख

दे ने वारी, योग, शोक आफद से यऺा कयने वारी, उसकी

फकमा गमा है -

दोनं तयॊ गं के सभनवम से भनुष्म को आत्भ फर-प्रेयणा

भहायसथमं के ऩास जो शॊख थे, उनका उल्रेख इस प्रकाय

ऩाॊिजन्मॊ रृषीकेशो दे वदत्तॊ धनञ्जम।

भनोकाभनाएॊ ऩूणा कयने वारी तयॊ गे उठने रगती हं , औय
भनुष्म अऩने कामा उद्दे श्म भं शीघ्र सपरता प्राद्ऱ कय रेता
हं ।
जानकायं का भानना हं की तयॊ गे इतनी शूक्ष्भ
होती हं की उसका प्रबाव हभं सयरता से िष्टी गोिय नहीॊ
हो ऩाता! शॊखनाद के सनयॊ तय प्रमोग से ही इन तयॊ गं के
प्रबावं को सभझा जा सकता हं ।
त्रवसबन्न शोध से मह ससद्ध हो िुका हं की वाद्यं व
ध्वसनमं का छोटे -फड़े सबी जीवं ऩय फहोत ही गहया
प्रबाव ऩड़ता हं । उसी प्रकाय शॊख ध्वसन के प्रबाव एवॊ
भहत्वता को आजका आधुसनक त्रवऻान बी भान िुका हं ।
हभाये त्रवद्रान ऋत्रष-भुसनमं ने अऩने मोगफर एवॊ
अनुसॊधानो का सूक्ष्भ अध्ममन कय के हजायं वषा ऩूवा ही
प्रकृ सत भं सछऩे गृढ़ यहस्मं को जान सरमा था, औय
प्रकृ सत के गृढ़ यहस्मं के ऻान को हभाये ऋत्रष-भुसनमं ने
त्रवसबन्न ग्रॊथं औय शास्त्रं के रुऩ सहे ज कय भं प्रदान
फकमा हं । शॊख ध्वसन एवॊ शॊख के त्रवसबन्न राब की शोध
का श्रेम बी हभाये ऋत्रष-भुसनमं को ही जाता हं ।

ऩौण्रॊ दध्भौ भहाशॊखॊ बीभकभाा वृकोदय॥

अनन्तत्रवजमभ ् याजा कुन्तीऩुिो मुसधत्रष्ठय।
नकुर सहदे वश्च सुघोषभस्णऩुष्ऩकौ॥

काश्मश्च ऩयभेष्वास सशखण्डी ि भहायथ।

धृष्टद्युम्नो त्रवयाटश्च सात्मफकश्चाऩयास्जता्॥
िऩ
ु दो िौऩदे माश्च सवाश ऩृसथवीऩते।

सौबिश्च भहाफाहु् शॊखान्दध्भु् ऩृथक्ऩृथक् ॥
अथाात ्: श्रीकृ ष्ण बगवान ने ऩाॊिजन्म नाभक, अजुन
ा ने
दे वदत्त औय बीभसेन ने ऩंर शॊख फजामा। कुॊती ऩुि याजा

मुसधत्रष्ठय ने अनन्तत्रवजम शॊख, नकुर ने सुघोष एवॊ
सहदे व ने भस्णऩुष्ऩक नाभक शॊख का नाद फकमा। इसके
अरावा

काशीयाज,

सशखॊडी,

धृष्टद्युम्न,

याजा

त्रवयाट,

सात्मफक, याजा िऩ
ु द, िौऩदी के ऩाॉिं ऩुिं औय असबभन्मु
आफद सबी ने अरग-अरग शॊखं का नाद फकमा।

जून 2013

15

आफद जीवं से फिाने के सरए प्रसत भॊगरवाय को
शॊखनाद कयना राबप्रद भाना हं ।
 शॊखं का जर फनाने हे तु शॊख भं 12 से 24 घॊटे जर
बयकय यखा जाता हं ।
 त्रवसबन्न ग्रॊथं एवॊ शास्त्रं भं उल्रेख सभरते हं की
शॊख ध्वसन के प्रबाव से भनुष्म ही नहीॊ वयन ऩशुऩस्ऺमं को बी सम्भोफहत फकमा जा सकता हं ।
 तॊि शास्त्रं भं उल्रेख हं की दोष यफहत शॊखनाद की
ध्वसन तयॊ ग भनुष्म की कुॊडसरनी एवॊ रुििक्र ऩय
भाना जाता हं की मोद्धाओॊ द्राया मुद्ध बूसभ भं
अद्भत
ु शौमा औय शत्रक्त के प्रदशान का आधाय शॊखनाद ही

प्रबाव डारती हं व शयीय की सुषुद्ऱ शत्रक्त जाग्रत होने
रगती हं ।

हं । मही कायण हं की ऩुयातन कार भं मोद्धाओॊ द्राया मुद्ध

 शास्त्रकायं ने शॊख ध्वसन के अद्भत
ु प्रबावं का वणा

भं शॊखनाद प्रमोग फकमा जाता था। बगवान श्रीकृ ष्ण का

कयते हुवे फतामा हं की शॊखनाद के प्रबाव से फसधयता

ऩाॊिजन्म नाभक शॊख तो एकदभ अद्भत
ु औय अफद्रतीम

दयू होना सॊबव हं ।

होने के कायण हीॊ भहाबायत भं त्रवजम का प्रतीक फन

 शॊखजर के सनमसभत सेवन से भूकता औय हकराऩन
दयू हो सकता हं ।

गमा।
रृदम को झॊकृत कयने, ऩुन् कॊत्रऩत कयने व
आनस्न्दत कयने भं शॊख ध्वसन का प्रबाव अद्भत
ु यहा हं ।
आज बी जफ फकसी धासभाक कामा मा भाॊगसरक
कामा के दौयान जफ शॊखनाद होता हं तो वहाॊ ऩय
उऩस्स्थत रोगं का तन-भन आनस्न्दत हो जाता हं ।

 मफद गबावसत स्त्री शॊखजर का सनमसभत सेवन कयं तो
होने वारी सॊतान स्वस्थ एवॊ सुॊदय होती हं ।
 सनमसभत शॊख ध्वसन का श्रवण कयने से रृदम
अवयोध, रृदम धात (फदर का दौया) नहीॊ होता।
 शॊख पूॉकने से व्मत्रक्त के पेपड़े शत्रक्तशारी होते हं ,

शॊखनाद के त्रवसबन्न प्रबावं का उल्रेख हभं अनेक शास्त्र

क्मंफक शॊख पूॉकने ऩय ऩहरे हवा पेपड़ं भं जभा

एवॊ ग्रॊथं भं सभरता है ।

होती हं , फपय उसे भुॉह बयकय शॊख भं पूॉकते हं । इस

 कुछ कृ त्रषकामा से जुड़े रोगं नं अऩने खेतं भं

फक्रमा से आॉत, श्वास नरी पेपड़े एक साथ काभ कयते हं ।

शॊखनाद द्राया अऩनी पसर के उत्ऩादन भं वृत्रद्ध कयके

 शॊखनाद सनयॊ तय कयने ऩय दभा, खाॉसी, मकृ त आफद

शॊख ध्वसन के भाध्मभ से सपरता प्राद्ऱ की हं ।
 त्रवद्रानं का अनुबव हं की पसरं को ऩानी दे ते सभम
शुब भुहूता भं 108 शॊखोदक (108 शॊखं का जर)
सभरा कय पसर भं दे ने से पसर के उत्ऩादन भं
वृत्रद्ध होती हं , अनाज के बॊडाय गृह भं कीड़ं -भकोड़े

योग जड़ से नष्ट हो जाते हं ।
 शॊखजर के सनमसभत सेवन से शीत त्रऩत्त, श्वेत प्रदय,
यक्त की अल्ऩता आफद योग दयू हो जाते हं ।

***

जून 2013

16

हभाये जीवन भं शॊख का भहत्व

 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी, श्रेमा.ऐस.जोशी
शॊख की उत्ऩत्रत्त के त्रवषम भं शास्त्रं भं उल्रेख है
फक सभुि भॊथन के सभम िौदह प्रकाय के यत्नं भं शॊख
बी सनकरा।
भुख्म रुऩ से शॊख की उत्ऩत्रत्त जर से ही होती है ।
जर ही जीवन का आधाय है मही कायण हं की सृत्रष्ट की
उत्ऩत्रत्त बी जर से हुई है । अत: जर से उत्ऩत्रत्त के

वाभावृत्रत्त शॊख: स्जस शॊख का भुख फाएॊ हाथ ऩय ऩड़ता हं
उसे वाभावृत्रत्त शॊख कहा जाता है ।
दस्ऺणावृसत शॊख औय भध्मावृत्रत्त शॊख दर
ा भाने
ु ब

गम हं क्मोकी मह आसानी से उऩरब्ध नहीॊ होते हं ।

मह दोनं शॊख अऩनी दर
ा ता एवॊ िभत्कारयक
ु ब

कायण शॊख की भहत्वता सवाासधक यही हं । अनेकं दे वी-

गुणं के कायण ही अन्म शॊख की अऩेऺा असधक

दे वता के एक हाथ भं शॊख शोबामभान होता हं । मही

भूल्मवान होते हं ।

कायण हं कई की सफदमं से शॊख का उऩमोग त्रवसबन्न
धासभाक अनुष्ठानं भं त्रवशेष रूऩ से फकमा जाता है ।

तीन शॊखं के अरावा अन्म शॊखं प्रभुख शॊख

शॊख के प्रभुख बेद

रक्ष्भी शॊख, गोभुखी शॊख, काभधेनु शॊख, त्रवष्णु

शॊख के प्रकाय
वैसे तो प्राकृ सतक शॊख त्रवसबन्न प्रकाय के ऩामे जाते हं ।
इस सरए शॊख की त्रवसबन्नता एवॊ त्रवशेषता के अनुशाय ही
इनकी ऩूजन-ऩद्धसत भं बी सबन्नता ऩाई जाती है ।

शॊख, दे व शॊख, िक्र शॊख, ऩंर शॊख, सुघोष शॊख,
गरुड़ शॊख, भस्णऩुष्ऩक शॊख, याऺस शॊख, शसन

शॊख, याहु शॊख, केतु शॊख, शेषनाग शॊख, कच्छऩ
शॊख आफद प्रकाय के होते हं ।

शॊख के प्रकाय उसकी आकृ सत (अथाात उदय) के आधाय

फहन्द ु शास्त्रं भं 33 कयोड़ दे वी-दे वता का उल्रेख

ऩय भाने जाते हं ।
त्रवद्रानं ने शॊख के प्रभुख तीन प्रकाय फतामे हं
1-दस्ऺणावृत्रत्त शॊख
2-भध्मावृत्रत्त शॊख तथा
3-वाभावृत्रत्त शॊख।
दस्ऺणावृत्रत्त शॊख: स्जस शॊख का भुख दाफहने हाथ ऩय

सभरता हं । इन सबी दे वी-दे वताओॊ के अऩने अरग शॊख
भाने गमे हं , दे व-असुय सॊग्राभ भं सभुि से स्जन 14 यत्नं
की प्रासद्ऱ हुई थी उसभं त्रवसबन्न तयह के शॊख बी सनकरे,
स्जसभं से कई शॊखं का उऩमोग केवर ऩूजन के सरए
होते है ।
अबीतक प्राद्ऱ जानकायी के आधाय ऩय मह ऻात

ऩड़ता हं उसे दस्ऺणावृत्रत्त शॊख कहा जाता है ।

हुवा हं की त्रवश्व का सफसे फड़ा शॊख केयर याज्म भं

भध्मावृत्रत्त शॊख: स्जस शॊख का भुॉह फीि भं खुरता है ,

रॊफाई अॊदाज से आधा भीटय है तथा वजन दो फकरोग्राभ

उसे भध्मावृत्रत्त शॊख कहा जाता है ।

गुरुवमूय के श्रीकृ ष्ण भॊफदय भं सुशोसबत है , इस शॊख की
फतामा जाता है ।

जून 2013

17

त्रवत्रवध आकाय प्रकाय वारे शॊख को शुब एवॊ
भाॊगसरक भानकय रोग उसका ऩूजन कयते हं उसे अऩने
ऩास यखते हं । जो त्रवशेष आकृ सत वारे शॊख होते हं , स्जसे
सभृत्रद्ध औय सपरता का प्रतीक भान कय उसे त्रवशेष
साधना भं प्रमोग फकमा जाता है ।

सॊस्कृ त भं शॊखके त्रवत्रवध नाभं का उल्रेख
सभरता है ।

शॊख, सभुिज, कॊफु, सुनाद, ऩावनध्वसन, कॊफु,
कॊफोज, अब्ज, त्रिये ख, जरज, अणोबव, भहानाद,
भुखय,

दीघानाद,

फहुनाद, हरयत्रप्रम, सुयिय,
जरोद्भव, त्रवष्णुत्रप्रम, धवर, स्त्रीत्रवबूषण, अणावबव
आफद।

श्रेष्ठ होता है जफफक अशुद्ध अथाात ् भग्न शॊख गुणदामक
नहीॊ होता। गुणंवारा शॊख ही प्रमोग भं राना िाफहए।

प्राम् शॊख का प्रमोग ऩूजा-ऩाठ भं त्रवशेष रुऩ से फकमा
जाता है । जानकाय त्रवद्रानं का कथन हं की ऩूजन को
प्रायॊ ब भं शॊखभुिा से शॊख की प्राथाना कयनी िाफहए।

त्वॊ ऩुया सागयोत्ऩन्नो त्रवष्णुना त्रवधृत: कये ।
नसभत: सवादेवश्ै म ऩाञ्िजन्म नभो स्तुते।।

 वैऻासन

अनुशॊधान

के

अनुसाय

शॊख

ध्वसन

से

वातावयण से अशुत्रद्ध दयू होती हं औय वातावय शुद्ध
होता हं ।

 शॊख ध्वसन के ध्वसन ऺेि तक त्रवसबन्न प्रकाय के
हासनकायक कीटाणुओॊ का नाश हो जाता है ।
 आमुवद
े के जानकायं के अनुसाय शॊखोदक व बस्भ से

शॊखं के प्रकाय के फाये भं शास्त्र भं उल्रेख फकमा
गमा है

अथाात ्: सनभार व िन्िभा की काॊसत के सभानवारा शॊख

फद्रधासदस्ऺणावसतावााभावत्रत्तस्तुब
ा ेदत:

दस्ऺणावताशक
ॊ यवस्तु ऩुण्ममोगादवाप्मते

मद्गहृ े सतष्ठसत सोवै रक्ष्म्माबाजनॊ बवेत ्

अथाात ्: शॊख दो प्रकाय के होते हं दस्ऺणावतॉ एवॊ
वाभावतॉ। दस्ऺणावतॉ शॊख ऩुण्म के ही मोग से प्राद्ऱ

होता है । मह शॊख स्जस घय भं स्थात्रऩत होता है , वहाॊ
रक्ष्भी की वृत्रद्ध होती है । इसका प्रमोग अघ्मा आफद दे ने
के सरए त्रवशेषत: होता है । वाभवतॉ शॊख का ऩेट फाईं
ओय खुरा होता है । इसके फजाने के सरए एक सछि होता

ऩेट की फीभारय, ऩीसरमा, मकृ त, ऩथयी आफद योग
ठीक फकमा जा सकता हं ।
 ऩौयास्णक भान्मता है फक छोटे फच्िं छोटा शॊख
फाॉधने से तथा शॊख भं जर बयकय उसे असबभॊत्रित
कयके फच्िे को त्रऩराने से वाणी दोष नहीॊ होता, मफद
है तो वह दयू होने रगता है ।

 ऩुयाणं भं उल्रेख सभरता है फक फसधय, भूक एवॊ श्वास
योगी मफद शॊख फजामं तो सूनने व फोरने की शत्रक्त
ऩा सकते हं ।
 आधुसनक अनुसॊधान के अनुसाय शॊख फजाने से हभाये
पेपड़ं का व्मामाभ हो जाता है , श्वास सॊफॊधी योगं से
रडऩे वारी शत्रक्त भजफूत हो जाती है । ऩूजन के

है । इसकी ध्वसन से योगोत्ऩादक कीटाणु फरफहन ऩड़ जाते हं ।

सभम शॊख के जर को सबी ऩय सछड़कने से जर के

श्रेष्ठ शॊख के रऺण के त्रवषम भं शास्त्रं भं उल्रेख

 शॊख का जर स्वास््म औय हभायी हस्डडमं, दाॊतंके

फकमा गमा है

शॊखस्तुत्रवभर: श्रेष्ठश्चन्िकाॊसतसभप्रब:
अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगण
ु प्रद:

प्रबाव से कीटाणुओॊ नाश होता है ।
सरए फहुत राबदामक होता है ।

 अनुसॊधान से ऩता िरा हं की शॊख भं कैस्ल्शमभ,
पास्पोयस औय गॊधक के गुण सभाफहत होते हं जो
उसभं जर बयकय यखने ऩय जर भं आते हं ।

जून 2013

18

 जानकायं का भानना है फक शॊख के प्रबाव से सूमा की

 शॊख भं जो राबदामक घटक

हासनकायक फकयणं का अवयोधक होता हं । इस सरए

औय

फहन्द ू सॊस्कृ सत भं सुफह औय शाभ ऩूजा के सभम शॊख

सुवाससत औय कीटाणु यफहत हो जाता है । इसीसरए तो

ध्वसन का त्रवधान फतामा गमा हं ।

 वैऻासनक अनुसॊधान से मह ऩरयणाभ साभने आमा हं
की शॊख की ध्वसन जहाॊ तक जाती है , वहाॊ तक व्माद्ऱ

गॊधक

भौजूद

होते

हं ।

कैस्ल्शमभ, पास्पोयस
उसके

कायण

हभाये शास्त्रं भं शॊख जर को भहाऔषसध भाना जाता
है ।
 शॊखनाद से आसऩास की नकायात्भक ऊजाा का नाश

फीभारय उत्ऩन्न कयने औय फढ़ाने वारे कीटाणु नष्ट हो

होकय सकायात्भक ऊजाा का सॊिाय होता है ।

जाते हं । इससे हभाये आसऩास का वातावयण शुद्ध हो

 शॊख नाद से स्भयण शत्रक्त की वृत्रद्ध होती है ।

जाता है ।

जर

भॊि ससद्ध दर
ा साभग्री
ु ब

भॊि ससद्ध भारा

हत्था जोडी- Rs- 370, 550, 730, 1250, 1450

स्पफटक भारा- Rs- 190, 280, 460, 730, DC 1050, 1250

ससमाय ससॊगी- Rs- 370, 550, 730, 1250, 1450

सपेद िॊदन भारा - Rs- 280, 460, 640

त्रफल्री नार- Rs- 370, 550, 730, 1250, 1450

यक्त (रार) िॊदन - Rs- 100, 190, 280

कारी हल्दी:- 370, 550, 750, 1250, 1450,

भोती भारा- Rs- 280, 460, 730, 1250, 1450 & Above

दस्ऺणावतॉ शॊख- Rs- 550, 750, 1250, 1900

त्रवधुत भारा - Rs- 100, 190

भोसत शॊख- Rs- 550, 750, 1250, 1900

ऩुि जीवा भारा - Rs- 280, 460

भामा जार- Rs- 251, 551, 751

कभर गट्टे की भारा - Rs- 210, 280

इन्ि जार- Rs- 251, 551, 751

हल्दी भारा - Rs- 150, 280

धन वृत्रद्ध हकीक सेट Rs-251(कारी हल्दी के साथ Rs-550)

तुरसी भारा - Rs- 100, 190, 280, 370

घोडे की नार- Rs.351, 551, 751

नवयत्न भारा- Rs- 1050, 1900, 2800, 3700 & Above

ऩीरी कौफड़माॊ: 11 नॊग-Rs-111, 21 नॊग Rs-181

नवयॊ गी हकीक भारा Rs- 190 280, 460, 730

हकीक: 11 नॊग-Rs-111, 21 नॊग Rs-181

हकीक भारा (सात यॊ ग) Rs- 190 280, 460, 730

रघु श्रीपर: 1 नॊग-Rs-111, 11 नॊग-Rs-1111

भूॊगे की भारा Rs- 190, 280, Real -1050, 1900 & Above

नाग केशय: 11 ग्राभ, Rs-111

ऩायद भारा Rs- 730, 1050, 1900, 2800 & Above

कारी हल्दी:- 370, 550, 750, 1250, 1450,

वैजमॊती भारा Rs- 100,190

गोभती िक्र Small & Medium 11 नॊग-75, 101, 151, 201,

रुिाऺ भारा: 100, 190, 280, 460, 730, 1050, 1450

गोभती िक्र Very Rare Big Size : 1 नॊग- 51 से 550

भूल्म भं अॊतय छोटे से फड़े आकाय के कायण हं ।

(असत दर
ा फड़े आकाय भं 5 ग्राभ से 11 ग्राभ भं उऩरब्ध)
ु ब

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19

जून 2013

सशवसरॊग ऩूजन भं शॊख सनषेद्ध क्मो?

 सॊदीऩ शभाा
सशव ऩुयाण भं उल्रेख हं की एक शॊखिूड़ नाभ का भहाऩयाक्रभी दै त्म था। शॊखिूड जो दै त्मयाभ दॊ ब का ऩुि था। शादी
के ऩश्चमात कई वषो तक दै त्मयाज दॊ ब को कोई सॊतान नहीॊ हुई तफ उसने बगवान श्रीत्रवष्णु को प्रशन्न कयने के सरए

कठोय तऩ फकमा औय तऩ से प्रसन्न होकय बगवान श्रीत्रवष्णु प्रकट हुए। औय बगवान श्रीत्रवष्णु ने दै त्मयाज दॊ ब से वय
भाॊगने के सरए कहा तफ दॊ ब ने भहाऩयाक्रभी तीनं रोको भं अजेम ऩुि का वय भाॊगा औय त्रवष्णुजी तथास्तु फोरकय

अॊतय ध्मान हो गए। तफ दॊ ब के महाॊ शॊखिूड नाभक ऩुि का जन्भ हुआ औय शॊखिूड ने ऩुष्कय भं ब्रह्माजी की घोय
तऩस्मा कय उन्हं प्रसन्न कय सरमा। ब्रह्माजी ने वय भाॊगने के सरए कहा, तो शॊखिूड ने वय भाॊग सरमा फक वो दे वताओॊ
भं अजेम हो जाए। ब्रह्मा ने तथास्तु कहाॉ औय शॊखिूड को श्रीकृ ष्णकवि फदमा फपय वे अॊतय ध्मान हो गए।

जाते सभम ब्रह्माजी ने शॊखिूड को धभाध्वज की कन्मा तुरसी से त्रववाह कयने की आऻा दी। ब्रह्माजी की आऻा से
शॊखिूड औय तुरसी का त्रववाह हो गमा। ब्रह्माजी औय त्रवष्णुजी के वयदान के भद भं िूय दै त्मयाज शॊखिूड ने धीये -धीये
तीनं रोकं ऩय स्वासभत्व स्थात्रऩत कय सरमा।
दे वताओॊ ने िस्त होकय त्रवष्णु से सहामता भाॊगी रेफकन उन्हंने स्वमॊ दॊ ब को ऐसे ऩुि का वयदान फदमा था अत:
उन्हंने सशवजी को साया वृताॊत सुनामा औय दे वताओॊ को शॊखिूड के अत्मािायं से फिाने की प्राथाना की। सशव ने
दे वताओॊ का द्ु ख दयू कयने का सनश्चम फकमा औय शॊखिूड का वध कयने के सनकर गमे। रेफकन बगवान श्रीकृ ष्ण के
फदव्म कवि औय तुरसी के ऩासतव्रत धभा की वजह से सशवजी बी उसका वध कयने भं सपर नहीॊ हो ऩा यहे थे तफ

त्रवष्णु से ब्राह्मण रूऩ धायण कय दै त्मयाज शॊखिूड से उसका श्रीकृ ष्ण कवि दान भं प्राद्ऱ कय सरमा औय शॊखिूड का रूऩ
धायण कय तुरसी से ऩसत वेश भं भ्रसभत फकमा। तफ सशवजी ने शॊखिूड को अऩने त्रिशुर से बस्भ कय फदमा औय
उसकी हस्डडमं से शॊख का उद्गभ हुआ। धासभाक भान्मता के अनुशाय शॊखिूड त्रवष्णु बक्त था इससरए भाॉ रक्ष्भी-श्रीत्रवष्णु
को शॊख औय शॊख का जर असत त्रप्रम है । प्राम् सबी दे वी-दे वताओॊ को शॊख से जर िढ़ाने का त्रवधान है । रेफकन
सशवजी ने शॊखिूड का वध फकमा था इससरए शास्त्रं भं शॊख का जर सशव को सनषेध फतामा गमा है । इसी वजह से
सशवजी को शॊख से जर मा शॊख का जर नहीॊ िढ़ामा जाता है ।

बाग्म रक्ष्भी फदब्फी
सुख-शास्न्त-सभृत्रद्ध की प्रासद्ऱ के सरमे बाग्म रक्ष्भी फदब्फी :- स्जस्से धन प्रसद्ऱ, त्रववाह मोग,

व्माऩाय वृत्रद्ध, वशीकयण, कोटा किेयी के कामा, बूतप्रेत फाधा, भायण, सम्भोहन, तास्न्िक फाधा,
शिु बम, िोय बम जेसी अनेक ऩये शासनमो से यऺा होसत है औय घय भे सुख सभृत्रद्ध फक प्रासद्ऱ

होसत है , बाग्म रक्ष्भी फदब्फी भे रघु श्री फ़र, हस्तजोडी (हाथा जोडी), ससमाय ससन्गी, त्रफस्ल्र
नार, शॊख, कारी-सफ़ेद-रार गुॊजा, इन्ि जार, भाम जार, ऩातार तुभडी जेसी अनेक दर

ु ब
साभग्री होती है ।

भूल्म:- Rs. 1250, 1900, 2800, 5500, 7300, 10900 भं उप्रब्द्ध >> Order Now .

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जून 2013

20

शॊख ऩूजन से वास्तुदोष सनवायण

 त्रवजम ठाकुय
वास्तुशास्त्र के जानकायं का भानना हं की शॊख का भहत्व
केवर धासभाक कामं तक ही सीसभत नहीॊ है । ऩौयास्णक शास्त्रं
भं शॊखका वास्तु भं बी अत्मासधक भहत्त्व भाना गमा है ।
उनका भानना हं की आज-कर वास्तु-दोष के सनवायण के सरए
दस
ू यी सॊस्कृ सतमं व दस
ू ये दे शं की नकर कयके अनावश्मक,
फेकाय की िीज़ं का प्रमोग फकमा जाता है , उनके फदरे मफद
प्रकृ सत द्राया प्राद्ऱ शॊख आफद फदव्म वस्तुओॊ का प्रमोग फकमा
जामे तो उससे हभं कई प्रकाय के राब सयरता से प्राद्ऱ हो
सकते हं इस भं जयाबी सॊदेह नहीॊ हं । उनका भानना हं की
शॊख न केवर वास्तु दोषं के अशुब प्रबावं को कभ कयता है ,
शॊख स्जस स्थान ऩय स्थात्रऩत होता हं उस स्थान ऩय सुखशाॊसत के वृत्रद्ध, योगं का नाश व आयोग्म की प्रासद्ऱ, दीघाामु की प्रासद्ऱ, धन-धान्म की प्रासद्ऱ एवॊ वृत्रद्ध, सॊतान प्रासद्ऱ,
त्रवसबन्न दोषं का सनवायण, जीवन भं आने वारी छोटी-फड़ी अनेक रुकावटं एवॊ सभस्माओॊ को दयू कयने भं बी सऺभ
है । हभाये ग्रॊथं भं तो शॊख को ऩाऩ नाशक फतामा गमा है । त्रवद्रानं का भानना हं की उसित ऻान एवॊ भागादशान से शॊख

के भाध्मभ से व्मत्रक्त अऩनी त्रवसबन्न प्रकाय की काभनाओॊ को अवश्म ऩूया कय सकता है । शास्त्रोक्त भान्मता के अनुशाय
स्जस घय भं सनमसभत शॊखनाद की ध्वसन होती है उस घयभं सनवास कताा को कई प्रकाय के योगं से स्वत् ही भुत्रक्त
सभर जाती है । दोष यफहत दस्ऺणावतॉ शॊख के त्रवसधवत ऩूजन से घय भं धन-सभृत्रद्ध की वृत्रद्ध होती है ।

भॊि ससद्ध ऩन्ना गणेश
बगवान श्री गणेश फुत्रद्ध औय सशऺा के कायक ग्रह फुध के असधऩसत दे वता हं ।
ऩन्ना गणेश फुध के सकायात्भक प्रबाव को फठाता हं एवॊ नकायात्भक प्रबाव

वास्तु उऩाम
हे तु सवाश्रष्ठ

को कभ कयता हं ।. ऩन्न गणेश के प्रबाव से व्माऩाय औय धन भं वृत्रद्ध भं वृत्रद्ध होती हं । फच्िो फक
ऩढाई हे तु बी त्रवशेष पर प्रद हं ऩन्ना गणेश इस के प्रबाव से फच्िे फक फुत्रद्ध कूशाग्र होकय
उसके आत्भत्रवश्वास भं बी त्रवशेष वृत्रद्ध होती हं । भानससक अशाॊसत को कभ कयने भं भदद कयता हं ,
व्मत्रक्त द्राया अवशोत्रषत हयी त्रवफकयण शाॊती प्रदान कयती हं , व्मत्रक्त के शायीय के तॊि को सनमॊत्रित
कयती हं । स्जगय, पेपड़े , जीब, भस्स्तष्क औय तॊत्रिका तॊि इत्माफद योग भं सहामक होते हं । कीभती ऩत्थय भयगज के फने होते
हं ।

Rs.550 से Rs.8200 तक >> Order Now

GURUTVA KARYALAY
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जून 2013

21

इष्ट आयाधना भं शॊख अभोघ परदामी हं ।

 ऩॊ.श्री बगवानदास त्रिवेदी जी, सॊदीऩ शभाा
इष्ट आयाधना भं शॊख का भहत्त्व
फहन्द ू धभा के सबी भाॊगसरक कामं भं शॊख का
त्रवशेष रुऩ से प्रमोग फकमा जाता है । दस्ऺणावतॉ शॊख को
दे वी रक्ष्भी का प्रतीक भाना जाता है , दस्ऺणावतॉ शॊख
की ऩूजा दे वी भहारक्ष्भी को प्रसन्न कयने वारी है ।
इससरए ऐसी भान्मता हं की स्जस स्थान ऩय सनमसभत
रूऩ से शॊख की ऩूजा होती है उस स्थान ऩय कबी धन
अबाव नहीॊ यहता। शॊख को त्रवसबन्न दे वी-दे वता का
प्रतीक भानकय बी ऩूजा जाता है व शॊख के भाध्मभ से
अबीष्ट कामं की ऩूसता की जाती है ।
शास्त्रं भं भनोकाभना ऩूसता के सरए शॊख की
त्रवशेष ऩूजन ऩद्धसत एवॊ साधना का उल्रेख बी सभरता
है । शास्त्रं के अनुसाय श्रीकृ ष्ण के ऩूजन के सरए उत्तभ
भागाशीषा भाह भं ऩॊिजन्म शॊख के ऩूजन का त्रवशेष
भहत्त्व है । त्रवद्रानं का कथन हं की अगहनभास (अथाात
ऩौष) भं शॊख ऩूजन से व्मत्रक्त को सबी भनोवाॊसछत पर
प्राद्ऱ हो जाते हं ।
ऩॊिजन्म शॊख की ऩूजा बी बगवान श्रीत्रवष्णु की
ऩूजा के सभान ही ऩुण्म दामक भानी गई है । इस सरए
अगहनभास (ऩौष) भं त्रवसध-त्रवधान से शॊख का ऩूजन
कयना अत्मॊत राबदामक होता हं । त्रवद्रनं का कथन हं
की स्जस प्रकाय दे वी-दे वताओॊ का ऩूजन फकमा जाता है
उसी के साथ शॊख का बी ऩूजन कयना त्रवशेष रुऩ से
कल्माणकायी होता हं ।

इष्ट आयाधना भं शॊख ध्वसन अथाात शॊखनाद का
त्रवशेष भहत्त्व

शॊख भुख्मत् नाद अथाात ध्वसन का प्रतीक है ।
ध्वसन ब्रह्माॊड भं आफद से अॊत तक व्माद्ऱ है । जानकायं
का मह भाना हं की सृत्रष्ट का आयॊ ब बी ध्वसन से ही
होता है औय त्रवरम बी ध्वसन भं होता है ।
अन्म शब्दं भं सभझे तो सभग्र ब्रह्माण्ड भं ॐकाय
की ध्वसन व्माद्ऱ हं , शॊख को मदी कान के ऩास यखा जामे
तो उस भं ॐ की ध्वसन सुनाई दे ती हं , शॊखनाद के
सभम सनकरने वारी ध्वसन भं बी ॐकाय सुनाई दे ता हं
। इस सरए शॊख को बी ॐ का ही प्रतीक भाना जाता हं ।
मही कायण हं की ऩूजा-अिाना आफद सबी प्रकाय
के भाॊगसरक प्रसॊगं भं शॊख ध्वसन की त्रवशेष भहत्ता है ।
फहन्द ू सॊस्कृ सत भं शॊख ध्वसन की ऩयॊ ऩया अत्मॊत प्रासिन
हं । भान्मता हं की शॊख ध्वसन त्रवजम का भागा को प्रशस्त
कयती है ।
आयती मा ऩूजन से ऩूवा की जाने वारी शॊख की
ध्वसन बक्तं को ऩूजा-अिाना का सभम होने की सूिना
दे ता है । आयती मा ऩूजन के सभासद्ऱ की जाने वारे शॊख
ध्वसन से बक्तं के भन को शाॊसत प्राद्ऱ होती है ।
शॊख ध्वसन की ऩयॊ ऩया केवर फहन्द ू सॊस्कृ सत ही
नहीॊ फल्की जैन, फौद्ध आफद प्रासिन सॊस्कृ सतमं भं बी
शॊख ध्वसन की ऩयॊ ऩयाएॊ प्रिसरत यही हं । इसी सरए शॊख
ध्वसन को अत्मॊत शुब भाना गमा हं ।
शॊख ध्वसन का भुख्म उद्दे श्म ध्मान आकत्रषात
कयना हं िाहे वह दे वी-दे वता हं, कोइ अन्म जीव हो मा
शुक्ष्भ जीवाणु हो उन्हं आकत्रषात कयने मा कोई सॊकेत दे ने
के सरए शॊख फजामे जाते हं ।

जून 2013

22

ऩुयातन कार भं याजाओॊ का याज होता था उस

आयम्ब कयते सभम शॊख ध्वसन शुबता का प्रतीक भाना

सभम याजदयफाय भं याजा मा अन्म खास व्मत्रक्त के

गमा है । एसा भाना जाता हं की शॊख ध्वसन से श्रवण

आगभन की सूिना दे ने के सरए शॊख ध्वसन का प्रमोग

कताा सयरता से ईश्वय की उऩस्स्थसत का अनुबव हो जाता

फकमा जाता था।

है औय श्रवण कताा के त्रविायं से नकायात्भक गुणं का

मुद्ध के प्रायॊ ब एवॊ अॊत भं शॊख ध्वसन का प्रमोग
होता था।

प्रबाव दयू होकय सकायात्भक गुणं की वृत्रद्ध होने रगती
हं ।

धासभाक कामं भं तीन फाय शॊख फजाने की ऩयॊ ऩया

सनमसभत घय भं प्रात् औय सॊध्मा शॊखध्वसन होने

है उसका भुख्म कायण आफद, भध्म औय अॊत से जुड़ा है ।

से आसुयी शत्रक्तमाॊ घय से दयू ही यहती हं । धभाशास्त्रं के

फहन्द ू भान्मता के अनुसाय शॊख ध्वसन को त्रवजम घोष का

अनुसाय सनमसभत शॊख फजाने से बूत-प्रेत, योग, फुये

प्रतीक भाना गमा है । फकसी बी भाॊगसरक कामा को

त्रविाय औय दरयिता का नाश होता है ।

भॊि ससद्ध स्पफटक श्री मॊि
"श्री मॊि" सफसे भहत्वऩूणा एवॊ शत्रक्तशारी मॊि है । "श्री मॊि" को मॊि याज कहा जाता है क्मोफक मह अत्मन्त

शुब फ़रदमी मॊि है । जो न केवर दस
ू ये मन्िो से असधक से असधक राब दे ने भे सभथा है एवॊ सॊसाय के हय व्मत्रक्त

के सरए पामदे भॊद सात्रफत होता है । ऩूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत एवॊ ऩूणा िैतन्म मुक्त "श्री मॊि" स्जस व्मत्रक्त के घय भे
होता है उसके सरमे "श्री मॊि" अत्मन्त फ़रदामी ससद्ध होता है उसके दशान भाि से अन-सगनत राब एवॊ सुख की

प्रासद्ऱ होसत है । "श्री मॊि" भे सभाई अफद्रतीम एवॊ अिश्म शत्रक्त भनुष्म की सभस्त शुब इच्छाओॊ को ऩूया कयने भे

सभथा होसत है । स्जस्से उसका जीवन से हताशा औय सनयाशा दयू होकय वह भनुष्म असफ़रता से सफ़रता फक
औय सनयन्तय गसत कयने रगता है एवॊ उसे जीवन भे सभस्त बौसतक सुखो फक प्रासद्ऱ होसत है । "श्री मॊि" भनुष्म

जीवन भं उत्ऩन्न होने वारी सभस्मा-फाधा एवॊ नकायात्भक उजाा को दयू कय सकायत्भक उजाा का सनभााण

कयने भे सभथा है । "श्री मॊि" की स्थाऩन से घय मा व्माऩाय के स्थान ऩय स्थात्रऩत कयने से वास्तु दोष म वास्तु

से सम्फस्न्धत ऩये शासन भे न्मुनता आसत है व सुख-सभृत्रद्ध, शाॊसत एवॊ ऐश्वमा फक प्रसद्ऱ होती है ।

गुरुत्व कामाारम भे "श्री मॊि" 12 ग्राभ से 2250 Gram (2.25Kg) तक फक साइज भे उप्रब्ध है

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जून 2013

23

शॊख अऩनामे योग, द्ु ख, दरयिता, दब
ु ााग्म बगामे

 स्वस्स्तक.ऎन.जोशी,
वैऻासनक शोध से मह ऩता िरा हं की शॊख का

वातावयण शुद्ध यहता है । शॊख जर का सेवन स्वास््म

भहत्व केवर धासभाक दृत्रष्ट से ही नहीॊ, फल्की वैऻासनक

औय हभायी हस्डडमं, दाॊतं के सरए अत्मॊट राबदामक

रूऩ से बी भहत्वऩूणा है । वैऻासनक शोध से ससद्ध हुवा हं

भाना गमा है । इसीसरए शॊख जर को भहाऔषसध भाना

होती हं । इससरए हभाये महाॊ प्रात्कार व सामॊकार भं

अथवावेद भं उल्रेख हं ,

की शॊख ध्वसन के प्रबाव भं सूमा की फकयणं अवयोसधत
जफ सूमा की फकयणं कभ होने रगती तबी शॊख-ध्वसन
कयने का त्रवधान है । शॊख ध्वसन से आसऩास का
वातावयण शुद्ध होता है ।
आमुवद
े के जानकाय फताते हं शॊखोदक बस्भ से
ऩेट की त्रवसबन्न फीभारयमाॉ जैसे ऩीसरमा, कास प्रीहा
मकृ त, ऩथयी आफद योग ठीक होते हं ।
आमुवद
े के जानकाय का भानना हं रूक-रूक कय
फोरने व हकराने वारे व्मत्रक्त मफद सनत्म शॊख-जर का
सेवन कयं , तो उन्हं आश्चमाजनक राब सभरेगा। उनका
भानना हं की भूकता व हकराऩन दयू कयने के सरए
शॊख-जर एक भहौषसध की तयह कामा कयता है ।

रृदम योगी के सरए मह फहोत ही उऩमोगी औषसध है ।

मजुवद
े भं वणान है फक

मस्तु शॊखध्वसनॊ कुमाात्ऩूजाकारे त्रवशेषत् ।
त्रवमुक्त् सवाऩाऩेन त्रवष्णुनाॊ सह भोदते ॥

अथाात: ऩूजा के सभम जो व्मत्रक्त शॊख-ध्वसन कयता है ,
उसके साये ऩाऩ नष्ट हो जाते हं औय वह बगवान त्रवष्णु
के साथ आनॊद का अनुबव कयता है ।
सन ् 1928 भं फसरान मूसनवससाटी भं शॊख ध्वसन

ऩय फकमे गमे अनुसॊधान से मह ससद्ध हो गमा की शॊख
ध्वसन कीटाणुओॊ को नष्ट कयने के सरए उत्तभ है ।
ब्रह्मवैवता ऩुयाण भं उल्रेख हं की, ऩूजा के सभम
शॊख भं जर बयकय ऩूजा स्थान भं यखकय, उस जर से
ऩूजन साभग्री शुद्ध कयना उत्तभ भाना गमा हं औय शॊख
जर को घय के आस-ऩास सछड़कने से आस-ऩास का

जाता है ।

शॊखेन हत्वा यऺाॊसस (अथवावेद-४/१०/१२)

शॊख के प्रबाव से याऺसं का नाश होता हं ।

मजुव
ा ेद भं उल्रेख हं ,

अवयस्ऩयाम शॊखध्वभ ् (मजुवा ेद-30/19)

मजुवद
े के अनुसाय मुद्ध भं शिुओॊ का रृदम दहराने के
सरए शॊख पूॊकने वारा व्मत्रक्त अऩेस्ऺत (अथाात आवश्मक)
है ।
रक्ष्भी सॊफहता, बागवत ऩुयाण, त्रवश्वासभि सॊफहता,
गोयऺा सॊफहता, कश्मऩ सॊफहता, शॊख सॊफहता, ऩुरस्त्म
सॊफहता, भाकंडे म आफद धभा ग्रॊथं भं दस्ऺणावतॉ शॊख को
आमुवद्ध
ा क औय सभृत्रद्ध दामक होने का उल्रेख सभरता हं ।
जानकायं की भाने तानसेन ने शॊख फजाकय ही
अऩनी अद्भत
ु गामन शत्रक्त प्राद्ऱ की थी।

अथवावेद के ितुथा अध्माम भं शॊखभस्ण सूक्त भं

शॊख की भहत्ता वस्णात है ।
त्रवद्रान जानकायं का भानना हं की त्रवश्व भं 64
हजाय से बी ज्मादा प्रकाय के शॊख ऩाए जाते हं । हाराॊकी
मह आॊकड़े अबी तक स्ऩष्ट नहीॊ हुवे हं अनुभानक हं ।

सन ् 1998 भं बायत सयकाय ने शॊखं ऩय

िाय डाक फटकट जायी फकए, स्जसभं गणेश शॊख,
ऩाॊिजन्म शॊख, गोभुखी शॊख औय नीरकॊठ शॊख
सासभर फकमे गमे।

***

जून 2013

24

शसनदे व का ऩरयिम

 सिॊतन जोशी, स्वस्स्तके.ऎन.जोशी.
ऩद: ब्रह्मा
यॊ ग: कारा
तत्व: वामु
जासत: शूि
प्रकृ सत: ताभससक
त्रववयण: ऺीण औय रम्फा शयीय, गहयी ऩीरी आॉखं, वात,
फड़े दाॊत, अकभाण्म, रॊगड़ाऩन, भोटे फारं.
धातु: स्नामु
सनवास: भसरन जभीन
सभम अवसध: सार
स्वाद: कसैरे
भजफूत फदशा: ऩस्श्चभ
ऩेड़: ऩीऩर, फाॊफी
कऩड़े : कारे, नीरे, फहु यॊ ग का वस्त्र
भौसभ: सससशय Sishira

शसन के छल्रे

ऩदाथा: धातु,

शसन ग्रह

शसन ग्रह के िायं ओय कई उऩग्रही छल्रे हं । मह

शसन सौयभण्डर के प्रएक सदस्म ग्रह है । मह
सूयज से छठे स्थान ऩय है औय सौय भॊडर भं फृहस्ऩसत
के फाद सफसे फड़ा ग्रह हं । इसके कऺीम ऩरयभ्रभण का
ऩथ १४,२९,४०,००० फकरोभीटय है । शसन ग्रह की खोज
प्रािीन कार भं ही हो गई थी। रेफकन वैऻासनक िष्टी

छल्रे फहुत ही ऩतरे होते हं । हाराॊफक मह छल्रे िौड़ाई
भं २५०,००० फकरोभीटय है रेफकन मह भोटाई भं एक

फकरोभीटय से बी कभ हं । इन छल्रं के कण भुख्मत:
फपा औय फपा से ढ़के ऩथयीरे ऩदाथं से फने हं । नमे

वैऻासनक शोध के अनुशाय शसन ग्रह के छल्रे ४-५ अयफ

कोण से गैरीसरमो गैसररी ने सन ् १६१० भं दयू फीन की

वषा ऩहरे फने हं स्जस सभम सौय प्रणारी अऩनी सनभााण

७५% हाइरोजन औय २५% हीसरमभ से हुई है । जर,

छल्रे डामनासौय मुग भं अस्स्तत्व भं आए थे। अभेरयका

जाते हं । सौय भण्डर भं िाय ग्रहं को गैस दानव कहा

कयोड़ सार ऩहरे फनने के फजाम उस सभम अस्स्तत्व भं

सहामता से इस ग्रह को खोजा था। शसन ग्रह की यिना

अवस्था भं ही थी। ऩहरे ऐसा भाना जाता था फक मे

सभथेन,अभोसनमा औय ऩत्थय महाॉ फहुत कभ भािा भं ऩाए

भं वैऻासनकं ने भं ऩामा फक शसन ग्रह के छल्रे दस

जाता

आए जफ सौय प्रणारी अऩनी शैशवावस्था भं थी। १९७०

है ,

क्मंफक

इनभं

सभटटी-ऩत्थय

की

फजाम

असधकतय गैस है औय इनका आकाय फहुत ही त्रवशार है ।

के दशक भं वैऻासनक मह भानने रगे थे फक शसन ग्रह के

अरुण(मुयेनस) औय वरुण (नॎप्टमून) हं ।

फड़े िॊिभा से टकयाने के कायण ऩैदा हुए हं । कुछ

शसन

इनभे

से

एक

है

-

फाकी

तीन

फृहस्ऩसत,

छल्रे कापी मुवा हं औय सॊबवत: मह फकसी धूभकेतु के

जून 2013

25

वैऻासनको के अनुशाय शसन के छल्रे हभेशा से थे रेफकन

अनुसाय ही अन्म ग्रह सॊफॊसधत व्मत्रक्त को शुबा-शुब पर

उनभं रगाताय फदराव आता यहा औय वे आने वारे कई

प्रदान कयते हं । जड़-िेतन सबी ऩय ग्रहं का अनुकूर मा

अयफं सार तक अस्स्तत्व भं यहं गे।

प्रसतकूर प्रबाव सनस्श्चत ऩड़ता हं । आऩके भागादशान हे तु

बायतीम शास्त्रो के अनुशाय शसनदे व का वणान
वैदम
ू ा काॊसत यभर, प्रजानाॊ वाणातसी

फाणफ़ूर

मा

अरसी

के

फ़ूर

ऩुयातन कार से रोगं के अॊदय शसनदे व के प्रसत
सुनते ही रोग बमबीत हो जाते हं । शसनदे व का ऩौयास्णक

अन्मात्रऩ वणा बुव गच्छसत तत्सवणाासब

बावाथा:- शसन ग्रह वैदम
ू या त्न अथवा

हं ।
गरत धायणाएॊ, बम घय फकमे फैठा हं , शसनदे व नाभ

कुसुभ वणा त्रवबश्च शयत:।

सूमाात्भज: अव्मतीसत भुसन प्रवाद:॥

शसनदे व से सॊफॊसधत कुछ त्रवसशष्ट जानकारयमाॊ महाॊ प्रस्तुत

शसन यत्न नीरभ

ऩरयिम आऩकी जानकायी हे तु प्रस्तुत
हं स्जससे शसनदे व से सॊफॊधी व्माद्ऱ
त्रवसबन्न

भ्राॊसतमं

के

सनवायण

भं

आऩको सहामता सभरे।

जैसे

त्रवत्रवध ऩुयाणं भं शसनदे व के

सनभार यॊ ग से जफ प्रकासशत होता है ,

प्रादब
ु ााव व उनके त्रवसशष्ट गुणं की

तो उस सभम प्रजा के सरमे शुब फ़र

अनेक ििाा उप्रब्ध है ।

दे ता है मह अन्म वणं को प्रकाश दे ता

ऩुयाणो

है , तो उच्ि वणं को सभाद्ऱ कयता है ,

के

अनुसाय

शसनदे व

भहत्रषा

ऐसाऋत्रष भहात्भा कहते हं ।

कश्मऩ के ऩुि सूमा की सॊतान हं । सूमा

शसनदे व का स्वरुऩ:

स्वरूऩ हं । शसनदे वकी भाता का नाभ

शनैश्चय

का

शयीय-कास्न्त

इन्िनीरभस्ण के सभान हं । शसनदे व के
ससय ऩय स्वणा भुकुट गरे भं भारा
तथा शयीय ऩय नीरे यॊ ग के वस्त्र
सुशोसबत होते हं । शसनदे व का वणा
कृ ष्ण, वाहन गीध तथा रोहे का फना
यथ है ।

त्रवश्व की आत्भा व साऺात ब्रह्म का

B.Sapphire

छामा अथवा सुवणाा हं । भनु सावस्णा,

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मभयाज शसनदे व के बाई औय मभुना

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* उऩमोक्त वजन औय भूल्म से असधक

सूमद
ा े व के ऩुि हं शसनदे व
ज्मोसतष के त्रवद्रानो के अनुशाय
मह सॊऩूणा सॊसाय सौयभॊडर के ग्रहं
द्राया सनमॊत्रित हं औय शसनदे व इन ग्रहो

औय कभ वजन औय भूल्म का नीरभ
उसित भूल्म ऩय प्रासद्ऱ हे तु सॊऩका कयं ।

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भं से भुख्म सनमॊिक हं । शसनदे व को
ग्रहं के न्मामाधीश भॊडर का प्रधान न्मामाधीश कहा गमा
हं । कुछ त्रवद्रानो का भत हं की शसनदे व के सनणाम के

फहन हं ।
शास्त्रोक्त वस्णात हं की वॊश का
प्रबाव सॊतान ऩय अवश्म ऩड़ता हं ।
शसनदे व का जन्भ कश्मऩ वॊश भं हुवा
हं

औय

सूमद
ा ेव

शसनदे व

के

ऩुि

साऺात

हं

अत्

ब्रह्मस्वरूऩ

शसनदे व

अफद्रतीम शत्रक्त व व्मत्रक्तत्व के स्वाभी
हं ।
शसनदे व

आशुतोष

बगवान

सशव

के

अनन्म बक्त हं ।
ऩोयास्णक

कथा

के

अनुशाय

प्रशॊगवश सूमा दे व ने अऩनी ऩत्नी अथाात शसनदे व की भाॊ
छामा ऩय नायाज हो

गमे औय उन्हं शाऩ तक दे ने को

जून 2013

26

तैमाय हो गमे। शसनदे व को सूमद
ा े व का ऐसा व्मवहाय

ऩूवक
ा ृ त कभं के पर बोग को बी अऩने अनुरूऩ फनाने

सहन न हुआ। उनके भन भं सूमा से बी असधक

भं सऺभ हो सकता हं ।

फकसी सॊकोि सूमा से ही अऩनी शत्रक्तप्रासद्ऱ के उऩाम ऩूछने

अऩना कय प्रसतकूर ऩरयस्स्थसतमं को अऩने अनुकूर

रगे।

फनामा जा सकता है । ज्मोसतष त्रवद्या से भनुष्म अऩने

शत्रक्तशारी फनने की इच्छा जागृत हुई। शसनदे व ने त्रफना

सूमद
ा े व ने सुना फक शसन उनसे
असधक

शत्रक्तशारी

होना

िाहता

ज्मोसतषीम त्रवश्लेषण के अनुशाय फतामे गमे उऩामं

शसन का उऩयत्न

है ,

सुनते ही उन्हं फड़ी प्रसन्नता हुई। सफ

कटे रा(एभेसथस्ट)

सूमद
ा े व ने शसन को काशी भं जाकय

बत्रवष्म के त्रवषम भं जानकायी प्राद्ऱ
कय

अऩने

कत्तव्मं

द्राया

प्रसतकूर

स्स्थसतमं को अऩने अनुकूर फनाने के
सरए भागादशान प्राद्ऱ कय सकता हं ।

बगवान सशव का ऩासथावसरॊग फनाकय

सॊऩूणा ियािय जगत ईश्वरयम

ऩूजन व असबषेक कयने का आदे श

शत्रक्तमं के सॊकल्ऩ से सृजन हुवा हं ।

फदमा। शसनदे व काशी भं आकय ऩासथाव

उसी ईश्वरयम शत्रक्तमं की इच्छानुसाय

सशवसरॊग फनाकय उऩासना भं सरन हो

नव ग्रहं को त्रवश्व के सभस्त जड़-

गमे। सशवजी ने उनकी उऩासना से

िेतन को सनमॊत्रित व अनुशाससत कयने

प्रसन्न होकय वयदान भाॊगने को कहाॊ।

का कामा फदमा गमा है । भानव सभेत

शसन ने सशवजी से दो वयदान भाॊगे।

सभस्त जीवो को सभरने वारे सुख-दख

एक मह फक भं अऩने त्रऩता से बी

Amethyst

असधक शत्रक्तशारी फनूॊ औय दस
ू या मह

सशवजी ने तथास्तु कह उन्हं वयदान दे
फदमा।
ज्मोसतषशास्त्र

भं

अॊतरयऺ,

त्रवयान स्थानं, श्भसानं, फीहड़ वन,
प्राॊतयं, दग
ा -घाफटमं, ऩवातं, गुपाओॊ,
ु भ
खदानं व जन शून्म आकाश-ऩातार
के यहस्मऩूण-ा स्थर आफद को शसनदे व
के

असधकाय

ऺेि

भाना

गमा

प्रदान फकमे जाते हं । रेफकन ग्रहो के

Katela

फक त्रऩता से सात गुना दयू ी ऩय सात

उऩग्रहं से सघया हुआ भेया भॊडर हो।

ग्रहं के शुब-अशुब प्रबावो द्राया ही
शुब-अशुब प्रबाव भं फकसी व्मत्रक्त मा

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उसित भूल्म ऩय प्रासद्ऱ हे तु सॊऩका कयं ।

है ।

शसनदे व के असधकाय ऺेि भं केवर

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यहस्मभम व गुह्य ऻान के उऩयाॊत
कभाऺेि भं, सतत ् िेष्टा, श्रभ, सेवा -रािाय, त्रवकराॊगं,
योगी व वृध्दं की सहामता आफद बी आते हं ।

जीव त्रवशेष से इन ग्रहो का कोई
ऩऺऩात नहीॊ होता, क्मोफक फकसी बी
व्मत्रक्त मा जीव को सभरने वारे सुखदख
ु ं उस जीव द्राया फकमे गम कभा ही
होते हं ।

जीव त्रवशेष के कभो के कायक
ग्रह शसनदे व होने की वजह से उनकी
फक्रमभाण कभं के सॊऩादन भं प्रभुख
बूसभका होती है । जीव के द्राया फकमे
गमे कभं से फकसी कभा का पर कफ
औय फकस प्रकाय बोगना है , इसका

सनधाायण नव ग्रहं द्राया ही होता हं ।
सबी जीव के शुब-अशुब कभं का पर प्रदान

शसनदे व कभा के कायक ग्रह होने की वजह से

कयने भं शसनदे व दण्डासधकायी न्मामाधीश के रूऩ भं कामा

भनुष्म को फक्रमभाण कभं का अवरॊफन रेकय अऩने

कयते हं । क्मोफक अशुब कभं के सरए दण्ड प्रदान कयते

जून 2013

27

सभम शसन नहीॊ दे य कयते है औय नहीॊ ऩऺऩात। दण्ड दे ते

शसनदे व उन्हीॊ रोगो को असधक कष्ट प्रदान कयते

सभम दमा आफद बाव शसनदे व को छू नहीॊ ऩाते, इस

हं जो रोग गरत काभ भं सरग्न होते हं । अच्छे कभा

सरमे रोगं भं शसन के नाभ से बम के रहय दौड जाती

कयने वारं ऩय शसनदे व असत प्रसन्न व उनके अनुकूर

है । इसी सरमे शास्त्रं भं शसनदे व को क्रूय, कुफटर व ऩाऩ

पर प्रदान कयते हं ।

ग्रह सॊऻा फद गई है । शसनदे व स्जतने कठोय हं उतने ही
अॊदय से कृ ऩारु व दमारु बी है । शसनदे व की कृ ऩा प्रासद्ऱ
हे तु

भनुष्मो

को

अऩने

कभो

क्मोफक त्रवद्रानो के भतानुशाय

ऩूवज
ा न्भ के सॊसित ऩुण्म औय ऩाऩं का
पर जीव को वताभान जीवन भं ग्रहं
के अनुसाय बोगने ऩडते हं ।
के

शुब-अशुब

प्रबाव

भहादशा, अॊतदा शा आफद के अनुशाय
प्राद्ऱ होते हं । अत् ग्रहो के असनष्ट
परं से फिाव के सरए उसित उऩाम
फकमा जा सकता है ।
हभाये प्रािीन भनीत्रषमं ने शास्त्रो भं
शसनदे व के अनुकूर व प्रसतकूर प्रबावं
का फड़ी सूक्ष्भता से सनयीऺण कय
उसकी त्रवस्तृत जानकायी हभं प्रदान की
हं ।
मफद फकसी जातक के

औय शसन कृ ऩा से ही जीवन का भूर उद्दे श्म ऩूणा होगा।

को

सुधायना िाफहए।

ग्रहो

अत् शुब कभा कयने से शसन की कृ ऩा प्राद्ऱ होगी

सरमे

शसनदे व अनुकूर होते हं तो जातक को
अऩाय धन-वैबव व ऐश्वमााफद की प्रासद्ऱ
होती हं , मफद प्रसतकूर हो, तो व्मत्रक्त
को बीषण कष्टं का साभना कयना
ऩड़ता है । ऐसी स्स्थसत भं व्मत्रक्त त्रवशेष
के सॊसित धन, सॊऩदा का नाश होता
है । व्मफक सनॊफदत कभं यत हो जाता हं

शास्त्रो भं उल्रेस्खत हं की शसनदे व के

शसन के यत्न औय उऩयत्न
नीरभ, नीसरभा, नीरभस्ण,

जाभुसनमा, नीरा कटे रा, आफद
शसन के यत्न औय उऩयत्न हं ।
अच्छा यत्न शसनवाय को ऩुष्म
नऺि

भं

धायण

कयना

िाफहमे। इन यत्नं भे फकसी
बी यत्न को धायण कयते ही

फ़ामदा सभर जाता है ।

त्रफच्छू फूटी की जड मा शभी
स्जसे छंकया बी कहते है की

जड शसनवाय को ऩुष्म नऺि
भं कारे धागे भं ऩुरुष औय

स्त्री दोनो ही दाफहने हाथ की
बुजा भं फान्धने से शसन के
कुप्रबावं भं कभी आना शुरु

उसे रोकसनॊदा का ऩाि फनना ऩड़ता हं । उसे ऩग-ऩग ऩय
द्ु ख, कष्ट, योग व अऩभान का साभना कयना ऩड़ता है ।
उन्हं तयह-तयह की मातनाएॊ बी झेरनी ऩड़ जाती हं ।

को बी ढाई फदन के सरमे छुऩना ऩडा
था। शसनदे व के कोऩ के कायण ऩावाती
नॊदन गणेशजी का सशय कट गमा था।

ज्मोसतषी जानकायी :
शसन एक यासश भं तीस भहीने यहते हं ।
शसन भकय औय कुम्ब यासश के स्वाभी
हं तथा शसनकी भहादशा 19 वषा की
होती है । शसन का प्रबाव एक यासश ऩय
ढ़ाई वषा औय साढ़े साती के रूऩ भं

शसन की जडी फूफटमाॊ

हो जाता है ।

दॊ ड से शसनदे व के गुरु साऺात सशवजी

साढे ़ सात वषा अवसध तक बोगना
ऩढ़ता हं ।

शसनदे व के कारे होने का यहस्म!
इस फाये भं एक कथा प्रिसरत
है , जफ शसनदे व भाता के गबा भं थे,
तफ सशव बत्रक्तनी भाता ने घोय तऩस्मा
की, धूऩ-गभॉ की तऩन भं शसन का यॊ ग
कारा हो गमा। रेफकन भाॊ के इसी तऩ
ने उन्हे आऩाय शत्रक्त दी औय नग्रहो भं
से एक ग्रह फना फदमा।

शसनदे व की गसत धीभी होने का कायण
शसनदे व का अन्म सबी ग्रहं से भॊद होने का
कायण इनका रॊगड़ाकय िरना है । वे रॊगड़ाकय क्मं

जून 2013

28

िरते हं , इसके सॊफॊध भं सूमत
ा ॊि भं वस्णात कथा इस
प्रकाय हं ।
एक फाय सूमा दे व का तेज सहन न कय ऩाने की
वजह से सॊऻा दे वी ने अऩने शयीय से अऩने जैसी ही एक
प्रसतभूसता तैमाय की औय उसका नाभ स्वणाा यखा। उसे
आऻा दी फक तुभ भेयी अनुऩस्स्थसत भं भेयी सायी सॊतानं
की दे खये ख कयते हुए सूमा दे व की सेवा कयो औय ऩत्नी
सुख बोगो।

एसा आदे श दे कय सॊऻा अऩने त्रऩता के घय िरी
गई। स्वणाा ने बी अऩने आऩ को इस तयह ढ़ारा फक
सूमा दे व बी मह यहस्म न जान सके। इस फीि सूमा दे व

शसनदे व को तेर त्रप्रम होने का कायण
शसन दे व ऩय तेर िढामा जाता हं , इस सॊफॊध भं
आनॊद याभामण भं एक कथा का उल्रेख सभरता हं । जफ
श्री याभ की सेना ने सागय सेतु फाॊध सरमा, तफ याऺस
इसे हासन न ऩहुॊिा सकं, उसके सरए ऩवन सुत हनुभान
को उसकी दे खबार की स्जम्भेदायी सौऩी गई। जफ

हनुभान जी शाभ के सभम अऩने इष्टदे व याभ के ध्मान भं
भग्न थे, तबी सूमा ऩुि शसन ने अऩना कारा कुरूऩ िेहया
फनाकय क्रोधऩूणा कहा- हे वानय भं दे वताओ भं शत्रक्तशारी
शसन हूॉ। सुना हं , तुभ फहुत फरशारी हो। आॉखं खोरो

औय भेये साथ मुद्ध कयो, भं तुभसे मुद्ध कयना िाहता हूॉ।

से स्वणाा को ऩाॊि ऩुि औय दो ऩुत्रिमाॊ हुई। धीये -धीये

इस ऩय हनुभान ने त्रवनम्रताऩूवक
ा कहा- इस सभम भं

कभ ध्मान दे ने रगी। एक फदन सॊऻा के ऩुि शसन को

भत डासरए। आऩ भेये आदयणीम है । कृ ऩा कयके आऩ

स्वणाा अऩने फच्िं ऩय असधक औय सॊऻा की सॊतानं ऩय
तेज बूख रगी, तो उसने स्वणाा से बोजन भाॊगा। तफ
स्वणाा ने कहा फक अबी ठहयो, ऩहरे भं बगवानका
् बोग

रगा रूॊ औय तुम्हाये छोटे बाई-फहनं को स्खरा दॊ ,ू फपय

तुम्हं बोजन दॊ ग
ू ी। मह सुनकय शसन को क्रोध आ गमा

औय उन्हंने भाता को भायने के सरए अऩना ऩैय उठामा,
तो स्वणाा ने शसन को श्राऩ फदमा फक तेया ऩाॊव अबी टू ट
जाए।

अऩने प्रबु को माद कय यहा हूॊ। आऩ भेयी ऩूजा भं त्रवध्न
महा से िरे जाइए।
जफ शसन दे व रड़ने ऩय उतय आए, तो हनुभान जी
ने अऩनी ऩूॊछ भं रऩेटना शुरू कय फदमा। फपय उन्हे
कसना प्रायॊ ब कय फदमा जोय रगाने ऩय बी शसन उस
फॊधन से भुक्त न होकय ऩीड़ा से व्माकुर होने रगे।
हनुभान ने फपय सेतु की ऩरयक्रभा कय शसन के घभॊड को

तोड़ने के सरए ऩत्थयो ऩय ऩूॊछ को झटका दे -दे कय
भाता का श्राऩ सुनकय शसनदे व डयकय अऩने त्रऩता

के ऩास गए औय साया फकस्सा कह सुनामा। सूमद
ा ेव
तुयन्त सभझ गए फक कोई बी भाता अऩने ऩुि को इस
तयह का शाऩ नही दे सकती। इसी सरए उनके साथ
अऩनी ऩत्नी नही कोई औय हं । सूमा दे व ने क्रोध भं आकय
ऩूछा फक फताओ तुभ कौन हो, सूमा का तेज दे खकय स्वणाा
घफया गई औय सायी सच्िाई उन्हे फता दी। तफ सूमद
ा ेव
नं शसन को सभझामा फक स्वणाा तुभायी भाता नही हं ,
रेफकन भाॊ सभान हं । इसीसरए उनका फदमा शाऩ व्मथा तो
नही होगा, ऩयन्तु मह इतना कठोय नही होगा फक टाॊग
ऩूयी तयह से अरग हो जाए। हाॊ, तुभ आजीवन एक ऩाॉव
से रॊगडाकय िरोगे।

ऩटकना शुरू कय फदमा। इससे शसन का शयीय रहुरुहान
हो गमा, स्जससे उनकी ऩीड़ा फढ़ती गई। तफ शसन दे व ने

हनुभान जी से प्राथाना की फक भुझे फधॊन भुक्त कय
दीस्जए। भं अऩने अऩयाध की सजा ऩा िुका हूॉ, फपय
भुझसे ऐसी गरती नही होगी।

इस ऩय हनुभान जी फोरे-भं तुम्हे तबी छोडू ॊ गा,
जफ तुभ भुझे विन दोगे फक श्री याभ के बक्त को कबी
ऩये शान नही कयोगे। मफद तुभने ऐसा फकमा, तो भं तुम्हं
कठोय दॊ ड दॊ ग
ू ा। शसन ने सगड़सगड़ाकय कहा -भं विन दे ता
हूॊ फक कबी बूरकय बी आऩके औय श्री याभ के बक्त की
यासश ऩय नही आऊॉगा। आऩ भुझे छोड़ दं । तबी हनुभान
जी ने शसनदे व को छोड़ फदमा। फपय हनुभान जी से

जून 2013

29

शसनदे व ने अऩने घावो की ऩीड़ा सभटाने के सरए तेर

रोगे, वह नष्ट हो जामगा। ध्मान टू टने ऩय शसनदे व ने

भाॊगा। हनुभान जी ने जो तेर फदमा, उसे घाव ऩय रगाते

अऩनी ऩत्नी को भनामा। ऩत्नी को बी अऩनी बूर ऩय

ही शसन दे व की ऩीड़ा सभट गई। उसी फदन से शसनदे व को

ऩश्चाताऩ हुआ, फकन्तु शाऩ के प्रतीकाय की शत्रक्त उसभं न

तेर िढ़ामा जाता हं , स्जससे उनकी ऩीडा शाॊत हो जाती हं
औय वे प्रसन्न हो जाते हं ।

थी, तबी से शसन दे वता अऩना ससय नीिा कयके यहने
रगे। क्मंफक मह नहीॊ िाहते थे फक इनके द्राया फकसी का
असनष्ट हो।

शसनदे व की क्रूयिष्टी का कायण

अत् कहा गमा है , शसनदे व क्रुय ग्रह नहीॊ हं , वो

शसनदे व जी की दृत्रष्ट भं जो क्रूयता है , वह इनकी
ऩत्नी के शाऩ के कायण है । ब्रह्मऩुयाण भं इनकी कथा इस
प्रकाय आमी है - फिऩन से ही शसन दे वता श्रीकृ ष्ण के
ऩयभ बक्त थे। वे श्रीकृ ष्ण के अनुयाग भं सनभग्न यहा
कयते थे। वमस्क होने ऩय इनके त्रऩता ने सिियथ की
कन्मा से इनका त्रववाह कय फदमा। इनकी ऩत्नी सतीसाध्वी औय ऩयभ तेजस्स्वनी थी। एक यात वह ऋतु-स्नान

न्मामकताा है । व्मत्रक्त ऩाऩ कयता यहता है , औय जफ उस
व्मत्रक्त ऩय शसन की साढ़े साती आती है , तो उसके ऩाऩो का
फहसाफ स्वमॊ शसनदे व कयते है । जफ व्मत्रक्त रोब, वासना,
गुस्सा, भोह से प्रबात्रवत होकय अन्माम, अत्मािाय, दयू ािाय,
अनािाय, ऩाऩािाय, व्मसबिाय का सहाया रेता है , जफ सफसे

सछऩ कय कोई ऩाऩ कामा कयता हं , तफ सभम आने ऩय
शसनदे व के द्राया व्मत्रक्त को दॊ ड बी प्राद्ऱ होता हं । जो

कयके ऩुि- प्रासद्ऱ की इच्छा से इनके ऩास ऩहुॉिी, ऩय मह

याजा का यॊ क फना दे ती हं , वह शसन की साढे -सासत ही

सुधफुध ही नहीॊ थी। ऩत्नी प्रतीऺा कयके थक गमी। उसका

सत्म को नहीॊ छोड़े ता, ऩुन्, दमा औय न्माम का सहाया

श्रीकृ ष्ण के ध्मान भं सनभग्न थे। इन्हं फाह्य सॊसाय की
ऋतुकार सनष्पर हो गमा। इससरमे उसने क्रुद्ध होकय
शसनदे व को शाऩ दे फदमा फक आज से स्जसे तुभ दे ख

होती है । रेफकन मफद साढे -साती दशा के दौयान बी व्मत्रक्त
रेता हं , एसी अवस्था भं सफ फहुत ही अच्छे से व्मतीत
हो जाता हं ।

 क्मा आऩके फच्िे कुसॊगती के सशकाय हं ?
 क्मा आऩके फच्िे आऩका कहना नहीॊ भान यहे हं ?
 क्मा आऩके फच्िे घय भं अशाॊसत ऩैदा कय यहे हं ?
घय ऩरयवाय भं शाॊसत एवॊ फच्िे को कुसॊगती से छुडाने हे तु फच्िे के नाभ से गुरुत्व कामाारत द्राया
शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से भॊि ससद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत ऩूणा िैतन्म मुक्त वशीकयण कवि एवॊ एस.एन.फडब्फी

फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भं स्थात्रऩत कय अल्ऩ ऩूजा, त्रवसध-त्रवधान से आऩ त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय
सकते हं । मफद आऩ तो आऩ भॊि ससद्ध वशीकयण कवि एवॊ एस.एन.फडब्फी फनवाना िाहते हं , तो सॊऩका
इस कय सकते हं ।

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जून 2013

30

शसनवाय व्रत

 स्वस्स्तके.ऎन.जोशी.
व्रत भाहात्म्मॊ एवॊ कथा त्रवसध
शसन-ग्रह की शाॊसत व सबी प्रकाय के सुखं की

ॐ कोणस्थाम नभ्।

इच्छा यखने वारे स्त्री-ऩुरुषं को शसनवाय का व्रत कयना

ॐ यौिात्भकाम नभ्।

िाफहए। सॊऩूणा त्रवसध-त्रवधान से शसनवाय का व्रत कयने से

ॐ शनैश्चयाम नभ्।

शसन से सॊफॊसधत सॊऩूणा ऩीडा-दोष, योग-शोक नष्ट हो जाते

ॐ मभाम नभ्।

तथा आमु व फुत्रद्ध की वृत्रद्ध होती हं ।

ॐ कृ ष्णाम नभ्।

हं , औय धन का राब होता हं । व्रती को स्वास््म सुख
शसनदे व के प्रबाव भं सबी प्रकाय के उद्योग,

ॐ फभ्रवे नभ्।

ॐ भॊदाम नभ्।

व्मवसाम, कर-कायखाने, धातु उद्योग, रौह वस्तु, तेर,

ॐ त्रऩप्ऩराम नभ्।

कारे यॊ ग की वस्तु, कारे जीव, जानवय, अकार भृत्मु,

ॐ त्रऩॊगराम नभ्।

ऩुसरस बम, कायागाय, योग बम, गुयदे का योग, जुआ,

ॐ सौयमे नभ्।

सट्टा, रॉटयी, िोय बम तथा क्रूय कामा आते हं ।
त्रवद्रानो के अनुशाय शसन से सॊफॊसधत कष्ट सनवायण

उस वृऺ भं सूत के सात धागे रऩेटकय सात

के सरए शसनवाय का व्रत कयना ऩयभ राबप्रद होता हं ।

ऩरयक्रभा कये तथा वृऺ का ऩूजन कये । शसन ऩूजन

शसनवाय के व्रत को जानकाय व्मत्रक्त की सराह से प्रत्मेक

सूमोदम से ऩूवा तायं की छाॊव भं कयना िाफहए। शसनवाय

उम्र के स्त्री-ऩुरुष कय सकता हं ।

व्रत-कथा को बत्रक्त औय प्रेभऩूवक
ा सुने। कथा कहने वारे

शसनवाय का व्रत फकसी बी शसनवाय से आयॊ ब
फकमा जा सकता हं । रेफकन श्रावण भास के शसनवाय से
व्रत को प्रायॊ ब फकमा जाए तो त्रवशेष राबप्रद यहता हं ।

को दस्ऺणा दे । सतर, जौ, उड़द, गुड़, रोहा, तेर, नीरे
वस्त्र का दान कये । आयती औय प्राथाना कयके प्रसाद फाॊटे।
ऩहरे शसनवाय को उड़द का बात औय दही, दस
ू ये

शसनवाय को सूमोदम से ऩूवा व्रती भनुष्म को

शसनवाय को खीय, तीसये को खजरा, िौथे शसनवाय को

फकसी ऩत्रवि नदी-जराशम आफद के जर भं स्नान कय,

घी औय ऩूरयमं का बोग रगावे। इस प्रकाय तंतीस

ऋत्रष-त्रऩतृ अऩाण कयके, सुॊदय करश भं जर बयकय रामे,

शसनवाय तक इस व्रत को कये । इस प्रकाय व्रत कयने से

उस करश को शभी अथवा ऩीऩर के ऩेड़ के नीिे सुॊदय

शसनदे व प्रसन्न होते हं । इससे सवाप्रकाय के कष्ट, अरयष्ट

वेदी फनावे, उसे गोफय से रीऩे, रौह सनसभात शसन की

आफद व्मासधमं का नाश होता है औय अनेक प्रकाय के

प्रसतभा को ऩॊिाभृत भं स्नान कयाकय कारे िावरं से

सुख, साधन, धन, ऩुि-ऩौिाफद की प्रासद्ऱ होती हं । काभना

फनाए हुए िौफीस दर के कभर ऩय स्थात्रऩत कये ।

की ऩूसता होने ऩय शसनवाय के व्रत का उद्याऩन कयं । तंतीस

शसनदे व का कारे यॊ ग के गॊध, ऩुष्ऩ, अष्टाॊग, धूऩ, पूर,

ब्राह्मणं को बोजन कयावे, व्रत का त्रवसजान कये । इस

उत्तभ प्रकाय के नैवेद्य आफद से ऩूजन कये ।

प्रकाय व्रत का उद्याऩन कयने से ऩूणा पर की प्रासद्ऱ होती

उस के ऩश्चमात शसन के इन दस नाभं का श्राद्धा
व बत्रक्त-बाव से से उच्िायण कये -

है एवॊ सबी प्रकाय की काभनाओॊ की ऩूसता होती हं ।

जून 2013

31

काभना ऩूसता होने ऩय मफद मह व्रत फकमा जाए, तो प्राद्ऱ

केतु हे तु केतु भॊि से कुशा की ससभधा भं, कृ ष्ण जौ के

वस्तु का नाश नहीॊ होता।

घी व कारे सतर से प्रत्मेक के सरए १०८ आहुसतमा दे

ज्मोसतष शास्त्र भं शसन याहु औय केतु के कष्ट

औय ब्राह्मण को बोजन कयावे।

सनवायण हे तु बी शसनवाय के व्रत का त्रवधान हं । इस व्रत

इस प्रकाय शसनवाय के व्रत के प्रबाव से शसन औय

भं शसन की रोहे की, याहु व केतु की शीशे की भूसता

याहु-केतु जसनत कष्ट, सबी प्रकाय के अरयष्ट तथा आफद-

फनवाएॊ।

कृ ष्ण वणा वस्त्र, दो बुजा दण्ड औय अऺभाराधायी,
कारे यॊ ग के आठ घोड़े वारे यथ भं फैठे शसन का
ध्मान कये ।

कयार फदन, खड्ग, िभा औय शूर से मुक्त नीरे
ससॊहासन ऩय त्रवयाजभान वयप्रद याहु का ध्मान कये ।

धूम्रवणा,

गदाफद

आमुधं

से

मुक्त,

गृद्धासन

व्मासधमं का सवाथा नाश होता हं ।

सॊऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत 22 गेज शुद्ध
स्टीर भं सनसभात अखॊफडत

ऩुरुषाकाय

ऩय

शसन मॊि

त्रवयाजभान त्रवकटासन औय वयप्रद केतु का ध्मान
कये ।
इन्ही स्वरूऩं भं भुसतामं का सनभााण कयावे अथवा
गोराकाय भूसता फनावे मा फाजाय से खयीद रे।
कारे यॊ ग के िावरोभ से िौफीस दर का कभर
सनभााण कये । कभर के भध्म भं शसन, दस्ऺण बाग भं
याहु औय वाभ बाग भं केतु की स्थाऩना कये । यक्त िॊदन
भं केशय सभराकय, गॊध िावर भं काजर सभराकय, कारे

िावर, काकभािी, कागरहय के कारे ऩुष्ऩ, कस्तूयी आफद
से 'कृ ष्ण धूऩ' औय सतर आफद के सॊमोग से कृ ष्ण नैवेद्य
(बोग) अऩाण कये औय इस भॊि से प्राथाना एवॊ नभस्काय
कयं -

शनैश ्िय नभस्तुभ्मॊ नभस्तेतवथ याहवे।

केतवेऽथ नभस्तुभ्मॊ सवाशाॊसत प्रदो बव॥

ॐ ऊध्वाकामॊ भहाघोयॊ िॊडाफदत्मत्रवभदा नभ ्।

ससॊफहकामा् सुतॊ यौिॊ तॊ याहुॊ प्रणभाम्महभ ्॥
ॐ ऩातारधूभ सॊकाशॊ तायाग्रहत्रवभदा नभ ्।
यौभा यौिात्भकॊ क्रूयॊ तॊ केतु प्रणभाम्महभ ्॥

सात शसनवाय का व्रत कये । शसन हे तु शसन-भॊि से शसन
की ससभधा भं, याहु हे तु याहु भॊि से ऩूवाा की ससभधा भं,

ऩुरुषाकाय शसन मॊि (स्टीर भं) को तीव्र प्रबावशारी
फनाने हे तु शसन की कायक धातु शुद्ध स्टीर(रोहे ) भं
फनामा गमा हं । स्जस के प्रबाव से साधक को तत्कार
राब प्राद्ऱ होता हं । मफद जन्भ कुॊडरी भं शसन
प्रसतकूर

होने

ऩय

व्मत्रक्त

को

अनेक

कामं

भं

असपरता प्राद्ऱ होती है , कबी व्मवसाम भं घटा,
नौकयी भं ऩये शानी, वाहन दघ
ा ना, गृह क्रेश आफद
ु ट
ऩये शानीमाॊ

फढ़ती

जाती

है

ऐसी

स्स्थसतमं

भं

प्राणप्रसतत्रष्ठत ग्रह ऩीड़ा सनवायक शसन मॊि की अऩने

को व्मऩाय स्थान मा घय भं स्थाऩना कयने से अनेक
राब सभरते हं । मफद शसन की ढै ़मा मा साढ़े साती का

सभम हो तो इसे अवश्म ऩूजना िाफहए। शसनमॊि के
ऩूजन भाि से व्मत्रक्त को भृत्मु, कजा, कोटा केश, जोडो
का ददा , फात योग तथा रम्फे सभम के सबी प्रकाय के
योग से ऩये शान व्मत्रक्त के सरमे शसन मॊि असधक
राबकायी होगा। नौकयी ऩेशा आफद के रोगं को
ऩदौन्नसत बी शसन द्राया ही सभरती है अत् मह मॊि
असत उऩमोगी मॊि है स्जसके द्राया शीघ्र ही राब ऩामा जा
सकता है । भूल्म: 1050 से 10900>> Order Now

जून 2013

32

श्री शसनवाय व्रत कथा
ऩौयास्णक कथा के अनुशाय एक फाय सभस्त
प्रास्णमं का फहत िाहने वारे भुसनगण नैसभषायण्म भं
एकि हुए। उस सभम व्मास जी के सशष्म सूतजी अऩने
सशष्मो के साथ श्रीहरय का स्भयण कयते हुए वहाॊ ऩय

आए। सभस्त शास्त्रं के ऻाता श्री सूतजी को आमा
दे खकय भहातेजस्वी शौनकाफद भुसनमं ने उठकय श्री
सूतजी को प्रणाभ फकमा। भुसनमं द्राया फदए आसन ऩय श्री
सूतजी फैठ गए।

श्री सूतजी से शौनक आफद भुसनमं ने त्रवनमऩूवक

ऩूछा- हे भुसन! इस कसरकार भं हरय बत्रक्त फकस प्रकाय से
होगी? सबी प्राणी ऩाऩ कयने भं तत्ऩय हंगे, भनुष्मं की
आमु कभ होगी। ग्रह कष्ट, धन यफहत औय अनेक
ऩीड़ामुक्त भनुष्म हंगे। हे सूतजी! ऩुण्म असत ऩरयश्रभ से

हे मुसधत्रष्ठय! कुशरऩूवक

तो हो? मुसधत्रष्ठय ने कहा- हे
प्रबो! आऩकी कृ ऩा है । आऩसे कुछ सछऩा नफहॊ है ! कृ ऩाकय
कोई ऐसा उऩाम फतराएॊ, स्जसके कयने से मह ग्रह कष्ट

न व्माऩे। हभं इससे छुटकाया सभरे। मह शसन ग्रह फहुत
कष्ट दे ता है ।

श्रीकृ ष्ण फोरे- याजन! आऩने फहुत ही सुॊदय फात

सॊऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत
22 गेज शुद्ध स्टीर भं
सनसभात अखॊफडत

शसन

प्राद्ऱ होता है , इस कायण कसरमुग भं कोई बी भनुष्म
ऩुण्म न कय ऩामेगा। ऩुण्म के नष्ट होने से भनुष्मं की
प्रकृ सत ऩाऩभम होगी, इस कायण तुच्छ त्रविाय कयने वारे
भनुष्म अऩने अॊश सफहत नष्ट हो जाएॊगे। हे सूतजी! स्जस
तयह थोड़े ही ऩरयश्रभ, थोड़े धन से, थोड़े सभम भं ऩुण्म
प्राद्ऱ हो, ऐसा कोई उऩाम हभ रोगं को फतराइए। हे
भहाभुने, हभने मह बी सुना है फक शसन के प्रकोऩ से
दे वता बी भुक्त नहीॊ हो ऩाते । शसन की क्रूय दृत्रष्ट ने
बगवान श्रीगणेश जी का ससय उसके त्रऩता के हाथं कटवा
फदमा। शसन की दृत्रष्ट कष्टं को दे ने वारी हं , इससरए कोई
ऐसा व्रत फताएॊ, स्जसे कयने से शसनदे व प्रसन्न हो।
सूतजी फोरे- हे भुसनश्रेष्ठ तुभ धन्म हो। तुम्हीॊ
वैष्णवं भं अग्रगण्म हो, क्मंफक सफ प्रास्णमं का फहत
िाहते हो। भं आऩसे उत्तभ व्रत को कहता हूॊ। ध्मान दे कय

सुनं- इसके कयने से बगवान शॊकय प्रसन्न होते है औय
शसन ग्रह के कष्ट प्राद्ऱ नहीॊ होते।
हे ऋत्रषमो! मुसधत्रष्ठय आफद ऩाॊडव जफ वनवास भं
अनेक कष्ट बोग यहे थे, उस सभम उनके त्रप्रम सखा
श्रीकृ ष्ण उनके ऩास ऩहुॊिे। मुसधत्रष्ठय ने श्रीकृ ष्ण का फहुत
आदय फकमा औय सुॊदय आसन ऩय फैठामा। श्रीकृ ष्ण फोरे-

तैसतसा मॊि

शसनग्रह

से

सॊफॊसधत

ऩीडा

के

सनवायण हे तु त्रवशेष राबकायी मॊि।
भूल्म: 550 से 10900
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जून 2013

33

ऩूछी है । आऩसे एक उत्तभ व्रत कहता हूॊ, सुनो। जो

ब्राह्मणी ने याजकुभाय धभागुद्ऱ को अऩने साथ रे सरमा

बगवान शॊकय का व्रत कयते हं , उन्हं शसन की ग्रह दशा

गयीफ ब्राह्मणी दोनं कुभायो का फहुत कफठनाई से

भनुष्म बत्रक्त औय श्रद्धामुक्त होकय शसनवाय के फदन

औय नगय को छोड़कय िर दी।

भे कोई कष्ट नहीॊ होता। उनको सनधानता नहीॊ सताती

सनवााह कय ऩाती थी। कबी फकसी शहय भं औय कबी

तथा इस रोक भं अनेक प्रकाय के सुखं को बोगकय अॊत

फकसी नगय भं दोनं कुभायं को सरए घूभती यहती थी।

भं सशवरोक की प्रासद्ऱ होती है । मुसधत्रष्ठय फोरे- हे प्रबु!

एक फदन वह ब्राह्मणी जफ दोनं कुभायं को सरए एक

सफसे ऩहरे मह व्रत फकसने फकमा था, कृ ऩा कयके इसे

नगय से दस
ु ये नगय जा यही थी फक उसे भागा भं भहत्रषा

त्रवस्तायऩूवक
ा कहं तथा इसकी त्रवसध बी फतराएॊ।

बगवान श्रीकृ ष्ण फोरे- याजन! शसनवाय के फदन,

शाॊफडल्म के दशान हुए। ब्राह्मणी ने दोनं फारकं के साथ
भुसन के ियणं भे प्रणाभ फकमा औय फोरी- भहत्रषा! भं

त्रवशेषकय श्रावण भास भं शसनवाय के फदन रौहसनसभात

आज आऩके दशान कय कृ ताथा हो गई। मह भेये दोनं

प्रसतभा को ऩॊिाभृत से स्नान कयाकय, अनेक प्रकाय के

कुभाय आऩकी शयण है , आऩ इनकी यऺा कयं । भुसनवय!

गॊध, अष्टाॊग, धूऩ, पर, उत्तभ प्रकाय के नैवेद्य आफद से

मह शुसिव्रत भेया ऩुि है औय मह धभागुद्ऱ याजऩुि है औय

ऩूजन कये , शसन के दस नाभं का उच्िायण कये । सतर,

भेया धभाऩुि है । हभ घोय दारयद्र्म भं हं , आऩ हभाया उद्धाय

जौ, उड़द, गुड़, रोहा, नीरे वस्त्र का दान कये । फपय

कीस्जए। भुसन शाॊफडल्म ने ब्राह्मणी की सफ फात सुनी औय

बगवान शॊकय का त्रवसधऩूवक

ऩूजन कय आयती-प्राथाना

फोरे-दे वी! तुम्हाये ऊऩय शसन का प्रकोऩ है , अत् आऩ

कये - हे बोरेनाथ! भं आऩकी शयण हूॊ, आऩ भेये ऊऩय

शसनवाय के फदन व्रत कयके बोरे शॊकय की आयाधना

हे मुसधत्रष्ठय! ऩहरे शसनवाय को उड़द का बात,

ब्राह्मणी औय दोनं कुभाय भुसन को प्रणाभ कय

दस
ू ये को केवर खीय, तीसये को खजरा, िौथे को ऩूरयमं

सशव भॊफदय के सरए िर फदए। दोनं कुभायं ने ब्राह्मणी

का बोग रगावे। व्रत की सभासद्ऱ ऩय मथाशत्रक्त ब्राह्मण

सफहत भुसन के उऩदे श के अनुसाय शसनवाय का व्रत फकमा

बोजन कयावे। इस प्रकाय कयने से सबी असनष्ट, कष्ट,

तथा सशवजी का ऩूजन फकमा। दोनं कुभायं को मह व्रत

आसधव्माफदमं का सवाथा नाश होता है । शसन, याहु, केते

कयते-कयते िाय भास व्मतीत हो गए। एक फदन शुसिव्रत

सुख-साधन एवॊ ऩुि-ऩौिाफद का सुख प्राद्ऱ होता हं ।

था। कीिड़ भं उसे एक फहुत फड़ा करश फदखाई फदमा।

कृ ऩा कयं । भेयी यऺा कयं ।

से प्राद्ऱ होने वारे दोष दयू होते हं औय अनेक प्रकाय के

फकमा कयो, इससे तुम्हाया कल्माण होगा।

स्नान कयने के सरए गमा। उसके साथ याजकुभाय नहीॊ
शुसिव्रत ने उसको उठामा औय दे खा तो उसभं धन था।

सफसे ऩूवा स्जसने इस व्रत को फकमा था, उसका इसतहास

शुसिव्रत उस करश को रेकय घय आमा औय भाॊ से

बी सुनो-

फोरा-हे भाॊ! सशवजी ने इस करश के रुऩ भं धन फदमा है ।

ऩूवक
ा ार भं इस ऩृ्वी ऩय एक याजा याज्म कयता

भाता ने आदे श फदमा- फेटा! तुभ दोनं इसको फाॊट

था। याजाने अऩने शिुओॊ को अऩने वश भं कय सरमा।

रो। भाॊ का विन सुनकय शुसिव्रत फहुत ही प्रसन्न हुआ

दै व गसत से याजा औय याजकुभाय ऩय शसन की दशा आई।

औय धभागुद्ऱ से फोरा- बैमा! अऩना फहस्सा रे रो। ऩयॊ तु

याजा को उसके शिुओॊ ने भाय फदमा। याजकुभाय बी

सशवबक्त याजकुभाय धभागुद्ऱ ने कहा-भाॊ! भं फहसा रेना

फेसहाया हो गमा। याजगुरु को बी फैरयमं ने भाय फदमा।

नहीॊ िाहता, क्मंफक जो कोई अऩने सुकृत से कुछ बी

उसकी त्रवधवा ब्राह्मणी तथा उसका ऩुि शुसिव्रत यह गमा।

ऩाता है , वह उसी का बाग है औय उसे आऩ ही बोगना
िाफहमे। सशवजी भुझ ऩय बी कबी कृ ऩा कयं गे।

जून 2013

34

धभागुद्ऱ प्रेभ औय बत्रक्त के साथ शसन का व्रत
कयके ऩूजा कयने रगा। इस प्रकाय उसे एक वषा व्मतीत
हो गमा। फसॊत ऋतु का आगभन हुआ। याजकुभाय

आऩसे फात कयने की इच्छा हुई, इसी से भं सस्खमं को

अरग बेजकय अकेरी यह गई हूॊ। गॊधवा कहते हं फक भेये

फयाफय सॊगीत त्रवद्या भं कोई सनऩुण नहीॊ है । बगवान

धभागुद्ऱ तथा ब्राह्मण ऩुि शुसिव्रत दोनं ही वन भं घूभने

शॊकय ने हभ दोनं ऩय कृ ऩा की है , इससरए आऩको महाॊ

गए। दोनं वन भं घूभते-घूभते कापी दयू सनकर गए।

ऩय बेजा है । अफ से रेकय भेया-आऩका प्रेभ कबी न टू टे ।

ब्राह्मण कुभाय फोरा- बैमा! िरयिवान ऩुरुषं को िाफहए फक

याजकुभाय के गरे भं डार फदमा।

उनको वहाॊ सैकड़ं गॊधवा कन्माएॊ खेरती हुई सभरीॊ।

ऐसा कहकय कन्मा ने अऩने गरे का भोसतमं का हाय

वे स्स्त्रमं से फिकय यहं । मे भनुष्म को शीघ्र ही भोह रेती

याजकुभाय धभागुद्ऱ ने कहा- भेये ऩास न याज है ,

हं । त्रवशेष रूऩ से ब्रह्मिायी को स्स्त्रमं से न तो सॊबाषण

न धन। आऩ भेयी बामाा कैसे फनंगी? आऩके त्रऩता है ,

कयना िाफहए, तथा न ही सभरना िाफहए। ऩयॊ तु गॊधवा

आऩने उनकी आऻा बी नहीॊ री। गॊधवा कन्मा फोरी- अफ

कन्माओॊ की क्रीड़ा को दे खने की इच्छा यखने वारा

आऩ घय जाएॊ, रेफकन ऩयसं प्रात्कार महाॊ अवश्म

याजकुभाय उनके ऩास अकेरा िरा गमा।

ऩधायं । याजकुभाय से ऐसा कहकय गॊधवा कन्मा अऩनी

गॊधवा कन्माओॊ भं से एक सुॊदयी उस याजकुभाय
ऩय भोफहत हो गई औय अऩनी सस्खमं से फोरी- महाॊ से
थोड़ी दयू ी ऩय एक सुॊदय वन है , उसभं नाना प्रकाय के
पूर स्खरे हं । तुभ सफ जाकय उन सुॊदय पूरं को तोड़कय
रे आओ, तफ तक भं महीॊ फैठी हूॊ। सस्खमाॊ उस गॊधवा
कन्मा की आऻा ऩाकय िरी गई औय वह सुॊदय गॊधवा
कन्मा याजकुभाय ऩय दृत्रष्ट गड़ाकय फैठ गई। उसे अकेरा
दे खकय याजकुभाय बी उसके ऩास िरा आमा।
याजकुभाय को दे खकय गॊधवा कन्मा उठी औय फैठने
के सरए कभर-ऩत्तं का आसन फदमा। याजकुभाय आसन
ऩय फैठ गमा। गॊधवा कन्मा ने ऩूछा- आऩ कौन है ? फकस
दे श के यहने वारे हं तथा आऩका आगभन कैसे हुआ है ?
याजकुभाय ने कहा- भं त्रवदबा दे श के याजा का ऩुि हूॊ,
भेया नाभ धभागुद्ऱ है । भेये भाता-त्रऩता स्वगारोक ससधाय
िुके हं । शिुओॊ ने भेया याज्म छीन सरमा है । भं याजगुरु
की ऩत ्नी के साथ यहता हूॊ, वह भेयी धभा भाता हं ।

सहे सरमं के ऩास िरी गई। याजकुभाय धभागुद्ऱ शुसिव्रत
के ऩास िरा आमा औय उसे सफ सभािाय कह सुनामा।
याजकुभाय धभागुद्ऱ तीसये फदन शुसिव्रत को साथ
रेकय उसी वन भं गमा। उसने दे खा फक स्वमॊ गॊधवायाज
त्रवित्रवक

उस

कन्मा

को

साथ

रेकय

उऩस्स्थत

हं ।

गॊधवायाज ने दोनं कुभायं का असबवादन फकमा औय दोनं
को

सुॊदय

आसन

ऩय

त्रफठाकय

याजकुभाय

से

कहा

याजकुभाय! भं ऩयसं कैराश ऩय गौयी शॊकय के दशान
कयने गमा था। वहाॊ करुणारूऩी सुधा के सागय बोरे
शॊकयजी भहायाज ने भुझे अऩने ऩास फुराकय कहागॊधवायाज! ऩृ्वी ऩय धभागुद्ऱ नाभ का याजभ्रष्ट याजकुभाय है ।
उसके ऩरयवाय के रोगं को शिुओॊ ने सभाद्ऱ कय
फदमा है । वह फारक गुरु के कहने से शसनवाय का व्रत
कयता है औय सदा भेयी सेवा भं रगा यहता है । तुभ
उसकी सहामता कयो, स्जससे वह अऩने शिुओॊ ऩय त्रवजम
प्राद्ऱ कय सके।
गौयीशॊकय की आऻा को सशयोधामा कय भं अऩने

फपय याजकुभाय ने उस गॊधवा कन्मा से ऩूछा- आऩ

घय िरा आमा। वहाॊ भेयी ऩुिी अॊशुभसत ने बी ऐसी ही

कौन है ? फकसकी ऩुिी हं औय फकस कामा से महाॊ ऩय

प्राथाना की। सशवशॊकय की आऻा तथा अॊशुभसत के भन

आऩका आगभन हुआ है ?

की फात जानकय भं ही इसको इस वन भं रामा हूॊ।

गॊधवा कन्मा ने कहा- त्रवित्रवक नाभ के गॊधवा की
भं ऩुिी हूॊ। भेया नाभ अॊशुभसत है । आऩको आता दे ख

भं इसे आऩको संऩता हूॊ। भं आऩके शिुओॊ को
ऩयास्त कय आऩको आऩका याज्म फदरा दॊ ग
ू ा।

जून 2013

35

ऐसा कहकय गॊधवायाज ने अऩनी कन्मा का त्रववाह

श्रीकृ ष्ण बगवान फोरे- हे ऩाॊडुनॊदन! आऩ बी मह

याजकुभाय के साथ कय फदमा तथा अॊशुभसत की सहे री की

व्रत कयं तो कुछ सभम फाद आऩको याज्म प्राद्ऱ होगा औय

शादी ब्राह्मण कुभाय शुसिव्रत के साथ कय दी। उसने

सबी प्रकाय के सुखं की प्रासद्ऱ होगी। आऩके फुये फदनं की

याजकुभाय की सहामता के सरए गॊधवो की ितुयॊसगणी

शीघ्र सभासद्ऱ होगी।

सेना बी दी।

मुसधत्रष्ठय ने शसनवाय व्रत की कथा सुनकय श्रीकृ ष्ण

धभागुद्ऱ के शिुओॊ ने जफ मह सभािाय सुना तो
उन्होने याजकुभाय का अधीनता स्वीकाय कय री औय
याज्म बी रौटा फदमा। धभागुद्ऱ ससॊहासन ऩय फैठा। उसने

अऩने धभा बाई शुसिव्रत को भॊिी सनमुक्त फकमा। स्जस

बगवान की ऩूजा की औय व्रत आयॊ ब फकमा। इसी व्रत के
प्रबाव से भहाबायत भं ऩाॊडवंने िोण, बीष्भ औय कणा
जैसे भहायसथमं को ऩयास्त फकमा- सफसे फढ़कय उन्हं

ब्राह्मणी ने उसे ऩुि की तयह ऩारा था, उसे याजभाता

श्रीकृ ष्ण जैसा मोग्म सायथी सभरा तथा सछना हुआ याज्म

फनामा। इस प्रकाय शसनवाय के व्रत के प्रबाव औय सशवजी

प्राद्ऱ कय वषं तक उसका सुख बोगा औय फपय दे ह

की कृ ऩा से धभागुद्ऱ फपय से त्रवदबायाज हुआ।

त्मागकय स्वगा की प्रासद्ऱ की।

भॊि ससद्ध भॊगर गणेश
भूॊगा गणेश को त्रवध्नेश्वय औय ससत्रद्ध त्रवनामक के रूऩ भं जाना जाता हं । इस सरमे भूॊगा गणेश ऩूजन के
सरए अत्मॊत राबकायी हं । गणेश जो त्रवध्न नाश एवॊ शीघ्र पर फक प्रासद्ऱ हे तु त्रवशेष राबदामी हं ।
भूॊगा गणेश घय एवॊ व्मवसाम भं ऩूजन हे तु स्थात्रऩत कयने से गणेशजी का आशीवााद शीघ्र प्राद्ऱ होता हं ।
क्मोफक रार यॊ ग औय रार भूॊगे को ऩत्रवि भाना गमा हं । रार भूॊगा शायीरयक औय भानससक शत्रक्तमं का
त्रवकास कयने हे तु त्रवशेष सहामक हं । फहॊ सक प्रवृत्रत्त औय गुस्से को सनमॊत्रित कयने हे तु बी भूॊगा गणेश फक
ऩूजा राब प्रद हं । एसी रोकभान्मता हं फक भॊगर गणेश को स्थात्रऩत कयने से बगवान गणेश फक कृ ऩा
शत्रक्त िोयी, रूट, आग, अकस्भात से त्रवशेष सुयऺा प्राद्ऱ होती हं , स्जस्से घय भं मा दक
ु ान भं उन्नती एवॊ
सुयऺा हे तु भूॊगा गणेश स्थात्रऩत फकमा जासकता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत भूॊगा गणेश फक स्थाऩना से

बाग्मोदम, शयीय भं खून की कभी, गबाऩात से फिाव, फुखाय, िेिक, ऩागरऩन, सूजन औय घाव, मौन
शत्रक्त भं वृत्रद्ध, शिु त्रवजम, तॊि भॊि के दष्ट
ा नाओॊ, हभरा, िोय, तूपान, आग,
ु प्रबा, बूत-प्रेत बम, वाहन दघ
ु ट

त्रफजरी से फिाव होता हं । एवॊ जन्भ कुॊडरी भं भॊगर ग्रह के ऩीफड़त होने ऩय सभरने वारे हासनकय प्रबावं से भुत्रक्त सभरती हं ।जो व्मत्रक्त
उऩयोक्त राब प्राद्ऱ कयना िाहते हं उनके सरमे भॊि ससद्ध भूॊगा गणेश अत्मसधक पामदे भॊद हं । भूॊगा गणेश फक सनमसभत रूऩ से ऩूजा कयने

से मह अत्मसधक प्रबावशारी होता हं एवॊ इसके शुब प्रबाव से सुख सौबाग्म फक प्रासद्ऱ होकय जीवन के साये सॊकटो का स्वत् सनवायण
होता हं ।

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जून 2013

36

शसन प्रदोष व्रत का भहत्व

 सिॊतन जोशी
सनातन धभा भं प्रदोष व्रत का त्रवशेष भहत्व भाना
जाता हं । प्रत्मेक भाह के शुक्र औय कृ ष्ण दोनं ऩऺं के
तेयहवं फदन अथाात िमोदशी को प्रदोष व्रत कहाजाता हं ।
इस फदन फकए जाने वारे व्रत को प्रदोष व्रत कहा
जाता हं । प्रदोष व्रत के फदन बगवान सशव औय भाता ऩावाती
की आयाधना कयने का त्रवधान हं ।
त्रवद्रानो के भतानुशाय प्रदोष व्रत से व्मत्रक्त को
सपरता, शास्न्त प्रदान कयने वारा एवॊ उसकी सभस्त
इच्छाओॊ की ऩूसता कयने वारा हं ।
एसी धासभाक भान्मता हं फक प्रदोष के फदन बगवान सशव के
फकसी बी रूऩ का दशान कयने भाि से व्मत्रक्त की सायी
अऻानता का नाश कय दे ता हं औय बक्त को सशव की कृ ऩा का
बागी फनाता हं ।
जफ

शसनवाय के फदन प्रदोष व्रत ऩड़ता हं , तो उसे

शसन प्रदोष व्रत के नाभ से जाना जाता हं । शसनदे व नवग्रहं
भं से एक भहाग्रह हं । शसनदे व के फाये भं शास्त्रं भं वणान है
फक शसन का कोऩ अत्मन्त बमॊकय होता हं । बमॊकय कोऩ
शान्त कयने हे तु ऩुयाणं भं उल्रेख हं की शसन प्रदोष व्रत
कयने से शसन दे व का प्रकोऩ स्वत् शान्त हो जाता है ।

शसन प्रदोष के फदन शसन की कायक वस्तुओॊ जैसे
रोहा, तैर, कारे सतर, कारी उड़द, कोमरा औय कम्फर आफद
का दान कयना शुब परप्रद होता हं , औय शसन-भॊफदय भं
जाकय तैर का फदमा जराता है तथा उऩवास कयता है ,
शसनदे व उससे प्रसन्न होकय उसके साये द्ु खं को दयू कय दे ते
हं ।
त्रवद्रानो के अनुशाय शास्त्रं भं वस्णात है फक उत्तभ
सॊतान की काभना यखने वारे दम्ऩत्रत्त को शसन प्रदोष व्रत
अवश्म कयना िाफहए। शास्त्रो भं शसन प्रदोष व्रत शीघ्र ही
सॊतान दे ने वारा भाना गमा हं ।
सॊतान-प्रासद्ऱ के हे तु शसन प्रदोष वारे फदन सुफह
स्नानादी कयने के ऩश्चात ऩसत-ऩत्नी को सभरकय सशव-ऩावाती
औय गणेश की का त्रवसध-त्रवधान से ऩूजन-अिान कयना
िाफहए औय सशवसरॊग ऩय जरासबषेक कयना िाफहए। इसके
ऩश्चमात शसनदे व की कृ ऩा प्राद्ऱ कयने हे तु ऩीऩर के वृऺ की
जड़ भं जर िढ़ाना िाफहए। साथ ही दम्ऩत्रत्त को ऩूये फदन
उऩवास कयना िाफहए। ऐसा कयने से जल्दी ही सॊतान की
प्रासद्ऱ होती है ।

स्जन रोगं ऩय शसन की साढ़े साती औय ढै मा का

शसन प्रदोष व्रत के फदन साधक को सॊध्मा-कार भं

प्रबाव हो, उनके सरए शसन प्रदोष व्रत कयना त्रवशेष फहतकायी

बगवान का बजन-ऩूजन कयना िाफहए औय सशवसरॊग का

भाना गमा है ।

जर औय त्रफल्व की ऩत्रत्तमं से असबषेक कयना िाफहए। साथ

ऩूणा त्रवसध-त्रवधान व सनष्ठा से फकमा गमा प्रदोष व्रत

ही इस फदन भहाभृत्मुॊजम-भॊि के जाऩ का बी त्रवधान है । इस

शसनदे व की कृ ऩा प्राद्ऱ कयने का एक शास्त्रोक्त व आसान उऩाम

फदन प्रदोष व्रत कथा का ऩाठ कयना िाफहए औय ऩूजा के फाद

है । प्रदोष व्रत के प्रबाव से शसन से सॊफॊसधत ऩीडा दयू होती हं ,
औय शसनदे व का आशीवााद बी सभरता है स्जससे व्मत्रक्त की
सबी भनोकाभनाएॉ ऩूयी होती जाती हं ।

बबूत को भस्तक ऩय रगाना िाफहए। शास्त्रं के अनुसाय जो
साधक इस तयह शसन प्रदोष व्रत का ऩारन कयता है , उसके
सबी कष्ट सभाद्ऱ हो जाते हं औय सम्ऩूणा इच्छाएॉ ऩूयी होती हं ।

जून 2013

37

शसन-साढ़े साती के शाॊसत उऩाम

 सिॊतन जोशी
 “ॐ ऐॊ ह्रीॊ श्रीॊ शनैश्चयाम नभ्” इस भॊि का जऩ
प्रसतफदन १०८ फाय कयने से राब प्राद्ऱ होता हं ।
 श्री सशवसरॊग

ऩय ताॉफे का सऩा (नाग) िढ़ाने से शसन

साढे साती का अशुबता भं कभी आती हं ।
 आक के ऩौधे ऩय सात शसनवाय तक रोहे की सात
कीर िढ़ाने से राब प्राद्ऱ होता हं ।
 फकसी भॊफदय भं कारे यॊ ग की वस्तुएॊ एवॊ सात फादाभ
सात शसनवाय तक रगाताय दान कयने से शसन की
साढे साती भं शसन से सॊफॊसधत कष्ट दयू होते हं ।
 हनुभान की ऩूजा-अिाना कयने से हनुभानजी की
प्रसतभा को ससॊदयू व तेर िढाने से राब प्राद्ऱ होता हं ।
 शसनवाय का व्रत कयने से बी शसन के अशुब प्रबवो
भं कभी आसत हं ।
 शसनवाय को फकसी हनुभान जी की प्रसतभा को ससॊदयू ,
िभेरी का तेर, िाॊदी के वका का िोरा िढ़ाए।

हनुभानजी को जनेऊ, रार पूर की भारा, रडडु तथा
ऩान अऩाण कयने से साढ़े साती से सॊफॊसधत कष्टो से
छुटकाया सभरता हं ।

 सद्ऱधान अथाात सात प्रकाय के अन्न का दान कयने
से व शसनवाय को प्रात् ऩीऩर का ऩूजन कय ऩीऩर
के भूर भं जर अऩाण कयने से बी त्रवशेष राब प्राद्ऱ
होता हं ।
 स्नान कयते सभम राजवन्ती, रंग, रोफान, िौराई,
कारा सतर, गौय, कारी सभिा, भॊगयै रा, कुल्थी, गौभूि
आफद भं से ऩाॊि मा सात मा उस्से से असधक वस्तु
जो बी प्राद्ऱ हो उसका िूणा फना कय को जर भं
सभराकय दस्ऺण फदशा की औय भुख कय के खड़े

होकय स्नान कयं । इस जर से स्नान कयने के ऩश्चात ्

फकसी बी तयह का साफुन मा तेर का प्रमोग नहीॊ
कयं । इस जर को शयीय ऩय डारने से ऩूवा साफुन
आफद रगरे व शुद्ध ऩाने से झाग को साप कयने के
ऩश्चमात औषसध सभरे जर से स्नान फकमा जा सकता
हं ।
 शसनवाय के फदन शसन से सॊफॊफदत वस्तुएॊ जेसे कारे

उड़द, तेर, कारे सतर, रोहे से फनी वस्तु, श्माभ वस्त्र
आफद का दान दे ने से शसन ऩीड़ा का शभन होता हं ।

 एक सूखा नारयमर रेकय उसभं िाकू मा फकर से
छोटा सा गोर छे द फना रं। इस छे द भं नारयमर भं
आटे का फूया, फादाभ, काजू, फकशसभश, त्रऩस्ता, अखयोट
मा छुआया सभराकय नारयमर भं बयं । नारयमर को
ऩुन् फन्द कय फकसी ऩीऩर के ऩास बूसभ के अन्दय
इस प्रकाय गाड़ दं की िीफटमाॊ आसानी से तराश रं,
फकन्तु अन्म जानवय न ऩा सकं। घय रौटकय हाथ-ऩैय
धोकय घय भं प्रवेश कयं । इस प्रकाय ८ शसनवाय तक
मह फक्रमा सम्ऩन्न कयने से शसन ऩीडाका शभन होता
हं ।
 सशवसरॊग ऩय कच्िा दध
िढाते हुए “अभोघ सशव

कवि“ का ऩाठ कयने से शसन ऩीडा शाॊत होती हं ।

 प्रत्मेक शसनवाय को भछसरमं को जौ के आटे से फनी
गोसरमाॉ खाने को डारने से राब प्राद्ऱ होता हं ।
 प्रसतफदन शसन वज्रऩॊजय कवि , दशयथ-कृ त-शसन-स्तोि
अथवा शनैश्चयस्तवयाज् का सनमसभत ऩाठ कयने से
राब प्राद्ऱ होता हं ।
 बोजन कयने से ऩूवा ऩयोसी गमी थारी भं से एक
ग्रास सनकारकय कारे कुत्ते को स्खराएॉ अथवा शसनवाय
को शाभ के सभम उड़द की दार के ऩकौडे व इभयती
कुत्ते को स्खराए।

जून 2013

38

 शसनवाय के फदन कारे कऩड़े भं जौ, नारयमर, रोहे की

शनैश्चयाम

क्रूयाम,

िौकोय शीट, कारे सतर, कच्िे कोमरे व कारे िने को

ऩोटरी भं फाॊधकय फहते हुए ऩानी भं डारना राबप्रद

भाभकानाॊ

बमॊ

गागेम

कौसशकस्मात्रऩ,

होता हं ।

 कारी गाम व कारे कुत्ते को तेर से िुऩड़ी योटी, िने
की दार व गुड स्खराना राबप्रद यहता है ।
 वट वृऺ को दध
ू भं शहद व गुड़ को सभराकय सीॊिने
से राब होता हं ।

 शसनवाय, अभावस्मा आफद त्रवशेष फदनं ऩय „शसनभस्न्दय‟ भं जाकय आक-ऩणा (भदाय के ऩत्ते) एवॊ ऩुष्ऩं
की भारा भूसता ऩय िढ़ाएॉ। एक मा आधा िम्भि तेर
बी िढ़ाने से राब होता है ।
 रोहे भं फना प्राण-प्रसतत्रष्ठत शसनमॊि प्राद्ऱ कयरे रं।
सशवसरॊग का मथा शत्रक्त ऩूजन कयं । हो सके, जरासबषेक
कयं । ऩाॉि श्वेत ऩुष्ऩ औय एक त्रफल्व-ऩि िढ़ाएॉ। सशवभन्ि का जऩ कयं , फपय प्राथाना कयं । मथा- ॐ श्रीशॊकयाम
नभ्। श्रीकैरास-ऩतमे नभ्। श्रीऩावाती-ऩतमे नभ्।

इस प्रकाय प्राथाना के सशवसरॊग के साभने एक
नारयमर औय एक भुठ्ठी गेहूॉ यखं। नभस्काय कय घय
वाऩस आएॉ।

शसन एवॊ शसन-बामाा-स्तोि का सनत्म तीन ऩाठ कयने
से „शसन-ग्रह′ की ऩीड़ा सनश्चम की दयू होती है ।

क्रोडस्तु

त्रऩॊगरो

शौरय्

शनैश्चयो

एतासन
तस्म

ध्वजनी
करही
नाभासन

स्वप्नेष्वत्रऩ

शसन-नाभासन,

शौये ्

कृ ता

ऩीड़ा,

धाभनी
कण्टकी

बवसत

कदािन॥६॥

शसन-बामाामा्,

यौिोऽन्तको

त्रऩप्रादे न
प्रातरुत्थाम

िैव,
िात्रऩ,

जामते॥५॥
भहाभुसन्।

कृ ष्णो

भन्द्,

त्रऩप्रादो

फभ्रु्,

बवाम्महभ ्।

बवसत

सॊमुत्॥७॥
म्

कॊकारी
अजा

सनत्मॊ

मभ्।

भफहषी
जऩसत

ऩठे त ्।

कदािन॥८॥

करह-त्रप्रमा।
तुयगॊभा॥९॥
म्

तस्म द्ु खा त्रवनश्मस्न्त, सुख-सौबाग्मॊ वद्धा ते॥१०॥

ऩुभान ्।

भॊि ससद्ध घोड़े की नार
त्रवशेष त्रवसध-त्रवधान द्राया असबभॊत्रित घोड़े की नार का
प्रमोग दब
ु ााग्म को दयू कयने भं सहामक ससद्ध होती हं ।

घोड़े द्राया इस्तेभार की हुई नार एक दर
ा वस्तु भानी
ु ब

अशुब मोग को शाॊत कयने हे तु घोड़े की नार त्रवशेष रुऩ
से राबकायी होती हं ।
मफद व्मवसाम ठीक से नहीॊ िर यहा हो, आऩके व्मवसाम
को फकसी ने भॊि-तॊि आफद प्रमोग कय फाॊध फदमा हो तो
अऩने व्मवसामीक स्थर के भुख्म द्राय की िौखट ऩय
मफद घय भं हभंशा क्रेश यहता हो, आसथाक स्स्थती
कभजोय हो मा घय ऩय भॊि-तॊि का प्रबाव हो, घय के

म् ऩुया याज्म-भ्रष्टाम, नराम प्रददो फकर।
स्वमॊ,

भन्िॊ

नीराञ्जन-प्रख्मॊ,

छामा-भाताण्ड-सम्बूतॊ,

सवा-काभ-पर-प्रदभ ्॥१॥

नीर-जीभूत-सस्न्नबभ ्।

नभस्मासभ

शनैश्चयभ ्॥२॥

ॐ नभोऽका-ऩुिाम शनैश्चयाम, नीहाय-वणााञ्जन-नीरकाम।
स्भृत्वा यहस्मॊ बुत्रव भानुषत्वे, पर-प्रदो भेबव सूम-ा ऩुि॥३॥
नभोऽस्तु

ऩीड़ा,

तुष्टो

घोड़े की नार को रगा दे ना िाफहए।

शसन-बामाा-स्तोि

क्रोडॊ

तस्म,

तस्म

की अशुब दशा, ढै मा, साढ़े साती शसन आफद कोई बी

शास्न्त!! शास्न्त!!!

शौरय्

शनैश्चय-कृ ता

स्तौसत,

प्रदासमने॥४॥

गई है जो शसन सभफसधत सबी प्रकाय की ऩीड़ा जैसे शसन

श्रीत्रवघ्न-हतााम नभ्। श्रीसुख-दािे नभ्। ॐ शास्न्त!

स्वप्ने

एसबनााभसब्

ससत्रद्ध-फुत्रद्ध

प्रेत-याजाम,

कृ ष्ण-वणााम

ते

नभ्।

भुख्म द्राय ऩय घोड़े की नार को रगा दे ना िाफहए।
घोड़े की नार फुयी नजय, जाद-ू टोने आफद से यऺा कयती हं ।

भूल्म: Rs.351, 551, 751 >> Order Now

असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं ।

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जून 2013

39

साभुफिक शास्त्र भं शसन ये खा का भहत्व

 सिॊतन जोशी
बायतीम साभुफिक शास्त्र बी ज्मोसतष शास्त्र की तयह

होने के कायण कबी-कबी व्मत्रक्त अऩने कताव्म के प्रसत सजग

कई यहस्मो से बया हुवा भहासागय की तयह गहया है । स्जसभे

औय स्जम्भेदाय बी होता है । व्मत्रक्त सभम के साथ साथ ज्मादा

स्स्थत ऩवातं को कापी भहत्व फदमा गमा है । साभुफिक शास्त्र भं

स्जस व्मत्रक्त के हाथ भं शसन ऩवात उबयहुवा औय

हाथ का आकाय, ये खा, नाखून, हथेरी का यॊ ग एवॊ हथेरी ऩय

यहस्मवादी होते जाते हं ।

भनुष्म की हथेरी ऩय ग्रहो भं प्रभुख नवग्रहो के सरए अरग

प्रबावशारी होता हं । वह व्मत्रक्त सपर यहस्मवादी त्रवषमो के

अरग स्थान सनधाारयत फकमा गमा हं । उन ग्रहं के सरए

जानकाय जेसे जादग
ू य, इॊ जीसनमय शोध कताा आफद होते हं ।

सनघाारयत फकमे गमे स्थान को ही ऩवात कहा गमा हं । जानकायो
की भाने तो हथेरी ऩय स्स्थत ऩवात हभाये शयीय के िुम्फकीम
केन्ि होते हं जो सॊफॊसधत ग्रहं से उजाा प्राद्ऱ कय भस्स्तष्क एवॊ
शयीय के त्रवसबन्न फहस्सो तक उस उजाा को ऩहुॊिाते हं ।
इस अॊक भं हभ आऩका भगादशान कय यहे हं ।

शसन ऩवात व शसन ये खा
हथेरी ऩय भध्मभा अॊगुरी अथाात सफसे फडी वारी
अॊगुरी (सभडीर फपॊगय) के भूर भं शसन का स्थान होता है स्जसे
शसन ऩवात कहा जाता हं । हथेरी ऩय स्स्थत शसन ऩवात से
व्मत्रक्त का स्वबाव, गृहस्थ जीवन औय स्वास््म को दशााता हं ।
हथेरी ऩय स्स्थत शसन ऩवात व्मत्रक्त की साधयण-आसाधायण
प्रकृ सत के फायं भं सयरता से ऻात फकमा जा सकता है ।

ऩूणा त्रवकससत:
स्जस व्मत्रक्त की हथेरी भं शसन ऩवात उबया हुवा अथाात

ऩूणा त्रवकसीत हो एसे व्मत्रक्त फहुत ही बाग्मशारी होते हं , इन्हं

अऩनी भेहनत का ऩूणा राब प्राद्ऱ होता है । व्मत्रक्त अऩनी भेहनत
के फर ऩय श्रेष्ठ स्थान को प्राद्ऱ कयते हं । एसे व्मत्रक्त असधकतय
अकेरे यहना ऩसॊद कयते दे खे गमे हं । व्मत्रक्त का स्वबाव थोडा
सिड़सिड़ा होता हं ।
एसे व्मत्रक्त अऩने रक्ष्म को प्राद्ऱ कयने भं सऺभ होते हं ।
फदन प्रसत-फदन सपरता प्राद्ऱ कयते जाते हं । एसे व्मत्रक्त अऩने
कामा के प्रसत अत्मासधक सभत्रऩात होते हं स्जस कायण वह अऩने
गृहस्थ जीवन की ऩयवाह नहीॊ कयते! रेफकन उन्नत शसन ऩवात

व्मत्रक्त अऩने जीवन भं ऩूणा सभतव्ममी होते हं । व्मत्रक्त अिर
सम्ऩसत खयीदने भं ज्मादा त्रवश्वास यखते हं ।
सॊगीत, नृत्म आफद करा भं इनका रूझान कभ यहता

हं । ऐसे व्मत्रक्त थोडे शकी सभजाज के होते हं । फिऩन से ही इनके
फदभाग भं छोटी-छोटी फातो को रेकय सन्दे हशीरता होती हं इस
कायण व्मत्रक्त अऩने ऩरयजनो ऩय बी शक कयने से नहीॊ िूकते।
कुछ जानकायो के अनुशाय अत्मासधक त्रवकससत
अथाात उबया शसन ऩवात व्मत्रक्त को आत्भहत्मा कयने को प्रेरयत
कयता हं । जरूयत से ज्मादा त्रवकससत शसन ऩवात वारे व्मत्रक्त
धृतकामा कयने वारे जैसे डाकू, ठग, रुटेये, आफद होता हं । ऐसे

व्मत्रक्तमं की हथेरी भं शसन ऩवात साधायणत: ऩीराऩन सरए
हुए होता हं । इनकी हथेसरमाॊ कुछ ऩीराऩन सरमे होती हं ।

शसन ऩवात शुब रक्ष्ण मुक्त हो तो भनुष्म, इॊ जीसनमय,

वैऻासनक, जादग
ू य, साफहत्मकाय, ज्मोसतषी, कृ षक अथवा
यसामन शास्त्री होते हं ।

शुब शसन ऩवात वारे व्मत्रक्त प्राम: अऩने भाता-त्रऩता की
इकरौती सॊतान मा सबी सॊतानो भं से असधक त्रप्रम होते हं ।
स्वबाव से सॊतोषी औय थोडे कॊजूस होते हं ।
एसे व्मत्रक्त मफद रेखन कामा से जुडे हो, तो धासभाक व
यहस्मवाद रेखन उनका त्रप्रम त्रवषम होता है ।

भध्माभ त्रवकससत ऩवात:
शसन ऩवात के भध्मभ त्रवकससत होने से व्मत्रक्त अऩने
जीवन भं भध्मभ सपरता व सम्भान प्राद्ऱ कय ऩाता।

जून 2013

40
अत्रवकससत ऩवात:

मह शुबपर प्राद्ऱ होने के सॊकेत हं । व्मत्रक्त को सभाज भं भान-

मफद फकसी व्मत्रक्त की हथेरी भं शसन ऩवात नही होता है
तो उस व्मत्रक्त का जीवन उद्दे श्महीन व भहत्वहीन होता हं । मफद

सम्भान की प्रासद्ऱ होती हं ।
मफद शसन ऩवात सूमा ऩवात की ओय झुका हुआ हो तो

शसन ऩवात साभान्म रूऩ से उबया हुआ हो तो व्मत्रक्त जरूयत से

मह व्मत्रक्त के आरसी, सनधान होने के रऺण होते हं । एसे व्मत्रक्त

असधकतय कामो भं असपरता प्राद्ऱ होती है । मफद भध्मभा

जरूयत से ज्मादा हताशा औय सनयाशा के बाव होते हं । एसे

ज्मादा बाग्म ऩय त्रवश्वास कयने वारा होता हं । उसे अऩने
अॊगुरी का ससया नुकीरा हो औय शसन ऩवात त्रवकससत हो तो
व्मत्रक्त अत्मासधक कल्ऩनासशर होता है ।

व्मत्रक्त के हाथ-ऩैय ठॊ डे होते हं , दाॊत योग बी होता हं । एसे

व्मत्रक्त को दघ
ा नाओॊ भं असधकतय ऩैयं औय नीिे के अॊगं भं
ु ट
िोट रगती हं । उनका स्वास््म असधकतय सनफार होता हं ।

मफद शसन ऩवात गुरू ऩवात की ओय झुका हुआ हो तो

अऩने बाग्म के बयोसे ऩय जीत्रवत यहने वारे होते हं । इनभं
व्मत्रक्त प्रत्मेक कामा को नकायात्भक िष्टी से ही दे खते हं ।
मफद शसन ऩवात ऩय जरूयत से ज्मादा ये खाएॊ स्स्थत हं

तो व्मत्रक्त डयऩोक, कामय औय फहुत बोगत्रप्रम होता हं ।

मफद हथेरी ऩय शसन ऩवात औय फुध ऩवात दोनं ही ऩूणा

त्रवकससत हो, तो व्मत्रक्त एक सपर व्माऩायी होता हं । उसे अऩने
जीवन भं आसथाक दृत्रष्ट से फकसी प्रकाय का कोई अबाव नहीॊ यहता।

त्रवद्या प्रासद्ऱ हे तु सयस्वती कवि औय मॊि
आज के आधुसनक मुग भं सशऺा प्रासद्ऱ जीवन की भहत्वऩूणा आवश्मकताओॊ भं से

एक है । फहन्द ू धभा भं

त्रवद्या की

असधष्ठािी दे वी सयस्वती को भाना जाता हं । इस सरए दे वी सयस्वती की ऩूजा-अिाना से कृ ऩा प्राद्ऱ कयने से फुत्रद्ध कुशाग्र एवॊ
तीव्र होती है ।
आज के सुत्रवकससत सभाज भं िायं ओय फदरते ऩरयवेश एवॊ आधुसनकता की दौड भं नमे-नमे खोज एवॊ सॊशोधन के
आधायो ऩय फच्िो के फौसधक स्तय ऩय अच्छे त्रवकास हे तु त्रवसबन्न ऩयीऺा, प्रसतमोसगता एवॊ प्रसतस्ऩधााएॊ होती यहती हं ,
स्जस भं फच्िे का फुत्रद्धभान होना असत आवश्मक हो जाता हं । अन्मथा फच्िा ऩयीऺा, प्रसतमोसगता एवॊ प्रसतस्ऩधाा भं
ऩीछड जाता हं , स्जससे आजके ऩढे सरखे आधुसनक फुत्रद्ध से सुसॊऩन्न रोग फच्िे को भूखा अथवा फुत्रद्धहीन मा अल्ऩफुत्रद्ध
सभझते हं । एसे फच्िो को हीन बावना से दे खने रोगो को हभने दे खा हं , आऩने बी कई सैकडो फाय अवश्म दे खा होगा?
ऐसे फच्िो की फुत्रद्ध को कुशाग्र एवॊ तीव्र हो, फच्िो की फौत्रद्धक ऺभता औय स्भयण शत्रक्त का त्रवकास हो इस सरए सयस्वती
कवि अत्मॊत राबदामक हो सकता हं ।

सयस्वती कवि को दे वी सयस्वती के ऩयॊ भ दर
ा तेजस्वी भॊिो द्राया ऩूणा भॊिससद्ध औय ऩूणा िैतन्ममुक्त फकमा जाता हं ।
ू ब
स्जस्से जो फच्िे भॊि जऩ अथवा ऩूजा-अिाना नहीॊ कय सकते वह त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय सके औय जो फच्िे ऩूजा-अिाना
कयते हं , उन्हं दे वी सयस्वती की कृ ऩा शीघ्र प्राद्ऱ हो इस सरमे सयस्वती कवि अत्मॊत राबदामक होता हं ।
सयस्वती कवि औय मॊि के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं । >> Order Now

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41

जून 2013

शसन के त्रवसबन्न ऩाम का

 स्वस्स्तके.ऎन.जोशी.
बायतीम ज्मोसतष शास्त्र के अनुशाय फकसी बी
व्मत्रक्त की जन्भ यासश से शसन स्जस बी बाव भं गोिय
कय यहा होता है । उसके अनुसाय शसन के ऩामा अथाात
ऩाद पर त्रविाय फकमा जाता हं । व्मत्रक्त की जन्भ कुण्डरी
से शसन ऩामा के परं का त्रवस्ताय से अध्ममन फकमा
जाता हं ।

जन्भ यासश के अनुसाय शसन ऩामा की शुबता मा
अशुबता का सनधाायण सनम्न रुऩ से फकमा जाता हं ।
जफ शसन गोिय भं फकसी व्मत्रक्त की जन्भ यासश से 1,
6, 11 बाव भं भ्रभण कयते है , तो शसन के ऩाद स्वणा के भाने
जाते हं । उसी तयह जफ शसन फकसी व्मत्रक्त की जन्भ यासश से
2, 5, 9 वं बाव भं गोिय कयते है . तो शसन के ऩाद यजत के

भाने जाते हं । जफ शसन फकसी व्मत्रक्त की जन्भ यासश से 3, 7,
10 वं बाव भं गोिय कयते है , तो शसन के ऩाद ताम्र के भाने

3. ताॊफे का ऩामा की अवसध के पर
शसन के गोिय की ताॊफे का ऩामा की अवसध व्मत्रक्त को सभरेजुरे पर प्रदान कयने वारी होती हं । इस अवसध भं व्मत्रक्त को
जीवन के कई ऺेिं भं सपरता प्राद्ऱ होती हं । इस अवसध भं
व्मत्रक्त को कुछ ऺेिं भं असपरता का बी साभना कयना ऩड
सकता हं ।

4. रोहे का ऩामा की अवसध के पर
शसन गोिय की रोहे का ऩामा की अवसध भं व्मत्रक्त को
आसथाक भाभरो भं हासन हो सकती है । नौकयी, व्मवसाम
के सरमे बी मह सभम प्रसतकुर यहने की असधक
सॊबावनाएॊ फनती हं । इस अवसध भं व्मत्रक्त को स्वास््म
सुख भं कभी हो सकती है ।

जाते हं औय जफ शसन फकसी व्मत्रक्त की जन्भ यासश से 4, 8,

जन्भ यासश से त्रवसबन्न बावं भं शसन के पर

12 वं बाव भं भ्रभण कयते है , तो शसन के ऩाद रोहे के भाने

1. प्रथभ बाव भं शसन स्वणा ऩामा त्रविाय

जाते हं ।

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश अथाात प्रथभ

शास्त्रोक्त त्रवधान से शसन ऩामा की अवसध भं सभरने
वारे साभान्म पर

सोने का ऩामा की अवसध भं व्मत्रक्त को कई प्रकाय के सुखसाधन प्राद्ऱ होने की सॊबावनाएॊ असधक फनती हं । आसथाक
िष्टी से धन व सभृत्रद्ध की वृद्धो के सरमे बी मह सभम व्मत्रक्त
के अनुकुर होता हं ।

ऩामा कहा जाता हं । सोने के ऩामे भं शसन व्मत्रक्त के
कष्ट हो सकता हं । व्मत्रक्त के रम्फे सभम से रुके हुए
कामा ऩूये होते है . व्मत्रक्त को नौकयी व व्मवसामीक कामो
से राब प्राद्ऱ होता हं । फकन्तु सशऺा ऺेि भं फाधाएॊ फनी
यह सकती हं ।
2. फद्रतीम बाव भं शसन यजत ऩामा त्रविाय

.

यजत का ऩामा की अवसध व्मत्रक्त को शुब पर दे ने वारी भानी
गई हं । अवसध भं व्मत्रक्त को सफ प्रकाय की बौसतक सुखसुत्रवधाएॊ प्राद्ऱ होती हं ।

बाव भं स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का सोने का
स्वास््म सुख को फढाता हं । ऩयॊ तु व्मत्रक्त को सॊतान से

1. सोने का ऩामा की अवसध के पर

2. िाॊदी का ऩामा की अवसध के पर

.

.

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश फद्रतीय़ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का यजत का ऩामा
कहा जाता हं । यजत के ऩामे भं शसन व्मत्रक्त को नौकयीव्मवसाम के कामो भं सपरता प्राद्ऱ होती हं । आसथाक

42

भाभरो भं सुधाय होता हं । बूसभ-बवन-वाहन इत्माफद से
राब प्राद्ऱ होता हं । इस सभमावसध भं इष्ट सभिो व
ऩारयवायीक सदस्मो का सहमोग प्राद्ऱ होता हं । व्मत्रक्त के
भान-सम्भान भं वृत्रद्ध होती हं ।
3. तृतीम बाव भं शसन ताम्रऩाद ऩामा त्रविाय

.

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश तृतीम बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का ताम्र का ऩामा कहा
जाता हं । ताम्र ऩामा भं शसन व्मत्रक्त को धसभाक कामो भं
रुसि फढाता हं । मफद ऩढाई कय यहे तो उच्ि सशऺा द्ऱासद्ऱ
की सम्बावनामे असधक होती हं । नौकयी भं उन्नसत व
व्माऩाय भं वृत्रद्ध हो सकती हं । अऩने फर-फुत्रद्ध से शिुओॊ
को

ऩयास्जत कयने भं सपरता प्राद्ऱ हो सकती हं ।

दाम्ऩत्म जीवन तानवऩूणा हो सकता हं । आकस्स्भक
दघ
ा नाएॊ बी हो सकती है .
ु ट
.

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश ितुथा बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का रौहे का ऩामा कहा

जाता हं । रौह ऩामा भं नौकयी-व्मवसाम के कामो भं
अत्मासधक फाधाएॊ औय नुक्शान हो सकता हं । उसके
योजगाय का स्त्रोत एकासधक फाय फदरता यहता हं । रौह
ऩामा भं भानससक तनाव फढने की सॊबावनाएॊ असधक
फनती हं । ऩारयवाय भं करह की असधकता होती हं । व्मत्रक्त
भान-सम्भान

की

हासन

हो

5. ऩॊिभ बाव भं शसन यजत ऩामा त्रविाय

सकती

हं ।
.

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश ऩॊिभ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का यजत का ऩामा
कहा जाता हं । यजत ऩामा भं नौकयी- भं उन्नत्रत्त व्माऩाय
भं वृत्रद्ध हो सकती हं । जातक के घय भं भॊगरकामा
सम्ऩन्न होते हं । इस अवसध भं असधकतय शुब पर
असधक प्राद्ऱ होते हं । अऩने त्रवयोसध व शिु को ऩयास्त
कयने भं व्मत्रक्त सपर यहता हं । रेफकन दाॊम्ऩत्म सुख भं
कभी हो सकती हं ।
6. छठे बाव भं शसन स्वणा ऩामा त्रविाय

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश छठे बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का स्वणा का ऩामा
कहा जाता हं । स्वणा ऩामा भं जातक को शुब परो की
प्रासद्ऱ होती हं । नौकयी-व्मवसाम के कामो भं असधक राब
प्राद्ऱ होते हं । व्मत्रक्त के भान-सम्भान भं वृत्रद्ध होती हं ।
एक से असधक स्तोि से धन राब केमोग फनते हं ।
बूसभ-बवन-वाहन के सुख भं वृत्रद्ध होती हं ।
7. सद्ऱभ बाव भं शसन ताम्र ऩामा त्रविाय

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश सद्ऱभ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का ताम्र का ऩामा कहा
जाता हं । ताम्र ऩामा भं व्मत्रक्त के बौसतक सुख-साधनो भं
वृत्रद्ध होने के मोग फनते हं । रेफकन व्मत्रक्त को भानससक
तनाव फना यहता हं । जातक के जीवन साथी के स्वास््म
भं सगयावट हो सकती हं ।
8. अष्टभ बाव भं शसन रोहे ऩामा त्रविाय

4. ितुथा बाव भं शसन रौहे ऩामा त्रविाय

के

जून 2013

गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश अष्टभ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का रौहे का ऩामा कहा
जाता हं । रौह ऩामा भं व्मत्रक्त के कष्टं भं फढोतयी हो
सकती हं । ऩरयवारयक सदस्मो के त्रफि भं आऩसी तनाव व
भतबेद फढने की असधक सॊबावना होती हं । आकस्स्भक
घटनाओॊ के कायण व्मत्रक्त की ऩये शासनमाॊ फढ सकती हं ।
भान-सम्भान भं कभी हो सकती हं । कजा के कायण
ऩये शानी सॊबव हं ।
9. नवभ बाव भं शसन यजत ऩामा त्रविाय
गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश नवभ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का यजत का ऩामा
कहा जाता हं । यजत ऩामा भं व्मत्रक्त की आसथाक स्स्थती
भं सुधाय होता है । एकासधक स्त्रोत से धन राब प्रात होता
हं । व्मत्रक्त के ऩुयाने शिु बी ऩयास्त होते हं ।
10. दशभ बाव भं शसन ताम्र ऩामा त्रविाय
गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश दशभ बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का ताम्र का ऩामा कहा
जाता हं । ताम्र ऩामा भं व्मत्रक्त को अत्मासधक ऩरयश्रभ के
उऩयाॊत सपरता प्राद्ऱ होती हं । रम्फे सभम से िरी

जून 2013

43

आयही मोजनाएॊ बी ऩूणा हो सकती हं । व्मत्रक्त को इस
अवसध भं अऩने रक्ष्मं के प्रसत सिेत यहना िाफहए।
कबी-कबी आरस्म के बाव प्रगसत भं फाधाएॊ डार सकते
हं ।

12. द्रादश बाव भं शसन रौहे ऩामा त्रविाय
गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश द्रादश बाव भं
स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का रौहे का ऩामा कहा
जाता हं । रौह ऩामा भं व्मत्रक्त के अऩने सगे-सॊफॊसधमं व

11. एकादश बाव भं शसन स्वणा ऩामा त्रविाय
गोिय भं जफ शसन व्मत्रक्त की जन्भ यासश एकादश बाव
भं स्स्थत हो तो इस अवसध को शसन का स्वणा का ऩामा
कहा जाता हं । स्वणा ऩामा भं व्मत्रक्त को सबी प्रकाय के

बौसतक सुख साधन प्राद्ऱ होते हं । कामा ऺेि भं ऩूणा
सपरता प्राद्ऱ होती हं । धन-सऩत्रत्त भं वृत्रद्ध होती हं । भान

इष्ट सभिो से सॊफन्ध खयाफ हो सकते हं । आवश्मक्ता से
असधक खिा व कजा से ऩये शानी सॊबव हं । अनावश्मक
फकसी कामो भं झूठे आयोऩ रग सकते हं । भानससक
अस्स्थयता यह सकती हं । दयू स्थ स्थानो की मािा सॊबव
हं ।

सम्भान व ऩद-प्रसतष्ठा भं वृत्रद्ध होती हं ।

द्रादश भहा मॊि
मॊि को असत प्रासिन एवॊ दर
ा मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान द्राया फनामा गमा हं ।
ु ब

ऩयभ दर
ा वशीकयण मॊि,
ु ब

गृहस्थ सुख मॊि

ऩूणा ऩौरुष प्रासद्ऱ काभदे व मॊि

बाग्मोदम मॊि

शीघ्र त्रववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि 

योग सनवृत्रत्त मॊि

भनोवाॊसछत कामा ससत्रद्ध मॊि

सहस्त्राऺी रक्ष्भी आफद्ध मॊि

साधना ससत्रद्ध मॊि

याज्म फाधा सनवृत्रत्त मॊि

आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ मॊि

शिु दभन मॊि

उऩयोक्त सबी मॊिो को द्रादश भहा मॊि के रुऩ भं शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से भॊि ससद्ध ऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत एवॊ िैतन्म

दस्ऺणावसता शॊख

आकाय रॊफाई भं

पाईन

सुऩय पाईन

स्ऩेशर

आकाय रॊफाई भं पाईन

सुऩय पाईन

स्ऩेशर

0.5" ईंि

180

230

280

4" to 4.5" ईंि

730

910

1050

1" to 1.5" ईंि

280

370

460

5" to 5.5" ईंि

1050

1250

1450

2" to 2.5" ईंि

370

460

640

6" to 6.5" ईंि

1250

1450

1900

3" to 3.5" ईंि

460

550

820

हभाये महाॊ फड़े आकाय के फकभती व भहॊ गे शॊख जो आधा रीटय ऩानी औय 1 रीटय ऩानी सभाने की ऺभता वारे
होते हं । आऩके अनुरुध ऩय उऩरब्ध कयाएॊ जा सकते हं ।

स्ऩेशर गुणवत्ता वारा दस्ऺणावसता शॊख ऩूयी तयह से सपेद यॊ ग का होता हं ।

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जून 2013

44

श्री शसन िारीसा
दोह
जम

गणेश

जम

जम

दीनन
कयहु

के

सगरयजा

दख

श्री

कृ ऩा

हे

दयू

सुवन,

शसनदे व
यत्रव

हरयश्रिन्द् नृऩ नारय त्रफकानी। आऩहु बये डोभ घय ऩानी॥

करय,।
प्रबु,

तनम,

भॊगर

कयण

कीजै

सुनहु

याखहु

नाथ

त्रवनम

जन

की

कृ ऩार।

सनहार॥

भहायाज।
राज॥

जमसत जमसत शसनदे व दमारा। कयत मदा बक्तन प्रसतऩारा॥

तैसे नर ऩय दशा ससयानी। बूजी भीन कूद गई ऩानी॥
श्री

शॊकयफह

गहमो जफ जाई।

ऩावाती को

सती कयाई॥

तसनक त्रवरोकत ही करय यीसा। नब ठफड गमो गौरयसुत सीसा॥

ऩाण्डव ऩय बै दशा तुम्हायी। फिी िौऩदी होसत उघायी॥
कौयव के बी गसत भायमो। मुद्ध भहाबायत करय डायमो॥
यत्रव कहॊ भुख भहॊ धरय तत्कारा। रेकय कूफद ऩयमो ऩातारा॥

िारय बुजा, तनु श्माभ त्रवयाजै। भाथे यतन भुकुट छत्रव छाजै॥

शेष दे व-रस्ख त्रवनती राई। यत्रव को भुख ते फदमो छुड़ई॥

ऩयभ त्रवशार भनोहय बारा। टे ढ़ी दृत्रष्ट बृकुफट त्रवकयारा।

जम्फुक ससॊह आफद नखधायी। सो पर जज्मोसतष कहत ऩुकायी॥

कुण्डर श्रवण िभािभ िभके। फहमे भार भुक्तत भस्ण दभके॥
कय भं गदा त्रिशुर कुठाया। ऩर त्रवि कयं आरयफहॊ सॊहाया॥
त्रऩॊगर, कृ ष्णं, छामा, नन्दन। मभ कोणस्थ, यौि, द्ु खबॊजन॥

सौयी, भन्द, शसन दशनाभा। बानु ऩुि ऩूजफहॊ सफ काभा।

जा ऩय प्रबु प्रसन्न है जाहीॊ। यकॊहुॊ याव कयै ऺण भाहीॊ॥
ऩवातहू तृण होई सनहायत। तृणहू को ऩवात करय डायत॥
याज सभरत फन याभफहॊ दीन्हो। कैकेइहुॊ की भसत हरय रीन्हं॥

फनहूॊ भं भृग कऩट फदखाई। भातु जानकी गई ितुयाई॥

रखनफहॊ शत्रक्त त्रवकर करय डाया। भसिॊगा दर भं हाहाकाया॥
यावण

की

गसत

भसत

फौयाई।

याभिन्ि

सं

फैय

फढ़ाई॥

फदमो कीट करय कॊिन रॊका। फस्ज फजयॊ ग फीय की डाॊका॥
नृऩ त्रवक्रभ ऩय तुफह ऩगु धाया। सिि भमूय सनगसर गै हाया॥
हाय

नौराखा

राग्मो

िोयी।

हाथ

ऩैय

डयवामो

तोयी॥

बायी दशा सनकृ ष्ट फदखामो। तेसरफहॊ घय कोल्हू िनवामो॥

त्रवनम याग दीऩक भहॊ कीन्हं। तफ प्रसन्न प्रबु हवै सुख दीन्हं॥

शसन सम्फन्धी व्माऩाय औय नौकयी

वाहन प्रबु के सात सुजाना। जग फदग्ज गदा ब भृग स्वाना॥

गज वाहन रक्ष्भी गृह आवै। हम ते सुख सम्ऩत्रत्त उऩजावं॥

गदा ब हासन कयै फहु नष्ट कय डायै । भृग दे कष्ट प्रण सॊहायै ॥
जफ आवफहॊ प्रबु स्वान सवायी। िोयी आफद होम डय बायी॥

तैसफह िारय ियण मह नाभा। स्वणा रौह िाॊजी अरु ताभा॥

रौह ियण ऩय जफ प्रबु आवं। धन जन सम्ऩत्रत्त नष्ट कयावै॥
सभता ताम्र यजत शुबकायी। स्वाण सवा सुख भॊगर कायी॥

जो मह शसन िरयि सनत गावै। कफहु न दशा सनकृ ष्ट सभावै॥
अदबुत नाथ फदखावं रीरा। कयै शिु के नसश फसर ढीरा॥

जो ऩस्ण्डत सुमोग्म फुरवाई। त्रवसधवत शसन ग्रह शाॊसत कयाई॥

ऩीऩर जर शसन फदवस िढ़ावत। दीऩ दान दे फहु सुख ऩावत॥
कहत याभसुन्दय प्रबु दासा। शसन सुसभयत सुख होत प्रकाश॥
दोहा
ऩाठ

शसनिय

दे व

को

की

कयत ऩाठ िासरस फदन हो बवसागय ऩाय॥

त्रवभर

तैमाय।

शसन सम्फन्धी दान ऩुण्म

कारे यॊ ग की वस्तुमं, रोहा से फनी वस्तुमं, ऊन, तेर, गैस, ऩुष्म, अनुयाधा औय उत्तयाबािऩद नऺिं के सभम भं शसन

कोमरा, काफान से फनी वस्तुमं, िभडा, भशीनं के ऩाट्सा, ऩीडा के सनवायण के सरए स्वमॊ के वजन के फयाफय मा

ऩेट्रोर, ऩत्थय, सतर औय यॊ ग का व्माऩाय शसन से जुडे दशाॊश वजन के कारे िने, कारे कऩडे , जाभुन के फ़र,
जातकं को फ़ामदा दे ने वारा होता है .िऩयासी की नौकयी, कारे उडद, कारी गाम, कारे जूते, सतर, बंस, रोहा, तेर,
राइवय, सभाज कल्माण की नौकयी नगय ऩासरका वारे नीरभ, कुरथी, कारे व नीरे फ़ूर, कस्तूयी आफद दान की

काभ, जज, वकीर, याजदत
ू आफद वारे ऩद शसन की नौकयी वस्तुओॊ का दान फकमा जाता है । मफद इन नऺिो व
भे आते हं ।

शसनवाय का सॊमोग हो तो औय बी उत्तभपर प्राद्ऱ होते हं ।

जून 2013

45

शसनग्रह से सॊफॊसधत योग

 स्वस्स्तके.ऎन.जोशी.
उन्भाद नाभ का योग शसन की दे न है । जफ

गाॊठं के रूऩ भे आभाशम से फाहय कडा होकय गुदा भागा

जो व्मत्रक्त कयता जा यहा है । उसे कयता जाता है । उसे

के छे द की भुरामभ दीवार को फ़ाडता हुआ सनकरता है ।

फदभाग भं सोिने त्रविायने की शत्रक्त का नाश हो जाता है ।
मह ऩता नही है फक वह जो कय यहा है । सॊसाय के रोगं
के प्रसत उसके क्मा कताव्म हं । उसे ऩता नही होता। सबी
को एक रकडी से हाॊकने वारी फात उसके जीवन भं

से जफ फाहय सनकरता है तो रौह त्रऩण्ड की बाॊसत गुदा
रगाताय भर का इसी तयह से सनकरने ऩय ऩहरे से ऩैदा

हुए घाव ठीक नही हो ऩाते हं । औय इतना असधक
सॊक्रभण हो जाता है , फक फकसी प्रकाय की एन्टीफामफटक

सभरती है । भानव वध कयने भं नही फहिकना। शयाफ

काभ नही कय ऩाती है ।

औय भाॊस का रगाताय प्रमोग कयना। जहाॊ बी यहना

आतॊक भिामे यहना। जो बी सगे सम्फन्धी हं । उनके

स्थानं का सनवास। िोयी औय डकैती आफद कयने वारे

प्रसत हभेशा सिन्ता दे ते यहना आफद उन्भाद नाभ के योग
के रऺण है ।

वात योग का अथा है वामु वारे योग। जो रोग

त्रफना कुछ अच्छा खामे त्रऩमे फ़ूरते िरे जाते है । शयीय भं

गफठमा योग शसन की ही दे न है । शीरन बये

रोग असधकतय इसी तयह का स्थान िुनते है । सिन्ताओॊ
के कायण एकान्त फॊध जगह ऩय ऩडे यहना। अनैसतक रूऩ
से सॊफॊध कयना। शयीय भं स्जतने बी जोड हं । यज मा
वीमा स्खसरत होने के सभम वे बमॊकय रूऩ से उत्तेस्जत हो

वामु कुत्रऩत हो जाती है । उठना फैठना दब
ू य हो जाता है ।

जाते हं । धीये -धीये शयीय का तेज खत्भ हो जाता है । औय

मह योग रगाताय सट्टा। जुआ। राटयी। घुडदौड औय

को उठने फैठने औय योज के काभं को कयने भं बमॊकय

भे असधक दे खा जाता है । फकसी बी इस तयह के काभ

को अऩने द्राया फकमे गमे असधक वासना के दष्ु ऩरयणाभं

शसन मह योग दे कय जातक को एक जगह ऩटक दे ता है ।

अन्म तुयत ऩैसा फनाने वारे काभं को कयने वारे रोगं

जातक के जोडं के अन्दय सूजन ऩैदा होने के फाद जातक
ऩये शानी उठानी ऩडती है । इस योग को दे कय शसन जातक

कयते वक्त व्मत्रक्त रम्फी साॊस खीॊिता है । उस रम्फी साॊस

की सजा को बुगतवाता है .

के अन्दय जो हायने मा जीतने की िाहत यखने ऩय ठॊ डी

वामु होती है वह शयीय के अन्दय ही रुक जाती है । औय

अऩना काभ नही कय ऩाती हं । वह आॊखं के अन्दय

अॊगं के अन्दय बयती यहती है । अनैसतक काभ कयने
वारं औय अनािाय काभ कयने वारं के प्रसत बी इस
तयह के रऺण दे खे गमे है ।

बगन्दय योग गुदा भे घाव मा न जाने वारे फ़ोडे

के रूऩ भं होता है । असधक सिन्ता कयने से मह योग
असधक भािा भं होता दे खा गमा है । सिन्ता कयने से जो
बी खामा जाता है । वह आॊतं भं जभा होता यहता है ।
ऩिता नही है । औय सिन्ता कयने से उवासी रगाताय
छोडने से शयीय भं ऩानी की भािा कभ हो जाती है । भर

स्नामु योग के कायण शयीय की नशं ऩूयी तयह से

कभजोयी भहसूस कयता है । ससय की ऩीडा। फकसी बी फात
का त्रविाय कयते ही भूछाा आजाना सभगॉ। फहस्टीरयमा।
उत्तेजना। बूत का खेरने रग जाना आफद इसी कायण से
ही ऩैदा होता है । अगय रगाताय शसन के फीज भॊि का
जाऩ जातक से कयवामा जाम। उडद की दार का प्रमोग
कयवामा जाम। योटी भे िने का प्रमोग फकमा जाम। रोहे
के फतान भं खाना खामा जामे। तो इस योग से भुत्रक्त
सभर जाती है इन योगं के अरावा ऩेट के योग। जॊघाओॊ
के योग। टीफी। कंसय आफद योग बी शसन की दे न है ।

जून 2013

46

शसनदे व की कृ ऩा प्रासद्ऱ के सयर उऩाम

 सिॊतन जोशी, स्वस्स्तके.ऎन.जोशी.

शास्त्रो भं शसन दे व को वृद्धावस्था का स्वाभी कहा गमा हं । जो व्मत्रक्त अऩने भाता त्रऩता व फुजुगो का सम्भान कयता
हं उस व्मत्रक्त ऩय शसन दे व फहुत प्रसन्न होते हं । जो व्मत्रक्त अऩने भाता-त्रऩता व फुजुगो का अऩभान उस व्मत्रक्त ऩय
शसनदे व का कोऩ हो जाता हं व उस व्मत्रक्त से सुख-सभृत्रद्ध दयू िरी जाती हं ।

सनधानो व असहाम जीवो की सहामता कयने से शसनदे व प्रसन्न होते हं । असहाम व्मत्रक्त को कारा छाता, िभड़े के
जूते िप्ऩर बेट कयने से शसन दे व प्रसन्न होते है ।

शसन दे व को उड़द के रडडू फहुत त्रप्रम है । अत शसनवाय को रडडू का बोग रगा कय फाॉटना राबप्रद होता हं ।

शसनवाय के फदन तेर से भासरश कय स्नान कयना िाफहए।

रोहे फक कोई वस्तु शसन भॊफदय भं दान कयनी िाफहए, ऐसी वस्तु दान कये जो भॊफदय भे काभ आसके।

शसन से उत्ऩन्न सभस्मा के सभाधान के सरए बगवान सशवजी औय हनुभान जी की ऩूजा एक साथ कयना त्रवशेष
राबप्रद होता हं । शसनदे व को शाॊत कयने के सरमे शसन िारीसा, सशव िारीसा, हनुभान िारीसा, फजयॊ गफाण
हनुभान फाहुक का ऩाठ कयना शुबदामक होता हं ।

शसनयत्न नीरभ के साथ ऩन्ना बी धायण कयने से राब होता हं ।

भछसरमं को आटे से फनी गोसरमाॊ स्खरामे।

हय शसनवाय व भॊगरवाय को कारे कुत्ते को भीठी योटीमा स्खरामे।

श्री हनुभान जी मा शसन भॊफदय भं ऩीऩर का ऩेड हो तो सॊध्मा के सभम दीऩक जराना शसन, हनुभान औय बैयवजी
के दशान अत्मॊत राबकायी है ।

शसनवाय का व्रत कये तथा एक सभम त्रफना नभक का बोजन रे।

खारी ऩेट नाश्ते से ऩूवा कारी सभिा िफाकय गुड मा फताशे से खाए।

बोजन कयते सभम नभक कभ होने ऩय कारा नभक तथा सभिा कभ होने ऩय कारी सभिा प्रमोग कये ।

बोजन के उऩयाॊत रंग खाए।

शसनवाय भॊगरवाय को क्रोध न कये ।

बोजन कयते सभम भंन यहे ।

प्रत्मेक शसनवाय को सोते सभम शयीय व नाखूनं ऩय तेर भसरे।

भाॊस, भछरी, भद तथा नशीरी िीजो का सेवन त्रफरकुर न कये ।

गुड़ व िने से फनी वस्तु बोग रगाकय असधक से असधक रोगो को फाॉटना िाफहए।

रोहे के फतान भं तेर बयकय अऩना िेहया दे खकय दान कयदे । मफद दान हे तु मोग्म ऩाि न सभरे तो उसभे फत्ती
रगाकय उसे शसन भॊफदय भं जरा दे ना िाफहए।

प्रत्मेक शसन अभावस्मा को अऩने वजन का दशाॊश सयसं के तेर का असबषेक कयना िाफहए।

शसन भृत्मुॊजम स्रोत दशयथ कृ त शसन स्रोत का ४० फदन तक सनमसभत ऩाठ कये ।

घोड़े की नार अथवा नाव की कीर से फना छल्रा असबभॊत्रित कयके धायण कयना शसन के अशुब प्रबाव को कभ
कयता है ।

जून 2013

47

अऩने सनवास स्थान व व्मवसामीक स्थान ऩय घोडे की नार को U आकाय भे अवश्म रगामे।

कऩूय को नारयमर के तेर भं डारकय ससय भं रगामे, शसनवाय के फदन बोजन भं उड़द की दार का अत्मसधक सेवन
कये , कभो को सुधाये , सनवास स्थान ऩय अॉधेया, सूनाऩन व खॊडहय की स्स्थसत न होने दे ।

प्रसत भाह की अभावस्मा आने से ऩूवा अऩने घय व व्मवसामीक स्थर की सपाई व धुराई कये व तेर का दीऩक
जराए।

शसन भॊफदय भं कारे िने, कच्िा कोमरा, कारी हल्दी, कारे सतर, कारा कम्फर, तेर आदी शसन से सॊफॊसधत
वस्तुओॊ का दान दे ।

16 शसनवाय सूमाास्त्र के सभम एक ऩानी वारा नारयमर, 5 फादाभ, कुछ दस्ऺणा शसन भॊफदय भं िढ़ामे।

शसन के शुब पर प्रासद्ऱ हे तु दस्ऺण फदशा भं ससयाहना कय सोमे। व ऩस्श्चभ फदशा भं भुख कय साये कामा कये व
अऩने ऩूजन स्थान भं शसन मॊि स्थाऩीत कयं ।

प्रत्मेक शसनवाय को यात्रि भं सोते सभम आॉखं भं काजर मा सुयभा रगामे व शसनवाय को नीरा मा कारा कऩडा
अवश्म ऩहने।

प्रत्मेक शसन अभावस्मा, शसन जमॊती मा शसनवाय को शसन भॊफदय अवश्म जामे।

अभोद्य भहाभृत्मुॊजम कवि
अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कवि व

उल्रेस्खत अन्म साभग्रीमं को शास्त्रोक्त त्रवसध-

त्रवधान से त्रवद्रान ब्राह्मणो द्राया सवा राख भहाभृत्मुॊजम भॊि जऩ एवॊ दशाॊश
हवन द्राया सनसभात कवि अत्मॊत प्रबावशारी होता हं ।

अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कवि
कवि फनवाने हे तु:
अऩना नाभ, त्रऩता-भाता का नाभ,
गोि, एक नमा पोटो बेजे

अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम

कवि

दस्ऺणा भाि: 10900

कवि के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु गुरुत्व कामाारम भं सॊऩका कयं । >> Order Now

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जून 2013

48

शसन के त्रवसबन्न भॊि

 सिॊतन जोशी
शभ का अथा ऩाऩ नाशक दे वता के रूऩ भं बी

शसनग्रह ऩीडा सनवायक भॊि-

कहा जाता है । 'श' का अथा होता है कल्माणकायी

ससउमाऩत
ु ये फदघ्दााहो त्रवश्लाछ : सशवत्रप्रम :।

शाॊसत प्रदान कयने वारा ग्रह "शसन शम््ते

भॊद्िाय: प्रसन्नात्भा ऩीडा हस्तु भं शसन:॥

ऩाऩॊभ" अथाात शसन ग्रह हभाये ऩाऩो का शभन
कयता है । हभाये ऩाऩो का नाश कयता है । इससरए

कष्ट सनवायण शसन भॊि-

इसे शसन कहा गमा है ।

नीराम्फय:

शसन की उऩासना के सरए सनम्न भं से फकसी एक
भॊि अथवा एकासधक भॊि का श्रद्धानुसाय सनमसभत
एक सनस्श्चत सॊख्मा भं जऩ कयना िाफहए। जऩ का
सभम सॊध्माकार अत्मासधक राबदामक होता हं ।

फकयीट:

गस्ध्स्ता्स्रसक्रो

धनुष्भान।
ितुबयु :

सुमस
ा त
ु :

प्रसान्त:

स्दाद्स्तु

भह

व्रॊदोद्ल्ऩगाभी॥
सुख-स्म्रसधदामक शसन भॊिकोणस्थ : त्रऩॊगरो फभ्र: कृ ष्णो यौिाॊत को मभ:।

फीज भॊि-

सौयी: शनैश्रौ भॊद त्रऩऩरादे न सॊस्तुत:॥

ॐ प्राॊ प्रीॊ प्रं स् शनैश्चयाम नभ्।

सवाफाधा सनवायण शसन गामिी भॊि-

दशाऺय शसन भॊि-

ॐ बगबवाम त्रवद्राहे भृत्मुऩयु ाम धीभफह तन्नो

ॐ शॊ शनैश्चयाम नभ्।

शसन: प्रिोदमात:।

वैफदक भॊिॐ शॊ नो दे वीयसबष्टम आऩो बवन्तु ऩीतमे।
शॊ मोयसब स्रवन्तु न्॥

शसन ऩत्नी नाभ स्तुसतॐ शॊ शनैिायम नभ:।
धव्जनी धासभनी िैव कॊकारी करास्रप्रमा।

ऩौयास्णक भॊिनीराॊजनसभाबासॊ
छामाभाताण्डसम्बूतॊ

शुल्धय:

यत्रवऩुिॊ
तॊ

नभाभी

मभाग्रजभ।्

कॊटकी करही िादम तुयॊगी भफहषी अजा॥

शनैश्चयभ ्॥

ॐ शॊ शनैिायम नभ:।

जून 2013

49

भहाकार शसन भृत्मुॊजम स्तोि
भहाकार शसन भृत्मुॊजम स्तोि

गरे

तु

त्रवसनमोग्-

रृफद

न्मसेन्भहाकारॊ

ॐ अस्म श्री भहाकार शसन भृत्मुञ्जम स्तोि भन्िस्म

जान्वोम्तूडुियॊ

त्रऩप्राद ऋत्रषयनुष्टुप्छन्दो भहाकार शसनदे वता शॊ फीजॊ

एवॊ न्मासत्रवसध कृ त्वा ऩश्चात ् कारात्भन् शने् ।।१३

भामसी

न्मासॊ

शत्रक्त्

कार

अऩभृत्मु

ऩुरुषामेसत

कीरकॊ

सनवायणाथे

श्री

भभ

ऩाठे

अकार

त्रवसनमोग्।

गणेशाम

भहाकार

शसन

भृत्मुञ्जामाम

त्रवन्मसेन्भन्दॊ

ध्मानॊ

कल्ऩाफदमुगबेदाॊश्च
सवाास्ण

साभयस्मे

प्रणम्म

सशयसा

।।१

सशवभ ्

जगत्रद्धतभ ्


।।२

।।ऩावात्मुवाि।।
अल्ऩभृत्मुत्रवनाशाम
तदे वत्वॊ
तव

मत्त्वमा

भहाफाहो

भूसता

!

!

ऩूवा

।।३।।

रोकानाॊ

प्रबेदस्म

ब्रूफह

भे

भृत्मुहयणभऩभृत्मु

शसनभन्िप्रबेदा
प्रसतनाभ

फहतकायकभ ्

भहाकारस्म

शनेभत्ाृ मुञ्जमस्तोिॊ
अकार

बक्तानुग्रहकायक
सूसितभ ्

मे

िथुमन्
ा तॊ

नेिजन्भन्


।।५

शुबभ ्

भनुनामुतभ ्

।।श्रीशॊकय
त्रप्रमतभे

गुह्याद्गह्य
ु तभॊ

गौरय

फदव्मॊ

सवाभॊगरभाॊगल्मॊ

सवारोक-फहतेयते

प्रवक्ष्मासभ
सवाशिु

सवायोगप्रशभनॊ
बक्तासस

भे

सवातन्िेषु

ऋत्रषन्मासॊ
भूस्घ्ना


।।८

नृणाभ ्

।।९

गोऩनीमॊ

तच्रणुष्व

त्रवन्मस्म

तवऽधुना

सवााऩफद्रसनवायणभ ्
गौयी

कयन्मासॊ


।।७

त्रवभदा नभ ्

शयीयायोग्मकयणभामुवत्राृ द्धकयॊ

भहोग्रॊ

।।६

सवारोकोऩकायकभ ्

शसनभृत्मुञ्जमस्तोिॊ

गोत्रऩतॊ

उवाि।।

सनत्मे

मफद


।।४

मत्स्तवॊ

नभोन्तॊ

साम्प्रतभ ्

सनवायणभ ्

तैमक्त
ुा ॊ

दे हन्मासॊ
भुखे

प्रमत्नत्

भहे श्वयी
वैवस्वतॊ

!

सभािये त ्

श्मावाा

ऩठे न्नय्

।।१४

भन्वन्तयास्ण

सभासीनॊ

!

शनैश्चयभ ्।

नभ्।

भेरुऩृष्ठे

दे वदे वेश

तनौ

।।१२

कारात्भनो न्मसेद् गािे भृत्मुञ्जम ! नभोऽस्तु ते ।

बावमेत्प्रबवाद्यब्दान ्

!

न्मसेत ्

नभ्।

ऩुयारयजामत्मशेषासुयनाशकायी

बगवन ्

कृ शतनुॊ

कयाॊगन्मासरुत्रऩण्

शम्बुभह
ा ाकारशसन्

ऩृच्छसतस्भ

न्मसेत ्

ऩादमोस्तु

प्रवक्ष्मासभ

बावमेत्प्रसत

गौयी

गुह्ये

न्मस्म

नीरािीशोबास्ञ्ितफदव्मभूसता् खडगो त्रिदण्डी शयिाऩहस्त्।
स्स्थतॊ

फाह्वोभाहाग्रहॊ

प्रत्मॊगे

नभस्ते

भहाकाराम
शीषे

सौयमे

ि

नभस्तेऽतु

भहोग्राम

नभो

नभो

बादं

भागाशीषा
नभ्

तथा

भन्दगाम

ऩौषॊ

नभो

वैशाखॊ

तु

भेढ्रे

कृ ष्णऩऺॊ

ि

क्रूयाम

नमसेन्भूरॊ
नभ्

न्मसेद्-गुल्प-द्रमे

जानुद्रमे

शुक्रऩऺॊ

ऩादमोश्च

सवास्जते

त्रवष्णुबॊ

नभ्

िैव

तोमॊ

त्रवश्वॊ

बावमेज्जॊघोबमे
धसनष्ठाॊ

ि


।।२०

।।२१

ि

ि

।।२२

नभस्तथा

नभस्तथा

।।२३

आऩादभस्तके
ि

शनमे

सवांगुरौ
नभ्

।।१९

तथा

ग्रहाम

ग्रहाम

िोदये न्मसेत ्

सॊवत्ताकाम
ि

।।१८

नभ्

सशवोस्बवाम

शनमे

न्मसेत ्

बैयवाम

न्मसेदाशीषाऩादान्ते

ि

ते

वै

नभ्

ऩाद्योश्चैव

।।१७

न्मसेत ्

न्मसेद्रापाल्गुनॊ

जॊघमोबाावमेज्ज्मेष्ठॊ

त्रवन्मसेन्भुखे

रृदमे

त्रवन्मसेज्जान्वोनाभ्

आषाढ़ॊ

भ्रुवो्

कासताकॊ

भाघॊ

ऊवोन्मासेच्िैिभासॊ

ऊरुद्रमे

िास्श्वनॊ

न्मसेद्-फाह्वोभाहायौिाम
कारप्रफोधाम

।।१६

श्रवणमोन्मासेत ्

ग्रीवामाॊ

ऊद्रा रोक-सनवासाम

नभ्

कृ ष्णसनबाम

दसु नायीक्ष्माम

नीरभमूखाम

गण्डमोत्रवान्मसेदृतून ्

बावमेदक्ष्णोनाभ्
वै

।।१५
नभ्

त्रवन्मसेदमने

श्रावणॊ
नभो

ते

कारस्जते

सनत्मसेव्माम

।।१०

न्मसेत ् ।।११

भहाकारस्वरुत्रऩण्


।।२४

नभ्
न्मसेत ्

शुष्कतयाम

सशष्टतभाम

न्मसेत ्

कृ ष्णरुिे

वारुणांन्मसेत्कारबृते

नभ्

ते


।।२५

ि


।।२६

नभ्

।।२७

जून 2013

50

ऩूवब
ा ािॊ

न्मसेन्भेढ्रे

ऩृष्ठउत्तयबािॊ
ये वतीॊ

ि

ि

गबादेशे
नभो

न्मसेद्दस्त्रॊ
बोसगस्त्रजे

योफहणीॊ

नभ्

न्मेसतद्राभ

मभॊ

सतष्मॊ
साऩं

न्मसेद्राभफाहौ

भघाॊ

िोग्रिाऩाम

ते

नभस्ते
नभ्

कृ सयान्न

स्वातीॊ

न्मेसद्राभकणे

नभो

दऺनेिे

बावमेच्छीषेसन्धौ

प्रीसतमोगॊ

भ्रुवो्

सन्धौ

कृ ष्णमासतगण्डॊ

नभो

सनभांसदे हाम

सुकभााणॊ

धृसतॊ

न्मसेद्दऺवाहौ

ऩृष्ठे

ध्रुवॊ

तन्भस्णफन्धे

सन्धौ

तन्भूरसन्धौ

तत्कूऩाये

न्मसेद्रज्रॊ

।।३८

।।३९

।।४०
ि

नभ्

।।४१

सनत्मानन्दाम

ते

कारऻाम

न्मसेत ् ।।४२
ते

कृ शाम

बुतसन्तात्रऩने

सानन्दाम

नभ्

नभोऽस्तु

नभ्
ि


।।४३

नभ्
ते


।।४४

ि

नभ्

सशवॊ

वै

तद्-गुल्पसन्धौ

घोयाम

ते

ते

नभ्

न्मसेद्राभारुसन्धौ

ि

शुक्रकारत्रवदे

तज्जानो

न्मसेत्सद्योसगने

तद्-गुल्पसन्धौ

न्मसेत्तदॊ गुरीसन्धौ
िभास्ण

गयॊ

ि

बव्माम

फवकयणॊ
बावमेिक्ते

बावमेदस्स््न

ते


।।४९

नभ्

नभोऽस्तु

ते

।।५१

ते
ते

।।५०

सवाबस्ऺणे

सवाग्रासाम

।।४८

नभ्

आभभाॊसत्रप्रमाम
ि

नभ्

वैधसृ तभ ्

नभस्ते

बावमेन्भसस
न्मसेद्रऩामाॊ

!

।।४७

नभ्

बावमेद्यज्वने
सॊहायक

नभ्

मोगाऽधीशाम

नभो

।।४६

नभ्

यौिाम

ऐन्िॊ

ते

ते

शुबॊ

ि

कारसास्ऺणे

भहादे हाम

।।४५

नभ्

नभोऽस्तु

न्मसेत्तदॊ गुरीसन्धौ
ब्रह्ममोगॊ

नभ्

कारात्भने

बावमेस्त्सत्रद्धॊ
न्मसेच्ि

।।५२
नभ्

न्मसेद्रस्णजॊ भज्जामाॊ सवाान्तक ! नभोऽस्तु ते ।।५३
त्रवमेत्रवबावमेफद्रत्रष्टॊ
भुहूतांश्च

सशयोधये

कृ ष्णाम

साध्मॊ

ते

त्रवबावमेत ्

नभो

तज्जानौ

रुिसभि

नभ्

ते

न्मसेद्दऺोरुसन्धौ

काराग्नमे

न्मसेत्कारकृ ते

बावमेद्राभऩाश्वासन्धौ

।।३७

ि

छामासुताम

ऩरयघॊ

तैत्रत्तरॊ

नभ्

त्रऩण्मात्भने

बावमेद्राभफाहुऩष्ठ
ृ े

हषाणॊ

ते

न्मसेदग्र
ु ाम

तद््गुरी-भूरसन्धौ

व्माघातॊ

नभोऽस्तु

हनुसन्धौ

ि
ि

!

नभ्

दऺऩाश्वासन्धौ

।।३५

न्मसेत ्

वयीमाॊसॊ

कौरवॊ

।।३६

ि

कयाग्रेषु


तन्भस्णफन्धे

व्मतीऩातॊ

फारवॊ

ते

ते

ससत्रद्धॊ

।।३४

ते

पराशनाम

नभ्

वृत्रद्धॊ

ऻानदृष्टमे

बीष्भाम

बावमेत्कणे

न्मसेदगण्डे

त्रप्रमाम

भहाभन्दॊ

शोबनॊ

तत्कूऩाये

।।३३

ि

फृह्मभमाम

बावमेन्नासासन्धौ

शूरॊ

नभ्

काराम

सन्धावामुष्भद्योगॊ

तन्भूरसन्धौ

।।३२

नभ्

नभस्ते

त्रवष्कुम्बॊ

सौबाग्मॊ

भन्मवे

धारयणे

न्मसेद्दऺकणे

नेिमो्

।।३१

मोसगने

हस्तऺं

ि

ि

क्रूयग्रहाम

त्वाष्डॊ
त्रवशाखाॊ

बस्भधारयणे

बावमेद्दऺनासामाभमाभाणश्व

।।३०

िाऩधारयणे
हय

ि

बावमेद्राभनासामाॊ

ि

फाणधारयणे

नभस्ते

त्रवबावमेत्कण्ठे
न्मसेद्-बगऺा

वै

वै

न्मसेद्दऺफाहौ

।।२९

खडगधायीणे

नभो

नभो

न्मसेत ्

त्रिदण्डोल्रससताम

बावमेिौिॊ

ऩुनवासुभूद्ध्वा

स्तनमुगे

नभस्ते

ि

ि

नभस्तैरत्रप्रमाम

हस्ते


।।२८

भन्दियाम

श्माभतयाम

सनत्मॊ
रृदमे

ि

नभस्तथा

नभो

बावमेद्धस्ते

दऺोद्ध्वा

भुखे

कयाराम

न्मसेन्नाबो

न्मेसत्कृ त्रत्तकाॊ
भृगॊ

जटाजूटधयाम

!

खगेशाम

सत्मव्रताम

भन्मूग्रतेजसे

त्रऩतृवसुवायीण्मेताॊश्च

ऩञ्ि

दऺऩादनखेषु
ि

ऩुरुहूतशतभखे
भुहूतांश्च

नभो

खस्थाम

ि

।।५४

बावमेन्नभ्

स्वरुत्रऩणे

।।५५

खेियाम

त्रवश्ववेधो-त्रवधूॊस्तथा
वाभऩादनखेषु
सत्माम

बावमेन्नभ्

सनत्मसत्माम

ते

।।५६
नभ्

ससद्धे श्वय ! नभस्तुभ्मॊ मोगेश्वय ! नभोऽस्तु ते ।।५७
वफिनक्तॊियाॊश्चैव
भुहूतांश्च

रग्नोदमाम
वक्राम

वरुणामाभमोनकान ्

दऺहस्तनखेषु
दीघााम

बावमेन्नभ्
भासगाणे

िासतक्रूयाम

नभस्ते

वाभहस्तनखेष्वन्त्मवणेशाम
सगरयशाफहफुध्
ा न्मऩूषाजऩष्द्दस्त्राॊश्च
यासशबोक्िे
यासशनाथाम

यासशगाम
याशीनाॊ

परदािे

।।५८

दऺदृष्टमे
वाभदृष्टमे

नभोऽस्तु

।।५९
ते

बावमेत ्


।।६०

यासशभ्रभणकारयणे
नभोऽस्तु

ते


।।६१

जून 2013

51

मभास्ग्न-िन्िाफदसतजत्रवधातृॊश्च

त्रवबावमेत ्

ऊद्ध्वा-हस्त-दऺनखेष्वत्मकाराम
तुरोच्िस्थाम

सौम्माम

सभीयत्वष्टजीवाॊश्च

ते

नक्रकुम्बगृहाम

त्रवष्णु

सतग्भ

ि

वरयष्ठाम

यत्रववायॊ

रराटे

सोभवायॊ

न्मसेदास्मे

बौभवायॊ
भेढ्रॊ

नभो

न्मसेत्स्वान्ते

वृषणे

गुरुवायॊ

बृगुवायॊ

शसनवायॊ

घफटका

न्मसेत्केशेषु

ि

अखण्डदण्डभानाम
कारदे वाम

कारकाराम

सनभेषाफदभहाकल्ऩकाररुऩॊ
दातायॊ

सवाबव्मानाॊ

भृत्मुञ्जमॊ

भहाकारॊ

कत्ताायॊ
भृत्मुञ्जमॊ
हत्ताायॊ

सवाद्ु खानाॊ
भहाकारॊ

ते
वै
वै

नभ्
नभ्

दष्ट
ु ानाॊ

नभस्मासभ

शनैश्चयभ ्
बमवधानभ ्
शनैश्चयभ ्

परानाभघकारयणाभ ्

भृत्मुञ्जमॊ

भहाकारॊ

नभस्मासभ

शनैश्चयभ ्
शान्तभव्ममभ ्
शनैश्चयभ ्

बावाऽबाव-स्वरुत्रऩणभ ्
नभस्मासभ

अकार-भृत्मु-हयणऽभऩभृत्मु
नभस्मासभ

शनैश्चयभ ्
सनवायणभ ्
शनैश्चयभ ्

कारस्म

भहाकारॊ
वशगा्

नभस्मासभ

सवे


कार

।।६६

काररुऩॊ

िण्डीशो

।।६८
।।६९

।।७०

।।७३

शम्बु्

िण्डीश्

ऺतजस्ताभसी
नभोऽन्तो

भनुरयत्मेष

भनुभेनॊ

म्

ध्मात्त्वा

ऩठे च्रणुमाद्रात्रऩ

िस्म

भृत्मोबामॊ

ज्वया्

सवे

त्रवद्युता

।।८४
ऩुन्

मुत्


।।८५

सशवे


।।८६

बत्रक्तत्

शतवषाावसधत्रप्रमे

!।।८७

दि-ु त्रवस्पोटकच्छुका्

फदवा सौरयॊ स्भये त ् यािौ भहाकारॊ मजन ् ऩठे त ।।८८
जन्भऺे
वेधगे

ि

मदा

वाभवेधे

फद्रतीमे

द्रादशे

तत्तिाशौ

सौरयजाऩेदेतत्सहस्त्रकभ ्

वा
भन्दे

तनौ

वाऽत्रऩ

वा

सद्ऱभे

िमॊ

वाथ

नवऩञ्िभे

नश्मस्न्त

।।७६

भहाकारारमे

ऩीठे

ऩाऩासन
ह्यथवा

ऩुण्मऺेिेऽश्वत्थभूरे

ि

।।९१

ब्रह्मिमेण

ऩफठतव्मॊ
ऩुण्मॊ

ि

ि

जमॊ

।।९२
बवेत ्

जरसस्न्नधौ

।।९३

गृहे

भौसनना

साधकानाॊ
स्तोिॊ

कदािन

तैरकुम्बाग्रतो

सनमभेनैकबक्तेन
स्वस्त्ममनॊ

शतमुग्भॊ

।।९०

ऩठे दावृत्रत्तसॊख्ममा

आऩदस्तस्म

ऩयॊ

िाष्टभेऽत्रऩ

दशास्वन्तदा शासु

श्रोतव्मॊ

वा

।।८९

ऩठे त्तावफद्दनावसध

गुरुराघवऻानेन
शतभेकॊ

जऩेदद्धा सहस्त्रकभ ्

बवेद्यावत ्
जन्भरग्नेशे

।।७८

उच्मते

सम्ऩूज्म

त्रवनश्मस्न्त

गोिये

।।८३

जऩेन्नय्

नैव

।।७४

।।७७

ग्रहदे वता

शसनतुत्रष्टकय्

आद्यन्तेऽष्टोत्तयशतॊ

दशभे

त्रवरीमते

रसरत्

स्स्थयात्भा

।।८२

यसासधऩ्

स्जह्वमा

शोबी

ितुथे

।।७५

एव

सभारुढो

शुकसॊमुक्तो


शनैश्चयभ ्

कारात्भा

नद्याॊ

।।८१

कस्मसिद्रश्

रुिडाफकन्माक्रान्तश्चण्डीश

त्रवद्युदाकसरतो

शनैश्चयभ ्

कार्

जगत्सवं
स्वमॊ

।।८०

सवाग्रह-सनवायणभ ्

कारदे व

नभस्मासभ

ते

नभ्

भृत्मुञ्जमॊ

ि

शनैश्चयभ ्

!।

नभ्

ग्रहबूतॊ

।।७९

दीघा-रोिनभ ्

प्रणतोऽस्स्भ

बक्तानाभबमॊकयभ ्

सुखदॊ

भहाकारॊ

ते

ग्रहाणाॊ

शनैश्चयभ ्

कारऩुरुषॊ

ते

सूक्ष्भरुत्रऩणे

भृत्मुञ्जमॊ

भहाग्रहभ ्

तस्भात्त्वाॊ

।।७२

बूतानाॊ

भृत्मुञ्जमॊ

।।६५

शनैश्चयभ ्

नभस्मासभ

सवेषाभेव

भहाकारॊ

नभस्मासभ

भृत्मुञ्जमॊ

नभस्मासभ

बैयवभ ्

भहाकारॊ

सुखद्ु खानाॊ

भहाकारॊ

।।७१

भृत्मुञ्जमॊ

कायणॊ

बीषणॊ

नभ्

ि

ग्रहजातानाॊ

स्थूरयोभॊ

।।६७

नभोऽस्तु

कारनन्दाम

त्वनाद्यन्ताम

भहाकारॊ

दसु नायीक्ष्मॊ

नभ्

प्ररमकारयणे

कारनुन्नाम

भृत्मुञ्जमॊ

नभस्मासभ

भन्ि-स्वरुत्रऩणे

शम्बुजाताम

काराम

भहाकारॊ

।।६४

सवाऩाऩप्रणाशक्

नभस्तुभ्मॊ

भृत्मुञ्जमॊ

।।६३

जीव-स्वरुत्रऩणे

सनभांसाम

कारशयीयाम

।।६२

ब्रह्म-स्वरुत्रऩणे

नभस्ते

वधाथांम
!

ि

नभो

काररुत्रऩन्नभस्तेऽस्तु

कारहे तो

भृतत्रप्रमाम

नभ्

ऩादमो्

नभ्

ि

नभो

भरद्राये

त्रिऩुयस्म

याहुसखाम

नभो

ि

बऺमन्तॊ

न्मसेद्-बीभदृशे

न्मसेत्सौम्मवायॊ

सॊसाय

सनवारयणे

नभो

ि

काररुऩेण

ि

द्युतीन्नमसेत ्

ऊध्वा-वाभहस्त-नखेष्वन्मग्रह
तुष्टाम

नभ्


।।९४

सुखावहभ ्

भृत्मुञ्जमासबधभ ् ।।९५

जून 2013

52

कारक्रभेण

कसथतॊ

प्रात्कारे
ऩठताॊ

न्मासक्रभ

शुसिबूत्ा वा
नैव

ऩूजामाॊ

दष्ट
ु ेभ्मो

नास्ग्नतो

नाऽकारे

भयणॊ

ि

तेषाॊ

साग्रॊ

सनशाभुखे

व्माघ्रसऩााफदतो

जराद्रामोदे शे

आमुवष
ा श
ा तॊ

सभस्न्वतभ ्

।।९६

बमभ ्

दे शान्तये ऽथवा

नाऽऩभृत्मुबमॊ

बवस्न्त


।।९७

बवेत ्

सियजीत्रवन्


।।९८

नाऽत्

ऩयतयॊ

शास्न्तकॊ

स्तोिॊ

शीघ्रपरदॊ

कथनीमॊ

मदीच्छे दात्भनो

भहादे त्रव

इसत

भहत ्

स्तोिभेतन्भमोफदतभ ्

तस्भात्सवाप्रमत्नेन
।।

शसनतुत्रष्टकयॊ

!

।।९९

फहतभ ्

नैवाबक्तस्म

भाताण्ड-बैयव-तन्िे

कस्मसित ्


।।१००

भहाकार-शसन-भृत्मुञ्जम-

स्तोिॊ सम्ऩूणभ
ा ् ।।

॥ शनैश्चयस्तवयाज्॥
श्री

गणेशाम

नायद

ध्मात्वा

गणऩसतॊ

धीय्

सशयो

भं

कोटयाऺो
घ्राणॊ

भे

स्कन्धौ
सौरयभे

ग्रहयाज्
ऩादौ

यऺाभेताॊ

शनैश्चयस्मेभॊ
दृशौ

सॊवताक्
कफटॊ

सौरय्

शनैश्चय्

शुष्कोदयो

दीघो

नीराॊश्ु

बुजौ

ऩातु

मुसधत्रष्ठय्

स्तवभुत्तभभ

बारॊ

भे

सवातो

कृ ष्ण्

सियामुश्च

कृ ष्णो

श्रुती

बमदोऽवतु

सौये नााभफरैमत
ुा ाभ ्
बवेन्नाि

नीरोत्ऩरसनब्

दा सु नयीक्ष्मो

सनभांसगािस्तु
क्रोधनो

कुजो

फुधो

कयारी

केतुदेवऩसतफााहु्
शशी

त्रवष्णुहायो

गुरू्

भरूत्कुफेयश्च

शुष्को

घोयो

ि

काव्मो

त्रवबीषण्

क्रूयकभात्रवधाता

कृ तान्तो
ईशान्

कुभाय्

श्माभरा्गो
ि

|
||७||
|

बमानक्

यत्रव्

बानुज्
सुय

||८||

|
|

आत्भबू्

||११||

ईश्वय्

|

याज्मेशो

धनप्रद्

सवाकभाावयोधक्

अतृद्ऱ्
||१०||

नैऋतस्तथा

धनहताा

|

शशी

ससॊफहकासुत्

काभ

|
||६||

दीघाश्भश्रुजट
ा ाधय्

सूमऩ
ा ि
ु ो

|
||५||

शसन्

कताा हताा ऩारसमता याज्मबुग ् याज्मदामक् ||१२||
छामासुत्

वऩु्

स्थूरयोभावरीभुख्

यौिो

गणऩसत्

||४||

सॊशम्

भन्दो भन्दगसत् खॊजो तृद्ऱ् सॊवताको मभ् ||९||
ग्रहयाज्

|

नीरश्छामारृदमनन्दन्

कोटयाऺ्

|
||३||

शनैश्चयोऽवतु

ऩात्वस्खरॊ

|
||२||

फसरभुखोऽवतु

यत्रवनन्दन्

|
||१||

छामासुतोऽवतु

भुखॊ

नासबॊ

ऩातु

त्रवशाराऺो

सशस्खकण्ठसनबो
कारदृत्रष्ट्

ऩातु

ऩातु

ऩठे स्न्नत्मॊ

ऩुिी

||

सशस्खकण्ठसनब्

ऩातु

भन्दगसत्

||

धभायाजो

ऩातु

ऩातु

बीषण्

उवाि

िकाय

बास्करय्

रृदमॊ

सुखी

याजा

नभ्

|
||१३||

तुष्टो

रूष्ट्

काभरूऩ्

ग्रहऩीडाहय्
स्स्थयासन्

शान्तो

भहाकार्

आफदत्मबमदाता

शतसबिऺ
ु दसमता
सत्मात्भा

ि

मोगयासशभुह
ा ू ताात्भा
शभीऩुष्ऩत्रप्रम्
नीरवासा्

दशासु

ऩूजमेद्य्
त्रवधाम
वाधा

बीतो
योगी

ि

तस्म

||

इसत

फदनऩसत्

प्रबु्

स्स्थसतवाात्रऩ
गते

शसनॊ

माऽन्मग्रहाणाॊ

योगाफद्रभुच्मेत

वय्

बत्रक्तभान्म्

ऩीडा

सौये

ि

श्रीभान ्

सनशम्म

सभस्ता

गोिये

नयो

||१७||
|

नय्

काभॊ

बत्रवष्मऩुयाणे

स्तवॊ

म्

|
||१९||

ध्रुवभ ्

सदा

त्रवनश्मसत

क्रूययासशगे

स्तवसभभॊ

ऩठे त्तस्म
भुच्मेत

स्तवसभभॊ
नाि

|
||२१||

ऩठे त ्

नश्मसत

|
||२३||

फन्धनात ्

ऩठे त ्

सॊशम्

शनैश्चयस्तवयाज्

तदा

|

||२२||

|
||२४||
||२५||

प्रत्मऺोऽबूच्छनैश्चय्

शसनश्चान्तदाधे

|

||२०||

द्ु खाफद्रभुच्मते

जामते

ऩाथास्म

||१८||

शभीऩुष्ऩाऺताम्फयै ्

म्

फद्धो

नश्मसत

तस्म

तदा

बक्त्मा

बमाफद्रभुच्मेत

श्री

|

दे वगणस्तुत्

सौये श्छामासुतस्म

ऩीडा

रोहप्रसतभाॊ

याऻे

||१६||

नऺिगणनामक्

ससद्धो

शसनफदने

नायद उवाि ||
दत्त्वा

|

िमोदसशसतसथत्रप्रम्

कताा

ऩठे न्भत्मो

ऩुिवान्धनवान ्
स्तवॊ

||१५||

श्माभस्त्रैरोक्माबमदामक्

नाम्नाॊ

ऩठे स्न्नत्मॊ

जन्भरग्ने

कारकारक्

|

भृत्मुयाफदत्मनॊदन्

दे व्

अष्टोत्तयशतॊ

त्रवशेषत्

||१४||

फक्रमाससन्धुनॉराञ्जनिमच्छत्रव्

सवायोगहयो

ऩूजाॊ

ग्रहे श्वय्

|

भहाफर्

कारात्भा

सतसथगणनो

सत्मात्भकस्स्तसथगणो

यत्रवनन्दन्

नऺिेशो

स्स्थयगसतभाहाकामो

भहाप्रबो

कृ त्वा

काभदो

|
||२६||

सम्ऩूण्ा

|

जून 2013

53

॥ शनैश्चयस्तोिभ ् ॥

॥शसनवज्रऩॊजयकविभ ्॥

॥ श्रीशनैश्चयस्तोिभ ् ॥

श्री गणेशाम नभ् ||

अस्म श्रीशनैश्चयस्तोिस्म दशयथ ऋत्रष् । शनैश्चयो दे वता । त्रवसनमोग्- ॐ अस्म श्रीशनैश्चय-कवि-स्तोि-भन्िस्म कश्मऩ
त्रिष्टु ऩ ्

छन्द्

शनैश्चयप्रीत्मथा

जऩे

दशयथ उवाि –

त्रवसनमोग्। ऋत्रष्, अनुष्टुऩ ् छन्द, शनैश्चयो दे वता, शीॊ शत्रक्त्, शूॊ कीरकभ ्,
शनैश्चय-प्रीत्मथं जऩे त्रवसनमोग्।।
नीराम्फयो

कोणोऽण्तको यौिमभोऽथ फभ्रु् कृ ष्ण् शसन्त्रऩॊगरभन्दोसौरय्।
सनत्मॊ स्भृतो मो हयते ि ऩीडाॊ तस्भै नभ् श्रीयत्रवनन्दनाम ॥१॥
सुयासुया्

फकॊऩुरुषोयगेन्िा

गन्धवात्रवद्याधयऩन्नगाश्च

ऩीडमस्न्त सवे त्रवषभस्श्थतेन तस्भैइ नभ् श्रीयत्रवनन्दनाम ॥२॥

नीरवऩु्

फकयीटी

गृध्रस्स्थतस्त्रासकयो

धनुष्भान ्

|

ितुबज
ुा ् सूमस
ा ुत् प्रसन्न् सदा भभ स्माद् वयद् प्रशान्त् ||१||
ब्रह्मा

उवाि

शृणुध्वभृषम्
कविॊ

सवे

ऩीडमस्न्त सवे त्रवषभस्श्थतेन तस्भैइ नभ् श्रीयत्रवनन्दनाम॥३॥ शनैश्चयप्रीसतकयॊ
दे शाश्च दग
ु ाास्ण वनास्ण मि सेनासनवेशा् ऩुयऩत्तनासन । ॐ

|
||२||

वज्रऩॊजयसॊऻकभ ्

ऩातु

छामात्भज्

भहत ्

सौये रयदभनुत्तभभ ्

दे वतावासॊ

श्रीशनैश्चय्

ऩीडमस्न्त सवे त्रवषभस्श्थतेन तस्भैइ नभ् श्रीयत्रवनन्दनाम॥४॥ नेिे

शसनऩीडाहयॊ

शसनयाजस्म

नया नये न्िा् ऩशवो भृगेन्िा वन्माश्च मे कीटऩतॊगबृ्गा् । कविॊ

||

|

सवासौबाग्मदामकभ ्
बारॊ

ऩातु

भे

ऩातु

||३||

सूमन
ा न्दन्

कणं

|

मभानुज्

||४||

। नासाॊ वैवस्वत् ऩातु भुखॊ भे बास्कय् सदा |
स्स्नग्धकण्ठश्च भे कण्ठॊ बुजौ ऩातु भहाबुज् ||५||
प्रीणासत भन्िैसनाजवसये ि तस्भै नभ् श्रीयत्रवनन्दनाम ॥५॥
स्कन्धौ
ऩातु
शसनश्चैव
कयौ
ऩातुशुबप्रद्
|
प्रमागकूरे मभुनातटे ि सयस्वतीऩुण्मजरे गुहामाभ ् ।
वऺ्
ऩातु
मभभ्राता
कुस्ऺॊ
ऩात्वससतस्तथा
||६||
मो मोसगनाॊ ध्मानगतोत्रऩ सूक्ष्भस्तस्भैनभ् श्रीयत्रवनन्दनाम॥६॥
नासबॊ ग्रहऩसत् ऩातु भन्द् ऩातु कफटॊ तथा |
अन्मप्रदे शात्स्वगृहॊ प्रत्रवष्टस्तदीमवाये स नय् सुखी स्मत ् ।
ऊरू भभान्तक् ऩातु मभो जानुमुगॊ तथा ||७||
गृहाद् गतो मोन ऩुन् प्रमासत तस्भैनभ् श्रीयत्रवनन्दनाम॥७॥ ऩदौ
भन्दगसत्
ऩातु
सवांगॊ
ऩातु
त्रऩप्ऩर्
|
सतरैमव
ा ैभााषगुडान्नदानैरोहे न

नीराम्फयदानतो

वा

स्रष्टा स्वमॊबूबुव
ा निमस्म िाता हयीशो हयते त्रऩनाकी । अॊगोऩाॊगासन
एकस्स्त्रधाअ

ऋग्ममजु्

नभ्

श्रीयत्रवनन्दनाम

साभभूसतास्तस्भै इत्मेतत ्
॥८॥ न

कविॊ

तस्म

शन्मष्टकॊ म् प्रमत् प्रबते सनत्मॊ सुऩुि्ै ऩशुफान्धवैश्च । व्मम-

एतासन

शनैश्चयो
दश

शनैश्चयकृ ता

भन्द्

त्रऩप्ऩरादे न

नाभाअसन
ऩीडा

प्रातरुत्थाम

सॊस्तुत्
म्

कदासिद्भत्रवष्मसत

॥ इसत श्रीब्रह्माण्डऩुयाणे श्रीशनैश्चयस्तोिॊ सॊऩूणभ
ा ्॥

॥१०॥

ऩठे त ्

॥११॥

कविॊ

फदव्मॊ

जामते

जन्भ-

ऩठे त्तु सौख्मॊ बुत्रव बोगमुक्त् प्राप्नोसत सनवााणऩदॊ तदन्ते ॥९॥ करिस्थो
कोणस्थ् त्रऩ्गरो फभ्रु् कृ ष्णो यौिोऽन्तको मभ् । अष्टभस्थे
सौरय्

सवाास्ण

यऺेन ्

ऩीडा
वाऽत्रऩ

सूमस
ा ुते

ऩठते

ऩठे त ्

सनत्मॊ

इत्मेतत्कविॊ

फदव्मॊ

||

इसत

नायदसॊवादे

दोषान ्
श्री

बवसत

||८||
म्

|

सूमज
ा ्

भृत्मुस्थानगतोऽत्रऩ

||९||
वा

|

सुप्रीतस्तु

सदा

शसन्

||१०||

व्ममे

जन्भफद्रतीमगे

|

ऩीडा

जामते

क्वसित ्

सौये मस्ा न्नसभातॊ

द्रादशाऽष्टभजन्भस्थदोषान्नाशमते
जन्भरग्नस्स्थतान ्

सूमन
ा न्दन्
सूमस
ा ुतस्म

प्रीतो

फद्रतीमस्थो

गतो

भे

ऩुया

सदा

सवाान्नाशमते

प्रबु्

ब्रह्माण्डऩुयाणे

शसनवज्रऩॊजयकविभ ् सम्ऩूणाभ ् ||

||११||
|
|
||१२||
ब्रह्म-

जून 2013

54

दशयथकृ त-शसन-स्तोि
दशयथकृ त शसन स्तोि

व्माकुरॊ

त्रवसनमोग्- ॐ अस्म श्रीशसन-स्तोि-भन्िस्म कश्मऩ ऋत्रष्,

ब्रुवस्न्त

त्रिष्टु ऩ ् छन्द्, सौरयदे वता, शॊ फीजभ ्, सन् शत्रक्त्, कृ ष्णवणेसत

दे शाश्च

नगय

कीरकभ ्, धभााथ-ा काभ-भोऺात्भक-ितुत्रवाध-ऩुरुषाथा-ससद्धमथे

ऩप्रच्छ

प्रमतोयाजा

जऩे

सभाधानॊ

फकभिाऽस्स्त

कय-न्मास्-

प्राजाऩत्मे

तु

शनैश्चयाम अॊगुष्ठाभ्माॊ नभ्। भन्दगतमे तजानीभ्माॊ नभ्।

अमॊ

नभ्।

छामात्भजाम

सभाधाम

धनुफदा व्मॊ

नभ्।

यथभारुह्य

वेगेन

त्रवसनमोग्।

अधोऺजाम भध्मभाभ्माॊ नभ्। कृ ष्णाॊगाम अनासभकाभ्माॊ
शुष्कोदयाम

कसनत्रष्ठकाभ्माॊ

नभ्।

कयतर-कय-ऩृष्ठाभ्माॊ
रृदमाफद-न्मास्शनैश्चयाम
अधोऺजाम

तदा

ि

नभ्।

सशखामै

भन्दगतमे

वषट्।

सशयसे

कृ ष्णाॊगाम

स्वाहा।

कविाम

हुभ ्।

दीप्मभानो

“ॐ बूबव
ुा ् स्व्”

ब्मयाजत

ध्मान्-

फदशाओॊ

भं

िुटकी

फजाएॊ।

दृष्टवा

अथाात ् नीरभ के सभान कास्न्तभान, हाथं भं धनुष औय

प्रहस्म

ितुबज
ुा ॊ सूमस
ा ुतॊ प्रशान्तॊ वन्दे

सदाबीष्टकयॊ वये ण्मभ ्।।

शूर धायण कयने वारे, भुकुटधायी, सगद्ध ऩय त्रवयाजभान,

शिुओॊ को बमबीत कयने वारे, िाय बुजाधायी, शान्त, वय
को दे ने वारे, सदा बक्तं के फहतकायक, सूम-ा ऩुि को भं
प्रणाभ कयता हूॉ।
त्रवख्मातो

िक्रवतॉ

कृ त्रत्तकान्ते

शसनॊऻात्वा

याजा

त्रवऻेम्

बेदसमत्वातु

भहाफर्।

भस्णयत्नत्रवबूत्रषते।।१०

भहाकेतु

सभुस्च्छते।
फकयीटभुकुटोज्वरै्।।११

फद्रतीमे

इव

सहस्त्रॊ
प्रफदशताॊि

िाग्रेतस्थौतु

बमात ्

सौरयरयदॊ

बास्कय्।

सनमोस्जतभ ्।।१२
योफहणीभ ्।

बृकुटीभुख्।।१३
सुयाऽसुयसनषूदनभ ्।

विनभब्रवीत ्।।१४

बावाथा: प्रािीन कार भं यघुवॊश भं दशयथ नाभक प्रससद्ध
िक्रवती याजा हुए, जो सातं द्रीऩं के स्वाभी थे। उनके

याज्मकार भं एक फदन ज्मोसतत्रषमं ने शसन को कृ त्रत्तका

ऩुया।

शसन योफहणी का बेदन कय जामेगा। इसको „योफहणी-

सद्ऱदीऩासधऩोऽबवत ्।।१

शकट-बेदन‟ कहते हं । मह मोग दे वता औय असुय दोनं ही

द्रासधाब्दॊ

तु

बत्रवष्मसत
तद्राक्मॊ

फह

शसनमाास्मसत

बेद्यसभत्मुक्तॊ
तु

दशयथ्

दै वऻैऻाात्रऩतो

शकटॊ
एतच्ुत्वा

नऺिभण्डरभ ्।

याजा

शसनदृा ष्टवा
ि

ममौ।

िन्िस्मोऩरयसॊस्स्थताभ ्।।९

फदव्मे

दशयथॊ

सुयै्।।७

फदव्मामुधसभस्न्वतभ ्।।८

शसनऻाात्वा

सॊहायास्त्रॊ

ऩयभॊ

प्रजा्।

के अस्न्तभ ियण भं दे खकय याजा से कहा फक अफ मह

यघुवॊशेषु

योफहणीॊ

साहसॊ

भहायत्नै्

कृ त्रत्तकान्तॊ

सबन्नेकुत्

ब्रह्म-शक्राफदसब्

स्स्थतो

तदाकाशे

फद्रजान ्।

फद्रजसत्तभ्।।६

गतो

आकणािाऩभाकृ ष्म

नीरद्युसतॊ शूरधयॊ फकयीफटनॊ गृध्रस्स्थतॊ िासकयॊ धनुधया भ ्।

भे

तस्स्भन ्

स्थानॊ

यथेतुकाञ्िने

सभागता्।।५

प्रभुखान ्

ब्रूफह

भनसा

योफहणीऩृष्ठभासाद्य

फदग्फन्धन्िायं

वससष्ठ

नऺिे

सस्ञ्िन्त्म

बमभेतत्सभागतभ ्।

बमबीत्

मोगोह्यसाध्मश्च

हॊ सवनाहमैमुक्त
ा े

हुए

ग्राभा

त्रिरऺमोजनॊ

रृदमाम

ऩौय-जानऩदाफदकभ ्।।४

सवारोकाश्च

शुष्कोदयाम नेि-िमाम वौषट्। छामात्भजाम अस्त्राम पट्।

ऩढ़ते

जगद्दष्टवा

भस्न्िसब्

स्।

साम्प्रतॊ।।२

सुयाऽसुयबमॊकयभ ्।

सुदारुणभ ्।।३

सह

ऩासथाव्।

के सरमे बमप्रद होता है तथा इसके ऩश्चात ् फायह वषा का
घोय

द्ु खदामी

अकार

ऩड़ता

है ।

ज्मोसतत्रषमं की मह फात भस्न्िमं के साथ याजा ने सुनी,
इसके साथ ही नगय औय जनऩद-वाससमं को फहुत
व्माकुर दे खा। उस सभम नगय औय ग्राभं के सनवासी

जून 2013

55

बमबीत होकय याजा से इस त्रवऩत्रत्त से यऺा की प्राथाना

ऩुरुषाथा भंने फकसी भं नहीॊ दे खा, क्मंफक दे वता, असुय,

कयने रगे। अऩने प्रजाजनं की व्माकुरता को दे खकय

भनुष्म, ससद्ध, त्रवद्याधय औय सऩा जासत के जीव भेये दे खने

याजा दशयथ वसशष्ठ ऋत्रष तथा प्रभुख ब्राह्मणं से कहने

भाि से ही बम-ग्रस्त हो जाते हं । हे याजेन्ि ! भं तुम्हायी

रगे- „हे ब्राह्मणं ! इस सभस्मा का कोई सभाधान भुझे

तऩस्मा औय ऩुरुषाथा से अत्मन्त प्रसन्न हूॉ। अत् हे

फताइए।‟।।१-६

यघुनन्दन ! जो तुम्हायी इच्छा हो वय भाॊ रो, भं तुम्हं

इस ऩय वसशष्ठ जी कहने रगे- „प्रजाऩसत के इस नऺि
(योफहणी) भं मफद शसन बेदन होता है तो प्रजाजन सुखी
कैसे यह सकते हं । इस मोग के दष्ु प्रबाव से तो ब्रह्मा एवॊ

इन्िाफदक दे वता बी यऺा कयने भं असभथा हं ।।७।।
त्रवद्रानं के मह विन सुनकय याजा को ऐसा प्रतीत हुआ
फक मफद वे इस सॊकट की घड़ी को न टार सके तो उन्हं

कामय कहा जाएगा। अत् याजा त्रविाय कयके साहस
फटोयकय फदव्म धनुष तथा फदव्म आमुधं से मुक्त होकय
यथ को तीव्र गसत से िराते हुए िन्िभा से बी तीन राख
मोजन ऊऩय नऺि भण्डर भं रे गए। भस्णमं तथा यत्नं

से सुशोसबत स्वणा-सनसभात यथ भं फैठे हुए भहाफरी याजा
ने योफहणी के ऩीछे आकय यथ को योक फदमा।

सपेद घोड़ं से मुक्त औय ऊॉिी-ऊॉिी ध्वजाओॊ से सुशोसबत
भुकुट भं जड़े हुए फहुभुल्म यत्नं से प्रकाशभान याजा

दशयथ उस सभम आकाश भं दस
ू ये सूमा की बाॊसत िभक

यहे थे। शसन को कृ त्रत्तका नऺि के ऩश्चात ् योफहनी नऺि
भं प्रवेश का इच्छुक दे खकय याजा दशयथ फाण मुक्त धनुष
कानं तक खीॊिकय बृकुफटमाॊ तानकय शसन के साभने
डटकय

खड़े

हो

गए।

अऩने साभने दे व-असुयं के सॊहायक अस्त्रं से मुक्त दशयथ
को खड़ा दे खकय शसन थोड़ा डय गमा औय हॊ सते हुए याजा
से

कहने

रगा।।८-१४

तव

याजेन्ि

!

भमा

दे वासुयाभनुष्माशऽि
भमात्रवरोफकता्
तुष्टोऽहॊ
वयॊ

तव
ब्रूफह

दशयथ उवािप्रसन्नोमफद
योफहणीॊ

दृष्टॊ

कस्मसित ्।

ससद्ध-त्रवद्याधयोयगा्।।१५
सवेबमॊ

याजेन्ि
प्रदास्मासभ

गच्छस्न्त
!

तऩसाऩौरुषेण

स्वेच्छमा

तत्ऺणात ्।
ि।।१६

यघुनन्दन्

!

बावाथा: शसन कहने रगा- „ हे याजेन्ि ! तुम्हाये जैसा

भे

सौये

!

बेदसमत्वा

सरयत्

एकश्चास्तु

तु

सागया

मासितॊ

तु

प्राप्मैवॊ

तु

ऩुनये वाऽब्रवीत्तुष्टो

वय्

ऩय्।।१७

गन्तव्मॊ

कदािन ्।

मावद्यावच्िन्िाकाभेफदनी।।१८

भहासौये

एवभस्तुशसनप्रोक्तॊ

!

नऽन्मसभच्छाम्महॊ ।

वयरब्ध्वा

तु

वयॊ

याजा

वयॊ

वयभ ्

शाश्वतभ ्।।१९

कृ तकृ त्मोऽबवत्तदा।
सुव्रत

!

।।२०

बावाथा: दशयथ ने कहा- हे सूम-ा ऩुि शसन-दे व ! मफद आऩ
भुझ ऩय प्रसन्न हं तो भं केवर एक ही वय भाॊगता हूॉ फक
जफ तक नफदमाॊ, सागय, िन्िभा, सूमा औय ऩृ्वी इस
सॊसाय भं है , तफ तक आऩ योफहणी शकट बेदन कदात्रऩ न
कयं । भं केवर मही वय भाॊगता हूॉ औय भेयी कोई इच्छा
नहीॊ है ।‟

तफ शसन ने „एवभस्तु‟ कहकय वय दे फदमा। इस प्रकाय
शसन से वय प्राद्ऱ कयके याजा अऩने को धन्म सभझने
रगा। तफ शसन ने कहा- „भं ऩुभसे ऩयभ प्रसन्न हूॉ, तुभ
औय

बी

प्राथामाभास
नबेत्तव्मॊ

वय

रृष्टात्भा

द्रादशाब्दॊ

शसन उवािऩौरुषॊ

दॊ ग
ू ा।।१५-१६।।

दसु बाऺॊ

ि

एवॊ

सम्प्राप्म

तु

यथोऩरयधनु्
ध्मात्वा
याजा

दशयथ्

दे वीॊ
स्तोिॊ

तदा।

बास्कयनन्दन।।२१
कताव्मॊ

िैरोक्मे

स्थाप्मबूत्वा
सयस्वती

शसनॊ

त्वमा

कीसतायषाभदीमा
वयॊ

रो।।१७-२०

वयभन्मॊ

बेत्तव्मॊ

तु

भाॊग

तु

रृष्टयोभा
िैव
गणनाथॊ

कदािन।

बत्रवष्मसत।।२२

ऩासथाव्।

कृ ताञ्जसर्।।२३
त्रवनामकभ ्।

सौये रयदभथाऽकयोत ्।।२४

बावाथा: तफ याजा ने प्रसन्न होकय शसन से दस
ू या वय

जून 2013

56

भाॊगा। तफ शसन कहने रगे- „हे सूमा वॊसशमो के ऩुि तुभ

आकाय

सनबाम यहो, सनबाम यहो। फायह वषा तक तुम्हाये याज्म भं

स्जनके शयीय का ढाॊिा पैरा हुआ है , स्जनके योएॊ फहुत

अकार नहीॊ ऩड़े गा। तुम्हायी मश-कीसता तीनं रोकं भं

है , उन

शनैश्चय

दे व

को

नभस्काय

है ।।२६

भोटे हं , जो रम्फे-िौड़े फकन्तु सूके शयीय वारे हं तथा

पैरेगी। ऐसा वय ऩाकय याजा प्रसन्न होकय धनुष-फाण

स्जनकी दाढ़ं काररुऩ हं , उन शसनदे व को फाय-फाय प्रणाभ

यथ भं यखकय सयस्वती दे वी तथा गणऩसत का ध्मान

है ।।२७

कयके शसन की स्तुसत इस प्रकाय कयने रगा।।२१-२४

हे शने ! आऩके नेि कोटय के सभान गहये हं , आऩकी
ओय दे खना कफठन है , आऩ घोय यौि, बीषण औय त्रवकयार

दशयथकृ त शसन स्तोि
नभ:

कृ ष्णाम

नीराम

सशसतकण्ठ

सनबाम

ि।

नभ: कारास्ग्नरूऩाम कृ तान्ताम ि वै नभ: ।।२५।।
नभो

सनभांस

नभो

दे हाम

त्रवशारनेिाम

नभ:

दीघााम

नभस्ते

शुष्काम

घोयाम

सवाबऺाम

सूमऩ
ा ुि

नभस्तेऽस्तु

अधोदृष्टे:

नभो

भन्दगते

तुभ्मॊ

दग्ध-दे हाम
सनत्मॊ
ददासस

प्रसाद

ते।।२७

वै

नभ:

याज्मॊ

कऩासरने।।२८
नभोऽस्तु

ते।

ि

।।२९

सॊवताक

नभोऽस्तु

ते।

सनस्स्त्रॊशाम

नभोऽस्तुते

।।३०

मोगयताम

अतृद्ऱाम

ि

वै

ि
नभ:

कश्मऩात्भज-सूनवे
रुष्टो

हयसस


।।३१

तत्ऺणात ् ।।३२

ससद्ध-त्रवद्याधयोयगा:।

त्रवरोफकता:
कुरु

नभोऽस्तु

बीषणाम

दे वासुयभनुष्माश्च
त्वमा

नभ:।

दन
ु या ीक्ष्माम

सनत्मॊ

ऺुधातााम
वै

वै

बास्कये ऽबमदाम

नभस्तेऽस्तु

बमाकृ ते।।२६

फरीभुख

ऻानिऺुनभ
ा स्तेऽस्तु
तुष्टो

कारदॊ ष्ड

यौिाम

नभस्ते

ि

स्थूरयोम्णेऽथ

कोटयाऺाम

नभो

तऩसा

शुष्कोदय

ऩुष्करगािाम

नभो

नभो

दीघाश्भश्रुजटाम

भे

सवे

नाशॊ

सौये

!

मास्न्त
वायदो

सभूरत:।।३३
बव

बास्कये ।

एवॊ स्तुतस्तदा सौरयग्राहयाजो भहाफर: ।।३४
बावाथा: स्जनके शयीय का वणा कृ ष्ण नीर तथा बगवान ्
शॊकय के सभान है , उन शसन दे व को नभस्काय है । जो

जगत ् के सरए कारास्ग्न एवॊ कृ तान्त रुऩ हं , उन शनैश्चय
को

फाय-फाय

नभस्काय

है ।।२५

स्जनका शयीय कॊकार जैसा भाॊस-हीन तथा स्जनकी दाढ़ीभूॊछ औय जटा फढ़ी हुई है , उन शसनदे व को नभस्काय है ।

स्जनके फड़े -फड़े नेि, ऩीठ भं सटा हुआ ऩेट औय बमानक

हं ,

आऩको

नभस्काय

है ।।२८

वरीभूख ! आऩ सफ कुछ बऺण कयने वारे हं , आऩको
नभस्काय है । सूमन
ा न्दन ! बास्कय-ऩुि ! अबम दे ने वारे
दे वता

!

आऩको

नीिे की ओय

प्रणाभ

है ।।२९

दृत्रष्ट यखने वारे शसनदे व ! आऩको

नभस्काय है । सॊवताक ! आऩको प्रणाभ है । भन्दगसत से
िरने वारे शनैश्चय ! आऩका प्रतीक तरवाय के सभान है ,
आऩको

ऩुन्-ऩुन्

प्रणाभ

है ।।३०

आऩने तऩस्मा से अऩनी दे ह को दग्ध कय सरमा है , आऩ
सदा मोगाभ्मास भं तत्ऩय, बूख से आतुय औय अतृद्ऱ यहते
हं ।

आऩको

सदा

सवादा

नभस्काय

है ।।३१

ऻाननेि ! आऩको प्रणाभ है । काश्मऩनन्दन सूमऩ
ा ुि
शसनदे व आऩको नभस्काय है । आऩ सन्तुष्ट होने ऩय याज्म
दे दे ते हं औय रुष्ट होने ऩय उसे तत्ऺण हय रेते हं ।।३२
दे वता, असुय, भनुष्म, ससद्ध, त्रवद्याधय औय नाग- मे सफ
आऩकी दृत्रष्ट ऩड़ने ऩय सभूर नष्ट हो जाते हं ।।३३
दे व भुझ ऩय प्रसन्न होइए। भं वय ऩाने के मोग्म हूॉ औय
आऩकी शयण भं आमा हूॉ।।३४
एवॊ

स्तुतस्तदा

अब्रवीच्ि
तुष्टोऽहॊ
एवॊ

शसनवााक्मॊ
तव

वयॊ

याजेन्ि
प्रदास्मासभ

सौरयग्राहयाजो

रृष्टयोभा
!
मत्ते

ि

भहाफर्।
ऩासथाव्।।३५

स्तोिेणाऽनेन
भनसस

सुव्रत।
वताते।।३६

बावाथा: याजा दशयथ के इस प्रकाय प्राथाना कयने ऩय ग्रहं
के याजा भहाफरवान ् सूम-ा ऩुि शनैश्चय फोरे- „उत्तभ व्रत के
ऩारक याजा दशयथ ! तुम्हायी इस स्तुसत से भं अत्मन्त

सन्तुष्ट हूॉ। यघुनन्दन ! तुभ इच्छानुसाय वय भाॊगो, भं
अवश्म

दॊ ग
ू ा।।३५-३६

जून 2013

57

दशयथ उवािप्रसन्नो
अद्य

यऺासभ

मफद

भे

सौये

प्रबृसत-त्रऩॊगाऺ

!

!

वयॊ

दे फह

ऩीडा

दे मा

भभेस्प्सतभ ्।

सततॊ

अनेनैव

तस्म

प्रकाये ण

ऩीडाॊ
ऩीडाभुक्तॊ

िान्मग्रहस्म

ि।

जगद्भवेत ्।।५०

कस्मसित ्।।३७

बावाथा: शसन ने कहा- „हे याजन ् ! मद्यत्रऩ ऐसा वय भं

बावाथा: प्रसादॊ कुरु भे सौये ! वयोऽमॊ भे भहे स्प्सत्।

तुभको दे यहा हूॉ। तुम्हाये द्राया कहे गमे इस स्तोि को जो

याजा दशयथ फोरे- „प्रबु ! आज से आऩ दे वता, असुय,

फकसी को दे ता नहीॊ हूॉ, फकन्तु सन्तुष्ट होने के कायण

भनुष्म, दे व अथवा असुय, ससद्ध तथा त्रवद्रान आफद ऩढ़ं गे,

भनुष्म, ऩशु, ऩऺी तथा नाग-फकसी बी प्राणी को ऩीड़ा न

उन्हं शसन फाधा नहीॊ होगी। स्जनके गोिय भं भहादशा मा

दं ।

अन्तदा शा भं अथवा रग्न स्थान, फद्रतीम, ितुथ,ा अष्टभ मा

फस

मही

भेया

त्रप्रम

वय

है ।।३७

शसन उवािअदे मस्तु

वयौऽस्भाकॊ

त्वमाप्रोक्तॊ

ि

भे

तुष्टोऽहॊ
स्तोिॊ

दे वऽसुय-भनुष्माश्च

तेषाॊ

गोिये
म्

ऩठे द्

तस्म

प्रसतभा

मे

ऩीडा

भत्कृ ता

वै

कदािन।

हे याजन ! स्जनको भेयी कृ ऩा प्राद्ऱ कयनी है , उन्हं िाफहए

जन्भकारे

वा

दशास्वन्तदा शासु

हो औय उनभं धनुष, बारा औय फाण धायण फकए हुए

फद्र-त्रिसन्ध्मॊ
जामते

वा

ऩीडा

कृ त्वा

ऩामससॊशकायामुक्तॊ

भभसनस्श्चतभ ्।

वै

याजन ्

होभत्।।४३

ब्राह्मणं को बोजन कयाएॊ। उऩयोक्त शसन की प्रसतभा को

िैव

भन्िेण

नील्मा

वा

कृ ष्णतुरसी

दद्यान्भे

प्रीतमे

धेनुॊ

वृषबॊ

त्रवशेषऩूजाॊ

शुबाभ ्।

जाए। इसके ऩश्चात ् घी तथा दध
ू से सनसभात ऩदाथं से

शभीऩिैधत्ा ृ वाक्तैनॉरऩॊकजै्।

सतर के तेर मा सतरं के ढे य भं यखकय त्रवसध-त्रवधान-

ि

होभमेत ्।।४४

मथात्रवसध्।।४५

कुॊकुभाद्यॊ

मस्तु

ि

ि

भद्राये

ि

िैवऽहॊ

शुबभ ्।

ऩमस्स्वनीभ ्।।४७

कुरुते

नृऩ

!

ऩूवक
ा भन्ि द्राया ऩूजन कयं , कुॊकुभ इत्माफद िढ़ाएॊ, नीरी
तथा कारी तुरसी, शभी-ऩि भुझे प्रसन्न कयने के सरए
अत्रऩत
ा कयं ।
कारे यॊ ग के वस्त्र, फैर, दध
ू दे ने वारी गाम- फछड़े सफहत
दान भं दं । हे याजन ! जो भन्िोद्धायऩूवक
ा इस स्तोि से

भेयी ऩूजा कयता है , ऩूजा कयके हाथ जोड़कय इस स्तोि
का ऩाठ कयता है , उसको भं फकसी प्रकाय की ऩीड़ा नहीॊ
होने दॊ ग
ू ा। इतना ही नहीॊ, अन्म ग्रहं की ऩीड़ा से बी भं

िैव

ऩूजमेत ्।।४८

कृ ताञ्जसर्।

करयष्मासभ

कदािन ्।।४९

को ऩीड़ा से भुक्त कयता हूॉ।।।४२-५०

स्तोिेणऽनेन

शुबै्।।४६

कृ ष्णवस्त्राफदकॊ

सवत्साॊ

जऩेत्स्तोिॊ

रेऩमेत ्।

शभीऩिाफदसब्

िात्रऩ

भन्िोद्धायत्रवशेषेण

घृत-ऩामसै्।

प्रत्मऺ

ऩूजनॊ

जऩ कयं , जऩ का दशाॊश हवन कये , स्जसकी साभग्री कारे

सतर, शभी-ऩि, घी, नीर कभर, खीय, िीनी सभराकय फनाई

तद्दशाॊशेन

वा

हो।* इसके ऩश्चात ् दस हजाय की सॊख्मा भं इस स्तोि का

ितुबज
ुा ाभ ्।।४२

स्वशक्तमा

तेरयाशौ

ऩीडाॊ

कृ ता

घृतसभश्रॊ

ब्राह्मणान्बोजमेत्ति

ऩूजसमत्वा

सभाफहत्।।४१

धनु्-शूर-फाणाॊफकतकयाॊ
ि

ि।

शुसिबूत्ा वा

भभ

कृ ष्णैस्स्तरै्

तस्म

त्रवद्याधयोयगा।।३९

करुॊ गा।।३८-४१

फक वे भेयी एक रोहे की भीसता फनाएॊ, स्जसकी िाय बुजाएॊ

आमुतभेकजप्मॊ

एवॊ

भानवा्।

जन्भ-व्मम-फद्रतीमगे।।४०

ि

वा

ऩफठष्मस्न्त

ध्मान दे कय ऩढ़ं गे, उनको सनस्श्चत रुऩ से भं ऩीफड़त नहीॊ

वा

रोहजाॊ

वा

ते।।३८

प्रात्, भध्माि औय सामॊकार के सभम इस स्तोि को

ितुथे

वयदाॊ

तैरे

ददासभ

ससद्ध

फाधते

भृत्मुस्थाने

ि

द्रादश स्थान भं शसन हो वे व्मत्रक्त मफद ऩत्रवि होकय

बूत्वा

उसकी यऺा करुॊ गा। इस तयह अनेकं प्रकाय से भं जगत

जून 2013

58

शसन अष्टोत्तयशतनाभावसर्
ॐ शनैश्चयाम नभ् ॥
ॐ शान्ताम नभ् ॥

ॐ सवााबीष्टप्रदासमने नभ् ॥
ॐ शयण्माम नभ् ॥
ॐ वये ण्माम नभ् ॥
ॐ सवेशाम नभ् ॥

ॐ सौम्माम नभ् ॥

ॐ सुयवन्द्याम नभ् ॥

ॐ सुयरोकत्रवहारयणे नभ् ॥

ॐ सुखासनोऩत्रवष्टाम नभ् ॥
ॐ सुन्दयाम नभ् ॥
ॐ घनाम नभ् ॥

ॐ घनरूऩाम नभ् ॥

ॐ घनाबयणधारयणे नभ् ॥
ॐ घनसायत्रवरेऩाम नभ् ॥
ॐ खद्योताम नभ् ॥
ॐ भन्दाम नभ् ॥

ॐ भन्दिेष्टाम नभ् ॥

ॐ भहनीमगुणात्भने नभ् ॥
ॐ भत्माऩावनऩदाम नभ् ॥
ॐ भहे शाम नभ् ॥

ॐ छामाऩुिाम नभ् ॥
ॐ शवााम नभ् ॥

ॐ शततूणीयधारयणे नभ् ॥

ॐ ियस्स्थयस्वबावाम नभ् ॥
ॐ अिञ्िराम नभ् ॥
ॐ नीरवणााम नभ् ॥
ॐ सनत्माम नभ् ॥

ॐ नीराञ्जनसनबाम नभ् ॥

ॐ नीराम्फयत्रवबूशणाम नभ् ॥
ॐ सनश्चराम नभ् ॥
ॐ वेद्याम नभ् ॥

ॐ त्रवसधरूऩाम नभ् ॥

ॐ त्रवयोधाधायबूभमे नभ् ॥

ॐ बेदास्ऩदस्वबावाम नभ् ॥
ॐ वज्रदे हाम नभ् ॥

ॐ वैयाग्मदाम नभ् ॥

ॐ बव्माम नभ् ॥

ॐ वीतयोगबमाम नभ् ॥

ॐ धनुभण्ा डरसॊस्थाम नभ् ॥

ॐ वीयाम नभ् ॥

ॐ त्रवऩत्ऩयम्ऩये शाम नभ् ॥
ॐ त्रवश्ववन्द्याम नभ् ॥
ॐ गृध्नवाहाम नभ् ॥
ॐ गूढाम नभ् ॥

ॐ कूभाा्गाम नभ् ॥
ॐ कुरूत्रऩणे नभ् ॥

ॐ कुस्त्सताम नभ् ॥

ॐ गुणाढ्माम नभ् ॥
ॐ गोियाम नभ् ॥

ॐ अत्रवद्याभूरनाशाम नभ् ॥

ॐ त्रवद्यात्रवद्यास्वरूत्रऩणे नभ् ||
ॐ आमुष्मकायणाम नभ् ॥
ॐ आऩदद्ध
ु िे नभ् ॥

ॐ त्रवष्णुबक्ताम नभ् ॥
ॐ वसशने नभ् ॥

ॐ त्रवत्रवधागभवेफदने नभ् ॥
ॐ त्रवसधस्तुत्माम नभ् ॥
ॐ वन्द्याम नभ् ॥

ॐ त्रवरूऩाऺाम नभ् ॥
ॐ वरयष्ठाम नभ् ॥
ॐ गरयष्ठाम नभ् ||

ॐ वज्रा्कुशधयाम नभ् ॥

ॐ वयदाबमहस्ताम नभ् ॥
ॐ वाभनाम नभ् ॥

ॐ ज्मेष्ठाऩत्नीसभेताम नभ् ॥
ॐ श्रेष्ठाम नभ् ॥

ॐ सभतबात्रषणे नभ् ॥

ॐ कष्टौघनाशकिे नभ् ॥
ॐ ऩुत्रष्टदाम नभ् ॥

ॐ स्तुत्माम नभ् ॥

ॐ स्तोिगम्माम नभ् ||
ॐ बत्रक्तवश्माम नभ् ॥
ॐ बानवे नभ् ॥

ॐबानुऩि
ु ाम नभ् ॥

ॐ ऩावनाम नभ् ॥
ॐ धनदाम नभ् ॥

ॐ धनुष्भते नभ् ॥

ॐ तनुप्रकाशदे हाम नभ् ॥
ॐ ताभसाम नभ् ||

ॐ अशेषजनवन्द्याम नभ् ॥

ॐ त्रवशेशपरदासमने नभ् ॥
ॐ वशीकृ तजनेशाम नभ् ॥
ॐ ऩशूनाॊ ऩतमे नभ् ॥
ॐ खेियाम नभ् ॥

ॐ खगेशाम नभ् ॥

ॐ घननीराम्फयाम नभ् ॥

ॐ काफठन्मभानसाम नभ् ॥

ॐ आमागणस्तुत्माम नभ् ॥
ॐ नीरच्छिाम नभ् ॥
ॐ सनत्माम नभ् ॥

ॐ सनगुण
ा ाम नभ् ॥

ॐ गुणात्भने नभ् ॥

ॐ सनयाभमाम नभ् ॥
ॐ सनन्द्याम नभ् ॥

ॐ वन्दनीमाम नभ् ॥
ॐ धीयाम नभ् ॥

ॐ फदव्मदे हाम नभ् ॥

ॐ दीनासताहयणाम नभ् ॥

ॐ दै न्मनाशकयाम नभ् ॥

ॐ आमाजनगण्माम नभ् ॥
ॐ क्रूयाम नभ् ॥

ॐ क्रूयिेष्टाम नभ् ॥

ॐ काभक्रोधकयाम नभ् ॥

ॐ करिऩुिशिुत्वकायणाम नभ् ॥
ॐ ऩरयऩोत्रषतबक्ताम नभ् ॥
ॐ ऩयबीसतहयाम नभ् ॥

ॐ बक्तसॊघभनोऽबीष्टपरदाम नभ् ॥
॥ इसत शसन अष्टोत्तयशतनाभावसर्
सम्ऩूणभ
ा ्॥

जून 2013

59

गुरु ऩुष्माभृत मोग

 सिॊतन जोशी
हय फदन फदरने वारे नऺि भे ऩुष्म नऺि बी एक नऺि है , एवॊ अन्दाज से हय २७वं फदन ऩुष्म नऺि होता है ।
मह स्जस वाय को आता है , इसका नाभ बी उसी प्रकाय यखा जाता है ।
इसी प्रकाय गुरुवाय को ऩुष्म नऺि होने से गुरु ऩुष्म मोग कहाजात है ।
गुरु ऩुष्म मोग के फाये भं त्रवद्रान ज्मोसतत्रषमो का कहना हं फक ऩुष्म नऺि भं धन प्रासद्ऱ, िाॊदी, सोना, नमे वाहन,
फही-खातं की खयीदायी एवॊ गुरु ग्रह से सॊफॊसधत वस्तुए अत्मासधक राब प्रदान कयती है ।
हय व्मत्रक्त अऩने शुब कामो भं सपरता हे तु इस शुब भहूता का िमन कय सफसे उऩमुक्त राब प्राद्ऱ कय सकता

है औय अशुबता से फि सकता है ।
अऩने

जीवन

भं

फदन-प्रसतफदन

वारे फदन फकसी बी नमे कामा को जेसे
हो िुके कामा शुरू कयने के सरमे एवॊ
कामा कयने से 99.9% सनस्श्चत सपरता

गुरुऩुष्माभृत

मोग

फहोत

कभ

होता है । तफ फनता है गुरु ऩुष्म

सपरता की प्रासद्ऱ के सरए इस अद्भत
ु भहूता

13 जून
साॊम

4.55

यात 1.13 तक

गुरुवाय के फदन शुब कामो एवॊ

नौकयी, व्माऩाय मा ऩरयवाय से जुड़े कामा, फॊध
जीवन के कोई बी अन्म भहत्वऩूणा ऺेि भं
की सॊबावना होसत है ।
फनता है जफ गुरुवाय के फदन ऩुष्म नऺि
मोग।

आध्मात्भ से सॊफॊसधत कामा कयना असत शुब

एवॊ भॊगरभम होता है ।

ऩुष्म नऺि बी सबी प्रकाय के शुब कामो एवॊ आध्मात्भ से जुडे कामो के सरमे असत शुब भाना गमा है ।

जफ गुरुवाय के फदन ऩुष्म नऺि होता तफ मह मोग फन जाता है अद्भत
ु एवॊ अत्मॊत शुब पर प्रद अभृत मोग।

एक साधक के सरए फेहद पामदे भॊद होता हं गुरुऩुष्माभृत मोग।

इस फदन त्रवद्रान एवॊ गुढ यहस्मो के जानकाय भाॊ भहारक्ष्भी की साधना कयने की सराह दे ते है ।

मह मोग त्रवशेष साधना के सरमे असत शुब एवॊ शीघ्र ऩयीणाभ दे ने वारा होता है ।

भाॊ भहारक्ष्भी का आह्वान कयके अत्मॊत सयरता से उनकी कृ ऩा ित्रष्ट से सभृत्रद्ध औय शाॊसत प्राद्ऱ फक जासकती है ।

ऩुष्म नऺि का भहत्व क्मं हं ?

शास्त्रो भं ऩुष्म नऺि को नऺिं का याजा फतामा गमा हं । स्जसका स्वाभी शसन ग्रह हं । शसन को ज्मोसतष भं
स्थासमत्व का प्रतीक भाना गमा हं । अत् ऩुष्म नऺि सफसे शुब नऺिो भं से एक हं ।
मफद यत्रववाय को ऩुष्म नऺि हो तो यत्रव ऩुष्म मोग औय गुरुवाय को हो तो औय गुरु ऩुष्म मोग कहराता हं ।
शास्त्रं भं ऩुष्म मोग को 100 दोषं को दयू कयने वारा, शुब कामा उद्दे श्मो भं सनस्श्चत सपरता प्रदान कयने वारा

एवॊ फहुभूल्म वस्तुओॊ फक खयीदायी हे तु सफसे श्रेष्ठ एवॊ शुब परदामी मोग भाना गमा है ।

गुरुवाय के फदन ऩुष्म नऺि के सॊमोग से सवााथा अभृतससत्रद्ध मोग फनता है । शसनवाय के फदन ऩुष्म नऺि के

सॊमोग से सवााथसा सत्रद्ध मोग होता है । ऩुष्म नऺि को ब्रह्माजी का श्राऩ सभरा था। इससरए शास्त्रोक्त त्रवधान से ऩुष्म नऺि
भं त्रववाह वस्जात भाना गमा है ।

60

जून 2013

सवा कामा ससत्रद्ध कवि
स्जस व्मत्रक्त को राख प्रमत्न औय ऩरयश्रभ कयने के फादबी उसे भनोवाॊसछत सपरतामे एवॊ

फकमे गमे कामा भं ससत्रद्ध (राब)
धायण कयना िाफहमे।

प्राद्ऱ नहीॊ होती, उस व्मत्रक्त को सवा कामा ससत्रद्ध कवि अवश्म

कवि के प्रभुख राब: सवा कामा ससत्रद्ध कवि के द्राया सुख सभृत्रद्ध औय नव ग्रहं के

नकायात्भक प्रबाव को शाॊत कय धायण कयता व्मत्रक्त के जीवन से सवा प्रकाय के द:ु ख-दारयि का
नाश हो कय सुख-सौबाग्म एवॊ उन्नसत प्रासद्ऱ होकय जीवन भे ससब प्रकाय के शुब कामा ससद्ध होते

हं । स्जसे धायण कयने से व्मत्रक्त मफद व्मवसाम कयता होतो कायोफाय भे वृत्रद्ध होसत हं औय मफद
नौकयी कयता होतो उसभे उन्नसत होती हं ।

 सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं सवाजन वशीकयण कवि के सभरे होने की वजह से धायण
कताा की फात का दस
ू ये व्मत्रक्तओ ऩय प्रबाव फना यहता हं ।

 सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं अष्ट रक्ष्भी कवि के सभरे होने की वजह से व्मत्रक्त ऩय सदा

भाॊ भहा रक्ष्भी की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना यहता हं । स्जस्से भाॊ रक्ष्भी के अष्ट रुऩ (१)आफद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)- धैमा रक्ष्भी, (४)-गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)त्रवजम रक्ष्भी, (७)-त्रवद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी रुऩो का अशीवााद प्राद्ऱ होता हं ।

 सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं तॊि यऺा कवि के सभरे होने की वजह से ताॊत्रिक फाधाए दयू
होती हं , साथ ही नकायात्भक शत्रक्तमो का कोइ कुप्रबाव धायण कताा व्मत्रक्त ऩय नहीॊ होता। इस
कवि के प्रबाव से इषाा-द्रे ष यखने वारे व्मत्रक्तओ द्राया होने वारे दष्ट
ु प्रबावो से यऺा होती हं ।

 सवा कामा ससत्रद्ध कवि के साथ भं शिु त्रवजम कवि के सभरे होने की वजह से शिु से सॊफॊसधत

सभस्त ऩये शासनओ से स्वत् ही छुटकाया सभर जाता हं । कवि के प्रबाव से शिु धायण कताा
व्मत्रक्त का िाहकय कुछ नही त्रफगाड़ सकते।

अन्म कवि के फाये भे असधक जानकायी के सरमे कामाारम भं सॊऩका कये :
फकसी व्मत्रक्त त्रवशेष को सवा कामा ससत्रद्ध कवि दे ने नही दे ना का अॊसतभ सनणाम हभाये ऩास सुयस्ऺत हं ।

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जून 2013

61

हभाये त्रवशेष मॊि
व्माऩाय वृत्रद्ध मॊि: हभाये अनुबवं के अनुशाय मह मॊि व्माऩाय वृत्रद्ध एवॊ ऩरयवाय भं सुख सभृत्रद्ध हे तु त्रवशेष प्रबावशारी हं ।
बूसभराब मॊि: बूसभ, बवन, खेती से सॊफॊसधत व्मवसाम से जुड़े रोगं के सरए बूसभराब मॊि त्रवशेष राबकायी ससद्ध
हुवा हं ।

तॊि यऺा मॊि: फकसी शिु द्राया फकमे गमे भॊि-तॊि आफद के प्रबाव को दयू कयने एवॊ बूत, प्रेत नज़य आफद फुयी शत्रक्तमं
से यऺा हे तु त्रवशेष प्रबावशारी हं ।

आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ मॊि: अऩने नाभ के अनुशाय ही भनुष्म को आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ हे तु परप्रद हं इस मॊि के
ऩूजन से साधक को अप्रत्मासशत धन राब प्राद्ऱ होता हं । िाहे वह धन राब व्मवसाम से हो, नौकयी से हो, धन-सॊऩत्रत्त
इत्माफद फकसी बी भाध्मभ से मह राब प्राद्ऱ हो सकता हं । हभाये वषं के अनुसॊधान एवॊ अनुबवं से हभने आकस्स्भक
धन प्रासद्ऱ मॊि से शेमय ट्रे फडॊ ग, सोने-िाॊदी के व्माऩाय इत्माफद सॊफॊसधत ऺेि से जुडे रोगो को त्रवशेष रुऩ से आकस्स्भक
धन राब प्राद्ऱ होते दे खा हं । आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ मॊि से त्रवसबन्न स्रोत से धनराब बी सभर सकता हं ।

ऩदौन्नसत मॊि: ऩदौन्नसत मॊि नौकयी ऩैसा रोगो के सरए राबप्रद हं । स्जन रोगं को अत्मासधक ऩरयश्रभ एवॊ श्रेष्ठ कामा
कयने ऩय बी नौकयी भं उन्नसत अथाात प्रभोशन नहीॊ सभर यहा हो उनके सरए मह त्रवशेष राबप्रद हो सकता हं ।

यत्नेश्वयी मॊि: यत्नेश्वयी मॊि हीये -जवाहयात, यत्न ऩत्थय, सोना-िाॊदी, ज्वैरयी से सॊफॊसधत व्मवसाम से जुडे रोगं के सरए
असधक प्रबावी हं । शेय फाजाय भं सोने-िाॊदी जैसी फहुभूल्म धातुओॊ भं सनवेश कयने वारे रोगं के सरए बी त्रवशेष
राबदाम हं ।

बूसभ प्रासद्ऱ मॊि: जो रोग खेती, व्मवसाम मा सनवास स्थान हे तु उत्तभ बूसभ आफद प्राद्ऱ कयना िाहते हं , रेफकन उस
कामा भं कोई ना कोई अड़िन मा फाधा-त्रवघ्न आते यहते हो स्जस कायण कामा ऩूणा नहीॊ हो यहा हो, तो उनके सरए
बूसभ प्रासद्ऱ मॊि उत्तभ परप्रद हो सकता हं ।

गृह प्रासद्ऱ मॊि: जो रोग स्वमॊ का घय, दक
ु ान, ओफपस, पैक्टयी आफद के सरए बवन प्राद्ऱ कयना िाहते हं । मथाथा
प्रमासो के उऩयाॊत बी उनकी असबराषा ऩूणा नहीॊ हो ऩायही हो उनके सरए गृह प्रासद्ऱ मॊि त्रवशेष उऩमोगी ससद्ध हो सकता हं ।

कैरास धन यऺा मॊि: कैरास धन यऺा मॊि धन वृत्रद्ध एवॊ सुख सभृत्रद्ध हे तु त्रवशेष परदाम हं ।
आसथाक राब एवॊ सुख सभृत्रद्ध हे तु 19 दर
ा रक्ष्भी मॊि
ु ब

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त्रवसबन्न रक्ष्भी मॊि

श्री मॊि (रक्ष्भी मॊि)

भहारक्ष्भमै फीज मॊि

कनक धाया मॊि

श्री मॊि (भॊि यफहत)

भहारक्ष्भी फीसा मॊि

वैबव रक्ष्भी मॊि

श्री मॊि (सॊऩूणा भॊि सफहत)

रक्ष्भी दामक ससद्ध फीसा मॊि

श्री श्री मॊि

श्री मॊि (फीसा मॊि)

रक्ष्भी दाता फीसा मॊि

अॊकात्भक फीसा मॊि

श्री मॊि श्री सूक्त मॊि

रक्ष्भी फीसा मॊि

ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि

श्री मॊि (कुभा ऩृष्ठीम)

रक्ष्भी गणेश मॊि

धनदा मॊि

(भहान ससत्रद्ध दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि)

(रसरता भहात्रिऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमं श्री भहामॊि )

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जून 2013

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सवाससत्रद्धदामक भुफिका
इस भुफिका भं भूॊगे को शुब भुहूता भं त्रिधातु (सुवणा+यजत+ताॊफ)ं भं जड़वा कय उसे शास्त्रोक्त त्रवसधत्रवधान से त्रवसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्राया सवाससत्रद्धदामक फनाने हे तु प्राण-प्रसतत्रष्ठत एवॊ ऩूणा िैतन्म मुक्त फकमा
जाता हं । इस भुफिका को फकसी बी वगा के व्मत्रक्त हाथ की फकसी बी उॊ गरी भं धायण कय सकते हं ।

महॊ भुफिका कबी फकसी बी स्स्थती भं अऩत्रवि नहीॊ होती। इस सरए कबी भुफिका को उतायने की
आवश्मक्ता नहीॊ हं । इसे धायण कयने से व्मत्रक्त की सभस्माओॊ का सभाधान होने रगता हं । धायणकताा

को जीवन भं सपरता प्रासद्ऱ एवॊ उन्नसत के नमे भागा प्रसस्त होते यहते हं औय जीवन भं सबी प्रकाय
की ससत्रद्धमाॊ बी शीध्र प्राद्ऱ होती हं ।

भूल्म भाि- 6400/- >> Order Now

(नोट: इस भुफिका को धायण कयने से भॊगर ग्रह का कोई फुया प्रबाव साधक ऩय नहीॊ होता हं ।)

सवाससत्रद्धदामक भुफिका के त्रवषम भं असधक जानकायी के सरमे हे तु सम्ऩका कयं ।

ऩसत-ऩत्नी भं करह सनवायण हे तु
मफद ऩरयवायं भं सुख-सुत्रवधा के सभस्त साधान होते हुए बी छोटी-छोटी फातो भं ऩसत-ऩत्नी के त्रफि भे करह होता यहता हं ,

तो घय के स्जतने सदस्म हो उन सफके नाभ से गुरुत्व कामाारत द्राया शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से भॊि ससद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत
ऩूणा िैतन्म मुक्त वशीकयण कवि एवॊ गृह करह नाशक फडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भं त्रफना फकसी ऩूजा, त्रवसधत्रवधान से आऩ त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय सकते हं । मफद आऩ भॊि ससद्ध ऩसत वशीकयण मा ऩत्नी वशीकयण एवॊ गृह करह
नाशक फडब्फी फनवाना िाहते हं , तो सॊऩका आऩ कय सकते हं ।

100 से असधक जैन मॊि
हभाये महाॊ जैन धभा के सबी प्रभुख, दर
ा एवॊ शीघ्र प्रबावशारी मॊि ताम्र ऩि,
ु ब
ससरवय (िाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे उऩरब्ध हं ।

हभाये महाॊ सबी प्रकाय के मॊि कोऩय ताम्र ऩि, ससरवय (िाॊदी) ओय गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है । इसके

अरावा आऩकी आवश्मकता अनुशाय आऩके द्राया प्राद्ऱ (सिि, मॊि, फड़ज़ाईन) के अनुरुऩ मॊि बी फनवाए

जाते है . गुरुत्व कामाारम द्राया उऩरब्ध कयामे गमे सबी मॊि अखॊफडत एवॊ 22 गेज शुद्ध कोऩय(ताम्र
ऩि)- 99.99 टि शुद्ध ससरवय (िाॊदी) एवॊ 22 केये ट गोल्ड (सोने) भे फनवाए जाते है । मॊि के त्रवषम भे
असधक जानकायी के सरमे हे तु सम्ऩका कयं ।

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63

जून 2013

द्रादश भहा मॊि
मॊि को असत प्रासिन एवॊ दर
ा मॊिो के सॊकरन से हभाये वषो के अनुसॊधान
ु ब
द्राया फनामा गमा हं ।

 ऩयभ दर
ा वशीकयण मॊि,
ु ब

 सहस्त्राऺी रक्ष्भी आफद्ध मॊि

 भनोवाॊसछत कामा ससत्रद्ध मॊि

 ऩूणा ऩौरुष प्रासद्ऱ काभदे व मॊि

 बाग्मोदम मॊि

 याज्म फाधा सनवृत्रत्त मॊि
 गृहस्थ सुख मॊि

 शीघ्र त्रववाह सॊऩन्न गौयी अनॊग मॊि

 आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ मॊि
 योग सनवृत्रत्त मॊि

 साधना ससत्रद्ध मॊि
 शिु दभन मॊि

उऩयोक्त सबी मॊिो को द्रादश भहा मॊि के रुऩ भं शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से भॊि ससद्ध ऩूणा
प्राणप्रसतत्रष्ठत एवॊ िैतन्म मुक्त फकमे जाते हं । स्जसे स्थाऩीत कय त्रफना फकसी ऩूजा अिानात्रवसध त्रवधान त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय सकते हं ।

>> Order Now

 क्मा आऩके फच्िे कुसॊगती के सशकाय हं ?
 क्मा आऩके फच्िे आऩका कहना नहीॊ भान यहे हं ?
 क्मा आऩके फच्िे घय भं अशाॊसत ऩैदा कय यहे हं ?
घय ऩरयवाय भं शाॊसत एवॊ फच्िे को कुसॊगती से छुडाने हे तु फच्िे के नाभ से गुरुत्व कामाारत
द्राया शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से भॊि ससद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत ऩूणा िैतन्म मुक्त वशीकयण कवि एवॊ
एस.एन.फडब्फी फनवारे एवॊ उसे अऩने घय भं स्थात्रऩत कय अल्ऩ ऩूजा, त्रवसध-त्रवधान से आऩ
त्रवशेष राब प्राद्ऱ कय सकते हं । मफद आऩ तो आऩ भॊि ससद्ध वशीकयण कवि एवॊ एस.एन.फडब्फी
फनवाना िाहते हं , तो सॊऩका इस कय सकते हं ।

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जून 2013

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सॊऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत 22 गेज शुद्ध स्टीर भं सनसभात अखॊफडत

ऩुरुषाकाय शसन मॊि

ऩुरुषाकाय शसन मॊि (स्टीर भं) को तीव्र प्रबावशारी फनाने हे तु शसन की कायक धातु शुद्ध स्टीर(रोहे )
भं फनामा गमा हं । स्जस के प्रबाव से साधक को तत्कार राब प्राद्ऱ होता हं । मफद जन्भ कॊु डरी भं

शसन प्रसतकूर होने ऩय व्मत्रक्त को अनेक कामं भं असपरता प्राद्ऱ होती है , कबी व्मवसाम भं घटा,
नौकयी भं ऩये शानी, वाहन दघ
ा ना, गृह क्रेश आफद ऩये शानीमाॊ फढ़ती जाती है ऐसी स्स्थसतमं भं
ु ट

प्राणप्रसतत्रष्ठत ग्रह ऩीड़ा सनवायक शसन मॊि की अऩने को व्मऩाय स्थान मा घय भं स्थाऩना कयने से
अनेक राब सभरते हं । मफद शसन की ढै ़मा मा साढ़े साती का सभम हो तो इसे अवश्म ऩूजना िाफहए।
शसनमॊि के ऩूजन भाि से व्मत्रक्त को भृत्मु, कजा, कोटा केश, जोडो का ददा , फात योग तथा रम्फे सभम

के सबी प्रकाय के योग से ऩये शान व्मत्रक्त के सरमे शसन मॊि असधक राबकायी होगा। नौकयी ऩेशा आफद

के रोगं को ऩदौन्नसत बी शसन द्राया ही सभरती है अत् मह मॊि असत उऩमोगी मॊि है स्जसके द्राया
शीघ्र ही राब ऩामा जा सकता है ।

भूल्म: 1050 से 8200 >> Order Now

सॊऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत
22 गेज शुद्ध स्टीर भं सनसभात अखॊफडत

शसन तैसतसा मॊि

शसनग्रह से सॊफॊसधत ऩीडा के सनवायण हे तु त्रवशेष राबकायी मॊि।
भूल्म: 550 से 8200 >> Order Now

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जून 2013

नवयत्न जफड़त श्री मॊि

शास्त्र विन के अनुसाय शुद्ध सुवणा मा यजत
भं सनसभात श्री मॊि के िायं औय मफद नवयत्न
जड़वा ने ऩय मह नवयत्न जफड़त श्री मॊि
कहराता हं । सबी यत्नो को उसके सनस्श्चत
स्थान ऩय जड़ कय रॉकेट के रूऩ भं धायण
कयने से व्मत्रक्त को अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी
की प्रासद्ऱ होती हं । व्मत्रक्त को एसा आबास
होता हं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हं ।
नवग्रह को श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहं
की अशुब दशा का धायणकयने वारे व्मत्रक्त
ऩय प्रबाव नहीॊ होता हं ।

गरे भं होने के कायण मॊि ऩत्रवि यहता हं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो
जर त्रफॊद ु शयीय को रगते हं , वह गॊगा जर के सभान ऩत्रवि होता हं । इस सरमे इसे सफसे

तेजस्वी एवॊ परदासम कहजाता हं । जैसे अभृत से उत्तभ कोई औषसध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी
प्रासद्ऱ के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भं नहीॊ हं एसा शास्त्रोक्त विन हं । इस प्रकाय के
नवयत्न जफड़त श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्राया शुब भुहूता भं प्राण प्रसतत्रष्ठत कयके फनावाए जाते
हं । Rs: 2350, 2800, 3250, 3700, 4600, 5500 से 10,900 तक

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असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं ।

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68

जून 2013

भॊि ससद्ध वाहन दघ
ा ना नाशक भारुसत मॊि
ु ट

ऩौयास्णक ग्रॊथो भं उल्रेख हं की भहाबायत के मुद्ध के सभम अजुन
ा के यथ के अग्रबाग ऩय भारुसत ध्वज एवॊ
भारुसत मन्ि रगा हुआ था। इसी मॊि के प्रबाव के कायण सॊऩूणा मुद्ध के दौयान हज़ायं-राखं प्रकाय के आग्नेम अस्त्र-

शस्त्रं का प्रहाय होने के फाद बी अजुन
ा का यथ जया बी ऺसतग्रस्त नहीॊ हुआ। बगवान श्री कृ ष्ण भारुसत मॊि के इस
अद्भत
ा नाग्रस्त कैसे हो
ु यहस्म को जानते थे फक स्जस यथ मा वाहन की यऺा स्वमॊ श्री भारुसत नॊदन कयते हं, वह दघ
ु ट
सकता हं । वह यथ मा वाहन तो वामुवेग से, सनफाासधत रुऩ से अऩने रक्ष्म ऩय त्रवजम ऩतका रहयाता हुआ ऩहुॊिेगा।
इसी सरमे श्री कृ ष्ण नं अजुन
ा के यथ ऩय श्री भारुसत मॊि को अॊफकत कयवामा था।

स्जन रोगं के स्कूटय, काय, फस, ट्रक इत्माफद वाहन फाय-फाय दघ
ा ना ग्रस्त हो यहे हो!, अनावश्मक वाहन को
ु ट

नुऺान हो यहा हं! उन्हं हानी एवॊ दघ
ा ना से यऺा के उद्दे श्म से अऩने वाहन ऩय भॊि ससद्ध श्री भारुसत मॊि अवश्म
ु ट

रगाना िाफहए। जो रोग ट्रान्स्ऩोफटं ग (ऩरयवहन) के व्मवसाम से जुडे हं उनको श्रीभारुसत मॊि को अऩने वाहन भं अवश्म
स्थात्रऩत कयना िाफहए, क्मोफक, इसी व्मवसाम से जुडे सैकडं रोगं का अनुबव यहा हं की श्री भारुसत मॊि को स्थात्रऩत
कयने से उनके वाहन असधक फदन तक अनावश्मक खिो से एवॊ दघ
ा नाओॊ से सुयस्ऺत यहे हं । हभाया स्वमॊका एवॊ अन्म
ु ट
त्रवद्रानो का अनुबव यहा हं , की स्जन रोगं ने श्री भारुसत मॊि अऩने वाहन ऩय रगामा हं , उन रोगं के वाहन फडी से

फडी दघ
ा नाओॊ से सुयस्ऺत यहते हं । उनके वाहनो को कोई त्रवशेष नुक्शान इत्माफद नहीॊ होता हं औय नाहीॊ अनावश्मक
ु ट
रुऩ से उसभं खयाफी आसत हं ।

वास्तु प्रमोग भं भारुसत मॊि: मह भारुसत नॊदन श्री हनुभान जी का मॊि है । मफद कोई जभीन त्रफक नहीॊ यही हो, मा उस
ऩय कोई वाद-त्रववाद हो, तो इच्छा के अनुरूऩ वहॉ जभीन उसित भूल्म ऩय त्रफक जामे इस सरमे इस भारुसत मॊि का
प्रमोग फकमा जा सकता हं । इस भारुसत मॊि के प्रमोग से जभीन शीघ्र त्रफक जाएगी मा त्रववादभुक्त हो जाएगी। इस सरमे
मह मॊि दोहयी शत्रक्त से मुक्त है ।

भारुसत मॊि के त्रवषम भं असधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भं सॊऩका कयं । भूल्म Rs- 255 से 10900 तक

श्री हनुभान मॊि

शास्त्रं भं उल्रेख हं की श्री हनुभान जी को बगवान सूमद
ा े व ने ब्रह्मा जी के आदे श ऩय हनुभान

जी को अऩने तेज का सौवाॉ बाग प्रदान कयते हुए आशीवााद प्रदान फकमा था, फक भं हनुभान को सबी शास्त्र का ऩूणा

ऻान दॉ ग
ू ा। स्जससे मह तीनोरोक भं सवा श्रेष्ठ वक्ता हंगे तथा शास्त्र त्रवद्या भं इन्हं भहायत हाससर होगी औय इनके
सभन फरशारी औय कोई नहीॊ होगा। जानकायो ने भतानुशाय हनुभान मॊि की आयाधना से ऩुरुषं की त्रवसबन्न फीभारयमं

दयू होती हं , इस मॊि भं अद्भत
ु शत्रक्त सभाफहत होने के कायण व्मत्रक्त की स्वप्न दोष, धातु योग, यक्त दोष, वीमा दोष, भूछाा,

नऩुॊसकता इत्माफद अनेक प्रकाय के दोषो को दयू कयने भं अत्मन्त राबकायी हं । अथाात मह मॊि ऩौरुष को ऩुष्ट कयता
हं । श्री हनुभान मॊि व्मत्रक्त को सॊकट, वाद-त्रववाद, बूत-प्रेत, द्यूत फक्रमा, त्रवषबम, िोय बम, याज्म बम, भायण, सम्भोहन
स्तॊबन इत्माफद से सॊकटो से यऺा कयता हं औय ससत्रद्ध प्रदान कयने भं सऺभ हं ।
श्री हनुभान मॊि के त्रवषम भं असधक जानकायी के सरमे गुरुत्व कामाारम भं सॊऩका कयं । भूल्म Rs- 730 से 10900 तक

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जून 2013

69

त्रवसबन्न दे वताओॊ के मॊि
गणेश मॊि

भहाभृत्मुज
ॊ म मॊि

याभ यऺा मॊि याज

गणेश मॊि (सॊऩण
ू ा फीज भॊि सफहत)

भहाभृत्मुज
ॊ म कवि मॊि

याभ मॊि

गणेश ससद्ध मॊि

भहाभृत्मुज
ॊ म ऩूजन मॊि

द्रादशाऺय त्रवष्णु भॊि ऩूजन मॊि

एकाऺय गणऩसत मॊि

भहाभृत्मुॊजम मुक्त सशव खप्ऩय भाहा सशव मॊि

त्रवष्णु फीसा मॊि

हरयिा गणेश मॊि

सशव ऩॊिाऺयी मॊि

गरुड ऩूजन मॊि

कुफेय मॊि

सशव मॊि

सिॊताभणी मॊि याज

श्री द्रादशाऺयी रुि ऩूजन मॊि

अफद्रतीम सवाकाम्म ससत्रद्ध सशव मॊि

सिॊताभणी मॊि

दत्तािम मॊि

नृससॊह ऩूजन मॊि

स्वणााकषाणा बैयव मॊि

दत्त मॊि

ऩॊिदे व मॊि

हनुभान ऩूजन मॊि

आऩदद्ध
ु ायण फटु क बैयव मॊि

सॊतान गोऩार मॊि

हनुभान मॊि

फटु क मॊि

श्री कृ ष्ण अष्टाऺयी भॊि ऩूजन मॊि

सॊकट भोिन मॊि

व्मॊकटे श मॊि

कृ ष्ण फीसा मॊि

वीय साधन ऩूजन मॊि

कातावीमााजन
ुा ऩूजन मॊि

सवा काभ प्रद बैयव मॊि

दस्ऺणाभूसता ध्मानभ ् मॊि

भनोकाभना ऩूसता एवॊ कष्ट सनवायण हे तु त्रवशेष मॊि
व्माऩाय वृत्रद्ध कायक मॊि

अभृत तत्व सॊजीवनी कामा कल्ऩ मॊि

िम ताऩंसे भुत्रक्त दाता फीसा मॊि

व्माऩाय वृत्रद्ध मॊि

त्रवजमयाज ऩॊिदशी मॊि

भधुभेह सनवायक मॊि

व्माऩाय वधाक मॊि

त्रवद्यामश त्रवबूसत याज सम्भान प्रद ससद्ध फीसा मॊि

ज्वय सनवायण मॊि

व्माऩायोन्नसत कायी ससद्ध मॊि

सम्भान दामक मॊि

योग कष्ट दरयिता नाशक मॊि

बाग्म वधाक मॊि

सुख शाॊसत दामक मॊि

योग सनवायक मॊि

स्वस्स्तक मॊि

फारा मॊि

तनाव भुक्त फीसा मॊि

सवा कामा फीसा मॊि

फारा यऺा मॊि

त्रवद्युत भानस मॊि

कामा ससत्रद्ध मॊि

गबा स्तम्बन मॊि

गृह करह नाशक मॊि

सुख सभृत्रद्ध मॊि

ऩुि प्रासद्ऱ मॊि

करेश हयण फत्रत्तसा मॊि

सवा रयत्रद्ध ससत्रद्ध प्रद मॊि

प्रसूता बम नाशक मॊि

वशीकयण मॊि

सवा सुख दामक ऩंसफठमा मॊि

प्रसव-कष्टनाशक ऩॊिदशी मॊि

भोफहसन वशीकयण मॊि

ऋत्रद्ध ससत्रद्ध दाता मॊि

शाॊसत गोऩार मॊि

कणा त्रऩशािनी वशीकयण मॊि

सवा ससत्रद्ध मॊि

त्रिशूर फीशा मॊि

वाताारी स्तम्बन मॊि

साफय ससत्रद्ध मॊि

ऩॊिदशी मॊि (फीसा मॊि मुक्त िायं प्रकायके)

वास्तु मॊि

शाफयी मॊि

फेकायी सनवायण मॊि

श्री भत्स्म मॊि

ससद्धाश्रभ मॊि

षोडशी मॊि

ज्मोसतष तॊि ऻान त्रवऻान प्रद ससद्ध फीसा मॊि

अडसफठमा मॊि

वाहन दघ
ा ना नाशक मॊि
ु ट

ब्रह्माण्ड साफय ससत्रद्ध मॊि

अस्सीमा मॊि

बूतादी व्मासधहयण मॊि

कुण्डसरनी ससत्रद्ध मॊि

ऋत्रद्ध कायक मॊि

कष्ट सनवायक ससत्रद्ध फीसा मॊि

क्रास्न्त औय श्रीवधाक िंतीसा मॊि

भन वाॊसछत कन्मा प्रासद्ऱ मॊि

बम नाशक मॊि

श्री ऺेभ कल्माणी ससत्रद्ध भहा मॊि

त्रववाहकय मॊि

स्वप्न बम सनवायक मॊि

प्रेत-फाधा नाशक मॊि

जून 2013

70

ऻान दाता भहा मॊि

रग्न त्रवघ्न सनवायक मॊि

कुदृत्रष्ट नाशक मॊि

कामा कल्ऩ मॊि

रग्न मोग मॊि

श्री शिु ऩयाबव मॊि

दीधाामु अभृत तत्व सॊजीवनी मॊि

दरयिता त्रवनाशक मॊि

शिु दभनाणाव ऩूजन मॊि

भॊि ससद्ध त्रवशेष दै वी मॊि सूसि
आद्य शत्रक्त दग
ु ाा फीसा मॊि (अॊफाजी फीसा मॊि)

सयस्वती मॊि

भहान शत्रक्त दग
ु ाा मॊि (अॊफाजी मॊि)

सद्ऱसती भहामॊि(सॊऩण
ू ा फीज भॊि सफहत)

नव दग
ु ाा मॊि

कारी मॊि

नवाणा मॊि (िाभुड
ॊ ा मॊि)

श्भशान कारी ऩूजन मॊि

नवाणा फीसा मॊि

दस्ऺण कारी ऩूजन मॊि

िाभुड
ॊ ा फीसा मॊि ( नवग्रह मुक्त)

सॊकट भोसिनी कासरका ससत्रद्ध मॊि

त्रिशूर फीसा मॊि

खोफडमाय मॊि

फगरा भुखी मॊि

खोफडमाय फीसा मॊि

फगरा भुखी ऩूजन मॊि

अन्नऩूणाा ऩूजा मॊि

याज याजेश्वयी वाॊछा कल्ऩरता मॊि

एकाॊऺी श्रीपर मॊि

भॊि ससद्ध त्रवशेष रक्ष्भी मॊि सूसि
श्री मॊि (रक्ष्भी मॊि)

भहारक्ष्भमै फीज मॊि

श्री मॊि (भॊि यफहत)

भहारक्ष्भी फीसा मॊि

श्री मॊि (सॊऩण
ू ा भॊि सफहत)

रक्ष्भी दामक ससद्ध फीसा मॊि

श्री मॊि (फीसा मॊि)

रक्ष्भी दाता फीसा मॊि

श्री मॊि श्री सूक्त मॊि

रक्ष्भी गणेश मॊि

श्री मॊि (कुभा ऩृष्ठीम)

ज्मेष्ठा रक्ष्भी भॊि ऩूजन मॊि

रक्ष्भी फीसा मॊि

कनक धाया मॊि

श्री श्री मॊि (श्रीश्री रसरता भहात्रिऩुय सुन्दमै श्री भहारक्ष्भमं श्री भहामॊि)

वैबव रक्ष्भी मॊि (भहान ससत्रद्ध दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि)

अॊकात्भक फीसा मॊि
ताम्र ऩि ऩय सुवणा ऩोरीस
(Gold Plated)
साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

ताम्र ऩि ऩय यजत ऩोरीस
(Silver Plated)

भूल्म
460
820
1650
2350
3600
6400
10800

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

भूल्म
370
640
1090
1650
2800
5100
8200

ताम्र ऩि ऩय
(Copper)

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

मॊि के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं ।

भूल्म
255
460
730
1090
1900
3250
6400

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जून 2013

71

यासश यत्न
भेष यासश:

भूग
ॊ ा

वृषब यासश:

हीया

Red Coral

Diamond
(Special)

(Special)
5.25" Rs. 1050
6.25" Rs. 1250
7.25" Rs. 1450
8.25" Rs. 1800
9.25" Rs. 2100
10.25" Rs. 2800

10 cent
20 cent
30 cent
40 cent
50 cent

Rs. 4100
Rs. 8200
Rs. 12500
Rs. 18500
Rs. 23500

सभथुन यासश:

कका यासश:

ससॊह यासश:

कन्मा यासश:

Green Emerald

Naturel Pearl
(Special)

Ruby
(Old Berma)
(Special)

Green Emerald

ऩन्ना

(Special)
5.25" Rs. 9100
6.25" Rs. 12500
7.25" Rs. 14500
8.25" Rs. 19000
9.25" Rs. 23000
10.25" Rs. 28000

भोती

5.25"
6.25"
7.25"
8.25"
9.25"
10.25"

Rs. 910
Rs. 1250
Rs. 1450
Rs. 1900
Rs. 2300
Rs. 2800

भाणेक

2.25"
3.25"
4.25"
5.25"
6.25"

Rs.
Rs.
Rs.
Rs.
Rs.

12500
15500
28000
46000
82000

ऩन्ना

(Special)
5.25" Rs. 9100
6.25" Rs. 12500
7.25" Rs. 14500
8.25" Rs. 19000
9.25" Rs. 23000
10.25" Rs. 28000

** All Weight In Rati

All Diamond are Full
White Colour.

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

तुरा यासश:

वृस्श्चक यासश:

धनु यासश:

कॊु ब यासश:

भीन यासश:

हीया

भूग
ॊ ा

ऩुखयाज

भकय यासश:

नीरभ

नीरभ

Diamond
(Special)

Red Coral

Y.Sapphire

B.Sapphire

B.Sapphire

Y.Sapphire

(Special)

(Special)

(Special)

(Special)

(Special)

10 cent
20 cent
30 cent
40 cent
50 cent

Rs. 4100
Rs. 8200
Rs. 12500
Rs. 18500
Rs. 23500

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5.25" Rs. 1050
6.25" Rs. 1250
7.25" Rs. 1450
8.25" Rs. 1800
9.25" Rs. 2100
10.25" Rs. 2800
** All Weight In Rati

ऩुखयाज

5.25" Rs. 30000
6.25" Rs. 37000
7.25" Rs. 55000
8.25" Rs. 73000
9.25" Rs. 91000
10.25" Rs.108000

5.25" Rs. 30000
6.25" Rs. 37000
7.25" Rs. 55000
8.25" Rs. 73000
9.25" Rs. 91000
10.25" Rs.108000

5.25" Rs. 30000
6.25" Rs. 37000
7.25" Rs. 55000
8.25" Rs. 73000
9.25" Rs. 91000
10.25" Rs.108000

5.25" Rs. 30000
6.25" Rs. 37000
7.25" Rs. 55000
8.25" Rs. 73000
9.25" Rs. 91000
10.25" Rs.108000

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

** All Weight In Rati

* उऩमोक्त वजन औय भूल्म से असधक औय कभ वजन औय भूल्म के यत्न एवॊ उऩयत्न बी हभाये महा व्माऩायी भूल्म ऩय उप्रब्ध
हं ।

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जून 2013

72

भॊि ससद्ध रूिाऺ
Rudraksh List
एकभुखी रूिाऺ (नेऩार)

Rate In
Indian Rupee

Rudraksh List

750 to 1900 नौ भुखी रूिाऺ (नेऩार)

Rate In
Indian Rupee
1550 to 2800

दो भुखी रूिाऺ (नेऩार)

55 to 280 दस भुखी रूिाऺ (नेऩार)

1550 to 2800

तीन भुखी रूिाऺ (नेऩार)

55 to 280 ग्मायह भुखी रूिाऺ (नेऩार)

2100 to 3250

िाय भुखी रूिाऺ (नेऩार)

25 to 190 फायह भुखी रूिाऺ (नेऩार)

3250 to 4600

ऩॊि भुखी रूिाऺ (नेऩार)

25 to 190 तेयह भुखी रूिाऺ (नेऩार)

5500 to 7300

छह भुखी रूिाऺ (नेऩार)

25 to 190 िौदह भुखी रूिाऺ (नेऩार)

सात भुखी रूिाऺ (नेऩार)
आठ भुखी रूिाऺ (नेऩार)

150 to 450 गौयीशॊकय रूिाऺ (नेऩार)
1250 to 2350 गणेश रुिाऺ (नेऩार)

14500 to 19000
3700 to 14500
450 to 1450

* भूल्म भं अॊतय रुिाऺ के आकाय औय गुणवत्ता के अनुशाय अरग-अरग होते हं । उऩयोक्त भूल्म छोटे से फड़े आकाय
के अनुरुऩ दशाामे गमे हं । कबी-कबी सॊबात्रवत हं की छोटे आकाय के उत्तभ गुणवत्ता वारे रुिाऺ असधक भूल्म भं प्राद्ऱ
हो सकते हं ।
त्रवशेष सूिना: फाजाय की स्स्थसत के अनुसाय, रूिाऺ भूल्म, फदन-फ-फदन फदरते यहते है , स्जस कायण हभायी भूल्म
सूिी भं बी

फाजाय की स्स्थसत के अनुसाय ऩरयवतान होते यहते हं , कृ प्मा रुिाऺ के सरए अऩना बुगतान बेजने से

ऩहरे रुिाऺ के नमी भूल्म सूिी हे तु हभ से सॊऩका कयं ।

रुिाऺ के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं ।

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भॊि ससद्ध दर
ा साभग्री
ु ब
हत्था जोडी- Rs- 370

घोडे की नार- Rs.351

भामा जार- Rs- 251

त्रफल्री नार- Rs- 370

भोसत शॊख- Rs- 550

धन वृत्रद्ध हकीक सेट Rs-251

ससमाय ससॊगी- Rs- 370

दस्ऺणावतॉ शॊख- Rs- 550

इन्ि जार- Rs- 251

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जून 2013

73

श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि
फकसी बी व्मत्रक्त का जीवन तफ आसान फन जाता हं जफ उसके िायं औय का भाहोर उसके अनुरुऩ उसके वश
भं हं। जफ कोई व्मत्रक्त का आकषाण दस
ु यो के उऩय एक िुम्फकीम प्रबाव डारता हं , तफ

रोग उसकी सहामता एवॊ

सेवा हे तु तत्ऩय होते है औय उसके प्राम् सबी कामा त्रफना असधक कष्ट व ऩये शानी से सॊऩन्न हो जाते हं । आज के
बौसतकता वाफद मुग भं हय व्मत्रक्त के सरमे दस
ॊ कत्व को कामभ
ू यो को अऩनी औय खीिने हे तु एक प्रबावशासर िुफ

यखना असत आवश्मक हो जाता हं । आऩका आकषाण औय व्मत्रक्तत्व आऩके िायो ओय से रोगं को आकत्रषात कये इस
सरमे सयर उऩाम हं , श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि। क्मोफक बगवान श्री कृ ष्ण एक अरौफकव एवॊ फदवम िुॊफकीम व्मत्रक्तत्व के
धनी थे। इसी कायण से श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि के ऩूजन एवॊ दशान से आकषाक व्मत्रक्तत्व प्राद्ऱ होता हं ।
श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि के साथ व्मत्रक्तको दृढ़ इच्छा शत्रक्त एवॊ उजाा प्राद्ऱ
होती हं , स्जस्से व्मत्रक्त हभेशा एक बीड भं हभेशा आकषाण का कंि यहता हं ।
मफद फकसी व्मत्रक्त को अऩनी प्रसतबा व आत्भत्रवश्वास के स्तय भं वृत्रद्ध,
अऩने सभिो व ऩरयवायजनो के त्रफि भं रयश्तो भं सुधाय कयने की ईच्छा होती
हं उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि का ऩूजन एक सयर व सुरब भाध्मभ
सात्रफत हो सकता हं ।
श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि ऩय अॊफकत शत्रक्तशारी त्रवशेष ये खाएॊ, फीज भॊि एवॊ

श्रीकृ ष्ण फीसा कवि
श्रीकृ ष्ण

फीसा

कवि

को

केवर

त्रवशेष शुब भुहुता भं सनभााण फकमा
जाता हं । कवि को त्रवद्रान कभाकाॊडी

ब्राहभणं द्राया शुब भुहुता भं शास्त्रोक्त

अॊको से व्मत्रक्त को अद्द्भत
ु आॊतरयक शत्रक्तमाॊ प्राद्ऱ होती हं जो व्मत्रक्त को

त्रवसध-त्रवधान से त्रवसशष्ट तेजस्वी भॊिो

श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि के ऩूजन व सनमसभत दशान के भाध्मभ से बगवान

मुक्त कयके सनभााण फकमा जाता हं ।

सफसे आगे एवॊ सबी ऺेिो भं अग्रस्णम फनाने भं सहामक ससद्ध होती हं ।

श्रीकृ ष्ण का आशीवााद प्राद्ऱ कय सभाज भं स्वमॊ का अफद्रतीम स्थान स्थात्रऩत कयं ।
श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि अरौफकक ब्रह्माॊडीम उजाा का सॊिाय कयता हं , जो
एक प्राकृ त्रत्त भाध्मभ से व्मत्रक्त के बीतय सद्दबावना, सभृत्रद्ध, सपरता, उत्तभ
स्वास््म, मोग औय ध्मान के सरमे एक शत्रक्तशारी भाध्मभ हं !

श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि के ऩूजन से व्मत्रक्त के साभास्जक भान-सम्भान व

स्जस के पर स्वरुऩ धायण कयता
व्मत्रक्त को शीघ्र ऩूणा राब प्राद्ऱ होता
हं । कवि को गरे भं धायण कयने
से वहॊ अत्मॊत प्रबाव शारी होता
हं । गरे भं धायण कयने से कवि

ऩद-प्रसतष्ठा भं वृत्रद्ध होती हं ।

हभेशा रृदम के ऩास यहता हं स्जस्से

कंफित कयने से व्मत्रक्त फक िेतना शत्रक्त जाग्रत होकय शीघ्र उच्ि स्तय

एवॊ शीघ्र ऻात होने रगता हं ।

त्रवद्रानो के भतानुशाय श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि के भध्मबाग ऩय ध्मान मोग
को प्राद्ऱहोती हं ।

द्राया ससद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत ऩूणा िैतन्म

व्मत्रक्त ऩय उसका राब असत तीव्र
भूरम भाि: 1900 >>Order Now

जो ऩुरुषं औय भफहरा अऩने साथी ऩय अऩना प्रबाव डारना िाहते हं औय उन्हं अऩनी औय आकत्रषात कयना
िाहते हं । उनके सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि उत्तभ उऩाम ससद्ध हो सकता हं ।

ऩसत-ऩत्नी भं आऩसी प्रभ की वृत्रद्ध औय सुखी दाम्ऩत्म जीवन के सरमे श्रीकृ ष्ण फीसा मॊि राबदामी होता हं ।

भूल्म:- Rs. 730 से Rs. 10900 तक उप्रब्द्ध >> Order Now

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जून 2013

74

याभ यऺा मॊि
याभ यऺा मॊि सबी बम, फाधाओॊ से भुत्रक्त व कामो भं सपरता प्रासद्ऱ हे तु उत्तभ मॊि हं । स्जसके प्रमोग
से धन राब होता हं व व्मत्रक्त का सवांगी त्रवकाय होकय उसे सुख-सभृत्रद्ध, भानसम्भान की प्रासद्ऱ होती
हं । याभ यऺा मॊि सबी प्रकाय के अशुब प्रबाव को दयू कय व्मत्रक्त को जीवन की सबी प्रकाय की
कफठनाइमं से यऺा कयता हं । त्रवद्रानो के भत से जो व्मत्रक्त बगवान याभ के बक्त हं मा श्री
हनुभानजी के बक्त हं उन्हं अऩने सनवास स्थान, व्मवसामीक स्थान ऩय याभ यऺा मॊि को अवश्म
स्थाऩीत कयना िाफहमे स्जससे आने वारे सॊकटो से यऺा हो उनका जीवन सुखभम व्मतीत हो सके
एवॊ उनकी सभस्त आफद बौसतक व आध्मास्त्भक भनोकाभनाएॊ ऩूणा हो सके।

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ताम्र ऩि ऩय सुवणा ऩोरीस

ताम्र ऩि ऩय यजत ऩोरीस

ताम्र ऩि ऩय

(Gold Plated)

(Silver Plated)

(Copper)

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

भूल्म
460
820
1650
2350
3600
6400
10800

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

भूल्म
370
640
1090
1650
2800
5100
8200

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
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भूल्म
255
460
730
1090
1900
3250
6400

75

जून 2013

जैन धभाके त्रवसशष्ट मॊिो की सूिी
श्री िौफीस तीथंकयका भहान प्रबात्रवत िभत्कायी मॊि

श्री एकाऺी नारयमेय मॊि

श्री िोफीस तीथंकय मॊि

सवातो बि मॊि

कल्ऩवृऺ मॊि

सवा सॊऩत्रत्तकय मॊि

सिॊताभणी ऩाश्वानाथ मॊि

सवाकामा-सवा भनोकाभना ससत्रद्धअ मॊि (१३० सवातोबि मॊि)

सिॊताभणी मॊि (ऩंसफठमा मॊि)

ऋत्रष भॊडर मॊि

सिॊताभणी िक्र मॊि

जगदवल्रब कय मॊि

श्री िक्रेश्वयी मॊि

ऋत्रद्ध ससत्रद्ध भनोकाभना भान सम्भान प्रासद्ऱ मॊि

श्री घॊटाकणा भहावीय मॊि

ऋत्रद्ध ससत्रद्ध सभृत्रद्ध दामक श्री भहारक्ष्भी मॊि

श्री घॊटाकणा भहावीय सवा ससत्रद्ध भहामॊि

त्रवषभ त्रवष सनग्रह कय मॊि

श्री ऩद्मावती मॊि

ऺुिो ऩिव सननााशन मॊि

श्री ऩद्मावती फीसा मॊि

फृहच्िक्र मॊि

श्री ऩाश्वाऩद्मावती ह्रंकाय मॊि

वॊध्मा शब्दाऩह मॊि

ऩद्मावती व्माऩाय वृत्रद्ध मॊि

भृतवत्सा दोष सनवायण मॊि

श्री धयणेन्ि ऩद्मावती मॊि

काॊक वॊध्मादोष सनवायण मॊि

श्री ऩाश्वानाथ ध्मान मॊि

फारग्रह ऩीडा सनवायण मॊि

श्री ऩाश्वानाथ प्रबुका मॊि

रधुदेव कुर मॊि

बक्ताभय मॊि (गाथा नॊफय १ से ४४ तक)

नवगाथात्भक उवसग्गहयॊ स्तोिका त्रवसशष्ट मॊि

भस्णबि मॊि

उवसग्गहयॊ मॊि

श्री मॊि

श्री ऩॊि भॊगर भहाश्रृत स्कॊध मॊि

श्री रक्ष्भी प्रासद्ऱ औय व्माऩाय वधाक मॊि

ह्रीॊकाय भम फीज भॊि

श्री रक्ष्भीकय मॊि

वधाभान त्रवद्या ऩट्ट मॊि

रक्ष्भी प्रासद्ऱ मॊि

त्रवद्या मॊि

भहात्रवजम मॊि

सौबाग्मकय मॊि

त्रवजमयाज मॊि

डाफकनी, शाफकनी, बम सनवायक मॊि

त्रवजम ऩतका मॊि

बूताफद सनग्रह कय मॊि

त्रवजम मॊि

ज्वय सनग्रह कय मॊि

ससद्धिक्र भहामॊि

शाफकनी सनग्रह कय मॊि

दस्ऺण भुखाम शॊख मॊि

आऩत्रत्त सनवायण मॊि

दस्ऺण भुखाम मॊि

शिुभख
ु स्तॊबन मॊि

(अनुबव ससद्ध सॊऩण
ू ा श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि)

मॊि के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु सॊऩका कयं ।

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जून 2013

76

घॊटाकणा भहावीय सवा ससत्रद्ध भहामॊि को स्थाऩीत

कयने से साधक की सवा भनोकाभनाएॊ ऩूणा होती हं । सवा
प्रकाय के योग बूत-प्रेत आफद उऩिव से यऺण होता हं ।
जहयीरे औय फहॊ सक प्राणीॊ से सॊफसॊ धत बम दयू होते हं ।
अस्ग्न बम, िोयबम आफद दयू होते हं ।

दष्ट
ु व असुयी शत्रक्तमं से उत्ऩन्न होने वारे बम

से मॊि के प्रबाव से दयू हो जाते हं ।

मॊि के ऩूजन से साधक को धन, सुख, सभृत्रद्ध,

ऎश्वमा, सॊतत्रत्त-सॊऩत्रत्त आफद की प्रासद्ऱ होती हं । साधक की
सबी प्रकाय की सास्त्वक इच्छाओॊ की ऩूसता होती हं ।

मफद फकसी ऩरयवाय मा ऩरयवाय के सदस्मो ऩय

वशीकयण, भायण,

उच्िाटन इत्माफद जाद-ू टोने वारे

प्रमोग फकमे गमं होतो इस मॊि के प्रबाव से स्वत् नष्ट
हो जाते हं औय बत्रवष्म भं मफद कोई प्रमोग कयता हं तो
यऺण होता हं ।

कुछ जानकायो के श्री घॊटाकणा भहावीय ऩतका

मॊि से जुडे अद्द्भत
ु अनुबव यहे हं । मफद घय भं श्री

घॊटाकणा भहावीय ऩतका मॊि स्थात्रऩत फकमा हं औय मफद

कोई इषाा, रोब, भोह मा शिुतावश मफद अनुसित कभा

कयके फकसी बी उद्दे श्म से साधक को ऩये शान कयने का प्रमास कयता हं तो मॊि के प्रबाव से सॊऩण
ू ा
ऩरयवाय का यऺण तो होता ही हं , कबी-कबी शिु के द्राया फकमा गमा अनुसित कभा शिु ऩय ही उऩय
उरट वाय होते दे खा हं ।

भूल्म:- Rs. 1650 से Rs. 10900 तक उप्रब्द्ध >> Order Now

सॊऩका कयं । GURUTVA KARYALAY
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जून 2013

77

अभोघ भहाभृत्मुॊजम कवि
अभोद्य् भहाभृत्मुज
ॊ म कवि व उल्रेस्खत अन्म साभग्रीमं को शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से त्रवद्रान
ब्राह्मणो द्राया सवा राख भहाभृत्मुॊजम भॊि जऩ एवॊ दशाॊश हवन द्राया सनसभात फकमा जाता हं इस
सरए कवि अत्मॊत प्रबावशारी होता हं ।

अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम कवि
कवि फनवाने हे तु:
अऩना नाभ, त्रऩता-भाता का नाभ,
गोि, एक नमा पोटो बेजे

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अभोद्य् भहाभृत्मुॊजम
कवि
दस्ऺणा भाि: 10900

याशी यत्न एवॊ उऩयत्न
त्रवशेष मॊि
हभायं महाॊ सबी प्रकाय के मॊि सोने-िाॊफदताम्फे भं आऩकी आवश्मक्ता के अनुशाय

फकसी बी बाषा/धभा के मॊिो को आऩकी
आवश्मक फडजाईन के अनुशाय २२ गेज
सबी साईज एवॊ भूल्म व क्वासरफट के

असरी नवयत्न एवॊ उऩयत्न बी उऩरब्ध हं ।

शुद्ध ताम्फे भं अखॊफडत फनाने की त्रवशेष
सुत्रवधाएॊ उऩरब्ध हं ।

हभाये महाॊ सबी प्रकाय के यत्न एवॊ उऩयत्न व्माऩायी भूल्म ऩय उऩरब्ध हं । ज्मोसतष कामा से जुडे़

फधु/फहन व यत्न व्मवसाम से जुडे रोगो के सरमे त्रवशेष भूल्म ऩय यत्न व अन्म साभग्रीमा व अन्म
सुत्रवधाएॊ उऩरब्ध हं ।

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78

जून 2013

भाससक यासश पर

 सिॊतन जोशी
भेष: 1 से 15 जून 2013 : आऩकी भहत्व ऩूणा मोजनाएॊ एवॊ कामो को स्स्थगीत कयना नुक्शान दे ह हो सकता हं । कुछ
रुकावटो के फाद भं भहत्वऩूणा कामो को सॊप्ऩन कयने भं सभथा होगं। आसथाक स्स्थसत
सुधये गी ऩयॊ तु धन सॊग्रह कयने भं कफठनाई होगी। मािा के दौयान अऩने फहुभूल्म साभन
को सॊबार कय यखं। शिु ऩऺ से त्रवध्न-फाधाएॊ आसकती हं रेफकन आऩ उसे अऩनी
फुत्रद्ध एवॊ िातुमा से दयू कयने भं सभथा हंगे।
16 से 30 जून 2013 : आऩ अऩने कामा का अच्छा प्रदशान कयने भं सभथा हंगे।
सयकाय से सॊफॊसधत कामा भं राब प्राद्ऱ हो सकता हं । दाम्ऩत्म जीवन की छोटी-छोटी
सभस्माओॊ को दयू कयने का प्रमास कये अन्मथा सभस्मा त्रवकट हो सकती हं । वाहान
िराते सभम मा वाहन आफद से सावधान यहं आकस्स्भक दध
ा ना आफद की सॊबावना असधक हं । अऩनी असधक खिा
ू ट
कयने की प्रवृसत ऩय सनमॊिण कयने का प्रमास कयं ।

वृषब: 1 से 15 जून 2013 : व्माऩाय उद्योग से जुडे़ रोगो को नमे अवसय प्राद्ऱ हंगे। नौकयी, व्माऩाय, ऩूॊजी सनवेश
इत्माफद से आकस्स्भक रुऩ से धन प्रासद्ऱ हो सकती हं । फकमे गमे ऩूॊस्ज सनवेश मा बूसभ-बवन से सॊफॊसधत कामो भं राब
प्राद्ऱ होगा। इस अवसध भं आऩके उऩय कामा के दफावं के िरते सुस्ती का असय दे खने को सभर सकता हं । इष्ट सभिं
के सहमोग से नमे सभि फन सकते हं ।
16 से 30 जून 2013 : नौकयी/व्मवसाम के फने-फनामे कामो भं अिानक रुकावटे आसकती हं मा कामा भं कोई िूक से
फड़ा नुक्शान सॊबव हं । नौकयी-व्मवसाम भं अत्मसधक ऩरयश्रभ एवॊ भेहनत के उऩयाॊत फहुत भुस्श्कर से धन राब प्राद्ऱ
कय सकते हं । त्रवयोसध एवॊ शिु ऩऺ से ऩये शानी हो सकती हं । प्रकृ सत भं फदराव से आऩका स्वास््म नयभ यह सकता
हं । आऩकी भहत्व ऩूणा व्मवसासमक मािा स्थसगत हो सकती। दाॊऩत्म जीवन भध्मभ यहे गा

सभथुन: 1 से 15 जून 2013 : बूसभ-बवन से सॊफॊसधत भाभरो भं त्रवशेष धन राब के
मोग फन यहे हं । आऩके रुके हुए कामा ऩूणा हंगे। इष्ट सभिं एवॊ सॊफॊधीमं धनराब प्राद्ऱ
होगा। शिु ऩऺ ऩय आऩका दफदफा यहे गा। भौसभ के फदराफ से खाने- ऩीने का ध्मान
यखे अन्मथा स्वास््म नयभ हो सकता हं । सॊतान से रेकय कोई ऩये शानी हो सकती हं ।
दाॊऩत्म जीवन सुखभम यहने के मोग हं ।
16 से 30 जून 2013 : दै सनक सुख-साधनो भं वृत्रद्ध होगी स्जस कायण खिा फढ़ सकता
हं । उच्ि असधकायी एवॊ सहकभॉ के कामा ऩये शानीमं सॊबव हं । अऩने स्वबाव भं दमा,
भृदत
ु ा व त्रवनम्रता राने का प्रमास कयं । मफद साझेदायी भं व्मवसाम कयने के सोि यहे हं , तो सभम अनुकूर हं रेफकन
अऩने सनणाम ऩय ऩुन् त्रविाय कयना िाफहए स्जससे आऩके सॊफॊध खयाफ नहीॊ हो।

79

जून 2013

कका: 1 से 15 जून 2013 : आऩको एकासधक स्त्रोत से आकस्स्भक धन की प्रासद्ऱ हो सकती हं । बूसभ- बवन-वाहन के
क्रम-त्रवक्रम से राब प्राद्ऱ हो सकता हं । आऩका स्वबाव थोडा सिड़सिड़ा फन सकता हं ।
अऩने क्रोध ऩय सनमॊिण यखे अन्मथा आऩका स्वबाव आऩके त्रप्रमजनो को त्रवशेष कष्ट दे
सकता हं । अत्रववाह हं तो त्रववाह होने के मोग फन यहे हं । प्रकृ सत भं फदराव से आऩका
स्वास््म नयभ यह सकता हं ।
16 से 30 जून 2013 : आऩको त्रवसबन्न कामं भं सपरता प्राद्ऱ होने के मोग हं । इस
सभम बायी भािा भं ऩूॊस्ज सनवेश कयने से फिे। इस दौयान मथा सॊबव ऋण के रेन -दे ने
से फिने का प्रमास कयं अन्मथा धन की ऩुन् प्रासद्ऱ-बुगतान भं त्रवरॊफ हो सकता हं ।
फकसी से वाद-त्रववाद कयने से फिे अन्मथा कोटा -किहयी के िक्कयं भं उरझना ऩड सकता हं । अऩने खान-ऩान का
ध्मान यखे आऩका स्वास््म साभान्म यहे गा।

ससॊह: 1 से 15 जून 2013 : आसथाक सभस्माएॊ ऩये शान कय सकती हं रेफकन सभम के साथ सभस्माएॊ सरझने रगेगी।
कोटा -किहयी के कामो भं त्रवजम प्रासद्ऱ के सॊकेत हं । दयू स्थानो की व्मवसामीक मािाए
स्थसगत कयनी ऩड़ सकती हं ।सॊतान ऩऺ से सॊफॊसधत सिॊताएॊ दयू होगी। जीवन साथी के
साथ वैिारयक भतबेद सॊबव हं । अऩने खाने-ऩीने का त्रवशेष ध्मान यखे।
16 से 30 जून 2013 : आऩके भहत्वऩूणा कामो भं अनावश्म त्रवरॊफ होता नजय आएगा
जो सभम के साथ खत्भ हो जाएगा। मफद आऩ नौकयी भं हं औय स्थान ऩरयवतान की
सोि यहे हं तो ऩरयणाभ अनुकूर नहीॊ सभरंगे हं । अऩनी आॊखं का त्रवशेष खमार यखं।
ऩरयवाय भं अशाॊसत का भाहोर हो सकता हं । दाॊऩत्म जीवन भं थोडी सभसाएॊ होने ऩय
सुझ-फुझ से सुरझाने का प्रमास कयं । व्मसनो से दयू यहे ।

कन्मा: 1 से 15 जून 2013 : अनािश्मक खिा कयने से फिे अन्मथा फडा आसथाक
नुकसान हो सकता हं । साझेदायी से धनराब की प्रासद्ऱ होगी। उन्नसत के सरए आऩको
अऩनी भहत्वऩूणा मोजनाओॊ को मथा शीघ्र अभर भं राना िाफहए। अन्मथा आऩके
प्रसतमोगी आऩसे आगे सनकर सकते हं । जीवनसाथी का स्वास््म सिॊताजनक हो
सकता हं । त्रवऩयीत सरॊग के प्रसत आऩका आकषाण असधक यहे गा।
16 से 30 जून 2013 : नए व्मावसासमक राब प्राद्ऱ हो सकते हं । अऩने दै सनक कामा भं
आऩ उजाा व उसाह की कभी भहसूस कय सकते हं इस सरए सकायात्भक द्दष्टीकोण
अऩनाए। शिु ऩऺ से झूठा आयोऩ रग सकते हं । ऩरयवाय भं बी करेश फढ़ सकता हं । अऩने त्रप्रमजनो से वाद-त्रववाद भं
उरझने से फिने का प्रमास कये । नमे रोगो से सभिता होगी।

80

जून 2013

तुरा: 1 से 15 जून 2013 : नौकयी भं हं तो स्थानाॊतय हो सकता हं मा नई नौकयी प्राद्ऱ हो सकती हं , व्मवसाम भं हं
तो उन्नती के नए भागा प्राद्ऱ हंगे। अऩने उच्िासधकायी एव्भ सहकभािायी के फीि आऩ
अऩने कामा का अच्छा प्रदशान कयने भं ऩूणरु
ा ऩ से सभथा हंगे। जीवनसाथी से ऩूणा
सहमोग की प्रासद्ऱ होगी। ऩरयवाय भं खुसशमो का भाहोर यहे गा औय ऩरयवाय भं फकसी नमे
सदस्म की वृत्रद्ध होने के मोग फन यहे हं ।
16 से 30 जून 2013 : इस भाह आऩके अॊदय यिनात्भक कामा कयने की ऺभता का
त्रवकास होगा। आसथाक स्स्थसत भं ऩूवा की अऩऺा भं सुधाय होगा। अऩने कामा ऺेि भं
त्रवऩयीत सरॊग के प्रसत आऩका आकषाण आऩके सरए ऩये शानी खडी कय सकता हं अत्
अऩने त्रविायं को शुद्ध यखे। सभि एवॊ ऩरयवाय के रोगो का सहमोग प्राद्ऱ होगा। आऩको ऩेट के योग के कायण ऩीडा हो
सकती हं ।

वृस्श्चक: 1 से 15 जून 2013 : नौकयी से सॊफॊसधत कामा भं नमे फदराव हो सकते हं , व्मवसाम भं
हं तो उन्नती के नए भागा प्राद्ऱ हंगे। व्मवसामीक मािाएॊ सपर होगी। ऩारयवारयक भाहोर छोटीछोटी घटनाओॊ के कायण तनावऩूणा हो सकता हं । ऩरयवाय भं भाॊगसरक कामा हो सकते हं एवॊ शुब
सभािाय की प्रासद्ऱ हो सकती हं । अऩने खाने-ऩीने का त्रवशेष ध्मान यखे अन्मथा आऩका का
स्वास््म नयभ हो सकता हं ।
16 से 30 जून 2013 : मफद आऩ नौकयी भं हं तो ऩदौन्नसत हो सकती हं । बूसभ-बवन के क्रम
त्रवक्रम से धन राब होगा। कामाऺेि भं आऩके जोश एवॊ उत्साह भं वृत्रद्ध होने से आऩको
भनोनुकूर राब प्राद्ऱ होगा। अऩनी वाणी एवॊ क्रोध ऩय सनमॊिण यखे अन्मथा आऩके फने फनामे कामा त्रफगड सकते हं । आऩके त्रवयोधी
एवॊ शिु ऩऺ ऩयास्त हंगे। असधक सभम अऩने जीवन साथी के साथ त्रफताने का प्रमास कये ।

धनु: 1 से 15 जून 2013 : नौकयी-व्मवसाम भं उन्नसत के मोग फन यहे हं । धनराब के उत्तभ मोग फन यहे हं साथ ही अनावश्मक
खिा बी फढ़ सकता हं । भहत्व के कामो के सरमे इष्ट सभिं एवॊ सॊफॊधीमं से आऩको कजा रेना ऩड
सकता हं । भौसभ के फदराव से आऩको सदॊ-जुकाभ की सभस्मा हो सकती हं । त्रवऩयीत सरॊग के
प्रसत आऩका असधक आकषाण आऩकी भानससक शाॊसत छीन सकता हं ।
16 से 30 जून 2013 : धन सॊफॊधी ऩूयानी सभस्माओॊ का सभाधान सॊबव हं । बूसभ-बवन से
सॊफॊसधत भाभरो भं आऩकी भहत्वऩूणा रुसि हो सकती हं । दाॊऩत्म जीवन सुखभम यहे गा।
ऩरयवाय भं फकसी सदस्म के स्जद्दी स्वबाव के कायण आऩके ऩरयवाय भं भानससक अशाॊसत का
भाहोर हो सकता हं । प्रेभ प्रसॊग भं सपरता प्राद्ऱ होगी, अनैसतक कभा व अनुसित कामो से फिे।

81

जून 2013

भकय: 1 से 15 जून 2013 : कामाऺेि भं अत्मसधक बागदौड़ के कायण आऩको उजाा व उसाह की कभी भहसूस हो सकती हं ।
व्मवसासमक मािा राबदामक ससद्ध होगी। आऩ अत्रववाफहत हं तो त्रववाह के उत्तभ मोग फन यहे हं ।
ऩरयवाय के फकसी सदस्मके साथ भं भतबेद सॊबव हं । अऩने खाने-ऩीने का त्रवशेष ध्मान यखे
अन्मथा आऩका का स्वास््म नयभ हो सकता हं ।
16 से 30 जून 2013 : नौकयी से सॊफॊसधत कामा भं नमे फदराव हो सकते हं , व्मवसाम भं हं तो
उन्नती के नए भागा प्राद्ऱ हंगे। बूसभ-बवन से सॊफॊसधत भाभरं भं त्रवरॊफ सॊबव हं । आऩके
बौसतक सुख साधनो भं वृत्रद्ध होगी। स्वास््म सुख भं वृत्रद्ध होगी फपय बी खाने- ऩीने का त्रवशेष
ध्मान यखना फहतकायी यहे गा। जीवन साथी से ऩूणस
ा हमोग प्राद्ऱ होगा।

कॊु ब: 1 से 15 जून 2013 : फकमे गमे ऩूॊस्ज सनवेश द्राया आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ के मोग फन यहे हं ।
भहत्वऩूणा कामा एवॊ मोजनाओॊ को ऩूणा कयने हे तु सभम उत्तभ हं । कामाऺेि की सभस्माकं दयू
कयने भं आऩ ऩूणा रुऩ से सभथा हंगे हं । घय ऩरयवाय भं भाॊगसरक कामा सॊऩन्न होने के अच्छे मोग
हं । खान-ऩान का त्रवशेष ध्मान यखं अन्मथा ऩूयाने योगो के कायण रॊफे सभम के सरए कष्ट सॊबव
हं ।
16 से 30 जून 2013 : नौकयी-व्मवसाम से सॊफॊसधत कामो से जुडे रोगो के सरए सभम भध्मभ
राब दे ने वारा यहे गा। िर-अिर सॊऩत्रत्त भं ऩूॊस्जसनवेश कयने के सरए सभम उत्तभ ससद्ध हो सकता हं । ऩरयवाय भं फकसी सदस्म के
स्जद्दी स्वबाव के कायण आऩके ऩरयवाय भं भानससक अशाॊसत का भाहोर हो सकता हं । जीवन साथी से ऩूणा सहमोग प्राद्ऱ होगा।

भीन: 1 से 15 जून 2013 : नौकयी-व्मवसाम से सॊफॊसधत कामो भं सपरता के मोग हं । धनराब
के उत्तभ मोग फन यहे हं साथ ही अनावश्मक खिा बी फढ़ सकता हं । भहत्व के कामो भं इष्ट सभिं
एवॊ सॊफॊधीमं से सहमोग सभरेगा। दाॊऩत्म जीवन भं थोडा तनाव सॊबव हं । शिु आऩके उऩय हात्रव
होने का असपर प्रमास कय सकते हं । दाॊऩत्म जीवन सुख भं वृत्रद्ध के अच्छे सॊकेत हं ।
16 से 30 जून 2013 : मफद आऩ नौकयी भं हं तो अऩने कामा का अच्छा प्रदशान कयने भं सभथा
हंगे। आम से व्मम असधक होने के मोग फन यहे हं इस सरए व्मम ऩय सनमन्िण यखने का प्रमास
कयं । दयू स्थ स्थानो की धासभाक मािाएॊ सपर हो सकती हं ।जीवनसाथी से ऩूणा सुख की प्रासद्ऱ
होगी। मफद आऩ अत्रववाफहत हं तो त्रववाह के फॊधन भं जल्द ही फॊध सकते हं ।

जून 2013

82

जून 2013 भाससक ऩॊिाॊग
फद

वाय

भाह

ऩऺ

सतसथ

1

शसन

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण अष्टभी

12:04:48

2

यत्रव

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण नवभी

3

सोभ

ज्मेष्ठ

4

नऺि

कयण

सभासद्ऱ

िॊि

सभासद्ऱ

मोग

सभासद्ऱ

शतसबषा

06:52:36

त्रवषकुॊब

18:06:40

कौरव

12:04:48

कुॊब

25:03:00

11:50:32

ऩूवााबािऩद

07:12:06

प्रीसत

17:02:43

गय

11:50:32

भीन

-

कृ ष्ण दशभी

12:16:37

उत्तयाबािऩद

08:11:55

आमुष्भान 16:29:44 त्रवत्रष्ट

12:16:37

भीन

-

भॊगर ज्मेष्ठ

कृ ष्ण एकादशी

13:19:16

ये वसत

09:47:24

सौबाग्म

16:24:54

फारव

13:19:16

भीन

09:48:00

5

फुध

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण द्रादशी

14:51:01

अस्श्वनी

11:54:46

शोबन

16:42:35

तैसतर

14:51:01

भेष

-

6

गुरु

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण िमोदशी

16:48:06

बयणी

14:24:40

असतगॊड

17:18:06

वस्णज

16:48:06

भेष

21:05:00

7

शुक्र

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण ितुदाशी

19:02:05

कृ सतका

17:12:24

सुकभाा

18:06:46

त्रवत्रष्ट

05:52:42

वृष

-

8

शसन

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण अभावस्मा 21:27:20 योफहस्ण

20:10:27

धृसत

19:03:54

ितुष्ऩाद 08:13:16 वृष

-

9

यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र प्रसतऩदा

23:56:21

भृगसशया

23:13:14

शूर

20:05:44

फकस्तुघ्न 10:41:21 वृष

09:41:00

ज्मेष्ठ

शुक्र फद्रतीमा

26:25:24

आिा

26:16:01

गॊड

21:07:35

फारव

13:11:20

सभथुन

-

11 भॊगर ज्मेष्ठ

शुक्र तृतीमा

28:46:58

ऩुनवासु

29:12:17

वृत्रद्ध

22:04:47

तैसतर

15:36:39

सभथुन

22:29:00

12 फुध

ज्मेष्ठ

शुक्र ितुथॉ

30:55:26

ऩुष्म

31:55:26

ध्रुव

22:54:30

वस्णज

17:52:37

कका

-

13 गुरु

ज्मेष्ठ

शुक्र ितुथॉ

06:55:29

ऩुष्म

07:55:29

व्माघात

23:29:14

त्रवत्रष्ट

06:55:29

कका

-

14 शुक्र

ज्मेष्ठ

शुक्र ऩॊिभी

08:43:21

आश्लेषा

10:18:03

हषाण

23:44:18

फारव

08:43:21

कका

10:18:00

15 शसन

ज्मेष्ठ

शुक्र षष्ठी

10:02:12

भघा

12:13:27

वज्र

23:33:08

तैसतर

10:02:12

ससॊह

-

16 यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र सद्ऱभी

10:47:18

ऩूवाापाल्गुनी

13:33:14

ससत्रद्ध

22:52:56

वस्णज

10:47:18

ससॊह

19:48:00

17 सोभ

ज्मेष्ठ

शुक्र अष्टभी

10:50:15

उत्तयापाल्गुनी

14:13:41

व्मसतऩात

21:39:56

फव

10:50:15

कन्मा

-

18 भॊगर ज्मेष्ठ

शुक्र नवभी

10:10:05

हस्त

14:11:01

वरयमान

19:49:27

कौरव

10:10:05

कन्मा

25:52:00

19 फुध

ज्मेष्ठ

शुक्र दशभी

08:44:56

सििा

13:22:26

ऩरयग्रह

17:23:22

गय

08:44:56

तुरा

-

20 गुरु

ज्मेष्ठ

शुक्र एकादशी

06:35:44

स्वाती

11:52:37

सशव

14:23:33

त्रवत्रष्ट

06:35:44

तुरा

28:21:00

10 सोभ

सभासद्ऱ

यासश

सभासद्ऱ

जून 2013

83

21 शुक्र

ज्मेष्ठ

शुक्र िमोदशी

24:33:08

त्रवशाखा

09:47:12

ससद्ध

10:55:38

कौरव

14:15:19

वृस्श्चक

-

22 शसन

ज्मेष्ठ

शुक्र ितुदाशी

20:53:59

अनुयाधा

07:12:44

साध्म

07:02:25

गय

10:46:29

वृस्श्चक

28:17:00

23 यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र ऩूस्णाभा

17:02:39

भूर

25:13:54

शुक्र

22:36:24

त्रवत्रष्ट

06:59:51

धनु

-

24 सोभ

आषाढ़

कृ ष्ण प्रसतऩदा

13:08:32

ऩूवााषाढ़

22:13:13

ब्रह्म

18:19:47

कौरव

13:08:32

धनु

27:29:00

25 भॊगर आषाढ़

कृ ष्ण फद्रतीमा

09:22:52

उत्तयाषाढ़

19:24:45

इन्ि

14:14:26

गय

09:22:52

भकय

-

26 फुध

आषाढ़

कृ ष्ण तृतीमा

05:57:51

श्रवण

17:02:32

वैधसृ त

10:25:02

त्रवत्रष्ट

05:57:51

भकय

28:04:00

27 गुरु

आषाढ़

कृ ष्ण ऩॊिभी

24:44:06

धसनष्ठा

15:15:02

त्रवषकुॊब

07:03:47

कौरव

13:46:54

कुॊब

-

28 शुक्र

आषाढ़

कृ ष्ण षष्ठी

23:09:44

शतसबषा

14:08:48

आमुष्भान 26:04:06 गय

11:50:59

कुॊब

-

29 शसन

आषाढ़

कृ ष्ण सद्ऱभी

22:27:53

ऩूवााबािऩद

13:51:19

सौबाग्म

24:33:30

त्रवत्रष्ट

10:42:53

कुॊब

07:52:00

30 यत्रव

आषाढ़

कृ ष्ण अष्टभी

22:32:55

उत्तयाबािऩद

14:23:33

शोबन

23:41:22

फारव

10:23:33

भीन

-

शसन ऩीड़ा सनवायक
सॊऩूणा प्राणप्रसतत्रष्ठत 22 गेज शुद्ध स्टीर भं सनसभात अखॊफडत ऩौरुषाकाय शसन मॊि
ऩुरुषाकाय शसन मॊि (स्टीर भं) को तीव्र प्रबावशारी फनाने हे तु शसन की कायक धातु शुद्ध स्टीर(रोहे ) भं फनामा गमा
हं । स्जस के प्रबाव से साधक को तत्कार राब प्राद्ऱ होता हं । मफद जन्भ कुॊडरी भं शसन प्रसतकूर होने ऩय व्मत्रक्त को
अनेक कामं भं असपरता प्राद्ऱ होती है , कबी व्मवसाम भं घटा, नौकयी भं ऩये शानी, वाहन दघ
ा ना, गृह क्रेश आफद
ु ट

ऩये शानीमाॊ फढ़ती जाती है ऐसी स्स्थसतमं भं प्राणप्रसतत्रष्ठत ग्रह ऩीड़ा सनवायक शसन मॊि की अऩने को व्मऩाय स्थान मा
घय भं स्थाऩना कयने से अनेक राब सभरते हं । मफद शसन की ढै ़मा मा साढ़े साती का सभम हो तो इसे अवश्म ऩूजना
िाफहए। शसनमॊि के ऩूजन भाि से व्मत्रक्त को भृत्मु, कजा, कोटा केश, जोडो का ददा , फात योग तथा रम्फे सभम के सबी

प्रकाय के योग से ऩये शान व्मत्रक्त के सरमे शसन मॊि असधक राबकायी होगा। नौकयी ऩेशा आफद के रोगं को ऩदौन्नसत
बी शसन द्राया ही सभरती है अत् मह मॊि असत उऩमोगी मॊि है स्जसके द्राया शीघ्र ही राब ऩामा जा सकता है ।

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GURUTVA KARYALAY
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जून 2013

84

जून-2013 भाससक व्रत-ऩवा-त्मौहाय
फद

वाय

भाह

ऩऺ

सतसथ

सभासद्ऱ

प्रभुख व्रत-त्मोहाय
श्रीत्रिरोकनाथाष्टभी (ऩ.फॊ), शीतराष्टभी-फसौड़ा, दादाबाई नौयोजी

1

शसन

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

अष्टभी

12:04:48

2

यत्रव

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

नवभी

11:50:32

नवतऩा सभाद्ऱ

3

सोभ

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

दशभी

12:16:37

-

4

भॊगर

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

एकादशी

13:19:16

5

फुध

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

द्रादशी

14:51:01

प्रदोष व्रत, त्रवश्व ऩमाावयण फदवस, गुरु गोरवरकय स्भृसतफदवस

6

गुरु

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

िमोदशी

16:48:06

भाससक सशवयात्रि व्रत, त्रिफदवसीम वटसात्रविी व्रत प्रायॊ ब (उ.बा)

7

शुक्र

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

ितुदाशी

19:02:05

सात्रविी ितुदाशी (ऩ.फॊ),

स्भृसतफदवस, फार-सुयऺा फदवस

अिरा एकादशी व्रत, अऩया एकादशी व्रत, बिकारी ग्मायस (ऩॊजाफ),
जरक्रीड़ा एकादशी (ओफड़सा)

शसन जमॊती, शनैश्चयी अभावस्मा, शसन अभावस्मा, स्नान-दान-श्राद्ध
8

शसन

ज्मेष्ठ

कृ ष्ण

अभावस्मा

21:27:20

हे तु उत्तभ ज्मेष्ठी अभावस्मा, वटसाविी अभावस्मा (फयगदाही अभावस),
बावुका अभावस, परहारयणी कासरका ऩूजा (ऩ.फॊ),
गॊगा दशहया-स्नान प्रायॊ ब (दशाश्वभेध घाट, वायाणसी भं), कयवीय व्रत,

9

यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र

प्रसतऩदा

23:56:21

10

सोभ

ज्मेष्ठ

शुक्र

फद्रतीमा

26:25:24

नवीन िन्ि-दशान, सोऩऩदा फद्रतीमा, दृत्रष्टदान सॊकल्ऩ फदवस

11

भॊगर

ज्मेष्ठ

शुक्र

तृतीमा

28:46:58

यम्बा तृतीमा व्रत, भहायाणा प्रताऩ जमन्ती, रवण तृतीमा

12

फुध

ज्मेष्ठ

शुक्र

ितुथॉ

30:55:26

13

गुरु

ज्मेष्ठ

शुक्र

ितुथॉ

06:55:29

त्रफयसा भुण्डा शहीद फदवस

वयदत्रवनामक ितुथॉ व्रत (िॊ.अ.या.9:39), उभाितुथॉ (ऩ.फॊ,
ओफड़सा), फारश्रभ सनषेध फदवस
ऊधभससॊह शहीद फदवस
सूमा की सभथुन-सॊक्रास्न्त शेष यात्रि 4.54 फजे, स्कन्दषष्ठी व्रत,

14

शुक्र

ज्मेष्ठ

शुक्र

ऩॊिभी

08:43:21

भहादे व त्रववाह (ओफड़सा), त्रवॊध्मवाससनी षष्ठी व्रत-ऩूजन
(प्रािीनभतानुसाय), साॊई टे ऊॊयाभ की ऩुण्मसतसथ
अयण्मषष्ठी व्रत-ऩूजा, आधुसनक दृश्म-गस्णतानुसाय त्रवन्ध्मवाससनी

15

शसन

ज्मेष्ठ

शुक्र

षष्ठी

10:02:12

भहाऩूजा, जभाई षष्ठी (ऩ.फॊ), शीतरा षष्ठी (ओफड़सा), सभथुन
(याजस) सॊक्रास्न्त के स्नान-दान का ऩुण्मकार फदन 11.18 फजे तक,

85

16

यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र

सद्ऱभी

10:47:18

17

सोभ

ज्मेष्ठ

शुक्र

अष्टभी

10:50:15

जून 2013

फड़ ऩूजा, बानु-सद्ऱभी ऩवा प्रात: 10.46 फजे तक

(सूमग्र
ा हणतुल्म

परप्रद), Father’s Day

श्रीदग
ु ााष्टभी व्रत, श्रीअन्नऩूणााष्टभी व्रत, ज्मेष्ठाष्टभी, धूभावती
भहात्रवद्या जमन्ती, शुक्रादे वी-ऩूजा

गॊगा-दशहया का मोग एवॊ ऩवा-स्नान प्रात: 10.09 फजे से,
18

भॊगर

ज्मेष्ठ

शुक्र

नवभी

10:10:05

सेतुफन्ध याभेश्वय प्रसतष्ठाफदवस, भहायानी रक्ष्भीफाई फसरदान
फदवस, भहत्रषा गारवजी अवतयण फदवस

19

फुध

ज्मेष्ठ

शुक्र

दशभी

08:44:56

सनजारा एकादशी व्रत (स्भाता), रुस्क्भणीहयण रीरा (भथुया),
फटु कबैयव जमॊती, काशी त्रवश्वनाथ करशमािा फदवस,
सनजारा एकादशी व्रत (वैष्णव), बीभसेनी एकादशी, त्रिस्ऩृशा

20

गुरु

ज्मेष्ठ

शुक्र

एकादशी

06:35:44

भहाद्रादशी व्रत, कूभा द्रादशी, िम्ऩक द्रादशी (ऩ.फॊ), त्रित्रवक्रभ
द्रादशी (सभसथ.), श्माभफाफा द्रादशी, रुस्क्भणी त्रववाह (ओड़ीसा),
गामिी जमन्ती (भतान्तय से), सॊबाजी भहायाज जमॊती
प्रदोष व्रत, सशवयाज शक सम्वत 340 प्रायॊ ब, वटसात्रविी व्रत 3

21

शुक्र

ज्मेष्ठ

शुक्र

िमोदशी

24:33:08

फदन (गुज, द.बा), गौतभेश्वय-दशान, सूमा सामन कका भं प्रात:
10.35 फजे, सौय वषाा ऋतु-दस्ऺणामन प्रायॊ ब, अमन ऩवाकार
सूमोदम से सामॊ 4.35 फजे तक, सूमा आिरा भं शेष यात्रि 4.34 फजे

22

शसन

ज्मेष्ठ

शुक्र

ितुदाशी

20:53:59

काभाख्मा दे वी की अम्फुवािी प्रवृत्रत्त, िम्ऩक ितुदाशी (ऩ.फॊ),
ऩूस्णाभा व्रत, श्रीसत्मनायामण ऩूजा-कथा, अमन करयफदन
स्नान-दान हे तु ज्मेष्ठी ऩूस्णाभा, वटसात्रविी ऩूस्णाभा, दे व-स्नान

23

यत्रव

ज्मेष्ठ

शुक्र

ऩूस्णाभा

17:02:39

ऩूस्णाभा (ऩ.फॊ, ओड़ीसा), त्रफल्वत्रियाि व्रत प्रायॊ ब, सयमू जमॊती
(अमोध्मा), सॊत कफीय जमॊती, डा. श्माभा प्रसाद भुखजॉ स्भृसतफदवस

24

सोभ

आषाढ़

कृ ष्ण

प्रसतऩदा

13:08:32

यानी दग
ु ाावती फसरदान फदवस

25

भॊगर

आषाढ़

कृ ष्ण

फद्रतीमा

09:22:52

काभाख्मा अम्फुवािी सनवृत्रत्त

26

फुध

आषाढ़

कृ ष्ण

तृतीमा

05:57:51

सॊकष्टी श्रीगणेश ितुथॉ व्रत (िॊ.उ.या.9:29),

27

गुरु

आषाढ़

कृ ष्ण

ऩॊिभी

24:44:06

नागऩॊिभी (ऩ.फॊ), भधुभेह जागृसत फदवस

28

शुक्र

आषाढ़

कृ ष्ण

षष्ठी

23:09:44

-

29

शसन

आषाढ़

कृ ष्ण

सद्ऱभी

22:27:53

-

30

यत्रव

आषाढ़

कृ ष्ण

अष्टभी

22:32:55

काराष्टभी व्रत, शीतराष्टभी, फोहयाष्टभी

जून 2013

86

गणेश रक्ष्भी मॊि
प्राण-प्रसतत्रष्ठत गणेश रक्ष्भी मॊि को अऩने घय-दक
ु ान-ओफपस-पैक्टयी भं ऩूजन स्थान, गल्रा मा अरभायी भं स्थात्रऩत
कयने व्माऩाय भं त्रवशेष राब प्राद्ऱ होता हं । मॊि के प्रबाव से बाग्म भं उन्नसत, भान-प्रसतष्ठा एवॊ

व्माऩाय भं वृत्रद्ध होती

हं एवॊ आसथाक स्स्थभं सुधाय होता हं । गणेश रक्ष्भी मॊि को स्थात्रऩत कयने से बगवान गणेश औय दे वी रक्ष्भी का

Rs.730 से Rs.10900 तक

सॊमुक्त आशीवााद प्राद्ऱ होता हं ।

भॊगर मॊि से ऋण भुत्रक्त
भॊगर मॊि को जभीन-जामदाद के त्रववादो को हर कयने के काभ भं राब दे ता हं , इस के असतरयक्त व्मत्रक्त को ऋण
भुत्रक्त हे तु भॊगर साधना से असत शीध्र राब प्राद्ऱ होता हं ।

त्रववाह आफद भं भॊगरी जातकं के कल्माण के सरए भॊगर

मॊि की ऩूजा कयने से त्रवशेष राब प्राद्ऱ होता हं । प्राण प्रसतत्रष्ठत भॊगर मॊि के ऩूजन से बाग्मोदम, शयीय भं खून की
कभी, गबाऩात से फिाव, फुखाय, िेिक, ऩागरऩन, सूजन औय घाव, मौन शत्रक्त भं वृत्रद्ध, शिु त्रवजम, तॊि भॊि के दष्ट
ु प्रबा,

भूल्म भाि Rs- 730

बूत-प्रेत बम, वाहन दघ
ा नाओॊ, हभरा, िोयी इत्मादी से फिाव होता हं ।
ु ट

कुफेय मॊि
कुफेय मॊि के ऩूजन से स्वणा राब, यत्न राब, ऩैतक
ृ सम्ऩत्ती एवॊ गड़े हुए धन से राब प्रासद्ऱ फक काभना कयने वारे

व्मत्रक्त के सरमे कुफेय मॊि अत्मन्त सपरता दामक होता हं । एसा शास्त्रोक्त विन हं । कुफेय मॊि के ऩूजन से एकासधक
स्त्रोि से धन का प्राद्ऱ होकय धन सॊिम होता हं ।

ताम्र ऩि ऩय सुवणा ऩोरीस

ताम्र ऩि ऩय यजत ऩोरीस

ताम्र ऩि ऩय

(Gold Plated)

(Silver Plated)

(Copper)

साईज
1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

भूल्म
460
820
1650
2350
3600
6400
10800

साईज

भूल्म

साईज

भूल्म

1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

370
640
1090
1650
2800
5100
8200

1” X 1”
2” X 2”
3” X 3”
4” X 4”
6” X 6”
9” X 9”
12” X12”

255
460
730
1090
1900
3250
6400

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87

जून 2013

नवयत्न जफड़त श्री मॊि
शास्त्र विन के अनुसाय शुद्ध सुवणा मा यजत भं सनसभात श्री मॊि के िायं औय मफद नवयत्न जड़वा ने ऩय मह नवयत्न
जफड़त श्री मॊि कहराता हं । सबी यत्नो को उसके सनस्श्चत स्थान ऩय जड़ कय रॉकेट के रूऩ भं धायण कयने से व्मत्रक्त को
अनॊत एश्वमा एवॊ रक्ष्भी की प्रासद्ऱ होती हं । व्मत्रक्त को एसा आबास होता हं जैसे भाॊ रक्ष्भी उसके साथ हं । नवग्रह को
श्री मॊि के साथ रगाने से ग्रहं की अशुब दशा का धायण कयने वारे व्मत्रक्त ऩय प्रबाव नहीॊ होता हं । गरे भं होने के
कायण मॊि ऩत्रवि यहता हं एवॊ स्नान कयते सभम इस मॊि ऩय स्ऩशा कय जो जर त्रफॊद ु शयीय को रगते हं , वह गॊगा
जर के सभान ऩत्रवि होता हं । इस सरमे इसे सफसे तेजस्वी एवॊ परदासम कहजाता हं । जैसे अभृत से उत्तभ कोई

औषसध नहीॊ, उसी प्रकाय रक्ष्भी प्रासद्ऱ के सरमे श्री मॊि से उत्तभ कोई मॊि सॊसाय भं नहीॊ हं एसा शास्त्रोक्त विन हं । इस
प्रकाय के नवयत्न जफड़त श्री मॊि गुरूत्व कामाारम द्राया शुब भुहूता भं प्राण प्रसतत्रष्ठत कयके फनावाए जाते हं ।

अष्ट रक्ष्भी कवि
अष्ट रक्ष्भी कवि को धायण कयने से व्मत्रक्त ऩय सदा भाॊ भहा रक्ष्भी की कृ ऩा एवॊ आशीवााद फना

यहता हं । स्जस्से भाॊ रक्ष्भी के अष्ट रुऩ (१)-आफद रक्ष्भी, (२)-धान्म रक्ष्भी, (३)-धैयीम रक्ष्भी, (४)गज रक्ष्भी, (५)-सॊतान रक्ष्भी, (६)-त्रवजम रक्ष्भी, (७)-त्रवद्या रक्ष्भी औय (८)-धन रक्ष्भी इन सबी
रुऩो का स्वत् अशीवााद प्राद्ऱ होता हं ।

भूल्म भाि: Rs-1250

भॊि ससद्ध व्माऩाय वृत्रद्ध कवि
व्माऩाय वृत्रद्ध कवि व्माऩाय भं शीघ्र उन्नसत के सरए उत्तभ हं । िाहं कोई बी व्माऩाय हो अगय उसभं राब के स्थान ऩय
फाय-फाय हासन हो यही हं । फकसी प्रकाय से व्माऩाय भं फाय-फाय फाधाएॊ उत्ऩन्न हो यही हो! तो सॊऩण
ू ा प्राण प्रसतत्रष्ठत
भॊि ससद्ध ऩूणा िैतन्म मुक्त व्माऩाय वृत्रद्ध मॊि को व्मऩाय स्थान मा घय भं स्थात्रऩत कयने से शीघ्र ही व्माऩाय भं वृत्रद्ध

भूल्म भाि: Rs.730 & 1050

एवॊ सनतन्तय राब प्राद्ऱ होता हं ।

भॊगर मॊि
(त्रिकोण) भॊगर मॊि को जभीन-जामदाद के त्रववादो को हर कयने के काभ भं राब दे ता हं , इस के असतरयक्त व्मत्रक्त को
ऋण भुत्रक्त हे तु भॊगर साधना से असत शीध्र राब प्राद्ऱ होता हं । त्रववाह आफद भं भॊगरी जातकं के कल्माण के सरए
भॊगर मॊि की ऩूजा कयने से त्रवशेष राब प्राद्ऱ होता हं ।

भूल्म भाि Rs- 730
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88

जून 2013

त्रववाह सॊफॊसधत सभस्मा
क्मा आऩके रडके-रडकी फक आऩकी शादी भं अनावश्मक रूऩ से त्रवरम्फ हो यहा हं मा उनके वैवाफहक जीवन भं खुसशमाॊ कभ
होती जायही हं औय सभस्मा असधक फढती जायही हं । एसी स्स्थती होने ऩय अऩने रडके-रडकी फक कुॊडरी का अध्ममन
अवश्म कयवारे औय उनके वैवाफहक सुख को कभ कयने वारे दोषं के सनवायण के उऩामो के फाय भं त्रवस्ताय से जनकायी प्राद्ऱ
कयं ।

सशऺा से सॊफॊसधत सभस्मा
क्मा आऩके रडके-रडकी की ऩढाई भं अनावश्मक रूऩ से फाधा-त्रवघ्न मा रुकावटे हो यही हं ? फच्िो को अऩने ऩूणा ऩरयश्रभ
एवॊ भेहनत का उसित पर नहीॊ सभर यहा? अऩने रडके-रडकी की कुॊडरी का त्रवस्तृत अध्ममन अवश्म कयवारे औय
उनके त्रवद्या अध्ममन भं आनेवारी रुकावट एवॊ दोषो के कायण एवॊ उन दोषं के सनवायण के उऩामो के फाय भं त्रवस्ताय से
जनकायी प्राद्ऱ कयं ।

क्मा आऩ फकसी सभस्मा से ग्रस्त हं ?
आऩके ऩास अऩनी सभस्माओॊ से छुटकाया ऩाने हे तु ऩूजा-अिाना, साधना, भॊि जाऩ इत्माफद कयने का सभम नहीॊ हं ?
अफ आऩ अऩनी सभस्माओॊ से फीना फकसी त्रवशेष ऩूजा-अिाना, त्रवसध-त्रवधान के आऩको अऩने कामा भं सपरता प्राद्ऱ
कय सके एवॊ आऩको अऩने जीवन के सभस्त सुखो को प्राद्ऱ कयने का भागा प्राद्ऱ हो सके इस सरमे गुरुत्व कामाारत
द्राया हभाया उद्दे श्म शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से त्रवसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्राया ससद्ध प्राण-प्रसतत्रष्ठत ऩूणा िैतन्म मुक्त त्रवसबन्न प्रकाय के
मन्ि- कवि एवॊ शुब परदामी ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न आऩके घय तक ऩहोिाने का हं ।

ज्मोसतष सॊफॊसधत त्रवशेष ऩयाभशा
ज्मोसत त्रवऻान, अॊक ज्मोसतष, वास्तु एवॊ आध्मास्त्भक ऻान सं सॊफॊसधत त्रवषमं भं हभाये 30 वषो से असधक वषा के
अनुबवं के साथ ज्मोसतस से जुडे नमे-नमे सॊशोधन के आधाय ऩय आऩ अऩनी हय सभस्मा के सयर सभाधान प्राद्ऱ कय
सकते हं । >> Order Now

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ओनेक्स
जो व्मत्रक्त ऩन्ना धायण कयने भे असभथा हो उन्हं फुध ग्रह के उऩयत्न ओनेक्स को धायण कयना िाफहए।

उच्ि सशऺा प्रासद्ऱ हे तु औय स्भयण शत्रक्त के त्रवकास हे तु ओनेक्स यत्न की अॊगूठी को दामं हाथ की सफसे छोटी
उॊ गरी मा रॉकेट फनवा कय गरे भं धायण कयं । ओनेक्स यत्न धायण कयने से त्रवद्या-फुत्रद्ध की प्रासद्ऱ हो होकय स्भयण

शत्रक्त का त्रवकास होता हं ।

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जून 2013

89

जून 2013 -त्रवशेष मोग
कामा ससत्रद्ध मोग
2

प्रात: 7:12 से फदन-यात

21

प्रात: 9:46 से 22 जून को यात्रि 8:53 तक

4

प्रात: 9:47 से फदन-यात

23

सूमोदम से यात्रि 1:14 तक

8

सूमोदम से यात्रि 8:09 तक

27

सूमोदम से यात्रि 12:42 तक

13

सूमोदम से प्रात: 7:54 तक

28

सूमोदम से यात्रि 11:09 तक

16

फदन 1:32 से यातबय

30

सूमोदम से फदन 2:22 तक

त्रिऩुष्कय (तीनगुना पर) मोग
25

सूमोदम से प्रात: 9:22 तक

29

सूमोदम से फदन 1:51 तक

गुरु-ऩुष्माभृत मोग
13

सूमोदम से प्रात: 7:54 तक

त्रवघ्नकायक बिा
2

यात 12:03 से 3 जून को फदन 12:16 तक

19

सामॊ 7:39 से 20 जून को प्रात: 6:35 तक

6

सामॊ 4:47 से 7 जून को प्रात: 5:54 तक

22

यात्रि 8:53 से 23 जून को प्रात: 6:57 तक

12

सामॊ 5:50 से 13 जून प्रात: 6:54 तक

25

सामॊ 7:39 से 26 जून को प्रात: 5:56 तक

16

प्रात: 10:46 से यात्रि 10:47 तक

28

यात्रि 11:09 से 29 जून को प्रात: 10:48 तक

मोग पर :
 कामा ससत्रद्ध मोग भे फकमे गमे शुब कामा भे सनस्श्चत सपरता प्राद्ऱ होती हं , एसा शास्त्रोक्त विन हं ।
 गुरु ऩुष्माभृत मोग भं फकमे गमे फकमे गमे शुब कामा भे शुब परो की प्रासद्ऱ होती हं , एसा शास्त्रोक्त विन हं ।
 त्रिऩुष्कय मोग भं फकमे गमे शुब कामो का राब तीन गुना होता हं । एसा शास्त्रोक्त विन हं ।
 शास्त्रोक्त भत से त्रवघ्नकायक बिा मा बिा मोग भं शुब कामा कयना वस्जात हं ।

दै सनक शुब एवॊ अशुब सभम ऻान तासरका
वाय

गुसरक कार (शुब)

मभ कार (अशुब)

सभम अवसध

सभम अवसध

याहु कार (अशुब)
सभम अवसध

यत्रववाय

03:00 से 04:30

12:00 से 01:30

04:30 से 06:00

भॊगरवाय

12:00 से 01:30

09:00 से 10:30

03:00 से 04:30

06:00 से 07:30

01:30 से 03:00

01:30 से 03:00

09:00 से 10:30

सोभवाय
फुधवाय
गुरुवाय

शुक्रवाय

शसनवाय

01:30 से 03:00
10:30 से 12:00
09:00 से 10:30
07:30 से 09:00

06:00 से 07:30

10:30 से 12:00
07:30 से 09:00
03:00 से 04:30

07:30 से 09:00
12:00 से 01:30

10:30 से 12:00

जून 2013

90

फदन के िौघफडमे
सभम

यत्रववाय

सोभवाय

भॊगरवाय फुधवाय गुरुवाय

शुक्रवाय

शसनवाय

06:00 से 07:30

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

िर

कार

07:30 से 09:00

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

09:00 से 10:30

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

10:30 से 12:00

अभृत

योग

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

12:00 से 01:30

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

िर

01:30 से 03:00

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

03:00 से 04:30

योग

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

04:30 से 06:00

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

िर

कार

यात के िौघफडमे
सभम

यत्रववाय

सोभवाय

भॊगरवाय

फुधवाय गुरुवाय

शुक्रवाय

शसनवाय

06:00 से 07:30

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

09:00 से 10:30

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

10:30 से 12:00

योग

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

12:00 से 01:30

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

िर

01:30 से 03:00

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

03:00 से 04:30

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

शुब

िर

कार

04:30 से 06:00

शुब

िर

कार

उद्रे ग

अभृत

योग

राब

07:30 से 09:00

अभृत

योग

राब

शुब

िर

कार

उद्रे ग

शास्त्रोक्त भत के अनुशाय मफद फकसी बी कामा का प्रायॊ ब शुब भुहूता मा शुब सभम ऩय फकमा जामे तो कामा भं सपरता

प्राद्ऱ होने फक सॊबावना ज्मादा प्रफर हो जाती हं । इस सरमे दै सनक शुब सभम िौघफड़मा दे खकय प्राद्ऱ फकमा जा सकता हं ।

नोट: प्राम् फदन औय यात्रि के िौघफड़मे फक सगनती क्रभश् सूमोदम औय सूमाास्त से फक जाती हं । प्रत्मेक िौघफड़मे फक अवसध 1

घॊटा 30 सभसनट अथाात डे ढ़ घॊटा होती हं । सभम के अनुसाय िौघफड़मे को शुबाशुब तीन बागं भं फाॊटा जाता हं , जो क्रभश् शुब,
भध्मभ औय अशुब हं ।

* हय कामा के सरमे शुब/अभृत/राब का

िौघफडमे के स्वाभी ग्रह

शुब िौघफडमा

भध्मभ िौघफडमा

अशुब िौघफड़मा

िौघफडमा स्वाभी ग्रह

िौघफडमा स्वाभी ग्रह

िौघफडमा

स्वाभी ग्रह

शुब

गुरु

िय

उद्बे ग

सूमा

अभृत

िॊिभा

कार

शसन

राब

फुध

योग

भॊगर

शुक्र

िौघफड़मा उत्तभ भाना जाता हं ।

* हय कामा के सरमे िर/कार/योग/उद्रे ग
का िौघफड़मा उसित नहीॊ भाना जाता।

जून 2013

91

फदन फक होया - सूमोदम से सूमाास्त तक
वाय

1.घॊ

2.घॊ

3.घॊ

4.घॊ

5.घॊ

6.घॊ

7.घॊ

8.घॊ

9.घॊ

यत्रववाय

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

सोभवाय

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

भॊगरवाय

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

फुधवाय

फुध

िॊि

शसन

गुरु भॊगर सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

गुरुवाय

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

शुक्रवाय

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

शसनवाय

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

िॊि

िॊि
फुध

10.घॊ 11.घॊ 12.घॊ

यात फक होया – सूमाास्त से सूमोदम तक
यत्रववाय

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

सोभवाय

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

भॊगरवाय

शसन

गुरु

भॊगर

फुधवाय

सूमा

शुक्र

फुध

गुरुवाय

िॊि

शसन

गुरु

शुक्रवाय

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

गुरु भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

भॊगर सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शसन

गुरु

भॊगर

सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसनवाय

फुध

िॊि

शसन

गुरु भॊगर सूमा

शुक्र

फुध

िॊि

शसन

गुरु

भॊगर

िॊि

िॊि

होया भुहूता को कामा ससत्रद्ध के सरए ऩूणा परदामक एवॊ अिूक भाना जाता हं , फदन-यात के २४ घॊटं भं शुब-अशुब सभम
को सभम से ऩूवा ऻात कय अऩने कामा ससत्रद्ध के सरए प्रमोग कयना िाफहमे।

त्रवद्रानो के भत से इस्च्छत कामा ससत्रद्ध के सरए ग्रह से सॊफॊसधत होया का िुनाव कयने से त्रवशेष राब
प्राद्ऱ होता हं ।

 सूमा फक होया सयकायी कामो के सरमे उत्तभ होती हं ।
 िॊिभा फक होया सबी कामं के सरमे उत्तभ होती हं ।
 भॊगर फक होया कोटा -किेयी के कामं के सरमे उत्तभ होती हं ।
 फुध फक होया त्रवद्या-फुत्रद्ध अथाात ऩढाई के सरमे उत्तभ होती हं ।
 गुरु फक होया धासभाक कामा एवॊ त्रववाह के सरमे उत्तभ होती हं ।
 शुक्र फक होया मािा के सरमे उत्तभ होती हं ।
 शसन फक होया धन-िव्म सॊफॊसधत कामा के सरमे उत्तभ होती हं ।

जून 2013

92

ग्रह िरन जून -2013
Day
1

Sun

Mon

Ma

01:16:37

10:19:14

01:06:20

2

01:17:35

11:02:24

3

01:18:32

4

Me

Jup

Ven

Sat

Rah

Ket

Ua

Nep

Plu

02:07:04

02:00:12

02:03:23

06:11:50

06:22:36

00:22:36

11:17:37

10:11:18

08:16:58

01:07:03

02:08:38

02:00:26

02:04:37

06:11:47

06:22:36

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सवा योगनाशक मॊि/कवि
भनुष्म अऩने जीवन के त्रवसबन्न सभम ऩय फकसी ना फकसी साध्म मा असाध्म योग से ग्रस्त होता हं ।
उसित उऩिाय से ज्मादातय साध्म योगो से तो भुत्रक्त सभर जाती हं , रेफकन कबी-कबी साध्म योग होकय बी
असाध्म होजाते हं , मा कोइ असाध्म योग से ग्रससत होजाते हं । हजायो राखो रुऩमे खिा कयने ऩय बी असधक
राब प्राद्ऱ नहीॊ हो ऩाता। डॉक्टय द्राया फदजाने वारी दवाईमा अल्ऩ सभम के सरमे कायगय सात्रफत होती हं , एसी
स्स्थती भं राब प्रासद्ऱ के सरमे व्मत्रक्त एक डॉक्टय से दस
ू ये डॉक्टय के िक्कय रगाने को फाध्म हो जाता हं ।
बायतीम ऋषीमोने अऩने मोग साधना के प्रताऩ से योग शाॊसत हे तु त्रवसबन्न आमुवये औषधो के असतरयक्त
मॊि, भॊि एवॊ तॊि का उल्रेख अऩने ग्रॊथो भं कय भानव जीवन को राब प्रदान कयने का साथाक प्रमास हजायो
वषा ऩूवा फकमा था। फुत्रद्धजीवो के भत से जो व्मत्रक्त जीवनबय अऩनी फदनिमाा ऩय सनमभ, सॊमभ यख कय आहाय
ग्रहण कयता हं , एसे व्मत्रक्त को त्रवसबन्न योग से ग्रससत होने की सॊबावना कभ होती हं । रेफकन आज के
फदरते मुग भं एसे व्मत्रक्त बी बमॊकय योग से ग्रस्त होते फदख जाते हं । क्मोफक सभग्र सॊसाय कार के अधीन
हं । एवॊ भृत्मु सनस्श्चत हं स्जसे त्रवधाता के अरावा औय कोई टार नहीॊ सकता, रेफकन योग होने फक स्स्थती भं
व्मत्रक्त योग दयू कयने का प्रमास तो अवश्म कय सकता हं । इस सरमे मॊि भॊि एवॊ तॊि के कुशर जानकाय से
मोग्म भागादशान रेकय व्मत्रक्त योगो से भुत्रक्त ऩाने का मा उसके प्रबावो को कभ कयने का प्रमास बी अवश्म
कय सकता हं ।
ज्मोसतष त्रवद्या के कुशर जानकय बी कार ऩुरुषकी गणना कय अनेक योगो के अनेको यहस्म को
उजागय कय सकते हं । ज्मोसतष शास्त्र के भाध्मभ से योग के भूरको ऩकडने भे सहमोग सभरता हं , जहा
आधुसनक सिफकत्सा शास्त्र अऺभ होजाता हं वहा ज्मोसतष शास्त्र द्राया योग के भूर(जड़) को ऩकड कय उसका
सनदान कयना राबदामक एवॊ उऩामोगी ससद्ध होता हं ।
हय व्मत्रक्त भं रार यॊ गकी कोसशकाए ऩाइ जाती हं , स्जसका सनमभीत त्रवकास क्रभ फद्ध तयीके से होता
यहता हं । जफ इन कोसशकाओ के क्रभ भं ऩरयवतान होता है मा त्रवखॊफडन होता हं तफ व्मत्रक्त के शयीय भं
स्वास््म सॊफॊधी त्रवकायो उत्ऩन्न होते हं । एवॊ इन कोसशकाओ का सॊफॊध नव ग्रहो के साथ होता हं । स्जस्से योगो
के होने के कायण व्मत्रक्त के जन्भाॊग से दशा-भहादशा एवॊ ग्रहो फक गोिय स्स्थती से प्राद्ऱ होता हं ।
सवा योग सनवायण कवि एवॊ भहाभृत्मुॊजम मॊि के भाध्मभ से व्मत्रक्त के जन्भाॊग भं स्स्थत कभजोय एवॊ
ऩीफडत ग्रहो के अशुब प्रबाव को कभ कयने का कामा सयरता ऩूवक
ा फकमा जासकता हं । जेसे हय व्मत्रक्त को
ब्रह्माॊड फक उजाा एवॊ ऩृ्वी का गुरुत्वाकषाण फर प्रबावीत कताा हं फठक उसी प्रकाय कवि एवॊ मॊि के भाध्मभ
से ब्रह्माॊड फक उजाा के सकायात्भक प्रबाव से व्मत्रक्त को सकायात्भक उजाा प्राद्ऱ होती हं स्जस्से योग के प्रबाव
को कभ कय योग भुक्त कयने हे तु सहामता सभरती हं ।
योग सनवायण हे तु भहाभृत्मुॊजम भॊि एवॊ मॊि का फडा भहत्व हं । स्जस्से फहन्द ू सॊस्कृ सत का प्राम् हय
व्मत्रक्त भहाभृत्मुॊजम भॊि से ऩरयसित हं ।

94

जून 2013

कवि के राब :
 एसा शास्त्रोक्त विन हं स्जस घय भं भहाभृत्मुॊजम मॊि स्थात्रऩत होता हं वहा सनवास कताा हो नाना प्रकाय
फक आसध-व्मासध-उऩासध से यऺा होती हं ।
 ऩूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवॊ ऩूणा िैतन्म मुक्त सवा योग सनवायण कवि फकसी बी उम्र एवॊ जासत धभा के रोग
िाहे स्त्री हो मा ऩुरुष धायण कय सकते हं ।
 जन्भाॊगभं अनेक प्रकायके खयाफ मोगो औय खयाफ ग्रहो फक प्रसतकूरता से योग उतऩन्न होते हं ।
 कुछ योग सॊक्रभण से होते हं एवॊ कुछ योग खान-ऩान फक असनमसभतता औय अशुद्धतासे उत्ऩन्न होते हं ।
कवि एवॊ मॊि द्राया एसे अनेक प्रकाय के खयाफ मोगो को नष्ट कय, स्वास््म राब औय शायीरयक यऺण प्राद्ऱ
कयने हे तु सवा योगनाशक कवि एवॊ मॊि सवा उऩमोगी होता हं ।

 आज के बौसतकता वादी आधुसनक मुगभे अनेक एसे योग होते हं , स्जसका उऩिाय ओऩये शन औय दवासे बी
कफठन हो जाता हं । कुछ योग एसे होते हं स्जसे फताने भं रोग फहिफकिाते हं शयभ अनुबव कयते हं एसे
योगो को योकने हे तु एवॊ उसके उऩिाय हे तु सवा योगनाशक कवि एवॊ मॊि राबादासम ससद्ध होता हं ।
 प्रत्मेक व्मत्रक्त फक जेसे-जेसे आमु फढती हं वैसे-वसै उसके शयीय फक ऊजाा कभ होती जाती हं । स्जसके साथ
अनेक प्रकाय के त्रवकाय ऩैदा होने रगते हं एसी स्स्थती भं उऩिाय हे तु सवायोगनाशक कवि एवॊ मॊि परप्रद
होता हं ।
 स्जस घय भं त्रऩता-ऩुि, भाता-ऩुि, भाता-ऩुिी, मा दो बाई एक फह नऺिभे जन्भ रेते हं , तफ उसकी भाता
के सरमे असधक कष्टदामक स्स्थती होती हं । उऩिाय हे तु भहाभृत्मुॊजम मॊि परप्रद होता हं ।
 स्जस व्मत्रक्त का जन्भ ऩरयसध मोगभे होता हं उन्हे होने वारे भृत्मु तुल्म कष्ट एवॊ होने वारे योग, सिॊता भं
उऩिाय हे तु सवा योगनाशक कवि एवॊ मॊि शुब परप्रद होता हं ।
नोट:- ऩूणा प्राण प्रसतत्रष्ठत एवॊ ऩूणा िैतन्म मुक्त सवा योग सनवायण कवि एवॊ मॊि के फाये भं असधक
जानकायी हे तु सॊऩका कयं । >> Order Now

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जून 2013

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भॊि ससद्ध कवि

भॊि ससद्ध कवि को त्रवशेष प्रमोजन भं उऩमोग के सरए औय शीघ्र प्रबाव शारी फनाने के सरए तेजस्वी भॊिो द्राया शुब भहूता भं शुब
फदन को तैमाय फकमे जाते है । अरग-अरग कवि तैमाय कयने केसरए अरग-अरग तयह के भॊिो का प्रमोग फकमा जाता है ।

 क्मं िुने भॊि ससद्ध कवि?  उऩमोग भं आसान कोई प्रसतफन्ध नहीॊ  कोई त्रवशेष सनसत-सनमभ नहीॊ  कोई फुया प्रबाव नहीॊ

भॊि ससद्ध कवि सूसि
अभोघ भहाभृत्मुॊजम कवि

10900

श्रात्रऩत मोग सनवायण कवि

1900

तॊि यऺा

730

याज याजेश्वयी कवि

11000

* सवा जन वशीकयण

1450

शिु त्रवजम

730

सवा कामा ससत्रद्ध कवि

4600

ससत्रद्ध त्रवनामक कवि

1450

त्रववाह फाधा सनवायण

730

श्री घॊटाकणा भहावीय सवा ससत्रद्धप्रद कवि

6400

सकर सम्भान प्रासद्ऱ कवि

1450

व्माऩय वृत्रद्ध

730

सकर ससत्रद्ध प्रद गामिी कवि

6400

आकषाण वृत्रद्ध कवि

1450

सवा योग सनवायण

730

दस भहा त्रवद्या कवि

6400

वशीकयण नाशक कवि

1450

योजगाय वृत्रद्ध

730

नवदग
ु ाा शत्रक्त कवि

6400

प्रीसत नाशक कवि

1450

भस्स्तष्क ऩृत्रष्ट वधाक

640

यसामन ससत्रद्ध कवि

6400

िॊडार मोग सनवायण कवि

1450

काभना ऩूसता

640

ऩॊिदे व शत्रक्त कवि

6400

ग्रहण मोग सनवायण कवि

1450

त्रवयोध नाशक

640

सुवणा रक्ष्भी कवि

4600

अष्ट रक्ष्भी

1250

त्रवघ्न फाधा सनवायण

550

स्वणााकषाण बैयव कवि

4600

भाॊगसरक मोग सनवायण कवि

1250

नज़य यऺा

550

3250

सॊतान प्रासद्ऱ

1250

योजगाय प्रासद्ऱ

550

कारसऩा शाॊसत कवि

2800

स्ऩे- व्माऩय वृत्रद्ध

1050

460

इष्ट ससत्रद्ध कवि

2800

कामा ससत्रद्ध

दब
ु ााग्म नाशक

1050

* वशीकयण (2-3 व्मत्रक्तके सरए)

ऩयदे श गभन औय राब प्रासद्ऱ कवि

2350

आकस्स्भक धन प्रासद्ऱ

1050

* ऩत्नी वशीकयण

640

श्रीदग
ु ाा फीसा कवि

1900

स्वस्स्तक फीसा कवि

1050

* ऩसत वशीकयण

640

अष्ट त्रवनामक कवि

1900

हॊ स फीसा कवि

1050

सयस्वती (कऺा +10 के सरए)

550

त्रवष्णु फीसा कवि

1900

स्वप्न बम सनवायण कवि

1050

सयस्वती (कऺा 10 तकके सरए)

460

याभबि फीसा कवि

1900

नवग्रह शाॊसत

910

* वशीकयण ( 1 व्मत्रक्त के सरए)

640

कुफेय फीसा कवि

1900

बूसभ राब

910

ससद्ध सूमा कवि

550

गरुड फीसा कवि

1900

काभ दे व

910

ससद्ध िॊि कवि

550

ससॊह फीसा कवि

1900

ऩदं उन्नसत

910

ससद्ध भॊगर कवि

550

नवााण फीसा कवि

1900

ऋण भुत्रक्त

910

ससद्ध फुध कवि

550

सॊकट भोसिनी कासरका ससत्रद्ध कवि

1900

सुदशान फीसा कवि

910

ससद्ध गुरु कवि

550

याभ यऺा कवि

1900

भहा सुदशान कवि

910

ससद्ध शुक्र कवि

550

हनुभान कवि

1900

त्रिशूर फीसा कवि

910

ससद्ध शसन कवि

550

बैयव यऺा कवि

1900

धन प्रासद्ऱ

820

ससद्ध याहु कवि

550

*त्रवरऺण सकर याज वशीकयण कवि

शसन साड़े साती औय ढ़ै मा कष्ट सनवायण कवि

1900

1050

ससद्ध केतु कवि

550

उऩयोक्त कवि के अरावा अन्म सभस्मा त्रवशेष के सभाधान हे तु एवॊ उद्दे श्म ऩूसता हे तु कवि का सनभााण फकमा जाता हं । कवि के त्रवषम भं असधक जानकायी हे तु
सॊऩका कयं । *कवि भाि शुब कामा मा उद्दे श्म के सरमे

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जून 2013

96

GURUTVA KARYALAY
YANTRA LIST

EFFECTS

Our Splecial Yantra
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10

12 – YANTRA SET
VYAPAR VRUDDHI YANTRA
BHOOMI LABHA YANTRA
TANTRA RAKSHA YANTRA
AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA
PADOUNNATI YANTRA
RATNE SHWARI YANTRA
BHUMI PRAPTI YANTRA
GRUH PRAPTI YANTRA
KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA

For all Family Troubles
For Business Development
For Farming Benefits
For Protection Evil Sprite
For Unexpected Wealth Benefits
For Getting Promotion
For Benefits of Gems & Jewellery
For Land Obtained
For Ready Made House
-

Shastrokt Yantra
11
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39
40
41
42

AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA
BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL)
BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL)
BHAGYA VARDHAK YANTRA
BHAY NASHAK YANTRA
CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta)
CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA
DARIDRA VINASHAK YANTRA
DHANDA POOJAN YANTRA
DHANDA YAKSHANI YANTRA
GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra)
GARBHA STAMBHAN YANTRA
GAYATRI BISHA YANTRA
HANUMAN YANTRA
JWAR NIVARAN YANTRA
JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA
YANTRA
KALI YANTRA
KALPVRUKSHA YANTRA
KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA)
KANAK DHARA YANTRA
KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA
KARYA SHIDDHI YANTRA
 SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA
KRISHNA BISHA YANTRA
KUBER YANTRA
LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA
LAKSHAMI GANESH YANTRA
MAHA MRUTYUNJAY YANTRA
MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA
MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA)
MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA
NAVDURGA YANTRA

Blessing of Durga
Win over Enemies
Blessing of Bagala Mukhi
For Good Luck
For Fear Ending
Blessing of Chamunda & Navgraha
Blessing of Chhinnamasta
For Poverty Ending
For Good Wealth
For Good Wealth
Blessing of Lord Ganesh
For Pregnancy Protection
Blessing of Gayatri
Blessing of Lord Hanuman
For Fewer Ending
For Astrology & Spritual Knowlage
Blessing of Kali
For Fullfill your all Ambition
Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga
Blessing of Maha Lakshami
For Successes in work
For Successes in all work
Blessing of Lord Krishna
Blessing of Kuber (Good wealth)
For Obstaele Of marriage
Blessing of Lakshami & Ganesh
For Good Health
Blessing of Shiva
For Fullfill your all Ambition
For Marriage with choice able Girl
Blessing of Durga

97

YANTRA LIST

43
44
45
46
47
48
49
50
51
52
53
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58
59
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61
62
63
64

जून 2013

EFFECTS

NAVGRAHA SHANTI YANTRA
NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA
 SURYA YANTRA
 CHANDRA YANTRA
 MANGAL YANTRA
 BUDHA YANTRA
 GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA)
 SUKRA YANTRA
 SHANI YANTRA (COPER & STEEL)
 RAHU YANTRA
 KETU YANTRA
PITRU DOSH NIVARAN YANTRA
PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA
RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA
RAM YANTRA
RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA
ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA
SANKAT MOCHAN YANTRA
SANTAN GOPAL YANTRA
SANTAN PRAPTI YANTRA
SARASWATI YANTRA
SHIV YANTRA

For good effect of 9 Planets
For good effect of 9 Planets
Good effect of Sun
Good effect of Moon
Good effect of Mars
Good effect of Mercury
Good effect of Jyupiter
Good effect of Venus
Good effect of Saturn
Good effect of Rahu
Good effect of Ketu
For Ancestor Fault Ending
For Pregnancy Pain Ending
For Benefits of State & Central Gov
Blessing of Ram
Blessing of Riddhi-Siddhi
For Disease- Pain- Poverty Ending
For Trouble Ending
Blessing Lorg Krishana For child acquisition
For child acquisition
Blessing of Sawaswati (For Study & Education)
Blessing of Shiv
Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth &
65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA)
Peace
Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth
66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA
For Bad Dreams Ending
67 SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA
For Vehicle Accident Ending
68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA
VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE
Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All
69 MAHALAKSHAMI YANTRA)
Successes
VASTU
YANTRA
For Bulding Defect Ending
70
For Education- Fame- state Award Winning
71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA
Blessing of Lord Vishnu (Narayan)
72 VISHNU BISHA YANTRA
Attraction For office Purpose
73 VASI KARAN YANTRA
Attraction For Female
 MOHINI VASI KARAN YANTRA
74
Attraction For Husband
 PATI VASI KARAN YANTRA
75
Attraction For Wife
 PATNI VASI KARAN YANTRA
76
Attraction For Marriage Purpose
 VIVAH VASHI KARAN YANTRA
77
Yantra Available @:- Rs- 255, 370, 460, 550, 640, 730, 820, 910, 1250, 1850, 2300, 2800 and Above…..

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जून 2013

98

GURUTVA KARYALAY
NAME OF GEM STONE

GENERAL

Emerald
(ऩन्ना)
Yellow Sapphire
(ऩुखयाज)
Blue Sapphire
(नीरभ)
White Sapphire
(सफ़ेद ऩुखयाज)
Bangkok Black Blue(फंकोक नीरभ)
Ruby
(भास्णक)
Ruby Berma
(फभाा भास्णक)
Speenal
(नयभ भास्णक/रारडी)
Pearl
(भोसत)
Red Coral (4 यसत तक) (रार भूॊगा)
Red Coral (4 यसत से उऩय)( रार भूॊगा)
White Coral
(सफ़ेद भूॊगा)
Cat’s Eye
(रहसुसनमा)
Cat’s Eye Orissa (उफडसा रहसुसनमा)
Gomed
(गोभेद)
Gomed CLN
(ससरोनी गोभेद)
Zarakan
(जयकन)
Aquamarine
(फेरुज)
Lolite
(नीरी)
Turquoise
(फफ़योजा)
Golden Topaz
(सुनहरा)
Real Topaz (उफडसा ऩुखयाज/टोऩज)
Blue Topaz
(नीरा टोऩज)
White Topaz
(सफ़ेद टोऩज)
Amethyst
(कटे रा)
Opal
(उऩर)
Garnet
(गायनेट)
Tourmaline
(तुभर
ा ीन)
Star Ruby
(सुमक
ा ान्त भस्ण)
Black Star
(कारा स्टाय)
Green Onyx
(ओनेक्स)
Real Onyx
(ओनेक्स)
Lapis
(राजवात)
Moon Stone
(िन्िकान्त भस्ण)
Rock Crystal
(स्फ़फटक)
Kidney Stone
(दाना फफ़यॊ गी)
Tiger Eye
(टाइगय स्टोन)
Jade
(भयगि)
Sun Stone
(सन ससताया)
Diamond
(.05 to .20 Cent )

(हीया)

MEDIUM FINE

200.00
550.00
550.00
550.00
100.00
100.00
5500.00
300.00
30.00
75.00
120.00
20.00
25.00
460.00
15.00
300.00
350.00
210.00
50.00
15.00
15.00
60.00
60.00
60.00
20.00
30.00
30.00
120.00
45.00
15.00
09.00
60.00
15.00
12.00
09.00
09.00
03.00
12.00
12.00
50.00

500.00
1200.00
1200.00
1200.00
150.00
190.00
6400.00
600.00
60.00
90.00
150.00
28.00
45.00
640.00
27.00
410.00
450.00
320.00
120.00
30.00
30.00
120.00
90.00
90.00
30.00
45.00
45.00
140.00
75.00
30.00
12.00
90.00
25.00
21.00
12.00
11.00
05.00
19.00
19.00
100.00

(Per Cent )

(Per Cent )

FINE

SUPER FINE

1200.00 1900.00
1900.00 2800.00
1900.00 2800.00
1900.00 2800.00
200.00
500.00
370.00
730.00
8200.00 10000.00
1200.00 2100.00
90.00
120.00
12.00
180.00
190.00
280.00
42.00
51.00
90.00
120.00
1050.00 2800.00
60.00
90.00
640.00 1800.00
550.00
640.00
410.00
550.00
230.00
390.00
45.00
60.00
45.00
60.00
280.00
460.00
120.00
280.00
120.00
240.00
45.00
60.00
90.00
120.00
90.00
120.00
190.00
300.00
90.00
120.00
45.00
60.00
15.00
19.00
120.00
190.00
30.00
45.00
30.00
45.00
15.00
30.00
15.00
19.00
10.00
15.00
23.00
27.00
23.00
27.00
200.00
370.00
(PerCent )

(Per Cent)

SPECIAL

2800.00 & above
4600.00 & above
4600.00 & above
4600.00 & above
1000.00 & above
1900.00 & above
21000.00 & above
3200.00 & above
280.00 & above
280.00 & above
550.00 & above
90.00 & above
190.00 & above
5500.00 & above
120.00 & above
2800.00 & above
910.00 & above
730.00 & above
500.00 & above
90.00 & above
90.00 & above
640.00 & above
460.00 & above
410.00& above
120.00 & above
190.00 & above
190.00 & above
730.00 & above
190.00 & above
100.00 & above
25.00 & above
280.00 & above
55.00 & above
100.00 & above
45.00 & above
21.00 & above
21.00 & above
45.00 & above
45.00 & above
460.00 & above
(Per Cent )

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Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus

जून 2013

99

BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION
We are mostly engaged in spreading the ancient knowledge of Astrology, Numerology, Vastu and Spiritual
Science in the modern context, across the world.
Our research and experiments on the basic principals of various ancient sciences for the use of common man.
exhaustive guide lines exhibited in the original Sanskrit texts

BOOK APPOINTMENT PHONE/ CHAT CONSULTATION
Please book an appointment with Our expert Astrologers for an internet chart . We would require your birth
details and basic area of questions so that our expert can be ready and give you rapid replied. You can indicate the
area of question in the special comments box. In case you want more than one person reading, then please mention
in the special comment box . We shall confirm before we set the appointment. Please choose from :

PHONE/ CHAT CONSULTATION
Consultation 30 Min.:
Consultation 45 Min.:
Consultation 60 Min.:

RS. 1250/-*
RS. 1900/-*
RS. 2500/-*

*While booking the appointment in Addvance

How Does it work Phone/Chat Consultation
This is a unique service of GURUATVA KARYALAY where we offer you the option of having a personalized
discussion with our expert astrologers. There is no limit on the number of question although time is of
consideration.
Once you request for the consultation, with a suggestion as to your convenient time we get back with a
confirmation whether the time is available for consultation or not.
 We send you a Phone Number at the designated time of the appointment
 We send you a Chat URL / ID to visit at the designated time of the appointment
 You would need to refer your Booking number before the chat is initiated
 Please remember it takes about 1-2 minutes before the chat process is initiated.
 Once the chat is initiated you can commence asking your questions and clarifications
 We recommend 25 minutes when you need to consult for one persona Only and usually the time is
sufficient for 3-5 questions depending on the timing questions that are put.
 For more than these questions or one birth charts we would recommend 60/45 minutes Phone/chat
is recommended
 Our expert is assisted by our technician and so chatting & typing is not a bottle neck
In special cases we don't have the time available about your Specific Questions We will taken some time for
properly Analysis your birth chart and we get back with an alternate or ask you for an alternate.
All the time mentioned is Indian Standard Time which is + 5.30 hr ahead of G.M.T.
Many clients prefer the chat so that many questions that come up during a personal discussion can be
answered right away.
BOOKING FOR PHONE/ CHAT CONSULTATION PLEASE CONTECT

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100

जून 2013

सूिना
 ऩत्रिका भं प्रकासशत सबी रेख ऩत्रिका के असधकायं के साथ ही आयस्ऺत हं ।
 रेख प्रकासशत होना का भतरफ मह कतई नहीॊ फक कामाारम मा सॊऩादक बी इन त्रविायो से सहभत हं।
 नास्स्तक/ अत्रवश्वासु व्मत्रक्त भाि ऩठन साभग्री सभझ सकते हं ।
 ऩत्रिका भं प्रकासशत फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का उल्रेख महाॊ फकसी बी व्मत्रक्त त्रवशेष मा फकसी बी स्थान मा
घटना से कोई सॊफॊध नहीॊ हं ।
 प्रकासशत रेख ज्मोसतष, अॊक ज्मोसतष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मास्त्भक ऻान ऩय आधारयत होने के कायण
मफद फकसी के रेख, फकसी बी नाभ, स्थान मा घटना का फकसी के वास्तत्रवक जीवन से भेर होता हं तो मह भाि
एक सॊमोग हं ।
 प्रकासशत सबी रेख बायसतम आध्मास्त्भक शास्त्रं से प्रेरयत होकय सरमे जाते हं । इस कायण इन त्रवषमो फक
सत्मता अथवा प्राभास्णकता ऩय फकसी बी प्रकाय फक स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक फक नहीॊ हं ।
 अन्म रेखको द्राया प्रदान फकमे गमे रेख/प्रमोग फक प्राभास्णकता एवॊ प्रबाव फक स्जन्भेदायी कामाारम मा सॊऩादक
फक नहीॊ हं । औय नाहीॊ रेखक के ऩते फठकाने के फाये भं जानकायी दे ने हे तु कामाारम मा सॊऩादक फकसी बी
प्रकाय से फाध्म हं ।
 ज्मोसतष, अॊक ज्मोसतष, वास्तु, भॊि, मॊि, तॊि, आध्मास्त्भक ऻान ऩय आधारयत रेखो भं ऩाठक का अऩना
त्रवश्वास होना आवश्मक हं । फकसी बी व्मत्रक्त त्रवशेष को फकसी बी प्रकाय से इन त्रवषमो भं त्रवश्वास कयने ना कयने
का अॊसतभ सनणाम स्वमॊ का होगा।
 ऩाठक द्राया फकसी बी प्रकाय फक आऩत्ती स्वीकामा नहीॊ होगी।
 हभाये द्राया ऩोस्ट फकमे गमे सबी रेख हभाये वषो के अनुबव एवॊ अनुशॊधान के आधाय ऩय सरखे होते हं । हभ फकसी बी व्मत्रक्त
त्रवशेष द्राया प्रमोग फकमे जाने वारे भॊि- मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोकी स्जन्भेदायी नफहॊ रेते हं ।
 मह स्जन्भेदायी भॊि-मॊि मा अन्म प्रमोग मा उऩामोको कयने वारे व्मत्रक्त फक स्वमॊ फक होगी। क्मोफक इन त्रवषमो भं नैसतक
भानदॊ डं, साभास्जक, कानूनी सनमभं के स्खराप कोई व्मत्रक्त मफद नीजी स्वाथा ऩूसता हे तु प्रमोग कताा हं अथवा प्रमोग
के कयने भे िुफट होने ऩय प्रसतकूर ऩरयणाभ सॊबव हं ।
 हभाये द्राया ऩोस्ट फकमे गमे सबी भॊि-मॊि मा उऩाम हभने सैकडोफाय स्वमॊ ऩय एवॊ अन्म हभाये फॊधग
ु ण ऩय प्रमोग फकमे हं
स्जस्से हभे हय प्रमोग मा भॊि-मॊि मा उऩामो द्राया सनस्श्चत सपरता प्राद्ऱ हुई हं ।
 ऩाठकं फक भाॊग ऩय एक फह रेखका ऩून् प्रकाशन कयने का असधकाय यखता हं । ऩाठकं को एक रेख के ऩून्
प्रकाशन से राब प्राद्ऱ हो सकता हं ।
 असधक जानकायी हे तु आऩ कामाारम भं सॊऩका कय सकते हं ।
(सबी त्रववादो केसरमे केवर बुवनेश्वय न्मामारम ही भान्म होगा।)

101

जून 2013

FREE
E CIRCULAR

गुरुत्व ज्मोसतष ऩत्रिका जून -2013
सॊऩादक

सिॊतन जोशी
सॊऩका
गुरुत्व ज्मोसतष त्रवबाग

गुरुत्व कामाारम

92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
INDIA
पोन

91+9338213418, 91+9238328785
ईभेर
gurutva.karyalay@gmail.com,
gurutva_karyalay@yahoo.in,

वेफ

www.gurutvakaryalay.com
http://gk.yolasite.com/
http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/

102

जून 2013

हभाया उद्दे श्म
त्रप्रम आस्त्भम
फॊध/ु फफहन
जम गुरुदे व
जहाॉ आधुसनक त्रवऻान सभाद्ऱ हो जाता हं । वहाॊ आध्मास्त्भक ऻान प्रायॊ ब हो जाता हं , बौसतकता का आवयण ओढे व्मत्रक्त
जीवन भं हताशा औय सनयाशा भं फॊध जाता हं , औय उसे अऩने जीवन भं गसतशीर होने के सरए भागा प्राद्ऱ नहीॊ हो ऩाता क्मोफक
बावनाए फह बवसागय हं , स्जसभे भनुष्म की सपरता औय असपरता सनफहत हं । उसे ऩाने औय सभजने का साथाक प्रमास ही श्रेष्ठकय
सपरता हं । सपरता को प्राद्ऱ कयना आऩ का बाग्म ही नहीॊ असधकाय हं । ईसी सरमे हभायी शुब काभना सदै व आऩ के साथ हं । आऩ
अऩने कामा-उद्दे श्म एवॊ अनुकूरता हे तु मॊि, ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न औय दर
ा भॊि शत्रक्त से ऩूणा प्राण-प्रसतत्रष्ठत सिज वस्तु का हभंशा
ु ब
प्रमोग कये जो १००% परदामक हो। ईसी सरमे हभाया उद्दे श्म महीॊ हे की शास्त्रोक्त त्रवसध-त्रवधान से त्रवसशष्ट तेजस्वी भॊिो द्राया ससद्ध
प्राण-प्रसतत्रष्ठत ऩूणा िैतन्म मुक्त सबी प्रकाय के मन्ि- कवि एवॊ शुब परदामी ग्रह यत्न एवॊ उऩयत्न आऩके घय तक ऩहोिाने का हं ।

सूमा की फकयणे उस घय भं प्रवेश कयाऩाती हं ।
जीस घय के स्खड़की दयवाजे खुरे हं।

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103

Jun
2013

जून 2013

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