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Main Hoo Unke Saath

Main Hoo Unke Saath

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a good poem by Harivansh Rai Bacchan
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Published by: deveshpratap.singh17074 on May 12, 2009
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06/14/2009

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कभी नह|ं जो तज सकते ह अपना 7यायोÎचत अÎधकार

,
कभी नह|ं जो सह सकते ह शीश नवा कर अcयाचार ,
एक अके ले ह| या उनके साथ खड़ी हो भार| भीड़ .
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़

Îनभ य होकर घोÍषत करते जो अपने उदगार Íवचार
िजनक| िज[ा पर होता है उनके अं तर का अं गार
नह|ं िज7ह चुप कर सकती है आतताइय| क| शमशीर
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़

नह|ं झुका करते जो दु Îनया से करने को समझौता
ऊँ चे से ऊँ चे सपनो को दे ते रहते जो 7योता
दू र दे खती िजनक| पै नी आँ ख भÍव*यत् का तम् चीर
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़

जो अपने कं धो से पव त से बढ़ ट4कर लेते ह
पथ क| बाधाओं को िजनके पाँव चुनौती दे ते ह
िजनको बाँध नह|ं सकती ह लोहे क| भार| जंजीर
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़


जो चलते ह अपने छ¯पर के ऊपर लु का धर कर
हार जीत का सौदा करते जो 9ाण| क| बाजी पर


प उदा£े म नह|ं पलट कर जो Íफर ताका करते तीर
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़


िजनको यह अवकाश नह|ं है दे ख कब तारे अनु क

ल ,
िजनको यह परवाह नह|ं है कब तक भ5 , कब Íद4शू ल ,
िजनके हाथ| क| चाबु क से चलती है उनक| तकद|र ,
म ह

ँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़

तु म हो कौन कहो जो मु झसे सह| गलत पथ लो तो जान
सोच सोच कर पू छ पू छ कर बोलो कब चलता तू फ़ान
सत् पथ वो है िजसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
म ह

ँ उनके साथ कड़ी जो सीधी रखते अपनी र|ढ़.

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