रामचिरतमानस

- 1-

गोःवामी तुलसीदास
िवरिचत

रामचिरतमानस
अरण्यकाण्ड

Sant Tulsidas’s

Rāmcharitmānas
Aranya Kānd

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अरण्यकांड

रामचिरतमानस

- 2-

अरण्यकांड

RAMCHARITMANAS : AN INTRODUCTION
Ramayana, considered part of Hindu Smriti, was written originally in Sanskrit by
Sage Valmiki (3000 BC). Contained in 24,000 verses, this epic narrates Lord Ram of
Ayodhya and his ayan (journey of life). Over a passage of time, Ramayana did not remain
confined to just being a grand epic, it became a powerful symbol of India's social and
cultural fabric. For centuries, its characters represented ideal role models - Ram as an ideal
man, ideal husband, ideal son and a responsible ruler; Sita as an ideal wife, ideal daughter
and Laxman as an ideal brother. Even today, the characters of Ramayana including Ravana
(the enemy of the story) are fundamental to the grandeur cultural consciousness of India.
Long after Valmiki wrote Ramayana, Goswami Tulsidas (born 16th century) wrote
Ramcharitamanas in his native language. With the passage of time, Tulsi's Ramcharitmanas,
also known as Tulsi-krita Ramayana, became better known among Hindus in upper India
than perhaps the Bible among the rustic population in England. As with the Bible and
Shakespeare, Tulsi Ramayana’s phrases have passed into the common speech. Not only are
his sayings proverbial: his doctrine actually forms the most powerful religious influence in
present-day Hinduism; and, though he founded no school and was never known as a Guru
or master, he is everywhere accepted as an authoritative guide in religion and conduct of
life.
Tulsi’s Ramayana is a novel presentation of the great theme of Valmiki, but is in no
sense a mere translation of the Sanskrit epic. It consists of seven books or chapters namely
Bal Kand, Ayodhya Kand, Aranya Kand, Kiskindha Kand, Sundar Kand, Lanka Kand and
Uttar Kand containing tales of King Dasaratha's court, the birth and boyhood of Rama and
his brethren, his marriage with Sita - daughter of Janaka, his voluntary exile, the result of
Kaikeyi's guile and Dasaratha's rash vow, the dwelling together of Rama and Sita in the
great central Indian forest, her abduction by Ravana, the expedition to Lanka and the
overthrow of the ravisher, and the life at Ayodhya after the return of the reunited pair.
Ramcharitmanas is written in pure Avadhi or Eastern Hindi, in stanzas called chaupais,
broken by 'dohas' or couplets, with an occasional sortha and chhand.
Here, you will find the text of Aranya Kand, 3rd chapter of Ramcharitmanas.

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रामचिरतमानस

- 3-

अरण्यकांड

ौीगणेशाय नमः

ौीरामचिरतमानस तृतीय सोपान
अरण्यकाण्ड
ोक
मूलं

धमतरोिववेकजलधेः

वैरा या बुजभाःकरं

घघन वान्तापहं

मोहा भोधरपूगपाटनिवधौ
वन्दे

ॄ कुलं

तापहम

ःवःस भवं

कलंकशमनं

बाणशरासनं

सुन्दरं
वरम

धृतजटाजूटेन

सीतालआमणसंयुतं

॥१॥

पीता बरं
क टलस ूणीरभारं

राजीवायतलोचनं

पिथगतं

श करं

ौीरामभूपिूयम

सान्िानन्दपयोदसौभगतनुं
पाणौ

पूणन्दमानन्ददं

संशोिभतं

रामािभरामं

भजे

॥२॥

सोरठा
उमा

राम

पाव हं
पुर

नर

गुन

मोह

भरत

गूढ़

िबमूढ़
ूीित

पं डत

जे

हिर

गाई

अब ूभु चिरत सुनहु अित पावन

एक

बार

चुिन

सीत ह

प हराए

सुरपित

सुत

जिम

कुसुम

ूभु
धिर

िपपीिलका

सीता

चरन

चला

िधर

सादर

सागर

चच

हित

रघुनायक

पाव हं

िबमुख

मित

िबरित

रित

धम

अनु प

अनूप

सुहाई

। करत जे बन सुर नर मुिन भावन ॥१॥

सुहाए

बायस

मुिन


िनज
बैठे

बेषा

थाहा


सुंदर
बल

पावन

मंदमित

सींक

बनाए

पर

रघुपित

मंदमित

मूढ़

राम

िसला

चाहत

महा

भूषन

फ टक
सठ

भागा
जाना

कर

चाहा

कारन

धनुष

सायक

दन

पर

दे खा
कागा

संधाना


॥२॥

॥३॥

॥४॥

दोहा
अित
ता
ूेिरत
धिर

कृ पाल
सन

मंऽ
िनज

आइ

ॄ सर

गयउ

सदा

रघुनायक
क न्ह

छलु

धावा

िपतु

पाह ं

मूरख

चला

अवगुन

भा ज
राम

िबमुख

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बायस
राखा

नेह
गेह
भय
ते ह


॥१॥
पावा
नाह ं


॥१॥

रामचिरतमानस

भा

- 4-

िनरास

ॄ धाम
काहँू

उपजी

िसवपुर
बैठन

मन

सब

कहा

लोका

मृ यु

िपतु

समन

िमऽ

करइ

सत

िरपु

जगु

ता ह

नारद

दे खा

पठवा

तुरत

आतुर

सभय

अतुिलत

िनज

कृ त

सुिन

कृ पाल

सुधा

सकइ

ता

जो

कहँ

कर

सुनु

हिरजाना

िबमुख
कोमल

ताह

कहे िस

पुकािर

ूनत

जाई

ूभुताई

जिनत

फल पायउँ

आरत

ऽा ह


बानी

मितमंद

अब

पा ह

ूभु

एकनयन

सुनु

ॅाता
पाह

दयाल

किर

॥४॥

॥५॥

पाई

तक

तजा

रघुराई

न हं

सरन

॥३॥

संता

हत

जािन

बैतरनी

िचत

ऽा ह

॥२॥

िोह

िबबुधनद

रघुबीर

सोका

राम

दया

पद

दबासा

भय

िबष

होइ

ताता

याकुल

लािग

प हं

अित

को

िरिष

अतुिलत

कम

रा ख

भय

जयंता

गहे िस

बल

चब

ौिमत

करनी

ते

िबकल
राम

समाना

जथा

फरा

कै

अनलहु

ओह

मातु
सब

ऽासा

अरण्यकांड

॥६॥

आयउँ

भवानी

॥७॥

सोरठा
क न्ह

मोह

ूभु
रघुपित

राम

सकल
अिऽ

छाड़े उ

िचऽकूट

बहिर

अस

मुिनन्ह
के

पुल कत

बस

गात

करत

दं डवत

दे ख

राम

किर

पूजा

किर

छोह
नाना

मन

अनुमाना

मुिन

छिब

ते ह

को

कर

कृ पाल

चिरत

होइ ह

समाना

भीर

सब हं

मो ह

जाना

सुनत

महामुिन

धाए

दे ख

रामु

नयन
बचन

जुड़ाने
सुहाए

सीता

ूेम

स हत

बािर

सादर

िनज

मूल

दए

॥२॥

सुधा


सम

ौुित

गयऊ
लाए

कए

ूभु
उर

उिचत

रघुबीर

कराई

उठ

बध

िबदा

जब
अिऽ

कह

ज िप

बिस
सन

आौम

िोह

चले

हरिषत

आतुर

जन

ूभु

भयऊ

चिल

आए

तब

आने

अन्हवाए

आौम

फल

भाई

मन

भाए

सोरठा
ूभु
मुिनबर

आसन

आसीन

परम

ूबीन

भिर

लोचन

जोिर

पािन

सोभा
अःतुित

िनर ख
करत

छं द
नमािम

व सलं

कृ पालु

भजािम

ते

पदांबुजं

अकािमनां

िनकाम

ँयाम

ूफु ल

कंज

सुंदरं
लोचनं


शील

भवा बुनाथ
मदा द

दोष

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कोमलं

ःवधामदं

मंदरं

मोचनं


॥३॥


॥१॥

॥२॥

॥३॥


॥४॥

रामचिरतमानस

- 5-

ूलंब

बाहु

िवबमं

अरण्यकांड

ूभोऽूमेय

वैभवं

िऽलोक

नायकं

िनषंग

चाप

सायकं

धरं

दनेश

वंश

मंडनं

महे श

चाप

खंडनं

मुनींि

संत

रं जनं

सुरािर

वृंद

भंजनं

मनोज

वैिर

वं दतं

अजा द

दे व

सेिवतं

िवशु

बोध

दषणा
पहं

नमािम
भजे

िवमहं

इं दरा

सशि

पितं

सानुजं

वदं िय

मूल

ये नराः

पतंित

नो

भवाणवे

िविव

वािसनः

िनरःय

इं िया दकं

तमेकम दतं

जग ु ं

समःत

सुखाकरं
शची

सतां

पितं

िवतक

वीिच

संकुले

भजंित

मु ये

मुदा

गितं

ःवकं

ूयांित

शा तं

ते

िनर हमी रं

िवभुं

तुर यमेव

केवलं

सुदलभं

व लभं

कुयोिगनां

ःवभ

क प

पादपं

समं

अनूप

नमािम

पठं ित

ये

ोजंित

नाऽ

ते

ःतवं

सुसे यमन्वहं

नतोऽहमुिवजा

पदा ज

इदं

संशयं


भाव

मे

िूयानुजं
म सरा

भजािम

ूसीद

हन

भूपितं

गितं

भजंित

सदा

ूभुं

भि

नरादरे ण

वद य

पितं

दे ह मे

ते

भि

पदं

संयुता

जोिर

बहोिर

दोहा
िबनती

किर

चरन
अनुसुइया

सरो ह
के

िरिषपितनी
द य

मुिन

बसन

पद

मन

नाइ

नाथ
गह

सुख

भूषन

कह

िरिषबधू

सरस

मातु

िपता

ॅाता

अिमत

दािन

भता

धीरज

धम

िमऽ

िस

जिन

कह

कबहँु

तजै

मित

॥४॥

िमली

अिधकाई

आिसष

दे इ

िनकट

बैठाई

॥१॥

नािरधम

कछु

याज

बखानी

॥२॥

िनत

मृद ु

बानी

बयदे ह

अधम

सो

नार

आपद

हतकार

जे

बहोिर

मोिर

सीता

प हराए

कर

िमतूद

नूतन

सब
नािर

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काल

सुसील
अमल

सुनु
जो

िबनीता

सेव

सुहाए

राजकुमार

पिर खअ हं

तेह
चार




॥३॥

रामचिरतमानस

बृ

- 6-

रोगबस

ऐसेहु

एकइ

धनह ना

पित

कर

धम

एक

ॄत

ॄता

चािर

जग

पित

उ म

के

म यम
धम

जड़

कएँ

अस

िबचािर

कुल

अवसर

भय

पित

बंचक

परपित

सुख

िबनु

ौम

पित

लािग जनम
नािर

ूितकुल

रह
रित

सत

सपनेहुँ

सो

िन क

िऽय

जोई

जानेहु

अधम

को ट

रौरव

परम

गित

लहई

जनम

जहँ

जाई

दख

नरक

समुझ

पितॄत

जग

पुऽ

िनज

ौुित

अस

िपता

नािर
क प

धम

िबधवा

सम

छा ड़

होई

॥५॥

नाह ं

॥६॥

जस

कहई

॥७॥

सोई

परई

॥८॥

गहई

॥९॥

को

छल

पाई

कह हं

जग
सत

ते ह

ूेमा

सब

पु ष

॥४॥

नाना

पद

संत

आन

द ना
दख

पित

पुरान

ॅाता

करई

अित

जमपुर

मन

बेद

रहई

पाव

बचन

अह हं

कैस

बोधी

नािर

कायँ

माह ं

दे खइ

िबनु
छन

िबिध

बिधर

मन

समु झ

अधं

अपमाना
नेमा

बस

परपित

अरण्यकांड

खोट

त नाई

॥१०॥

सोरठा
सहज

अपाविन

जसु

गावत

ौुित

सनु

सीता

तव

तो ह
सुिन
तब
संतत

ूानिूय

जानक ं
मुिन
धुरंधर

जासु

कृ पा
तु ह

परम

सन

मो

धम

ते

नािर

ूभु

पितॄत

कथा

संसार

हत

कृ पािनधाना

आयसु

होइ

जाउँ

करे हू

कै

बानी

िसव

सेवक

सुिन

सनकाद

िपआरे
चतुराई

समान

अितसय न हं

के ह

िबिध

कह

जाहु

कोई
अब

िबलो क

मुिन

चहत

ता

कहहु

॥५(ख)॥
िस

मुिन

सकल

सील
जल

नयन

मुख

नावा
आना

जिन

मृद ु

बचन

कस

सब

बाद
उचारे

दे व

िबहाई

अस

तु ह

बह

नेहू

यानी

परमारथ

नाथ

लोचन

बन

बोले

तु ह ह

कर

॥५(क)॥

तजेहु

बंधु

भजी

ःवामी
धीरा

सूेम

दन


जािन

कर ह

चरन

जे ह

ूभु

नािर

िूय

तासु

जानी

कह

हिर ह

लहइ

सादर

अब

अस

तुलिसका

गित

कृ पा

ौी

अजहु

सुिमर

सुभ

पावा

अकाम

सेवत

क हउँ

सुखु

अज
राम

नाम
राम

कह

पर

चािर

पित

होई

अंतरजामी

पुलक

सर रा

छं द
तन

पुलक

मन

यान

जप

जोग

रधुबीर

िनभर
गुन
धम

चिरत

ूेम

पुरन

गोतीत

ूभु

समूह

पुनीत

िनिस

दख

नर
दन

जप

भगित
दास

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पंकज
तप

का

अनुपम
तुलसी

दए

कए

पावई

गावई


॥१॥

॥२॥


॥३॥

॥४॥

॥५॥

रामचिरतमानस

- 7-

अरण्यकांड

दोहा
किलमल
सादर

समन
सुन ह

दमन

मन

ितन्ह

पर

जे

राम

सुजस

राम

रह हं

सुखमूल

अनुकूल

॥६(क)॥

सोरठा
क ठन

काल

पिरहिर

सकल

मुिन

पद

कमल

आगे

राम
बीच

ौी

सिरता

बन

िगिर

जहँ

जहँ

िमला
तुरत हं

दे व

िचर

पुिन

आए

मग


जहँ

ते हं

पित
कर हं

जाता


जोग

चतुर

नर

सुर

बेष

मेध
आवतह ं

मुिन

िनज

अनुज

बाटा

नभ

॥२॥

छाया

िनपाता
धाम

जानक

॥३॥

पठावा
संगा


॥१॥

जैसी

बर

तहँ

ईसा

काछ

माया

रघुवीर

दखी

सुंदर

॥६(ख)॥

दे हं

तहँ

अित

िबच

प हचानी

जप

नर

बने

जीव

दे ख

बन ह

बर

सरभंगा

ते

चले

पावा

मुिन

यान

मुिन

घाटा

रघुराया

िबराध

कैसी

अवघट


भज हं

सीसा

पाछ

सोहइ

धम

राम ह

किर

पुिन

जा ह

असुर

कोस

भरोस

नाइ

अनुज

उमय

मल


॥४॥

दोहा
दे खी

राम

मुख

पंकज

सादर

पान

करत

अित

धन्य

कृ पाला

संकर

सुनेउँ

ौवन

बन

ऐह हं

अब

ूभु

दे ख

जुड़ानी

क न्ह

कृ पा

जािन

जन

कह

मुिन

सुनु

जात

रहे उँ

िबरं िच

िचतवत
नाथ
सो

पंथ

के

रहे उँ

सकल
कछु

रघुबीर
दन

साधन

दे व

धामा

ह ना

मो ह

तब लिग रहहु द न

राती

मुिनबर

िनहोरा

िनज

लोचन
जन्म

पन

सरभंग
मानस

राखेउ

हत लागी । जब लिग िमल

जोग

ज य

जप

तप

ॄत

एह

िबिध

सर

रिच

मुिन

क न्हा

सरभंगा

ूभु

कहँ

बैठे

भृंग

दयँ

॥७॥
राजमराला

छा ड़

॥१॥

छाती

द ना

जन
भगित

रामा

मन

तु ह ह तनु

दे इ

बर
सब

॥२॥

चोरा

यागी ॥३॥
लीन्हा
संगा

॥४॥

दोहा
सीता

अनुज

समेत

मम

हयँ

बसहु

अस

कह

ताते

मुिन

जोग
हिर

अिगिन
लीन

ूभु

नील

जलद

िनरं तर
तनु
भयऊ

जारा

सगुन प

ूथम हं

राम
भेद

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तनु

ःयाम

ौीराम
कृ पाँ
भगित


॥८॥

बैकुंठ
बर

िसधारा
लयऊ


॥१॥

रामचिरतमानस

िरिष

- 8-

िनकाय

अःतुित
पुिन

मुिनबर

गित

सकल

मुिन

कर हं

दे ख

चले

बन

समूह

दे ख

रघुराया

अ ःथ
जानतहँु

पूिछअ

िनिसचर

सकल

सुखी

आगे

कस

िनकर

बृंदा

रघुनाथ

जयित

भए

िनज

ूनत

हत

मुिनबर

पूछ

ःवामी

मुिन

अरण्यकांड

खाए

बृंद

मुिनन्ह
सुिन

िबसेषी

क ना

िबपुल
लािग

सबदरसी

दयँ

कंदा

सँग

अित

तु ह


॥२॥

लागे

दाया

॥३॥

अंतरजामी

रघुबीर

नयन

जल

उठाइ

पन

क न्ह

छाए

॥४॥

दोहा
िनिसचर

हन

सकल
मुिन

बम

ूभु
हे

आौम न्ह

कर

िसंय

सुजाना

राम

आगवनु

स हत

जयँ

न हं

सतसंग

एक

भरोस

बािन
सुफल

िनभर

ूेम

कबहँु क

आजु
मगन

मुिन

िब दिस

पंथ

ूेम

भगित

अितसय

ूीित

मुिन

मग

तब

रघुनाथ

दे ख

माझ
बहु

तब

मुिन

अकुलाइ

आग

दे ख

परे उ

लकुट

इव

भुज

िबसाल

गह

राम

राम

िमलत
बदनु

उठा
तन

अस

िबलोक

कह

पाई

ूभु

यान

कृ पाला

दसा


ूेम

मानहँु

भव

मोचन

मिन

मन

मगन
ूीित

मुिनबर
राखे

त ह

िचऽ

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माझ

उर

जनु

पावा

भट

िल ख

धामा

॥१०॥

बड़भागी


॥११॥

तमाला
काढ़ा


॥९॥

जैस

लाई


॥८॥

दे खावा

सुख

॥६॥

॥७॥

जैसा

बर

भाए

सुख

फिन

स हत

॥५॥

भीरा
फल

बूझा

लुकाई

भव


॥४॥

भवानी
न हं

यानजिनत

अनुज

कनक

ओट

जन

हन

परम

आन

िनज

॥३॥

अनुरागा

गाई

पनस

माह ं

गुन

सर र

॥२॥

नाई

करइ

चतुभुज

िबकल
सीता

कहाँ

दाया

दसा

हरन

दयँ


दे ख

जाग

लागी

सोह

नृ य

दयँ

दे ख

चलेउँ

पुलक

उठाई

सो

॥१॥

धावा

मन

पंकज

जाइ

ूगटे

िलए

बदन

कबहँु क

ठाढ़ा


को

ःयामा

मुिन

दे ख

कैस

सेवक

सूझा

दरावा

िनज

गित

आए

चरन न्ह

िबरित

किरह हं

जाक

जगावा

तब

िमिलह हं

पर

दे वक

आतुर

मनोरथ

सठ

िूय

बैसा

राम

करत

भरोस

सो

होइ

भाँित

आन

कमल

चिल

भगवाना

चरन

रघुबीरा

अचल

िनकट

राम

मुिन

रित

जाई

॥९॥

सुतीछन

सपनेहुँ

द न्ह

न हं

यानी

पुिन

सुख

लोचन
न हं

नाम

भगित

जाइ

से

मो

जागा

मम

अिबरल

मुिन ह

नाह ं
जप

पाछ

भूप

गोसाई

जोग

फिर

मुिन ह

राम

क नािनधान

होइह
दिस

पावा

रघुराया

मो ह

जाइ

सेवक

सुिन

द नबंधु

मोरे

पद

ौवन

अनुज

भुज

के

बचन

िबिध

मह

मुिनन्ह

अग ःत

मन

करउँ

॥१२॥

रामचिरतमानस

- 9-

अरण्यकांड

दोहा

कह

तब

मुिन

दयँ

धीर

िनज

आौम

ूभु

आिन

मुिन

ूभु

म हमा

अिमत

ँयाम

तामरस

मोिर

मित

थोर

मोह

िविपन

घन

॑द

संशय
भव
िनगुण

राजीव
बाल

अित

नागर

अतुिलत
धम

वम

िबरज

तदिप

अनुज

जे

जान हं

जो

कोसल

अस

परम
मुिन

शमन

ऽातु

नौिम

बल

जाइ

जानु
बर

भोरे

मन

भाए

जाचा

अिबरल

भगित

िबरित

िब याना

कुल

शं

तनोतु

मम

सो

बहिर

जो


दयँ

राम

सेवक

रघुपित

हरिष

मुिनबर

बर

मागहु

परइ

सो

मो ह

होहु

सकल

दे हु

अब

गुन

सो

मम

जानक
हय

गगन

स हत
इं द ु

॥११॥

मोरे

तोह

साचा
सुखदाई

यान

बान

धर

इव

बसहु

सदा

िनहकाम


॥१२॥

िनधाना

॥१३॥

भावा

॥१४॥

जो

चाप

लाए

सो

ूभु

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॥९॥
।१०॥

उर

दास

अयना

पित

का


॥८॥

बासी

दोहा
अनुज

॥७॥

अंतरजामी

मम

झूठ

मो ह

काननचार

दे उ

दे हु

॥६॥

रामः

उर
दय

नामः

िनरं तर

मम

अगुन

॥५॥

केतुः

संतत

सगुन

कामः

िवभंजन

समु झ


पावा

दनकर

मनिस

॥४॥

भारं

िवपुल

मह

सदा

के

गोतीतमनूपं
मद

बसतु

व थः

मल

करउ

मोह

रघुराई

सो

जिन

मुिन
कबहँु

कृ पा

लोभ

सब

॥३॥

िवषादः

किल

ःवामी

लागै

द न्ह


नीक

जो

िवशालं

बोध

ऽातु

खरार

तु ह ह
ूभु

मामः

राम

भंजन

िनशेशं

बाहु

िगरा

॥२॥

बाजः

तक

नो

ान

तजन

धामः

नयना

सदा

भानुः

चकोर

उर

॥१॥

ौीरघुवीरं

खग

सुककश

राम

अिबनासी

रा जव

राम

अँजोर

कानन

भव

तोर

मुिनचीरं

िनरं तर

नयन

िबिध

पिरधन

नो

॥१०॥

ख ोत

सरो ह

सीता

पं

सेतुः

जानहँु

पित

मै

नौिम

स हत

बचन

कह

सम

यापक
ौी

ूसन्न

सदा

यूथः

गुण

ते

मुिन

ऽातु

ूताप

अिभमान

सुिन

संत

मरालं

सागर

नमद

जदिप

आरामः

भव

भुज

कृ शानुः

िवषम

क पपादप

नौिम

सुवेशं

सुर

अमलम खलमनव मपारं

कवन

सन्मुख
मुकुट

बार

ूकार

कर

रिब
जटा

बार हं

िबिबध

तूणीरं

उरगादः

रं जन

सगुण

मृगराजः

मसन

भंजन

शर रं

दहन

मानस
सप

कट

व थ

नयन

हर

अःतुित

शर

अ ण

पूजा

मोर

दाम

पद

किर

िबनती

चाप

किर

गह

सुनु

पा ण

िनिशचर

धीर

राम


॥११॥

रामचिरतमानस

- 10 -

एवमःतु
बहत

किर

रमािनवासा

दवस

अब

ूभु

दे ख

गुर

दरसन

संग

जाउँ

कृ पािनिध

पंथ

कहत

तुरत

सुतीछन

नाथ

अनुज

सुनत

मुिन

बैदेह

अग ःत

तुरत

उठ

कुसल

पूिछ

मुिन

ूकार

ूभु

अपर

मुिन

पद

सादर
पुिन

किर

जहँ

लिग

कमल

परे

बहु
रहे

भाई

कहँ

आए

दनु
हिर

यानी
पूजा

बृंदा

अित

अस

बर

मो ह

सम

भा यवंत

जेह

जल

िलए

आसन
सब

हहु

लोचन

ूीित

हरषे

भयऊ
आधारा

जपत


सुरभूपा

जगत

िबलो क

िरिष

भाई

पहँु चे

कहत

दे व

नाह ं

आौम

िमलन

आएँ

िनहोरा

िबहसै

दं डवत

पासा

आौम

नाथ

संग

किर

िरिष

ए हं

मुिन

िनिस

धाए

मो ह

िलए

कुभंज

तु ह

गयऊ

कुमारा

समेत

अनूपा

प हं

चले

भए

पाह ं

भगित

गुर

चतुराई

मुिन

िनज

हरिष

पाएँ

गुर

कौसलाधीस

राम

अरण्यकांड

उर

बैठारे

लाई

आनी

न हं

िबलो क

छाए

दजा

सुखकंदा


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

॥५॥


॥६॥
॥७॥

दोहा

तब

मुिन

समूह

सरद

इं द ु

तन

रघुबीर

कहा

मुिन

जानहु

जे ह

कारन

तु ह
अब

सो

मुिन

मुसकाने

तु हरे इँ

जीव

फल

दे हु

मानहँु

ूभु

िबसाल

तव

ूभाव

जंतु

भ छक

िचतवत

लोकपित

यह

बर

मागउँ

कृ पािनकेता

अस


तव

संतत
है

िबरित

अखंड

दं डक

बन

बास

करहु

सा

बसहु

सतसंगा

अनंता


रघुकुल

तात

ठाऊँ
करहू

राया

फिर

सगुन

मो ह
पावन

उम

क जे

साप
सकल

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॥३॥

आना

सोउ

काला

अभंगा

जे ह

पूँछेहु

संता

रित

मानउँ

रघुराई

पंचबट

ते ह

मुिनबर

कर

मुिनन्ह

ना

समेता

ूीित

भज हं

िनकाया

अनुज

सरो ह

ग य

फिर

बड़ाई
ूभु

चरन

ौी

॥१॥
॥२॥

तु हार

मनुज

जानी

जान हं

सदा

मो ह

दयँ

का

अनेक

डरत

पूँछेहु

अनुभव

दे हु

पुनीत

भयँ

मनोहर

तव

जानउँ

परम
तहँ

मुिनिोह

कछुक

ॄ ांड

नाह

समुझायउँ

मो ह

बस ह

॥१२॥

मार

म हमा

कछु

कह

ूकार

फल

भीतर

बखानउँ

दासन्ह
ूभु

दराव

नाथ

जानउँ

कराला

सकल

जे ह

ओर

चकोर

ूभु

तात

पूछेहु

िनकर

ताते

माया

सब

सन

अघार

तु ह

ज िप

बानी

समाना

क ठन

भगित

तु ह

मोह

ते

अिबरल

आयउँ

ूभु

चराचर

सन्मुख

पाह ं

सुिन

भजन

ऊमिर
ते

मंऽ

बैठे

महँ

पर


॥४॥

॥५॥

॥६॥

॥७॥

नाऊँ
हरहू

दाया


॥८॥

रामचिरतमानस

- 11 -

चले

राम

मुिन

आयसु

पाई

अरण्यकांड

तुरत हं

पंचबट

िनअराई

॥९॥

दोहा
गीधराज

गोदावर

िनकट

जब

ते

िगिर

बन नद ं

खग

मृग

सो

राम

एक
मो ह

मुिन

समुझाइ

कहहु

यान

छिब

रहे

बासा
छाए

रहह ं

सक

सचराचर

सा

सोइ

िबराग

सुखी

दन

दन


सब

कहहु

बीती

अित

मधुर

हौ हं

गंजत

ूगट
िनज

तज
सो

भगित

सकल

कहौ

छिब

लहह ं
छलह ना

चरन
करहु

नाई
रज

॥१ ॥

िबराजा

कहे
ूभु

कर

ऽासा

सुहाए

रघुबीर

बचन

पूछउँ

॥१३॥

मुिन

ूित

छाइ

भए

लिछमन

बढ़ाइ

गृह

जहाँ

दे वा

ूीित

परन

मधुप

माया

िबिध

अ हराजा
आसीना

कहहु

बहु

सुख

ूभु

नर

तहँ

अनं दत

बरिन

बार

सुर

ताल

भइ
ूभु

क न्ह

बृंद

बन

भट

सेवा

जे हं

दाया

समुझाइ


॥२॥

॥३॥

॥४॥

दोहा
ईःवर

जीव

जात
थोरे ह

सब
मोर

गो

गोचर

ते ह

कर

एक

दु

एक

होइ

महँ

भेद
चरन

तोर

भेद
जग

यान

मान

क हअ

तात

माया


जाई

सुनहु

तु ह

सोऊ

दख
ु पा


जहँ

जाक

एकउ
परम

नाह ं

िबरागी

तात

मित

मन

बस

क न्हे

जीव

सो

सब

अपर

जा

बस

जीव

ूभु

ूेिरत

दे ख

तृन

सम

जाइ

माया

िब ा


ॅम

जे हं

मन

बस

मोह

सुनहु

लिग

गुन

सो

सोक

बुझाई

अितसय

रचइ

रित

कहउँ

जहँ

ूभु

न हं

॥१४॥
िचत

लाई

िनकाया
जानेहु

भाई

अिब ा

दोऊ

परा

भवकूपा

िनज

समान

िसि

तीिन

बल

ताक

सब

माह

गुन

यागी


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

दोहा
माया

ईस

बंध

मो छ

धम

जात

बेिग

सो
भगित

िबरित

सुतंऽ
तात

िवउँ

आपु
ूद

सबपर

जोग

भाई

अवलंब
अनुपम

कहँु

याना

सुखमूला


क हअ

माया

ूेरक


सो

आना

जान

यान
मम
ते ह

िमलइ

सो
सीव

मो छूद
भगित

आधीन
जो

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संत

जीव

॥१५॥
बेद

भगत
यान
होइँ

बखाना
सुखदाई
िब याना

अनुकूला


॥१॥

॥२॥

रामचिरतमानस

- 12 -

भगित

साधन

ूथम हं

िबू

चरन

एह

कहउँ
अित

कर

फल

पुिन

ौवना दक

नव

भि

संत

चरन

गु

िपतु

मम

गुन

काम

आद

ूीती

िबषय

अित

बंधु

िनज


दे वा

जाक

पाव हं

कम

िनरत

ौुित

मम

धम

उपज

लीला

रित

अित

मन

बम

सब

मो ह

तब

मन

सर रा

दं भ

पंथ

िनज

मम

ूेमा

पुलक

मद

सुगम

िबरागा

पित

गावत

ढ़ाह ं

पंकज
मातु

बखानी

अरण्यकांड

बचन

मो ह


बह

नयन

तात

िनरं तर

बस

॥३॥

माह ं

िगरा

र ती

जाने

गदगद

अनुरागा

भजन

कहँ

ूानी


॥४॥

नेमा
सेवा


॥५॥

नीरा

ताक


॥६॥

दोहा

भगित
एह

बचन

कम

मन

मोिर

गित

ितन्ह

के

दय

कमल

महँु

करउँ

सदा

िबौाम

जोग

सुिन

ूभु

चरन न्ह

िबिध

गए

सूपनखा

सो

ॅाता

िपता

होइ
िचर

कछुक

दन

बीती

कहत

कै

ब हनी

बारा

पु ष

अनु प

अब

सीत ह

लिछमन

सम

बाता

भिगनी

जानी

चह

मान

िभखार

लोभी

जसु

चह

चार

गुमानी

पुिन

फिर

राम

िनकट

सो

तब
सीत ह

खिसआिन
सभय

तो ह
राम
दे ख

सो

सुख

कहा

प हं

सँजोग

िबिध

बहत

िबलोक

॥३॥

िबचार

अित

लाघवँ

ितहु

नाह ं

अहइ

कुआर

मोर

लघु

ॅाता

ूभु

मनु

माना

कछु

िबलो क

तु ह ह

बोले

िनहार

मृद ु

जो

कछु

कर हं

उन ह

सब

यसनी
नभ

धन

दु ह

ूभु

तृन

कहा

सुभ

दध

अनुज

गित

चहत

लिछमन

जो

गई

सो

॥४॥

लोक

लाज

भयंकर
सन

छाजा

नाक

कान

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िबनु

॥५॥


॥६॥

॥७॥

िबिभचार
ूानी

बहिर

पिरहरई
भई

बुझाई

क न्ह


॥८॥

पठाई

ूगटत
सयन

सुपासा

प हं

तोिर

बानी

दोहा
लिछमन

खो ज

तोर

नार

दे खेउँ

न हं

॥२॥

मुसुकाई

रचा

पराधीन

बरई

बचन

आई

रघुराई

यह

दासा

सेवक

लिछमन

बोली

कुमारा

जाई


॥१॥

अ हनी

जुगल
रिब ह

माह ं

राजा

भइ

रिबमिन िव

ूभु

कोसलपुर

िबकल

नावा
नीती

जस

जिम

नार

कर

दा न

गुन

कुमार

उन्ह

दय

यान

िस

िनरखत

कह

िबराग


॥१६॥

मनोहर

जग

र हउँ

िनःकाम

पु ष

रोक

प हं

मो

िरपु

सुनु

ूभु

लिग

समथ

उरगार

मन ह

दु

दे ख

पु ष

िचतइ

सुंदिर

एक

धिर

मम

ूभु

लिछमन

पुऽ


सम

गइ

सक

तु ह
ताते

पावा

गइ

िबकल

कर हं

सुख

अित

रावन

पंचबट

भजनु

॥९॥

॥१०॥

रामचिरतमानस

- 13 -

ताके
नाक

कर

कान

खर

िबनु

दषन

ते ह

भइ

प हं

पूछा

धाए

रावन

िनिसचर

कहे िस

िनकर

ब था

नानाकारा

किर

लीनी

असगुन

अिमत

हो हं

भयकार

गगन

उड़ाह ं

तज हं

कोउ

कह

जअत

धूिर

पूिर

नभ

जान क ह

रहे हु

दे ख

सजग

िरपुदल

गन हं

रहा

राम

कंदर

कै

चिल

आवा

आवा

चले

बल
सेन

क जल

िगिर
घोर

मृ यु

िबबस

झार

हरषाह ं
लेहु

सर

अपारा

छड़ाई
कहा

कटकु

ौी

॥१॥
॥२॥

सन

िनिसचर

जूथा

सब

ितय

अनुज

स हत

बनाई

ह नी

अित

मारहु

धारा
ॅाता

नासा

भट

बोलाइ

बानी

पौ ष

ौुित

धिर

कै

सुिन

कटकु

॥१७॥

गै

धर

दे ख

भाई

िगिर

ूभु

असुभ

तव

सप छ

नानायुध

सैल

जातुधान

जनु

द न्ह

िधग

मंडल

सुिन

राम

धरहु

जाहु

िधग

आग

लै

चुनौती

जनु

बुझाई

बाहन

गज ह

िबलपाता

नाना

सुपनखा

मनौ

िबकरारा

गइ

सब

कहँ

अरण्यकांड

भयंकर

धनु

पानी

िबहिस

क ठन

कोदं ड

चढ़ावा

जूट

बाँधत

सोह

भुजग

॥३॥

॥४॥

॥५॥

॥६॥
॥७॥

छं द
कोदं ड

क ठन

मरकत

सयल

चढ़ाइ
पर

िसर

लरत

जट

दािमिन

को ट

जुग

क ट किस िनषंग िबसाल भुज ग ह चाप िबिसख सुधािर कै ॥
िचतवत

मनहँु

मृगराज

ूभु

गजराज

घटा

िनहािर

कै

सोरठा

ूभु
सिचव
नाग
हम
ज िप
दे हु

मोर

दतन्ह

हम

िरपु

बगमेल

आइ

गए

जथा

िबलो क

िबलो क

सर

बोिल

बोले

असुर

सुर

भिर

जन्म

भिगनी

अकेल
सक हं
खर

थ कत

यह

कोउ

सुनहु

सब

भाई

दे खी

कु पा

बध

जीअत

तु ह

ता ह

दे ख

दे खे

कहा

बलवंत

डार

दराई

सन
बन

न हं

सुनावहु

जाई

करह ं

डरह ं


एक

नृपबालक

नर

न हं
भवन

बार

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जाहु

कालहु

केते

सुंदरताई

पु ष

आतुर

बोले
मृग

धार
भूषन

हम

अिस

सुिन

राम
खल

हते

न हं

बचन
से

॥१८॥

रजनीचर

जते

सुनत

तु ह

दनुज

भई

लायक

तासु

सुभट

घेरत

नािर

मृगया

रिब ह

जेते

िनज

छऽी

दषन

बाल

धावत

मुिन

क न्ह

राम

धरहु

नर

तुरत
कहा

धरहु

अनूपा
भाई
आवहु

मुसकाई
खौजत

सन

फरह ं

लरह ं


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

॥५॥

रामचिरतमानस

ज िप

मनुज

रन
दतन्ह

- 14 -

होइ

दनुज
बल

चढ़

कुल

घर

किरअ

जाइ

घालक

फिर

कपट

तुरत

जाहू

मुिन

पालक

खल

। समर

िबमुख

पर

कृ पा

चतुराई
कहे ऊ

सब

अरण्यकांड

िरपु

सुिन

खर

दषन

सालक
हतउँ

बालक

॥६॥

परम

काहू

कदराई

अित

दहे ऊ

॥७॥

उर

छं द
उर

दहे उ

सर

कहे उ

चाप

ूभु

तोमर

क न्ह

भए

बिधर

धरहु

सि

धाए

िबकट

भट

ूथम

कठोर

घोर

सूल

धनुष

टकोर

याकुल

जातुधान

कृ पान

रजनीचरा

पिरघ

यान

ते ह

परसु

धरा

भयावहा

अवसर

रहा

दोहा
सावधान

होइ

धाए

लागे

बरषन

राम

ितन्ह

के

आयुध

तािन

सरासन

जािन

पर

ितल

ौवन

सबल

सम

किर

पुिन

लिग

आराित

बहु

छाँड़े

भाँित

॥१९(क)॥

काटे

िनज

रघुबीर
तीर

॥१९(ख)॥

छं द
तब

चले

कोपेउ

अवलो क

जान

समर

बबान
ौीराम

खरतर

बु

तीिनउ

ते ह

बधब

हम

िरपु
छाँड़े
उर

सीस

िच करत

जािन
कर

चरन
बान

फुंकरत
िबिसख

मुिर

चले

जो

भािग


लागत

चले

पािन

नाराच

भुज

ूकार

कोपे

िबपुल

भाइ

िनज

अनेक
परम

तीर

भए

आयुध

कराल

फरे

जनु
िनिसत

बहु

िनिसचर

रन

मरन

याल
िनकाम

ते

मन महँु

बीर

जाइ

ठािन

कर हं

ूहार

ूभु

धनुष

सर

संधािन

िबकट

िपसाच

लगे

कटन
जहँ

धर

तहँ

लगे

परत

मह

कुधर

परन
समान

कटत

तन

सत

खंड

पुिन

उठत

किर

नभ

उड़त

भुज

मुंड

िबनु

मौिल

धावत

खग

कंक

बहु

सृगाल

ते

भट

काक

सनमुख


पाषंड

ंड

कटकट हं

क ठन

कराल

िपसाच

खपर

संचह ं

छं द
कटकट हं

ज़ंबुक

भूत

ूेत

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रामचिरतमानस

- 15 -

बेताल

बीर

रघुबीर

बान

जहँ

तहँ

कपाल
ूचंड

पर हं

अंतावर ं

उड़त

पुर

मारे

पछारे

सर

सि

अवलो क

िबकल

तोमर

परसु

महँु

सर

िनिमष

दस

दस

िबिसख

मह

परत

उठ

सुर

डरत

चौदह

सुर

मुिन

िरपु
उर

भट

िभरत

सभय

ूभु

परसपर

राम

कृ पान

मारे

ूेत

संमाम

परे

फरे

बारह ं

डारह ं

डारे

सायका

िनिसचर

नायका

पचािर

एक

िबलो क

किर

दषन

करत माया

मायानाथ

उड़ावह ं

एक ह

सकल

दे ख

िनसाचर

िनवािर

मरत न

सहस

खर

अगिनत

माझ

धावह ं

कहँ रत

ितिसरा द

सूल

पर

ूभु

दे ख ह

भट

भयकर िगरा ॥

गुड़

भट

िसरा

गह

बाल

िबपुल

नंचह ं
भुज

कर हं
कर

बहु

ौीरघुबीर

कोप

उर

िपसाच

िबदारे

दल

किर

के

धर ध

मनहँु

उर

जोिगिन

भटन्ह

गीध

बासी

िनज

बजाइ

खंड हं

उ ठ लर हं

गह

संमाम

ताल

अरण्यकांड

अित

अवध

अित

कौतुक

िरपुदल

लिर

पाव हं

पद

घनी

धनी

कर यो

मर

यो

दोहा
राम

राम

किर

उपाय

हरिषत

कह

तनु

तज हं

िरपु

मारे

छन

बरष हं

अःतुित

सुमन

चले

िरपु

जीते

सुर

नर

मुिन

सब

आए

ूभु

पद

परत

हरिष

परम

ूेम

लोचन

तब

लिछमन

सीत ह

लै

िचतव

ःयाम

मृद ु

बिस

ौीरघुनायक

धुआँ

दे ख

बोिल

बचन

बोध

करिस

पान

सोविस

राज

नीित

संग

ते

िब ा

ूीित

िबनु

िबनु

िबबेक

करत

चिरत

सुर

केरा

जाइ

सुपनखाँ

किर

भार

दे स

कोस

दनु

राती

सुिध

न हं

धन

िबनु

धमा

उपजाएँ

कुमंऽ
िबनु

मद

ते

राजा
ते

गुनी

ौम

मान

ते

भय

उर

अघाता
ूेरा

िबनु

यान

पान
नीित

िबसार
पर


॥१॥

सुखदायक

िसर
कएँ

बीते

लाए

रावन

पढ़े

बेिग

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के

सुरित

समप

फल

नास ह

कै

॥२०(ख)॥

मुिन

तव

हिर ह

॥२०(क)॥

िबमान

खरदषन

जती

ूनय

गाता

िबिबध

िनसान

सब

समर

सोिभत

गगन

किर

रघुनाथ

पंचवट ं

बाज हं

किर

जब
सीता

कृ पािनधान

महँु

सुर

िनबान

आराती


॥२॥

॥३॥

सतकमा

॥४॥

लाजा

॥५॥

सुनी

॥६॥



अस

पाएँ

रामचिरतमानस

- 16 -

अरण्यकांड

सोरठा
िरपु

पावक

अस

कह

पाप

िबिबध

ूभु

िबलाप

अह
किर

गिनअ

लागी

छोट

रोदन

किर

करन

॥२१(क)॥

कह

रोइ

दोहा
सभा

माझ

तो ह

जअत

सुनत

पिर

सभासद

कह

लंकेस

कहिस

समु झ

पर

मो ह

जन्ह

कर

भुजबल

रािस

तासु

अनुज

खर

दषन

खर

दषन

अभय

खल

नािर

काटे

ौुित

ितन्ह

सँवार

लगे

कर

रत

रित

सत

भिगिन

पुकारा

छन

महँु

सकल

सुिन

सुखदाता

तासु

तव

मुिन

को ट

सुिन

घाता

नाना

एक

ःयामा
बिलहार

कर हं
कटक

दससीस

कानन

गुन

नािर

नासा

धरनी

मुिन

सुर

संग

आए

किरह हं

धन्वी

बध

िनपाता

खेलन

िबचरत

धीर

उठाई

कान

बन

भए

के

बाहँ

नासा

िनसाचर

परम

नामा

तव

॥२१(ख)॥

गह

र हत


होइ

िसंघ

ॅाता

गित

पु ष

समाना

िबिध

ितिसरा

दसानन

अिस

कइँ

करनी

कै

ूकार

समुझाई

जाए

पाइ

अस

सुिन


बाता

उन्ह

ूताप

राम

मोिर

के

काल

बल

सोभाधाम

दसरथ

बालक

बहु

अकुलाई
िनज

नृपित

अतुिलत

दसकंधर

उठे

अवध

दे खत

याकुल

पिरहासा
उन्ह

जरे

सब

बहु

भाँित

मारा

गाता


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

॥५॥

॥६॥

दोहा
सुपनख ह
गयउ
सुर

नर

खर

दषन

सुर
तौ
होइ ह

चला

इहाँ

समुझाइ

भवन

असुर

रं जन

मै

अित

नाग

मो ह

सम

भंजन

मह
हठ

भजनु

तामस

अकेल

राम

भूपसुत
जान

जिस

जुगुित


तहवाँ

बनाई

मोरे


दे हा

परइ

हिरहउँ

बस

सुनहु

मारइ
ूान

बम

मार च
उमा

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कोउ

िबनु

तज

सो

अवतारा

मंऽ

तरऊँ

रन

िसंधु

नाह ं

भगवंता

भव

जीित


॥२२॥

लीन्ह

बचन

नािर

दोहा

राित
कहँ

भगवंत

सर

मन

को

ूभु

न हं

अनुचर

ितन्ह ह

भारा

कोऊ
चढ

करऊँ

बोलेिस

नीद

माह ं

बलवंता

बै

बल

सोचबस

खग

जाइ

नर प

किर

तट

कथा

एहा

दोऊ
जहवाँ

सुहाई


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

रामचिरतमानस

- 17 -

लिछमन

गए

जनकसुता
सुनहु

बन हं

सन

जब

बोले

अरण्यकांड

लेन

िबहिस

मूल

कृ पा

फल
सुख

बृंद
लिलत

िूया

ॄत

िचर

सुसीला

कछु

करिब

तु ह

पावक

जौ

लिग

कर

राम

करहु

िनवासा

जब हं

महँु

िनज

ूितिबंब

लिछमनहँू

गयउ

नीच

भयदायक

कहा

बखानी

रा ख

यह

दसमुख
नविन

सब

सीता

मरमु

जहाँ

मार चा

कै

खल

तहँ

अित
कै

जाना

पद

तैसइ

दखदाई

िूय

ूभु

बानी

जिम

ःवारथ

अंकुस

जिम

नरलीला

के

नासा

॥१॥

समानी

सुिबनीता

रचा

भगवाना

॥२॥

रत

नीचा

॥३॥

धनु

अकाल

॥२३॥

अनल

चिरत

माथ

नाइ

हयँ

सील

कछु

िनसाचर

धिर

जो

कंद

उरग

िबलाई

कुसुम

भवानी

॥४॥

दोहा
किर

पूजा

कवन
दसमुख
होहु

ते हं
तास

सकल

कपट
पुिन

सत

जोजन

भइ

मम
नर

यम
ते ह

तु ह

कहा

तात

मख

मन

कथा

मृग

मुिन

हे तु

मार च

न हं

राखन

गयउ

आयउँ
कट

तदिप

पूछ

अित

अकसर

आयहु

आग


कह

क जे

माह ं


मार

िबनु

नाई

अित

सूरा

मिरअ

जहँ

आनौ

रघुपित

बय

तहँ

ितन्ह ह

कएँ

नृपनार

॥१॥

ईसा
जीजै

मो ह

भल

दे खउँ

िबरोिध

अभाग

चराचर
जआएँ

सर

सन

॥२४॥

अिभमान

नर प

फर

तात

हिर

ते

ितन्ह

िबिध

बात

स हत

जे ह

दससीसा
कुमारा

छन
भृंग

तात

सादर

छलकार

सुनहु

बय

तब

मारा

नाह ं

दोउ

आइ ह

भाई
पूरा

॥२॥

॥३॥

॥४॥

दोहा
जे हं

जाहु

गु

तब
स ी

उभय

ताड़का

सुबाहु

खर

दषन

ितिसरा

भवन

कुल

कुसल

जिम

मूढ़

मार च
मम

भाँित

उत

दे त

अस

जयँ

बधेउ

मम

दयँ

अनुमाना

दे खा

मो ह
जािन

सठ

िनज

बधब

बोधा
धनी

दसानन


मरना

अभाग

खंडेउ

मनुज

िबचार

करिस
ूभु

हित


संगा

अस

सुनत
कहु

जग

बैद

बं द

तब

कस

चला

कोदं ड
बिरबंड

जरा

नव ह

हर

समान

िबरोध

न हं

किब

ता किस
मर

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राम

॥२५॥

द न्हिस

मो ह

बहु

को

भानस

रघुनायक

गार

जोधा

॥१॥

क याना

गुनी

॥२॥
॥३॥

सरना

रघुपित

सर

लाग

पद

ूेम

अभंगा


रामचिरतमानस

मन

- 18 -

अित

हरष

जनाव

तेह

अरण्यकांड

आजु

दे खहउँ

परम

किर

सुख

सनेह

॥४॥

छं द
िनज

परम

ौी

ूीतम

स हत

िनबान

अनुज

दायक

िनज

दे ख

पािन

लोचन

समेत

बोध
सर

सुफल

कृ पािनकेत

जा

कर

संधािन

सो

पद

भगित
मो ह

पाइह

मन

लाइह

अबस ह

बसकर

हर

बिध ह

सुखसागर

दोहा
मम

पाछ

फिर

फिर

ते ह

बन

अित

िबिचऽ

सीता

परम

सुनहु

धर
ूभु ह

िनकट

बरिन

िचर

स यसंध
तब

रघुपित

जानत

मृग

िबलो क

कट

ूभु

लिछमिन ह

कहा

ूभु ह

िबलो क

चला

िनगम

नेित

िसव

कबहँु

िनकट

पुिन

दरत

करत

सीता

केिर

ूगटत
तब

तक

लिछमन

राम

कर

ूान

तजत

अंतर

ूेम

सब

समुझाई

रखवार

मृग
यान
दिर

छल

बुिध

पावा

पराई

धाए

एह

सुंदर

चम

कहित

पाछ

ूगटइ

धरिन

परे उ

भाई

िबचार

लै

नामा

पाछ

सुिमरे िस

िनज

दे हा

सुिमरे िस

मुिन

दलभ

सो

छपाई

घोर
मन

रामु

समेत

गित

लै

द न्ह

॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥


॥६॥

दरू

पुकारा
महँु

॥५॥

धावा

गयउ

किर

साँधा

साजी

कबहँु

ूभु ह

बहु

सरासन

मारा

प हचाना

सर

समय

मायामृग
िबिध

बैदेह
सँवारन

िचर

बल

बेषा
छाला

काजु

रामु

कबहँु क

अित

िनिसचर

िबबेक

बनाई

सुमनोहर

चाप

िबिपन

भयऊ

रिचत

सुर

करतल

फरत


भूर

हरिष

॥२६॥

कपटमृग

अंग
कर

आन

मिन

आनहु

उठे

भाजी

सर

ूथम हं
ूगटे िस

सम

दे ह

मृग

बान

मार च

अंग

एह

बाँधा

मो

कनक

कारन


तब

एह

पिरकर

क ठन

तासु

जाई

किर

करे हु

दे खा

कृ पाला

बिध

ूभु

सरासन

धन्य

गयऊ

मृग

रघुबीर

धर

िबलो कहउँ

दसानन

कछु

दे व

धावत

रामा


॥७॥

सनेहा

॥८॥

सुजाना

॥९॥

दोहा
िबपुल

खल
आरत

सुमन

सुर

िनज

पद

बिध

तुरत

फरे

सुनी

जब

िगरा

द न्ह

बरष हं
असुर
रघुबीरा

सीता

गाव हं
कहँु

कह

ूभु
द नबंधु

सोह

चाप

लिछमन

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गुन

गाथ

रघुनाथ
कर
सन

॥२७॥
कट

परम

तूनीरा
सभीता


॥१॥

रामचिरतमानस

जाहु

- 19 -

बेिग

भृकु ट

संकट

िबलास

मरम

सृि

बचन

बन

दिस

सून

बीच

जाक

डर

स िप

सुर

इिम

कुपंथ

पग

दे त

किर

कह

सीता

सुनु

तब

रावन

िनज

सीता

धिर

सुनत

बचन

कथा

ूेिरत

चले

नीद

नाई

इत

उत

रह

गोसा

दे खावा


बोलेहु

बचन

भई

आइ

गयउ

भएिस

मन

महँु

िरसाना

अन्न

॥४॥

लेसा

ूीित

जब

नाम

सुनावा

खल

ठाढ़ा

दु

ूभु

कालबस
चरन

दे खाई

ना

रहु

िनिसचर

बं द

खाह ं
भ ड़हाई

बल

॥२॥
॥३॥

बेषा

चला

राहू

भय

सभय

चाहा

जती

बुिध

राजनीित

डोला

सिस

िचतइ
तेज

सोई

मन

रावन
दन

माता

लिछमन

िनकट

सुनु

परइ

जहाँ

आवा

कहा

संकट

िनिस

सस

दससीस

िबहिस

गाढ़ा

छुि

हिर

सुहाई

जती

सपनेहुँ

काहू

खगेसा

धीरजु

हिरबधु ह

बोला

डे राह ं

लिछमन

दे खा

असुर

होई

सब

ःवान

िबिध

जिम

सीता

दसकंधर

दससीस

कह

ॅाता

लय

जब
दे व

सो
नाना

अित

अरण्यकांड

नाहा

सुख

माना

बैठाइ



॥५॥

॥६॥


॥७॥

॥८ ॥

दोहा
बोधवंत

तब

चला
हा

गगनपथ

जग

आरित

एक
हरन

िबिबध

िबलाप

िबपित

मोिर

सीता

कै

गीधराज
अधम

बोधवंत
रे

आवत

दु

सुखदायक

ूभु ह

सुनावा

सुिन

भार

करित

आरत

करिस

जाई
जिन

खग
ठाढ़

कन

जरठ

जटायू

सुनत

गीध

बोधातुर

जान क ह

कुसल

गृह

पुरोडास

पायउँ

मलेछ
किरहउँ
पिब

िनभय

फिर
मम
मम

कर

कह

ना हं

रासभ

बस

जातुधान
परबत

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अस

कहँु

रावन

गाई

कर

नासा
जैसे

जाने ह

कर

छाँ ड़ ह
मोर
होइ ह

मोह

पित

॥१॥

॥२॥



॥४॥

॥५॥

अनुमाना

स हत

॥३॥

प हचानी

किपला

तीरथ

सुनु

खावा
दखार

नािर

जान

रोसा

सनेह

जीव

दसकंधर
बल

दननायक

दिर

चह

चलेिस

दाया

क न्हे उँ

ूभु

रघुकुलितलक

छूटइ

जाहू

िबसारे हु

चराचर

भए

धावा

कृ पा

॥२८॥

सरोज

फलु

भूिर

जाइ

अपराध

सो

ऽासा

होई

रघुकुल

जिम

समाना
एहा

होह

खगपित

हा

कैस

कृ तांत

बानी

लीन्हे

जाना
तज

बैदेह

हाँ क

के हं

दोसा

रथ

रथ

को

दे ख

मैनाक

रघुराया
न हं

िनसाचर

धावा

भयँ

तु हार

सुिन
पुिऽ

रे

बीर

िबलाप

सीते

ली न्हिस

आतुर

सरन

लिछमन

हा

रावन

सोई

दे हा
िसखावा
बहबाह
ु ू


॥६॥

॥७॥

॥८॥

रामचिरतमानस

- 20 -

राम

रोष

उत

धिर

कच

दे त

चौचन्ह
तब

पावक

दसानन

िबरथ
मािर

सबोध

काटे िस

िगिर

पर

एह

जोधा

तब हं

दे ह

खग

जाित

धरनी

नभ
सो

धावा
रा ख

एक

भइ

दं ड

काढ़े िस
राम

याध

िबबस

कह

हिर

गयऊ

गीध

॥१०॥

कृ पाना

मृगी

पट

राखत

॥११॥

थोर

सभीता

द न्ह

महँ

॥९॥

करनी

ऽास

नाम

फरा

तेह

अदभुत

जनु

असोक

पुिन

कराल

उताइल

बन

तोरा

बोधा

मु छा

किर

चला

कुल
किर

परम

िनहार

सलभ

गीध

सुिमिर

सीता

लै

सकल

सीत ह

बहोर

किपन्ह

सीत ह

िगरा

खिसआना

चढ़ाइ

बैठे

िबिध

होइ ह

िबदारे िस

जािन
िबलाप

मह

परा

करित

घोरा

क न्ह

िनिसचर

पंख

सीत ह

अित

अरण्यकांड

डार

भयऊ


॥१२॥

॥१३॥

दोहा
हािर

परा

तब

खल

असोक

बहु

पादप

िबिध
तर

भय

रा खिस

ूीित

दे खाइ

जतन

कराइ

॥२९(क)॥

नवान्हपारायण, छठा िवौाम
जे ह

िबिध

सो
रघुपित

छिब

िनिसचर
गह

सीता

अनुज ह

जनकसुता

कपट

िनकर

पद

अकेली

समेत

गए

आौम

दे ख

जानक

हा

गुन

लिछमन
हे

खंजन

बहु

सुक

कुंद

कली

ब न

पास

सुनु

जानक

ौीफल
किम

कनक

कदिल

स ह जात

अनख

मीना

तो ह

मन

तट

भए

िबकल


चले

मधुप
कमल
गज

नेकु

हरषे

दे खी

सिस
िनज

संक

सकल
िूया

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बेिग

पाँती


॥३॥

॥४॥

मृगनैनी
ूबीना


॥५॥

अ हभािमनी

सुनत

सकुच

पाइ

॥२॥

पुनीता

सीता

सरद

द ना

को कला

जहवाँ

नेम

िनकर

केहिर

खोर

ूाकृ त

लता

तु ह

॥१॥

नाह ं

आौम

ॄत

पेली

आौम

मो ह

जस

सील

िबसेषी

मम

सीता

गोदाविर

पूछत

॥२९(ख)॥

बचन

पाह ं

मम

क न्ह

कछु

आजू

तात

कहे उ

ौीराम

िचंता

नाथ

ौेनी

हरषाह ं

िबनु

आयहु

हं सा

बा हज

सीता

दािमनी
धनु

तो ह

भाँती

मृग

दा ड़म
मनोज

हिरनाम

मधुकर

कपोत

रहित

तहवाँ

ह ना

समुझाए
हे

रटित

माह ं

ूभु
जानक

मृग

उर

कर जोर

खािन

खग

चले

बन

अनुज

अनुज

धाइ

दे खी

फर हं

कमल

सँग

रा ख

आवत

पिरहिरहु

कुरं ग

ूगटिस

ूसंसा

॥६॥

राजू

॥७॥

मन

जनु

माह ं

कस

नाह ं

रामचिरतमानस

एह

- 21 -

िबिध

खौजत

पूरनकाम
आगे

राम

परा

िबलपत

सुख

ःवामी

मनुज

चिरत

कर

सुिमरत

राम

चरन

रासी

गीधपित

अरण्यकांड

दे खा

मनहँु

महा

िबरह

अित

कामी

अज

अिबनासी

जन्ह

रे खा

रधुबीर

॥८॥

॥९॥

दोहा
कर

सरोज

िनर ख

राम

तब

कह

नाथ

दसानन

लै

गीध

दरस

लागी

राम

कहा

जा

कर

बचन

ते ह

ताता

मुख

मरत

मुख

गोचर
कह हँ

जन्ह
तात

हरन

दे ह

तज
िबसाल

राख

दे ह

नाथ

माह

तात

दे उँ

दोहा

जिन

कहहु

स हत
पा

चार

कम

ितन्ह

धामा

हिर

भुज

कह

आग

कुल

धिर

मुसकाइ

होई

िनज

कहँु

काह

िपता

अःतुित

बहु

करत

लीन्ह

नाई

ते हं
ौुित

बाता
गावा

के ह

खाँग

गितं

दलभ

पाई

कछु

नाह

तु ह

पूरनकामा

सन

जाइ

दसानन

भूषन

भीरा

कृ पािनधाना

ते

जग

कहह

हिर

अब

मुकुत

मम

चहत

भव

कुरर

अित

अधमउ

तात

राम

जनकसुता

िबलपित

॥३०॥

भंजन

मन

जाहु

पीर

आवा
रघुराई

के

सब

राम

खल

चलन

राखहु

भई

सुनहु

नयन

गात

क न्ह

ूाना

भिर

ःयाम

धीरा

राखउँ

जल

गीध

िबगत

ूभु

लोचन

सीता

मुख

गोसाई

नाम

तज

धिर

कृ पािसंधु

गयउ

मम

तनु

धाम

गित

तनु

बस

परसेउ

दिस

सो
पर हत

छिब

यह

द छन

िसर

आइ

राम

दससीस
पाथोद
िनत

बाहु

गात
नौिम

बल

िनत

रामु

मूमेय

गोिबंद
जे

अनूप
ूचंड

खंडन

सरोज

मुख

कृ पाल

नौिम

मंऽ
राम

बाहु

मना द

गोपर
राम

िनगुन

सगुन
चंड

गुन
सर

पीत

अनूपा

नयन

भिर

बार

आयत

राजीव
िबसाल

मंडन

भव

मजम य

ं हर

भय

सह

मह

लोचनं

मोचनं

॥१॥

मेकमगोचरं

िब यानघन

धरनीधरं

मन

जपंत

संत

अनंत

जन

अकाम

िूय

कामा द

खल

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दल


॥२॥

॥३॥

॥४॥

॥५॥

॥३१॥

पट

ूेरक

॥१॥

छं द
जय

रं जनं
गंजनं

॥२॥


॥१॥

रामचिरतमानस

- 22 -

जे ह

ौुित

किर

यान

यापक

िबरज

अज

कह

गावह ं

मुिन

जे ह

पावह ं

जग

मोहई

यान

िबराग

जोग

अनेक

ूगट

क ना

कंद

सोभा

बृंद

दय

पंकज

भृंग

अगम

सुगम

सुभाव

िनमल

जोगी

जतन

किर

सो
मम
जो

िनरं जन

अरण्यकांड

पःयंित

सो

राम

मम

उर

जं

रमा

बसउ

अंग

िनवास

सो

अनंग

बहु

असम
करत

संतत

समन

अग

सम
मन

दास

संसिृ त

छिब

सीतल

सदा

बस

सदा

गो

बस

िऽभुवन

जासु

॥३॥

सोहई

धनी

क रित

पावनी

गयउ

हिरधाम

क न्ह

राम

॥४॥

दोहा
अिबरल
ते ह
कोमल

भगित

बया

िचत

गीध

अधम

सुनहु

उमा

पुिन

अित
खग

लता

िबटप

आवत

पंथ

कबंध

सुनु

मो ह

गंधब

भोगी


िनपाता

सापा

कहउँ

मै

गित

तोह

तज

चले


ते हं

बहु

पे ख

॥३२॥
कृ पाला

जाचत

जोगी

िबषय

अनुरागी

बन

मृग
कह

पद

मो ह

जो

िबलोकत

सब

रघुनाथ

हो हं

खग

ूभु

िबनु

द न्ह

हिर

कानन

कर

कारन

भाई

घन

द न्ह

अभागी

खोजत

गीध

िनज

द नदयाला

लोग

संकुल

बर

जथोिचत

आिमष

ते

सीत ह

दरबासा

मािग

तहँ

गज

साप

कै

िमटा

सोहाइ


॥१॥

बहताई

॥२॥

बाता

॥३॥

िोह

॥४॥

पंचानन

सो

पापा

ॄ कुल

दोहा
मन

बम

मो ह
ताड़त

पू जअ

िबू
िनज

रघुपित

प ष
सील

धम

चरन
दे इ

गित

सबर

दे ख

राम

सरिसज

ःयाम
ूेम

लोचन

गौर
मगन

ता ह

बाहु

सुंदर
मुख

बचन

सेव

िबू

पू य

अस

गाव हं

गन

यान

सूि

िनज

नाई

गयउ

उदारा

सबर

मुिन

के

िबसाला

दोउ

भूसुर
सब

आए

कर

ताक

समुझावा
िस

गृहँ

जो

बस

ह ना

राम

तज

िसव

कहं ता

गुन

कमल

ता ह

कपट

िबरं िच

समेत

सापत
कह

बचन

भाई
आवा


गुन
पद

जटा

॥३३॥

दे ख

ूीित

मन

आपिन

गित

आौम

पगु

बचन

समु झ

मुकुट

िसर

पर
पुिन

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पद

संता

जयँ

उर

ूबीना

गगन

सबर
पुिन

दे व

॥१॥

भावा

पाई

॥२॥

धारा

भाए

॥३॥

बनमाला

चरन

लपटाई

सरोज

िसर

॥४॥

नावा

रामचिरतमानस

सादर

- 23 -

जल

लै

चरन

पखारे

अरण्यकांड

पुिन

सुंदर

आसन

बैठारे

॥५॥

दोहा
कंद

मूल

ूेम
पािन

िबिध

अधम

ते

कह

सुरस

स हत

जोिर

के ह

फल

ूभु

आग

भइ

अःतुित
अधम

रघुपित

ठाढ़

करौ

अित

दए

खाए

बारं बार

ूभु ह

तु हार

अधम

अित

सुनु

भािमिन
धम


बड़ाई

जाित

पाँित

कुल

भगित

हन

नर

नवधा

भगित

कहउँ

तो ह

ूथम

भगित

संतन्ह

कर

सोहइ

कैसा

धन

पाह ं

संगा

बखािन
ूीित

बाढ़

अित

भार

महँ

मितमंद

अघार

भगित

कर

नाता

गुन

चतुराई

एक

पिरजन

जल

दसिर

॥३४॥

जड़मित

बािरद

सावधान

बल

िबनु

आिन

जाित

ितन्ह

मानउँ

कहँु

िबलो क

अधम

नार

बाता

राम

दे खअ

सुनु

रित

मम

जैसा

मन

माह ं

ूसंगा

कथा


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

दोहा
गुर

पद

पंकज

चौिथ

भगित

मम

मंऽ

जाप

छठ

दम

सातवँ

नव
सोइ

मो ह

सरल
महँु

बृंद

मम

दरसन

कइ

सर ह

सो

सब

बार

बार

ूभु

पद

पंचम

भजन

करमा

िनरत

दे खा

मोत


सपनेहुँ

तज
सो

िनरं तर
संत

न हं

मम

गान

भरोस

बेद
किर

दे खइ

परदोषा

हयँ

हरष
सचराचर

भािमिन

मोरे

सकल

ूकार

भगित

तो

अनूपा

भािमनी

रघुराई

जीव

रघुबीरा

िस

नाई

पाव

जान ह

दे व

आजु

तहँ

ूेम

सुलभ

द ना
कोई

भइ

सुमीव
पूछहु

सब

तोर
सोई
स पा

मितधीरा
सुनाई

छं द
कह

कथा

सकल

िबलो क

तज

जोग

पावक

दे ह

हिर

हिर पद

मुख
लीन

दयँ

पद

पंकज

धरे

भइ

जहँ

न हं

फरे

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॥१॥


॥३॥

॥४॥

॥५॥

िमताई

कथा

॥२॥

किरबरगािमनी

होइ ह
स हत

लेखा

सहज

िनज
कहु

जानतहँू

धरमा

अिधक

पु ष

कहँु

ूकासा

स जन

नािर

जोई


॥३५॥

सुिध

कहह

कपट

अमान

होई

परम

जाहु

भगित

के

गित

फल

करइ

छलह ना

जन्ह
िूय

गन

जग

सन

दरलभ

जनकसुता

बहु

संतोषा

एकउ

तीसिर

िबःवासा

मय

सब

अितसय

गुन

िबरित

जथालाभ

जोिग

पंपा

सील

सम

आठवँ
नवम

मम

सेवा


॥६॥
॥७॥

रामचिरतमानस

- 24 -

नर

िबिबध

िबःवास

कम

किर

अधम

कह

बहु

दास

अरण्यकांड

मत

सोकूद

तुलसी

राम

सब

यागहू

पद

अनुरागहू

दोहा
जाित

हन

महामंद
चले

मन

राम

िबरह

जन्म
सुख

बन

ूभु

करत

दे खु

िबिपन

स हत

सब

खग

हम ह

दे ख

मृग

िनकर

तु ह

आनंद

संग

लाइ

सा

सुिचंितत

पुिन

नािर

जदिप

रा खअ
दे खहु

बसंत

क न्ह

अिस

ऐसे

ूभु ह

िबसािर

सोभा

मृग

मु

अतुिलत

िबषादा
बृंदा

दे खत

के ह

मृगीं

मोिर

कंचन

किर

लेह ं

पुिन

दे खअ

उर

माह ं

सुहावा

सा

हन

िूया

भय

न हं

नृपित

मो ह

दे ह ं

ले खअ
नाह ं

उपजावा


॥२॥

नाह ं

आए

बस

भय

॥१॥

िनंदा

िसखावनु

बस

छोभा

ह हं

खोजन

सुसेिवत

जुबती

न हं

कहँ

मो ह

दोऊ

संबादा

मन

तु ह

मानहँु

भूप

केहिर

करत

मृग

॥३६॥

अनेक

कर

कह हं

नािर

नर

कथा

मानहँु

जाए

बल

कहत

पराह ं

मृग

किरनीं

तात

चहिस

कइ

नािर

करहु

मह

सोऊ

यागा

इव

लिछमन

अघ


॥३॥

॥४॥

॥५॥

दोहा
िबरह

िबकल

स हत

िबिपन

मधुकर

दे ख

गयउ

ॅाता

डे रा

क न्हे उ

िबटप

िबसाल

कदिल

ताल

िबिबध
कहँु

कूजत

कहँु

रथ

फूले

सुन्दर
िपक

िगिर

चतुरंिगनी
लिछमन

तब

दै ख

नाना
सुहाए

गज
बर

बाजी
जूथा

दं द
ु भी

सेन

सँग

लीन्ह

दे खत

काम

अनीका

बल

भट

नार

बात

॥३७(क)॥

॥३७(ख)॥

मनजात
दए

मोह

जनु

धीर

बानैत
िबलग

मन

बने

जाका

बहु

िबलग

तानी
बाना

होइ

छाए

ढे क

महोख

ऊँट

िबसराते

पारावत

मराल

सब

ताजी

बरिन

सहनाई

परम

जनु

भेिर

अकेल

सुिन

िबतान

जनु

झरना

दत

माते

बगमेल

हट क

पताका

मुखर

एक

तासु

कटकु

िनपट

क न्ह

िबिबध

पदचर

िसला

मदन

िबटप

कर

खग

जानेिस

स हत

मानहँु

मो ह

अ झानी

धुजा

लावक

मधुकर

एह

बर

चकोर

तीितर

मनहँु

लता

भाँित

मोर

बलह न

चातक

बंद

िऽिबध
िबचरत
रह हं
ते ह

जाइ
गुन

धीर

गन

बयािर
सब ह
उबर

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बरना

बसीठ ं
चुनौती

ितन्ह

ब था

मनोज

कै

सुभट

आई
द न्ह

जग

सोइ

लीका

भार


॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

॥५॥

॥६॥

रामचिरतमानस

- 25 -

अरण्यकांड

दोहा
तात

तीिन

मुिन

िब यान

लोभ

बोध
गुनातीत

सो

प ष

कै

नर

उमा

कहउँ

पुिन

ूभु

संत

मन

कर हं

िनिमष

महँु

छोभ

दं भ

बल

केवल
िबचािर

कह हं

ःवामी

राम

उमा

माया
भूला

सरोबर

अपना

पंपा

नीरा

जनु

॥३८(ख)॥
अंतरजामी

राम
नट
जगत

नाम

सुभग

घाट
गृह

पाइअ

॥१॥

दाया

अनुकूला
सब

चार

जाचक

॥२॥

सपना

गंभीरा

मनोहर

उदार

ढ़ाई
कं

भजनु

बाँधे

नािर

िबरित

सो

होइ

हिर

बार

मृग

मन

॥३८(क)॥

सब

सकल

पर

सत

तीरा

छूट हं

जा

िनमल
िबिबध

धीरन्ह

लोभ

मुिनबर

अनुभव
जस

काम

बल

न हं

िपअ हं

तहँ

बोध

मद

गए

दय

काम

दे खाई

लोभ

इं िजाल

खल

बचन

द नता

मनोज

जहँ

इ छा

के

ूबल

धाम

सचराचर

कािमन्ह
बोध

अित

भीरा


॥३॥

॥४॥

दोहा
पुरइिन

सबन

मायाछन्न
सु ख
था

िबकसे

ताल

खग
समीप
प लव
मंद
कुहू

सब

के

तमाला

कुसुिमत

सुगंध

भारन

पर

उपकार

धुिन

करह ं

निम
पु ष

जात

जिम

बहु

भृंगा

चंचर क

दोहा

सब
नव हं

भूिम

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बोलाई
सुहाए

रसाला
कर

गाना

मनोहर
यान

सुसंपित

जाई

िबटप

पटली

सरस

रहे

लेत

परास

बहइ

ूसंसा

न हं

कानन

पनस

रव

करत

जनु

दिस

संतत

॥३९(ख)॥

बरिन

पिथक

पाटल

सुिन

जनु

बनइ

चहु

िबटप

गुंजत

मा हं

मुखर

नाना

सुभाऊ

जल

मधुर
दे खत

॥३९(क)॥

जा हं

िबलो क

संजुत

छाए

अगाध

मम

सुख

ूभु

सुहाई

गृह

कदं ब

फल


िनगुन

अित

दन

समुदाई

मुिनन्ह

को कल

जैसे

रं गा

िगरा

बेिग

एकरस

कलहं सा

खग
गन

जल

दे खऐ

नाना

बकुल

सीतल
कुहू

धमसीलन्ह

बक

चंपक
नव

मीन

जलकु कुट

चबवाक
सुन्दर

सरिसज

बोलत

ओट

बाऊ

मुिन

पाइ

॥१॥

॥२॥

॥३॥

॥४॥

टरह ं

िनअराइ

॥४०॥

॥५॥

रामचिरतमानस

- 26 -

दे ख

राम

दे खी
तहँ

अित

सुंदर
पुिन

बैठे

िचर

त बर

सकल

छाया

दे व

बैठे

कृ पाला

कहत

भगवंत ह

दे खी

किर

अंगीकारा

ूसन्न

मुिन

म जनु

आए

परम

िबरहवंत

तलावा

राम

नाना

दख

िबचािर

नारद

कर

बीना

राम

चिरत

मृद ु

बानी

ःवागत

पूँिछ

पुिन

िनकट

बैठारे

धाम

सहत

उठाई

िनज

सोच

यह

िलए

किर

बिन ह

गए

जहाँ

ूेम

राखे

सादर

॥१॥

रसाला

भारा

॥३॥

आई

आसीना

बहु

भाँित

चरन

पखारे

लाई


॥४॥

बखानी

उर


॥२॥

िबसेषी

सुख

बार

िसधाए

अवस

ूभु

बहत

लिछमन

कथा

अस

स हत

पावा

रघुराया

भा

िबलोकउँ

दं डवत

अःतुित

स हत

मन

ूभु ह

करत

अनुज

सुख

नारद

ऐसे
गावत

परम

सन

साप

क न्ह

अनुज

मोर

जाई

अरण्यकांड

॥५॥

दायक

दोहा

सुनहु
दे हु

जानहु

नाना

िबिध

िबनती

किर

नारद

बोले

बचन

तब

उदार

सहज

रघुनायक

एक

बर

मुिन

मागउँ

तु ह

ूभु
जोिर

अगम

सुभाऊ

जयँ

सरो ह

सुंदर

ःवामी

मोर

ूसन्न

पािन
बर

जानत

सन

कबहँु

॥४१॥

सुगम

ज िप

जन

जािन

अंतरजामी

करउँ

॥१॥

दराऊ

भोर

कवन बःतु अिस िूय मो ह लागी । जो मुिनबर न सकहु तु ह मागी ॥२॥

जन
तब

ज िप
राम

कहँु

कछु

अदे य

नारद

बोले

सकल

नामन्ह

ूभु

के

न हं

मोर

हरषाई

नाम

अनेका

ते

अिधका

अस

अस

बर

ौुित

होउ

िबःवास

मागउँ

कह

नाथ

तजहु

करउँ

अिधक

अघ

जिन

एक

खग

ढठाई

॥३॥

बिधका

॥४॥

गन

एका

दोहा
राका

रजनी

अपर

अित

नाम

उडगन

एवमःतु

मुिन

तब

मन

नारद

ूसन्न

राम

जब हं

तब

िबबाह

सुनु

मुिन

करउँ

भगित

सदा


तो ह

हरष

िनज

चाहउँ
कहउँ

ितन्ह

िबमल
अित

जानी

माया

सहरोसा

भगत

ूभु


रखवार

ूभु
भज हं

उर

पद

नारद

जे

जिम

॥४२(ख)॥

बोले

मृद ु

बानी

द न्हा

कारन

मो ह

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सुनहु

तज

बालक

माथ

मो ह

के ह

॥४२(क)॥

रघुनाथ

नायउ

मोहे हु

सोम

योम

कृ पािसंधु

पुिन

सोइ

नाम

कहे उ

क न्हा

कै

राम
बसुहुँ

सन

रघुनाथ ह
ूेरेउ

तव

करै

सकल

राखइ

रघुराया
भरोसा

महतार


॥१॥

॥२॥

रामचिरतमानस

- 27 -

गह

िससु

ब छ

ूौढ़

भएँ

ते ह

मोरे

ूौढ़

तनय

सम

बल

िनज

जन ह
यह

मोर
िबचािर

सुत

पं डत

मो ह

पुरान

नेम

दबासना

कुमुद

धम

सकल

पुिन

ममता

जवास

पाप

उलूक

िनकर

बल

सरसी ह

सील

अवगुन
ताते

क न्ह

सुिन

रघुपित

के

कहहु

कवन

ूभु

भज हं
सादर

संतन्ह
सुनु

मुिन

षट

िबकार

अिमतबोध
सावधान

अस
ल छन

संतन्ह
जत
अनीह
मानद

के

मुिन

र ती

िमतभोगी

िरतु

दख

जािन

मुिन

तन

पुलक

नयन

सेवक

सुनहु

कहहु

जन्ह

पर

यान

रं क

राम

नर

भव

उन्ह

ते

अ कंचन

स यसार
धम

संसार

तज

चरन

मम

दख

सरोज

र हत
िूय

ितन्ह

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॥४॥

॥४४॥
भिर

आए

ूीती

मंद

अभागी

िबसारद
बस

सुिच

भीरा
रहऊँ
सुखधामा

॥१॥

॥२॥

॥३॥

किब

कोिबद

जोगी

॥४॥

गित

परम

ूबीना

॥५॥

िबगत
कहँु

दोहा
गुनागार

॥३॥

ूबीना

भंजन

अँिधआर

िब यान

नाथ

अचल

धीर

ममता

॥२॥

मंदा

खािन

जयँ

पाई

कह हं

िऽय

सब

यागी

सुख

यह

अकामा

दहइ

सम

॥१॥

एका

ितन्ह ह

कहऊँ

बरषा

रजनी

नार

सुखदाई

बनसी

॥५॥

बसंता

सदा

िनिबड़

॥४३॥

सब

िसिसर

॥४॥

सरद

नािर

ूमदा

तजह ं

नािर

हरषूद

नािर

दोहा

रघुबीरा

मदह ना

हम

नारद

अनघ

कहँ

कहँु

आह

धािर

सोषइ

इन्ह ह

पलुहइ

ॅम

गुन

मीषम

बाता

िरपु

नािर

िबिपन

॥३॥

अमानी

न हं

कै

माया पी

होइ

भगित

मोह

मोह

होइ

सुहाए

मुिन

ूबल

मीना

अिस

यान

दोहा

सूलूद

ूभु

पाएहँु

िनवारन

बोले

के

सब

कै

बोध

दखद

सुखकार

बचन

काम

ितन्ह

बहताई

मूल

कहँ

बृंदा

स य

दहु ु

अरगाई

पािछिल
दास

भेका

समुदाई

न हं
सम

संता

म सर

करइ

जननी

सुत

दा न

झार

राखइ

बालक

मद

ौुित

तहँ

ूीित

भजह ं

जलाौय

मद

ताह

अित

बोध

पुिन

बल

महँ

तप

यानी

ितन्ह

कह

धाई

माता

लोभा द

जप

जे

पर

बोध

मुिन

बुिध

अह

काम

सुिन
काम

अनल

अरण्यकांड

दे ह

संदेह

गेह


॥४५॥

रामचिरतमानस

- 28 -

िनज

गुन

सम

सीतल

जप

तप

ौ ा

ॄत

मान

मुिन

सुनु

सकुचाह ं

याग हं
दम

दाया

िबनय

मद

सुन हं

कर हं

सदा

साधुन्ह के

नीती

संजम

मयऽी

िबबेक

दं भ

सुनत

न हं

छमा

िबरित
गाव हं

ौवन

नेमा

गुन

भूिल

जेते

ूीित

पद

बेद

दे हं

कुमारग

ूीती
ूेमा
पुराना

पर हत

रत

सारद

ौुित

सक हं

हरषाह ं

अमाया

जथारथ
र हत

सन

पद

हे तु

कह

सब हं
िबू

बोध

अिधक

गोिबंद

मम

लीला

सुनत

सुभाउ

गु

मु दता

काऊ

मम

गुन

सरल

िब याना

पर

अरण्यकांड

सक

अस

द नबंधु

िस

नाह

ते

सारद
कृ पाल

बार हं

धन्य

पद

पंकज

गहे

अपने

भगत

गुन

िनज

मुख

कहे

गए

रँ ए

तुलसीदास

आस

िबहाइ

जे

नारद
हिर

रँ ग

दोहा
रावनािर

जसु

पावन

राम

भगित

दप

िसखा

सम

भज ह

राम

तज

पाव हं
जुबित
काम

गाव हं
िबनु
तन

मद

सुन हं

जे

लोग

जप

जोग

॥४६(क)॥

जिन

होिस

पतंग

िबराग
मन

कर ह

सदा

सतसंग


॥४६(ख)॥

मासपारायण, बाईसवाँ िवौाम
इित ौीमिामचिरतमानसे सकलकिलकलुषिव वंसने तृतीयः सोपानः समा ः ।

अरण्यकाण्ड समा

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॥४॥

सुनत
ॄ पुर

॥२॥

तेते

सीला

नारद
चरन न्ह

॥३॥

सेष
बार

॥१॥

पाऊ

छं द
कह

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