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पत्नी से पित

िमिस्टर सेठ को सभी िहिन्दस
ु तानी चीजो से नफरत थी ओर उनकी सुन्दरी पत्नी गोदावरी को सभी
िवदेशी चीजो से िचढ ! मिगर धैर्यर ओर िवनय भारत की देिवयो का आभूषण हिैर् गोदावरी िदल पर हिजार
जब करके पित की लायी हिु ई िवदेशी चीजो का व्यवहिार करती थी, हिालांकिक भीतर हिी भीतर उसका हिदय
अपनी परवशता पर रोता था। वहि िजस वक अपने छज्जे पर खड़ी हिोकर सड़क पर िनगाहि दौड़ाती ओर
िकतनी हिी मििहिलाओंक को खद्दर की सािड़यो पहिने गवर से िसर उठाते चलते देख्रती, तो उसके भीतर की
वेदना एक ठंकडी आहि बनकर िनकल जाती थी। उसे ऐसा मिालूमि हिोता था िक मिुझसे ज्यादा बदनसीब
औरत संकसार मिे नहिी हिै मिैर् अपने स्वदेश वािसंकयो की इतनी भी सेवा नहिी कर सकती? शामि को िमिस्टर सेठ
के आग्रहि करने पर वहि कहिी मिनोरंकजन या सैर्र के िलए जाती, तो िवदेशी कपड़े पहिने हिु ए िनकलते शमिर से
उसकी गदर न झुक जाती थी। वहि पत्रो मिे मििहिलाओंक के जोश- भरे व्याख्यान पढती तो उसकी आंक खे
जगमिगा उठती, थोड़ी देर के िलए वहि भूल जाती िक मिै यहिांक बन्धनो मिे जकड़ी हिई़ हिू ।ंक
हिोली का िदन था, आठ बजे रात का समिय । स्वदेश के नामि पर िबके हिु ए अनुरािगयो का जुलूस आकर
िमिस्टर सेठ के मिकान के सामिने रूका ओर उसी चौड़े मिैर्दान मिे िवलायती कपड़ो हिी हिोिलयांक लगाने की
तैर्यािरयांक हिोने ल्रगी। गोदावरी अपने कमिरे मिे िखड़की पर खड़ी यहि समिारोहि देखती थी ओर िदल
मिसोसकर रहि जाती थी एक वहि हिैर्, जो यो खुश-खुश, आजादी के नशे-मितवाले, गवर से िसर उठाये हिोली
लगा रहिे हिै, और एक मिे हिू ंक िक िपंकजड़े मिे बन्द पक्षी की तरहि फड़फड़ा रहिी हिू ंक । इन तीिलयो को केसे तोड़
दंक ?ू उसने कमिरे मिे िनगाहि दौड़ायी । सभी चीजे िवदेशी थी । स्वेदेशी का एक सूत भी न था यहिी चीजे वहिॉँ
जलायी जा रहिी थी ओर वहिी चीजे यहिॉँ उसके ह्रदय मिे संकिचत ग्लािन की भांकित सन्दक
ु ो मिे रखी हिु ई थी।
उसके जी मिे एक लहिर उठ रहिी थी िक इन चीजो को उठाकर उसी हिोली मिे डाल दे, उसकी सारी ग्लािन
और दबु र लता जलकर भस्मि हिो जाय। मिगर पित को अप्रसन्नता के भय ने उसका हिाथ पकड़ िलया ।
सहिसा िमि० सेठ के आकर अन्दर कहिा- जरा इन िसरफरो को देखो, कपड़े जला रहिे हिै। यहि पागलपन,
उन्मिाद और िवद्रोहि नहिी तो और क्या हिैर्। िकसी ने सच कहिा हिैर्, िहिदस्ु तािनयो के न अक्ल आयी हिैर् न
आयेगी । कोई कल भी तो सीधी नहिी ।
गोदावरी ने कहिा – तुमि भी िहिंकदस्ु तानी हिो।
सेठ ने गमिर हिोकर कहिा- हिॉ, लेिकन मिुझे इसका हिमिेशा खेद रहिता हिैर् िक ऐसे अभागे देश मिे क्यो पैर्दा हिु आ।
मिै नहिी चाहिता िक कोई मिुझे िहिन्दस्ु तानी कहिे या समिझे । कमि- से–कमि मिैने आचार –व्यवहिार वेश-भुषा,
रीित-नीित, कमिर – वचन मिे कोई ऐसी बात नहिी रखी, िजससे हिमिे कोई िहिन्दस्ु तानी हिोने का कलंकक लगाए

आग की िशखाएंक आसमिान से बाते करने लगी. जैर्से बच्चे मिाता के दध ू के िलए रोते हिैर्। सहिसा हिोली जली. तो क्यो दौड़े वैर्द के घर जाते हिो? पररमिात्मिा उन्हिी की मिदद करता हिैर्. लेिकन अपने घर मिे आग लगा देना.बस धारण िकए हिु ए आकाश के देवताओंक से गले िमिलने जा रहिी हिो । दीनानाथ ने िखड़की बन्द कर दी. तो आप हिी आप भोजन िमिल जाएगा बीमिार हिोते हिो . िजन्हिे परमिात्मिा कभी पसंकद नहिी कर सकता। गोदावरी –तो यहिँ के लोगो का चुपचाप बैर्ठे रहिना चािहिए? सेठ. तो हिमि क्यो मिोटा टाट खरीदे । इस िवषय मिे हिर एक को पूरी स्वाधीनता हिोनी चािहिए । न जाने क्यो गवनर मिेट ने इन दष्टु ो को यहिांक। जमिा हिोने िदया । अगर मिेरे हिाथ मिे अिधकार हिोता. वहि मिेरा स्वामिी हिैर्. घर की चीजो को जला देना. भारत आध्यािक त्मिक देश हिैर्। क्या अध्यामित्मि का यहिी आशय हिैर् िक परमिात्मिा के िवधानो का िवरोध िकया जाय? जब यहि मिालूमि हिैर् िक परमिात्मिा की इच्छा के िवरूद एक पत्ती भी नहिी िहिल सकती.मिै इन्हिे अपना भाई नहिी समिझता। गेदावरी.तो िफर क्यो नोकरी करते हिो? परमिात्मिा की इच्छा हिोगी. मिानो स्वाधनीता की देवी अिग. उनके िलए यहि दृश्य भी असह था। गोदावरी इस तरहि खड़ी रहिी. कोई अंकग्ररेजो का बाल भी बॉका न कर सकेगा ! गोदावरी .दाल का भाव मिालूमि हिोता । गोदावरी ने अपने शब्द मिे तीक्ष्ण ितरस्कार भर के कहिा—तुम्हिे अपने भइयो का जरा ख्याल नहिी आता ? भारत के िसवा और भी कोई देश हिैर्. वहि इन्हिी की जेब से तो आता हिै ! सेठ. रोना चािहिए । इस तरहि रोना चािहिए.नहिी.। पूिछए. िजस पर िकसी दस ू री जाित के शासन हिो? छोटे-छोटे राष्टर भी िकसी दस ू री जाित के गुलामि बनकर नहिी रहिना चाहिते । क्या एक िहिन्दस्ु तानी के िलए यहि लज्जा की बात नहिी हिैर् िक वहि अपने हिी भाइयो के साथ अन्याय करे ? सेठ ने भोहिै चढाकर कहिा. तो यहि मिुमििकन हिैर् िक यहि इतना बड़ा देश परामिात्मिा की मिजी बगैर्र अंकगरेजो के अधीन हिो? क्यो इन दीवानो को इतनी अक्ल नहिी आती िक जब तक परमिात्मिा की इच्छा न हिोगी. तो सबो को जहिन्नुमि रसीद कर देता । तब आटे. जैर्से कोई गाय कसाई के खूट ंक े पर खड़ी हिो । उसी वक िकसी के गाने का आवाज आयी- . ऐसे कामि हिैर्.आिखर तुम्हिे सरकार जो वेतन देती हिैर्. जो अपनी मिदद आप करते हिैर्। सेठ—बेशक करता हिैर्. जब हिमिे आठ आने गज मिे बिढया कपड़ा िमिलता हिैर्. न जाने इन दष्टु ो को क्या सनक सवार हिु ई हिैर् कहिते हिै.मिुझे इससे कोई मितलब नहिी िक मिेरा वेतन िकसकी जेब से आता हिैर् मिुझे िजसके हिाथ से िमिलता हिैर्.

भगवान् आपको खुशी रखे । अब यहिी सोता हिू ँ। -------2 दस ू रे िदन प्रात: काल कॉँग्रेस की तरफ से एक आमि जलसा हिु आ । िमिस्टर सेठ ने िवलायती टू थ पाउडर िबलायती बुश से दॉँतो पर मिला . तब भी तुझे खाने को नहिी िमिलता? अन्धा.क्या करूंक मिाता. पर उसेमिे उसे एक पैर्सा िमिला । नोट ओर रूपये थे.खा लूगंक ा मिाता जी. कोई खाने को नहिी देता । गोदावरी. िवलायती चाय िवलायती प्यािलयो मिे पी.इस पैर्से का चवैर्ना लेकर खा ले । अन्धा. मिगर अन्धे फकीर को नोट या रूपये देने का सवाल हिी न था पैर्से अगर दो –चार िमिल जाते. और अपनी मिोटर साइिकल पर बैर्ठ फ्लावर शो देखने चले गये । . िवलायती साबुन से नहिाया.‘वतन की देिखए तकदरी कब बदलती हिै’ गोदावरी के िवषाद से भरे हिु ए ह्रदय मिे एक चोट लगी । उसने िखड़की खोल दी और नीचे की तरफ झॉँका । हिोली अब भी जल रहिी थी और एक अंकधा लड़का अपनी खँजरी बजाकर गा रहिा था‘वतन की देिखए तकदीर कब बदलती हिैर्।’ वहि िखड़की के सामिने पहिु च ंक ा तो गोदावरी पे पुकारा.ओ अन्धे ! खड़ा रहिा । अन्धा खड़ा हिो गया। गोदवारी ने सन्दक ु खोला. तो इस वक वहि जरूर दे देती । पर वहिांक एक हिी पैर्सा था. िवलायती दध ू िपया। िफर िवलायती सूट धारण करके िवलायती िसंकगार मिुंकहि मिे दबाकर घर से िनकले. वहि भी इतना िघसा हिु आ िक कहिार बाजार से लौटा लाया था । िकसी दक ू ानदार ने न िलया था । अन्धे को वहि पैर्सा देते हिु ए गोदावरी को शमिर आ रहिी थी। वहि जरा देर तक पैर्से को हिाथ मिे िलए संकशय मिे खड़ी रहिी । तब अन्धे को बुलाया ओर पैर्सा दे िदया । अन्धे ने कहिा—मिाता जी कुछ खाने को दीिजए। आज िदन भर से कुछ नहिी खाया । गोदावरी—िदन भर मिॉँगता हिैर्. िवलायती िबस्कुट िवलायती मिक्खन के साथ खाया.

तो क्या मिे सजा पाऊँगी? उसी सजा ये खुद झेलेगे । उसका अपराध इनके ऊपर हिोगा। इन्हिे अपने कमिर और वचन का अिक ख्तयार हिै मिुझे अपने कमिर और वचन का अिक ख्तयार । यहि अपनी सरकार की गुलामिी करे.नहिी ! ‘बहिु त अच्छा तमिाशा हिैर्।’ ‘मिै कॉँग्रेस के जलसे मिे जा रहिी हिू ंक । िमिस्टर सेठ के ऊपर यिद छत िगर पड़ी हिोती या उन्हिोने िबजली का तार हिाथ से पकड़ िलया हिोता. ‘जब यहि मिेरी इतनी सी बात नहिी मिान सकते.तुमि कॉग्रेस के जलसे मिे जाओगी ? ‘हिांक जरूर जांकउगी !. अपशब्द कहिे तो नौकर उसको सहिन करने के िलए मिजबूर नहिी। गुलामि के िलए कोई शतर नहिी. ‘ मिैर् नहिी चाहिता िक तुमि वहिँ जाओ।’ ‘अगर तुमि मिेरी परवाहि नहिी करते. पर उस भले आदमिी पर उसके सारे हिाव –भाव.ंक क्यो इनकी इच्छाओंक की लौंडी बनी रहिू ंक? मिैने इनके हिाथ कुछ अपनी आत्मिा नहिी बेची हिैर्। अगर आज ये चोरी या गबन करे .िवलास को कोई असर न हिु आ । खुद तो स्वदेशी वसो के व्यवहिार करने पर क्या राजी हिोते.गोदावरी को रात भर नीद नहिी आयी थी. तो मिेरा धमिर नहिी िक तुम्हिारी हिर एक आज्ञा का पालन करूँ।’ . उसकी दैर्िहिक गुलामिी पीछे हिोती हिैर्. मिानिसक गुलामिी पहिले हिी हिो जाती हिै। सरकार ने इनसे कब कहिा हिैर् िक देशी चीजे न खरीदो।’ सरकारी िटकटो तक पर शब्द िलखे हिोते हिै ‘स्वेदेशी चीजे खरीदो। इससे िविदत हिैर् िक सरकार देशी चीजे का िनषेध नहिी करती। िफर भी यहि मिहिाश्य सुखररू बनने की िफक्र मिे सरकार से भी दो अंकगुल आगे बढना चाहिते हिैर् ! िमिस्टर सेठ ने कुछ झेपते हिु ए कहिा—कल न फ्लावर शो देखने चलोगी? गोदावरी ने िवरक मिन से कहिा. िजसने अपने को स्वाथर के हिाथो बेच िदया. दरु ाशा ओर पराजय की किठन यन्त्रणा िकसी कोड़े की तरहि उसे ह्रदय पर पड़ रहिी थी । ऐसा मिालुमि हिोता था िक उसके कंकठ मिे कोई कड़वी चीज अटक गयी हिैर्। िमिस्टर सेठ का अपने प्रभाव मिे लाने की उसने वहि सब योजनाएँ की. गोदावरी के िलए एक खद्दर की साड़ी लाने पर भी सहिमित न हिु ए । यहिँ तक िक गोदाबरी ने उनसे कभी कोई चीज मिांकगने की कसमि खा ली । क्रोध और ग्लािन ने उसकी सद्भावना को इस तरहि िवकृत कर िदया जेसे कोई मिैर्ली बस्तु िनमिर ल जल को दिू षत कर देती हिैर् उसने सोचा. तब िफर मिै क्या इनके इशारो पर चलू. मिुझे क्या गरज हिैर् िक उसमिे उनका सहियोग करूँ ! िजसमिे आत्मिािभमिान नहिी. मिृद ु मिुस्कान ओर वाणी. उसके प्रित अगर मिेरे मिन मिे भिक न हिो तो मिेरा दोष नहिी। यहि नौकर हिैर् या गुलामि ? नौकरी और गुलामिी मिे अन्तर हिैर् नौकर कुछ िनयमिो के अधीन अपना िनिदर ष्ट कामि करता हिैर्। वहि िनयमि स्वामिी और सेवक दोनो हिी पर लागू हिोते हिै। स्वामिी अगर अपमिान करे. जो एक रमिणी कर सकती हिैर्. अंकगरेजो की चौखट पर नाक रगड़े. तो भी वहि इतने बदहिवास न हिोते । आँ खे फाड़कर बोले.

इसकी िचंकता नहिी. तुमि िकसी के ईश्वर नहिी हिो। िमिस्टर सेठ सूब गमिर पड़े. यहि वहि पैर्सा हिैर्. आिखर मिुंकहि फेरकर लेटे रहिे। प्रात: काल फ्लावर शो जाते समिय भी उन्हिोने गोदावरी से कुछ न कहिा । 3 गोदावरी िजस समिय कँग्रेस के जलसे मिे पहिु च ंक ी. न जाने िकधर से आ गया और ज्यो हिी चन्दे की झोली उसके सामिने पहिु ँची. वहि गा रहिा हिैर्।– ‘वतन की देिखए तकदीर कब बदलती हिैर्।’ इस पीिड़त ह्रदय मिे िकतना उत्सगर ! क्या अब भी कोई संकदेहि कर सकता हिैर् िक हिमि िकसकी आवाज हिै? . लेिकन सड़क पर गाने वाले अन्धे की कौन परवाहि करता हिैर्। झोली मिे पैर्सा डालकर अन्धा वहिाँ से चल िदया और कुछ दरू जाकर गाने लगा‘वतन की देिखए तकदीर कब बदलती हिैर्।’ सभापित ने कहिा – िमित्रो. तो मिुझे सत्य की िवजय मिे संकदेहि नहिी मिालूमि हिोता । हिमिारे यहिाँ क्यो इतने फकीर िदखायी देती हिै? या तो इसिलए िक समिाज मिे इन्हिे कोई कामि नहिी िमिलता या दिरद्रता से पैर्दा हिु ई बीमिािरयो के कारण यहि अब इस योग्य हिी नहिी रहि गये िक कुछ कामि करे। या िभक्षावृित ने इनमिे कोई सामिथ्यर हिी नहिी छोड़ी । स्वराज्य के िसवा इन गरीबो का अब उदार कौन कर सकता हिैर्। देिखए. देिखए. धमििकयॉ दी. तो कई हिजार मिदो और औरतो का जमिाव था । मिन्त्री ने चन्दे की अपील की थी और कुछ लोग चन्दा दे रहिे थे । गोदावरी उस जगहि खड़ी हिो गई जहिॉँ और िसयॉँ जमिा थी ओर देखने लगी िक लोग क्या देते हिै। अिधकाश लोग दो-दो चार-चार आना हिी दे रहिे थे । वहिांक ऐसा धनवान था हिी कौन? उसने अपनी जेब टटोली. तब भी तो उस बेचारे को रोटी नहिी िमिलती ! अगर यहिी गाना िपश्वाज और साज के साथ िकसी मिहििफल मिे हिोता तो रूपये बरसते.िमिस्टर सेठ ने आंक खो मिे िवष भर कर कहिा – नतीजा बुरा हिोगा । गोदावरी मिानो तलवार के सामिने छाती खोल कर बोली. तो एक रूपया िनकला । उसने समिझा यहि काफी हिैर्। इसी इन्तजार मिे थी िक झोली सामिने आवे तो उसमिे डाल दँ ?ू सहिसा वहिी अन्धा लड़का. िजसे िक उसने पैर्सा िदया था. उसने उसमिे कुछ डाल िदया । सबकी आँ खे उसकी तरफ उठ गयी । सबको कुतूहिल हिो रहिा था िक अन्धे ने क्या िदया? कहिी एक-आध पैर्सा िमिल गया हिोगा। िदन भर गला फाड़ता हिैर्.जो एक गरीब उन्धा लड़का इस झोली मिे डाल गया हिैर्। मिेरी आंक खो मिे इस एक पैर्से की कीमित िकसी अमिीर के एक हिजार रूपये से कमि नहिी । शायद यहिी इस गरीब की सारी िबसात हिोगी। जब ऐसे गरीबो की सहिानुभूित हिमिारे साथ हिैर्.

एकंक सौ बीस रूपये । लोगो के चेहिरे पर हिवाइयँ उड़ने लगी। समिझ गये. मिानो िकसी दंकगल के दशर क अपने पहिलवान कीिवजय पर मितवाले हिो गये हिो। . जो मिेरी बराबरी कर सके ! गोदावरी के मिन मिे स्पदार का भाव जाग उठा । चाहिे कुछ हिो जाय. क्या वहि वहिी तौ पेसा नहिी हिैर्. जो रात मिैने उसे िदया था? क्या उसने सचमिुच रात को कुछ नहिी खाया? उसने जाकर समिीप से पैर्से को देखा. िक चारो तरफ तािलयॉ पड़ने लगी. मिगर ज्यो हिी गोदावरी के मिुँहि से िनकला डेढ सौ. इसी के हिाथ िवजय रहिी। िनराश आंक खो से गोदावरी की ओर ताकने लगे. उसके त्याग का स्मिरण करके गोदावरी अनुरक हिो उठी । कँपते हिु ए स्वर मिे बोली – मिुझे आप यहि पैर्सा दे दीिजए. जो मिेज पर रखा िदया गया था। उसका ह्रदय धक् से हिो गया । यहि वहिी िघसा हिु आ पैर्सा था। उस अंकधे की दशा. मिानो कहि रहिा हिो िक यहिॉँ कौन हिैर्. अब की आप हिी हिमिारी लाज रिखए । गोदावरी ने उस आदमिी की ओर देखकर धमिकी से िमिले हिु ए स्वर मिे कहिा – सौ रुपये। धनी आदमिी ने भी तुरत ंक कहिा. मिै पॉँच रूपये दगंक ू ी । सभापित ने कहिा – एक बहिन इस पैर्से के दामि पांकच रूपये दे रहिी हिैर्। दस ू री आवाज आयी –दस रुपये। तीसरी आवाज आयी. इसके हिाथ मिे यहि पैर्सा न जाय । समिझता हिैर्.(पैर्सा उपर उठा कर) आपमिे कौन इस रत्न को खरीद सकता हिैर्? गोदावरी के मिन मिे िजज्ञासा हिु ई.बीस रुपये । गोदावरी ने इस अिक न्तमि व्यिक की ओर देखा । उसके मिुख पर आत्मिािभमिान झलक रहिा था. इसने बीस रुपये क्या कहि िदये. सारे संकसार का मिोल ले िलया । गोदावरी ने कहिा – चालीस रूपये । उस पुरूष ने तुरत ंक कहिा—पचास रूपये । हिजारो आँ खे गोदावरी की ओर उठ गयी मिानो कहि रहिी हिो.

तुम्हिारे खचर करने का तुम्हिे िजतना अिक ख्तयार हिैर्. जब तलाक का कानून पास करा लोगे और तलाक दे दोगे. तब न रहिेगा। िमिस्टर सेठ ने अपना हिैर्ट इतने जोर से मिेज पर फेका िक वहि लुढकता हिु आ जमिीन पर िगर पड़ा और बोले—मिुझे तुम्हिारी अक्ल पर अफसोस आता हिैर्। जानती हिो तुम्हिारी इस उद्दंकडता का क्या नतीजा हिोगा? मिुझसे जवाब तलब हिो जाएगा। बतलाओ.उस आदमिी ने िफर कहिा – पौने दो सौ। गोदावरी बोली – दो सौ। िफर चारो तरफ से तािलयँ पड़ी। प्रितद्वंकद्वी ने अब मिैर्दान से हिट जाने हिी मिेअपनी कुशल समिझी । गोदावरी िवजय के गवर पर नम्रता का पदार डाले हिु ए खड़ी थी और हिजारो शुभ कामिनाऍंक उस पर फुलो की तरहि बरस रहिी थी। 4 जब लोगो को मिालूमि हिु आ िक यहि देवी िमिस्टर सेठ की बीबी हिैर्।. मिानो सारी देहि शुन्य पड़ गयी हिो । िफर दानो मिुिटयँ बांकध ली । दांकत पीसे.क्या तुमि मिेरे मिुहि ंक मिे कािलख पुतवाना चाहिती हिो? गोदावरी ने शांकत भाव से कहिा-कुछ मिुहि से भी तो कहिो या गािलयॉँ हिी िदये जाओगे? तुम्हिारे मिुहिँ मिे कािलख लगेगी. तुम्हिे मिेरा रुपया खचर करने का कोई हिक नहिी हिैर्। गोदावरी-िबलकुल गलत. ओठ चबाये और उसी वक घर चले । उनकी मिोटर –साईिकल कभी इतनी तेज न चली थी। घर मिे कदमि रखते हिी उन्हिोने िचनगािरयो –भरी ऑंकखो से देखते हिु ए कहिा. क्या जवाब दँगू ा? जब यहि जािहिर हिैर् िक कांकग्रेस सरकार से . उतना हिी मिुझको भी हिैर्। हिॉँ. तो उन्हिे ईष्यारमिय आनंकद के साथ उस पर दया भी आयी । िमिस्टर सेठ अभी फ्लावर शो मिे हिी थे िक एक पुिलस के अफसर ने उन्हिे यहि घातक संकवाद सुनाया । िमिस्टर सेठ सकते मिे पड़ गये. तो क्या मिेरे मिुहिँ मिे न लगेगी? तुम्हिारी जड़ खुदेगी. तो मिेरे िलए दस ू रा कौन-सा सहिारा हिैर्। िमिस्टर सेठ—सारे शहिर मिे तूफान मिचा हिु आ हिैर्। तुमिने मिेरे िलए रुपये िदये क्यो? गोदावरी ने उसी शांकत भाव से कहिा—इसिलए िक मिै उसे अपना हिी रुपया समिझती हिू ँ। िमिस्टर सेठ दॉँत िकटिकटा कर बोले—हिरिगज नहिी.

क्लको ंक पर रोब नहिी जमिाया. तो तुम्हिारी हिी बुिद का भ्रमि था। रोज अखबारो मिे देखती हिो. साहिब उतरे तो झुककर उन्हिोने सलामि िकया। मिगर साहिब ने मिुँहि फेर िलया। . तब आध घण्टे के बाद िमिसले लेकर पहिु ँचते थे। आज वहि बरामिदे मिे खड़े थे. तो उनके कदमि पीछे रहि जाते थे! न जाने आज वहिॉँ क्या हिाल हिो। रोज की तरहि दफ्तर मिे पहिु ँच कर उन्हिोने चपरािसयो को डॉंकटा नहिी. न पुिलस इसकी परवाहि करती हिैर्। मिगर पुिलस को िजस मिामिले मिे राजनीित की गंकध भी आ जाती हिैर्। िफर देखो पुिलस की मिुस्तैर्दी। इन्सपेक्टर जरनल से लेकर कांकस्टेिबल तक ऐिड़यो तक का जोर लगाते हिै। सरकार को चोरो से भय नहिी। चोर सरकार पर चोट नहिी करता। कॉँग्रेस सरकार को अिक ख्तयार पर हिमिला करती हिैर्. कोई तलवार िसर पर लटक रहिी हिैर्। साहिब की मिोटर की आवाज सुनते हिी उनके प्राण सूख गये। रोज वहि अपने कमिरे मिे बैर्ठ रहिते थे। जब साहिब आकर बैर्ठ जाते थे. िकसी का कुछ पता नहिी चलता. तो बीिसयो सादे कपड़े वाले पुिलस अफसर उसकी िरपोटर लेने बैर्ठते हिै। काँग्रेस के सरगनाओंक के पीछे कई-कई मिुखिबर लगा िदए जाते हिै.दश्ु मिनी कर रहिी हिैर् तो कांकग्रेस की मिदद करना सरकार के साथ दश्ु मिनी करनी हिैर्। ‘तुमिने तो नहिी की कांकग्रेस की मिदद!’ ‘तुमिने तो की!’ इसकी सजा मिुझे िमिलेगी या तुम्हिे? अगर मिै चोरी करूँ. िफर भी मिुझसे पूछती हिो। एक कॉँग्रेस का आदमिी प्लेटफामिर पर बोलने खड़ा हिोता हिैर्. तो क्या तुमि जेल जाओगे?’ ‘चोरी की बात और हिैर्. िजनका कामि यहिी हिैर् िक उन पर कड़ी िनगाहि रखे। चोरो के साथ तो इतनी सख्ती कभी नहिी की जाती। इसीिलए हिजारो चोिरयॉँ और डाके और खून रोज हिोते रहिते हिै. इसिलए सरकार भी अपनी रक्षा के िलए अपने अिक ख्तयार से कामि लेती हिैर्। यहि तो प्रकृित का िनयमि हिैर्। िमिस्टर सेठ आज दफ्तर चले. सरकारी नौकर के िलए चोरी या डाके से भी बुरा हिैर्।’ ‘मिैने यहि नहिी समिझा था।’ अगर तुमिने यहि नहिी समिझा था. और यहि बात और हिैर्।’ ‘तो क्या कांकग्रेस की मिदद करना चोरी या डाके से भी बुरा हिैर्?’ ‘हिॉँ. चुपके से जाकर कुसी पर बैर्ठ गये। ऐसा मिालूमि हिोता था.

मिानो आसमिान फट गया हिो। साहिब गरज रहिैर् थे. मिगर िदल मिे सोच रहिा था. तो मिुझे यहि खबर िमिली। साहिब-ओ! तुमि हिमिको बेवकूफ बनाता हिैर्? यहि बात अिग-िशला की भॉँित ज्यो हिी साहिब के मििक स्तष्क मिे घुसी. िसगार-केस और िदयािसलाई मिेज पर रख दी। एकाएक ऐसा मिालूमि हिु आ. िजनके पास बड़े-बड़े तालुकेदार सलामि करने आते हिै. आगे बढकर पदार हिटा िदया. यू ब्लडी। तुमिको सरकार पॉँच सौ रूपये इसिलए नहिी देता िक तुमि अपने वाइफ के हिाथ से कॉँग्रेस का चंकदा िदलवाये। तुमिको इसिलए सरकार रुपया नहिी देता। िमिस्टर सेठ को अपनी सफाई देने का अवसर िमिला। बोले-मिै आपको िवश्वास िदलाता हिू ँ िक मिेरी वाइफ ने सरासर मिेरी मिजी के िखलाफ रुपये िदये हिै। मिै तो उस वक फ्लावर शो देखने गया था. जहिॉँ िमिस फ्रॉँक का गुलदस्ता पॉँच रुपये मिे िलया। वहिॉँ से लौटा. साहिब कमिरे मिे गये. तुमि दगाबाज आदमिी हिो! सेठ ने इस तरफ साहिब की तरफ देखा. इसे . बोले-मिेरा तो ख्याल हिैर् िक मिुझसे बड़ा राजभक इस देश मिे न हिोगा। साहिब-तुमि नमिकहिारमि आदमिी हिैर्। िमिस्टर सेठ के चेहिरे पर सुखी आयी-आप व्यथर हिी अपनी जबान खराब कर रहिैर् हिै। साहिब-तुमि शैर्तान आदमिी हिैर्। िमिस्टर सेठ की ऑंकखो मिे सुखी आयी-आप मिेरी बेइज्जती कर रहिैर् हिै। ऐसी बाते सुनने की मिुझे आदत नहिी हिैर्। साहिब-चुप रहिो.लेिकन वहि िहिम्मित नहिी हिारे. उन्हिी को कोई बेवकूफ बनाये! उसके िलये वहि असह था! रूल उठा कर दौड़ा। लेिकन िमिस्टर सेठ भी मिजबूत आदमिी थे। यो वहि हिर तरहि की खुशामिद िकया करते थे! लेिकन यहि अपमिान स्वीकार न कर सके। उन्हिोने रूल का तो हिाथ पर िलया और एक डग आगे आगे बढकर ऐसा घूँसा साहिब के मिुँहि पर रसीद िकया िक साहिब की ऑंकखो के सामिने अँधेरा छा गया। वहि इस मिुिष्टप्रहिार के िलए तैर्यार न थे। उन्हिे कई बार इसका अनुभव हिो चुका था िक नेिटव बहिु त शांकत. सेठ ने लपककर. जैर्से उनका मितलब नहिी समिझे। साहिब ने िफर गरज कर कहिा-तुमि दगाबाज आदमिी हिो। िमिस्टर सेठ का खून गमिर हिो उठा. कब िसर पर तलवार िगरती हिैर्। साहिब ज्यो हिी कुसी पर बैर्ठे. िजनके नौकरो को बड़े-बडे रईस नजराना देते हिै. मिगर जान सूखी जाती थी िक देखे. तो सेठ साहिब ने पंकखा खोल िदया. उनके िमिजाज का पारा उबाल के दजे तक पहिु ँच गया। िकसी िहिंकदस्ु तानी की इतनी मिजाल िक उन्हिे बेवकूफ बनाये! वहि जो िहिंकदस्ु तान के बादशाहि हिै. दब्बू और गमिखोर हिोता हिैर्। िवशेषकर साहिबो के सामिने तो उनकी जबान तक नहिी खुलती। कुसी पर बैर्ठ कर नाक का खून पोछने लगा। िफर िमिस्टर सेठ के उलझने की उसकी िहिम्मित नहिी पड़ी.

मिै तो खुश हिू ँ िक तुम्हिारी बेिड़यॉँ कट गयी। सेठ-आिखर कुछ सोचा हिैर्. अब से तुमि मिेरे इशारे पर चलना। मिै तुमिसे िकसी बात की िशकायत न करती थी. मिहिल मिे रहिती। झोपड़ी मिे रखते. तुमि जो कुछ िखलाते थे खाती थी. बिक ल्क वहि अपने साहिस पर प्रसन्न थे। इसकी बदमिाशी तो देखो िक मिुझ पर रूल चला िदया! िजतना दबता था. अब यहिॉँ से िनकल जाने मिे हिी कुशल हिैर्। उन्हिोने तुरंक त एक इस्तीफा िलखा और साहिब के पास भेज िदया। साहिब ने उस पर िलख िदया. तो आज नहिी. झोपड़ी मिे रहिती। उसी तरहि तुमि भी रहिना। जो कामि करने को कहिू ँ वहि करना। िफर देखँू कैर्से कामि नहिी चलता। बड़प्पन सूट-बूट और ठाठ-बाट मिे नहिी हिैर्। िजसकी आत्मिा पिवत्र हिो. वहि हिो गयी। अब रोओ. िसर पर हिाथ रखके! गोदावरी-बात क्या हिु ई. ऊपर से घाव पर नमिक िछड़कती हिो। गोदावरी-लजाऊँ क्यो. बरखास्तगी का परवाना आ जायेगा। अपील कहिॉँ हिोगी? सेक्रेटरी हिै िहिन्दस्ु तानी. उतना हिी दबाये जाता था। मिेमि यारो को िलये घूमिा करती हिैर्. वहि तुमि िकये जाना। अब तक मिै तुम्हिारे इशारे पर चलती थी. जो कुछ पहिनाते थे पहिनती थी। मिहिल मिे रखते. कामि कैर्से चलेगा? गोदावरी-सब सोच िलया हिैर्। मिै चल कर िदखा दँगू ी। हिॉँ. मिै जो कुछ कहिू ँ. मिैने चाँटा जमिाया और इस्तीफा दे कर चला आया। गोदावरी-इस्तीफा देने की क्या जल्दी थी? सेठ-और क्या िसर के बाल नुचवाता? तुम्हिारा यहिी हिाल हिैर्. उसने ऑंकखे िदखायी. कुछ कहिो भी तो? सेठ-बात क्या हिु ई. . ‘बरखास्त’। 5 दोपहिर को जब िमिस्टर सेठ मिुहिँ लटकाये हिु ए घर पहिू ँचे तो गोदावरी ने पूछा-आज जल्दी कैर्से आ गये? िमिस्टर सेठ दहिकती हिु ई ऑखो से देख कर बोले-िजस बात पर लगी थी.कैर्से नीचा िदखाऊँ। िमिस्टर सेठ भी अपने कमिरे मिे आ कर इस पिरिक स्थित पर िवचार करने लगे। उन्हिे िबलकुल खेद न था. अच्छा हिी हिु आ। आज से तुमि भी कॉँग्रेस मिे शरीक हिो जाओ। सेठ ने ओठ चबा कर कहिा-लजाओगी तो नहिी. उससे बोलने की िहिम्मित नहिी पड़ती। मिुझसे शेर बन गया। अब दौड़ेगा किमिश्नर के पास। मिुझे बरखास्त कराये बगैर्र न छोड़ेगा। यहि सब कुछ गोदावरी के कारण हिो रहिा हिैर्। बेइज्जती तो हिो हिी गयी अब रोिटयो को भी मिुहिताज हिोना पड़ा। मिुझ से तो कोई पूछेगा भी नहिी. मिगर अँगरेजो से भी ज्यादा अँगरेज। हिोमि मिेम्बर भी िहिन्दस्ु तानी हिै. कल अलग हिोना हिी पड़ता। गोदावरी-खैर्र. जो हिु आ. मिगर अँगरेजो के गुलामि। गोदावरी के चंकदे का हिाल सुनते हिी उन्हिे जूड़ी चढआयेगी। न्याय कीिकसी से आशा नहिी.

वहिी ऊँचा हिैर्। आज तक तुमि मिेरे पित थे आज से मिै तुम्हिारा पित हिू ँ। सेठ जी उसकी और स्नेहि की ऑंकखो से देख कर हिँस पड़े। .