व्याकरण बोध तथा रचना

िविषयानुक्र मणिणका
1.

भाषा, व्याकरण और बोली

2.

विणर -िविचार

3.

शबद-िविचार

4.

पद-िविचार

5.

संजा के िविकारक ततवि

6.

विचन

7.

कारक

8.

सविर नामण

9.

िविशेषण

10.

िक्रया

11.

काल

12.

विाचय

13.

िक्रया-िविशेषण

14.

संबंधबोधक अव्यय

15.

समणुचयबोधक अव्यय

16.

िविसमणयािदबोधक अव्यय

17.

शबद-रचना

18.

पतयय

19.

संिध

20.

समणास

21.

पद-पिरचय

22.

शबद-जान

23.

िविरामण-िचह

24.

विाकय-पकरण

25.

अशुद विाकयो के शुद रप

26.

मणुहाविरे और लोकोिकयाँ

27.

संविाद लेखन

28.

कहानी-लेखन

29.

सार-लेखन तथा अपिठत गदांश

30.

पत लेखन

31.

िनबंध लेखन

अध्याय 1
1.भाषा, व्याकरण और बोली
पिरभाषा- भाषा अिभव्यिक का एक ऐसा समणथर साधन है िजसके दारा मणनुषय अपने िविचारो को दस
ू रो पर
पकट कर सकता है और दस
ू रो के िविचार जाना सकता है।
संसार मणे अनेक भाषाएँ है। जैसे-िहनदी,संसकृत,अंगेजी, बँगला,गुजराती,पंजाबी,उदर ,ू तेलुगु, मणलयालमण,
कनड, फैच, चीनी, जमणर न इतयािद।
भाषा के पकार- भाषा दो पकार की होती है1. मणौिखक भाषा।
2. िलिखत भाषा।
आमणने-सामणने बैठे व्यिक परसपर बातचीत करते है अथविा कोई व्यिक भाषण आिद दारा अपने िविचार पकट
करता है तो उसे भाषा का मणौिखक रप कहते है।
जब व्यिक िकसी दरू बैठे व्यिक को पत दारा अथविा पुसतको एविं पत-पितकाओं मणे लेख दारा अपने िविचार
पकट करता है तब उसे भाषा का िलिखत रप कहते है।
व्याकरण
मणनुषय मणौिखक एविं िलिखत भाषा मणे अपने िविचार पकट कर सकता है और करता रहा है िकनतु इससे भाषा
का कोई िनिशचत एविं शुद सविरप िसथर नही हो सकता। भाषा के शुद और सथायी रप को िनिशचत करने
के िलए िनयमणबद योजना की आविशयकता होती है और उस िनयमणबद योजना को हमण व्याकरण कहते है।
पिरभाषा- व्याकरण विह शास है िजसके दारा िकसी भी भाषा के शबदो और विाकयो के शुद सविरपो एविं शुद
पयोगो का िविशद जान कराया जाता है।
भाषा और व्याकरण का संबंध- कोई भी मणनुषय शुद भाषा का पूणर जान व्याकरण के िबना पाप नही कर
सकता। अतः भाषा और व्याकरण का घिनष संबंध है विह भाषा मणे उचचारण, शबद-पयोग, विाकय-गठन तथा
अथो ं के पयोग के रप को िनिशचत करता है।
व्याकरण के िविभाग- व्याकरण के चार अंग िनधारिरत िकये गये है1. विणर -िविचार।

2. शबद-िविचार।
3. पद-िविचार।
4. विाकय िविचार।
बोली
भाषा का केतीय रप बोली कहलाता है। अथारत् देश के िवििभन भागो मणे बोली जाने विाली भाषा बोली
कहलाती है और िकसी भी केतीय बोली का िलिखत रप मणे िसथर सािहतय विहाँ की भाषा कहलाता है।
िलिप
िकसी भी भाषा के िलखने की िवििध को ‘िलिप’ कहते है। िहनदी, नेपाली और संसकृत भाषा की िलिप का
नामण देविनागरी है। अंगेजी भाषा की िलिप ‘रोमणन’, उदर ू भाषा की िलिप फारसी, और पंजाबी भाषा की िलिप
गुरमणुखी है।
सािहतय
जान-रािश का संिचत कोश ही सािहतय है। सािहतय ही िकसी भी देश, जाित और विगर को जीविंत रखने काउसके अतीत रपो को दशारने का एकमणात साकय होता है। यह मणानवि की अनुभूित के िवििभन पको को सपष
करता है और पाठको एविं शोताओं के हदय मणे एक अलौिकक अिनविर चनीय आनंद की अनुभूित उतपन करता
है।

अध्याय 2
विणर -िविचार
पिरभाषा-िहनदी भाषा मणे पयुक सबसे छोटी ध्वििन विणर कहलाती है। जैसे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क्, ख् आिद।
विणर मण ाला
विणो ं के समणुदाय को ही विणर मणाला कहते है। िहनदी विणर मणाला मणे 44 विणर है। उचचारण और पयोग के आधार
पर िहनदी विणर मणाला के दो भेद िकए गए है1. सविर
2. व्यंजन
सविर
िजन विणो ं का उचचारण सवितंत रप से होता हो और जो व्यंजनो के उचचारण मणे सहायक हो विे सविर कहलाते
है। ये संखया मणे गयारह हैअ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
उचचारण के समणय की दिष से सविर के तीन भेद िकए गए है1. हसवि सविर।
2. दीघर सविर।
3. पलुत सविर।
1. हसवि सविर
िजन सविरो के उचचारण मणे कमण-से-कमण समणय लगता है उनहे हसवि सविर कहते है। ये चार है- अ, इ, उ, ऋ।
इनहे मणूल सविर भी कहते है।
2. दीघर सविर
िजन सविरो के उचचारण मणे हसवि सविरो से दगु ुना समणय लगता है उनहे दीघर सविर कहते है। ये िहनदी मणे सात हैआ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

िविशेष- दीघर सविरो को हसवि सविरो का दीघर रप नही समणझना चािहए। यहाँ दीघर शबद का पयोग उचचारण मणे
लगने विाले समणय को आधार मणानकर िकया गया है।
3. पलुत सविर
िजन सविरो के उचचारण मणे दीघर सविरो से भी अिधक समणय लगता है उनहे पलुत सविर कहते है। पायः इनका
पयोग दरू से बुलाने मणे िकया जाता है।
मणाताएँ
सविरो के बदले हु ए सविरप को मणाता कहते है सविरो की मणाताएँ िनमनिलिखत हैसविर मणाताएँ शबद
अ × कमण
आ ाा कामण
इ िा िकसलय
ई ाी खीर
उ ाु गुलाब
ऊ ाू भूल
ऋ ाृ तृण
ए ाे केश
ऐ ाै है
ओ ाो चोर
औ ाौ चौखट
अ विणर (सविर) की कोई मणाता नही होती। व्यंजनो का अपना सविरप िनमनिलिखत हैक् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आिद।
अ लगने पर व्यंजनो के नीचे का (हल) िचह हट जाता है। तब ये इस पकार िलखे जाते हैक च छ ज झ त थ ध आिद।
व्यं ज न
िजन विणो ं के पूणर उचचारण के िलए सविरो की सहायता ली जाती है विे व्यंजन कहलाते है। अथारत व्यंजन
िबना सविरो की सहायता के बोले ही नही जा सकते। ये संखया मणे 33 है। इसके िनमनिलिखत तीन भेद है-

1. सपशर
2. अंतःसथ
3. ऊषमण
1. सपशर
इनहे पाँच विगो ं मणे रखा गया है और हर विगर मणे पाँच-पाँच व्यंजन है। हर विगर का नामण पहले विगर के अनुसार रखा
गया है जैसेकविगर - क् ख् ग् घ् ड्
चविगर - च् छ् ज् झ् ञ्
टविगर - ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड् ढ् )
तविगर - त् थ् द् ध् न्
पविगर - प् फ् ब् भ् मण्
2. अं त ःसथ
ये िनमनिलिखत चार हैय् र् ल् वि्
3. ऊषमण
ये िनमनिलिखत चार हैश् ष् स् ह्
विैसे तो जहाँ भी दो अथविा दो से अिधक व्यंजन िमणल जाते है विे संयक
ु व्यंजन कहलाते है, िकनतु देविनागरी
िलिप मणे संयोग के बाद रप-पिरवितर न हो जाने के कारण इन तीन को िगनाया गया है। ये दो-दो व्यंजनो से
िमणलकर बने है। जैसे-क=क्+ष अकर, ज=ज्+ञ जान, त=त्+र नकत कुछ लोग क् त् और ज् को भी िहनदी
विणर मणाला मणे िगनते है, पर ये संयक
ु व्यंजन है। अतः इनहे विणर मणाला मणे िगनना उिचत पतीत नही होता।
अनुस विार
इसका पयोग पंचमण विणर के सथान पर होता है। इसका िचनह (ां) है। जैसे- समभवि=संभवि, सञय=संजय,
गड् गा=गंगा।

िविसगर
इसका उचचारण ह् के समणान होता है। इसका िचह (:) है। जैसे-अतः, पातः।
चं द्रब िबं द ु
जब िकसी सविर का उचचारण नािसका और मणुख दोनो से िकया जाता है तब उसके ऊपर चंद्रबिबंद ु (ाँ) लगा
िदया जाता है।
यह अनुनािसक कहलाता है। जैसे-हँसना, आँ ख।
िहनदी विणर मणाला मणे 11 सविर तथा 33 व्यंजन िगनाए जाते है, परनतु
इनमणे ड् , ढ् अं तथा अः जोडने पर िहनदी के विणो ं की कुल संखया 48 हो जाती है।
हलं त
जब कभी व्यंजन का पयोग सविर से रिहत िकया जाता है तब उसके नीचे एक ितरछी रेखा (ा्) लगा दी
जाती है। यह रेखा हल कहलाती है। हलयुक व्यंजन हलंत विणर कहलाता है। जैसे-िविद् या।
विणो ं के उचचारण-सथान
मणुख के िजस भाग से िजस विणर का उचचारण होता है उसे उस विणर का उचचारण सथान कहते है।
उचचारण सथान तािलका
क्रमण विणर

उचचारण

शेणी

1.

अ आ क् ख् ग् घ् ड् ह्

िविसगर कंठ और जीभ का िनचला
भाग

कंठसथ

2.

इ ई च् छ् ज् झ् ञ् य् श

तालु और जीभ

तालव्य

3.

ऋ ट् ठ् ड् ढ् ण् ड् ढ् र् ष्

मणूधार और जीभ

मणूधरनय

4.

त् थ् द् ध् न् ल् स्

दाँत और जीभ

दंतय

5.

उ ऊ प् फ् ब् भ् मण

दोनो होठ

ओषठ

6.

एऐ

कंठ तालु और जीभ

कंठतालव्य

7.

ओऔ

दाँत जीभ और होठ

कंठोषठ

8.

वि्

दाँत जीभ और होठ

दंतोष्

अध्याय 3
शबद-िविचार
पिरभाषा- एक या अिधक विणो ं से बनी हु ई सवितंत साथर क ध्वििन शबद कहलाता है। जैसे- एक विणर से िनिमणर त
शबद-न (नही) वि (और) अनेक विणो ं से िनिमणर त शबद-कुता, शेर,कमणल, नयन, पासाद, सविर व्यापी, परमणातमणा।
शबद-भे द
व्युतपित (बनाविट) के आधार पर शबद-भेदव्युतपित (बनाविट) के आधार पर शबद के िनमनिलिखत तीन भेद है1. रढ
2. यौिगक
3. योगरढ
1. रढ
जो शबद िकनही अनय शबदो के योग से न बने हो और िकसी िविशेष अथर को पकट करते हो तथा िजनके
टु कडो का कोई अथर नही होता, विे रढ कहलाते है। जैसे-कल, पर। इनमणे क, ल, प, र का टु कडे करने पर
कुछ अथर नही है। अतः ये िनरथर क है।
2. यौिगक
जो शबद कई साथर क शबदो के मणेल से बने हो,विे यौिगक कहलाते है। जैसे-देविालय=देवि+आलय,
राजपुरष=राज+पुरष, िहमणालय=िहमण+आलय, देविदत
ू =देवि+दत
ू आिद। ये सभी शबद दो साथर क शबदो के
मणेल से बने है।
3. योगरढ
विे शबद, जो यौिगक तो है, िकनतु सामणानय अथर को न पकट कर िकसी िविशेष अथर को पकट करते है,
योगरढ कहलाते है। जैसे-पंकज, दशानन आिद। पंकज=पंक+ज (कीचड मणे उतपन होने विाला) सामणानय
अथर मणे पचिलत न होकर कमणल के अथर मणे रढ हो गया है। अतः पंकज शबद योगरढ है। इसी पकार दश
(दस) आनन (मणुख) विाला राविण के अथर मणे पिसद है।

उतपित के आधार पर शबद-भे द
उतपित के आधार पर शबद के िनमनिलिखत चार भेद है1. ततसमण- जो शबद संसकृत भाषा से िहनदी मणे िबना िकसी पिरवितर न के ले िलए गए है विे ततसमण कहलाते है।
जैसे-अिग, केत, विायु, राित, सूयर आिद।
2. तदवि- जो शबद रप बदलने के बाद संसकृत से िहनदी मणे आए है विे तदवि कहलाते है। जैसे-आग (अिग),
खेत(केत), रात (राित), सूरज (सूयर) आिद।
3. देशज- जो शबद केतीय पभावि के कारण पिरिसथित वि आविशयकतानुसार बनकर पचिलत हो गए है विे
देशज कहलाते है। जैसे-पगडी, गाडी, थैला, पेट, खटखटाना आिद।
4. िविदेशी या िविदेशज- िविदेशी जाितयो के संपकर से उनकी भाषा के बहु त से शबद िहनदी मणे पयुक होने लगे
है। ऐसे शबद िविदेशी अथविा िविदेशज कहलाते है। जैसे-सकूल, अनार, आमण, कैची,अचार, पुिलस, टेलीफोन,
िरकशा आिद। ऐसे कुछ िविदेशी शबदो की सूची नीचे दी जा रही है।
अंगेजी- कॉलेज, पैिसल, रेिडयो, टेलीिविजन, डॉकटर, लैटरबकस, पैन, िटकट, मणशीन, िसगरेट, साइिकल,
बोतल आिद।
फारसी- अनार,चशमणा, जमणीदार, दक
ु ान, दरबार, नमणक, नमणूना, बीमणार, बरफ, रमणाल, आदमणी, चुगलखोर,
गंदगी, चापलूसी आिद।
अरबी- औलाद, अमणीर, कतल, कलमण, कानून, खत, फकीर, िरशवित, औरत, कैदी, मणािलक, गरीब आिद।
तुकी- कैची, चाकू, तोप, बारद, लाश, दारोगा, बहादरु आिद।
पुतरगाली- अचार, आलपीन, कारतूस, गमणला, चाबी, ितजोरी, तौिलया, फीता, साबुन, तंबाकू, कॉफी, कमणीज
आिद।
फांसीसी- पुिलस, काटू र न, इंजीिनयर, कफयूर, िबगुल आिद।
चीनी- तूफान, लीची, चाय, पटाखा आिद।
यूनानी- टेलीफोन, टेलीगाफ, ऐटमण, डेलटा आिद।
जापानी- िरकशा आिद।
पयोग के आधार पर शबद-भे द
पयोग के आधार पर शबद के िनमनिलिखत आठ भेद है1. संजा
2. सविर नामण

3. िविशेषण
4. िक्रया
5. िक्रया-िविशेषण
6. संबंधबोधक
7. समणुचचयबोधक
8. िविसमणयािदबोधक
इन उपयुरक आठ पकार के शबदो को भी िविकार की दिष से दो भागो मणे बाँटा जा सकता है1. िविकारी
2. अिविकारी
1. िविकारी शबद
िजन शबदो का रप-पिरवितर न होता रहता है विे िविकारी शबद कहलाते है। जैसे-कुता, कुते, कुतो, मणै मणुझे,हमणे
अचछा, अचछे खाता है, खाती है, खाते है। इनमणे संजा, सविर नामण, िविशेषण और िक्रया िविकारी शबद है।
2. अिविकारी शबद
िजन शबदो के रप मणे कभी कोई पिरवितर न नही होता है विे अिविकारी शबद कहलाते है। जैसे-यहाँ, िकनतु,
िनतय, और, हे अरे आिद। इनमणे िक्रया-िविशेषण, संबंधबोधक, समणुचचयबोधक और िविसमणयािदबोधक आिद
है।

अथर की दिष से शबद-भे द
अथर की दिष से शबद के दो भेद है1. साथर क
2. िनरथर क
1. साथर क शबद
िजन शबदो का कुछ-न-कुछ अथर हो विे शबद साथर क शबद कहलाते है। जैसे-रोटी, पानी, मणमणता, डंडा आिद।
2. िनरथर क शबद

िजन शबदो का कोई अथर नही होता है विे शबद िनरथर क कहलाते है। जैसे-रोटी-विोटी, पानी-विानी, डंडा-विंडा
इनमणे विोटी, विानी, विंडा आिद िनरथर क शबद है।
िविशेष- िनरथर क शबदो पर व्याकरण मणे कोई िविचार नही िकया जाता है।

अध्याय 4
पद-िविचार
साथर क विणर -समणूह शबद कहलाता है, पर जब इसका पयोग विाकय मणे होता है तो विह सवितंत नही रहता बिलक
व्याकरण के िनयमणो मणे बँध जाता है और पायः इसका रप भी बदल जाता है। जब कोई शबद विाकय मणे पयुक
होता है तो उसे शबद न कहकर पद कहा जाता है।
िहनदी मणे पद पाँच पकार के होते है1. संजा
2. सविर नामण
3. िविशेषण
4. िक्रया
5. अव्यय
1. सं ज ा
िकसी व्यिक, सथान, विसतु आिद तथा नामण के गुण, धमणर , सविभावि का बोध कराने विाले शबद संजा कहलाते
है। जैसे-शयामण, आमण, िमणठास, हाथी आिद।
संजा के पकार- संजा के तीन भेद है1. व्यिकविाचक संजा।
2. जाितविाचक संजा।
3. भाविविाचक संजा।
1. व्यिकविाचक सं ज ा
िजस संजा शबद से िकसी िविशेष, व्यिक, पाणी, विसतु अथविा सथान का बोध हो उसे व्यिकविाचक संजा
कहते है। जैसे-जयपकाश नारायण, शीकृषण, रामणायण, ताजमणहल, कुतुबमणीनार, लालिकला िहमणालय आिद।
2. जाितविाचक सं ज ा
िजस संजा शबद से उसकी संपूणर जाित का बोध हो उसे जाितविाचक संजा कहते है। जैसे-मणनुषय, नदी,
नगर, पविर त, पशु, पकी, लडका, कुता, गाय, घोडा, भैस, बकरी, नारी, गाँवि आिद।

3. भाविविाचक सं ज ा
िजस संजा शबद से पदाथो ं की अविसथा, गुण-दोष, धमणर आिद का बोध हो उसे भाविविाचक संजा कहते है।
जैसे-बुढापा, िमणठास, बचपन, मणोटापा, चढाई, थकाविट आिद।
िविशेष विकव्य- कुछ िविदान अंगेजी व्याकरण के पभावि के कारण संजा शबद के दो भेद और बतलाते है1. समणुदायविाचक संजा।
2. द्रबव्यविाचक संजा।
1. समणुद ायविाचक सं ज ा
िजन संजा शबदो से व्यिकयो, विसतुओं आिद के समणूह का बोध हो उनहे समणुदायविाचक संजा कहते है। जैसेसभा, कका, सेना, भीड, पुसतकालय दल आिद।
2. द्रबव्यविाचक सं ज ा
िजन संजा-शबदो से िकसी धातु, द्रबव्य आिद पदाथो ं का बोध हो उनहे द्रबव्यविाचक संजा कहते है। जैसे-घी,
तेल, सोना, चाँदी,पीतल, चाविल, गेहूँ, कोयला, लोहा आिद।
इस पकार संजा के पाँच भेद हो गए, िकनतु अनेक िविदान समणुदायविाचक और द्रबव्यविाचक संजाओं को
जाितविाचक संजा के अंतगर त ही मणानते है, और यही उिचत भी पतीत होता है।
भाविविाचक संजा बनाना- भाविविाचक संजाएँ चार पकार के शबदो से बनती है। जैसे1. जाितविाचक सं ज ाओं से
दास दासता
पंिडत पांिडतय
बंधु बंधुतवि
कितय कितयतवि
पुरष पुरषतवि
पभु पभुता
पशु पशुता,पशुतवि
बाहण बाहणतवि
िमणत िमणतता

बालक बालकपन
बचचा बचपन
नारी नारीतवि
2. सविर नामण से
अपना अपनापन, अपनतवि िनज िनजतवि,िनजता
पराया परायापन
सवि सवितवि
सविर सविर सवि
अहं अहंकार
मणमण मणमणतवि,मणमणता
3. िविशे ष ण से
मणीठा िमणठास
चतुर चातुयर, चतुराई
मणधुर मणाधुयर
सुंदर सौदयर , सुंदरता
िनबर ल िनबर लता सफेद सफेदी
हरा हिरयाली
सफल सफलता
पविीण पविीणता
मणैला मणैल
िनपुण िनपुणता
खटा खटास
4. िक्रया से
खेलना खेल
थकना थकाविट
िलखना लेख, िलखाई

हँसना हँसी
लेना-देना लेन-देन
पढना पढाई
िमणलना मणेल
चढना चढाई
मणुसकाना मणुसकान
कमणाना कमणाई
उतरना उतराई
उडना उडान
रहना-सहना रहन-सहन
देखना-भालना देख-भाल

अध्याय 5
सं ज ा के िविकारक ततवि
िजन ततविो के आधार पर संजा (संजा, सविर नामण, िविशेषण) का रपांतर होता है विे िविकारक ततवि कहलाते है।
विाकय मणे शबदो की िसथित के आधार पर ही उनमणे िविकार आते है। यह िविकार िलंग, विचन और कारक के
कारण ही होता है। जैसे-लडका शबद के चारो रप- 1.लडका, 2.लडके, 3.लडको, 4.लडको-केविल विचन
और कारको के कारण बनते है।
िलंग- िजस िचह से यह बोध होता हो िक अमणुक शबद पुरष जाित का है अथविा सी जाित का विह िलंग
कहलाता है।
पिरभाषा- शबद के िजस रप से िकसी व्यिक, विसतु आिद के पुरष जाित अथविा सी जाित के होने का जान
हो उसे िलंग कहते है। जैसे-लडका, लडकी, नर, नारी आिद। इनमणे ‘लडका’ और ‘नर’ पुिलंग तथा लडकी
और ‘नारी’ सीिलंग है।
िहनदी मणे िलंग के दो भेद है1. पुिलंग।
2. सीिलंग।
1. पुि लंग
िजन संजा शबदो से पुरष जाित का बोध हो अथविा जो शबद पुरष जाित के अंतगर त मणाने जाते है विे पुिलंग है।
जैसे-कुता, लडका, पेड, िसंह, बैल, घर आिद।
2. सीिलं ग
िजन संजा शबदो से सी जाित का बोध हो अथविा जो शबद सी जाित के अंतगर त मणाने जाते है विे सीिलंग है।
जैसे-गाय, घडी, लडकी, कुरसी, छडी, नारी आिद।
पुि लंग की पहचान
1. आ, आवि, पा, पन न ये पतयय िजन शबदो के अंत मणे हो विे पायः पुिलंग होते है। जैसे- मणोटा, चढावि,
बुढापा, लडकपन लेन-देन।

2. पविर त, मणास, विार और कुछ गहो के नामण पुिलंग होते है जैसे-िविंध्याचल, िहमणालय, विैशाख, सूयर, चंद्रब,
मणंगल, बुध, राहु , केतु (गह)।
3. पेडो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-पीपल, नीमण, आमण, शीशमण, सागौन, जामणुन, बरगद आिद।
4. अनाजो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-बाजरा, गेहूँ, चाविल, चना, मणटर, जौ, उडद आिद।
5. द्रबवि पदाथो ं के नामण पुिलंग होते है। जैसे-पानी, सोना, ताँबा, लोहा, घी, तेल आिद।
6. रतनो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-हीरा, पना, मणूँगा, मणोती मणािणक आिद।
7. देह के अवियविो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-िसर, मणसतक, दाँत, मणुख, कान, गला, हाथ, पाँवि, होठ, तालु,
नख, रोमण आिद।
8. जल, सथान और भूमणंडल के भागो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-समणुद्रब, भारत, देश, नगर, दीप, आकाश,
पाताल, घर, सरोविर आिद।
9. विणर मणाला के अनेक अकरो के नामण पुिलंग होते है। जैसे-अ,उ,ए,ओ,क,ख,ग,घ, च,छ,य,र,ल,वि,श आिद।
सीिलं ग की पहचान
1. िजन संजा शबदो के अंत मणे ख होते है, विे सीिलंग कहलाते है। जैसे-ईख, भूख, चोख, राख, कोख, लाख,
देखरेख आिद।
2. िजन भाविविाचक संजाओं के अंत मणे ट, विट, या हट होता है, विे सीिलंग कहलाती है। जैसे-झंझट, आहट,
िचकनाहट, बनाविट, सजाविट आिद।
3. अनुसविारांत, ईकारांत, ऊकारांत, तकारांत, सकारांत संजाएँ सीिलंग कहलाती है। जैसे-रोटी, टोपी,
नदी, िचटी, उदासी, रात, बात, छत, भीत, लू, बालू, दार, सरसो, खडाऊँ, पयास, विास, साँस आिद।
4. भाषा, बोली और िलिपयो के नामण सीिलंग होते है। जैसे-िहनदी, संसकृत, देविनागरी, पहाडी, तेलुगु पंजाबी
गुरमणुखी।
5. िजन शबदो के अंत मणे इया आता है विे सीिलंग होते है। जैसे-कुिटया, खिटया, िचिडया आिद।
6. निदयो के नामण सीिलंग होते है। जैसे-गंगा, यमणुना, गोदाविरी, सरसविती आिद।
7. तारीखो और ितिथयो के नामण सीिलंग होते है। जैसे-पहली, दस
ू री, पितपदा, पूिणर मणा आिद।
8. पृथविी गह सीिलंग होते है।
9. नकतो के नामण सीिलंग होते है। जैसे-अिशविनी, भरणी, रोिहणी आिद।
शबदो का िलं ग -पिरवितर न
पतयय

पुि लंग

सीिलं ग

इया

इन

नी

आनी

आइन

घोडा

घोडी

देवि

देविी

दादा

दादी

लडका

लडकी

बाहण

बाहणी

नर

नारी

बकरा

बकरी

चूहा

चुिहया

िचडा

िचिडया

बेटा

िबिटया

गुडा

गुिडया

लोटा

लुिटया

मणाली

मणािलन

कहार

कहािरन

सुनार

सुनािरन

लुहार

लुहािरन

धोबी

धोिबन

मणोर

मणोरनी

हाथी

हािथन

िसंह

िसंहनी

नौकर

नौकरानी

चौधरी

चौधरानी

देविर

देविरानी

सेठ

सेठानी

जेठ

जेठानी

पंिडत

पंिडताइन

ठाकुर

ठाकुराइन

बाल

बाला

सुत

सुता

छात

छाता

िशषय

िशषया

अक को इका करके

इनी (इणी)

पाठक

पािठका

अध्यापक

अध्यािपका

बालक

बािलका

लेखक

लेिखका

सेविक

सेिविका

तपसविी

तपिसविनी

िहतकारी

िहतकािरनी

सविामणी

सविािमणनी

परोपकारी

परोपकािरनी

कुछ िविशेष शबद जो सीिलंग मणे िबलकुल ही बदल जाते है।
पुिलंग

सीिलंग

िपता

मणाता

भाई

भाभी

नर

मणादा

राजा

रानी

ससुर

सास

समाट

समाजी

पुरष

सी

बैल

गाय

युविक

युविती

िविशेष विकव्य- जो पािणविाचक सदा शबद ही सीिलंग है अथविा जो सदा ही पुिलंग है उनके पुिलंग अथविा
सीिलंग जताने के िलए उनके साथ ‘नर’ वि ‘मणादा’ शबद लगा देते है। जैसेसीिलंग

पुिलंग

मणकखी

नर मणकखी

कोयल

नर कोयल

िगलहरी

नर िगलहरी

मणैना

नर मणैना

िततली

नर िततली

बाज

मणादा बाज

खटमणल

मणादा खटमणल

चील

नर चील

कछुआ

नर कछुआ

कौआ

नर कौआ

भेिडया

मणादा भेिडया

उलू

मणादा उलू

मणचछर

मणादा मणचछर

अध्याय 6
विचन
पिरभाषा-शबद के िजस रप से उसके एक अथविा अनेक होने का बोध हो उसे विचन कहते है।
िहनदी मणे विचन दो होते है1. एकविचन
2. बहु विचन
एकविचन
शबद के िजस रप से एक ही विसतु का बोध हो, उसे एकविचन कहते है। जैसे-लडका, गाय, िसपाही, बचचा,
कपडा, मणाता, मणाला, पुसतक, सी, टोपी बंदर, मणोर आिद।
बहु विचन
शबद के िजस रप से अनेकता का बोध हो उसे बहु विचन कहते है। जैसे-लडके, गाये, कपडे, टोिपयाँ, मणालाएँ ,
मणाताएँ , पुसतके, विधुएँ, गुरजन, रोिटयाँ, िसयाँ, लताएँ , बेटे आिद।
एकविचन के सथान पर बहु विचन का पयोग
(क) आदर के िलए भी बहु विचन का पयोग होता है। जैसे(1) भीषमण िपतामणह तो बहचारी थे।
(2) गुरजी आज नही आये।
(3) िशविाजी सचचे विीर थे।
(ख) बडपपन दशारने के िलए कुछ लोग विह के सथान पर विे और मणै के सथान हमण का पयोग करते है जैसे(1) मणािलक ने कमणर चारी से कहा, हमण मणीिटंग मणे जा रहे है।
(2) आज गुरजी आए तो विे पसन िदखाई दे रहे थे।
(ग) केश, रोमण, अशु, पाण, दशर न, लोग, दशर क, समणाचार, दामण, होश, भागय आिद ऐसे शबद है िजनका पयोग
बहु धा बहु विचन मणे ही होता है। जैसे(1) तुमहारे केश बडे सुनदर है।
(2) लोग कहते है।
बहु विचन के सथान पर एकविचन का पयोग

(क) तू एकविचन है िजसका बहु विचन है तुमण िकनतु सभय लोग आजकल लोक-व्यविहार मणे एकविचन के िलए
तुमण का ही पयोग करते है जैसे(1) िमणत, तुमण कब आए।
(2) कया तुमणने खाना खा िलया।
(ख) विगर , विृंद, दल, गण, जाित आिद शबद अनेकता को पकट करने विाले है, िकनतु इनका व्यविहार एकविचन
के समणान होता है। जैसे(1) सैिनक दल शतु का दमणन कर रहा है।
(2) सी जाित संघषर कर रही है।
(ग) जाितविाचक शबदो का पयोग एकविचन मणे िकया जा सकता है। जैसे(1) सोना बहु मणूलय विसतु है।
(2) मणुंबई का आमण सविािदष होता है।
बहु विचन बनाने के िनयमण
(1) अकारांत सीिलंग शबदो के अंितमण अ को एँ कर देने से शबद बहु विचन मणे बदल जाते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

आँ ख

आँ खे

बहन

बहने

पुसतक

पुसतके

सडक

सडके

गाय

गाये

बात

बाते

(2) आकारांत पुिलंग शबदो के अंितमण ‘आ’ को ‘ए’ कर देने से शबद बहु विचन मणे बदल जाते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

घोडा

घोडे

कौआ

कौए

कुता

कुते

गधा

गधे

केला

केले

बेटा

बेटे

(3) आकारांत सीिलंग शबदो के अंितमण ‘आ’ के आगे ‘एँ ’ लगा देने से शबद बहु विचन मणे बदल जाते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

कनया

कनयाएँ

अध्यािपका

अध्यािपकाएँ

कला

कलाएँ

मणाता

मणाताएँ

किविता

किविताएँ

लता

लताएँ

(4) इकारांत अथविा ईकारांत सीिलंग शबदो के अंत मणे ‘याँ’ लगा देने से और दीघर ई को हसवि इ कर देने से
शबद बहु विचन मणे बदल जाते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

बुिद

बुिदयाँ

गित

गितयाँ

कली

किलयाँ

नीित

नीितयाँ

कॉपी

कॉिपयाँ

लडकी

लडिकयाँ

थाली

थािलयाँ

नारी

नािरयाँ

(5) िजन सीिलंग शबदो के अंत मणे या है उनके अंितमण आ को आँ कर देने से विे बहु विचन बन जाते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

गुिडया

गुिडयाँ

िबिटया

िबिटयाँ

चुिहया

चुिहयाँ

कुितया

कुितयाँ

िचिडया

िचिडयाँ

खिटया

खिटयाँ

बुिढया

बुिढयाँ

गैया

गैयाँ

(6) कुछ शबदो मणे अंितमण उ, ऊ और औ के साथ एँ लगा देते है और दीघर ऊ के साथन पर हसवि उ हो जाता
है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

गौ

गौएँ

बहू

बहू एँ

विधू

विधूएँ

विसतु

विसतुएँ

धेनु

धेनुएँ

धातु

धातुएँ

(7) दल, विृद
ं , विगर , जन लोग, गण आिद शबद जोडकर भी शबदो का बहु विचन बना देते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

अध्यापक

अध्यापकविृंद

िमणत

िमणतविगर

िविदाथी

िविदाथीगण

सेना

सेनादल

आप

आप लोग

गुर

गुरजन

शोता

शोताजन

गरीब

गरीब लोग

(8) कुछ शबदो के रप ‘एकविचन’ और ‘बहु विचन’ दोनो मणे समणान होते है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

कमणा

कमणा

नेता

नेता

जल

जल

पेमण

पेमण

िगिर

िगिर

क्रोध

क्रोध

राजा

राजा

पानी

पानी

िविशेष- (1) जब संजाओं के साथ ने, को, से आिद परसगर लगे होते है तो संजाओं का बहु विचन बनाने के िलए
उनमणे ‘ओ’ लगाया जाता है। जैसेएकविचन

बहु विचन

एकविचन

बहु विचन

लडके को बुलाओ

लडको को बुलाओ

बचचे ने गाना गाया

बचचो ने गाना गाया

नदी का जल ठंडा है

निदयो का जल ठंडा है

आदमणी से पूछ लो

आदिमणयो से पूछ लो

(2) संबोधन मणे ‘ओ’ जोडकर बहु विचन बनाया जाता है। जैसेबचचो ! ध्यान से सुनो। भाइयो ! मणेहनत करो। बहनो ! अपना कतर व्य िनभाओ।

अध्याय 7
कारक
पिरभाषा-संजा या सविर नामण के िजस रप से उसका सीधा संबंध िक्रया के साथ जात हो विह कारक कहलाता
है। जैसे-गीता ने दध
ू पीया। इस विाकय मणे ‘गीता’ पीना िक्रया का कतार है और दध
ू उसका कमणर । अतः ‘गीता’
कतार कारक है और ‘दध
ू ’ कमणर कारक।
कारक िविभिक- संजा अथविा सविर नामण शबदो के बाद ‘ने, को, से, के िलए’, आिद जो िचह लगते है विे िचह
कारक िविभिक कहलाते है।
िहनदी मणे आठ कारक होते है। उनहे िविभिक िचहो सिहत नीचे देखा जा सकता हैकारक िविभिक िचह (परसगर )
1. कतार ने
2. कमणर को
3. करण से, के साथ, के दारा
4. संपदान के िलए, को
5. अपादान से (पृथक)
6. संबंध का, के, की
7. अिधकरण मणे, पर
8. संबोधन हे ! हरे !
कारक िचह समणरण करने के िलए इस पद की रचना की गई हैकतार ने अर कमणर को, करण रीित से जान।
संपदान को, के िलए, अपादान से मणान।।
का, के, की, संबंध है, अिधकरणािदक मणे मणान।
रे ! हे ! हो ! संबोधन, िमणत धरहु यह ध्यान।।
िविशेष-कतार से अिधकरण तक िविभिक िचह (परसगर ) शबदो के अंत मणे लगाए जाते है, िकनतु संबोधन कारक
के िचह-हे, रे, आिद पायः शबद से पूविर लगाए जाते है।
1. कतार कारक

िजस रप से िक्रया (कायर ) के करने विाले का बोध होता है विह ‘कतार’ कारक कहलाता है। इसका िविभिकिचह ‘ने’ है। इस ‘ने’ िचह का वितर मणानकाल और भिविषयकाल मणे पयोग नही होता है। इसका सकमणर क
धातुओं के साथ भूतकाल मणे पयोग होता है। जैसे- 1.रामण ने राविण को मणारा। 2.लडकी सकूल जाती है।
पहले विाकय मणे िक्रया का कतार रामण है। इसमणे ‘ने’ कतार कारक का िविभिक-िचह है। इस विाकय मणे ‘मणारा’
भूतकाल की िक्रया है। ‘ने’ का पयोग पायः भूतकाल मणे होता है। दस
ू रे विाकय मणे वितर मणानकाल की िक्रया का
कतार लडकी है। इसमणे ‘ने’ िविभिक का पयोग नही हु आ है।
िविशेष- (1) भूतकाल मणे अकमणर क िक्रया के कतार के साथ भी ने परसगर (िविभिक िचह) नही लगता है। जैसेविह हँसा।
(2) वितर मणानकाल वि भिविषयतकाल की सकमणर क िक्रया के कतार के साथ ने परसगर का पयोग नही होता है।
जैसे-विह फल खाता है। विह फल खाएगा।
(3) कभी-कभी कतार के साथ ‘को’ तथा ‘स’ का पयोग भी िकया जाता है। जैसे(अ) बालक को सो जाना चािहए। (आ) सीता से पुसतक पढी गई।
(इ) रोगी से चला भी नही जाता। (ई) उससे शबद िलखा नही गया।
2. कमणर कारक
िक्रया के कायर का फल िजस पर पडता है, विह कमणर कारक कहलाता है। इसका िविभिक-िचह ‘को’ है। यह
िचह भी बहु त-से सथानो पर नही लगता। जैसे- 1. मणोहन ने साँप को मणारा। 2. लडकी ने पत िलखा। पहले
विाकय मणे ‘मणारने’ की िक्रया का फल साँप पर पडा है। अतः साँप कमणर कारक है। इसके साथ परसगर ‘को’
लगा है।
दस
ू रे विाकय मणे ‘िलखने’ की िक्रया का फल पत पर पडा। अतः पत कमणर कारक है। इसमणे कमणर कारक का
िविभिक िचह ‘को’ नही लगा।
3. करण कारक
संजा आिद शबदो के िजस रप से िक्रया के करने के साधन का बोध हो अथारत् िजसकी सहायता से कायर
संपन हो विह करण कारक कहलाता है। इसके िविभिक-िचह ‘से’ के ‘दारा’ है। जैसे- 1.अजुरन ने जयद्रबथ को
बाण से मणारा। 2.बालक गेद से खेल रहे है।
पहले विाकय मणे कतार अजुरन ने मणारने का कायर ‘बाण’ से िकया। अतः ‘बाण से’ करण कारक है। दस
ू रे विाकय
मणे कतार बालक खेलने का कायर ‘गेद से’ कर रहे है। अतः ‘गेद से’ करण कारक है।

4. सं प दान कारक
संपदान का अथर है-देना। अथारत कतार िजसके िलए कुछ कायर करता है, अथविा िजसे कुछ देता है उसे व्यक
करने विाले रप को संपदान कारक कहते है। इसके िविभिक िचह ‘के िलए’ को है।
1.सविासथय के िलए सूयर को नमणसकार करो। 2.गुरजी को फल दो।
इन दो विाकयो मणे ‘सविासथय के िलए’ और ‘गुरजी को’ संपदान कारक है।
5. अपादान कारक
संजा के िजस रप से एक विसतु का दस
ू री से अलग होना पाया जाए विह अपादान कारक कहलाता है।
इसका िविभिक-िचह ‘से’ है। जैसे- 1.बचचा छत से िगर पडा। 2.संगीता घोडे से िगर पडी।
इन दोनो विाकयो मणे ‘छत से’ और घोडे ‘से’ िगरने मणे अलग होना पकट होता है। अतः घोडे से और छत से
अपादान कारक है।
6. सं बं ध कारक
शबद के िजस रप से िकसी एक विसतु का दस
ू री विसतु से संबंध पकट हो विह संबंध कारक कहलाता है।
इसका िविभिक िचह ‘का’, ‘के’, ‘की’, ‘रा’, ‘रे’, ‘री’ है। जैसे- 1.यह राधेशयामण का बेटा है। 2.यह कमणला
की गाय है।
इन दोनो विाकयो मणे ‘राधेशयामण का बेटे’ से और ‘कमणला का’ गाय से संबंध पकट हो रहा है। अतः यहाँ संबंध
कारक है।
7. अिधकरण कारक
शबद के िजस रप से िक्रया के आधार का बोध होता है उसे अिधकरण कारक कहते है। इसके िविभिक-िचह
‘मणे’ , ‘पर’ है। जैसे- 1.भँविरा फूलो पर मणँडरा रहा है। 2.कमणरे मणे टी.विी. रखा है।
इन दोनो विाकयो मणे ‘फूलो पर’ और ‘कमणरे मणे’ अिधकरण कारक है।
8. सं ब ोधन कारक
िजससे िकसी को बुलाने अथविा सचेत करने का भावि पकट हो उसे संबोधन कारक कहते है और संबोधन
िचह (!) लगाया जाता है। जैसे- 1.अरे भैया ! कयो रो रहे हो ? 2.हे गोपाल ! यहाँ आओ।
इन विाकयो मणे ‘अरे भैया’ और ‘हे गोपाल’ ! संबोधन कारक है।

अध्याय 8
सविर न ामण
सविर नामण-संजा के सथान पर पयुक होने विाले शबद को सविर नामण कहते है। संजा की पुनरिक को दरू करने के
िलए ही सविर नामण का पयोग िकया जाता है। जैसे-मणै, हमण, तू, तुमण, विह, यह, आप, कौन, कोई, जो आिद।
सविर नामण के भेद- सविर नामण के छह भेद है1. पुरषविाचक सविर नामण।
2. िनशचयविाचक सविर नामण।
3. अिनशचयविाचक सविर नामण।
4. संबंधविाचक सविर नामण।
5. पशनविाचक सविर नामण।
6. िनजविाचक सविर नामण।
1. पुर षविाचक सविर न ामण
िजस सविर नामण का पयोग विका या लेखक सवियं अपने िलए अथविा शोता या पाठक के िलए अथविा िकसी
अनय के िलए करता है विह पुरषविाचक सविर नामण कहलाता है। पुरषविाचक सविर नामण तीन पकार के होते है(1) उतमण पुरषविाचक सविर नामण- िजस सविर नामण का पयोग बोलने विाला अपने िलए करे, उसे उतमण
पुरषविाचक सविर नामण कहते है। जैसे-मणै, हमण, मणुझे, हमणारा आिद।
(2) मणध्यमण पुरषविाचक सविर नामण- िजस सविर नामण का पयोग बोलने विाला सुनने विाले के िलए करे, उसे मणध्यमण
पुरषविाचक सविर नामण कहते है। जैसे-तू, तुमण,तुझे, तुमहारा आिद।
(3) अनय पुरषविाचक सविर नामण- िजस सविर नामण का पयोग बोलने विाला सुनने विाले के अितिरक िकसी अनय
पुरष के िलए करे उसे अनय पुरषविाचक सविर नामण कहते है। जैसे-विह, विे, उसने, यह, ये, इसने, आिद।
2. िनशचयविाचक सविर न ामण
जो सविर नामण िकसी व्यिक विसतु आिद की ओर िनशचयपूविरक संकेत करे विे िनशचयविाचक सविर नामण कहलाते
है। इनमणे ‘यह’, ‘विह’, ‘विे’ सविर नामण शबद िकसी िविशेष व्यिक आिद का िनशचयपूविरक बोध करा रहे है, अतः
ये िनशचयविाचक सविर नामण है।
3. अिनशचयविाचक सविर न ामण

िजस सविर नामण शबद के दारा िकसी िनिशचत व्यिक अथविा विसतु का बोध न हो विे अिनशचयविाचक सविर नामण
कहलाते है। इनमणे ‘कोई’ और ‘कुछ’ सविर नामण शबदो से िकसी िविशेष व्यिक अथविा विसतु का िनशचय नही हो
रहा है। अतः ऐसे शबद अिनशचयविाचक सविर नामण कहलाते है।
4. सं बं ध विाचक सविर नामण
परसपर एक-दस
ू री बात का संबंध बतलाने के िलए िजन सविर नामणो का पयोग होता है उनहे संबंधविाचक
सविर नामण कहते है। इनमणे ‘जो’, ‘विह’, ‘िजसकी’, ‘उसकी’, ‘जैसा’, ‘विैसा’-ये दो-दो शबद परसपर संबंध का
बोध करा रहे है। ऐसे शबद संबंधविाचक सविर नामण कहलाते है।
5. पशनविाचक सविर नामण
जो सविर नामण संजा शबदो के सथान पर तो आते ही है, िकनतु विाकय को पशनविाचक भी बनाते है विे पशनविाचक
सविर नामण कहलाते है। जैसे-कया, कौन आिद। इनमणे ‘कया’ और ‘कौन’ शबद पशनविाचक सविर नामण है, कयोिक
इन सविर नामणो के दारा विाकय पशनविाचक बन जाते है।
6. िनजविाचक सविर न ामण
जहाँ अपने िलए ‘आप’ शबद ‘अपना’ शबद अथविा ‘अपने’ ‘आप’ शबद का पयोग हो विहाँ िनजविाचक
सविर नामण होता है। इनमणे ‘अपना’ और ‘आप’ शबद उतमण, पुरष मणध्यमण पुरष और अनय पुरष के (सवियं का)
अपने आप का बोध करा रहे है। ऐसे शबद िनजविाचक सविर नामण कहलाते है।
िविशेष-जहाँ केविल ‘आप’ शबद का पयोग शोता के िलए हो विहाँ यह आदर-सूचक मणध्यमण पुरष होता है और
जहाँ ‘आप’ शबद का पयोग अपने िलए हो विहाँ िनजविाचक होता है।
सविर नामण शबदो के िविशेष पयोग
(1) आप, विे, ये, हमण, तुमण शबद बहु विचन के रप मणे है, िकनतु आदर पकट करने के िलए इनका पयोग एक
व्यिक के िलए भी होता है।
(2) ‘आप’ शबद सवियं के अथर मणे भी पयुक हो जाता है। जैसे-मणै यह कायर आप ही कर लूँगा।

अध्याय 9
िविशे ष ण
िविशेषण की पिरभाषा- संजा अथविा सविर नामण शबदो की िविशेषता (गुण, दोष, संखया, पिरमणाण आिद) बताने
विाले शबद ‘िविशेषण’ कहलाते है। जैसे-बडा, काला, लंबा, दयालु, भारी, सुनदर, कायर, टेढा-मणेढा, एक, दो
आिद।
िविशेषय- िजस संजा अथविा सविर नामण शबद की िविशेषता बताई जाए विह िविशेषय कहलाता है। यथा- गीता
सुनदर है। इसमणे ‘सुनदर’ िविशेषण है और ‘गीता’ िविशेषय है। िविशेषण शबद िविशेषय से पूविर भी आते है और
उसके बाद भी।
पूविर मणे, जैसे- (1) थोडा-सा जल लाओ। (2) एक मणीटर कपडा ले आना।
बाद मणे, जैसे- (1) यह रासता लंबा है। (2) खीरा कडविा है।
िविशेषण के भेद- िविशेषण के चार भेद है1. गुणविाचक।
2. पिरमणाणविाचक।
3. संखयाविाचक।
4. संकेतविाचक अथविा साविर नािमणक।
1. गुण विाचक िविशे ष ण
िजन िविशेषण शबदो से संजा अथविा सविर नामण शबदो के गुण-दोष का बोध हो विे गुणविाचक िविशेषण कहलाते
है। जैसे(1) भावि- अचछा, बुरा, कायर, विीर, डरपोक आिद।
(2) रंग- लाल, हरा, पीला, सफेद, काला, चमणकीला, फीका आिद।
(3) दशा- पतला, मणोटा, सूखा, गाढा, िपघला, भारी, गीला, गरीब, अमणीर, रोगी, सविसथ, पालतू आिद।
(4) आकार- गोल, सुडौल, नुकीला, समणान, पोला आिद।
(5) समणय- अगला, िपछला, दोपहर, संध्या, सविेरा आिद।
(6) सथान- भीतरी, बाहरी, पंजाबी, जापानी, पुराना, ताजा, आगामणी आिद।
(7) गुण- भला, बुरा, सुनदर, मणीठा, खटा, दानी,सच, झूठ, सीधा आिद।
(8) िदशा- उतरी, दिकणी, पूविी, पिशचमणी आिद।

2. पिरमणाणविाचक िविशे ष ण
िजन िविशेषण शबदो से संजा या सविर नामण की मणाता अथविा नाप-तोल का जान हो विे पिरमणाणविाचक िविशेषण
कहलाते है।
पिरमणाणविाचक िविशेषण के दो उपभेद है(1) िनिशचत पिरमणाणविाचक िविशेषण- िजन िविशेषण शबदो से विसतु की िनिशचत मणाता का जान हो। जैसे(क) मणेरे सूट मणे साढे तीन मणीटर कपडा लगेगा।
(ख) दस िकलो चीनी ले आओ।
(ग) दो िलटर दध
ू गरमण करो।
(2) अिनिशचत पिरमणाणविाचक िविशेषण- िजन िविशेषण शबदो से विसतु की अिनिशचत मणाता का जान हो। जैसे(क) थोडी-सी नमणकीन विसतु ले आओ।
(ख) कुछ आमण दे दो।
(ग) थोडा-सा दध
ू गरमण कर दो।
3. सं ख याविाचक िविशे ष ण
िजन िविशेषण शबदो से संजा या सविर नामण की संखया का बोध हो विे संखयाविाचक िविशेषण कहलाते है। जैसेएक, दो, िदतीय, दगु ुना, चौगुना, पाँचो आिद।
संखयाविाचक िविशेषण के दो उपभेद है(1) िनिशचत संखयाविाचक िविशेषण- िजन िविशेषण शबदो से िनिशचत संखया का बोध हो। जैसे-दो पुसतके मणेरे
िलए ले आना।
िनिशचत संखयाविाचक के िनमनिलिखत चार भेद है(क) गणविाचक- िजन शबदो के दारा िगनती का बोध हो। जैसे(1) एक लडका सकूल जा रहा है।
(2) पचचीस रपये दीिजए।
(3) कल मणेरे यहाँ दो िमणत आएँ गे।
(4) चार आमण लाओ।
(ख) क्रमणविाचक- िजन शबदो के दारा संखया के क्रमण का बोध हो। जैसे(1) पहला लडका यहाँ आए।
(2) दस
ू रा लडका विहाँ बैठे।
(3) रामण कका मणे पथमण रहा।

(4) शयामण िदतीय शेणी मणे पास हु आ है।
(ग) आविृितविाचक- िजन शबदो के दारा केविल आविृित का बोध हो। जैसे(1) मणोहन तुमणसे चौगुना कामण करता है।
(2) गोपाल तुमणसे दगु ुना मणोटा है।
(घ) समणुदायविाचक- िजन शबदो के दारा केविल सामणूिहक संखया का बोध हो। जैसे(1) तुमण तीनो को जाना पडेगा।
(2) यहाँ से चारो चले जाओ।
(2) अिनिशचत संखयाविाचक िविशेषण- िजन िविशेषण शबदो से िनिशचत संखया का बोध न हो। जैसे-कुछ
बचचे पाकर मणे खेल रहे है।
4. सं के तविाचक (िनदे श क) िविशे ष ण
जो सविर नामण संकेत दारा संजा या सविर नामण की िविशेषता बतलाते है विे संकेतविाचक िविशेषण कहलाते है।
िविशेष-कयोिक संकेतविाचक िविशेषण सविर नामण शबदो से बनते है, अतः ये साविर नािमणक िविशेषण कहलाते है।
इनहे िनदेशक भी कहते है।
(1) पिरमणाणविाचक िविशेषण और संखयाविाचक िविशेषण मणे अंतर- िजन विसतुओं की नाप-तोल की जा सके
उनके विाचक शबद पिरमणाणविाचक िविशेषण कहलाते है। जैसे-‘कुछ दध
ू लाओ’। इसमणे ‘कुछ’ शबद तोल के
िलए आया है। इसिलए यह पिरमणाणविाचक िविशेषण है। 2.िजन विसतुओं की िगनती की जा सके उनके विाचक
शबद संखयाविाचक िविशेषण कहलाते है। जैसे-कुछ बचचे इधर आओ। यहाँ पर ‘कुछ’ बचचो की िगनती के
िलए आया है। इसिलए यह संखयाविाचक िविशेषण है। पिरमणाणविाचक िविशेषणो के बाद द्रबव्य अथविा
पदाथर विाचक संजाएँ आएँ गी जबिक संखयाविाचक िविशेषणो के बाद जाितविाचक संजाएँ आती है।
(2) सविर नामण और साविर नािमणक िविशेषण मणे अंतर- िजस शबद का पयोग संजा शबद के सथान पर हो उसे
सविर नामण कहते है। जैसे-विह मणुंबई गया। इस विाकय मणे विह सविर नामण है। िजस शबद का पयोग संजा से पूविर
अथविा बाद मणे िविशेषण के रप मणे िकया गया हो उसे साविर नािमणक िविशेषण कहते है। जैसे-विह रथ आ रहा है।
इसमणे विह शबद रथ का िविशेषण है। अतः यह साविर नािमणक िविशेषण है।
िविशे ष ण की अविसथाएँ
िविशेषण शबद िकसी संजा या सविर नामण की िविशेषता बतलाते है। िविशेषता बताई जाने विाली विसतुओं के गुणदोष कमण-जयादा होते है। गुण-दोषो के इस कमण-जयादा होने को तुलनातमणक ढंग से ही जाना जा सकता है।
तुलना की दिष से िविशेषणो की िनमनिलिखत तीन अविसथाएँ होती है-

(1) मणूलाविसथा
(2) उतराविसथा
(3) उतमणाविसथा
(1) मणूल ाविसथा
मणूलाविसथा मणे िविशेषण का तुलनातमणक रप नही होता है। विह केविल सामणानय िविशेषता ही पकट करता है।
जैसे- 1.सािविती सुंदर लडकी है। 2.सुरश
े अचछा लडका है। 3.सूयर तेजसविी है।
(2) उतराविसथा
जब दो व्यिकयो या विसतुओं के गुण-दोषो की तुलना की जाती है तब िविशेषण उतराविसथा मणे पयुक होता है।
जैसे- 1.रविीनद्रब चेतन से अिधक बुिदमणान है। 2.सिविता रमणा की अपेका अिधक सुनदर है।
(3) उतमणाविसथा
उतमणाविसथा मणे दो से अिधक व्यिकयो एविं विसतुओं की तुलना करके िकसी एक को सबसे अिधक अथविा
सबसे कमण बताया गया है। जैसे- 1.पंजाब मणे अिधकतमण अन होता है। 2.संदीप िनकृषतमण बालक है।
िविशेष-केविल गुणविाचक एविं अिनिशचत संखयाविाचक तथा िनिशचत पिरमणाणविाचक िविशेषणो की ही ये
तुलनातमणक अविसथाएँ होती है, अनय िविशेषणो की नही।
अविसथाओं के रप(1) अिधक और सबसे अिधक शबदो का पयोग करके उतराविसथा और उतमणाविसथा के रप बनाए जा
सकते है। जैसेमणूलाविसथा उतराविसथा उतमणाविसथा
अचछी अिधक अचछी सबसे अचछी
चतुर अिधक चतुर सबसे अिधक चतुर
बुिदमणान अिधक बुिदमणान सबसे अिधक बुिदमणान
बलविान अिधक बलविान सबसे अिधक बलविान
इसी पकार दस
ू रे िविशेषण शबदो के रप भी बनाए जा सकते है।
(2) ततसमण शबदो मणे मणूलाविसथा मणे िविशेषण का मणूल रप, उतराविसथा मणे ‘तर’ और उतमणाविसथा मणे ‘तमण’ का
पयोग होता है। जैसेमणूलाविसथा

उतराविसथा

उतमणाविसथा

उचच

उचचतर

उचचतमण

कठोर

कठोरतर

कठोरतमण

गुर

गुरतर

गुरतमण

मणहान, मणहानतर

मणहतर, मणहानतमण

मणहतमण

नयून

नयूनतर

नयनूतमण

लघु

लघुतर

लघुतमण

तीव

तीवतर

तीवतमण

िविशाल

िविशालतर

िविशालतमण

उतकृष

उतकृषर

उतकृटतमण

सुंदर

सुंदरतर

सुंदरतमण

मणधुर

मणधुरतर

मणधुतरतमण

िविशे ष णो की रचना
कुछ शबद मणूलरप मणे ही िविशेषण होते है, िकनतु कुछ िविशेषण शबदो की रचना संजा, सविर नामण एविं िक्रया
शबदो से की जाती है(1) संजा से िविशेषण बनाना
पतयय

संजा

िविशेषण

संजा

िविशेषण

अंश

आं िशक

धमणर

धािमणर क

अलंकार

आलंकािरक

नीित

नैितक

अथर

आिथर क

िदन

दैिनक

इितहास

ऐितहािसक

देवि

दैिविक

अंक

अंिकत

कुसुमण

कुसुिमणत

सुरिभ

सुरिभत

ध्वििन

ध्वििनत

कुधा

कुिधत

तरंग

तरंिगत

जटा

जिटल

पंक

पंिकल

फेन

फेिनल

उिमणर

उिमणर ल

इमण

सविणर

सवििणर मण

रक

रिकमण

रोग

रोगी

भोग

भोगी

ईन,ईण

कुल

कुलीन

गामण

गामणीण

ईय

आतमणा

आतमणीय

जाित

जातीय

इत

इल

आलु

शदा

शदालु

ईषयार

ईषयारलु

विी

मणनस

मणनसविी

तपस

तपसविी

मणय

सुख

सुखमणय

दख

दख
ु मणय

विान

रप

रपविान

गुण

गुणविान

विती(सी)

गुण

गुणविती

पुत

पुतविती

मणान

बुिद

बुिदमणान

शी

शीमणान

मणती (सी)

शी

शीमणती

बुिद

बुिदमणती

रत

धमणर

धमणर रत

कमणर

कमणर रत

सथ

समणीप

समणीपसथ

देह

देहसथ

िनष

धमणर

धमणर िनष

कमणर

कमणर िनष

(2) सविर नामण से िविशेषण बनाना
सविर नामण

िविशेषण

सविर नामण

िविशेषण

विह

विैसा

यह

ऐसा

(3) िक्रया से िविशेषण बनाना
िक्रया

िविशेषण

िक्रया

िविशेषण

पत

पितत

पूज

पूजनीय

पठ

पिठत

विंद

विंदनीय

भागना

भागने विाला

पालना

पालने विाला

अध्याय 10
िक्रया
िक्रया- िजस शबद अथविा शबद-समणूह के दारा िकसी कायर के होने अथविा करने का बोध हो उसे िक्रया कहते
है। जैसे(1) गीता नाच रही है।
(2) बचचा दध
ू पी रहा है।
(3) राकेश कॉलेज जा रहा है।
(4) गौरवि बुिदमणान है।
(5) िशविाजी बहु त विीर थे।
इनमणे ‘नाच रही है’ , ‘पी रहा है’, ‘जा रहा है’ शबद कायर -व्यापार का बोध करा रहे है। जबिक ‘है’, ‘थे’ शबद
होने का। इन सभी से िकसी कायर के करने अथविा होने का बोध हो रहा है। अतः ये िक्रयाएँ है।
धातु
िक्रया का मणूल रप धातु कहलाता है। जैसे-िलख, पढ, जा, खा, गा, रो, पा आिद। इनही धातुओं से िलखता,
पढता, आिद िक्रयाएँ बनती है।
िक्रया के भेद- िक्रया के दो भेद है(1) अकमणर क िक्रया।
(2) सकमणर क िक्रया।
1. अकमणर क िक्रया
िजन िक्रयाओं का फल सीधा कतार पर ही पडे विे अकमणर क िक्रया कहलाती है। ऐसी अकमणर क िक्रयाओं को
कमणर की आविशयकता नही होती। अकमणर क िक्रयाओं के अनय उदाहरण है(1) गौरवि रोता है।
(2) साँप रेगता है।
(3) रेलगाडी चलती है।
कुछ अकमणर क िक्रयाएँ - लजाना, होना, बढना, सोना, खेलना, अकडना, डरना, बैठना, हँसना, उगना, जीना,
दौडना, रोना, ठहरना, चमणकना, डोलना, मणरना, घटना, फाँदना, जागना, बरसना, उछलना, कूदना आिद।

2. सकमणर क िक्रया
िजन िक्रयाओं का फल (कतार को छोडकर) कमणर पर पडता है विे सकमणर क िक्रया कहलाती है। इन िक्रयाओं मणे
कमणर का होना आविशयक है, सकमणर क िक्रयाओं के अनय उदाहरण है(1) मणै लेख िलखता हू ँ।
(2) रमणेश िमणठाई खाता है।
(3) सिविता फल लाती है।
(4) भँविरा फूलो का रस पीता है।
3.िदकमणर क िक्रया- िजन िक्रयाओं के दो कमणर होते है, विे िदकमणर क िक्रयाएँ कहलाती है। िदकमणर क िक्रयाओं के
उदाहरण है(1) मणैने शयामण को पुसतक दी।
(2) सीता ने राधा को रपये िदए।
ऊपर के विाकयो मणे ‘देना’ िक्रया के दो कमणर है। अतः देना िदकमणर क िक्रया है।
पयोग की दिष से िक्रया के भे द
पयोग की दिष से िक्रया के िनमनिलिखत पाँच भेद है1.सामणानय िक्रया- जहाँ केविल एक िक्रया का पयोग होता है विह सामणानय िक्रया कहलाती है। जैसे1. आप आए।
2.विह नहाया आिद।
2.संयक
ु िक्रया- जहाँ दो अथविा अिधक िक्रयाओं का साथ-साथ पयोग हो विे संयक
ु िक्रया कहलाती है।
जैसे1.सिविता मणहाभारत पढने लगी।
2.विह खा चुका।
3.नामणधातु िक्रया- संजा, सविर नामण अथविा िविशेषण शबदो से बने िक्रयापद नामणधातु िक्रया कहलाते है। जैसेहिथयाना, शरमणाना, अपनाना, लजाना, िचकनाना, झुठलाना आिद।
4.पेरणाथर क िक्रया- िजस िक्रया से पता चले िक कतार सवियं कायर को न करके िकसी अनय को उस कायर को
करने की पेरणा देता है विह पेरणाथर क िक्रया कहलाती है। ऐसी िक्रयाओं के दो कतार होते है- (1) पेरक कतारपेरणा पदान करने विाला। (2) पेिरत कतार-पेरणा लेने विाला। जैसे-शयामणा राधा से पत िलखविाती है। इसमणे
विासतवि मणे पत तो राधा िलखती है, िकनतु उसको िलखने की पेरणा देती है शयामणा। अतः ‘िलखविाना’ िक्रया
पेरणाथर क िक्रया है। इस विाकय मणे शयामणा पेरक कतार है और राधा पेिरत कतार।

5.पूविरकािलक िक्रया- िकसी िक्रया से पूविर यिद कोई दस
ू री िक्रया पयुक हो तो विह पूविरकािलक िक्रया
कहलाती है। जैसे- मणै अभी सोकर उठा हू ँ। इसमणे ‘उठा हू ँ’ िक्रया से पूविर ‘सोकर’ िक्रया का पयोग हु आ है।
अतः ‘सोकर’ पूविरकािलक िक्रया है।
िविशेष- पूविरकािलक िक्रया या तो िक्रया के सामणानय रप मणे पयुक होती है अथविा धातु के अंत मणे ‘कर’
अथविा ‘करके’ लगा देने से पूविरकािलक िक्रया बन जाती है। जैसे(1) बचचा दध
ू पीते ही सो गया।
(2) लडिकयाँ पुसतके पढकर जाएँ गी।
अपूणर िक्रया
कई बार विाकय मणे िक्रया के होते हु ए भी उसका अथर सपष नही हो पाता। ऐसी िक्रयाएँ अपूणर िक्रया कहलाती
है। जैसे-गाँधीजी थे। तुमण हो। ये िक्रयाएँ अपूणर िक्रयाएँ है। अब इनही विाकयो को िफर से पिढएगांधीजी राषरिपता थे। तुमण बुिदमणान हो।
इन विाकयो मणे क्रमणशः ‘राषरिपता’ और ‘बुिदमणान’ शबदो के पयोग से सपषता आ गई। ये सभी शबद ‘पूरक’
है।
अपूणर िक्रया के अथर को पूरा करने के िलए िजन शबदो का पयोग िकया जाता है उनहे पूरक कहते है।

अध्याय 11
काल
काल
िक्रया के िजस रप से कायर संपन होने का समणय (काल) जात हो विह काल कहलाता है। काल के
िनमनिलिखत तीन भेद है1. भूतकाल।
2. वितर मणानकाल।
3. भिविषयकाल।
1. भूत काल
िक्रया के िजस रप से बीते हु ए समणय (अतीत) मणे कायर संपन होने का बोध हो विह भूतकाल कहलाता है।
जैसे(1) बचचा गया।
(2) बचचा गया है।
(3) बचचा जा चुका था।
ये सब भूतकाल की िक्रयाएँ है, कयोिक ‘गया’, ‘गया है’, ‘जा चुका था’, िक्रयाएँ भूतकाल का बोध कराती
है।
भूतकाल के िनमनिलिखत छह भेद है1. सामणानय भूत।
2. आसन भूत।
3. अपूणर भूत।
4. पूणर भूत।
5. संिदगध भूत।
6. हेतुहेतुमणद भूत।
1.सामणानय भूत- िक्रया के िजस रप से बीते हु ए समणय मणे कायर के होने का बोध हो िकनतु ठीक समणय का
जान न हो, विहाँ सामणानय भूत होता है। जैसे(1) बचचा गया।

(2) शयामण ने पत िलखा।
(3) कमणल आया।
2.आसन भूत- िक्रया के िजस रप से अभी-अभी िनकट भूतकाल मणे िक्रया का होना पकट हो, विहाँ आसन
भूत होता है। जैसे(1) बचचा आया है।
(2) शयान ने पत िलखा है।
(3) कमणल गया है।
3.अपूणर भूत- िक्रया के िजस रप से कायर का होना बीते समणय मणे पकट हो, पर पूरा होना पकट न हो विहाँ
अपूणर भूत होता है। जैसे(1) बचचा आ रहा था।
(2) शयामण पत िलख रहा था।
(3) कमणल जा रहा था।
4.पूणर भूत- िक्रया के िजस रप से यह जात हो िक कायर समणाप हु ए बहु त समणय बीत चुका है उसे पूणर भूत
कहते है। जैसे(1) शयामण ने पत िलखा था।
(2) बचचा आया था।
(3) कमणल गया था।
5.संिदगध भूत- िक्रया के िजस रप से भूतकाल का बोध तो हो िकनतु कायर के होने मणे संदेह हो विहाँ संिदगध
भूत होता है। जैसे(1) बचचा आया होगा।
(2) शयामण ने पत िलखा होगा।
(3) कमणल गया होगा।
6.हेतुहेतुमणद भूत- िक्रया के िजस रप से बीते समणय मणे एक िक्रया के होने पर दस
ू री िक्रया का होना आिशत
हो अथविा एक िक्रया के न होने पर दस
ू री िक्रया का न होना आिशत हो विहाँ हेतुहेतुमणद भूत होता है। जैसे(1) यिद शयामण ने पत िलखा होता तो मणै अविशय आता।
(2) यिद विषार होती तो फसल अचछी होती।

2. वितर मण ान काल
िक्रया के िजस रप से कायर का वितर मणान काल मणे होना पाया जाए उसे वितर मणान काल कहते है। जैसे(1) मणुिन मणाला फेरता है।

(2) शयामण पत िलखता होगा।
इन सब मणे वितर मणान काल की िक्रयाएँ है, कयोिक ‘फेरता है’ , ‘िलखता होगा’, िक्रयाएँ वितर मणान काल का बोध
कराती है।
इसके िनमनिलिखत तीन भेद है(1) सामणानय वितर मणान।
(2) अपूणर वितर मणान।
(3) संिदगध वितर मणान।
1.सामणानय वितर मणान- िक्रया के िजस रप से यह बोध हो िक कायर वितर मणान काल मणे सामणानय रप से होता है
विहाँ सामणानय वितर मणान होता है। जैसे(1) बचचा रोता है।
(2) शयामण पत िलखता है।
(3) कमणल आता है।
2.अपूणर वितर मणान- िक्रया के िजस रप से यह बोध हो िक कायर अभी चल ही रहा है, समणाप नही हु आ है विहाँ
अपूणर वितर मणान होता है। जैसे(1) बचचा रो रहा है।
(2) शयामण पत िलख रहा है।
(3) कमणल आ रहा है।
3.संिदगध वितर मणान- िक्रया के िजस रप से वितर मणान मणे कायर के होने मणे संदेह का बोध हो विहाँ संिदगध वितर मणान
होता है। जैसे(1) अब बचचा रोता होगा।
(2) शयामण इस समणय पत िलखता होगा।
3. भिविषयत काल
िक्रया के िजस रप से यह जात हो िक कायर भिविषय मणे होगा विह भिविषयत काल कहलाता है। जैसे- (1)
शयामण पत िलखेगा। (2) शायद आज संध्या को विह आए।
इन दोनो मणे भिविषयत काल की िक्रयाएँ है, कयोिक िलखेगा और आए िक्रयाएँ भिविषयत काल का बोध कराती
है।
इसके िनमनिलिखत दो भेद है1. सामणानय भिविषयत।
2. संभाव्य भिविषयत।

1.सामणानय भिविषयत- िक्रया के िजस रप से कायर के भिविषय मणे होने का बोध हो उसे सामणानय भिविषयत
कहते है। जैसे(1) शयामण पत िलखेगा।
(2) हमण घूमणने जाएँ गे।
2.संभाव्य भिविषयत- िक्रया के िजस रप से कायर के भिविषय मणे होने की संभाविना का बोध हो विहाँ संभाव्य
भिविषयत होता है जैसे(1) शायद आज विह आए।
(2) संभवि है शयामण पत िलखे।
(3) कदािचत संध्या तक पानी पडे।

अध्याय 12
विाचय
विाचय-िक्रया के िजस रप से यह जात हो िक विाकय मणे िक्रया दारा संपािदत िविधान का िविषय कतार है, कमणर
है, अथविा भावि है, उसे विाचय कहते है।
विाचय के तीन पकार है1. कतृरविाचय।
2. कमणर विाचय।
3. भाविविाचय।
1.कतृरविाचय- िक्रया के िजस रप से विाकय के उदेशय (िक्रया के कतार) का बोध हो, विह कतृरविाचय कहलाता
है। इसमणे िलंग एविं विचन पायः कतार के अनुसार होते है। जैसे1.बचचा खेलता है।
2.घोडा भागता है।
इन विाकयो मणे ‘बचचा’, ‘घोडा’ कतार है तथा विाकयो मणे कतार की ही पधानता है। अतः ‘खेलता है’, ‘भागता
है’ ये कतृरविाचय है।
2.कमणर विाचय- िक्रया के िजस रप से विाकय का उदेशय ‘कमणर ’ पधान हो उसे कमणर विाचय कहते है। जैसे1.भारत-पाक युद मणे सहसो सैिनक मणारे गए।
2.छातो दारा नाटक पसतुत िकया जा रहा है।
3.पुसतक मणेरे दारा पढी गई।
4.बचचो के दारा िनबंध पढे गए।
इन विाकयो मणे िक्रयाओं मणे ‘कमणर ’ की पधानता दशारई गई है। उनकी रप-रचना भी कमणर के िलंग, विचन और
पुरष के अनुसार हु ई है। िक्रया के ऐसे रप ‘कमणर विाचय’ कहलाते है।
3.भाविविाचय-िक्रया के िजस रप से विाकय का उदेशय केविल भावि (िक्रया का अथर ) ही जाना जाए विहाँ
भाविविाचय होता है। इसमणे कतार या कमणर की पधानता नही होती है। इसमणे मणुखयतः अकमणर क िक्रया का ही
पयोग होता है और साथ ही पायः िनषेधाथर क विाकय ही भाविविाचय मणे पयुक होते है। इसमणे िक्रया सदैवि
पुिलंग, अनय पुरष के एक विचन की होती है।
पयोग

पयोग तीन पकार के होते है1. कतर िर पयोग।
2. कमणर िण पयोग।
3. भाविे पयोग।
1.कतर िर पयोग- जब कतार के िलंग, विचन और पुरष के अनुरप िक्रया हो तो विह ‘कतर िर पयोग’ कहलाता
है। जैसे1.लडका पत िलखता है।
2.लडिकयाँ पत िलखती है।
इन विाकयो मणे ‘लडका’ एकविचन, पुिलंग और अनय पुरष है और उसके साथ िक्रया भी ‘िलखता है’
एकविचन, पुिलंग और अनय पुरष है। इसी तरह ‘लडिकयाँ पत िलखती है’ दस
ू रे विाकय मणे कतार बहु विचन,
सीिलंग और अनय पुरष है तथा उसकी िक्रया भी ‘िलखती है’ बहु विचन सीिलंग और अनय पुरष है।
2.कमणर िण पयोग- जब िक्रया कमणर के िलंग, विचन और पुरष के अनुरप हो तो विह ‘कमणर िण पयोग’ कहलाता
है। जैसे- 1.उपनयास मणेरे दारा पढा गया।
2.छातो से िनबंध िलखे गए।
3.युद मणे हजारो सैिनक मणारे गए।
इन विाकयो मणे ‘उपनयास’, ‘सैिनक’, कमणर कतार की िसथित मणे है अतः उनकी पधानता है। इनमणे िक्रया का
रप कमणर के िलंग, विचन और पुरष के अनुरप बदला है, अतः यहाँ ‘कमणर िण पयोग’ है।
3.भाविे पयोग- कतर िर विाचय की सकमणर क िक्रयाएँ , जब उनके कतार और कमणर दोनो िविभिकयुक हो तो विे ‘भाविे
पयोग’ के अंतगर त आती है। इसी पकार भाविविाचय की सभी िक्रयाएँ भी भाविे पयोग मणे मणानी जाती है। जैसे1.अनीता ने बेल को सीचा।
2.लडको ने पतो को देखा है।
3.लडिकयो ने पुसतको को पढा है।
4.अब उससे चला नही जाता है।
इन विाकयो की िक्रयाओं के िलंग, विचन और पुरष न कतार के अनुसार है और न ही कमणर के अनुसार, अिपतु
विे एकविचन, पुिलंग और अनय पुरष है। इस पकार के ‘पयोग भाविे’ पयोग कहलाते है।
विाचय पिरवितर न
1.कतृरविाचय से कमणर विाचय बनाना(1) कतृरविाचय की िक्रया को सामणानय भूतकाल मणे बदलना चािहए।
(2) उस पिरविितर त िक्रया-रप के साथ काल, पुरष, विचन और िलंग के अनुरप जाना िक्रया का रप जोडना

चािहए।
(3) इनमणे ‘से’ अथविा ‘के दारा’ का पयोग करना चािहए। जैसेकतृरविाचय कमणर विाचय
1.शयामणा उपनयास िलखती है। शयामणा से उपनयास िलखा जाता है।
2.शयामणा ने उपनयास िलखा। शयामणा से उपनयास िलखा गया।
3.शयामणा उपनयास िलखेगी। शयामणा से (के दारा) उपनयास िलखा जाएगा।
2.कतृरविाचय से भाविविाचय बनाना(1) इसके िलए िक्रया अनय पुरष और एकविचन मणे रखनी चािहए।
(2) कतार मणे करण कारक की िविभिक लगानी चािहए।
(3) िक्रया को सामणानय भूतकाल मणे लाकर उसके काल के अनुरप जाना िक्रया का रप जोडना चािहए।
(4) आविशयकतानुसार िनषेधसूचक ‘नही’ का पयोग करना चािहए। जैसेकतृरविाचय भाविविाचय
1.बचचे नही दौडते। बचचो से दौडा नही जाता।
2.पकी नही उडते। पिकयो से उडा नही जाता।
3.बचचा नही सोया। बचचे से सोया नही जाता।

अध्याय 13
िक्रया-िविशे ष ण
िक्रया-िविशेषण- जो शबद िक्रया की िविशेषता पकट करते है विे िक्रया-िविशेषण कहलाते है। जैसे- 1.सोहन
सुंदर िलखता है। 2.गौरवि यहाँ रहता है। 3.संगीता पितिदन पढती है। इन विाकयो मणे ‘सुनदर’, ‘यहाँ’ और
‘पितिदन’ शबद िक्रया की िविशेषता बतला रहे है। अतः ये शबद िक्रया-िविशेषण है।
अथारनुसार िक्रया-िविशेषण के िनमनिलिखत चार भेद है1. कालविाचक िक्रया-िविशेषण।
2. सथानविाचक िक्रया-िविशेषण।
3. पिरमणाणविाचक िक्रया-िविशेषण।
4. रीितविाचक िक्रया-िविशेषण।
1.कालविाचक िक्रया-िविशेषण- िजस िक्रया-िविशेषण शबद से कायर के होने का समणय जात हो विह कालविाचक
िक्रया-िविशेषण कहलाता है। इसमणे बहु धा ये शबद पयोग मणे आते है- यदा, कदा, जब, तब, हमणेशा, तभी,
ततकाल, िनरंतर, शीघ, पूविर, बाद, पीछे , घडी-घडी, अब, ततपशचात्, तदनंतर, कल, कई बार, अभी िफर
कभी आिद।
2.सथानविाचक िक्रया-िविशेषण- िजस िक्रया-िविशेषण शबद दारा िक्रया के होने के सथान का बोध हो विह
सथानविाचक िक्रया-िविशेषण कहलाता है। इसमणे बहु धा ये शबद पयोग मणे आते है- भीतर, बाहर, अंदर, यहाँ,
विहाँ, िकधर, उधर, इधर, कहाँ, जहाँ, पास, दरू , अनयत, इस ओर, उस ओर, दाएँ , बाएँ , ऊपर, नीचे आिद।
3.पिरमणाणविाचक िक्रया-िविशेषण-जो शबद िक्रया का पिरमणाण बतलाते है विे ‘पिरमणाणविाचक िक्रया-िविशेषण’
कहलाते है। इसमणे बहु धा थोडा-थोडा, अतयंत, अिधक, अलप, बहु त, कुछ, पयारप, पभूत, कमण, नयून, बूँदबूँद, सविलप, केविल, पायः अनुमणानतः, सविर था आिद शबद पयोग मणे आते है।
कुछ शबदो का पयोग पिरमणाणविाचक िविशेषण और पिरमणाणविाचक िक्रया-िविशेषण दोनो मणे समणान रप से
िकया जाता है। जैसे-थोडा, कमण, कुछ काफी आिद।
4.रीितविाचक िक्रया-िविशेषण- िजन शबदो के दारा िक्रया के संपन होने की रीित का बोध होता है विे
‘रीितविाचक िक्रया-िविशेषण’ कहलाते है। इनमणे बहु धा ये शबद पयोग मणे आते है- अचानक, सहसा, एकाएक,
झटपट, आप ही, ध्यानपूविरक, धडाधड, यथा, तथा, ठीक, सचमणुच, अविशय, विासतवि मणे, िनससंदेह, बेशक,
शायद, संभवि है, कदािचत्, बहु त करके, हाँ, ठीक, सच, जी, जरर, अतएवि, िकसिलए, कयोिक, नही, न,
मणत, कभी नही, कदािप नही आिद।

अध्याय 14
सं बं ध बोधक अव्यय
संबंधबोधक अव्यय- िजन अव्यय शबदो से संजा अथविा सविर नामण का विाकय के दस
ू रे शबदो के साथ संबंध
जाना जाता है, विे संबंधबोधक अव्यय कहलाते है। जैसे- 1. उसका साथ छोड दीिजए। 2.मणेरे सामणने से हट
जा। 3.लालिकले पर ितरंगा लहरा रहा है। 4.विीर अिभमणनयु अंत तक शतु से लोहा लेता रहा। इनमणे ‘साथ’,
‘सामणने’, ‘पर’, ‘तक’ शबद संजा अथविा सविर नामण शबदो के साथ आकर उनका संबंध विाकय के दस
ू रे शबदो
के साथ बता रहे है। अतः विे संबंधबोधक अव्यय है।
अथर के अनुसार संबंधबोधक अव्यय के िनमनिलिखत भेद है1. कालविाचक- पहले, बाद, आगे, पीछे ।
2. सथानविाचक- बाहर, भीतर, बीच, ऊपर, नीचे।
3. िदशाविाचक- िनकट, समणीप, ओर, सामणने।
4. साधनविाचक- िनिमणत, दारा, जिरये।
5. िविरोधसूचक- उलटे, िविरद, पितकूल।
6. समणतासूचक- अनुसार, सदश, समणान, तुलय, तरह।
7. हेतुविाचक- रिहत, अथविा, िसविा, अितिरक।
8. सहचरसूचक- समणेत, संग, साथ।
9. िविषयविाचक- िविषय, बाबत, लेख।
10. संगविाचक- समणेत, भर, तक।
िक्रया-िविशे ष ण और सं बं ध बोधक अव्यय मणे अं त र
जब इनका पयोग संजा अथविा सविर नामण के साथ होता है तब ये संबंधबोधक अव्यय होते है और जब ये िक्रया
की िविशेषता पकट करते है तब िक्रया-िविशेषण होते है। जैसे(1) अंदर जाओ। (िक्रया िविशेषण)
(2) दक
ु ान के भीतर जाओ। (संबंधबोधक अव्यय)

अध्याय 15
समणुच चयबोधक अव्यय
समणुचचयबोधक अव्यय- दो शबदो, विाकयांशो या विाकयो को िमणलाने विाले अव्यय समणुचचयबोधक अव्यय
कहलाते है। इनहे ‘योजक’ भी कहते है। जैसे(1) शुित और गुज
ं न पढ रहे है।
(2) मणुझे टेपिरकाडर र या घडी चािहए।
(3) सीता ने बहु त मणेहनत की िकनतु िफर भी सफल न हो सकी।
(4) बेशक विह धनविान है परनतु है कंजूस।
इनमणे ‘और’, ‘या’, ‘िकनतु’, ‘परनतु’ शबद आए है जोिक दो शबदो अथविा दो विाकयो को िमणला रहे है। अतः
ये समणुचचयबोधक अव्यय है।
समणुचचयबोधक के दो भेद है1. समणानािधकरण समणुचचयबोधक।
2. व्यिधकरण समणुचचयबोधक।
1. समणानािधकरण समणुच चयबोधक
िजन समणुचचयबोधक शबदो के दारा दो समणान विाकयांशो पदो और विाकयो को परसपर जोडा जाता है, उनहे
समणानािधकरण समणुचचयबोधक कहते है। जैसे- 1.सुनंदा खडी थी और अलका बैठी थी। 2.ऋतेश गाएगा तो
ऋतु तबला बजाएगी। इन विाकयो मणे और, तो समणुचचयबोधक शबदो दारा दो समणान शबद और विाकय परसपर
जुडे है।
समणानािधकरण समणुचचयबोधक के भेद- समणानािधकरण समणुचचयबोधक चार पकार के होते है(क) संयोजक।
(ख) िविभाजक।
(ग) िविरोधसूचक।
(घ) पिरणामणसूचक।
(क) संयोजक- जो शबदो, विाकयांशो और उपविाकयो को परसपर जोडने विाले शबद संयोजक कहलाते है।
और, तथा, एविं वि आिद संयोजक शबद है।
(ख) िविभाजक- शबदो, विाकयांशो और उपविाकयो मणे परसपर िविभाजन और िविकलप पकट करने विाले शबद

िविभाजक या िविकलपक कहलाते है। जैसे-या, चाहे अथविा, अनयथा, विा आिद।
(ग) िविरोधसूचक- दो परसपर िविरोधी कथनो और उपविाकयो को जोडने विाले शबद िविरोधसूचक कहलाते है।
जैसे-परनतु, पर, िकनतु, मणगर, बिलक, लेिकन आिद।
(घ) पिरणामणसूचक- दो उपविाकयो को परसपर जोडकर पिरणामण को दशारने विाले शबद पिरणामणसूचक
कहलाते है। जैसे-फलतः, पिरणामणसविरप, इसिलए, अतः, अतएवि, फलसविरप, अनयथा आिद।
2. व्यिधकरण समणुच चयबोधक
िकसी विाकय के पधान और आिशत उपविाकयो को परसपर जोडने विाले शबद व्यिधकरण समणुचचयबोधक
कहलाते है।
व्यिधकरण समणुचचयबोधक के भेद- व्यिधकरण समणुचचयबोधक चार पकार के होते है(क) कारणसूचक। (ख) संकेतसूचक। (ग) उदेशयसूचक। (घ) सविरपसूचक।
(क) कारणसूचक- दो उपविाकयो को परसपर जोडकर होने विाले कायर का कारण सपष करने विाले शबदो को
कारणसूचक कहते है। जैसे- िक, कयोिक, इसिलए, चूँिक, तािक आिद।
(ख) संकेतसूचक- जो दो योजक शबद दो उपविाकयो को जोडने का कायर करते है, उनहे संकेतसूचक कहते
है। जैसे- यिद....तो, जा...तो, यदिप....तथािप, यदिप...परनतु आिद।
(ग) उदेशयसूचक- दो उपविाकयो को परसपर जोडकर उनका उदेशय सपष करने विाले शबद उदेशयसूचक
कहलाते है। जैसे- इसिलए िक, तािक, िजससे िक आिद।
(घ) सविरपसूचक- मणुखय उपविाकय का अथर सपष करने विाले शबद सविरपसूचक कहलाते है। जैसे-यानी,
मणानो, िक, अथारत् आिद।

अध्याय 16
िविसमणयािदबोधक अव्यय
िविसमणयािदबोधक अव्यय- िजन शबदो मणे हषर , शोक, िविसमणय, गलािन, घृणा, लजजा आिद भावि पकट होते है विे
िविसमणयािदबोधक अव्यय कहलाते है। इनहे ‘दोतक’ भी कहते है। जैसे1.अहा ! कया मणौसमण है।
2.उफ ! िकतनी गरमणी पड रही है।
3. अरे ! आप आ गए ?
4.बाप रे बाप ! यह कया कर डाला ?
5.िछः-िछः ! िधककार है तुमहारे नामण को।
इनमणे ‘अहा’, ‘उफ’, ‘अरे’, ‘बाप-रे-बाप’, ‘िछः-िछः’ शबद आए है। ये सभी अनेक भाविो को व्यक कर रहे
है। अतः ये िविसमणयािदबोधक अव्यय है। इन शबदो के बाद िविसमणयािदबोधक िचह (!) लगता है।
पकट होने विाले भावि के आधार पर इसके िनमनिलिखत भेद है(1) हषर बोधक- अहा ! धनय !, विाह-विाह !, ओह ! विाह ! शाबाश !
(2) शोकबोधक- आह !, हाय !, हाय-हाय !, हा, तािह-तािह !, बाप रे !
(3) िविसमणयािदबोधक- है !, ऐं !, ओहो !, अरे, विाह !
(4) ितरसकारबोधक- िछः !, हट !, िधक्, धत् !, िछः िछः !, चुप !
(5) सविीकृितबोधक- हाँ-हाँ !, अचछा !, ठीक !, जी हाँ !, बहु त अचछा !
(6) संबोधनबोधक- रे !, री !, अरे !, अरी !, ओ !, अजी !, हैलो !
(7) आशीविारदबोधक- दीघारयु हो !, जीते रहो !

अध्याय 17
शबद-रचना
शबद-रचना-हमण सविभावितः भाषा-व्यविहार मणे कमण-से-कमण शबदो का पयोग करके अिधक-से-अिधक कामण
चलाना चाहते है। अतः शबदो के आरंभ अथविा अंत मणे कुछ जोडकर अथविा उनकी मणाताओं या सविर मणे कुछ
पिरवितर न करके नविीन-से-नविीन अथर -बोध कराना चाहते है। कभी-कभी दो अथविा अिधक शबदांशो को
जोडकर नए अथर -बोध को सविीकारते है। इस तरह एक शबद से कई अथो ं की अिभव्यिक हेतु जो नए-नए
शबद बनाए जाते है उसे शबद-रचना कहते है।
शबद रचना के चार पकार है1. उपसगर लगाकर
2. पतयय लगाकर
3. संिध दारा
4. समणास दारा
उपसगर
विे शबदांश जो िकसी शबद के आरंभ मणे लगकर उनके अथर मणे िविशेषता ला देते है अथविा उसके अथर को बदल
देते है, उपसगर कहलाते है। जैसे-परा-पराक्रमण, पराजय, पराभवि, पराधीन, पराभूत।
उपसगो ं को चार भागो मणे बाँटा जा सकता है(क) संसकृत के उपसगर
(ख) िहनदी के उपसगर
(ग) उदर ू के उपसगर
(घ) उपसगर की तरह पयुक होने विाले संसकृत के अव्यय
(क) सं स कृ त के उपसगर
उपसगर

अथर (मणे)

शबद-रप

अित

अिधक, ऊपर

अतयंत, अतयुतमण, अितिरक

अिध

ऊपर, पधानता

अिधकार, अध्यक, अिधपित

अनु

पीछे , समणान

अनुरप, अनुज, अनुकरण

अप

बुरा, हीन

अपमणान, अपयश, अपकार

अिभ

सामणने, अिधक पास

अिभयोग, अिभमणान, अिभभाविक

अवि

बुरा, नीचे

अविनित, अविगुण, अविशेष

तक से, लेकर, उलटा

आजनमण, आगमणन, आकाश

उत्

ऊपर, शेष

उतकंठा, उतकषर , उतपन

उप

िनकट, गौण

उपकार, उपदेश, उपचार, उपाध्यक

दरु ्

बुरा, किठन

दज
ु र न, ददु र शा, दगु र मण

दस
ु ्

बुरा

दशु चिरत, दसु साहस, दगु र मण

िन

अभावि, िविशेष

िनयुक, िनबंध, िनमणग

िनर्

िबना

िनविारह, िनमणर ल, िनजर न

िनस्

िबना

िनशचल, िनशछल, िनिशचत

परा

पीछे , उलटा

परामणशर , पराधीन, पराक्रमण

पिर

सब ओर

पिरपूणर, पिरजन, पिरवितर न

आगे, अिधक, उतकृष

पयतन, पबल, पिसद

पित

सामणने, उलटा, हरएक

पितकूल, पतयेक, पतयक

िवि

हीनता, िविशेष

िवियोग, िविशेष, िविधविा

समण्

पूणर, अचछा

संचय, संगित, संसकार

सु

अचछा, सरल

सुगमण, सुयश, सविागत

(ख) िहनदी के उपसगर
ये पायः सं स कृ त उपसगो ं के अपभ्रंश मणात ही है।
उपसगर

अथर (मणे)

शबद-रप

अभावि, िनषेध

अजर, अछूत, अकाल

अन

रिहत

अनपढ, अनबन, अनजान

अध

आधा

अधमणरा, अधिखला, अधपका

रिहत

औगुन, औतार, औघट

कु

बुराई

कुसंग, कुकमणर , कुमणित

िन

अभावि

िनडर, िनहतथा, िनकममणा

(ग) उदर ू के उपसगर
उपसगर

अथर (मणे)

शबद-रप

कमण

थोडा

कमणबखत, कमणजोर, कमणिसन

खुश

पसन, अचछा

खुशबू, खुशिदल, खुशिमणजाज

गैर

िनषेध

गैरहािजर, गैरकानूनी, गैरकौमण

दर

मणे

दरअसल, दरकार, दरिमणयान

ना

िनषेध

नालायक, नापसंद, नामणुमणिकन

बा

अनुसार

बामणौका, बाकायदा, बाइजजत

बद

बुरा

बदनामण, बदमणाश, बदचलन

बे

िबना

बेईमणान, बेचारा, बेअकल

ला

रिहत

लापरविाह, लाचार, लाविािरस

सर

मणुखय

सरकार, सरदार, सरपंच

हमण

साथ

हमणददी, हमणराज, हमणदमण

हर

पित

हरिदन, हरएक,हरसाल

(घ) उपसगर की तरह पयु क होने विाले सं स कृ त अव्यय
उपसगर

अथर (मणे)

शबद-रप

अ (व्यंजनो से पूविर)

िनषेध

अजान, अभावि, अचेत

अन् (सविरो से पूविर)

िनषेध

अनागत, अनथर , अनािद

सिहत

सजल, सकल, सहषर

अधः

नीचे

अधःपतन, अधोगित, अधोमणुख

िचर

बहु त देर

िचरायु, िचरकाल, िचरंतन

अंतर

भीतर

अंतरातमणा, अंतरारषरीय, अंतजारतीय

पुनः

िफर

पुनगर मणन, पुनजर नमण, पुनिमणर लन

पुरा

पुराना

पुराततवि, पुरातन

पुरस्

आगे

पुरसकार, पुरसकृत

ितरस्

बुरा, हीन

ितरसकार, ितरोभावि

सत्

शेष

सतकार, सजजन, सतकायर

अध्याय 18
पतयय
पतयय- जो शबदांश शबदो के अंत मणे लगकर उनके अथर को बदल देते है विे पतयय कहलाते है। जैसे-जलज,
पंकज आिद। जल=पानी तथा ज=जनमण लेने विाला। पानी मणे जनमण लेने विाला अथारत् कमणल। इसी पकार पंक
शबद मणे ज पतयय लगकर पंकज अथारत कमणल कर देता है। पतयय दो पकार के होते है1. कृत पतयय।
2. तिदत पतयय।
1. कृ त पतयय
जो पतयय धातुओं के अंत मणे लगते है विे कृत पतयय कहलाते है। कृत पतयय के योग से बने शबदो को
(कृत+अंत) कृदंत कहते है। जैसे-राखन+हारा=राखनहारा, घट+इया=घिटया, िलख+आविट=िलखाविट
आिद।
(क) कतृरविाचक कृदंत- िजस पतयय से बने शबद से कायर करने विाले अथारत कतार का बोध हो, विह कतृरविाचक
कृदंत कहलाता है। जैसे-‘पढना’। इस सामणानय िक्रया के साथ विाला पतयय लगाने से ‘पढनेविाला’ शबद
बना।
पतयय शबद-रप

पतयय

शबद-रप

विाला

पढनेविाला, िलखनेविाला,रखविाला

हारा

राखनहारा, खेविनहारा, पालनहारा

आऊ

िबकाऊ, िटकाऊ, चलाऊ

आक

तैराक

आका

लडका, धडाका, धमणाका

आडी

अनाडी, िखलाडी, अगाडी

आलू

आलु, झगडालू, दयालु, कृपालु

उडाऊ, कमणाऊ, खाऊ

एरा

लुटेरा, सपेरा

इया

बिढया, घिटया

ऐया

गविैया, रखैया, लुटैया

अक

धाविक, सहायक, पालक

(ख) कमणर विाचक कृदंत- िजस पतयय से बने शबद से िकसी कमणर का बोध हो विह कमणर विाचक कृदंत कहलाता
है। जैसे-गा मणे ना पतयय लगाने से गाना, सूँघ मणे ना पतयय लगाने से सूँघना और िबछ मणे औना पतयय लगाने
से िबछौना बना है।
(ग) करणविाचक कृदंत- िजस पतयय से बने शबद से िक्रया के साधन अथारत करण का बोध हो विह
करणविाचक कृदंत कहलाता है। जैसे-रेत मणे ई पतयय लगाने से रेती बना।

पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

भटका, भूला, झूला

रेती, फाँसी, भारी

झाा़डू

बेलन, झाडन, बंधन

नी

धौकनी करतनी, सुिमणरनी

(घ) भाविविाचक कृदंत- िजस पतयय से बने शबद से भावि अथारत् िक्रया के व्यापार का बोध हो विह भाविविाचक
कृदंत कहलाता है। जैसे-सजा मणे आविट पतयय लगाने से सजाविट बना।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

अन

चलन, मणनन, िमणलन

औती

मणनौती, िफरौती, चुनौती

आविा

भुलाविा,छलाविा, िदखाविा

अंत

िभडंत, गढंत

आई

कमणाई, चढाई, लडाई

आविट

सजाविट, बनाविट, रकाविट

आहट

घबराहट,िचलाहट

(ड) िक्रयाविाचक कृदंत- िजस पतयय से बने शबद से िक्रया के होने का भावि पकट हो विह िक्रयाविाचक कृदंत
कहलाता है। जैसे-भागता हु आ, िलखता हु आ आिद। इसमणे मणूल धातु के साथ ता लगाकर बाद मणे हु आ लगा
देने से वितर मणानकािलक िक्रयाविाचक कृदंत बन जाता है। िक्रयाविाचक कृदंत केविल पुिलंग और एकविचन मणे
पयुक होता है।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

ता

डू बता, बहता, रमणता, चलता

ता

हु आ आता हु आ, पढता हु आ

या

खोया, बोया

सूखा, भूला, बैठा

कर

जाकर, देखकर

ना

दौडना, सोना

2. तिदत पतयय
जो पतयय संजा, सविर नामण अथविा िविशेषण के अंत मणे लगकर नए शबद बनाते है तिदत पतयय कहलाते है।
इनके योग से बने शबदो को ‘तिदतांत’ अथविा तिदत शबद कहते है। जैसे-अपना+पन=अपनापन,
दानवि+ता=दानविता आिद।
(क) कतृरविाचक तिदत- िजससे िकसी कायर के करने विाले का बोध हो। जैसे- सुनार, कहार आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

पाठक, लेखक, िलिपक

आर

सुनार, लुहार, कहार

कार

पतकार, कलाकार, िचतकार

इया

सुिविधा, दिु खया, आढितया

एरा

सपेरा, ठठे रा, िचतेरा

मणछुआ, गेरआ, ठलुआ

विाला

टोपीविाला घरविाला, गाडीविाला

दार

ईमणानदार, दक
ु ानदार, कजर दार

हारा

लकडहारा, पिनहारा, मणिनहार

ची

मणशालची, खजानची, मणोची

गर

कारीगर, बाजीगर, जादगू र

(ख) भाविविाचक तिदत- िजससे भावि व्यक हो। जैसे-सरारफा, बुढापा, संगत, पभुता आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

पन

बचपन, लडकपन, बालपन

बुलाविा, सरारफा

आई

भलाई, बुराई, िढठाई

आहट

िचकनाहट, कडविाहट, घबराहट

इमणा

लािलमणा, मणिहमणा, अरिणमणा

पा

बुढापा, मणोटापा

गरमणी, सरदी,गरीबी

औती

बपौती

(ग) संबंधविाचक तिदत- िजससे संबंध का बोध हो। जैसे-ससुराल, भतीजा, चचेरा आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

आल

ससुराल, निनहाल

एरा

मणमणेरा,चचेरा, फुफेरा

जा

भानजा, भतीजा

इक

नैितक, धािमणर क, आिथर क

(घ) ऊनता (लघुता) विाचक तिदत- िजससे लघुता का बोध हो। जैसे-लुिटया।
पतययय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

इया

लुिटया, िडिबया, खिटया

कोठरी, टोकनी, ढोलकी

टी, टा

लँगोटी, कछौटी,कलूटा

डी, डा

पगडी, टु कडी, बछडा

(ड) गणनाविाचक तदित- िजससे संखया का बोध हो। जैसे-इकहरा, पहला, पाँचविाँ आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

हरा

इकहरा, दहु रा, ितहरा

ला

पहला

रा

दस
ू रा, तीसरा

था

चौथा

(च) सादशयविाचक तिदत- िजससे समणता का बोध हो। जैसे-सुनहरा।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

सा

पीला-सा, नीला-सा, काला-सा

हरा

सुनहरा, रपहरा

(छ) गुणविाचक तदित- िजससे िकसी गुण का बोध हो। जैसे-भूख, िविषैला, कुलविंत आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

भूखा, पयासा, ठंडा,मणीठा

धनी, लोभी, क्रोधी

ईय

विांछनीय, अनुकरणीय

ईला

रंगीला, सजीला

ऐला

िविषैला, कसैला

लु

कृपालु, दयालु

विंत

दयाविंत, कुलविंत

विान

गुणविान, रपविान

(ज) सथानविाचक तदित- िजससे सथान का बोध हो. जैसे-पंजाबी, जबलपुिरया, िदलीविाला आिद।
पतयय

शबद-रप

पतयय

शबद-रप

पंजाबी, बंगाली, गुजराती

इया

कलकितया, जबलपुिरया

विाल

विाला डेरवि
े ाला, िदलीविाला

कृ त पतयय और तिदत पतयय मणे अं त र
कृत पतयय- जो पतयय धातु या िक्रया के अंत मणे जुडकर नया शबद बनाते है कृत पतयय कहलाते है। जैसेिलखना, िलखाई, िलखाविट।
तिदत पतयय- जो पतयय संजा, सविर नामण या िविशेषण मणे जुडकर नया शबद बनाते हं विे तिदत पतयय कहलाते
है। जैसे-नीित-नैितक, काला-कािलमणा, राषर-राषरीयता आिद।

अध्याय 19
सं ि ध
संिध-संिध शबद का अथर है मणेल। दो िनकटविती विणो ं के परसपर मणेल से जो िविकार (पिरवितर न) होता है विह
संिध कहलाता है। जैसे-समण्+तोष=संतोष। देवि+इंद्रब=देविेद्रब। भानु+उदय=भानूदय।
संिध के भेद-संिध तीन पकार की होती है1. सविर संिध।
2. व्यंजन संिध।
3. िविसगर संिध।
1. सविर सं ि ध
दो सविरो के मणेल से होने विाले िविकार (पिरवितर न) को सविर-संिध कहते है। जैसे-िविदा+आलय=िविदालय।
सविर-संिध पाँच पकार की होती है(क) दीघर सं ि ध
हसवि या दीघर अ, इ, उ के बाद यिद हसवि या दीघर अ, इ, उ आ जाएँ तो दोनो िमणलकर दीघर आ, ई, और ऊ
हो जाते है। जैसे(क) अ+अ=आ धमणर +अथर =धमणारथर, अ+आ=आ-िहमण+आलय=िहमणालय।
आ+अ=आ आ िविदा+अथी=िविदाथी आ+आ=आ-िविदा+आलय=िविदालय।
(ख) इ और ई की संिधइ+इ=ई- रिवि+इंद्रब=रविीद्रब, मणुिन+इंद्रब=मणुनीद्रब।
इ+ई=ई- िगिर+ईश=िगरीश मणुिन+ईश=मणुनीश।
ई+इ=ई- मणही+इंद्रब=मणहीद्रब नारी+इंद ु=नारीद ु
ई+ई=ई- नदी+ईश=नदीश मणही+ईश=मणहीश
(ग) उ और ऊ की संिधउ+उ=ऊ- भानु+उदय=भानूदय िविधु+उदय=िविधूदय
उ+ऊ=ऊ- लघु+ऊिमणर =लघूिमणर िसधु+ऊिमणर =िसंधूिमणर

ऊ+उ=ऊ- विधू+उतसवि=विधूतसवि विधू+उलेख=विधूलेख
ऊ+ऊ=ऊ- भू+ऊध्विर =भूध्विर विधू+ऊजार=विधूजार
(ख) गुण सं ि ध
इसमणे अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए, उ, ऊ हो तो ओ, तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संिध कहते
है जैसे(क) अ+इ=ए- नर+इंद्रब=नरेद्रब अ+ई=ए- नर+ईश=नरेश
आ+इ=ए- मणहा+इंद्रब=मणहेद्रब आ+ई=ए मणहा+ईश=मणहेश
(ख) अ+ई=ओ जान+उपदेश=जानोपदेश आ+उ=ओ मणहा+उतसवि=मणहोतसवि
अ+ऊ=ओ जल+ऊिमणर =जलोिमणर आ+ऊ=ओ मणहा+ऊिमणर =मणहोिमणर
(ग) अ+ऋ=अर् देवि+ऋिष=देवििषर
(घ) आ+ऋ=अर् मणहा+ऋिष=मणहिषर
(ग) विृि द सं ि ध
अ आ का ए ऐ से मणेल होने पर ऐ अ आ का ओ, औ से मणेल होने पर औ हो जाता है। इसे विृिद संिध कहते है।
जैसे(क) अ+ए=ऐ एक+एक=एकैक अ+ऐ=ऐ मणत+ऐकय=मणतैकय
आ+ए=ऐ सदा+एवि=सदैवि आ+ऐ=ऐ मणहा+ऐशवियर =मणहैशवियर
(ख) अ+ओ=औ विन+ओषिध=विनौषिध आ+ओ=औ मणहा+औषध=मणहौषिध
अ+औ=औ परमण+औषध=परमणौषध आ+औ=औ मणहा+औषध=मणहौषध
(घ) यण सं ि ध
(क) इ, ई के आगे कोई िविजातीय (असमणान) सविर होने पर इ ई को ‘य्’ हो जाता है। (ख) उ, ऊ के आगे
िकसी िविजातीय सविर के आने पर उ ऊ को ‘वि्’ हो जाता है। (ग) ‘ऋ’ के आगे िकसी िविजातीय सविर के
आने पर ऋ को ‘र्’ हो जाता है। इनहे यण-संिध कहते है।
इ+अ=य्+अ यिद+अिप=यदिप ई+आ=य्+आ इित+आिद=इतयािद।
ई+अ=य्+अ नदी+अपर ण=नदपर ण ई+आ=य्+आ देविी+आगमणन=देव्यागमणन
(घ) उ+अ=वि्+अ अनु+अय=अनविय उ+आ=वि्+आ सु+आगत=सविागत
उ+ए=वि्+ए अनु+एषण=अनविेषण ऋ+अ=र्+आ िपतृ+आजा=िपताजा

(ड) अयािद संिध- ए, ऐ और ओ औ से परे िकसी भी सविर के होने पर क्रमणशः अय्, आय्, अवि् और आवि् हो
जाता है। इसे अयािद संिध कहते है।
(क) ए+अ=अय्+अ ने+अन+नयन (ख) ऐ+अ=आय्+अ गै+अक=गायक
(ग) ओ+अ=अवि्+अ पो+अन=पविन (घ) औ+अ=आवि्+अ पौ+अक=पाविक
औ+इ=आवि्+इ नौ+इक=नािविक
2. व्यं ज न सं ि ध
व्यंजन का व्यंजन से अथविा िकसी सविर से मणेल होने पर जो पिरवितर न होता है उसे व्यंजन संिध कहते है।
जैसे-शरत्+चंद्रब=शरचचंद्रब।
(क) िकसी विगर के पहले विणर क्, च्, ट् , त्, प् का मणेल िकसी विगर के तीसरे अथविा चौथे विणर या य्, र्, ल्, वि्, ह
या िकसी सविर से हो जाए तो क् को ग् च् को ज्, ट् को ड् और प् को ब् हो जाता है। जैसेक्+ग=गग िदक्+गज=िदगगज। क्+ई=गी विाक्+ईश=विागीश
च्+अ=ज् अच्+अंत=अजंत ट् +आ=डा षट् +आनन=षडानन
प+ज+बज अप्+ज=अबज
(ख) यिद िकसी विगर के पहले विणर (क्, च्, ट् , त्, प्) का मणेल न् या मण् विणर से हो तो उसके सथान पर उसी विगर
का पाँचविाँ विणर हो जाता है। जैसेक्+मण=ड् विाक्+मणय=विाड् मणय च्+न=ञ् अच्+नाश=अञनाश
ट् +मण=ण् षट् +मणास=षणमणास त्+न=न् उत्+नयन=उनयन
प्+मण्=मण् अप्+मणय=अममणय
(ग) त् का मणेल ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, वि या िकसी सविर से हो जाए तो द् हो जाता है। जैसेत्+भ=द सत्+भाविना=सदाविना त्+ई=दी जगत्+ईश=जगदीश
त्+भ=द भगवित्+भिक=भगविदिक त्+र=द्रब तत्+रप=तद्रबूप
त्+ध=द सत्+धमणर =सदमणर
(घ) त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट् , ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने
पर ल् हो जाता है। जैसेत्+च=चच उत्+चारण=उचचारण त्+ज=जज सत्+जन=सजजन
त्+झ=जझ उत्+झिटका=उजझिटका त्+ट=ट तत्+टीका=तटीका
त्+ड=ड उत्+डयन=उडयन त्+ल=ल उत्+लास=उलास
(ड) त् का मणेल यिद श् से हो तो त् को च् और श् का छ् बन जाता है। जैसेत्+श्=चछ उत्+शविास=उचछास त्+श=चछ उत्+िशष=उिचछष

त्+श=चछ सत्+शास=सचछास
(च) त् का मणेल यिद ह् से हो तो त् का द् और ह् का ध् हो जाता है। जैसेत्+ह=द उत्+हार=उदार त्+ह=द उत्+हरण=उदरण
त्+ह=द तत्+िहत=तिदत
(छ) सविर के बाद यिद छ् विणर आ जाए तो छ् से पहले च् विणर बढा िदया जाता है। जैसेअ+छ=अचछ सवि+छं द=सविचछं द आ+छ=आचछ आ+छादन=आचछादन
इ+छ=इचछ संिध+छे द=संिधचछे द उ+छ=उचछ अनु+छे द=अनुचछे द
(ज) यिद मण् के बाद क् से मण् तक कोई व्यंजन हो तो मण् अनुसविार मणे बदल जाता है। जैसेमण्+च्=ां िकमण्+िचत=िकंिचत मण्+क=ां िकमण्+कर=िकंकर
मण्+क=ां समण्+कलप=संकलप मण्+च=ां समण्+चय=संचय
मण्+त=ां समण्+तोष=संतोष मण्+ब=ां समण्+बंध=संबंध
मण्+प=ां समण्+पूणर=संपूणर
(झ) मण् के बाद मण का िदतवि हो जाता है। जैसेमण्+मण=ममण समण्+मणित=सममणित मण्+मण=ममण समण्+मणान=सममणान
(ञ) मण् के बाद य्, र्, ल्, वि्, श्, ष्, स्, ह् मणे से कोई व्यंजन होने पर मण् का अनुसविार हो जाता है। जैसेमण्+य=ां समण्+योग=संयोग मण्+र=ां समण्+रकण=संरकण
मण्+वि=ां समण्+िविधान=संिविधान मण्+वि=ां समण्+विाद=संविाद
मण्+श=ां समण्+शय=संशय मण्+ल=ां समण्+लग=संलग
मण्+स=ां समण्+सार=संसार
(ट) ऋ,र्, ष् से परे न् का ण् हो जाता है। परनतु चविगर , टविगर , तविगर , श और स का व्यविधान हो जाने पर न् का
ण् नही होता। जैसेर्+न=ण पिर+नामण=पिरणामण र्+मण=ण प+मणान=पमणाण
(ठ) स् से पहले अ, आ से िभन कोई सविर आ जाए तो स् को ष हो जाता है। जैसेभ्+स्=ष अिभ+सेक=अिभषेक िन+िसद=िनिषद िवि+समण+िविषमण
3. िविसगर -सं ि ध
िविसगर (:) के बाद सविर या व्यंजन आने पर िविसगर मणे जो िविकार होता है उसे िविसगर -संिध कहते है। जैसेमणनः+अनुकूल=मणनोनुकूल।
(क) िविसगर के पहले यिद ‘अ’ और बाद मणे भी ‘अ’ अथविा विगो ं के तीसरे, चौथे पाँचविे विणर , अथविा य, र, ल,

वि हो तो िविसगर का ओ हो जाता है। जैसेमणनः+अनुकूल=मणनोनुकूल अधः+गित=अधोगित मणनः+बल=मणनोबल
(ख) िविसगर से पहले अ, आ को छोडकर कोई सविर हो और बाद मणे कोई सविर हो, विगर के तीसरे, चौथे, पाँचविे
विणर अथविा य्, र, ल, वि, ह मणे से कोई हो तो िविसगर का र या र् हो जाता है। जैसेिनः+आहार=िनराहार िनः+आशा=िनराशा िनः+धन=िनधर न
(ग) िविसगर से पहले कोई सविर हो और बाद मणे च, छ या श हो तो िविसगर का श हो जाता है। जैसेिनः+चल=िनशचल िनः+छल=िनशछल दःु +शासन=दशु शासन
(घ)िविसगर के बाद यिद त या स हो तो िविसगर स् बन जाता है। जैसेनमणः+ते=नमणसते िनः+संतान=िनससंतान दःु +साहस=दसु साहस
(ड) िविसगर से पहले इ, उ और बाद मणे क, ख, ट, ठ, प, फ मणे से कोई विणर हो तो िविसगर का ष हो जाता है।
जैसेिनः+कलंक=िनषकलंक चतुः+पाद=चतुषपाद िनः+फल=िनषफल
(ड)िविसगर से पहले अ, आ हो और बाद मणे कोई िभन सविर हो तो िविसगर का लोप हो जाता है। जैसेिनः+रोग=िनरोग िनः+रस=नीरस
(छ) िविसगर के बाद क, ख अथविा प, फ होने पर िविसगर मणे कोई पिरवितर न नही होता। जैसेअंतः+करण=अंतःकरण

अध्याय 20
समणास
समणास का तातपयर है ‘संिकपीकरण’। दो या दो से अिधक शबदो से िमणलकर बने हु ए एक नविीन एविं साथर क
शबद को समणास कहते है। जैसे-‘रसोई के िलए घर’ इसे हमण ‘रसोईघर’ भी कह सकते है।
सामणािसक शबद- समणास के िनयमणो से िनिमणर त शबद सामणािसक शबद कहलाता है। इसे समणसतपद भी कहते
है। समणास होने के बाद िविभिकयो के िचह (परसगर ) लुप हो जाते है। जैसे-राजपुत।
समणास-िविगह- सामणािसक शबदो के बीच के संबंध को सपष करना समणास-िविगह कहलाता है। जैसे-राजपुतराजा का पुत।
पूविरपद और उतरपद- समणास मणे दो पद (शबद) होते है। पहले पद को पूविरपद और दस
ू रे पद को उतरपद
कहते है। जैसे-गंगाजल। इसमणे गंगा पूविरपद और जल उतरपद है।
समणास के भे द
समणास के चार भेद है1. अव्ययीभावि समणास।
2. ततपुरष समणास।
3. दंद समणास।
4. बहु वीिह समणास।
1. अव्ययीभावि समणास
िजस समणास का पहला पद पधान हो और विह अव्यय हो उसे अव्ययीभावि समणास कहते है। जैसे-यथामणित
(मणित के अनुसार), आमणरण (मणृतयु कर) इनमणे यथा और आ अव्यय है।
कुछ अनय उदाहरणआजीविन - जीविन-भर, यथासामणथयर - सामणथयर के अनुसार
यथाशिक - शिक के अनुसार, यथािवििध िवििध के अनुसार
यथाक्रमण - क्रमण के अनुसार, भरपेट पेट भरकर
हररोज - रोज-रोज, हाथोहाथ - हाथ ही हाथ मणे
रातोरात - रात ही रात मणे, पितिदन - पतयेक िदन

बेशक - शक के िबना, िनडर - डर के िबना
िनससंदेह - संदेह के िबना, हरसाल - हरेक साल
अव्ययीभावि समणास की पहचान- इसमणे समणसत पद अव्यय बन जाता है अथारत समणास होने के बाद उसका
रप कभी नही बदलता है। इसके साथ िविभिक िचह भी नही लगता। जैसे-ऊपर के समणसत शबद है।
2. ततपुर ष समणास
िजस समणास का उतरपद पधान हो और पूविरपद गौण हो उसे ततपुरष समणास कहते है। जैसेतुलसीदासकृत=तुलसी दारा कृत (रिचत)
जातव्य- िविगह मणे जो कारक पकट हो उसी कारक विाला विह समणास होता है। िविभिकयो के नामण के अनुसार
इसके छह भेद है(1) कमणर ततपुरष िगरहकट िगरह को काटने विाला
(2) करण ततपुरष मणनचाहा मणन से चाहा
(3) संपदान ततपुरष रसोईघर रसोई के िलए घर
(4) अपादान ततपुरष देशिनकाला देश से िनकाला
(5) संबंध ततपुरष गंगाजल गंगा का जल
(6) अिधकरण ततपुरष नगरविास नगर मणे विास
(क) नञ ततपुर ष समणास
िजस समणास मणे पहला पद िनषेधातमणक हो उसे नञ ततपुरष समणास कहते है। जैसेसमणसत पद समणास-िविगह समणसत पद समणास-िविगह
असभय न सभय अनंत न अंत
अनािद न आिद असंभवि न संभवि
(ख) कमणर ध ारय समणास
िजस समणास का उतरपद पधान हो और पूविरविद वि उतरपद मणे िविशेषण-िविशेषय अथविा उपमणान-उपमणेय का
संबंध हो विह कमणर धारय समणास कहलाता है। जैसेसमणसत पद

समणास-िविगह

समणसत पद

समणात िविगह

चंद्रबमणुख

चंद्रब जैसा मणुख

कमणलनयन

कमणल के समणान नयन

देहलता

देह रपी लता

दहीबडा

दही मणे डू बा बडा

नीलकमणल

नीला कमणल

पीतांबर

पीला अंबर (विस)

सजजन

सत् (अचछा) जन

नरिसंह

नरो मणे िसंह के समणान

(ग) िदगु समणास
िजस समणास का पूविरपद संखयाविाचक िविशेषण हो उसे िदगु समणास कहते है। इससे समणूह अथविा समणाहार का
बोध होता है। जैसेसमणसत पद

समणात-िविगह

समणसत पद

समणास िविगह

नविगह

नौ गहो का मणसूह

दोपहर

दो पहरो का समणाहार

ितलोक

तीनो लोको का समणाहार

चौमणासा

चार मणासो का समणूह

नविरात

नौ राितयो का समणूह

शताबदी

सौ अबदो (सालो) का समणूह

अठनी

आठ आनो का समणूह

3. दंद समणास
िजस समणास के दोनो पद पधान होते है तथा िविगह करने पर ‘और’, अथविा, ‘या’, एविं लगता है, विह दंद
समणास कहलाता है। जैसेसमणसत पद समणास-िविगह

समणसत पद

समणास-िविगह

पाप-पुणय

पाप और पुणय

अन-जल

अन और जल

सीता-रामण

सीता और रामण

खरा-खोटा

खरा और खोटा

ऊँच-नीच

ऊँच और नीच

राधा-कृषण

राधा और कृषण

4. बहु वीिह समणास
िजस समणास के दोनो पद अपधान हो और समणसतपद के अथर के अितिरक कोई सांकेितक अथर पधान हो
उसे बहु वीिह समणास कहते है। जैसेसमणसत पद

समणास-िविगह

दशानन

दश है आनन (मणुख) िजसके अथारत् राविण

नीलकंठ

नीला है कंठ िजसका अथारत् िशवि

सुलोचना

सुंदर है लोचन िजसके अथारत् मणेघनाद की पतनी

पीतांबर

पीले है अमबर (विस) िजसके अथारत् शीकृषण

लंबोदर

लंबा है उदर (पेट) िजसका अथारत् गणेशजी

दरु ातमणा

बुरी आतमणा विाला (कोई दषु )

शविेतांबर

शविेत है िजसके अंबर (विस) अथारत् सरसविती

सं ि ध और समणास मणे अं त र
संिध विणो ं मणे होती है। इसमणे िविभिक या शबद का लोप नही होता है। जैसे-देवि+आलय=देविालय। समणास दो
पदो मणे होता है। समणास होने पर िविभिक या शबदो का लोप भी हो जाता है। जैसे-मणाता-िपता=मणाता और
िपता।
कमणर धारय और बहु वीिह समणास मणे अंतर- कमणर धारय मणे समणसत-पद का एक पद दस
ू रे का िविशेषण होता है।
इसमणे शबदाथर पधान होता है। जैसे-नीलकंठ=नीला कंठ। बहु वीिह मणे समणसत पद के दोनो पदो मणे िविशेषणिविशेषय का संबंध नही होता अिपतु विह समणसत पद ही िकसी अनय संजािद का िविशेषण होता है। इसके साथ
ही शबदाथर गौण होता है और कोई िभनाथर ही पधान हो जाता है। जैसे-नील+कंठ=नीला है कंठ िजसका
अथारत िशवि।

अध्याय 21
पद-पिरचय
पद-पिरचय- विाकयगत शबदो के रप और उनका पारसपिरक संबंध बताने मणे िजस पिक्रया की आविशयकता
पडती है विह पद-पिरचय या शबदबोध कहलाता है।
पिरभाषा-विाकयगत पतयेक पद (शबद) का व्याकरण की दिष से पूणर पिरचय देना ही पद-पिरचय कहलाता
है।
शबद आठ पकार के होते है1.संजा- भेद, िलंग, विचन, कारक, िक्रया अथविा अनय शबदो से संबंध।
2.सविर नामण- भेद, पुरष, िलंग, विचन, कारक, िक्रया अथविा अनय शबदो से संबंध। िकस संजा के सथान पर
आया है (यिद पता हो)।
3.िक्रया- भेद, िलंग, विचन, पयोग, धातु, काल, विाचय, कतार और कमणर से संबंध।
4.िविशेषण- भेद, िलंग, विचन और िविशेषय की िविशेषता।
5.िक्रया-िविशेषण- भेद, िजस िक्रया की िविशेषता बताई गई हो उसके बारे मणे िनदेश।
6.संबंधबोधक- भेद, िजससे संबंध है उसका िनदेश।
7.समणुचचयबोधक- भेद, अिनवित शबद, विाकयांश या विाकय।
8.िविसमणयािदबोधक- भेद अथारत कौन-सा भावि सपष कर रहा है।

अध्याय 22
शबद-जान
1. पयारय विाची शबद
िकसी शबद-िविशेष के िलए पयुक समणानाथर क शबदो को पयारयविाची शबद कहते है। यदिप पयारयविाची शबद
समणानाथी होते है िकनतु भावि मणे एक-दस
ू रे से िकंिचत िभन होते है।
1.अमणृत- सुधा, सोमण, पीयूष, अिमणय।
2.असुर- राकस, दैतय, दानवि, िनशाचर।
3.अिग- आग, अनल, पाविक, वििह।
4.अशवि- घोडा, हय, तुरगं , बाजी।
5.आकाश- गगन, नभ, आसमणान, व्योमण, अंबर।
6.आँ ख- नेत, दग, नयन, लोचन।
7.इचछा- आकांका, चाह, अिभलाषा, कामणना।
8.इंद्रब- सुरश
े , देविेद्रब, देविराज, पुरद
ं र।
9.ईशविर- पभु, परमणेशविर, भगविान, परमणातमणा।
10.कमणल- जलज, पंकज, सरोज, राजीवि, अरिविनद।
11.गरमणी- गीषमण, ताप, िनदाघ, ऊषमणा।
12.गृह- घर, िनकेतन, भविन, आलय।
13.गंगा- सुरसिर, ितपथगा, देविनदी, जाहविी, भागीरथी।
14.चंद्रब- चाँद, चंद्रबमणा, िविधु, शिश, राकेश।
15.जल- विािर, पानी, नीर, सिलल, तोय।
16.नदी- सिरता, तिटनी, तरंिगणी, िनझर िरणी।
17.पविन- विायु, समणीर, हविा, अिनल।
18.पतनी- भायार, दारा, अधारिगनी, विामणा।
19.पुत- बेटा, सुत, तनय, आतमणज।
20.पुती-बेटी, सुता, तनया, आतमणजा।
21.पृथविी- धरा, मणही, धरती, विसुधा, भूिमण, विसुध
ं रा।
22.पविर त- शैल, नग, भूधर, पहाड।

23.िबजली- चपला, चंचला, दािमणनी, सौदामणनी।
24.मणेघ- बादल, जलधर, पयोद, पयोधर, घन।
25.राजा- नृप, नृपित, भूपित, नरपित।
26.रजनी- राित, िनशा, यािमणनी, िविभाविरी।
27.सपर - सांप, अिह, भुजंग, िविषधर।
28.सागर- समणुद्रब, उदिध, जलिध, विािरिध।
29.िसंह- शेर, विनराज, शादर ल
ू , मणृगराज।
30.सूयर- रिवि, िदनकर, सूरज, भासकर।
31.सी- ललना, नारी, कािमणनी, रमणणी, मणिहला।
32.िशकक- गुर, अध्यापक, आचायर , उपाध्याय।
33.हाथी- कंु जर, गज, िदप, करी, हसती।
2. अने क शबदो के िलए एक शबद
1

िजसे देखकर डर (भय) लगे

डराविना, भयानक

2

जो िसथर रहे

सथाविर

3

जान देने विाली

जानदा

4

भूत-वितर मणान-भिविषय को देखने (जानने) विाले

ितकालदशी

5

जानने की इचछा रखने विाला

िजजासु

6

िजसे कमणा न िकया जा सके

अकमय

7

पंद्रबह िदन मणे एक बार होने विाला

पािकक

8

अचछे चिरत विाला

सचचिरत

9

आजा का पालन करने विाला

आजाकारी

10

रोगी की िचिकतसा करने विाला

िचिकतसक

11

सतय बोलने विाला

सतयविादी

12

दस
ू रो पर उपकार करने विाला

उपकारी

13

िजसे कभी बुढापा न आये

अजर

14

दया करने विाला

दयालु

15

िजसका आकार न हो

िनराकार

16

जो आँ खो के सामणने हो

पतयक

17

जहाँ पहु ँचा न जा सके

अगमण, अगमय

18

िजसे बहु त कमण जान हो, थोडा जानने विाला

अलपज

19

मणास मणे एक बार आने विाला

मणािसक

20

िजसके कोई संतान न हो

िनससंतान

21

जो कभी न मणरे

अमणर

22

िजसका आचरण अचछा न हो

दरु ाचारी

23

िजसका कोई मणूलय न हो

अमणूलय

24

जो विन मणे घूमणता हो

विनचर

25

जो इस लोक से बाहर की बात हो

अलौिकक

26

जो इस लोक की बात हो

लौिकक

27

िजसके नीचे रेखा हो

रेखांिकत

28

िजसका संबंध पिशचमण से हो

पाशचातय

29

जो िसथर रहे

सथाविर

30

दख
ु ांत नाटक

तासदी

31

जो कमणा करने के योगय हो

कमय

32

िहंसा करने विाला

िहंसक

33

िहत चाहने विाला

िहतैषी

34

हाथ से िलखा हु आ

हसतिलिखत

35

सब कुछ जानने विाला

सविर ज

36

जो सवियं पैदा हु आ हो

सवियंभू

37

जो शरण मणे आया हो

शरणागत

38

िजसका विणर न न िकया जा सके

विणर नातीत

39

फल-फूल खाने विाला

शाकाहारी

40

िजसकी पतनी मणर गई हो

िविधुर

41

िजसका पित मणर गया हो

िविधविा

42

सौतेली मणाँ

िविमणाता

43

व्याकरण जाननेविाला

विैयाकरण

44

रचना करने विाला

रचियता

45

खून से रँगा हु आ

रकरंिजत

46

अतयंत सुनदर सी

रपसी

47

कीितर मणान पुरष

यशसविी

48

कमण खचर करने विाला

िमणतव्ययी

49

मणछली की तरह आँ खो विाली

मणीनाकी

50

मणयूर की तरह आँ खो विाली

मणयूराकी

51

बचचो के िलए कामण की विसतु

बालोपयोगी

52

िजसकी बहु त अिधक चचार हो

बहु चिचर त

53

िजस सी के कभी संतान न हु ई हो

विंध्या (बाँझ)

54

फेन से भरा हु आ

फेिनल

55

िपय बोलने विाली सी

िपयंविदा

56

िजसकी उपमणा न हो

िनरपमण

57

जो थोडी देर पहले पैदा हु आ हो

नविजात

58

िजसका कोई आधार न हो

िनराधार

59

नगर मणे विास करने विाला

नागिरक

60

रात मणे घूमणने विाला

िनशाचर

61

ईशविर पर िविशविास न रखने विाला

नािसतक

62

मणांस न खाने विाला

िनरािमणष

63

िबलकुल बरबाद हो गया हो

ध्विसत

64

िजसकी धमणर मणे िनषा हो

धमणर िनष

65

देखने योगय

दशर नीय

66

बहु त तेज चलने विाला

द्रबुतगामणी

67

जो िकसी पक मणे न हो

तटसथ

68

तततवि को जानने विाला

तततविज

69

तप करने विाला

तपसविी

70

जो जनमण से अंधा हो

जनमणांध

71

िजसने इंिद्रबयो को जीत िलया हो

िजतेिद्रबय

72

िचंता मणे डू बा हु आ

िचंितत

73

जो बहु त समणय कर ठहरे

िचरसथायी

74

िजसकी चार भुजाएँ हो

चतुभर ुज

75

हाथ मणे चक्र धारण करनेविाला

चक्रपािण

76

िजससे घृणा की जाए

घृिणत

77

िजसे गुप रखा जाए

गोपनीय

78

गिणत का जाता

गिणतज

79

आकाश को चूमणने विाला

गगनचुंबी

80

खंिडत

जो टु कडे-टु कडे हो गया हो

818 आकाश मणे उडने विाला

नभचर

82

तेज बुिदविाला

कुशागबुिद

83

कलपना से परे हो

कलपनातीत

84

जो उपकार मणानता है

कृतज

85

िकसी की हँसी उडाना

उपहास

86

ऊपर कहा हु आ

उपयुरक

87

ऊपर िलखा गया

उपिरिलिखत

88

िजस पर उपकार िकया गया हो

उपकृत

89

इितहास का जाता

अितहासज

90

आलोचना करने विाला

आलोचक

91

ईशविर मणे आसथा रखने विाला

आिसतक

92

िबना विेतन का

अविैतिनक

93

जो कहा न जा सके

अकथनीय

94

जो िगना न जा सके

अगिणत

95

िजसका कोई शतु ही न जनमणा हो

अजातशतु

96

िजसके समणान कोई दस
ू रा न हो

अिदतीय

97

जो पिरिचत न हो

अपिरिचत

98

िजसकी कोई उपमणा न हो

अनुपमण

3. िविपरीताथर क (िविलोमण शबद)
शबद

िविलोमण

शबद

िविलोमण

शबद

िविलोमण

अथ

इित

आिविभारवि

ितरोभावि

आकषर ण

िविकषर ण

आिमणष

िनरािमणष

अिभज

अनिभज

आजादी

गुलामणी

अनुकूल

पितकूल

आद्रबर

शुषक

अनुराग

िविराग

आहार

िनराहार

अलप

अिधक

अिनविायर

विैकिलपक

अमणृत

िविष

अगमण

सुगमण

अिभमणान

नमता

आकाश

पाताल

आशा

िनराशा

अथर

अनथर

अलपायु

दीघारयु

अनुगह

िविगह

अपमणान

सममणान

आिशत

िनरािशत

अंधकार

पकाश

अनुज

अगज

अरिच

रिच

आिद

अंत

आदान

पदान

आरंभ

अंत

आय

व्यय

अविारचीन

पाचीन

अविनित

उनित

कटु

मणधुर

अविनी

अंबर

िक्रया

पितिक्रया

कृतज

कृतघन

आदर

अनादर

कडविा

मणीठा

आलोक

अंधकार

क्रुद

शानत

उदय

असत

क्रय

िविक्रय

आयात

िनयारत

कमणर

िनषकमणर

अनुपिसथत

उपिसथत

िखलना

मणुरझाना

आलसय

सफूितर

खुशी

दख
ु , गमण

आयर

अनायर

गहरा

उथला

अितविृिष

अनाविृिष

गुर

लघु

आिद

अनािद

जीविन

मणरण

इचछा

अिनचछा

गुण

दोष

इष

अिनष

गरीब

अमणीर

इिचछत

अिनिचछत

घर

बाहर

इहलोक

परलोक

चर

अचर

उपकार

अपकार

छूत

अछूत

उदार

अनुदार

जल

थल

उतीणर

अनुतीणर

जड

चेतन

उधार

नकद

जीविन

मणरण

उतथान

पतन

जंगमण

सथाविर

उतकषर

अपकषर

उतर

दिकण

जिटल

सरस

गुप

पकट

एक

अनेक

तुचछ

मणहान

ऐसा

विैसा

िदन

रात

देवि

दानवि

दरु ाचारी

सदाचारी

मणानविता

दानविता

धमणर

अधमणर

मणहातमणा

दरु ातमणा

धीर

अधीर

मणान

अपमणान

धूप

छाँवि

िमणत

शतु

नूतन

पुरातन

मणधुर

कटु

नकली

असली

िमणथया

सतय

िनमणारण

िविनाश

मणौिखक

िलिखत

आिसतक

नािसतक

मणोक

बंधन

िनकट

दरू

रकक

भकक

िनंदा

सतुित

पितवता

कुलटा

राजा

रंक

पाप

पुणय

राग

देष

पलय

सृिष

राित

िदविस

पिवित

अपिवित

लाभ

हािन

िविधविा

सधविा

पेमण

घृणा

िविजय

पराजय

पशन

उतर

पूणर

अपूणर

विसंत

पतझर

परतंत

सवितंत

िविरोध

समणथर न

बाढ

सूखा

शूर

कायर

बंधन

मणुिक

शयन

जागरण

बुराई

भलाई

शीत

उषण

भावि

अभावि

सविगर

नरक

मणंगल

अमणंगल

सौभागय

दभ
ु ारगय

सविीकृत

असविीकृत

शुकल

कृषण

िहत

अिहत

साकर

िनरकर

सविदेश

िविदेश

हषर

शोक

िहंसा

अिहंसा

सविाधीन

पराधीन

किणक

शाशवित

साधु

असाधु

जान

अजान

सुजन

दज
ु रन

शुभ

अशुभ

सुपुत

कुपुत

सुमणित

कुमणित

सरस

नीरस

सच

झूठ

साकार

िनराकार

शमण

िविशामण

सतुित

िनंदा

िविशुद

दिू षत

सजीवि

िनजीवि

िविषमण

समण

सुर

असुर

िविदान

मणूखर

4. एकाथर क पतीत होने विाले शबद
1. अस- जो हिथयार हाथ से फेककर चलाया जाए। जैसे-बाण।
शस- जो हिथयार हाथ मणे पकडे-पकडे चलाया जाए। जैसे-कृपाण।
2. अलौिकक- जो इस जगत मणे किठनाई से पाप हो। लोकोतर।
असविाभािविक- जो मणानवि सविभावि के िविपरीत हो।
असाधारण- सांसािरक होकर भी अिधकता से न िमणले। िविशेष।
3. अमणूलय- जो चीज मणूलय देकर भी पाप न हो सके।
बहु मणूलय- िजस चीज का बहु त मणूलय देना पडा।
4. आनंद- खुशी का सथायी और गंभीर भावि।
आहाद- किणक एविं तीव आनंद।
उलास- सुख-पािप की अलपकािलक िक्रया, उमणंग।
पसनता-साधारण आनंद का भावि।
5. ईषयार- दस
ू रे की उनित को सहन न कर सकना।
डाह-ईषयारयक
ु जलन।
देष- शतुता का भावि।
सपधार- दस
ू रो की उनित देखकर सवियं उनित करने का पयास करना।
6. अपराध- सामणािजक एविं सरकारी कानून का उलंघन।

पाप- नैितक एविं धािमणर क िनयमणो को तोडना।
7. अनुनय-िकसी बात पर सहमणत होने की पाथर ना।
िविनय- अनुशासन एविं िशषतापूणर िनविेदन।
आविेदन-योगयतानुसार िकसी पद के िलए कथन दारा पसतुत होना।
पाथर ना- िकसी कायर -िसिद के िलए िविनमतापूणर कथन।
8. आजा-बडो का छोटो को कुछ करने के िलए आदेश।
अनुमणित-पाथर ना करने पर बडो दारा दी गई सहमणित।
9. इचछा- िकसी विसतु को चाहना।
उतकंठा- पतीकायुक पािप की तीव इचछा।
आशा-पािप की संभाविना के साथ इचछा का समणनविय।
सपृहा-उतकृष इचछा।
10. सुंदर- आकषर क विसतु।
चार- पिवित और सुंदर विसतु।
रिचर-सुरिच जागत करने विाली सुंदर विसतु।
मणनोहर- मणन को लुभाने विाली विसतु।
11. िमणत- समणवियसक, जो अपने पित पयार रखता हो।
सखा-साथ रहने विाला समणवियसक।
सगा-आतमणीयता रखने विाला।
सुहदय-सुंदर हदय विाला, िजसका व्यविहार अचछा हो।
12. अंतःकरण- मणन, िचत, बुिद, और अहंकार की समणिष।
िचत- समणृित, िविसमणृित, सविपन आिद गुणधारी िचत।
मणन- सुख-दख
ु की अनुभूित करने विाला।
13. मणिहला- कुलीन घराने की सी।
पतनी- अपनी िविविािहत सी।
सी- नारी जाित की बोधक।
14. नमणसते- समणान अविसथा विालो को अिभविादन।
नमणसकार- समणान अविसथा विालो को अिभविादन।
पणामण- अपने से बडो को अिभविादन।
अिभविादन- सममणाननीय व्यिक को हाथ जोडना।
15. अनुज- छोटा भाई।

अगज- बडा भाई।
भाई- छोटे-बडे दोनो के िलए।
16. सविागत- िकसी के आगमणन पर सममणान।
अिभनंदन- अपने से बडो का िवििधवित सममणान।
17. अहंकार- अपने गुणो पर घमणंड करना।
अिभमणान- अपने को बडा और दस
ू रे को छोटा समणझना।
दंभ- अयोगय होते हु ए भी अिभमणान करना।
18. मणंतणा- गोपनीय रप से परामणशर करना।
परामणशर - पूणरतया िकसी िविषय पर िविचार-िविमणशर कर मणत पकट करना।
5.समणोचचिरत शबद
1. अनल=आग
अिनल=हविा, विायु
2. उपकार=भलाई, भला करना
अपकार=बुराई, बुरा करना
3. अन=अनाज
अनय=दस
ू रा
4. अणु=कण
अनु=पशचात
5. ओर=तरफ
और=तथा
6. अिसत=काला
अिशत=खाया हु आ
7. अपेका=तुलना मणे
उपेका=िनरादर, लापरविाही
8. कल=सुंदर, पुरजा
काल=समणय
9. अंदर=भीतर
अंतर=भेद
10. अंक=गोद

अंग=देह का भाग
11. कुल=विंश
कूल=िकनारा
12. अशवि=घोडा
अशमण=पतथर
13. अिल=भ्रमणर
आली=सखी
14. कृिमण=कीट
कृिष=खेती
15. अपचार=अपराध उपचार=इलाज
16. अनयाय=गैर-इंसाफी
अनयानय=दस
ू रे-दस
ू रे
17. कृित=रचना
कृती=िनपुण, पिरशमणी
18. आमणरण=मणृतयुपयरत
आभरण=गहना
19. अविसान=अंत
आसान=सरल
20. किल=किलयुग, झगडा
कली=अधिखला फूल
21. इतर=दस
ू रा
इत=सुगंिधत द्रबव्य
22. क्रमण=िसलिसला कमणर =कामण
23. परष=कठोर
पुरष=आदमणी
24. कुट=घर,िकला
कूट=पविर त
25. कुच=सतन
कूच=पसथान
26. पसाद=कृपा

पासादा=मणहल
27. कुजन=दज
ु रन
कूजन=पिकयो का कलरवि
28. गत=बीता हु आ गित=चाल
29. पानी=जल
पािण=हाथ
30. गुर=उपाय
गुर=िशकक, भारी
31. गह=सूयर,चंद्रब
गृह=घर
32. पकार=तरह
पाकार=िकला, घेरा
33. चरण=पैर
चारण=भाट
34. िचर=पुराना
चीर=विस
35. फन=साँप का फन
फन=कला
36. छत=छाया
कत=कितय,शिक
37. ढीठ=दषु ,िजदी
डीठ=दिष
38. बदन=देह
विदन=मणुख
39. तरिण=सूयर
तरणी=नौका
40. तरंग=लहर
तुरगं =घोडा
41. भविन=घर
भुविन=संसार

42. तप=गरमण
तृप=संतुष
43. िदन=िदविस
दीन=दिरद्रब
44. भीित=भय
िभित=दीविार
45. दशा=हालत
िदशा=तरफ
46. द्रबवि=तरल पदार
अथ द्रबव्य=धन
47. भाषण=व्याखयान
भीषण=भयंकर
48. धरा=पृथविी
धारा=पविाह
49. नय=नीित
नवि=नया
50. िनविारण=मणोक
िनमणारण=बनाना
51. िनजर र=देविता िनझर र=झरना
52. मणत=राय
मणित=बुिद
53. नेक=अचछा
नेकु=तिनक
54. पथ=राह
पथय=रोगी का आहार
55. मणद=मणसती
मणद=मणिदरा
56. पिरणामण=फल
पिरमणाण=विजन
57. मणिण=रतन

फणी=सपर
58. मणिलन=मणैला
मलान=मणुरझाया हु आ
59. मणातृ=मणाता
मणात=केविल
60. रीित=तरीका
रीता=खाली
61. राज=शासन
राज=रहसय
62. लिलत=सुंदर
लिलता=गोपी
63. लकय=उदेशय
लक=लाख
64. विक=छाती
विृक=पेड
65. विसन=विस
व्यसन=नशा, आदत
66. विासना=कुितसत
िविचार बास=गंध
67. विसतु=चीज
विासतु=मणकान
68. िविजन=सुनसान
व्यजन=पंखा
69. शंकर=िशवि
संकर=िमणिशत
70. िहय=हदय
हय=घोडा
71. शर=बाण
सर=तालाब
72. शमण=संयमण

समण=बराबर
73. चक्रविाक=चकविा
चक्रविात=बविंडर
74. शूर=विीर
सूर=अंधा
75. सुिध=समणरण
सुधी=बुिदमणान
76. अभेद=अंतर नही
अभेद=न टू टने योगय
77. संघ=समणुदाय
संग=साथ
78. सगर =अध्याय
सविगर =एक लोक
79. पणय=पेमण
पिरणय=िविविाह
80. समणथर =सकमण
सामणथयर =शिक
81. किटबंध=कमणरबंध
किटबद=तैयार
82. क्रांित=िविद्रबोह
कलांित=थकाविट
83. इंिदरा=लकमणी
इंद्रबा=इंद्रबाणी
6. अने क ाथर क शबद
1. अकर= नष न होने विाला, विणर , ईशविर, िशवि।
2. अथर = धन, ऐशवियर , पयोजन, हेतु।
3. आरामण= बाग, िविशामण, रोग का दरू होना।
4. कर= हाथ, िकरण, टैकस, हाथी की सूँड।
5. काल= समणय, मणृतयु, यमणराज।

6. कामण= कायर , पेशा, धंधा, विासना, कामणदेवि।
7. गुण= कौशल, शील, रससी, सविभावि, धनुष की डोरी।
8. घन= बादल, भारी, हथौडा, घना।
9. जलज= कमणल, मणोती, मणछली, चंद्रबमणा, शंख।
10. तात= िपता, भाई, बडा, पूजय, पयारा, िमणत।
11. दल= समणूह, सेना, पता, िहससा, पक, भाग, िचडी।
12. नग= पविर त, विृक, नगीना।
13. पयोधर= बादल, सतन, पविर त, गना।
14. फल= लाभ, मणेविा, नतीजा, भाले की नोक।
15. बाल= बालक, केश, बाला, दानेयक
ु डंठल।
16. मणधु= शहद, मणिदरा, चैत मणास, एक दैतय, विसंत।
17. राग= पेमण, लाल रंग, संगीत की ध्वििन।
18. रािश= समणूह, मणेष, ककर, विृिशचक आिद रािशयाँ।
19. लकय= िनशान, उदेशय।
20. विणर = अकर, रंग, बाहण आिद जाितयाँ।
21. सारंग= मणोर, सपर , मणेघ, िहरन, पपीहा, राजहंस, हाथी, कोयल, कामणदेवि, िसंह, धनुष भौरा, मणधुमणकखी,
कमणल।
22. सर= अमणृत, दध
ू , पानी, गंगा, मणधु, पृथविी, तालाब।
23. केत= देह, खेत, तीथर , सदावत बाँटने का सथान।
24. िशवि= भागयशाली, मणहादेवि, शृगाल, देवि, मणंगल।
25. हिर= हाथी, िविषणु, इंद्रब, पहाड, िसंह, घोडा, सपर , विानर, मणेढक, यमणराज, बहा, िशवि, कोयल, िकरण,
हंस।
7. पशु-पिकयो की बोिलयाँ
पशु

बोली

पशु

बोली

पशु

बोली

ऊँट

बलबलाना

कोयल

कूकना

गाय

रँभाना

िचिडया

चहचहाना

भैस

डकराना (रँभाना)

बकरी

िमणिमणयाना

मणोर

कुहकना

घोडा

िहनिहनाना

तोता

टै-टै करना

हाथी

िचघाडना

कौआ

काँवि-काँवि करना

साँप

फुफकारना

शेर

दहाडना

सारस

क्रे-क्रे करना

िटटहरी

टी-टी करना

कुता

भौकना

मणकखी

िभनिभनाना

8. कु छ जड पदाथो ं की िविशे ष ध्वििनयाँ या िक्रयाएँ
िजहा

लपलपाना

दाँत

िकटिकटाना

हदय

धडकना

पैर

पटकना

अशु

छलछलाना

घडी

िटक-िटक करना

पंख

फडफडाना

तारे

जगमणगाना

नौका

डगमणगाना

मणेघ

गरजना

9. कु छ सामणानय अशुि दयाँ
अशुद

शुद

अशुद

शुद

अशुद

शुद

अशुद

शुद

अगामणी

आगामणी

िलखायी

िलखाई

सपािहक

सापािहक

अलोिकक

अलौिकक

संसािरक

सांसािरक

कयूँ

कयो

आधीन

अधीन

हसताकेप

हसतकेप

व्योहार

व्यविहार

बरात

बारात

उपनयािसक औपनयािसक कतीय

कितय

दिु नयां

दिु नया

ितथी

ितिथ

कालीदास

कािलदास

पूरती

पूितर

अितथी

अितिथ

नीती

नीित

गृहणी

गृिहणी

पिरिसथत

पिरिसथित

आिशर विाद

आशीविारद

िनिरकण

िनरीकण

िबमणारी

बीमणारी

पितन

पतनी

शतािबद

शताबदी

लडायी

लडाई

सथाई

सथायी

शीमणित

शीमणती

सािमणगी

सामणगी

विािपस

विापस

पदिशर नी

पदशर नी

ऊतथान

उतथान

दस
ु रा

दस
ू रा

साधू

साधु

रेणू

रेणु

नुपुर

नूपुर

अनुिदत

अनूिदत

जाद ु

जाद ू

बृज

बज

पथक

पृथक

इितहािसक

ऐितहािसक

दाइतवि

दाियतवि

सेिनक

सैिनक

सैना

सेना

घबडाना

घबराना

शाप

शाप

बनसपित

विनसपित

बन

विन

िविना

िबना

बसंत

विसंत

अमणाविशया

अमणाविसया

पशाद

पसाद

हंिसया

हँिसया

गंविार

गँविार

असोक

अशोक

िनसविाथर

िनःसविाथर

दसु कर

दषु कर

मणुलयविान

मणूलयविान

िसरीमणान

शीमणान

मणहाअन

मणहान

नविमण्

नविमण

कात

छात

छमणा

कमणा

आदर श

आदशर

षषमण्

षष

पंतु

परंतु

पीका

परीका

मणरयादा

मणयारदा

ददु शार

ददु र शा

राजिभषेक

किविती

कविियती

पमणातमणा

परमणातमणा

घिनष

घिनष

राजयािभषेक िपयास

पयास

िवितीत

व्यतीत

कृपया

कृपा

व्यिकक

विैयिकक

मणांिसक

मणानिसक

समणविाद

संविाद

संपित

संपित

िविषेश

िविशेष

शाशन

शासन

दःु ख

दख

मणूलतयः

मणूलतः

िपओ

िपयो

हु ये

हु ए

लीये

िलए

सहास

साहस

रामणायन

रामणायण

चरन

चरण

रनभूिमण

रणभूिमण

रसायण

रसायन

पान

पाण

मणरन

मणरण

कलयान

कलयाण

पडता

पडता

ढेर

ढे र

झाडू

झाडू

मणेढक

मणेढक

शेष

शेष

षषी

षषी

िनषा

िनषा

सृिष

सृिष

इष

इष

सविासथ

सविासथय

पांडे

पांडेय

सवितंता

सवितंतता

उपलक

उपलकय

मणहतवि

मणहततवि

आलहाद

आहाद

उजविल

उजजविल

व्यसक

वियसक

अध्याय 23
िविरामण-िचह
िविरामण-िचह- ‘िविरामण’ शबद का अथर है ‘रकना’। जब हमण अपने भाविो को भाषा के दारा व्यक करते है तब
एक भावि की अिभव्यिक के बाद कुछ देर रकते है, यह रकना ही िविरामण कहलाता है।
इस िविरामण को पकट करने हेतु िजन कुछ िचहो का पयोग िकया जाता है, िविरामण-िचह कहलाते है। विे इस
पकार है1. अलप िविरामण (,)- पढते अथविा बोलते समणय बहु त थोडा रकने के िलए अलप िविरामण-िचह का पयोग िकया
जाता है। जैसे-सीता, गीता और लकमणी। यह सुंदर सथल, जो आप देख रहे है, बापू की समणािध है। हािनलाभ, जीविन-मणरण, यश-अपयश िवििध हाथ।
2. अधर िविरामण (;)- जहाँ अलप िविरामण की अपेका कुछ जयादा देर तक रकना हो विहाँ इस अधर -िविरामण िचह
का पयोग िकया जाता है। जैसे-सूयोदय हो गया; अंधकार न जाने कहाँ लुप हो गया।
3. पूणर िविरामण (।)- जहाँ विाकय पूणर होता है विहाँ पूणर िविरामण-िचह का पयोग िकया जाता है। जैसे-मणोहन
पुसतक पढ रहा है। विह फूल तोडता है।
4. िविसमणयािदबोधक िचह (!)- िविसमणय, हषर , शोक, घृणा आिद भाविो को दशारने विाले शबद के बाद अथविा
कभी-कभी ऐसे विाकयांश या विाकय के अंत मणे भी िविसमणयािदबोधक िचह का पयोग िकया जाता है। जैसे- हाय
! विह बेचारा मणारा गया। विह तो अतयंत सुशील था ! बडा अफसोस है !
5. पशनविाचक िचह (?)- पशनविाचक विाकयो के अंत मणे पशनविाचक िचह का पयोग िकया जाता है। जैसेिकधर चले ? तुमण कहाँ रहते हो ?
6. कोषक ()- इसका पयोग पद (शबद) का अथर पकट करने हेतु, क्रमण-बोध और नाटक या एकांकी मणे
अिभनय के भाविो को व्यक करने के िलए िकया जाता है। जैसे-िनरंतर (लगातार) व्यायामण करते रहने से देह
(शरीर) सविसथ रहता है। िविशवि के मणहान राषरो मणे (1) अमणेिरका, (2) रस, (3) चीन, (4) िबटेन आिद है।
नल-(िखन होकर) ओर मणेरे दभ
ु ारगय ! तूने दमणयंती को मणेरे साथ बाँधकर उसे भी जीविन-भर कष िदया।
7. िनदेशक िचह (-)- इसका पयोग िविषय-िविभाग संबंधी पतयेक शीषर क के आगे, विाकयो, विाकयांशो अथविा
पदो के मणध्य िविचार अथविा भावि को िवििशष रप से व्यक करने हेतु, उदाहरण अथविा जैसे के बाद, उदरण
के अंत मणे, लेखक के नामण के पूविर और कथोपकथन मणे नामण के आगे िकया जाता है। जैसे-समणसत जीवि-जंतुघोडा, ऊँट, बैल, कोयल, िचिडया सभी व्याकुल थे। तुमण सो रहे हो- अचछा, सोओ।
दारपाल-भगविन ! एक दबु ला-पतला बाहण दार पर खडा है।
8. उदरण िचह (‘‘ ’’)- जब िकसी अनय की उिक को िबना िकसी पिरवितर न के जयो-का-तयो रखा जाता है,

तब विहाँ इस िचह का पयोग िकया जाता है। इसके पूविर अलप िविरामण-िचह लगता है। जैसे-नेताजी ने कहा था,
‘‘तुमण हमणे खून दो, हमण तुमहे आजादी देगे।’’, ‘‘ ‘रामणचिरत मणानस’ तुलसी का अमणर काव्य गंथ है।’’
9. आदेश िचह (:- )- िकसी िविषय को क्रमण से िलखना हो तो िविषय-क्रमण व्यक करने से पूविर इसका पयोग
िकया जाता है। जैसे-सविर नामण के पमणुख पाँच भेद है :(1) पुरषविाचक, (2) िनशचयविाचक, (3) अिनशचयविाचक, (4) संबंधविाचक, (5) पशनविाचक।
10. योजक िचह (-)- समणसत िकए हु ए शबदो मणे िजस िचह का पयोग िकया जाता है, विह योजक िचह
कहलाता है। जैसे-मणाता-िपता, दाल-भात, सुख-दख
ु , पाप-पुणय।
11. लाघवि िचह (.)- िकसी बडे शबद को संकेप मणे िलखने के िलए उस शबद का पथमण अकर िलखकर उसके
आगे शूनय लगा देते है। जैसे-पंिडत=पं., डॉकटर=डॉ., पोफेसर=पो.।

अध्याय 24
विाकय-पकरण
विाकय- एक िविचार को पूणरता से पकट करने विाला शबद-समणूह विाकय कहलाता है। जैसे- 1. शयामण दध
ू पी
रहा है। 2. मणै भागते-भागते थक गया। 3. यह िकतना सुंदर उपविन है। 4. ओह ! आज तो गरमणी के कारण
पाण िनकले जा रहे है। 5. विह मणेहनत करता तो पास हो जाता।
ये सभी मणुख से िनकलने विाली साथर क ध्वििनयो के समणूह है। अतः ये विाकय है। विाकय भाषा का चरमण अवियवि
है।
विाकय-खं ड
विाकय के पमणुख दो खंड है1. उदेशय।
2. िविधेय।
1. उदेशय- िजसके िविषय मणे कुछ कहा जाता है उसे सूचिक करने विाले शबद को उदेशय कहते है। जैसे1. अजुरन ने जयद्रबथ को मणारा।
2. कुता भौक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमणे अजुरन ने, कुता, तोता उदेशय है; इनके िविषय मणे कुछ कहा गया है। अथविा यो कह सकते है िक विाकय
मणे जो कतार हो उसे उदेशय कह सकते है कयोिक िकसी िक्रया को करने के कारण विही मणुखय होता है।
2. िविधेय- उदेशय के िविषय मणे जो कुछ कहा जाता है, अथविा उदेशय (कतार) जो कुछ कायर करता है विह सब
िविधेय कहलाता है। जैसे1. अजुरन ने जयद्रबथ को मणारा।
2. कुता भौक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमणे ‘जयद्रबथ को मणारा’, ‘भौक रहा है’, ‘डाल पर बैठा है’ िविधेय है कयोिक अजुरन ने, कुता, तोता,-इन
उदेशयो (कतारओं) के कायो ं के िविषय मणे क्रमणशः मणारा, भौक रहा है, बैठा है, ये िविधान िकए गए है, अतः इनहे
िविधेय कहते है।
उदेशय का िविसतार- कई बार विाकय मणे उसका पिरचय देने विाले अनय शबद भी साथ आए होते है। ये अनय
शबद उदेशय का िविसतार कहलाते है। जैसे-

1. सुंदर पकी डाल पर बैठा है।
2. काला साँप पेड के नीचे बैठा है।
इनमणे सुंदर और काला शबद उदेशय का िविसतार है।
उदेशय मणे िनमनिलिखत शबद-भेदो का पयोग होता है(1) संजा- घोडा भागता है।
(2) सविर नामण- विह जाता है।
(3) िविशेषण- िविदान की सविर त पूजा होती है।
(4) िक्रया-िविशेषण- (िजसका) भीतर-बाहर एक-सा हो।
(5) विाकयांश- झूठ बोलना पाप है।
विाकय के साधारण उदेशय मणे िविशेषणािद जोडकर उसका िविसतार करते है। उदेशय का िविसतार नीचे िलखे
शबदो के दारा पकट होता है(1) िविशेषण से- अचछा बालक आजा का पालन करता है।
(2) संबंध कारक से- दशर को की भीड ने उसे घेर िलया।
(3) विाकयांश से- कामण सीखा हु आ कारीगर किठनाई से िमणलता है।
िविधेय का िविसतार- मणूल िविधेय को पूणर करने के िलए िजन शबदो का पयोग िकया जाता है विे िविधेय का
िविसतार कहलाते है। जैसे-विह अपने पैन से िलखता है। इसमणे अपने िविधेय का िविसतार है।
कमणर का िविसतार- इसी तरह कमणर का िविसतार हो सकता है। जैसे-िमणत, अचछी पुसतके पढो। इसमणे अचछी
कमणर का िविसतार है।
िक्रया का िविसतार- इसी तरह िक्रया का भी िविसतार हो सकता है। जैसे-शेय मणन लगाकर पढता है। मणन
लगाकर िक्रया का िविसतार है।

विाकय-भे द
रचना के अनुसार विाकय के िनमनिलिखत भेद है1. साधारण विाकय।
2. संयक
ु विाकय।
3. िमणिशत विाकय।
1. साधारण विाकय

िजस विाकय मणे केविल एक ही उदेशय (कतार) और एक ही समणािपका िक्रया हो, विह साधारण विाकय कहलाता
है। जैसे- 1. बचचा दध
ु ा पुसतक पढ रही है।
ू पीता है। 2. कमणल गेद से खेलता है। 3. मणृदल
िविशेष-इसमणे कतार के साथ उसके िविसतारक िविशेषण और िक्रया के साथ िविसतारक सिहत कमणर एविं िक्रयािविशेषण आ सकते है। जैसे-अचछा बचचा मणीठा दध
ू अचछी तरह पीता है। यह भी साधारण विाकय है।
2. सं यु क विाकय
दो अथविा दो से अिधक साधारण विाकय जब सामणानािधकरण समणुचचयबोधको जैसे- (पर, िकनतु, और, या
आिद) से जुडे होते है, तो विे संयक
ु विाकय कहलाते है। ये चार पकार के होते है।
(1) संयोजक- जब एक साधारण विाकय दस
ू रे साधारण या िमणिशत विाकय से संयोजक अव्यय दारा जुडा
होता है। जैसे-गीता गई और सीता आई।
(2) िविभाजक- जब साधारण अथविा िमणश विाकयो का परसपर भेद या िविरोध का संबंध रहता है। जैसे-विह
मणेहनत तो बहु त करता है पर फल नही िमणलता।
(3) िविकलपसूचक- जब दो बातो मणे से िकसी एक को सविीकार करना होता है। जैसे- या तो उसे मणै अखाडे मणे
पछाडू ँगा या अखाडे मणे उतरना ही छोड दँगू ा।
(4) पिरणामणबोधक- जब एक साधारण विाकय दसूरे साधारण या िमणिशत विाकय का पिरणामण होता है। जैसेआज मणुझे बहु त कामण है इसिलए मणै तुमहारे पास नही आ सकँू गा।
3. िमणिशत विाकय
जब िकसी िविषय पर पूणर िविचार पकट करने के िलए कई साधारण विाकयो को िमणलाकर एक विाकय की रचना
करनी पडती है तब ऐसे रिचत विाकय ही िमणिशत विाकय कहलाते है।
िविशेष- (1) इन विाकयो मणे एक मणुखय या पधान उपविाकय और एक अथविा अिधक आिशत उपविाकय होते है
जो समणुचचयबोधक अव्यय से जुडे होते है।
(2) मणुखय उपविाकय की पुिष, समणथर न, सपषता अथविा िविसतार हेतु ही आिशत विाकय आते है।
आिशत विाकय तीन पकार के होते है(1) संजा उपविाकय।
(2) िविशेषण उपविाकय।
(3) िक्रया-िविशेषण उपविाकय।
1. संजा उपविाकय- जब आिशत उपविाकय िकसी संजा अथविा सविर नामण के सथान पर आता है तब विह संजा
उपविाकय कहलाता है। जैसे- विह चाहता है िक मणै यहाँ कभी न आऊँ। यहाँ िक मणै कभी न आऊँ, यह संजा

उपविाकय है।
2. िविशेषण उपविाकय- जो आिशत उपविाकय मणुखय उपविाकय की संजा शबद अथविा सविर नामण शबद की
िविशेषता बतलाता है विह िविशेषण उपविाकय कहलाता है। जैसे- जो घडी मणेज पर रखी है विह मणुझे
पुरसकारसविरप िमणली है। यहाँ जो घडी मणेज पर रखी है यह िविशेषण उपविाकय है।
3. िक्रया-िविशेषण उपविाकय- जब आिशत उपविाकय पधान उपविाकय की िक्रया की िविशेषता बतलाता है तब
विह िक्रया-िविशेषण उपविाकय कहलाता है। जैसे- जब विह मणेरे पास आया तब मणै सो रहा था। यहाँ पर जब विह
मणेरे पास आया यह िक्रया-िविशेषण उपविाकय है।
विाकय-पिरवितर न
विाकय के अथर मणे िकसी तरह का पिरवितर न िकए िबना उसे एक पकार के विाकय से दस
ू रे पकार के विाकय मणे
पिरवितर न करना विाकय-पिरवितर न कहलाता है।
(1) साधारण विाकयो का संयक
ु विाकयो मणे पिरवितर नसाधारण विाकय संयक
ु विाकय
1. मणै दध
ू पीकर सो गया। मणैने दध
ू िपया और सो गया।
2. विह पढने के अलाविा अखबार भी बेचता है। विह पढता भी है और अखबार भी बेचता है
3. मणैने घर पहु ँचकर सब बचचो को खेलते हु ए देखा। मणैने घर पहु ँचकर देखा िक सब बचचे खेल रहे थे।
4. सविासथय ठीक न होने से मणै काशी नही जा सका। मणेरा सविासथय ठीक नही था इसिलए मणै काशी नही जा
सका।
5. सविेरे तेज विषार होने के कारण मणै दफतर देर से पहु ँचा। सविेरे तेज विषार हो रही थी इसिलए मणै दफतर देर से
पहु ँचा।
(2) संयक
ु विाकयो का साधारण विाकयो मणे पिरवितर नसंयक
ु विाकय साधारण विाकय
1. िपताजी असविसथ है इसिलए मणुझे जाना ही पडेगा। िपताजी के असविसथ होने के कारण मणुझे जाना ही
पडेगा।
2. उसने कहा और मणै मणान गया। उसके कहने से मणै मणान गया।
3. विह केविल उपनयासकार ही नही अिपतु अचछा विका भी है। विह उपनयासकार के अितिरक अचछा विका
भी है।
4. लू चल रही थी इसिलए मणै घर से बाहर नही िनकल सका। लू चलने के कारण मणै घर से बाहर नही िनकल
सका।
5. गाडर ने सीटी दी और टर ेन चल पडी। गाडर के सीटी देने पर टर ेन चल पडी।

(3) साधारण विाकयो का िमणिशत विाकयो मणे पिरवितर नसाधारण विाकय िमणिशत विाकय
1. हरिसंगार को देखते ही मणुझे गीता की याद आ जाती है। जब मणै हरिसंगार की ओर देखता हू ँ तब मणुझे गीता
की याद आ जाती है।
2. राषर के िलए मणर िमणटने विाला व्यिक सचचा राषरभक है। विह व्यिक सचचा राषरभक है जो राषर के िलए मणर
िमणटे।
3. पैसे के िबना इंसान कुछ नही कर सकता। यिद इंसान के पास पैसा नही है तो विह कुछ नही कर सकता।
4. आधी रात होते-होते मणैने कामण करना बंद कर िदया। जयोही आधी रात हु ई तयोही मणैने कामण करना बंद कर
िदया।
(4) िमणिशत विाकयो का साधारण विाकयो मणे पिरवितर निमणिशत विाकय साधारण विाकय
1. जो संतोषी होते है विे सदैवि सुखी रहते है संतोषी सदैवि सुखी रहते है।
2. यिद तुमण नही पढोगे तो परीका मणे सफल नही होगे। न पढने की दशा मणे तुमण परीका मणे सफल नही होगे।
3. तुमण नही जानते िक विह कौन है ? तुमण उसे नही जानते।
4. जब जेबकतरे ने मणुझे देखा तो विह भाग गया। मणुझे देखकर जेबकतरा भाग गया।
5. जो िविदान है, उसका सविर त आदर होता है। िविदानो का सविर त आदर होता है।
विाकय-िविशले ष ण
विाकय मणे आए हु ए शबद अथविा विाकय-खंडो को अलग-अलग करके उनका पारसपिरक संबंध बताना विाकयिविशलेषण कहलाता है।
साधारण विाकयो का िविशलेषण
1. हमणारा राषर समणृदशाली है।
2. हमणे िनयिमणत रप से िविदालय आना चािहए।
3. अशोक, सोहन का बडा पुत, पुसतकालय मणे अचछी पुसतके छाँट रहा है।
उदेशय िविधेय
विाकय उदेशय उदेशय का िक्रया कमणर कमणर का पूरक िविधेय क्रमणांक कतार िविसतार िविसतार का िविसतार
1. राषर हमणारा है - - समणृद 2. हमणे - आना िविदालय - शाली िनयिमणत
चािहए रप से
3. अशोक सोहन का छाँट रहा पुसतके अचछी पुसतकालय

बडा पुत है मणे
िमणिशत विाकय का िविशलेषण1. जो व्यिक जैसा होता है विह दस
ू रो को भी विैसा ही समणझता है।
2. जब-जब धमणर की कित होती है तब-तब ईशविर का अवितार होता है।
3. मणालूमण होता है िक आज विषार होगी।
4. जो संतोषी होत है विे सदैवि सुखी रहते है।
5. दाशर िनक कहते है िक जीविन पानी का बुलबुला है।
संयक
ु विाकय का िविशलेषण1. तेज विषार हो रही थी इसिलए परसो मणै तुमहारे घर नही आ सका।
2. मणै तुमहारी राह देखता रहा पर तुमण नही आए।
3. अपनी पगित करो और दस
ू रो का िहत भी करो तथा सविाथर मणे न िहचको।
अथर के अनुस ार विाकय के पकार
अथारनुसार विाकय के िनमनिलिखत आठ भेद है1. िविधानाथर क विाकय।
2. िनषेधाथर क विाकय।
3. आजाथर क विाकय।
4. पशनाथर क विाकय।
5. इचछाथर क विाकय।
6. संदेथरक विाकय।
7. संकेताथर क विाकय।
8. िविसमणयबोधक विाकय।
1. िविधानाथर क विाकय-िजन विाकयो मणे िक्रया के करने या होने का सामणानय कथन हो। जैसे-मणै कल िदली
जाऊँगा। पृथविी गोल है।
2. िनषेधाथर क विाकय- िजस विाकय से िकसी बात के न होने का बोध हो। जैसे-मणै िकसी से लडाई मणोल नही
लेना चाहता।
3. आजाथर क विाकय- िजस विाकय से आजा उपदेश अथविा आदेश देने का बोध हो। जैसे-शीघ जाओ विरना
गाडी छूट जाएगी। आप जा सकते है।
4. पशनाथर क विाकय- िजस विाकय मणे पशन िकया जाए। जैसे-विह कौन है उसका नामण कया है।
5. इचछाथर क विाकय- िजस विाकय से इचछा या आशा के भावि का बोध हो। जैसे-दीघारयु हो। धनविान हो।

6. संदेहाथर क विाकय- िजस विाकय से संदेह का बोध हो। जैसे-शायद आज विषार हो। अब तक िपताजी जा चुके
होगे।
7. संकेताथर क विाकय- िजस विाकय से संकेत का बोध हो। जैसे-यिद तुमण कनयाकुमणारी चलो तो मणै भी चलूँ।
8. िविसमणयबोधक विाकय-िजस विाकय से िविसमणय के भावि पकट हो। जैसे-अहा ! कैसा सुहाविना मणौसमण है।

अध्याय 25
अशुद विाकयो के शुद विाकय
(1) विचन-संबंधी अशुिदयाँ
अशुद शुद
1. पािकसतान ने गोले और तोपो से आक्रमणण िकया। पािकसतान ने गोलो और तोपो से आक्रमणण िकया।
2. उसने अनेको गंथ िलखे। उसने अनेक गंथ िलखे।
3. मणहाभारत अठारह िदनो तक चलता रहा। मणहाभारत अठारह िदन तक चलता रहा।
4. तेरी बात सुनते-सुनते कान पक गए। तेरी बाते सुनते-सुनते कान पक गए।
5. पेडो पर तोता बैठा है। पेड पर तोता बैठा है।
(2) िलंग संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. उसने संतोष का साँस ली। उसने संतोष की साँस ली।
2. सिविता ने जोर से हँस िदया। सिविता जोर से हँस दी।
3. मणुझे बहु त आनंद आती है। मणुझे बहु त आनंद आता है।
4. विह धीमणी सविर मणे बोला। विह धीमणे सविर मणे बोला।
5. रामण और सीता विन को गई। रामण और सीता विन को गए।
(3) िविभिक-संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. मणै यह कामण नही िकया हू ँ। मणैने यह कामण नही िकया है।
2. मणै पुसतक को पढता हू ँ। मणै पुसतक पढता हू ँ।
3. हमणने इस िविषय को िविचार िकया। हमणने इस िविषय पर िविचार िकया
4. आठ बजने को दस िमणनट है। आठ बजने मणे दस िमणनट है।
5. विह देर मणे सोकर उठता है। विह देर से सोकर उठता है।
(4) संजा संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. मणै रिविविार के िदन तुमहारे घर आऊँगा। मणै रिविविार को तुमहारे घर आऊँगा।
2. कुता रेकता है। कुता भौकता है।
3. मणुझे सफल होने की िनराशा है। मणुझे सफल होने की आशा नही है।

4. गले मणे गुलामणी की बेिडयाँ पड गई। पैरो मणे गुलामणी की बेिडयाँ पड गई।
(5) सविर नामण की अशुिदयाँअशुद शुद
1. गीता आई और कहा। गीता आई और उसने कहा।
2. मणैने तेरे को िकतना समणझाया। मणैने तुझे िकतना समणझाया।
3. विह कया जाने िक मणै कैसे जीिवित हू ँ। विह कया जाने िक मणै कैसे जी रहा हू ँ।
(6) िविशेषण-संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. िकसी और लडके को बुलाओ। िकसी दस
ू रे लडके को बुलाओ।
2. िसंह बडा बीभतस होता है। िसंह बडा भयानक होता है।
3. उसे भारी दख
ु हु आ। उसे बहु त दख
ु हु आ।
4. सब लोग अपना कामण करो। सब लोग अपना-अपना कामण करो।
(7) िक्रया-संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. कया यह संभवि हो सकता है ? कया यह संभवि है ?
2. मणै दशर न देने आया था। मणै दशर न करने आया था।
3. विह पढना मणाँगता है। विह पढना चाहता है।
4. बस तुमण इतने रठ उठे बस, तुमण इतने मणे रठ गए।
5. तुमण कया कामण करता है ? तुमण कया कामण करते हो ?
(8) मणुहाविरे-संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. युग की मणाँग का यह बीडा कौन चबाता है युग की मणाँग का यह बीडा कौन उठाता है।
2. विह शयामण पर बरस गया। विह शयामण पर बरस पडा।
3. उसकी अकल चककर खा गई। उसकी अकल चकरा गई।
4. उस पर घडो पानी िगर गया। उस पर घडो पानी पड गया।
(9) िक्रया-िविशेषण-संबंधी अशुिदयाँअशुद शुद
1. विह लगभग दौड रहा था। विह दौड रहा था।
2. सारी रात भर मणै जागता रहा। मणै सारी रात जागता रहा।

3. तुमण बडा आगे बढ गया। तुमण बहु त आगे बढ गए.
4. इस पविर तीय केत मणे सविर सवि शांित है। इस पविर तीय केत मणे सविर त शांित है।

अध्याय 26
मणुह ाविरे और लोकोिकयाँ
मणुहाविरा- कोई भी ऐसा विाकयांश जो अपने साधारण अथर को छोडकर िकसी िविशेष अथर को व्यक करे उसे
मणुहाविरा कहते है।
लोकोिक- लोकोिकयाँ लोक-अनुभवि से बनती है। िकसी समणाज ने जो कुछ अपने लंबे अनुभवि से सीखा है
उसे एक विाकय मणे बाँध िदया है। ऐसे विाकयो को ही लोकोिक कहते है। इसे कहावित, जनशुित आिद भी कहते
है।
मणुहाविरा और लोकोिक मणे अंतर- मणुहाविरा विाकयांश है और इसका सवितंत रप से पयोग नही िकया जा
सकता। लोकोिक संपूणर विाकय है और इसका पयोग सवितंत रप से िकया जा सकता है। जैसे-‘होश उड
जाना’ मणुहाविरा है। ‘बकरे की मणाँ कब तक खैर मणनाएगी’ लोकोिक है।
कुछ पचिलत मणुहाविरे
1. अं ग सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. अंग छूटा- (कसमण खाना) मणै अंग छूकर कहता हू ँ साहब, मणैने पाजेब नही देखी।
2. अंग-अंग मणुसकाना-(बहु त पसन होना)- आज उसका अंग-अंग मणुसकरा रहा था।
3. अंग-अंग टू टना-(सारे बदन मणे ददर होना)-इस जविर ने तो मणेरा अंग-अंग तोडकर रख िदया।
4. अंग-अंग ढीला होना-(बहु त थक जाना)- तुमहारे साथ कल चलूँगा। आज तो मणेरा अंग-अंग ढीला हो रहा
है।
2. अकल-सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. अकल का दशु मणन-(मणूखर)- विह तो िनरा अकल का दशु मणन िनकला।
2. अकल चकराना-(कुछ समणझ मणे न आना)-पशन-पत देखते ही मणेरी अकल चकरा गई।
3. अकल के पीछे लठ िलए िफरना (समणझाने पर भी न मणानना)- तुमण तो सदैवि अकल के पीछे लठ िलए
िफरते हो।
4. अकल के घोडे दौडाना-(तरह-तरह के िविचार करना)- बडे-बडे विैजािनको ने अकल के घोडे दौडाए, तब
कही विे अणुबमण बना सके।
3. आँ ख-सं बं ध ी मणुह ाविरे

1. आँ ख िदखाना-(गुससे से देखना)- जो हमणे आँ ख िदखाएगा, हमण उसकी आँ खे फोड देगे।
2. आँ खो मणे िगरना-(सममणानरिहत होना)- कुरसी की होड ने जनता सरकार को जनता की आँ खो मणे िगरा
िदया।
3. आँ खो मणे धूल झोकना-(धोखा देना)- िशविाजी मणुगल पहरेदारो की आँ खो मणे धूल झोककर बंदीगृह से बाहर
िनकल गए।
4. आँ ख चुराना-(िछपना)- आजकल विह मणुझसे आँ खे चुराता िफरता है।
5. आँ ख मणारना-(इशारा करना)-गविाह मणेरे भाई का िमणत िनकला, उसने उसे आँ ख मणारी, अनयथा विह मणेरे
िविरद गविाही दे देता।
6. आँ ख तरसना-(देखने के लालाियत होना)- तुमहे देखने के िलए तो मणेरी आँ खे तरस गई।
7. आँ ख फेर लेना-(पितकूल होना)- उसने आजकल मणेरी ओर से आँ खे फेर ली है।
8. आँ ख िबछाना-(पतीका करना)- लोकनायक जयपकाश नारायण िजधर जाते थे उधर ही जनता उनके
िलए आँ खे िबछाए खडी होती थी।
9. आँ खे सेकना-(सुंदर विसतु को देखते रहना)- आँ ख सेकते रहोगे या कुछ करोगे भी
10. आँ खे चार होना-(पेमण होना,आमणना-सामणना होना)- आँ खे चार होते ही विह िखडकी पर से हट गई।
11. आँ खो का तारा-(अितिपय)-आशीष अपनी मणाँ की आँ खो का तारा है।
12. आँ ख उठाना-(देखने का साहस करना)- अब विह कभी भी मणेरे सामणने आँ ख नही उठा सकेगा।
13. आँ ख खुलना-(होश आना)- जब संबंिधयो ने उसकी सारी संपित हडप ली तब उसकी आँ खे खुली।
14. आँ ख लगना-(नीद आना अथविा व्यार होना)- बडी मणुिशकल से अब उसकी आँ ख लगी है। आजकल
आँ ख लगते देर नही होती।
15. आँ खो पर परदा पडना-(लोभ के कारण सचाई न दीखना)- जो दस
ू रो को ठगा करते है, उनकी आँ खो
पर परदा पडा हु आ है। इसका फल उनहे अविशय िमणलेगा।
16. आँ खो का काटा-(अिपय व्यिक)- अपनी कुपविृितयो के कारण राजन िपताजी की आँ खो का काँटा बन
गया।
17. आँ खो मणे समणाना-(िदल मणे बस जाना)- िगरधर मणीरा की आँ खो मणे समणा गया।
4. कले ज ा-सं बं ध ी कु छ मणुह ाविरे
1. कलेजे पर हाथ रखना-(अपने िदल से पूछना)- अपने कलेजे पर हाथ रखकर कहो िक कया तुमणने पैन
नही तोडा।
2. कलेजा जलना-(तीव असंतोष होना)- उसकी बाते सुनकर मणेरा कलेजा जल उठा।
3. कलेजा ठंडा होना-(संतोष हो जाना)- डाकुओं को पकडा हु आ देखकर गाँवि विालो का कलेजा ठंढा हो

गया।
4. कलेजा थामणना-(जी कडा करना)- अपने एकमणात युविा पुत की मणृतयु पर मणाता-िपता कलेजा थामणकर रह
गए।
5. कलेजे पर पतथर रखना-(दख
ु मणे भी धीरज रखना)- उस बेचारे की कया कहते हो, उसने तो कलेजे पर
पतथर रख िलया है।
6. कलेजे पर साँप लोटना-(ईषयार से जलना)- शीरामण के राजयािभषेक का समणाचार सुनकर दासी मणंथरा के
कलेजे पर साँप लोटने लगा।
5. कान-सं बं ध ी कु छ मणुह ाविरे
1. कान भरना-(चुगली करना)- अपने सािथयो के िविरद अध्यापक के कान भरने विाले िविदाथी अचछे नही
होते।
2. कान कतरना-(बहु त चतुर होना)- विह तो अभी से बडे-बडो के कान कतरता है।
3. कान का कचचा-(सुनते ही िकसी बात पर िविशविास करना)- जो मणािलक कान के कचचे होते है विे भले
कमणर चािरयो पर भी िविशविास नही करते।
4. कान पर जूँ तक न रेगना-(कुछ असर न होना)-मणाँ ने गौरवि को बहु त समणझाया, िकनतु उसके कान पर जूँ
तक नही रेगी।
5. कानोकान खबर न होना-(िबलकुल पता न चलना)-सोने के ये िबसकुट ले जाओ, िकसी को कानोकान
खबर न हो।
6. नाक-सं बं ध ी कु छ मणुह ाविरे
1. नाक मणे दमण करना-(बहु त तंग करना)- आतंकविािदयो ने सरकार की नाक मणे दमण कर रखा है।
2. नाक रखना-(मणान रखना)- सच पूछो तो उसने सच कहकर मणेरी नाक रख ली।
3. नाक रगडना-(दीनता िदखाना)-िगरहकट ने िसपाही के सामणने खूब नाक रगडी, पर उसने उसे छोडा
नही।
4. नाक पर मणकखी न बैठने देना-(अपने पर आँ च न आने देना)-िकतनी ही मणुसीबते उठाई, पर उसने नाक
पर मणकखी न बैठने दी।
5. नाक कटना-(पितषा नष होना)- अरे भैया आजकल की औलाद तो खानदान की नाक काटकर रख देती
है।
7. मणुँह -सं बं ध ी कु छ मणुह ाविरे

1. मणुँह की खाना-(हार मणानना)-पडोसी के घर के मणामणले मणे दखल देकर हरदारी को मणुँह की खानी पडी।
2. मणुँह मणे पानी भर आना-(िदल ललचाना)- लडुओं का नामण सुनते ही पंिडतजी के मणुँह मणे पानी भर आया।
3. मणुँह खून लगना-(िरशवित लेने की आदत पड जाना)- उसके मणुँह खून लगा है, िबना िलए विह कामण नही
करेगा।
4. मणुँह िछपाना-(लिजजत होना)- मणुँह िछपाने से कामण नही बनेगा, कुछ करके भी िदखाओ।
5. मणुँह रखना-(मणान रखना)-मणै तुमहारा मणुँह रखने के िलए ही पमणोद के पास गया था, अनयथा मणुझे कया
आविशयकता थी।
6. मणुँहतोड जविाब देना-(कडा उतर देना)- शयामण मणुँहतोड जविाब सुनकर िफर कुछ नही बोला।
7. मणुँह पर कािलख पोतना-(कलंक लगाना)-बेटा तुमहारे कुकमणो ं ने मणेरे मणुँह पर कािलख पोत दी है।
8. मणुँह उतरना-(उदास होना)-आज तुमहारा मणुँह कयो उतरा हु आ है।
9. मणुँह ताकना-(दस
ू रे पर आिशत होना)-अब गेहूँ के िलए हमणे अमणेिरका का मणुँह नही ताकना पडेगा।
10. मणुँह बंद करना-(चुप कर देना)-आजकल िरशवित ने बडे-बडे अफसरो का मणुँह बंद कर रखा है।
8. दाँत -सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. दाँत पीसना-(बहु त जयादा गुससा करना)- भला मणुझ पर दाँत कयो पीसते हो? शीशा तो शंकर ने तोडा है।
2. दाँत खटे करना-(बुरी तरह हराना)- भारतीय सैिनको ने पािकसतानी सैिनको के दाँत खटे कर िदए।
3. दाँत काटी रोटी-(घिनषता, पककी िमणतता)- कभी रामण और शयामण मणे दाँत काटी रोटी थी पर आज एकदस
ू रे के जानी दशु मणन है।
9. गरदन-सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. गरदन झुकाना-(लिजजत होना)- मणेरा सामणना होते ही उसकी गरदन झुक गई।
2. गरदन पर सविार होना-(पीछे पडना)- मणेरी गरदन पर सविार होने से तुमहारा कामण नही बनने विाला है।
3. गरदन पर छुरी फेरना-(अतयाचार करना)-उस बेचारे की गरदन पर छुरी फेरते तुमहे शरमण नही आती,
भगविान इसके िलए तुमहे कभी कमणा नही करेगे।
10. गले -सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. गला घोटना-(अतयाचार करना)- जो सरकार गरीबो का गला घोटती है विह देर तक नही िटक सकती।
2. गला फँसाना-(बंधन मणे पडना)- दस
ू रो के मणामणले मणे गला फँसाने से कुछ हाथ नही आएगा।
3. गले मणढना-(जबरदसती िकसी को कोई कामण सौपना)- इस बुद ू को मणेरे गले मणढकर लालाजी ने तो मणुझे

तंग कर डाला है।
4. गले का हार-(बहु त पयारा)- तुमण तो उसके गले का हार हो, भला विह तुमहारे कामण को कयो मणना करने
लगा।
11. िसर-सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. िसर पर भूत सविार होना-(धुन लगाना)-तुमहारे िसर पर तो हर समणय भूत सविार रहता है।
2. िसर पर मणौत खेलना-(मणृतयु समणीप होना)- िविभीषण ने राविण को संबोिधत करते हु ए कहा, ‘भैया ! मणुझे
कया डरा रहे हो ? तुमहारे िसर पर तो मणौत खेल रही है‘।
3. िसर पर खून सविार होना-(मणरने-मणारने को तैयार होना)- अरे, बदमणाश की कया बात करते हो ? उसके
िसर पर तो हर समणय खून सविार रहता है।
4. िसर-धड की बाजी लगाना-(पाणो की भी परविाह न करना)- भारतीय विीर देश की रका के िलए िसर-धड
की बाजी लगा देते है।
5. िसर नीचा करना-(लजा जाना)-मणुझे देखते ही उसने िसर नीचा कर िलया।
12. हाथ-सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. हाथ खाली होना-(रपया-पैसा न होना)- जुआ खेलने के कारण राजा नल का हाथ खाली हो गया था।
2. हाथ खीचना-(साथ न देना)-मणुसीबत के समणय नकली िमणत हाथ खीच लेते है।
3. हाथ पे हाथ धरकर बैठना-(िनकममणा होना)- उदमणी कभी भी हाथ पर हाथ धरकर नही बैठते है, विे तो
कुछ करके ही िदखाते है।
4. हाथो के तोते उडना-(दख
ु से हैरान होना)- भाई के िनधन का समणाचार पाते ही उसके हाथो के तोते उड
गए।
5. हाथोहाथ-(बहु त जलदी)-यह कामण हाथोहाथ हो जाना चािहए।
6. हाथ मणलते रह जाना-(पछताना)- जो िबना सोचे-समणझे कामण शुर करते है विे अंत मणे हाथ मणलते रह जाते
है।
7. हाथ साफ करना-(चुरा लेना)- ओह ! िकसी ने मणेरी जेब पर हाथ साफ कर िदया।
8. हाथ-पाँवि मणारना-(पयास करना)- हाथ-पाँवि मणारने विाला व्यिक अंत मणे अविशय सफलता पाप करता है।
9. हाथ डालना-(शुर करना)- िकसी भी कामण मणे हाथ डालने से पूविर उसके अचछे या बुरे फल पर िविचार कर
लेना चािहए।
13. हविा-सं बं ध ी मणुह ाविरे

1. हविा लगना-(असर पडना)-आजकल भारतीयो को भी पिशचमण की हविा लग चुकी है।
2. हविा से बाते करना-(बहु त तेज दौडना)- राणा पताप ने जयो ही लगामण िहलाई, चेतक हविा से बाते करने
लगा।
3. हविाई िकले बनाना-(झूठी कलपनाएँ करना)- हविाई िकले ही बनाते रहोगे या कुछ करोगे भी ?
4. हविा हो जाना-(गायब हो जाना)- देखते-ही-देखते मणेरी साइिकल न जाने कहाँ हविा हो गई ?
14. पानी-सं बं ध ी मणुह ाविरे
1. पानी-पानी होना-(लिजजत होना)-जयोही सोहन ने मणाताजी के पसर मणे हाथ डाला िक ऊपर से मणाताजी
आ गई। बस, उनहे देखते ही विह पानी-पानी हो गया।
2. पानी मणे आग लगाना-(शांित भंग कर देना)-तुमणने तो सदा पानी मणे आग लगाने का ही कामण िकया है।
3. पानी फेर देना-(िनराश कर देना)-उसने तो मणेरी आशाओं पर पानी पेर िदया।
4. पानी भरना-(तुचछ लगना)-तुमणने तो जीविन-भर पानी ही भरा है।
15. कु छ िमणले -जुले मणुह ाविरे
1. अँगूठा िदखाना-(देने से साफ इनकार कर देना)-सेठ रामणलाल ने धमणर शाला के िलए पाँच हजार रपए दान
देने को कहा था, िकनतु जब मणैनेजर उनसे मणांगने गया तो उनहोने अँगूठा िदखा िदया।
2. अगर-मणगर करना-(टालमणटोल करना)-अगर-मणगर करने से अब कामण चलने विाला नही है। बंधु !
3. अंगारे बरसाना-(अतयंत गुससे से देखना)-अिभमणनयु विध की सूचना पाते ही अजुरन के नेत अंगारे बरसाने
लगे।
4. आडे हाथो लेना-(अचछी तरह काबू करना)-शीकृषण ने कंस को आडे हाथो िलया।
5. आकाश से बाते करना-(बहु त ऊँचा होना)-टी.विी.टाविर तो आकाश से बाते करती है।
6. ईद का चाँद-(बहु त कमण दीखना)-िमणत आजकल तो तुमण ईद का चाँद हो गए हो, कहाँ रहते हो ?
7. उँ गली पर नचाना-(विश मणे करना)-आजकल की औरते अपने पितयो को उँ गिलयो पर नचाती है।
8. कलई खुलना-(रहसय पकट हो जाना)-उसने तो तुमहारी कलई खोलकर रख दी।
9. कामण तमणामण करना-(मणार देना)- रानी लकमणीबाई ने पीछा करने विाले दोनो अंगेजो का कामण तमणामण कर
िदया।
10. कुते की मणौत करना-(बुरी तरह से मणरना)-राषरद्रबोही सदा कुते की मणौत मणरते है।
11. कोलहू का बैल-(िनरंतर कामण मणे लगे रहना)-कोलहू का बैल बनकर भी लोग आज भरपेट भोजन नही पा
सकते।

12. खाक छानना-(दर-दर भटकना)-खाक छानने से तो अचछा है एक जगह जमणकर कामण करो।
13. गडे मणुरदे उखाडना-(िपछली बातो को याद करना)-गडे मणुरदे उखाडने से तो अचछा है िक अब हमण चुप
हो जाएँ ।
14. गुलछरे उडाना-(मणौज करना)-आजकल तुमण तो दस
ू रे के मणाल पर गुलछरे उडा रहे हो।
15. घास खोदना-(फुजूल समणय िबताना)-सारी उम तुमणने घास ही खोदी है।
16. चंपत होना-(भाग जाना)-चोर पुिलस को देखते ही चंपत हो गए।
17. चौकडी भरना-(छलाँगे लगाना)-िहरन चौकडी भरते हु ए कही से कही जा पहु ँचे।
18. छकके छुडाा़ना-(बुरी तरह परािजत करना)-पृथविीराज चौहान ने मणुहममणद गोरी के छकके छुडा िदए।
19. टका-सा जविाब देना-(कोरा उतर देना)-आशा थी िक कही विह मणेरी जीिविका का पबंध कर देगा, पर
उसने तो देखते ही टका-सा जविाब दे िदया।
20. टोपी उछालना-(अपमणािनत करना)-मणेरी टोपी उछालने से उसे कया िमणलेगा?
21. तलविे चाटने-(खुशामणद करना)-तलविे चाटकर नौकरी करने से तो कही डू ब मणरना अचछा है।
22. थाली का बैगन-(अिसथर िविचार विाला)- जो लोग थाली के बैगन होते है, विे िकसी के सचचे िमणत नही
होते।
23. दाने-दाने को तरसना-(अतयंत गरीब होना)-बचपन मणे मणै दाने-दाने को तरसता िफरा, आज ईशविर की
कृपा है।
24. दौड-धूप करना-(कठोर शमण करना)-आज के युग मणे दौड-धूप करने से ही कुछ कामण बन पाता है।
25. धिजजयाँ उडाना-(नष-भ्रष करना)-यिद कोई भी राषर हमणारी सवितंतता को हडपना चाहेगा तो हमण उसकी
धिजजयाँ उडा देगे।
26. नमणक-िमणचर लगाना-(बढा-चढाकर कहना)-आजकल समणाचारपत िकसी भी बात को इस पकार नमणकिमणचर लगाकर िलखते है िक जनसाधारण उस पर िविशविास करने लग जाता है।
27. नौ-दो गयारह होना-(भाग जाना)- िबली को देखते ही चूहे नौ-दो गयारह हो गए। 28. फँू क-फँू ककर कदमण
रखना-(सोच-समणझकर कदमण बढाना)-जविानी मणे फँू क-फँू ककर कदमण रखना चािहए।
29. बाल-बाल बचना-(बडी किठनाई से बचना)-गाडी की टककर होने पर मणेरा िमणत बाल-बाल बच गया।
30. भाड झोकना-(योही समणय िबताना)-िदली मणे आकर भी तुमणने तीस साल तक भाड ही झोका है।
31. मणिकखयाँ मणारना-(िनकममणे रहकर समणय िबताना)-यह समणय मणिकखयाँ मणारने का नही है, घर का कुछ
कामण-काज ही कर लो।
32. मणाथा ठनकना-(संदेह होना)- िसंह के पंजो के िनशान रेत पर देखते ही गीदड का मणाथा ठनक गया।
33. िमणटी खराब करना-(बुरा हाल करना)-आजकल के नौजविानो ने बूढो की िमणटी खराब कर रखी है।
34. रंग उडाना-(घबरा जाना)-काले नाग को देखते ही मणेरा रंग उड गया।

35. रफूचककर होना-(भाग जाना)-पुिलस को देखते ही बदमणाश रफूचककर हो गए।
36. लोहे के चने चबाना-(बहु त किठनाई से सामणना करना)- मणुगल समाट अकबर को राणापताप के साथ
टककर लेते समणय लोहे के चने चबाने पडे।
37. िविष उगलना-(बुरा-भला कहना)-दय
ु ोधन को गांडीवि धनुष का अपमणान करते देख अजुरन िविष उगलने
लगा।
38. शीगणेश करना-(शुर करना)-आज बृहसपितविार है, नए विषर की पढाई का शीगणेश कर लो।
39. हजामणत बनाना-(ठगना)-ये िहपपी न जाने िकतने भारतीयो की हजामणत बना चुके है।
40. शैतान के कान कतरना-(बहु त चालाक होना)-तुमण तो शैतान के भी कान कतरने विाले हो, बेचारे
रामणनाथ की तुमहारे सामणने िबसात ही कया है ?
41. राई का पहाड बनाना-(छोटी-सी बात को बहु त बढा देना)- तिनक-सी बात के िलए तुमणने राई का पहाड
बना िदया।
कु छ पचिलत लोकोिकयाँ
1. अधजल गगरी छलकत जाए-(कमण गुण विाला व्यिक िदखाविा बहु त करता है)- शयामण बाते तो ऐसी करता
है जैसे हर िविषय मणे मणासटर हो, विासतवि मणे उसे िकसी िविषय का भी पूरा जान नही-अधजल गगरी छलकत
जाए।
2. अब पछताए होत कया, जब िचिडयाँ चुग गई खेत-(समणय िनकल जाने पर पछताने से कया लाभ)- सारा
साल तुमणने पुसतके खोलकर नही देखी। अब पछताए होत कया, जब िचिडयाँ चुग गई खेत।
3. आमण के आमण गुठिलयो के दामण-(दगु न
ु ा लाभ)- िहनदी पढने से एक तो आप नई भाषा सीखकर नौकरी पर
पदोनित कर सकते है, दस
ू रे िहनदी के उचच सािहतय का रसासविादन कर सकते है, इसे कहते है-आमण के
आमण गुठिलयो के दामण।
4. ऊँची दक
ु ान फीका पकविान-(केविल ऊपरी िदखाविा करना)- कनॉटपलेस के अनेक सटोर बडे पिसद है,
पर सब घिटया दजे का मणाल बेचते है। सच है, ऊँची दक
ु ान फीका पकविान।
5. घर का भेदी लंका ढाए-(आपसी फूट के कारण भेद खोलना)-कई व्यिक पहले कांगेस मणे थे, अब जनता
(एस) पाटी मणे िमणलकर कागेस की बुराई करते है। सच है, घर का भेदी लंका ढाए।
6. िजसकी लाठी उसकी भैस-(शिकशाली की िविजय होती है)- अंगेजो ने सेना के बल पर बंगाल पर
अिधकार कर िलया था-िजसकी लाठी उसकी भैस।
7. जल मणे रहकर मणगर से विैर-(िकसी के आशय मणे रहकर उससे शतुता मणोल लेना)- जो भारत मणे रहकर
िविदेशो का गुणगान करते है, उनके िलए विही कहावित है िक जल मणे रहकर मणगर से विैर।
8. थोथा चना बाजे घना-(िजसमणे सत नही होता विह िदखाविा करता है)- गजेद्रब ने अभी दसविी की परीका

पास की है, और आलोचना अपने बडे-बडे गुरजनो की करता है। थोथा चना बाजे घना।
9. दध
ू का दध
ू पानी का पानी-(सच और झूठ का ठीक फैसला)- सरपंच ने दध
ू का दध
ू ,पानी का पानी कर
िदखाया, असली दोषी मणंगू को ही दंड िमणला।
10. दरू के ढोल सुहाविने-(जो चीजे दरू से अचछी लगती हो)- उनके मणसूरी विाले बंगले की बहु त पशंसा सुनते
थे िकनतु विहाँ दगु रध के मणारे तंग आकर हमणारे मणुख से िनकल ही गया-दरू के ढोल सुहाविने।
11. न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी-(कारण के नष होने पर कायर न होना)- सारा िदन लडके आमणो के िलए
पतथर मणारते रहते थे। हमणने आँ गन मणे से आमण का विृक की कटविा िदया। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।
12. नाच न जाने आँ गन टेढा-(कामण करना नही आना और बहाने बनाना)-जब रविीद्रब ने कहा िक कोई गीत
सुनाइए, तो सुनील बोला, ‘आज समणय नही है’। िफर िकसी िदन कहा तो कहने लगा, ‘आज मणूड नही है’।
सच है, नाच न जाने आँ गन टेढा।
13. िबन मणाँगे मणोती िमणले, मणाँगे िमणले न भीख-(मणाँगे िबना अचछी विसतु की पािप हो जाती है, मणाँगने पर
साधारण भी नही िमणलती)- अध्यापको ने मणाँगो के िलए हडताल कर दी, पर उनहे कया िमणला ? इनसे तो बैक
कमणर चारी अचछे रहे, उनका भता बढा िदया गया। िबन मणाँगे मणोती िमणले, मणाँगे िमणले न भीख।
14. मणान न मणान मणै तेरा मणेहमणान-(जबरदसती िकसी का मणेहमणान बनना)-एक अमणेिरकन कहने लगा, मणै एक
मणास आपके पास रहकर आपके रहन-सहन का अध्ययन करँगा। मणैने मणन मणे कहा, अजब आदमणी है, मणान न
मणान मणै तेरा मणेहमणान।
15. मणन चंगा तो कठौती मणे गंगा-(यिद मणन पिवित है तो घर ही तीथर है)-भैया रामणेशविरमण जाकर कया करोगे ?
घर पर ही ईशसतुित करो। मणन चंगा तो कठौती मणे गंगा।
16. दोनो हाथो मणे लडू-(दोनो ओर लाभ)- मणहेद्रब को इधर उचच पद िमणल रहा था और उधर अमणेिरका से
विजीफा उसके तो दोनो हाथो मणे लडू थे।
17. नया नौ िदन पुराना सौ िदन-(नई विसतुओं का िविशविास नही होता, पुरानी विसतु िटकाऊ होती है)- अब
भारतीय जनता का यह िविशविास है िक इस सरकार से तो पहली सरकार िफर भी अचछी थी। नया नौ िदन,
पुराना नौ िदन।
18. बगल मणे छुरी मणुँह मणे रामण-रामण-(भीतर से शतुता और ऊपर से मणीठी बाते)- सामाजयविादी आज भी कुछ
राषरो को उनित की आशा िदलाकर उनहे अपने अधीन रखना चाहते है, परनतु अब सभी देश समणझ गए है
िक उनकी बगल मणे छुरी और मणुँह मणे रामण-रामण है।
19. लातो के भूत बातो से नही मणानते-(शरारती समणझाने से विश मणे नही आते)- सलीमण बडा शरारती है, पर
उसके अबबा उसे पयार से समणझाना चाहते है। िकनतु विे नही जानते िक लातो के भूत बातो से नही मणानते।
20. सहज पके जो मणीठा होय-(धीरे-धीरे िकए जाने विाला कायर सथायी फलदायक होता है)- िविनोबा भाविे का
िविचार था िक भूिमण सुधार धीरे-धीरे और शांितपूविरक लाना चािहए कयोिक सहज पके सो मणीठा होय।

21. साँप मणरे लाठी न टू टे-(हािन भी न हो और कामण भी बन जाए)- घनशयामण को उसकी दषु ता का ऐसा
मणजा चखाओ िक बदनामणी भी न हो और उसे दंड भी िमणल जाए। बस यही समणझो िक साँप भी मणर जाए और
लाठी भी न टू टे।
22. अंत भला सो भला-(िजसका पिरणामण अचछा है, विह सविोतमण है)- शयामण पढने मणे कमणजोर था, लेिकन
परीका का समणय आते-आते पूरी तैयारी कर ली और परीका पथमण शेणी मणे उतीणर की। इसी को कहते है अंत
भला सो भला।
23. चमणडी जाए पर दमणडी न जाए-(बहु त कंजूस होना)-मणहेद्रबपाल अपने बेटे को अचछे कपडे तक भी
िसलविाकर नही देता। उसका तो यही िसदानत है िक चमणडी जाए पर दमणडी न जाए।
24. सौ सुनार की एक लुहार की-(िनबर ल की सैकडो चोटो की सबल एक ही चोट से मणुकाबला कर देते है)कौरविो ने भीमण को बहु त तंग िकया तो विह कौरविो को गदा से पीटने लगा-सौ सुनार की एक लुहार की।
25. साविन हरे न भादो सूखे-(सदैवि एक-सी िसथित मणे रहना)- गत चार विषो ं मणे हमणारे विेतन वि भते मणे एक सौ
रपए की बढोतरी हु ई है। उधर 25 पितशत दामण बढ गए है-भैया हमणारी तो यही िसथित रही है िक साविन हरे
न भागो सूखे।

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