स्वामी िववे क ानन्द

उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिजल प्राप न हो जाये ।

जो सत्य है, उसे साहसपूर्वरक िनभीक होकर लोगो से कहो–उससे िकसी को कष होता है या नही, इस ओर ध्यान
मत दो। दुबरलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योित ‘बुिद्धिमान’ मनुष्यो के िलए यिद अत्यिधिक मात्रा मे प्रखर
प्रतीत होती है, और उन्हे बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे िजतना शीघ बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

तुम अपनी अंजत:स्थ आत्मा को छोड िकसी और के सामने िसर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नही करते

िक तुम स्वयंज देवो के देव हो, तब तक तुम मुक नही हो सकते।

ईश्वर ही ईश्वर की उपलि कब्थ कर सकता है। सभी जीवंजत ईश्वर है–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन

करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत मे िजतने ईसा या बुद्धि हु ए है, सभी हमारी ज्योित से ज्योितष्मान है। इस ज्योित
को छोड देने पर ये सब हमारे िलए और अिधिक जीिवत नही रह सकेगे, मर जाएंज गे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर ि कस्थर
रहो।

ज्ञान स्वयमेव वतर मान है, मनुष्य केवल उसका आिवष्कार करता है।

मानव-देह ही सवर श्रेष देह है, एवंज मनुष्य ही सवोच्च प्राणी है, क्योिक इस मानव-देह तथा इस जन्म मे ही हम इस
सापेिक्षिक जगत् से संजपूर्णरतया बाहर हो सकते है–िनश्चय ही मुिक की अवस्था प्राप कर सकते है, और यह मुिक ही
हमारा चरम लक्ष्य है।

जो मनुष्य इसी जन्म मे मुिक प्राप करना चाहता है, उसे एक ही जन्म मे हजारो वषर का काम करना पडेगा। वह
िजस युग मे जन्मा है, उससे उसे बहु त आगे जाना पडेगा, िकन्तु साधिारण लोग िकसी तरह रेगते-रेगते ही आगे बढ
सकते है।

वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अित शीघ फल प्रािप होगी। यह है यथाथर आत्मोनित का उपाय। एकाग्रता सीखो.सभी मरेगे। िचर काल तक िकसी का शरीर नही रहेगा। अतएव उठो. वह अंजश को भी प्राप कर सकता है।  पहले स्वयंज संजपूर्णर मुकावस्था प्राप कर लो. और िजस ओर इच्छा हो. और उतनी ही हमारी इच्छा शिक अिधिक बलवती होती है।  मन का िवकास करो और उसका संजयम करो. वे उन महापुरुषो की तुलना मे अपेक्षिाकृत अपूर्णर है. उसके बाद इच्छा करने पर िफर अपने को सीमाबद्धि कर सकते हो। प्रत्येक कायर मे अपनी समस्त शिक का प्रयोग करो।  सभी मरेगे. उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्षि अनुभव होता है. अतएव वे मुक भी नही हो सकते। सांजसािरक धिक्का ही हमे जगा देता है. जो मौन रहकर पिवत्र जीवनयापन करते है और श्रेष िवचारो का िचन्तन करते हु ए जगत् की सहायता करते है। इन सभी महापुरुषो मे एक के बाद दस ूर् रे का आिवभारव होता है–अंजत मे उनकी शिक का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शिकसम्पन पुरुष आिवभूर्रत होता है. उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हे कुछ खोना नही पडेगा। जो समस्त को प्राप करता है. इसिलए उन्हे कभी दंजड भी प्राप नही होता. िजससे मनुष्य आजीवन दृष्टढव्रत बन सके। . चािहए इस तरह की दृष्टढता और चिरत्र का बल. वही इस जगत्स्वप्न को भंजग करने मे सहायता पहु ँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संजसार से छुटकारा पाने की अथारत् मुिक-लाभ करने की हमारी आकांजक्षिा को जाग्रत करते है।  हमारी नैितक प्रकृित िजतनी उनत होती है.साधिु या असाधिु. जो महापुरुष प्रचार-कायर के िलए अपना जीवन समिपर त कर देते है. धिनी या दिरद. उसके बाद जहाँ इच्छा हो. जो जगत् को िशक्षिा प्रदान करता है।  आध्याि कत्मक दृष्टिष से िवकिसत हो चुकने पर धिमर संजघ मे बना रहना अवांजछनीय है। उससे बाहर िनकलकर स्वाधिीनता की मुक वायु मे जीवन व्यतीत करो।  मुिक-लाभ के अितिरक और कौन सी उच्चावस्था का लाभ िकया जा सकता है? देवदत ूर् कभी कोई बुरे कायर नही करते. जागो और संजपूर्णर रूप से िनष्कपट हो जाओ। भारत मे घोर कपट समा गया है। चािहए चिरत्र.

हु क ंज ार मात्र से हम दुिनया को पलट देगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। िकसी के साथ िववाद न कर िहल-िमलकर अग्रसर हो -.यह दुिनया भयानक है.गुल मचाओ की उसकी आवाज दुिनया के कोने कोने मे फैल जाय। कुछ लोग ऐसे है.स. िकन्तु कायर करने के समय उनका पता नही चलता है। जुट जाओ. ६/८)  बडे-बडे िदग्गज बह जायेगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कायर मे जुट जाओ. तुम क्यो ँ रो रहे हो ? सब शिक तो तुम्ही मे है। हे भगवन्. मृत्यु के प्रित प्रेम। सांजसािरक लोग जीवन से प्रेम करते है. िकसी पर िवश्वास नही है। डरने का कोई कारण नही है. संजन्यास का अथर है. वही श्रेष पथ मै तुम्हे िदखाता हू ँ! (िव. माँ मेरे साथ है -. अपनी शिक के अनुसार आगे बढो।इसके बाद मै भारत पहु ँच कर सारे देश मे उत्तेजना फँूर् क दगंज ूर् ा। डर िकस बात का है? नही है. अपना ऐश्वयर मय स्वरूप को िवकिसत करो। ये तीनो लोक तुम्हारे पैरो के नीचे है। जड की कोई शिक नही प्रबल शिक आत्मा की है। हे िवद्वन! डरो मत्. वे न तो अपना उद्धिार ही कर सकेगे और न दस ूर् रो का। ऐसा शोर . तुम्हारा नाश नही है. परन्तु संजन्यासी के िलए प्रेम करने को मृत्यु है। लेिकन इसका मतलब यह नही है िक हम आत्महत्या कर ले। आत्महत्या करने वालो को तो कभी मृत्यु प्यारी नही होती है। संजन्यासी का धिमर है समस्त संजसार के िहत के िलए िनरंजतर आत्मत्याग करते हु ए धिीरे-धिीरे मृत्यु को प्राप हो जाना।  हे सखे.इस बार ऐसे कायर होगे िक तुम चिकत हो जाओगे। भय िकस बात का? िकसका भय? वज जैसा हृदय बनाकर कायर मे जुट जाओ। (िववेकानन्द सािहत्य खण्ड-४पना-३१५) (४/३१५)  तुमने बहु त बहादुरी की है। शाबाश! िहचकने वाले पीछे रह जायेगे और तुम कुद कर सबके आगे पहु ँच जाओगे। जो अपना उध्दार मे लगे हु ए है. कहने से साँप का िवष भी नही . नही है. जो िक दस ूर् रो की त्रुिटयो को देखने के िलए तैयार बैठे है. संजसार-सागर से पार उतरने का उपाय है। िजस पथ के अवलम्बन से यती लोग संजसार-सागर के पार उतरे है.

तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे.बडे . कोई िचन्ता न करना। सभी कामो मे एक दल शत्रुता ठानता है.स.बडे बह गये. इससे कम मे िकसी तरह नही चल सकता। कुछ परवाह नही। दुनीया भर मे प्रलय मच जायेगा..स. कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षिा कर सकता है? यिद तुम अपनी अि कन्तम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। िसंजह की शूर्रता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (िव.धिीरे सब होगा।  वीरता से आगे बढो। एक िदन या एक साल मे िसि कध्द की आशा न रखो। उच्चतम आदशर पर दृष्टढ रहो। ि कस्थर रहो। स्वाथर परता और ईष्यार से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य. और तुम संजसार को िहला दोगे। याद रखो -.यही सदा से होता आया है -. उन्ही िवघ्नो की रेल पेल मे आदमी तैयार होता है। िमशनरी िफशनरी का काम थोडे ही है जो यह धिक्का सम्हाले! .बडे आदमी वो है जो अपने हृदय-रुिधिर से दस ूर् रो का रास्ता तैयार करते है. सत्य के ही बल से देवयानमागर की गित िमलती है।) . िमथ्या की नही.४/३२०)  लोग तुम्हारी स्तुित करे या िनन्दा. मनुष्य -.. इसके िसवाय अन्य कुछ भी नही। (िव..रहता है। नही नही कहने से तो 'नही' हो जाना पडेगा। खूर्ब शाबाश! छान डालो .सारी दिूर् नया को छान डालो! अफसोस इस बात का है िक यिद मुझ जैसे दो .स.. सत्येनव ै पन्था िवततो देवयानः (सत्य की ही िवजय होती है. वाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांजिस बहु िवघ्नािन.जाित और अपने देश के पक्षि पर सदा के िलए अटल रहो. तुम न्यायपथ से कभी भ्रष न हो। (िव.६/८८)  श्रेयांजिस बहु िवघ्नािन अच्छे कमो ंज मे िकतने ही िवघ्न आते है। -. जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है.प्रलय मचाना ही होगा..चार व्यिक भी तुम्हारे साथी होते  तमाम संजसा िहल उठता। क्या करूँ धिीरे .स. लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो.धिीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूर्फ़ान मचा दो तूर्फ़ान! (िव. अपना काम करते जाओ िकसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतंज. ४/३८७)  िकसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ. अब गडिरये का काम है जो थाह ले? यह सब नही चलने का भैया.धिीरे .एक आदमी अपना .व्यिक और उसका जीवन ही शिक का स्रोत है. ४/३९५)  इस तरह का िदन क्या कभी होगा िक परोपकार के िलए जान जायेगी? दुिनया बच्चो का िखलवाड नही है -.

६/३५२) मन और मुँह को एक करके भावो को जीवन मे कायारि कन्वत करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे.तुमसे कहता हू ँ देखना. सावर जनीनता.धिैयर धिारण करने पर सफलता  अवश्यम्भावी है.दो क्यो न रहे. ऐसा ही हो. "भाव  के घर मे िकसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब िवषओंज मे व्यवहािरक बनना होगा। लोगो या समाज की बातो पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कायर करते रहेगे क्या तुने नही सुना. दस ूर् रे के अत्यन्त छोटे अिधिकार मे भी हस्तक्षिेप न करना . "दुसरो के धिमर का द्वेष न करना".हम दस ही क्यो न हो.शरीर-पात करके सेतु िनमारण करता है.मै ही िशव हू ँ.बहु त्व मे एकत्व सावर जिनन भाव मे िकसी तरह की बाधिा न हो। यिद आवश्यक हो तो "सावर जनीनता" के भाव की रक्षिा के िलए सब कुछ छोडना होगा। मै मरूँ चाहे बचूर्ँ. देश जाऊँ या न जाऊँ.३/३८१) अन्त मे प्रेम की ही िवजय होती है। हैरान होने से काम नही चलेगा. मै ही िशव हू ँ। ) मै चाहता हू ँ िक मेरे सब बच्चे.ठहरो.मै कहता हू ँ.इन तीनो के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मागर से िवचिलत नही कर सकता। (िव.हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नही करते िक. परन्तु कट्टरता छोडकर. नही. अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन. इसके िलए हमे चाहे िजतना कष उठाना पडे.कोई बाहरी अनुषानपध्दित आवश्यक न हो. ध्येय के प्रित अनुराग तथा ध्येय को कायर रूप मे पिरणत करने के िलए सदा प्रस्तुत रहना -. कुत्ता भोके हजार साधिुन को दुभारव निहंज."हाथी चले बाजार मे. उससे सौगुना उन्न्त बने। तुम लोगो मे से प्रत्येक  को महान शिकशाली बनना होगा.स.चाहे िकतना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक  ईष्यार) हमारे भीतर न घुसने पाये. जो िनन्दे संजसार" ऐसे ही चलना है। दुिनया के लोगो की बातो पर ध्यान नही देना होगा। उनकी भली बुरी बातो को सुनने से जीवन भर कोई िकसी प्रकार का महत् कायर नही कर सकता। (िव. हम सब लोग सब धिमो ंज को सत्य समझते है और उन्का ग्रहण भी पूर्णर रूप से करते है हम इसका प्रचार भी करते है और इसे कायर मे पिरणत कर िदखाते है सावधिान रहना. िशवोs हम् िशवोs हम् (ऐसा ही हो. तुम लोग अच्छी तरह याद रखना िक. कबीरदास के दोहे मे है.इसी भँवर मे बडे-बडे जहाज डूर् ब जाते है पुरी भिक. और हजारो आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते है। एवमस्तु एवमस्तु. िदखानी होगी. मै िजतना उनत बन सकता था.परवाह नही परन्तु िजतने हो सम्पूर्णर शुध्दचिरत्र हो। .स. याद रखना उन्की कृपा से सब ठीक हो जायेगा। िजस तरह हो.

पाप्.१/३८०)  बालको. िकन्तु जो उस परम िपता के इच्छानुसार कायर करता है वही धिािमर क है। यिद कभी कभी तुमको संजसार का थोडा-बहु त धिक्का भी खाना पडे. िनरन्तर कमर . इसमे ही समग्र धिमर िनिहत है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है.स.सारा धिमर इसी मे है। (िव. जो कभी कि कम्पत न हो। दृष्टढता के साथ लगे रहो. संजघषर .सदा उसीका साथ करो। िबना िवघ्न . िकन्तु मै ऐसा नही करूँगा। मै तो लोहे के सदृष्टश दृष्टढ इच्छा-शिक सम्पन हृदय चाहता हू ँ.बाधिाओंज के क्या कभी कोई महान कायर हो सकता है? समय.स. असदाचरण तथा दुबरलता तुममे एकदम नही रहनी चािहए. तो उससे िवचिलत न होना. वीर पुरूष कभी भी पापानुषान नही करते -. नीितपरायण तथा साहसी बनो. मेरी सन्तानो मे से कोई भी कायर न बने। तुम लोगो मे जो सबसे अिधिक साहसी है .स. तुम्हारे िलए नीितपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दस ूर् रा धिमर नही। इसके िसवाय और कोई धिािमर क मत-मतान्तर तुम्हारे िलए नही है। कायरता. उठो तथा सामथ्यर शाली बनो। कमर .१/३७९)  क्या संजस्कृत पढ रहे हो? िकतनी प्रगित होई है? आशा है िक प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप कर चुके होगे। िवशेष पिरश्रम के साथ संजस्कृत सीखो। (िव. प्रभु तुम्हे आशीवारद दे। सदा शुभकामनाओंज के साथ तुम्हारा िववेकानन्द। (िव. बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपि कस्थत होगी।(िव.४/३१९)  बच्चो. अन्त: करण पूर्णरतया शुध्द रहना चािहए। पूर्णर नीितपरायण तथा साहसी बनो -प्रणो के िलए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते है.स.स. िजससे तुम्हारे हृदय उछल पडते.स.१/३७९-८०)  शत्रु को परािजत करने के िलए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसिलए अंजग्रेजी और संजस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो। (िव. धिमर का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है. धिैयर तथा अदम्य इच्छाशिक से ही कायर हु आ करता है। मै तुम लोगो को ऐसी बहु त सी बाते बतलाता.४/३४०) . मुहूतर भर मे वह दरूर् हो जायगा तथा सारी ि कस्थित पुनः ठीक हो जायगी। (िव. व्यथर के मतवादो से नही। सच्चा बनना तथा सच्चा बतारव करना. दृष्टढ बने रहो.यहाँ तक िक कभी वे मन मे भी पाप का िवचार नही लाते। प्रािणमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो.१/३५०)  शिकमान. वह नही. िनरन्तर संजघषर ! अलिमित। पिवत्र और िनःस्वाथी बनने की कोिशश करो -.

४/३४७)  भाग्य बहादुर और कमर ठ व्यिक का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगे.४/३५६)  बच्चो.४/३६१) .४/३५१)  साहसी होकर काम करो। धिीरज और ि कस्थरता से काम करना -. साहस. अपार शिक. अिमत साहस और िनस्सीम धिैयर की आवश्यकता है.स. जब तक तुम लोगो को भगवान तथा गुरू मे.स.स. तब तक सीखना' -.और तभी महत कायर िनष्पन िकये जा सकते है। हमे पूर्रे िवश्व को उद्दीप करना है। (िव. पिवत्रता और अनवरत कमर । जब तक तुम पिवत्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे.१/३८७)  पिवत्रता. िवश्वासी होओ.यही एक मागर है। आगे बढो और याद रखो धिीरज.स. उसी प्रकार इस नश्वर जगत मे भी तुम्हारी इच्छा पूर्णर हो.४/३५१)  पिवत्रता. जब तक जीना. धिैयर तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधिाएँ दरूर् हो जाती है। इसमे कोई सन्देह नही िक महान कायर सभी धिीरे धिीरे होते है। (िव.कदािप भयभीत मत होना। पिवत्र होओ.अनुभव ही जगत मे सवर श्रेष िशक्षिक है। (िव.स.माँ तुम्हे कभी न छोडेगी और पूर्णर आशीवारद के तुम पात्र हो जाओगे। (िव.१/३८६)  जीस प्रकार स्वगर मे. अपिरिमत उत्साह. दृष्टढता तथा उद्यम.स. भिक तथा सत्य मे िवश्वास रहेगा. तब तक तुम कभी िनष्फल नही होओगे -. और आज्ञापालक होओ। (िव.स. तब तक कोई भी तुम्हे नुक़सान नही पहु ँचा सकता। िकन्तु इनमे से एक के भी नष हो जाने पर पिरणाम िवपित्तजनक है। (िव. क्योिक अनन्त काल के िलए जगत मे तुम्हारी ही मिहमा घोिषत हो रही है एवंज सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है। (िव.ये तीनो गुण मै एक साथ चाहता हू ँ। (िव.स.४/३३९)  महाशिक का तुममे संजचार होगा -.

यह न भूर्लना। अथारत् यिद तुम िकसी के प्रित अन्य की अपेक्षिा अिधिक प्रीितप्रदशर न करते हो. तब तक प्रत्येक कायर मे तुम्हे सफलता िमलेगी। (िव.स. और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दस ूर् रो पर शासन करने का तिनक भी यत्न न करो.४/२७६)  ईष्यार तथा अंजहकार को दरूर् कर दो -.पैसे के व्यवहार मे शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कायर करेगे। जब तक तुममे ईमानदारी.स. ि कस्थर रहो.स. सच्चे और सहनशील बनो।(िव. तो तुम्हे सहायता देने के िलए कोई भी आगे न बढेगा। यिद सफल होना चाहते हो.४/२८०)  पूर्णरतः िनःस्वाथर रहो. वही जगत् मे सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षिा करे। मै तुम्हारे साथ काम करने के िलए सदैव प्रस्तुत हू ँ एवंज हम लोग यिद स्वयंज अपने िमत्र रहे तो प्रभु भी हमारे िलए सैकडो िमत्र भेजेगे. िबना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन रखो। पिवत्रता और शिक के साथ अपने आदशर पर दृष्टढ रहो और िफर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधिाएँ क्यो न हो. कुछ समय बाद संजसार तुमको मानेगा ही। (िव.४/२८४)  यिद तुम स्वयंज ही नेता के रूप मे खडे हो जाओगे. आत्मिवशवास रखो. तो पहले 'अहंज' ही नाश कर डालो। (िव. भिक और िवश्वास है. आत्मैव ह्यात्मनो बन्धिुः। (िव.४/३६८)  जो पिवत्र तथा साहसी है.स.४/३६२)  धिीरज रखो और मृत्युपयर न्त िवश्वासपात्र रहो। आपस मे न लडो! रुपये . क्योिक इससे ईष्यार उत्पन होगी और इससे हर चीज बबारद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहु त अच्छा काम िकया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेगे अन्य सहायता के िलए हम प्रतीक्षिा नही करते। मेरे बच्चे.स.स.४/३१२) .स.संजगिठत होकर दस ूर् रो के िलए कायर करना सीखो। (िव.४/२८५)  पक्षिपात ही सब अनथो ंज का मूर्ल है. तो याद रखो उसीसे भिवष्य मे कलह का िबजारोपण होगा। (िव.

जब तक हृदय मे उत्साह एवंज गुरू तथा ईश्वर मे िवश्वास . कायर करते रहो। (िव.४/३१५)  िकसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ. तो नम्रतापूर्वरक ग़लती के प्रित उनको सजग कर दो। एक दस ूर् रे की आलोचना ही सब दोषो की जड है। िकसी भी संजगठन को िवनष करने मे इसका बहु त बडा हाथ है। (िव.ये तीनो वस्तुएम रहेगी . जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है.स.तब तक तुम्हे कोई भी दबा नही सकता। मै िदनोिदन अपने हृदय मे शिक के िवकास का अनुभव कर रहा हू ँ। हे साहसी बालको.स. यिद कोई तुम्हारे समीप अन्य िकसी साथी की िनन्दा करना चाहे. ४/३२०)  क्या तुम नही अनुभव करते िक दस ूर् रो के ऊपर िनभर र रहना बुि कध्दमानी नही है। बुि कध्दमान व्यिक को अपने ही पैरो पर दृष्टढता पूर्वरक खडा होकर कायर करना चिहए। धिीरे धिीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा। (िव. कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षिा कर सकता है? यिद तुम अपनी अि कन्तम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। िसंजह की शूर्रता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (िव. उससे भिवष्य मे िववाद का सूर्त्रपात होगा। (िव. कायर करते रहो। (िव.४/३३२)  िकसी को उसकी योजनाओंज मे हतोत्साह नही करना चािहए। आलोचना की प्रवृित्त का पूर्णरतः पिरत्याग कर दो। जब तक वे सही मागर पर अग्रेसर हो रहे है.४/३१८)  बच्चे.स. ४/३३२) . जब तक तुम्हारे हृदय मे उत्साह एवंज गुरू तथा ईश्वर मे िवश्वास. ४/३२८)  बच्चे.तब तक तुम्हे कोई भी दबा नही सकता। मै िदनोिदन अपने हृदय मे शिक के िवकास का अनुभव कर रहा हू ँ। हे साहसी बालको.ये तीनो वस्तुएँ रहेगी -.४/३१३)  गम्भीरता के साथ िशशु सरलता को िमलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंजकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदाियक िवचारो को मन मे न लाओ। व्यथर िववाद महापाप है। (िव.स. और जब कभी तुमको उनके कायर मे कोई ग़लती नजर आये. तो तुम उस ओर िबल्कुल ध्यान न दो। इन बातो को सुनना भी महान् पाप है.स.स.स. तब तक उन्के कायर मे सहायता करो.

स. यश और दस ूर् रो पर शासन करने की इच्छा से रिहत होकर काम करे। काम. भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कायो ंज से सामना पडने पर मेरा धिैयर समाप हो जाता है। यही संजसार है िक िजन्हे तुम सबसे अिधिक प्यार और सहायता करो.स. यही मेरा मूर्लमंजत्र है। (िव. तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मै पागल नही हो जाता हू ँ. जो भिवष्य मे संजसार मे शाि कन्त की वषार करने वाली है.स.स. क्रोधि एंज व लोभ -. आओ हम नाम. िकन्तु उसे मृत्युपयर न्त सत्य और िवश्वासी होना होगा। मै सफलता और असफलता की िचन्ता नही करता। मै अपने आन्दोलन को पिवत्र रखूर्ँगा.स. ४/३४८)  शिक और िवशवास के साथ लगे रहो। सत्यिनषा. १८८९) . वे ही तुम्हे धिोखा देगे। (िव.मनुष्य जाित को उसके िदव्य स्वरूप का उपदेश देना. तथा जीवन के प्रत्येक क्षिेत्र मे उसे अिभव्यक करने का उपाय बताना। (िव. ४/३६९)  एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे. उसके िलए प्रितक्षिा करते रहो.स. ४/४०७)  जब कभी मै िकसी व्यिक को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्णर रूप से िनमग पाता हू ँ. ४/३७७)  मेरा आदशर अवश्य ही थोडे से शब्दो मे कहा जा सकता है .भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहे. १/३३४.इस ित्रिवधि बन्धिन से हम मुक हो जाये और िफर सत्य हमारे साथ रहेगा। (िव. यही आश्चयर की बात है। (िव. पिवत्र और िनमर ल रहो. न ढूर् ँढो -. ६ फरवरी. तथा आपस मे न लडो। हमारी जाित का रोग ईष्यार ही है। (िव. ४/३३८)  न टालो.

स) . िहल नही सकता। (िव.१/३८९) यही दुिनया है! यिद तुम िकसी का उपकार करो. तो छुतही िबमारी की तरह हम उसके स्पशर से दरूर् भागते है।  परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्राथर ना के रूप मे कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट िमल जाता है-.स. परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल मे प्रेम एवंज कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नही पहु ँचते.स.यिह मेरा धिमर है। "मुझे मुिक और भिक की चाह नही। लाखो नरको मे  जाना मुझे स्वीकार है. दिक्षिण भारत मे पादरी लोग क्या गजब कर रहे है। ये लोग नीच जाित के लोगो को लाखो की संजख्या मे ईसाई बना रहे है। .४/३२८) हर काम को तीन अवस्थाओंज मे से गुजरना होता है -.'बसन्त की तरह लोग का िहत करते हु ए' .तब चाहे वह िकसी कट्टर से कट्टर िहन्द ूर् के कमरे के भीतर पहु ँच जाय. िवरोधि और स्वीकृित। जो मनुष्य अपने समय से  आगे िवचार करता है. तब ये सब लुप हो जायेगे। (िव.१/३८५) प्रायः देखने मे आता है िक अच्छे से अच्छे लोगो पर कष और किठनाइयाँ आ पडती है। इसका समाधिान न भी हो  सके. देिखए तो सही. ऐसा कोई नही.४/३३०) यिद कोई भंजगी हमारे पास भंजगी के रूप मे आता है. उसके िलए कही रोक-टोक नही.. कब एक मनुष्य दस ूर् रे से भाईचारे का बतारव करना सीखेगा। (िव.यही मेरा धिमर है।" (िव. वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमािणत करने मे नही िहचिकचायेगे। मेरे जैसे भावुक व्यिक अपने सगे .स.स. तो लोग उसे कोई महत्व नही देगे. जो मूर्ल रूप मे भली न हो। ऊपरी लहरे चाहे जैसी हो.स्नेिहयो द्वरा सदा ठगे जाते है। (िव. परन्तु मुझे दृष्टढ और पिवत्र होना चािहए और भगवान् मे अपिरिमत िवश्वास रखना चािहए. बसन्तवल्लोकिहतंज चरन्तः.उपहास.वह िकतना ही फटा-पुराना क्यो न हो-. जो सिदयो की पुरािन चट्टान पर बना है.वहाँ लगभग चौथाई जनसंजख्या ईसाई हो गयी है! मै उन बेचारो को क्यो दोष दँ ? ूर् हे भगवान. िकन्तु ज्यो ही तुम उस कायर  को वन्द कर दो. जो उससे सप्रेम हाथ िमलाकर बैठने के िलए उसे कुसी न दे! इससे अिधिक िवड्म्बना की बात क्या हो सकता है? आइए. िफर भी मुझे जीवन मे ऐसा अनुभव हु आ है िक जगत मे कोई ऐसी वस्तु नही. लोग उसे िनश्चय ही ग़लत समझते है। इसिलए िवरोधि और अत्याचार हम सहषर स्वीकार करते है. वह मकान. तभी तक हमे कष िमलता है। एक बार उस शाि कन्त-मण्डल मे प्रवेश करने पर िफर चाहे आँ धिी और तूर्फान के िजतने तुमुल झकोरे आये..

युगो के सामािजक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले. परन्तु हाय! कोई भी िकंजिचत् अंजश मे प्रत्य्क्षि आचरण नही करता। (िव. सैकडो वषो ंज से केवल आहार की छुआछूर्त के िववाद मे ही अपनी सारी शिक नष करनेवाले. न पाि कण्डत्य. अन्य देश िकस तरह आगे बढ रहे है। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यिद 'हाँ' तो आओ.४/३३७) . आत्म-साक्षिात्कार को िवजय िमलेगी! प्रत्येक देश मे िसंजह जैसी शिकमान दस-बारह आत्माएँ होने दो. िजन्का िचत्र ब्रह्मनुसन्धिान मे लीन है. क्योिक उनका सुधिार कभी न होगा.िकताबे हाथ मे िलए तुम केवल समुद के िकनारे िफर रहे हो। तीस रुपये की मुंजशी . एक शब्द मे अनुभूर्ित. िजन्होने अनन्त का स्पशर कर िलया है. रोटी दो ' िचल्लाते रहते है। क्या समुद मे इतना पानी भी न रहा िक तुम उसमे िवश्विवद्यालय के िडप्लोमा... अत्यन्त िनकट और िप्रय सम्बन्धिी रोते हो. मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोिहतो को.स. ठोकरे मारकर िनकाल दो.गीरी के िलए अथवा बहु त हु आ..मि कस्तष्क . न बल की. व्यथर बकवाद करने वालो. न धिन. तो रोने दो. कुछ भी नही. हम लोग उच्चता और उनित के मागर मे प्रयत्नशील हो। पीछे मुडकर मत देखो. मेरी केवल यह इच्छा है िक प्रितवषर यथेष संजख्या मे हमारे नवयुवको को चीन जापान मे आना चािहए। जापानी लोगो के िलए आज भारतवषर उच्च और श्रेष वस्तुओंज का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? .जान से तडप रहे हो -.. भला बताओ तो सही. पशुओंज का नही। परमात्मा ने तुम्हारी इस िनश्चेष सभ्यता को तोडने के िलए ही अंजग्रेजी राज्य को भारत मे भेजा है. जीवन भर केवल बेकार बाते िकया करते हो. बि कल्क पिवत्रता. वह परमात्मा बन जाता है और दस ूर् रो को तदरूप बनने मे सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् मे अनेक मतवादो का प्रचार हो चुका है। लाखो पुस्तके है. इन लोगो को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह िछपा लो। सिठयाई बुि कध्दवालो. ( िव. जो सदैव उनित्त के मागर मे बाधिक होते है. मनुष्य बनो। कूर्पमंजडूर्कता छोडो और बाहर दृष्टिष डालो। देखो. तुम्हारी तो देश से बाहर िनकलते ही जाित चली जायगी! अपनी खोपडी मे वषो ंज के अन्धििवश्वास का िनरन्तर वृि कध्दगत कूर्डा-ककरट भरे बैठे. िपछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हजार युवको का बिलदान चाहती है -.यही तो भारतवषर के नवयुवको की सबसे बडी महत्वाकांजक्षिा है। ितस पर इन िवद्यािथर यो के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते है. न नाम की और ये व्यिक ही संजसार को िहला डालने के िलए पयारप होगे। (िव.मूर्ल से िनकाल फेको। आओ..४/३३६)  यही रहस्य है। योग प्रवतर क पंजतजिल कहते है. जो भूर्ख से तडपते हु ए उन्हे घेरकर ' रोटी दो. जो न धिन की िचन्ता करते है. तुम लोग क्या हो? आओ. तो एक वकील बनने के िलए जी .वाले युवको का. तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? . शुध्द जीवन. " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शिकयो के लोभ का त्याग करता है.स. गाउन और पुस्तको के समेत डूर् ब मरो ? आओ. तभी उसे धिमर मेघ नामक समािधि प्राप होती है। वह प्रमात्मा का दशर न करता है.१/३९८-९९)  न संजख्या-शिक. न वाक चातुयर.स.. िजन्होने अपने बन्धिन तोड डाले है. उन्के हृदय कभी िवशाल न होगे। उनकी उत्पित्त तो सैकडो वषो ंज के अन्धििवश्वासो और अत्याचारो के फलस्वरूप हु ई है। पहले पुरोिहती पाखंजड को जड .

धिन. एक महान रहस्य का मैने पता लगा िलया है -. जब तक सोते हु ए देवता न जाग उठे . स्त्री से सन्तोष प्राप करने दो। और हम धिमोपलि कब्धि. अकेले रहो। जो अकेला रहता है. धिीरे . ४/३८१)  मेरी दृष्टढ धिारणा है िक तुममे अन्धििवश्वास नही है। तुममे वह शिक िवद्यमान है.नीच सोचने के िलए कभी नही रुकता. और अपने आदशो ंज पर जमे रहना. जो ऊँच .स. ४/३३७)  जो सबका दास होता है. किठन पिरश्रम्! काम कांजचन के इस चक्कर मे अपने आप को ि कस्थर रखना. उसके चरणो मे सारा संजसार लोट जाता है। (िव. वे आज या कल सफलता को देखेगे। पिरश्रम करना है वत्स.स. उसका िकसीसे िवरोधि नही होता. जब तक अन्तयारमी देव उस पुकार का उत्तर न दे। जीवन मे और क्या है? इससे महान कमर क्या है? (िव. यश.स.बार पुकारे. वे कभी िकसी से बैर नही करते। वाचालो को वाचाल होने दो! वे इससे अिधिक और कुछ नही जानते! उन्हे नाम. वह िकसीकी शाि कन्त भंजग नही करता. ब्रह्मलाभ एवंज ब्रह्म होने के िलए ही दृष्टढव्रत होगे। हम आमरण एवंज जन्म-जन्मान्त मे सत्य का ही अनुसरण करेगे। दस ूर् रो के कहने पर हम तिनक भी ध्यान न दे और यिद आजन्म यत्न के बाद एक.धिीरे और भी अन्य लोग आयेगे। 'साहसी' शब्द और उससे अिधिक 'साहसी' कमो ंज की हमे आवश्यकता है। उठो! उठो! संजसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार . जब तक िक आत्मज्ञान और पूर्णर त्याग के साँचे मे िशष्य न ढल जाय िनश्चय ही किठन काम है। जो प्रितक्षिा करता है.स. ४/३८७)  अकेले रहो. न दस ूर् रा कोई उसकी शाि कन्त भंजग करता है। (िव. ४/४०३)  वत्स. जो संजसार को िहला सकती है. देवल एक ही आत्मा संजसार के बन्धिनो को तोडकर मुक हो सके तो हमने अपना काम कर िलया। (िव.स. धिीरज रखो. वह कभी नेता नही बन सकता। िजसके प्रेम का कोई अन्त नही है. वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। िजसके प्रेम मे ऊँच . उसे सब चीजे िमलती है। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो। (िव. काम तुम्हारी आशा से बहु त ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम मे सफलता प्राप करने से पहले सैकडो किठनाइयो का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेगे.वह यह िक केवल धिमर की बाते करने वालो से मुझे कुछ भय नही है। और जो सत्यद्र्ष महात्मा है.नीच का िवचार होता है. ४/४०८ .

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