ईषया / पेमचंद

पतापचनद ने िवरजन के घर आना-जाना िववाह के कुछ िदन पूवर से ही तयाग िदया था। वह िववाह के िकसी भी कायर मे
सिममिलत नही हुआ। यहॉ तक िक महिफल मे भी न गया। मिलन मन िकये, मुहॅ लटकाये, अपने घर बैठा रहा, मुंशी
संजीवनलाला, सुशीला, सुवामा सब िबनती करके हार गये, पर उसने बारात की ओर दृिष न फेरी। अंत मे मुंशीजी का मन टू ट
गया और िफर कुछ न बोले। यह दशा िववाह के होने तक थी। िववाह के पशात तो उसने इधर का मागर ही तयाग िदया। सकूल
जाता तो इस पकार एक ओर से िनकल जाता, मानो आगे कोई बाघ बैठा हुआ है, या जैसे महाजन से कोई ऋणी मनुषय ऑख
बचाकर िनकल जाता है। िवरजन की तो परछाई से भागता। यिद कभी उसे अपने घर मे देख पाता तो भीतर पग न देता।
माता समझाती-बेटा। िवरजन से बोलते-चालत कयो नही ? कयो उससे यसमन मोटा िकये हुए हो ? वह आ-आकर घणटो रोती है
िक मैने कया िकया है िजससे वह रष हो गया है। देखो, तुम और वह िकतने िदनो तक एक संग रहे हो। तुम उसे िकतना पयार
करते थे। अकसमात् तुमको कया हो गया? यिद तुम ऐसे ही रठे रहोगे तो बेचारी लडकी की जान पर बन जायेगी। सूखकर
कॉटा हो गया है। ईशर ही जानता है, मुझे उसे देखकर करणा उतपन होती है। तुमहारी चरचा के अितिरकत उसे कोई बात ही
नही भाती।
पताप ऑखे नीची िकये हुए सब सुनता और चुपचाप सरक जाता। पताप अब भोला बालक नही था। उसके जीवनरपी वृक मे
यौवनरपी कोपले फूट रही थी। उसने बहुत िदनो से-उसी समय से जब से उसने होश संभाला-िवरजन के जीवन को अपने
जीवन मे शरकरा कीर की भॉित िमला िलया था। उन मनोहर और सुहावने सवपो का इस कठोरता और िनदरयता से धूल मे
िमलाया जाना उसके कोमल हृदय को िवदीणर करने के िलए काफी था, वह जो अपने िवचारो मे िवरजन को अपना सवरसव
समझता था, कही का न रहा, और अपने िवचारो मे िवरजन को अपना सवरसव समझता था, कही का न रहा, और वह, िजसने
िवरजन को एक पल के िलए भी अपने धयान मे सथान न िदया था, उसका सवरसव हो गया। इस िवतरक से उसके हृदय मे
वयाकुलता उतपन होती थी और जी चाहता था िक िजन लोगो ने मेरी सवपवत भावनाओं का नाश िकया है और मेरे जीवन की
आशाओं को िमटटी मे िमलाया है, उनहे मै भी जलाउं। सबसे अिधक कोध उसे िजस पर आता था वह बेचारी सुशीला थी।
शनै :-शनै : उसकी यह दशा हो गई िक जब सकूल से आता तो कमलाचरण के समबनध की कोई घटना अवशय वणरन करता।
िवशेष कर उस समय जब सुशीला भी बैठी रहती। उस बेचारी का मन दुखाने मे इसे बडा ही आननद आता। यदिप अवयकत
रीित से उसका कथन और वाकय-गित ऐसी हृदय-भेिदनी होती थी िक सुशीला के कलेजे मे तीर की भाित लगती थी। आज
महाशय कमलाचरण ितपाई के ऊपर खडे थे, मसतक गगन का सपशर करता था। परनतु िनलरजज इतने बडे िक जब मैने उनकी
ओर संकेत िकया तो खडे-खडे हॅसने लगे। आज बडा तमाशा हुआ। कमला ने एक लडके की घडी उडा दी। उसने मासटर से
िशकायत की। उसके समीप वे ही महाशय बैठे हुए थे। मासटर ने खोज की तो आप ही फेटे से घडी िमली। िफर कया था ?
बडे मासटर के यहॉ िरपोटर हुई। वह सुनते ही झलला गये और कोई तीन दजरन बेते लगायी, सडासड। सारा सकूल यह कौतूहल
देख रहा था। जब तक बेते पडा की, महाशय िचललाया िकये, परनतु बाहर िनकलते ही िखलिखलाने लगे और मूछ
ं ो पर ताव देने
लगे। चाची। नही सुना ? आज लडको ने ठीक सकूल के फाटक पर कमलाचरण को पीटा। मारते-मारते बेसुध कर िदया।
सुशीला ये बाते सुनती और सुन-सुसनकर कुढती। हॉ। पताप ऐसी कोई बात िवरजन के सामने न करता। यसिद वह घर मे
बैठी भी होती तो जब तक चली न जाती, यह चचा न छेडता। वह चाहता था िक मेरी बात से इसे कुछ दुख: न हो। समय-समय
पर मुंशी संजीवनलाल ने भी कई बार पताप की कथाओं की पुिष की। कभी कमला हाट मे बुलबुल लडाते िमल जाता, कभी
गुणडो के संग िसगरेट पीते, पान चबाते, बेढंगेपन से घूमता हुआ िदखायी देता। मुंशीजी जब जामाता की यह दशा देखते तो घर
आते ही सती पर कोध िनकालते- यह सब तुमहारी ही करतूत है। तुमही ने कहा था घर-वर दोनो अचछे है, तुमही रीझी हुई थी।
उनहे उस कण यह िवचार न होता िक जो दोषारोपण सुशील पर है, कम-से-कम मुझ पर ही उतना ही है। वह बेचारी तो घर मे
बनद रहती थी, उसे कया जात था िक लडका कैसा है। वह सामुिदक िवदा थोड ही पढी थी ? उसके माता-िपता को सभय देखा,
उनकी कुलीनता और वैभव पर सहमत हो गयी। पर मुंशीजी ने तो अकमरणयता और आलसय के कारण छान-बीन न की, यदिप
उनहे इसके अनेक अवसर पापत थे, और आलसय के कारण छान-बीन न की, यदिप उनहे इसके अनेक अवसर पापत थे, और

मुंशीजी के अगिणत बानधव इसी भारतवषर मे अब भी िवदमान है जो अपनी पयारी कनयाओं को इसी पकार नेत बनद करकेक कुए
मे ढकेल िदया करते है।
सुशीला के िलए िवरजन से िपय जगत मे अनय वसतु न थी। िवरजन उसका पाण थी, िवरजन उसका धमर थी और िवरजन ही
उसका सतय थी। वही उसकी पाणाधार थी, वही उसके नयनो को जयोित और हृदय का उतसाह थी, उसकी सवौचच सासािरक
अिभलाषा यह थी िक मेरी पयारी िवरजन अचछे घर जाय। उसके सास-ससुर, देवी-देवता हो। उसके पित िशषता की मूितर और
शीरामचंद की भाित सुशील हो। उस पर कष की छाया भी न पडे। उसने मर-मरकर बडी िमनतो से यह पुती पायी थी और
उसकी इचछा थी िक इन रसीले नयनो वाली, अपनी भोली-भाली बाला को अपने मरण-पयरनत आंखो से अदृशय न होने दूंगी।
अपने जामाता को भी यही बुलाकर अपने घर रखूंगी। जामाता मुझे माता कहेगा, मै उसे लडका समझूगी। िजस हृदय मे ऐसे
मनोरथ हो, उस पर ऐसी दारण और हृदयिवदारणी बातो का जो कुछ पभाव पडेगा, पकट है।
हा। हनत। दीना सुशीला के सारे मनोरथ िमटी मे िमल गये। उसकी सारी आशाओं पर ओस पड गयी। कया सोचती थी और
कया हो गया। अपने मन को बार-बार समझाती िक अभी कया है, जब कमला सयाना हो जाएगी तो सब बुराइया सवयं तयाग
देना। पर एक िननदा का घाव भरने नही पाता था िक िफर कोई नवीन घटना सूनने मे आ जाती। इसी पकार आघात-पर-आघात
पडते गये। हाय। नही मालूम िवरजन के भागय मे कया बदा है ? कया यह गुन की मूितर, मेरे घर की दीिपत, मेरे शरीर का पाण
इसी दुषकृत मनुषय के संग जीवन वयतीत करेगी ? कया मेरी शयामा इसी िगद के पाले पडेगी ? यह सोचकर सुशीला रोने लगती
और घंटो रोती रहती है। पिहले िवरजन को कभी-कभी डाट-डपट भी िदया करती थी, अब भूलकर भी कोई बात न कहती।
उसका मंह देखते ही उसे याद आ जाती। एक कण के िलए भा उसे सामने से अदृशय न होने देगी। यिद जरा देर के िलए वह
सुवामा के घर चली जाती, तो सवयं पहंुच यजाती। उसे ऐसा पतीत होता मानो कोई उसे छीनकर ले भागता है। िजस पकार
वािधक की छुरी के तले अपने बछडे को देखकर गाय का रोम-रोम कापने लगता है, उसी पकार िवरजन के दुख का धयान
करके सुशीला की आंखो मे संसार सूना जाना पडता था। इन िदनो िवरजन को पल-भर के िलए नेतो से दूर करते उसे वह कष
और वयाकुलता होती,जो िचिडया को घोसले से बचचे के खो जाने पर होती है। सुशीला एक तो यो ही जीणर रोिगणी थी। उस पर
भाविषय की असाधय िचनता और जलन ने उसे और भी धुला डाला। िननदाओं ने कलेजा चली कर िदया। छ: मास भी बीतने न
पाये थे िक कयरोग के िचहृन िदखायी िदए। पथम तो कुछ िदनो तक साहस करके अपने दु :ख को िछपाती रही, परनतु कब
तक ? रोग बढने लगा और वह शिकतहीन हो गयी। चारपाई से उठना किठन हो गया। वैद और डाकटर औषिघ करने लगे।
िवरयजन और सुवामा दोनो रात-िदन उसके पास बैठी रहती। िवरजन एक पल के िलए उसकी दृिष से ओझल न होती। उसे
अपने िनकट न देखकर सुशीला बेसुध-सी हो जाती और फूट-फूटकर रोने लगती। मुंशी संजीवनलाल पिहले तो धैयर के साथ
दवा करते रहे, पर जब देखा िक िकसी उपाय से कुछ लाभ नही होता और बीमारी की दशा िदन-िदन िनकृष होती जाती है तो
अंत मे उनहोने भी िनराश हो उदोग और साहस कम कर िदया। आज से कई साल पहले जब सुवामा बीमार पडी थी तब सुशीला
ने उसकी सेवा-शुशूषा मे पूणर पिरशम िकया था, अब सुवामा बीमार पडी थी तब सुशीला ने उसकी सेवा-सुशूषा मे पूणर पिरशम
िकया था,अब सुवामा की बारी आयी। उसने पडोसी और भिगनी के धमर का पालन भली-भाित िकया। रगण-सेवा मे अपने
गृहकायर को भूल-सी गई। दो-दो तीन-तीन िदन तक पताप से बोलने की नौबत न आयी। बहुधा वह िबना भोजन िकये ही सकूल
चला जाता। परनतु कभी कोई अिपय शबद मुख से न िनकालता। सुशीला की रगणावसथ ने अब उसकी देषारािगन को बहुत
कम कर िदया था। देष की अिगन देषा की उनित और दुदरशा के साथ-साथ तीवर और पजजविलत हो जाती है और उसी समय
शानत होती है जब देषा के जीवन का दीपक बुझ जाता है। िजस िदन वृजरानी को जात हो जाता िक आज पताप िबना भोजन
िकये सकूल जा रहा है, उस िदन वह काम छोडकर उसके घर दौड जाती और भोजन करने के िलए आगह करती, पर पताप
उससे बात न करता, उसे रोता छोड बाहर चला जाता। िनससंसदेह वह िवरजन को पूणरत:िनदोष समझता था, परनतु एक ऐसे
संबध को, जो वषर छ: मास मे टू ट जाने वाला हो, वह पहले ही से तोड देना चाहता था। एकानत मे बैठकर वह आप-ही-आप
फूट-फूटकर रोता, परनतु पेम के उदेग को अिधकार से बाहर न होने देता। एक िदन वह सकूल से आकर अपने कमरे मे बैठा
हुआ था िक िवरजन आयी। उसके कपोल अशु से भीगे हुए थे और वह लंबी-लंबी िससिकया ले रही थी। उसके मुख पर इस

समय कुछ ऐसी िनराशा छाई हुई थी और उसकी दृिष कुछ ऐसी करणोतपादक थी िक पताप से न रहा गया। सजल नयन
होकर बोला-‘कयो िवरजन। रो कयो रही हो ? िवरजन ने कुछ उतर न िदया, वरन और िबलख-िबलखकर रोने लगी। पताप का
गामभीयर जाता रहा। वह िनससंकोच होकर उठा और िवरजन की आंखो से आंसू पोछने लगा। िवरजन ने सवर संभालकर कहालललू अब माताजी न जीयेगी, मै कया करं ? यह कहते-कहते िफर िससिकया उभरने लगी। पताप यह समाचार सुनकर सतबध
हो गया। दौडा हुआ िवरजन के घर गया और सुशीला की चारपाई के समीप खडा होकर रोने लगा। हमारा अनत समय कैसा
धनय होता है। वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अिहतकािरयो को खीच लाता है, जो कुछ िदन पूवर हमारा मुख नही देखना चाहते थे, और
िजनहे इस शिकत के अितिरकत संसार की कोई अनय शिकत परािजत न कर सकती थी। हा यह समय ऐसा ही बलवान है और
बडे-बडे बलवान शतुओं को हमारे अधीन कर देता है। िजन पर हम कभी िवजय न पापत कर सकते थे, उन पर हमको यह
समय िवजयी बना देता है। िजन पर हम िकसी शतु से अिधकार न पा सकते थे उन पर समय और शरीर के िशकतहीन हो जाने
पर भी हमको िवजयी बना देता है। आज पूरे वषर भर पशात पताप ने इस घर मे पदापण िकया। सुशीला की आंखे बनद थी, पर
मुखमणडल ऐसा िवकिसत था, जैसे पभातकाल का कमल। आज भोर ही से वह रट लगाये हुए थी िक लललू को िदखा दो।
सुवामा ने इसीिलए िवरजन को भेजा था। सुवामा ने कहा-बिहन। आंखे खोलो। लललू खडा है। सुशीला ने आंखे खोल दी और
दोनो हाथ पेम-बाहुलय से फैला िदये। पताप के हृदय से िवरोध का अिनतम िचहृन भी िवलीन हो गया। यिद ऐसे काल मे भी कोई
मतसर का मैल रहने दे, तो वह मनुषय कहलाने का हकदार नही है। पताप सचचे पुततव-भाव से आगे बढा और सुशीला के पेमाक
मे जा िलपटा। दोनो आधे घंणटे तक रोते रहे। सुशीला उसे अपने दोनो बाहो मे इस पकार दबाये हुए थी मानो वह कही भागा जा
रहा है। वह इस समय अपने को सैकडो िघकार दे रहा था िक मै ही इस दुिखया का पाणहारी हूं। मैने ही देष-दुरावेग के वशीभूत
होकर इसे इस गित को पहंुचाया है। मै ही इस पेम की मूितर का नाशक हं।
ू जयो-जयो यह भावना उसके मन मे उठती, उसकी
आंखो से आंसू बहते। िनदान सुशीला बोली-लललू। अब मै दो-एक िदन की ओर मेहमान हूं। मेरा जो कुछ कहा-सुना हो, कमा
करो। पताप का सवर उसके वश मे न था, इसिलए उसने कुछ उतर न िदया। सुशीला िफर बोली-न जाने कयो तुम मुझसे रष
हो। तुम हमारे घर नही आते। हमसे बोलते नही। जी तुमहे पयार करने को तरस-तरसकर रह जाता है। पर तुम मेरी तिनक भी
सुिध नही लेते। बताओं, अपनी दुिखया चाची से कयो रष हो ? ईशर जानता है, मै तुमको सदा अपना लडका समझती रही।
तुमहे देखकर मेरी छाती फूल उठती थी। यह कहते-कहते िनबरलता के कारण उसकी बोली धीमी हो गयी, जैसे िकितज के
अथाह िवसतार मे उडनेवाले पकी की बोली पितकण मधयम होती जाती है-यहा तक िक उसके शबद का धयानमात शेष रह जाता
है। इसी पकार सुशीला की बोली धीमी होते-होते केवल साय-साय रह गयी।
सुशीला की मृतयु / पेमचंद
तीन िदन और बीते, सुशीला के जीने की अब कोई संभावना न रही। तीनो िदन मुंशी संजीवनलाल उसके पास बैठे उसको
सानतवना देते रहे। वह तिनक देर के िलए भी वहा से िकसी काम के िलए चले जाते, तो वह वयाकुल होने लगती और रो-रोकर
कहने लगती-मुझे छोडकर कही चले गये। उनको नेतो के सममुख देखकर भी उसे संतोष न होता। रह-रहकर उतावलेपन से
उनका हाथ पकड लेती और िनराश भाव से कहती-मुझे छोडकर कही चले तो नही जाओगे ? मुंशीजी यदिप बडे दृढ-िचत मनुषय
थे, तथािप ऐसी बाते सुनकयर आदरनेत हो जाते। थोडी-थोडी देर मे सुशीला को मूछा-सी आ जाती। िफर चौकती तो इधरउधर भौजकी-सी देखने लगती। वे कहा गये? कया छोडकर चले गये ? िकसी-िकसी बार मूछा का इतना पकोप होता िक
मुनशीजी बार-बार कहते-मै यही हूं,घबराओं नही। पर उसे िवशास न आता। उनही की ओर ताकती और पूछती िक –कहा है ?
यहा तो नही है। कहा चले गये ? थोडी देर मे जब चेत हो जाता तो चुप रह जाती और रोने लगती। तीनो िदन उसने िवरजन,
सुवामा, पताप एक की भी सुिध न की। वे सब-के-सब हर घडी उसी के पास खडे रहते, पर ऐसा जान पडता था, मानो वह
मुशीजी के अितिरकत और िकसी को पहचानती ही नही है। जब िवरजन बैचैन हो जाती और गले मे हाथ डालकर रोने लगती,
तो वह तिनक आंख खोल देती और पूछती-‘कौन है, िवरजन ? बस और कुछ न पूछती। जैसे, सूम के हृदय मे मरते समय अपने
गडे हुए धन के िसवाय और िकसी बात का धयान नही रहयता उसी पकार िहनदू-सती अनत समय मे पित के अितिरकत और
िकसी का धयान नही कर सकती। कभी-कभी सुशीला चौक पडती और िविसमत होकर पूछती-‘अरे। यह कौन खडा है ? यह

कौन भागा जा रहा है ? उनहे कयो ले जाते है ? ना मै न जाने दूंगी। यह कहकर मुंशीजी के दोनो हाथ पकड लेती। एक पल मे
जब होश आ जाता, तो लिजजत होकर कहती....’मै सपना देख रही थी, जैसे कोई तुमहे िलये जा रहा था। देखो, तुमहे हमारी
सौहं है, कही जाना नही। न जाने कहा ले जायेगा, िफर तुमहे कैसे देखूंगी ? मुनशीजी का कलेजा मसोसने लगता। उसकी ओर
पित करणा-भरी सनेह-दृिष डालकर बोलते-‘नही, मै न जाउंगा। तुमहे छोडकर कहा जाउंगा ? सुवामा उसकी दशा देखती और
रोती िक अब यह दीपक बुझा ही चाहता है। अवसथा ने उसकी लजजा दूर कर दी थी। मुनशीजी के सममुख घंटो मुंह खोले
खडी रहती। चौथे िदन सुशीला की दशा संभल गयी। मुनशीजी को िवशास हो गया, बस यह अिनतम समय है। दीपक बुझने के
पहले भभक उठता है। पात:काल जब मुंह धोकर वे घर मे आये, तो सुशीला ने संकेत दारा उनहे अपने पास बुलाया और
कहा-‘मुझे अपने हाथ से थोडा-सा पानी िपला दो’’। आज वह सचेत थी। उसने िवरजन, पताप, सुवामा सबको भली-भाित
पिहचाना। वह िवरजन को बडी देर तक छाती से लगाये रोती रही। जब पानी पी चुकी तो सुवामा से बोली-‘बिहन। तिनक
हमको उठाकर िबठा दो, सवामी जी के चरण छू ं लूं। िफर न जाने कब इन चरणो के दशरन होगे। सुवामा ने रोते हुए अपने हाथो
से सहारा देकर उसे तिनक उठा िदया। पताप और िवरजन सामने खडे थे। सुशीला ने मुनशीजी से कहा-‘मेरे समीप आ
जाओ’। मुनशीजी पेम और करणा से िवहृल होकर उसके गले से िलपट गये और गदगद सवर मे बोले-‘घबराओ नही, ईशर
चाहेगा तो तुम अचछी हो जाओगी’। सुशीला ने िनराश भाव से कहा-‘हॉ’ आज अचछी हो जाउंगी। जरा अपना पैर बढा दो। मै
माथे लगा लूं। मुनशीजी िहचिकचाते रहे। सुवामा रोते हुए बोली-‘पैर बढा दीिजए, इनकी इचछा पूरी हो जाये। तब मुंशीजी ने
चरण बढा िदये। सुशीला ने उनहे दोनो हाथो मे पकड कर कई बार चूमा। िफर उन पर हाथ रखकर रोने लगी। थोडे ही देर मे
दोनो चरण उषण जल-कणो से भीग गये। पितवरता सती ने पेम के मोती पित के चरणो पर िनछोवर कर िदये। जब आवाज संभली
तो उसने िवरजन का एक हाथ थाम कर मुनशीजी के हाथ मे िदया और अित मनद सवर मे कहा-सवामीजी। आपके संग बहुत िदन
रही और जीवन का परम सुख भोगा। अब पेम का नाता टू टता है। अब मै पल-भर की और अितिथ हूं। पयारी िवरजन को तुमहे
सौप जाती हं।
ू मेरा यही िचहृन है। इस पर सदा दया-दृिष रखना। मेरे भागय मे पयारी पुती का सुख देखना नही बदा था। इसे
मैने कभी कोई कटु वचन नही कहा, कभी कठोर दृिष से नही देखा। यह मरे जीवन का फल है। ईशर के िलए तुम इसकी ओर
से बेसुध न हो जाना। यह कहते-कहते िहचिकया बंध गयी और मूछा-सी आ गयी। जब कुछ अवकाश हआ तो उसने सुवामा के
सममुख हाथ जोडे और रोकर कहा- ‘बिहन’। िवरजन तुमहारे समपरण है। तुमही उसकी मता हो। लललू। पयारे। ईशर करे तुम
जुग-जुग जीओ। अपनी िवरजन को भूलना मत। यह तुमहारी दीना और मातृहीना बिहन है। तुममे उसके पाण बसते है। उसे
रलाना मत, उसे कुढाना मत, उसे कभी कठोर वचन मत कहना। उससे कभी न रठना। उसकी ओर से बेसुध न होना, नही
तो वह रो-रो कर पाण दे देगी। उसके भागय मे न जाने कया बदा है, पर तुम उसे अपनी सगी बिहन समझकर सदा ढाढस देते
रहना। मै थोडी देर मे तुम लोगो को छोडकर चली जाऊंगी, पर तुमहे मेरी सोह, उसकी ओर से मन मोटा न करना तुमही उसका
बेडा पार लगाओगे। मेरे मन मे बडी-बडी अिभलाषाएं थी, मेरी लालसा थी िक तुमहारा बयाह करंगी, तुमहारे बचचे को िखलाउंगी।
पर भागय मे कुछ और ही बदा था। यह कहते-कहते वह िफर अचेत हो गयी। सारा घर रो रहा था। महिरया, महरािजने सब
उसकी पशंसा कर रही थी िक सती नही, देवी थी। रिधया-इतने िदन टहल करते हुए, पर कभी कठोर वचन न कहा।
महरािजन-हमको बेटी की भाित मानती थी। भोजन कैसा ही बना दूं पर कभी नाराज नही हुई। जब बाते करती, मुसकरा के।
महराज जब आते तो उनहे जरर सीधा िदलवाती थी। सब इसी पकार की बाते कर रहे थे। दोपहर का समय हुआ। महरािजन
ने भोजन बनाया, परनतु खाता कौन ? बहुत हठ करने पर मुंशीजी गये और नाम करके चले आये। पताप चौके पर गया भी
नही। िवरजन और सुवामा को गले लगाती, कभी पताप को चूमती और कभी अपनी बीती कह-कहकर रोती। तीसरे पहर उसने
सब नौकरो को बुलाया और उनसे अपराध कमा कराया। जब वे सब चले गये तब सुशीला ने सुवामा से कहा- बिहन पयास बहुत
लगती है। उनसे कह दो अपने हाथ से थोडा-सा पानी िपला दे। मुंशीजी पानी लाये। सुशीला ने किठनता से एक घूंट पानी
कणठ से नीचे उतारा और ऐसा पतीत हुआ, मानो िकसी ने उसे अमृत िपला िदया हो। उसका मुख उजजवल हो गया आंखो मे
जल भर आया। पित के गले मे हाथ डालकर बोली—मै ऐसी भागयशािलनी हंू िक तुमहारी गोद मे मरती हं।
ू यह कहकर वह चुप
हो गयी, मानो कोई बात कहना ही चाहती है, पर संकोच से नही कहती। थोडी देर पशात् उसने िफर मुंशीजी का हाथ पकड
िलया और कहा-‘यिद तुमसे कुछ मागू,तो दोगे ? मुंशीजी ने िविसमत होकर कहा-तुमहारे िलए मागने की आवशयकता है?

िन:संकोच कहो। सुशीला-तुम मेरी बात कभी नही टालते थे। मुनशीजी-मरते दम तक कभी न टालूंगा। सुशीला-डर लगता है,
कही न मानो तो... मुनशीजी-तुमहारी बात और मै न मानूं ? सुशीला-मै तुमको न छोडू ंगी। एक बात बतला दो-िसलली(सुशीला)मर
जायेगी, तो उसे भूल जाओगे ? मुनशीजी-ऐसी बात न कहो, देखो िवरजन रोती है। सुशीला-बतलाओं, मुझे भूलोगे तो नही ?
मुनशीजी-कभी नही। सुशीला ने अपने सूखे कपोल मुशीजी के अधरो पर रख िदये और दोनो बाहे उनके गले मे डाल दी। िफर
िवरजन को िनकट बुलाकर धीरे-धीरे समझाने लगी-देखो बेटी। लालाजी का कहना हर घडी मानना, उनकी सेवा मन लगाकर
करना। गृह का सारा भर अब तुमहारे ही माथे है। अब तुमहे कौन सभालेगा ? यह कह कर उसने सवामी की ओर करणापूणर
नेतो से देखा और कहा- मै अपने मन की बात नही कहने पायी, जी डू बा जाता है। मुनशीजी-तुम वयथर असमंजस मे पडी हो।
सुशीला-तुम मरे हो िक नही ? मुनशीजी-तुमहारा और आमरण तुमहारा। सुशीला- ऐसा न हो िक तुम मुझे भूल जाओं और जो वसतु
मेरी थी वह अनय के हाथ मे चली जाए। सुशीला ने िवरजन को िफर बुलाया और उसे वह छाती से लगाना ही चाहती थी िक
मूिछरत हो गई। िवरजन और पताप रोने लगे। मुंशीजी ने कापते हुए सुशीला के हृदय पर हाथ रखा। सास धीरे-धीरे चल रही
थी। महरािजन को बुलाकर कहा-अब इनहे भूिम पर िलटा दो। यह कह कर रोने लगे। महरािजन और सुवामा ने िमलकर
सुशीला को पृथवी पर िलटा िदया। तपेिदक ने हिडडया तक सुखा डाली थी। अंधेरा हो चला था। सारे गृह मे शोकमय और
भयावह सनाटा छाया हुआ था। रोनेवाले रोते थे, पर कणठ बाध-बाधकर। बाते होती थी, पर दबे सवरो से। सुशीला भूिम पर
पडी हुई थी। वह सुकुमार अंग जो कभी माता के अंग मे पला, कभी पेमाक मे पौढा, कभी फूलो की सेज पर सोया, इस समय
भूिम पर पडा हुआ था। अभी तक नाडी मनद-मनद गित से चल रही थी। मुंशीजी शोक और िनराशानद मे मगन उसके िसर की
ओर बैठे हुए थे। अकससमात् उसने िसर उठाया और दोनो हाथो से मुंशीजी का चरण पकड िलया। पाण उड गये। दोनो कर
उनके चरण का मणडल बाधे ही रहे। यह उसके जीवन की अंितम िकया थी। रोनेवालो, रोओ। कयोिक तुम रोने के अितिरकत
कर ही कया सकते हो? तुमहे इस समय कोई िकतनी ही सानतवना दे, पर तुमहारे नेत अशु-पवाह को न रोक सकेगे। रोना तुमहारा
कतरवय है। जीवन मे रोने के अवसर कदािचत िमलते है। कया इस समय तुमहारे नेत शुषक हो जायेगे ? आंसुओं के तार बंधे हुए
थे, िससिकयो के शबद आ रहे थे िक महरािजन दीपक जलाकर घर मे लायी। थोडी देर पिहले सुशीला के जीवन का दीपक बुझ
चुका था।
िवरजन की िवदा / पेमचंद
राधाचरण रडकी कालेज से िनकलते ही मुरादाबाद के इंजीिनयर िनयुकत हुए और चनदा उनके संग मुरादाबाद को चली।
पेमवती ने बहुत रोकना चाहा, पर जानेवाले को कौन रोक सकता है। सेवती कब की ससुराल आ चुकी थी। यहा घर मे अकेली
पेमवती रह गई। उसके िसर घर का काम-काज पडा। िनदान यह राय हुई िक िवरजन के गौने का संदेशा भेजा जाए। िडपटी
साहब सहमत न थे, परनतु घर के कामो मे पेमवती ही की बात चलती थी। संजीवनलाल ने संदेशा सवीकार कर िलया। कुछ
िदनो से वे तीथरयाता का िवचार कर रहे थे। उनहोने कम-कम से सासािरक संबध
ं तयाग कर िदये थे। िदन-भर घर मे आसन
मारे भगवदगीता और योगवािशष आिद जान-संबिनधनी पुसतको का अधययन िकया करते थे। संधया होते ही गंगा-सनान को चले
जाते थे। वहा से राित गये लौटते और थोडा-सा भोजन करके सो जाते। पाय: पतापचनद भी उनके संग गंगा-सनान को जाता।
यदिप उसकी आयु सोलह वषर की भी न थी, पर कुछ तो यिनज सवभाव, कुछ पैतृक संसकार और कुछ संगित के पभाव से उसे
अभी से वैजािनक िवषयो पर मनन और िवचार करने मे बडा आननद पापत होता था। जान तथा ईशर संबिनधनी बाते सुनते-सुनते
उसकी पवृित भी भिकत की ओर चली थी, और िकसी-िकसी समय मुनशीजी से ऐसे सूकम िवषयो पर िववाद करता िक वे िविसमत
हो जाते। वृजरानी पर सुवामा की िशका का उससे भी गहरा पभाव पडा था िजतना िक पतापचनद पर मुनशीजी की संगित और
िशका का। उसका पनदहवा वषर था। इस आयु मे नयी उमंगे तरंिगत होती है और िचतवन मे सरलता चंचलता की तरह मनोहर
रसीलापन बरसने लगता है। परनतु वृजरानी अभी वही भोली-भाली बािलका थी। उसके मुख पर हृदय के पिवत भाव झलकते
थे और वातालाप मे मनोहािरणी मधुरता उतपन हो गयी थी। पात:काल उठती और सबसे पथम मुनशीजी का कमरा साफ करके,
उनके पूजा-पाठ की सामगी यथोिचत रीित से रख देती। िफर रसोई घर के धनधे मे लग जाती। दोपहर का समय उसके

िलखने -पढने का था। सुवामा पर उसका िजतना पेम और िजतनी शदा थी, उतनी अपनी माता पर भी न रही होगी। उसकी
इचछा िवरजन के िलए आजा से कम न थी।
सुवामा की तो सममित थी िक अभी िवदाई न की जाए। पर मुनशीजी के हठ से िवदाई की तैयािरया होने लगी। जयो-जयो वह
िवपित की घडी िनकट आती, िवरजन की वयाकुलता बढती जाती थी। रात-िदन रोया करती। कभी िपता के चरणो मे पडती
और कभी सुवामा के पदो मे िलपट जाती। पार िववािहता कनया पराये घर की हो जाती है, उस पर िकसी का कया अिधकार।
पतापचनद और िवरजन िकतने ही िदनो तक भाई-बहन की भाित एक साथ रहे। पर जब िवरजन की आंखे उसे देखते ही नीचे
को झुक जाती थी। पताप की भी यही दशा थी। घर मे बहुत कम आता था। आवशयकतावश आया, तो इस पकार दृिष नीचे
िकए हुए और िसमटे हुए, मानो दुलिहन है। उसकी दृिष मे वह पेम-रहसय िछपा हुआ था, िजसे वह िकसी मनुषय-यहा तक िक
िवरजन पर भी पकट नही करना चाहता था। एक िदन सनधया का समय था। िवदाई को केवल तीन िदन रह गये थे। पताप
िकसी काम से भीतर गया और अपने घर मे लैमप जलाने लगा िक िवरजन आयी। उसका अंचल आंसुओं से भीगा हुआ था।
उसने आज दो वषर के अननतर पताप की ओर सजल-नेत से देखा और कहा-लललू। मुझसे कैसे सहा जाएगा ?
पताप के नेतो मे आंसू न आये। उसका सवर भारी न हुआ। उसने सुदृढ भाव से कहा-ईशर तुमहे धैयर धारण करने की शिकत
देगे। िवरजन का िसर झुक गया। आंखे पृथवी मे पड गयी और एक िससकी ने हृदय-वेदना की यह अगाध कथा वणरन की,
िजसका होना वाणी दारा असंभव था। िवदाई का िदन लडिकयो के िलए िकतना शोकमय होता है। बचपन की सब सिखयोसहेिलयो, माता-िपता, भाई-बनधु से नाता टू ट जाता है। यह िवचार िक मै िफर भी इस घर मे आ सकूंगी, उसे तिनक भी संतोष
नही देता। कयो अब वह आयेगी तो अितिथभाव से आयेगी। उन लोगो से िवलग होना, िजनके साथ जीवनोदान मे खेलना और
सवातंदतय-वािटका मे भमण करना उपलबध हुआ हो, उसके हृदय को िवदीणर कर देता है। आज से उसके िसर पर ऐसा भार
पडता है, जो आमरण उठाना पडेगा।
िवरजन का शृगार िकया जा रहा था। नाइन उसके हाथो व पैरो मे मेहदी रचा रही थी। कोई उसके बाल गूंथ रही थी। कोई
जुडे मे सुगनध बसा रही थी। पर िजसके िलये ये तैयािरया हो रही थी, वह भूिम पर मोती के दाने िबखेर रही थी। इतने मे बारह
से संदेशा आया िक मुहूरत टला जाता है, जलदी करो। सुवामा पास खडी थी। िवरजन, उसके गले िलपट गयी और अशु-पवाह
का आंतक, जो अब तक दबी हुई अिगन की नाई सुलग रहा था, अकसमात् ऐसा भडक उठा मानो िकसी ने आग मे तेल डाल
िदया है।
थोडी देर मे पालकी दार पर आयी। िवरजन पडोस की िसतयो से गले िमली। सुवामा के चरण छुए, तब दो-तीन िसितयो ने उसे
पालकी के भीतर िबठा िदया। उधर पालकी उठी, इधर सुवामा मूिचछरत हो भूिम पर िगर पडी, मानो उसके जीते ही कोई उसका
पाण िनकालकर िलये जाता था। घर सूना हो गया। सैकंडो िसतया का जमघट था, परनतु एक िवरजन के िबना घर फाडे खाता
था।
कमलाचरण के िमत / पेमचंद
जैसे िसनदूर की लािलमा से माग रच जाती है, जैसे ही िवरजन के आने से पेमवती के घर की रौनक बढ गयी। सुवामा ने उसे
ऐसे गुण िसखाये थे िक िजसने उसे देखा, मोह गया। यहा तक िक सेवती की सहेली रानी को भी पेमवती के सममुख सवीकार
करना पडा िक तुमहारी छोटी बहू ने हम सबो का रंग फीका कर िदया। सेवती उससे िदन-िदन भर बाते करती और उसका जी
न ऊबता। उसे अपने गाने पर अिभमान था, पर इस केत मे भी िवरजन बाजी ले गयी। अब कमलाचरण के िमतो ने आगह
करना शुर िकया िक भाई, नई दुलिहन घर मे लाये हो, कुछ िमतो की भी िफक करो। सुनते है परम सुनदरी पाये हो।
कमलाचरण को रपये तो ससुराल से िमले ही थे, जेब खनखनाकर बोले-अजी, दावत लो। शराबे उडाओ। हॉ, बहुत शोरगुल न
मचाना, नही तो कही भीतर खबर होगी तो समझेगे िक ये गुणडे है। जब से वह घर मे आयी है, मेरे तो होश उडे हुए है। कहता
हूं, अंगेजी, फारसी, संसकृत, अलम-गलम सभी घोटे बैठी है। डरता हूं कही अंगेजी मे कुछ पूछ बैठी, या फारसी मे बाते करने
लगे, मुहॅ ताकने के िसवाय और कया करंगा ? इसिलए अभी जी बचाता िफरता हूं। यो तो कमलाचरण के िमतो की संखया

अपिरिमत थी। नगर के िजतने कबूतर-बाज, कनकौएबाजा गुणडे थे सब उनके िमत परनतु सचचे िमतो मे केवल पाच महाशय थे
और सभी-के-सभी फाकेमसत िछछोरे थे। उनमे सबसे अिधक िशिकत िमया मजीद थे। ये कचहरी मे अरायज िकया करते थे।
जो कुछ िमलता, वह सब शराब मे भेट करते। दूसरा नमबर हमीदंखा का था। इन महाशय ने बहुत पैतृक संपित पायी थी, परनतु
तीन वषर मे सब कुछ िवलास मे लुटा दी। अब यह ढंग था िक साय को सज-धजकर गािलयो मे धूल फॉकते िफरते थे। तीसरे
हजरत सैयद हुसैन थे-पके जुआरी, नाल के परम भकत, सैकंडो के दाव लगाने वाले, सती गहनो पर हाथ मॉजना तो िनतय का
इनका काम था। शेष दो महाशय रामसेवकलालल और चनहदूलाल कचहरी मे नौकर थे। वेतन कम, पर ऊपरी आमदनी बहुत
थी। आधी सुरापान की भेट करते, आधी भोग-िवलास मे उडाते। घर मे लोग भूखे मरे या िभका मॉगे, इनहे केवल अपने सुख से
काम था। सलाह तो हो चुकी थी। आठ बजे जब िडपटी साहब लेटे तो ये पॉचो जने एकत हुए और शराब के दौर चलने लगे।
पॉचो पीने मे अभयसत थे। अब नशे का रंग जमा,बहक-बहककर बाते करने लगे। मजीद-कयो भाई कमलाचरण, सच कहना,
सती को देखकर जी खुश हो गया िक नही ? कमला-अब आप बहकने लगे कयो ? रामसेवक-बतला कयो नही देते, इसमे झेपने
की कौन-सी बात है ? कमला-बतला कया अपना िसर दूं, कभी सामने जाने का संयोग भी तो हुआ हो। कल िकवाड की दरार से
एक बार देख िलया था, अभी तक िचत ऑखो पर िफर रहा है। चनदूलाल-िमत, तुम बडे भागयवान हो। कमला-ऐसा वयाकुल
हुआ िक िगरते-िगरते बचा। बस, परी समझ लो। मजीद-तो भई, यह दोसती िकस िदन काम आयेगी। एक नजर हमे भी
िदखाओं। सैयद-बेशक दोसती के यही मानी है िक आपस मे कोई पदा न रहे। चनदूलाल-दोसती मे कया पदा ? अंगेजो को
देखो,बीबी डोली से उतरी नही िक यार दोसत हाथ िमलाने लगे। रामसेवक-मुझे तो िबना देखे चैन न आयेगा ? कमला-(एक धप
लगा कर) जीभ काट ली जायेगी, समझे ? रामसेवक-कोई िचनता नही, ऑखे तो देखने को रहेगी। मजीद-भई कमलाचरण, बुरा
मानने की बात नही, अब इस वकत तुमहारा फजर है िक दोसतो की फरमाइश पूरी करो। कमला-अरे। तो मै नही कब करता हंू ?
चनदूलाल-वाह मेरे शेर। ये ही मदों की सी बाते है। तो हम लोग बन-ठनकर आ जायॅ , कयो ? कमला-जी, जरा मुंह मे कािलख
लगा लीिजयेगा। बस इतना बहुत है। सैयद-तो आज ही ठहरी न। इधर तो शराब उड रही थी, उधर िवरजन पलंग पर लेटी हुई
िवचार मे मगन हो रही थी। बचपन के िदन भी कैसे अचछे होते है। यिद वे िदन एक बार िफर आ जाते। ओह। कैसा मनौहर
जीवन था। संसार पेम और पीित की खान थी। कया वह कोई अनय संसार था ? कया उन िदनो संसार की वसतुए बहुत सुनदर
होती थी ? इनही िवचारो मे ऑख झपक गयी और बचपन की एक घटना आंखो के सामने आ गयी। लललू ने उसकी गुिडया
मरोड दी। उसने उसकी िकताब के दो पने फाड िदये। तब लललू ने उसकी पीठ मं जोर से चुटकी ली, बाहर भागा। वह रोने
लगी और लललू को कोस रही थी िक सवामा उसका हाथ पकडे आयी और बोली-कयो बेटी इसने तुमहे मारा है न ? यह बहुत
मार-मार कर भागता है। आज इसकी खबर लेती हं, देखूं कहा मारा है। लललू ने डबडबायी ऑखो से िवरजन की ओर देखा।
तब िवरजन ने मुसकरा कर कहा-मुझे उनहाने कहॉ मारा है। ये मुझे कभी नही मारते। यह कहकर उसका हाथ पकड िलया।
अपने िहससे की िमठाई िखलाई और िफर दोनो िमलकर खेलने लगे। वह समय अब कहा 9 राित अिधक बीत गयी थी,
अचानक िवरजन को जान पडा िक कोई सामने वाली दीवार धमधमा रहा है। उसने कान लगाकर सुना। बराबर शबद आ रहे
थे। कभी रक जाते िफर सुनायी देते। थोडी देर मे िमटी िगरन लगी। डर के मारे िवरजन के हाथ-पाव फूलने लगे। कलेजा
धक-धक करने लगा। जी कडा करके उठी और महरािजन चतर सती थी। समझी िक िचललाऊंगी तो जाग हो जायेगी। उसने
सुन रखा था िक चोर पिहले सेध मे पाव डालकर देखते है तब आप घुसते है। उसने एक डंडा उठा िलया िक जब पैर डालेगा तो
ऐसा तानकर मारंगी िक टॉग टू ट जाएगी। पर चोर न पाव के सथन पर िसर रख िदया। महरािजन घात मं थी ही डंडा चला
िदया। खटक की आवाज आयी। चोर न झट िसंर खीच िलया और कहता हुआ सुनायी िदया-‘उफ मार डाला, खोपडी झना
गयी’। िफर कई मनुषयो के हॅसने की धविन आयी और ततपशात सनाटा हो गया। इतने मे और लोग भी जाग पडे और शेष राित
बातचीत मे वयतीत हुई। पात:काल जब कमलाचरण घर मं आये, तो नेत लाल थे और िसर मे सूजन थी। महरािजम ने िनकट
जाकर देखा, िफर आकर िवरजन से कहा-बहू एक बात कहूं। बुरा तो न मानोगी ? िवरजन – बुरा कयो मानूगी, कहो कया कहती
हो? महरािजन – रात को सेध पडी थी वह चोरो ने नही लगायी थी। िवरजन –िफर कौन था? महरािजन – घर ही के भेदी थे।
बाहरी कोई न था। िवरजन – कया िकसी कहारन की शरारत थी? महरािजन – नही, कहारो मे कोई ऐसा नही है। िवरजन –
िफर कौन था, सपष कयो नही कहती? महारािजन – मेरी जान मे तो छोटे बाबू थे। मैने जो लकडी मारी थी, वह उनके िसर मे

लगी। िसर फूला हुआ है। इतना सुनते ही िवरजन की भृकुटी चढ गयी। मुखमंडल अरण हो आया। कुद होकर बोली –
महरािजन, होश संभालकर बाते करो। तुमहे यह कहते हुए लाज नही आती? तमहे मेरे सममुख ऐसी बात कहने का साहस कैसे
हुआ? साकात् मेरे ऊपर कलंक का टीका लगा रही हो। तुमहारे बुढापे पर दया आती है, नही तो अभी तुमहे यहा से खडे-खडे
िनकलवा देती। तब तुमहे िविदत होता िक जीभ को वश मे न रखने का कया फल होता है! यहा से उठ जाओ, मुझे तुमहारा मुंह
देखकर जवर-सा चढ रहा है। तुमहे इतना न समझ् पडा िक मै कैसा वाकय मुंह से िनकाल रही हं।
ू उनहे ईशर ने कया नही िदया
है? सारा घर उनका है। मेरा जो कुछ है, उनका है। मै सवयं उनकी चेरी हूं। उनके संबध
ं मे तुम ऐसी बात कह बैठी। परनतु
िजस बात पर िवरजन इतनी कुद हुई, उसी बात पर घर के और लोगो को िवशवास हो गया। िडपटी साहब के कान मे भी बात
पहंुची। वे कमलाचरण को उससे अिधक दुष-पकृित समझते थे, िजतना वह था। भय हुआ िक कही यह महाशय बहू के गहनो
पर न हाथ बढाये: अचछा हो िक इनहे छातालय मे भेज दूं। कमलाचरण ने यह उपाय सुना तो बहुत छटपटाया, पर कुछ सोच
कर छातालय चला गया। िवरजन के आगमन से पूवर कई बार यह सलाह हुई थी, पर कमला के हठ के आगे एक भी न चलती
थी। यह सती की दृिष मे िगर जाने का भय था, जो अब की बार उसे छातालय ले गया।
कायापलट / पेमचंद
पहला िदन तो कमलाचरण ने िकसी पकार छातालय मे काटा। पात: से सायंकाल तक सोया िकये। दूसरे िदन धयान आया िक
आज नवाब साहब और तोखे िमजा के बटेरो मे बढाऊ जोड है। कैस-े कैसे मसत पटे है! आज उनकी पकड देखने के योगय
होगी। सारा नगर फट पडे तो आशयर नही। कया िदललगी है िक नगर के लोग तो आनंद उडाये और मै पडा रोऊं। यह सोचतेसोचते उठा और बात-की-बात मे अखाडे मे था।
यहा आज बडी भीड थी। एक मेला-सा लगा हुआ था। भीशती िछडकाव कर रहे थे, िसगरेट, खोमचे वाले और तमबोली सब
अपनी-अपनी दुकान लगाये बैठे थे। नगर के मनचले युवक अपने हाथो मे बटेर िलये या मखमली अडडो पर बुलबुलो को बैठाये
मटरगशती कर रहे थे कमलाचरण के िमतो की यहा कया कमी थी? लोग उनहे खाली हाथ देखते तो पूछते – अरे राजा साहब!
आज खाली हाथ कैस?
े इतने मे िमया, सैयद मजीद, हमीद आिद नशे मे चूर, िसगरेट के धुऐ ं भकाभक उडाते दीख पडे।
कमलाचरण को देखते ही सब-के-सब सरपट दौडे और उससे िलपट गये। मजीद – अब तुम कहा गायब हो गये थे यार, कुरान
की कसम मकान के सैकडो चकर लगाये होगे। रामसेवक – आजकल आनंद की राते है, भाई! आंखे नही देखते हो, नशा-सा
चढा हुआ है। चनदुलाल – चैन कर रहा है पटा। जब से सुनदरी घर मे आयी, उसने बाजार की सूरत तक नही देखी। जब
देखीये, घर मे घुसा रहता है। खूब चैन कर ले यार! कमला – चैन कया खाक करं ? यहा तो कैद मे फंस गया। तीन िदन से
बोिडरगं मे पडा हुआ हूं। मजीद - अरे! खुदा की कसम? कमला – सच कहता हूं, परसो से िमटी पलीद हो रही है। आज सबकी
आंख बचाकर िनकल भागा। रामसेवक – खूब उडे। वह मुछंदर सुपिरणटेणडणट झलला रहा होगा। कमला – यह माके का जोड
छोडकर िकताबो मे िसर कौन मारता। सैयद – यार, आज उड आये तो कया? सच तो यह है िक तुमहारा वहा रहना आफत है।
रोज तो न आ सकोगे? और यहा आये िदन नयी सैर, नयी-नयी बहारे, कल लाला िडगगी पर, परसो पेट पर, नरसो बेडो का मेलाकहा तक िगनाऊं, तुमहारा जाना बुरा हुआ। कमला – कल की कटाव तो मै जरर देखूंगा, चाहे इधर की दुिनया उधर हो जाय।
सैयद – और बेडो का मेला न देखा तो कुछ न देखा। तीसरे पहर कमलाचरण िमतो से िबदा होकर उदास मन छातालय की ओर
चला। मन मे एक चोर-सा बैठा हुआ था। दार पर पहंुचकर झाकने लगािक सुपिरणटेणडेणट साहब न हो तो लतपककर कमरे मे
हो रहूं। तो यह देखता है िक वह भी बाहर ही की ओर आ रहे है। िचत को भली-भाित दृढ करके भीतर पैठा। सुिरणटेणडेणट
साहब ने पूछा – अब तक हा थे? ‘एक काम से बाजार गया था’। ‘यह बाजार जाने का समय नही है’। ‘मुझे जात नही था, अब
धयान रखूंग को जब कमला चारपाई पर लेटा तो सोचने लगा – यार, आज तो बच गया, पर उतम तभी हो िक कल बचूं। और
परसो भी महाशय की आंख मे धूल डालूं। कल का दृशय वसतुत:दशरनीय होगा। पतंग आकाश मे बाते करेगे और लमबे-लमबे पेच
होगे। यह धयान करते-करते सो गया। दूसरे िदन पात: काल छातालय से िनकल भागा। सुहृदगण लाल िडगगी पर उसकी
पतीका कर रहे थे। देखते ही गदगद् हो गये और पीठ ठोकी। कमलाचरण कुछ देर तक तो कटाव देखता रहा। िफर शौक
चराया िक कयो न मै भी अपने कनकौए मंगाऊं और अपने हाथो की सफाई िदखलाऊं। सैयद ने भडकाया, बद-बदकर

लडाओ। रपये हम देगे।चट घर पर आदमी दौडा िदया। पूरा िवशास था िक अपने माझे से सबको परासत कर दूंगा। परनतु
जब आदमी घर से खाली हाथ आया, तब तो उसकी देह मे आग-सी-लग गयी। हणटर लेकर दौडा और घर पहंुचते ही कहारो को
एक ओर से सटर-सटर पीटना आरंभ िकया। बेचारे बैठे हुका: तमाखू कर रहे थे। िनरपराध अचानक हणटर पडे तो िचललािचललाकर रोने लेगे। सारे मुहलले मे एक कोलाहल मच गया। िकसी को समझ ही मे न आया िक हमारा कया दोष है? वहा
कहारो का भली-भाित सतकार करके कमलाचरण अपने कमरे मे पहंुचा। परनतु वहा की दुदरशा देखकर कोध और भी पजजविलत
हो गया। पतंग फटे हुए थे, चिखरया टू टी हुई थी, माझे लिचछया उलझ् पडी थी, मानो िकसी आपित ने इन यवन योदाओं का
सतयानाश कर िदया था। समझ गया िक अवशय यह माताजी की करतूत है। कोध से लाल माता के पास गया और उचच सवर
से बोला – कया मा! तुम सचमुच मेरे पाण ही लेने पर आ गयी हो? तीन िदन हुए कारागार मे िभजवाया पर इतने पर भी िचत को
संतोष न हुआ। मेरे िवनोद की सामिगयो को नष कर डाला कयो? पेमवती – (िवसमय से) मैने तुमहारी कोई चीज नही छुई! कया
हुआ? कमला – (िबगडकर) झूठो के मुख मे कीडे पडते है। तुमने मेरी वसतुए ं नही छुई तो िकसको साहस है जो मेरे कमरे मे
जाकर मेरे कनकौए और चिखरया सब तोड-फोड डाले, कया इतना भी नही देखा जाता। पेमवती – ईशर साकी है। मैने तुमहारे
कमरे मे पाव भी नही रखा। चलो, देखूं कौन-कौन चीजे टू टी है। यह कहकर पेमवती तो इस कमरे की ओर चली और कमला
कोध से भरा आंगन मे खडा रहा िक इतने मे माधवी िवरजन के कमरे से िनकली और उसके हाथ मे एक िचटी देकर चली गयी।
िलखा हुआ था- ‘अपराध मैने िकया है। अपरािधन मै हूं। जो दणड चाहे दीिजए’। यह पत देखते ही कमला भीगी िबलली बन गया
और दबे पाव बैठक की ओर चला। पेमवती पदे की आड से िससकते हुए नौकरो को डाट रही थी, कमलाचरण ने उसे मना
िकया और उसी कण कुछ और कनकौए जो बचे हुए थे, सवंय फाड डाले, चिखरया टुकडे-टुकडे कर डाली और डोर मे
िदयासलाई लगा दी। माता के धयान ही मे नही आता था िक कया बात है? कहा तो अभी-अभी इनही वसतुओं के िलए संसार िसर
पर उठा िलया था, और कहा आप ही उसका शतु हो गया। समझी, शायद कोध से ऐसा कर रहा हो मानाने लगी, पर कमला की
आकृित से कोध तिनक भी पकट न होता था। िसथरता से बोला – कोध मे नही हं।
ू आज से दृढ पितजा करता हंू िक पतंग
कभी न उडाऊँगा मेरी मूखरता थी, इन वसतुओं के िलए आपसे झगड बैठा। जब कमलाचरण कमरे मे अकेला रह गया तो सोचने
लगा-िनससनदेह मेरा पतंग उडाना उनहे नापसनद है, इससे हािदरक घृणा है; नही तो मुझ पर यह अतयाचार कदािप न करती। यिद
एक बार उनसे भेट हो जाती तो पूछता िक तुमहारी कया इचछा है; पर कैसे मुँह िदखाऊँ। एक तो महामूशर, ितस पर कई बार
अपनी मूखरता का पिरचय दे चुका। सेधवाली घटना की सूचना उनहे अवशय िमली होगी। उनहे मुख िदखाने के योगय नही रहा।
अब तो यही उपाय है िक न तो उनका मुख देखूँ न अपना िदखाऊँ, या िकसी पकार कुछ िवदा सीखूँ। हाय ! इस सुनदरी ने
कैसार सवरप पाया है! सती नीह अपसरा जान पडती है। कया अभी वह िदन भी होगा जब िक वह मुझसे पेम करेगी? कया लाललाल रसीले अधर है! पर है कठोर हृदय। दया तो उसे छू नही गयी। कहती है जो दणड दूँ? यिद पा जाऊँ हृदय से लगा लू।
अचछा, तो अब आज से पढना चािहये। यह सोचते-सोचते उठा और दरबा खोलकर कबूतरो का उडाने लगा। सैकडो जोडे थे
ओर एक-से-एक बढ-चढकर। आकाश मे तारे बन जाएँ , डे तो िदन-भर उतरने का नाम न ले। जगर क बूतरबाज एक-एक
जोड पर गुलामी करने को तैयार थे। परनतु कण-मात मे सब-के-सब उडा िदय। जब दरबा खाली हो ेगया, तो कहाररो को
आजा दी िक इसे उठा ले जाओ और आग मे जला दो। छता भी िगरा दो, नही तो सब कबूतर जाकर उसकी पर बैठेगे। कबूतरो
का काम समापत करके बटेरो और बुलबुलो की ओर चले और उनकी भी कारागार से मुकत कर िदया। बाहर तो यह चिरत हो
रहा था, भीतर पेमवती छाती पीट रही थी िक ल़का न जाने कया करने तर ततपर हुआ है? िवरजन को बुलाकर कहा-बेटी? बचचे
को िकसी पकार रोको। न-जाने उसने मन मे कया ठानी है? यह कहक रोने लगी! िवरजन को भी सनदेह हो रहा था िक अवशय
इनकी कुछ और नयीत है नही तो यह कोध कयो? यदिप कमला दुवयरसनी था, दुराचारी था, कुचिरत था, परनतु इन सब दोषो के
होते हुए भी उसमे एक बडा गुण भी था, िजसका कोई सती अवहेलना नही कर सकती। उसे वृजरानी से सववी पीित थी। और
इसका गुप् रीित से कई बार पिरचय भी िमल गया था। यही कारण था िजसेन िवरजन को इतना गवरशील बना िदया था। उसने
कागेज िनकाला और यह पत बाहर भेजा। “िपयत, यह कोप िकस पर है? केवल इसीिलए िक मैने दो-तीन कनकौए फाडृ डाले?
यिद मुझे जात होता िक आप इतनी-सी बात पर ऐसे कुद हो जायेगे, तो कदािप उन पर हाथ न लगाती। पर अब तो अपराध हो
गया, कमा कीिजये। यह पहला कसूर है आपकी वृजरानी।”

कमलाचरण यह पत पाकर ऐसा पमुिदत हुआ, माने सारे जगत की संपित पापत हो गयी। उतर देने की इचछा हुई, पर लेखनी ही
नही उठती थी। न पशिसत िमलती है, न पितषा, न आरंभ का िवचार आता, न समािपत का। बहुत चाहते है िक भावपूणर
लहलहाता हुआ पत िलखू,ं पर बुिद तिनक भी नही दौडती। आज पथम बार कमलाचरण को अपनी मुखरता और िनरकरता पर
रोना आया। शोक ! मै एक सीधा-सा पत भी नही िलख सकता। इस िवचार से वह रोने लगा और घर के दार सब बनद कर
िलये िक कोई देख न ले। तीसरे पहर जब मुंशी शयामाचरण घर आये, तो सबसे पहली वसतु जो उनकी दृिष मे पडी, वह आग
का अलावा था। िविसमत होकर नौकरो से पूडा-यह अलाव कैसा? नौकरो ने उतर िदया-सरकार ! दरबा जल रहा है। मुंशीजी(घुडककर) इसे कयो जलाते हो? अब कबूर कहा रहेगे? कहार-छोटे बाबू की आजा है िक सब दरबे जला दो मुंशीजी- कबूतर
कहा गये? कहार-सब उडा िदये, एक भी नही रखा। कनकौए सब फाड डाले, डोर जला दी, बडा नुकसान िकया। कहरो ने
अपनी समझ मे मार-पीट का बउला िलया। बेचारे समझे िक मुंशीजी इस नुकासन क िलये कमलाचरण को बुरा-भला कहेगे,
परनतु मंशीजी ने यह समाचार सुना तो भैचके-से रह गये। उनही जानवरो पर कमलाचरण पाण देता था, आज अकसमात् कया
कायापलट हो गयी? अवशय कुछ भेद है। कहार से कहा- बचचे को भेज दो। एक िमनट मे कहार ने आकर कहा- हजुर,
दरवाजा भीतर से बनद है। बहुत खटखटाया, बोलते ही नही। इतना सुनना था िक मुंशीजी का रिधर शुषक हो गया। झट
सनदेह हुआ िक बचचे ने िवष खा िलया। आज एक जहर िखलाने के मुकदमे का फैसला िकया था। नंगे, पाव दौडे और बनद
कमरे के िकवाड पर बजपूवरक लात मारी और कहा- बचचा! बचचा! यह कहते-कहते गला रँध गया। कमलाचरण िपता की वाणी
पिहचान कर झट उठा और अपने आँसूं पोछकर िकवाड खोल िदया। परनतु उसे िकतना आशयर हुआ, जब मुंशीजी ने िधकार,
फटकार के बदले उसे हृदय से लगा िलया और वयाकुल होकर पूछा-बचचा, तुमहे मेरे िसर की कसम, बता दो तुमने कुछ खा तो
नही िलया? कमलाचरण ने इस पश का अथर समझने के िलये मुंशीजी की ओर आँखे उठायी तो उनमे जल भरा था, मुंशीजी को
पूरा िवशास हो गया िक अवशयश् िवपित का सामना हुआ। एक कहार से कहा-डाकटर साहब को बुला ला। कहना, अभी
चिलये। अब जाकर दुबुरिद कमेलाचरण ने िपता की इस घबराहट का अथर समझा। दौडकर उनसे िलपट गया और बोलाआपको भम हुआ है। आपके िसर की कसम, मै बहुत अचछी तरह हूँ। परनतु िडपटी साहब की बुिद िसथर न थी ; समझे, यह मुझे
रोककर िवलमब करना चाहता है। िवनीत भाव से बोले-बचचा? ईशर के िलए मुझे छोड दो, मै सनदूक से एक औषिध ले आऊँ।
मै कया जानता था िक तुम इस नीयत से छातालय मे जा रहे हो। कमलाचरण- इशरर-साकी से कहता हूँ, मै िबलकुल अचछा हूँ।
मै ऐसा लजजावान होता, तो इतना मूखर कयो बना रहता? आप वयथर ही डाकटर साहब को बुला रहे है। मुंशीजी- (कुछ-कुछ
िवशास करके) तो िकवाड बनद कर कया करते थे? कमलाचरण- भीतर से एक पत आया था, उतर िलख रहा था। मुंशीजीऔर यह कबूतर वगैरह कयो उडा िदये? कमला- इसीिलए िक िनिशंतापूवरक पढू ँ। इनही बखेडो मे समय नष होता था। आज मैने
इनका अनत कर िदया। अबा आप देखेगे िक मै पढने मे कैसा जी लगाता हूँ। अब जाके िडपटी साहब की बुिद िठकाने आयी।
भीतर जाकर पेमवती से समाचार पूछा तो उसने सारी रामायण कह सुनायी। उनहोने जब सुना िक िवरजन ने कोध मे आकर
कमला के कनकौए फाड डाले और चिखरया तोड डाली तो हंस पडे और कमलाचरण के िवनोद के सवरनाश का भेद समझ मे आ
गया। बोले-जान पडता है िक बहू इन लालजी को सीधा करके छोडेगी।
भम / पेमचंद
वृजरानी की िवदाई के पशात सुवामा का घर ऐसा सूना हो गया, मानो िपंजरे से सुआ उड गया। वह इस घर का दीपक और
शरीर की पाण थी। घर वही है, पर चारो ओर उदासी छायी हुई है। रहनेचाला वे ही है। पर सबके मुख मिलन और नेत
जयोितहीन हो रहे है। वािटका वही है, पर ऋतु पतझड की है। िवदाई के एक मास पशात मुंशी संजीवनलाल भी तीथरयात करने
चले गये। धन-संपित सब पताप को सिमरपत कर दी। अपने सग मृगछाला, भगवद् गीता और कुछ पुसतको के अितिरकत कुछ
न ले गये। पताचनद की पेमाकाका बडी पबल थी पर इसके साथ ही उसे दमन की असीम शिकत भी पापत थी। घर की एक-एक
वसतु उसे िवरजन का समरण कराती रहती थी। यह िवचार एक कण के िलए भी दूर न होता था यिद िवरजन मेरी होती, तो ऐसे
सुख से जीवन वयतीत होता। परनतु िवचार को वह हटाता रहता था। पढने बैठता तो पुसतक खुली रहती और धयान अनयत जा
पहंुचता। भोजन करने बैठता तो िवरजन का िचत नेतो मे िफरने लगता। पेमािगन को दमन की शिकत से दबाते-दबाते उसकी

अवसथा ऐसी हो गयी, मानो वषों का रोगी है पेिमयो को अपनी अिभलाषा पूरी होने की आशा हो यान हो, परनतु वे मन-ही-मन
अपनी पेिमकाओं से िमलने का आननद उठाते रहते है। वे भाव-संसार मे अपने पेम-पात से वातालाप करते है, उसे छोडते है,
उससे रठते है, उसे मनाते है और इन थावो मे उनहे तृिपत होती है आैैश
शशश

मन को एक सुखद और रसमय कायर िमल जाता

है। परनतु यिद कोई शिकत उनहे इस भावोदान की सैर करने से रोके, यिद कोई शिकत धयान मे भी उस िपयतम का िचत् न
देखने दे, तो उन अभागो पेिमयो को कया दशा होगा? पताप इनही अभागो मे था। इसमे संदेह नही िक यिद वह चाहता तो सुखद
भावो का आननद भोग सकता था। भाव-संसार का भमणअतीव सुखमय होता है, पर किठनता तो यह थी िक वह िवरजन का
धयान भी कुितसत वासनाओं से पिवत् रखना चाहता था। उसकी िशका ऐसे पिवत िनयमो से हुई थी और उसे ऐसे पिवततमाओं
और नीितपरायण मनुषयो की संगित से लाभ उठाने क अवसर िमले थे िक उसकी दृिष मे िवचार की पिवतता की भी उतनी ही
पितषा थी िजतनी आचार की पिवतता की। यह कब संभव था िक वह िवरजन को-िजसे कई बार बिहन कह चुका था और
िजसे अब भी बिहन समझने का पयत करता रहता था- धयानावसथा मे भी ऐसे भावो का केद बनाता, जो कुवासनाओं से भले ही
शुद हो, पर मन की दूिषत आवेगो से मुकत नही हो सकते थे जब तक मुनशीजी संजीवनलाल िवदमान थे, उनका कुछ-न-कुछ
समय उनके संग जान और धमर-चचा मे कट जाता था, िजससे आतमा को संतोष होता था ! परनतु उनके चले जाने के पशात
आतम-सुधार का यह अवसर भी जाता रहा। सुवामा उसे यो मिलन-मन पाती तो उसे बहुत दु :ख होता। एक िदन उसने कहायिद तुमहारा िचत न लगता हो, पयाग चले जाओ वहा शायद तुमहारा जी लग जाए। यह िवचार पताप के मन मे भी कई बार
उतपन हुआ था, परनतु इस भय से िक माता को यहा अकेले रहने मे कष होगा, उसने इस पक कुछ धयान नही िदया था। माता
का आदेश पाकर इरादा पका हो गया। याता की तैयािरया करने लगा, पसथान का िदन िनिशत हो गया। अब सुवामा की यह
दशा है िक जब देिखए, पताप को परदेश मे रहने -सहने की िशकाएं दे रही है-बेटा, देखो िकसी से झगडा मत मोल लेना।झगडने
की तुमहारी वैसे भी आदत नही है, परनतु समझा देती हूँ। परदेश की बात है फूंक-फूंककर पग धरना। खाने -पीने मे असंयम न
करना। तुमहारी यह बुरी आदत है िक जाडो मे सायकाल ही सो जाते हो, िफर कोई िकतना ही बुलाये पर जागते ही नही। यह
सवभाव परदेश मे भी बना रहे तो तुमहे साझ का भोजन काहे को िमलेगा? िदन को थोडी देर के िलए सो िलया करना। तुमहारी
आंखो मे तो िदन को जैसे नीद नही आती। उसे जब अवकाश िमला, बेटे को ऐसी समयोिचत िशकाएं िदया करती। िनदान
पसथान का िदन आ ही गया। गाडी दस बजे िदन को छू टती थी। पताप ने सोचा- िवरजन से भेट कर लूं। परदेश जा रहा हूँ।
िफर न जाने कब भेट हो। िचत को उतसुक िकया। माता से कह बैठा। सुवामा बहुत पसन हुई। सुवामा बहुत पसन हुई। एक
थाल मे मोदक समोसे और दो-तीन पकार के मुरबबे रखकर रिधयाको िदये िक लललू के संग जा। पताप ने बाल बनवाये, कपडे
बदले। चलने को तो चला, पर जयो-जयो पग आगे उठाता है, िदल बैठा जाता है। भाित-भाित के िवचार आ रहे है। िवरजन न
जाने कया मन मे समझे, कया सन समझे। चार महीने बीत गये, उसने एक िचटी भी तो मुझे अलग से नही िलखी। िफर कयोकर
कहंू िक मेरे िमलने से उसे पसनता होगी। अजी, अब उसे तुमहारी िचनता ही कया है? तुम मर भी जाओ तो वह आंसू न बहाये।
यहा की बात और थी। वह अवशय उसकी आँखो मे खटकेगा। कही यह न समझे िक लालाजी बन-ठनकर मुझे िरझाने आये
है। इसी सोच-िवचार मे गढता चला जाता था। यहा तक िक शयामाचरण का मकान िदखाई देने लगा। कमला मैदान टहल रहा
था उसे देखते ही पताप की वह दशा हो गई िक जो िकसी चोर की दशा िसपाही को देखकर होती है झट एक घर कर आड मे
िछप गया और रिधया से बोला- तू जा, ये वसतुएँ दे आ। मै कुछ काम से बाजार जा रहा हँू। लौटता हुआ जाऊँगा। यह कह कर
बाजार की ओर चला, परनतु केवल दस ही डग चला होेेश

शश

िक िपर महरी को बुलाया और बोला- मुझे शायद देर हो जाय,

इसिलए न आ सकूँगा। कुछ पूछे तो यह िचटी दे देना, कहकर जेब से पेिनसल िनकाली और कुछ पंिकतया िलखकर दे दी,
िजससे उसके हृदय की दशा का भली-भंित पिरचय िमलता है। “मै आज पयाग जा रहा हूँ, अब वही पढू ंगा। जलदी के कारण
तुमसे नही िमल सका। जीिवत रहँूगा तो िफर आऊँगा। कभी-कभी अपने कुशल-केम की सूचना देती रहना। तुमहारा पताप”
पताप तो यह पत देकर चलता हुआ, रिधया धीरे-धीरे िवरजन के घर पहुँची। वह इसे देखते ही दौडी और कुशल-केम पूछने
लगी-लाला की कोई िचटी आयी थी? रिधया- जब से गये, िचटी-पती कुछ भी नही आयी। िवरजन- चाची तो सूख से है?
रिधया– लललू बाबू पयागराज जात है तीन तिनक उदास रहत है। िवरजन – (चौककर) लललू पयाग जा रहे है। रिधया – हा,

हम सब बहुत समझाया िक परदेश मा कहा जैहो। मुदा कोऊ की सनुत है? रधीया – कब जायेगे? रधीया – आज दस बजे की
टे से जवयया है। तुसे भेट करन आवत रहेन, तवन दुवािर पर आइ के लवट गयेन। िवरजन – यहं तक आकर लौट गये। दार
पर कोई था िक नही? रधीया – दार पर कहा आये, सडक पर से चले गये। िवरजन – कुछ कहा नही, कया लौटा जाता हं?

रधीया – कुछ कहा नही, इतना बोले िक ‘हमार टेम छिहट जहै, तौन हम जाइत है।’ िवरजन ने घडी पर दृिष डाली, आठ बजने
वाले थे। पेमवती के पास जाकर बोली – माता! लललू आज पयाग जा रहे है, िद आप कहे तो उनसे िमलती आऊं। िफर न जाने
कब िमलना हो, कब न हो। महरी कहती है िक बस मुझसेिमलने आते थे, पर सडक के उसी पार से लौट गये। पेमवती – अभी
न बाल गुंथवाये, न माग भरवायी, न कपडे बदले बस जाने को तैयार हो गयी। िवरजन – मेरी अममा! आज जाने दीिजए। बाल
गुंथवाने बैठूंगी तो दस यही बज जायेगे। पेमवती – अचछा, तो जाओ, पर संधया तक लौट आना। गाडी तैयार करवा लो, मेरी
ओर से सुवामा को पालगन कह देना। िवरजन ने कपडे बदले, माधवी को बाहर दौडाया िक गाडी तैयार करने के िलए कहो और
तब तक कुछ धयान न आया। रधीया से पूछा – कुछ िचटी-पती नही दी? रिधया ने पत िनकालकर दे िदया। िवरजन ने उसे हषर
सेिलया, परनतु उसे पढते ही उसका मुख कुमहला गया। सोचने लगीिक वह दार तक आकर कयो लौट गये और पत भी िलखा
तो ऐसा उखडा और असपष। ऐसी कौन जलदी थी? कया गाडी के नौकर थे, िदनभर मे अिधक नही तो पाच – छ: गािडया
जाती होगी। कया मुझसे िमलने के िलए उनहे दो घंटो का िवलमब भी असहय हो गया? अवशय इसमे कुछ-न-कुछ भेद है। मुझसे
कया अपराध हुआ? अचानक उसे उस सय का धयान आया, जब वह अित वयाकुल हो पताप के पास गयी थी और उसके मुख से
िनकला था, ‘लललू मुझसे कैसे सहा जायेगा!’िवरजन को अब से पिहले कई बार धयान आ चुका िक मेरा उस समय उस दशा मे
जाना बहुत अनुिचत था। परनतु िवशास हो गया िक मै अवशय लललू की दृिष से िगर गयी। मेरा पेम और मन अब उनके िचतमे
नही है। एक ठणडी सास लेकर बैठ गयी और माधवी से बोली – कोचवान से कह दो, अब गाडी न तैयार करे। मै न जाऊंगी।

कतरवय और पेम का संघषर / पेमचंद

जब तक िवरजन ससुराल से न आयी थी तब तक उसकी दृिष मे एक िहनदु -पितवरता के कतरवय और आदशर का कोई िनयम
िसथर न हुआ था। घर मे कभी पित-समबंधी चचा भी न होती थी। उसने सती-धमर की पुसतके अवशय पढी थी, परनतु उनका
कोई िचरसथायी पभाव उस पर न हुआ था। कभी उसे यह धयान ही न आता था िक यह घर मेरा नहं है और मुझे बहुत शीघ ही
यहा से जाना पडेगा। परनतु जब वह ससुराल मे आयी और अपने पाणनाथ पित को पितकण आंखो के सामने देखने लगी तो
शनै : शनै : िचत्-वृितयो मे पिरवतरन होने लगा। जात हुआिक मै कौन हं,ू मेरा कया कतरवय है, मेरा कया धरम और कया उसके िनवाह
की रीित है? अगली बाते सवपवत् जान पडने लगी। हा िजस समय समरण हो आता िक अपराध मुझसे ऐसा हुआ है, िजसकी
कािलमा को मै िमटा नही सकती, तो सवंय लजजा से मसतक झुका लेती और अपने को उसे आशयर होता िक मुझे लललू के
सममुख जाने का साहस कैसे हुआ! कदािचत् इस घटना को वह सवप समझने की चेषा करती, तब लललू का सौजनयपूणर िचत
उसे सामने आ जाता और वह हृदय से उसे आशीवाद देती, परनतु आज जब पतापचंद की कुद-हृदयता से उसे यह िवचार करने
का अवसर िमला िक लललू उस घटना को अभी भुला नही है, उसकी दृिष मे अब मेरी पितषा नही रही, यहा तकिक वह मेरा
मुख भी नही देखना चाहता, तो उसे गलिनपूणर कोध उतपन हुआ। पताप की ओर से िचत िलन हो गया और उसकी जो पेम और
पितषा उसके हृदय मे थी वह पल-भर मे जल-कण की भाित उडने लगी। सतीयो का िचत बहुत शीघ पभावगाही होता है,िजस
पताप के िलए वह अपना असिततव धूल मेिमला देने को ततपर थी, वही उसके एक बाल-वयवहार को भी कमा नही कर सकता,
कया उसका हृदय ऐसा संकीण है? यह िवचार िवरजन के हृदय मे काटे की भाित खटकने लगा। आज से िवरजन की सजीवता
लुपत हो गयी। िचत पर एक बोझ-सा रहने लगा। सोचतीिक जब पताप मुझे भूल गये और मेरी रती-भर भी पितषा नही करते
तो इस शोक से मै। कयो अपना पाण घुलाऊं? जैसे ‘राम तुलसी से, वैसे तुलसी राम से’। यिद उनहे मझसे घृणा है, यिद वह
मेरा मुख नही देखना चाहते है, तो मै भी उनका मुख देखने से घणा करती हंू और मुझे उनसे िमलने की इचछा नही। अब वह
अपने ही ऊपर झलला उठतीिक मै पितकण उनही की बाते कयो सोचती हूं और संकलप करती िक अब उनका धयान भी मन मे न
आने दूंगी, पर तिनक देर मे धयान िफर उनही की ओर जा पहंुचता और वे ही िवचार उसे बेचैन करने लगते। हृदय केइस संताप
को शात करने केिलए वह कमलाचरण को सचचे पेम का पिरचय देने लगी। वह थोडी देर के िलए कही चला जाता, तो उसे
उलाहना देती। िजतने रपये जमा कर रखे थे, वे सब दे िदये िक अपने िलए सोने की घडी और चेन मोल ले लो। कमला ने
इंकारिकया तो उदास हो गयी। कमला यो ही उसका दास बना हुआ था, उसके पेम का बाहुलय देखकर और भी जान देने लगा।
िमतो ने सुना तो धनयवाद देने लगे। िमया हमीद और सैयद अपने भागय को िधकारने लगे िक ऐसी सनेही सती हमको न िमली।
तुमहे वह िबन मागे ही रपये देती है और यहा सतीयो की खीचतान से नाक मे दम है। चाहेह अपने पास कानी कौडी न हो, पर
उनकी इचछा अवशय पूरी होनी चािहये, नही तो पलय मच जाय। अजी और कया कहे, कभी घर मे एक बीडे पान के िलए भी चले
जाते है, तो वहा भी दस-पाच उलटी-सीधी सुने िबना नही चलता। ईशर हमको भी तुमहारी-सी बीवी दे। यह सब था, कमलाचरण
भी पेम करता था और वृजरानी भी पेम करती थी परनतु पेिमयो को संयोग से जो हषर पापत होता है, उसका िवरजन के मुख पर
कोई िचह िदखायी नही देता था। वह िदन-िदन दुबली और पतली होती जाती थी। कमलाचरण शपथ दे-देकर पूछतािक तुम
दुबली कयो होती जाती हो? उसे पसन् करने के जो-जो उपाय हो सकते करता, िमतो से भी इस िवषय मे सममित लेता, पर कुछ
लाभ न होता था। वृजरानी हंसकर कह िदया करतीिक तुम कुछ िचनता न करो, मै बहुत अचछी तरह हूं। यह कहते-कहते
उठकर उसके बालो मे कंघी लगाने लगती या पंखा झलने लगती। इन सेवा और सतकारो से कमलाचरण फूलर न समाता।
परनतु लकडी के ऊपर रंग और रोगन लगाने से वह कीडा नही मरता, जो उसके भीतर बैठा हुआ उसका कलेजा खाये जाता
है। यह िवचार िक पतापचंद मुझे भूल गये और मै उनकी मे िगर गयी, शूल की भाित उसके हृदय को वयिथत िकया करता था।
उसकी दशा िदनो – िदनो िबगडती गयी – यहा तक िक िबसतर पर से उठना तक किठन हो गया। डाकटरो की दवाएं होने
लगी। उधर पतापचंद का पयाग मे जी लगने लगा था। वयायाम का तो उसे वयसन था ही। वहा इसका बडा पचार था।
मानिसक बोझ हलका करने के िलए शारीिरक शम से बढकर और कोई उपाय नही है। पात: कसरत करता, सायकाल और
फुटबाल खलता, आठ-नौ बजे रात तक वािटका की सैर करता। इतने पिरशम के पशात् चारपाई पर िगरता तो पभात होने ही
पर आंख खुलती। छ: ही मास मे िककेट और फुटबाल का कपतान बन बैठा और दो-तीन मैच ऐसे खेले िक सारे नगर मे धूम हो
गयी। आज िककेट मे अलीगढ के िनपुण िखलािडयो से उनका सामना था। ये लोग िहनदुसतान के पिसद िखलािडयो को परासत

करिवजय का डंका बजाते यहा आये थे। उनहे अपनी िवजय मे तिनक भी संदेह न था। पर पयागवाले भी िनराश न थे। उनकी
आशा पतापचंद पर िनभरर थी। यिद वह आध घणटे भी जम गया, तो रनो के ढेर लगा देगा। और यिद इतनी ही देर तक उसका
गेद चल गया, तो िफर उधर का वार-नयारा है। पताप को कभी इतना बडा मैच खेलने का संयोग निमला था। कलेजा धडक
रहा था िक न जाने कया हो। दस बजे खेल पारंभ हुआ। पहले अलीगढवालो के खेलने की बारी आयी। दो-ढाई घंटे तक उनहोने
खूब करामात िदखलाई। एक बजते-बजते खेल का पिहला भाग समापत हुआ। अलीगढ ने चार सौ रन िकये। अब पयागवालो
की बारी आयी पर िखलािडयो के हाथ-पाव फूले हुए थे। िवशास हो गया िक हम न जीत सकेगे। अब खेल का बराबर होना
किठन है। इतने रन कौन करेगा। अकेला पताप कया बना लेगा ? पिहला िखलाडी आया और तीसरे गेद मे िवदा हो गया।
दूसरा िखलाडी आया और किठनता से पॉँच गेद खेल सका। तीसरा आया और पिहले ही गेद मे उड गया। चौथे ने आकर दोतीन िहट लगाये, पर जम न सका। पॉँचवे साहब कालेज मे एक थे, पर या उनकी भी एक न चली। थापी रखते-ही-रखते चल
िदये। अब पतापचनद दृढता से पैर उठाता, बैट घुमाता मैदान मे आया दोनो पकवालो ने करतल धविन की। पयोगवालो की श
अकथनीय थी। पतयेक मनुषय की दृिष पतापचनद की ओर लगी हुई थी। सबके हृदय धडक रहे थे। चतुिदरक सनाटा छाया
हुआ था। कुछ लोग दूर बैठकर दरशर से पाथरना कर रहे थे िक पताप की िवजय हो। देवी-देवता समरण िकये जो रहे थे।
पिहला गेद आया, पताप नेखली िदया। पयोगवालो का साहस घट गया। दूसरा आया, वह भी खाली गया। पयागवालो का,
कलेजा नािभ तक बैठ गया। बहुत से लोग छतरी संभाल घर की ओर चले। तीसरा गेद आया। एक पडाके की धविन हुई ओर
गेद लू (गमर हवा) की भॉँित गगन भेदन करता हुआ िहट पर खडे होनेवाले िखलाडी से ससौ गज ओग िगरा। लोगो ने तािलयॉँ
बजायीयं। सूखे धान मे पानी पडा। जानेवाले िठठक गये। िनरशे को आशा बँधी। चौथा गंद आया और पहले गेद से दस गज
आगे िगरा। फीलडर चौके, िहट पर मदद पहँचायी! पॉँचवॉँ गेद आया और कट पर गया। इतने मे ओवर हुआ। बालर बदले, नये
बालर पूरे बिधक थे। घातक गेद फेकते थे। पर उनके पिहले ही गेद को पताप के आकाश मे भेजकर सूयर से सपरश करा िदया।
िफर तो गेद और उसकी थापी मे मैती-सी हो गयी। गेद आता और थापी से पाशर गहण करके कभी पूवर का मागर लेता, कभी
पिशम का , कभी उतर का और कभी दिकण का, दौडते-दौडते फीलडरो की सॉँसे फूल गयी, पयागवाले उछलते थे और तािलयॉँ
बजाते थे। टोिपयॉँ वायु मे उछल रही थी। िकसी न रपये लुटा िदये और िकसी ने अपनी सोने की जंजीर लुटा दी। िवपकी सब
मन मे कुढते, झललाते, कभी केत का कम पिरवतरन करते, कभी बालर पिरवतरन करते। पर चातुरी और कीडा-कौशल िनरथरक
हो रहा था। गेद की थापी से िमतता दृढ हो गयी थी। पूरे दो घनटे तक पताप पडाके, बम-गोले और हवाइयॉँ छोडतमा रहा और
फीलडर गंद की ओर इस पकार लपकते जैसे बचचे चनदमा की ओर लपकते है। रनो की संखया तीन सौ तक पहुँच गई।
िवपिकयो के छके छू टे। हृदय ऐसा भरा गया िक एक गेद भी सीधा था। यहा तक िक पताप ने पचास रन और िकये और अब
उसने अमपायर से तिनक िवशाम करने के िलए अवकाश मॉँगा। उसे आता देखकर सहसो मनुषय उसी ओरदौडे और उसे बारीबारी से गोद मे उठाने लगे। चारो ओर भगदड मच गयी। सैकडो छाते, छिडयॉँ टोिपयॉँ और जूते ऊधवरगामी हो गये मानो वे भी
उमंग मे उछल रहे थे। ठीक उसी समय तारघर का चपरासी बाइिसकल पर आता हुआ िदखायी िदया। िनकट आकर
बोला-‘पतापचंद िकसका नाम है!’ पताप ने चौककर उसकी ओर देखा और चपरासी ने तार का िलफाफा उसके हाथ मे रख
िदया। उसे पढते ही पताप का बदन पीला हो गया। दीघर शास लेकर कुसी पर बैठ गया और बोरला-यारो ! अब मैच का िनबटारा
तुमहारे हाथ मे है। मेने अपना कतरवय-पालन कर िदया, इसी डाक से घर चला जाऊगा। यह कहकर वह बोिडरगं हाउस की ओर
चला। सैकडो मनुषय पूछने लगे-कया है ? कया है ? लोगो के मुख पर उदासी छा गयी पर उसे बात करने का कहॉँ अवकाश !
उसी समय तॉँगे पर चढा और सटेशन की ओर चला। रासते-भर उसके मन मे तकर-िवतकर होते रहे। बार-बार अपने को िधकार
देता िक कयो न चलते समय उससे िमल िलया ? न जाने अब भेट हो िक न हो। ईशर न करे कही उसके दशरन से वंिचत रहूँ;
यिद रहा तो मै भी मुँह मे कािलख पोत कही मर रहँूगा। यह सोच कर कई बार रोया। नौ बजे रात को गाडी बनारस पहुँची।
उस पर से उतरते ही सीधा शयामाचरण के घर की ओर चला। िचनता के मारे ऑंखे डबडबायी हुई थी और कलेजा धडक रहा
था। िडपटी साहब िसर झुकाये कुसी पर बैठे थे और कमला डाकटर साहब के यहॉँ जाने को उदत था। पतापचनद को देखते ही
दौडकर िलपट गया। शयामाचरण ने भी गले लगाया और बोले-कया अभी सीधे इलाहाबाद से चले आ रहे हो ? पताप-जी हॉँ !
आज माताजी का तार पहुँचा िक िवरजन की बहुत बुरी दशा है। कया अभी वही दशा है ? शयामाचरण-कया कहँू इधर दो-तीन

मास से िदनोिदन उसका शरीर कीण होता जाता है, औषिधयो का कुछ भी असर नही होता। देखे, ईशर की कया इचछा है!
डाकटर साहब तो कहते थे, कयरोग है। पर वैदराज जी हृदय-दौबरलय बतलाते है। िवरजन को जब से सूचना िमली िक
पतापचनद आये है, तब से उसक हृदय मे आशा और भय घुडदौड मची हुई थी। कभी सोचती िक घर आये होगे, चाची ने बरबस
ठेल-ठालकर यहॉँ भेज िदया होगा। िफर धयान हुआ, हो न हो, मेरी बीमारी का समाचार पा, घबडाकर चले आये हो, परनतु नही।
उनहे मेरी ऐसी कया िचनता पडी है ? सोचा होगा-नही मर न जाए, चलूँ सासािरक वयवहार पूरा करता आऊं। उनहे मेरे मरने -जीने
का कया सोच ? आज मै भी महाशय से जी खोलकर बाते करं गी ? पर नही बातो की आवशयकता ही कया है ? उनहोने चुप साधी
है, तो मै कया बोलूँ ? बस इतना कह दूँगी िक बहुत अचछी हँू और आपके कुशल की कामना रखती हँू ! िफर मुख न खोलूँगी !
और मै यह मैली-कुचैली साडी कयो पिहने हूँ ? जो अपना सहवेदी न हो उसके आगे यह वेश बनाये रखने से लाभ? वह अितिथ
की भॉँित आये है। मै भी पाहुनी की भॉँित उनसे िमलूँगी। मनुषय का िचत कैसा चचंल है? िजस मनुषय की अकृपा ने िवरजन की
यह गित बना दी थी, उसी को जलाने के िलए ऐसे-ऐसे उपाय सोच रही है। दस बजे का समय था। माधवी बैठी पख झल रही
थी। औषिधयो की शीिशया इधर-उधर पडी हुई थी और िवरजन चारपाई पर पडी हुई ये ही सब बाते सोच रही थी िक पताप घर
मे आया। माधवी चौककर बोली-बिहन, उठो आ गये। िवरजन झपटकर उठी और चारपाई से उतरना चाहती थी िक िनबरलता
के कारण पृथवी पर िगर पडी। पताप ने उसे सँभाला और चारपाई पर लेटा िदया। हा! यह वही िवरजन है जो आज से कई मास
पूवर रप एवं लावाणय की मूितर थी, िजसके मुखडे पर चमक और ऑखो मे हँसी का वपास था, िजसका भाषण शयामा का गाना
और हँसना मन का लुभानाथ। वह रसीली ऑखोवाली, मीठी बातो वाली िवरजन आज केवल अिसथचमावशेष है। पहचानी नही
जाती। पताप की ऑखो मे ऑंसूं भर आये। कुशल पूछना चाहता था, पर मुख से केवल इतना िनकला-िवरजन ! और नेतो से
जल-िबनदु बरसने लगे। पेम की ऑंखे मनभावो के परखने की कसौटी है। िवरजन ने ऑंख उठाकर देखा और उन अशु-िबनदुओं
ने उसके मन का सारा मैल धो िदया। जैसे कोई सेनापित आनेवाले युद का िचत मन मे सोचता है और शतु को अपनी पीठ पर
देखकर बदहवास हो जाता है और उसे िनधरिरत िचत का कुछ धयान भी नही रहता, उसी पकार िवरजन पतापचनद को अपने
सममुख देखकर सब बाते भूल गयी, जो अभी पडी-पडी सोच रही थी ! वह पताप को रोते देखकर अपना सब दु :ख भूल गयी
और चारपाई से उठाकर ऑंचल से ऑसूं पोछने लगी। पताप, िजसे अपराधी कह सकते है, इस समय दीन बना हुआ था और
िवरजन –िजसने अपने को सखकर इस श तक पहुँचाया था-रो-रोकर उसे कह रही थी- लललू चुप रहो, ईशर जानता है, मै
भली-भॉँित अचछी हँू। मानो अचछा न होना उसका अपराध था। सतीयो की संवेदनशीलता कैसी कोमल होती है! पतापचनद के
एक सधारण संकोच ने िवरजन को इस जीवन से उपेिकत बना िदया था। आज ऑंसू कुछ बूँदो की उसके हृदय के उस सनताप,
उस जलन और उस अिगन कोशनत कर िदया, जो कई महीनो से उसके रिधर और हृदय को जला रही थी। िजस रेग को बडेबडे वैद और डाकटर अपनी औषिध तथा उपाय से अचछा न कर सके थे, उसे अशु-िबनदुओं ने कण-भर मे चंगा कर िदया। कया
वह पानी के िबनदु अमृत के िबनदु थे ? पताप ने धीरज धरकर पूछा- िवरजन! तुमने अपनी कया गित बना रखी है ? िवरजन
(हँसकर)- यह गित मैने नही बनायी, तुमने बनायी है। पताप-माताजी का तार न पहुँचा तो मुझे सूचना भी न होती। िवरजनआवशयकता ही कया थी ? िजसे भुलाने के िलए तो तुम पयाग चले गए, उसके मरने -जीने की तुमहे कया िचनता ? पताप-बाते बना
रही हो। पराये को कयो पत िलखती ? िवरजन-िकसे आशा थी िक तुम इतनी दूर से आने का या पत िलखने का कष
उठाओगे ? जो दार से आकर िफर जाए और मुख देखने से घण करे उसे पत भेजकर कया करती? पताप- उस समय लौट जाने
का िजतना दु :ख मुझे हुआ, मेरा िचत ही जानता है। तुमने उस समय तक मेरे पास कोई पत न भेजा था। मैने सझ, अब सुध
भूल गयी। िवरजन-यिद मै तुमहारी बातो को सच न समझती होती हो कह देती िक ये सब सोची हुई बाते है। पताप-भला जो
समझो, अब यह बताओ िक कैसा जी है? मैने तुमहे पिहचाना नही, ऐसा मुख फीका पड गया है। िवरजन- अब अचछी हो
जाऊगी, औषिध िमल गयी। पताप सकेत समझ गया। हा, शोक! मेरी तिनक-सी चूक ने यह पलय कर िदया। देर तक उसे
सझता रहा और पात:काल जब वह अपने घर तो चला तो िवरजन का बदन िवकिसत था। उसे िवशास हो गया िक लललू मुझे
भूले नही है और मेरी सुध और पितषा उनके हृदय मे िवदामन है। पताप ने उसके मन से वह कॉँटा िनकाल िदया, जो कई मास
से खटक रहा था और िजसने उसकी यह गित कर रखी थी। एक ही सपताह मे उसका मुखडा सवणर हो गया, मानो कभी बीमार
ही न थी।

सनेह पर कतरवय की िवजय / पेमचंद
रोगी जब तक बीमार रहता है उसे सुध नही रहती िक कौन मेरी औषिध करता है, कौन मुझे देखने के िलए आता है। वह अपने
ही कष मं इतना गसत रहता है िक िकसी दूसरे के बात का धयान ही उसके हृदय मं उतपन नही होता; पर जब वह आरोगय हो
जाता है, तब उसे अपनी शुशष करनेवालो का धयान और उनके उदोग तथा पिरशम का अनुमान होने लगता है और उसके हृदय
मे उनका पेम तथा आदर बढ जाता है। ठीक यही श वृजरानी की थी। जब तक वह सवयं अपने कष मे मगन थी, कमलाचरण
की वयाकुलता और कषो का अनुभव न कर सकती थी। िनससनदेह वह उसकी खाितरदारी मे कोई अंश शेष न रखती थी,
परनतु यह वयवहार-पालन के िवचार से होती थी, न िक सचचे पेम से। परनतु जब उसके हृदय से वह वयथा िमट गयी तो उसे
कमला का पिरशम और उदोग समरण हुआ, और यह िचंता हुई िक इस अपार उपकार का पित-उतर कया दूँ ? मेरा धमर था
सेवा-सतकार से उनहे सुख देती, पर सुख देना कैसा उलटे उनके पाण ही की गाहक हुई हं!ू वे तो ऐसे सचचे िदल से मेरा पेम करे
और मै अपना कतरवय ही न पालन कर सकूँ ! ईशर को कया मुँह िदखाऊगी ? सचचे पेम का कमल बहुधा कृपा के भाव से िखल
जाया करता है। जहॉं, रप यौवन, समपित और पभुता तथा सवाभािवक सौजनय पेम के बीच बोने मे अकृतकायर रहते है, वहॉँ,
पाय: उपकार का जादू चल जाता है। कोई हृदय ऐसा वज और कठोर नही हो सकता, जो सतय सेवा से दवीभूत न हो जाय।
कमला और वृजरानी मे िदनोिदन पीित बढने लगी। एक पेम का दास था, दूसरी कतरवय की दासी। समभव न था िक वृजरानी के
मुख से कोई बात िनकले और कमलाचरण उसको पूरा न करे। अब उसकी ततपरता और योगयता उनही पयतो मे वयय होती
थीह। पढना केवल माता-िपता को धोखा देना था। वह सदा रख देख करता और इस आशा पर िक यह काम उसकी पसननत
का कारण होगा, सब कुछ करने पर किटबद रहता। एक िदन उसने माधवी को फुलवाडी से फूल चुनते देखा। यह छोटा-सा
उदान घर के पीछे था। पर कुटुमब के िकसी वयिकत को उसे पेम न था, अतएव बारहो मास उस पर उदासी छायी रहती थी।
वृजरानी को फूलो से हािदरक पेम था। फुलवाडी की यह दुगरित देखी तो माधवी से कहा िक कभी-कभी इसमं पानी दे िदया कर।
धीरे-धीरे वािटका की दशा कुछ सुधर चली और पौधो मे फूल लगने लगे। कमलाचरण के िलए इशारा बहुत था। तन-मन से
वािटका को सुसिजजत करने पर उतार हो गया। दो चतुर माली नौकर रख िलये। िविवध पकार के सुनदर-सुनदर पुषप और पौधे
लगाये जाने लगे। भॉँित-भॉँितकी घासे और पितयॉँ गमलो मे सजायी जाने लगी, कयािरयॉँ और रिवशे ठीक की जाने लगी। ठौरठौर पर लताऍं चढायी गयी। कमलाचरण सारे िदन हाथ मे पुसतक िलये फुलवाडी मे टहलता रहता था और मािलयो को वािटका
की सजावट और बनावट की ताकीद िकया करता था, केवल इसीिलए िक िवरजन पसन होगी। ऐसे सनेह-भकत का जादू िकस
पर न चल जायगा। एक िदन कमला ने कहा-आओ, तुमहे वािटका की सैर कराऊ। वृजरानी उसके साथ चली। चॉँद िनकल
आया था। उसके उजजवल पकाश मे पुषप और पते परम शोभायमान थे। मनद-मनद वायु चल रहा था। मोितयो और बेले की
सुगिनध मिसतषक को सुरिभत कर रही थी। ऐसे समय मे िवरजन एक रेशमी साडी और एक सुनदर सलीपर पिहने रिवशो मे
टहलती दीख पडी। उसके बदन का िवकास फूलो को लिजजत करता था, जान पडता था िक फूलो की देवी है। कमलाचरण
बोला-आज पिरशम सफल हो गया। जैसे कुमकुमे मे गुलाब भरा होता है, उसी पकार वृजरानी के नयनो मे पेम रस भरा हुआ
था। वह मुसकायी, परनतु कुछ न बोली। कमला-मुझ जैसा भागयवान मुनषय संसा मे न होगा। िवरजन-कया मुझसे भी अिधक?
केमला मतवाला हो रहा था। िवरजन को पयार से गले लगा िदया। कुछ िदनो तक पितिदन का यही िनयम रहा। इसी बीच मे
मनोरंजन की नयी सामगी उपिसथत हो गयी। राधाचरण ने िचतो का एक सुनदर अलबम िवरजन के पास भेजा। इसमं कई िचत
चंदा के भी थे। कही वह बैठी शयामा को पढा रही है कही बैठी पत िलख रही है। उसका एक िचत पुरष वेष मे था। राधाचरण
फोटोगाफी की कला मे कुशल थे। िवरजन को यह अलबम बहुत भाया। िफर कया था ? िफर कया था? कमला को धुन लगी
िक मै भी िचत खीचूँ। भाई के पास पत िलख भेजा िक केमरा और अनय आवशयक सामान मेरे पास भेज दीिजये और अभयास
आरंभ कर िदया। घर से चलते िक सकूल जा रहा हँू पर बीच ही मे एक पारसी फोटोगाफर की दूकान पर आ बैठते। तीन-चार
मास के पिरशम और उदोग से इस कला मे पवीण हो गये। पर अभी घर मे िकसी को यह बात मालूम न थी। कई बार िवरजन
ने पूछा भी; आजकल िदनभर कहा रहते हो। छुटी के िदन भी नही िदख पडते। पर कमलाचरण ने हँू-हा करके टाल िदया।
एक िदन कमलाचरण कही बाहर गये हुए थे। िवरजन के जी मे आया िक लाओ पतापचनद को एक पत िलख डालूँ; पर

बकसखेला तो िचटी का कागज न था माधवी से कहा िक जाकर अपने भैया के डेसक मे से कागज िनकाल ला। माधवी दौडी
हुई गयी तो उसे डेसक पर िचतो का अलबम खुला हुआ िमला। उसने आलबम उठा िलया और भीतर लाकर िवरजन से कहाबिहन! दखो, यह िचत िमला। िवरजन ने उसे चाव से हाथ मे ले िलया और पिहला ही पना उलटा था िक अचमभा-सा हो गया।
वह उसी का िचत था। वह अपने पलंग पर चाउर ओढे िनदा मे पडी हुई थी, बाल ललाट पर िबखरे हुए थे, अधरो पर एक
मोहनी मुसकान की झलक थी मानो कोई मन-भावना सवप देख रही है। िचत के नीचे लख हुआ था- ‘पेम-सवप’। िवरजन चिकत
थी, मेरा िचत उनहोने कैसे िखचवाया और िकससे िखचवाया। कया िकसी फोटोगाफर को भीतर लाये होगे ? नही ऐसा वे कया
करेगे। कया आशय है, सवयं ही खीच िलया हो। इधर महीनो से बहुत पिरशम भी तो करते है। यिद सवयं ऐसा िचत खीचा है तो
वसतुत: पशंसनीय कायर िकया है। दूसरा पना उलटा तो उसमे भी अपना िचत पाया। वह एक साडी पहने , आधे िसर पर आँचल
डाले वािटका मे भमण कर रही थी। इस िचत के नीचे लख हुआ था- ‘वािटका-भमण। तीसरा पना उलटा तो वह भी अपना ही
िचत था। वह वािटका मे पृथवी पर बैठी हार गूँथ रही थी। यह िचत तीनो मे सबसे सुनदर था, कयोिक िचतकार ने इसमे बडी
कुशलता से पाकृितक रंग भरे थे। इस िचत के नीचे िलखा हुआ था- ‘अलबेली मािलन’। अब िवरजन को धयाना आया िक एक
िदन जब मै हार गूँथ रही थी तो कमलाचरण नील के काटे की झाडी मुसकराते हुए िनकले थे। अवशय उसी िदन का यह िचत
होगा। चौथा पना उलटा तो एक परम मनोहर और सुहावना दृशय िदखयी िदया। िनमरल जल से लहराता हुआ एक सरोवर था
और उसके दोनो तीरो पर जहा तक दृिष पहुँचती थी, गुलाबो की छटा िदखयी देती थी। उनके कोमल पुषप वायु के झोका से
लचके जात थे। एसका जात होता था, मानो पकृित ने हरे आकाश मे लाल तारे टाक िदये है। िकसी अंगेजी िचत का अनुकरण
पतीत होता था। अलबम के और पने अभी कोरे थे। िवरजन ने अपने िचतो को िफर देखा और सािभमान आननद से, जो पतयेक
रमणी को अपनी सुनदरता पर होता है, अलबम को िछपा कर रख िदया। संधया को कमलाचरण ने आकर देखा, तो अलबम का
पता नही। हाथो तो तोते उड गये। िचत उसके कई मास के किठन पिरशम के फल थे और उसे आशा थी िक यही अलबम
उहार देकर िवरजन के हृदय मे और भी घर कर लूँगा। बहुत वयाकुल हुआ। भीतर जाकर िवरजन से पूछा तो उसने साफ
इनकार िकया। बेचारा घबराया हुआ अपने िमतो के घर गया िक कोई उनमं से उठा ले गया हो। पह वहा भी फबितयो के
अितिरकत और कुछ हाथ न लगा। िनदान जब महाशय पूरे िनराश हो गये तोशम को िवरजन ने अलबम का पता बतलाया। इसी
पकार िदवस साननद वयतीत हो रहे थे। दोनो यही चाहते थे िक पेम-केत मे मै आगे िनकल जाऊ! पर दोनो के पेम मे अनतर था।
कमलाचरण पेमोनमाद मे अपने को भूल गया। पर इसके िवरद िवरजन का पेम कतरवय की नीव पर िसथत था। हा, यह
आननदमय कतरवय था। तीन वषर वयतीत हो गये। वह उनके जीवन के तीन शुभ वषर थे। चौथे वषर का आरमभ आपितयो का
आरमभ था। िकतने ही पािणयो को सासार की सुख-सामिगयॉँ इस पिरमाण से िमलती है िक उनके िलए िदन सदा होली और
राित सदा िदवाली रहती है। पर िकतने ही ऐसे हतभागय जीव है, िजनके आननद के िदन एक बार िबजली की भाित चमककर
सदा के िलए लुपत हो जाते है। वृजरानी उनही अभागे मे थी। वसनत की ऋतु थी। सीरी-सीरी वायु चल रही थी। सरदी ऐसे
कडाके की पडती थी िक कुओं का पानी जम जाता था। उस समय नगरो मे पलेग का पकोप हुआ। सहसो मनुषय उसकी भेट
होने लगे। एक िदन बहुत कडा जवर आया, एक िगलटी िनकली और चल बसा। िगलटी का िनकलना मानो मृतयु का संदश था।
कया वैद, कया डाकटर िकसी की कुछ न चलती थी। सैकडो घरो के दीपक बुझ गये। सहसो बालक अनाथ और सहसो िवधवा
हो गयी। िजसको िजधर गली िमली भाग िनकला। पतयेक मनुषय को अपनी-अपनी पडी हुई थी। कोई िकसी का सहायक और
िहतैषी न था। माता-िपता बचचो को छोडकर भागे। सतीयो ने पुरषो से समबनध पिरतयाग िकया। गिलयो मे, सडको पर, घरो मे
िजधर देिखये मृतको को ढेर लगे हुए थे। दुकाने बनद हो गयी। दारो पर ताले बनद हो गया। चुतुिदरक धूल उडती थी।
किठनता से कोई जीवधारी चलता-िफरता िदखायी देता था और यिद कोई कायरवश घर से िनकला पडता तो ऐसे शीघता से पॉव
उठाता मानो मृतयु का दूत उसका पीछा करता आ रहा है। सारी बसती उजड गयी। यिद आबाद थे तो किबसतान या शमशान।
चोरो और डाकुओं की बन आयी। िदन –दोपहार तोल टू टते थे और सूयर के पकाश मे सेधे पडती थी। उस दारण दु :ख का
वणरन नही हो सकता। बाबू शयामचरण परम दृढिचत मनुषय थे। गृह के चारो ओर महलले-के महलले शूनय हो गये थे पर वे अभी
तक अपने घर मे िनभरय जमे हुए थे लेिकन जब उनका साहस मर गया तो सारे घर मे खलबली मच गयी। गॉँव मे जाने की
तैयािरयॉँ होने लगी। मुंशीजी ने उस िजले के कुछ गॉँव मोल ले िलये थे और मझगॉँव नामी गाम मे एक अचछा-सा घर भी बनवा

रख था। उनकी इचछा थी िक पेशन पाने पर यही रहँूगा काशी छोडकर आगरे मे कौन मरने जाय! िवरजन ने यह सुना तो बहुत
पसन हुई। गामय-जीवन के मनोहर दृशय उसके नेतो मे िफर रहे थे हरे-भरे वृक और लहलहाते हुए खेत हिरणो की कीडा और
पिकयो का कलरव। यह छटा देखने के िलए उसका िचत लालाियत हो रहा था। कमलाचरण िशकार खेलने के िलए असतशसत ठीक करने लगे। पर अचनाक मुनशीजी ने उसे बुलाकर कहा िक तम पयाग जाने के िलए तैयार हो जाओ। पताप चनद
वहा तुमहारी सहायता करेगा। गॉवो मे वयथर समय िबताने से कया लाभ? इतना सुनना था िक कमलाचरण की नानी मर गयी।
पयाग जाने से इनकार कर िदया। बहुत देर तक मुंशीजी उसे समझाते रहे पर वह जाने के िलए राजी न हुआ। िनदान उनके इन
अंितम शबदो ने यह िनपटारा कर िदया-तुमहारे भागय मे िवदा िलखी ही नही है। मेरा मूखरता है िक उससे लडता हँू! वृजरानी ने
जब यह बात सुनी तो उसे बहुत दु :ख हुआ। वृजरानी यदिप समझती थी िक कमला का धयान पढने मे नही लगता; पर जब-तब
यह अरिच उसे बुरी न लगती थी, बिलक कभी-कभी उसका जी चाहता िक आज कमला का सकूल न जाना अचछा था। उनकी
पेममय वाणी उसके कानो का बहुत पयारी मालूम होती थी। जब उसे यह जात हुआ िक कमला ने पयाग जाना असवीकार िकया
है और लालाजी बहुत समझ रहे है, तो उसे और भी दु :ख हुआ कयोिक उसे कुछ िदनो अकेले रहना सहय था, कमला िपता को
आजजेललघंन करे, यह सहय न था। माधवी को भेजा िक अपने भैया को बुला ला। पर कमला ने जगह से िहलने की शपथ खा
ली थी। सोचता िक भीतर जाऊगा, तो वह अवशय पयाग जाने के िलए कहेगी। वह कया जाने िक यहा हृदय पर कया बीत रही
है। बाते तो ऐसी मीठी-मीठी करती है, पर जब कभी पेम-परीका का समय आ जाता है तो कतरवय और नीित की ओट मे मुख
िछपाने लगती है। सतय है िक सतीयो मे पेम की गंध ही नही होती। जब बहुत देर हो गयी और कमला कमरे से न िनकला तब
वृजरानी सवयं आयी और बोली-कया आज घर मे आने की शपथ खा ली है। राह देखते-देखते ऑंखे पथरा गयी। कमला- भीतर
जाते भय लगता है। िवरजन- अचछा चलो मै संग-संग चलती हँू, अब तो नही डरोगे? कमला- मुझे पयाग जाने की आजा िमली
है। िवरजन- मै भी तुमहारे सग चलूँगी! यह कहकर िवरजन ने कमलाचरण की ओर आंखे उठायी उनमे अंगूर के दोन लगे हुए
थे। कमला हार गया। इन मोहनी ऑखो मे ऑंसू देखकर िकसका हृदय था, िक अपने हठ पर दृढ रहता? कमेला ने उसे अपने
कंठ से लगा िलया और कहा-मै जानता था िक तुम जीत जाओगी। इसीिलए भीतर न जाता था। रात-भर पेम-िवयोग की बाते
होती रही! बार-बार ऑंखे परसपर िमलती मानो वे िफर कभी न िमलेगी! शोक िकसे मालूम था िक यह अंितम भेट है। िवरजन को
िफर कमला से िमलना नसीब न हुआ।
कमला के नाम िवरजन के पत / पेमचंद
‘िपयतम, पेम पत आया। िसर पर चढाकर नेतो से लगाया। ऐसे पत तुम न लख करो ! हृदय िवदीणर हो जाता है। मै िलखूं तो
असंगत नही। यहॉँ िचत अित वयाकुल हो रहा है। कया सुनती थी और कया देखती है ? टू टे-फूटे फूस के झोपडे, िमटी की
दीवारे, घरो के सामने कूडे-करकट के बडे-बडे ढेर, कीचड मे िलपटी हुई भैसे, दुबरल गाये, ये सब दृशय देखकर जी चाहता है
िक कही चली जाऊं। मनुषयो को देखो, तो उनकी सोचनीय दशा है। हिडडयॉँ िनकली हुई है। वे िवपित की मूितरयॉँ और
दिरदता के जीिवत िचत है। िकसी के शरीर पर एक बेफटा वसत नही है और कैसे भागयहीन िक रात-िदन पसीना बहाने पर भी
कभी भरपेट रोिटयॉँ नही िमलती। हमारे घर के िपछवाडे एक गडढा है। माधवी खेलती थी। पॉँव िफसला तो पानी मे िगर
पडी। यहॉँ िकमवदनती है िक गडढे मे चुडैल नहाने आया करती है और वे अकारण यह चलनेवालो से छेड-छाड िकया करती है।
इसी पकार दार पर एक पीपल का पेड है। वह भूतो का आवास है। गडढे का तो भय नही है, परनतु इस पीपल का वास सारेसारे गॉँव के हृदय पर ऐसा छाया हुआ है। िक सूयासत ही से मागर बनद हो जाता है। बालक और सतीया तो उधर पैर ही नही
रखते! हॉँ, अकेल-े दुकेले पुरष कभी-कभी चले जाते है, पर पे भी घबराये हुए। ये दो सथान मानो उस िनकृष जीवो के केनद
है। इनके अितिरकत सैकडो भूत-चुडैल िभन-िभन सथानो के िनवासी पाये जाते है। इन लोगो को चुडैले दीख पडती है। लोगो
ने इनके सवभाव पहचान िकये है। िकसी भूत के िवषय मे कहा जाता है िक वह िसर पर चढता है तो महीनो नही उतरता और
कोई दो-एक पूजा लेकर अलग हो जाता है। गाव वालो मे इन िवषयो पर इस पकार वातालाप होता है, मानो ये पतयक घटना है।
यहा तक सुना गया है िक चुडैल भोजन-पानी मॉँगने भी आया करती है। उनकी सािडयॉँ पाय: बगुले के पंख की भाित उजजवल
होती है और वे बाते कुछ-कुछ नाक से करती है। हॉँ, गहनो को पचार उनकी जाित मे कम है। उनही सतीयो पर उनके

आकमणका भय रहता है, जो बनाव शृंगार िकये रंगीन वसत पिहने , अकेली उनकी दृिष मे पड जाये। फूलो की बास उनको
बहुत भाती है। समभव नही िक कोई सती या बालक रात को अपने पास फूल रखकर सोये। भूतो के मान और पितषा का
अनुमान बडी चतुराई से िकया गया है। जोगी बाबा आधी रात को काली कमिरया ओढे, खडाऊ पर सवार, गॉँव के चारो आर
भमण करते है और भूले-भटके पिथको को मागर बताते है। साल-भर मे एक बार उनकी पूजा होती है। वह अब भूतो मे नही वरन्
देवताओं मे िगने जाते है। वह िकसी भी आपित को यथाशिकत गॉँव के भीतर पग नही रखने देते। इनके िवरद धोबी बाबा से
गॉँव-भर थराता है। िजस वुक पर उसका वास है, उधर से यिद कोई दीपक जलने के पशात् िनकल जाए, तो उसके पाणो की
कुशलता नही। उनहे भगाने के िलए दो बोलत मिदरा काफी है। उनका पुजारी मंगल के िदन उस वृकतले गाजा और चरस रख
आता है। लाला साहब भी भूत बन बैठे है। यह महाशय मटवारी थे। उनहं कई पंिडत असिमयो ने मार डाला था। उनकी पकड
ऐसी गहरी है िक पाण िलये िबना नही छोडती। कोई पटवारी यहा एक वषर से अिधक नही जीता। गॉँव से थोडी दूर पर एक पेड
है। उस पर मौलवी साहब िनवास करते है। वह बेचारे िकसी को नही छेडते। हॉँ, वृहसपित के िदन पूजा न पहुँचायी जाए, तो
बचचो को छेडते है। कैसी मूखरता है! कैसी िमथया भिकत है! ये भावनाऍं हृदय पर वजलीक हो गयी है। बालक बीमार हुआ िक
भूत की पूजा होने लगी। खेत-खिलहान मे भूत का भोग जहा देिखये, भूत-ही-भूत दीखते है। यहॉँ न देवी है, न देवता। भूतो का
ही सामाजय है। यमराज यहॉँ चरण नही रखते, भूत ही जीव-हरण करते है। इन भावो का िकस पकार सुधार हो ? िकमिधकम
तुमहारी िवरजन
(2)

मझगाव

पयारे, बहुत िदनो को पशात् आपकी पेरम-पती पापत हुई। कया सचमुच पत िलखने का अवकाश नही ? पत कया िलखा है, मानो
बेगार टाली है। तुमहारी तो यह आदत न थी। कया वहॉँ जाकर कुछ और हो गये ? तुमहे यहॉँ से गये दो मास से अिधक होते है।
इस बीच मं कई छोटी-बडी छुिटयॉँ पडी, पर तुम न आये। तुमसे कर बाधकर कहती हूँ- होली की छुटी मे अवशय आना। यिद
अब की बार तरसाया तो मुझे सदा उलाहना रहेगा। यहॉँ आकर ऐसी पतीत होता है, मानो िकसी दूसरे संसार मे आ गयी हँू। रात
को शयन कर रही थी िक अचानक हा-हा, हू-हू का कोलाहल सुनायी िदया। चौककर उठा बैठी! पूछा तो जात हुआ िक लडके
घर-घर से उपले और लकडी जमा कर रहे थे। होली माता का यही आहार था। यह बेढंगा उपदव जहा पहुँच गया, ईधन का
िदवाला हो गया। िकसी की शिकत नही जो इस सेना को रोक सके। एक नमबरदार की मिडया लोप हो गयी। उसमं दस-बारह
बैल सुगमतापूवरक बाधे जा सकते थे। होली वाले कई िदन घात मे थे। अवसर पाकर उडा ले गये। एक कुरमी का झोपडा उड
गया। िकतने उपले बेपता हो गये। लोग अपनी लकिडया घरो मे भर लेते है। लालाजी ने एक पेड ईधन के िलए मोल िलया
था। आज रात को वह भी होली माता के पेट मे चला गया। दो-तील घरो को िकवाड उतर गये। पटवारी साहब दार पर सो रहे
थे। उनहे भूिम पर ढकेलकर लोगे चारपाई ले भागे। चतुिदरक ईधन की लूट मची है। जो वसतु एक बार होली माता के मुख मे
चली गयी, उसे लाना बडा भारी पाप है। पटवारी साहब ने बडी धमिकया दी। मै जमाबनदी िबगाड दूँगा, खसरा झूठाकर दूँगा,
पर कुछ पभाव न हुआ! यहा की पथा ही है िक इन िदनो वाले जो वसतु पा जाये, िनिवरघ उठा ले जाये। कौन िकसकी पुकार
करे ? नवयुवक पुत अपने िपता की आंख बाकर अपनी ही वसतु उठवा देता है। यिद वह ऐसा न करे, तो अपने समाज मे
अपमािनत समझाजा जाए। खेत पक गये है।, पर काटने मे दो सपताह का िवलमब है। मेरे दार पर से मीलो का दृशय िदखाई
देता है। गेहँू और जौ के सुथरे खेतो के िकनारे-िकनारे कुसुम के अरण और केसर-वणर पुषपो की पंिकत परम सुहावनी लगती
है। तोते चतुिदरक मँडलाया करते है। माधवी ने यहा कई सिखया बना रखी है। पडोस मे एक अहीर रहता है। राधा नाम है।
गत वषर माता-िपता पलेगे के गास हो गये थे। गृहसथी का कुल भार उसी के िसर पर है। उसकी सती तुलसा पाय: हमारे यहा
आती है। नख से िशख तक सुनदरता भरी हुई है। इतनी भोली हैिक जो चाहता है िक घणटो बाते सुना करँ। माधवी ने इससे
बिहनापा कर रखा है। कल उसकी गुिडयो का िववाह है। तुलसी की गुिडया है और माधवी का गुडडा। सुनती हँू, बेचारी बहुत

िनधनर है। पर मैने उसके मुख पर कभी उदासीनता नही देखी। कहती थी िक उपले बेचकर दो रपये जमा कर िलये है। एक
रपया दायज दूँगी और एक रपये मे बराितयो का खाना-पीना होगा। गुिडयो के वसताभूषण का भार राधा के िसर है! कैसा सरल
संतोषमय जीवल है! लो, अब िवदा होती हँू। तुमहारा समय िनरथरक बातो मे नष हुआ। कमा करना। तुमहे पत िलखने बैठती हँू,
तो लेखनी रकती ही नही। अभी बहुतेरी बाते िलखने को पडी है। पतापचनद से मेरी पालागन कह देना। तुमहारी िवरजन

(3)

मझगाव

पयारे, तुमहारी, पेम पितका िमली। छाती से लगायी। वाह! चोरी और मुँहजोरी। अपने न आने का दोष मेरे िसर धरते हो ? मेरे
मन से कोई पूछे िक तुमहारे दशनर की उसे िकतनी अिभलाषा पितिदन वयाकुलता के रप मे पिरणत होती है। कभी-कभी बेसुध हो
जाती हँू। मेरी यह दशा थोडी ही िदनो से होने लगी है। िजस समय यहा से गये हो, मुझे जान न था िक वहा जाकर मेरी दलेल
करोगे। खैर, तुमही सच और मै ही झूठ। मुझे बडी पसनता हुई िक तुमने मरे दोनो पत पसनद िकये। पर पतापचनद को वयथर
िदखाये। वे पत बडी असावधानी से िलखे गये है। समभव है िक अशुिदया रह गयी हो। मझे िवशास नही आता िक पताप ने उनहे
मूलयवान समझा हो। यिद वे मेरे पतो का इतना आदर करते है िक उनके सहार से हमारे गामय-जीवन पर कोई रोचक िनबनध
िलख सके, तो मै अपने को परम भागयवान् समझती हँू। कल यहा देवीजी की पूजा थी। हल, चकी, पुर चूले सब बनद थे।
देवीजी की ऐसी ही आजा है। उनकी आजा का उललघंन कौन करे ? हुका-पानी बनद हो जाए। साल-भर मं यही एक िदन है,
िजस गावाले भी छुटी का समझते है। अनयथा होली-िदवाली भी पित िदन के आवशयक कामो को नही रोक सकती। बकरा
चढा। हवन हुआ। सतू िखलाया गया। अब गाव के बचचे-बचचे को पूणर िवशास है िक पलेग का आगमन यहा न हो सकेगा। ये
सब कौतुक देखकर सोयी थी। लगभग बारह बजे होगे िक सैकडो मनुषय हाथ मे मशाले िलये कोलाहल मचाते िनकले और सारे
गाव का फेरा िकया। इसका यह अथर था िक इस सीमा के भीतर बीमारी पैर न रख सकेगी। फेरे के सपताह होने पर कई मनुषय
अनय गाम की सीमा मे घुस गये और थोडे फूल,पान, चावल, लौग आिद पदाथर पृथवी पर रख आये। अथात् अपने गाम की बला
दूसरे गाव के िसर डाल आये। जब ये लोग अपना कायर समापत करके वहा से चलने लगे तो उस गाववालो को सुनगुन िमल
गयी। सैकडो मनुषय लािठया लेकर चढ दौडे। दोनो पकवालो मे खूब मारपीट हुई। इस समय गाव के कई मनुषय हलदी पी रहे
है। आज पात:काल बची-बचायी रसमे पूरी हुई, िजनको यहा कढाई देना कहते है। मेरे दार पर एक भटा खोदा गया और उस पर
एक कडाह दूध से भरा हुआ रखा गया। काशी नाम का एक भर है। वह शरीर मे भभूत रमाये आया। गाव के आदमी टाट पर
बैठे। शंख बजने लगा। कडाह के चतुिदरक माला-फूल िबखेर िदये गये। जब कहाड मे खूब उबाल आया तो काशी झट उठा
और जय कालीजी की कहकर कडाह मे कूद पडा। मै तो समझी अब यह जीिवत न िनकलेगा। पर पाच िमनट पशात् काशी ने
िफर छलाग मारी और कडाह के बाहर था। उसका बाल भी बाका न हुआ। लोगो ने उसे माला पहनायी। वे कर बाधकर पूछने
लगे-महराज! अबके वषर खेती की उपज कैसी होगी ? बीमारी अवेगी या नही ? गाव के लोग कुशल से रहेगे ? गुड का भाव
कैसा रहेगा ? आिद। काशी ने इन सब पशो के उतर सपष पर िकंिचत् रहसयपूणर शबदो मे िदये। इसके पशात् सभा िवसिजरत
हुई। सुनती हँू ऐसी िकया पितवषर होती है। काशी की भिवषयवािणया यब सतय िसद होती है। और कभी एकाध असतय भी
िनकल जाय तो काशी उना समाधान भी बडी योगयता से कर देता है। काशी बडी पहुँच का आदमी है। गाव मे कही चोरी हो,
काशी उसका पता देता है। जो काम पुिलस के भेिदयो से पूरा न हो, उसे वह पूरा कर देता है। यदिप वह जाित का भर है
तथािप गाव मे उसका बडा आदर है। इन सब भिकतयो का पुरसकार वह मिदरा के अितिरकत और कुछ नही लेता। नाम
िनकलवाइये, पर एक बोतल उसको भेट कीिजये। आपका अिभयोग नयायालय मे है; काशी उसके िवजय का अनुषान कर रहा
है। बस, आप उसे एक बोतल लाल जल दीिजये। होली का समय अित िनकट है ! एक सपताह से अिधक नही। अहा! मेरा

हृदय इस समय कैसा िखल रहा है ? मन मे आननदपद गुदगुदी हो रही है। आँखे तुमहे देखने के िलए अकुला रही है। यह सपताह
बडी किठनाई से कटेगा। तब मै अपने िपया के दशरन पाऊगी। तुमहारी िवरजन

(4)

मझगाव

पयारे तुम पाषाणहृदय हो, कटर हो, सनेह-हीन हो, िनदरय हो, अकरण हो झूठो हो! मै तुमहे और कया गािलया दूँ और कया कोसूँ ?
यिद तुम इस कण मेरे सममुख होते, तो इस वजहृदयता का उतर देती। मै कह रही हूँ, तुतम दगाबाज हो। मेरा कया कर लोगे ?
नही आते तो मत आओ। मेरा पण लेना चाहते हो, ले लो। रलाने की इचछा है, रलाओ। पर मै कयो रोऊ ! मेरी बला रोवे। जब
आपको इतना धयान नही िक दो घणटे की याता है, तिनक उसकी सुिध लेता आँऊ, तो मुझे कया पडी है िक रोऊ और पाण
खोऊ ? ऐसा कोध आ रहा है िक पत फाडकर फेक दूँ और िफर तुमसे बात न करं । हा ! तुमने मेरी सारी अिभलाषाएं, कैसे
घूल मे िमलायी है ? होली! होली ! िकसी के मुख से यह शबद िनकला और मेरे हृदय मे गुदगुदी होने लगी, पर शोक ! होली बीत
गयी और मै िनराश रह गयी। पिहले यह शबद सुनकर आननद होता था। अब दु :ख होता है। अपना-अपना भागय है। गाव के
भूखे-नंगे लँगोटी मे फाग खेले, आननद मनावे, रंग उडावे और मै अभािगनी अपनी चारपाइर पर सफेद साडी पिहने पडी रहूँ।
शपथ लो जो उस पर एक लाल धबबा भी पडा हो। शपथ ले लो जो मैने अबीर और गुलाल हाथ से छुई भी हो। मेरी इत से बनी
हुई अबीर, केवडे मे घोली गुलाल, रचकर बनाये हुए पान सब तुमहारी अकृपा का रोना रो रहे है। माधवी ने जब बहुत हठ की, तो
मैने एक लाल टीका लगवा िलया। पर आज से इन दोषारोपणो का अनत होता है। यिद िफर कोई शबद दोषारोपण का मुख से
िनकला तो जबान काट लूँगी। परसो सायंकाल ही से गाव मे चहल-पहल मचने लगी। नवयुवको का एक दल हाथ मे डफ िलये,
अशलील शबद बकते दार-दार फेरी लगाने लगा। मुझे जान न था िक आज यहा इतनी गािलया खानी पडेगी। लजजाहीन शबद
उनके मुख से इस पकार बेधडक िनकलते थे जैसे फूल झडते हो। लजजा और संकोच का नाम न था। िपता, पुत के सममुख
और पुत, िपता के समख गािलया बक रहे थे। िपता ललकार कर पुत-वधू से कहता है- आज होली है! वधू घर मे िसर नीचा
िकये हुए सुनती है और मुसकरा देती है। हमारे पटवारी साहब तो एक ही महातम िनकले। आप मिदरा मे मसत, एक मैली-सी
टोपी िसर पर रखे इस दल के नायक थे। उनकी बह-ू बेिटया उनकी अशलीलता के वेग से न बच सकी। गािलया खाओ और
हँसो। यिद बदन पर तिनक भी मैल आये, तो लोग समझेग िक इसका मुहररम का जनम है भली पथा है। लगभग तीन बजे राित
के झुणड होली माता के पास पहुँचा। लडके अिगन-कीडािद मे ततपर थे। मै भी कई सतीयो के पास गयी, वहा सतीया एक ओर
होिलया गा रही थी। िनदान होली म आग लगाने का समय आया। अिगन लगते ही जवाल भडकी और सारा आकाश सवणर-वणर हो
गया। दूर-दूर तक के पेड-पते पकािशत हो गय। अब इस अिगन-रािश के चारो ओर ‘होली माता की जय!’ िचलला कर दौडने
लगे। सबे हाथो मे गेहूँ और जौ िक बािलया थी, िजसको वे इस अिगन मे फेकते जाते थे। जब जवाला बहुत उतेिजत हुई, तो
लेग एक िकनारे खडे होकर ‘कबीर’ कहने लगे। छ: घणटे तक यही दशा रही। लकडी के कुनदो से चटाकपटाक के शबद
िनकल रहे थे। पशुगण अपने -अपने खूँटो पर भय से िचलला रहे थे। तुलसा ने मुझसे कहा- अब की होली की जवाला टेढी जा
रही है। कुशल नही। जब जवाला सीधी जाती है, गाव मे साल-भर आननद की बधाई बजती है। परनतु जवाला का टेढी होना
अशुभ है िनदान लपट कम होने लगी। आँच की पखरता मनद हुई। तब कुछ लोग होली के िनकट आकर धयानपूवरक देखने
लगे। जैसे कोइ वसतु ढू ँढ रहे हो। तुलसा ने बतलाया िक जब बसनत के िदन होली नीवं पडती है, तो पिहले एक एरणड गाड
देते है। उसी पर लकडी और उपलो का ढेर लगाया जाता है। इस समय लोग उस एरणड के पौधे का ढू ँढ रहे है। उस मनुषय
की गणना वीरो मे होती है जो सबसे पहले उस पौधे पर ऐसा लकय करे िक वह टू ट कर दूज जा िगर। पथम पटवारी साहब पैतरे
बदलते आये, पर दस गज की दूसी से झाककर चल िदये। तब राधा हाथ मे एक छोटा-सा सोटा िलये साहस और दृढतापूवरक
आगे बढा और आग मे घुस कर वह भरपूर हाथ लगाया िक पौधा अलग जा िगरा। लोग उन टुकडो को लूटन लगे। माथे पर

उसका टीका लगाते है और उसे शुभ समझते है। यहा से अवकाश पाकर पुरष-मणडली देवीजी के चबूतरे की ओर बढी। पर
यह न समझना, यहा देवीजी की पितषा की गई होगी। आज वे भी गिजया सुनना पसनद करती है। छोटे-बडे सब उनहं अशलील
गािलया सुना रहे थे। अभी थोडे िदन हुए उनही देवीजी की पूजा हुई थी। सच तो यह है िक गावो मे आजकल ईशर को गाली
देना भी कमय है। माता-बिहनो की तो कोई गणना नही। पभात होते ही लाला ने महाराज से कहा- आज कोई दो सेर भंग िपसवा
लो। दो पकारी की अलग-अलग बनवा लो। सलोनी आ मीठी। महारा ज िनकले और कई मनुषयो को पकड लाये। भाग पीसी
जाने लगी। बहुत से कुलड मँगाकर कमपूवरक रखे गये। दो घडो मं दोनो पकार की भाग रखी गयी। िफर कया था, तीन-चार
घणटो तक िपयकडो का ताता लगा रहा। लोग खूब बखान करते थे और गदरन िहला- िहलाकर महाराज की कुशलता की पशंसा
करते थे। जहा िकसी ने बखान िकया िक महाराज ने दूसरा कुलड भरा बोले-ये सलोनी है। इसका भी सवाद चखलो। अजी पी
भी लो। कया िदन-िदन होली आयेगी िक सब िदन हमारे हाथ की बूटी िमलेगी ? इसके उतर मे िकसान ऐसी दृिष से ताकता था,
मानो िकसी ने उसे संजीवन रस दे िदया और एक की जगह तीन-तीन कुलड चट कर जाता। पटवारी कक जामाता मुनशी
जगदमबा पसाद साहब का शुभागमन हुआ है। आप कचहरी मे अरायजनवीस है। उनहे महाराज ने इतनी िपला दी िक आपे से
बाहर हो गये और नाचने -कूदने लगे। सारा गाव उनसे पोदरी करता था। एक िकसान आता है और उनकी ओर मुसकराकर
कहता है- तुम यहा ठाढी हो, घर जाके भोजन बनाओ, हम आवत है। इस पर बडे जोर की हँसी होती है, काशी भर मद मे माता
लटा कनधे पर रखे आता और सभािसथत जनो की ओर बनावटी कोध से देखकर गरजता है- महाराज, अचछी बात नही है िक
तुम हमारी नयी बहुिरया से मजा लूटते हो। यह कहकर मुनशीजी को छाती से लगा लेता है। मुंशीजी बेचारे छोटे कद के मनुषय,
इधर-उधर फडफडाते है, पर नकारखाने मे तूती की आवाज कौन सुनता है ? कोई उनहे पयार करता है और गले लगाता है।
दोपहर तक यही छेड-छाड हुआ की। तुलसा अभी तक बैठी हुई थी। मैने उससे कहा- आज हमारे यहा तुमहारा नयोता है। हम
तुम संग खायेगी। यह सुनते ही महरािजन दो थािलयो मे भोजन परोसकर लायी। तुलसा इस समय िखडकी की ओर मुँह करके
खडी थी। मैने जो उसको हाथ पकडकर अपनी और खीचा तो उसे अपनी पयारी-पयारी ऑंखो से मोती के सोने िबखेरते हुए
पाया। मै उसे गले लगाकर बोली- सखी सच-सच बतला दो, कयो रोती हो? हमसे कोइर दुराव मत रखो। इस पर वह और भी
िससकने लगी। जब मैने बहुत हठ की, उसने िसर घुमाकर कहा-बिहन! आज पात:काल उन पर िनशान पड गया। न जाने उन
पर कया बीत रही होगी। यह कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। जात हुआ िक राधा के िपता ने कुछ ऋण िलया था। वह
अभी तक चुका न सका था। महाजन ने सोचा िक इसे हवालात ले चलूँ तो रपये वसूल हो जाये। राधा कनी काटता िफरता
था। आज देिषयो को अवसर िमल गया और वे अपना काम कर गये। शोक ! मूल धन रपये से अिधक न था। पथम मुझ जात
होता तो बेचारे पर तयोहार के िदन यह आपित न आने पाती। मैने चुपके से महाराज को बुलाया और उनहे बीस रपये देकर राधा
को छुडाने के िलये भेजा। उस समय मेरे दार पर एक टाट िबछा िदया गया था। लालाजी मधय मे कालीन पर बैठे थे। िकसान
लोग घुटने तक धोितया बाधे, कोई कुती पिहने कोई नगन देह, कोई िसर पर पगडी बाधे और नंगे िसर, मुख पर अबीर लगायेजो उनके काले वणर पर िवशेष छटा िदखा रही थी- आने लगे। जो आता, लालाजी के पैरो पर थोडी-सी अबीर रख देत।
लालाली भी अपने तशतरी मे से थोडी-सी अबीर िनकालकर उसके माथे पर लगा देते और मुसकुराकर कोई िदललगी की बात
कर देते थे। वह िनहाल हो जाता, सादर पणाम करता और ऐसा पसन होकर आ बैठता, मानो िकसी रंक ने रत- रािश पायी है।
मुझे सपप मे भी धयान न था िक लालाजी इन उजडड देहाितयो के साथ बैठकर ऐसे आननद से वतालाप कर सकते है। इसी
बीच मे काशी भर आया। उसके हाथ मे एक छोटी-सी कटोरी थी। वह उसमे अबीर िलए हुए था। उसने अनय लोगो की भाित
लालाजी के चरणो पर अबीर नही रखी, िकंतु बडी धृषता से मुटी-भर लेकर उनके मुख पर भली-भाित मल दी। मै तो डरी,
कही लालाजी रष न हो जायँ। पर वह बहुत पसन हुए और सवयं उनहोने भी एक टीका लगाने के सथान पर दोनो हाथो से
उसके मुख पर अबीर मली। उसके सी उसकी ओर इस दृिष से देखते थे िक िनससंदेह तू वीर है और इस योगय है िक हमारा
नायक बने। इसी पकार एक-एक करके दो-ढाई सौ मनुषय एकत हुए ! अचानक उनहोने कहा-आज कही राधा नही दीख पडता,
कया बात है ? कोई उसके घर जाके देखा तो। मुंशी जगदमबा पसाद अपनी योगयता पकािशत करने का अचछा अवसी देखकर
बोले उठे-हजूर वह दफा 13 नं. अिलफ ऐकट (अ) मे िगरफतार हो गया। रामदीन पाडे ने वारणट जारी करा िदया। हरीचछा से
रामदीन पाडे भी वहा बैठे हुए थे। लाला सने उनकी ओर परम ितरसकार दृिष से देखा और कहा- कयो पाडेजी, इस दीन को

बनदीगृह मे बनद करने से तुमहारा घर भर जायगा ? यही मनुषयता और िशषता अब रह गयी है। तुमहे तिनक भी दया न आयी िक
आज होली के िदन उसे सती और बचचो से अलग िकया। मै तो सतय कहता हूँ िक यिद मै राधा होता, तो बनदीगृह से लौटकर
मेरा पथम उदोग यही होता िक िजसने मुझे यह िदन िदखाया है, उसे मै भी कुछ िदनो हलदी िपलवा दूँ। तुमहे लाज नही आती िक
इतने बडे महाजन होकर तुमने बीस रपये के िलए एक दीन मनुषय को इस पकार कष मे डाला। डू ब मरना था ऐसे लोभ पर!
लालाजी को वसतुत: कोध आ गया था। रामदीन ऐसा लिजजत हुआिक सब िसटी-िपटी भूल गयी। मुख से बात न िनकली।
चुपके से नयायालय की ओर चला। सब-के-सब कृषक उसकी ओर कोध-पूणर दृिष से देख रहे थे। यिद लालाजी का भय न
होता तो पाडेजी की हडडी-पसली वही चूर हो जाती। इसके पशात लोगो ने गाना आरमभ िकया। मद मे तो सब-के-सब गाते ही
थे, इस पर लालजी के भातृ-भाव के सममान से उनके मन और भी उतसािहत हो गये। खूब जी तोडकर गाया। डफे तो इतने
जोर से बजती थी िक अब फटी और तब फटी। जगदमबापसाद ने दुहरा नशा चढाया था। कुछ तो उनके मन मे सवत: उमंग
उतपन हुई, कुछ दूसरो ने उतेजना दी। आप मधय सभा मे खडा होकर नाचने लगे; िवशास मानो, नाचने लग। मैने अचकन,
टोपी, धोती और मूँछोवाले पुरष को नाचते न देखा था। आध घणटे तक वे बनदरो की भाित उछलते-कूदते रहे। िनदान मद ने
उनहे पृथवी पर िलटा िदया। ततपशात् एक और अहीर उठा एक अहीिरन भी मणडली से िनकली और दोनो चौक मे जाकर नाचने
लगे। दोनो नवयुवक फुतीले थे। उनकी कमर और पीठ की लचक िवलकण थी। उनके हाव-भाव, कमर का लचकना, रोमरोम का फडकना, गदरन का मोड, अंगो का मरोड देखकर िवसमय होता था बहुत अभयास और पिरशम का कायर है। अभी यहा
नाच हो ही रहा था िक सामने बहुत-से मनुषय लंबी-लंबी लािठया कनधो पर रखे आते िदखायी िदये। उनके संग डफ भी था।
कई मनुषय हाथो से झाझ और मजीरे िलये हुए थे। वे गाते-बजाते आये और हमारे दार पर रके। अकसमात तीन- चार मुनषयो ने
िमलकर ऐसे आकाशभेदी शबदो मे ‘अररर...कबीर’ की धविन लगायी िक घर काप उठा। लालाजी िनकले। ये लोग उसी गाव के
थे, जहा िनकासी के िदन लािठया चली थी। लालजी को देखते ही कई पुरषो ने उनके मुख पर अबीर मला। लालाजी ने भी
पतयुतर िदया। िफर लोग फशर पर बैठा। इलायची और पान से उनका सममान िकया। िफर गाना हुआ। इस गाववालो ने भी
अबीर मली और मलवायी। जब ये लेग िबदा होने लगे, तो यह होली गायी:
‘सदा आननद रहे िह दारे मोहन खेले होरी।’
िकतना सुहावना गीत है! मुझे तो इसमे रस और भाव कूट-कूटकर भारा हुआ पतीत होता है। होली का भाव कैसे साधारण और
संिकपत शबदो मे पकट कर िदया गया है। मै बारमबार यह पयारा गीत गाती हँू, आननद लूटती हँू। होली का तयोहार परसपर पेम
और मेल बढाने के िलए है। समभव सन था िक वे लोग, िजनसे कुछ िदन पहले लािठया चली थी, इस गाव मे इस पकार बेधडक
चले आते। पर यह होली का िदन है। आज िकसी को िकसी से देष नही है। आज पेम और आननद का सवराजय है। आज के
िदन यिद दुखी हो तो परदेशी बालम की अबला। रोवे तो युवती िवधवा ! इनके अितिरकत और सबके िलए आननद की बधाई है।
सनधया-समय गाव की सब सतीया हमारे यहा खेलने आयी। मातजी ने उनहे बडे आदर से बैठाया। रंग खेला, पान बाटा। मै मारे
भय के बाहर न िनकली। इस पकार छुटी िमली। अब मुझे धयान आया िक माधवी दोपहर से गायब है। मैने सोचा था शायद
गाव मे होली खेलने गयी हो। परनतु इन सतीयो के संग न थी। तुलसा अभी तक चुपचाप िखडकी की ओर मुँह िकये बैठी थी।
दीपक मे बती पडी रही थी िक वह अकसमात् उठी, मेरे चरणो पर िगर पडी और फूट-फूटकर रोने लगी। मैने िखडकी की ओर
झाका तो देखती हँू िक आगे-आगे महाराज, उसके पीछे राधा और सबसे पीछे रामदीन पाडे चल रहे है। गाव के बहत से आदमी
उनकेस संग है। राधा का बदन कुमहलाया हुआ है। लालाजी ने जयोही सुना िक राधा आ गया, चट बाहर िनकल आये और बडे
सनेह से उसको कणठ से लगा िलया, जैसे कोई अपने पुत का गले से लगाता है। राधा िचलला-िचललाकर के चरणो मे िगर
पडी। लालाजी ने उसे भी बडे पेम से उठाया। मेरी ऑंखो मे भी उस समय ऑंसू न रक सके। गाव के बहुत से मनुषय रो रहे
थे। बडा करणापूणर दृशय था। लालाजी के नेतो मे मैने कभी ऑंसू ने देखे थे। वे इस समय देखे। रामदीन पाणडेय मसतक
झुकाये ऐसा खडा था, माना गौ-हतया की हो। उसने कहा-मरे रपये िमल गये, पर इचछा है, इनसे तुलसा के िलए एक गाय ले
दूँ। राधा और तुलसा दोनो अपने घर गये। परनतु थोडी देर मे तुलसा माधवी का हाथ पकडे हँसती हुई मरे घर आयी बोलीइनसे पूछो, ये अब तक कहा थी? मै- कहा थी ? दोपहर से गायब हो ? माधवी-यही तो थी। मै- यहा कहा थी ? मैने तो दोपहर

से नही देखा। सच-सख् बता दो मै रष न होऊगी। माधवी- तुलसा के घर तो चली गयी थी। मै- तुलसा तो यहा बैठी है, वहा
अकेली कया सोती रही ? तुलसा- (हँसकर) सोती काहे को जागती रह। भोजन बनाती रही, बरतन चौका करती रही। माधवीहा, चौका-बरतर करती रही। कोई तुमहार नौकर लगा हुआ है न! जात हुअ िक जब मैने महाराज को राधा को छुडाने के िलए
भेजा था, तब से माधवी तुलसा के घर भोजन बनाने मे लीन रही। उसके िकवाड खोले। यहा से आटा, घी, शकर सब ले
गयी। आग जलायी और पूिडया, कचौिडया, गुलगुले और मीठे समोसे सब बनाये। उसने सोचा थािक मै यह सब बताकर चुपके
से चली जाऊगी। जब राधा और तुलसा जायेगे, तो िविसमत होगे िक कौन बना गया! पर सयात् िवलमब अिधक हो गया और
अपराधी पकड िलया गया। देखा, कैसी सुशीला बाला है। अब िवदा होती हँू। अपराध कमा करना। तुमहारी चेरी हँू जैसे रखोगे
वैसे रहूँगी। यह अबीर और गुलाल भेजती हूँ। यह तुमहारी दासी का उपहार है। तुमहे हमारी शपथ िमथया सभयता के उमंग मे
आकर इसे फेक न देना, नही तो मेरा हृदय दुखी होगा। तुमहारी, िवरजन

(5)

मझगाव

‘पयारे! तुमहारे पत ने बहुत रलाया। अब नही रहा जाता। मुझे बुला लो। एक बार देखकर चली आँऊगी। सच बताओं, यिद मे
तुमहारे यहा आ जाऊं, तो हँसी तो न उडाओगे? न जाने मन मे कया समझोग ? पर कैस आऊं? तुम लालाजी को िलखो खूब!
कहेगे यह नयी धुन समायी है। कल चारपाई पर पडी थी। भोर हो गया था, शीतल मनद पवन चल रहा था िक सतीया गाने का
शबद सुनायी पडा। सतीया अनाज का खेत काटने जा रही थी। झाककर देखा तो दस-दस बारह-बारह सतीयो का एक-एक
गोल था। सबके हाथो मे हंिसया, कनधो पर गािठया बाधने की रसस् ओर िसर पर भुने हुए मटर की छबडी थी। ये इस समय
जाती है, कही बारह बजे लौटेगी। आपस मे गाती, चुहले करती चली जाती थी। दोपहर तक बडी कुशलता रही। अचानक
आकश मेघाचछन हो गया। ऑंधी आ गयी और ओले िगरने लगे। मैने इतने बडे ओले िगरते न देखे थे। आलू से बडे और ऐसी
तेजी से िगरे जैसे बनदूक से गोली। कण-भर मे पृथवी पर एक फुट ऊंचा िबछावन िबछ गया। चारो तरफ से कृषक भागने लगे।
गाये, बिकरया, भेडे सब िचललाती हुई पेडो की छाया ढू ँढती, िफरती थी। मै डरी िक न-जाने तुलसा पर कया बीती। आंखे
फैलाकर देखा तो खुले मैदान मे तुलसा, राधा और मोिहनी गाय दीख पडी। तीनो घमासान ओले की मार मे पडे थे! तुलसा के
िसर पर एक छोटी-सी टोकरी थी और राधा के िसर पर एक बडा-सा गटा। मेरे नेतो मे आंसू भर आये िक न जाने इन बेचारो की
कया गित होगी। अकसमात एक पखर झोके ने राधा के िसर से गटा िगरा िदया। गटा का िगरना था िक चट तुलसा ने अपनी
टोकरी उसके िसर पर औंधा दी। न-जाने उस पुषप ऐसे िसर पर िकतने ओले पडे। उसके हाथ कभी पीठ पर जाते, कभी िसर
सुहलाते। अभी एक सेकेणड से अिधक यह दशा न रही होगी िक राधा ने िबजली की भाित जपककर गटा उठा िलया और
टोकरी तुलसा को दे दी। कैसा घना पेम है! अनथरकारी दुदेव ने सारा खेल िबगाड िदया ! पात:काल सतीया गाती हुई जा रही
थी। सनधया को घर-घर शोक छाया हुआ था। िकतना के िसर लह-ू लुहान हो गये, िकतने हलदी पी रहे है। खेती सतयानाश हो
गयी। अनाज बफर के तले दब गया। जवर का पकोप है सारा गाव असपताल बना हुआ है। काशी भर का भिवषय पवचन पमािणत
हुआ। होली की जवाला का भेद पकट हो गया। खेती की यह दशा और लगान उगाहा जा रहा है। बडी िवपित का सामना है।
मार-पीट, गाली, अपशबद सभी साधनो से काम िलया जा रहा है। दोनो पर यह दैवी कोप! तुमहारी िवरजन

(6)
मझगाव

मेरे पाणिधक िपयतम, पूरे पनदह िदन के पशात् तुमने िवरजन की सुिध ली। पत को बारमबार पढा। तुमहारा पत रलाये िबना
नही मानता। मै यो भी बहुत रोया करती हँू। तुमको िकन-िकन बातो की सुिध िदलाऊँ? मेरा हृदय िनबरल है िक जब कभी इन
बातो की ओर धयान जाता है तो िविचत दशा हो जाती है। गमी-सी लगती है। एक बडी वयग करने वाली, बडी सवािदष, बहुत
रलानेवाली, बहुत दुराशापूणर वेदना उतपन होती है। जानती हँू िक तुम नही आ रहे और नही आओगे; पर बार-बार जाकर खडी
हो जाती हूँ िक आ तो नही गये। कल सायंकाल यहा एक िचताकषरक पहसन देखने मे आया। यह धोिबयो का नाच था। पनदहबीस मनुषयो का एक समुदाय था। उसमे एक नवयुवक शेत पेशवाज पिहने , कमर मे असंखय घंिटया बाधे, पाव मे घुघँर पिहने ,
िसर पर लाल टोपी रखे नाच रहा था। जब पुरष नाचता था तो मृअंग बजने लगती थी। जात हुआ िक ये लोग होली का
पुरसकार मागने आये है। यह जाित पुरसकार खूब लेती है। आपके यहा कोई काम-काज पडे उनहे पुरसकार दीिजये; और उनके
यहा कोई काम-काज पडे, तो भी उनहे पािरतोिषक िमलना चािहए। ये लोग नाचते समय गीत नही गाते। इनका गाना इनकी
किवता है। पेशवाजवाला पुरष मृदगं पर हाथ रखकर एक िवरहा कहता है। दूसरा पुरष सामने से आकर उसका पतयुतर देता
है और दोनो ततकण वह िवरहा रचते है। इस जाित मे किवतव-शिकत अतयिधक है। इन िवरहो को धयान से सुनो तो उनमे बहुधा
उतम किवतव भाव पकट िकये जाते है। पेशवाजवाले पुरषो ने पथम जो िवरहा कहा था, उसका यह अथर िक ऐ धोबी के बचचो!
तुम िकसके दार पर आकर खडे हो? दूसरे ने उतर िदया-अब न अकबर शाह है न राजा भोज, अब जो है हमारे मािलक है उनही
से मागो। तीसरे िवरहा का अथर यह है िक याचको की पितषा कम होती है अतएव कुछ मत मागो, गा-बाजकर चले चलो,
देनेवाला िबन मागे ही देगा। घणटे-भर से ये लोग िवरहे कहते रहे। तुमहे पतित न होगी, उनके मुख से िवरहे इस पकार बेधडक
िनकलते थे िक आशयर पकट होता था। सयात इतनी सुगमता से वे बाते भी न कर सकते हो। यह जाित बडी िपयकड है।
मिदरा पानी की भाित पीती है। िववाह मे मिदरा गौने मे मिदरा, पूजा-पाठ मे मिदरा। पुरसकार मागेगे तो पीने के िलए। धुलाई
मागेगे तो यह कहकर िक आज पीने के िलए पैसे नही है। िवदा होते समय बेचू धोबी ने जो िवरहा कहा था, वह कावयालंकार से
भरा हुआ है। तुमहारा पिरवार इस पकार बढे जैसे गंगा जी का जल। लडके फूले-फले, जैसे आम का बौर। मालिकन को
सोहाग सदा बना रहे, जैसे दूब की हिरयाली। कैसी अनोखी किवता है।
तुमहारी िवरजन
(7)

मझगाव

पयारे, एक सपताह तक चुप रहने की कमा चाहती हँू। मुझे इस सपताह मे तिनक भी अवकाश न िमला। माधवी बीमार हो गयी
थी। पहले तो कुनैन को कई पुिडया िखलायी गयी पर जब लाभ न हुआ और उसकी दशा और भी बुरी होने लगी तो, िदहलूराय
वैद बुलाये गये। कोई पचास वषर की आयू होगी। नंगे पाव िसर पर एक पगडो बाधे, कनधे पर अंगोछा रखे, हाथ मे मोटा-सा
सोटा िलये दार पर आकर बैठ गये। घर के जमीदार है, पर िकसी ने उनके शरीर मे िमजई तक नही देखी। उनहे इतना
अवकाश ही नही िक अपने शरीर-पालन की ओर धयान दे। इस मंडल मे आठ-दस कोस तक के लोग उन पर िवशास करते है।
न वे हकीम को लाने , न डाकटर को। उनके हकीम-डाकटर जो कुछ है वे िदहलूराय है। सनदेशा सुनते ही आकर दार पर बैठ
गये। डाकटरो की भाित नही की पथम सवारी मागेगे- वह भी तेज िजसमे उनका समय नष न हो। आपके घर ऐसे बैठे रहेगे,
मानो गूँगे का गुड खा गये है। रोगी को देखने जायेगे तो इस पकार भागेगे मानो कमरे की वायु मे िवष भरा हुआ है। रोग पिरचय
और औषिध का उपचार केवल दो िमनट मे समापत। िदहलूराय डाकटर नही है- पर िजतने मनुषयो को उनसे लाभ पहुँचता है,
उनकी संखया का अनुमान करना किठन है। वह सहानुभूित की मूितर है। उनहे देखते ही रेगी का आधा रोग दूर हो जाता है।
उनकी औषिधया ऐसी सुगम और साधारण होती है िक िबना पैसा-कौडी मनो बटोर लाइए। तीन ही िदन मे माधवी चलने -िफरने

लगी। वसतुत: उस वैद की औषिध मे चमतकार है। यहा इन िदनो मुगिलये ऊधम मचा रहे है। ये लोग जाडे मे कपडे उधार दे
देते है और चैत मे दाम वसूल करते है। उस समय कोई बहाना नही सुनते। गाली-गलौज मार-पीट सभी बातो पर उतरा आते
है। दो-तीन मनुषयो को बहुत मारा। राधा ने भी कुछ कपडे िलये थे। उनके दार पर जाक सब-के-सब गािलया देने लगे।
तुलसा ने भीतर से िकवाड बनद कर िदये। जब इस पकार बस न चला, तो एक मोहनी गाय को खूँटे से खोलकर खीचते हुए ले
चला। इतने मं राधा दूर से आता िदखाई िदया। आते ही आते उसने लाठी का वह हाथ मारा िक एक मुगिलये की कलाई लटक
पडी। तब तो मुगिलये कुिपत हुए, पैतरे बदलने लगे। राधा भी जान पर खेन गया और तीन दुषो को बेकार कर िदया। इतने
काशी भर ने आकर एक मुगिलये की खबर ली। िदहलूराय को मुगािलयो से िचढ है। सािभमान कहा करते है िक मैने इनके
इतने रपये डुबा िदये इतनो को िपटवा िदया िक िजसका िहसाब नही। यह कोलाहल सुनते ही वे भी पहुँच गये। िफर तो सैकडो
मनुषय लािठया ले-लेकर दौड पडे। उनहोने मुगिलयो की भली-भाित सेवा की। आशा है िक इधर आने का अब साहस न होगा।
अब तो मइ का मास भी बीत गया। कयो अभी छुटी नही हुई ? रात-िदन तमहारे आने की पतीका है। नगर मे बीमारी कम हो गई
है। हम लोग बुहत शीघ यहँ से चले जायगे। शोक ! तुम इस गाव की सैर न कर सकोगे। तुमहारी िवरजन

पतापचंद और कमलाचरण / पेमचंद
पतापचनद को पयाग कालेज मे पढते तीन साल हो चुके थे। इतने काल मे उसने अपने सहपािठयो और गुरजनो की दृिष मे
िवशेष पितषा पापत कर ली थी। कालेज के जीवन का कोई ऐसा अंग न था जहा उनकी पितभा न पदिशरत हुई हो। पोफेसर
उस पर अिभमान करते और छातगण उसे अपना नेता समझते है। िजस पकार कीडा-केत मे उसका हसतलाघव पशंसनीय था,
उसी पकार वयाखयान-भवन मे उसकी योगयता और सूकमदिशरता पमािणत थी। कालेज से समबद एक िमत-सभा सथािपत की गयी
थी। नगर के साधारण सभय जन, कालेज के पोफेसर और छातगण सब उसके सभासद थे। पताप इस सभा का उजजवल चनद
था। यहा देिशक और सामािजक िवषयो पर िवचार हुआ करते थे। पताप की वकतृताऍं ऐसी ओजिसवनी और तकर-पूणर होती थी
की पोफेसरो को भी उसके िवचार और िवषयानवेषण पर आशयर होता था। उसकी वकतृता और उसके खेल दोनो ही पभाव-पूणर
होते थे। िजस समय वह अपने साधारण वसत पिहने हुए पलेटफामर पर जाता, उस समय सभािसथत लोगो की आँखे उसकी ओर
एकटक देखने लगती और िचत मे उतसुकता और उतसाह की तरंगे उठने लगती। उसका वाकचातुयर उसक संकेत और मृदुल
उचचारण, उसके अंगो-पाग की गित, सभी ऐसे पभाव-पूिरत होते थे मानो शारदा सवयं उसकी सहायता करती है। जब तक वह
पलेटफामर पर रहता सभासदो पर एक मोिहनी-सी छायी रहती। उसका एक-एक वाकय हृदय मे िभद जाता और मुख से सहसा
‘वाह-वाह!’ के शबद िनकल जाते। इसी िवचार से उसकी वकतृताऍं पाय: अनत मे हुआ करती थी कयोिक बहुतधा शोतागण उसी
की वाकतीकणता का आसवादन करने के िलए आया करते थे। उनके शबदो और उचचारणो मे सवाभािवक पभाव था। सािहतय
और इितहास उसक अनवेषण और अधययन के िवशेष थे। जाितयो की उनित और अवनित तथा उसके कारण और गित पर वह
पाय: िवचार िकया करता था। इस समय उसके इस पिरशम और उदोग के परेक तथा वदरक िवशेषकर शोताओं के साधुवाद ही
होते थे और उनही को वह अपने किठन पिरशम का पुरसकार समझता था। हा, उसके उतसाह की यह गित देखकर यह अनुमान
िकया जा सकता था िक वह होनहार िबरवा आगे चलकर कैसे फूल-फूल लायेगा और कैसे रंग-रप िनकालेगा। अभी तक उसने
कण भी के िलए भी इस पर धयान नही िदया था िक मेरे अगामी जीवन का कया सवरप होगा। कभी सोचता िक पोफेसर हो
जाऊगा और खूब पुसतके िलखूँगा। कभी वकील बनने की भावना करता। कभी सोचता, यिद छातवृित पापत होगी तो िसिवल
सिवसर का उदोग करं गा। िकसी एक ओर मन नही िटकता था। परनतु पतापचनद उन िवदािथयो मे से न था, िजनका सारा
उदोग वकतृता और पुसतको ही तक पिरिमत रहता है। उसके संयम और योगयता का एक छोटा भाग जनता के लाभाथर भी वयय
होता था। उसने पकृित से उदार और दयालु हृदय पाया था और सवरसाधरण से िमलन-जुलने और काम करने की योगयता उसे
िपता से िमली थी। इनही कायों मे उसका सदुतसाह पूणर रीित से पमािणत होता था। बहुधा सनधया समय वह कीटगंज और
कटरा की दुगरनधपूणर गिलयो मे घूमता िदखायी देता जहा िवशेषकर नीची जाित के लोग बसते है। िजन लोगो की परछाई से

उचचवणर का िहनदू भागता है, उनके साथ पताप टू टी खाट पर बैठ कर घंटो बाते करता और यही कारण था िक इन मुहललो के
िनवासी उस पर पाण देते थे। पेमाद और शारीिरक सुख-पलोभ ये दो अवगुण पतापचनद मे नाममात को भी न थे। कोई अनाथ
मनुषय हो पताप उसकी सहायता के िलए तैयार था। िकतनी राते उसने झोपडो मे कराहते हुए रोिगयो के िसरहाने खडे रहकर
काटी थी। इसी अिभपाय से उसने जनता का लाभाथर एक सभा भी सथािपत कर रखी थी और ढाई वषर के अलप समय मे ही इस
सभा ने जनता की सेवा मे इतनी सफलता पापत की थी िक पयागवािसयो को उससे पेम हो गया था। कमलाचरण िजस समय
पयाग पहुँचा, पतापचनद ने उसका बडा आदर िकया। समय ने उसके िचत के देष की जवाला शात कर दी थी। िजस समय वह
िवरजन की बीमारी का समाचार पाकर बनारस पहुँचा था और उससे भेट होते ही िवरजन की दशा सुधर चली थी, उसी समय
पताप चनद को िवशास हो गया था िक कमलाचरण ने उसके हृदय मे वह सथान नही पाया है जो मेरे िलए सुरिकत है। यह िवचार
देषािगन को शानत करने के िलए काफी था। इससे अितिरकत उसे पाय: यह िवचार भी उिदगन िकया करता था िक मै ही सुशीला
का पाणघातक हूँ। मेरी ही कठोर वािणयो ने उस बेचारी का पाणघात िकया और उसी समय से जब िक सुशील ने मरते समय
रो-रोकर उससे अपने अपराधो की कमा मागी थी, पताप ने मन मे ठान िलया था। िक अवसर िमलेगा तो मै इस पाप का
पायिशत अवशय करं गा। कमलाचरण का आदर-सतकार तथा िशका-सुधार मे उसे िकसी अंश मे पायिशत को पूणर करने का
अपूवर अवसर पापत हुआ। वह उससे इस पकार वयवहार रखता, जैसे छोटा भाई के साथ अपने समय का कुछ भाग उसकी
सहायता करने मे वयय करता और ऐसी सुगमता से िशकक का कतरवय पालन करता िक िशका एक रोचक कथा का रप धारण
कर लेती। परनतु पतापचनद के इन पयतो के होते हुए भी कमलाचरण का जी यहा बहुत घबराता। सारे छातवास मे उसके
सवाभावनुकूल एक मनुषय भी न था, िजससे वह अपने मन का दु :ख कहता। वह पताप से िनससंकोच रहते हुए भी िचत की
बहुत-सी बाते न कहता था। जब िनजरनता से जी अिधक घबराता तो िवरजन को कोसने लगता िक मेरे िसर पर यह सब
आपितया उसी की लादी हुई है। उसे मुझसे पेम नही। मुख और लेखनी का पेम भी कोई पेम है ? मै चाहे उस पर पाण ही कयो
न वारं , पर उसका पेम वाणी और लेखनी से बाहर न िनकलेगा। ऐसी मूितर के आगे, जो पसीजना जानती ही नही, िसर पटकने
से कया लाभ। इन िवचारो ने यहा तक जोर पकडा िक उसने िवरजन को पत िलखना भी तयाग िदया। वह बेचारी अपने पतो मे
कलेजा िनकलाकर रख देती, पर कमला उतर तक न देता। यिद देता भी तो रखा और हृदयिवदारक। इस समय िवरजन की
एक-एक बात, उसकी एक-एक चाल उसके पेम की िशिथलता का पिरचय देती हुई पतीत होती थी। हा, यिद िवसमरण हो गयी
थी तो िवरजन की सनेहमयी बाते, वे मतवाली ऑंखे जो िवयोग के समय डबडबा गयी थी और कोमल हाथ िजनहोने उससे िवनती
की थी िक पत बराबर भेजते रहना। यिद वे उसे समरण हो आते, तो समभव था िक उसे कुछ संतोष होता। परनतु ऐसे अवसरो
पर मनुषय की समरणशिकत धोखा दे िदया करती है। िनदान, कमलाचरण ने अपने मन-बहलाव का एक ढंग सोच ही िनकाला।
िजस समय से उसे कुछ जान हुआ, तभी से उसे सौनदयर-वािटका मे भमण करने की चाट पडी थी, सौनदयोपासना उसका
सवभाव हो गया था। वह उसके िलए ऐसी ही अिनवायर थी, जैसे शरीर रका के िलए भोजन। बोिडरगं हाउस से िमली हुई एक सेठ
की वािटका थी और उसकी देखभाल के िलए माली नौकर था। उस माली के सरयूदेवी नाम की एक कुँवारी लडकी थी। यदिप
वह परम सुनदरी न थी, तथािप कमला सौनदयर का इतना इचछुक न था, िजतना िकसी िवनोद की सामगी का। कोई भी सती,
िजसके शरीर पर यौवन की झलक हो, उसका मन बहलाने के िलए समुिचत थी। कमला इस लडकी पर डोरे डालने लगा।
सनधया समय िनरनतर वािटका की पटिरयो पर टहलता हुआ िदखायी देता। और लडके तो मैदान मे कसरत करते, पर
कमलाचरण वािटका मे आकर ताक-झाक िकया करता। धीरे-धीरे सरयूदेवी से पिरचय हो गया। वह उससे गजरे मोल लेता
और चौगुना मूलय देता। माली को तयोहार के समय सबसे अिधक तयोहरी कमलाचरण ही से िमलती। यहा तक िक सरयूदेवी
उसके पीित-रपी जाल का आखेट हो गयी और एक-दो बार अनधकार के पदे मे परसपर संभोग भी हो गया। एक िदन सनधया का
समय था, सब िवदाथी सैर को गये हुए थे, कमला अकेला वािटका मे टहलता था और रह-रहकर माली के झोपडो की ओर
झाकता था। अचानक झोपडे मे से सरयूदेवी ने उसे संकेत दारा बुलाया। कमला बडी शीघता से भीतर घुस गया। आज
सरयूदेवी ने मलमल की साडी पहनी थी, जो कमलाबाबू का उपहार थी। िसर मे सुगंिधत तेल डाला था, जो कमला बाबू बनारस
से लाये थे और एक छीट का सलूका पहने हुई थी, जो बाबू साहब ने उसके िलए बनवा िदया था। आज वह अपनी दृिष मे परम
सुनदरी पतीत होती थी, नही तो कमला जैसा धनी मनुषय उस पर कयो पाण देता ? कमला खटोले पर बैठा हुआ सरयूदेवी के

हाव-भाव को मतवाली दृिष से देख रहा था। उसे उस समय सरयूदेवी वृजरानी से िकसी पकार कम सुनदरी नही दीख पडती
थी। वणर मे तिनक सा अनतर था, पर यह ऐसा कोई बडा अंतर नही। उसे सरयूदेवी का पेम सचचा और उतसाहपूणर जान पडता
था, कयोिक वह जब कभी बनारस जाने की चचा करता, तो सरयूदेवी फूट-फूटकर रोने लगती और कहती िक मुझे भी लेते
चलना। मै तुमहारा संग न छोडू ँगी। कहा यह पेम की तीवरता व उतसाह का बाहुलय और कहा िवरजन की उदासीन सेवा और
िनदरयतापूणर अभयथरना ! कमला अभी भलीभाित ऑंखो को सेकने भी न पाया था िक अकसमात् माली ने आकर दार खटखटाया।
अब काटो तो शरीर मे रिधर नही। चेहरे का रंग उड गया। सरयूदेवी से िगडिगडाकर बोला- मै कहा जाऊं? सरयूदेवी का जान
आप ही शूनय हो गया, घबराहट मे मुख से शबद तक न िनकला। इतने मे माली ने िफर िकवाड खटखटाया। बेचारी सरयूदेवी
िववश थी। उसने डरते-डरते िकवाड खोल िदया। कमलाचरण एक कोने मे शास रोककर खडा हो गया। िजस पकार बिलदान
का बकरा कटार के तले तडपता है उसी पकार कोने मे खडे हुए कमला का कलेजा धजडक रहा था। वह अपने जीवन से
िनराश था और ईशर को सचचे हृदय से समरण कर रहा था और कह रहा था िक इस बार इस आपित से मुकत हो जाऊंगा तो
िफर कभी ऐसा काम न करं गा। इतने मे माली की दृिष उस पर पडी, पिहले तो घबराया, िफर िनकट आकर बोला- यह कौन
खडा है? यह कौन है ? इतना सुनना था िक कमलाचरण झपटकर बाहर िनकला और फाटक की ओर जी छोडकर भागा।
माली एक डंडा हाथ मे िलये ‘लेना-लेना, भागने न पाये?’ कहता हुआ पीछे-पीछे दौडा। यह वह कमला है जो माली को पुरसकार
व पािरतोिषक िदया करता था, िजससे माली सरकार और हुजूर कहकर बाते करता था। वही कमला आज उसी माली सममुख
इस पकार जान लेकर भागा जाता है। पाप अिगन का वह कुणड है जो आदर और मान, साहस और धैयर को कण-भर मे जलाकर
भसम कर देता है। कमलाचरण वृको और लताओं की ओट मे दौडता हुआ फाटक से बाहर िनकला। सडक पर तागा जा रहा
था, जो बैठा और हाफते-हाफते अशकत होकर गाडी के पटरे पर िगर पडा। यदिप माली ने फाटक भी पीछा न िकया था,
तथािप कमला पतयेक आने -जाने वाले पर चौक-चौककर दृिष डालता थ, मानो सारा संसार शतु हो गया है। दुभागय ने एक
और गुल िखलाया। सटेशन पर पहुँचते ही घबराहट का मारा गाडी मे जाकर बैठ गय, परनतु उसे िटकट लेने की सुिध ही न रही
और न उसे यह खबर थी िक मै िकधर जा रहा हूँ। वह इस समय इस नगर से भागना चाहता था, चाहे कही हो। कुछ दूर चला
था िक अंगेज अफसर लालटेन िलये आता िदखाई िदया। उसके संग एक िसपाही भी था। वह याितयो का िटकट देखता चला
आता था; परनतु कमला ने जान िक कोई पुिलस अफसर है। भय के मारे हाथ-पाव सनसनाने लगे, कलेजा धडकने लगा। जब
अंगेज दसूरी गिडयो मे जाच करता रहा, तब तक तो वह कलेजा कडा िकये पेकार बैठा रहा, परनतु जयो उसके िडबबे का
फाटक खुला कमला के हाथ-पाव फूल गये, नेतो के सामने अंधेरा छा गया। उतावलेपन से दूसरी ओर का िकवाड खोलकर
चलती हुई रेलगाडी पर से नीचे कूद पडा। िसपाही और रेलवाले साहब ने उसे इस पकार कूदते देखा तो समझा िक कोई
अभयसत डाकू है, मारे हषर के फूले न समाये िक पािरतोिषक अलग िमलेगा और वेतनोनित अलग होगी, झट लाल बती िदखायी।
तिनक देर मे गाडी रक गयी। अब गाडर, िसपाही और िटकट वाले साहब कुछ अनय मनुषयो के सिहत गाडी उतर गयी। अब
गाडर, िसपाही और िटकट वाले साहब कुछ अनय मुनषयो के सिहत गाडी से उतर पडे और लालटेन ले-लेकर इधर-उधर देखने
लगे। िकसी ने कहा-अब उसकी धून भी न िमलेगी, पका डकैत था। कोई बोला- इन लोगो को कालीजी का इष रहता है, जो
कुछ न कर िदखाये, थोडा है परनतु गाडर आगे ही बढता गया। वेतन वुिद की आशा उसे आगे ही िलये जाती थी। यहा तक िक
वह उस सथान पर जा पहुँचा, जहा कमेला गाडी से कूदा था। इतने मे िसपाही ने खडडे की ओर सकंकेत करके कहा- देखो,
वह शेत रंग की कया वसतु है ? मुझे तो कोई मनुषय-सा पतीत होता है और लोगो ने देखा और िवशास हो गया िक अवशय ही दुष
डाकू यहा िछपा हुआ है, चलकेर उसको घेर लो तािक कही िनकलने न पावे, तिनक सावधान रहना डाकू पाणपर खेल जाते है।
गाडर साहब ने िपसतौल सँभाली, िमया िसपाही ने लाठी तानी। कई सतीयो ने जूते उतार कर हाथ मे ले िलये िक कही आकमण
कर बैठा तो भागने मे सुभीता होगा। दो मनुषयो ने ढेले उठा िलये िक दूर ही से लकय करेगे। डाकू के िनकट कौन जाय, िकसे
जी भारी है? परनतु जब लोगो ने समीप जाकर देखा तो न डाकू था, न डाकू भाई; िकनतु एक सभय-सवरप, सुनदर वणर, छरहरे
शरीर का नवयुवक पृथवी पर औंधे मुख पडा है और उसके नाक और कान से धीरे-धीरे रिधर बह रहा है। कमला ने इधर सास
तोडी और िवरजन एक भयानक सवप देखकर चौक पडी। सरयूदेवी ने िवरजन का सोहाग लूट िलया।

दुःख-दशा / पेमचंद
सौभागयवती सती के िलए उसक पित संसार की सबसे पयारी वसतु होती है। वह उसी के िलए जीती और मारती है। उसका
हँसना-बोलना उसी के पसन करने के िलए और उसका बनाव-शृंगार उसी को लुभाने के िलए होता है। उसका सोहाग जीवन है
और सोहाग का उठ जाना उसके जीवन का अनत है। कमलाचरण की अकाल-मृतयु वृजरानी के िलए मृतयु से कम न थी।
उसके जीवन की आशाएँ और उमंगे सब िमटी मे िमल गयी। कया-कया अिभलाषाएँ थी और कया हो गय? पित-कण मृत
कमलाचरण का िचत उसके नेतो मे भमण करता रहता। यिद थोडी देर के िलए उसकी ऑखे झपक जाती, तो उसका सवरप
साकात नेतो के सममुख आ जाता। िकसी-िकसी समय मे भौितक तय-तापो को िकसी िवशेष वयिकत या कुटुमब से पेम-सा हो
जाता है। कमला का शोक शानत भी न हुआ था बाबू शयामाचरण की बारी आयी। शाखा-भेदन से वृक को मुरझाया हुआ न
देखकर इस बार दुदेव ने मूल ही काट डाला। रामदीन पाडे बडा दंभी मनुषय था। जब तक िडपटी साहब मझगाव मे थे, दबका
बैठा रहा, परनतु जयोही वे नगर को लौटे, उसी िदन से उसने उलपात करना आरमभ िकया। सारा गाव–का-गाव उसका शतु
था। िजस दृिष से मझगाव वालो ने होली के िदन उसे देखा, वह दृिष उसके हृदय मे काटे की भाित खटक रही थी। िजस
मणडल मे माझगाव िसथत था, उसके थानेदार साहब एक बडे घाघ और कुशल िरशती थे। सहसो की रकम पचा जाये, पर
डकार तक न ले। अिभयोग बनाने और पमाण गढने मे ऐसे अभयसत थे िक बाट चलते मनुषय को फास ले और वह िफर िकसी
के छुडाये न छू टे। अिधकार वगर उसक हथकणडो से िवज था, पर उनकी चतुराई और कायरदकता के आगे िकसी का कुछ बस
न चलता था। रामदीन थानेदार साहब से िमला और अपने हृदोग की औषिध मागी। उसक एक सपताह पशात् मझगाव मे डाका
पड गया। एक महाजन नगर से आ रहा था। रात को नमबरदार के यहा ठहरा। डाकुओं ने उसे लौटकर घर न जाने िदया।
पात:काल थानेदार साहब तहकीकात करने आये और एक ही रससी मे सारे गाव को बाधकर ले गये। दैवात् मुकदमा बाबू
शयामाचारण की इजलास मे पेश हुआ। उनहे पहले से सारा कचचा-िचटा िविदत था और ये थानेदार साहब बहुत िदनो से उनकी
आंखो पर चढे हुए थे। उनहोने ऐसी बाल की खाल िनकाली की थानेदार साहब की पोल खुल गयी। छ: मास तक अिभयोग चला
और धूम से चला। सरकारी वकीलो ने बडे-बडे उपाय िकये परनतु घर के भेदी से कया िछप सकता था? फल यह हुआ िक
िडपटी साहब ने सब अिभयुकतो को बेदाग छोड िदया और उसी िदन सायंकाल को थानेदार साहब मुअतल कर िदये गये। जब
िडपटी साहब फैसला सुनाकर लौटे, एक िहतिचनतक कमरचारी ने कहा- हुजूर, थानेदार साहब से सावधान रिहयेगा। आज बहुत
झललाया हुआ था। पहले भी दो-तीन अफसरो को धोखा दे चुका है। आप पर अवशय वार करेगा। िडपटी साहब ने सुना और
मुसकराकर उस मुनषय को धनयवाद िदया; परनतु अपनी रका के िलए कोई िवशेष यत न िकया। उनहे इसमे अपनी भीरता जान
पडती थी। राधा अहीर बडा अनुरोध करता रहा िक मै। आपके संग रहूँगा, काशी भर भी बहुत पीछे पडा रहा ; परनतु उनहोने
िकसी को संग न रखा। पिहले ही की तरह अपना काम करते रहे। जािलम खा बात का धनी था, वह जीवन से हाथ धोकर बाबू
शयामाचरण के पीछे पड गया। एक िदन वे सैर करके िशवपुर से कुछ रात गये लौट रहे थे पागलखाने के िनकट कुछ िफिटन
का घोडा िबदका गाडी रक गयी और पलभर मे जािलम खा ने एक वृक की आड से िपसतौल चलायी। पडाके का शबद हुआ और
बाबू शयामाचरण के वकसथल से गोली पार हो गयी। पागलखाने के िसपाही दौडे। जािलम खा पकड िलय गया, साइस ने उसे
भागने न िदया था। इस दुघरटनाओं ने उसके सवभाव और वयवहार मे अकसमात बडा भारी पिरवतरन कर िदया। बात-बात पर
िवरजन से िचढ जाती और कटू िकतयो से उसे जलाती। उसे यह भम हो गया िक ये सब आपाितया इसी बहू की लायी हई है।
यही अभािगन जब से घर आयी, घर का सतयानाश हो गया। इसका पौरा बहुत िनकृष है। कई बार उसने खुलकर िवरजन से
कह भी िदया िक-तुमहारे िचकने रप ने मुझे ठग िलया। मै कया जानती थी िक तुमहारे चरण ऐसे अशुभ है ! िवरजन ये बाते सुनती
और कलेजा थामकर रह जाती। जब िदन ही बुरे आ गये, तो भली बाते कयोकर सुनने मे आये। यह आठो पहर का ताप उसे
दु :ख के आंसू भी न बहाने देता। आँसूं तब िनकलते है। जब कोई िहतैषी हा और दुख को सुने। ताने और वयंगय की अिगन से
ऑंसू जल जाते है। एक िदन िवरजन का िचत बैठे-बैठे घर मे ऐसा घबराया िक वह तिनक देर के िलए वािटका मे चली आयी।
आह ! इस वािटका मे कैस-े कैसे आननद के िदन बीते थे ! इसका एक-एक पध मरने वाले के असीम पेम का समारक था। कभी

वे िदन भी थे िक इन फूलो और पितयो को देखकर िचत पफुिललत होता था और सुरिभत वायु िचत को पमोिदत कर देती थी।
यही वह सथल है, जहा अनेक सनधयाऍं पेमालाप मे वयतीत हुई थी। उस समय पुषपो की किलया अपने कोमल अधरो से उसका
सवागत करती थी। पर शोक! आज उनके मसतक झुके हुए और अधर बनद थे। कया यह वही सथान न था जहा ‘अलबेली
मािलन’ फूलो के हार गूंथती थी? पर भोली मािलन को कया मालूम था िक इसी सथान पर उसे अपने नेतरे से िनकले हुए मोितयो
को हार गूँथने पडेगे। इनही िवचारो मे िवरजन की दृिष उस कु ंज की ओर उठ गयी जहा से एक बार कमलाचरण मुसकराता
हुआ िनकला था, मानो वह पितयो का िहलना और उसके वसतरे की झलक देख रही है। उससे मुख पर उसे समय मनद-मनद
मुसकान-सी पकट होती थी, जैसे गंगा मे डू बते हुशरयर की पीली और मिलन िकणे का पितिबमब पडता है। आचानक पेमवती ने
आकर कणरकटु शबदो मे कहा- अब आपका सैर करने का शौक हुआ है ! िवरजन खडी हो गई और रोती हुई बोली-माता ! िजसे
नारायण ने कुचला, उसे आप कयो कुचलती है ! िनदान पेमवती का िचत वहा से ऐसा उचाट हुआ िक एक मास के भीतर सब
सामान औने -पौने बेचकर मझगाव चली गयी। वृजरानी को संग न िलया। उसका मुख देखने से उसे घृणा हो गयी थी। िवरजन
इस िवसतृत भवन मे अकेली रह गयी। माधवी के अितिरकत अब उसका कोई िहतैषी न रहा। सुवामा को अपनी मुँहबोली बेटी
की िवपितयो का ऐसा हीशेक हुआ, िजतना अपनी बेटी का होता। कई िदन तक रोती रही और कई िदन बराबर उसे सझाने के
िलए आती रही। जब िवरजन अकेली रह गयी तो सुवमा ने चाहा हहक यह मेरे यहा उठ आये और सुख से रहे। सवयं कई बार
बुलाने गयी, पर िवररजन िकसी पकार जाने को राजी न हुई। वह सोचती थी िक ससुर को संसार से िसधारे भी तीन मास भी
नही हुए, इतनी जलदी यह घर सूना हो जायेगा, तो लोग कहेगे िक उनके मरते ही सास और बेहु लड मरी। यहा तक िक उसके
इस हठ से सुवामा का मन मोटा हो गया। मझगाव मे पेमवती ने एक अंधेर मचा रखी थी। असािमयो को कटु वजन कहती।
कािरनदा के िसर पर जूती पटक दी। पटवारी को कोसा। राधा अहीर की गाय बलात् छीन ली। यहा िक गाव वाले घबरा गये !
उनहोने बाबू राधाचरण से िशकायत की। राधाचण ने यह समाचार सुना तो िवशास हो गया िक अवशय इन दुघरटनाओं ने अममा
की बुिद भष कर दी है। इस समय िकसी पकार इनका मन बहलाना चािहए। सेवती को िलखा िक तुम माताजी के पास चली
जाओ और उनके संग कुछ िदन रहो। सेवती की गोद मे उन िदनो एक चाद-सा बालक खेल रहा था और पाणनाथ दो मास की
छुटी लेकर दरभंगा से आये थे। राजा साहब के पाइवेट सेकटेरी हो गये थे। ऐसे अवसर पर सेवती कैस आ सकती थी?
तैयािरया करते-करते महीनो गुजर गये। कभी बचचा बीमार पड गया, कभी सास रष हो गयी कभी साइत न बनी। िनदान छठे
महीने उसे अवकाश िमला। वह भी बडे िवपितयो से। परनतु पेमवती पर उसक आने का कुछ भी पभाव न पडा। वह उसके गले
िमलकर रोयी भी नही, उसके बचचे की ओर ऑंख उठाकर भी न देखा। उसक हृदय मे अब ममता और पेम नाम-मात को भी न
रह गयाञ। जैसे ईख से रस िनकाल लेने पर केवल सीठी रह जाती है, उसकी पकार िजस मनुषय के हृदय से पेम िनकल गया,
वह अिसथ-चमर का एक ढेर रह जाता है। देवी-देवता का नाम मुख पर आते ही उसके तेवर बदल जाते थे। मझागाव मे
जनमाषमी हुई। लोगो ने ठाकुरजी का वरत रख और चनदे से नाम कराने की तैयािरया करने लगे। परनतु पेमवती ने ठीक जनम
के अवसर पर अपने घर की मूितर खेत से िफकवा दी। एकादशी बत टू टा, देवताओं की पूजा छू टी। वह पेमवती अब पेमवती ही
न थी। सेवती ने जयो-तयो करके यहा दो महीने काटे। उसका िचत बहुत घबराता। कोई सखी-सहेली भी न थी, िजसके संग
बैठकर िदन काटती। िवरजन ने तुलसा को अपनी सखी बना िलया था। परनतु सेवती का सभव सरल न था। ऐसी सतीयो से
मेल-जोल करने मे वह अपनी मानहािन समझती थी। तुलसा बेचारी कई बार आयी, परनतु जब दख िक यह मन खोलकर नही
िमलती तो आना-जाना छोड िदया। तीन मास वयतीत हो चुके थे। एक िदन सेवती िदन चढे तक सोती रही। पाणनाथ ने रात
को बहुत रलाया था। जब नीद उचटी तो कया देखती है िक पेमवती उसके बचचे को गोद मे िलय चूम रही है। कभी आखे से
लगाती है , कभी छाती से िचपटाती है। सामने अंगीठी पर हलुवा पक रहा है। बचचा उसकी ओर उंगली से संकेत करके
उछलता है िक कटोरे मे जा बैठूँ और गरम-गरम हलुवा चखूँ। आज उसक मुखमणडल कमल की भाित िखला हुआ है। शायद
उसकी तीवर दृिष ने यह जान िलया है िक पेमवती के शुषक हृदय मे पेमे ने आज िफर से िनवास िकया है। सेवती को िवशास न
हुआ। वह चारपाई पर पुलिकत लोचनो से ताक रही थी मानो सवप देख रही थी। इतने मे पेमवती पयार से बोली- उठो बेटी !
उठो ! िदन बहुत चढ आया है। सेवती के रोगटे खडे हो गओ और आंखे भर आयी। आज बहुत िदनो के पशात माता के मुख से
पेममय बचन सुने। झट उठ बैठी और माता के गले िलपट कर रोने लगी। पेमवती की खे से भी आंसू की झडी लग गयीय,

सूखा वृक हरा हुआ। जब दोनो के ऑंसू थमे तो पेमवती बोली-िसतो ! तुमहे आज यह बाते अचरज पतीत होती है ; हा बेटी,
अचरज ही न। मै कैसे रोऊं, जब आंखो मे आंसू ही रहे? पयार कहा से लाऊं जब कलेजा सूखकर पतथर हो गया? ये सब िदनो
के फेर है। ऑसू उनके साथ गये और कमला के साथ। अज न जाने ये दो बूँद कहा से िनकल आये? बेटी ! मेरे सब अपराध
कमा करना। यह कहते-कहते उसकी ऑखे झपकने लगी। सेवती घबरा गयी। माता हो िबसतर पर लेटा िदया और पख झलने
लगी। उस िदन से पेमवती की यह दशा हो गयी िक जब देखो रो रही है। बचचे को एक कण िलए भी पास से दूर नही करती।
महिरयो से बोलती तो मुख से फूल झडते। िफर वही पिहले की सुशील पेमवती हो गयी। ऐसा पतीत होता था, मानो उसक हृदय
पर से एक पदा-सा उठ गया है ! जब कडाके का जाडा पडता है, तो पाय: निदया बफर से ढँक जाती है। उसमे बसनेवाले
जलचर बफर मे पदे के पीछे िछप जाते है, नौकाऍं फँस जाती है और मंदगित, रजतवणर पाण-संजीवन जल-सोत का सवरप कुछ
भी िदखायी नही देता है। यदिप बफर की चदर की ओट मे वह मधुर िनदा मे अलिसत पडा रहता था, तथािप जब गरमी का
सामाजय होता है, तो बफर िपघल जाती है और रजतवणर नदी अपनी बफर का चदर उठा लेती है, िफर मछिलया और जलजनतु आ
बहते है, नौकाओं के पाल लहराने लगते है और तट पर मनुषयो और पिकयो का जमघट हो जाता है। परनतु पेमवती की यह दशा
बहुत िदनो तक िसथर न रही। यह चेतनता मानो मृतयु का सनदेश थी। इस िचतोिदगनता ने उसे अब तक जीवन-कारावास मे
रखा था, अनथा पेमवती जैसी कोमल-हृदय सती िवपितयो के ऐसे झोके कदािप न सह सकती। सेवती ने चारो ओर तार
िदलवाये िक आकर माताजी को देख जाओ पर कही से कोई न आया। पाणनाथ को छुटी न िमली, िवरजन बीमार थी, रहे
राधाचरण। वह नैनीताल वायु-पिरवतरन करने गये हुए थे। पेमवती को पुत ही को देखने की लालसा थी, पर जब उनका पत आ
गया िक इस समय मै नही आ सकता, तो उसने एक लमबी सास लेकर ऑंखे मूँद ली, और ऐसी सोयी िक िफर उठना नसीब न
हुआ !

मन का पाबलय / पेमचंद
मानव हृदय एक रहसयमय वसतु है। कभी तो वह लाखो की ओर ऑख उठाकर नही देखता और कभी कौिडयो पर िफसल पडता
है। कभी सैकडो िनदरषो की हतया पर आह ‘तक’ नही करता और कभी एक बचचे को देखकर रो देता है। पतापचनद और
कमलाचरण मे यदिप सहोदर भाइयो का-सा पेम था, तथािप कमला की आकिसमक मृतयु का जो शोक चािहये वह न हुआ।
सुनकर वह चौक अवशय पडा और थोडी देर के िलए उदास भी हुआ, पर शोक जो िकसी सचचे िमत की मृतयु से होता है उसे न
हुआ। िनससंदेह वह िववाह के पूवर ही से िवरजन को अपनी समझता था तथािप इस िवचार मे उसे पूणर सफलता कभी पापत न
हुई। समय-समय पर उसका िवचार इस पिवत समबनध की सीमा का उललंघन कर जाता था। कमलाचरण से उसे सवत: कोई
पेम न था। उसका जो कुछ आदर, मान और पेम वह करता था, कुछ तो इस िवचार से िक िवरजन सुनकर पसन होगी और इस
िवचार से िक सुशील की मृतयु का पायिशत इसी पकार हो सकता है। जब िवरजन ससुराल चली आयी, तो अवशय कुछ िदनो
पताप ने उसे अपने धयान मे न आने िदया, परनतु जब से वह उसकी बीमारी का समाचार पाकर बनारस गया था और उसकी भेट
ने िवरजन पर संजीवनी बूटी का काम िकया था, उसी िदन से पताप को िवशास हो गया था िक िवरजन के हृदय मे कमला ने वह
सथान नही पाया जो मेरे िलए िनयत था। पताप ने िवरजन को परम करणापूणर शोक-पत िलखा पर पत िलखता जाता था और
सोचता जाता था िक इसका उस पर कया पभाव होगा? सामानयत: समवेदना पेम को पौढ करती है। कया आशयर है जो यह पत
कुछ काम कर जाय? इसके अितिरकत उसकी धािमरक पवृित ने िवकृत रप धारण करके उसके मन मे यह िमथया िवचार उतपन
िकया िक ईशर ने मेरे पेम की पितषा की और कमलाचरण को मेरे मागर से हटा िदया, मानो यह आकाश से आदेश िमला है िक
अब मै िवरजन से अपने पेम का पुरसकार लूँ। पताप यह जो जानता था िक िवरजन से िकसी ऐसी बात की आशा करना, जो
सदाचार और सभयता से बाल बराबर भी हटी हुई हो, मूखरता है। परनतु उसे िवशास था िक सदाचार और सतीतव के सीमानतगरत
यिद मेरी कामनाएँ पूरी हो सके, तो िवरजन अिधक समय तक मेरे साथ िनदरयता नही कर सकती। एक मास तक ये िवचार उसे
उिदगन करते रहे। यहा तक िक उसके मन मे िवरजन से एक बार गुपत भेट करने की पबल इचछा भी उतपन हुई। वह यह
जानता था िक अभी िवरजन के हृदय पर तातकािलकघव है और यिद मेरी िकसी बात या िकसी वयवहार से मेरे मन की दुशेषा

की गनध िनकली, तो मै िवरजन की दृिष से हमश के िलए िगर जाऊगा। परनतु िजस पकार कोई चोर रपयो की रािश देखकर
धैयर नही रख सकता है, उसकी पकार पताप अपने मन को न रोक सका। मनुषय का पारबध बहुत कुछ अवसर के हाथ से रहता
है। अवसर उसे भला नही मानता है और बुरा भी। जब तक कमलाचरण जीिवत था, पताप के मन मे कभी इतना िसर उठाने
को साहस न हुआ था। उसकी मृतयु ने मानो उसे यह अवसर दे िदया। यह सवाथरपता का मद यहा तक बढा िक एक िदन उसे
ऐसाभस होने लगा, मानो िवरजन मुझे समरण कर रही है। अपनी वयगता से वह िवरजन का अनुमान करेन लगा। बनारस जाने
का इरादा पका हो गया। दो बजे थे। राित का समय था। भयावह सनाटा छाया हुआ था। िनदा ने सारे नगर पर एक घटाटोप
चादर फैला रखी थी। कभी-कभी वृको की सनसनाहट सुनायी दे जाती थी। धुआं और वृको पर एक काली चदर की भाित
िलपटा हुआ था और सडक पर लालटेने धुऍं की कािलमा मे ऐसी दृिष गत होती थी जैसे बादल मे िछपे हुए तारे। पतापचनद
रेलगाडी पर से उतरा। उसका कलेजा बासो उछल रहा था और हाथ-पाव काप रहे थे। वह जीवन मे पहला ही अवसर था िक
उसे पाप का अनुभव हुआ! शोक है िक हृदय की यह दशा अिधक समय तक िसथर नही रहती। वह दुगरनध-मागर को पूरा कर
लेती है। िजस मनुषय ने कभी मिदरा नही पी, उसे उसकी दुगरनध से घृणा होती है। जब पथम बार पीता है, तो घणटे उसका मुख
कडवा रहता है और वह आशयर करता है िक कयो लोग ऐसी िवषैली और कडवी वसतु पर आसकत है। पर थोडे ही िदनो मे
उसकी घृणा दूर हो जाती है और वह भी लाल रस का दास बन जाता है। पाप का सवाद मिदरा से कही अिधक भंयकर होता
है। पतापचनद अंधेरे मे धीरे-धीरे जा रहा था। उसके पाव पेग से नही उठते थे कयोिक पाप ने उनमे बेिडया डाल दी थी। उस
आहलाद का, जो ऐसे अवसर पर गित को तीवर कर देता है, उसके मुख पर कोई लकण न था। वह चलते-चलते रक जाता और
कुछ सोचकर आगे बढता था। पेत उसे पास के खडडे मे कैसा िलये जाता है? पताप का िसर धम-धम कर रहा था और भय से
उसकी िपंडिलया काप रही थी। सोचता-िवचारता घणटे भर मे मुनशी शयामाचरण के िवशाल भवन के सामने जा पहुँचा। आज
अनधकार मे यह भवन बहुत ही भयावह पतीत होता था, मानो पाप का िपशाच सामने खडा है। पताप दीवार की ओट मे खडा हो
गया, मानो िकसी ने उसक पाव बाध िदये है। आध घणटे तक वह यही सोचता रहा िक लौट चलूँ या भीतर जाऊ? यिद िकसी ने
देख िलया बडा ही अनथर होगा। िवरजन मुझे देखकर मन मे कया सोचेगी? कही ऐसा न हो िक मेरा यह वयवहार मुझे सदा के
िलए उसकी िदष से िगरा दे। परनतु इन सब सनदेहो पर िपशाच का आकषरण पबल हुआ। इिनदयो के वश मे होकर मनुषय को
भले-बुरे का धयान नही रह जाता। उसने िचत को दृढ िकया। वह इस कायरता पर अपने को िधकार देने लगा, तदनतर घर मे
पीछे की ओर जाकर वािटका की चहारदीवारी से फाद गया। वािटका से घर जाने के िलए एक छोटा-सा दार था। दैवयेग से वह
इस समय खुला हुआ था। पताप को यह शकुन-सा पतीत हुआ। परनतु वसतुत: यह अधमर का दार था। भीतर जाते हुए पताप
के हाथ थराने लगे। हृदय इस वेग से धडकता था; मानो वह छाती से बाहर िनकल पडेगा। उसका दम घुट रहा था। धमर ने
अपना सारा बल लगा िदया। पर मन का पबल वेग न रक सका। पताप दार के भीतर पिवष हुआ। आंगन मे तुलसी के चबूतरे
के पास चोरो की भाित खडा सोचने लगा िक िवरजन से कयोकर भेट होगी? घर के सब िकवाड बनद है? कया िवरजन भी यहा
से चली गयी? अचानक उसे एक बनद दरवाजे की दरारो से पेकाश की झलक िदखाई दी। दबे पाव उसी दरार मे ऑंखे लगाकर
भीतर का दृशय देखने लगा। िवरजन एक सफेद साडी पहले, बाल खोले, हाथ मे लेखनी िलये भूिम पर बैठी थी और दीवार की
ओर देख-देखकर कागेज पर िलखती जाती थी, मानो कोई किव िवचार के समुद से मोती िनकाल रहा है। लखनी दातो तले
दबाती, कुछ सोचती और िलखती िफर थोडी देर के पशात् दीवार की ओर ताकने लगती। पताप बहुत देर तक शास रोके हुए
यह िविचत दृशय देखता रहा। मन उसे बार-बार ठोकर देता, पर यह धरम का अिनतम गढ था। इस बार धमर का परािजत होना
मानो हृदाम मे िपशाच का सथान पाना था। धमर ने इस समय पताप को उस खडडे मे िगरने से बचा िलया, जहा से आमरण उसे
िनकलने का सौभागय न होता। वरन् यह कहना उिचत होगा िक पाप के खडडे से बचानेवाला इस समय धमर न था, वरन्
दुषपिरणाम और लजजा का भय ही था। िकसी-िकसी समय जब हमारे सदभाव परािजत हो जाते है, तब दुषपिरणाम का भय ही
हमे कतरवयचयुत होने से बचा लेता है। िवरजन को पीले बदन पर एक ऐसा तेज था, जो उसके हृदय की सवचछता और िवचार
की उचचता का पिरचय दे रहा था। उसके मुखमणडल की उजजवलता और दृिष की पिवतता मे वह अिगन थी ; िजसने पताप की
दुशेषाओं को कणमात मे भसम कर िदया ! उसे जान हो गया और अपने आितमक पतन पर ऐसी लजजा उतपन हुई िक वही खडा
रोने लगा। इिनदयो ने िजतने िनकृष िवकार उसके हृदय मे उतपन कर िदये थे, वे सब इस दृशय ने इस पकार लोप कर िदये,

जैसे उजाला अंधेरे को दूर कर देता है। इस समय उसे यह इचछा हुई िक िवरजन के चरणो पर िगरकर अपने अपराधो की कमा
मागे। जैसे िकसी महातमा संनयासी के सममुख जाकर हमारे िचत की दशा हो जाती है, उसकी पकार पताप के हृदय मे सवत:
पायिशत के िवचार उतपन हुए। िपशाच यहा तक लाया, पर आगे न ले जा सका। वह उलटे पावो िफरा और ऐसी तीवरता से
वािटका मे आया और चाहरदीवारी से कूछा, मानो उसका कोई पीछा करता है। अरणोदय का समय हो गया था, आकाश मे तारे
िझलिमला रहे थे और चकी का घुर-घुर शबद करणगोचर हो रहा था। पताप पाव दबाता, मनुषयो की ऑंखे बचाता गंगाजी की ओर
चला। अचानक उसने िसर पर हाथ रखा तो टोपी का पता न था और जेब जेब मे घडी ही िदखाई दी। उसका कलेजा सन-से
हो गया। मुहॅ से एक हृदय-वेधक आह िनकल पडी। कभी-कभी जीवन मे ऐसी घटनाए हो जाती है, जो कणमात मे मनुषय का
रप पलट देती है। कभी माता-िपता की एक ितरछी िचतवन पुत को सुयश के उचच िशखर पर पहुँचा देती है और कभी सती की
एक िशका पित के जान-चकुओं को खोल देती है। गवरशील पुरष अपने सगो की दृिषयो मे अपमािनत होकर संसार का भार
बनना नही चाहते। मनुषय जीवन मे ऐसे अवसर ईशरदत होते है। पतापचनद के जीवन मे भी वह शुभ अवसर था, जब वह
संकीणर गिलयो मे होता हुआ गंगा िकनारे आकर बैठा और शोक तथा लजजा के अशु पवािहत करने लगा। मनोिवकार की
पेरणाओं ने उसकी अधोगित मे कोई कसर उठा न रखी थी परनतु उसके िलए यह कठोर कृपालु गुर की ताडना पमािणत हुई।
कया यह अनुभविसद नही है िक िवष भी समयानुसार अमृत का काम करता है ? िजस पकार वायु का झोका सुलगती हुई अिगन
को दहका देता है, उसी पकार बहुधा हृदय मे दबे हुए उतसाह को भडकाने के िलए िकसी बाह उदोग की आवशयकता होती है।
अपने दुखो का अनुभव और दूसरो की आपित का दृशय बहुधा वह वैरागय उतपन करता है जो सतसंग, अधययन और मन की
पवृित से भी संभव नही। यदिप पतापचनद के मन मे उतम और िनसवाथर जीवन वयतीत करने का िवचार पूवर ही से था, तथािप
मनोिवकार के धके ने वह काम एक ही कण मे पूरा कर िदया, िजसके पूरा होने मे वषर लगते। साधारण दशाओं मे जाित-सेवा
उसके जीवन का एक गौण कायर होता, परनतु इस चेतावनी ने सेवा को उसके जीवन का पधान उदेशय बना िदया। सुवामा की
हािदरक अिभलाषा पूणर होने के सामान पैदा हो गये। कया इन घटनाओं के अनतगरत कोई अजात पेरक शािकत थी? कौन कह
सकता है?
िवदुषी वृजरानी / पेमचंद

जब से मुंशी संजीवनलाल तीथर याता को िनकले और पतापचनद पयाग चला गया उस समय से सुवामा के जीवन मे बडा अनतर
हो गया था। वह ठेके के कायर को उनत करने लगी। मुंशी संजीवनलाल के समय मे भी वयापार मे इतनी उनित नही हुई थी।
सुवामा रात-रात भर बैठी ईट-पतथरो से माथा लडाया करती और गारे-चूने की िचंता मे वयाकुल रहती। पाई-पाई का िहसाब
समझती और कभी-कभी सवयं कुिलयो के कायर की देखभाल करती। इन कायो मे उसकी ऐसी पवृित हुई िक दान और वरत से
भी वह पहले का-सा पेम न रहा। पितिदन आय वृिद होने पर भी सुवामा ने वयय िकसी पकार का न बढाया। कौडी-कौडी दातो से
पकडती और यह सब इसिलए िक पतापचनद धनवान हो जाए और अपने जीवन-पयरनत सानद रहे।
सुवामा को अपने होनहार पुत पर अिभमान था। उसके जीवन की गित देखकर उसे िवशास हो गया था िक मन मे जो अिभलाषा
रखकर मैने पुत मागा था, वह अवशय पूणर होगी। वह कालेज के िपंिसपल और पोफेसरो से पताप का समाचार गुपत रीित से
िलया करती थी ओर उनकी सूचनाओं का अधययन उसके िलए एक रसेचक कहानी के तुलय था। ऐसी दशा मे पयाग से
पतापचनद को लोप हो जाने का तार पहुँचा मानो उसके हुदय पर वज का िगरना था। सुवामा एक ठणडी सासे ले, मसतक पर
हाथ रख बैठ गयी। तीसरे िदन पतापचनद की पुसत, कपडे और सामिगया भी आ पहुँची, यह घाव पर नमक का िछडकाव था।
पेमवती के मरे का समाचार पाते ही पाणनाथ पटना से और राधाचरण नैनीताल से चले। उसके जीते-जी आते तो भेट हो जाती,
मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने को सौभागय न हुआ। मृतक-संसकार बडी धूम से िकया गया। दो सपताह गाव मे बडी
धूम-धाम रही। ततपशात् मुरादाबाद चले गये और पाणनाथ ने पटना जाने की तैयारी पारमभ कर दी। उनकी इचछा थी िक

सतीको पयाग पहुँचाते हुए पटना जायँ। पर सेवती ने हठ िकया िक जब यहा तक आये है, तो िवरजन के पास भी अवशय चलना
चािहए नही तो उसे बडा दु :ख होगा। समझेगी िक मुझे असहाय जानकर इन लोगो ने भी तयाग िदया।
सेवती का इस उचाट भवन मे आना मानो पुषपो मे सुगनध मे आना था। सपताह भर के िलए सुिदन का शुभागमन हो गया।
िवरजन बहुत पसन हुई और खूब रोयी। माधवी ने मुनू को अंक मे लेकर बहुत पयार िकया।
पेमवती के चले जाने पर िवरजन उस गृह मे अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास थी। हृदय-ताप और मानिसक दु :ख
ने उसका वह गुण पकट कर िदया, जा अब तक गुपत था। वह कावय और पद-रचना का अभयास करने लगी। किवता सचची
भावनाओं का िचत है और सचची भावनाएँ चाहे वे दु :ख हो या सुख की, उसी समय समपन होती है जब हम दु :ख या सुख का
अनुभव करते है। िवरजन इन िदनो रात-रात बैठी भाष मे अपने मनोभावो के मोितयो की माला गूँथा करती। उसका एक-एक
शबद करणा और वैरागय से पिरवूणर होता था अनय किवयो के मनो मे िमतो की वहा-वाह और कावय-पेितयो के साधुवाद से
उतसाह पैदा होता है, पर िवरजन अपनी दु :ख कथा अपने ही मन को सुनाती थी।
सेवती को आये दो- तीन िदन बीते थे। एक िदन िवरजन से कहा- मै तुमहे बहुधा िकसी धयान मे मगन देखती हूँ और कुछ िलखते
भी पाती हँू। मुझे न बताओगी? िवरजन लिजजत हो गयी। बहाना करने लगी िक कुछ नही, यो ही जी कुछ उदास रहता है।
सेवती ने कहा-मैन मानूँगी। िफर वह िवरजनका बाकस उठा लायी, िजसमे किवता के िदवय मोती रखे हुए थे। िववश होकर
िवरजन ने अपने नय पद सुनाने शुर िकये। मुख से पथम पद का िनकलना था िक सेवती के रोएँ खडे हो गये और जब तक
सारा पद समापत न हुआ, वह तनमय होकर सुनती रही। पाणनाथ की संगित ने उसे कावय का रिसक बना िदया था। बार-बार
उसके नेत भर आते। जब िवरजन चुप हो गयी तो एक समा बँधा हुआ था मानो को कोई मनोहर राग अभी थम गया है। सेवती
ने िवरजन को कणठ से िलपटा िलया, िफर उसे छोडकर दौडी हुई पाणनाथ के पास गयी, जैसे कोई नया बचचा नया िखलोना
पाकर हषर से दौडता हुआ अपने सािथयो को िदखाने जाता है। पाणनाथ अपने अफसर को पाथरना-पत िलख रहे थे िक मेरी
माता अित पीिडता हो गयी है, अतएव सेवा मे पसतुत होने मे िवलमब हुआ। आशा करता हूँ िक एक सपताह का आकिसमक
अवकाश पदान िकया जायगा। सेवती को देखकर चट आपना पाथरना-पत िछपा िलया और मुसकराये। मनुषय कैसा धूतर है! वह
अपने आपको भी धोख देने से नही चूकता।
सेवती- तिनक भीतर चलो, तुमहे िवरजन की किवता सुनवाऊं, फडक उठोगे।
पाण 0- अचछा, अब उनहे किवता की चाट हुई है? उनकी भाभी तो गाया करती थी – तुम तो शयाम बडे बेखबर हो।
सेवती- तिनक चलकर सुनो, तो पीछे हॅसना। मुझे तो उसकी किवता पर आशयर हो रहा है।
पाण 0- चलो, एक पत िलखकर अभी आता हूं।
सेवती- अब यही मुझे अचछा नही लगता। मै आपके पत नोच डालूंगी।
सेवती पाणनाथ को घसीट ले आयी। वे अभी तक यही जानते थे िक िवरजन ने कोई सामानय भजन बनाया होगा। उसी को
सुनाने के िलए वयाकुल हो रही होगी। पर जब भीतर आकर बैठे और िवरजन ने लजाते हुए अपनी भावपूणर किवता ‘पेम की
मतवाली’ पढनी आरमभ की तो महाशय के नेत खुल गये। पद कया था, हृदय के दुख की एक धारा और पेम –रहसय की एक
कथा थी। वह सुनते थे और मुगध होकर झुमते थे। शबदो की एक-एक योजना पर, भावो के एक-एक उदगार पर लहालोट हुए
जाते थे। उनहोने बहुतेरे किवया के कावय देखे थे, पर यह उचच िवचार, यह नूतनता, यह भावोतकषर कही दीख न पडा था। वह
समय िचितत हो रहा था जब अरणोदय के पूवर मलयािनल लहराता हुआ चलता है, किलया िवकिसत होती है, फूल महकते है
और आकाश पर हलकी लािलमा छा जाती है। एक –एक शबद मे नविवकिसत पुषपो की शोभा और िहमिकरणो की शीतलता
िवदमान थी। उस पर िवरजन का सुरीलापन और धविन की मधुरता सोने मे सुगनध थी। ये छनद थे, िजन पर िवरजन ने हृदय
को दीपक की भॉँित जलाया था। पाणनाथ पहसन के उदेशय से आये थे। पर जब वे उठे तो वसतुत: ऐसा पतीत होता था, मानो
छाती से हृदय िनकल गया है। एक िदन उनहोने िवरजन से कहा- यिद तुमहारी किवताऍं छपे, तो उनका बहुत आदर हो।

िवरजन ने िसर नीचा करके कहा- मुझे िवशास नही िक कोई इनको पसनद करेगा।

पाणनाथ- ऐसा संभव ही नही। यिद हृदयो मे कुछ भी रिसकता है तो तुमहारे कावय की अवशय पितषा होगी। यिद ऐसे लोग
िवदमान है, जो पुषपो की सुगनध से आनिनदत हो जाते है, जो पिकयो के कलरव और चादनी की मनोहािरणी छटा का आननद उठा
सकते है, तो वे तुमहारी किवता को अवशय हृदय मे सथान देगे। िवरजन के हदय मे वह गुदगुदी उतपन हुई जो पतयेक किव को
अपने कावयिचनतन की पशंसा िमलने पर, किवता के मुिदत होने के िवचार से होती है। यदिप वह नही–नही करती रही, पर वह,
‘नही’, ‘हा’ के समान थी। पयाग से उन िदनो ‘कमला’ नाम की अचछी पितका िनकलती थी। पाणनाथ ने ‘पेम की मतवाली’ को
वहा भेज िदया। समपादक एक कावय–रिसक महानुभाव थे किवता पर हािदरक धनयवाद िदया ओर जब यह किवता पकािशत हुई,
तो सािहतय–संसार मे धूम मच गयी। कदािचत ही िकसी किव को पथम ही बार ऐसी खयाित िमली हो। लोग पढते और िवसमय
से एक-दूसरे का मुंह ताकते थे। कावय–पेिमयो मे कई सपताह तक मतवाली बाला के चचे रहे। िकसी को िवशास ही न आता
था िक यह एक नवजात किव की रचना है। अब पित मास ‘कमला’ के पृष िवरजन की किवता से सुशोिभत होने लगे और
‘भारत मिहला’ को लोकमत ने किवयो के सममािनत पद पर पहंुचा िदया। ‘भारत मिहला’ का नाम बचचे-बचचे की िजहवा पर चढ
गया। को इस समाचार-पत या पितका ‘भारत मिहला’ को ढू ढने लगते। हा, उसकी िदवय शिकतया अब िकसी को िवसमय मे न
डालती उसने सवयं किवता का आदशर उचच कर िदया था।
तीन वषर तक िकसी को कुछ भी पता न लगा िक ‘भारत मिहला’ कौन है। िनदान पाण नाथ से न रहा गया। उनहे िवरजन पर
भिकत हो गयी थी। वे कई मास से उसका जीवन –चिरत िलखने की धुन मे थे। सेवती के दारा धीरे-धीरे उनहोने उसका सब
जीवन चिरत जात कर िदया और ‘भारत मिहला’ के शीषरक से एक पभाव–पूिरत लेख िलया। पाणनाथ ने पिहले लेख न िलखा
था, परनतु शदा ने अभयास की कमी पूरी कर दी थी। लेख अतयनत रोचक, समालोचनातमक और भावपूणर था।
इस लेख का मुिदत होना था िक िवरजन को चारो तरफ से पितषा के उपहार िमलने लगे। राधाचरण मुरादाबाद से उसकी भेट
को आये। कमला, उमादेवी, चनदकुवरं और सिखया िजनहोने उसे िवसमरण कर िदया था पितिदन िवरजन के दशनों को आने
लगी। बडे बडे गणमानय सजजन जो ममता के अभीमान से हिकमो के सममुख िसर न झुकाते, िवरजन के दार पर दशनर को आते
थे। चनदा सवयं तो न आ सकी, परनतु पत मे िलखा – जो चाहता है िक तुमहारे चरणे पर िसर रखकर घंटो रोऊँ।
माधवी / पेमचंद
कभी–कभी वन के फूलो मे वह सुगिनधत और रंग-रप िमल जाता है जो सजी हुई वािटकाओं को कभी पापत नही हो सकता।
माधवी थी तो एक मूखर और दिरद मनुषय की लडकी, परनतु िवधाता ने उसे नािरयो के सभी उतम गुणो से सुशोिभत कर िदया
था। उसमे िशका सुधार को गहण करने की िवशेष योगयता थी। माधवी और िवरजन का िमलाप उस समय हुआ जब िवरजन
ससुराल आयी। इस भोली–भाली कनया ने उसी समय से िवरजन के संग असधारण पीित पकट करनी आरमभ की। जात नही,
वह उसे देवी समझती थी या कया? परनतु कभी उसने िवरजन के िवरद एक शबद भी मुख से न िनकाला। िवरजन भी उसे अपने
संग सुलाती और अचछी–अचछी रेशमी वसत पिहनाती इससे अिधक पीित वह अपनी छोटी भिगनी से भी नही कर सकती थी।
िचत का िचत से समबनध होता है। यिद पताप को वृजरानी से हािदरक समबनध था तो वृजरानी भी पताप के पेम मे पगी हुई थी।
जब कमलाचरण से उसके िववाह की बात पकी हुई जो वह पतापचनद से कम दुखी न हुई। हा लजजावश उसके हृदय के भाव
कभी पकट न होते थे। िववाह हो जाने के पशात उसे िनतय िचनता रहती थी िक पतापचनद के पीिडत हृदय को कैसे तसलली
दूं? मेरा जीवन तो इस भाित आननद से बीतता है। बेचारे पताप के ऊपर न जाने कैसी बीतती होगी। माधवी उन िदनो गयारहवे
वषर मे थी। उसके रंग–रप की सुनदरता, सवभाव और गुण देख–देखकर आशयर होता था। िवरजन को अचानक यह धयान
आया िक कया मेरी माधवी इस योगय नही िक पताप उसे अपने कणठ का हार बनाये? उस िदन से वह माधवी के सुधार और पयार
मे और भी अिधक पवृत हो गयी थी वह सोच-सोचकर मन –ही मन-फूली न समाती िक जब माधवी सोलह–सतह वषर की हो
जायेगी, तब मै पताप के पास जाऊंगी और उससे हाथ जोडकर कहंग
ू ी िक माधवी मेरी बिहन है। उसे आज से तुम अपनी चेरी

समझो कया पताप मेरी बात टाल देगे? नही– वे ऐसा नही कर सकते। आननद तो तब है जब िक चाची सवयं माधवी को अपनी
बहू बनाने की मुझसे इचछा करे। इसी िवचार से िवरजन ने पतापचनद के पशसनीय गुणो का िचत माधवी के हृदय मे खीचना
आरमभ कर िदया था, िजससे िक उसका रोम-रोम पताप के पेम मे पग जाय। वह जब पतापचनद का वणरन करने लगती तो
सवत: उसके शबद असामानय रीित से मधुर और सरस हो जाते। शनै :-शनै : माधवी का कामल हृदय पेम–रस का आसवादन
करने लगा। दपरण मे बाल पड गया।
भोली माधवी सोचने लगी, मै कैसी भागयवती हं।
ू मुझे ऐसे सवामी िमलेगे िजनके चरण धोने के योगय भी मै नही हंू, परनतु कया वे
मुझे अपनी चेरी बनायेगे? कुछ तो, मै अवशय उनकी दासी बनूंगी और यिद पेम मे कुछ आकषणर है, तो मै उनहे अवशय अपना बना
लूंगी। परनतु उस बेचारी को कया मालूम था िक ये आशाएं शोक बनकर नेतो के मागर से बह जायेगी ? उसको पनदहवा पूरा भी न
हुआ था िक िवरजन पर गृह-िवनाश की आपितया आ पडी। उस आंधी के झोके ने माधवी की इस किलपत पुषप वािठका का
सतयानाश कर िदया। इसी बीच मे पताप चनद के लोप होने का समाचार िमला। आंधी ने जो कुछ अविशष रखा था वह भी इस
अिगन ने जलाकर भसम कर िदया।
परनतु मानस कोई वसतु है, तो माधवी पतापचनद की सती बन चुकी थी। उसने अपना तन और मन उनहे समपरण कर िदया।
पताप को जान नही। परनतु उनहे ऐसी अमूलय वसतु िमली, िजसके बराबर संसार मे कोई वसतु नही तुल सकती। माधवी ने
केवल एक बार पताप को देखा था और केवल एक ही बार उनके अमृत–वचन सुने थे। पर इसने उस िचत को और भी
उजजवल कर िदया था, जो उसके हृदय पर पहले ही िवरजन ने खीच रखा था। पताप को पता नही था, पर माधवी उसकी
पेमािगन मे िदन-पितिदन घुलती जाती है। उस िदन से कोई ऐसा वरत नही था, जो माधवी न रखती हो , कोई ऐसा देवता नही था,
िजसकी वह पूजा न करती हो और वह सब इसिलए िक ईशर पताप को जहा कही वे हो कुशल से रखे। इन पेम–कलपनाओं ने
उस बािलका को और अिधक दृढ सुशील और कोमल बना िदया। शायद उसके िचत ने यह िनणयर कर िलया था िक मेरा िववाह
पतापचनद से हो चुका। िवरजन उसकी यह दशा देखती और रोती िक यह आग मेरी ही लगाई हुई है। यह नवकुसुम िकसके
कणठ का हार बनेगा? यह िकसकी होकर रहेगी? हाय रे िजस चीज को मैने इतने पिरशम से अंकुिरत िकया और मधुकीर से
सीचा, उसका फूल इस पकार शाखा पर ही कुमहलाया जाता है। िवरजन तो भला किवता करने मे उलझी रहती, िकनतु माधवी
को यह सनतोष भी न था उसके पेमी और साथी उसके िपयतम का धयान मात था–उस िपयतम का जो उसके िलए सवरथा
अपिरिचत था पर पताप के चले जाने के कई मास पीछे एक िदन माधवी ने सवप देखा िक वे सतयासी हो गये है। आज माधवी
का अपार पेम पकट हंआ है। आकाशवाणी सी हो गयी िक पताप ने अवशय संनयास ते िलया। आज से वह भी तपसवनी बन गयी
उसने सुख और िवलास की लालसा हृदय से िनकाल दी।
जब कभी बैठे–बैठे माधवी का जी बहुत आकुल होता तो वह पतापचनद के घर चली जाती। वहा उसके िचत की थोडी देर के
िलए शाित िमल जाती थी। परनतु जब अनत मे िवरजन के पिवत और आदशो जीवन ने यह गाठ खोल दी वे गंगा यमुना की भाित
परसपर गले िमल गयी , तो माधवी का आवागमन भी बढ गया। सुवामा के पास िदन –िदन भर बैठी रह जाती, इस भवन की,
एक-एक अंगुल पृथवी पताप का समारक थी। इसी आँगन मे पताप ने काठ के घोडे दौडाये और इसी कुणड मे कागज की नावे
चलायी थी। नौकरी तो सयात काल के भंवर मे पडकर डू ब गयी, परनतु घोडा अब भी िवदमान थी। माधवी ने उसकी जजीरत
अिसथयो मे पाण डाल िदया और उसे वािटका मे कुणड के िकनारे एक पाटलवृक की छायो मे बाध िदया। यही भवन पतापचनद
का शयनागार था।माधवी अब उसे अपने देवता का मिनदर समझती है। इस पलंग ने पंताप को बहुत िदनो तक अपने अंक मे
थपक–थपककर सुलाया था। माधवी अब उसे पुषपो से सुसिजजत करती है। माधवी ने इस कमरे को ऐसा सुसिजजत कर
िदया, जैसे वह कभी न था। िचतो के मुख पर से धूल का यविनका उठ गयी। लैमप का भागय पुन: चमक उठा। माधवी की इस
अननत पेम-भािकत से सुवामा का दु :ख भी दूर हो गया। िचरकाल से उसके मुख पर पतापचनद का नाम अभी न आया था।
िवरजन से मेल-िमलाप हो गया, परनतु दोनो िसतयो मे कभी पतापचनद की चचा भी न होती थी। िवरजन लजजा की संकुिचत थी
और सुवामा कोध से। िकनतु माधवी के पेमानल से पतथर भी िपघल गया। अब वह पेमिवहवल होकर पताप के बालपन की बाते
पूछने लगती तो सुवामा से न रहा जाता। उसकी आँखो से जल भर आता। तब दोनो रोती और िदन-िदन भर पताप की बाते

समापत न होती। कया अब माधवी के िचत की दशा सुवामा से िछप सकती थी? वह बहुधा सोचती िक कया तपिसवनी इसी पकार
पेमिगन मे जलती रहेगी और वह भी िबना िकसी आशा के? एक िदन वृजरानी ने ‘कमला’ का पैकेट खोला, तो पहले ही पृष पर
एक परम पितभा-पूणर िचत िविवध रंगो मे िदखायी पडा। यह िकसी महातम का िचत था। उसे धयान आया िक मैने इन महातमा
को कही अवशय देखा है। सोचते-सोचते अकसमात उसका घयान पतापचनद तक जा पहंुचा। आननद के उमंग मे उछल पडी
और बोली – माधवी, तिनक यहा आना।
माधवी फूलो की कयािरया सीच रही थी। उसके िचत–िवनोद का आजकल वही कायर था। वह साडी पानी मे लथपथ, िसर के
बाल िबखरे माथे पर पसीने के िबनदु और नतो मे पेम का रस भरे हुए आकर खडी हो गयी। िवरजन ने कहा – आ तूझे एक िचत
िदखाऊं।
माधवी ने कहा – िकसका िचत है , देखूं।
माधवी ने िचत को घयानपूवरक देखा। उसकी आंखो मे आंसू आ गये।
िवरजन – पहचान गयी ?
माधवी - कयो? यह सवरप तो कई बार सवप मे देख चुकी हं?
ू बदन से काित बरस रही है।
िवरजन – देखो वृतानत भी िलखा है।
माधवी ने दूसरा पना उलटा तो ‘सवामी बालाजी’ शीषरक लेख िमला थोडी देर तक दोनो तनमय होकर यह लेख पढती रही, तब
बातचीत होने लगी।
िवरजन – मै तो पथम ही जान गयी थी िक उनहोने अवशय सनयास ले िलया होगा।
माधवी पृथवी की ओर देख रही थी, मुख से कुछ न बोली।
िवरजन – तब मे और अब मे िकतना अनतर है। मुखमणडल से काित झलक रही है। तब ऐसे सुनदर न थे।
माधवी – हूं।
िवरजन – इशरर उनकी सहायता करे। बडी तपसया की है।(नेतो मे जल भरकर) कैसा संयोग है। हम और वे संग–संग खेले,
संग–संग रहे, आज वे सनयासी है और मै िवयोिगनी। न जाने उनहे हम लोगो की कुछ सुध भी है या नही। िजसने सनयास ले
िलया, उसे िकसी से कया मतलब? जब चाची के पास पत न िलखा तो भला हमारी सुिध कया होगी? माधवी बालकपन मे वे कभी
योगी–योगी खेलते तो मै िमठाइयो िक िभका िदया करती थी। माधवी ने रोते हुए ‘न जाने कब दशरन होगे’ कहकर लजजा से िसर
झुका िलया।
िवरजन– शीघ ही आयंगे। पाणनाथ ने यह लेख बहुत सुनदर िलखा है।
माधवी– एक-एक शबद से भािकत टपकती है।
िवरजन -वकतृतता की कैसी पशंसा की है! उनकी वाणी मे तो पहले ही जादू था, अब कया पूछना! पाणनाथ केिचत पर िजसकी
वाणी का ऐसा पभाव हुआ, वह समसत पृथवी पर अपना जादू फैला सकता है।
माधवी – चलो चाची के यहा चले।
िवरजन- हा उनको तो धयान ही नही रहा देख,े कया कहती है। पसन तो कया होगी।
माधवी - उनको तो अिभलाषा ही यह थी, पसन कयो न होगी?
उनकी तो अिभलाषा ही यह थी, पसन कयो न होगी?

िवरजन- चल? माता ऐसा समाचार सुनकर कभी पसन नही हो सकती। दोनो सतीया घर से बाहर िनकली। िवरजन का
मुखकमल मुरझाया हुआ था, पर माधवी का अंग–अंग हषर िसला जाता था। कोई उससे पूछे –तेरे चरण अब पृथवी पर कयो नही
पहले? तेरे पीले बदन पर कयो पसनता की लाली झलक रही है? तुझे कौन-सी समपित िमल गयी? तू अब शोकािनवत और
उदास कयो न िदखायी पडती? तुझे अपने िपयतम से िमलने की अब कोई आशा नही, तुझ पर पेम की दृिष कभी नही पहुची
िफर तू कयो फूली नही समाती? इसका उतर माधवी देगी? कुछ नही। वह िसर झुका लेगी, उसकी आंखे नीचे झुक जायेगी,
जैसे डिलया फूलो के भार से झुक जाती है। कदािचत् उनसे कुछ अशुिबनदु भी टपक पडे; िकनतु उसकी िजहवा से एक शबद
भी न िनकलेगा।
माधवी पेम के मद से मतवाली है। उसका हृदय पेम से उनमत है। उसका पेम, हाट का सौदा नही। उसका पेमिकसी वसतु का
भूखा सनही है। वह पेम के बदले पेम नही चाहती। उसे अभीमान है िक ऐसे पवीतता पुरष की मूितर मेरे हृदय मे पकाशमान है।
यह अभीमान उसकी उनमता का कारण है, उसके पेम का पुरसकार है।
दूसरे मास मे वृजरानी ने , बालाजी के सवागत मे एक पभावशाली किवता िलखी यह एक िवलकण रचना थी। जब वह मुिदत हुई
तो िवदा जगत् िवरजन की कावय–पितभा से पिरिचत होते हुए भी चमतकृत हो गया। वह कलपना-रपी पकी, जो कावय–गगन मे
वायुमणडल से भी आगे िनकल जाता था, अबकी तारा बनकर चमका। एक–एक शबद आकाशवाणी की जयोित से पकािशत था
िजन लोगो ने यह किवता पढी वे बालाजी के भकत हो गये। किव वह संपेरा है िजसकी िपटारी मे सॉपो के सथान मे हृदय बनद
होते है।
काशी मे आगमन / पेमचंद
जब से वृजरानी का कावय–चनद उदय हुआ, तभी से उसके यहा सदैव मिहलाओं का जमघट लगा रहता था। नगर मे सतीयो की
कई सभाएं थी उनके पबंध का सारा भार उसी को उठाना पडता था। उसके अितिरकत अनय नगरो से भी बहुधा सतीयो उससे
भेट करने को आती रहती थी जो तीथरयाता करने के िलए काशी आता, वह िवरजन से अवरशय िमलता। राज धमरिसंह ने
उसकी किवताओं का सवाग–सुनदर संगह पकािशत िकया था। उस संगह ने उसके कावय–चमतकार का डंका, बजा िदया था।
भारतवषर की कौन कहे, यूरोप और अमेिरका के पितिषत किवयो ने उसे उनकी कावय मनोहरता पर धनयवाद िदया था।
भारतवषर मे एकाध ही कोई रिसक मनुषय रहा होगा िजसका पुसतकालय उसकी पुसतक से सुशोिभत न होगा। िवरजन की
किवताओं को पितषा करने वालो मे बालाजी का पद सबसे ऊंचा था। वे अपनी पभावशािलनी वकतृताओं और लेखो मे बहुधा
उसी के वाकयो का पमाण िदया करते थे। उनहोने ‘सरसवती’ मे एक बार उसके संगह की सिवसतार समालोचना भी िलखी थी।
एक िदन पात: काल ही सीता, चनदकु ंवरी ,रकमणी और रानी िवरजन के घर आयी। चनदा ने इन िसतयो को फंशर पर िबठाया
और आदर सतकार िकया। िवरजन वहा नही थी कयोिक उसने पभात का समय कावय िचनतन के िलए िनयत कर िलया था।
उस समय यह िकसी आवशयक कायर के अितिरकत् सिखयो से िमलती–जुलती नही थी। वािटका मे एक रमणीक कु ंज था।
गुलाब की सगिनधत से सुरिभत वायु चलती थी। वही िवरजन एक िशलायन पर बैठी हुई कावय–रचना िकया करती थी। वह
कावय रपी समुद से िजन मोितयो को िनकालती, उनहे माधवी लेखनी की माला मे िपरो िलया करती थी। आज बहुत िदनो के बाद
नगरवािसयो के अनुरोध करने पर िवरजन ने बालाजी की काशी आने का िनमंतण देने के िलए लेखनी को उठाया था। बनारस
ही वह नगर था, िजसका समरण कभी–कभी बालाजी को वयग कर िदया करता था। िकनतु काशी वालो के िनरंतर आगह करने
पर भी उनहे काशी आने का अवकाश न िमलता था। वे िसंहल और रंगून तक गये, परनतु उनहोने काशी की ओर मुख न फेरा
इस नगर को वे अपना परीका भवन समझते थे। इसिलए आज िवरजन उनहे काशी आने का िनमंतण दे रही है। लोगे का िवचार
आ जाता है, तो िवरजन का चनदानन चमक उठता है, परनतु इस समय जो िवकास और छटा इन दोनो पुषपो पर है, उसे देखदेखकर दूर से फूल लिजजत हुए जाते है।
नौ बजते –बजते िवरजन घर मे आयी। सेवती ने कहा– आज बडी देर लगायी।

िवरजन – कुनती ने सूयर को बुलाने के िलए िकतनी तपसया की थी।
सीता – बाला जी बडे िनषू र है। मै तो ऐसे मनुषय से कभी न बोलूं।
रकिमणी- िजसने संनयास ले िलया, उसे घर–बार से कया नाता?
चनदकुँविर– यहा आयेगे तो मै मुख पर कह दूंगी िक महाशय, यह नखरे कहा सीखे ?
रकमणी – महारानी। ऋिष-महातमाओं का तो िशषाचार िकया करो िजहवा कया है कतरनी है।
चनदकुँविर– और कया, कब तक सनतोष करे जी। सब जगह जाते है, यही आते पैर थकते है।
िवरजन– (मुसकराकर) अब बहुत शीघ दशरन पाओगे। मुझे िवशास है िक इस मास मे वे अवशय आयेगे।
सीता– धनय भागय िक दशरन िमलेगे। मै तो जब उनका वृतात पढती हंू यही जी चाहता है िक पाऊं तो चरण पकडकर घणटो
रोऊँ।
रकमणी – ईशर ने उनके हाथो मे बडा यश िदया। दारानगर की रानी सािहबा मर चुकी थी सास टू ट रही थी िक बालाजी को
सूचना हुई। झट आ पहंुचे और कण–मात मे उठाकर बैठा िदया। हमारे मुंशीजी (पित) उन िदनो वही थे। कहते थे िक रानीजी
ने कोश की कु ंजी बालाजी के चरणो पर रख दी ओर कहा–‘आप इसके सवामी है’। बालाजी ने कहा–‘मुझे धन की आवशयकता
नही अपने राजय मे तीन सौ गौशलाएं खुलवा दीिजये’। मुख से िनकलने की देर थी। आज दारानगर मे दूध की नदी बहती है।
ऐसा महातमा कौन होगा।
चनदकुविं र – राजा नवलखा का तपेिदक उनही की बूिटयो से छू टा। सारे वैद डाकटर जवाब दे चुके थे। जब बालाजी चलने
लगे, तो महारानी जी ने नौ लाख का मोितयो का हार उनके चरणो पर रख िदया। बालाजी ने उसकी ओर देखा तक नही।
रानी – कैसे रखे मनुषय है।
रकमणी - हॉ, और कया, उनहे उिचत था िक हार ले लेते– नही –नही कणठ मे डाल लेते।
िवरजन – नही, लेकर रानी को पिहना देते। कयो सखी?
रानी – हा मै उस हार के िलए गुलामी िलख देती।
चनदकु ंविर – हमारे यहॉ (पित) तो भारत–सभा के सभय बैठे है ढाई सौ रपये लाख यत करके रख छोडे थे, उनहे यह कहकर
उठा ले गये िक घोडा लेगे। कया भारत–सभावाले िबना घोडे के नही चलते?
रानी–कल ये लोग शेणी बाधकर मेरे घर के सामने से जा रहे थे,बडे भले मालूम होते थे।
इतने ही मे सेवती नवीन समाचार–पत ले आयी।
िवरजन ने पूछा – कोई ताजा समाचार है?
सेवती–हा, बालाजी मािनकपुर आये है। एक अहीर ने अपनी पुत् के िववाह का िनमंतण भेजा था। उस पर पयाग से भारतसभा
के सभयो िहत रात को चलकर मािनकपुर पहंुचे। अहीरो ने बडे उतसाह और समारोह के साथ उनका सवागत िकया है और
सबने िमलकर पाच सौ गाएं भेट दी है बालाजी ने वधू को आशीवारद िदया ओर दुले को हृदय से लगाया। पाच अहीर भारत
सभा के सदसय िनयत हुए।
िवरजन-बडे अचछे समाचार है। माधवी, इसे काट के रख लेना। और कुछ?
सेवती- पटना के पािसयो ने एक ठाकुददारा बनवाया है वहा की भारतसभा ने बडी धूमधाम से उतसव िकया।
िवरजन – पटना के लोग बडे उतसाह से कायर कर रहे है।

चनदकुँविर– गडू िरया भी अब िसनदूर लगायेगी। पासी लोग ठाकुर दारे बनवायंगे ?
रकमणी-कयो, वे मनुषय नही है ? ईशर ने उनहे नही बनाया। आप ही अपने सवामी की पूजा करना जानती है ?
चनदकुँविर- चलो, हटो, मुझे पािसयो से िमलाती हो। यह मुझे अचछा नही लगता।
रकिमणी – हा, तुमहारा रंग गोरा है न? और वसत-आभूषणो से सजी बहुत हो। बस इतना ही अनतर है िक और कुछ?
चनदकुँविर- इतना ही अनतर कयो है? पृतवी आकाश से िमलाती हो? यह मुझे अचछा नही लगता। मुझे कछवाहो वंश मे हँू, कुछ
खबर है?
रिकमणी- हा, जानती हूँ और नही जानती थी तो अब जान गयी। तुमहारे ठाकुर साहब (पित) िकसी पासी से बढकर मलल –युद
करेगे? यह िसफर टेढी पाग रखना जानते है? मै जानती हंू िक कोई छोटा –सा पासी भी उनहे काख –तले दबा लेगा।
िवरजन - अचछा अब इस िववाद को जाने तो। तुम दोनो जब आती हो, लडती हो आती हो।
सेवती- िपता और पुत का कैसा संयोग हुआ है? ऐसा मालुम होता है िक मुंशी शिलगाम ने पतापचनद ही के िलए संनयास िलया
था। यह सब उनही कर िशका का फल है।
रिकमणी – हा और कया? मुनशी शिलगाम तो अब सवामी बहमाननद कहलाते है। पताप को देखकर पहचान गये होगे ।
सेवती – आननद से फूले न समाये होगे।
रिकमणी-यह भी ईशर की पेरणा थी, नही तो पतापचनद मानसरोवर कया करने जाते?
सेवती–ईशर की इचछा के िबना कोई बात होती है?
िवरजन–तुम लोग मेरे लालाजी को तो भूल ही गयी। ऋषीकेश मे पहले लालाजी ही से पतापचनद की भेट हुई थी। पताप उनके
साथ साल-भर तक रहे। तब दोनो आदमी मानसरोवर की ओर चले।
रिकमणी–हा, पाणनाथ के लेख मे तो यह वृतानत था। बालाजी तो यही कहते है िक मुंशी संजीवनलाल से िमलने का सौभागय
मुझे पापत न होता तो मै भी मागने –खानेवाले साधुओं मे ही होता।
चनदकु ंविर-इतनी आतमोनित के िलए िवधाता ने पहले ही से सब सामान कर िदये थे।
सेवती–तभी इतनी–सी अवसथा मे भारत के सुयर बने हुए है। अभी पचीसवे वषर मे होगे?
िवरजन – नही, तीसवा वषर है। मुझसे साल भर के जेठे है।
रिकमणी -मैने तो उनहे जब देखा, उदास ही देखा।
चनदकु ंविर – उनके सारे जीवन की अिभलाषाओं पर ओंस पड गयी। उदास कयो न होगी?
रिकमणी – उनहोने तो देवीजी से यही वरदान मागा था।
चनदकु ंविर – तो कया जाित की सेवा गृहसथ बनकर नही हो सकती?
रिकमणी – जाित ही कया, कोई भी सेवा गृहसथ बनकर नही हो सकती। गृहसथ केवल अपने बाल-बचचो की सेवा कर सकता
है।
चनदकु ंविर – करनेवाले सब कुछ कर सकते है, न करनेवालो के िलए सौ बहाने है।

एक मास और बीता। िवरजन की नई किवता सवागत का सनदेशा लेकर बालाजी के पास पहुची परनतु यह न पकट हुआ िक
उनहोने िनमंतण सवीकार िकया या नही। काशीवासी पतीका करते–करते थक गये। बालाजी पितिदन दिकण की ओर बढते चले
जाते थे। िनदान लोग िनराश हो गये और सबसे अधीक िनराशा िवरजन को हुई।
एक िदन जब िकसी को धयान भी न था िक बालाजी आयेगे, पाणनाथ ने आकर कहा–बिहन। लो पसन हो जाओ, आज बालाजी
आ रहे है।
िवरजन कुछ िलख रही थी, हाथो से लेखनी छू ट पडी। माधवी उठकर दार की ओर लपकी। पाणनाथ ने हंसकर कहा – कया
अभी आ थोडे ही गये है िक इतनी उिदगन हुई जाती हो।
माधवी – कब आयंगे इधर से हीहोकर जायंगे नए?
पाणनाथ – यह तो नही जात है िक िकधर से आयेगे – उनहे आडमबर और धूमधाम से बडी घृणा है। इसिलए पहले से आने की
ितिथ नही िनयत की। राजा साहब के पास आज पात:काल एक मनुषय ने आकर सूचना दी िक बालाजी आ रहे है और कहा है
िक मेरी आगवानी के िलए धूमधाम न हो, िकनतु यहा के लोग कब मानते है? अगवानी होगी, समारोह के साथ सवारी िनकलेगी,
और ऐसी िक इस नगर के इितहास मे समरणीय हो। चारो ओर आदमी छू टे हुए है। जयोही उनहे आते देखेगे, लोग पतयेक मुहलले
मे टेलीफोन दारा सूचना दे देगे। कालेज और सकूलो के िवदाथी विदरया पहने और झिणडया िलये इनतजार मे खडे है घर–घर
पुषप–वषा की तैयािरया हो रही है बाजार मे दुकाने सजायी जा रही है। नगर मे एक धूम सी मची हुई है।
माधवी - इधर से जायेगे तो हम रोक लेगी।
पाणनाथ – हमने कोई तैयारी तो की नही, रोक कया लेगे? और यह भी तो नही जात है िक िकधर से जायेगे।
िवरजन – (सोचकर) आरती उतारने का पबनध तो करना ही होगा।
पाणनाथ – हॉ अब इतना भी न होगा? मै बाहर िबछावन आिद िबछावाता हूं।
पाणनाथ बाहर की तैयािरयो मे लगे, माधवी फूल चुनने लगी, िवरजन ने चादी का थाल भी धोकर सवचछ िकया। सेवती और
चनदा भीतर सारी वसतुए ं कमानुसार सजाने लगी।
माधवी हषर के मारे फूली न समाती थी। बारमबार चौक–चौककर दार की ओर देखती िक कही आ तो नही गये। बारमबार कान
लगाकर सुनती िक कही बाजे की धविन तो नही आ रही है। हृदय हषर के मारे धडक रहा था। फूल चुनती थी, िकनतु धयान
दूसरी ओर था। हाथो मे िकतने ही काटे चुभा िलए। फूलो के साथ कई शाखाऍं मरोड डाली। कई बार शाखाओं मे उलझकर
िगरी। कई बार साडी काटो मे फंसा दी उसस समय उसकी दशा िबलकुल बचचो की-सी थी।
िकनतु िवरजन का बदन बहुत सी मिलन था। जैसे जलपूणर पात तिनक िहलने से भी छलक जाता है, उसी पकार जयो-जयो
पाचीन घटनाएँ समरण आती थी, तयो-तयो उसके नेतो से अशु छलक पडते थे। आह! कभी वे िदन थे िक हम और वह भाईबिहन थे। साथ खेलते, साथ रहते थे। आज चौदह वषर वयतीत हुए, उनकास मुख देखने का सौभगय भी न हुआ। तब मै तिनक
भी रोती वह मेरे ऑंसू पोछते और मेरा जी बहलाते। अब उनहे कया सुिध िक ये ऑंखे िकतनी रोयी है और इस हृदय ने कैस-े कैसे
कष उठाये है। कया खबर थी की हमारे भागय ऐसे दृशय िदखायेगे? एक िवयोिगन हो जायेगी और दूसरा सनयासी।
अकसमात् माधवी को धयान आया िक सुवमस को कदािचत बाजाजी के आने की सुचना न हुई हो। वह िवरजन के पास आक
बोली- मै तिनक चची के यहॉँ जाती हँू। न जाने िकसी ने उनसे कहा या नही?
पाणनाथ बाहर से आ रहे थे, यह सुनकर बोले- वहॉँ सबसे पहले सूचना दी गयी भली-भॉँित तैयािरयॉँ हो रही है। बालाजी भी
सीधे घर ही की ओर पधारेगे। इधर से अब न आयेगे।
िवरजन- तो हम लोगो का चलना चािहए। कही देर न हो जाए। माधवी- आरती का थाल लाऊँ?

िवरजन- कौन ले चलेगा ? महरी को बुला लो (चौककर) अरे! तेरे हाथो मे रिधर कहॉँ से आया?
माधवी- ऊँह! फूल चुनती थी, कॉँटे लग गये होगे।
चनदा- अभी नयी साडी आयी है। आज ही फाड के रख दी।
माधवी- तुमहारी बला से!
माधवी ने कह तो िदया, िकनतु ऑखे अशुपूणर हो गयी। चनदा साधारणत: बहुत भली सती थी। िकनतु जब से बाबू राधाचरण ने
जाित-सेवा के िलए नौकरी से इसतीफा दे िदया था वह बालाजी के नाम से िचढती थी। िवरजन से तो कुछ न कह सकती थी,
परनतु माधवी को छेडती रहती थी। िवरजन ने चनदा की ओर घूरकर माधवी से कहा- जाओ, सनदूक से दूसरी साडी िनकाल
लो। इसे रख आओ। राम-राम, मार हाथ छलनी कर डाले!
माधवी- देर हो जायेगी, मै इसी भॉँित चलूँगी।
िवरजन- नही, अभी घणटा भर से अिधक अवकाश है।
यह कहकर िवरजन ने पयार से माधवी के हाथ धोये। उसके बाल गूंथे, एक सुनदर साडी पिहनायी, चादर ओढायी और उसे
हृदय से लगाकर सजल नेतो से देखते हुए कहा- बिहन! देखो, धीरज हाथ से न जाय।
माधवी मुसकराकर बोली- तुम मेरे ही संग रहना, मुझे सभलती रहना। मुझे अपने हृदय पर भरोसा नही है।
िवरजन ताड गई िक आज पेम ने उनमततास का पद गहण िकया है और कदािचत् यही उसकी पराकाषा है। हॉँ ! यह बावली
बालू की भीत उठा रही है।
माधवी थोडी देर के बाद िवरजन, सेवती, चनदा आिद कई सतीयो के संग सुवाम के घर चली। वे वहॉँ की तैयािरयॉँ देखकर
चिकत हो गयी। दार पर एक बहुत बडा चँदोवा िबछावन, शीशे और भॉँित-भाित की सामिगयो से सुसिजजत खडा था। बधाई
बज रही थी! बडे-बडे टोकरो मे िमठाइयॉँ और मेवे रखे हुए थे। नगर के पितिषत सभय उतमोतम वसत पिहने हुए सवागत करने
को खडे थे। एक भी िफटन या गाडी नही िदखायी देती थी, कयोिक बालाजी सवरदा पैदल चला करते थे। बहुत से लोग गले मे
झोिलयॉँ डाले हुए िदखाई देते थे, िजनमे बालाजी पर समपरण करने के िलये रपये-पैसे भरे हुए थे। राजा धमरिसंह के पॉँचो लडके
रंगीन वसत पिहने , केसिरया पगडी बाधे, रेशमी झिणडया कमरे से खोसे िबगुल बजा रहे थे। जयोिह लोगो की दृिष िवरजन पर
पडी, सहसो मसतक िशषाचार के िलए झुक गये। जब ये देिवया भीतर गयी तो वहा भी आंगन और दालान नवागत वधू की
भाित सुसिजजत िदखे! सैकडो सतीया मंगल गाने के िलए बैठी थी। पुषपो की रािशया ठौर-ठौर पडी थी। सुवामा एक शेत साडी
पिहने सनतोष और शािनत की मूितर बनी हुई दार पर खडी थी। िवरजन और माधवी को देखते ही सजल नयन हो गयी। िवरजन
बोली- चची! आज इस घर के भागय जग गये। सुवामा ने रोकर कहा- तुमहारे कारण मुझे आज यह िदन देखने का सौभागय
हुआ। ईशर तुमहे इसका फल दे।
दुिखया माता के अनत:करण से यह आशीवाद िनकला। एक माता के शाप ने राजा दशरथ को पुतशोक मे मृतयु का सवाद
चखाया था। कया सुवामा का यह आशीवाद पभावहीन होगा?
दोनो अभी इसी पकार बाते कर रही थी िक घणटे और शंख की धविन आने लगी। धूम मची की बालाजी आ पहंुचे। सतीयो ने
मंगलगान आरमभ िकया। माधवी ने आरती का थाल ले िलया मागर की ओर टकटकी बाधकर देखने लगी। कुछ ही काल मे
अदैतामबरधारी नवयुवको का समुदाय दखयी पडा। भारत सभा के सौ सभय घोडो पर सवार चले आते थे। उनके पीछे अगिणत
मनुषयो का झुणड था। सारा नगर टू ट पडा। कनधे से कनधा िछला जाता था मानो समुद की तरंगे बढती चली आती है। इस
भीड मे बालाजी का मुखचनद ऐसा िदखायी पडता था मानो मेघाचछिदत चनद उदय हुआ है। ललाट पर अरण चनदन का ितलक
था और कणठ मे एक गेरए रंग की चादर पडी हुई थी।

सुवामा दार पर खडी थी, जयोही बालाजी का सवरप उसे िदखायी िदया धीरज हाथ से जाता रहा। दार से बाहर िनकल आयी
और िसर झुकाये, नेतो से मुकतहार गूंथती बालाजी के ओर चली। आज उसने अपना खोया हुआ लाल पाया है। वह उसे हृदय
से लगाने के िलए उिदगन है।
सुवामा को इस पकार आते देखकर सब लोग रक गये। िविदत होता था िक आकाश से कोई देवी उतर आयी है। चतुिदरक
सनाटा छा गया। बालाजी ने कई डग आगे बढकर मातीजी को पमाण िकया और उनके चरणो पर िगर पडे। सुवामा ने उनका
मसतक अपने अंक मे िलया। आज उसने अपना खोया हुआ लाल पाया है। उस पर आंखो से मोितयो की वृिष कर रही है।
इस उतसाहवदरक दृशय को देखकर लोगो के हृदय जातीयता के मद मे मतवाले हो गये ! पचास सहस सवर से धविन
आयी-‘बालाजी की जय।’ मेघ गजा और चतुिदरक से पुषपवृिष होने लगी। िफर उसी पकार दूसरी बार मेघ की गजरना हुई।
‘मुंशी शािलगाम की जय’ और सहसो मनुषये सवदेश-पेम के मद से मतवाले होकर दौडे और सुवामा के चरणो की रज माथे पर
मलने लगे। इन धविनयो से सुवामा ऐसी पमुिदत हो रही थी जैसे महुअर के सुनने से नािगन मतवाली हो जाती है। आज उसने
अपना खोया हुआ लाल पाया है। अमूलय रत पाने से वह रानी हो गयी है। इस रत के कारण आज उसके चरणो की रज लोगो
के नेतो का अंजन और माथे का चनदन बन रही है।
अपूवर दृशय था। बारमबार जय-जयकार की धविन उठती थी और सवगर के िनवािसयो को भातर की जागृित का शुभ-संवाद सुनाती
थी। माता अपने पुत को कलेजे से लगाये हुए है। बहुत िदन के अननतर उसने अपना खोया हुआ लाल है, वह लाल जो उसकी
जनम-भर की कमाई था। फूल चारो और से िनछावर हो रहे है। सवणर और रतो की वषा हो रही है। माता और पुत कमर तक
पुषपो के समुद मे डू बे हुए है। ऐसा पभावशाली दृशय िकसके नेतो ने देखा होगा।
सुवामा बालाजी का हाथ पकडे हुए घरकी ओर चली। दार पर पहुँचते ही सतीयॉँ मंगल-गीत गाने लगी और माधवी सवणर रिचत
थाल दीप और पुषपो से आरती करने लगी। िवरजन ने फूलो की माला-िजसे माधवी ने अपने रकत से रंिजत िकया था- उनके
गले मे डाल दी। बालाजी ने सजल नेतो से िवरजन की ओर देखकर पणाम िकया।
माधवी को बालाजी के दशनर की िकतनी अिभलाषा थी। िकनतु इस समय उसके नेत पृथवी की ओर झुके हुए है। वह बालाजी
की ओर नही देख सकती। उसे भय है िक मेरे नेत पृथवी हृदय के भेद को खोल देगे। उनमे पेम रस भरा हुआ है। अब तक
उसकी सबसे बडी अिभलाषा यह थी िक बालाजी का दशनर पाऊँ। आज पथम बार माधवी के हृदय मे नयी अिभलाषाएं उतपन
हुई, आज अिभलाषाओं ने िसर उठाया है, मगर पूणर होने के िलए नही, आज अिभलाषा-वािटका मे एक नवीन कली लगी है, मगर
िखलने के िलए नही, वरन मुरझाने िमटी मे िमल जाने के िलए। माधवी को कौन समझाये िक तू इन अिभलाषाओं को हृदय मे
उतपन होने दे। ये अिभलाषाएं तुझे बहुत रलायेगी। तेरा पेम कालपिनक है। तू उसके सवाद से पिरिचत है। कया अब
वासतिवक पेम का सवाद िलया चाहती है?
पेम का सवप / पेमचंद
मनुषय का हृदय अिभलाषाओं का कीडासथल और कामनाओं का आवास है। कोई समय वह था जब िक माधवी माता के अंक मे
खेलती थी। उस समय हृदय अिभलाषा और चेषाहीन था। िकनतु जब िमटी के घरौदे बनाने लगी उस समय मन मे यह इचछा
उतपन हुई िक मै भी अपनी गुिडया का िववाह करँगी। सब लडिकया अपनी गुिडया बयाह रही है, कया मेरी गुिडया कुँवारी रहेगी?
मै अपनी गुिडया के िलए गहने बनवाऊँगी, उसे वसत पहनाऊँगी, उसका िववाह रचाऊँगी। इस इचछा ने उसे कई मास तक
रलाया। पर गुिडयो के भागय मे िववाह न बदा था। एक िदन मेघ िघर आये और मूसलाधार पानी बरसा। घरौदा वृिष मे बह
गया और गुिडयो के िववाह की अिभलाषा अपूणर हो रह गयी। कुछ काल और बीता। वह माता के संग िवरजन के यहॉँ आने जाने लगी। उसकी मीठी-मीठी बाते सुनती और पसन होती, उसके थाल मे खाती और उसकी गोद मे सोती। उस समय भी
उसके हृदय मे यह इचछा थी िक मेरा भवन परम सुनदर होता, उसमे चादी के िकवाड लगे होते, भूिम ऐसी सवचछ होती िक मकखी
बैठे और िफसल जाए ! मै िवरजन को अपने घर ले जाती, वहा अचछे-अचछे पकवान बनाती और िखलाती, उतम पलंग पर

सुलाती और भली-भॉँित उसकी सेवा करती। यह इचछा वषों तक हृदय मे चुटिकया लेती रही। िकनतु उसी घरौदे की भाित यह
घर भी ढह गया और आशाएँ िनराशा मे पिरवितरत हो गयी।
कुछ काल और बीता, जीवन-काल का उदय हुआ। िवरजन ने उसके िचत पर पतापचनद का िचत खीचना आरमभ िकया। उन
िदनो इस चचा के अितिरकत उसे कोई बात अचछी न लगती थी। िनदान उसके हृदय मे पतापचनद की चेरी बनने की इचछा
उतपन हुई। पडे-पडे हृदय से बाते िकया करती। रात मे जागरण करके मन का मोदक खाती। इन िवचारो से िचत पर एक
उनमाद-सा छा जाता, िकनतु पतापचनद इसी बीच मे गुपत हो गये और उसी िमटी के घरौदे की भाित ये हवाई िकले ढह गये।
आशा के सथान पर हृदय मे शोक रह गया।
अब िनराशा ने उसक हृदय मे आशा ही शेष न रखा। वह देवताओं की उपासना करने लगी, वरत रखने लगी िक पतापचनद पर
समय की कुदृिष न पडने पाये। इस पकार अपने जीवन के कई वषर उसने तपिसवनी बनकर वयतीत िकये। किलपत पेम के
उललास मे चूर होती। िकनतु आज तपिसवनी का वरत टू ट गया। मन मे नूतन अिभलाषाओं ने िसर उठाया। दस वषर की तपसया
एक कण मे भंग हो गयी। कया यह इचछा भी उसी िमटी के घरौदे की भाित पददिलत हो जाएगी?
आज जब से माधवी ने बालाजी की आरती उतारी है,उसके आँसू नही रके। सारा िदन बीत गया। एक-एक करके तार िनकलने
लगे। सूयर थककर िछप गय और पकीगण घोसलो मे िवशाम करने लगे, िकनतु माधवी के नेत नही थके। वह सोचती है िक
हाय! कया मै इसी पकार रोने के िलए बनायी गई हँू? मै कभी हँसी भी थी िजसके कारण इतना रोती हँू? हाय! रोते-रोते आधी
आयु बीत गयी, कया शेष भी इसी पकार बीतेगी? कया मेरे जीवन मे एक िदन भी ऐसा न आयेगा, िजसे समरण करके सनतोष हो
िक मैने भी कभी सुिदन देखे थे? आज के पहले माधवी कभी ऐसे नैराशय-पीिडत और िछनहृदया नही हुई थी। वह अपने किलपत
पेम मे िनमगन थी। आज उसके हृदय मे नवीन अिभलाषाएँ उतपन हुई है। अशु उनही के पेिरत है। जो हृदय सोलह वषर तक
आशाओं का आवास रहा हो, वही इस समय माधवी की भावनाओं का अनुमान कर सकता है।
सुवामा के हृदय मे नवीन इचछाओं ने िसर उठाया है। जब तक बालजी को न देखा था, तब तक उसकी सबसे बडी अिभलाषा
यह थी िक वह उनहे आँखे भर कर देखती और हृदय-शीतल कर लेती। आज जब आँखे भर देख िलया तो कुछ और देखने की
अचछा उतपन हुई। शोक ! वह इचछा उतपन हुई माधवी के घरौदे की भाित िमटी मे िमल जाने क िलए।
आज सुवामा, िवरजन और बालाजी मे सायकाल तक बाते होती रही। बालाजी ने अपने अनुभवो का वणरन िकया। सुवामा ने
अपनी राम कहानी सुनायी और िवरजन ने कहा थोडा, िकनतु सुना बहुत। मुंशी संजीवनलाल के सनयास का समाचार पाकर
दोनो रोयी। जब दीपक जलने का समयआ पहुँचा, तो बालाजी गंगा की ओर संधया करने चले और सुवामा भोजन बनाने बैठी।
आज बहुत िदनो के पशात सुवामा मन लगाकर भोजन बना रही थी। दोनो बात करने लगी।
सुवामा-बेटी! मेरी यह हािदरक अिभलाषा थी िक मेरा लडका संसार मे पितिषत हो और ईशर ने मेरी लालसा पूरी कर दी। पताप
ने िपता और कुल का नाम उजजवल कर िदया। आज जब पात:काल मेरे सवामीजी की जय सुनायी जा रही थी तो मेरा हृदय
उमड-उमड आया था। मै केवल इतना चाहती हूँ िक वे यह वैरागय तयाग दे। देश का उपकार करने से मै उनहे नही राकती।
मैने तो देवीजी से यही वरदान मागा था, परनतु उनहे संनयासी के वेश मे देखकर मेरा हृदय िवदीणर हुआ जाता है।
िवरजन सुवामा का अिभपाय समझ गयी। बोली-चाची! यह बात तो मेरे िचत मे पिहले ही से जमी हुई है। अवसर पाते ही अवशय
छेडूँगी।
सुवामा-अवसर तो कदािचत ही िमले। इसका कौन िठकान? अभी जी मे आये, कही चल दे। सुनती हूँ सोटा हाथ मे िलये
अकेले वनो मे घूमते है। मुझसे अब बेचारी माधवी की दशा नही देखी जाती। उसे देखती हँू तो जैसे कोई मेरे हृदय को मसोसने
लगता है। मैने बहुतेरी सतीया देखी और अनेक का वृतानत पुसतको मे पढा ; िकनतु ऐसा पेम कही नही देखा। बेचारी ने आधी
आयु रो-रोकर काट दी और कभी मुख न मैला िकया। मैने कभी उसे रोते नही देखा ; परनतु रोने वाले नेत और हँसने वाले मुख

िछपे नही रहते। मुझे ऐसी ही पुतवधू की लालसा थी, सो भी ईशर ने पूणर कर दी। तुमसे सतय कहती हँू, मै उसे पुतवधू
समझती हूँ। आज से नही, वषों से।
वृजरानी- आज उसे सारे िदन रोते ही बीता। बहुत उदास िदखायी देती है।
सुवामा- तो आज ही इसकी चचा छेडो। ऐसा न हो िक कल िकसी ओर पसथान कर दे, तो िफर एक युग पतीका करनी पडे।
वृजरानी- (सोचकर) चचा करने को तो मै करँ, िकनतु माधवी सवयं िजस उतमता के साथ यह कायर कर सकती है, कोई दूसरा
नही कर सकता।
सुवामा- वह बेचारी मुख से कया कहेगी?
वृजरानी- उसके नेत सारी कथा कह देगे?
सुवामा- लललू अपने मन मे कया कहंगे?
वृजरानी- कहेगे कया ? यह तुमहारा भम है जो तुम उसे कुँवारी समझ रही हो। वह पतापचनद की पती बन चुकी। ईशर के यहा
उसका िववाह उनसे हो चुका यिद ऐसा न होता तो कया जगत् मे पुरष न थे? माधवी जैसी सती को कौन नेतो मे न सथान देगा?
उसने अपना आधा यौवन वयथर रो-रोकर िबताया है। उसने आज तक धयान मे भी िकसी अनय पुरष को सथान नही िदया। बारह
वषर से तपिसवनी का जीवन वयतीत कर रही है। वह पलंग पर नही सोयी। कोई रंगीन वसत नही पहना। केश तक नही गुँथाये।
कया इन वयवहारो से नही िसद होता िक माधवी का िववाह हो चुका? हृदय का िमलाप सचचा िववाह है। िसनदूर का टीका, गिनथबनधन और भावर- ये सब संसार के ढकोसले है।
सुवामा- अचछा, जैसा उिचत समझो करो। मै केवल जग-हँसाई से डरती हूँ।
रात को नौ बजे थे। आकाश पर तारे िछटके हुए थे। माधवी वािटका मे अकेली िकनतु अित दूर है। कया कोई वहा तक पहुँच
सकता है? कया मेरी आशाएँ भी उनही नकतो की भाित है? इतने मे िवरजन ने उसका हाथ पकडकर िहलाया। माधवी चौक
पडी।
िवरजन-अँधेरे मे बैठी कया कर रही है?
माधवी- कुछ नही, तो तारो को देख रही हूँ। वे कैसे सुहावने लगते है, िकनतु िमल नही सकते।
िवरजन के कलेजे मे बछी-सी लग गयी। धीरज धरकर बोली- यह तारे िगनने का समय नही है। िजस अितिथ के िलए आज
भोर से ही फूली नही समाती थी, कया इसी पकार उसकी अितिथ-सेवा करेगी?
माधवी- मै ऐसे अितिथ की सेवा के योगय कब हँू?
िवरजन- अचछा, यहा से उठो तो मै अितिथ-सेवा की रीित बताऊँ।
दोनो भीतर आयी। सुवामा भोजन बना चुकी थी। बालाजी को माता के हाथ की रसोई बहुत िदनो मे पापत हुई। उनहोने बडे पेम
से भोजन िकया। सुवामा िखलाती जाती थी और रोती जाती थी। बालाजी खा पीकर लेटे, तो िवरजन ने माधवी से कहा- अब
यहा कोने मे मुख बाधकर कयो बैठी हो?
माधवी- कुछ दो तो खाके सो रहँ,ू अब यही जी चाहता है।
िवरजन- माधवी! ऐसी िनराश न हो। कया इतने िदनो का वरत एक िदन मे भंग कर देगी?
माधवी उठी, परनतु उसका मन बैठा जाता था। जैसे मेघो की काली-काली घटाएँ उठती है और ऐसा पतीत होता है िक अब
जल-थल एक हो जाएगा, परनतु अचानक पछवा वायु चलने के कारण सारी घटा काई की भाित फट जाती है, उसी पकार इस
समय माधवी की गित हो रही है।

वह शुभ िदन देखने की लालसा उसके मन मे बहुत िदनो से थी। कभी वह िदन भी आयेगा जब िक मै उसके दशरन पाऊँगी? और
उनकी अमृत-वाणी से शवण तृपत करँगी। इस िदन के िलए उसने मानयाएँ कैसी मानी थी? इस िदन के धयान से ही उसका
हृदय कैसा िखला उठता था!
आज भोर ही से माधवी बहुत पसन थी। उसने बडे उतसाह से फूलो का हार गूँथा था। सैकडो काटे हाथ मे चुभा िलये। उनमत
की भाित िगर-िगर पडती थी। यह सब हषर और उमंग इसीिलए तो था िक आज वह शुभ िदन आ गया। आज वह िदन आ गया
िजसकी ओर िचरकाल से आँखे लगी हुई थी। वह समय भी अब समरण नही, जब यह अिभलाषा मन मे नही, जब यह अिभलाषा
मन मे न रही हो। परनतु इस समय माधवी के हृदय की वह गाते नही है। आननद की भी सीमा होती है। कदािचत् वह माधवी के
आननद की सीमा थी, जब वह वािटका मे झूम-झूमकर फूलो से आँचल भर रही थी। िजसने कभी सुख का सवाद ही न चखा हो,
उसके िलए इतना ही आननद बहुत है। वह बेचारी इससे अिधक आननद का भार नही सँभाल सकती। िजन अधरो पर कभी हँसी
आती ही नही, उनकी मुसकान ही हँसी है। तुम ऐसो से अिधक हँसी की आशा कयो करते हो? माधवी बालाजी की ओर परनतु इस
पकार इस पकार नही जैसे एक नवेली बहू आशाओं से भरी हुई शृंगार िकये अपने पित के पास जाती है। वही घर था िजसे वह
अपने देवता का मिनदर समझती थी। जब वह मिनदर शूनय था, तब वह आ-आकर आँसुओं के पुषप चढाती थी। आज जब देवता
ने वास िकया है, तो वह कयो इस पकार मचल-मचल कर आ रही है?
राित भली-भाित आदर हो चुकी थी। सडक पर घंटो के शबद सुनायी दे रहे थे। माधवी दबे पाव बालाजी के कमरे के दार तक
गयी। उसका हृदय धडक रहा था। भीतर जाने का साहस न हुआ, मानो िकसी ने पैर पकड िलए। उलटे पाव िफर आयी और
पृथवी पर बैठकर रोने लगी। उसके िचत ने कहा- माधवी! यह बडी लजजा की बात है। बालाजी की चेरी सही, माना िक तुझे
उनसे पेम है ; िकनतु तू उसकी सती नही है। तुझे इस समय उनक गृह मे रहना उिचत नही है। तेरा पेम तुझे उनकी पती नही
बना सकता। पेम और वसतु है और सोहाग और वसतु है। पेम िचत की पवृित है और बयाह एक पिवत धमर है। तब माधवी को
एक िववाह का समरण हो आया। वर ने भरी सभा मे पती की बाह पकडी थी और कहा था िक इस सती को मै अपने गृह की
सवािमनी और अपने मन की देवी समझता रहूँगा। इस सभा के लोग, आकाश, अिगन और देवता इसके साकी रहे। हा! ये कैसे
शुभ शबद है। मुझे कभी ऐसे शबद सुनने का मौका पापत न हुआ! मै न अिगन को अपना साकी बना सकती हँू, न देवताओं को और
न आकाश ही को; परनतु है अिगन! है आकाश के तारो! और हे देवलोक-वािसयो! तुम साकी रहना िक माधवी ने बालाजी की पिवत
मूितर को हृदय मे सथान िदया, िकनतु िकसी िनकृष िवचार को हृदय मे न आने िदया। यिद मैने घर के भीतर पैर रखा हो तो है
अिगन! तुम मुझे अभी जलाकर भसम कर दो। हे आकाश! यिद तुमने अपने अनेक नेतो से मुझे गृह मे जाते देखा, तो इसी कण
मेरे ऊपर इनद का वज िगरा दो।
माधवी कुछ काल तक इसी िवचार मे मगन बैठी रही। अचानक उसके कान मे भक-भक की धविन आयीय। उसने चौककर
देखा तो बालाजी का कमरा अिधक पकािशत हो गया था और पकाश िखडिकयो से बाहर िनकलकर आँगन मे फैल रहा था।
माधवी के पाव तले से िमटी िनकल गयी। धयान आया िक मेज पर लैमप भभक उठा। वायु की भाित वह बालाजी के कमरे मे
घुसी। देखा तो लैमप फटक पृथवी पर िगर पडा है और भूतल के िबछावन मे तेल फैल जाने के कारण आग लग गयी है। दूसरे
िकनारे पर बालाजी सुख से सो रहे थे। अभी तक उनकी िनदा न खुली थी। उनहोने कालीन समेटकर एक कोने मे रख िदया
था। िवदुत की भाित लपककर माधवी ने वह कालीन उठा िलया और भभकती हुई जवाला के ऊपर िगरा िदया। धमाके का शबद
हुआ तो बालाजी ने चौककर आँखे खोली। घर मे धुआँ भरा था और चतुिदरक तेल की दुगरनध फैली हुई थी। इसका कारण वह
समझ गये। बोले- कुशल हुआ, नही तो कमरे मे आग लग गयी थी।
माधवी - जी हा! यह लैमप िगर पडा था।
बालाजी - तुम बडे अवसर से आ पहुँची।
माधवी - मै यही बाहर बैठी हुई थी।

बालाजी – तुमको बडा कष हुआ। अब जाकर शयन करो। रात बहुत हा गयी है।
माधवी – चली जाऊँगी। शयन तो िनतय ही करना है। यअ अवसर न जाने िफर कब आये?
माधवी की बातो से अपूवर करणा भरी थी। बालाजी ने उसकी ओर धयान-पूवरक देखा। जब उनहोने पिहले माधवी को देखा
था,उसक समय वह एक िखलती हुई कली थी और आज वह एक मुरझाया हुआ पुषप है। न मुख पर सौनदयर था, न नेतो मे
आननद की झलक, न माग मे सोहाग का संचार था, न माथे पर िसंदरू का टीका। शरीर मे आभूषाणो का िचनह भी न था।
बालाजी ने अनुमान से जाना िक िवधाता से जान िक िवधाता ने ठीक तरणावसथा मे इस दुिखया का सोहाग हरण िकया है। परम
उदास होकर बोले-कयो माधवी! तुमहारा तो िववाह हो गया है न?
माधवी के कलेज मे कटारी चुभ गयी। सजल नेत होकर बोली- हा, हो गया है।
बालाजी- और तुमहार पित?
माधवी- उनहे मेरी कुछ सुध ही नही। उनका िववाह मुझसे नही हुआ।
बालाजी िविसमत होकर बोले- तुमहारा पित करता कया है?
माधवी- देश की सेवा।
बालाजी की आँखो के सामने से एक पदा सा हट गया। वे माधवी का मनोरथ जान गये और बोले- माधवी इस िववाह को िकतने
िदन हुए?
बालाजी के नेत सजल हो गये और मुख पर जातीयता के मद का उनमाद– सा छा गया। भारत माता! आज इस पिततावसथा मे
भी तुमहारे अंक मे ऐसी-ऐसी देिवया खेल रही है, जो एक भावना पर अपने यौवन और जीवन की आशाऍं समपरण कर सकती है।
बोले- ऐसे पित को तुम तयाग कयो नही देती?
माधवी ने बालाजी की ओर अिभमान से देखा और कहा- सवामी जी! आप अपने मुख से ऐसे कहे! मै आयर-बाला हूँ। मैने गानधारी
और सािवती के कुल मे जनम िलया है। िजसे एक बार मन मे अपना पित मान ेश
ाचुकी

उसे नही तयाग सकती। यिद मेरी आयु

इसी पकार रोते-रोते कट जाय, तो भी अपने पित की ओर से मुझे कुछ भी खेद न होगा। जब तक मेरे शरीर मे पाण रहेगा मै
ईशर से उनक िहत चाहती रहँूगी। मेरे िलए यही कया कमक है, जो ऐसे महातमा के पेम ने मेरे हृदय मे िनवास िकया है? मै इसी
का अपना सौभागय समझती हूँ। मैने एक बार अपने सवामी को दूर से देखा था। वह िचत एक कण के िलए भी आँखो से नही
उतरा। जब कभी मै बीमार हुई हँू, तो उसी िचत ने मेरी शुशुषा की है। जब कभी मैने िवयोेेश

के आँसू बहाये है, तो उसी

िचत ने मुझे सानतवना दी है। उस िचत वाले पित को मै। कैसे तयाग दूँ? मै उसकी हूँ और सदैव उसी का रहूँगी। मेरा हृदय
और मेरे पाण सब उनकी भेट हो चुके है। यिद वे कहे तो आज मै अिगन के अंक मंे ऐसे हषरपूवरक जा बैठूँ जैसे फूलो की शैयया
पर। यिद मेरे पाण उनके िकसी काम आये तो मै उसे ऐसी पसनता से दे दूँ जैसे कोई उपसाक अपने इषदेव को फूल चढाता
हो।
माधवी का मुखमणडल पेम-जयोित से अरणा हो रहा था। बालाजी ने सब कुछ सुना और चुप हो गये। सोचने लगे- यह सती है ;
िजसने केवल मेरे धयान पर अपना जीवन समपरण कर िदया है। इस िवचार से बालाजी के नेत अशुपूणर हो गये। िजस पेम ने एक
सती का जीवन जलाकर भसम कर िदया हो उसके िलए एक मनुषय के घैयर को जला डालना कोई बात नही! पेम के सामने धैयर
कोई वसतु नही है। वह बोले- माधवी तुम जैसी देिवया भारत की गौरव है। मै बडा भागयवान हूँ िक तुमहारे पेम-जैसी अनमोल
वसतु इस पकार मेरे हाथ आ रही है। यिद तुमने मेरे िलए योिगनी बनना सवीकार िकया है तो मै भी तुमहारे िलए इस सनयास और
वैरागय का तयाग कर सकता हूँ। िजसके िलए तुमने अपने को िमटा िदया है।, वह तुमहारे िलए बडा-से-बडा बिलदान करने से
भी नही िहचिकचायेगा।

माधवी इसके िलए पहले ही से पसतुत थी, तुरनत बोली- सवामीजी! मै परम अबला और बुिदहीन सती हँू। परनतु मै आपको
िवशास िदलाती हूँ िक िनज िवलास का धयान आज तक एक पल के िलए भी मेरे मन मे नही आया। यिद आपने यह िवचार िकया
िक मेर पेम का उदेशय केवल यह क आपके चरणो मे सासािरक बनधनो की बेिडया डाल दूँ, तो (हाथ जोडकर) आपने इसका
ततव नही समझा। मेरे पेम का उदेशय वही था, जो आज मुझे पापत हो गया। आज का िदन मेरे जीवन का सबसे शुभ िदन है।
आज मे अपने पाणनाथ के सममुख खडी हँू और अपने कानो से उनकी अमृतमयी वाणी सुन रही हँू। सवामीजी! मुझे आशा न थी
िक इस जीवन मे मुझे यह िदन देखने का सौभागय होगा। यिद मेरे पास संसार का राजय होता तो मै इसी आननद से उसे आपके
चरणो मे समपरण कर देती। मै हाथ जोडकर आपसे पाथरना करती हँू िक मुझे अब इन चरणो से अलग न कीिजयेगा। मै।
सनयास ले लूंगी और आपके संग रहूंगी। वैरािगनी बनूंगी, भभूित रमाऊंगी; परनत् आपका संग न छोडू ंगी। पाणनाथ! मैने बहुत
दु :ख सहे है, अब यह जलन नही सकी जाती।
यह कहते-कहते माधवी का कंठ रँध गया और आँखो से पेम की धारा बहने लगी। उससे वहा न बैठा गया। उठकर पणाम
िकया और िवरजन के पास आकर बैठ गयी। वृजरानी ने उसे गले लगा िलया और पूछा– कया बातचीत हुई?
माधवी- जो तुम चाहती थी।
वृजरानी- सच, कया बोले?
माधवी- यह न बताऊंगी।
वृजरानी को मानो पडा हुआ धन िमल गया। बोली- ईशर ने बहुत िदनो मे मेरा मनारेथ पूरा िकया। मे अपने यहा से िववाह
करंगी।
माधवी नैराशय भाव से मुसकरायी। िवरजन ने किमपत सवर से कहा- हमको भूल तो न जायेगी? उसकी आँखो से आँसू बहने
लगे। िफर वह सवर सँभालकर बोली- हमसे तू िबछुड जायेगी।
माधवी- मै तुमहे छोडकर कही न जाऊंगी।
िवरजन- चल; बाते ने बना।
माधवी- देख लेना।
िवरजन- देखा है। जोडा कैसा पहनेगी?
माधवी- उजजवल, जैसे बगुले का पर।
िवरजन- सोहाग का जोडा केसिरया रंग का होता है।
माधवी- मेरा शेत रहेगा।
िवरजन- तुझे चनदहार बहुत भाता था। मै अपना दे दूंगी।
माधवी-हार के सथान पर कंठी दे देना।
िवरजन- कैसी बाते कर रही है?
माधवी- अपने शृंगार की!
िवरजन- तेरी बाते समझ मे नही आती। तू इस समय इतनी उदास कयो है? तूने इस रत के िलए कैसी-कैसी तपसयाएँ की,
कैसा-कैसा योग साधा, कैसे-कैसे वरत िकये और तुझे जब वह रत िमल गया तो हिषरत नही देख पडती!
माधवी- तुम िववाह की बातीचीत करती हो इससे मुझे दु :ख होता है।

िवरजन- यह तो पसन होने की बात है।
माधवी- बिहन! मेरे भागय मे पसनता िलखी ही नही! जो पकी बादलो मे घोसला बनाना चाहता है वह सवरदा डािलयो पर रहता है।
मैने िनणरय कर िलया है िक जीवन की यह शेष समय इसी पकार पेम का सपना देखने मे काट दूंगी।

िवदाई / पेमचंद
दूसरे िदन बालाजी सथान-सथान से िनवृत होकर राजा धमरिसंह की पतीका करने लगे। आज राजघाट पर एक िवशाल गोशाला
का िशलारोपण होने वाला था, नगर की हाट-बाट और वीिथया मुसकाराती हुई जान पडती थी। सडृक के दोनो पाशर मे झणडे
और झिणया लहरा रही थी। गृहदार फूलो की माला पिहने सवागत के िलए तैयार थे, कयोिकआज उस सवदेश-पेमी का शुभगमन
है, िजसने अपना सवरसव देश के िहत बिलदान कर िदया है।
हषर की देवी अपनी सखी-सहेिलयो के संग टहल रही थी। वायु झूमती थी। दु :ख और िवषाद का कही नाम न था। ठौर-ठौर पर
बधाइया बज रही थी। पुरष सुहावने वसत पहने इठालते थे। सतीया सोलह शृंगार िकये मंगल-गीत गाती थी। बालक-मणडली
केसिरया साफा धारण िकये कलोले करती थी हर पुरष-सती के मुख से पसनता झलक रही थी, कयोिक आज एक सचचे जाितिहतैषी का शुभगमन है िजसेने अपना सवरसव जाित के िहत मे भेट कर िदया है।
बालाजी अब अपने सुहदो के संग राजघाट की ओर चले तो सूयर भगवान ने पूवर िदशा से िनकलकर उनका सवागत िकया।
उनका तेजसवी मुखमणडल जयो ही लोगो ने देखा सहसो मुखो से ‘भारत माता की जय’ का घोर शबद सुनायी िदया और वायुमंडल
को चीरता हुआ आकाश-िशखर तक जा पहंुवा। घणटो और शंखो की धविन िननािदत हुई और उतसव का सरस राग वायु मे
गूँजने लगा। िजस पकार दीपक को देखते ही पतंग उसे घेर लेते है उसी पकार बालाजी को देखकर लोग बडी शीघता से उनके
चतुिदरक एकत हो गये। भारत-सभा के सवा सौ सभयो ने आिभवादन िकया। उनकी सुनदर वािदरया और मनचले घोडो नेतो मे
खूब जाते थे। इस सभा का एक-एक सभय जाित का सचचा िहतैषी था और उसके उमंग-भरे शबद लोगो के िचत को उतसाह से
पूणर कर देते थे सडक के दोनो ओर दशरको की शेणी थी। बधाइया बज रही थी। पुषप और मेवो की वृिष हो रही थी। ठौर-ठौर
नगर की ललनाएँ शृंगार िकये, सवणर के थाल मे कपूर, फूल और चनदन िलये आरती करती जाती थी। और दूकाने नवागता वधू
की भाित सुसिजजत थी। सारा नगेर अपनी सजावट से वािटका को लिजजत करता था और िजस पकार शावण मास मे काली
घटाएं उठती है और रह-रहकर वन की गरज हृदय को कँपा देती है और उसी पकार जनता की उमंगवदरक धविन (भारत माता
की जय) हृदय मे उतसाह और उतेजना उतपन करती थी। जब बालाजी चौक मे पहुँचे तो उनहोने एक अदुत दृशय देखा।
बालक-वृनद ऊदे रंग के लेसदार कोट पिहने , केसिरया पगडी बाधे हाथो मे सुनदर छिडया िलये मागर पर खडे थे। बालाजी को
देखते ही वे दस-दस की शेिणयो मे हो गये एवं अपने डणडे बजाकर यह ओजसवी गीत गाने लगे:-

बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।
धिन-धिन भागय है इस नगरी के ; धिन-धिन भागय हमारे।।
धिन-धिन इस नगरी के बासी जहा तब चरण पधारे।
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।।

कैसा िचताकषरक दृशय था। गीत यदिप साधारण था, परनतु अनके और सधे हुए सवरो ने िमलकर उसे ऐसा मनोहर और
पभावशाली बना िदया िक पाव रक गये। चतुिदरक सनाटा छा गया। सनाटे मे यह राग ऐसा सुहावना पतीत होता था जैसे राित
के सनाटे मे बुलबुल का चहकना। सारे दशरक िचत की भाित खडे थे। दीन भारतवािसयो, तुमने ऐसे दृशय कहा देख?
े इस

समय जी भरकर देख लो। तुम वेशयाओं के नृतय-वाद से सनतुष हो गये। वारागनाओं की काम-लीलाएँ बहुत देख चुके, खूब
सैर सपाटे िकये ; परनतु यह सचचा आननद और यह सुखद उतसाह, जो इस समय तुम अनुभव कर रहे हो तुमहे कभी और भी
पापत हुआ था? मनमोहनी वेशयाओं के संगीत और सुनदिरयो का काम-कौतुक तुमहारी वैषियक इचछाओं को उतेिजत करते है।
िकनतु तुमहारे उतसाहो को और िनबरल बना देते है और ऐसे दृशय तुमहारे हृदयो मे जातीयता और जाित-अिभमान का संचार करते
है। यिद तुमने अपने जीवन मे एक बार भी यह दृशय देखा है, तो उसका पिवत िचहन तुमहारे हृदय से कभी नही िमटेगा।
बालाजी का िदवय मुखमंडल आितमक आननद की जयोित से पकािशत था और नेतो से जातयािभमान की िकरणे िनकल रही थी।
िजस पकार कृषक अपने लहलहाते हुए खेत को देखकर आननदोनमत हो जाता है, वही दशा इस समय बालाजी की थी। जब
रागे बनद हो गेया, तो उनहोने कई डग आगे बढकर दो छोटे-छोटे बचचो को उठा कर अपने कंधो पर बैठा िलया और बोले,
‘भारत-माता की जय!’
इस पकार शनै : शनै लोग राजघाट पर एकत हुए। यहा गोशाला का एक गगनसपशी िवशाल भवन सवागत के िलये खडा था।
आँगन मे मखमल का िबछावन िबछा हुआ था। गृहदार और सतंभ फूल-पितयो से सुसिजजत खडे थे। भवन के भीतर एक सहस
गाये बंधी हुई थी। बालाजी ने अपने हाथो से उनकी नॉँदो मे खली-भूसा डाला। उनहे पयार से थपिकयॉँ दी। एक िवसतृत गृह मे
संगमर का अषभुज कुणड बना हुआ था। वह दूध से पिरवूणर था। बालाजी ने एक चुललू दूध लेकर नेतो से लगाया और पान
िकया।
अभी आँगन मे लोग शािनत से बैठने भी न पाये थे कई मनुषय दौडे हुए आये और बोल-पिणडत बदलू शासती, सेठ उतमचनद और
लाला माखनलाल बाहर खडे कोलाहल मचा रहे है और कहते है। िक हमा को बालाजी से दो-दो बाते कर लेने दो। बदलू
शासती काशी के िवखयात पंिणडत थे। सुनदर चनद-ितलक लगाते, हरी बनात का अंगरखा पिरधान करते औश बसनती पगडी
बाधत थे। उतमचनद और माखनलाल दोनो नगर के धनी और लकाधीश मनुषये थे। उपािध के िलए सहसो वयय करते और
मुखय पदािधकािरयो का सममान और सतकार करना अपना पधान कतरवय जानते थे। इन महापुरषो का नगर के मनुषयो पर बडा
दबवा था। बदलू शासती जब कभी शासतीथर करते, तो िन:संदेह पितवादी की पराजय होती। िवशेषकर काशी के पणडे और
पागवाल तथा इसी पनथ के अनय धािमकगझर तो उनके पसीने की जगह रिधर बहाने का उदत रहते थे। शासती जी काशी मे
िहनदू धमर के रकक और महान् सतमभ पिसद थे। उतमचनद और माखनलाल भी धािमरक उतसाह की मूितर थे। ये लोग बहुत िदनो
से बालाजी से शासताथर करने का अवसर ढू ंढ रहे थे। आज उनका मनोरथ पूरा हुआ। पंडो और पागवालो का एक दल िलये आ
पहुँचे।
बालाजी ने इन महातमा के आने का समाचार सुना तो बाहर िनकल आये। परनतु यहा की दशा िविचत पायी। उभय पक के लोग
लािठया सँभाले अँगरखे की बाहे चढाये गुथने का उदत थे। शासतीजी पागवालो को िभडने के िलये ललकार रहे थे और सेठजी
उचच सवर से कह रहे थे िक इन शूदो की धिजजयॉँ उडा दो अिभयोग चलेगा तो देखा जाएगा। तुमहार बाल-बॉँका न होने
पायेगा। माखनलाल साहब गला फाड-फाडकर िचललाते थे िक िनकल आये िजसे कुछ अिभमान हो। पतयेक को सबजबाग
िदखा दूँगा। बालाजी ने जब यह रंग देखा तो राजा धमरिसंह से बोले-आप बदलू शासती को जाकर समझा दीिजये िक वह इस
दुषता को तयाग दे, अनयथा दोनो पकवालो की हािन होगी और जगत मे उपहास होगा सो अलग।
राजा साहब के नेतो से अिगन बरस रही थी। बोले- इस पुरष से बाते करने मे अपनी अपितषा समझता हूँ। उसे पागवालो के
समूहो का अिभमान है परनतु मै। आज उसका सारा मद चूणर कर देता हँू। उनका अिभपाय इसके अितिरकत और कुछ नही है
िक वे आपके ऊपर वार करे। पर जब तक मै। और मरे पॉँच पुत जीिवत है तब तक कोई आपकी ओर कुदृिष से नही देख
सकता। आपके एक संकेत-मात की देर है। मै पलक मारते उनहे इस दुषता का सवाद चखा दूंगा।
बालाजी जान गये िक यह वीर उमंग मे आ गया है। राजपूत जब उमंग मे आता है तो उसे मरने -मारने क अितिरकत और कुछ
नही सूझता। बोले-राजा साहब, आप दूरदशी होकर ऐसे वचन कहते है? यह अवसर ऐसे वचनो का नही है। आगे बढकर अपने
आदिमयो को रोिकये, नही तो पिरणाम बुरा होगा।

बालालजी यह कहते-कहते अचानक रक गये। समुद की तरंगो का भाित लोग इधर-उधर से उमडते चले आते थे। हाथो मे
लािठया थी और नेतो मे रिधर की लाली, मुखमंडल कुद, भृकुटी कुिटल। देखते-देखते यह जन-समुदाय पागवालो के िसर पर
पहुँच गया। समय सिनकट था िक लािठया िसर को चुमे िक बालाजी िवदुत की भाित लपककर एक घोडे पर सवार हो गये और
अित उचच सवर मे बोले:
‘भाइयो ! कया अंधेर है? यिद मुझे आपना िमत समझते हो तो झटपट हाथ नीचे कर लो और पैरो को एक इंच भी आगे न बढने
दो। मुझे अिभमान है िक तुमहारे हृदयो मे वीरोिचत कोध और उमंग तरंिगत हो रहे है। कोध एक पिवत उदोग और पिवत उतसाह
है। परनतु आतम-संवरण उससे भी अिधक पिवत धमर है। इस समय अपने कोध को दृढता से रोको। कया तुम अपनी जाित के
साथ कुल का कतरवय पालन कर चुके िक इस पकार पाण िवसजरन करने पर किटबद हो कया तुम दीपक लेकर भी कूप मे िगरना
चाहते हो? ये उलोग तमहारे सवदेश बानधव और तुमहारे ही रिधर है। उनहे अपना शतु मत समझो। यिद वे मूखर है तो उनकी
मूखरता का िनवारण करना तुमहारा कतरवय है। यिद वे तुमहे अपशबद कहे तो तुम बुरा मत मानो। यिद ये तुमसे युद करने को
पसतुत हो तुम नमता से सवीकार कर तो और एक चतुर वैद की भाित अपने िवचारहीन रोिगयो की औषिध करने मे तललीन हो
जाओ। मेरी इस आशा के पितकूल यिद तुममे से िकसी ने हाथ उठाया तो वह जाित का शतु होगा।
इन समुिचत शबदो से चतुिदरक शाित छा गयी। जो जहा था वह वही िचत िलिखत सा हो गया। इस मनुषय के शबदो मे कहा का
पभाव भरा था,िजसने पचास सहस मनुषयो के उमडते हुए उदेग को इस पकार शीतल कर िदया ,िजस पकार कोई चतुर सारथी
दुष घोडो को रोक लेता है, और यह शिकत उसे िकसने की दी थी ? न उसके िसर पर राजमुकुट था, न वह िकसी सेना का
नायक था। यह केवल उस पिवत् और िन:सवाथर जाित सेवा का पताप था, जो उसने की थी। सवजित सेवक के मान और
पितषा का कारण वे बिलदान होते है जो वह अपनी जित के िलए करता है। पणडो और पागवालो नेबालाजी का पतापवान रप
देखा और सवर सुना, तो उनका कोध शानत हो गया। िजस पकार सूयर के िनकलने से कुहरा आ जाता है उसी पकार बालाजी
के आने से िवरोिधयो की सेना िततर िबतर हो गयी। बहुत से मनुषय – जो उपदव के उदेशय से आये थे – शदापूवरक बालाजी के
चरणो मे मसतक झुका उनके अनुयािययो के वगर मे सिमलत हो गये। बदलू शासती ने बहुत चाहा िक वह पणडो के पकपात और
मूखररता को उतेिजत करे,िकनतु सफलता न हुई।
उस समय बालाजी ने एक परम पभावशाली वकतृता दी िजसका एक –एक शबद आज तक सुननेवालो के हृदय पर अंिकत है और
जो भारत –वािसयो के िलए सदा दीप का काम करेगी। बालाजी की वकतृताएं पाय: सारगिभरत है। परनतु वह पितभा, वह ओज
िजससे यह वकतृता अलंकृत है, उनके िकसी वयाखयान मे दीख नही पडते। उनहोने अपने वाकयो के जादू से थोडी ही देर मे
पणडो को अहीरो और पािसयो से गले िमला िदया। उस वकतृता के अंितम शबद थे:
यिद आप दृढता से कायर करते जाएंगे तो अवशय एक िदन आपको अभीष िसिद का सवणर सतमभ िदखायी देगा। परनतु धैयर को
कभी हाथ से न जाने देना। दृढता बडी पबल शिकत है। दृढता पुरष के सब गुणो का राजा है। दृढता वीरता का एक पधान अंग
है। इसे कदािप हाथ से न जाने देना। तुमहारी परीकाएं होगी। ऐसी दशा मे दृढता के अितिरकत कोई िवशासपात पथ-पदशरक
नही िमलेगा। दृढता यिद सफल न भी हो सके, तो संसार मे अपना नाम छोड जाती है’।
बालाजी ने घर पहुचंकर समाचार-पत खोला, मुख पीला हो गया, और सकरण हृदय से एक ठणडी सास िनकल आयी। धमरिसंह
ने घबराकर पूछा– कुशल तो है ?
बालाजी–सिदया मे नदी का बाध फट गया बस साहस मनुषय गृहहीन हो गये।
धमरिसंह- ओ हो।
बालाजी– सहसो मनुषय पवाह की भेट हो गये। सारा नगर नष हो गया। घरो की छतो पर नावे चल रही है। भारत सभा के
लोग पहुच गये है और यथा शिकत लोगो की रका कर रहे है, िकनतु उनकी संखया बहुत कम है।

धमरिसंह(सजलनयन होकर) हे इशर। तू ही इन अनाथो को नाथ है। गयी। तीन घणटे तक िनरनतर मूसलाधार पानी बरसता
रहा। सोलह इंच पानी िगरा। नगर के उतरीय िवभाग मे सारा नगर एकत है। न रहने को गृह है, न खाने को अन। शव की
रािशया लगी हुई है बहुत से लोग भूखे मर जाते है। लोगो के िवलाप और करणाकनदन से कलेजा मुंह को आता है। सब
उतपात–पीिडत मनुषय बालाजी को बुलाने की रट लगा रह है। उनका िवचार यह है िक मेरे पहंुचने से उनके दु :ख दूर हो
जायंगे।
ं जाऊंगा। आप सिदयो की , ‘भारत
कुछ काल तक बालाजी धयान मे मगन रहे, ततपशात बोले–मेरा जाना आवशयक है। मै तुरत
सभा’ की तार दे दीिजये िक वह इस कायर मे मेरी सहायता करने को उदत् रहे।
राजा साहब ने सिवनय िनवेदन िकया – आजा हो तो मै चलूं ?
बालाजी – मै पहंुचकर आपको सूचना दूँगा। मेरे िवचार मे आपके जाने की कोई आवशयकता न होगी।
धमरिसंह -उतम होता िक आप पात:काल ही जाते।
बालाजी – नही। मुझे यहॉँ एक कण भी ठहरना किठन जान पडता है। अभी मुझे वहा तक पहुचंने मे कई िदन लगेगे।
पल – भर मे नगर मे ये समाचार फैल गये िक सिदयो मे बाढ आ गयी और बालाजी इस समय वहा आ रहे है। यह सुनते ही
सहसो मनुषय बालाजी को पहंुचाने के िलए िनकल पडे। नौ बजते–बजते दार पर पचीस सहस मनुषयो क समुदाय एकत् हो
गया। सिदया की दुघरटना पतयेक मनुषय के मुख पर थी लोग उन आपित–पीिडत मनुषयो की दशा पर सहानुभूित और िचनता
पकािशत कर रहे थे। सैकडो मनुषय बालाजी के संग जाने को किटबद हुए। सिदयावालो की सहायता के िलए एक फणड
खोलने का परामशर होने लगा।
उधर धमरिसंह के अनत: पुर मे नगर की मुखय पितिषत िसतयो ने आज सुवामा को धनयावाद देने के िलए एक सभा एकत की
थी। उस उचच पसाद का एक-एक कौना िसतयो से भरा हुआ था। पथम वृजरानी ने कई िसतयो के साथ एक मंगलमय सुहावना
गीत गाया। उसके पीछे सब िसतया मणडल बाध कर गाते – बजाते आरती का थाल िलये सुदामा के गृह पर आयी। सेवती और
चनदा अितिथ-सतकार करने के िलए पहले ही से पसतुत थी सुवामा पतयेक मिहला से गले िमली और उनहे आशीवादर िदया िक
तुमहारे अंक मे भी ऐसे ही सुपूत बचचे खेले। िफर रानीजी ने उसकी आरती की और गाना होने लगा। आज माधवी का मुखमंडल
पुषप की भाित िखला हुआ था। मात वह उदास और िचंितत न थी। आशाएं िवष की गाठ है। उनही आशाओं ने उसे कल रलाया
था। िकनतु आज उसका िचत उन आशाओं से िरकत हो गया है। इसिलए मुखमणडल िदवय और नेत िवकिसत है। िनराशा
रहकर उस देवी ने सारी आयु काट दी, परनतु आशापूणर रह कर उससे एक िदन का दु :ख भी न सहा गया।
सुहावने रागो के आलाप से भवन गूंज रहा था िक अचानक सिदया का समाचार वहा भी पहंुचा और राजा धमरिसहं यह कहते यह
सुनायी िदये – आप लोग बालाजी को िवदा करने के िलए तैयार हो जाये वे अभी सिदया जाते है।
यह सुनते ही अधरराित का सनाटा छा गया। सुवामा घबडाकर उठी और दार की ओर लपकी, मानो वह बालाजी को रोक लेगी।
उसके संग सब –की–सब िसतया उठ खडी हुई और उसके पीछे –पीछे चली। वृजरानी ने कहा –चची। कया उनहे बरबस िवदा
करोगी ? अभी तो वे अपने कमरे मे है।
‘मै उनहे न जाने दूंगी। िवदा करना कैसा ?
वृजरानी- मै कया सिदया को लेकर चाटू ंगी ? भाड मे जाय। मै भी तो कोई हूं? मेरा भी तो उन पर कोई अिधकार है ?
वृजरानी –तुमहे मेरी शपथ, इस समय ऐसी बाते न करना। सहसो मनुषय केवल उनके भरासे पर जी रहे है। यह न जायेगे तो
पलय हो जायेगा।

माता की ममता ने मनुषयतव और जािततव को दबा िलया था, परनतु वृजरानी ने समझा–बुझाकर उसे रोक िलया। सुवामा इस
घटना को समरण करके सवरदा पछताया करती थी। उसे आशयर होता था िक मै आपसे बाहर कयो हो गयी। रानी जी ने पूछािवरजन बालाजी को कौन जयमाल पिहनायेगा।
िवरजन –आप।
रानीजी – और तुम कया करोगी ?
िवरजन –मै उनके माथे पर ितलक लगाऊंगी।
रानीजी – माधवी कहा है ?
िवरजन (धीरे–से) उसे न छडो। बेचार, अपने घयान मे मगन है। सुवामा को देखा तो िनकट आकर उसके चरण सपशर िकये।
सुवामा ने उनहे उठाकर हृदय मे लगाया। कुछ कहना चाहती थी, परनतु ममता से मुख न खोल सकी। रानी जी फूलो की
जयमाल लेकर चली िक उसके कणठ मे डाल दूं, िकनतु चरण थराये और आगे न बढ सकी। वृजरानी चनदन का थाल लेकर
चली, परनतु नेत-शावण –धन की भित बरसने लगे। तब माधव चली। उसके नेतो मे पेम की झलक थी और मुंह पर पेम की
लाली। अधरो पर मिहनी मुसकान झलक रही थी और मन पेमोनमाद मे मगन था। उसने बालाजी की ओर ऐसी िचतवन से देखा
जो अपार पेम से भरी हुई। तब िसर नीचा करके फूलो की जयमाला उसके गले मे डाली। ललाट पर चनदन का ितलक
लगाया। लोक–संसकारकी नयूनता, वह भी पूरी हो गयी। उस समय बालाजी ने गमभीर सॉस ली। उनहे पतीत हुआ िक मै अपार
पेम के समुद मे वहा जा रहा हूं। धैयर का लंगर उठ गया और उसे मनुषय की भाित जो अकसमात् जल मे िफसल पडा हो, उनहोने
माधवी की बाह पकड ली। परनतु हा :िजस ितनके का उनहोने सहारा िलया वह सवयं पेम की धार मे तीब गित से बहा जा रहा
था। उनका हाथ पकडते ही माधवी के रोम-रोम मे िबजली दौड गयी। शरीर मे सवेद-िबनदु झलकने लगे और िजस पकार वायु
के झोके से पुषपदल पर पडे हुए ओस के जलकण पृथवी पर िगर जाते है, उसी पकार माधवी के नेतो से अशु के िबनदु बालाजी के
हाथ पर टपक पडे। पेम के मोती थे, जो उन मतवाली आंखो ने बालाजी को भेट िकये। आज से ये ओंखे िफर न रोयेगी।
आकाश पर तारे िछटके हुए थे और उनकी आड मे बैठी हुई िसतया यह दृशय देख रही थी आज पात:काल बालाजी के सवागत मे
यह गीत गाया था :

बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।

और इस समय िसतया अपने मन –भावे सवरो से गा रही है :

बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।

आना भी मुबारक था और जाना भी मुबारक है। आने के समय भी लोगो की आंखो से आंसूं िनकले थे और जाने के समय भी
िनकल रहे है। कल वे नवागत के अितिथ सवागत के िलए आये थे। आज उसकी िवदाई कर रहे है उनके रंग – रप सब पूवरवत
है :परनतु उनमे िकतना अनतर है।
मतवाली योिगनी / पेमचंद
माधवी पहले ही से मुरझायी हुई कली थी। िनराशा ने उसे खाक मे िमला िदया। बीस वषर की तपिसवनी योिगनी हो गयी। उस
बेचारी का भी कैसा जीवन था िक या तो मन मे कोई अिभलाषा ही उतपन न हुई, या हुई दुदैव ने उसे कुसुिमत न होने िदया।

उसका पेम एक अपार समुद था। उसमे ऐसी बाढ आयी िक जीवन की आशाएं और अिभलाषाएं सब नष हो गयी। उसने
योिगनी के से वसत् पिहन िलये। वह सासिरक बनधनो से मुकत हो गयी। संसार इनही इचछाओं और आशाओं का दूसरा नाम है।
िजसने उनहे नैराशय–नद मे पवािहत कर िदया, उसे संसार मे समझना भम है। इस पकार के मद से मतवाली योिगनी को एक
सथल पर शाित न िमलती थी। पुषप की सुगिधं की भाित देश-देश भमण करती और पेम के शबद सुनाती िफरती थी। उसके पीत
वणर पर गेरए रंग का वसत परम शोभा देता था। इस पेम की मूितर को देखकर लोगो के नेतो से अशु टपक पडते थे। जब
अपनी वीणा बजाकर कोई गीत गाने लगती तो वुनने वालो के िचत अनुराग मे पग जाते थे उसका एक–एक शबद पेम–रस डू बा
होता था। मतवाली योिगनी को बालाजी के नाम से पेम था। वह अपने पदो मे पाय: उनही की कीितर सुनाती थी। िजस िदन से
उसने योिगनी का वेष घारण िकया और लोक–लाज को पेम के िलए पिरतयाग कर िदया उसी िदन से उसकी िजहा पर माता
सरसवती बैठ गयी। उसके सरस पदो को सुनने के िलए लोग सैकडो कोस चले जाते थे। िजस पकार मुरली की धविन सुनकर
गोिपंया घरो से वयाकुल होकर िनकल पडती थी उसी पकार इस योिगनी की तान सुनते ही शोताजनो का नद उमड पडता था।
उसके पद सुनना आननद के पयाले पीना था। इस योिगनी को िकसी ने हंसते या रोते नही देखा। उसे न िकसी बात पर हषर था,
न िकसी बात का िवषाद्। िजस मन मे कामनाएं न हो, वह कयो हंसे और कयो रोये ? उसका मुख–मणडल आननद की मूितर था।
उस पर दृिष पडते ही दशरक के नेत पिवत् आननद से पिरपूणर हो जाते थे।

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