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मुटठी भर पैसे

. उपनयास

‘शंकर सोनाने

रचनाकाल
1993 - 1996

पूजनीय माताजी
शानता सोनाने
शदे य
संगीता साहबजी
बेिियाँ.....
संगीता और वैशाली
के िलए......

मुटठी भर पैसे.................

माना गया है ,पैसा भगवान तो नहीं है लेिकन कमबखत भगवान से कम भी नहीं है । पैसे के िलए
इनसान वह सब कुछ करने के िलए तैयार हो जाता है जो उसे िकया जाना है ।िजससे उसे अपनी ितजोरी भरने के िलए
आवशयक होता है ।वह अचछा-बुरा नहीं सोचता।उसकी तमनना रहती है उसके पास और अििक पैसा आए।चाहे वह
िजस भी िकसी तरह से आए,लेिकन आए जरर ।इनसान की रपये-पैसे की हवस कभी पूरी नहीं होती ।िजतना उसे
अििक िमलता है उतना अििक पाने की उसकी अपेका रहती है ।वह उतना और अििक पाने की कोिशश करता है । अब
तक के िजतने भी युद हुए है उसके पीछे रपये-पैसे भी कारण रहे है । अचछे -भरे पिरवारो मे,िरशतो मे,समाज मे और
िमतो के बीच रपये -पैसे को लेकर बैर उतपनन होता आया है ।इनसान यह नहीं समझता िक रपये-पैसो से भी बढ़कर
इनसानी िरशते होते है । उसे तो बस केवल रपया-पैसा ही नज़र आता है ।वह इनसानो से नहीं अिपतु इनही रपये-पैसो से
पे््रम करने लग जाता है ।उठते-बैठते,खाते-पीते उसे केवल रपया-पैसा ही सूझता है । इसी तरह सारे िरशतो और
मानवीयता की हद को पार करते हुए िरमदास महाजन रपये-पैसे के पीछे इतने पागल हो गए िक उनहोने अपनी
इनसािनयत को है वािनयत मे बदल िदया।तोड़ दी इनसानी िरशतो की दीवार और जो नहीं करना चािहए था उसने वह
िकया।पिरणाम जो भी िनकला हो या िनकले लेिकन जब से इनसानो ने रपये-पैसो को एहिमयत दी है तब से आने वाले
समय तक िरमदास महाजन जैसे लोग मानवीयता को कलंिकत करते रहे गे।

जो भी बकायादार बकाया जमा नहीं करता वह उसे अपने आदिमयो से उठवा लेता।उसे तरह-तरह की
यातनाएं दे ता।मारता-पीिता और कोठिरयो मे बनद कर उसके हाथ-पाँव बंघवा दे ता तािक वह िकसी तरह की हरकत न
करे ।भागकर नहीं जा सके्े।यह उसका िनतय का कमम था। िजन िदनो गाँव मे कोई वयिि िदखाई नहीं दे ता,समझा
जाता है िक उसे िरमदास ने कोठिरया मे बनद कर िदया हो। अििकतर गाँव के िनिन
म तबके के लोग िरमदास
महाजन के िशकार होते रहे ।िजस िकसी की कोई भी िववशता हो,िरमदास महाजन उसे तुरत-फुरत कजम दे ने मे आना-
कानी नहीं करता।यहाँ तक िक वह जररतमनदो की ज़मीन-जायजाद ,गहने या जो कुछ भी िमल जाए,िगरवी रखवा
िलया करता था।इस तरह उसने गाँव के कई िनिन
म ो को कजद
म ार बना रखा था।जो कोई चूँ भी करे तो वह ज़बान खींच
िलया करता था।
उस रात भूरा कहीं जा आ रहा था।रात का समय था।गाँवो मे वैसे ही रात हो जाते ही लोग अपने-अपने घरो मे
दब
ु क जाते है िफर आने-जाने का नाम ही नहीं लेते।जब तक िक कोई बहुत ही जररी काम न आ पड़े ।शहर को गए हुए
गामीण गई रात होने पर या तो गाँव वापस लौिते ही नहीं थे।सोचा करते िक चलो िदन होने पर ही गाँव जाना उिचत
होगा।बहुत जररी होने पर ही शहर को गए गामीण रात-बे-रात गाँव लौि आया करते है ।गाँव के पवेश करने पर कुछ
पुरानी झोपिड़याँ िदखाई दे ती है ।यहाँ अकसर लोगो के पशु बंिा करते है ।वह भी कभी-कभी।जब से इस सथान पर
िरमदास महाजन ने कबजा करके रखा है तब से और कोई इस सथान पर अपना अििकार नहीं जताता।कहा जाता है
िक िकसी मजबूर की ज़मीन िरमदास ने हिथया ली थी।मजबूरीवश वह महाजन का कजाम चुकता नहीं कर पाया।सारी
िजनदगी बयाज दे ता रहा और अनतत: चल बसा।तब से महाजन का हक इस ज़मीन पर रहा है ।
भूरा जब गाँव मे पवेश कर रहा था। उसी समय िकसी झोपड़ी मे से कराहने की आवाज़ आ रही थी।आसमान मे जगर-
मगर करता चनदमा दै िदपयमान हो रहा था।उसी का हलका-हलका पकाश झोपड़ी के भीतर खमभे से बंिे गामीण के
चेहरे पर पड़ रहा था। यूँ ही उसकी उम चालीस के आसपास रही होगी।दे खने मे वह बहुत कमजोर और वद
ृ लग रहा
था।उसके चेहरे पर वद
ृ ावसथा की झुिरZ या झलक रही थी।संभवत:वह आयु के्े पहले ही वद
ृ हो गया हो।वह घुिनो
तक िोती और बदन पर मैली-कुचैनी पुरानी बंडी पहना हुआ था।उसके िसर के केश असत-वयसत हो गए थे।उसके चेहरे
पर ढ़े र सारी ढाढ़ी िनकल आई हुई थी।लगता था न जाने उसे िकतने िदनो से झोपड़ी मे बनद करके रखा हुआ है ।उसके
चेहरे पर पीड़ा के भाव िबखरे पड़े थे।वह भूख-पयास से पीिड़त पतीत हो रहा था।उसके गाल भीतर िपचक गए थे।आँखे
भीतर गड््डे मे िंसी जाती थी।उसके होठो पर पपड़ी जम गई थी।ऐसा पतीत हो रहा था जैसे वह पूवम से ही पतािड़त
िकया जाता रहा हो।झोपड़ी मे सामान-असबाब िबखरा पड़ा था।झोपड़ी का दरवाज़ा खुला पड़ा था।
लगभग पैतीस वषम की आयु का भूरा िोती-कुरता पहने,कांिे पर गमछा डाले ,हाथ मे एक झोला िलए हुए शहर से
खरीदारी कर लौि रहा था।जब झोपड़ी के पास आया उसे भीतर से कराहने की आवाज़ सुनाई दी।उसने भीतर झाँक कर
दे खा।झोपड़ी मे अंिेरा था लेिकन चनदका की िकरणे झोपड़ी मे िकसी छे द से आ रही थी।जो सीिे उस वयिि के चेहरे
पर पड़ रही थी। आसपास कोई िदखाई नहीं दे रहा था।उसने सोचा,कयो न भीतर जाकर दे खा जाए िक यह वयिि को्ैन
है ।उसे यह जानने का कौतूहल होने लगा।हालांिक वह जान गया था िक यह सब िरमदास महाजन ने ही िकया होगा
िफर भी उसके भीतर कौतुहल जाग उठा।
उसने झोपड़ी के भीतर पवेश िकया।खमभे से बंिे वयिि के करीब गया।उसे पहचानने की कोिशश करता है ।
उसे अंिेरे मे साफ िदखाई नहीं दे रहा है ।वह बोला-
`` कौन हो भाईषोषो``
वह वयिि अब भी कराह रहा है ।उसमे इतनी शिि नहीं िक वह ठीक तरह से बोल पाये।उसने अपनी गदम न ऊपर उठाने
की कोिशश की िकनतु उसकी कोिशश अिूरी रह गई।भूरा आसमंजसय मे पड़ गया। भूरा ने मािचस की ितली जलाई
और वयिि के चेहरे के पास रोशनी करते हु्ुए साशयम बोला-

`` अरे ......रािेलाल...........तुम........! तुमको यहाँ िकसने बांि रखा है ।और ये कया हाल बना रखा है ।``
वह इतना अशि हो गया िक न तो वह बोल पा रहा है और न ही कुछ पयत कर पा रहा है ।भूरा उसे बनिन से मुि करने
का पयास करने लगता है ।तब ही बाहर से कुछ लोगो की आवाज़े आने लगी। `` हट.....ह.......ह.......!! िफर जूतो के
चरमराने की आवाज़ सुनाई दे ने लगी।भूरा चौक पड़ता। वह अतयनत साविान होकर बाहर िनकला। दरू से दो वयिियो
की परछाई िदखाई दे ती है ।वह इसी ओर झोपड़ी की तरफ आ रहे है ।भूरा पास की झािड़यो मे छुप जाता है । दोनो वयिि
झोपड़ी के पास आते है ।पास आते ही चनदमा की रोशनी मे साफ िदखाई दे ने लगता है ।यह िमदास महाजन और
उसका अंगरकक िकशन है । इन दोनो को दे खकर भूरा चौक जाता है ।उसने अब तक केवल सुनकर रखा था िक
िरमदास कजद
म ारो पर अतयाचार करता है लेिकन उसने आज पहली बार िरमदास का यह रप दे खा।िरमदास के हाथ
मे छड़ी है ।िसर पर साफा बांिे हुए है । िकशन हाथ मे लालिे न िलए हुए है । दोनो झोपड़ी मे पवेश करते है । भूरा तेजी से
झपिकर झोपड़ी के पास आता है ।वह भीतर झाँकने का पयास करता है ।झोपड़ी के पीछे से कुछ खुला िदख जाता है
िकनतु वहाँ बहुत अंिेरा है ।भूरा ने सोचा वह अंिेरा सथान छुपने के िलए ठीक रहे गा।वह सफुितम से उस अंिेरे सथान मे
जा बैठ जाता है । वह भीतर झाँककर दे खता है ।
रािेशयाम िबलकुल असहाय सा हो गया है ।उसके हाथ बंिे होने से वह वयाकुल हो रहा था।िरमदास महाजन
उसके पास जाता है ।आवेश मे आकर एक झननािे िर तमाचा रािेशयाम के चेहरे पर जड़ दे ता है ।वह तेजी से कराह
उठता है ।िरमदास चीख पड़ते है -
`` हां्ँ तो तू पुिलस को हमरी रपि करने गया था दम
ु दबाकर.....``
रािेशयाम अचेतनावसथा मे है । थपपड़ पड़ते ही वह िफर चीख पड़ता है । महाजन उसे बुरी तरह से पीिता है । वह
अचेतनावसथा मे चीखने लगता है ।
`` चीख ! और चीख....हमारा ही नमक खाएगा और हम पर ही भौकेगा दम
ु दबाकर.......खाक् थू..........``
अब तक महाजन का जी नहीं भरा वह उसे लगातार पीिते जाता है ।अशील से अशील गािलयाँ दे ते जाता ।
`` हफते भर मे दम
ु दबाकर कज़ Z और सूद नहीं चुकाया तो कुकीZ कर दँग
ू ा,समझे।``
अतयनत कोिाििन मे िरमदास तेजी से बाहर िनकल जाता है ।िकशन भी तेजी से िरमदास का अनुसरण करने
लगा। भूरा यह सारा दशय दे ख कांप उठा।
`` बाप रे बाप ! महाजन का यह रप मे आज मैने पहली बार दे खा है ।िकतना ज़ािलम आदमी है यह । िबलकुल
बेरहम और कसाई।``
दोनो के जाने के बाद भूरा झोपड़ी मे जाता है ।रािेशयाम अचेत पड़े हुए है ।भूरा उसे उठाता है और कांिे पर
लाद कर अपने साथ ले गया।
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(2)

भूरा सारी रात सो नहीं पाया।वह रात भर रािेशयाम के बारे मे सोचता रहा। यह भी सोचते रहा िक िरमदास
महाजन िकतनी नीचता तक िगर सकता है ।उसने कभी इतना अनदाज़ा नहीं लगाया होगा।अब तक वह गामीणो से
सुनते आ रहा था िकनतु जब गई रात उसने महाजन वदारा रािेशयाम को पतािड़त करते हुए दे खा और रािेशयाम की
िचनताजनक िसथित दे खी तो उसे पकका िवशास हो गया।सुबह वह जलदी उठ बैठा ।उसकी पलके भारी लग रही थी।
आँखे सुखम हो गई थी।वह पीछले दो रातो से सो नहीं पाया था।शहर मे उसे नींद नहीं आई थी।दस
ू रे वह शहर जाकर
िनराश भी हो गया था।उसे अब उममीद नहीं रही।उसने सोचा अब जो कुछ भी िकया जाय वह गाँव मे ही रहकर िकया
जाना उिचत होगा।
कमली,भूरा की पती।पचचीस बरस के आसपास की उम होगी।यो भी भूरा अभी पैतीस से जयादे का नहीं है ।
दोनो की उम मे दस-बारह बरस का अनतर हो सकता है ।वैसे भी गाँवो मे बहुत कम ही लोग जनम पती बनवाते है ।जो
बनवाते उनकी बात और है ।आज भी कई गाँवो मे िनिन
म तबके के लोगो को जनमपती बनवाने की लगी नहीं रहती।
उनकी पहली माँग रोिी-कपड़ा-मकान की होती है ।इसीिलए भूरा के माता-िपता या कमली के माता-िपता ने जनमपती
नहीं बनवाई। जब उसे बयाह कर भूरा ने लाया था तब पसनन वदना और भरी-पूरी लगती थी।माँ-बाप की लाड़ली बेिी
थी सो अलग।बड़ी-बड़ी आँखे और सांवला सा रं ग।कमली के केश कमर से नीचे तक लमबे रहा करते थे।सहे िलयो मे
सबसे जयादा लमबे और घने केश कमली के ही हुआ करते थे।िववाह के समय उसकी आयु उननीस-बीस के आसपास
रही होगी।पचचीस-छबबीस की आयु तक होते-होते उसके केश कमर तक ही होकर रह गए।
पकृ ित अपना काम करती है और समय अपना काम करता है ।
भूरा भी पढ़ा-िलखा नहीं था और न ही कमली पढ़ी-िलखी है ।दोनो ही िबलकुल अपढ़ ।सकूल का मुख भी नहीं
दे खा होगा दोनो ने। हाँ,बचचो को सकूल जाते जरर दे खा है िकनतु उनहोने सकूल जाने की कभी िजद भी नहीं की होगी।
सुबह-सुबह वह बैलो को चारा-पानी दे ने मे लग गया।अभी िमनदर के िशखर पर सूरज की पथम िकरणे भी
नहीं पड़ी थी।सानी बनाकर उसने बैलो के सामने चारा रख िदया और गोठान साफ करने लगा।दो बैलो का गोबर
गोठान मे भरा पड़ा था।दो िदनो से गोठान मे झाडू -बुहार भी नहीं हुई थी।कमली ने अवशय ही बैलो को चारा-पानी दे
िदया था।इसिलए अब बैल भी आशा भरी नज़रो से भूरा की और दे खने लग गए िक शायद उनहे गोठान से खोल िदया
जाएगा और आंगन मे खड़ा कर िदया जाएगा। एक बैल ने तो ज़ोरो से गदम न िहलाई और हाक मारी ` माँ........`` भूरा
समझ गया िक उसे कया चािहए।भूरा ने दोनो बैलो को खूँिे से खोल आंगन मे खूले मे बांि िदया।बैल ने पसननता मे
गदमन िहला दी।भूरा बकबकाया-
`` हो गए खुश.....!``
वैसे तो कमली ,भूरा के पहले िबसतर से उठ जाती है लेिकन भूरा रात भर सो नहीं पाने के कारण पहले ही उठ बैठा था।
वह रोज़ की तरह सनानिद से िनवत
ृ हो भोर मे ही शीकृ षण की तसवीर के सामने नतमसतक होकर पणाम करती।
तुलसी की दीया-बाती करती।उसके बाद ही घर के कामकाज पारं भ करती।सुहाग का िचनह तो कभी लगता है तो कभी
नहीं।सुबह उठते ही रोज़ी-रोिी की पड़ी रहती। इतना होते हुए भी उसे अपने इकलौते बेिे हिर की िचनता लगी रहती है
िक कम से कम वह इतना तो पढ़-िलख ही ले िक िचटठी-पती िलख-बांच सके।बोली-
`` हिर के बापू!अबकी बरस हिर को सकूल मे दािखला करवाना है ।इता बड़ा हो गया है ।सब बचचे सकूल जाने
लगे है ।``
`` मै तो रहा अपनढ़.....गंवार।कम से कम हिर दो-चार दजाम पढ़ ले तो उसका भिवषय अचछा हो सकता है ।``
`` यही तो मै कह रही हूँ,हिर के बापू।``
`` ठीक है ।मै कल ही हिर को मासिरजी के पास दािखला करवाने ले जाऊँगा।अभी तो सकूल चालू ही नहीं हुआ
है ।``
``ऐसा न हो िक कहते ही रह जाओ और हिर का दािखला हो ही नहीं पाये।``
`` नाही!नाही!!ऐसा नहीं.....कल तो जरर जाना होगा।अचछा ला,लाठी गमछा और पानी की छागल।दोपहर
को जलदी आना है ।``
``आज जाइयो भी ना तो काम नहीं चलेगा कयाषोषो``
`` हिर अब तक सो रहा है कयाषोषोिूप ऊपर िनकल आई है ।उठे तो उसे ज़रा मासिरजी के पास भेज दीिजए।
जाते-जाते मासिर जी से कह ही दँ ू तो सुभ हो।``
`` अचछा लेिकन तुम जलदी घर आइयो।``
`` कयोषोषोकोई खास बात है कयाषोषो``
``नहीं,बस यूँ ही कह रही थी।``
`` अचछा आ जाऊँगा।``
सुबह-सबेरे ही भूरा खेतो मे काम करने जाने के िलए तैयार हो गया।अभी हिर िबसतर मे ही मुँह ठाँपे सो रहा है ।वह
अकसर दे र तक सोते रहता है ।कमली भी सोचती ,हिर का कया काम है ।अभी तो वह पाँच बरस का ही तो है ।उठाकर
करना भी कया है ।सोने दो उसे।िफर न जाने कया सोचकर उसने आवाज़ लगाई-
``हिर, िबिवा चल उठ।िूप िसर चढ़ आई है ।उठ हाथ-मुँह िो ले।कल तुझे मासिरजी के पास पढ़ने के िलए
सकूल जाना है । चल उठ तो हिर बेिे..``
वह एक लमबी जमभाई लेता है ।जैसे िक हर बचचे करते है ।हाथ-पैर तान दे ते है ।अंगड़ाई लेते है । आँखे मलते है ।बस यही
सब कुछ हिर भी करता है ।कोई-कोई बचचे तो रोते हुए उठते है ।अििक लाड़ िदखाओगे तो बचचे लिड़याने लग जाते है ।
हिर के साथ भी ऐसी ही िसथित है ।उसे भी लिड़याने की आदत सी हो गई है ।
`` नहीं , मै सकूल नहीं जाऊँगा।``
``सकूल नहीं जाएगा तो करे गा कयाषोषो``
`` कुछ नहीं करँगा।``
``तेरे बापू जैसे गंवार रहे गा तू....चल मुँह-हाथ िो ले।दि
ू पी ले।``
बचचो के खेलते कूदने के िदन होते है ।जब तक वे बड़े नहीं हो जाते या जब तक उन पर कोई िजममेदारी नहीं आती तब
तक वे छोिे ही बने रहते है ।लेिकन िजस िदन वे बड़े हो जाते है ,उन पर िजममेदारी आ जाती है ।वे उसी िदन सब कुछ
सवयं ही करने लग जाते है ।हिर करते भी कया षोषो
`` अममा दि
ू दे दो।``
`` चल पहले उठकर मुँह-हाथ िो ले िफर पीछे दि
ू पी लेना।``
`` नहीं, ऐसे ही दे दो।``
`` चल लिड़याते नहीं्ं।अचछे बचचे ऐसे नहीं करते।``
`` तो िफर कैसे करते है षोषो``
`` अचछे बचचे अचछा-अचछा काम करते है ।``
`` जैसे षोषो``
`` बेिे पहले तुम उठ लो।मुह
ँ -हाथ िो लो।पीछे बताऊँगी।``
`` अचछा माँ! मै पहले मुँह-हाथ िो लेता हूँ िफर पीछे बताना जरर।``
``अचछा बेिे।``
.हिर खुश हो गए।िबसतर से उठे और झि से मुँह-हाथ िो आए ।बोले-
`` अममा दि
ू !``
ू के साथ पकवान दे खकर हिर के मुख मे पानी हो गया।आज उनके ठाि हो गए ।्ी्ार पेि पकवान खाया ।दि
.दि ू
पीया और भाग गए बाहर खेलने के िलए।
7
(3)

अकसर गाँवो्े के चौपालो और नुककड़ पर कुछ न कुछ युवक शरारते करने से बाज़ नहीं आते। वे आनेजाने
वाली युवितयो और अनय लोगो पर िफतरे कसते पाए जाते है । वे उतने बुरे नहीं होते िकनतु उनकी आयु उनहे
उचछ ª्ंखल करने के िलए िववश कर दे ती है ।इसे या तो आयु का पभाव कहा जा सकता है या उनका यौवनता का
जोश।इिर कुछ िदनो से गाँव मे मनचले युवको ने िकशोिरयो और युवितयो को अपने आननद का िनशाना बनाया है ।वे
आनेजानेवाल िकशोिरयो और युवितयो के साथ छे ड़छाड़ करने से बाज नहीं आते।अब उसी िदन दे ख िलिजए चंचल-
चुलबुल,युवावसथा से सराबोर नवयौवना गुलाबो इतराती-कूदती-गुनगुनाती हुई पानी का कलश िलए कुएं पर पानी
भरने जा रही थी-`` तोरी नज़रवा के लाने पयार िमतवा``गाँव के चौिरी कमलिसंह का पुत नीलिमंसंह अपने तीनो
िमतो के साथ उिर से उिम-मसती करते हुए जा रहा था िक उसने गुलाबो को मचलते हुए दे ख िलया।उसका मन
गुलाबो को दे ख शरारत करने को हुआ तो उसने ज़ोरो से गुलाबो को आवाज़ लगाई-
`` गुलाबो कहाँ जा रही है षोषो
वह तो रही मुँहफि आँखे ततेरते कुलहे ्े मिकाते और अपनी लमबी चोिी को झिका दे ते हुए बोल पड़ी-
``आँखे नहीं है कयाषोषो``
``आँखे तो है लेिकन मै तो यह पूछ रहा था िक मै भी चलूँ तेरे साथषोषो``
नीलमिसंह जब गुलाबो को छे ड़ रहे थे उस समय कुछ मिहलाएं कुएं के जगत पर पानी भर रही थी। वे दे ख
िखलिखलाकर हं सती है ।यो नीलमिसंह अकसर गुलाबो को छे ड़ते रहते है लेिकन आज उनका कुछ अलग ही अनदाज़
था।इसिलए मिहलाओं को अचछा भी लग रहा था। नीमलिसंह को गुलाबो अचछी तरह से जानती है । बोली-
``तू कयो चलेगा मेरे साथ।लोग कया कहे गे िक चौिरी का लड़का......!
.नीलमिसंह का िमत गोपाल जो अब तक अवसर की ताक मे था,बीच मे ही बोल पड़ा-
`` तो मै चलूँ तेरे साथषोषो``
``सुन रे गोपाल!ज़रा इिर तो आ।``
गोपाल को मैदान मे उतरते दे ख नीलमिसंह अपने जेब से जाबी का गुचछा िनकालकर अंगुिलयो मे नचाने लगे।अब
दे खो कया होता है गोपाल के साथ,यह जानने के िलए नीलमिसंह बार-बार उचक-उचक कर गोपाल को चीकुिी कािते
जाते।यािन िक गोपाल को उतसािहत करते जाते । गुलाबो मचल उठी ।बड़ा बुरा सा मुँह बना अपना हाथ उठाकर चाँिे
जैसा बनाती है ।बोली-
`` यह मेरा हाथ दे ख रहा है ।ये कैसा िदखता है षोषो``
`` अरे वाह गुलाबो तेरा हाथ से बहुत ही सुनदर और नाजुक है ।वाह कया गोरा-गोरा हाथ और ये तेरी
कलाइयॉ।ंतेरी बांहे तो इससे भी जयादा गोरी होगी न गुलाबो।कोमल-कोमल,नाजुक-नाजुक मजा आ जाएगा। ला ज़रा
दे खूँ तो छूकर तेरा हाथ।कयो नीलमषोषो``
.वह आगे बढ़कर गुलाबो के हाथ को अपने हाथ मे लेकर सहलाने लगता है ।गुलाबो को भी मज़ाक सूझती ।बोली-
`` ओ.....एं.......पड़े गा ना तो तेरी अममा याद आ जाएगी।तबीयत भी मसत हो जाएगी।ये बहुत झननािे दार
भी है समझे कया।ससाला।घर जा अपनी अममा का हाथ पकड़।``
शरारत मे गोपाल का िगरे बान पकड़ती है और ज़ोरो से िकका दे दे ती है ।वह िगर पड़ता है ।नीलमिसंह ज़ोरो से हं सता है ।
गोपाल िखिसया जाता है ।
``दे ख गुलाबो अपनी सुनदरता पर इतना घमणड अचछा नहीं।कहे दे ता हूँ ,नहीं तो पछताएगी।``
``अबे जा जा.....तेरे जैसे मजनूँ बहुत दे खे है ।चला हाथ पकड़ने।मदम होता तो हाथ ही नहीं
छोड़ता.......हूँ........``
और गुलाबो चोिी िहलाते कमर मिकाते कुलहे िहलाते उछलती-कूदती हुई चल दी।नीलमिसंह अब भी हं से जा रहे है ।
गोपाल को ज़मीन से उठाते हुए कहते-
`` गुलाबो है तो बड़ी किारीदार।``
`` बचचू लेिकन गुलाबो हाथ आनेवाली नहीं है ।``
`` यही तो रोना है ।वनाम न जाने इस कलेजे मे कब से आग लगी है ।गुलाबो को अपना बनाने की।``
``यही दिुनया-ए-उलफत मे हुआ करता है होने दो
उनहे हं सना मुबारक हो,कोई रोता है तो रोने दो।``
`` हम कयो रोये।रोये हमारे दशुमन।गुलाबो की चोली अब की होली मे नहीं िभगोई तो मेरा नाम भी
नीलमिसंह नहीं...चलो....``
होली को अभी दो ही िदन शेष थे।इसिलए नीलमिसंह ने सोच िलया िक वह,वही करे गा जो उसे अचछा लगता
है ।इसके िलए चाहे उसे कोई भी कीमत चुकानी पड़े ।वे गाँव के बड़े आदमी के बेिे है ।बड़े बुजुगम कहा करते है ,बड़ो के
िलए कुछ भी करना किठन नही्े होता।किठन होता है तो उनहे जो बड़े लोगो की कतार मे शुमार नहीं है ।
0
िुलेणडी के िदन सुबह से ही गाँव के चौराहो पर हुिलयारो की िोली जमा हो गई।ढोलक,ढफली,ताशे और
नकारे बजाते हुए युवक और वयोवद
ृ गाते-बाजते नाचने लगे।होली के अवसर पर गाँवो मे जो सामािजक एकता और
भाई-चारा िदखाई दे ता है ,वह अनयत नहीं िदखाई दे ता।गाँव-समाज के लोग िबना िकसी तरह के ज़ाित-िबरादरी का
खयाल रखे िबना आपस मे गले िमलते है ।एक दस
ू रे को गुलाब-अबीर और रं ग लगाकर अपनी खुशी का इज़हार करते
है ।होली ही एक ऐसा पवम है िजसमे अपने सभी िगली-िशकवे भुलाकर नये िसरे से िरशतो को मजबूत बनाने की कोिशश
की जाती है ।पूरे साल भर की रं िजश इस तयौहार पर ज़रा सा अबीर-गुलाल और रं ग लगाकर समाप हो जाती है ।
पे््रम मे भी ऐसा ही होता है ।पे््रमी-पे््रिमकाएं एक दस
ू रे को अपना पे््रम पदिशत
म करने के िलए इससे
अचछा कोई अवसर नहीं पाती।उनके िलए अपने िपयतम को मनाने का इससे अचछा अवसर नहीं होता।होली आते ही
पे््रिमयो के हदय मे बसंत की बयार और सुगनि ,पे््रम का संदेश ले आती है ।हदय मे पे््रमांकुर फूिने लगते है ।
िपय िमलन के िलए हदय वयाकुल हुआ जाता है ।नीलमिसंह की िसथित भी तकरीकन यही हो रही थी।उनके हदय मे
गुलाबो के पित अपार पे््रम का जवार उमड़-घुमड़ कर रहा था।वे चाहते थे िक िजस िकसी तरह गुलाबो को अपना
पे््रम पदिशत
म कर दे ।उनहोने गुलाबो को होली के रं ग मे िभगोने का पूरा मन बना िलया ।उनहोने अपनी िमत मणडली
को पहले की तैयार कर रखा ।जैसे ही गुलाबो िदखाई दे सब लोग िमलकर उसे घेर ले और उसे रं ग-अबीर-गुलास से
सरोबर कर दे ।नीलमिसंह ने संकलप कर िलया था िक वे गुलाबो की चोली होली के रं ग से िभगोकर ही चैन की सांस
लेगे।
हुिलयारो की िोली नाचते-गाते रं ग-गुलाल का आननद लेते घर-घर जा रहे थे।उिर से गुलाबो अपनी
सहे िलयो के साथ रं ग-गुलाल खेलते हुए आ पहुँची।गोपाल,हिरिसंह,नीलमिसंह और अनय युवको ने गुलाबो को घेर
िलया।ज़ोर-ज़ोर से ढोलक,डफली,ताशे,नकारे बजाये जाने लगे।युवको ने ज़ोर-शोर से नाच-नाच और हुड़दं ग करना
पारं भ कर िदया।नीलमिसंह को अचछा अवसर िमल गया।जयोही गुलाबो की िोली और नीलमिसंह की िोली मे रं ग
बरसने लगा।नीलमिसंह ने गुलाबो को सर-से-पांव तक रं ग िदया।गुलाबो ने भी नीलमिसंह को रं ग-गुलाल से रं ग िदया।
आशयम! गुलाबो भी संभवत: इसी अवसर का इनतज़ार कर रही होगी।इसिलए तो उसने नीलमिसंह को पूरा अवसर
िदया उसे रं गने के िलए।वह भी गाते-बजाते नीमिलंसह की बांहो मे झूल गई।बड़े ज़ोर-शोर से आननद-उललास के साथ
बाजे बजते रहे और नीलमिसंह-गुलाबो झूम के नाचते रहे ।
होली का यह समारोह सारे गाँव मे चचाम का िवषय बन गय।बहुत िदनो तक इस िुलेणडी का रं ग नीलमिसंह
और गुलाबो के हदयाकाश पर छाये रहा।
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िकसानो की शिि उनकी मेहनत होती है ।जब मेहनत रं ग लाती है तो वह भीतर से उतसािहत और पसनन हो
जाता है । उसके मेहनत का सुखद पिरणाम उसकी फसले होती है । िजसे वह मिहनो तक मेहनत करके तैयार करता है ।
जब वह अचछी तरह से तैयार हो जाती है और खेतो मे लहराने लगती है तब िकसान का सीना फूल जाता है ।उसे अपनी
मेहनत पर गवम होने लगता है ।उसकी आंखो मे चमक आ जाती है ।घर-आंगन मे खुिशयॉं छा जाती है ।उसका उतसाही
मन झूमने लगता है । उसका मन मयूर इस उतसाह मे नतृय करने लग जाता है ।भूरा भी िदन-रात खेतो मे मेहनत
करता है ।फसल अचछी होगी तो साहूकार का कजम चुक जाएगा।घर मे िन-िानय से पूणम लकमी आएगी । उसकी और
पिरवार की सभी मनोवांिछत आकांकाएं पूरी जो जाएगी। वह और उसका पिरवार पूरे साल पर तक इस अवसर तक
पतीका करते रहता है ।हर िकसान की यही िसथित है ।वह फसल आने का बेसबी से पतीका करने लगता है ।यह तो है
उसके मेहनत का नतीजा जहां उसे पुरसकून िमलता है ।
उस िदन सनधया के समय वह बहुत ही अििक पसनन और उतसािहत हो रहा था।खेत से लौिते समय उसने
चारे का गटठा िसर पर रख िलया और बैलो को हांकते हुए घर की ओर रवाना हो गया।सारा जग सनधया के समय
अपने घरो की ओर लौिता है ।पशु-पकी,िकसान,वयापारी,मजदरू और सभी ।िमनदरो मे घिड़याल बजने लगते है ।
िमनदरो के िशखर पर पकी ठीक उसी तरह कलरव करते है ,िजस तरह वे सूयोदय के समय िकया करते।आरती और
भजन-कीतन
म का समय हो रहा होता है । कुल िमलाकर गाँव मे सनधया का समय लकमी के गह
ृ पवेश का होता है ।
मिहलाएं सनधया के समय घर की चौकि पर,तुलसी के िबरवे के पास और अिे री पर दीपक रखकर लकमी जी के
सवागत की तैयारी करने लग जाती है ।कहते है सनधया के समय भगवान िवषणु,लकमी सिहत गह
ृ ो मे पवेश के िलए
आकर दरवाज़े पर खड़े हो जाते है ।जहाँ उनके सवागत के िलए दीपक जलाए जाते है वहाँ वे पवेश करते है ।
रात का भोजन करने के बाद भूरा पूरे िवशास के साथ कमली को बताने लगा -
``अब की बरस मािलक ने चाहा तो फसल अचछी होगी िफर मकान पकका बनवा लेगे।नये मकान मे ही रहने जाएंगे।
हिर को भी पढ़ने िलखने के िलए अचछा हो जाएगा। वह पढ़-िलख लेगा तो कम से कम बुढ़ापे का आसरा हो जाएगा।``
`` बाबा!मै िनतय सकूल जाया करँगा।खूब पढू ँ गा।``
`` हाँ मेरे बचचे! अचछा, ढोलक तो उठा ले हिर आज गाने-बजाने को मन कर रहा है ।``
`` मै भी ढोलक बजाऊँगा।``
``अचछा ! ठीक है ।चल उठ...!
कमली के मुख पर पसननता छा गई। उसने ढोलक लाकर हिर के हाथो थाम दी।दोनो िपता-पुत ढोलक पर थाप मारते
हुए भाग खड़े हुए।
बाहर आंगन मे ही नीम के पेड़ के नीचे कमली ने चबूतरा बनाया है । अकसर इस चबूतरे पर भूरा अपने िमतो
और पास-पड़ौिसयो के साथ गाने-बजाने की मणडली लगाता है ।गाने-बजाने का दौर पारं भ हो जाता।आज भी यही
हुआ।जयो ही वे दोनो िपता-पुत चबूतरे पर बैठे। ढोलक पर ज़ोरो से थाप दे ने लगे। िीरे -िीरे करते िमत मणडली एकत
होते गई और गीत-संगीत का समां्ं्ं बंि गया। भूरा गाने लगा-
तोरी नज़िरया के लाने है पयार िमतवा
मोरे सांविरया के लाने है िसंगार िमतवा........................
मोरी सौतन के लाने ना बीड़ा पान का लगाय हो
मोरी सौतन के लाने ना सेज फूलवा की सजाय हो
जवानी कमसीन तुझपे िनसार िमतवा....
तोरी नज़िरया के लाने है पयार िमतवा............
रं ग रजवा से चुनरी पयार की रं गाई दी जौ
दौना िमठाई का हलवाई से मंगाई दी जौ
बीच बजिरया बैठ के िखलाय िमतवा
तोरी सांविरया के लाने है पयार िमतवा..............
परदे श जे हौ तो मो को भूल ना जै हो
सोतिनया के आंचल मे गुम ना जै हो
िजनदगी तमाम करँगी इनतज़ार िमतवा
तोरी नज़िरया के लाने है पयार िमतवा............
.भूरा ने अबकी बार सबका मन मोह िलया। हिरिसंह बोले-
`` लगे है अबकी बार तुम नया नया गाना बनावै है ।``
`` ना ही जी््! ई जो गाना है ऊ हमरी लुगाइवा का मन की बात है बबुआ।``
`` ओ......सो तो कहे है िक िकतना मिुर गीत गावै है तुमषोषो``
.सुनकर भूरा खुसी से फूला नहीं समाए।सोते -सोते तक भूरा गाने की पंिियॉं गुनगुनाते रहे ्ै।हिर के समझ मे नहीं
आया रहा िक यह सब िमतवा और सौतिनया कया होते है ।उसे तो बस अचछा लग रहा है यह गाना।िबसतर मे सोते
समय उसने कमली के कान के पास िीरे से गाया-
``दौना िमठाई का हलवाई से मंगाई दी जौ
..............................................................................
परदे श जे हौ तो मो को भूल ना जै हो.....
``
कमली को लगा हिर की समझ इतनी नहीं है िक वह गाने के बोल समझ ले।बोली-
`` िबिवा चुपचाप सो जा।रात बहुत हो गई है ।तुझे सुबह सकूल भी जाना है न!``
हिर िीरे -िीरे गाना गुनगुनाते हुए जाने कब नींद की गोद मे सो गया।
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कोई नहीं जानता कब कया होनेवाला है षोषोइनसान की िनयती िकस समय कया कर बैठषोषोसारे िदन खेतो मे काम
करने के बाद मानिसक शिि को पोतसािहत करने के िलए भूरा दे र रात तक िमतो के साथ बैठकर गाता-बजाता रहा।
तब कहीं जाकर वह चैन की नींद लेने के िलए िनदादे वी की गोद मे िनिशनत होकर सो गया।
सारे गाँव मे सबसे अचछी और तनदरसत बैलो की जोड़ी केवल भूरा के ही पास है ।भूरा के बैलो को दे ख दरू-दरू
के गाँव के लोगो मे चचाम हुआ करती ।दोनो बैल सफेद रं ग के,बिलष,सुडौल और ताकतवर थे।भूरा उनहे सपाह मे दो-
तीन बार नदी मे अपनो हाथो से रगड़-रगड़ कर िनहलाता था।खूब सफेद झक् ।बड़े -बड़े िसंग और काली-काली बड़ी-बड़ी
आँखे।इतने सीिे और समझदार िक कोई भी बचचा या सी उनहे सहलाती,पुचकारती ,हांकती िफर भी वे िकसी को
मारते नहीं थे।गाड़ी मे िकतना भी लाद दो वे कभी हांफते नहीं थे।दौड़ मे तो वे सारे गाँव मे अववल थे।
पोले के अवसर पर गाड़ी दौड़ मे भूरा के बैल जीत जाया करते।भूरा जब उनहे सजा-संवार कर िनकलता था
जो िकसी की भी नज़रे बैलो को लग जाया करती ।वह उनके िसंगो मे पीतल की पािलश करवात था।पैरो मे घुघ
ँ र,पीठ
पर बहुत ही सुनदर चादर,गले मे छोिे -छोिे घुघ
ँ रओं की माला,िसर पर मयूर पंख और माथे पर काला िीका लगाना
कभी नहीं भूलती थी कमली।कमली को दे खते ही बैल `` माँ `` की आवाज़ के साथ रं भाते थे।जैसे कमली उनकी माँ ही
हो। पोले के िदन जब बैल सजिज कर िनकलते थे,भूरा ढफलेवाले को बुलवा िलया करता था।बैल ढफले की ताल पर
नाचा करते थे।लोग बैलो का नाच दे खते रह जाते थे।बैल भी बाजते हुए बाजे को दे खकर पसनन हो जाते थे।बाजा
दे खते ही बैल मचल पड़ते और उछलने लगते।भूरा समझ जाता िक बैलो का नाचने का मूढ है ।वह भी बैलो के साथ
नाचा करता।बैल ,भूरा के आगे-पीछे इतराते हुए नाचने लग जाते।गाँव वालो को बहुत कौतुहल होता िक बैल ,भूरा के
इशारे को समझते है और भूरा,बैल के इशारे को समझते है ।
कहा जाता है िक बैल,िकसानो के िलए बेिो के समान होते है ।उठते-बैठते हर कहीं बैल िकसान उनको साथ दे ते है ।
हमेशा साथ-साथ रहने पर बैलो का भूरा के पित पे््रम भी बहुत हो गया था। रात को खेत से लौिते समय एक बार
भूरा का सामना जंगली चीते से हो गया िकनतु दोनो बैलो ने फूफकारते हुए इतनी सफूितम िदखाई िक चीते को भी
भागना पड़ा।ऐसे कई हादसे हुए िजससे बैलो ने भूरा और उसके पिरवार को बचा िलया ।
पीछली बारसात मे नदी मे बहुत बाढ़ आ गई थी,भूरा नदी मे बहुत दरू तक बह गया था।बैलो ने बाढ़ मे उतर
कर भूरा को नदी मे से बाहर िनकाल िलया था।तब से भूरा ,बैलो को और अििक पे््रम करने लग गया। बैल गाँव के
लोगो को पहचानने लग गए थे।इसिलए वे िकसी को भी नहीं मारते थे। इसी का फायदा उठाकर कुछ असामािजक
लोगो ने बैलो को चुराने की कोिशश की।
गाने-बजाने के बाद लोग-बाग अपने-अपने घरो की ओर चल िदए थे लेिकन दो वयिि अब भी िजस िकसी
तरह से भूरा के मकान के आसपास मंडरा रहे थे।भूरा या िकसी ने भी उन पर धयान नहीं िदया । िकसी को भी अनहोनी
का अनदाज़ा नहीं था।
आिी रात से जयादा का समय हो चुका होगा। सारा गाँव सो रहा था। उसी समय दो वयिि भूरा के आंगन मे
पवेश कर गए।हालांिक बैल उन दोनो वयिियो को पहचानते थे ।जब वे बैलो के पास पहुँचे।उनहे पुचकारा।बैलो ने कोई
पितकार नहीं िकया।वे दोनो वयिि भूरा के मोहलले के थे।इसिलए बैलो को अजनबीपन नहीं लगा।उन दोनो वयिियो
ने एक बैल को खूँिो से छोड़ा और उसे आिहसता से आँगन के बाहर िनकाल ले गए।बैल उनके पीछे -पीछे चल िदया।
दस
ू रा बैल अपने साथी को बाहर जाते दे खता रह गया।संभवत:उसने सोचा होगा,ये जो लोग उसके साथी को ले जा रहे
है उसके पहचान के ही है लेिकन वह मूक पाणी कया जातना था िक इनसान उसे िोखा दे रहा था।
यह सविमविदन है िक इनसान की अपेका पशु अििक समझदार ,िवशसनीय,ईमानदार और उदार होता है ।यही
कारण है िक दस
ू रे बैल ने पितकार नहीं िकया और इनसान ने उसे िोखा दे िदया।उसके दस
ू रे साथी को वह ले गया। वह
दे खता रह गया।पशुओं के हदय मे भी मूक िवचार उठते रहते है ।वे जान-पहचान के लोगो पर िवशास कर लेते है ।इस
समय दस
ू रे बैल ने भी इनसान पर िवशास कर िलया।शायद यह जानकर िक वह इनसान उसकी पहचान का है कया कर
लेगा वह उसका और उसके साथी काषोषोिकनतु वह यह नहीं जानता था िक उसने उस इनसान पर गलत िवशास िकया
है ।
जब बैल ने दे खा िक बहुत दे र तक भी उसका दस
ू रा साथी लौिकर नहीं आया तो वह गदम न उठाकर उसे चारो
तरफ दे खने लगा।उसने अपने कान खड़े कर िदए तािक कहीं उसका साथी हो तो उसे आवाज़ सुनाई दे गी और वह उसे
रं भाकर आवाज़ दे गा िक वह जहॉं कहीं भी हो चले आए िफर यह सोचकर िक उसका दस
ू रा साथी अभी लौिकर आएगा।
वह अपने साथी की पतीका करते रहा।सुबह तक बैल का दस
ू रा साथी लौिकर नहीं आया।वह बेचैन हो उठा।वह खूं्ंिे
पर बंिा था।इिर से उिर करता रहा।वह िववश था ।वह बार-बार रं भा रहा था।
पशु भी मनुषय के समान संवेदनशील होता है ।अनतर इतना होता है िक वह ज़बान से अपनी संवेदना बयान
नहीं कर सकता।वह अपनी भावनाओं का समपेषण मूक होकर भी करता है ।वे दस
ू रो की भावनाओ ्ंको िबना शबदो के
अनुभव कर लेते है ।समझ लेते है ।उनकी अपनी भाषा होती है ।िजसे वे ही समझ सकते है ।पशु-पिकयो की भाषा
िवजानवाले जानी यह सब जानते है ।इितहास मे ऐसे कई उदाहरण दे खने-पढ़ने और सुनने को िमल जाएंगे।बैल की
बेचैन बढ़ते जा रही थी।
पात: होनेवाली थी।खँ्ूिे पर बंिा बैल कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह रं भाया।दो-चार बार रं भाया।शायद
इसिलए िक वह भूरा को अपने साथी के चले जाने की खबर दे ना चाहता है ।जब बार-बार बैल रं भाने लगा तो भूरा की
नींद िू िी।कमली भी जाग उठी।बोली-
``सुनो जी!दे खो तो बैल कयो रं भा रहा है ।बहुत दे र से रं भा रहा है ।पता नहीं कयोषोषो``
``हो सकता है उसे भूख-पयास लगी हो इसिलए रं भा रहा है ।``
`` ज़रा बाहर जाकर तो दे खो।``
भूरा और कमली उठकर बाहर िनकलते है ।दोनो को बाहर आया दे ख बैल एक बार िफर ज़ोरो से रं भाया। भूरा को
समझते दे र न लगी।बोला-
`` अरे एक बैल !शायद खूँिे से छूि गया है ।यहीं कहीं आसपास होगा।``
`` यही्े कहीं आसपास होगा।``
`` मै दे खता हूँ।``
उसने आसपास बैल को ढू ँ ढा लेिकन आसपास कहीं भी बैल िदखाई नहीं िदया।वह लौि कर आया।बोला-
`` कहीं ऐसा तो नहीं िक बैल खुल कर खेत की ओर चला गया हो।``
`` हो सकता है ।खेत मे जाकर दे खना होगा।``
.उसी समय भूरा खेतो की ओर चल िदया।बैल खेतो मे भी कहीं िदखाई नहीं िदया।वह लौि आया।आंगन मे बंिे बैल की
आँखो से आँसू बहने लगे।वह बार-बार रं भाने लगा।शायद यह बताने के िलए िक उसके साथी को मोहलले के दो लोग
खोल कर ले गए।लेिकन वह मूक पाणी बोल नहीं सकता।वह तो केवल अपनी संवेदना समपे््रिषत कर सकता है ।वह
इज़हार कर सकता है िक उसके साथी को कोई ले गया िकनतु वह न तो नाम जानता है न पता जानता है ।केवल उसकी
आँखे उन दोनो वयिियो को पहचानती है ।वे दोनो उसके सामने आ जाए तो वह बता सकता है िक ये ही दोनो लोग
उसके साथी को खोल कर ले गए।
ख््े्ात मे भी बैल नहीं है । थोड़ी ही दे र मे गाँव भर मे खबर फैल गई िक भूरा का एक बैल कोई खोलकर ले
गया है ।िजन दो लोगो ने इस काम को अंजाम िदया।वे भी इस भीड़ मे शािमल हो गए। खूँिे से बंिा बैल उन दोनो
लोगो्े को पहचान गया। वह बार-बार उनकी ओर दे ख-दे ख कर रं भाता रहा िकनतु कोई भी इनसान बैलो की भाषा नहीं
जानता। भूरा भी नहीं।इसिलए सामने खड़े उन दोनो को भूरा पहचान नहीं पाया।बैल रं भाते रहा और रोते रहा।
िजस तरह िकसी का जवान बेिा खो जाता है और वयिि अपने बेिे के ग़म मे तड़पता है । ठीक उसी तरह भूरा भी अपने
बैल खो जाने के कारण तड़प उठा।
जहाँ-जहाँ उसे लगता था वहाँ-वहाँ वह गया िकनतु बैल का कहीं पता नहीं चला।
.िदन,सपाह और मिहना वयतीत हो गया । अनतत:वह थक-हार कर चुप हो गया। रात-रात भर वह बैल की पीड़ा मे
जागता रहा। कमली की भी यही िसथित हो गई।पित को इस तरह िचिनतत दे ख वह भी वयाकुल हो जाया करती-
``कयो जी!नींद नहीं आ रही है कयाषोषो``
``नींद कैसे आएगीषोषोजैसे बुढ़ापे मे बेिा बुढ़ापे का सहारा होता है वैसे ही बैल िकसान का सहारा होता
है ...........और.......खासतौर पर.............एक छोिे से िकसान के वासते..............``
``िबना जोड़ी के खेती का काम कैसे होगाषोषो``
``यही िचनता भीतर ही भीतर खाये जा रही है ।एक ही बैल रह गया है ,कया काम होगाषोषोखिलहानी से लेकर
सारा काम तो बैल ही करते है न......!``
`` कुछ तो करना होगा।``
`` यही सोच रहा हूं्ं्ं िक कया करना होगा।समझ मे नहीं आ रहा है ।इस परदे श मे अपना कोई भी तो नहीं
है ।
``बस,एक ही रासता है ।``
`` कयाषोषो``
`` िरमदास महाजन! अचछा आदमी नहीं है ।ईमान का कंजूस है ।उससे कया उममीद की जा सकती है षोषो``
``एक बार कोिशश करके दे ख लेते।एक बैल और आ जाएगा।जोड़ी हो जाएगी।``
``मुझे महाजन से कोई उममीद नज़र नहीं आती।``
``कोिशश करने मे कया हज़ Z है षोषो``
`` तू कहती है तो कोिशश करके दे ख लेता हूं्ं।वैसे मेरा मन ``हॉं`` नहीं कह रहा है ।``
करवि बदलते रहने के बाद वह िफर बोला-
`` चल सो जा.........कल चला जाऊँगा।``
.लेिकन भूरा की आँखो मे नींद कहाँ षोषो सारी रात वह महाजन के बारे मे सोचते रहा।बहुत ही बेहूदा आदमी है
महाजन,िकसी पर रहम तो उसे आता ही नहीं और यिद वह मान भी गया तो इनसान को उलझा कर रख दे ता है ।उससे
िकसी तरह का ऋण लेने का तातपयम है िक `` आ बैल मुझे बार...!`` यही बात सोचकर भूरा िसहर उठता है ।रािेशयाम
जी की कया बूरी हालत बना दी थी महाजन ने षोषो इसे वह अपनी आँखो से दे ख चुका है ।इसिलए भी वह यह सोच कर
िसहर उठता है ।सारी रात वह करविे बदलता रहा। भोर होने लगी । पिकयो के चहचहाने की आवाज़ सुन कमली
उठ बैठी।
`` उठो जी! भोर हो गई।फेरीवालो की आवाज़ आ रही है ।``
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.महाजन का पिरचय अब पिरहायम नहीं है । उसके चिरत से सभी आमजन भिलभांित पिरिचत है । जैसा वह
ऊपर से िदखाई दे ता है वैसा वह भीतर से नहीं है । यह इनसान की खािसयत है िक वह ऊपर से कुछ िदखाई दे ता है और
भीतर से वह कुछ और ही होता है ।इस दिुनया मे अििकतर लोग दोहरे चिरत के होते है ।एक वह जो वे ऊपर से िदखाई
दे ते है ।एक वे जो भीतर से होते है ।यह िविभनन रं ्ग
ं ो की दिुनया है । जो ऊपर से कूर िदखाई दे ते है ,वे भीतर से
अतयनत िवनम और दयालु पाये जाते है ।उनहे दिुनया की माया गिसत नहीं कर पाती ।इसी तरह जो ऊपर से िवनम
िदखाई दे ते है या िदखाई दे ने का ढोग करते है , वे भीतर से अतयनत कूर होते है ।यह दह
ु राव सारे जग मे िबखरा हुआ
िदखाई दे ता है ।इसी को कहते है रं ग-रं ग की रं गीन दिुनया।इसे आसानी से समझ पाना बहुत ही किठन है ।जो जान गया
वह उसे जीत लेता है और बाकी हार जाते है ।
महाजन के दोहरे चिरत से गामीण अचछी तरह से वाकीफ है ।लेिकन गाँव भर मे महाजन ही एक ऐसा वयिि
है जो लोगो के काम आता है ।चाहे वह अचछी तरह से भले ही काम न आता हो । गामीण यही सोच कर आड़े िदनो मे
उसी के पास जाते है ।वह भी हं स कर गामीणो का िजस िकसी तरह उदार करने की कोिशश करता है । भले ही इस उदार
के पीछे उसका मनतवय कुछ भी रहता हो िकनतु वह गामीणो के कामो के िलए आगे आता ही है । जी हाँ, उसका सवाथम
िनिहत तो है ही।बहुत बड़ा सवाथम िनिहत है ।वह ऐसे लोगो की तलाश मे रहता है और िबना तलाशे सके पास खींचे चले
आते हो।
िरमदास महाजन का िदन सुबह की पूजा-पाठ से पारं भ होता है । वे सुबह-सुबह पूजा-पाठ मे वयसत नज़र
आते है । गुजराती िोती िबलकुल सफेद झग ् , माथे पर चनदन का सुदीघ Z िीका , गले मे असली मोितयो की दिुिया
माला जो छाती से नीचे तक लिकती रहती है ।कांिे पर रे शमी गमछा।वह भी गुजरात से मंगाया गया होता है । गाँव मे
ऐसा बिढ़या गमछा िकसी अनय के पास नहीं होता। िसर पर मोती जिड़त महाजनी िोपी अवशय होती है । एक नज़र
दे खते ही कोई भी पहचान सकता है िक यह वयिि अवशय ही महाजनी करता होगा।वसतुत: वयिि का वयिितव उसके
पहनावे से िनखर कर सामने आता है । िजस तरह से वकील काला कोि पहनते है ,चाहे िकतनी भी गरमी पड़े वे काला
कोि अवशय पहनते है ।जैसे िचिकतसकगण सफेद कोि पहनते है ।दे खते ही कोई भी पहचान जाता है िक वे िचिकतसक
है । यिद ऐसा कोई अनय वयिि करे तो वह अलग ही िदखाई दे ता है । िजस तरह बहुरिपया चाहे िकतने भी अचछी तरह
से कुछ भी ढोग करके हुिलया बदल ले वह पहचान मे आ जाता है । लेिकन महाजन का हुिलया उसका अपना असली
हुिलया था।उसका वासतिवक हुिलया उसके अनदर का िरमदास महाजन था।वह महाजन िजसे िकसी पर भी दया-
रहम नहीं आता। सुबह वे लकमी जी की तसवीर के सामने छोिी सी घणिी बजाते हुए आरती गाते पाये जाते है --
`` जय लकमी मैया..........जय लकमी मैया........लाभ भरपूर दे सी.......भरपूर मोकलो लाभ दे सी.........``
जब तक वे पूजा-पाठ करते तब तक जररतमनद लोग उनके आंगन मे एक-एक करके आते रहते । आंगन मे ही बैठते
। उनहे मालूम है िक महाजन इस समय लकमी जी की पूजा-अचन
म ा कर आरती करे गे उसके बाद ही बाहर आएंगे।
आंगन मे एक ओर महाजनीनुमा बैठक है ।छोिी िे बल ,गदा-तिकया,बहीखाते , दीवार पर लकमी जी की
तसवीर,शुभ-लाभ के पतीक िचनह ,हलदी और कुमकुम के हाथो के पंजो के िनशान लगे हुए है । यह पतीक पतयेक
महाजन की दक
ु ान मे दे खने को िमल जाता है । लेिकन िरमदास महाजन की बात ही कुछ और है । पितिदन कोई न
कोई जररतमनद गामीण उनके दरबार मे माथा िे कने आ ही जाता है । िजस िदन अचछा आसामी फंसता है उस िदन
उनकी बलले-बलले हो जाती है ।
बैठक मे िरमदास महाजन के पवेश करते ही जररतमनद लोग सहम जाते है । वे उनकी ओर आशा और
कातरता के साथ दे खने लग जाते है ।उनकी आँखो से िनिन
म ता िपकती िदखाई दे ती है । इस तरह की उनकी लाचारी
िबलकुल िबछी हुई हो। उदास और भयभीत चेहरे इतने उदास और पकाशहीन िक दिरद नारायण दे वता भी उनहे दे खकर
एक बारगी वासतव मे दिरद हो जाएंगे परनतु महाजन पर इन दिरदता का और उनके भयभीत चेहरो का कोई अनुकूल
पभाव नहीं पड़ता । वे उनको दे खकर अित पसनन होते है । वे महालकमी को हदय ही हदय मे पणाम करते है , हे माते !
इसी तरह दया-दिि बनाए रखना।अथात
म ् ये गामीण इसी तरह दीन-हीन,दिरद,लाचार,भयभीत,भूख-े पयासे ,दिलत बने
रहे और वह इनका जीते-जी रि चूसते रहे । इतना ही नहीं महालकमी िरमदास महाजन पर ततकाल पसनन भी हो
जाती है ।यह महालकमी गामीणो को नीचले तबके के गामीण िकसानो को और अििक लाचार और िववश कर दे ती है
िक उनहे दौड़ते हुए िरमदास महाजन की शरण मे िववश और करबद होकर आना ही पड़ता है । और महाजन, वे
महालकमी को बारमबार पणाम करते है .....जय लकमी मैया....तेरी कृ पा अपरमपार है ।
वे बैठक मे आ चुके होते है । भूख-े पयासे िनिन
म जररतमनद गामीणो के सामने ही बैठकर मेवा-िमठाई का
भरपूर नाशता कर ऊपर से गरमागरम केशर-कसतूरी,बादाम-िपशता िमला दि
ू गट गट पी जाते है । सब दे खते रह जाते
है । मुसकराकर महाजन कहते-
`` तो तुम लोग आ गए सुबह-सुबह दम
ु दबाकर । रात भर नींद तो आई नहीं होगी।चले आते अलसुबह....हाँ
तो कया कहना है तुम लोगो का दम
ु दबाकर.....षोषो``
`` आपके िसवा और िकसकी शरण मे जावे हम लोग सेठ जी षोषो``करबद होकर मैकू उठ खड़ा हुआ।
`` अचछा.....अचछा....मसका मत मार ।कया कहता है तू दम
ु दबाकर...षोषो``
.अभी मैकू अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया िक िकशन लाठी फिकारते हुए बैठक मे आ गया। यह िरमदास महाजन
का अंगरकक है ।हिट्ा-किट्ा जवान,िोती-कुरता,साफा और िसर से ऊपर तक लमबी मोिी लाठी । यह महाजन का
मुँह लगा अंगरकक है । आते ही बोला-
`` राम राम मािलक...!``
`` राम राम िकशन ,बोल कया बात है दम
ु दबाकर षोषो``
``खुशी की खबर लाया हूँ मािलक।``
`` खुशी की खबर ! कया िकसी की कुकीZ करनी है षोषो``
`` नहीं...नहीं...कुकीZ नहीं करनी है ।``
`` तो कया सोने का अणडा दे नेवाली मुगी िमल गई है कयाषोषो``
`` नहीं मािलक ऐसी बात नहीं।इससे भी अचछी खबर लाया हूँ।``
``तो बता न जलदी से।इतनी बाते कयो बना रहा है षोषोबोल....बोल....``
`` आपको लड़की हुई है ,मािलक...``
`` ित ् तेरे की । अबे, दे ख मै तो यहाँ सही सलामत हूँ।कहीं तेरा माथा तो नहीं िफर गया है िकशन।कभी
िकसी मदम को बचचा होते हुए तूने दे खा है कया षोषो``
`` मािलक , बहू को बेिी हुई है । घर मे लकमी आई है ।``
पसननता का इज़हार करती हुई चमपा ने महाजन को पणाम िकया। चमपा, महाजन के यहाँ घरे लू काम करती है । जयो
ही चमपा ने बताया िक लड़की हुई है महाजन िसर िपिने लग गए।
`` सतयानाश हो गया चमपा ,सतयानाश।जहाँ दहे ज आना चािहए वहाँ दहे ज दे ना पड़े गा.दहे ज..अरे कया
मनहूस खबर लेकर आई है । अचछा तू जा....जा...यहाँ से....जा...जा ...`
महाजन का मूड़ खराब दे ख चमपा चुपचाप चली गई।वह समझ गई । उनहे लड़की नहीं चािहए।तब ही तो उनहोने
अपना िसर पीि िलया। चमपा के जाते ही महाजन,िकशन के मुखाितब हो गए।बोले-
`` िकशन ! इन लोगो से सूद और कुछ लाया हो तो ले लो और भीतर रखवा दो।मै ज़रा जाकर दे खता हूं्ं
माज़रा कया है ।``
`` मािलक! तिनक हमरी अरज भी सुन ले जो।`` एक गामीण हाथ जोड़ते हुए बोला।
.लेिकन बड़े बेमन से महाजन अपना िसर पकड़ भीतर चले गए।
0.
चौिरी कमलिसंह गाँव-समाज के बहुपितषत वयिि है ।उनका रतबा भले ही ज़मीदार के बराबर है लेिकन
उनका अपना पथ
ृ क ही अनदाज़ है ।बड़ा रतबा और वैभव समपनन होने के बावजूद वे अतयनत
सामािजक,मिुरभाषी,िमतवययी,लोकवयवहार मे िनपुण,समाज सेवक और नयाय िपय है ।उनकी दिि मे
अपना-पराया कोई नहीं। कोई छोिा बड़ा नहीं।कोई अमीर-गरीब नहीं।वे सबको समयक दिि से दे खते है । वे िमभ
म ीर तो
नहीं है लेिकन िािमक
म और आधयाि्तमक मानयताओं को खूब मानते है ।अंििवशास ,िहं सा,दरुाचार,असतय तो उनसे
लाखो कदम पीछे है ।
िकसी पर न तो अतयाचार करते है और न ही अतयाचार होते दे ख सकते है ।वे सदै व नयाय और सतय का पक लेते है ।
हाँ,सबसे अहम ् यह िक वे कटिर गाँिीवादी है ।उनके रग-रग मे गाँिीिगरी भरी हुई है । केवल गाँव-समाज ही नहीं
बिलक आसपास के इलाको मे भी उनकी गाँिीिगरी की तूती बजती है । िनिन
म हो या अमीर वे पतयेक की मदद के िलए
सदै व तैयार रहते है । िकसी को भी संकि की िसथित मे दे खकर सवयं ही सहायताथम दौड़े -दौड़े चले आते है । वे अपने
गामीणजनो को भूख सोते दे ख नहीं सकते।वे कहते है ,कोई भले ही नींद से भूख जागे िकनतु कोई भी
गामीणजन भूखा सोये नहीं।िकसी भी गामीणजन की संकि की िसथित मे वे आिी रात को भी तैयार रहते है ।यही
कारण है िक वे गाँव के लोग उनका आदर-सतकार करते है ।
वे कटिर दे श भि है । सदै व सामाज सेवा और दे श सेवा मे संलिन रहते है । उनकी बैठक मे कभी िरि नहीं
रहती । िकसी न िकसी का आना-जाना चलते रहता है । यह बात उनके दामाम िरमदास महाजन को अचछी नहीं
लगती। िरमदास महाजन,चौिरी कमलिसंह के दामाद है ।चौिरी यह अचछी तरह से जानते है िक उनका दामाद
िरमदास महाजन गाँव मे महाजनी करते है । केवल गाँव-समाज मे ही नहीं बिलक गाँव-समाज से बाहर भी उनकी
महाजनी की िूम मची हुई है । चौिरी कमलिसंह ने िरमदास महाजन को कई बार समझाया और मागद
म शन
म िदया िक
वे कभी भी दब
ु ल
म ो और िनिन
म ो्े को पतािड़त न करे । इस िहदायत के बावजूद भी िरमदास महाजन बाज नहीं आते।
उस िदन जब चौिरी कमलिसंह हुकका गुड़गुड़ा रहे थे ,िरमदास महाजन का आना हुआ । चौिरी िकसी िचनतन मे
खोये हुए थे।रात को शतरं ज िबछी थी जो अब तक जयो की तयो िबछी हुई है ।इनदावती और महाजन ने आते ही चौिरी
के चरण सपशम िकए। शतरं ज के बाद बैठ गए और एक चाल चल दी ।हालचाल पूछने के बाद चौिरी जी अपनी बात पर
आ गए।बोले-
``अब वह िदन लद गए ,जब गोरी सरकार ने गाँिीबाबा के सतयागह के सामने अपनी हार सवीकार कर ली
थी ।(महाजन के मोहरे को शह दे ते हुए) ये रहा तुमहारा हाथी।
`` गोरो ने ही तो ज़मीदारो को पनाह दी थी लेिकन...``
`` लेिकन कया षोषो``
`` गोरो की बदौलत जो लाभ हमे िमल पा रहा था,अब वह लाभ कहाँ है यहाँ षोषो``
`` जवाहरलाल,वललभ भाई पिे ल,ितलक,लाला लाजपतराय का आनदोलन उस समय बहुत रं ग लाया था ।``
हुकके का लमबा कश लेते हुए महाजन के मोहरे को शह दे ते हुए चौिरी बोले।
`` आप भी कया इिर-उिर की उल-जलूल बात लेके बैठे।कोई जाए ,हमे कया लेना-
दे ना.....अरे ..रे ...रे ....रे ....रे ...रे आप तो मुझे मात पर मात िदए जा रहे है ।``
चचाम करते-करते चौिरी,महाजन के मोहरे को मात दे ते जा रहे है ।चौिरी की पती अनुसूया एक नवजात िशशु को गोद
मे ले आती है ।यह नवजात िशशु िरमदास महाजन की नवजात बेिी है ।िजसे उनहोने िमलाने के िलए अपने शसुर के
पास सिपत आए हुए थे। अनुसूया बोली-
`` लो दामाद जी !आपकी बेिी ।``
बेिी को अपने गोद मे लेकर िरमदासजी के मुख पर पसननता छा जाती है ।वे उसे अपने गोद मे लेते है और उसे
दल
ु ारने लग जाते है ।
`` लो.....लो.....लो......िकतनी पयाली-पयाली बेिी है हमारी.....लो...लो.अरे .....अरे ......अरे .......सू कर िदया ।लो
माताजी इसे ले जाओ। हमारी रािा िबििया को ले जाओ।``
`` रािा !.......कया कहा आपने िफर से तो कहो षोषो`
`` रािा .....हम हमारी इस िबििया का नाम रािा रखते है ।शयाम की रािा ....ठीक नाम रखा न हमने षोषो``
`` अभी नामकरण संसकार नहीं हुआ आपने िबििया का नाम रािा रख िदया। कम से कम िकसी बाहण से
पूछ िलया होता ।``
``हमसे अचछा बाहण कौन हो सकता है षोषोइसिलए िबििया का नाम राघा ही ठीक रहे गा ।``
`` जैसी आपकी इचछा !``
`` जैसी हमारी इचछा होती है हम वैसा ही करते है ।``
तभी िकशन कक मे पवेश करता है ।कहता है -
`` मािलक गाड़ी तैयार है ।
`` अचछा तू चल हम लोग अभी आते है ।``
`` अबकी बार आओ तो िबििया के िलए सोने की ``हाय`` बना कर लाइयेगा दामाद जी।बचचो को जलदी से
नज़र लग जाया करती है ।``
`` अचछा माताजी ! अचछा िपताजी ! अब हम चलते है ।
`` शुभ आिशष ।``

00

जब से भूरा का बैल चोरी हो गया है तब से उसकी खेती-बाड़ी के कामकाज पर पितकूल पभाव पड़ रहा है । एक
बैल से कुछ होने से रहा ।इतने ढ़े र सारे कामकाज और एक अकेला बैल । पित-पती िचनतागसत हो गए।कोई रासता
सूझ नहीं पा रहा था । भूरा की रातो्े की नींद हराम हो गई।वह सो नहीं पाता।उसे यह भय सताता रहता िक ऐसा न हो
िक कहीं दस
ू रा बैल भी चोरी हो जाए।िफर तो वह कहीं का नहीं रहे गा।अभी खिलहानी मे समय है । इतनी जलदी
खिलहानी नहीं हो पाएगी । फसल पकने के बाद ही सब कुछ अचछा हो सकेगा।उसके पहले नहीं हो सकता ।वह बार-
बार िबसतर से उठ बैठता।आँखो की नींद उड़ गई। वह कभी छत की ओर िनहारता है । कभी सोती हुई कमली की ओर
िनहारता है तो कभी सोते हुए हिर की ओर िनहारने लगता है । वह बार-बार बीड़ी सुलगाता है ।कश पर कश लेते जाता
है । बीड़ी की गंि से कमली की नींद िू ि गई और वह उठ बैठी ।
`` कयोजी! नींद नहीं आ रही है कयाषोषो``
`` नहीं, नींद कैसे आएगी षोषो जैसे बुढ़ापे मे बेिा सहारा होता है उसी तरह बैल िकसान का सहारा होता है । यो
कहूँ िक िकसान का दस
ू रा बेिा उसका बैल होता है । और खासतौर पर..........``
सारी रात भूरा सो नहीं पाया।पित-पती रात भर ज़माने भर की बाते करते रहे । सुबह होते ही कमली पानी
भरने कुएं पर चली गई।
गाँव के कुएं पर सुबह-सबेरे मिहलाएं पानी भरती हुई घरे लू बाते करने मे बड़ी िनपूण होती है ।अकसर होता
यही है िक जहाँ दो चार मिहलाएं एकत हो जाती वहाँ जयादातर पािरवािरक बाते होती रहती है । कोई अपनी सास-ननद
की बाते करती है तो कोई अपने गहने जेवरात की कोई िकसी की िननदा-सतुित करती है तो कोई अपनी ही तारीफ
करने लग जाती है । अकसर मिहलाएं िननदा-सतुित के अलावा तरह-तरह की खाद वसतुएं बनाने की बाते भी बहुत
करती है । लेिकन जहाँ युवा लड़िकयो की बात आती है वहाँ उनके हदय मे पनघि पर रािा-शयाम की चचाम होना
आवशयक सा हो जाता है । अरे , वह छोकरा.....अरे फलां की छोकरी.....वह तो ऐसा है वह तो ऐसी है .......रातो मे जागने
की बाते तो कहीं लुक-छुप कर अपने िपयतम से िमलने की बाते पनघि पर ही होती सुनी जा सकती है । सुबह-सबेरे
यिद अपने िपयतम के दशन
म पनघि के बहाने हो जाए तो सोने मे सुहागा समझो।लेिकन कभी कभी दशन
म तो नहीं हो
पाते परनतु िकसी न िकसी सहे ली से अपने मन की बात इशारो-इशारो मे हो जाती है ।
भूरा तो अपने काम-िाम मे लग गया और कमली चल दी कुएं पर पानी भरने चल दी। दो चार मिहलाए
पहले से ही कुएं पर पानी भर रही थी।कुछ मनचले छोकरे भी आसपास मंडरा राहे थे।गोपाल का कहीं पता नहीं था।वे
भी अकसर उसी समय कुंए पर आते जब गुलाबो,कमली के साथ कुंए पर आती।कमली हो कुएं पर आया दे ख गुलाबो
उलांछे मारते हुए आ िमकी । वह अकसर कमली के पास आ जाया करती । उसे पानी भरने मे सहयोग करती । कमली
को पानी भरते दे ख वह चुपके से कमली के पीछे आ खड़ी हुई । कमली तो समझ ही गई िक गुलाबो उसके पीछे चुपके से
आकर खड़ी हो गई। उसने पूछा -

्ृ `` कयो री गुलाबो,बहुत िदनो से गोपाल िदखाई नहीं दे रहा है ।``


`` उनके बाबा है न.....``
`` कौन षोषो रािेलाल काका ,``
`` महाजन का िरन न चुकाने पर कुकीZ हो गई। इसिलए काका के साथ मे वो भी चले गए ।``
`` वो कौन षोषो``
गुलाबो शरमा गई। वह अपनी चोिी मे अंगुिलयाँ िपरोने और इतराकर डोलने लगी । उसके होठो पर मुसकान िबखर
गई। वह िु कुर-िु कुर कमली की ओर दे खने लगी। हालांिक कमली समझ गई थी , ` वो `कौन है ।बोली-
`` अचछा....अचछा.....गोपाल !``
`` हाँ.....वो भी रािेलाल काका के साथ साब के बंगले पर काम करने जाने लगा है ।``
`` हाँ री, मरी दे नदारी-साहूकारी और ये जो िरन-िवन है न वह तो बहुत ही बुरी बला है । भगवान बचाए इन
बातो से...``
बोलते हुए कमली ने एक दीघ Z शास भरी । जैसे वह अभी से ही िरन-िवन को बहुत बुरा महसूस करने लगी हो। वह
इसिलए भी िक अब कमली के पित भूरा को एक और बैल खरीदने के िलए संभवत: िरमदास साहूकार के पास जाना
पड़े गा । यिद िरमदास साहूकार ने िरन िदया तो उसे सूद सिहत पिाना पड़े गा । न जाने िरमदास साहूकार िकतना
और कैसे सूद वसूल करे गा। साहूकार की बेईमानी से सारा जग वािकफ है िफर उसे यह एहसास हो गया िक रािेलाल
काका को िरमदास साहूकार ने िकस तरह पतािड़त िकया था षोषो उसकी रह काँप जाती। कमली को इस तरह दीघ Z
शास लेते दे ख गुलाबो थोड़ा सहम गई। गोया, रािेलाल काका के अलावा उसने भी वह पीड़ा महसूस की हो । वह बोली
-
`` दीदी ! रािेलाल काका के साथ जो कुछ हुआ ,तुम तो अचछी तरह से जानती हो न । अचछा आदमी आदमी
नहीं है िरमदास महाजन नाम तो िरमदास है लेिकन उसमे तो िरम नाम की कोई चीज है ही नहीं।हाँ लोगो पर
अतयाचार करने को कह दो।फिाफि अतयाचार करने मे मािहर जरर है वह।``
िबना कुछ बात िकये कमली ने पानी का बतन
म उठाया और चल दी ।अब तक भूरा कड़बी काि चुका था । उसने किी हुई
कड़बी एकलौते बैल के सामने डाल दी । बैल की पीठ थपथपाई तो बैल ने िसर उठाकर भूरा की ओर दे खा और जुगाली
करने लगा।संभवत वह यह कहना चाह रहा होगा ,``दे खो भूरा! मै अकेला हूँ मेरे साथी को वह मुहलले का आदमी ही
खूँिे से चुरा ले गया ।`` िकनतु वह तो मूक पाणी है वह ज़बान से बोल नहींसकता।हाँ भावनाओं की अिभवयिि अवशय
कर सकता है । बैल के चेहरे को दे ख भूरा के चेहरे पर उदासी छा गई।
`` तेरा साथी कोई चुरा ले गया। कया करे षोषो जो भािय मे था वहीं तो हुआ । मै कोिशश करँगा तेरे वासते
एक दस
ू रा साथी लाने की।खा ले । चारा तो खाना ही होगा । भूखे पेि सारी दिुनया से लड़ना किठन है । मै आज महाजन
के पास जाऊँगा । कुछ तो होगा।वह कुछ उिार दे दे तो तेरा साथ जरर आएगा ।``
`` ऐ जी ! हमे ऐसा ही करना होगा । िरमदास महाजन के पास हो आओ। वह कुछ तो करे गा ।``
`` कया पता ,महाजन उिार दे गा भी या नहीं । ला कुछ होगा तो दे दे ।कुछ खाकर ही जाऊँगा।िफर जाने सारा
िदन ही लग जाय।``
भूरा ,कमली की ओर कातर नज़रो से दे खने लगा है । शायद उसके भीतर पीड़ा पहाड़ बन ढह गई हो।शायद वह भारी
पतथरो का पहाड़ हो िजसे भूरा ढो नहीं पा रहा हो या िफर वह िरन से घबरा रहा हो कयोिक िरन एक पकार की महामारी
है या यो कहे िक यह महारोग है िजसे एक बार लग जाए वह तािज़नदगी िरन के बोझ से मुि नहीं हो सकता । िरन का
बोझ इनसान को तोड़कर रख दे ता है । इसका खािमयाना िरनगिहता को तो पीड़ा पहुँचाता ही है साथ ही उसकी
आनेवाली पीढ़ी भी इससे मुि नहीं हो पाती।यही सोच कर भूरा का हदय बैठा जा रहा है । भूरा की कातर दिि दे खकर
कमला का हदय ज़ोरो से िड़कने लेगा ।बोली-
`` कया दे खते हो जी षोषो``
`` हिर और तेरे वासते षोषो``
`` अभी है तुम खा लो ।``
भूरा की उदासी कमली से दे खी नहीं गई । उसकी आँखो मे आँसू भर आए।भूरा ने खाने का एक कौर उठाया लेिकन वह
खा नहीं पाया।
`` खाओगे नहीं तो काम कैसे चलेगा । चलो खा लो।िहममत हारोगे तो हम लोगो का कया होगा ,षोषो
कमली उसे िहममत दे ते रही । भूरा ने दो-चार कौर खाये और थाली उठाकर अलग रख दी । उसकी भी आँखो से आँसू
लुढक पड़े ।बोली-
`` और नहीं लोगो षोषो``
`` नहीं ! बस ।चलता हूँ । महाजन ने उिार िदया तो मासिर जी के पास भी हो आऊँगा ।``
भूरा उठ कर जाने लगा। उसने साफा बांिा और लाठी उठाकर आंगन के बाहर तक गया।कमली से रहा नहीं गया।
बोली-
`` सुनो जी!मेरा जी तो िक् िक् कर रहा है । मन कह रहा है ,महाजन के पास जाओ ही नहीं तो अचछा है । न
जाने कैसे-कैसे खयाल मन मे आ रहे है ।``
`` तू तो ठीक कहती है , पर चारा ही कया है षोषो``
`` मेरी मानो तो चौिरी के पास जाओ। भला आदमी है चौिरी।कोतवाल से िसफािरश कर दे गा बैल ढू ँ ढवाने
के िलए ।``
`` अरे चोरी गई चीज वापस भी िमली है कभी ।``
``कोिशश करने मे हरज ही कया है षोषो``
`` जैसी तेरी मरजी । पहले चौिरी के पास जाता हूँ।``
जैसे ही भूरा आंगन मे बाहर िनकला हिर खेलते-कूदते जाने कहाँ से आ गया।
`` अममा मै भी काका के साथ जा रहा हूँ।``
`` अचछा ठीक है ।``
00

चौिरी कमलिसंह यूँ तो अपनी ईमानदारी और सदाचार के िलए सारे इलाके मे चिचत
म है लेिकन जब संिदिि
असामािजक ततवो से सामना होता ,वे नयाय के पक मे बात करते है । वे सदै व अनयाय के िवरद आवाज़ उठाया करते
।जहाँ कहीं उनहे अनयाय नज़र आता फौरन ही अपनी बुलनद आवाज़ उठाते है । तब वे यह नहीं दे खते िक वे िकस के
िवरोि मे बोल रहे है और िकसके पक मे बोल रहे है ।उनके समक अपने-पराये सभी बराबर है ।ऐसा नहीं िक फलां-फलां
वयिि उनका िरशतेदार है तो उनहे अपराि की सज़ा न िदलाई जाय और ऐसा भी नहीं िक कोई उनका अपना नहीं है तो
उसे सज़ा िदलाई जाय।उनकी नज़र मे अपरािी तो अपरािी है और कुछ नहीं । हाँ,िनदोष को सज़ा हो,वे ऐसा कतई
नहीं सोच सकते।उनके पास तरह-तरह के लोग आते है । कोई सज़ा माफ करवाने की िसफािरश िलए आता है तो कोई
झूठी गवाही िदलवाने के िलए आता है ।कोई-कोई तो इस तरह आते है िक कोई अपराि नहीं है और िकसी पर अपराि
का पकरण दजम करवाने की अनुशंसा के िलए आते है ।वे इस तरह के पकरणो के पककारो को दो-िू क सुना कर चलता
करते है ।वे िकसी को गलत राह नहीं िदखाते और न कभी िकसी को बरगलाने की कोिशश करते।इसिलए पुिलस
महकमे मे भी उनकी अचछी खासी ईजजत-मुरववत है । तभी तो पुिलस के आला अफसर भी उनके दरबार मे हािजरी
लगाने आते है ।
पुिलस इनसपेकिर िवकमिसंह पिे ल उनके पुराने िमतो मे माने जाते है ।वे अकसर चौिरी कमलिसंह के दरबार
मे हािजरी लगवाने आते रहते है ।ऐसा नहीं िक वे पुिलस इनसपेकिर है इसिलए हािजरी लगवाने आते है बिलक
िवकमिसंह उनके सकूल के सहपाठी रह चुके है ।िकसी समय वे लंगोििया िमत थे।वे पुराने िदन थे जब सकूल मे सकूली
िमतता पनपती थी और िमतता गहरी हो गई थी िकनतु अब सकूल की िशका के बाद जीवन बदल गया है ।वयिि
िकताबी पढ़ाई के अलावा अब वयवाहािरकता मे आ जाता है । उसे दिुनया के अनुसार चलना होता है । दिुनया मे
दे खभाल कर कदम रखना होता है और वह ऐसा करता है कयोिक यही दिुनया का उसूल है । दिुनयादारी मे सकूली
िमतता पता नहीं कहाँ खो जाती िकसी को पता नहीं चलता । जब िमतता परवान चढ़ने लगती है तब तक सकूल से
िशका पूरी करने के बाद वयिि आगामी िशका के िलए अनय केत मे पवेश करता है या उचच िशका के िलए सथान
पिरवितत
म करता है वहाँ उसे अनय िमत िमल जाते है । सकूली िमतता के सथान पर नई िमतता सामने आती है । वह भी
कुछ ही िदनो तक रहती है । उचच िशका के बाद वयिि की दिुनया ही बदल चुकी होती है । लेिकन यहाँ ऐसी िसथित
उतपनन नहीं हुई। चौिरी कमलिसंह जयादा पढ़े -िलखे नहीं थे। उनहोने गाँव की शाला मे ही थोड़ा-बहुत पढ़-िलख िलया
था । बाकी की पढ़ाई घर पर ही हुई थी। घर से केवल परीका दे ने जाया करते थे। इस तरह उनहोने उचच िशका घर
रहकर ही पूणम की है । जहाँ तक िवकमिसंह पिे ल का सवाल है ,वे शहर मे जाकर उचच िशका पाप की।लेिकन िफर भी
वि उनहे उसी इलाके मे ले जाया िजस इलाके मे वे पले-बढ़े ।यही कारण है िक चौिरी कमलिसंह और िवकमिसंह पिे ल
की सकूली िमतता जयो की तयो बरकरार रही। आज वे दिुनया भर की सारे बाते िवकमिसंह पिे लके साथ ही बांिते है ।
`` इतने सारे गाँव की िजममेदारी संभालना आसान नहीं है इनसपेकिर साहब।! आपका साथ होकर भी लगता
है कहीं कुछ कमी अवशय रह गई है ।``
``ठीक कहा आपने,हतया डकैती कया,कोई चोरी-लूि की भी िहममत नहीं कर सकता हमारे केत मे ।``
`` इसिलए तो अमन-शािनत है आपके इलाके मे...कया मज़ाल िक कोई िकसी की गाय-बकरी चुरा ले जाय या
कोई िकसी के घर का ताला तोड़ दे ।``
`` और चौिारी जी! जो लोग अफसरो-नेताओं की जी हुजूरी मे लगे रहते है वे ही जनता को परे शान करने के
िलए कुछ न कुछ हथकणडे अपनाते रहते है ।
`` और कुछ तो बहती गंगा मे डू बकी लगा लेते है ।``
अभी िवकमिसंह पिे ल और चौिरी के बीच चचाम चल ही रही थी िक नीलमिसंह का पवेश हुआ । वे भी चौिरी के एक
मात पुत है । पवेश करते समय शायद वे चचाम सुन रहे थे िक तभी उनहोने बीच मे ही बोला-
`` गुसताखी माफ हो तो मै भी कुछ अजम करने की गुज़ािरश करना चाहता हूँ। पिे ल चाचा!.....``
`` हाँ....हाँ.... हाँ......कयो नहीं ।``
`` कुछ लोग है जो न कानून से डरते है न पुिलस से......वो तो—अपना ही कानून िनयम चलाते है और
सामानय जनता पर जुलम ढाते है ।``
`` दे शदोही होगे ।``
`` घर का भेदी लंका ढाय ।``चौिरी ने अपनी राय पसतुत की।
``रािेलाल काका पर जो जुलम हुआ उसको तो आप जाते ही होगे।``
`` रािेलाल पर.....!`` िवकमिसंह पिे ल को िवसमय हुआ।
`` हाँ, पिे ल काका । रािेलाल काका पर बहुत जुलम हुआ ।खैर,मै आप लो्ागो की चचाम मे बीच मे ही बोल
पड़ा।कमा िकजीए।``
`` चलो अचछा हुआ तुम आ गए। मै तो तुमहे बुलवा ही रहा था। कुछ काम आ पड़ा है शहर मे ,तुमहे जाना
होगा । समय िनकालकर चले जाना।``चौिरी बोले।
अभी जुलम-ओ-िसतम की बात हो ही रही थी िक उसी समय भूरा हताश सा दरबार मे दािखल हुआ । उसके चेहरे पर
गहरी उदासी छाई हुई थी।सारी रात जागने के कारण उसकी आँखे सूखम और सूजी िदखाई दे रही थ््ी । ऐसा लग रहा
था जैसे वह कई िदनोसे बीमार हो । उसे इस तरह गुमसुम और उदास दे ख चौिरी बोले-
`` हाँ, भाई भूरा ! बोल कया बात है षोषोतुम इस तरह उदास कयो िदख रहे हो षोषो``
`` मािलक ! दो िदन पहले, होली के बाद, रात को....``
`` रक कयो गया षोषो``
`` मािलक मेरा एक बैल कोई आंगन से छोड़कर ले गया ।``
`` कया षोषो`` िवकमिसंह पिे ल अचानक उछल पड़े ।
`` जी मािलक ।``
भूरा की बात सुनकर िवकमिसंह पिे ल और चौिरी कमलिसंह सकते मे आ गए।नीलमिसंह को अब बोलने का अवसर
िमल गया।वे बोले-
`` हाथ कंगन को आरसी कया षोषो सबूत आपके सामने है ।``
`` भूरा ! तू ठीक कह रहा है न !``
`` जी हुजूर ! मेरा एक बैल....अब मेरी खेती-बाड़ी का कया होगा षोषोएक बैल से काम नहीं चल सकता है
हुजूर ।``
`` अचछा....अब तू जा...हम खोजबीन करते है ।``िवकमिसंह ने भूरा को सानतवना दे ते हुए कहा ।
``आपकी बड़ी मेहरबानी होगी हुजूर ...!``
``ठीक है ।ठीक है जा...``
नीलमिसंह के बोल िनशाने पर लगे।िवकमिसंह और चौिरी कमलिसंह सोचते ही रह गए । जब भूरा के बैल की चोरी
की बात सुनी तो उनहे यकीन नहीं हो रहा था िक भूरा सच बोल रहा है । लेिकन जो सतय है उसे बदला नहीं जा सकता ।
सतय, सतय होता है ....अिठग....!

महाजनी का वयवसाय वे ही लोग करते है जो िन के अतयििक लोभी होते है ्ै।रपये-पैसो को दाँतो


तले दबा रखते है ।कहीं ऐसा न हो िक उनके हाथो से रपया-पैसा छूि जाय।िन लोलुपता इन लोगो मे बहुत अििक
होती है ।रपये-पैसो से इनका मन नहीं भरता।इनकी आकांकाएं पूरी नहीं होती।रात-िदन िसफम रपया-पैसा ही इनहे
नज़र आता है ।इनके सामने मनुषयता या यो कहे िक इनसािनयत नाम की कोई चीज नहीं होती।िरशते-नातो को ये लोग
रपये-पैसो से तोलते है । इनहे केवल रपया-पैसा ही िदखता है ।वयिि,इनसान,संवेदना,मानवीयता,सदाचार,िमम,ईमान
यहाँ तक िक इनहे ईशर का भी कोई भय नहीं रहता । इनके िलए इनका भगवान रपया-पैसा ही होता है । इनका बस
चले तो ये न जाने रपये-पैसो को और िकतना अििक महतव दे ते है । रपये-पैसो के आगे इनके िलए िकसी का कोई
महतव नहीं रहता। बस, हाय मेरा रपया और हाय मेरा पैसा...इसी नाम की रि लगाये रखते है । दे खा गया है िक अकसर
ऐसे लोगो के पास ही महालकमी का िनवास रहता है ।महालकमी इनकी ही कामना पूरी करने के िलए सदै व ततपर रहती
है । एक कहावत बहुत मशहूर है ....मुख मे राम बगल मे्े छुरी.....महाजनो पर यह कहावत सिीक बैठतीहै ।इनही्े
महाजनो मे एक महाजन है ,िरमदास महाजन । गाँव-समाज के जररत मनदो को बयाज पर रपया दे ते है ।इतना ही
नहीं िकसी का खेत-खिलहान हो, मकान हो,चाँदी-सोने के जेवरात हो उनहे भी वे िगरवी रखकर ऋण दे ते है । इस ऋण
पर उनकी बयाजदर उनके मुतािबत होती है ।वे आसामी को इतना अििक जकड़ लेते है िक आसामी उनकी बातो मे आ
जाता है और आसानी से अपनी ज़मीन-जायदाद,खेत-खिलहान या जो कुछ भी उनके पास हो वे िरमदास महाजन के
पास िगरवी रखकर ऋण ले लेते है ।
वैसे तो महाजन दयालु है बड़ी उदारता से आसामी को ऋण दे दे ते है तो उसी उदारता से बयाज भी
उसूलते है । अब दे खो न भूरा को भी इनही जररतमनदो की कतार मे खड़ा होना पड़ रहा है । भूरा भी िरमदास महाजन
से ऋण लेने की सोच रहे है ।लेिकन वे बहुत सोच-िवचार के बाद ही ऐसा िनणय
म लेना उिचत समझते है । अब आकर दे खे
िक िरमदास महाजन अपने आसािमयो से कैसे पेश आते है ।
पूजा-पाठ से िनवत
ृ होने के बाद उनहोने कूताम-पाजामा पहना,माथे पर चनदन का बड़ा सा ितलक लगाया । गले मे
असली मोितयो की माला डाली । िसर पर महाजनी िोपी पहनी और तैयार हो गए उनकी अमूलय िनिि को ढू ँ ढने के
िलए िजसके िलए वे बेसबी से इनतज़ार कर रहे थे।
सुबह-सबेरे वे न जाने कया खोज रहे है ।िबललोरी काँच से अपने कक मे िगरी हुई िकसी वसतु की
तलाश कर रहे है ।वह वसतु रात से ही कहीं गुम हो गई है लेिकन उनके िलए वह वसतु बहुत बहुमूलय है इसिलए उनहे
िबललोरी काँच का उपयोग करना पड़ रहा है कयोिक वह वसतु आसानी से उनहे पाप हो जाए ।
महाजन की शीमती जी याने शीमती इनदावती जी पूजन गह
ृ से गुनगुना रही है ।
``वैषणव जण तो ते ने किहय,जो पीर पराई जाणे रे ``

इनदाणी की मिुर वाणी वातावरण को पिवत बना रही है और महाजन जी िबललोरी काँच से वसतु ढू ँ ढने मे मिन है ।
उनहे अनायास वह वसतु िमल जाती है और वे पसनन होकर उछल पड़ते है ।
`` आिखर िमल ही गया । रात ही मे न जाने कैसे मेरे हाथ से िफसल गया था । चलो आिखर
मेहनत रं ग ला गई अरे भाई इनदावती.....``
वह अभी भी गुनगुना रही है :-
``वैषणव जण तो ते ने किहय,जो पीर पराई जाणे रे ``
महाजन अभी उस वसतु को अपनी जेब मे रख ही रहे थे िक उनके अंगरकक िकशन दनदनाते हुए आ गए । िबना िकसी
अिभवादन के िकशन ने अपनी बात सीिे तौर पर कह दी :-
`` मािलक ! मजदरू मजूरी का पैसा मांग रहे है ।``
इतना कहना भर था िक महाजन की जेब से वह वसतु िगर गई जो उनहोने बड़ी मेहनत के बाद ढू ँ ढ िनकाली थी। उनहोने
उस वसतु को दब
ु ारा िबललोरी काँच मे दे खा और उचक पड़े ....
`` ित ् तेरे की ....मै समझा था यह हीरे की किन ही होगी िजसके िलए मुझे इतनी मेहनत करनी
पड़ी । चलो, चावल का यह दाना िकसी हीरे से कम तो नहीं है । यह भी उतना ही कीमती है िजतना िक हीरा होता है । है
न िकशन......``
`` जी मािलक ! लेिकन मािलक उन मजदरूो को भी तो मजूरी दे नी है जो बड़ी दे र से बाहर आपकी
पतीका कर रहे है ।``
`` मजूरी ! काहे की मजूरी । िकसके पास है पैसा ``
`` मािलक ! मजूरो को तो मजूरी दे नी ही होगी न !``
`` ठीक है ....ठीक है ....तू चल मै आया ।``
इनदावती अब तक पित की सारी कारसतािनयाँ दे ख रही थी ।िकस तरह वे सुबह-सबेरे से चावल के एक दाने को
िबललोरी काँच से ढू ँ ढ रहे थे और िकस तरह मजदरूो का हक मारने के िलए कह रहे है िक, काहे की मजूरी िकसके पास
है पैसा षोषो`` वह ितलिमला गई बोली -
``ऐ जी ! इतनी भी कंजूरी अचछी नहीं होती । दे कयो नहीं दे ते मजूरो को उनकी मजूरी षोषो बेचारे
मेहनत भी तो करते है । दे ना ही होगा उनहे नहीं तो काम कैसे चलेगा ।``
`` अरे तूझे कया मालूम षोषो इन हरािमयो ने हज़ार-हज़ार का िरन ले रखा है । मूल तो मूल , सूद
भी नहीं पिाया इन कामचोरो ने...``
`` लेिकन इनहे मजूरी नहीं िमलेगी तो ये अपने बाल-बचचो का पेि कैसे पालेगे । कैसे ये गु़्ज़ारा
करे गे अपनी िनिन
म ता मे षोषो तुम तो उनहे मजूरी दे दो । हाँ िरन कािना ही है तो थोड़ा-थोड़ा काि लो बाकी का उनहे
भुगतान कर दो।``
`` तूझे कयो उनकी पीड़ा हो रही है ।वे सारे के सारे हरामी है । िरन चुकाने का नाम नहीं । सूद दे ने का
नाम नहीं और ऊपर से मजूरी मांगने चले आए।अरे भाई जब तक िरन चुकता नहीं हो जाता इनहे मजूदरूी तो करने
दो्ै।िरन चुकता हो जाएगा तो मै इनहे मजूरी दे ही दँग
ू ा ।``
कहते हुए महाजन अपना पैर पिकते चल िदए । इनदावती दे खते रह गई।वह हमेशा से ही कहती आ रही है िक मजूरो
और िनिन
म ो की बदआ
ु मत लो लेिकन ये है िक मानने के िलए तैयार ही नहीं होते ।कंजूसी की भी हद होती है ।एक
चावल के दाने को सुबह से िबललोरी काँच से ढू ँ ढना शोभा दे ता है कया षोषो लगता है ये इतनी आसानी से नहीं
माननेवाले ।कोई और रासता तलाशना होगा ।
0
बैठक मे तेज,ू मािव,शेरिसंह,नेकू,रपा और चमपा अपनी मजूरी के िलए पतीका कर रहे है । महाजन
अपनी महाजनी गदी पर बैठे बहीखाता दे खने मे वयसत है । वे बड़ी बारीकी से कागज पर िहसाब-िकताब कर रहे है ।
बार-बार अपनी ऐनक उचका कर कभी िकशन को कभी रपा को कभी शेरिसह को.... कनिखयो से दे खते है । होठो पर
अंगुली को गीला कर बहीखाते के पनने पलिते है । मजदरू बड़ी उममीद से महाजन की ओर दे खते है । संभवत: आज
उनहे कुछ तो मजूरी िमल ही जाएगी । आशा बड़ी बुरी चीज होती है ।आशा के िबना तो जीवन चल ही नहीं सकता ।
आशावादी जीवन आशाओं पर ििका होता है ।पतयेक पाणी को िकसी न िकसी से आशा बंिी होती है । उनहीं आशाओं के
साथ ये मजदरू भी बंि हुए है । भूखे लोगो के पास केवल आशाएं होती है भोजन नहीं।वे सवयं तो भूखे रह लेगे िकनतु
अपने आिशतो को भूखे नहीं रख सकते।इसी आशा के साथ वे महाजन के पास मजदरूी मांगने आए है । महाजन ने
पतयेक महदरू का िहसाब बताया।
`` सूद कािकर जो बचता है वही िमलेगा,समझे..घीसू चार रपये,तेज दस रपये,मािव आठ
रपये,शेरिसंह तीन रपये, मैकू दो रपये,रपा एक रपये और चमपा.......ये रहे तुमहारे बीस रपये।``
चमपा को बीस रपये दे ते समय महाजन मुसकरा दे ते है । अकसर महाजन जी चमपा पर मेहरबान बने रहते है ।वह उनके
घर मे काम-काज भी िकया करती है ।पानी भरना,झाड-पोछा लगाना,कपड़े िोना,लीपना-पोतना,गोबर पांथना आिद
कई घरे लू कायम चमपा ही िकया करती है । वह अििकाििक समय महाजन के घर पर ही काम-काज करते हुए िबताती
है ।
`` ये तो बहुत कम है ।``शेरिसंह मायूस होकर बोला।
`` तो कया यहाँ तुमने कुबेर का खजाना समझ रखा है ....चले आते भीख मांगने दम
ु दबाकर....जाओ...जाओ
दम
ु दबाकर भागो यहाँ से ..``
शेरिसंह,मैकू,तेज,घीसू िबना िकसी तरह का पितकार िकये चल दे ते है ।महाजन कभीमजदरूो को पूरी मजूरी नहीं दे ते।वे
बाकी मजूरी उनकी मजदरूी से काि लेते है ।ऋणगसत लोग िजस िकसी तरह अपना ऋण चुकाने के िलए महाजन के
यहाँ काम करते है ।बावजूद उनहे पूरी मजूरी नहीं िमलती । वे िकसी से िशकायत भी नहीं कर सकते।ऐसा करने से उनहे
जो मजूरी िमलती है वह भी उनहे िमलने से बनद जो जाएगी।यही कारण है िक महाजन ऋणगसतो से नाजायज लाभ
उठा लेते है । एक-एक करके सारे मजदरू चले गए।चमपा अब तक खड़ी थी उसे लगा िक अब कुछ नहीं िमलनेवाला तो
वह भी जाने को हुई।तभी महाजन चमपा को बड़े पे््रम से बोले-
`` चमपा......ए चमपा......रक तो ज़रा....``
चमपा जाते-जाते हुए रक गई। उसे लगा िक अब कुछ और रपया उसे िमल जाएगा लेिकन यह कया महाजन लिड़याते
हुए चमपा के पास आये और मुसकराने लगे। बोले,``
``तू तो आज बहुत अचछी लग रही है रे कया बात है बहुत पसनन नज़र आ रही है । कोई खजाना िमल गया
कया षोषो``
`` नहीं तो...बस यूँ ही तुमने मुझे जयादा मजूरी दी।सोचा तुमको िनयवाद कह दँ।ू ``
`` िफर िनयवाद कयो नहीं िदया षोषो``
`` िहममत नहीं हुई।``
`` यह तो कोई बात नहीं।कोई अपनो से इस तरह लजाता है कया जो तू लजा रही है ।``
`` मािलक और नौकर के बीच का िरशता इससे अििक नहीं रहता।िफर मै आपसे इस नाते कैसे कह सकती
षोषो``
`` बात यह नहीं है रे ।मािलक और नौकर बराबर के होते है वह तो ऐसा है न िक ऐरे -गैरो को कौन िसर चढ़ाये।
लेिकन तू तो इस घर की सदसय की ही तरह है ।इसिलए तुझे अििक इजजत िमल जाया करती है । है न षोषो``
`` यह तो आपकी उदारता है मािलक ।``
`` मािलक नहीं।आज से िसफम िरमदास.....िरमदास महाजन ..``
`` ऐसे कैसे हो सकता है षोषो``
`` ऐसा ही तो होना चािहए ।``
चमपा नज़रे नीचे कर लेती है । वह कुछ कहने से घबरा रही है लेिकन कह नहीं पा रही है ।सोच रही है आज महाजन
िकतना मीठा बोल रहे है नहीं तो खाने को दौड़ते। महाजन ,चमपा के करीब आकर उसकी ठु डडी पकड़कर उठाते है । वह
लजा जाती है । उसके लाल-लाल पतले से संतीरे की फांक के समाज मुलायम होठ लरजने लगे।िजस तरह वैशाख की
िूप मे पसीना आता है ठीक उसी तरह उसके माथे पर पसीना आ गया।उसने जलदी से लमबा घूघ
ँ ि काढ िलया तो
महाजन ने आिहसता से उसका घूँघि उठा िलया । उसके माथे पर और अििक ढ़़््ेर सारा पसीना छूि आया । उसका
हदय ज़ोरो से िड़कने लगा।वह समझ नहीं पा रही थी िक आज महाजन को कया हो गया है ।कोई मािलक अपने नौकर
से इस तरह पे््रम से बात भी नहीं करता और आज इनको कया हो गया है ।महाजन ने चमपा का घूँघि सवयं के और
चमपा के िसर पर ओढ़ कर ढं ककर उसके होठो पर अपने होठ िर िदए।चमपा पितकार न कर सकी।महाजन से बचना
उसके िलए मुिशकल हो गया।उसका आंचल सरककर िरती पर िगर पड़ा । वह `` ऊई माँ `` कह कर रह गई और
महाजन उस पर बरस गये।जब वह पूणत
म : संतुि हो गए उसने चमपा को ठीक उसी तरह पथ
ृ क कर िदया िजस तरह
कोई गनना खाकर बचा-खुचा फेक दे ता है । चमपा िनढाल सी फशम पर बैठ गई। वह इसके िलए तैयार नहीं थी और न ही
वह इसे पितकार कर सकी।वह जानती है िक यिद उसने पितकार िकया तो उसका पिरणाम उसे भुगतना होगा।उसने
अपने वस समेिे।केश संवारे । मुँह पर पानी के छींिे मारकर चेहरा साफ िकया और चुपचाप बाहर िनकल गई।
00

भूरा के खेत मे बहुत सा कायम िकया जाना बाकी पड़ा था।िजसे वह पूरा करना चाहता था।चौिरी
कमलिसंह से एक बैल काम कराने के िलए ले आया।इस तरह दो बैल हो गए।वह सुबह से ही खेत मे काम पर जुड़ गया
। कमली ने ऐसे समय पित को हौसला-अफजाई करना उिचत समझा । वह भी भूरा के साथ कांिे से कांिा िमलाकर
काम करने मे जुि गई। नारी सदै व पुरष के िलए शिि का कायम करती है ।जो हौसला एक नारी मे होता है ,वैसा हौसला
एक पुरष मे नहीं होता।बहुत कम अपवाद हो सकते है िकनतु िवश इितहास बताता है िक नारी के िबना पुरष की शिि
जागत
ृ नहीं होती। कोई भी कायम हो जब तक नारी पुरष को पे््रिरत नहीं करती तब तक वह कोई कायम करने मे सफल
नहीं हो पाता।िकसी पुरष ने कोई कायम पारं भ भी िकया हो तो वह उसे पूरे मनोवेग से पूरा नहीं कर पाता ।ऐसे समय मे
एक नारी वदारा पे््रिरत करने पर उसकी शिि पुन: पाप हो जाती है । यही िसथित भूरा की हो गई थी। उसे शिि िमली
है तो वह कमली से पाप हुई है ।अनयथा अब तक वह घर मे ही पड़ा सोचता रहता िक कया िकया जाय।वह तो कमली
की समझदारी कहो िक उसे सूझा चौिरी से एक बैल काम करने के िलए कुछ िदन के िलए मांग िलया जाय।भूरा ने
ऐसा ही िकया।चौिरी कमलिसंह ने िबना िकसी बहस के पे््रम और िवशास के साथ भूरा को एक बैल दे िदया। भूरा
को कमली की इस समझदारी पर नाज़ हो आया । कमली की सलाह पर उसके पिरणाम भी सुखद िनकले ।
कमली और भूरा खेत मे पड़े एक वक
ृ को हिाने मे लगे थे।िपछली रात भारी तूफान से कुछ पेड़
उखड़ गए थे।एक बड़ा भारी पेड़ भूरा के खेत का भी उखड़ गया था।अभी दोनो पेड़ को हिाने का पयास कर ही रहे थे िक
चौिरी कमलिसंह का उिर कहीं से आना हुआ। भूरा ने उनहे दरू से आते हुए दे ख िलया।वह झिपि दौड़ा।
`` राम, राम चौिरी काका। हमे ही बुलवा िलया हो्ेता ।``
`` नहीं , नहीं.......इस बहाने इस ओर भी मुझे आना ही था...................कांजी हाउस मे कुछ पशु
बनद िकए गए है । खबर िमली है िक सारे पशु रात मे नदी िकनारे वाले बगीचे मे चर रहे थे।तू जाकर दे ख आ।शायद तेरा
बैल िमल जाएगा ।``
`` ठीक है काका ! मै जाता हूँ।``
`` ये दस
ू रा बैल िकसका है षोषो पहचाना सा लग रहा है ।``
``ये बैल तो आपका ही है मािलक । कल आपने गोठान से बुलवा िदया।उसी से ही काम हो रहा है ।``
```` अचछा. नीलमिसंह ने िदया होगा ।अब तू कांजी हाउस जाकर दे ख आ ।``
`` ठीक है काका ।मै अभी जाता हूँ।``
इतना कहते हुए चौिरी कमलिसंह वहाँ से चल िदए । भूरा को तसलली हुई और आशा जगी ,संभवत: उसका एक बैल
कांजी हाउस मे होगा।यिद ऐसा हो तो उसकी सारी िचनताएं दरू हो जाएगी । उसे दस
ू रा बैल खरीदना नहीं पड़े गा ।
`` हिर की अममा ! कांजी हाउस मे अपना बैल िमल गया तो दस
ू रा खरीदना ही नहीं पड़े गा।``
`` हाँ..बात तो तुम ठीक कह रहे हो। वह तो चौिरी काका है इसिलए हमको कुछ तो सहारा िमल ही
जाता है । नहीं, कौन िकसके िलए इतनी दरू आकर खेत मे बताता ....अचछा, तुम पहलेकांजी हास मे जाकर दे ख आओ।
िफर चौिरी काका के यहाँ खबर करना होगा ।``
`` तू ठीक कहती है ।्ं जाकर दे ख आता हूँ।``
भूरा ततकण ही कांजी हाउस की ओर चल पड़ा। उसे पूरा िवशास है िक उसका गुम हुआ बैल कांजी हाउस मे
िमल जाएगा । एक ओर तो उसके अनतमन
म मे िवशास जाग रहा था िक कांजी हाउस मे बैल होगा। दस
ू री ओर उसके
मन मे तरह-तरह की आशंकाएं उठ रही िक यिद कांजी हाउस मे बैल नहीं िमला तो षोषो........शंका और कुशंकाओं के
उिेड़-बुन मे वह कांजी हाउस जा पहुँचा । बाहर बहुत भीड़ लगी हुई थी। गाम पंचायत के सदसय और कमच
म ारी िलखा-
पढ़ी कर रहे थे।
कांजी हाउस मे गाय,बैल,भैस,बकरी ,घोड़े और अनय पशु बंिे हुए थे।कोई चारा खा रहा है ।कोई पानी पी रहा
है ।कोई जुगली कर रहा है ।गामीण अपने-अपने पशु को पहचानने का पयास कर रहे है ।कोई अपना पशु पहचानकर ले
जाता है । भूरा भी अपने बैल को पहचानने मे लगा है ।उसका बैल तो उसे दे खकर ही `` माँ`` कह कर पुकारता है । लेिकन
यहॉं तो उसे कोई भी बैल ऐसा िदखाई नहीं िदया।वह चुपचाप बाहर िनकल आया । िजनके पशु िमल रहे है ,वे गाम
पंचायत के सदसय को जुमान
म ा भुगतान करते है और अपना पशु ले जाते है ।
`` यह भैस मेरी है ।`` एक गामीण बोला
`` ठीक है , जुमान
म ा भरो और ले जाओ अपनी भैस ...``
`` इसमे तो मेरी गाय िदखाई नहीं दे ती ।``
दस
ू रा गामीण उदास होकर बोल पड़ा ।
`` हिरराम जी! मेरा बैल तो िदखाई नहीं दे रहा ।``
भूरा ने मायूसी के साथ कहा ।
`` तो नहीं होगा। तुमने भीतर दे ख िलया होगा ।``
`` हाँ हाँ दे ख िलया । वह तो मुझे दे खकर ही आवाज़ लगाता था ।``
`` तुमने ठीक से दे खा कांजी हाउस मे । दस-बीस बैल तो रोज़ आते है । दे ख लो।``
`` नहीं है हिरराम जी । ऐसे कैसे हो सकता । कुछ िदन पहले मेरा बैल चोरी हो गया था अभी कोई
सुराग नहीं िमल पा रहा है ।``
`` रपि िलखवाओ जाकर ।``
`` चौिरी जी को रपि की थी।``
`` तो िमल ही जाएगा कभी न कभी ।तुम कयो िचनता करते हो। चौिरी जी िजममेदार वयिि है और
उनकी पहचान दरू-दरू तक है ।``
`` कह तो तुम ठीक रहे हो।लेिकन चौिरी बैल तो लाकर नहीं दे सकते।``
`` सब कुछ हो सकता है । ज़रा और अििक ज़ोर आजमाईश कर के दे खो।``
`` मुझे पहले चौिरी काका के पास जाना होगा ।वे ही कुछ न कुछ रासता जरर िनकालेगे।``
भूरा िनरीह नज़रो से एक बार कांजी हाउस के भीतर झांक कर दे खता है ।उसे लग रहा है जैसे उसका बैल इसी कांजी
हाउस मे है । यिद बैल कांजी हाउस मे होता तो उसे अवशय िमल जाता।बैल उसे पहचानता है ।उसे ``माँ`` कह कर
आवाज़ दे ता है । िफर ऐसे कैसे हो सकता है िक उसे बैल न पहचाने।सभी पशु एक जैसे तो होते नहीं है ।जो उसे पहचानने
मे भूल हो रही हो। उसने एक बार िफर भीतर झांक कर दे गा और चलता बना ।
0

`` आ गए जी ।``
``आ गया हूँ और हाँ,कांजी हाउस भी गया था लेिकन खाली हाथ......``
कुछ उदास होकर भूरा ने अपना गमछा रससी पर डाल िदया। पानी से हाथ-मुँह िोया।गमछे से पोछा और खाि पर लेि
गया ।
`` कुछ पशु रात को नदी िकनारे वाले बगीचे मे चरते हुए पाये गय थे। उनहे कांजी हाउस मे बनद कर
िदया गया है । कांजी हाउस गया था।िनरास होना पड़ा...बुआई का बखत भी पास आ रहा है ।``
`` अपना बैल खुल नहीं गया था,चोरी हो गया है । खुल गया होता तो कहीं जाता नहीं और अगर
जाता भी तो कांजी हाउस मे िमल जी जाता ।``
`` हम कैसे कह सकते है िक चोरी हो गया षोषो``
`` अचछा,चौिरी काका का बैल तो लौिा दो।कहीं ऐसा न हो िक लेने के दे ने पड़ जाय ।``
`` तुम ठीक कह रही हो.....आज ही बैल वापस करता हूँ.............महाजन के पास जाना होगा।``
`` महाजन का नाम सुनते ही मेरा कलेजा मुँह मे आने लगता है ।``
`` कुछ तो करना होगा ।``
`` जो भी करो । खूब सोच समझकर करो।महाजन अचछा आदमी नहीं है ।उसकी िनयत मे खोि है ।
सूदखोर है वो।उसे केवल रपया िदखता है िकसी का द ु:ख-ददम नहीं।``
दस
ू रे िदन भूरा,चौिरी कमलिसंह का बैल वापस करने चला गया । उसे दे खते ही चौिरी ने आवाज़ दे कर बुला
िलया । उसके चेहरे पर छाई उदासी दे खकर बोले,
`` अरे भूरा , इतने जलदी सारा काम िनपिा िलया षोषो राज़ी-खुशी तो है न सब कुछ !``
भूरा कुछ कह नहीं पाया । बैल को नीलमिसंह के हवाले करके सीिे चौिरी के पास आ गदम न लिकाए खड़ा हो गया ।
जवाब न पाकर चौिरी ने िफर पूछा,
`` कया बात है भूरा ! आज तुम िफर इतने उदास हो गए हो। अरे भाई ! यिद काम पूरा न हुआ हो तो
कुछ िदन के िलए बैल अपने ही पास रख लो।काम पूरा हो जाने पर लौिा दे ते ।जा...जा..बैल को ले जा ।``
`` नहीं मािलक ! आगे की िकसने दे खी । कहीं ऐसा न हो िक आपका यह बैल भी मेरे आंगन से चोरी
करके कोई ले जाए।ऐसा हो गया तो मै कहीं का नहीं रहूँगा ।इसीिलए बहुत सोच समझकर मैने और मेरी घरवाली ने
यह िनणय
म िलया है ।``
`` कहते तो तुम िबलकुल सही हो लेिकन भूरा एक बैल से खेती-बाड़ी का काम चल नहीं सकता।तू
तो जानता है न .....िकसान के पास बैलो का होना बहुत जररी है । बैल ही तो िकसान की शिि होते है ।``
`` मािलक ! मै कुछ और कर लूँगा । बैल होना बहुत जररी है ।कोई न कोई वयवसथा करनी ही पड़े गी
। नहीं,खिलहानी पर कया करँगा ।``
`` बात तो समझदारी की करते हो भूरा । खैर, जैसी तेरी मरजी ।मुझसे जो भी कुछ बनेगा मै तेरे
िलए आिी रात के िलए भी तैयार हूँ। तू जो कहे वह हो ही जाएगा ।``
`` अचछा , चलता हूँ मािलक....``
`` अचछा , जा । और हाँ,चोरी गए बैल की खोजबीन करते रहना ।मै भी कमी नहीं रखूँगा।मुझेजैसे
ही तेरे बैल का पता चलेगा मै तुझे खबर कर द्
ू ूँगा ।``
`` अचछा मािलक! जय शी कृ षण !``
`` जय शी कृ षण.........कोई खबर हो तो नीलमिसंह को कह दे ना । मुझको खबर िमल जाएगी।``
चौिरी कमलिसंह ने सानतवना दे ते हुए भूरा को खमझाया और उसकी हौसला-अफजाई की।भूरा हाथ जोड़कर पणाम
िकया और वहाँ से चल िदया ।बड़े वो होते है जो सवश
म ििसमपनन होने के बाद भी उदार पकृ ित के होते है । उदार वयिि
कभी भी अपने िन पर अिभमान नहीं करता । वह अपने साथ सारे जग की भलाई की सोचता है । कहा गया है िक िवदा
वहीं शोभयमान होती है जहाँ िवनय और िवनमता होती है ।ठीक इसी तरह लकमी भी वहीं िनवास करती है जहाँ उदारता
और समझदारी होती है । दोनो के िलए वयिि को िवनयशील , पजावान और िैयव
म ान होना बहुत लाजमी है ।अनयथा न
तो लकमी और न िवदा कहीं कर पाती है ।वह उनही्े गुणी जनो को चुनती है जो उनहे उपरोि गुणो से युि पितभािसत
होता है । चौिरी कमलिसंह मे ये सारे गुण िवदमान होने के कारण ही उनके पास लकमीजी का िनवास है । वैसे तो उनके
दामाद िरमदास चौिरी जो महाजनी का वयवसाय करते है उनके पास भी लकमी का िनवास है िकनतु उनमे इतनी
अििक कृ पणता है िक वे लकमी को अििक से अििक लिजजत करते रहते है । गाँव-समाज मे िजतना मान-सममान
चौिरी कमलिसंह का है उतना िरमदास िससौिदयाउफम िरमदास महाजन का नहीं है ।भले ही िरमदास महाजन के
पास िन-सममित है । आिखर है तो वे कृ पण ही । उनहे दे खते ही वयिि के हदय मे रोष और कोि आने लगता है ।
उनको पणाम - नमसकार की तो बात दरू उनहे दे खते ही गाँव-समाज के लोग रासता बदल कर चल दे ते है ।भला ऐसी
समपित िकस काम की िजससे अपने-पराये अपने से दरू-दरू भागे ।
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पती चाहे कोई भी हो ,वह यिद पित के पित समिपत


म है तो चाहे पित कैसा भी हो उसके िलए सब
कुछ होता है । पती,पित के सारे अपरािो का बोि रखते हुए उसे सनमागम पर चलने के िलए पे््रिरत करती है ।पित को
नि होने से बचा लेती है ।यिद पित नहीं मानता है तो घर-पिरवार तो बना रहे गा िकनतु पित वयििगततौर पर हािन को
पाप होता है िकनतु घर-पिरवार को अििक कित नहीं पहुँचती।पित यिद कदाचारी भी हो तो भी पती घर-पिरवार को
बचाये रखने मे कोई कमी नहीं रखती।पती घर का आिार है । पती यानी नारी।नारी घर-पिरवार,समाज की रीढ़ है ।
िजस तरह से िकसी भवन की नींद होती है ,उसी तरह घर-पिरवार की नींव भी होती है और नारी को घर-पिरवार की
नींव कहा जा सकता है । वह िू िते को बचाती है ।बचाकर संवारती है और संवारकर सजाती है । माना जाता है िक पित
घर की अपेका बाहर का अििक होता है ।इसिलए वह घर मे कम ही धयान दे पाता है ।उसका धयान अििक से अििक
घर के बाहर होता है ।ऐसे मे वह गलती कर बैठता है ।उसे जात नहीं होता िक वह वासतव मे गलती कर रहा है ।ऐसे मे
घर-पिरवार की नारी या पती वह काम कर िदखाती है िजससे घर-पिरवार पर अनुकूल पभाव पड़े और घर-पिरवार
सुरिकत रहे ।
कहा गया है िक यिद पित भिक जाय तो घर-पिरवार को उतनी कित नहीं पहुँचती िजतनी होनी होती है ।
बहुत से पुरषो को भिकते हुए दे खा है । वे पथभि भी हो जाते है ।घर-पिरवार को कित पहुँच भी जाती है तो भी उनहे
इसका जान नहीं होता।ऐसी िसथित मे पती या नारी ही घर-पिरवार को बचाकर सलती है ।लेिकन यिद पती भिक जाय
तो घर-पिरवार पूरी तरह से नि हो जाता है ।कुछ भी नहीं बचता । इसिलए पती का िनषावान होना बहुत जररी है ।
ऐसी ही िनषावान िपतयो मे इनदावती का नाम िगना जाता है । वह अपने घर-पिरवार और पित के पित
जवाबदे ह है । वह आये िदन पित को मागद
म शन
म करती रहती । गलत राह पर चल रहे पित को सही िदशा िदखाने की
कोिशश करती। वह चाहती है िक उसका पित ईमानदारी,मानवीयता और सदाचार बनाएं रखे।दस
ू रो के हक को
हड़पतने की कोिशश न करे ।िकसी भी िनिन
म को वह परे शान न करे ।गरीब से गरीब इनसान के पित भी हदय मे
दयाभाव और सेवा भाव बनाए रखे। वह रात िदन इसी िचनता मे लगी रहती है िक उसका पित कभी ऐसा कोई कायम न
करे िजससे िकसी का हदय आहत न हो। वह सुबह से शाम तक यहाँ तक िक अपने पित िरमदास िससौिदया उफम
िरमदास महाजन को समझाने की पूरी कोिशश करती रहती है । बावजूद इसके उसका पित अपनी आदतो से बाज नहीं
आते। इनदावती के समझाने पर वे हाँ हूँ तो कर दे ते है िकनतु उसके बताये मागम पर चलने के िलए तैयार नहीं होते।
कोई भूला-भिका िनिन
म या जररतमनद के आने पर वे इनदावती की सारी िहदायते भूल जाते है । वे वही काम करने
लग जाते जो उनको करना होता है । जो उनको अचछा लगता है । या जो उनको रिचकर लगता है । वे उस समय
इनसािनयत की सारी हदे तोड़ दे ते है ।
वैसे तो िरमदास महाजन अलसुबह िबसतर तयाग दे ते है । िनतयिकया से िनवत
ृ होकर दो
घणिे तक पूजा-पाठ,आरती और लकमी चालीसा पाठ करने मे लगाते रहते है । उसके बाद ही वे बतौर नासते के कुछ
गहण करने बैठ जाते है ।नासते मे वे खीर,पुड़ी,साग,दि
ू ,सूखे मेवे और ताजे फल होना िनहायत जररी है ।नासता करते
वि इनदावती गामीण पंखे से हवा दे रही होती है । इस वि वे यह नहीं दे खते या सुनते िक उनहे कोई िमलने आया है ।
कोई जररत मनद आया है । उनका कोई सहदय आया है । कोई सममािनत वयिि आया है ।इससे उनको कोई लेन-दे न
नहीं है । वे तो बस केवल अपना ही अपना िसद करने मे जुड़ रहते है । उनका यह उसूल है दिुनया जाये भाड़ मे हम तो
अपने रासते चले।
अब दे िखए न !......िदन जयादा ऊपर नहीं चढ़ा था।िरमदास महाजन नासता पानी करके अपनी
बैठक मे िवराजमान थे। दो-चार जररतमनद और आसामी उनको इदम -िगदम बैठे थे।वे सारे आशा भरी िनहाग से उनको
िनहार रहे थे।इसिलए िक उनहे कुछ न कुछ जररत आ पड़ी है । कोई ऋण लेने आया है । कोई बयाज दे ने आया है । कोई
उिारी चुकाने आया है ।कोई िगरवी रखने आया है ।शीमान िरमदास महाजन अपनी पगड़ी संभाले,आँखो पर ऐनक
लगाएं कभी बही खाते को दे खते है तो कभी आसािमयो को दे खते है । हिरिकशन की ओर दे खते हुए बोले-
`` अरे भई ,तुमने तो अब तक पूरा बयाज ही नहीं चुकाया है , मूल की बात तो बहुत दरू की है ।ऐसे मे
भला हम तुमको िफर से और अििक ऋण कैसे दे सकतेहै।पहले का चुकाओ िफर बातकरो दम
ु दबाकर।``
`` मािलक ! मेरी बेिी बहुत बीमार है । उसे असपताल िदखाने के िलए शहर ले जाना है ।वहाँ भी तो
इलाज और दवा-दार के िलए रपयो की जररत होगी।यिद उसका इलाज नहीं हुआ तो बहुत मर जाएगी।``
`` दे ख भई, हिरिकशन ! पुराना चुकाये िबना मै और अििक उिार तो नहीं दे सकता। हाँ, तेरे पास
मकान है उसे िगरवी रख दे और ले जा िजतना चाहे उतना दम
ु दबाकर।``
`` मािलक ! मेरे पास एक मकान ही तो है और उसके अलावा है भी कया षोषो अगर मकान िगरवी
रख िदया तो हम लोग रहे गे कहाँ षोषो``
`` दे ख हिरिकशन ! मकान िगरवी रखे िबना कोई तुझको उिार कैसे दे गा ।रही तुम लोगो को रहने
की परे शानी तो जब तक मकान का पूरा रपया चुकता नहीं कर लेता तब तक उसी मे रह लेिकन िमयाद पूरी हो जाने
पर मकान कुकम हो जाएगा । बोल कया कहता है दम
ु दबाकर ...``
`` हुजूर ऐसा न करो। मेरी बेिी का इलाज हो जाए तो मै मेहनत करके तुमहारा सारा िरन चुकता
कर दँग
ू ा।चाहे तो कोरे कागज पर अंगठ
ू ा लगवा लो।``
`` हाँ, अब आया न रासते पर दम
ु दबाकर । हाँ , जा मकान के कागजात ले आ जलदी से दम
ु दबाकर
।``
`` मै साथ मे ही लाया हूँ हु्ुजूर.....``
और िरमदास महाजन ,हिरिकशन से मकान के कागजात लेते है । अनपढ़-िनरकर हिरिकशन अपने अंगठ
ू े का िनशान
महाजन के बहीखाते मे कोरे कागज पर लगा दे ता है । महाजन मुसकरते हुए बोले-
`` समझदारो को जयादा समझाना नहीं पड़ता । बस ,परे शानी तो वहाँ होती है जहाँ कोई समझने
को तैयार नहीं हो और अनतत: हमे कुकीZ का कायव
म ाही करनी पड़ती । हिरिकशन सही मे बहुत ही समझदार है दम

दबाकर.....अचछा हिरिकशन ये लो दो सौ रपये...``
``लेिकन मािलक यह तो बहुत कम है ।``
`` अरे भाई , पहले की उिारी िमलाकर तुझ पर डे ढ़ हज़ार रपये हो रहे थे।बयाज िमलाकर यूँ तुझ
पर ढ़ाई हज़ार हो गए।इसमे से जो कुछ बचा है उसे ही तो दे रहा हूँ। इससे जयादा तुझे कैसे दे सकता । ले जा अपनी
बेिी का इलाज कराने के िलए मै ये रपये तुझे अपनी ओर से दे रहा हूँ। जा जलदी जा दम
ु दबाकर....``
`` मािलक ! ये ता िनयाब नहीं हुआ।कुछ और दे दे ते तो मेरी बेिी के इलाज के िलए सुिविा हो
जाती।``
` तो तू मुझे िनयाब िसखाने आया है ।नहीं ,सारी रकम चुकाकर तुझ पर दो सौ और अििक िनकलता है । तेरी बेिी की
बीमारी के िलए दे रहा हूँ। ले ले चुपचाप दम
ु दबाकर जा...जा.अब जा यहाँ से दम
ु दबाकर जा...``
हिरिकशन जयादा इतराज़ िकये बग़ैर िववशता मे चला गया । इतनी कम रािश मे बेिी का इलाज कैसे संभव हो
पाएगा।यह उसके िलए दिुविा उतपनन हो गई।
अब तक बैठक के एक कोने मे बैठे भूरा यह सारा दशय दे ख रहे थे। उनहोने आज दब
ु ारा महाजन का
यह कुरप रप दे खा।वे सहम गए ।उनका हदय ज़ोरो से कांपने लगा। इस तरह के है वान के सामने उसे हाथ फैलाने का
यह पहला अवसर आया है । नहीं तो वे कयो आते िरमदास महाजन के इस िवकृ त दरबार मे जहाँ ईमानदारी और
इनसािनयत नाम की कोई वसतु है ही नहीं।दया तो उसमे कतई िदखाई नहीं दे ती।ऐसे वयिि के सामने िगड़िगड़ाना
भूरा ने कभी सीखा नहीं था । आज यह अवसर आया दे ख उसके रोम-रोम कांपने लगे।उसे यह नहीं समझ आ रहा ,ऐसे
समय मे कया िकया जाय । यिद वह उिार नहीं लेता तो दस
ू रा बैल कहाँ से खरीदा जाएगा । बैल खरीदने के िलए गाँठ
मे रकम तो चािहए ही अनयथा कोई मुफत मे कैसे दे गा।वैसे तो चौिरी कमलिसंह ने उसे अपना एक बैल काम चलाने
के िलए दे िदया था िकनतु इस भय के कारण िक कहीं ऐसा न हो िक उनका यह बैल भी कोई चोरी कर ले जाए।यह
सोचकर भूरा ने चौिरी कमलिसंह का बैल सादर लौिा िदया था।चौिरी कमलिसंह ने आशासन भी िदया था िक जब भी
जररत पड़े आिी रात को तैयार रहूँगा।बावजूद भूरा,चौिरी कमलिसंह से संकोचवश कुछ नहीं कह पा रहे थे। उनका
संकोच लाजमी है कयोिक यिद कोई सजजन पुरष सवयं ही आकर सहायता करने के िलए ततपर हो जाए तो यह उिचत
नहीं जान पड़ता िक उसका अपमान करे या सहज़ रप से उनको इनकार कर दे । िकनतु इसका अथम यह नहीं िक
सजजनो की सहायता का दर
ु पयोग िकया जाय। भूरा को यही लग रहा था िक वह कहीं चौिरी कमलिसंह की
सजजनता का दर
ु पयोग तो नहीं कर रहा है । यही सोचकर वह िरमदास महाजन के पास ऋण लेने के उदे शय से आकर
चुपचाप बैठक के एक कोने मे बैठ गया।
िरमदास महाजन की नज़र बैठक के एक कोने मे बैठे भूरा पर पड़ी।वह अपने दोनो पैरो को घुिनो
सिहत मोड़ दोनो हाथो को सहे जे हुए बैठा था। वह िबलकुल खामौश और चुपचाप था। उसे दे ख िरमदास महाजन बोले-
`` अरे भूरा ! तू कम आया दम
ु दबाकर षोषो``
`` बस , अभी आया ही हूँ .....``
भूरा के सवर मे उदासी झलक रही थी। उसका उदास और उतरा हुआ चेहरा दे ख महाजन बोले-
`` कया बात है भूरा ! आज तू इतना उदास कयो है दम
ु दबाकर षोषो``
मािलक ! तुमसे कुछ काम आ पड़ा है षोषो``
`` तो इसमे्े इतना उदास होने की कया बात है । जो काम है उसे बात दे दम
ु दबाकर ..मुझसे जो
कुछ भी बन पड़े गा तेरे िलए करं्ँगा ।``
`` मािलक ...कैसे कहँ .....मुझको तो बहुत संकोच होता है । िकस मुँह से कहूँ।इसके पहले कभी ऐसा
मौका नहीं आया िक आज आपको सामने कुछ काम करने के िलए कह दँ।ू ``
`` नही...नहीं भूरा....जो कुछ भी कहना हो.....िन:संकोच कह दे दम
ु दबाकर.....िरमदास सदै व
अपने िमतो और दीन-द ु:िखयो की सेवा के िलए तैयार रहता है । तू कह तो सही दम
ु दबाकर िहममत के
साथ...कह...कह...``
`` िनरास होना पड़ा तो कैसे कहूँ षोषो कहीं ऐसा न हो िक तुम इनकार कर दो और मुझे भी वदे ष हो
जाए षोषो``
`` अरे नहीं भूरा ! कभी ऐसा नहीं िकया आज तक िरमदास महाजन ने ...मेरे घर के दरवाज़े सभी
के िलए खुले है । तू आिी रात के बाद भी मुझको जगाएगा तो मै तेरे िलए ततपर हूँ । बस तू षोषोज़रा सा इक इशारा कर
के तो दे ख दम
ु दबाकर । ``
`` ऐसी बात है तो मािलक मै िहममत करता हूँ..............आप िनराश तो नहीं करे गे।``
`` नहीं ...कह जलदी कह दम
ु दबाकर मुझे और भी बहुत से काम है ।चल बात..``
`` आप को तो पता ही होगा िक मेरा एक बैल चोरी हो गया ।``
`` तो थाने जाकर रपि कर आ जा मै दे ख लूँगा।``
`` नहीं ऐसी बात नहीं है । ``
`` तो िफर बात कया है षोषो``
`` मुझे एक बैल चािहए । मेरे पास एक ही बैल है । यिद आपकी कृ पा हो जाए तो एक बैल िमल
सकता हूँ।``
`` लेिकन मेरे पास बैल तो नहीं है । हाँ वयवसथा करवा सकता हूँ।``
`` मेरा मतलब....यह िक यिद आप मुझे एक बैल खरीदने के िलए कुछ रपये उिार दे दे तो मै एक
बैल खरीद सकता हूँ। खिलहानी के समय तुमहारा सारा िहसाब चुकता कर दँग
ू ा।``
`` दे ख भई भूरा ! तुझको पता है न मै लेन-दे र के वयापार मे िरशतेदारी बीच मे नहीं लाता।हाँ, तुझे उिार चािहए ले जा
िकनतु खिलहानी को िबना िकसी वयविान के चुका दे गा तो दे दे ता हूँ बोल, दम
ु दबाकर....कया कहना है षोषो``
`` यही तो मै कह रहा हूँ िक खिलहानी पर तुमहारी उिारी चुकता कर दँग
ू ा।``
`` ठीक है । िकतना चािहए तुझको दम
ु दबाकर षोषो``
`` केवल दो सौ रपये...इससे अििक नहीं ।``
`` लेिकन तेरा बैल तो अििक से अििक सौ सवा सौ मे आ जाएगा ।इतना लेकर कया करे गाषोषो``
`` मािलक, हिर को भी तो पाठशाला मे दािखला िदलवाना है । इतना तो लगेगा ही न ..``
`` यह तो तू जान....लेिकन खिलहानी पर चुकाना नहीं भूलना ।``
`` नहीं भूलँगा ।``
इस तरह पूरी बातचीत के बाद िरमदास महाजन ने भूरा को दो सौ रपये तो दे दी िदए लेिकन साथ ही कोरे बहीखाते
पर उसका अंगूठा भी लगवा िलया ।
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आंगन मे नया बैल आने की खुशी मे कमली ने बैल के पैरो पर लोिे से पानी डाला, ििका
लगाया,आिे की लोई मे गुड़ िमलाकर िखलाया और आरती उतारी । हिर उछल-उछल कर नाचने लगा।भूरा के मुख पर
तो पसननता छा गई। इतना ही नहीं नये बैल के आते ही पहले से आंगन मे बंिे बैल ने नये बैल को `` माँ `` की आवाज़
के साथ सवागत िकया । उसने ज़ोरो से िसर िहलाया ।जैसे जता रहा हो ,अब मै अकेला नहीं हूँ,मेरा एक नया साथी आ
गया । िजस तरह मनुषय अपनी पसननता शबदो मे वयि कर खुशी मनाते है उसी तरह पशु भी हुंकारा लगाकर या
उछल-उछल कर अपनी पसननता वयि करते है । यही िसथित आज भूरा के पुराने बैल की थी । नया बैल बार-बार नये
आंगन, नये मािलक, नये लोग और साथ के नये बैल को बार-बार िसर घुमा-घुमाकर दे खता रहा है । जैसे वह सबको
पहचानने की कोिशश कर रहा हो। यह भी हो सकता है िक नया बैल नये लोगो से िमतता करना चाह रहा हो लेिकन
उसके पास शबद नहीं है । वह िनरीह आँखो से सबकी ओर दे खता है और चारा खाने लगता है ।
दो-चार िदन तक नया बैल इसी तरह करता रहा । नये सथान पर उसे सथािपत होने मे सपाह भर
का समय लग गया । उसके बाद वह सभी मे घुल िमल गया।
खेती-बाड़ी का काम पुन: चालू हो गया । खेत मे हल चालू हो गया । कचरा ,खलपतवार और िू िे हुए
पेड़-पौिो को खेत से िनकालने मे भूरा को सपाह भर से अििक समय लग गया । आगामी खिलहानी की तैयारी करना
अब उसके िलए आसान हो गया । वह बड़ी मुसतैदी से काम मे जुि गया । अब उसे न केवल घर-पिरवार के िलए काम
करना है बिलक उसने िरमदास महाजन से बैल खरीदने और हिर को शाला मे दािखला करवाने के िलए जो ऋण िलया
है उसे चुकता भी करना बहुत ही िनहायत जररी है । इस उदे शय को लेकर वह पूणत
म : सचेत है ।वह जानता है िक
िरमदास महाजन का नाम भले ही िरमदास है लेिकन उसके पास िरम नाम की चीज नहीं है वह पूणत
म : अिमी है ।
वह उसे कचचा चबाकर खा जाएगा ।
हिर को शाला मे दाखला करवाने का उसका काम भी पूरा हो गया । खेत बुआई के िलए तैयार हो
गया है । बुआई का समय भी आ गया है । गाम पंचायत से वह बुआई के िलए बीज भी ले आया । अब की बार उसे पूरी
उममीद है िक सब कुछ अचछा होगा ।
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दो बरस पहले से मैकू और भूरा गाँव-समाज मे शेर का भेस बनाकर सारे गाँव मे नाच-नाचकर
िखचड़ा मांगते रहे है और िमनदर मे भी शेर के नाच का आयोजन कर सबको िखचड़ा बनाकर िखलाते रहे है ।इस बरस
भी दोनो ने बुआई के पहले िखचड़े का आयोजन िकया । दोनो ने सुबह से ही शेर बनने के िलए जांिघया पहना और सारे
बदन पर रं ग-रोगन करने लगे।गाँव-समाज के लोग िमनदर पांगण मे आकर दोनो को शेर बनते दे खने लगे। ढफली
बजानेवाले ने सुबह-सबेरे से ही ढफली बजाना पारं भ कर िदया था।गाँव-समाज के लोग ढफली की आवाज़ सुन िमनदर
पांगण मे एकत होने लगे। मैकू और भूरा के बदन पर लाल-पीली आड़ी-ितरछी पििटयो के िनशान बनाए गए।चेहरे को
पीला पोत िदया गया।भौहो के आसपास बड़ी-बड़ी आँखे उभारी गई। िसर पर ऐसी िोपी लगाई गई जो पीले और काले
रं ग की पिि््ियो से बनी हो और उसके दो कान बाहर िनकले हुए हो। कमर मे एक-एक पीले रं ग की लमबी पूँछ नुमा
बनाकर बांि दी गई।िजससे लगे िक यह शेर की पूँछ है । पलािसिक की लाल-लाल रं ग की लमबी सी जीभ बनाकर दोनो
के मुख मे लगा दी गई। अब दोनो पूरी तरह से शेर बन गए। बचचो और युवको ने ज़ोरदार ताली बजाई।ढफला अब
तेजी से बजने लगा।जयो-जयो ढफला बजते जाता तयो-तयो मैकू और भूरा का अंग-अंग थरथरा जाता।उनके बदन मे
शेर की सवारी आ जाती।दोनो को तािबज पहनाया गया और एक-एक पान का बीड़ा मुख मे रखा गया।मैकू की पती
रकमणी और भूरा की पती कमली आरती ले आई और दोनो की आरती उतारी।िमनदर मे दीपक जलाया गया। मैकू की
पती रकमणी बोली-
`` तुम दोनो की जोड़ी सलामत रहे ।``
मैकू ,कमली से बोला-
``भाभी ! सबसे पहले आप अपने घर से िखचड़ा दो।``
`` दे वर जी! िखचड़ा अपने घर से नहीं....गाँव मे मांगा जाता है ।
`` दे भी दो।मै मैकू के घर से िखचड़ा मांग लूँगा।``भूरा तपाक से बोल पड़ा।
``तुम कहते हो तो दे दे ती हूँ्ं।``
कमली थाली मे गेहूँ...चना...चावल िमलाकर मैकू की झोली मे डाल दे ती है ।
मैकू की झोली मे िखचड़ा पड़ते ही गोपाल ने ढफला तेज़ी से बजाना चालू कर िदया। ढफला बजते ही दोनो शेरो की
सवारी गाँव की ओर चल पड़ी।
ढफला बजते जाता।शेर बने मैकू और भूरा ढफले की थाप पर नाचते जाते।गाँव भरके युवक-बचचे दोनो के पीछे -पीछे
चल पड़े ।सारे गाँव मे खबर फैल गई।लोग घरो से िनकल-िनकलकर दोनो का नाच दे खने लगे। गाँव के मुखय चौराहे
पर भीड़ एकत हो गई। चौिरी कमलिसंह और बहुत से िदिगजगण नाच दे खने चौराहे पर आ खड़े हो गए। दो
घणिे तक शेरो का नाच होते रहा ।मैकू और भूरा को होश ही नहीं िक वे कया कर रहे है । वे कभी शेर की दहाड़ मारते है ।
कभी बहुत ऊँची छलांग लगाते है ।जमीन पर शेर जैसे तेजी से गोल घेरे मे दौड़ते है । कभी-कभी कुलांिियाँ लेते है ।
कूदते है ।उछलते है ।पेड़ पर चढ़ जाते है । कभी-कभी भगत जैसे झूमने लगते है । लमबी-लमबी जीभ िनकालते है । बड़ी-
बड़ी लाला-लाल आँखे ततेर जाती है ।ढफले की थाप जयो-जयो तेज होती जाती तयो-तयो दोनो के नाच की गित बढ़ती
जाती।
जब चौिरी ने दे खा िक दो घणिे बहुत हो गए तब उनहोने चौिराइन को िखचड़ा लाने का संकेत िदया।
चौिराइन तुरनत ही िखचड़ा ,आरती,अगरबती और पान की बीड़ा ले आई। ढफले की गित िीमी हो गई ।शेर का नाच
भी िीमा हो गया।चौिराइन थाली मे आरती और अगरबती जला ले आई।दोनो की आरती उतारी।दोनो के मुख मे पान
का बीड़ा रखा। दोनो ने झुककर चौिराइन को पणाम िकया। गोपाल ढफला बजाते हुए आगे की बढ़ गया।उसके आगे
बढ़ते ही शेर भी उसके पीछे -पीछे नाचते हुए िीमी गित से बढ़ चले।दशक
म ो की भीड़ उनके पीछे चल पड़ी। दोनो नाचते-
बजाते हुए आगे बढ़ने लगते।नाचते-नाचते दोनो शेर िरमदास महाजन के घर के सामने जा रके।गोपाल ढफली और
ज़ोरो से बजाने लगा। ढफली की आवाज़ सुन िरमदास बाहर िनकल आए।दोनो को दे खते ही बोल पड़े -
`` लो आ गए नकली शेर दम
ु दबाकर ।``
ढफले की आवाज़ मे िकसी ने भी िरमदास के शबद नहीं सुने।गोपाल ने ढफली पर तेज़ी से थाप मारी और दोनो शेर
तेजी से नाचने लगे। आिे घणिे तक िरमदास महाजन के घर के सामने दोनो नाचते रहे । नकली शेरो का नाच दे ख
िरमदासजी बहुत पसनन हो गए । बोले-
`` अचछा है ,जब कोई काम िंिा न हो तो कम से कम नकली शेर बजनकर जनता के सामने निो की तरह
नाचा करो। दो-चार िु कड़े तो िमल ही जाएंगे ,कयो गोपाल षोषो```
`` नहीं काका ! यह भीख नहीं मांग रहे । दर साल कर तरह यह करना पड़ता है । यह तो अपने-अपने पिरवार
की कोई मननत है िजसे करना पडता है । आप इसे गलत मत समझे।``गोपाल ने तुरनत ही जवाब िदया ।
`` अचछा भाई , जैसा तुम चाहो करो ।हमे कया । हमारे दरवाजे पर आ गए हो इसिलए जैसे और िभखािरयो
को दान िमलता है तुमहे भी िमल ही जागए्ा।``िरमदासजी ने वयंिय करते हुए कहा।
तब तक इनदावती िखचड़े की सामगी ले आई ।दोनो की आरती उतार पान का बीड़ा िखलाया । कचचा िखचड़ा िदया।
भूरा और मैकू नाचते बजाते आगे बढ़ गए ।
00
गाँव-समाज की िसथित थी वह बहुत ही िचनतनीय िसथित थी । दे श के नागिरक और िन:सवाथम नेता दे श के नाम के
िलए सवस
म व समपण
म करने के िलए तैयार थे ।उनहोने अपना बिलदान दे कर दे श को आज़ाद कराया है । लेिकन इस
आज़ादी का दर
ु पयोग वे लोग उठा रहे है जो शिि समपनन है और दे श तथा जनता पर राज करना चाहते है । अंगेज दे श
छोड़ चले गए है लेिकन सता लोलुप और सवाथम से सराबोर शिि समपनन लोगो को सीखा गए है िक दे श और जनता
पर कैसे राज़ िकया जाता है । शिि समपनन लोगो का एक ही सवाथम होता है , तुम दे श के िलए बिलदान हो जाओं और
हम दे श पर राज़ करे गे।
आज़ादी के बाद का मंज़र हमारे सामने सपि है । आज राजनेताओं की िसथित दे श के पितकूल है ।
आज िकसी भी राजनेता के घर-पिरवार का एक भी बेिा सरहद पर दे श की रका के िलए तैनात नहीं है ।िकसी भी
राजनेता ने अपने बेिे का बिलदान नहीं िदया है । वे अपने घर-पिरवार के िकसी भी सदसय का बिलदान दे श के िलए
नहीं करते।उनका मानना है ,वे और उनके घर-पिरवार के सदसय दे श और जनता पर राज़ करे गे और करते रहे गे।वे
अपने
घर-पिरवार के सदसयो का बिलदान कयो दे षोषो जब दे श की जनता के घर-पिरवार के सदसय दे श पर मर िमि रहे है
तो हम अपने घर-पिरवार के सदसयो को कयो मर-िमिने दे षोषो जहाँ दे खो वहाँ यही राग अलापा जा रहा है । ठीक यही
िसथित गाँव-समाज मे वयाप है ।
गाँव-समाज के युवको ने िमलकर `` राषीय एकता आनदोलन सिमित`` गठन िकया । इस संगठन
मे युवको ने गाँव-समाज के लोगो मे एकता और राषीय जागरकता लाने के िलए एक अचछा काम हाथो मे िलया है ।
दे श मे एकता की बहुत जररत है । जब तक एकता नहीं रहे गी तब तक आसान काम भी किठन लगेगा लेिकन एकता
होने पर किठन से किठन काम भी आसान हो जाता है । एकता मे बड़ी शिि है । वासतव मे एकता एक ऐसा संगठन है
िजसमे अपिरिमत शिि है । एकता का संगठन शििशाली होता है । एक-दो लकिड़यो को आसानी से तोड़ा जा सकता है ।
लेिकन यिद एक साथ कई लकिड़यो को िमलाकर तोड़े तो वह िू िती हीं नहीं है । बस यही एकता के संगठन की शिि है ।
गाँव मे नीलमिसंह, गोपाल और अनय गामीण युवक आए िदन गाँव मे बैठके आयोिजत कर िवचार-िवमशम करते है ।
इन बैठको मे कई मुदद्ो पर बातचीत होती है और िकसी किठनाई को हल करने के उपाय सोचे जाते है । आज भी एक
आपात बैठक आमंितत हुई है ।
``राषीय एकता आनदोलन सिमित`` के कायाल
म य के बाहर संगठन के कायक
म ताओ
म ं ने बेनर लगा
िदया है । कई गामीण युवक एक होकर िवचार-िवमशम मे तललीन है । नीलमिसंह अपने विवय दे रहे है ।
`` आज़ादी के पहले अंगेज सरकार ने एक भारतीय गामीण नागिरक से पूछा िक आप लोगो को
कौन सा फल अचछा लगता है तो एक गामीण भाई ने कहा ,`` हमको फूि नामका फल अचछा लगता है । तब अंगेज ने
कया कहा था षोषो आप मे से िकसी को मालूम है ।......नहीं.....नहीं न....तो सुनो....अंगेज अफसर ने कहा था तुम
भारतीय नागिरको मे एकता नहीं है ।तुम लोग फूि जयादा पसनद करते हो,इसिलए तुमहारा भारत दो सौ सालो तक
गुलाम रहा है । मेरा कहने का तातपयम ये है , अंगेज तो चले गए िकनतु अभी तक अंगेज की भारतीय औलादो ने अंगेजो
की आदते नहीं छोड़ी । अभी भी हममे एकता नहीं है । इसिलए हम लोग आपस मे लड़ते है और एक दस
ू रे को नीचा
िदखाने मे कमी नहीं रखते। इसिलए सािथयो हम एक हो और दे श के भीतर, गाँव के भीतर बसे दे श के गदारो का
पदाफ
म ाश करे ।``
बीच मे ही गोपाल नारे लगाने लगा -
`` हम सब ...एक है ....
हम सब.....एक है ..
नारे से पूरा गाँव गूँज उठा ।
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समपननता और वैभवता वयिि को अंिा बना दे ती है । वयिि यह नहीं दे खता िक वह इस नाशवान
माया का वसतुत:सवामी नहीं है ,लेिकन उसे अपनी समपननता पर अहं कार हो आता है । इसी अहं कार के कारण वह
अपने अलावा अनय सभी को तुचछ समझने लगता है । उसके हदय मे अहं कार की तुचछ भावना महारोग की तरह
अपना घर कर चुकी होती है । महारोग का इलाज इतने आसानी से नहीं होता । इसके िलए बहुत लमबे समय की पतीका
करनी होती है । िवश का कोई भी वयिि अहं कार के पिरणामो से मुि नहीं हो पाया है । तब सािारण मनुषय की कया
औकात षोषो अहं कार वयिि को िशखर से उठाकर िरा पर पिक दे ता है । एक िदन वह अवशय आता है और अहं कारी
को उसके अहं कार की सज़ा िमल जाती है । अहं कार वयिि के िवकास का अवरोिी है । वयिि के सामािजक और नैितक
िवकास के िलए अहं कार को ितलांजली दे ना बहुत ही जररत है । अहं कार का नासूर आिहसता-आिहसता वयिि को
भीतर ही भीतर से खोखला िकये रहता है ।एक िदन वह नासूर इतना बड़ा हो जाता है िक उसे नासूर का पता लगाना
किठन हो जाता है ।ऐसी िसथित मे नासूर के सूर को जड़ सिहत िनकाल फेकना पड़ता है ।
िरमदास महाजन िरती पर चलनेवाले वयिि नहीं है । वे सदै व आसमान पर चलना अपना अििकार समझते
है । सवयं के अितिरि अनय िकसी वयिि को वे अििकार दे ना नहीं चाहते ,जो हर वयिि का अपना अििकार होता है ।
गाँव-समाज मे नवयुवको वदारा पारं भ की गया `` राषीय एकता आनदोलन सिमित`` के वे सखत िखलाफ है । उनहे
लगा िक इससे उनके साहूकारी वयवसाय पर पितकूल पभाव पड़े गा। गामीण जनता सजग हो जाएगी और उनका
िवरोि कर सकती है । युवको ने गाँव-समाज को नई राह िदखाने के उद्ेदशय से जो कदम उठाया है वह उनके िलए
घातक हो सकता है । वे नहीं चाहते िक युवक ऐसा कोई कायम करे िजससे उनहे वयििगत हािन हो। वे सतत ् सचेत रहने
लगे। उनहे यह भी जात हो गया िक इस आनदोलन के पीछे उनके अगज चौिरी कमलिसंह की भी सहमित है । चौिरी
कमलिसंह की सहमित के िबना कोई युवक इतना साहस नहीं कर सकता । बावजूद इसके िरमदास महाजन
अनदरनी तौर पर िवरोि करने के िलए उतेिजत हो रहे है । उनहोने अपने अंगरकक िकशन को भेजकर मैकू को
बुलवाया । बोले-
`` हूँ.....राषीय एकता.....खाक् एकता ।िकतने आदमी थे वहाँ षोषो``
`` पाँच आदमी ।``
`` और पाँचो के पाँचो डरपोक !््``
`` नहीं सरकार! आपका साला नीलमिसंह और मैकू काका का छोकरा गोपाल भी था ।``
`` नीलमिसंह भी !``
`` हाँ सरकार !इसिलए तो हम कुछ न कर पाएं ।``
जब िरमदास ने नीलमिसंह का नाम सुना, वे कोई एतराज़ करने की िहममत नही कर सके । आिखर उनकी पती
इनदावती के भाई जो ठहरे । यिद जोर के भाई को छे ड़ा तो पिरणाम िवपरीत हो सकते है । कहा गया है िक यिद पती को
खुश रखना है तो उसके भाई की मननत-मनौती की जानी चािहए । इस कारण वे नीलमिसंह से िकसी तरह का िवरोि
नहीं कर सकते।यिद िवरोि िकया तो इनदावती के कोि का िशकार होना पड़े गा।इनदावती के िशकार का अथम यह भी हो
सकता है िक इनदावती उनके िवरोि मे आवाज़ उठा सकती है । सारा गाँव-समाज इनदावती का पक लेगा । पिरणाम
पितकूल हो सकते है । इसिलए समझदार वयिि को चािहए िक वे कभी भी पती के मायके के सदसयो का िवरोि न करे ।
इसमे ही उनहोने अपना बचाव िकया जाना उिचत समझा और बात बदलकर मैकू के बेिे गोपाल के िवषय को लेकर बैठ
गए। बोले-
`` ये बेवकूफ मैकू सुन ! कल से तेरा छोकरा गोपाल, नीलमिसंह के साथ नहीं िदखना चािहए।नहीं
तो जानते हो न तुमहारे रािेलाल दादा का कया हाल िकया था हमने षोषो``
`` जी हुजूर ! मै गोपाल को समझाऊँगा ।``
`` ठीक है अब तू जा.......और हाँ, यिद मुझे अब तेरे गोपाल की कोई िशकायत सुनाई दी तो..!``
`` नहीं...नहीं.....हुजूर.....ऐसा नहीं होगा ।``
`` ठीक है जा ््!``
`` जी हुजूर !``
`` तू ऐसा कर िकशन , जाकर गोपाल को बुलवा ले आ।``
`` जी हुजूर !``
आजा पाकर िकशन िसर झुकाते हुए चल दे ता है । जब वयिि को अपने पतन का आभास होने लगता है ,वह भयभीत
होने लगता है ।उसे लगने लगता है िक कहीं ऐसा तो नहीं है िक कोई उसके िवरद षढ़यंत रच रहा हो। वह अकलपनीय
भय से कांपने लगता है । यह बात अलग है िक वयिि का िकसी अनय कायम से कोई सीिा वासता नहीं रहता ,लेिकन
वयिि सोचने लगता है िक यिद ऐसा हो रहा है तो इसमे उस पर पितकूल पभाव पड़ सकता है । िबना िसर-पैर का
सोचना भी वयिि के िलए खतरे से खाली नहीं होता । यह भी हो सकता है िक इस पकार की मनगढं ़्त बात मन मे
कोई घर कर जाय। यह भी होता है िक शंका जब एक बार घर कर लेती है तो वयिि पितकूल वयवहार करने लगता है
और वह घिित हो जाता है जो वह नहीं चाहता था । पिरणाम अकसर अनुकूल नहीं होते ।
िरमदास इसी िचनता मे डू बे थे िक इनदावती अपनी नवज़ात पुती रािा को गोद मे िलए बैठक मे
ही आ गई। पती को बैठक मे अनायास आया दे ख पहले तो िरमदास जी शंिकत हो गए िक कहीं ऐसा तो नहीं िक
इनदावती ने उनका वाताल
म ाप सुन िलया हो िकनतु उनहोने तुरनत ही सहज होने का अिभनय िकया और बचची को गोद
मे ले िलया ।
`` अले...ले....ले...ले...........इसको कया हो गया । कयो गला फाड़-फाड़ कर रो रही है षोषो``
`` लगता है बचची को कोई पीड़ा है । मै इसे माँ जी के पास ले जा रही हूँ।``
`` अचछा ठीक है , ले जाओ ।``
इनदावती अभी बैठक से िनकली ही थी िक चमपा हाँफते हुए चली आई। उसकी सांस तेजी से चल रही थीं। वह कुछ
कहने की िसथित मे नहीं थी । बोली-
`` सेठ जी ....सेठ जी...``
`` कया है कयो िसर पर आ खड़ी हो गई इस तरह `` िरमदास डपि कर बोले ।
`` मेरी अममा......मेरी अममा !``
`` कया हुआ तेरी अममा को.......बताती कयो नहीं षोषो``
`` मेरी अममा बहुत बीमार है ।जुवर से तड़प रही है ।``
`` तो वैद-हकीम के पास ले जा ।मेरे पास कयो आई। मै कोई वैद-हकीम तो नहीं हूँ।``
`` वही तो कह रही हूँ।मेरी अममा को अचछे हकीम को िदखाना है । वह तड़प रही है ।``
`` तो जाकर िदखा दे । यहाँ मेरे िसर पर कयो खड़ी है षोषो``
`` सेठ जी ! बड़े हकीम को िदखाने के िलए रपया तो चािहए ही । वह कहाँ से लाऊँ।यिदतुमथोड़ी सी
रहम करो तो.....::
हाँफते हुए दौड़कर आने के कारण चमपा के वक का आंचल सरक गया था । आंचल सरक जाने से उसका उननत वक
उभर रहा था । अनायास िरमदास की िनगाह चमपा के वक पर जा ििकी । वे ज़रा सा संभल गए और उसके वक की
ओर दे खने लगे। उनके मुख मे पानी आ जाता है । वे ज़रा सा मुसकराये और मीठा बितयाने लगे।बोले-
`` हं ......हं ......हं ......हं ........तो पहले से कयो नहीं बोलती । अिक कयो जाती है । इिर आ...मेरे पास
आ......``
महाजन की मुसकान िबखर गई। उनहोने अपने िसर की महाजनी िोपी िनकालकर रख दी और िसर खुजाने लगे।बोले-
`` इतना कयो घबराती है । ये तेरा ही अपना घर है .....हे .....ह.्े......हे ......हे .....तुझे िकसने रोका
है .....िकशन.......अरे ओ िकशन............अरे कोई है भी या नहीं.........कहाँ मर गए ससाले सब के सब......कबसे कह रहा
हूँ ,मेरी मािलश कर दे .......सब के सब कामचोर है ससाले...........हे ..हे ....ह.्े....हे .....हे ...चमपा .....अचछा हो गया तू आ
गई........तू ही मेरे बदन की मािलश कर दे .....चल तो....``
`` पहले अममा को हकीम के पास ले जाना है ।`` िचनता जताते हुए चमपा बोली।
`` कोई बात नहीं ।मै खुद चलूँगा तेरे साथ ....पहले तू मेरी मािलश तो कर दे ......हे ......हे ......हे ....हे
़़़्््््
़ ़़़़्््........`` िखिसयानी हं सी हं सते हुए बोले ।
महाजन भीतर के कमरे मे गए । चमपा उनके पीछे -पीछे चल दी । महाजन कुरता उतार िबसतर पर लेि गए। पास ही
सरसो के तेल की शीशी रखी हुई है । चमपा ने तेल की शीशी उठाई और कांि-े पीठ पर तेल लगाकर मािलश करने लगी ।
`` अचछी तरह से......दो िदनो से सारा शरीर िू िा जा रहा है ।.......यहाँ इिर..........इिर नहीं
इिर.....इस ओर.....इिर मेरे सीने पर .......बहुत पीड़ा होती है । जैसे आग से जल रहा हो। अचछी तरह से
चमपा..........वाह......िकतना आराम िमल रहा है । तेरे कोमल हाथो मे तो जाद ू है । सपशम करते ही सारी पीड़ाएं कैसी छू
हो जाती है ।``
चमपा िन:संकोच मािलक की मािलश कर रही है । आिखर वह इस घर की नौकरानी भी तो है । उसे मािलक का कहना
मानना ही होगा । तभी िरमदासजी ने अचानक चमपा के हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच िलया। उनके हुदय मे
कामाििन ििक उठी । िरमदासजी को अचानक ऐसा करते दे ख चमपा बोली-
`` अं.....अं......ये आप कया करने जा रहे है । हम लोग आपके नौकर-चाकर है ।
`` अरे भई चमपा......नौकर-चाकरो का िरम होता है िक वो अपने मािलक की सेवा करे ।वही तो तू
करने जा रही है न......आ.....इिर आ......मेरे पास आ..... तेरी अममा के इलाज के िलए रपया चािहए नहीं
िक....नहीं.....तेरी जैसी मरजी.....``
चमपा चुप हो जाती है । वह चुपचाप महाजन के करीब जाती है । महाजन की कामाििन अब और अििक भड़क उठी ।
उनहोने अपना सारा आवेश चमपा पर उतार िदया । बह गए और चमपा को भी बहा ले गए ।अपना कुरता पहनते हुए
बोले-
`` ले चमपा........रपये ले ले और जाकर तेरी अममा का इलाज करवा ले .....जा.....``
िववशता और लाचारी िनिन
म ता को कुचल दे ती है । न चाहते हुए भी चमपा महाजन की भूख िमिाने के िलए िववश हो
गई।वह जानती है िक महाजन के चंगुल से िनकलना इतना आसान नहीं है ।यिद वह इनकार कर दे ती तो कया होता
षोषोयह सोचकर चमपा िसहर उठी थी।उसकी नौकरी चली जाती।उसकी माँ की िचिकतसा के िलए रपया कहाँ से आ
पाता।वह िकसके आिशत होकर अपनी माँ की िचिकतसा करवाती षोषो ऐसे कई पश उसके अनतस मे कौि रहे थे। इसी
िववशता का लाभ उठाकर महाजन ने उसे अपना िशकार बना िलया।
उसके माथे पर अभी तक पसीने की बूँदे झलक रही थी।चेहरे पर थकान और मुख पर उदासी छाई
हुई थी।वह भीतर से अपने-आपको अिभशप लग रही थी।जाने िकस कृ तय का उसे पिरणाम भुगतना पड़ रहा है । वह
महाजन की बैठक से बाहर िनकली ही थी िक गोपाल सामने से आता िदखाई िदया।गोपाल को दे खते ही उसकी नज़रे
नीची हो गई।हया और शमम के मारे उसके उसकी गदम न झुकी जा रही थी। चमपा को इस पितकूल अवसथा मे दे ख पहले
तो गोपाल को कोई आभास नहीं हुआ।उसने सोचा संभवत:चमपा िकसी कारण से परे शान होगी। उसने चमपा के कांिे
पर हाथ रखते हुए पूछा-
`` कया बात है चमपा षोषो आज तू इस तरह उदास कयो िदखाई दे रही है षोषो कोई परे शानी हो तो मुझे बता।
शायद मै तेरी कोई मदद कर सकूँ ्ं``
चमपा की रलाई फूि पड़ी।उसने मुख मे आंचल का कोना दबाया और तेजी से कदम उठाते हुए चली गई।गोपाल दे खता
रह गया । वह समझ नहीं पाया िक चमपा आिखर इस तरह कयो है रान-परे शान है ।ऐसी कोई भी बात होती तो वह सबसे
पहले गोपाल को अवशय बतालाती । लेिकन इस वि वह खामौश कयो है । आिखर बात कया हो सकती षोषो पल भर
वह चमपा को जाते हुए दे खता रहा िफर िरमदास महाजन की बैठक मे पवेश िकया ।िरमदास महाजन ``राषीय
एकता आनदोलन`` के िसलिसले मे उसकी पतीका कर रहे थे।
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तेजी से चलते हुए चमपा ,अममा के पास आकर रकी ।वह अब भी हांफ रही है । उसकी सांसे लमबी-
लमबी चल रही है । हाथो मे कई रपये िदखाती हुई वह अममा से बोली-
`` अममा ! अममा !! दे ख, मै रपये लाई हूँ । अब.....अब....अब तू जलदी अचछी हो जाएगी । मै तुझे
बड़े हकीम के पास इलाज के िलए ले जाऊँगी ।........अममा ! अममा !! दे ख तो िकतने सारे रपये लाई हूँ। दे ख ...दे ख
अममा !!......``
वह अममा को ज़ोरो से झकझोरती है िकनतु यह कया अममा का िसर एक ओर लुढक गया । नेतो की जयोित अननत मे
िवलीन हो गई।आँखो की पुतिलयाँ खुली रह गई। मुख बुरी तरह से जकड़ गया।दोनो हाथ चारपाई के नीचे लिक गए ।
अममा का पाण पंछी ऊँचे आसमान मे उड़ता हुआ चला गया।उसे वह दे ख भी नहीं पाई। उसके मुख से बहुत तेज़ी से
एक पीड़ा दायक चीख िनकली.
``.....न......हीं्ं.........अममा ..........नहीं.......तू मुझे छोड़कर नहीं जा सकती .......नहीं.......``
और वह दहाड़े मारकर रोने लगी । उसकी चीख सुनकर पास-पड़ौस की मिहलाएं और पुरष दौड़ पड़े ।दे खते ही समझ
गए िक अममा अब इस दिुनया मे नहीं है । चमपा को सानतवना दे ने लगे । शरीर नशर है ।एक-न-एक िदन इस नशर
शरीर से आतमा रपी पंछी को उड़ जाना है । यह शाशत सतय है । इस मतृयु लोक मे जो भी पाणी शरीर िारण करके
आया है ।उसे एक िदन यह शरीर तयागकर मतृयु लोक से जाना ही होता है । जब तक परमशिि चाहती है और जब तक
पकृ ित साथ दे ती है तब तक पंचभौितक िमटिी के शरीर मे ईशर अपना अंश रप आतमा पितसथािपत कर दे ता है ।
सिृि का िनमाण
म मुखयत: पंचमहाभूत यानी, पथ
ृ वी,जल,वायु,अििन ,आकाश से होता है ।महततव
का इसमे समावेश होता है । पकृ ित और पुरष के इस िनमाण
म मे पंचमहाभूत तो शरीर का िनमाण
म करते है िकनतु पुरष
रप मे ईशर अपना अंश आतमा उस पंचमहाभूती शरीर मे पिवि कर दे ते है । इस तरह पकृ ित और पुरष वदारा मनुषय
के शरीर का िनमाण
म होता है ।उसके भौितक शरीर मे पाण पितसथािपत होने से वह जीव मानव शरीर मे आकर पिरवार
और समाज मे शािमल हो जाता है ।बस, यही से पारं भ हो जाता है माया का िनराला खेल ....इस खेल को समझने के
िलए अनतचक
म ुओं को खोलने की आवशयकता है । इसके खुलने पर मनुषय इस माया को सवयमेव ही समझ लेता है ।
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थकसान अपने खेतो मे बुआई की तैयारी मे वयसत हो गए। चौिरी कमलिसंह , नीलमिसंह ,मैकू , गोपाल , भूरा और
अनय कई िकसानो ने भी बुआई के िलए सारी तैयारी कर ली है । सारा गाँव-समाज बुआई के इस उतसव मे शािमल हो
रहा है । हज़ारो एकड़ खेती मे बुलाई का िसलिसला पारं भ हो गया है । सी-पुरष अपने-अपने खेतो मे बड़ी िूम-िाम से
बुआई के िलए चल पड़े है । सारा जंगल ,सारे खेत इस अवसर पर गाँवमय हो गया है ।
मिहलाएं मंगलगान के साथ बुआई मे जुि गई है । पुरष ,बैलो को हलो मे जुते बुआई मे पाणत:
संलिन है । दे खते ही दे खते सपाह भर मे आसपास के सभी खेतो मे बुआई का कायक
म म समपनन हो गया । भूरा भी पीछे
नहीं हिे ।उनहोने पूरी उममीद और आशा के साथ अपने खेत मे बुआई की ।

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वषाZ के आते ही पािणयो मे जैसे पाणो का संचार होने लगता है ।पेड़-पौिे, पशु-पकी यहाँ तक
इनसानो के हदय पर भी हषाZ्ेललास के बादल छा जाते है । वनो मे मयूर , कोयल ,गौरे या अपनी आवाज़ का जाद ू
िबखेरने लगते है । युवक-युवितयो मे पणय का संचार होने लगता है । गोपाल और गुलाबो की जोड़ी गाँव-समाज मे
सबसे िनराली मानी जाती है । यह जोड़ी ऐसे िकसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने दे ती।चाहे कोई लाख अवरोि-
गतयावरोि उतपनन हो जाए कोई फकम नहीं पड़ता। आज भी वे सबकी नज़रे चुराकर नदी-नालो मे लुकछुप कर पणय
लीला मे डू ब गए । जब पणय की बात चली तो यह भी बताना जररी है िक पणय अकेला नहीं आता ।वह अपने साथ
मिुर कलपनाएं लेकर आता है । गाँव-समाज मे पणय को पकि करने के कई तरीके है और उन सबमे सबसे आसान
तरीका है अपनी िपयतम को लुभाने के िलए मिुर गीत गाना । गोपाल और गुलाबो भी अपने परे रम को इनही कलपनाओं
से अिभवयि करने मे कोई कमी नहीं करते । इसिलए तो दोनो झूम-झूम कर नदी-नालो मे गाते िफरते है ।
हाथ बढ़ा दे पे््रम िमतवा
पल-पल डोले मेरे तेरे नयन पयार के......
नज़र िमलते ही पे््रम की कहानी बन जाती है
मै भी अपने िपय की दीवानी बन जाती हूँ
ज़माना चाहे कर ले लाख िसतम
पे््रम करके मै मसतानी बन जाती हूँ
अिरो से झर झर झरते तराने मनुहार के
पल-पल डोले मेरे तेरे नयन पयार के....
कांिो पर चलना हमको आता है
अंगारो पर चलना हमको आता है
यो नसीब वाले होते है बहुत
िजनको पेम िनभाना आता है
पाण लुिा दे मेरे पाण िमतवा
पल-पल डोले मेरे तेरे नयन पयार के....

िफर तो आिहसता से युवक-युवितयो के आंगन मे सावन आ गया । अमराईयो ,बागानो और गाँव-समाज मे


झूले पड़ गए । झूलो पर युवितयाँ पणय गीत गाने लगी है और बादलो से अपने िपयतम को बुलाने का संदेश भेजने
लगी है ।कहीं तो कारे -कारे बादल झूम झूम कर बरस जाते है तो कहीं-कहीं तो िबन बरसे ही िनकल जाते है । िपय िमलन
की आस िकसी की पूरी हो जाती है तो िकसी की अिूरी रह जाती है । िजन युवितयो के िपयतम गाँव-समाज को छोड़कर
शहरो मे नौकरी-चाकरी के िलए गए हुए है उनका इतनी जलदी आना आसान नहीं है ।ऐसे मे वे युवितयाँ अपने
पिरिचतो से ,िरशतेदारो से उन तक अपनी खबरे भेजती है िक वे जलदी से आ जाए ,यहाँ सावन तन-मन मे आग लगा
रहा है । इस सावन मे ऐसी अगन कौन बुझाए। बेरहम िपयतम नहीं आते सो नहीं आते और खबर भेज दे ते है िक
सरकारी कामकाज बहुत बढ़ गया है , जैसे ही कामकाज का बोझ कम हो जाएगा वे अवशय ही आएंगे और बैरािगन
िपयतमा अपने िपयतम की इस बेरखी से फूि-फूि कर रोने लगती है ।

वषाZ काल मे समपूणम पथ


ृ वी हिरतमा से पिरपूणम हो हरी-भरी हो जाती है । पशु-पकी,मनुषय,नभचर
और जलचर आननदोललास से गदगद हो जाते है । लेिकन कभी-कभी पकृ ित का खेल िनराला होता है ।पकृ ित को
जानना आसान नहीं है ।पकृ ित अपना खेल सवयं रचती है और उस िखलौनो के साथ कीड़ा करती है । इस बरसात के
मौसम मे पकृ ित ने ऐसा ही कुछ नया खेल रचना पारं भ कर िदया । िकसानो ने खेतो मे बुआई कर दी । बुआई के बाद
दो-चार िदन छोड़कर बरसात होते रही । सपाह भर बाद िफर बािरश हुई । बाद उसके पूरा सावन-भादो िनकल गया ।
बरसात की एक भी बौछार नहीं हुई। खेतो मे बोए बीजो को पानी न िमलने से वे सूखने लगे। वनो मे पशुओं के िलए
चारा पूरी तरह से उग नहीं पा रहा।निदयो,झरनो और तालाब का पानी िीरे -िीरे सूखने लगा । बाविड़यो मे पानी का
सतर कम होने लगा। गाँवो की बाविड़यो मे पानी का सतर कम होने से पीने और उपयोग मे आनेवाले पानी की पूितम
कम होने लगी।
बालिी को बावड़ी मे डू बाने पर जब पानी कम आता िदखाई िदया तो मिहलाओ मे चचाम होने लगी।
उनहे िचनता होने लगी।
`` काकी , लगता है बावड़ी मे पानी कम हो गया है ।बालिी मे जलदी पानी भर नहीं पाता।``
`` बावड़ी मे बारह मिहनो कभी पानी कम नहीं होता,गुलाबो।`` कमली समझाते हुए बोली।
`` तो तुम हीदे ख लो। दे खो बालिी मे पानी िकतना कम आया है षोषो``
`` ला छोड़ तो मै िनकालती हूँ पानी । कभी-कभी कया होता है िक हम बालिी को पानी मे सही-सही
डू बा नहीं पाते और बालिी उथले पानी मे ही रह जाती है ।िजससे बालिी पानी से भर नहीं पाती और पानी कम भर आता
है ।इसीिलए बालिी जब हम ऊपर खींचते है तो उसमे पानी कम आता है ।दे ख , अब मै पानी िनकालती हूँ।``
कमली बालिी बावड़ी मे डालती है और चार-छह झोके बालिी को मारे िकनतु बालिी मे पानी नहीं भर पाया।बावड़ी बहुत
गहरी होने से पता नहीं चलता िक उसमे पानी िकतना गहरा या उथला है ।बावड़ी मे झांकने पर बहुत गहराई िदखती है ।
कमली ने बालिी ऊपर खींची ।बालिी मे पानी बहुत ही कम था । उसने दो-चार बार इसी तरह से पयास िकए िकनतु
बार-बार थोड़ा सा ही पानी बालिी मे आ पाता । गाँव-समाज की कई मिहलाएं बावड़ी के आसपा जमा हो गई।चमपा
बोल पड़ी-
`` हाँ री ! दे खो िकतना कम पानी िनकला बालिी मे षोषो``
`` यह तो बहुत ही कम है । ऐसा तो पहले कभी दे खने मे्ं नहीं आया ।``कमली बोली।
`` अब पीने का पानी कहाँ से लाएं षोषो``
`` अब तो नदी-तालाब का ही पानी लाना होगा । पीने का और उपयोग का पानी कहाँ से आएगा ।``
कमली िचिनतत हो बोली।
गाँव-समाज मे पानी की िकललत होने लगी । गामीण पानी के िलए यहाँ-वहाँ भिकने लगे। चौिरी कमलिसंह और
िरमदास महाजन की बावड़ी मे भी पानी का सतर नीचे हो गया ।
बरसात न होने से खेतो मे बोए गए बीज सूखने लगे।ज़मीन तड़कने लगी। पेड़-पौिो मे पानी की
कमी से फूल-पते कम आने लगे।चारे उग नहीं पाया । िकसानो मे हाहाकार मच गया । दे खते ही दे खते बरसात का पूरा
मौसम बीतगया।बरसात का नाम नहीं ।
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खेतो मे बोए गए सूखे बीजो को दे खकर भूरा और कमली हतपभ हो गए । अिघकांश बीजो मे अंकुर
आकर सूख गए । बाकी बीज सड़-गल गए ।कुछ पकी चुग गए । खेतो की काली-काली िरती पानी की कमी से फिने
और तड़कने लगी । भूरा माथा पकड़कर बैठ गया । वह कभी सूखे खेत की ओर तो कभी आसमान की ओर दे खने
लगता । मुख पर मिलनता छा गई।अब कया िकया जाय । िकसानो की िचनताजनक िसथित को जताना बहुत ही
किठन होता है ।िकसान के िलए खेती ही रोज़गार और जीवन का आिार होती है ।ऐसे मे यिद खेती मे अनाज नहीं
उगेगा तो वह साल भर अपने और पिरवार तथा आिशतो के िलए कहाँ से वयवसथा जुिा पाएगा । यह िसथित सभी
िकसानो की हो जाती है । भूरा भी यह सोचकर िचिनतत हो गया । भोजन अवकाश का समय हो गया । कमली रोिी
और साग भूरा के सामने रख कर बोली-
`` सोचने और िचनता करने से कुछ होनेवाला नहीं है ।चलो पहले रोिी खा लो।बाद मे सोचा जाएगा
िक हमे कया करना है । इस तरह हम यिद हाथ पर हाथ िर कर बैठे रहे गे तो कुछ होनेवाला नहीं है ।``
`` और तू ! ``
`` तुम खा लो तब तक मै पानी ले कर आती हूँ।``
``जलदी आओ। बैलो को पानी पीलाने ले जाना है ।``
`` बाबा ,मै बैलो को पोखर मे पानी पीलाने ले जाऊँ षोषो`` रोिी खाते-खाते हिर ने पूछा ।
`` नहीं षोषो नहीं , तुम नहीं जाओगे ।``
`` बाबा जाने दो न ! मै बहुत िदनो से नही गया ।``
`` नहीं बेिे । वहाँ बहुत कीचड़ है । तुम वहाँ नहीं जाओगे।``
`` मै केकड़े ले आऊँगा ।``
`` अचछा, अचछा । अममा को लौिकर आने दे ।तब तक रोिी खाना भी हो जाएगा ।``
भूरा ,कमली को पानी के िलए जाते हुए दे खते लगा । वह दरू तक जाती हुई िदखाई दे ती है ।वह खेत के मेढ़ से
होते हुए पोखर की ओर जाती है । पोखर सूखा हुआ है । सूखे पोखर को दे ख कमली आशयच
म िकत हो जाती है । सवयं ही
बड़बड़ाती है , `` हे भगवान ! पोखर भी सूख गया । अब कया करे षोषो``` कुछ समय तक वह िचिनतत सी पोखर को
दे खने लगी है िफर सोचने लगी,`` चलो नदी की ओर जाते है । उसमे पानी तो जरर होगा ।`` यह सोचते हुए जब वह
नदी पर पहुँची। नदी आिे से जयादा सूखी हुई है ।जहाँ थोड़ा बहुत पानी है वहाँ कीचड़ और गनदगी फैली हुई है । उसे
महाशयम हुआ कयोिक उसने पहले कभी ऐसा नहीं दे खा ।उसने एक लमबी सांस ली,यह सोचकर िक अब वह पीने के
िलए पानी कहाँ से लाएं । वह खेतो के मेढ़ से होते हुए आकर चुपचाप गाड़ी के पास खड़ी हो गई। कमली को इस तरह
हताश दे ख भूरा उठ खड़ा हुआ । बोला-
`` कया बात है षोषो तू इस तरह मुँह उतार कर कयो खड़ी है षोषो पीने का पानी दे दे तो आगे कुछ
काम करे ।``
`` हिर के बापू ! नदी सूख गई उसमे गनदगी फैल गई है ।पोखर मे भी पानी नहीं है । लगता है अब
की बार....``
`` शुभ शुभ बोल भई....अबकी बार ऐसा कुछ नहीं होगा । हमे कुछ करना होगा।कम से कम खेती मे
िसंचाई का सािन तो जुिाना ही होगा । बावड़ी खुदवाना होगा या और कोई रासता ......!``
`` अममा ! पानी दे दे । गला सूखा जा रहा है ।`` हिर कातर सवर मे बोल पड़ा ।
`` पानी......!!!!!!!!.....कहाँ है पानी ...........!....`` कमली की हताशा फूि पड़ी ।
भूरा हताश हो ऊपर आसमान की ओर दे खने लगा । सारा आकाश बादलहीन हो गया। कहीं भी बादलो का पता नहीं
था। यहाँ तक िक आकाश मे उड़नेवाले पंछी भी उड़ नहीं रहे थे । सावन-भादो के मिहने मे जहाँ भरपूर वषाZ होनी
चािहए वहाँ बािरश का एक बूँद पानी भी नहीं बरसा । इन िदनो का सूरज ठीक उसी तरह तप रहा है िजस तरह जयेष-
वैशाख मे तपता है ।दरू-दरू तक वनो मे हिरयाली िदखाई नहीं दे रही । अब तो वनो मे न तो मयूर और न ही कोयल की
कूकने के सवर सुनाई दे रहे । भूरा आकाश की ओर कातर दिि से दे ख दोनो हाथ ऊपर उठाकर चीख पड़ा -
`` सूना तूने......!!!!!!!! नदी सूख गई........पोखर सूख गए............बरसात नहीं होगी तो खेती कैसे
होगी.........अनाज कहाँ से उगेगा.............सूखा पड़ जाएगा सूखा...............अरे .............मै तो..............मै तो........मै
मारा जाऊँगा.......सब कुछ बबाZ द हो जाएगा........बबाZ द................``
शायद वह ऊपरवाले भगवान को चीख-चीखकर अपनी पीड़ा सूना रहा है । वह चीखते-चीखते खांसने लगा।हताश होकर
िम ् से ज़मीन पर बैठ गया । पसीने से वह तर-ब-तर हो गया । चेहरा तमतमा गया और हांफने लगा । कमली और
हिर भय से कांपने लगे। ऐसा लगने लगा अब न जाने कया होनेवाला है ।बाबा को न जाने ऐसा कया हो गया षोषो,यह
सोचकर हिर रोनी सी सूरत बनाकर भूरा के करीब जाकर आिहसता से बोला-
`` बाबा ! बरसात नहीं होगी षोषो``
इतना सुनते ही भूरा बुरी तरह से चीख पड़ा और एक झननािे दार थपपड़ हिर को जड़ दी -
`` चो...................प ्................................
दस
ू रे ही पल भूरा पशाताप से भर हिर को गले लगा िलया और फूि-फूिकर रोने लगा।कमली भी फूि-फूिकर रो पड़ी।
बोली-
`` बचचे को मारने से पानी बरस जाएगा कया षोषो``
भावावेश मे भूरा बैलगाड़ी के मचान पर माथा पिकने लगा।कमली दौड़ पड़ी और भूरा को थाम िलया।बोली-
`` ऐसे िहममत हारे गे तो काम कैसे चलेगा । हम ही नहीं सारा गाँव-समाज इस सूखे की चपेि मे आ
गया है । सब िमलकर इस सूखे का सामने करे गे्े ।``
`` ये.....ये......ये.....आवाज़ सुन रही है कमली.......सुन ............ज़रा धयान लगा कर सुन............!``
`` कहीं िकसी िमनदर से आ रही है । शायद कृ षण िमनदर से.............``
कहीं दरू िकसी िमनदर से जनसमूह के सवर उभर रहे है । लगता है गाँव-समाज के लोग सामुिहक रप से िमनदर मे कोई
पाथन
म ा कर रहे है । सवर उभर रहे है ........................

मेघा रे पानी दे
पानी दे गुड़िानी दे ........
बरस रे बरस रे
मेघा राजा बरस रे
मेघा राजा बरस जा..........
ये रे ये रे पावसा
तुमहे दे ते पैसा
पैसा हुआ खोिा
पा उ स आया..............मो..................िा.................
भूरा-कमली और हिर के चेहरे पर आशयम और अवसाद के भाव िमिशतरप से इस तरह तैरने लगे मानो पिशम के
आकाश मे उभरती िकसी मनोहरी दशय मे आशा की िकरण ओझल हो रही हो।िजसे पाने के िलए सारा जनसमूह
वयाकुल है लेिकन वह दरू......दरू.............और अििक दरू चला जा रहा हो। जो मनुषय के हाथो से छूिा जा रहा हो।
आशा की उस िकरण पर ही जैसे सारा मानव समुदाय दिि लगाए मनुहार कर रहा हो िकनतु वह हाथो मे नहीं आ पा
रहा हो । यह कैस अदत
ु दशय है । जो मायामय है अथवा वासतिवक है । वह कहना कया चाहता है । उसका अिभपाय कया
हो सकता है । वह आकाश मे इस तरह िवसतािरत हो गया मानो बरसात के काले-काले मेघ छा गये हो । अवशय ही
इसमे कुछ तो सनदे श होगा । कया यह सूखा पड़ने का िचनह है षोषोकया यह कोई आपदा है षोषो यह जान पाना बहुत
किठन पतीत हो रहा है ।
`` नहीं.............नहीं...................यह भम है .............ऐसा कैसे हो सकता है षोषो``
दे खते ही दे खते वह मनोहारी अदत
ु दिावली िवलोिपत हो गई। रह गया केवल शूनय आकाश ......................समूह गान
अब भी सुनाई दे रहा है । इस आशा और िवशास के साथ िक मेघराज उनकी पाथन
म ा सवीकार कर लेगे।
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गाँव-समाज के समद
ृ सुििजनो वदारा पंचायत आयोिजत की गई । िजसमे चौिरी कमलिसंह ,
िरमदास महाजन सिहत अनानय गामीण शािमल हुए ।इस वषम बरसात न होने पर िचनता पगि की गई।यह भी
िवचार िवमशम िकया गया िक सूखे की इस िसथित से िनपिने के िलए पंचायत तथा राषीय एकता आनदोलन वदारा
सामुिहकतौर पर कुछ ऐसे कायक
म म चलाए जाए िजससे गामीणो को रोज़गार िमले और सबको यथायोिय सुिविाएं
पाप होती रहे । चूँिक सूखे की िसथित से िनपिने के िलए कोई एक वयिि उतरदायी नहीं है बिलक इसके िलए
जनभागीदारी की आवशयकता होगी।इस जनभागीदारी मे गाँव-समाज का छोिे से छोिा और बड़े से बड़ा वयिि भी
भागीदारी करे ।इसी से गाँव-समाज का उदार हो सकता है ।जब तक सब गामीणो मे जनभागीदारी की भावना और
एकता का संकलप उिचत नहीं होगा , कुछ भी कायम िकया जाना संभव नहीं होगा।इसीिलए पंचायत को गामीणो के
अपेिकत सहयोग की आवशयकता महसूस हो रही है ।
पंचायत मे िलए गए िनणय
म पर अमल करने के िलए गाँव-समाज के युवक-युवितयो ने
जनभागीदारी मे शािमल होना पारं भ िकया । गोपाल,मैकू, नीलमिसंह,गुलाबो,चमपा, भूरा, कमली आिद कई गामीण
गाँव-समाज के िमनदर मे एकत हुए।िमनदर मे सबने िमलकर सूखे की िसथित से िनपिने के िलए दढ़ संकलप िलया।
चाहे जो भी िसथित हो सब िमलकर सूखे का सामना करे गे और गाँव-समाज मे सभी सुिविाएं मुहैया कराएंगे ।
िरमदास महाजन अपना िसर पीि कर रह गए । उसने तुरनत ही िकशन और उसके सािथयो को
गोपनीय मंतणा करने के िलए अपने घर बुलवाया । वह जलदी ही ऐसी मंतणा पर िवचार करना चाहता िजससे गाँव-
समाज के जररतमनद लोग उसके पास आए और उससे मदद मांगे । वह जररतमनद लोगो को ऋण दे कर उनके पास
की भूिम हिथयाने का सोचने लगे। महाजन ने िकशन और उनके सािथयो को अपनी बैठक मे बुलवाकर इन तमाम
कायो को आकार दे ने के िलए गंभीर िवचार-िवमशम िकया और यह िनणय
म िलया िक िजस भी िकसी तरह से
जररतमनद लोगो को घेरा जाए । उनहे ऋण िदया जाय और उनकी खेती , मकान और जो कुछ भी गहने आिद है वे
महाजन के पास िगरवी रख कर या बेचकर आिथक
म सहायता पाप करे ।
महाजन की युिि कामयाब हुई।उसने िकशन और उसके सािथयो के साथ िमलकर गाँव-समाज के
कई गामीणो को ऋण दे ना पारं भ कर िदया । दे खते ही दे खते चालीस-पचास गामीणो ने िरमदास महाजन के पास
अपनी खेती , मकान िगरवी रखकर नगद रपये ऋण सवरप पाप िकए । इससे गामीणो को मुख िखल गए।िरमदास
महाजन चाहते भी थे िक यह वि बहुत अचछा है । ऐसे अवसर पर ही अििकाििक िन समपदा बिौरी जा सकती है ।
गामीणो को ऐसे अवसर पर ही अपने चंगुल मे फंसाया जा सकता है । वे इस अवसर को खोना नहीं चाहते । कहा गया है
िक यिद अवसर हाथ से िनकल गया तो पछताना पड़े गा । िरमदास जी पूरे अवसरवादी है । वे इस सुनहरे अवसर को
गंवाना नहीं चाहते थे। हालांिक भले ही इससे गाँव-समाज के लोगो का भला नहीं हो िकनतु किठन समय मे वयिि
अपने जान से पयारी वसतु के सथान पर मनचाही वसतु पाप करना अवशय चाहता है । पेि के िलए , रोिी के िलए
इनसान चाहे जो करने के िलए तैयार हो जाता है । कोई भी पित , िपता , माता अपने आिशतो को भूखे मरने नहीं दे ते।
उनका कतवमय हो जाता है िक वे अपने आिशतो ्ंको कम से कम एक जून रोिी तो िखला ही दे । इसी जुगाड़ मे
गामीणो ने िरमदास महाजन से ऋण लेना पारं भ कर िदया ।

भूरा पहले ही िरमदास महाजन से ऋण दे चुका था।इसिलए वह दब


ु ारा ऋण लेने नहीं गया । उसने
महाजन से बैल खरीदने के िलए ऋण िलया था।यह ऋण उसे आगामी खिलहानी पर मयबयाज के चुकाना है । लेिकन
अब पिरिसथित बदल गई है ।इस वषम वषाZ नहीं हो पाई। सूखा पड़ गया है । पथमत: इस सूखे से िनपिना बहुत ही
जररी हो गया है । उसके बाद आगे की िसथित पर िवचार िकया जाएगा ।
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छोिे िकसानो को हर वषम अचछी फसल और खिलयानी की पतीका रहा करती है । यही उनके जीवन
का आिार है । इसी आशा और िवशास के साथ वे कड़़््ी मेहनत करते है । उनकी सारी उममीदे खेती पर ििकी रहती
है ।
सुबह ही बैलो को थोड़ा-थोड़ा चारा िदया था।अब उनके सामने चारे का एक भी ितनका नहीं था ।
भूरा बीड़ी का कश लेते हुए गंभीर िचनता मे डू ब गया । कमली कब उसके पास आकर बैठी उसे पता ही नहीं पड़ा । उसने
पयाज िोड़ा और रखी रोिी के िु कड़े भूरा के सामने रख िदए । बोली-
`` तुम कुछ खा लो । खेत की मेढ़ पर अभी कुछ घास बाकी है । मै उसे ले आऊँगी। बैलो के िलए हो
जाएगा ।``
`` ऐसा सूखा कभी दे खने मे नहीं आया । खेत के खेत सूखे की चपेि मे आ गए । समझ नहीं
आता कया करे षोषो ``
`` तुमहारे या मेरे समझने से कया होगा षोषो यह िसथित िसफम हमारी नहीं है , सारे गाँव-समाज की
है । जो सबके साथ होगा , वही हमारे साथ होगा । सब मरे गे तो हम भी मरे गे । सब जीएंगे तो हम भी जीएंगे।``
`` तू बहुत भोली है रे । जीना-मरना कोई इनसानो के हाथ होता है कया यह तो उस ऊपरवाले के हाथो से
रचा गया मायाजाल है ।इसे इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता है । ये तो वो ही ईशर जाने ।तू और मै कया जानू।
``
रखी रोिी खाने से हिर रआंसा हो गया । आँखो मे आँसू भर आए । लेिकन जब उसने दे खा िक उसके बाबा और अममा
सवयं ही बहुत द ु:खी और उदास िदखाई दे रहे है तो वह चुप ही रहना उिचत समझा िफर न जाने उसे कया सूखी
षोषोउसने भूरा के कांिो पर हाथ रखा और बोला-
`` बाबा ! हम लोग नहर पर काम करने चले। हम लोग मजूरी करे गे तो पैसा िमलेगा । उसी से हम
लोग शहर से खाना खरीद कर ले आएंगे।``
`` नहीं बेिे ! अभी तुमहारे पढ़ने-िलखने,खाने-पीने और खेलने-कूदने के िदन है । तुम कहाँ यह सब
कर पाओगे। हम नहीं है कया बेिू षोषो``
`` लेिकन कमली ! कहाँ से लाएंगे मासिरजी के फीस के पैसे षोषोउसके िलए भी तो पैसे चािहए ही
न !.....``
`` मै मजूरी करंगी । अपने बचचे को पढ़ाऊँगी । अचछा पहले तुम लोग खाना खा लो , जो कुछ भी
है । थोड़ा सा चावल भी है । खा लो।``
हांड़ी मे थोड़ा सा चावल है ।वह परोसती है । यह तो बहुत ही थोड़ा सा है । इससे पूरा नहीं हो सकता । बोली-
`` तुम खा लो मै पीछे खा लूँगी ।``
कमली ने पित और पुत को जो कुछ भी था परोस िदया । हांड़ी मे मात दो-चार दाने चावल के बचे । उसने एक दाना
उठाकर मुख मे डाला और सोचने लगी , `` भगवान शीकुषण ने भी चावल का एक दाना खाकर समपूणम संसार को तप

कर िदया था ।``
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इनसानो को जीिवत रहने के िलए भोजन होना बहुत जररी है । केवल इनसानो के िलए नहीं बिलक
समपूणम पािणयो के जीवन का आिार अनन है । कहा गया है िक जीवन जीने के िलए अनाज जीवन का आिार है ।अनन
के िबना पाणी मात का जीवन मतृयु तुलय है । पाणी एक रोिी के िलए , अपने पेि की आग बुझाने के िलए कुछ भी करने
के िलए तैयार हो जाता है । रोिी के िलए िवश मे अब तक न जाने िकतने युद हुए है ,यह सवम जात है । सारा संसार एक
रोिी के िलए ही दिुनया के सारे अचछे -बुरे कमम करता है ।
गाँव-समाज मे लोगो के पास जो भी अनाज अब तक शेष बचा हुआ था वह िीरे -िीरे करते हुए सारा
समाप हो गया । िनिन
म गामीणो के पास बचा हुआ अनाज ही उनका िन हुआ करता है ।जब तक उनके पास अनाज
संगिहत है तब तक वे कुशल है और िजस कण अनाज का भणडार समाप हो गया उसी कण से वे रासते पर आ जाते है ।
गामीणो का अनाज समाप होते ही वे समपनन लोगो की ओर सहायताथम अपनी झोली फैलाये खड़े हो गए । इस आशा
से िक इन समपनन लोगो के पास से कम से कम एक समय का भोजन तो िमल ही जाएगा ।
गामीणो ने िवचार-िवमशम िकया िक सारे गा््रमीण एकत होकर िरमदास महाजन के पास अनाज
के िलए अनुरोि करे ।भूरा, कमली , मैकू , गोपाल , गुलाबो ,रािेलाल , रपा , चमपा और बहुत से गामीण िरमदास
महाजन के मकान के सामने एकत हो गए। उनहोने िमलकर उनसे अपने अनाज के गोदाम मे से कुछ अनाज गामीणो
के बीच िवतिरत करने के िलए अनुनय-िवनय िकया । महाजन की ओर से कोई सकारातमक उतर नहीं िमल पा रहा ।
एकत गामीणो की भीड मे आकोश उतपनन हो गया ।अिनयंितत भीड़ को खदे ड़ने के उद्ेदशय से महाजन ने िकशन को
आदे श िदया । पहले तो िकशन ने लाठी भांजने की सोची िकनतु न जाने कया सोचकर वह शानत हो गया ।बोला -
`` शानत....शानत..................सेठ जी ने खबर दी है िक अनाज िबलकुल नहीं है । दो िदनो से सेठ जी के घर का
चूलहा भी नहीं जला ।``
िकशन से महाजन की खबर पाकर गामीण पहले तो उतेिजत हो गए िकनतु जब दे खा िक उनके बचचे और मिहलाएं
भूख के मारे िबलख रही है वे भी अपना कोि शानत करना उिचत समझने लगे । छोिे -छोिे बचचे..``.....माँ.....भूख लगी
है ..................माँ .....भूखलगी है `` कहते हुए रोने िचललाने लगे । बचचो का करण रदन सुनकर पुरषो का हदय फिा
जाने लगा। कोई-कोई औरत अपने बचचो को पीिने लगती है तो कोई औरत आसमान की ओर मुख करके भगवान से
पाथन
म ा करती है िक वह उनहे इस िरती से उठा ले।कोई-कोई तो िरती माँ से पाथन
म ा करती है िक वह फि जाए और वे
सारे के सारे इस िरती मे समा जाय।जब आसमान और िरती अनुनय नहीं सुनी, तब वे अपने बचचो को बुरी तरह से
पीिती और कहती है -
`` मर जा आदमी की औलाद.........मै तेरे िलए कहाँ से खाना लाऊँ।``
सुनकर संवेदनशीलो का हदय फिा जाता िकनतु समय की मार से कोई नहीं बच पाया जो ये सूखागसत गामीण बच
पाने की कोिशश करते।
गामीणो की पीड़ा दे ख भूरा का संवेदनशील हदय रो पड़ा । लेिकन वह कर भी कया सकता है ।उसने
शानत भाव से सबसे कहा-
`` हमे यह महसूस हो रहा है िक हमारे अननदाता चौिरी कमलिसंह के दरबार मे सभी गामीण
चले।हमे वहाँ अवशय ही राहत िमलेगी । कम से कम एक समय का भोजन िमल ही जाएगा। यिद आप लोग यह बात
सवीकार करते है तो मै आप सबके साथ हूँ।``
``हाँ......हाँ......चलो....चौिरी जी के दरबार मे चलो।``
एक साथ समूह सवर मे गामीणो ने सहमित वयि करते हए कहा और गामीणो का समूह भूरा का अनुसरण करते हुए
चौिरी कमलिसंह की कोठी की ओर चल पड़े ।
चौिरी कमलिसंह को गामीणो की उनकी कोठी की ओर आने की खबर पहुँच चुकी थी। चौिरी
कमलिसंह , नीलमिसंह और उनकी पती अनुसूया पहले ही आंगन मे गामीणो के सवागत के िलए बाहर आ खड़े हुए ।
चौिरी को पहले ही बाहर आंगन मे सपिरवार खड़े दे ख गामीण िबना िकसी तरह का पितवाद िकए उनके सामने
चुपचाप खड़े हो गए । चौिरी बोले-
``मै अपने गाँव-समाज की खाितर , बुढ़ो-बचचो की खितर कुछ भी करने के िलए तैयार हूँ। इस गाँव
की सूखे की िसथित िकसी से भी िछपी हुई नहीं है । सबको कुछ न कुछ िमलेगा ।जब तक मेरे अनाज भणडार अनन का
एक-एक दाना है सबको िमलेगा ।कोई भूखा नहीं रहे गा । कोई भूखा नहीं सोयेगा ।यह मेरा वचन है लेिकन िफर भी
ईशर की इचछा के िवरद मै नहीं चल सकता। हाँ, जब तक मुझसे जो भी बन सकेगा गाँव के िलए करता रहूँगा ।``
चौिरी कमलिसंह ने गामीणो को समझाया और नीमलिसंह को आदे श िदया िक वे अनाज भणडार मे जो भी अनाज
उपलबि है वह गामीणो मे िवतिरत कर दे ्े। गामीणो मे सं्त
ं ोष वयाप हो गया । चौिरी ने अपने भणडार मे उपलबि
सारा अनाज गाँव-समाज मे लोगो मे िवतिरत करवा िदया।
00
िीरे चौिरी कमलिसंह के गोदाम मे रखा अनाज भी समाप हो गया । तब उनहोने िरमदास महाजन को बुलाकर गाँव-
समाज मे अनाज िवतरण करने के िलए िनवेदन िकया। उनहोने कहा-
`` ठीक है । आपका आदे श िसर-आँखो पर । लेिकन बाबूजी! हमारे पास इतना अनाज नहीं है िक गाँव-समाज के लोगो
को सूखे की इस िसथित मे पूरा हो सके।आज हम दे दे गे और िफर कल के िलए हम िफर कहा से लाएंगे।``
`` जब तक हमारे पास अनाज है तब तक तो हम दे ना ही चाहते है आगे जैसे ईशर की इचछा ।``
`` ठीक है । मै आज ही कुछ करता हूँ।``
दामाद के मुख से इस तरह मीठे वचन सुनकर चौिरी कमलिसंह जी बहुत पसनन हो गए । उनहोने यह सोचा भी नहीं
था िक उनके दामाद उनके अनुरोि को इतनी आसानी से सवीकार कर लेगे। वे मन ही मन मे गदगद हो गए और उठ
कर दामाद िरमदास महाजन को गले से लगा िलया । हाँ, लेिकन चौिरी कमलिसंह जी उनके दामाद की करतूसो को
जानते हुए भी नहीं जानते । वे यह नहीं जानते िक उनका दामाद इस सवीकार के पीछे कया-कया गुल िखलाने वाले है ।
वे पसनन हो गए ।इनदावती ने िपता को बड़े आदर के साथ भोजन कराया और उनहे िवदा िकया ।
0
िरमदास महाजन के भणडार गह ृ मे िपछले कुछ वषोZ्ं का अनाज भरा पड़ा था ,जो काफी हद तक घूस ,चूहे
और कीड़ो वदारा खराब िकया गया था । अनाज मे दाने कम िकनतु भूसा और कचरा अििक था िजसे फेका तो नहीं जा
सकता था िकनतु पशुओं को अवशय ही िखला िदया जा सकता था िकनतु िरमदासजी ने ऐसा कुछ नहीं िकया था।
भणडार मे भरा अनाज िवतिरत भी नहीं िकया गया था ।यिद अनाज समय पर िवरिरत िकया गया होता तो इस तरह
खराब नहीं हो जाता।इस पुराने और खराब अनाज के अलावा भी दो सौ पचास बोरे गेहूँ
,चावल,चना,अरहर,जुवार,मकका आिद सुरिकत रखा हुआ है िजसे उनहोने संजोकर रखा हुआ है ।इसका उपयोग वे बहुत
सोच समझकर करते है ।बहुत पुरानी कहावत है िक भले ही अनाज खराब हो जाए िकनतु न तो फेको और न िकसी को
दान दो।बस, यही िसथित िरमदास महाजन की है । वे न तो िकसी को अनाज दान मे दे ते है और न ही उसका उपयोग
करते है । चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय ,वाली कहावत भी उन पर इसिलए नहीं लागू होती िक वे चमड़ी और दमड़ी
दोनो को बचाकर रखना उिचत समझते है ।यही कारण है िक वे इतने अििक संकीणम पविृत के है िक उनके सामने
अपने सवाथम के अलावा और कुछ भला या अचछा लगता ही नहीं है । अब दे िखए न ,चौिरी कमलिसंह जो उनके शसुर है
,ने उनसे गामीणो को अनाज िवतिरत करने के िलए िनवेदन िकया।बड़ी िवनित और अनुरोि िकया । वे अपने शसुर
को इनकार तो कर नहीं सकते थे और न पती इनदावती को रि कर सकते थे।इसिलए उनहोने दोनो के बीच का रासता
अि्खतायार करने का िनणय
म ले िलया । वे गामीणो को अनाज अवशय िवतिरत करे गे िकनतु मुफत मे नहीं करे गे , जो
उनको अनाज का दाम दे गा या अनाज के एवज मे और कुछ दे गा उनहे ही वे अनाज िवतिरत करे गे अनयथा चाहे कोई
भूखा ही मर जाए उनकी बला से ,उनहे इसकी िबलकुल भी िचनता नहीं या कोई सरोकार नहीं।एक तो वे इस संकि की
घड़ी मे गामीणो को अनाज िवतिरत करे गे और वह भी वािजब दाम पर तो िकसी को कया इतराज होना चािहए ।
दस
ू रे ही िदन उनहोने अपने अनाज का भणडार खोल िदया । गामीणो को खबर कर दी गई।गामीण
उनके भणडार के सामने कतारबद हो गए । िकशन और दो अनय सािथयो को अनाज िवतरण के िलए तैनात कर िदया
। सवयं बैठ गए अनाज का दाम वसूल करने के िलए ।
पुराना और खराब अनाज दे खकर गामीणो मे रोष पैदा हो गया।लेिकन यह अब उनकी िववशता है
िक भूखो मरने की अपेका कुछ तो पेि भरने के िलए िमलेगा।बाल-बचचे,मिहलाएं भूख के मारे िबलख रही है ।ऐसे समय
मे जो भी िमल जाए बस चािहए उदर भरण के िलए । लेिकन यह कया महाजन िकसी भी गामीण को मुफत अनाज
िवतरण करने के िलए तैयार नहीं है । िजनको चािहए ले जाएं अनयथा नहीं।गामीण बोलते-
`` हुजूर ! अब रपया भी कहा से लाएं । मजूरी भी नहीं है िक कुछ रपया-पैसा िमल जाता।ऐसी
संकि की घड़ी मे हम रपया भी कहाँ से लं्ाएं । बाल-बचचे और हमारे घर की मिहलाएं भूख से िबलख रही है । कुछ तो
रहम करो।``
`` एक तो हम कम कीमत पर तुम लोगो को अनाज िवतिरत कर रहे है और तुम लोग है िक आ गए
मुफत मे िभखारी की तरह हाथ फैलाकर दम
ु दबाकर । यहाँ कोई खैरात नहीं बंि रही है । िजनको अनाज चािहए वे
अनाज की िकमत दे और ले जाएं अनाज दम
ु दबाकर समझे।``
ऐसी संकि की घड़ी मे िकया भी कया जा सकता है । िजनके पास रपया था वे खड़ा-गला और पुराना अनाज खरीद कर
ले गए और िजनके पास नहीं था वे िबलखते रह गए िकनतु िरमदास महाजन का पतथर का कलेजा नहीं पसीजा तो
नहीं पसीजा । महाजन बोले-
``िजनके पास अनाज खरीदने के िलए रपया नहीं है वे अपना मकान,अपनी ज़मीन या गहने जो
भी है उसे िगरवी रखकर अनाज ले जाएं दम
ु दबाकर......मुफत मे तो मै अनाज कयो दँ।ू िजसे चािहए ले जाए िकसी को
मना तो नहीं करंगा।`
`और ऐसा ही हुआ ।जररतमनदो को अपनी ज़मीन , मकान और गहने महाजन के पास िगरवी रखने पड़े , तब कहीं
सोचकर महाजन ने जररतमनदो को अनाज िदया।इतना ही नहीं उनहोने उन जररतमनदो से कोरे बहीखाते पर अंगठ
ू ा
भी लगवा िलया।िरमदास महाजन को इससे अचछा अवसर िफर कभी िमल नहीं पाएगा।यह उनहोने जान िलया था।
इसी अवसर का लाभ उठाना मुनािसब समझा और उनहोने ऐसा िकया भी।वे अतयनत पसनन हो गए और माता लकमी
मैया को बार-बार नतमसतक करते रहे ।
भूरा की भी यह िसथित हो गई थी िक उसके पास अब रपया भी नहीं था िक वह िरमदास महाजन
से अनाज खरीद भी नहीं सके। वैसे भी भूरा ने महाजन से बैल खरीदने के िलए रपया उिार िलया है ,िजसे खिलहानी
पर चुकाना होगा।खिलहानी अब होने से रही।महाजन का िरन चुकाना भी किठन हो जाएगा।ऐसे मे वह भूरा को उिारी
मे अनाज भी दे तो कैसे दे ।महाजन िकसी भी गामीण को उिारी मे अनाज दे ने को तैयार नहीं है ।िफर भूरा को कैसे दे ।
000

बचचो को ऐसी संकि की घड़ी मे समझाना बहुत किठन होता है ।वे इस संकि से अनजान रहते है ।
यिद उनहे ्े मालूम भी हो तो भी वे मानिसकतौर पर संकि से लड़ने के िलए तैयार नहीं रहते।ऐसे मे माता-िपताओं के
सामने पितकूल िसथित पैदा हो जाती है । घर मे पयाप
म भोजन की वयवसथा नहीं है ।अकाल और सूखा पड़ा है ।अनाज
नहीं है ।सबजी-भाजी नहीं है ।दि
ू नहीं है ।घी नहीं है । यह सब कहाँ से ला सकेगे।यह िसथित बचचो के समापे सपि करना
बहुत िे ड़ी खीर सा है । कयोिक बचचो के पश.....कया...कयो....कैसे.....षोषो आिद होते है । िजनका उतर माता-िपता को
दे ना बहुत ही किठन होता है ।
हिर भूख के मारे रो रहा है ।भूरा िववश है ,वह िचनतातुर शूनय मे दे खे जा रहा है ।कमली चूलहे ्े पर
हांड़ी चढ़ाकर हिर को समझाने की कोिशश कर रही है ।
`` माँ ! भूख लगी है ।``
``ठहर , अभी हुआ जाता है ।``
`` अभी .....अभी......अभी.....नहीं.....¬¬जलदी से दे न .् ................``
`` अचछा ले..................................``
कमली हांडी मे से उबले हुए गेहूँ के दाने हिर के सामने थाली मे डालती है ।थाली मे उबले हुए गेहूँ को दे ख हिर रोने
लगता है ।
`` नहीं.....मुझको ये नहीं.....रोिी चािहए......भाजी चािहए.......अं.....अं....अं.
`` नहीं है बेिे......अभी यह खा ले बाद मे मेरे राजा बेिे को रोिी-सबजी िखलाऊँगी।``
`` अभी कयो नहीं¬¬¬¬.......बाद मे कयो........मुझको तो अभी चािहए.........``
`` अचछे बचचे िज़द नहीं करते। आज तू ये खा ले कल तुझे रोिी-सबजी िखलाऊँगी ।``
`` अचछा माँ....कल जरर िमलेगी न रोिी-सबजी षोषो``
`` हाँ मेरे अचछे बचचे जरर िमलेगी ।``
`` अचछा माँ तू और बाबा भी खा ले िफर कल हम लोग रोिी-सबजी खा्ाएंगे ।‘खूब खाएंगे।``
कमली की आँखो मे आँसू भर आए।उसने अपना मुख छुपा िलया और रोते हुए बाहर िनकल गई।
00
इस वषम अकाल और सूखे के कारण िकसानो की िसथित पितकूल हो गई।घरो मे रखा अनाज
समाप हो गया।चौिरी कमलिसंह ने अपने गोदाम का अनाज भी गामीणो को िवतिरत करवा िदया।िरमदास महाजन
ने गामीणो को सूखे के अवसर का लाभ उठाकर सड़ा-गला अनाज ऊँची िकमत पर बेच िदया। इस किठन िसथित मे
गाँव-समाज के लोगो ने हर िसथित का सामना करने की ठान ली िकनतु िविाता की मरजी के आगे िकसकी चली जो
इन िववश िकसानो की चलेगी।इतनी अििक िववशता के बावजूद िरमदास महाजन िकसानो से ऋण का सूद उगलने
चल िदए। उनहोने वीर नाम के गामीण के घर पर अचानक जाकर घेर िलया और लगे ऋण के सूद के भुगतान की
वसूली की चकललस करने।वीर के पास इस सूखे की िसथित मे सूद चुकाने के िलए कहाँ से रपया आए षोषो वह तो यूँ
ही संकि मे आ िघरा है । िरमदास को वीर और उसके बचचे-बीवी पर ज़रा भी दया नहीं आई। उनहोने िकशन और साथ
मे लाएं अपने नौकरो को वीर के घर का सामान बाहर िनकलवाने के आदे श दे िदए।वे िरमदास महाजन के इशारे पर
वीर के घर का सामान िनकाल बाहर फे्ंकने लगे।वीर ने लाख मननत-िमनौती की िकनतु महाजन िस से मस नहीं
हुए । बोले-
`` पर साल के पर साल तूने खेत और मकान मेरे पास िगरवी रखकर ढ़ाई हज़ार का िरन िलया था।
मूल तो मूल तूने सूद भी पूरा नहीं चुकाया ।``
`` नहीं सेठ जी , हम अनपढ़ गंवार िरन कया जाने िकनतु तुम तो पढ़े िलखे हो।सूद दे ने पर मूल की बकाया
रहता है ।``
`` कौन सा सूद......आ........कौन सा सूद िदया तूने......सूद तो पूरा चुकाया नहीं और बाकी जो सूद बचा है उस
पर भी सूद लगाता समझे ``
`` सेठ जी यह तो जयादती है ...बकाया मूल ही तो बाकी है वो भी दे ही दँग
ू ा।``
`` दे ख वीर तूने एक बरस के िलए िरन िलया था और िलखा पढ़ी करवाई थी.....हाँ िक
नहीं.....अं......बोल हां्ँ िक नहीं....दम
ु दबाकर.....षोषो``
`` ये तो सही है ।``
`` ये भी सही है िक एक साल मे कजम नहीं चुका तो मकान और दो बीघे ज़मीन जप हो जाएगी ।``
`` लेिकन सेठ जी , सूद तो बराबर दे ता रहा.....िकसी मिहने सूद नहीं िमला तो अगले मिहने दग
ु ुना सूद िदया।
``
``अरे बावरे ......यह तो सूद का सूद था न....बोल तूने ऐसा ही िलखवाया था िक नहीं दम
ु दबाकर ...``
`` इ तो नाइनसाफी है ।``
`` अरे जो िलखा पढ़ी है वे तो ऐसी ही तो है ....दे ख ज़रा दम
ु दबाकर दे ख।``
`` इ तो सराबर बेईमानी है । िकसनवा......रक......सामान मत उठा रक तो...नहीं ऐसा नहीं हो सकता ।तुम
लोग सामान नहीं िफकवा सकते।``
`` दे खते कया हो । मारो ससाले को थपपड़ और उठाकर फेको सारा सामान...िरन नहीं चुकाऐगा....सूद नहीं
चुकाएगा .....मुफत का समझ कर रखा है कयाकोई खैरात नहीं बांिी समझे.....``
तैश मे आकर महाजन बौखला उठा। िकशन बहुत ही भदद्ी गाली दे कर वीर को ज़ोरो से िकका दे ता है ।वह दीवार से
जा िकराता है । वीर के िसर से रि की फुहार फूि पड़ी ।पचरं गी और बचचे रोने लगे।पित को आहत होते दे ख पचरं गी
ऊँची-ऊँची आवाज़ मे महाजन को गाली दे ने लगी लेिकन महाजन ने ज़रा भी धयान नहीं िदया और वीर के घर को
अपना ताला लगवा िदया। वह तेज़ी से चल दे ता है ।उसके पीछे -पीछे िकसना और उसके साथी भी चल दे ते है । वीर
कराह उठता है । माथे को थाम कर बैठ जाता है । पचरं गी अपनी साड़ी का िसरा फाड़कर वीर के िसर पर बांिती है ।रि
काफी बह रहा है । पिट्ी बांिने से रि का बहना रक गया। बचचे अब भी रो रहे है ।पचरं गी तैश मे अब भी महाजन को
गाली िदए जा रही है । वीर िसर थामे बोला-
`` जो भािय मे िलखा है वो तो होता ही है ।``
`` चलो जी , इस गाँव मे हमारे िलए कुछ भी नहीं है । इस गाँव को ही छोड़ दे कहीं ओर जाकर मजूरी कर
अपना और बचचो का पेि पाल लेगे।``
`` चलो.....जहाँ तकदीर ले जाएगी वहीं जाएंगे ।चलो सामान उठाओ।``
जाने भूरा िकस ओर से चले आ रहे थे।आंगन मे सामान िबखरा हुआ....दरवाज़े पर ताला लगा और वीर ,पचरं गी तथा
बचचो को बाहर है रान-परे शान हालात मे दे ख रक गए। वे समझ नहीं पाए िक यह कया हुआ है । पल भर रकते है िफर
पूछ ही लेते-
`` तुम लो्ेग घर को ताला लगाकर कहाँ जा रहे हो षोषो``
`` जहाँ िकसमत ले जाए वहीं जाएंगे भैया । जब इस गाँव से हमारा दाना-पानी उठ गया है तो अब इस गाँव मे
हमारे िलए रखा ही कया है ।``
`` नहीं रे वीर ! ऐसी बाते नहीं करते।हम है न अभी.....जब तक हम है तब तक तुम यह गाँव छोड़कर नहीं जा
सकते।``
`` लेिकन भैया ! हम यहाँ रहकर कया करे गे। न मजूरी,न खेतीबाड़ी.....और अब तो महाजन ने िरन मे हमारा
मकान ही हड़प िलया । हम बाल-बचचो को लेकर रहे गे कहाँ षोषो``
`` नहीं वीर ....अववल तो तुम गाँव-समाज को छोड़कर नहीं जाओगे।कुछ न कुछ तो हम लोग िमलकर करे गे
ही । चौिरी काका जब तक साथ मे है तब तक िचनता की कोई बात नहीं। चलो चौिरी काका के पास....कुछ तो रासता
िनकल ही जाएगा।``
`` और बचचे षोषो``
`` अभी तो हमारे घर ले चलो।जब संकि की घड़ी आई है तो सब िमलकर सामाना करना चािहए।भूखे मरे गे
तो सब मरे गे और यिद दाना-पानी िमला तो सबको िमलेगा।``
`` जैसी तुमहारी इचछा भूरा भाई...``
वीर को गले से लगा िलया भूरा ने। पचरं गी की आँखे भर आई।वह बचचो को लेकर सीिे भूरा के घर जा पहुँची। पचरं गी
और बचचो को आता दे ख कमली ने सवागत िकया और पचरं गी को गले से लगा िलया ।
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चौिरी कमलिसंह अपने गाँव-समाज और दे श के पित अपना उतरदाियतव समझते है ।िजतनी िचनता उनहे
गाँव-समाज की रहती है उतनी ही िजममेदारी वे अपने दे श के पित समझते है । आये िदन हो रहे िविवि तरह की
पितकूल गितिविियो के पित वे अििक िचिनतत रहते है लेिकन कर कया सकते।वे अकेले इन पितकूल पिरिसथितयो
से जूझ नहीं सकते।आतमबल हालांिक उनके पास पचूर है िकनतु अकेले आतमबल से कया होनेवाला है ।उनके पास
समूह की कमी है ।यह बात अलग है िक आसपास के गाँव के संभानत वयिियो से उनकी अचछी-खासी बात है िकनतु
दे श-समाज के पित सभी अपनी िजममेदारी हर कोई नहीं समझता।इतना ही नहीं....पतयेक गितिविियो्े के संचालन
के िलए आतमबल के अलावा समूह और िन की आवशयकता होती है ।दोनो के अभाव मे कुछ िकया जाना संभव नहीं
है । जब िसथितयाँ पितकूल हो तो और भी अििक किठनाई होती है ।बावजूद इसके चौिरी कमलिसंह अपने कमक
म े़्त
मे जुिे हुए है ।वे हार नहीं माननेवाले।वे अकेले ही इन पितकूल पिरिसथितयो से िनपिने का हौसला रखते है ।
चौिराइन पान का बीड़ा लगाते हुए बोली -
`` हमारी बेिी इनदावती की बचची का नामकरण हो गया है षोषो कया नाम रखा बचची का षोषो``
`` रािा ....शीकृ षण की रािा जैसी सुनदर है हमारी पोती....``
वे बात तो कर रहे है चौिराइन से िकनतु साथ ही अखबार भी पढ़ रहे है । चौिरी जी अखबार के बहुत शौकीन है ।इससे
उनहे दे श-समाज की सारी खबरे िमल जाती है ।जब अचछी खबरे होती है तब वे बहुत पसनन होते है और जब द ु:खदायी
खबरे होती है वे बहुत उदास हो जाते है ।बोले-

`` वाह खूब.....लाठी चाजम....दस घायल....पचचीस िगरफतार.....``


`` यह तो अचछा नहीं हुआ जी । उगवादी....आतंकवादी जुलम करे और हमारी सरकार तमाश दे खती रह
जाए......जनता मारी जाती है और नेता लोग जनता की आड़ मे अपनी रोिियाँ सेकते है ।``
``गाँिी बाबा का कहना है िक खून खराबा......कया कहते है ........हाँ.......िहं सा नहीं करनी चािहए । अिहं सा
परमोिमम:....``
``गाँिी बाबा तो कह गए....उनहोने भी नाथूराम गोड़से की गोली खाई....गोड़से भी तो एक तरह का उगवादी-
आतंकवादी ही होगा....उसके बाद कया िकया सरकार ने षोषो.....तब से लगातार िकसी न िकसी तरह दे श और जनता
पर उगवादी और आतंकवादी ने िहं सा का बलात ् पयोग िकया।नेता लोग तो आराम फरमाते है मारी जाती है तो
केवल दे श की जनता....``
तभी नीलमिसंह आ िमके । उनका चेहरा लमतमाया हुआ है ।िोती-कुताम पहले वे आज बहुत ही शालीन लग रहे है ।
मुख मे पान की िगनौरी दबाए है । कुते पर पान के पीक का िबबा लगा है । लगता है कहीं से खुश होकर आ रहे है ।लेिकन
यह कया वे तो िशकायत ले आए है ।बोले-
`` बाबूजी...गुलाबो पर कोई पाबनदी ही नहीं है । वो तो सारे गाँव मे आवारा की तरह रं भाते िफरती है । कभी
िकसी को मारती है कभी िकसी को.....दे खो.....तो मेरे कुरते पर पान की पीक डाल दी ।``
`` लगता है ये पान की पीक गुलाबो की नहीं तुमहारी ही होगी जो पान खाते हुए िगर गई और नाम गुलाबो का
ले रहे हो।``
चौिराइन िखलिखलकर हं स पड़ी।जैसे वह जानती हो िक वासतव मे बात कया है ।गलती गुलाबो की है या नीलमिसंह
की। दोनो ही समवयसक है ।हं सी-िठठौली करते रहते है ।युवा है तो गरम खून उबलते रहता है । वह िफर चौिरी को
समबोिित करते हुए बोली-
`` दे खो जी .....``
`` अब तक दे खता ही आ रहा हूँ िकनतु हाँ...कुछ सुनना नहीं चाहता ।``
`` दे खना भी होगा और सुनना भी होगा। ये अब सयाने हो गए है । सपने दे खने लगे है ।इसिलए तो उस
आवारा गुलाबो के पीछे -पीछे घूमते है ।``
नहीं बाबा ! वो तो गोपाल ,गुलाबो के पीछे -पीछे पड़ा रहता है । मै कयो गुलाबो के पीछे पडू ं गा षोषो``
`` मेरी मानो तो इनके पैरो मे बेिड़याँ डाल दो। अपने-आप पिरी पर आ जाएंगे।``
`` नहीं बाबा......मै तो राषीय एकता आनदोलन कामयाब होने पर ही शादी के बारे मे सोचूँगा.....अभी
नहीं्ं.......``
`` तो कया यो ही उस आवारा के आगे-पीछे मिकते रहोगे षोषो``
`` नहीं , आवारा नहीं....गाँव-समाज के नवयवको और नवयुवितयो के िदल मे्े राषीय एकता आनदोलन के
िलए पे््ररणा के सफुरण उतपनन करने के िलए पूरा जोर लगाऊँगा ।``
`` आिखर.....बाप और बेिा एक ही िसकके के दो पहलू हो । चत भी हमारी और पि भी हमारी ।``
`` लेिकन दे ख रहा हूँ िक िकसी को भी गाँव-समाज की िचनता नहीं है । सूखा पड़ा है ।सारा गाँव सूखे की चपेि
मे है और हमारे सािहबजादे है िक.......``
कहते हुए चौिरी रक गए । अखबार अलग रख उठ कर बाहर िनकल गए ।
00

दिुनया मे तरह-तरह के लोग रहते है । सभी मे िकसी न िकसी तरह के गुण-अवगुण िवदमान रहते
है ।जहाँ बहुत बुरे लोग रहते है वहाँ बहुत अचछे लोग भी रहते है । जररी नहीं िक हर जगह नकारातमक िवचारो के लोग
ही हो सकारातमक िवचारो के लोगो की भी कमी नहीं है । जहाँ बुराई िवदमान रहती है वहाँ अचछाई भी िवदमान रहती
है । िवश मे्े सदै व दो तरह के ततव िवदमान रहते है । एक,सकारातमक ,दो-नकारातमक । अंिेरा-रोशनी , रात-िदन,
पाप-पूणय, अचछा-बुरा ,दे वता-राकस , बुरा-भला ,पापी-पूणयातमा ,दरुाचारी-सदाचारी ,सवगम-नरक आिद-आिद। इसी
तरह गाँव समाज मे िरमदास महाजन जैसे दरुाचारी है तो चौिरी कमलिसंह जैसे सदाचारी भी िवदमान है ।तभी तो
गाँव-समाज मे अब तक कुछ-कुछ अचछाई बची हुई है । चौिरी कमलिसंह के कारण गाँव-समाज की लाज अब तक
बची हुई है ।
िरमदास महाजन की जयादितयो से गाँव-समाज के िनिन
म और ऋणगसत गामीण तंग आ गए है ।
आए िदन िनिन
म ो और ऋणगसतो पर अतयाचार बढ़ रहे है िकनतु इस अतयाचार से बचने के िलए कोई अनय िवकलप
इन िववश लोगो के पास नहीं है ।
वे अनतत:चौिरी कमलिसंह के पास जा पहुँचते है कयोिक कोई न कोई समािान यहाँ िमल ही जाता है । भूरा के साथ
भी ऐसा ही हुआ।उसने चोरी गए बैल के सथान पर एक बैल खरीदने के िलए िरमदास महाजन से बतौर ऋण के कुछ
रपये उिार िलए थे िकनतु अब की बार सूखा पड़ने से पूरे इलाके मे खेती-बाड़ी की िसथित बहुत ही िचनतनीय होगई है ।
ऐसी िवकि िसथित मे भूरा के पास िरमदास महाजन को सूद दे ने के िलए रपये नहीं थे।उनहे पितमाह महाजन को सूद
चुकाना जररी हो जाता था। िवकि िसथित को दे खते हुए भूरा ने चौिरी कमलिसंह से गुहार की और चौिरी जी ने िबना
िकसी तरह का िवलमब िकये भूरा की समसय का िनराकरण कर िदया।उनहोने िरमदास से कह िदया िक जब तक
अचछी तरह से खेती-बाड़ी नहीं होती तब तक वह भूरा से न तो मूलिन और न ही सूद की रािश के िलए िववाद करे गे।
जयो ही अचछी खेती-बाड़ी होगी उनहे उनके रपये मयसूद के लौिा िदए जाएंगे। चूँिक चौिरी जी महाजन के शसुर
लगते है इसिलए उनहोने यह बात सवीकार कर ली । भूरा पसनन होकर घर लौि आए । िपता को घर आते दे ख हिर
मचल उठा।
`` ओ......ओ......बापू आ गए....बापू आ गए....``
कमली उपले पाथ रही थी।उसके हाथो मे गोबर सना हुआ था।भूरा को पसननिचत आए हुए दे ख कमली भाविवभोर हो
गई।भूरा को पसनन होते दे खने का मतलब वह समझ गई थी िक अवशय ही कोई न कोई अचछी खबर है । वह
भावाितरे क मे भूरा से िलपि गई।उसकी आँखो मे पसननता के आँसू भर आए।
`` हिर के बाप.....हिर के बापू......!``
`` अरे पगली......तू तो रो रही है ।......नहीं रोते.....खुशी मे कोई रोता है भला........चौिरी काका की
मेहरबानी से आज हमको महाजन ने पूरे साल की मोहलत दी है । यूँ समझो िक हम महाजन के बनिन से मुि हो गए ।
``
`` भगवान , चौिरी काका को हमारी उम दे दे ।``
`` हाँ कमली....``
`` चलो िमनदर चले । भगवान के दशन
म कर आते है ।........अरे ....ये...कया षोषो मेरे हाथो मे सना
हुआ गोबर तुमहारी पीठ पर लग गया...``
हिर उछल पड़ा--
`` बाबा की पीठ पर गोबर पाथा गया ......हो.....हो........हो......``
भूरा और कमली शमम से लाल हो गए । पे््रम ,िवशास और शदा का दस
ू रा नाम है ।िवशास और शदा इनसानो मे
पे््रम उतपनन करता है । केवल दो वयिियो को ही नहीं बांिता बिलक समपूणम िवश को अपने पे््रम मे जकड़ लेता है ।
पे््रम का अि्वदतीय सवाद चर-चराचर को अपने बंिन मे इस तरह जकड़ लेता है िक चाहने पर भी कोई उससे
छुिकारा नहीं पा सकता । पे््रम न केवल दो शरीरो का िमलन है बिलक यह दो आतमाओं का संगम है ।ऐसी दो
आतमाएं दो पे््रम के सवरप मे एकाकार हो जाती है । पभुतव को पाप कर लेती है । पे््रम के बादशािहयत को पाप हो
जाती है । पे््रम का बेगानापन परमाननद की चरमावसथा का पतीक है । िजसे पाप कर आतमा िचदाननद मे एकाकार
हो मुि हो जाती है ।इसमे ज़रा सा भी दाग आने पर यह अवसथा पाणी को पाप नहीं होती।इसिलए िनिवक
म ार पे््रम
सदा अहे तुक होता है । हे तुक को इसमे सथान नहीं है । पे््रम का दान िवश मे सभी दानो से शष
े है । बस ,आवशयकता है
तो इसे पहचानने की ।िजसने पे््रम को अनतरातमा से पहचान िलया वह संसार सागर के द ु:ख संताप को तार जाता है
िफर उसे कुछ पाप करने की आवशयकता महसूस नहीं होती । वह सवयं तो तर ही जाता है साथ ही मानव समाज को
भी तार जाता है । सवयं मुि होकर समपूणम मानवता को मुि करने की राह पशसत करता है । कोई पेम करके दे खे बशतम
उसमे सवाथम न हो । सवाथम और अिवशास पे््रम के िलए घातक होता है ।
भूरा ने सहमित वयि की -
`` हाँ....हाँ....चलो िमनदर चलते है ।``
घर से कुछ ही दरूी पर गाँव-समाज वदारा बनाया गया भगवान शीकृ षण का िमनदर है ।इस िमनदर मे सदै व पूजा-पाठ
होते रहता है । चौिरी कमलिसंह के सौजनय से यहाँ सदै व कोई न कोई कायक
म म होते रहते है ।
सुबह का समय था। आठ बज रहे होगे। िमनदर मे आरती हो रही थी।भूरा-कमली पूजा का सामान
पुजारी के पास दे ते है । पुजारी जी पूजा कर पसाद और थाली कमली के हाथ मे दे ते है । कमली ने भगवान शीकृ षण से
पाथन
म ा की -
`` हे जगदीशर ! आप परम दयालु है , सवज
म है , सभी पािणयो के भरण-पोषण करनेवाले है ।िदन-
रात ,काल और काल की गित तथा मन की गित से भी आप परे है ।आप अनतयाम
म ी है आपसे कुछ भी िछपा नहीं है ।
इसिलए हे पभो ! हे अिखल बहाणड के एक मात सवामी ! इस गाँव पर और हम सब पर कृ पा करो । इस सूखे की पीड़ा
से हम सबको उबारो भगवन ्! ``
`` हे परमाननद !्् हे िसचचदाननदघन परमेशर शीकृ षण ! हमारी इस पाथन
म ा के बाद भी यिद
बरसात नहीं होगी तो मै आमरण तेरी इस चौ्ैखि पर तक तक अनशन करँगा जब तक िक तू बरसात नहीं करे गा ।``
`` अरे !तुमने यह कया िकया षोषो``कमली साशयम बोली
`` न जाने मेरे मुख से यह अनायास कयो िनकल आया।मैने तो ऐसा सोचा ही नहीं था।``
`` ‘शायद पभु की यही इचछा हो हिर के बापू !``कमली बोली
`` यिद पभु की यही इचछा है तो मै इस संकलप को अवशय पूरा करंगा।``भूरा ने दढ़तापूवक
म कहा
`` कहते है न िक सब कुछ ईशर की मजी से होता है ।इसिलए उनहोने तुमहारे मुख ये यह कहलवालया।``
`` हाँ , हिर की माँ । अब मै यह संकलप पूरा करके ही रहूँगा।``
भूरा का इस तरह का संकलप पुजारी भी सुन रहे थे।पुजारी ने शंख उठाया और ज़ोरो से बजाया । शंखधविन से िमनदर
का गुब
ं ज गूज
ँ उठा । दशन
म ािथय
म ो ्ंने घणिे और घिड़याल बजाए । भिो ने शीकृ षण िुन छे ड़ दी .....
`` गोिवनद बोलो हिर गोपाल बोले
रािारमण हिर गोिवनद बोलो
गोिवनद बोले...गोपाल बोलो.....
आिे घणिे तक शीक 1 षण िुन से िमनदर का पांगण गूँजा रहा। भिो और दशनािथय
म ो ्ंने जय-जयकार लगाई।
कुछ ही समय मे भूरा वदारा िलए गए संकलप की चचाम सारे गाँव-समाज मे फैल गई। पूरे गाँव के
लोगो को पता चल गया िक यिद बरसात नहीं होगी तो भूरा तब तक आमरण अनशन पर बैठेगा जब तक भगवान
बरसात नहीं कराऐंगे । चौिरी कमलिसंह से लेकर िरमदास महाजन तक यहाँ तक िक गाँव के अिनतम वयिि तक
यह खबर आग की तरह फकल गई। चारो ओर भूरा की जय-जयकार होने लगी।
00

चौिरी कमलिसंह जी ने राषीय एकता आनदोलन के कायक


म ताओं की आपात बैठक आमंितत की ।
यह आपात बैठक मे सूखे की िसथित पर िवचार िवमशम होना है । चौिरी बोले-
`` दे श आज़ाद हुआ , यह सभी जानते है ।लगभग दो सौ वषोZ्ं तक दे श गुलामी की बेिड़यो मे
जकड़ा रहा और दे श के िवकास के िलए तो कुछ हुआ ही नहीं बिलक दे श के िवनाश के िलए बाहरी शिियाँ पचणड हो
रही है । अंगे््रजो ने भारितयो को भी आपस मे लड़वाया तािक एकता बनी न रहे और अंगेजो की हुकुमत भारत पर
बरकरार रहे । अंगे््रज जा चुके है और अब.......अब हमे अपने गाँव और दे श को संवारना है ।गाँव का िवकास होगा तो
दे श का िवकास होगा।दे श का िवकास हमारा अपना िवकास है ।असल मे यही हमारी आज़ादी है ।``
`` हाँ , इसके िलए अब हमे एक और एकता के साथ पुरानी गलितयो को सुिारना होगा।अंगेजो को
गए हुए भी जयादा वि हुआ है लेिकन अंगेजो के जाने के बाद भी गुलामी की बेिड़याँ हम भारितयो के हदय पर अभी भी
पड़ी हुई है ।`` नीलमिसंह बोले।
`` काका ! ये सब बाते तो हमारी समझ मे आती नहीं। हम तो ये जानते है िक इस गाँव मे जो
सूखा पड़ा है और साहूकार गामीणो को िजस तरह से तंग कर रहा है उससे िकस तरह िनपिा जाय षोषो``
गोपाल ने अपनी बात रखी-
`` मै नहीं जानता आज़ादी िकस वसतु का नाम है लेिकन वह यह जानता हूँ िक अब भी हम गुलाम है ।चाहे अंगेजो के
हो या भारितयो के...गुलामी अब तक हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है । अब हम इस भीतरी गुलामी से तंग आ गए है । हमे
असली आज़ादी चािहए।वह कहाँ है ।हम अपने ही दे श मे रहकर अब भी गुलामी की जंजीरो मे ज कड़े हुए है ।हम कब
आज़ाद होगेषोषोहमे नहीं मालूम ।``
गोपाल की बात सुनकर कण भर के िलए सभा मे खामौशी छा गई। लेिकन चौिरी जी तिसथ रहे ।बोले-
`` सूखा केवल गाँव मे ही नहीं सारे िजले मे पड़ा है । यह सब पाकृ ितक िवपदा है । इससे िनपिना
इतना आसान नहीं है । दस
ू रे , हमारी जमीदारी तो अब नहीं रही िफर भी जो भी हमसे बन पड़ा ,तुम सभी जानते ही
हो...हमने िकया। अब हमारे बस मे कुछ नहीं........साहूकारो से िनपिना भी अब हमारे बस मे नहीं है । साहूकारो से
िनपिने के िलए कानून है , सरकार है .....कचहिरयाँ और थाने है । सारे के सारे है । इसके अलावा सबसे बड़ी शिि तुम
लोगो की एकता की है । जब तक तुम लोगो मे एकता है ।एकता का परचम लहराया रहा है । तब तक तुमहारा कोई कुछ
नहीं कर सकता ।``
`` इन सबसे िनपिने के िलए हम बार-बार गामीणो को पे््रिरत करते रहते है िक सब एकजुि होर
आपितयो से जूझे।तभी हम सफल हो सकते है ।एकता मे बड़ी शिि है ।`` नीलमिसंह बोले।
`` काका ! शायद आपको खबर िमल गई होगी िक सूखे की िसथित से िनपिने के िलए हमारे इसी
गाँव का एक िकसान िपछले िदना्ो िमनदर मे जाकर भगवान के सामने संकलप िकया है िक इस गाँव मे जब तक
बरसात नहीं होगी, वह िमनदर की चौखि पर आमरण वत लेकर पड़ा रहे गा ।``
गोपाल ने जानकारी दे ते हुए कहा ।
`` कौन है इतना हौसलेमनद ।अपने इरादे पर अिडग वह िकसान षोषो``
`` वह है एक छोिा सा अदना सा मुिसबत का मारा िकसान ...भूरा है !``
गोपाल ने पूरे िवशास के साथ यह जानकारी सभा मे दी तो गामीणो मे िफर भूरा को लेकर गुिरगू
होने लगी। चौिरी कमलिसंह के मुख पर पसननता की आभा झलक पड़ी।बोले-
`` इस किठन समय मे हमारे गाँव-समाज मे भूरा जैसे लोग अभी भी मौजूद है और जब तक ऐसे
लोग रहे गे तब तक इस गाँव-समाज तो कया इस दे श पर संकि के बादल अििक समय तक नहीं ििक सके्ेगे।``
चौिरी की इस बात पर गामीणो ने करतल धविन से सवागत िकया।
00...

आजादी के पहले दे श की यह िसथित थी िक दे श पर िकसी भी तरह का संकि आ जाए हमारे दे श के


नेता दे श और जनता की खाितर अपना सवस
म व िनछावर करने के िलए ततपर रहते थे।अपनी जान की बाज़ी लगा िदया
करते थे ।इतना ही नहीं उनहोने पाणानत तक दे श और जनता के िलए कायम करते रहे और अनतत:वीरगित को पाप हो
गए।आज दे श के इितहास मे उन राजनेताओं का नाम सवणम अकरो ्ंमे िलखा गया है । लेिकन आज़ादी के बाद सारा
नकशा ही बदल गया है । दे श के राजनेता कहते है िक वे दे श और जनता पर राजय करते है वे और उनकी सनतान कयो
मरे िमिे ।उनका अििकार दे श और जनता पर पभुतव सथािपत करना है मरे -िमिे दे श की जनता।आज के नेता दे श पर
कुबाZ नी दे ना नहीं चाहते।वे चाहते है दे श की जनजा कुबाZ नी दे और वे दे श पर राज़ करे ।
दे श की जनता सदै व ही दे श और जनता के पित संवेदनशील रही है ।चाहे वह समय आज़ादी के
पहले का समय हो या बाद का।जनता के कमव
म ीरो ने जान की बाजी लगाकर अपना सवस
म व िनछावर कर िदया है और
भिवषय मे भी करती रहे गी। यही कारण है िक गाँव-समाज का वयिि भूरा गाँव-समाज के िलए सूखे की िसथित से
िनपिने भगवान मे िमनदर मे आमरण वत पर बैठने के िलए संकलपबद हो गया है । उसका यह कतवमय भूला नहीं िदया
जाएगा।
पात: का समय ।िमनदर जाने के पहले भूरा ने घूिनो तक आिी िोती ,बदन पर बणडी,िसर पर
गमछा बांि िलया।हाथ मे तांबे का लोिा उसमे पान और पाल पर रखा हुआ नारीयल ,जो वत के अनत तक घिसथापना
के रप मे सथािपत रहे गा। पित का अनुसरण करती हुई कमली हरी पुरानी साड़ी ,बलाउस ,खुलेकेश ,हाथो मे हरी
चुिड़याँ, माँग भर ली । कमली मे पूजन के िलए थाली मे यथायोिय सामगी रखी है ।दोनो अपने कतवमय को मूतम रप दे ने
के िलए िमनदर की ओर चल पड़े । वे घर से िनकल कर िमनदर की ओर पसथान कर चले।उनहे दे ख गाँव-समाज के नर-
नारी उनके पीछे चल िदए। िीरे -िीरे उन दोनो के पीछे गामीणो की भीड़ एकत हो गई।भीड उनके पीछे चल दी। मैकू ,
गोपाल , शेरिसंह ,गुलाबो,नीलमिसंह और अनयानय गामीण । यह खबर सारे गाँव-समाज मे िवदुत की तरह फैल गई।
चौिरी कमलिसंह भूरा के इस साहस की भूरी-भूरी पशंसा करने लगे। वे भी िमनदर की ओर चल पड़े ।
िीरे -िीरे िमनदर पांगण गाँव-समाज के लोगो से भर गया।चौिरी कमलिसंह ने आगे आकर भूरा
और कमली का अिभननदन िकया।उनहे िीका लगाया और गामीणो ने उनहे पणाम कर संकलप पूरा करने के िलए
हौसला-अफजाई की । िमनदर मे शंखनाद ,घणिानाद के साथ िघणियाँ बज उठी । नाद और िघणियो की आवाज़ दरू-दरू
तक गूँज उठी । लोगो ने जयकारा लगाया और हिर िुन गाने लगे -
`` शीकृ षण गोिवनद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाहे नाथ नारायण वासुदेवा जय नाथ
नारायण वासुदेवा ।``
लोगो ने िमनदर मे पूजा-पाठ पारं भ कर िदया । िमनदर पांगण गामीणो से खचाखच भर गया।लमबे समय से सूने पड़े
िमनदर मे एक बार िफर चहल-पहल मच गई। सारा वातारण भििमय और संगीतमय हो गया ।
भूरा ने सबके सामने अपना संकलप दोहराया --
`` मै भूरा .इस आशय से िमनदर मे आमरण वत के साथ बैठ रहा हूँ िक जब तक भगवान हमारे
गाँव-समाज
और िजले मे वषाZ नहीं करते तब तक मै अपना यह आमरण वत जारी रखूँगा।गाँव-समाज और िजले की भलाई के
िलए इस आमरण वत को सफल बनाने के िलए आप सभी भाई-बहनो के सहयोग की अपेका है । यह आमरण वत आप
सब के बग़ैर पूरा नहीं हो सकता। मै ईशर का नाम लेकर आज और अभी से आमरण वत पारं भ करता हूँ।``
भूरा के संकलप के साथ गामीणो ने तािलयाँ बजाई और आमरण वत को पूरा करने के िलए सहयोग दे ने का वचन
िदया।
00
अलसुबह िमनदर मे भगवान की आरती की जा रही थी।गाँव-समाज के लोग पहले ही िदन से भूरा
के सहयोगाथम िमनदर पहुँच चुके।कोई िमनदर पांगण मे झाडू बुहार रहा है ।कोई कचरा उठाकर दरू जा फेक आ रहा है ।
कोई िमनदर मे सेवा कर रहा है ।इस तरह गामीणो ने अपने-अपने कतवमय िनिािमरत कर िलए।
आरती ,घणिे ,शंख और लोगो की आवाज़े सम््ूपणम गाँव मे गूँजने लगी।इनदावती िनतयिकया से िनवत

होकर आंगन मे तुलसी के दीपक रख रही थी। उसने िमनदर से आ रही आवाज़े सूनी ,सुनते ही रह गई।वासतव मे अब
तक उसे जात नहीं था िक भूरा ,भगवान के िमनदर मे बरसात लाने के िलए कौल िलए हुआ आमरण वत पर बैठा है ।
शंख,घणिे और लोगो की आवाज़ सुनकर वह चिकत रह गई। सोचने लगी ,ऐसे भीषण सूखे मे कौन लोग िमनदर मे
पूजा-आरािना कर रहे है । उसका धयान िमनदर की ओर आकिषZ त हो गया। वह तुरनत ही भीतर जाती है और हड़बड़ी
के साथ िरमदास महाजन को जगाने लगती है ।
`` ऐ जी ! उठो तो ...िमनदर की ओर से िकतनी ढ़े र सारी आवाज़े आ रही है ।``
`` अं......सोने भी दो....दम
ु दबाकर....``
`` उठो भी । तुमहारी दम
ु वैसे भी कभी नहीं दबती ।``इनदावती हं स पड़ी ।
`` अरे ये गवटिे न खुद सोते है और न दस
ू रो को सोने दे ते है ।``
`` पहले उठो तो....इतनी ढ़े र सारी आवाज़े....शंख....घिड़याल ,घणिो और जयघोष की आवाज़े इस गाँव मे
पहली बार सुबह-सुबह सुनाई दे रही है ।``
`` अरे ! तूने तो नींद हराब कर दी।``
िरमदासजी अंगड़ाई लेते हुए इनदावती का हाथ पकड़कर खींच लेते है । वह िबसतर पर िम ् से िगर पड़ती है ।महाजन
इनदावती को बांहो मे भरना चाहते है िकनतु इनदावती तुरनत उठकर खड़ी हो जाती है ।
`` ऐ जी ! ये कया सुबह-सुबह सारे गाँव-समाज के लोग िमनदर मे भगवान की आरती-पूजा कर रहे है और
एक आपको है िक सुबह-सबेरे भोग करने की पड़ी है ।``
``अरे बावरी ! पे््रम करना भी तो भगवान की पूजा है ।``
`` लेिकन समय पर िकया जाता है पे््रम....हर समय नहीं। पे््रम कोई भोग की वसतु नहीं होती । वह तो
भगवान का अि्वदतीय पसाद होता है ।भोग के साथ कभी पे््रम नहीं िकया जाता।ऐसा नहीं िक जब चाहे तक भोग
कर िलया और कहते रहे िक पे््रम भगवान की पूजा है । तुमहारी तो चाल ही िनराली है .........``
इनदावती के इस तरह से वचन सुनकर िरमदास जी अंगड़ाई लेते हुए उठ बैठे।बोले-
`` ये सारे लोग बावले हो गए है ।कहीं भगवान को इस तरह सुबह-सुबह जगाया जाता है । वे भी तो सोते है
उनको भी तो आराम करने दे ना चािहए।``
`` हाँ....हाँ...जाकर दे खो कया हो रहा है िमनदर मे षोषो``
`` जाता हूँ भई जाता हूँ ।आज सुबह-सुबह न जाने कैसा िदन बीतेगा षोषो``
बड़बड़ाते हुए िरमदास जी गुसलखाने मे चले गए ।
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गाँव-समाज के लोग भूरा का वत और संकलप पूरा करने के िलए तरह-तरह के उपाय सोचने लगे।बैठके
आयोिजत करने लगे।वे जानते है िक यिद भूरा का संकलप पूरा हो गया तो बरसात अवशय होगी और इस कौल को पूरा
करने के िलए उनहे भी कुछ तो मदद करना होगी। नीमलिसंह ने अपने िमतो को आमंितत िकया और बोले-
`` अब हमे िमलकर भूरा के कौल को सफल करने के िलए एकजूि होकर कायम करना चािहए ।``
`` भूरा काका के कौल को पूरा करवाने मे मदद करना हमारा फजम बनता है । इसमे न केवल भूरा काका की
भलाई है बिलक पूरे गाँव-समाज की भलाई है ।``
गुलाबो ने अपनी राय दी । वह नहीं जानती िक कया करना चािहए िकनतु उसने अपनी ओर से कुछ करने का मन बना
िलया है । वह सोचने लगी उसे कुछ ऐसा करना चािहए िजससे िक भूरा काका और काकी का कौल पूरा हो।
`` लेिकन कया करना चािहए गुलाबो षोषो``
`` मुझे लगता है िक सबसे पहले इस गाँव-समाज के पमुख वयिि महाजन काका के बारे मे सोचना चािहए ।
``
`` कयो भला षोषो``
`` मुझे लगता है िक महाजन काका...........हाँ.......उनके पित संिदििता िदखाई दे ते है ।``गुलाबो ने दब
ु ारा
अपने िवचार रखे।
`` कयो भला षोषो`` नीलमिसंह ने पश िकया।
``इसिलए िक भूरा काका ने महाजन से िरन िलया था।सूखा पड़ा तो काका िरन नहीं चुका पाये ।``
िबना िकसी िहचक के गुलाबो ने कह डाला।हालांिक नीलमिसंह ,महाजन के िरशतेदार है िफर भी गुलाबो ने िहममत की।
नीलमिसंह जानते है , सबकुछ जानते है । लेिकन वे सचचाई के साथ है ।उनहे सचचाई के साथ नयाय करना भला लगता
है ,चाहे िरशतेदार ही कयो न हो।वे जानते है िक गाँव-समाज मे रहना है तो िमलजुल कर रहना होगा अनयथा अचछा
नहीं हो सकता। जानकर भी वे कुछ नहीं कर पाते। एक तो िरशतेदार के िवरद कठोर कायव
म ाही नहीं करवा सकते और
दस
ू रे वे िरशतेदार का िवरोि भी नहीं करवा सकते।इससे अििक बीच का रासता मधयसथता का होता है ।इसमे भी यिद
काम नहीं बना तो नयाय ही उिचत होता है ।यही सोच कर नीलमिसंह सचचाई और नयाय के साथ है । चाहे पिरणाम
कुछ भी हो। बहुत सोच समझ के बाद वे बोले-
`` और हमारे बाबूजी ने भूरा काका को महाजन जी के वचन से मुि करवाया।इसिलए तो हमको एक साथ
िमलकर भूरा काका के अिभयान को सफल करने मे उनकी मदद करनी चािहए ।``
`` इस कायम के िलए हमे कोई योजना बनानी होगी ।`` गोपाल बोले
`` हम ऐसा करते है िक दो-दो लोग िदन मे और दो-दो लोग रात मे भूरा काका का कौल पूरा होने तक िमनदर
पर पहरा दे ते रहे ।`` गुलाबो ने अपनी बुिद के अनुसार सोच समझकर कहा।
`` अरी वाह गुलाबो ! हम तो समझे थे िक इस छोकरी को कया अकल होगीलेिकन तू तो बड़ी वो......``
नीलमिसंह ने चुिकी भरी ।
`` चिकदार िनकली है यह छोकरी....है न नीलम....षोषो ``गोपाल िखलिखलाकर हं स पड़ा। तो नीलमिसंह भी
ठहाका लगाकर हं स िदए।बोले-
`` तो यह अिभयान अभी से पारं भ कर दे षोषो ``
`` तो दे र िकस बात की षोषो`` गुलाबो िफर बोल पड़ी ।
`` अब तो हमे ततकाल ही गुलाबो की सलाह पर अमल कर दे नी चािहए।कहीं ऐसा न हो िक कल को गुलाबो
कहे ,मैने तो कहा था तुम लोग ही नहीं माने ।``
यह िबलकुल सतय है िक िजस कायम के्े िलए पण िलया जाए उसे ततकाल पारं भ कर दे ना चािहए।कल का कायम आज
करना उिचत है और आज का कायम अभी ततकण कर दे ना ही समझदारी है । इसके बाद कभी अवसर नहीं आता।वह
हाथ से िनकल जाता है । बाद मे पछताने के अलावा हाथ मे कुछ भी नहीं आता। यह िवचार कर िमत-मणडली अपने
संकलप के अनुसार िमनदर पर पहरा दे ने के िलए योजनाबद तरीके से िनकल पड़े ।
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िरमदास महाजनजी को अब तक िवशास नहीं हो रहा था िक भूरा िमनदर मे आमरण वत का
संकलप िलए बैठा गया है । उनहे इनदावती की बातो पर िवशास नहीं हो रहा था।वे जब तक अपने िवशसत लोगो से
पमािणत नहीं करते तब तक वे िकसी भीबात को सवीकार नहीं करते। जब वे अपनी बैठक मे बैठे थे और दो-चार
आसामी उनको घेरे हुए थे उस समय िकशन लाठी खड़खड़ाते हुए आ गया । महाजन अब तक िकशन की पतीका मे ही
थे।िकशन उनहे गाँव-समाज की सारी जानकािरयाँ एकत कर िदया करता है ।िदन भर की जानकारी सनधया के समय
और रात भर की जानकारी पात:दरबार मे दे ना िकशन का पितिदन का कायम हुआ करता ।महाजन उसे पूरा संरकण दे ते
और वह भी महाजन को पूरा संरकण दे ता।ऐसे कहा जाय तो ठीक होगा िक िकशन ,िरमदास महाजन का अंगरकक है
और िरमदास महाजन उसकी आवशयकताओं की पूितम करने मे पीछे नहीं हिते।इसिलए महाजन गोपनीय
जानकािरयो के आिार पर गाँव-समाज के लोगो्े को पतािड़त करने से नहीं चूकते । िकशन के आते ही महाजन बोले-
`` िकशन ! जो मैने सुना है वो सही है कया षोषो``
`` आपने कया सूना है सेठ जी षोषो``
`` यही िक भूरा बरसात लाने के िलए कोई पण लेकर िमनदर मे बैठलेवाला है ।``
`` बात तो िबलकुल सही है लेिकन मै अभी िमनदर गया ही नहीं ।``
`` तू ऐसा कर , िमनदर जाकर दे ख आ ( वयंिय ) िरन लेकर जब पिा नहीं पा रहा है ता भगवान को मनाने
िमनदर मे जा बैठ रहा है । अरे ऐसे से कोई िरन थोड़े ही चुकेगा।मेहनत मजूरी करे गा तभी तो िरन चुकेगा न.......दे खता
हूँ कैसे बरसात होती है और कैसा िरन नहीं चुकाता दम
ु दबाकर .....``
`` चला जाऊँगा ...``
`` तो जा जलदी जा...दम
ु दबाकर ....`` डपिकर बोले महाजन
`` जाता हूँ हुजूर जाता हूँ....
`` हुजूर के बचचे.....! जलदी जा और जलदी से खबर ले आ...जा..जा....``
`` ये लो तमबाकू ....``
िकशन तमबाकू मलकर महाजन को दे ता ।लाठी ज़ोरो से ठोककर चला गया।जो आसामी अब तक दोनो का वाताल
म ाप
सुन रहे थे ,वे अवाक् हो गए।हालांिक वे लोग भी जानते थे िकनतु महाजन ने उनसे नहीं पूछा।इसका कारण यह हो
सकता है िक महाजन को कोई सही जानकारी नहीं दे ता और महाजन हाथ मलकर रह जाते या िकशन की पतीका
करते।उनहोने यही िकया ।उनहोने िकशन की पतीका की और उसे जानकारी लेने के िलए िमनदर भेज िदया ।
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सारे गाँव-समाज के भदजन और गामीण िमनदर जाकर भूरा की कुशल-केम पूछते और उसे
हौसला-अफजाई करते। िमनदर पांगण मे गाँव-समाज के कुछ िािमक
म पविृत के लो्ागे ने शीमदागवत महापुराण का
अखणड पाठ पारं भ िकया है ।कमबद तरीके से दो-चार लोग आकर महापुराण का पाठ करते रहते है । कुछ लोग अखणड
कीतन
म कर रहे है ...हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे । हरे कृ षण हरे कृ षणकृ षण कृ षण हरे हरे ।``
आज सनधया के समय चौिरी कमलिसंह ,उनकी पती अनुसुया और बेिी इनदावती सिहत अनय भदजन भूरा
की कुशल-केम जानने्े के िलए आ उपिसथत हुए ।चौिरी बोले-
`` अरे भई भूरा ! तू इस गाँव-समाज के िलए इतनी बड़ी तपसया कर रहा है ।यह तो िकसी ने नहीं सोचा था।``
`` नहीं काका ! ये तो मेरा कतवमय है और िफर इसमे मेरा भी तो सवाथम है काका।``
करबद होकर भूरा ने बड़ी िवनमता के साथ चौिरी कमलिसंह की ओर अिभमुख होकर कहा और उठ खड़ा हो गया ।
चौिरी ने उसके कांिे पर हाथ रखकर उसे नीचे िबठाया और बोले-
`` तो तू एक तीर से दो िनशाने साि रहा है षोषो``
``ये तो मैने सोचा ही नहीं था।हाँ , खुद के िसर पर इतनी बड़ी िरन की मार आ पड़ी है और ऊपर से सूखा
पड़ा्ा तो बस यही एक रासता सूझा हम दोनो को.. कमली बोली िक इससे गाँव-समाज की सेवा भी
होगी ।``
`` जब इनसानो के बस मे नहीं होता है तो आदमी भगवान के ही चरणो मे जाता है ।भगवान के चरणो मे बहुत
शािनत िमलती है ।``
`` आप ठीक कह रहे है चौिरी जी !``
िवकमिसह जी भी अपने िमतो और पिरवार के साथ भूरा के इस आयोजन मे आकर शािमल हो गए ।उनहे आता दे ख
चौिरी कमलिसंह ने उनका सवागत िकया और उनहे गले लगाकर अपने पास िबठाया। तभी नीलमिसंह भी अपनी
िोली के साथ आ गए।इतना ही नहीं रकमणी , चमपा , रपा और गुलाबो ढोलक लेकर आ गई और सब की सब जम गई
अपनी िोली बनाकर। अनुसुया जी बोली-
`` ये तूने अचछा िकया गुलाबो िक ढोलक लेकर आ गई। आओ कुछ भजन गा ले। चलो कृ षण-रािा के गीत
गाते है .....
रास रचैया िेनु चरै या माखन चुरावै ननदलाल..
गाओ री......``
सब िखलिखलाकर हं स पड़ती है । गुलाबो ढोलक पर थाप मारती है और गाने लगती है ।उसकी आवाज़ इतनी मिुर है
िक चौिरी सुनकर चिकत रह गए ।
``रास रचैया िेनु चरै या माखन चुरावै ननदलाल..
मुरली की िुन पर ता ता थैया नचे है वज
ृ लाल...
गुलाबो के गाते ही चौिरी कमलिसंह और िवकमिसंह ताली बजाने लगे । उनहे ताली बजाते दे ख पांगण मे ्ंबैठे सभी
लोग ताली बजाने लगे।
अभी िमनदर पांगण मे हं सी-खुशी का महौल मुसकारा रहा था िक जाने कहाँ से िकशन लाठी पिकता हुआ आ
िमका । उसे दे खकर चौिरी कमिलंसह ,नीलमिसंह,िवकमिसंह ,इनदावती, अनुसुया सिहत सभी जनो को ऐसा पतीत
हुआ मानो साकात ् यमराज आकर सामने खड़ा हो गया हो।वे जानते है िक िकशन को िरमदास महाजन वदारा यहाँ
की िसथित जानने के िलए भेजा गया है । वह यहाँ की सारी िसथित दे खकर हू-ब-हू महाजन को जाकर सुनाएगा और
महाजन अपनी कुििल चाल चलने के िलए पैतरे बदलना पारं भ कर दे गा।हालांिक महाजन को इस कायक
म म से कोई
लेना दे ना नही है िकनतु कोई भी शुभ कायम होते दे ख उनहे न जाने कया हो जाता है िक वे िवचिलत हो जाते है और
िवपिरत बुिद होकर पितकूल कायम करने लग जाते है ।

00
िकशन कई वषोZ्ं से महाजन के पास काम करता आ रहा है ।वह अपने मािलक का वफादार नौकर है ।उसे
िकसी के अचछे या बुरे से कोई वासता नहीं।उसे उसका मािलक जो आदे श दे ता है उसे वह बखूबी िनभाता आ रहा है ।
इसिलए वह केवल अपने मािलक का कहना ही सवोपिर समझता है । उसने िमनदर मे पांगण मे चल रही सारी
गितिविियो को अचछी तरह से समझने के बाद िरमदास महाजन को वसतुिसथित से अवगत कराया।महाजन सुनते
ही बौखला उठे।बोले-
`` ऐसा नहीं हो सकता ..िकशन । चौिरी और गाँव-समाज वाले कयो जाएंगे भला भूरा का सहयोग करने के
िलए षोषो उनहे कया पड़ी है भूरा को इस तरह से िहममत िदलवाने की षोषो उनहे कया पड़ी है िक वे सब भूरा को इतना
साहस िदलवाए िक वह आमरण वत जारी रख सके षोषो``
`` सुना है वह केवल अपने िलए ही नहीं बिलक सारे इलाके की भलाई के िलए यह आमरण वत रखा है और
जब तक बरसात नहीं होगी तब तक वह यह वत जारी रखेगा । चाहे उसके पाण िनकल जाएं।``
`` यािन गाँव-समाज और सारे िजले के िलए भूरा आमरण वत के साथ िमनदरमे बैठ गया ।``
`` हाँ हुजूर । वहाँ चौिरी काका के साथ-साथ चौिराइन ,िवकमिसंह पुिलसवालेऔर....और....``
`` और.....और.....कौन षोषो रक कयो गया षोषो``
`` माफ करना हुजूर......हमारी सेठानी जी भी उन सबके साथ वहाँ उपिसथत थी।आप चाहे तो सेठानी जी से
पूछ सकते है ।गलत बोलूँगा तो आप जो चाहे सज़ादे सकते है ।``
``यािन इनदावती........मेरी िरमपती......सेठानी भी उस हरामी का साथ दे ने िमनदर गई थी ।``
महाजन बड़े िवसमय और वयाकुलता के साथ बोले जा रहे थे।उनहे यह लग रहा था िक उनके साथ उनकी िमम पती भी
अनैितक कायो मे उनकी मदद करने जा पहुँची।यह उनकी भूल ही है ।सकारातमक िवचारो और कायो के िलए वयिि
सवयं ही चलकर आगे आता है ।उसे कहने की आवशयकता नहीं होती िक वह इन अचछे कायो के िलए आगे आए।जो
सुिवचारो के होते है वे सवयं ही अपना मागम तय कर लेते है और चल पड़ते है अपने उदे शय को पूरा करने के िलए।अचछे
कायो के िलए सुिवचारो के लोग ततपर रहते है ।यही सुिवचार वयिि का वयिितव होता है । जैसे िवचार होगे वैसा ही
वयिितव होगा।महाजन के जैसे िवचार है वैसा ही उनका वयिितव है । जररी नहीं िक उनकी पती भी उनके िवचारो से
सहमत हो। इनदावती के सुिवचार उसका अपना वयिितव है ।इसिलए वह सावज
म िनक तौर पर इस कायक
म म मे
सहयोग के िलए िमनदर जा पहुँची ।
अभी महाजन और िकशन के बीच िवचार-िवमशम चल ही रहा था िक इनदावती अपनी पुती रािा को गोद मे
िलए बैठक मे पवेश आ गई। वह अब तक इन दोनो की सारी बाते सुन चुकी।आते ही पूरे िवशास और दढ़ता के साथ
बोली-
`` भूरा का साथ दे ने नहीं.......बिलक िमम का साथ दे ने गई थी......और िफर मै अकेली ही नहीं सारा गाँव-
समाज िमनदर जा-आ रहा है ......यह कोई अपराि नहीं और न ही छुपानेवाली बात है ।यिद कोई वयिि िमम का कोई
कायम कर रहा हो तो हमे भी चािहए िक हम िमम के अिभमुख होकर ईशर के सामाने नत-मसतक हो जाए।अनयथा
हममे और पशुओं मे कया अनतर रह जाएगा षोषो``
`` एक नीच आदमी की खािरत ...आिखर कौन लगता है वो....वो...भूरा षोषो``
`` भूरा न ......बाबूजी का.....न माताजी का.....न िवकमिसंह काका का... और न ही गाँव-समाज का कोई
लगता है ।लेिकन हम गाँव-समाजवाले और तुम उसके कया लगते हो षोषोउसने हम सबकी खाितर बरसात लाने के
िलए भगवान के िमनदरमे आमरण वत का कौल िलया है । कौन लगता है वो हम सब लोगो का षोषोबताइए षोषो वह
कयो कर रहा है हम सब लोगो की खाितर इतना किठन कौल जोहम गाँव-समाज के लोग नहीं कर पा रहे है षोषोबताइए
षोषो``
`` न लगता हो वो हमारा कोई लेिकन.......``
`` तुम िकस िकस को रोकोगे षोषो मुझको , बाबूजी को, माताजी को, िवकमिसंह को, गाँव-समाज के लोगो
को । सारे गाँव-समाज के लोगो को रोक सकते हो तुम....रोक सको तो जाकर रोक लो िक कोई साथ नहीं दे भूरा का...या
कोई िमम का साथ न दे या कोई िमनदर मे न जाएं। कर सको तो कर के िदखाओं दे खते है िमम की िवजय होती है िक
अिमम की....जाओ.....जाओ....``
इनदावती की दढ़ता और िमम के पित पगाढ़ िवशास के सामने िरमदास महाजन कुछ नहीं कह पाएं। वे जानते है िक वे
न तो िमम पर पितबंि लगा सकते है और न ही गाँव-समाज पर ....हाँ, वे िमम के िवरद अवशय ही कोई षढ़यंत रच
सकते है । वे इस कायम के िलए मािहर है । वे िमम का साथ भले ही न दे िकनतु िमम के िकसी कायम को होता हुआ नहीं दे ख
सकते।खासकर वे अपने आसािमयो को कोई महतवपूणम कायम करने दे ना नहीं चाहते।वे चाहते है िक उनके आसामी
केवल उनकी जी हुजूरी करे और उनके सामने झुककर उनकी गुलामी करे ।उसके आसामी इतने िववश हो जाए िक वे
उनसे उनकी ज़मीन-जायजाद और जो कुछ भी उनके पास गहने आिद है वे उनका हो जाए और उनके आसामी उनके
सामने नज़रे झुकाकर रखे। वह अपनी बात मनवाने के िलए िकसी भी हद तक िगर सकते है ।वे इसे न तो गलत मानते
है और न ही इसे अनयाय मानते है ।उनका कहना है िक वे जो कुछ करते है वह सब नयाय के अनकूल है । जो कानून मे
है उसे ही वे सवोपिर मानते है । लेिकन वे यह भूल करते है िक नयाय और कानून अंिा होता है ।वह सतय और असतय से
परे है ।कानून-नयाय साक के आिार पर कायम करते है ।भले ही साक असतय हो वह साक ही कहलाता है । िकसी भी
असतय साक के आिार पर कानून-नयाय अपना िनणय
म सुना दे ता है । भले ही यह िनणय
म पाकृ ितक नयाय के िवरद हो।
इतना सब जानने के बावजूद भी िरमदास जी अपने िवचारो को सििचारो के अनुकूल नहीं कर पाते।
उनहोने इनदावती की इतनी दढ़ और िवशास की बाते सुनकर भी अपने िवचारो से नहीं बदले।िकशन को
अपने करीब बुलाकर बहुत ही आिसत्ा से बोले-
`` िकशन ...आज रात को तुम ऐसा करना िक.........``
िरमदास ने िकशन को वो सारी कारगुजारी समझा दी जो उसे करना है ।सुनकर पहले तो िकशन सकपका गया।बोला-
`` हुजूर....लेिकन यह सारी कारगुजारी िमम नहीं है ।``
`` ित ्....तेरे की........तू मेरा मािलक है िक मै तेरा मािलक हूँ।तुझे नौकरी करनी है या इस नौकरी से हाथ
िोना है ।यह जान तो बचचू...तुझको नौकरी से िनकाल िदया तो तू तो गया ही तेरे बाल-बचचे भूखे मरने लग जाएंगे।
यह तो तू जानताहै न....बोल....जानता है न दम
ु दबाकर..``
`` जी हुजूर.....!``
`` तो हुजूर के बचचे.....जा सवाल-जवाब मत कर और जो काम मै्ेने तुझे िदया है उसे पूरी इमानदारी के
साथ कर।इसी मे ही तेरा और तेरे पिरवार का भला है .......अब आ गया समझ मे....दम
ु दबकार...``
`` जी हुजूर....आप िचनता न करे ।आपने जैसा कहा है उसका पूरा-पूरा पालन आपका यह अंगरकक अवशय
करे गा।``
``िवनाशकाले िवपरीत बुिद `` िबलकुल सच ही है ।जब इनसान िवनाश की ओर बढ़ने लगता है तब उसकी बुिद िवपरीत
होने लगती है । वह मानवीय मयाद
म ाओं का उललंघन कर अमानवीय कायम करने लग जाता है और उसके पिरणाम की
िचनता िकये िबना पसनन होताहै ।िवपरीत बुिद से िकया गया कायम पहले तो अमत
ृ के समान लगता है िकनतु जब
उसके पिरणाम सामने आते है तब उसे वह पिरणाम िवष के समान लगने लगते है या इसे यो भी कहा जा सकता है िक
जो अमत
ृ के समान है । वह अनतत:िवष मे पिरवितत
म हो अपने दषुपिरणाम पगि करता है । मनुषय को इस तरह के
दषुपिरणामो से बचकर रहना चािहए।आज िरमदास महाजन की बुिद पितकूल हो रही है ।वे अिमम को िमम समझ रहे
है । अपने सवाथम पर िमम की बिल दे ने के िलए उतावले हो रहे है । उनहोने अपने अंगरकक को जो आदे श िदया वह उसे
इसिलए कर रहा है िक यह उसके मािलक का आदे श है ।मािलक चाहे कैसा भी हो उसके मािलक के आदे श का पालन
करना होता है ,यह हमारे शासो का िविान है ।यह सोचकर िकशन अपने कतवमय का पालन करने के िलए िबना िकसी
पिरणाम के उदत ् हो गया।
उसने
00
आिी रात से जयादा का समय हो रहा था।सारा गाँव-समाज अपने-अपने घरो मे नींद मे सो रहा था।
भूरा,कमली और पुत हिर िमनदर मे अपने कतवमय के पित संलिन थे।गोपाल और नीलमिसंह हाथो मे लािठयाँ िलए
पहरा दे रहे थे। कुछ गामीण शीमदागवत ् का पाठ कर रहे थे।यो कहा जाए िक िमनदर पांगण भििरस मे िवमिन था।
सब कुछ शानत सा चल रहा था। िमनदर पांगण मे हर कोई िनिशनत था।होनी-अनहोनी के पित गामीण सतकम थे।उनहे
िकसी भी अपशकुन का आभास नहीं था।
इिर िकशन अपने मािलक के आदे श का पालन करने के िलए कििबद हो गाँव के बाहर से योजनाबद तरीके
से भूरा के मकान की ओर चला आ रहा है ।उसके एक हाथ मे लाठी और दस
ू रे हाथ मे तैयार की गई मशाल,जो अभी
जलाई नहीं गई थी।वह चारो ओर चौकनना हो भूरा के मकान की ओर चला जा रहा है । रात बहुत गहरा गई है ।आसमान
मे चतुथी के चाँद की मदम-मदम रोशनी िदखाई दे रही है ।तारे जगर-मगर करते ििमििमा रहे है ।हलकी मनद समीर
चल रही है ।िमनदर से शीमदागवत ् पाठ के मदम सवर सुनाई दे रहे है ।िकशन अपने िमशन को मूतम रप दे ने के िलए
सतकम हो भूरा के मकान की ओर सतकमता के साथ आिहसता-आिहसता चला जा रहा है । भूरा के मकान के भीतर दीपक
की हलकी सी रोशनी दे ख िकशन िठठक जाता है । बाहर आंगन मे बैल बंिे हुए है । पास ही बरामदे मे मैकू चारपाई पर
गहरी नींद मे सो रहा है । बैल जुगाली कर रहे है अनायास िकशन का पैर गडडे मे जा पड़ता है ।वह िठठक जाता है ।वह
कोई आवाज़ नहीं करता। उसने एक बार िफर चारो ओर दे खा । कोई िदखाई नहीं दे रहा है ।गाँव पूरी तरह से शानत है ।
गामीण भी गहरी नींद मे सो रह है । िकशन ने झाँक करआंगन मे दे खा।चारपाई पर सो रहे मैकू को वह पहचान नहीं
पाया।उसने भी जयादा तवजजो नहीं दी।उसे इससे कया षोषो कोई भी सोवे,उसे जो काम िदया गया है उसी कामको
अंजाम दे ना है । उसने पूरी सतकमता के साथ मािचस की ितली जलाई और मशाल को जला िदया।एक बार िफर चारो
ओर दे खा और बहुत ही सतकमता के साथ जलती हुई मशाल भूरा के मकान पर फेक अंिेरे मे गुम हो गया। दे खते ही
दे खते आग भूरा के मकान मे फैल गई।बैल ज़ोरो से रं भाने लगे।बैलो के रं भाने की आवाज़ सुन मैकू उठ बैठा।आग
दे खते ही वह घबरा गया । उसने बड़े साहस के साथ बैलो को खूँिो से छोड़ा और आंगन के बाहर आ गया। अब वह
घबरा गया।वह ज़ोरो से िचललाने लगा।
`` बचाओ......बचाओ.........आग लगी.....आग लगी.....बचाओ..... बचाओ ।``
आग की तेज लपिे और मैकू की आवाज़ सुन घरो मे सो रहे गामीण जाग गए।आग की लपिो से दरू-दरू तक पकाश
फैल गया। ``आग....आग....बचाओ...बचाओ `` की आवाज़ से सारा गाँव-समाज जाग उठा।भूरा के मकान के पास भीड़
लग गई। मैकू िचललाया-
`` अरे कोई आग बुझाओ...अरे कोई आग बुझाओ ।``
लेिकन सब बेकार.....सूखे के कारण गाँव मे पानी िकसी के भी पास इतना नहीं िक भूरा के मकान मे लगी आग को
बुझाया जा सके।गामीण भूरा के मकान को जलते हुए दे खते रह गए िकनतु पानी नहीं होने से आग बुझाना किठन हो
गया। आग की लपिे उठती जा रही।सब असहाय से मकान को दे खते रहे ।चौिरी कमलिसंह असहाय से मकान को
दे खते रहे िकनतु कुछ भी कर नहीं पाएं।
मकान के आग की लपिो की रोशनी िमनदर तक िदखाई दे रही थी।नीलमिसंह आग की लपिे दे खते ही
समझ गए । बोले-
`` गोपाल तुम ज़रा धयान रखना मै अभी आता हूँ।``
`` ठीक है । यह भी दे खना िक यह आग की लपिे कहाँ से उठ रही है षोषो``
`` यही पता लगाने जा रहा हूँ।लेिकन साविान...मुझे लगता है िक कुछ अपशकुन है ।तुम साविान
रहना ।मै जो सोच रहा हूँ भगवान करे ऐसा न हो।मै अभी लौि आता हूँ।``
`` ठीक है ।``
नीलमिसंह तेजी से आग की लपिो की िदशा की ओर दौड़ पड़े ।थोड़ी ही दे र मे वे भूर के मकान के पास आ पहुँचे।उनका
सोचना िबलकुल सही िनकला। भूरा का मकान पूरी तरह से जल कर खाक् हो गया। गामीणो को असहाय खड़े दे ख वे
भी चुपचाप आकर चौिरी कमलिसंह के पास आकर खड़े हो गए। कोई िकसी ने नज़रे नहीं िमला पा रहे है ।कारण यह
िक वे कोई भी इस आग पर काबू नहीं पा सकते।उनके पास पानी नहीं है ।बाविड़यो मे पानी नहीं है ।घरो मे पीने की पानी
की कमी है ।ऐसे मे आग बुझाने के िलए पानी कहाँ से लाएं षोषो सभी िचिनतत थे िकनतु असहाय से नज़रे झुकाएं दे खते
रह जाते।कया िकया जा सकता।ऐसे संकि की घड़ी मे एक भगवान का ही सहारा है ।गाँव मे अब तक सरकार ने पीने के
पानी की समसया हल नहीं की है । जब पीने का पानी ही नहीं है तो अनय कायो के िलए पानी कहाँ से लाया जा सकता
है । इस बरस बरसात न होने से सूखे की िसथित से िनपिने के िलए सरकार वदारा अब तक मदद नहीं पहुँचाई गई है ।
इसिलए सरकार से मदद पाने की आशा की जाना उिचत नहीं जान पड़ता। नीलमिसंह,चौिरी कमलिसंह ,िवकमिसंह
और अनानय गामीण दे खते रहने से जयादा कुछ न कर सके। नीलमिसंह से रहा न गया,बोले-
`` काका !......अब हम लोग कया करे ।आज भूरा का मकान जल रहा है ।हमारे पास आग बुझाने के िलए पानी
की वयवसथा नहीं है । भगवान न करे िफर भी कल िकसी और के मकान मे यिद आग लग गई तो हम कया कर पाएंगे ।
``
चौिरी कमलिसंह कुछ न बोल पाएं।वे गाँव-समाज के पुरोिा है ।उनके पास अब ऐसा कोई सािन नहीं है िजससे वे
संकि के समय कर सके्े। गाँव से शहर इतने पास नहीं है िक दमकल बुलवाकर आग बुझाई जा सके।आवागमन के
सािन की कमी के कारण से ऐसे संकि की घड़ी मे गाँव-समाज िबलकुल असहाय हो जाता है ।
कुछ ही कणो मे भूरा के मकान के जल जाने की खबर िमनदर पहुँच गई। खबर पाकर भूरा कुछ कणो के िलए
सतबि हो गया। उसने भगवान की मूितम के सामने िसर झुकाकर आँसू के दो कतरे बहा िदए।वह अपने सथान से उठकर
मकान तक नहीं जा सकता।इसिलए वह कातर नज़रो से कमली की ओर दे खने लगा िकनतु कहा कुछ नहीं।कमली
अपने पित की पीड़ा को समझ गई। उसकी आँखो मे भी आँसू भर आए।उसने िमनदर मे भगवान की मूितम के समक
पणाम िकया और हिर को लेकर चल दी। जलते हुए मकान के सामने गाँव-समाज के लोगो्े की भीड़ दे ख वह समझ
गई िक वे सब असहाय है ।चौिरी कमलिसंह ने कमली को दे खते ही नज़रे नीचे झुका दी।वे कोई जवाब नहीं दे पाने की
िसथित मे थे।
कमली का रोना फूि पड़ता है । वह चीखे मार-मार कर रोने लगी ।
`` हे भगवान ! ये कया हो गया है षोषो अब तो हम बेघर-बार हो गए। ये कैसी तू हमारी परीका ले रहा है
षोषोिवपदा पर िवपदा आ रही है । हे भगवान ! अब हम कया करे षोषो कहाँ जाएं षोषो हे भगवान !``
रपा , चमपा ,रकमणी ,अनुसूया और गुलाबो , कमली को संभालती है ।उसे समझाने का पूरा पयास करती है । रकमणी
समझाने लगी-
`` बहन रोने से कया अब झोपड़ी दब
ु ारा बन जाएगी षोषो िीरज रख बहन । भगवान के घर दे र है अंिेर नहीं
है ।``
`` दीदी ! िीरज रखो । हम लोग है न तुमहारे साथ । अब तो मेरी अममा भी नहीं है । कया तुम मुझको अपना
नहीं समझती षोषो`` चमपा ने ढांढस बंिाते हुए बोली।
`` कमली.....कमली.....रो मत कमली ....दे ख हम सब लोग है तुमहारे साथ....दे ख काका की ओर दे ख....वे भी
बहुत द ु:खी है । लेिकन कया करे । जो भगवान को मंजूर है वही होता है मेरी बहन । ज़रा िीरज रख बहना !``
अनुसूया उसे समझाने लगी।अब तक रके हुए आँसुओं को चौिरी जी थामे रहे लेिकन जयोही कमली को रोते-िबलखते
हुए दे खा उनके आँसू भी बह िनकले।
पीछे से गुलाबो ,अनुसूया ,चमपा और रकमणी ,कमली को संभालते है और उठाकर साथ ले जाती है । वह
रोती-िबलखती रही। उसके आँसू रकते से नहीं रकते थे।उसका घर जलकर खाक हो गया।सूखा नहीं रहता तो कम से
कम आग बुझाने के िलए बाविड़यो से पानी िमल ही जाता । लेिकन अब तो सब सवाहा हो गया है ।
00

सुबह-सबेरे िरमदास जी सवयं चलकर भूरा के मकान के पास आए। सारा मकान जल कर खाक हो चुका था।
कमली ,चमपा, गुलाबो और मैकू, जो कुछ बचा हुआ था उसे उठा-उठाकर एकत कर रहे थे।बैल असहाय से चारे के
इनतज़ार मे दे ख रहे थे।वे बार-बार रं भा रहे थे। उनहे शायद पयास लगी हुई थी। बार-बार बैल इिर-उिर चपलता के
साथ मचल रहे थे। जो कुछ थोड़ा बहुत चारा बचा हुआ था उसे मैकू ने बैलो के पास डाला।बैल चारा खाने लगे।
िरमदास को आता दे ख मैकू ने उनहे नमसकार िकया।महाजन ने केवल िसर िहला िदया और मकान को दे ख कर बोले-
`` राम....राम......राम.....राम........राम........ये कैसे हो गया रे मैकू.... ये तो सारा का सारा मकान की जल कर
खाककर खाक हो गया दम
ु दबाकर.....राम.....राम.....राम....राम यह तो बहुत ही बुरा हो गया। हरे कृ षणा .....हरे
कृ षणा............बहुत बुरा हो गया रे मैकू यह तो............................अचछा......भूरा कहाँ है दम
ु दबाकर षोषो``
`` वह तो िमनदर मे आमरण वत पर बैठा हुआ है ।``
`` राम.....राम......राम.........राम......राम............दम
ु दबाकर ऐसे सािु वयिि का मकान जल कर खाक हो
गया.....हरे ......हरे .......हरे ........``
`` हाँ हुजूर.....बहुत बुरा हो गया।एक तो सूखा पड़ा है ।आग बुझाने के िलए पानी भी नहीं था िजससे आग
बुझाई जा सके।``
`` यह तो और भी जयादा बुरा हो गया दम
ु दबाकर.....राम....राम....राम...राम...``
``मै जाता हूँ िमनदर.....भूरा को तुमहारे आने की खबर दे दँ ू ।``
`` नहीं ।तू कयो जाएगा दम
ु दबाकर...मै खुद ही चला जाऊँगा उसे समझाने के िलए....मुझसे जो भी बनेगा
उसके िलए करँगा....अचछा चलता हूँ...``
दिुनया मे िरमदास जैसे लोग भी होते है जो दस
ू रो के घरो मे आग लगाकर हाथ सेकने आ जाते है ।कई लोगो के नाम
िरमदास ,परमाननद,राजाराम, कृ षणा आिद होते है िकनतु उनमे यथा नाम तथा गुण नहीं होते।िरमदास नाम रखने
से कोई िरम का दास नहीं बन जाता,जैसे िरमदास महाजन ...नाम तो िरमदास है लेिकन िमम का एक भी गुण उनके
िदखाई नहीं दे ते। पहले तो भूरा के घर मे आग लगवा दी और अब बाद मे जले पर नमक िछड़कने आ गए।

वयिि को सदै व आशावादी होना चािहए।यही एक ऐसा आतमबल है िजससे बड़े से बड़े संकिो पर िवजय पाई
जा सकती है । लेिकन जब वयिि असहाय महसूस करने लगता है तब उसे न तो सवयं पर िवशास हो पाता और न ही
ईशर की सता पर िवशास हो पाता। हालांिक भूरा पूरे आतमिवशास के साथ िमनदर मे आमरण वत का संकलप िलए
बैठा परनतु जब उसका मकान अििन मे सवाहा हो गया तब उसका िैयम िू ि गया। उसका साहस जवाब दे गया । उसने
इस सूखे की िवपदा से िनज़ाद पाने के िलए ही यह आमरण वत रखा है तो अवशय ही उसके मागम मे बािाएं आएगी ही।
कमली ने भी महसूस िकया िक ईशर के मागम मे बािाएं और कांिे िबछे है ।यह उनकी अििन परीका है । इस किठन
अििन परीका को पार करना आसान नहीं है । यह एक आग का दिरया है । सवज
म न िहताय के िलए की जानीवाली
तपसयाओं मे बािाएं नहीं आने पाती िकनतु सवश
म ििमान ईशर अपने भि की परीका अवशय लेता है िक उसका वह
भि सतयिनष और दढ़ संकलपवान है या नहीं।कमजोर मानिसकता ,आतमशिि की कमी, ईशर और अपने कमम के
पित िनषावान वयिि कभी भी किठन पिरिसथितयो के समझ परािजत नहीं होता बिलक वह अनतत: इस परीकाओं मे
अवशय ही उतीणम होता है । भूरा के वत मे जनिहताथम के अलावा िनजी सवाथम भी शािमल है ।इसीिलए उसके मागम मे
वयविान उतपनन हो रहे है । उसके मुख पर हारने की रे खाएं अलबता सपि नहीं है िकनतु वह अपने आपको भीतर से
िू िा सा महसूस करने लगा। वह उठा और िमनदर मे भगवान की मूितम के समक अपने आवेश के साथ फूि पड़ा -
``तुमको दिुनया का मािलक कहते है । जो तुझे मानते है ,वो तो बुरी तरह से परे शान है और जो तुझे
नहीं मानते ,वे बड़े मज़े ही मज़े मे है । दे ख, तेरा इनसान सूखे की िवकि समसया मे िकस कदर परे शान हो रहा है िकस
कदर मर रहा है ।.................िरन दे ने मे मुझको ठगा गया । मैने तुझसे कुछ नहीं कहा । मेरे साथ गुलामो की तरह
वयवहार िकया गया। िफर भी मैने तुझसे कुछ नहीं कहा । तूने इस इलाके मे सूखा िकया। मैने िफर भी तुझको कुछ
नहीं कहा। अब तो तूने मेरी झोपड़ी भी िछन ली ।
घर-वदार से वंिचत कर िदया। मेरी झोपड़ी जल कर राख हो गई। बैल चोरी हो गया । मै और मेरा पिरवार बेघर हो गए ।
कया यही है तेरा नयाय षोषो दे ख , दिुनया मे दे ख, सब ओर लूि-मार हो रही है । बड़े लोग छोिे लोगो का खून पी रहे है ।
इनसानो पर अतयाचार हो रहे है ।लोग भूख और पयास से मर रहे है । पशुओं के िलए चारा नहीं। लोगो के घरो मे चूलहे
नहीं जल रहे है । यह कैसा तेरा नयाय है । तू कैसे अपनेआपको जगत का िपता कहलाता है । ििककार है तुझको , जो तेरी
संतानो पर जुलम ढाले जा रहे है और तू चुपचाप तमाशा दे ख रहा है । तू कैसा तमाशाई है षोषो दे ख , चारो ओर दे ख ! तेरे
चाहनेवाले कैसे हाल-बेहाल हुए जा रहे है । यिद ऐसा ही रहा तो कौन तुझ पर िवशास करे गा षोषो कौन तेरे िमनदर की
चौखि पर िसर झुकाने आएगा षोषो कोई नहीं....कोई नहीं.कोई नहीं आएगा तेरी चौखि पर...............!..``
वह बुरी तरह से हांफने लगता है । िमनदर पांगण मे उपिसथत शदालु अवाक् से दे खने लगे िक अनाचक भूरा को यह
कया हो गया है षोषोवह िकस तरह बदहवास भगवान के सामने अपना आकोश उतार रहा है । वह िकस कदर अपनी और
इस गाँव-समाज की परे शािनयो के िलए भगवान को िजममेदार ठहरा रहा है िफर भी वह गाँव-समाज के िलए भगवान
के िमनदर मे आमरण वत का संकलप िलए अिडग बैठा है । उसे इस तरह के अलौिकत वयवहार से सारा गाँव-समाज
अचंिभत हो गया ।
उसके बुरी तरह से हांफने से वह पसीने से तर-ब-तर हो गया । मैकू ,गोपाल और नीलमिसंह उसे थाम पर
िलिाते है ।उसे हवा दे ते है । शदालुगण हिर-िुर तेज़ कर दे ते है -
``हरे कृ षण हरे कृ षण कृ षण कृ षण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।``
मैके की आँखो मे आँसू भर आते है । वह िमनदर के पष
ृ भाग मे जाता है और फूि-फूि कर रोने लगता है ।
`` शायद ईशर को यही सवीकार है ......भूरा तो .....जैसी उसकी मरजी....भला, ईशर के आगे अदना सा इनसान
कया कर सकता है षोषो``
कुछ गामीण िमनदर पांगण मे राम-िुन गाने लगे -
रघुपित राघव राजाराम पितत पावन सीताराम
सीताराम सीताराम भज पयारे तू सीताराम
ईशर अलला तेरे नाम सबको सनमित दे भगवान
रघुपित रािव....................
राम-िुन सुन भूरा अनायास हं सने लगा।बोला-
`` नहीं रे मैकू भाई ! इनसान कभी भी सनमित से काम नहीं लेता । इनसान को तो दम
ु िमत से काम लेता है । तू
तो अचछी तरह से जानता है न.......``
`` तुम ठीक कहते हो भूरा भाई ! लेिकन गाँिी बाबा ने `` सबको सनमित `` मांगी है भगवान से....``
``गाँिी बाबा महातमा थे ।हम और तुम उनकी बराबरी नहीं कर सकते। मै सच कह रहा हूँ भाई षोषो``
`` हाँ , कह तो रहे हो िबलकुल सच िकनतु वे भी तो इनसान थे।उनके समान हमारे भी हाथ-पैर है लेिकन उनके
समान बुिद नहीं है । इसिलए वे महातमा कहलाएं परनतु यह तो बताओ िक हम भगवान से सनमित माँग तो सकते है
न षोषो``
`` यह हम सभी पािणयो का अििकार है । बाद इसके वह चाह सनमित दे या न दे लेिकन दनुमित वह उन
लोगो को दे ता है जो इनसािनयत के िखलाफ है ।यह तो तुम मानते हो न षोषो``
`` यह मानना ही पड़े गा अनयथा भगवान को मानेगा कौन षोषो अचछा तुम लोग जाओ और आराम करो....``
`` नहीं , जब तक तुमहारा कौल पूरा नहीं होता तब तक कोई न कोई िमनदर मे अवशय रहे गा ।``
भूरा ने अबकी बार कुछ नहीं कहा। उसने नेत बनद कर िलए और गुनगुनाने लगा-
`` ईशर अलला तेरो नाम
सबको सनमित दे भगवान !``
000
जब इनसान कुछ करने की िसथित मे नहीं होता तब वह एक मात उस सवश
म ििमान ईशर की शरण मे जाता
है । मानवीय उपकरण जब उपयोगहीन हो जाते है और मनुषय का अहं कार कुचल जाता है ,तब वह ईशर की शरण मे
जाता है । जब मनुषय को एहसास हो जाता है िक इस भौितक और छलवादी मानव समाज वदारा उसके साथ अिवशास
िकया जा रहा है ,तब वह ईशर की शरण मे जाता है । मनुषय को जब भौितक जगत से कोई सकारातमक उतर नहीं
िमलता और िनराशा की गतम मे डू बने को होता है , तब वह ईशर की शरण मे्े जाता है । लेिकन ईशर इतनी सहजता से
सवीकार नहीं करते । वे मनुषय के संकलप की परीका लेते है । कहीं ऐसा तो नहीं िक मनुषय ईशर के नाम ,पभाव और
शिि का दर
ु पयोग करना चाहता हो । कहीं ऐसा तो नही िक मनुषय अनावशयक रप से केवल िदखावा करने के िलए
यह सारा पपंच रच रहा हो । इनहीं सारी पिरिसथितयो को धयान मे रखते हुए ईशर संकलपरत मनुषय की परीका लेना
आवशयक समझता है । यिद मनुषय ईशर की परीका मे खरा उतरता है तो ईशर उसे मनमांगी मुराद दे दे ता है । यह
ईशर का पाविान है । तभी तो कहा गया है िक ईशर चाहे िजसे छपपर फाड़कर दे ता है और चाहे िजसे कण भर मे
नेसतनामूद कर दे ता है ।
भूरा को अपने संकलप को पूरा करने के िलए आमरण वत पर बैठे हुए एक माह से अििक का समय हो गया
है । इस एक माह की अविि तक उसने जल और अनन को तिनक भी सपशम नहीं िकया । उसके शरीर मे पानी की कमी
होने लगी यािन उसे िडहाईडे शन होने लगा । पेि मे अनन का एक दाना भी न होने से उसकी शरीिरक कमता कमज़ोर
होने लगी है । भूरा का मुख िनशतेज , होठो पर पपड़ी जमने लगी । उसके गाल ,आँखे भीतर िंसने लगे । हदय
कमज़ोरी के कारण कांपने लगा । शरीिरक कमज़ोरी तो उसे हो गई िकनतु वत के कारण उसकी मानिसक शिि
उतरोतर बढ़ने लगी । उसके मुख मणडल पर भले ही तेज नहीं हो तो कया हुआ िकनतु आतमबल बहुत बढ़ गया है । उसे
ईशर पर पूरा िवशास और आसथा है । वह जानता है िक ईशर उसके आमरण वत और संकलप की परीका ले रहे है । वह
चाहता है िक वह इस परीका मे सफल हो और उसके िलए उसे जो चाहे करना हो वह करे गा िकनतु हारे गा नहीं ।
वह अिच
म ेतना मे है । नेत आिे खुले और आिे बनद है । उसे घे्ेरे हुए चौिरी कमलिसंह , िवकमिसंह , गोपाल ,
नीलमिसंह , मैकू , गुलाबो , कमली और अनानय गामीण ,खड़े है । िवकमिसंह बोले-
`` भूरा ! हम सबसे अब तुमहारा यह हाल दे खा नहीं जाता । तुम वत तोड़ दो।``
`` न....हीं.....का....का.... इस....गाँव...के वासते.......िजले के वासते.......और....और... इसमे ......मेरा
अपना........भी......सवा...र....थ..... है .....का....का.....``
बोलते-बोलते हुए भूरा हांफने लगता है । पित की िनरीह अवसथा दे ख कमली की आँखो मे आँसू भर आते है । हिर, िपता
को दे ख भयभीत हो माँ कमली से िलपि जाता ।
`` माँ.........बापू....!``
`` काका........मेरा.....सौभािय ....है िक......जाने.....अनजाने......मे.....ईशर.....ने....मुझे....यह.....पूणय
का..........कारज सौपा........है ......मुझे ....अपने कतवमय.....से....मत.....िडगाओ...काका...``
बोलते हुए भूरा अनायास अचेत हो गया । उसके अचेत होते ही कमली चीखमारकर रोने लगती है । शायद इसिलए िक
कमली ने सोचा अब भूरा का साया भी िसर से उठ चुका।कमली के होश-हवाश उड़ गए । वह आशंिकत सी पतयेक के
चेहरे की ओर दे खने लगी और भूरा से िलपि पड़ी । मैकू और रकमणी ने कमली को संभाला । भूरा के चेहरे पर पानी के
छींिे डाले । उसे हवा दी गई। लेिकन भूरा की चेतना वापस लौि न सकी । जब बहुत दे र तक भूरा की यही िसथित रही
तब कमली का साहस जवाब दे गया।वह रो पड़ी -
`` नहीं , ऐसा नहीं हो सकता । हिर के बापू ! ऐसा नहीं हो सकता । शीकृ षण गोपाल ऐसा नहीं कर सकते । वे
सबके रकक है और मेरे साथ अनयाय नहीं हो सकता । हिर के बापू.....!``
कमली दहाड़े मार-मारकर रोने लगी । उसे रोता दे ख हिर भी रो पड़ा । उसे भगवान शीकृ षण पर िवशास है िक वे उसके
साथ ऐसा नहीं कर सकते । वह ईशर से पाथन
म ा करने लगी-
ओ िनदम यी भगवान
भूल मत जाना तेरी करनी भी दे खता है इनसान
ओ िनदम यी भगवान
मेरा अपराि ऐसा कौन सा चाहे लेले तू मेरे पाण
कर रहा तू हाय कयो मेरी यो िज़नदगी वीरान
ओ िनदम यी भगवान
रो रही ये ज़मीं और रो रहा इनसान
ताही-ताही मची हुई है यहाँ सुबहो-शाम
िनबल
म ो की मुिशकले आसान करना तेरी शान
ओ िनदम यी भगवान
सच ही राह मे चलकर यही िमला इनाम
ननहा बालक लड़े भूख से मै हो गई परे शान
सागर उमड़ो आज बहा दो दिुनया
इस दिुनया मे अब नहीं रहा इनसान
यहाँ िरम िबकता है ईमान होता नीलाम
ओ िनदम यी भगवान...
ईशर का िविान दे खो िक वह भिो की पुकार तुरनत सुन लेता है । वह कभी अपने िपयजनो को किठन पिरिसथितयो मे
दे खना नहीं चाहता । वह उसी पर पसनन रहता है जो उसके िविान के अनुरप आचरण करता है । उस ईशर के दरबार
मे दे र है िकनतु अंिेर नहीं होती । वह दे री से सुनता है कयोिक वह चाहता है िक उसके िपयजन उसी तरह िनषकपि हो
िजस तरह एक िनदोष बालक होता है । वह िनदोषो पर अपनी कृ पादिि बनाए रखता है । तब ही वह उन पर अपनी
कृ पा-विृि भी करता है तोिक उसके िपयजन उसके पे््रम और कृ पा का पूणत
म :आननद उठा पाए ।
पित के पित अपार पे््रम और शदा दे ख दया के सागर ईशर को अनतत: दया आ ही गई। दे खते ही दे खते
भूरा की आँखे खुल गई। वह उठ बैठा । जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
भूरा के सचेत होते ही मैकू ने पूरी शिि के साथ शंख बजाया । उसने इतनी तेजी से शंख बजाया िक सारा
गाँव-समाज सुन सके। लोग शंख-नाद सुन िमनदर की ओर चल िदए। गोपाल ने घिड़याल बजाया और नीलमिसंह ने ``
भगवान शीकृ षण की जय `` जयघोष की । सारा िमनदर पांगण भगवान शीकृ षण के जयघोष से िननािदत हो उठा ।
िमनदर पांगण मे उपिसथत शदालुओं ने हिर-िुन पारं भ कर दी -
`` शीकृ षण गोिवनद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा ।``
कमली भाविवभोर हो उठी । उसने आरती उठाई और भूरा की आरती उतारी । इतने मे दे खते ही दे खते सारा गाँव-
समाज िमनदर पांगण मे आ पहुँचा । िमनदर पांगण मे शदालुओं शदालुओं के पहुँचते ही खुशी की लहर दौड़ पड़ी ।
.यह सवीकारना बहुत किठन है िक हर बात को कोई भी मानने को तैयार हो जाएगा।यिद ऐसा होता तो िरमदास
महाजन अब तक िमनदर जाकर भूरा को ढ़े र सारी शुभकामनाएं अवशय दे दे ते िकनतु उनहोने ऐसा नहीं िकया । हालांिक
उनहे जात है िक भूरा बरसात लाने के िलए िमनदर मे भगवान के सामने आमरण वत का संकलप िलए बैठा है
िरमदास जी ितलिमला गए ,बोले-
`` भूरा ....भूरा....भूरा....भूरा..... पक गए मेरे कान बार-बार भूरा का नाम सुन-सुनकर गाँव-समाजवालो्े पर
न जाने उसने कया जादक
ू र िदया िक गाँव-समाज तो को छोड़ दो इलाके की सारी जनता भूरा को दे खने के िलए उमड़
रही है । और तुम िकशन ! तुम दे खते रह जाते हो।``
`` हम लोग कया कर सकते । इतनी सारी जनता को हम रोक भी तो नहीं सकते ।``
`` जनता को छोड़ो और भूरा के बारे मे सोचो । कुछ ऐसा काम कर िदखाओ िक न बांस रहे न बांसुरी...यािन
सांप भी मरे और लाठी भी न िू िे ...समझे षोषो``
`` जी हुजूर...हम समझ गए है ।``
`` ये काम आज रात को ही हो जाना चािहए ।``
गंभीरता ओढ़े हुए िरमदास जी बोले और अपनी पगड़ी उठाकर िसर खुजाने लगे। उनहे लगा शायद िकशन अपनी
मनद बुिद से वह काम कर िदखाएगा जो उसे समझ मे आएगा । कयोिक ठस बुिदवालो के िदमाग मे ठस बाते ही ठसी
होती है । इसीिलए वे अचछी बाते आसानी से समझ नहीं पाते और जब वे बुरे काम कर बैठते है तब िफर वे बाद मे
पछताते है । िकशन ठहरा ,िरमदास का नौकर । उसे नौकरी करनी है ।इसीिलए िरमदास जी के आदे श का पालन
करना वह जररी समझता है । बस यही उसके िदमाग मे रह गया िक वह अपने मािलक की जी हुजूरी ही करे गा।चाहे
उसमे उसे हािन हो या लाभ । वह मुसकराते हुए बोला-
`` मािलक ! ऐसे काम तो हमारे बांऐ हाथ के खेल है । अब दे खते जाओ हम कया कया करके िदखाते है । ``
`` तो जाओ दम
ु दबाकर और हाँ...कल सुबह हमको भूरा की लाश ही िदखनी चािहए दम
ु दबाते हुए.....खाक्
थू.....``
िकशन ने अपनी लाठी पूरी शिि के साथ ज़मीन पर ठोक दी और सीना तानकर चल पड़ा अपने कतवमय पालन के िलए
। नौकर चाहे कोई भी हो ,वे अपने मािलक के आदे श का पालन करना ही जानते है ।चाहे भला हो या बुरा । युद के मैदान
मे सैिनक अपने मािलक के आदे श का पालन करने के िलए कूद पड़ता है िफर वह यह नही्े दे खता िक इस युद मे वह
मरे गा या दशुमन को मारे गा । मर गया तो शहीद कहलाएगा और दशुमन को मान िगराया तो वीरपुरष कहलाएगा ।
यही िसथित आज िकशन की है । वह अपने मािलक के आदे श को अंजाम दे ने के िलए िनकल पड़ा।उसने अपने
िवशसनीय सािथयो को एकत िकया । उनहे अपने मािलक के आदे श का पालन करने के िलए संदेश सुनाया और सारे के
सारे तैयार हो गए । उनहे तो बस आदे श चािहए और उसके बाद पिरणाम दे ना है । वे अपनी सारी तैयारी के साथ िमनदर
की ओर चल पड़े ।
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शदा पर िकसी का अंकुश नहीं होता। कोई शदा को पितबिनित नही कर सकता।वह िकसी की भी गुलाम
नहीं है । उसे केवल शदा करना आता है । शदा के ही कारण भारतीयता बनी हुई है । यही भारतीय होने का पिान गुण है ।
पतयेक भारतीय मे अपार शदा भरी हुई है । इसी कारण हम भारतीय पतथर मे भी भगवान की पिरकलपना कर लेते है
और कहने लगते है ,`` कण-कण मे भगवान ।``इसी कण-कण मे भगवान होने की पिरकलपना के कारण ही भि
पलहाद ने पतथर और गारे -मािी के सतमभ से भगवान निृसंह को पुकारा था और वे ततकण पगि होकर शदा को
पमािणत िकया था और इस पमािणकता से उनहोने िहरणयकिशपु को मारकर सपि कर िदया था । वो ही शदा गाँव-
समाज के लोगो मे कूि-कूि कर भरी हुई है । वो ही शदा भूरा के अनतमन
म मे िवशास के साथ जागत हुई है । इसी शदा के
चलते उसने गाँव-समाज और इलाके मे बरसात करवाने के िलए आमरण वत का संकलप लेकर िमनदर मे जा बैठा है ।
एक माह से अििक का समय हो गया है । इस अविि मे भूरा का शारीिरक ढाँचा पिरवितत
म हो गया है । बढ़ी
हुई दाढ़ी ,बढ़े हुए केश , िनशतेज मुखमणडल ,डू बी-डू बी सी आँखे ,जीणम-शीणम काया िलए हुए वह दीवार से ििक कर बैठा
हुआ है ।शदालु और दशन
म अिभवादन करते जाते और तरह-तरह की वसतुएं उसे भेि करते जाते।हालांिक वह िकसी भी
वसतु को सपशम नहीं करता । सारी वसतुएं गोपाल और मैकू उठाकर िमनदर मे भगवान की मूितम के समक रख दे ते है ।
शदालुगण केले ,सेवफल,मेवा ,नािरयल ,पपीता और फूल-पसाद लाकर समिपत
म करते है और वहीं भूरा के आसपास
उसे घेरकर बैठ जाते है । गोपाल और उसके सािथयो वदारा िनरनतर शीमदागवतमहापुराण का पाठ िकया जा रहा है ।
शदालु नमन ् कर शदा के साथ पुराण पाठ सुनते है । भूरा के हाल-चाल पूछते है और कुछ समय िमनदर पांगण मे
तरह-तरह की सेवा करते हुए अपने-अपने घरो की ओर वापस चल दे ते है ।
अनुसूया , रपा , चमपा , गुलाबो-रकमणी और इनदावती सनधया समय की आरती की तैयारी करती है ।
सामुिहकतौर पर आरती होने के बाद सबने आरती और पसाद गहण िकया । भूरा आरती लेने के िलए उठ खड़ा होने
लगता है िकनतु इनदावती उसे रोक दे ती है -
`` नहीं हिर के बापू ...कोई जररत नहीं । हम लोग तुमहारी शदा-भिि और पण के समक नतमसतक हो रहे
है ।तुम कि मत उठाओ ।``
भूरा कुछ कहना चाहता है िकनतु अनुसूया उसे बोलते से भी रोकती है और कहती है -
`` नहीं भूरा ..बोलो मत ..इस गाँव-समाज पर और हम सब पर तुमहारे इतने सारे एहसान हो गए है िक हम
लोग जो भी करे वह कम ही है । तुम आराम से बैठे रहो।हम लोगो्े के िलए इतना बहुत जयादा है ।``
`` चौिराइन जी ! हम सब लोग िमलकर भूरा के िलए भगवान से पाथन
म ा करतेहै िक भूरा का कौल पूरा हो ।
हमारी ओर से कोई कमी बाकी न रह पाएं।``मैकू बोल पड़े ।
गुलाबो अब तक िमनदर मे पूजा कर चुकी होती है । वह पहले गोपाल को पसाद दे ती है ।गोपाल , गुलाबो के पैरो मे ज़ोरो
से िचमिी लेता है । वह `` उई......`` करती है और गोपाल के कान मरोड़ दे ती है -
`` िमनदर मे भी शैतानी सूझती है तुमको...बेशरम ...``
इनदावती ,अनुसूया ,चमपा , रकमणी और सारी मिहलाएं एक साथ हं स उठती है । चमपा बोली -
`` बस , इन दोनो को तो मौका िमल जाना चािहए िक हो गए शुर....``
वह िखलिखलाकर हं स दे ती है । चलते हुए अनुसूया जी बोली-
`` भूरा! ...कोई जररत पड़े तो हमे खबर करना नहीं भूलना । अब हम लोग चलते है । ये सारे लोग तुमहारे
साथ है । घबराना नहीं ।``
भूरा करबद होता है । सभी मिहलाएं िमनदर पांगण से िवदा हो लेती है । अंिेरा छा गया ।आसमान मे तारे ििमििमाने
लगे। गाँव के घरो से दीयो के ििमििमाने से ऐसा पतीत हो रहा था मानो जैसे सारा आकाश िरती पर उतर आया हो।
भगवतपुराण का पाठ िनरनतर जारी है । कुछ लोग अखणड हिर िुन गा रहे है ।िमनदर मे शीकृ षण की पितमा
के सममुख दीपक ििमििमा रहा है । बरामदे मे हलकी-हलकी रोशनी पड़ रही है । भूरा नेत मूँदे दीवार से ििककर बैठा
हुआ है । रात का अंिेरा गहराने से गोपाल ,मैकू और हिरिसंह लािठयाँ िलए हुए पहरा दे ने लगे। हालांिक तीनो पूरी
सतकमता के साथ पहरा दे रहे है िकनतु उनहे िकसी तरह की घिना का कोई पूवान
म ुमान नहीं है ।दरू-दरू तक अंिेरे के
कारण कुछ िदखाई नहीं दे पा रहा है । ऐसी अंिेरी रात के साये मे िकशन और उसके लठै त साथी िमनदर के पीछे आहाते
से पांगण मे पवेश करते है । अशि भूरा नेत मूँदे दीवार से ििके हुए है ।वे लठै त भीतर आ जाते है ्ं और भूरा की बाँहे
पकड़कर खड़ा करते है । शििहीन भूरा लठैतो का िवरोि करने मे पूणत
म :असमथम है । िकशन आवेश मे आकर लाठी उठा
भूरा के िसर पर पूरी शिि के साथ वार करना चाहता है िकनतु दभ
ु ािमयवश िकशन की लाठी िमनदर मे्े लिक रहे घणिो
से िकरा जाती है ।घणिे ज़ोरो से बज उठते है । सभी घणिे एक साथ बज उठने से गोपाल ,मैकू और हिरिसंह सतकम हो
जाते है और िमनदर की ओर दौड़ पड़ते है । िकशन और उसके साथी गोपाल ,मैकू और हिरिसंह से िभड़ पड़ते है । दोनो
गुिो मे जमकर लािठयाँ भाँिज जाती है । बहुत दे र तक दोनो गुि एक दस
ू रे को परासत करने मे अपनी पूरी शिि का
उपयोग करते है ।अनतत: िकशन और उसके साथी लािठयाँ छोड़कर भाग खड़े होते है । गोपाल चीख पड़ा-
`` अब कभी इिर आँख उठाने की िहममत भी की तो आँखे िनकाल दी जाएगी।``
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माना जाता है िक िजसका रखवाला सवयं ईशर हो उसे कोई भी कित नहीं पहुँचा सकता । लाख चाहने पर भी भूरा को
िकसी तरह की कोई कित नहीं हो पाई।भले ही िवरोिियो ने उसका घर जलाकर खाक कर िदया हो लेिकन अब तक भूरा
के पास और सवश
म ििमान के पास बहुत कुछ बाकी है । कहने का तातपयम यह नहीं है िक सब कुछ ईशर पर छोड़ िदया
जाए।यह उिचत नहीं होगा । लेिकन यिद कोई अपनी सहायता सवयं करता है और अपने कतवमय के पित जवाबदे ह
रहता है तो उसे पकृ ित अवशय ही सहायता करती है । पकृ ित ईशर का पितिनिितव करती है । पकृ ित और ईशर िसकके
के दो पहलू है ।िजस तरह ईशर की सवश
म ििमानता अपना कायम करती है ठीक उसी तरह पकृ ित की शिि भी अपना
कायम करती है ।दोनो एक दस
ू रे के पूरक है । िरमदास महाजन की योजनाओं को मूतम दे ने मे उसके सहयोिगयो का
सहयोग है तो भूरा के संकलपो को पूरा करने के िलए भी उसके सहयोिगयो का सारा सहयोग है । भूरा के सहयोग के
िलए सवयं पकृ ित भी अपनी महती भूिमका का िनवह
म न कर रही है ।
िकशन और उसके साथी मुँह की खाकर वापस आ गए । इतना ही नहीं गां्ँव-समाज के लोगो वदारा अचछी
भूिमका िनभाई गई। गोपाल ,नीलमिसंह और मैकू के रहते भूरा का कोई कुछ नहीं कर सकता ।हारकर जब िकशन
और उसके साथी िरमदास के सामने नत मसतक हो गए तब िरमदास गरज पड़ा-
`` ििककार है तुम लोगो की मदान
ा गी पर । तुम लोग केवल दे खने के काम के हो । सािारण गामीणो के हाथो
से तुम लोग मार खाकर आ गए । हाट.......खाक् थू...............................दरू हो जाओ मरी नज़रो के सामने से......भागो
यहाँ से...``
`` हुजूर ! अब की बार कोई गलती नहीं होगी । वह तो िमनदर के घणिे बीच मे िनिना उठे वनाम वो हाल करते
हम भूरा का िक सारे गाँव के लोग दे खतेरह जाते ।``
`` तुम लोग िबलकुल िनकममे हो । तुम लोग कुछ कर नहीं सकते ।लगता है अब मुझे ही कुछ करना होगा ।
यह काम तुम लोगो के बस का नहीं है । एक ज़रा सा काम तुम लोग नहीं कर सके। और तुम कर भी कया सकते हो।
यिद
ऐसा रहा तो समय आने पर तुम लोग मुझे छोड़ कर भाग ही जाओगे । कैसे अंगरकक हो तुम लोग । ``
`` हुजूर ! जब समय पितकूल हो तो उसे अनुकूल तो नहीं बनाया जा सकता। आिखर भगवान भी तो कोई
चीज है ।``
`` नहीं......भगवान कोई चीज नहीं है । जो कुछ है वह पैसा है । पैसा भगवान से कम नहीं है । जो काम भगवान
नहीं कर सकता । वह काम पैसा करता है ।अब तुम लोग जाओ । मुझे ही कुछ करना होगा ।``
` एक मौका और दे दो हुजूर ! ``
`` नहीं....नहीं...जाओ....तुम लोग जाओ ....जररत पड़ी तो तुम दोनो्े को बुलवा लूँगा । अभी तुम लोग
जाओ ।``
िकशन और उसक दोनो साथी िसर नीचे झुकाएं चल िदए । िरमदास मुिि््ठयो को भींचते रह गए। लेिकन िकस पर
कोि करते षोषो िकशन पर षोषो अपने आप पर षोषो भूरा पर षोषो या अपने कुिवचारो पर षोषो उनके पास सोचने के
अलावा कुछ भी बाकी न रहा ।
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यह कभी नहीं सोचना चािहए िक तुमहारा दशुमन तुमसे कमज़ोर होगा । ऐसा सोचना या तो नासमझदारी
होगी या बहुत बड़ी बेवकूफी। कभी भी शतु को कमजोर नहीं समझना चािहए । इसी तरह अपने पितवदनवदी को भी
कभी कमजोर नहीं समझना चािहए । हाँ ,लेिकन यिद शतु शििशाली है और चालाक तो उसे बुिद से जीता जाता है ।
यिद शतु सदाचारी और नेम-ईमानदार है तो उसे िजतना आसान नहीं होता बिलक बहुत किठन होता है । शतु मे
बेईमानी यिद हो तो बात अलग है लेिकन वह पूणत
म : ईमानदार है तो कुछ भी आसान नहीं है । िजस तरह दय
ु ोिन को
साथ दे नेवाले कणम और भीषम िपतामह दोषी ठहराये जाते है । उसी तरह िरमदास महाजन को साथ दे नेवाले भी दोषी
ही कहलाएंगे । यही िसथित िकशन और उसके सािथयो की है । अजुन
म के सारथी िजस तरह शीकृ षण थे उसी तरह भूरा
को साथ दे नेवाले नीलमिसंह ,गोपालिसंह और मैकू आिद है िफर उसे िकस बात का भय षोषो भूरा को मारने के िलए
िमनदर गए थे और सवयं ही मार खाकर आ गए । सारे बदन पर घावो के िनशान और बड़ी भारी सूजन आने से िकशन
तड़प उठा । पीड़ा के कारण िकशन और उसके साथी चीखे्े मारने लगे।िकशन को चीखते दे ख उसकी महतारी बोली-
`` हमेशा ही कहती रही हूँ िकसना ! बुरे काम का बुरा नतीजा होत है लेिकन तू माने तब न ्.........लो अब
भुगत लो । करे महाजन और भुगतो तुम ....``
`` अउर कोऊ िंिा भी तो नहीं है बुिढ़या ।``
`` कोऊ िंिा ढू ँ ढ ले । ई महाजन के पास पापो के अलावा अउर कुछ नहीं है रे िकसना । हमरी मान ले तो जा
के भूरा से काफी मांग लई ले ।``
`` भूरा से षोषो हम माफी मांग ले षोषो``
`` अउर नहीं तो कया षोषो हरज ही का है तू कऊ छोिा तो नई होऊ जात ।जा जा के भूरा से माफी मांगी ली जौ ।``
`` तू कहती है बुिढ़या तो ठीक है ,सोचूँगा ।``
बुिढ़या बड़बड़ाते रही और िकशन चारपाई पर आड़ािट पड़ा रहा । कोई नहीं आया मरहम पिट्ी करवाने । कोई नहीं
आया यह पूछने के िलए िक कहीं जयादा है या कम । उलि मार खाकर चारपाई तोड़ने लगे ।
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सुबह-सबेरे सारे गाँव-समाज मे खबर फैल गई िक रात को कुछ लोगो ने भूरा को जान से मारने के िलए
कोिशश की लेिकन िजसको भगवान बचाता है उसे कोई नहीं मार सकता । कहा गया है िक ``जाको राखे सांइयां मार
सके न कोय । बाल न बांका होई सके जो जग बैरी होय ।``सारे गाँव-समाज के लोग भूरा का हालचाल जानने के िलए
उमड़ पड़े । कमली बेतहाशा दौड़ते हुए चली जा रही है और उसके पीछे गुलाबो , चमपा और उसकी सिखयाँ भी चली जा
रही है । गामीणो मे तरह तरह की बाते्े होने लगी । कोई नहीं समझ पा रहा िक यह सब कैसे हुआ षोषो भूरा का दशुमन
कौन हो सकता है षोषो कौन भूरा को मार डालना चाहता है षोषो कोई भूरा को कयो मार डालना चाहता है षोषो ऐसी
कौन सी दशुमनी है भूरा के साथ िजससे कोई उसको जान से मार डालना चाहता है । कोई तो होगा । हालांिक नीलमिसंह
और मैकू अचछी तरह से जानते है िक यह सारा िकया गया पपंच िरमदास महाजन का ही है लेिकन एकदम िकसी पर
सीिे आरोप नहीं लगाया जा सकता । नीमलिसंह और मैकू के पास ऐसा कोई साकय नहीं है िक वे िरमदास महाजन
को दोषी करार करवा सके। वे चाहते है िक िरमदास महाजन पर आरोप लगाने के पहले सारे साकय ठोस होने चािहए
अनयथा कुछ गलत भी हो सकता है ।
चौिरी कमलिसंह , चौिरी िवकमिसंह और गां्ँव के अनानयगण िमनदर पांगण मे एकत हो गए । सारे लोग
भूरा को घेर बैठ गए । चौिरी बोले-
`` मैकू ! ये सब कैसे हुआ षोषो िकसी को भेजकर हमे खबर करवा दे ते। ससालो को रायफल से मौत के घाि
उतार दे ते हम ।``
`` काका -
मुदई लाख चाहे तो कया होता है
वही होता है जो मंजूरे-खुदा होता है ।``
`` मारनेवाले से बचानेवाला बड़ा होता है चौिरी !``िवकमिसंह ने मैकू की बात की पुिि करते हुए कहा ।
`` तुम ठीक कहते हो िवकम ! लेिकन मैकू तुम बता सकते हो िक वे लोग कौन हो सकते है । तुमने तो उनहे
दे खा ही होगा ।``
``काका ! जान बची लाखो पाए । िकसी का नाम लेने से कया फायदा । हम कौन होते िकसी को सज़ा दे नेवाले
।`` भूरा ने िीमी आवाज़ मे अपनी बात कहीं और चुप हो गया । मैकू ,गोपाल और नीलमिसंह कुछ कहे इसके पहले ही
भूरा ने बात आगे न बढ़े इस बात को धयान मे रखकर कह िदया ।
`` तू तो िनरा बुदू है रे भूरा ! कानून ने अपरािियो के वासते ही तो सजाएं मुकरम र की है । बस तू नाम बता दे ।
बाकी हम िनपि लेगे ।`` िवकमिसंह ने सानतवना दे ते हुए कहा ।
`` िजसको जब सज़ा िमलनी होगी मािलक उसे आप ही सज़ा दे दे गा ।दे खो मािलक िकस तरह सज़ा दे रहा है
मुझको ।िकसी को िदखाई नहीं दे रहा है ।कहा गया है िक इनसान के लाठी की मार िदखती है िकनतु ईशर की लाठी की
मार िदखती नहीं।``
`` हाँ काका ्् भगवान की लाठी की मार िकसी को िदखाई नहीं दे ती ।``
मैकू ने भूरा की बात का समथन
म करते हुए कहा ।
`` खैर , जैसी तेरी मरजी । लेिकन यह याद रख भूरा िक तुम जो काम कर रहे हो वह तुम अकेले अपने िलए
नहीं कर रहे हो । तुमहारा यह कायम इस सारे गाँव-समाज और इलाके के िलए । हम सब पर तुमहार बहुत बड़ा अहसान
है यह हम नहीं भूल सकते ।`` चौिरी बोले
`` नहीं काका ! गीता मे भगवान शीकृ षण ने कहा है िनषकाम भाव से कमम करते रहो।फल की अिभलाषा मत
रखो।कमम करना तुमहारा कायम है उसका फल दे ना या नहीं दे ना यह ईशर का कायम है । लेिकन काका िनषकाम भाव से
िकए गए कमो का फल कभी न कभी तो िमलेगा ही।यह तो आप भी जानते है ।``
भूरा के िनषकाम कमम और िनषकाम भावना दे ख-सुन चौिरी कमलिसंह नतमसतक हो गए।बोले-
`` तुम तो पूरे गाँिी बाबा के अनुयायी हो गए हो । या यो कहूँ िक तुम पर गाँिीिगरी का पूरा पभाव पड़ा है ।``
`` ये सब बाते तो मै नहीं जानता िकनत यह जानता हूँ िक गाँिी बाबा और भगवान शीकृ षण के िसदानत
संभवत:एक जैसे ही होगे । तभी तो आप और ये सारे लोग गाँिी बाबा के िसदानतो की चचाम करते है ।``
चौिरी कमलिसंह ,भूरा के िवचारो से सहमत हुए िबना नहीं रहे । उनहोने भूरा का पक लेकर गाँव-समाज के िवकास
और पुनुZ सथान के िलए सबको एक साथ िमलकर काम करने की बात सवीकार की। सभी िमलकर भूरा से रात के
हमले की जानकारी हािसल करनी चाही िकनतु भूरा ने कुछ भी नहीं बताया । वह नहीं चाहता िक इस नाजुक िसथित मे
वह कोई सखत कदम उठाऐ।इस नाजुक िसथित मे यिद वह ऐसा कोई कदम उठाता है तो हो सकता है िक उसके िलए
और अििक किठन िसथित उतपनन हो जाती । िजतना उसने अब तक यह संकलप पूरा िकया है वह संकलप बीच मे ही
िू ि सकता है ।अब तक की गई सार मेहनत और िकया गया वत कुछ ही कणो मे िू िकर िबखर जाएगा । यह सोच
समझकर भूरा ने खामौश रहना ही उिचत समझा िक गाँिी बाबा के समान ही हमे अपने कमम करने है ।यिद कोई थपपड़
मारता है तो दस
ू रा गाल भी आगे कर दे ना चािहए ।
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गामीण केतो मे्े पानी का संकि गहराते गया । बावड़ी-कुओं ,नदी और तालाबो का पानी पयाप
म नहीं है ।बहुत
ही कम पानी रह गया है जो पदिुषत होने के कारण उपयोग मे लाने के लायक नहीं रहा । कुओं का पानी छानकर पीना
पड़ रहा है । गाँव-समाज की मिहलाएं जब भी पानी के िलए कुअ्ो पर जाती तब कुएं के गंदले पानी को छानकर भरती
है ।
उस िदन सुबह-सबेरे गुलाबो ,रकमणी,रपा और गाँव की मिहलाएं कुएं पर पानी लेने जा पहुँची । कुएं मे पानी
नज़र नहीं आ रहा था। लग रहा था शायद कुआं अब पूरी तरह से सूख गया है । गुलाबो ने बालिी कुएं मे डाली।चिट्ानो
से िकराने के बाद बालिी नीचे जा पहुँची।लेिकन यह कया बालिी मे पानी तो बहुत कम लेिकन गारा-मािी अििक भर
आई। जब गुलाबो ने बालिी ऊपर खींची उसमे पानी के साथ गारा-मािी दे खकर रआंसी सी हो गई।मिहलाओं के मुख
पर उदासी छा गई।रपा ने अपनी साड़ी सा आंचल घड़े से लगाया । गुलाबो गारा-मािी भरा पानी छानने का पयास
करने लगी। बहुत मुिशकल से आिा घड़ा पानी भर आया । वे सब एक दस
ू रे का मुख दे खने लगी।गुलाबो कहने लगी-
`` लगता है अब तो पूरा कुआं ही सूख गया है । यिद ऐसा ही रहा तो हम लोगो को यह गाँव छोड़कर जाना
पड़े गा ।``
`` जाना तो पड़े गा ही नहीं तो हम पानी कहाँ से लाएंगे । सुना है शहरो मे सरकार ने पानी की अचछा वयवसथा
कर रखी है । बड़े -बड़े पानी के भणडार भरे हुए रहते है ।जब चाहो तब पानी आसानी से िमल जाता है । पानी की कमी नहीं
है शहरो मे....मै उनसे कहती हूँ हम लोग शहर को चले।`` रकमणी बोली
`` मैकू काका मान जाएंगे षोषो वे तब तक भूरा काका का साथ दे गे जब तक िक बरसात नहीं होगी और सुना
है िक जो कोई कौल लेकर बैठता है भगवान उसकी जरर सुनता है और बरसात करवाता है ।``गुलाबो ने पूरे आशा-
िवशास के साथ के साथ कहा ।
`` सुना है शहरो मे भी सरकार के मंती लोग बरसात लाने के िलए यज-हवन करते है । बहुत साल पहले
भोपाल मे भी मुखय मंती ने अपने बंगले पर यज करवाया था । तेरे काका भी तो गए थे भोपाल....``रकमणी ने सहमत
होकर कहा।
`` याने मैकू काका भी भोपाल गए थे । इसिलए तो मुझे लगता है भूरा काका को मैकू काका ने ही यह सलाह
दी होगी ।`` गुलाबो बोली।
तभी अनायास चमपा को मतली होने लगी और वह उबकाई िनकालने लगी । बहुत अििक मतली और उबकाई के बाद
चमपा के मुख से पानी जैसा पदाथम िनकला । चमपा को इस तरह मतली और उबकाई के बावजूर वह बोली-
`` भगवान ने चाहा तो भूरा काका की मेहनत बेकार नहीं जाएगी ।``
कहते-कहते उसने दब
ु ारा उबकाई िनकाली और दो-चार उि्लियाँ कर दी । चमपा को बार-बार उि्लियाँ आते दे ख
रकमणी ने मज़ाक-मज़ाक मे कह िदया -
`` लगता है कुछ गड़बड़ हो गई चमपा के साथ....कयो री चमपा...बता तो कया हो गया तेरे साथ....``
सभी मिहलाएं िखलिखलाकर हं स दी । पहले तो चमपा झेप गई। कहीं यह बात सच तो नहीं हो सकती षोषो चमपा के
हदय मे यह पश उठा । कहीं ऐसा तो नहीं िक उस िदन िरमदास महाजन ने जो जयादती उसके साथ की उसका ही यह
पिरणाम हो। यह सोचकर उसका हदय िसहर उठा िफर भी वह बात छुपाते हुए बोली-
`` नहीं री चाची ! ऐसी को कोई बात नहीं है । नहीं......तुमको तो जरर बताती ।``
कहते हुए वह शरमा गई।
`` चमपा ! ऐसी मतली और उबकाई तो केवल उसमे आती है ...समझीतू षोषो``
`` नहीं काकी ! मुझे कया पता ...तुमहे मालूम होगा तो सच ही होगा लेिकन काकी.. मुझको कयो आई ऐसी
मतकी और उबकाई , पता नहीं जाने कयो षोषो``
`` तू जरर ही कोई बात िछपा रही है । कहीं ऐसा तो नहीं िक जहाँ नौकरी करती हो वहीं तेरे मािलक ने तेरे
साथ जोर-जबरदसती......!`` कहते-कहते रकमणी रक गई तो चमपा की आँखो मे आँसू भर आए। उसका गला भर
आया । वह गुलाबो से िलपि कर रोने लगी ।
`` आिखर कया करती मै षोषो अममा की बीमारी के इलाज के िलए उनके पास सहायता लेने गई थी िकनतु
उनहोने कहा, तेरी माँ की बीमारी के इलाज के िलए तुझे रपये चािहए िक नहीं....नहीं तो तेरी माँ मर जाएगी.....`` अब
तो चमपा फूि-फूि कर रोने लगी ।
`` जो हो गया सो हो गया । लेिकन आगे के िलए ऐसा कभी न हो ये धयान मे रखना।
हम लोग कुछ न कुछ ऐसा करे गी िजससे तेरी बदनामी न हो । पुरष की बदनामी दो चार िदन की होती है ।
उसके बाद समाज उसे सवीकार कर लेता है िकनत औरत की बदनामी एक बार हो गई तो वह सारी िजनदगी पीछा नहीं
छोड़ती ।औरत के माथे पर कलंक लग जाता है हमेशा के िलए । यही तो अनतर है पुरष और औरत मे । पुरष करे तो
सतह खून माफ हो जाते है लेिकन गलती से भी औरत के साथ कुछ हो जाता है तो कोई माफ नहीं करता । बिलक
जीवन नरक बन जाता है ।`` रकमणी समझाने लगी।
औरत होना आज के समय मे बहुत ही किठन हो गया है । जो अििकार औरतो को आज के पिरपेकय मे िदए गए है
उसकी पहुँच नीचले तबके तक नहीं है ।आज भी नीचले तबके मे दबे हुई औरते बहुतायात मे िमलेगी । जो यह नहीं
जानती िक उनके अििकार कया है षोषो उनको िकस तरह की सुिविाएं मुहैया करायी गई है । वे आज भी उपेिकत और
पतािड़त होती रहती है । जो औरते उचच कुल मे है या उचच वगम मे है ्ै वे भले ही अििकारो का लाभ उठा रही है या
अििकारो ्ंका दर
ु पयोग कर रही है । यह कहा जाना किठन है िक औरतो के अििकारो का ठीक तरह से िकयानवयन
कयो नहीं िकया जा रहा है षोषो
पुरषो के अपराि की बात हो तो आसानी से छुप जाती है लेिकन यिद औरतो वदारा िकए गए अपराि की बात
हो तो कभी िछपती नहीं है । इसी तरह पुरषो वदारा हुई गलती को भी आसानी से छुपा िलया जाता है िकनतु औरतो के
मामलो मे ऐसा नही ्ंहै।उसके वदारा हुई Z गलती की चचाम होने लगती है । कुछ ऐसा ही चमपा के साथ हुआ । बात
िीरे -िीरे चौिरी कमलिसंह और उनकी पती अनुसूया तक पहुँच गई। अनुसूया ितलिमलाई बोली-
`` बात यहाँ तक आ गई है िक जमाई राजा सूद के बदले मे या रपयो की खाितर गाँव-समाज की बहू-बेिियो
की इजजत पर भी हाथ डालनेसे नहीं कतरा रहे है ।उनहे इतना िघनौना काम करते हुए लाज नहीं आतीषोषो
यिद वे हमारे दामाद नहीं होते तो आज उनको वह सबक िसखलाती जा वे उम भर तक नहीं भूल पाते।``
``चौिराइन जी ! हम गरीबन को न तो िजनदगी िमलती है और न ही मौत....आिखर हम गरीबन जाएं तो
कहाँ जाए । जो आप है िक हमारी अरज सुन लेती हो अनयथा यहाँ और कौन है जो सुन ले षोषो``
`` चमपा ! आज से तू हमारी हवेली मे ्ंरहे गी । पीछे की तरफ एक कोठी खाली पड़ी है उसने तेरे रहने का
बनदोबसत करवादे गे ।`` अनुसूया ने चमपा को गले से लगाते और ढांढस दे ते हुए िदलासा दी ।
`` लेिकन काकी ! मै तो आजकल गुलाबो के साथ रह रही हूँ। वह मेरी अचछी दे खभाल करती है ।``
`` जैसी तेरी इचछा ।लेिकन तुझे लगता है िक तू सुरिकत नहीं है तो िबना संकोच िकए सीिे मेरे पास चली
आना ।``
`` जी काकी । मै्े ऐसा ही करंगी ।अचछा चाची अब मै चलूँ गुलाबो मेरी पतीका कर रही होगी ।``
िजस िकसी तरह चौिराइन गाँव-समाज की मिहलाओं को सहयोग करते रहती है । वह सभी की सहभागी है चाहे जो भी
सी उनके पास आए वह उनको मदद करती है ।
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गाँव-समाज मे हो रहे हलचल की जानकारी रखना सरपंच का उतरदाियतव होता है । सरपंच गाम पंचायत के
मुिखया होने के साथ-साथ गाँव-समाज का भी मुिखया होता है । वह गाम पंचायत की गितिविियो के अलावा गाँव-
समाज मे हो रही गितिविियो की जानकारी िजला पंचायत और िजला कायाल
म य को दे नी होती है । िजलांचायत और
िजला कायाल
म य ,िजले मे हो रही गितिविियो की जानकारी िजला कलेकिर को दे ते है । िजला कलेकिर,िजले की
समपूणम गितिविियो की समीका सवयं करते है और जररत पड़ने पर समपूणम िजले मे जहाँ जो भी पमुख कायम हो रहा है
उसके िलए उिचत मागद
म शन
म दे ते है ।यह सरकार की कायप
म णाली के अनतगत
म आता है । इसके अलावा कलेकिर को
नयायपणाली की ओर भी धयान दे ना होता है । इतना ही नहीं अनय गितिविियो पर भी कलेकिर को नज़र रखनी होती
है । इतनी सारी जानकािरयो के िनवह
म न के िलए िजला कलेकिर िजममेदार होते है ।
गाँव-समाज मे चल रही गितिविियो की जानकारी चौिरी कमलिसंह वदारा िजला पंचायत और िजला
कायाल
म य को दी गई थी । िजला कायाल
म य वदारा शीघ ही िजला कलेकिर को सारी गितिविियो के बारे मे अवगत
कराया । जब िजला कलेकिर ने सुना िक गाँव-समाज मे िकसी िमनदर पर भूरा नाम के वयिि वदारा बरसात लाने के
िलए आमरण वत िारण कर बैठा है तो वे सिकय हो गए और अपने अमले के साथ गाँव-समाज की ओर रवाना हो गए
। िमनदर पांगण मे शदालुओं की अपार भीड़ एकत थी। िविभनन तरह के कायक
म म का संचालन चल रहा था । इसी
दौरान िजला कलेकिर अपने अमले के साथ िमनदर पांगण मे आ उपिसथत हुए । िजला कलेकिर को आया दे ख चौिरी
कमलिसंह ,चौिरी िवकमिसंह , नीलमिसंह और गाँव-समाज के अनानयगण उठ खड़े हो गए । कलेकिर ने सभी का
अिभवादन िकया । चौिरी बोले-
``आइए शीमान ! आपका सवागत है ।``
``नमसते चौिरी जी । आपके होते हुए यह सब कयो हो रहा है षोषो``
`` यह सब शदा और िवशास है कलेकिर साहब । जब मनुषय के बस मे कुछ नही्े होता है तब ही मनुषय
भगवान की ओर अिभमुख होता है ।शायद भगवान ही कुछ सुन ले।``
`` यह आप ठीक कह रहे है । बरसात जैसी आपदा पर िकसी का जोर नहीं है िकनतु इस आपदा से िनपिने के
िलए सरकार के पास सभी तरह के सािन तो है न । आपने सरकार को बड़ी दे र के बाद याद िकया है चौिरी जी ।``
`` नहीं ऐसी बात नहीं । वसतुत:सरकार को एक माह पहले ही हमने गाँव-समाज की गितिविियो की
जानकारी दे दी थी िकनतु यह जानकारी आप तक पहुँचने मे एक माह से अििक का समय लग गया ।``
`` नहीं ऐसा नहीं है । आप मुझसे पतयक िमलकर इस िवषय पर चचाम कर सकते थे।मै आपके िलए पसतुत ही
हूँ।``
`` यह बात तो सही है लेिकन कलेकिर साहब हम जब भी िजला कायाल
म य गए हमे बताया गया िक आप
राजिानी गए हुए है । तो कभी िमििं ग मे वयसत है । तो कभी मंती जी के साथ पवास पर है । आिद कई बाते सामने आई
और गाँव-समाज की समसया का िनराकरण िलमबत होते गया ।``
वसतुत: होता यही है िक सरकारसतर पर कोई कायव
म ाही िकयाि्नवत करवाने के िलए आसान मागम नहीं है । िकसी भी
सतर पर कोई सुनने को तैयार नहीं होता।छोिे अििकारी जनसमसयाओं पर धयान नहीं दे ते। बड़े अििकािरयो तक
बात पहुँचने मे इतना अििक समय लग जाता है िक समसया िवकराल रप ले लेती है । कहीं कहीं तो यह िसथित है िक
बड़े अििकारी भी सिहषणु नहीं होते । वे भी समसयाओं पर अििक धयान नहीं दे ते,यह सोचकर िक यह तो पितिदन की
सामानय समसयाएं है । िवपदा की िसथित मे समय पर पीिड़तजनो तक सहायता नहीं पहुँच पाती । यही िसथित यहाँ भी
उपिसथत हो गई थी।
िविभनन िवषयो पर चचाम के बाद कलेकिर साहब भूरा के पास जा बैठे।भूरा नेत मूँदे िदवार से ििका हुआ बैठा
था। वे बोले-
`` हाँ भाई भूरा ! यह कया हाल बना रखा है षोषो ``
`` शायद ईशर को यही सवीकार है । `` भूरा ने आिहसता-आिहसता जवाब िदया।
`` सरकार ने सूखागसत केतो मे जल पदाय और अनाज पदाय के िलए योजना बनाई है सो जलदी ही सब
ठीक हो जाएगा ।``
`` भगवान आपका भला करे ।``
`` भई भूरा ! तुमने जो चाहा तुमहारे िबना कहे सरकार ने इस गाँव और िजले को सूखे की िसथित से िनपिने
के िलए वयवसथा कर दी है । लो अब वत तोड़ दो।दे खो हमने तुमहारे िलए अनानास का रस लाया है पी लो ।``
`` नहीं सरकार ! मुझे अपना संकलप पूरा कर लेने दो । जब तक बरसात नहीं होगी िरती की पयास नहीं
बुझेगी मै अपना संकलप नहीं तोड़ सकता ।``
`` हम इस िजले के कलेकिर है । हम वादा करते है िक इस गाँव की इस िजले की पयासी जमीन की पयास
बुझाने के िलए हम पूरा पयास करे गे ।``
`` माफ करना कलेकिर साहब आप भगवान नहीं है जो सारे िजले की जमीन की पयास बुझा दे । हाँ आदमी के
पेि की आग तो िमिा ही सकते है ।``
``यही तो हम कह रहे है ।जब पेि की भूख िमिे गी तो मेहनत करने के िलए शिि उतपनन होगी और बांि-
नहर बनाने के िलए तो शिि चािहए ही न ।``
`` बांि-नहर बनते बनते सारा अनाज ही समाप हो जाएगा ।``
`` भूरा ! मान जाओ ।एक कलेकिर आपको अनुरोि कर रहा है ।मै इतनी दरू से चलकर तुमहारे
पास आया हूँ।``
कलेकिर के साथ भूरा का लमबा वाताल
म ाप चला । अििक वाताल
म ाप से भूरा वयिथत हो गया । उसे अनाचक गसत हो
गए और वह अचेत हो गया । कलेकिर के बार-बार कहने पर भी भूरा कोई जवाब नहीं दे पाया तो उनहं ्ोने उसे
झकझोरा िकनतु तब तक वह अचेत हो चुका था।
`` ओह ये तो अचेत हो गया । इसे िचिकतसा की ततकाल आवशयकता है ।``
अभी भूरा की िचिकतसा की बात हो ही रही थी िक िीरे -िीरे भूरा नेत खोलता है ।वह बड़बड़ाया -
`` उसे बरसात करनी होगी । उसे बरसात करनी ही होगी ।``
भूरा बड़बड़ाते रहा । कलेकिर उठकर चौिरी के पास आए बोले-
`` सरकार ने इस गाँव की सहायताथम एक सौ बोरी अनाज मंजूर िकया है ।आज रात तक अनाज गाँव मे आ
जाएगा। कल गाँव मे अनाज का िवतरण िकया जाएगा । अचछा चौिरी साहब ! अब हम चलते है ।``
`` आपकी बड़ी कृ पा कलेकिर साहब ! आपने अपना बहुमूलय समय हमे िदया और हमारी समसयाओं पर
धयान िदया ।``
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िजला कलेकिर वदारा दी गई राहत की चचाम जब िरमदास महाजन के पास पहुँची वह ितलिमला गया। उनहे
यह उममीद नहीं थी िक बात िजला कलेकिर तक पहुँचेगी। वह िनि्शिनतत था िक जब तक सूखा है तब तक गाँव-
समाज के आसामी उसके ही पास अनाज लेने आएंगे और वह उनसे मनमाना वसूल करे गा।यहाँ तक िक रपया-पैसा
नहीं है तो वह आसािमयो से जेवरात ,मकान और खेती की जमीन िगरवी रखवाकर उनको ऋण दे दे गा। उसे पूणम
िवशास था िक गाँव-समाज के आसामी उसके अलावा िकसी के पास नहीं जाएंगे कयोिक आसपास के गाँवो के
साहूकारो से भी िरमदास ने सांठ-गांठ बनाकर रखी है । िजसके पिरणामसवरप गाँव-समाज के आसामी िरमदास
महाजन के ही पास लेन-दे न करने आया करते है । िजला कलेकिर वदारा राहत सवरप अनाज की खेप आने की
जानकरी िरमदास महाजन को भी िमल गई। वह नहीं चाहता है िक अनाज गाँव-समाज के लोगो्े तक पहुँचे।इसिलए
िरमदास जी ने िफर अपनी चाल चलनी चाही । उनहोने िकशन को दब
ु ारा बुला भेजा । पहले तो िकशन ने
साफ इनकार कर िदया िकनतु जब िरमदास महाजन ने उसे पूरा आशासन िदया िक अब की बार वे उसे असफलता
पर कुछ नहीं कहे गे बिलक इस अिभयान मे शािमल होने पर यिद िरमदास की मंशा पूरी हो जाती है तो वे िकशन को
मनचाहा इनाम दे गे। िकशन िफर एक बार िरमदास महाजन की बातो मे आ गया। िरमदास की कूिनीित हालांिक
िकशन की समझ से परे है इसिलए उसने अििक कुछ नहीं कहा और लालच मे आकर िरमदास का साथ दे ने के िलए
तैयार हो गया । उसने अपने कुछ पुराने सािथयो को बुलवाया और उनहे सारी योजना समझा दी ।
रात के करीब दस-ियारह बजे िजले से दो टको मे अनाज आ रहा था । टक मे टक डाइवर के अलावा और दो
साथी थे जो बोिरयो का िहसाब िकताब रखते है ।िजला कलेकिर ने चौिरी कमलिसंह के नाम से टक लदवाकर भेजा है ।
यह जानकारी िजला कलेकिर के अलावा और िकसी को नहीं थी कयोिक टक मे लदा सारा अनाज चौिरी कमलिसंह की
अनाज की दक
ु ान मे रखवाना है ।इसिलए अििक लोगो को टक के साथ नहीं भेजा गया था िकनतु जो दो लोग िहसाब
िकताब के िलए आए हुए थे ,उनहे ्े अनाज की सुरका के िलए कलेकिर वदारा अनय सािन उपलबि करवा िदए थे
तािक संकि के समय इन सािनो का उपयोग िकया जा सके्े।
यह बात धयान दे ने योिय है िक िरमदास महाजन अपने आदिमयो से काम तो िजस िकसी तरह पूरा लेते है
िकनतु उनकी सुरका की कोई वयवसथा नहीं करते िफर चाहे कायम िकसी भी तरह का हो । चाहे लूिपाि का हो या खेत
की रखवाली का हो । िकशन अपने सािथयो के साथ सरकारी टक को लूिने के िलए गाँव से दो िकलोमीिर दरू झािड़यो
मे िछपकर बैठ गया । रात के करीब साढ़े दस बजे सरकारी टक कचची सड़क से होकर आ रहा था । कचची सड़क होने
के कारण यह सवाभािवक है िक टक िीमी गित से चल रहा था । इतनी िीमी गित से िक कोई भी वयिि बड़ी आसानी
से टक पर चढ़ सकता है । जयो ही टक ितराहे से मुड़कर गाँववाले सड़क पर आया तयोही िकशन और उसके साथी टक
पर पीछे से चढ़ गए ।छत की ऊपर से होकर डायवर के पास आ गए और अचानक डायवर की कनपिी पर एक झापड़ दे
मारी । डायवर दमदार था । उसे एक झिका तो लगा िकनतु वह संभल गया और तुरनत ही टक रोक िदया । साथ मे
आए दोनो सािथयो के पास िजला कलेकिर वदारा दी गई दो नाल की भरी हुई बनदक
ू े तैयार थी । दोनो साथी िबना
समय गंवाएं तुरनत ही टक से कूद पड़े और दो हवाई फायर छोड़े । हवाई फायर की आवाज़ सुनकर िकशन के साथी
घबरा गए िकनतु िकशन और डायवर के बीच झुका-झिकी होने लगी । बाकी चार साथी और थे उनहोने टक पर लगी
चिाई कािनी चाही ,इसके पहले ही बनदक
ू की नाल से तड़ाक से गोली चली और एक वयिि की जांघ मे जा लगी । वह
तड़प कर िगर पड़ा । उसे ततकाल दबोच िलया । िफर दस
ू री गोली तड़ाक से चली और ,और एक वयिि को िद दबौच
िलया । अब िकशन के पास दस
ू रा रासता न था । डायवर भी बिलष ही था उसने िकशन को जोरिार पिकनी दी लेिकन
िकशन तुरनत ही उठकर भागने लगा।बनदक िारी ने तड़ाक से एक गोली दाग दी जो िकशन की बांह मे जा लगी । एक
गोली और चली वह उसकी जांि मे जा लगी । अब तो िकशन भी भाग नहीं सकता था । बाकी साथी भाग खड़े हुए ।
िकशन इस बार िफर हार गया । केवल वह हारा ही नहीं अबकी बार वह और उसके साथी बनदक
ू से घायल भी हो गए ।
टक डायवर की बहादरुी और िजला कलेकिर वदारा दी गई बनदक
ू के कारण अनाज का टक िरमदास
महाजन के चुगल मे जाने से बच गया ।
िकशन की एक बांह और एक जांघ मे बनदरू की गोली का घाव हो जाने से वह भाग नहीं पाया । वह वहीं पर
िगर पड़ा । उसके सािथयो ने उसकी खबर भी नहीं ली और वे िजस िकसी तरह जान बचाकर सीिे िरमदास महाजन
की शरण मे जा पहुँचे।एक वयिि की जांघ काफी जखमी हो गई । िजसमे से लगातार रि बहने लगा । िरमदास
दे खकर घबड़ा गए । उनहोने सोचा भी नहीं था िक िसथित इतनी खराब हो सकती है । वे सकते मे आ गए । ऐसी िसथित
मे बनदक
ू की गोली के घाव की िचिकतसा की जाना भी बड़े संकि का काम है । उन सािथयो ने सारी िसथित बयान कर
दी । बताया गया िक िकशन वहीं पर अब तक पड़ा है । िरमदास अब तो और घबड़ा गए । वे तुरनत अपनी मोिर से
गए और िजस िकसी तरह िकशन को उठा ले आए । उनहोने बनदरू की गोली से जखमी िकशन और उसके साथी को
िजला असपताल मे िचिकतसा करवाने के िलए भरती करवा िदया ।
टक डायवर ने भरा टक लाकर सीिे चौिरी कमलिसंह के गोदाम मे ला खड़ा कर िदया । टक पर हुए हमले
की बात छुपी नहीं रही । डायवर ने सारा वत
ृ ानत कह सुनाया । चौिरी को अपने दामाद िरमदास पर पूरा शक गया ।
उनहोने पता लगाया तो जात हुआ िक िरमदास जी िकसी काम से गाँव से बाहर गए हुए है । चौिरी जी का शक कुछ
मजबूत सा जान पड़ा। िदन होते-होते सारे गाँव-समाज मे टक के लूि की बात आग की तरह फैल गई। मैकू ,
गोपालिसंह, हिरिकशन ,नीलमिसंह और अनय सािथयो को जब यह बात पता चली तो वे सारा मामला कण भर मे
समझ गए । नीलमिसंह ने िकशन को बुलवाने के िलए मैकू और सािथयो को उसके घर भेजा िकनतु िकशन घर पर
नहीं िमला । डायवर और साथ मे आए लोगो्े ने बताया िक कुछ लोगो के साथ आपस मे िभडनत हो गई । इसिलए हो
सकता है िक वे ही लोग हो। नीलमिसंह का अनदाजा सही िनकला । नीलमिसंह ने उनहे खोज िनकाला । वे सब के सब
िरमदास महाजन के साथ िजला िचिकतसालय मे पाए गए ।चौिरी को जब िसथित की जात हुई तो उनहे अतयनत
द ु:ख हुआ िक उनके दामाद इतनी नीच हरकत सकते है । िरमदास जी इतना िगर सकते है िक उनहे गाँव-समाज का
और अपने पिरवार का भला-बुरा भी नहीं समझता ।
इनदावती शमम से पानी-पानी हो गई। अब वह िकस तरह से गाँव-समाज के के सामने अपना ऊँचा कर
सकेगी। बहुत िदनो तक इस घिना की िननदा गाँव-समाज मे होते रही ।
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सूखे की िवकि िसथित से िनपिने और गाँव-समाज के लोगो को राहत पहुँचाने के िलए सरकार वदारा उठाया
गया कदम न िसफम गाँव-समाज के िलए उपयोगी रहा बिलक पूरे इलाके को इससे लाभ पहुँचा । चौिरी कमलिसंह के
गोदाम मे पयाप
म माता मे अनाज आ गया । पानी के िे ्ंकर आए।उनहोने पूरा गाँव-समाज मे डोडी िपिवा दी िक
सरकार वदारा गाँव के लोगो्े के िलए मुफत मे अनाज िवतरण िकया जा रहा है ।गामीण आकर अनाज ले जाए और
कोई भूखा न सोये।
डोडी मे िकए गए एलान से खबर सुनकर गामीण चौिरी के गोदाम मे जाकर अनाज और पानी ले गए ।
अनाज और पानी पाकर सारा गाँव-समाज पसनन हो रहा । चौिरी की उपिसथित मे गामीणो को उिचत माता मे अनाज
का िवतरण िकया गया । चौिरी सवयं अपने हाथो से अनाज और आवशयक सामगी लेकर कमली के पास गए।बोले-
`` बहू ! अब तुम भी कुछ गहण कर लो । बेचारा बचचा हिर भी भूख के कारण तड़प रहा होगा ।``
`` नहीं काका ! जब तक ये अपना कौल पूरा करते है तब तक मै भी अपने पित का साथ दँग
ू ी । वे कौल रखे
हुए है और मै भोजन करँ।यह मुझसे नहीं होगा काका ! आपने हमारा इतना धयान रखा । यह हमारे िलए काफी है ।``
`` बहू ! तुम कह तो ठीक रही हो िकनतु यिद तुम नहीं खाओगी तो हिर भी नही खाएगा ।वह तो अभी बचचा
है ।``
`` काका ! उसे मै समझा दँग
ू ी ।``
`` यिद तुम गलत न समझे तो एक बात कहूँ बहू षोषो``
`` नहीं काका । गलत कैसे कहोगे आप ।आप तो हमारे िहतैशी है ।``
`` मै हिर को साथ ले जाना चाहता हूँ । वह हमारे घर ही भोजन कर लेगा।``
`` जैसी आपकी मरजी !``
कमली ने हिर को समझाया । हिर अभी बचचा ही है । वह तुरनत मान गया और चौिरी उसे अपने साथ घर ले गए ।
पूरा इलाके मे यहाँ-वहाँ जहाँ कहीं भूरा की मेहनत का पिरणाम पिरलिकत हो रहा है । लोगो मे चचाम है तो
िसफम भूरा के मेहनत की िजसके कारण उनहे ्े अनाज उपलबि हो पाया है । इतने वषोZ्ं मे पहली बार सरकार ने
इतना अनाज मुफत मे बांिा है । गामीण कहते-
`` असल मे सूखा पड़ जाने के कारण सारे िजले मे फसल नहीं हो पाई और अनाज उतपानन नहीं हो पाया ।
ऐसे मे पतयेक के िलए भोजन की समसया पैदा हो गई थी। भला हो कलेकिर साहब का ।``
`` मुझे लगता सारे िजले मे अनाज बांिा गया होगा ।``
`` नहीं...सुनने मे आया है िक इस िजले के इसी गाँव मे इतना अनाज मुफत मे बांिा गया है और िकसी िजले
मे नहीं ।``
`` कुछ भी कहो भाई लेिकन भूरा िमनदर मे कौल लेकर नहीं बैठता तो हम भूखे ही मरते ..सही कहा न मैने
षोषो ``
`` लेिकन भूरा उसकी घरवाली और उसका बेिा....उनको तो अब तक भी अनाज नसीब नहीं हुआ । भूरा ने
तो अब तक अनाज तो कया पानी भी गहण नहीं िकया होगा । उनको भी कोई जाकर कहे ...``
`` जानते हो । कलेकिर साहब खुद आए थे और वे भूरा से िमले थे । सुना है िक कलेकिर साहब ने भूरा से
कौल तोड़ने के िलए थरमस मे शरबत लाए थे लेिकन भूरा ने साफ इनकार कर िदया िक जब तक बरसात नहीं होगी ,
वह कुछ न लेगा ।``
`` उसी के पूणय का पताप है िक आज सारे गाँव मे चूलहा जल रहा है और सबकेघर मे खाना पक रहा है ।``
`` और कोई भूखा भी नहीं सोया ।``
`` ईशर भूरा और उसके पिरवार को भी शिि पदान करे ।``
`` भूरा को आमरण वत पर बैठे हुए दो मिहने से भी जयादा समय हो गया है । यो कब तक अपने कौल पर
रहे गा वह षोषो``
`` जब तक िक बरसात नहीं होती ।``
`` हमे लगता है भगवान अवशय ही उसकी भिि से पसनन होकर बरसात करे गे।``
`` भगवान तेरा कहना सच करे ।``
आए िदन गाँव-समाज मे तरह-तरह की चचाए
म ं होते रही।
बहुत िदनो तक िरमदास महाजन और िकशन गाँव-समाज मे नज़र नहीं आए।िकशन और उसके सािथयो
को ठीक होने मे दो-तीन सपाह लग गए ।
तीन सपाह उसे असपताल से छुिट्ी िमली । बाद मे , िकशन समेत सभी साथी गाँव चले आए।लाज और शरम के
मारे िकशन अपने िमतो सिहत घरो ्ंमे दब
ु का रहा । िकशन की महतारी चौिरी कमलिसंह के गोदाम जाकर अनाज
और पानी ले आई थी। रोिी का कौर मुं्ँह मे रखते हुए उसके पूछा-
`` अममा ! यह कहाँ से लाई हो और यह पानी भी षोषो``
`` भला हो भूरा और चौिरी काका का । जो गाँव-समाज की इतनी िचनता रखते
है । एक तू कपूत है िक गाँव-समाज की तो छोड़ अपनी महतारी की भी िचनता नहीं रखता । तुझसे तो कहना
भी गुनाह लगता है ।``
महतारी कहती रही और िकशन िसर नीचा करके खाना खाता रहा । उसकी दोनो भुजाएं फड़क रही थी। उसे ऐसा लग
रहा था जैसे अभी भूरा उसके सामने आ जाए तो वह उसे इतना मारे िक वह अिमरा हो जाए । लेिकन ऐसा करना
िकशन की बस मे नहीं था।इसिलए वह हाथ मसोस कर रह गया ।
यही हाल उिर िरमदास जी का था । वे अपना सा मुँह बनाकर घर जा पहुँचे।पित को बहुत िदनो के बाद घर
आया दे ख इनदावती बोल पड़ी-
`` कहाँ थे इतने िदनो तक......बताकर भी नहीं गए । ऐसा कौन सा जररी काम
आ पड़ा था िक अपनी पती को भी बताना जररी नहीं समझा गया ।``
`` तू तो खाम-खाह कुछ भी सोच रही है । अरे भई ! कुछ जररी काम आ पड़ा था सो चला गया ।तुझको बताने
का मौका भी नहीं िमला । सोचा तो था िक तुझको बता दँ ू िकनतु इतना कम समय था िक तुझको बता भी नही पाया।
``
`` मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रही है । कहीं तुमने कोई ऐसा-वैसा तो काम नहीं िकया िजससे तुमहे चुपचाप
भागने की पड़ी रही ।``
`` कैसी बाते करती हो रािा की माँ ! भला मै ऐसा-वैसा कोई काम कयो करं्ँगा भला िजससे िक मुँह छुपाऊँ
।``
`` नहीं ! मै यो ही पूँछ रही थी ।``
बात आई-गई हो गई।इनदावती ने जयादा बहस करना उिचत नहीं समझा । वह जानती है िक अनाज की गाड़ी पर इनहीं
ने हमला करवाया होगा तभी तो गाँव-समाज मे चचाम हो रही थी । इनदावती की आशंका सच सािबत हुई िकनतु वह
बोली नहीं । वह जानती है िक कभी न कभी यह बात अवशय सामने आएगी।
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रात काफी गहरा गई । अमावस की काली रात मे दरू-दरू तक कुछ भी िदखाई नहीं दे रहा था । आसमान मे
तारे ििमििमा रहे थे । घरो से उठता हुआ िुआँ गाँव पर छा रहा था । ऐसा पतीत हो रहा था मानो पूरा गाँव पर सफेद
बादल छा गए हो। आिी रात से जयादा का समय हो रहा होगा । सारा गाँव रात के आगोश मे िनिशनत सो रहा है ।
िमनदर से हिर-िुन की आवाज़ उठ रही है । मूितम के सामने दीपक जल रहा है । भूरा दीवार के सहारे ििका हुआ िबलकुल
शानत और चुपचाप बैठा हुआ है । बाहर मैकू हिरिसंह, गोपालिसंह पहरा दे रहे है । भूरा को जाने कया सूझी वह दीवार के
सहारे उठ बैठता है । अचानक उसे खाँसी आने लगी । वह पूरी शिि के साथ खाँसने लगा ।उसकी खाँसी इतनी तेज थी
िक भूरा का चेहरा तमतमा गया आवाज़ सुनकर मैकू और हिरिसंह दौड़कर भूरा को संभालने लगे। उसकी छाती और
पीठ को सहलाया िकनतु िफर भी खाँसी रकने का नाम नहीं ले रही थी। मैकू उसका माथा और वक छूकर दे खता है ।
`` भूरा को तो बहुत तेज जवर है !``
`` अरे हाँ भूरा को बहुत तेज जवर है । अब कया िकया जाय षोषो``हिरिसंह ने छूकर दे खा और बोला ।
`` तुम जलदी से गाँव जाकर चौिरी काका को खबर कर दो । वे शायद कुछ न कुछ अवशय ही वयवसथा करे गे
।``
`` मै अभी जाता हूँ।``
`` लेिकन जलदी लौि आओ ।``.
हिरिसंह िबना समय गंवाए चौिरी कमलिसंह को बुलाने के िलए चल िदए । भूरा का जवर कम नहीं हो पा रहा । उसका
चेहरा जवर के ताप से तमतमाने लगा । होठो पर पपड़ी पड़ गई।उसका कणठ सूखने लगा।शायद शरीर मे पानी की
कमी हो गई । िपछले दो माह अििक से भूरा के पेि मे अनन का एक दाना नहीं गया और उसने अब तक एक बूँद पानी
भी नहीं पीया । पिरणामसवरप भूरा का शरीर जीणम-शीणम और शरीर शििहीन हो गया । वह बार-बार अचेत होता ।
बार-बार गशत खाकर िगर पड़ता और बड़बड़ाया करता। वह अब भी बड़बड़ा रहा है ।
``
मैकू......भाई.......शा......शा......शायद...........मेरा........अन......अन....अिनतम.....समय........आ......आ.....आ
गया..........है .............तु........तु.........तुम.........िजतनी...........जलदी..............हो...............सके........................हिर.....
............को............मेरे........पास...................ले................आ...............आओ...........................मेरा.........अिूरा......क
्ौल..................हिर.............पू...........पू..............पूरा................करे गा..........``
कहते-कहते वह िफर अचेत हो गया । कुछ कण बाद उसे िफर होश आया ,तब मैकू ने उसे समझाते हुए कहा-
``तुमहे कुछ नहीं होगा भूरा भाई !कुछ नहीं होगा ।िीरज रखो । हिरिसंह भाई इस समय चौिरी को बुलाने
गए है । िफर बाद मे तुमहारे हिर को भी बुलवा लेगे।``
`` तु..........तु............तुम................दे र...........कर........रहे ...........हो ।
तुम.....जाओ......जलदी............जाओ...........हिर को.............मेरे...............पास..........ले....आओ ।``
`` नहीं भूरा ! मै तुमहे अकेला छोड़कर नहीं जा सकता । हिरिसंह बस आने ही वाले है । चौिरी काका भी आ ही
जाएंगे साथ मे हिर भी आएगा ।``
``मै.......कू..........तुझे...............मेरे............कौल.........की
.......सौगंि...........तुम......जाओ....जलदी......जाओ..... हिर...को....ले..... ``
बात करते हुए भूरा तेजी से खांसने लगा । वह बार-बार अचेत हो जाता । उसके शरीर की कमता समाप सी हो गई है
िकनतु अब तक उसमे जीजीिवषा शेष है । यह अिल सतय है िक उपवास की अवसथा मे मनुषय की आनतिरक कित का
िवकास होता है । ऐसी अवसथा मे वयिि भीतर से शििशाली हो जाता है । इसका सकारातमक पहलू यह है िक वत की
अवसथा मे वयिि की आनतिरक इि्नदयाँ ,ऊजाव
म ान और साि्तवक होती है । साि्तवक अवसथा मे वयिि की
समसत कमिे्नदयाँ और जानेि्नदयाँ परमशुद होती है । यह वह अवसथा है िजसमे वयिि की समपूणम इि्नदया
िवशातमा की सघन एकातमकता मे तनमय रहती है िजससे वयिि आधयाि्तमक शिि समपनन हो जाता है ।ऐसे
समय वयिि समसत इि्नदयो को जीतकर आतमतप
ृ हो जाता है । वह आतमाराम हो जाता है । उसकी समसत
इि्नदयाँ परमशिि से एकाकार हो जाती है और वयिि उस परमशिि का पुँज बन जाता है ।ऐसी अवसथा मे वयिि की
कोई कित नहीं होती ।उसकी आनतिरक शिि के पभाव से पकृ ित अिभभूत हो जाती है । वसतुत: यही मुिि है ,जब
वयिि सभी कामनाओं से परे हो जाता है । सभी कामनाओं से परे होने का नाम ही मुिि है । इससे अलग हिकर कोई
मुिि नहीं होती । गीता मे मुिि इसी मुिावसथा को मानी गई है । जो लोग मुिि को सवगम की पािप मानते है या वैकुणड
की पािप को मुिि मानते है वे भम मे है ।वासतव मे सवगम और वैकुणठ पूणय के पताप से पाप होता है और पूणय कीण
हो जाने के बाद वयिि पुन: जनम लेता है । यह अविारण अिल सतय है । वासतिवक सवगम ,वैकुणठ तो सवम कामनाओं
से मुि होने का नाम है । यह मुिि पाप होने पर वयिि ईशर से सायुजय मुिि पाप कर लेता है जो पुन: जनम के िलए
अपेिकत नहीं होती अथात
म िफर पाणी का िकसी भी योिन मे जनम नहीं होता । इस समय भूरा की आि्तमक िसथित
यही है । वह सवम कामनाओं से मुि है लेिकन अपने कौल को पूरा करने के िलए अपने पुत हिर की आकांका करता है ।
अिनतम समय वयिि के बहुत ही किठन घड़ी होती है । इस अवसथा को जीत लेने पर वयिि समपूणम संसार को जीत
चुका होता है िकनतु यहाँ भूरा की अवसथा िबलकुल अलग है । संभवत: वह सोच रहा है िक यिद उसकी मतृयु हो गई तो
आमरण वत का संकलप अिूरा रह जाएगा । यह उसकी अपनी सोच है िकनतु यह आवशयक नहीं है कयोिक यही भूरा के
पाण िनकल भी गए तो उसका कौल अथवा यो कहे िक उसका संकलप पूरा हो गया । लेिकन भूरा को लग रहा है िक
यिद संकलप पूरा नहीं हुआ तो बरसात नहीं होगी और सूखे की िसथित जयो की तयो बनी रहे गी ।इसिलए वह अपने
संकलप को पूरा करने के िलए अपने पुत हिर की अिभलाषा कर रहा है ।भूरा के बार-बार िनवेदन के बाद मैकू ने कहा -
`` जैसी तेरी मजी भूरा ! मै अभी जाकर चौिरी काका के साथ तेरे पुत हिर को भी ले आता हूँ।``
मैकू की इचछा नहीं हो रही िक वह भूरा को छोड़कर चौिरी काका और हिर को बुलाने जाए िकनतु अब उसकी िववशता
है ।वह िमनदर मे भगवान के सामने करबद होकर कहता है :-
`` हे पभु ! मै भूरा को तेरे भरोसे छोड़कर जा रहा हूँ । तू उसकी रका करना कहीं ऐसा न हो िक मेरे जाते
ही......नहीं...नहीं....ऐसा नहीं हो सकता ।``
वह मूितम के सामने पाथन
म ा करने के बाद शीमद भागवत पुराण का वाचन कर रहे सािथयो से कहा-
`` मै चौिरी काका और हिर को लेने के िलए जा रहा हूँ । तुम लोग भूरा का खयाल रखना ।``
सािथयो को समझाईश दे कर मैकू चला जाता है । भूरा को िफर खांसी का वेग पारं भ हुआ । वह तेजी से खांसने लगा ।
खांसते-खांसते उसके मुख से रि िनषकािसत होने लगा । वह लगातार खांस रहा है । चेहरे पर पसीने की बूँदे उभर आई
। आँखे सूखम हो गई।वह पसीने से तर-ब-तर हो गया । बावजूद वह पूरी शिि के साथ अपने-आपको संभालते हुए
िमनदर के दरवाज़े की ओर दे खने लगा । शीकृ षण की मूितम के सामने दीपक दै िदपयमान हो रहा है । घोर अमावश की
काली रात मे दीपक का पकाश मदम-मदम रोशनी दे रहा है । भूरा के िनशतेज मुखमणडल पर आतुरता और आशा के
भाव उभर आए।वह करबद हो भगवान से कुछ कहना चाह रहा है । लेिकन उसके अिर थरथराने लगे । शबद मुख मे
िवलीन होने लगे । शबद अिरो पर नहीं आ पा रहे है । जब तक शबद अिरो पर नहीं आएंगे वह िकस तरह से भगवान
की पाथन
म ा करे । उसने करबद हो िमनदर की चौखि पर अपना माथा िे का।माथा िे कते ही वह िनढाल हो लुढ़क गया।
बाहर घनघोर अंिेरा छाया हुआ है । आसमान मे काले-काले घनघोर बादल छाने लगे। तभी अनायास िमनदर मे
अपतीम पकाश उजजवलयमान हो उठा। ऐसा पकाश जो कभी दे खने मे नहीं आया । िमनदर की ििणियाँ सवयं ही बजने
लगी । शंखनाद होने लगा। पुषपवषाZ होने लगी । दे खते ही दे खते बादल की घड़घड़ाहि के साथ वषाZ होने लगी ।भूरा
अब भी लुढ़का पड़ा है । उसी समय एक गंभीर आवाज़ सुनाई दी -
`` भूरा...!....भूरा !! भूरा !!! उठो भूरा !!!! दे खो वषाZ हो रही है । तुमहे बुला रही है । उठो भूरा !``
उसी कण वषाZ की बौछार आकर भूरा पर िगरी । वषाZ के पानी के सपशम से भूरा के शरीर मे िबजली सी कौि गई । वह
ठीक उसी तरह उठ बैठा िजस तरह कोई पूणम सवसथय वयिि उठ बैठता है । उसके शरीर मे नई शिि आ गई।
िमनदर मे पहरा दे रहे गोपालिसंह , नीलमिसंह तथा शीमदागवत का पाठ कर रहे गामीणो ने जब यह सारा
दशय दे खा तो वे नत-मसतक हो गए। उनहोने अपनी आँखो से िमनदर मे उजजवलयमान तेज रोशनी ,शंखधविन
,िघणियो का आवाज़े और आकाशवाणी सुनी , वे सारे के सारे गदद हो गए ।
भूरा उठ खड़ा हुआ और करबद हो भगवान की पाथन
म ा की -
`` हे जगितपता परम पभु ! हम सब नत-मसतक है । तुम जगत के पालनहार हो । अपनी सनतान से सचचा
पे््रम करनेवाले हो । हमने अवशय ही ऐसा कोई अपराि िकया होगा ,िजसके पिरणामसवरप हमे सूखे का दणड िमला
। पभु
हमे िवशास है िक िजस तरह िपता अपनी सनतान का पूरा खयाल रखता है ,उसी तरह तुम भी अपनी इन सनतानो का
खयाल रखते हो । यिद सनतान सनमागम पर चले तो उनहे कभी कोई संकि नहीं आता । हम संकलप करते है िक हम
भिवषय मे ऐसा कोई कायम नहीं करे गे िजससे पिरवार ,समाज और दे श को कित पहुँचे। हे परमिपता ! हम तुमहारे
आभारी है ।``
भूरा ने पाथन
म ा कर दणडवत पणाम िकया । बाद मे गोपालिसंह ,नीलमिसंह और सािथयो ने भगवान की जय-जयकार
की।

जयो ही मैकू ने चौिरी कमलिसंह के दरवाज़े की कुणडी खिखिाई बादलो की घड़घड़ाहि और वषाZ पारं भ हो
गई। बादलो के घड़घड़ाहि , िबजली के ज़ोरो से कौिने और तेजी से वषाZ होने लगी । चौिरी नींद से उठकर जाग गए
। वे भी बादलो की आवाज सुनकर चौक गए ।बाहर आकर दे खते है िक वषाZ हो रही है और सामने मैकू खड़े है । पल
भर के िलए वे भी सब कुछ भूल गए । न मैकू को होश रहा िक वे चौिरी काका को बुलाने आए है और न ही चौिरी को
होश रहा िक उनहे ्े मैकू बुलाने आया है । वषाZ होती दे ख उनके आननद का पारावार नहीं रहा । वे पसननतावश
बरसात के पानी मे नाच-नाचकर भीगने का आननद लेने लगे। िीरे -िीरे सारा गाँव-समाज जाग गया । सारे गामीण
पसननता मे फूले नहीं समा रहे । सारा गाँव अंिेरी रात मे बरसते पानी मे भूरा की जय-जयकारकरते हुए िमनदर की
ओर चल पड़े ।
िरमदास जी िबसतर मे बड़े आराम से सो रहे थे। वे भी बादलो की घड़घड़ाहि और पानी के बरसने की आवाज़ सुनकर
उठ बैठे । इनदावती को जगाने लगे-
`` ऐ....ऐ....ऐ.......उठ तो........ये बादलो की घड़घड़ाहि , पानी बरसने की आवाज़और िमनदर की िघणियो की
आवाज़ । गाँव-समाज के लोग जय-जयकार लगा रहे है । दे ख तो माज़रा कया है षोषो``
इनदावती पसनन हो उठी । वह उठकर बाहर आई। बरसात होते दे ख वह झूम उठी । बोली-
`` सतयमेव जयते । हमेशा सतय की ही िवजय होती है ।``
वह भी बािरश मे भीग कर आिननदत होने लगी । वह तेजी से उस ओर चल दी िजस ओर से गाँव-समाज के लोगो की
जय-जयकार की आवाज़े्े सुनाई दे रही है । वह भी जय-जयकारा लगाते हुए उस ओर चल पड़ी ।
िरमदास महाजन यह सब दे खते रह गए । वे कभी अपना मुँह अपने ही हाथो से िछपाने की कोिशश करते तो
कभी खीज कर दरवाज़े पर अपनी छड़ी ज़ोरो से पीिने लगते है ।
सारी रात िमनदर मे आननद उतसव चलता रहा । हिर-भजन ,जयकारा और तरह-तरह के कायक
म म
आयोिजत होते रहे । सुबह होते ही चौिरी कमलिसंह ,चौिरी िवकमिसंह और अनानय गाँव-समाज के नागिरक िमनदर
पांगण मे उपिसथत हुए । िजला कलेकिर भी इस अवसर पर िमनदर पांगण मे आ उपिसथत हुए । चौिरी
कमलिसंह,चौिरी िवकमिसंह और कलेकिर फूलो की मालाएं िलए भूरा के करीब गए । चौिरी बोले-
`` भूरा ! आज तुमहारा आमरण वत का संकलप पूरा हुआ । तुमहारी जीत हुई। हम सारा गाँव-समाज और
िजले के नागिरक तुमहारा अिभननदन करते है ।``
`` काका ! यह सब आपके आिशवाद
म का पताप है । मुझ जैसे अदने से वयिि की कया औकात जो इतना
किठन वत पूरा कर पाता । यिद आप लोग नहीं होते तो यह वत कभी पूरा नहीं हो पाता ।`` भूरा करबद हो बड़े िवनीत
भाव से अपने उदार पगि करने लगे ।
`` काका ! वासतव मे यह जीत मेरी नहीं आप सब लोगो की जीत है ।मै तो केवल एक िनिमत हूँ। भला आप
लोगो्े के िबना यह संकलप कभी पूरा हो सकता था।``
`` यह जान लो भूरा यिद तुम यह संकलप नहीं करते तो िनिशत ही यह मान िलया जाना होता िक सूखे पर
िवजय पाप नहीं की जा सकती थी। इस पथ
ृ वी को सूखे के कहर से बचाने के िलए आप जैसे महातमाओं की
आवशयकता होती है ।गीता मे भगवान ने कहा है िक जब-जब िमम की हािन होती है तब-तब वे िमम की रका के िलए
अवतार लेते है । मुझे तो यह लगता है िक इसी िमम को बचाने के िलए भगवान ने भूरा के रप मे आज हमारे बीच जनम
िलया है ।यह हमारा अहो भािय है अनयथा जो काम सरकार नहीं कर सकी वह काम तुमने िकतनी मशककत से पूरा
कर िदया । तुम हमारे िलए आदर के पात हो ।``
कलेकिर साहब ने अपनी बात पूरी करते हुए भूरा के गले मे फूलो की माला डाल दी । साथ ही चौिरी कमलिसंह,चौिरी
िवकमिसंह और अनानय नागिरको ने भी भूरा के गले मे फूलो की माला डालकर भूरा का अिभननदन िकया ।
`` हमारी अिभलाषा है िक अब तुम इस संकलप के पूरा होने की खुशी मे जल अनन और फलो का रस गहण
कर लो।``
चौिरी कमलिसंह बोले । अनुसूया एक सजाई हुई थाली भूरा के सामने रखती है ।िजसमे सेवफल का रस ,चावल की
खीर और चाँदी के िगलास मे जल भरा हुआ है ।सबके अनुनय-िवनय पर भूरा ने दो चममच खीर मुख मे डाल ली ।
आिा िगलास सेवफल का रस और आिा िगलास जल पी िलया । वह बोला-
`` िचिकतसक की सलाह अनुसार मुझे इससे अििक सेवन नहीं करना चािहए। िीरे -िीरे अनन का सेवन
करने का पाविान है ।``
भूरा के अनन गहण करने के साथ सभी ने करतल धविन से पसननता जताई।बाहणो ने सविसतवाचन पारं भ िकया और
मिहलाओं और युवको ने आननद-उतसव मनाया ।िजले के आसपास के लोग दशन
म ाथम आने लगे। कलेकिर बोले-
`` भई भूरा ! हम तुमहारे पित कृ तज है । सरकार की ओर से जो भी सुलभ होगा हम तुमहारे इस गाँव के िलए
करने के िलए अब पितबद हो गए है । अचछा ,अब हमे जाने की आजा दीिजए ।``
कलेकिर अपने अमले के साथ चले गए । सपाह भर तक िमनदर और गाँव-समाज मे आननद-उतसव चलते रहा ।
अभी सपाह भर का समय भी नहीं हुआ िक एक िदन सनधया के समय िरमदास महाजन अपने लठैत
सािथयो के साथ िमनदर पांगण मे आ िमका । उस समय िमनदर पांगण मे चौिरी कमलिसंह , चौिरी िवकमिसंह,
नीलमिसंह ,अनुसूया,इनदावती,रकमणी,रपा,,गुलाबो सिहत अनानय गाँव-समाज के गामीण भी एकितत थे। गामीण
युवक डांिडया नतृय पसतुत कर रहे थे । िरमदास महाजन िोती ,कुताम ,पैरो मे बहुत ही मंहगी चपपल , गले मे मोितयो
की माला और चाँदी की छड़ी िारण िकए हुए बीच मे आ िमके्े । नतृय रोकते हुए गरज पड़े ।
`` ठहरो , यह कया खुिशयाँ मनाई जा रही है षोषो``
युवक नतृय करते हुए थम गए। अचानक आई हुई िवपदा पर सभी दं ग रह गए । सभी एक दस
ू रे का मुख दे खने लगे ।
`` भूरा ! तूने तो गाँव के पित अपना कौल पूरा कर िदखाया । अब मेरे को जो कौल िदया था उसे भी पूरा
कर......अब तो बरसात भी हो गई दम
ु दबाकर ...।``
अपने दामाद को इस तरह अनायास दखल दे ते दे खकर चौिरी कमलिसंह ितलिमला उठे।वे बोले-
`` दे खो जमाई राजा ! अभी तो केवल बरसात ही हुई है । फसल पैदा होने मे किने मे ,खिलहानी होने मे समय
तो लगेगा ही । इसके पहले यह सब कैसे होगा। यह कोई अलािदन का िचराग तो नहीं हुआ िक पल भर मे सब कुछ हो
जाय ।``
`` मै तो इतना जानू िक भूरा ने कहा था दम
ु दबाकर िक अब की बरस बरसात होने दो पैसा-पैसा चुका दँग
ू ा
दम
ु दबाकर और अब बरसात भी हो गई । भूरा से कह दो िक वह अब भगवान से मेरा िरन चुकाने के िलए मांग ले दम

दबाकर।``
`` महाजन ! मै तो मेरा कौल पूरा करँगा ही लेिकन भगवान भी पापी को सुिरने के िलए एक अवसर दे ता है
। तुम तो इनसान हो । कया इनसान इतना भी नहीं कर सकता ।`` भूरा करबद हो बोला ।
`` अरे ! तू तो बड़ी-बड़ी बाते करने लगा है । िकशन ! भूरा को साथ ले चल।जब तक मेरा िरन पूरा नहीं चुका
भूरा मेरे खेतो मे काम करे गा दम
ु दबाकर समझे``
िकशन भूरा का हाथ पकड़ता है िकनतु तभी चौिरी िवकमिसंह बीच मे ही गरज उठते है । बोले-
`` ठहरो ! हम तुमको अब तक चौिरी का दामाद होने के कारण बखश दे ते रहे है । यिद तुम अपनी हरकतो से
बाज नहीं आओगे तो हम तुमहारी साहूकारी का लाइसेस रद करवा सकते है और तुमको जेल भी िभजवा सकते है
समझे !``
`` ओय....ओय.....ओय.......ये कौन सी िचिड़या फुदक रही है दम
ु दबाकर ..मै भी तो जानूं तुमहारी औकात
िकतनी है । िकशन दे खते कया हो ले चलो भूरा को, दे खता हूँ कौन रोकता है हमे दम
ु दबाकर ।``
महाजन अपने पूरे तेवर िदखाते हुए बोला । िकशन और अनय लठैत भर्ा को पकड़ लेते है । जयोही भूरा ,िकशन की
मजबूत हाथो से जकड़ा गया गुलाबो झपि पड़ी -
`` खबरदार ! भूरा काका को हाथ भी लगाया तो एक-एक का िसर फोड़ दँग
ू ी।``
गुलाबो की बहादरुी दे ख महाजन की पती इनदावती लपक पड़ी ।वह अपने पित िरमदास से बोली -
`` गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है । मुझे तुमसे ऐसी उममीद नहीं थी िक तुम इतनी
नीच हरकत पर उतर आओगे दम
ु दबाकर ।तुम इतना भी नहीं जानते िक जो इनसान रात-िदन भूखा-पयासा गाँव-
समाज और िजले की खाितर अपनी जान हथेली पर लेकर आमरण वत कर रहा है । उसके पित तुमहारा इतना घििया
रवैया । शमम आती है तुमहारी इस हरकत पर ।``
`` तू काहे को बीच मे बोलती है रे । जा तू अपना काम कर जा घर जा ।``
िरमदास पती के सामने नरम होते हुए बोले ।
``तुम महाजन हो तो कया मै महाजनीन नहीं हूँ । तुमको तुमहारा पैसी ही चािहए न तो िफर इतना हं गामा
मचाने की कया जररत थी षोषो``
िरमदास िखयाया जाता है और हे ...हे ....हे ...हे ....हे ...हे .....हं सने लगा ।
`` अरी बावरी ! तू तो बीच मे न बोल । माना िक तू महाजनीन है लेिकन तू कया जाने साहूकारी षोषो मै जो हूँ
तो तेरी कया जररत षोषो जा तू घर जा ।``
``जैसे मै चाहूँ वैसा ही होगा और तुमहारा िरन भी िमल जाएगा ।``
`` सो कैसे षोषो``
`` वो ऐसे िक भूरा हमारे खेतो मे काम करे गा तो खाएगा कया षोषो िरन कैसे चुका पाएगा षोषो``
`` मै कया जानू षोषो वह कहीं से भी वयवसथा करे दम
ु दबाकर षोषो``
`` नहीं ऐसे नहीं होगा । ऐ िकशन चल पहले तू फूि तो यहाँ से । तू कया यहाँ तमाशा दे खने आया है
तमाशबीन भाग यहाँ से ...!``
िबना िकसी तरह का अपवाद िकए िकशन अपने लठै त सािथयो सिहत चला जाता है । इनदावती िफर बोली-
`` हाँ तो सुनो ! भूरा की पती कमली हमारे घर का कामकाज करे गी तो उससे सूद किे गा और भूरा को उसके
अपने खेत मे खेती करने दो।खिलहानी पर जो भी बनेगा उससे िरन चुकता हो जाएगा । ये मेरा वादा है ।``
`` ये तूने ठीक िकया बेिे । आिखर बेिी िकसकी है हमारे चौिरी की , है न बेिे । बेिी पर पूरा िपता का पभाव
पड़ा है िकनतु दामाद पर...दम
ु दबाकर..``
िवकमिसह बोले । उनकी बात पर सभी हं स िदए । महाजन का िसर झुक गया ।बोले-
`` तू जो कहती है तो ठीक है । दे ख लूँगा।``
और महाजन मुँह ही मुँह मे बड़बड़ाते हुए िमनदर पांगण से चले गए । चौिरी बोले-
`` अरे भई ! शुर करो डांिडया .....``
युवको ने िफर डांिडया नतृय करना पारं भ कर िदया । दोनो चौिरी उठे और युवको के साथ नाचने लगे ।
00

भूरा ने इनदावती की बात रख ली । कमली को घर का काम-काज करने के िलए िरमदास महाजन के घर


भेज िदया और सवयं अपनी खेती मे काम करने चल िदया । बरसात होने से दब
ु ारा िरती पर हिरयाली छा गई। पेड़-
पौिे हरे -भरे होने लगे । कुछ ही िदनो मे िान , गेहूँ और चने की फसले लहराने लगी । गाँव-समाज के लोगो्े मं िफर
से पसननता छा गई। जहाँ दे खो वहाँ िकसान अपने खेतो मे काम करते नज़र आने लगे । अगहन-पौष तक गेहूँ और
चना लहराने लगा । सोयाबीन कि कर मणडी तक पहुँच गई। दे खते ही दे खते गाँव-समाज मे रौनक आ गई।
इनदावती और कमली मे अचछी पिने लगी । छोिी से छोिी बात पर इनदावती ,कमली से सलाह मशवरा
करने लगती ।रािा अब छह मिहने को होने की है और वह अब तक खड़ी भी नहीं हो पाती । वह अभी तक घुिनो के बल
पर भी नहीं िखसकती।कया करना चािहए । उसे खाने मे कया-कया दे ना चािहए । रािा की मािलश से लेकर नहलाना
और उसे खेल िखलाना कमली को भी अचछा लगने लगा । हिर अब रािा के साथ खेलने लेगा ।जब कभी िरमदास जी
बचचो को साथ मे खेलते दे खते तो दे खते ही रह जाते है । सोचने लगते, इस हिर के बचचे की िकसमत भी कया है दे खो न
िकतने आराम से इस घर मे आ िमका और बड़े इि्तमनान से खा-पी रहा है । काम की बात तो दरू रही।आिखर
इनदावती का कहना मानना ही पड़े गा न । वह जो ठहरी गाँव-समाज के मुिखया की बेिी । अििक चले तो कुछ न कुछ
गड़बड़ भी हो सकती है । यह सोचकर िरमदास जी मन ही मन कुडने लगते है । तरह-तरह के अनाप-शनाप बाते उनके
मन मे आती ।लेिकन वे सोचकर चुप हो जाते है । असल मे दे खा जाय तो िरमदास जी अवसर की तलाश मे रहते है ।
कब आसामी उनकी पकड़ मे आ जाय , कहा नहीं जा सकता । जयो ही िकसी आसामी की कमजोरी िदखाई दी , वे
तुरनत ही उसकी िगरे बान पकड़कर दबोच दे ते है और अपनी पाई-पाई वसूल कर लेते है । चाहे इसके िलए उनहे कुछ भी
करना पड़े । िजतना भी िगरना हो वे िगरने को तैयार हो जाते है िकनतु अपना एक भी पैसा छोड़ने को तैयार नहीं होते ।
अब भूरा को अवकाश ही नहीं िमलता । वह जानता है िक आनेवाली खिलहानी पर उसे िरमदास महाजन की ऋण
चुकाना है । इसिलए वह अििक से अििक कड़ी मेहनत करने लगता है । सुबह से सनधया तक वह बैलो के समान खेतो
मे जुता रहता है । उसे तो अपने भूख-पयास की भी िचनता नहीं रहती । कभी हिरिसंह तो कभी मैकू उसके िलए भोजन-
पानी की वयवसथा कर दे ते है । थोड़ा ऊपर सूरज चढ़ आने पर हिरिसंह भोजन लेकर आ जाता है । भूरा लकड़ी चीर रहा
होता या कुछ और कर रहा होता।
`` राम , राम भूरा ! भई थोड़ा तो सुसता िलया करो।``
`` तिनक थोड़ी सी लकड़ी चीर लूँ िफर सुसताएंगे ।``
और वह लकडी चीरने लगता है । यह लकड़ी वह मैकू के घर के िलए चीर कर तैयार कर दे ता है । हिरिसंह ने बीड़ी
सुलगाई ।
`` लो भई भूरा ! दो-चार कश बीड़ी के लगा लो । मैकू काका ने तुमहारे वासते रोिी भेजी है तिनक बैठकर जीम
लो ।``
कुलहाड़ी अलग रखकर बीड़ी ले लेता है -
`` मैकू काका भी बस ! लगता है उनके साथ हमारा कोई िपछले जनम का िरशता नाता होगा । तभी तो वे
हमारे िलए कुछ न कुछ करते रहते है ।``
`` िरशते-नाते भगवान के घर बनते है । हमारे -तुमहारे हाथ मे नहीं । िरशते तो अपने-आप बन जाते है । बनाने
से नहीं बनते और िबना बनाये बन जाते है ।बोलो सच है या नहीं ।``
`` तुम तो कहते ही हो िबलकुल सच । अचछा पहले भोजन जीम लो।जब तक मै तुमहारे िलए पानी ले आता
हूँ।``
0
समय िीरे -िीरे आगे सरकता गया । पतयेक खिलहानी पर भूरा अपनी मेहनत से जो भी िन पाप करता
उसमे से िलए गए ऋण का रपया िरमदास महाजन को चुकता करता । िबना िकसी हुजजत के िरमदास जी भी भूरा
से ऋण की रािश ले लेते।कमली, महाजन के घर काम-काज कर ही रही है उससे उनका बयाज चुकता होते रहता।इस
तरह समय अपनी रफतार चलता रहा ।
इसी बीच महाजन के घर पुत रत की पिप हुई। रािा भी आिहसता-आिहसता बड़ी होती गई। हिर अब युवा होने लगा है ।
समय की गित रकती नहीं । समय अपनी रफतार से चलते रहता है । समय पिरवतन
म शील है । समय के साथ-साथ
पकृ ित भी पिरवतन
म शील है । दोनो के पिरवतन
म को रोका जाना आसान नहीं है ।
समय के अनुसार गाँव-समाज मे िीरे -िीरे बदलाव आने लगा। दे खते ही दे खते लोगो मे समयानुकूल तथा
पकृ ित के अनुकूल बदलाव आते रहा ।
00
लगभग पचचीस वषीZ य हिर और बाईस वषीZ य रािा के बीच , साथ रहते-रहते इतना आकषण
म हो गया िक अब वे
अपना अििकतर समय साथ-साथ रहने लगे । हालांिक यह जानकारी इनदावती और िरमदास महाजन को भी है
िकनतु इतने वषोZ्ं तक साथ-साथ रहने से िकसी ने भी इस दोनो के आकषण
म की ओर धयान नहीं िदया ।वे अकसर
खेतो मे ,खिलहानो मे ,नदी-तालाब के िकनारे िमलते रहते और अठखेिलयाँ करते रहते। उनका यह आकषण
म महज
आकषण
म न होककर पे््रम की पिरणित तक पहुँच गया है । वे अकसर पे््रम उतसव मनाते रहते।
िरमदास का सुपुत भी संगामिसंह भी अब लगभग बीस-बाईस वषम की आयु के हो गए है । संगामिसंह पर
िरमदास जी का पूरा का पूरा पभाव पड़ा है । इतना ही नहीं अब वे अपना अििक समय चौपालो पर िबताया करते।
चौपालो पर तरह-तरह के लोगो का जमावड़ा लगा रहता है । तरह-तरह के लोगो से संगामिसंह की िमतता होने लगी
और वे भी उनही लोगो की तरह उजजडड होने लगे है । उनके कुछ सािथयो मे िपोरी भी है ।िपोरी पूरा का पूरा िपोरी है ।
उनका काम यहाँ की बाते वहाँ बताना और वहाँ की बाते यहाँ बताना होता है । िकसी ने ज़रा सी दार का पीला दी िक
समझो िपोरी अपना पूरा िपोरीपन ऊँढ़े लकर रख दे ता है । िफर वह चाहे उसका िहतैषी कयो न हो वह आगे पीछे नहीं
दे खता । इसे यो भी कहा जा सकता है िक िपोरी िबना पेदे के लोिे के समान है जहाँ अपना सवाथम िदखा वहीं वे लुढक
जाते है । रहते तो है संगामिसंह के साथ लेिकन यिद िवकमिसंह ,नीलमिसंह ,हिर या और कोई उनको घास डालते है तो
वे अपने दस
ू रे साथी का कचचा िचटठा खोलकर रख दे ते । उनकी इस तरह की आदत का सभी लोग भरपूर लाभ उठाते
है ।
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सनधया का समय रहा होगा । संगामिसंह बहीखाता दे ख रहे थे। वे दे ख रहे थे िक िकतने आसािमयो को ऋण
िदया हुआ है षोषो िकतनो ने ऋण का पूरा भुगतान कर िदया है और अब िकतने आसािमयो से ऋण का सूद और
मूलिन बाकी है षोषो िरमदास जी ने संगामिसंह को साहूकारी के सभी गुण-अवगुण िसखला िदए है । अब उनहे भी
िपता के साथ साहूकारी के वयवसाय को या तो आगे बढ़ाना है या आगे चलाना है । वे अभी बहीखाते मे उलझे हुए थे िक
कहीं से िपोरी आ िपका । बोला-
`` सेठ जी कहाँ है भाई षोषो बड़ा जररी काम आ पड़ा है ।``
संगामिसंह ने बताया-
`` िकसी काम से बाहर गए हुए है , कया काम है हमे बताएं ।``
`` भाई ! बड़ा जररी काम है । कह नहीं गए कुछ। वैसे सेठ जी कब तक आएंगेषोषो
`` बड़ी बुरी गंि आ रही है तुमहारे मुँह से । कया तुमने दार पी रखी है षोषो``
`` वो कया है न िक आज एक िरशतेदारी मे गया था तो िरशतेदारो की बैठक मे थोड़ी बहुत ले ली थी । वनाम
िकसे मयससर होती है जामे-शराब , कयो करे हम खाना खराब षोषो``
`` बड़े रं गीले आदमी हो भई । लगते तो हो बड़े काम के । कया कोई गुल िखला सकते हो षोषो``
िपोरी संगामिसंह के कानो मे फुसफुसाने लगता है -
`` कया है िक मुझे कुछ रपयो की जररत है और उममीद है िक आप मेरी मदद जरर करे गे ।``
`` भई हम तो आप लोगो की मदद के िलए ही यहाँ बैठे हुए है । लेिकन कुछ लाए हो तो बात करो ।``
`` एक चीज िदखाने लाया था । हाथ का कंगन, पांच-दास तोले का तो होगा ही । मै सेठ जी का पुराना
आसामी हूँ जो कुछ दे दोगे ले लूँगा ।``
कहते हुए िपोरी अपने कमर मे बंिी एक पोिली िनकालकर संगामिसंह के सामने रखता है । संगामिसंह कंगन को
उठाकर जांच करने की कोिशश करते है ।पहले तो वे सकुचा गए िक कहीं चोरी की वसतु तो नहीं है । बोले-
`` है तो असली । कहाँ से लाएं हो षोषो चोरी का है कया षोषो``
`` चोरी षोषो मािलक ने सबके पीछे रोजी-रोिी लगा रखी है । कोई नौकरी करता है । कोई मजूरी करता है ।
कोई रोजगार करके अपना पापी पेि भरता है । अलला ताला ने इस समनदर को भरने के िलए सबको कुछ न कुछ
अवशय िदया है । चाहे उसे कहीं से भी िमल जाय । तो िफर िनकालो रपये । मुझे दे र हो रही है ।जलदी ही शहर जाना है ।
बहुत काम आन पड़ा है ।`` िपोरी ने संगामिसं हो अपनी बातो मे इस तरह जकड़ िलया िक वे इनकार न कर सके्े।
बोले-
`` तू तो बड़े काम का आदमी है रे । लाओ इिर । पुिलस का भय तो नहीं है ।कहे दे ता हूँ भई ऊँचे हाथ कर दँग
ू ा
।``
``तुम तो भयभीत हो रहे हो जी । सेठ जी इतना डरते होते तो महाजनी नहीं करते । हमारे जैसे िपोिरयो से
उनका वयवहार है । कोई अचछी वसतु हाथ लगी और आँख मूँदकर यहाँ चले आए। दाम िलया और घर की राह पकड़
ली।सेठजी की मेहरबानी से इस गरीब का पेि पलता है । ये तो कुछ भी नहीं है जी।कम से कम यह पाँच हजार के तो
होगे ही``
`` ठीक है । तू इतना भरोसा िदला रहा है तो ये लो दो सौ रपये और बाकी सेठजी के आने पर ले जाना ।``
`` ठीक है भई।यह िंिा ईमानदारी पर ही तो ििका हुआ है ।``
``महाजनी या यो कहो साहूकारी का िंिा है तो बड़ा गजब का । लेिकन लाभ,,`` लाभ मोकलो दे सी। भणडार भरपूर
भरसी ।`` मे ईमान िबक जाता है । वैसे भी ईमानदारी का ज़माना नहीं रहा संगामिसंह ।``
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बचपन का साथ और यादे वयिि को सदै व समरण रहती है । चाहे वह साथ िकसी का भी हो।पुरष-पुरष का
साथ लमबे समय तक सुषुप रहता है और हलकी सी समिृत छोड़ जाता है और यिद सी-पुरष का साथ हो तो वह
समिृतयाँ मिुर बनी रहती है । िबछड़ना तभी हो पाता है जब दोनो मे से िकसी एक का जीवन अनय सथान पर
सथानांिरत हो जाता है । नारी का जीवन िववाह होने पर सथानांतिरत हो जाता है । लेिकन यिद युवा होने पर दोनो साथ
हो तो अििक किठनाई नहीं होती।खासकर कुलीन पिरवारो मे इतना धयान नहीं रखा जाता परनतु यिद यह िसथितयाँ
पितकूल हो तो उसका पभाव भी पितकूल ही पड़ता है । दो पिरवारो के बारे मे यह िसथित खासतौर पर बनती है । यिद
दोनो पिरवार एक दस
ू रे के अनुकूल हो तो कोई बात नहीं परनतु यिद दोनो पिरवार एक दस
ू रे के पितकूल हो तो बात
नहीं बनती । भूरा का पिरवार एक िकसान पिरवार और िरमदास महाजन का पिरवार एक समपनन पिरवार होने के
कारण िसथितयाँ अनुकूल नहीं रही लेिकन िरशते कहीं न कहीं आपस मे िमलते है । कहीं न कहीं आपस मे िकराते है ।
िमलन होना किठन हो जाता है और ऐसी िसथित को संभालना भी किठन हो जाता है । यही िसथित हिर और रािा को
लेकर उतपनन हो गई है ।
कमली अब वद
ृ हो चली है । उसके केश सफेद होने लगे है । चेहरे पर झुिरZ याँ पड़ने लगी है । इस अवसथा तक
आते-आते वयिि का शारीिरक गठन बदलने लगता है । उसी अनुरप वयिि कायम करने लगता है । उस रोज़ वह यो ही
घर का काम-काज िपपिा रही थी िक रािा ने दौड़ते-िखलिखलाती हुई कमली की कमर पकड़ ली । उसके हाथ मे कोई
अखबार है और हिर उसके पास का अखबार छीनने की कोिशश मे है ।वह िखलिखलाती हुई कमली से बोली -
`` अममा दे खो न हिर को ! िकतना सताता रहता है ।``
`` माँ ! ये अखबार नहीं दे रही है ।``
`` अचछा ले...ले....ले....ले....अखबार ले ।``
हिर बलात ् अखबार छीनना चाहता है िकनतु रािा अखबार लेकर कमली के चारो ओर दौड़ने लगी । दोनो को इस तरह
भाग-दौड़ करते दे ख कमली खड़ी हो गई। बोली-
`` अरे बचचो ! लड़ो मत ।``
`` माँ ! मै नहीं लड़ रही । ये तो हिर ही पेरशान करते रहता है ।``
`` नहीं माँ ! ये झूठ बोल रही है । मेरा अखबार लेकर भाग आई और अब दे खो न अखबार नहीं दे रही है ।``
`` नहीं माँ ! मै नहीं लड़ रही ।``
`` तो कया मै लड़ रहा हूँ षोषो``
`` नहीं मै भी नहीं लड़ रही हूँ।``
`` मै भी नहीं लड़ रहा माँ।``
`` नहीं तुम दोनो नहीं लड़ रहे हो । मेरे को परे शान कर रहे हो। अचछा लड़ना बनद करो तो।``
`` नहीं हम लोग लड़ नहीं रहे है ``
`` अचछा बाबा ! तुम दोनो नहीं लड़ रहे हो तो मै लड़ रही हूँ।``
कमली ने दोनो को बड़े पयार से बोला और रािा को अपने सीने से लगा िलया । तभी हिर मौका पाकर रािा के हाथ से
अखबार छीन िलया । रािा इतराते हुए रोने लगी ।
`` दे खो न माँ ! हिर्े ने मेरा अखबार छीन िलया ।``
`` ले जाने दे तू दस
ू रा ले लेना ।``
`` नहीं मुझे तो वो वाला ही अखबार चािहए....ए्े्ं....ए्े्ं....ऐं्ं....ऐ्े्ं......नहीं....उस अखबार मे िजतेनद
की तसवीर है ऐं....ऐं....ऐं....``.``
रािा इतराते हुए रोने लगी तो हिर ने अखबार मे से िजतेनद की तसवीरवाला भाग पनना रािा की ओर फेक िदया ।
उसने अखबार उलि-पलि कर दे खा िफर रोने लगी-
`` माँ जी ! दे खो तो ...िजतेनद िकतना अचछा लगता है न !``
`` अचछा तो िजतेनद से बयाह रचाएगी । बड़ा पसनद है तुझको तो ।``
`` हाँ...हाँ....मै तो िजतेनद से ही बयाह रचाऊँगी । तेरा कया तू तो िनखटिू है ।``षोषो
`` हाँ...हाँ...मै तो िनखटिू हूँ । तेरे िजतेनद जैसा आवारा तो नहीं हूँ न !`` बोलते हुए हिर ने उसकी चोिी ज़ोरो
से खीची और भाग खड़ा हुआ ।
`` जा जा तुझे रोकता कौन है षोषो``
`` हे भगवानल मै तो इन दोनो ्ंबचचो से परे शान हो गई हूँ। अब छोिे थोड़े हीहै बड़े -बड़े हो गए है िफर भी
सारा िदन लड़ते-झगड़ते रहते है ।``
रािा िलपि जाती है कमली से और बहुत पयार करने लगती है ।
`` माँ ! मेरी अचछी माँ !! अचछा अममा जी बता दो तो आपमे मेरी माँ मे कया फकम हो सकता है षोषो``
`` अचछा पश िकया तूने । अरी बेिी माँ , माँ होती है । सबकी माँ एक जैसी होती है । चाहे वो रािा की माँ हो या
हिर की माँ ।``
कमली से जवाब पाकर रािा उछल पड़ी और इतराते हुए भाग खड़ी हुई।

राषीय एकता आनदोलन सिमित के पुराने कायाल


म य के सथान पर अब नया भवन बन चुका है । बीस-पचचीस
वषोZ्ं मे कई सदसय बने और कई सदसय बदल गए । कायम अपनी गित से चलते रहा । इस दौरान पूरी पुरानी पीढ़ी
ही कायम करते हुए बदल गई। वही पुरानी कायप
म णाली जो बरसो से चली आ रही थी उसमे कोई खास अममून पिरवतन

नहीं हो पा रहा था । सामािजक और राजनीितक पिरवतन
म के साथ समय ने भी अपने तेवर बदले और नये िवचारो के
साथ नई पीढ़ी ने कदम रखे । आनदोलन सिमित गाँव-समाज के िवकास के िलए अपने ही ढ़ं ग से कायम करना चाहती
है । यह पीढ़ी चाहती है िक कुछ ऐसा पिरवतन
म हो िजससे गाँव-समाज का सारा पिरदशय बदल जाए। कोई भी गरीब न
हो । कोई भूखा न सोये । सब के पास रोिी-कपड़ा और अपना मकान हो और इसके िलए नयी पीढ़ी कांिे-से-कांिा
िमलाकर कायम करने के िलए तैयार हो रही है । पुरानी पीढ़ी भी चाहती है िक अब नई पीढ़ी को राषीय एकता आनदोलन
सिमित मे शािमल िकया जाय और उनसे कायम िलया जाय । यह सब कुछ सोच-िवचारने के बाद चौिरी कमलिसंह ,
चौिरी िवकमिसंह और अनानय वयोवद
ृ गामीणजनो ने सिमित कायाल
म य मे बैठक आयेिजत कर नवयुवको को
आमंितत िकया । चौिरी बोले-
`` ज़माना बदलता जाता है और उसके साथ-साथ ज़माने के रीित-िरवाज़ भी बदलते जाते है ।इन बूढ़ी
आँखो ने गुलामी के िदन दे खे है और ज़मीदारी के भी िदन दे खे है । दे श को आज़ाद हुए तीस बरस बीत चुके है ।अब इन
बूढ़े काँिो पर गाँव-समाज की यह िसयासत भारी लगती है । इस बोझ को आप लोगो के काँिो पर लादने के िलए हमने
तुम लोगो को आज यहाँ आमंितत िकया है ।``
`` ये कैसी बात कहते हो काका । हम सबको तो आपके मागद
म शन
म की जररत आ पड़ी रहती है ।`` एक युवक
ने अपनी बात कही।
``तुम सबके मागद
म शन
म के वासते मै अभी हूँ न ! पर तुम लोगो को जो भी काम करना है वह गाँव-समाज के
िवकास के िलए करना है ।`` चौिरी ने सानतवना भरे शबदो के साथ कहा ।
`` काका ! इस गाँव-समाज के पंचायत चुनाव भी गाँव-समाज के िसयासत मे ही आते है कया षोषो आप
हमको समझा कर बताओ काका षोषो`` हिर जो अब तक सुन रहा था ,खूब सोच-समझने के बाद बोल पड़ा ।
`` हाँ बेिे ! पंचायत तो इस गाँव-समाज की ही होती है लेिकन इसमे िसयासत की बू भरी रहती है । तुम लोगो
को इसिलए भी आज हमने यहाँ बात करने के िलए बुलाया है ।हमे पूरी उममीद है िक तुम नई पीढ़ी के युवक बहुत
अचछा कामकर सकते हो ।``
`` अब हमारी समझ मे आया ।इस अखबार मे भी कुछ ऐसी ही खबर छपी है काका । यह तो सारे िजले मे
गाँवो मे भी होनेवाला है । है न काका षोषो``हिर ने अपनी मंशा पगि की । यह वही अखबार का पनना है िजसे वह रािा
से झपि कर लाया था िकनतु वह अब तक समझ नहीं पा रहा था।चौिरी काका की बात से उसे कुछ-कुछ समझ मे
आने लगा ।
`` ला बेिे हिर !हमको भी िदखा तो कया िलखा है अखबार मे षोषो``नीलमिसंह ने हिर से अखबार का वह
पनना ले िलया और बड़े धयान से पढ़ने लगे। िजसमे िजले के गाँवो मे पंचायत चुनावो की खबरे पकािशत हुई है ।
अखबार पढ़ने के बाद चौिरी कमलिसंह को समबोिित करते हुए बोले-
`` काका ! हमारा हिर तो अभी से ही िसयासत की बात समझने लगा है । ऐसा लगता है िक हिर के हदय और
मिसतषक मे कोई बात खदबदा रही है । ``
`` हमे यह सुनकर बहुत अचछा लगा काका । कयो न हम लोग हिर को सिमित का सारा काम सौप दे । अपना
बचचा है ।उसके मागद
म शन
म के िलए हम लो्ेग तो है ही ।`` गोपालिसंह ने अपनी मंशा सबके सामने रख दी ।
`` ठीक कहा गोपालिसंह तुमने ।कयो चौिरी िवकमिसंह जी कया िवचार है आपके षोषो``
चौिरी कमलिसंह की बात पर गौर करते हुए चौिरी िवकमिसंह सोच मे पड़ गए िक कहीं ऐसा तो नहीं िक हिर को
सिमित का उतरिदयततव सौप िदया जाय और संगामिसंह तथा िरमदासजी कोई हं गामा खड़ा न कर दे । िफर उनहोने
सोचा,चलो अभी हम सब लोग हिर के साथ तो है न िफर िचनता िकस बात की।सोचने के बाद वे बोले-
`` चौिरी ! बचचा हमारा ही है िचनता की कोई बात नहीं िफर हम लोग भी तो है न उसके साथ । हमे यह
पसताव अचछा लगा ।``
चौिरी िवकमिसंह ने भी समथन
म िकया ।चौिरी कमलिसंह जी ,हिर को समबोिित करते हुए बोले-
`` लेिकन बेिे हिर ये बात याद रखो िक कोई भी काम उलि-पलि न होने पाएं।यिद ऐसा कुछ होता है तो तुम
हम लोगो को खबर करोगे और हम लोगो से सलाह मशवरा भी ले सकते हो ।िजससे िक हम लोग िमलकर कोई रासता
िनकाल सके ।``
चौिरी काका के िवचार पर सिमित कायाल
म य मे एकत सभी नवयुवको और वयोवद
ृ ो ने समेत सवरो और करतल धविन
के साथ सहमित वयि की । हिर अब तक केवल िु कुर-िु कुर दे ख रहा था।वह समझ नहीं पा रहा था िक यह अनायास
हो कया गया है षोषो उसने तो केवल बात चलाई थी लेिकन बात यहाँ तक आ पहुँचेगी यह उसे जात नहीं था । वह हदय
ही हदय मे पसनन हो उठा।उसके हदय मे अनेक िवचार उठने लगे।वह सोचने लगा, यिद इस समय उसके बाबा और
अममा यहाँ होती तो उसे आिशवाद
म दे ती और वक से लगा लेते।यिद रािा यहाँ होती तो िचकुिी कािकर कहती,यिद मै
अखबार के िलए नहीं लड़ती तो तू इसे झपिकर नहीं भागता और तू एकता सिमित का मुिखया नहीं बनता।उसका
हदय यह सोचते हुए हिषZ त होने लगा । तभी गोपालिसंह काका की आवाज़ उसके कानो मे पड़ी।वे बोल रहे थे-
`` गाँव-समाज की हार-जीत गाँव मे ही रहे तो अचछा है ।बनद मुटठी तो लाख की खुल गई तो खाक की ।``
`` काका ! यह भी िक हम लोग िकसी भी तरह की िवपरीत िसथित मे डअकर मुकाबला करे गे और िकसी को
हम पर हावी नहीं होने दे गे। हमारे गाँव-समाज पर अब तक बहुत सी िवपितयो ने आकमण िकया, कभी छुपके तो कभी
िकसी दस
ू रे के वदारा कराया गया । हमे तोड़ने की कोिशशे की जाती रही िकनतु गाँव- समाज ने अपनी एकता का
पदशन
म की िवपितयो को पीछे ढकेल िदया ।``काका नीलमिसंह ने अब तक हो रही पितकूल िसथितयो को अपरोकय रप
से सिमित के सदसयो के सामने अपनी बात कही तो हिर को भी जोश आ गया। बोला-
`` हम बाहर के िकसी भी अनैितक शिियो को इस गाँव-समाज पर राज़ करने नहीं दे गे । हम चौिरी काका
के मागद
म शन
म मे काम करे गे और इसके िलए मुझे अपने युवा सािथयो के सहयोग की आवशयकता होगी । सब तैयार है
षोषो``
हिर के जोश और आवाहन से सिमित कायाल
म य मे उपिसथत युवको ने समवेत सवरो मे समथन
म िकया -
`` हम तैयार है ।``
पसननता का माहौल छा गया । गोपालिसंह , हिरिसंह और अनानय गामीणो ने मुसकराकर सवागत िकया ।
गोपालिसंह , हिरिसंह के कानो मे बोले-
`` इसका मतलब समझतो हो दादा षोषो``
`` नहीं , नहीं िबलकुल नहीं ।``
`` इसका मतलब िरमदास महाजन से भी हो सकता है । है तो वे इसी गाँव-समाज के ,लेिकन उनका
वयवहार ऐसा है जैसे उनका इस गाँव-समाज से कोई लेना-दे ना ही नहीं है ।``
`` अचछा ! अब समझ मे आया । लेिकन भैया, अकेले महाजन से हम सबको इतना भय कयो है भला षोषो
कया हम सब लोग इतने कमजोर है िक सब िमलकर भी उनका मुकाबला नहीं कर सकते षोषो``
`` ऐसी बात नहीं है दादा ।एक तो वे चौिरी काका के दामाद और अब उनका बेिा संगामिसंह भी बड़ा हो गया
है । बाप का असर बेिे पर तो पड़ता है न !तुमको पता नहीं है कया आजकल संगािमंसह भी अपने बाप का साथ दे ने लेगा
है ।``
सिमित कायाल
म य मे सभी युवाओं को आमंितत िकया गया था।इस बहाने िपोरी भी सिमित की इस कायव
म ाही मे
शािमल था। लेिकन वह अनत तक कुछ बोला नहीं अिपतु वह सारी कायव
म ाही दे ख-सुन रहा था । िपोरी ,गोपालिसंह
और हिरिसंह का वाताल
म ाप सुन चौक गया।उसने तो अब तक यह सोचा भी नहीं था िक िवपितयाँ लानेवाले िरमदास
महाजन और अब उनका बेिा संगामिसंह भी है । वह सोचने लगा , अब तक गाँव-समाज मे जो भी उलि-फेर हो रहा है
या हो रहा था उसे अकेले िरमदास महाजन काका कर रहे थे।कया िरमदास महाजन काका इतने शििशाली है िक
सारा गाँव-समाज उनसे भयभीत रहता है । वह सोचकर रोमांिचत हो उठा । वह अचानक फुदक उठा, जैसे उसे कोई
खजाना िमल गया हो ।
बैठक की कायव
म ाही अभी समाप नहीं हुई थी। नीलमिसंह बोले-
`` हमारी इस बैठक मे आप युवाओं को आमंितत करने का सबसे बड़ा कारण यह है िक गाँव-समाज मे एकता
बनाए रखना है । बग़ैर एकता के कुछ संभव नहीं नहीं है ।``
`` कुछ उलिा-पलिा हो गया तो षोषो`` हिरिसंह को िफर शंका हो गई।
`` उलि-पलि हो गया तो इसके वासते हमारे इनसपेकिर चौिरी िवकमिसंह काका तो है ही ।भले ही वे अब
िरिायर हो गए है लेिकन अब भी उनकी अपनी है िसयत उनके महकमे मे बनी हुई है । उनका कहना अब भी मान िलया
जाता है ।``गोपाल ने समझाते हुए कहा ।
``और इनसपेकिर काका का बेिा भी तो पुिलस मे ही है न !``
`` हाँ है अशोकिसंह ठाकुर लेिकन वे पुिलस मे नहीं है वे आजकल खजुरीकला के िविायक हो गए है ।
``गोपालिसंह बोले
बहुत िवचार-िवमशम के बाद चौिरी कमलिसंह जी बोले-
`` हमारा इतना ही कहना है िक गाँव-समाज की शािनत और खुशहाली के िलए इस सिमित के बैनर तले
एकता सथािपत रहनी चािहए । तभी हम गाँव-समाजऔर अपना िवकास कर सकते है ।``
000
िपोरी के पेि मे बात हजम नहीं हो पाई।वह उछला-कूदता हुआ जा पहुँचा सीिे संगामिसह के पास । पहले तो
उसने संगामिसंह से बहुत सी बाते बनाई और छोिरयो से लेकर औरतो तक की बाते करता रहा । बहुत अििक
िछछौरे पन के बाद वह उतर आया राषीय एकता आनदोलन सिमित वदारा की गई कायव
म ािहयो पर और बोला-
`` भैया संगाम ! जैसा तुमहारा नाम है वैसे तो तुम हो नहीं िफर तुमहारा नाम संगाम कयो रखा गया । तुम तो
वैसे ही अचछे हो कया मतलब संगामिसंह नाम रखने का । अरे भई ,बेहतर होता तुम इतना सुनकर बौखला जाते िकनतु
तुम तो बहुत ही ठणडे िमजाज के िनकले ।``
िपोरी पूरा िपोरी है । वह नहीं जानता िकस काम मे िकस बात मे िकसका लाभ या िकसकी हािन हो सकती है । उसे तो
बस यहाँ की बात वहाँ कहना और वहाँ की बात यहाँ बताने मे ही आननद आता है । िपोरी की बात सुनकर संगामिसंह
काफी दे र तक सोचते रहा । वह समझ नहीं पा रहा था िक उसे राषीय एकता आनदोलन सिमित से कया लेना-दे ना हो
सकता है । उसे इन आनदोलनो से कया मतलब षोषो उसे तो आसािमयो से सूद लेना है और जो सूद नहीं दे ता उसका
मकान या िगरवी सामान या खेत कुकम करवाना है । उसे कया मतलब इन आनदोलन और सिमित से । लेिकन िपोरी
उसे उकसाता रहा ।बोला-
`` अरे भाई संगाम ! लगता है मेरे कहने का तुम पर कोई असर नहीं पड़ा । अरे चौिरी काका ,िवकम काका
और नीलम काका ने भी हिर को आनदोलन सिमित का मुिखया सवीकार करने की सहमित दे दी है और तुम कहीं के न
रहे ।अरे भई,पहला हक तुमहारा बनता है । तुम आनदोलन सिमित के मुिखया बनने के हकदार हो लेिकन नहीं काकाओं
ने सदसयो के पसताव को सवीकार कर सहमित दे दी। अब तो तुम न इिर के रहे और न उिर के ।``
`` ऐसा है िपोरी ! हमे कया करना है इन आनदोलन सिमितयो से । सालो के पास खाने को नहीं है ।तन ढकने
को ठीक से कपड़ा नहीं है ।िसर ढकने के िलए छत नहीं है । वे लोक कया आनदोलन करे गे। अरे भई िपोरी , आनदोलन
तो हम लोग करते है ।जो आसामी सूद नहीं दे । जो आसामी िरन नहीं चुकाएं हम तुरनत ही आनदोलन पारं भ कर उसे
नेसतनाबूद कर दे ते है ।इससे बड़ा आनदोलन और कया हो सकता है । इससे तो हमे रोज़ी-रोिी िमलती है ।उनहे कया
िमलता बता तो षोषो``
`` वैसे तो तुम ठीक कहते हो संगाम भैया । वे ससाले भूखे-नंगे कया आनदोलन करे गे । भूखे पेि भजन न हो गोपाला
...ठीक ही कहा है िकसी ने ।``
`` हाँ तो तुम अब समझ गए न िपोरी । अभी तो हमे हिर के बापू से िहसाब करना बाकी है ।मेरे बाबा कह रहे
थे िकसी िदन बहीखाता ठीक से दे ख ले ।िकस-िकस पर िरन और सूद बाकी है । आजकल तो मै इसी काम मे लगा हूँ
और मै कुछ ही िदनो मे िरन और सूद वसूली का आनदोलन पारं भ करने ही वाला हूँ िपोरी समझे !``
`` भैया संगाम ! तुमहारी बाते मेरी समझ मे नहीं आती । अचछा , दे दो तो पाँच का नोि , बहुत िदनो से
हलक के नीचे कुछ उतरी नहीं है ।``
`` लो तुम भी कया याद करोगे िकस रहीस से पाला पड़ा ।``
िपोरी िखसीयानी हं सी हं सता हुआ चलता बना । इस तरह के चिरत आम िजनदगी मे बहुत से िमलते है जो न कभी
िकसी का भला चाहते है और न िकसी के कुछ काम आ सकते है ।ऐसे लोग अपने सवाथम िसिद के िलए कभी उिर तो
कभी इिर लुढ़कते िफरते है । जहाँ िकसी ने इनहे चारा डाला ,ये लोग उसी तरफ हो जाते है । इनकी कभी न ``हाँ``
अचछी होती है और न कभी `` ना `` अचछी अचछी होती है । इन पर िवशास तो कतई नहीं िकया जा सकता । बावजूद
कई लोग िपोिरयो की बात का कोई न कोई अथम िनकाल ही लेते है । हो सकता है िक ये िपोरी सच कह रहा हो और यिद
इसकी बात पर धयान नहीं िदया गया तो हो सकता है िक कुछ अनथम ही हो।ऐसा ही सोचकर भले-चंगे लोग भी कभी-
कभी ऐसे िपोिरयो की बातो मे आ जाते है । संगामिसंह को कचचे कान का भी नहीं कह सकते कयोिक यिद वे कचचे
कान के होते तो तुरनत ही अपने अििकार की बाते करते िकनतु वे जानते है िक गाँव-समाज के लोगो पर िकस तरह
अपना रौब जताया जाय। बात यही समाप नहीं होती ।
िरमदास महाजन को भी राषीय एकता आनदोलन सिमित के कायव
म ाही की खबर िमल गई।उनके हदय मे
कई िदनो से खुननस अिक रही थी।उनहोने सोचा,यही अचछा अवसर है जब भूरा को िरन चुकाने के िलए दबाव डाला
जाय िफर दे खते है आनदोलन सिमितवाले कया करते है । उनहोने तुरनत ही िकशन को आदे श िदया िक वह जाकर भूरा
को बुला लाएं।
सुबह-सबेरे का ही समय था। वद
ृ भूरा चारा काि-काि कर बैलो के सामने डाल रहा था । हिर घर मे नहीं था ।
वह सिमित के कायम से अपने िमतो के साथ कहीं गया हुआ था । कमली ने चूलहे पर से चाय का तपेला उतारा और भूरा
को आवाज दी-
`` हिर के बापू !चाय ले लो ।``
``अरे भई यहीं ले आओ । हम यही पी लेगे और तुम भी बाहर ही आ जाओ साथ मे चाय पीने मे आननद ही
कुछ और आता है ।``
कमली बाहर ही चाय ले आई और दोनो िमलकर चाय पीने लगे।भूरा बोले-
`` आजकल ये लड़का घर मे ििकता ही नहीं है ।``
`` बचचे बड़े हो जाते है तो उनके पंख फूिने लगते है उड़ने के िलए । अब तोबेिा बड़ा हो गया है पैरो मे बेिड़याँ
डाल दो तो िफर दे खना कहीं नहीं भागेगा।``
कमली की बात पर भूरा को हं सी आ गई।बोला-
`` बावरी हो गई तू । अरे अभी उसके खाने-पीने के िदन है । खायेगा-पीयेगा और दिुनया दे खेगा तो समझदार
भी हो जाएगा ।``
तभी िकशन आंगन मे आकर भूरा के सामने खड़ा हो गया । उसे इतने सबेरे आया दे ख भूरा बोले-
`` राम राम िकशन भई । आओ चाय पीओ ।``
`` नहीं भूरा । मै चाय पीने नहीं आया हूँ । सेठ जी ने तुमहे बुला भेजा है । सेठ जी कोि मे है ।कहा है भूरा को
जलदी बुला ले आ ।``
`` अब कया कोई पहाड़ िू िनेवाला है ।``
`` कया पता , तुम चलकर दे ख लो भूरा ।``
`` हिर की माँ , मै िमल आता हूँ सेठ जी से ।``
`` जलदी अइयो जी ।``
`` हाँ...हाँ...जलदी आ जाऊँगा ।``
भूरा,िकशन के साथ चल दे ता है ।
महाजन मसनद पर बैठे हुकका गुड़गुड़ा रहे है । वे भी अब वद
ृ हो गए है । बाल पक गए है । मोिे काँच का चशमा
लगा है । संगामिसंह जाने कब से बहीखाता दे ख रहे है । सामने बैठे भूरा की ओर महाजन ऐनक मे से बार-बार भूरा की
ओर झांककर दे खने लगे । भूरा सहमे-सहमे से कभी महाजन को तो कभी संगामिसंह की ओर दे खने लगे । तभी
संगामिसंह बोले-
`` बाबा ! ये िहसाब तो बहुत पुराना मालूम पड़ता है । इसमे इतनो बरसो का लेखा जोखा ही नहीं िकया गया
है ।``
`` अब भूरा का िहसाब कया बनता है । ज़रा लेखा-जोखा करके बता तो।``
`` ये तो बाईस हज़ार रपया हो गया है । कब से पड़ा है ये पैसा षोषो``
सुनकर भूरा हकका-बकका हो गया । महाजन एक बार संगामिसंह की ओर और एक बार भूरा की ओर दे खा िफर बोले-
``सुन भूरा ! बीस बरस मे तूने एक पैसा भी दम
ु दबाकर नहीं चुकाया । अब बोल कया कहता है दम
ु दबाकर
षोषो``
`` तुमहारा बहीखाता , तुमहारी कलम और हाथ भी तुमहारे है । जो जी मे आए िलख िलया करते हो । यह भी
कोई िहसाब और ईमान है भला षोषो``
`` भूरा ,ईमान तो तुमने बेशरमी मे खतम ही कर िदया । अरे कम से कम इस बुढ़ापे मे सफेदी की तो शरम
कर दम
ु दबाकर ...``
` महाजन , काहे को हमारा मुँह खुलवाते हो । ये तुमहारा छोरा है है ...ये पैदा भी नहीं हुआ था और हमने तुमहरी पाई-
पाई का िहसाब चुकता कर िदया था।अब तुम जानो और तुमहारा ईमान । कहो तो पंचायत िबठा िलयो।``
`` पंचायत की िमकी दे रहा है तू तो । पंचायत इसमे्े कया करे गी षोषो``संगामसंह बीच मे ही बोल पड़ा।
`` नयाय करे गी ललला !नयाय करे गी ।``
`` तू कहता है तो पंचायत ही सही । कल ही पंचायत बुलवा लो । दि
ू का दि
ू और पानी का पानी अलग हो
जाएगा । चल जा अब यहाँ से । अबकी बार तो तो तुझको छोड़नेवाला नहीं हूँ भूरा ,समझे।``
`` अचछा चलता हूँ । राम , राम ।``
बीस बरस बात िफर ऋण और सूद का मामला िरमदास ने उठाया । बीस बरस तक वह कयो नहीं बोला । हो सकता है
िक इस दौरान उसने कुछ और ही सोच कर रखा हो। भूरा का िसर चकरा गया । वह सीिे जा पहुँचा चौिरी कमलिसंह
के दरवाज़े और आवाज़ लगाई।
`` चौिरी काका घर है कया षोषो``
भीतर से आवाज़ आई-
`` अरे भई कौन है इतने सुबह-सबेरे षोषो``
``काका , मै हूँ भूरा ।``
नीलमिसंह ने दरवाज़ा खोला ।बोले-
`` काका तुम , कया बात है षोषो तुमहारा चेहरा इस तरह उदास कयो है षोषो``
`` महाजन िफर वही पुराना बखेड़ा ले बैठे िक बीस साल से िरन नहीं चुकाया।``
`` तो अब षोषो``
`` महाजन पंचायत बुलाने का कह रहे है । अब तो अिनतम फैसला हो जाना ही चािहए । हम कब तक ज़लील
होते रहे गे षोषो``
`` लेिकन काका ,वे तो हमारे जीजा है । उनस िबगाड़ करके हमारा भी अचछा नहीं होगा ।``
`` नीलम बेिे ! चौिरी काका तो गाँव-समाज के मुिखया है । पंचायत भी काका के हाथो मे है । पंचायत तो
गाँव-समाज के नयाय के िलए होती है बेिे ।``
`` काका , तुम ठीक कह रहे हो।``
`` सारी दिुनया जानती है िक पंचो मे परमेशर होता है । पंचो का नयाय परमेशर का नयाय माना जाता है ।``
`` ठीक है काका ! पंचायत मे पंच ही फैसला करे गे । मै चौिरी काका को सारी िसथित बता दँग
ू ा । तुम िचनता
न करो । िचनता तयागकर घर जाओ और हाँ हिर को हमारे पास भेज दो ।``
भूरा बहुत िचिनतत हो गया । वह नहीं जानता िक कया होनेवाला है । यिद अब की बार महाजन ने तकरार की तो इतना
रपया कहाँ से आएगा । हिर भी अब कुछ नहीं कर सकता।इतने कम समय मे इतनी रािश जुड़ाना एक सामानय
िकसान के िलए बहुत ही किठन काम है । साहूकार का पैसा कभी ईमान का नहीं होता िफर महाजन का पैसा ईमान का
कैसे हो सकता है । यह तो ठीक ऐसा है िक मूल तो जमा ही रहता है और सूद आिहसता-आिहसता बढ़ते ही जाता है ।
मूलिन एक पितशत होता है तो सूद उसके दस पितशत हो जाता है ऐसे मे तो महाजन का ऋण कभी चुकता नहीं हो
सकता ।
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िपोरी को ने िफर पासां पलिा । वह िबना िकसी तरह का िवलमब िकए हिर को तलाशने लगा । िमनदर
,सिमित कायाल
म य ,खेल के मैदान से लेकर खेतो मे वह हिर को तलाशते रहा लेिकन उसे हिर का कहीं पता नहीं चला ।
हिर कहीं नहीं िमला तो अवशय ही वह चौपाल पर ही होगा, यह सोचकर िपोरी सीिे चौपाल जा पहुँचा । हिर अपने कुछ
युवा सािथयो के साथ एकता आनदोलन और गाँव-समाज के िवकास को लेकर चचाम कर रहे थे। अचानक िपोरी को
आया दे ख पहले तो सब लोग चौक गए िकनतु बात करने की पहल पहले िपोरी ने ही की।बोला-
`` अरे हिर भाई ! तुम यहाँ आराम से बैठे गपप ् मार रहे हो और वहाँ उिर महाजन तुमहारे बाबा के िवरोि मे
पंचायत बुलवा रहा है ।``
`` कया कहा षोषो िफर से तो बताओ ।``
`` मै कह रहा हूँ हिर के बाबा के िवरोि मे महाजन पंचायत बुलवा रहा है ।``
`` हिर के बाबा के िवरोि मे पंचायत ! कैसी पंचायत षोषो`` एक सदसय ने पूछा।
`` मै कया जानूँ षोषो सारे गाँव मे चचाम हो रही है । मै तो चला भई तमाश दे खने।``
`` सारे गाँव-समाज मे चचाम हो रही है और हमे यहाँ पता ही नहीं । चलो सािथयो चलकर दे खते है कया हो रहा
है ।``
हिर के कहते ही सारे युवा िमत उठ खड़े हुए और हिर के पीछे चल पड़े ।
िपोरी पानी मे आग लगवा दी । अब उसका दस
ू रा िनशाना संगामिसंह पर था।वह सीिे संगामिसंह की बैठक
मे जा पहुँचा । संगामिसंह अपनी िमत मणडली के साथ मौज उड़ा रहे है ।बैठक मे िे िबल पर चार िगलास रखे हुए है ।
पानी का बतन
म भरा रखा है ।चार-छह शीिशयाँ दे शी ठरे Z की रखी हुई है । एक नवयुवती उनके चारो ओर मिक रही है ।
वह संगामिसंह और उनके िमतो को िगलासो मे ठराम भरकर अपने हाथो से िपलाये जा रही है ।कभी संगामिसंह तो कभी
उसके साथी नवयुवित के साथ अि्शल हरकते करते है । कभी उसे अपने करीब खींच लेते है । कभी उसके उरोजो को
ज़ोरो से मसक दे ते है ।तरह-तरह की जवांगदीZ िकए जा रहे है । ऐसे मे िकसी अनय का आ जाना वैसे तो उनहे अचछा
नहीं लगता लेिकन यिद उनके सवाथम की बात हो तो सबकुछ जायज जान पड़ता है । िपोरी का लड़खड़ाते हुए आना
संगामिसंह को आशयज
म नक नहीं लगा । आते ही उसने माहौल को भांप िलया । बोला-
`` बूँद-बूँद पर िलखा होता है पीनेवाले का नाम ।``
`` आओ िपोरी ,आओ ! कया खबर लाए हो षोषो``
``ज़रा थोड़ी सी चढ़ा लूँ तभी मज़ा आएगा खबर बताने मे....अरे वाह संगाम भैया,शराब और शबाब दोनो एक
साथ , वाह िफर तो मज़ा आएगा ।``
नवयुवित को दे ख िपोरी का मन ललचा गया । उसने अब तक िकसी लड़की को इतने करीब से न तो पहले दे खा था
और मजे लुिे थे। वह चहक उठा । उसे उतेिजत दे ख संगामिसंह मुसकरा उठे।बोले-
`` अचछा , ले । शुर हो जा ।``
`` अ....हा.....इसको कहते है िदलदारी । शराब और शबाब िमल रहा है । वाह िपोरी तेरी तो िकसमत ही खुल
गई रे ला भैया दे दे िफर शबाब का मज़ा भी लूँगा हाँ.....``
दो पैग गिक जाने के बाद िफर बोला-
`` ये तो हो गई चढ़ावा और अब उतारा भी तो दो ।``
`` अबे उतारा तो बाद मे िमलेगी । तुमने उतारा ले िलया तो शबाब का मज़ा कैसे लोगे षोषो``
`` वाह भई वाह ...तुम तो हमारा खूब धयान रखते हो संगाम भाई। शराब और शबाब दोनो काम एक साथ हो
जाने दो चौिरी िफर दे खना कया मज़ा आता है । पहले शराब िफर शबाबा , पहले शराब िफर
शबाब....वाह...वाह....वाह...``
अब तक िपोरी को ठराम पीते-पीते इतना नशा हो गया िक उसका िसर चकराने लगा।उसने लड़की की ओर दे खा और
दे खता ही रह गया ।
`` अरे ! यह कया षोषो पहले तो एक ही लड़की थी अब यह दो-दो कैसे हो गईषोषो अब मै िकसके पास
जाऊँ....चलो कोई बात नहीं ...पहलेवाली के पास पहले और दस
ू रीवाली के पास बाद मे .....है न संगाम भाई ....``
संगाम और उसके साथी ठहाके लगाकर हं सने लगे।बोले-
`` बेवड़ा हो गया है अब िपोरी । पहले तो वह केवल िपोरी ही था लेिकन अब वह बेवड़ा हो गया है बेवड़ा...
सबके हं सी के ठहाके गूज
ँ ने लगे। लड़की मिक-मिक कर िपोरी के चारो ओर नाचने लगी । िपोरी उसे सपशम करने की
कोिशश करता है िकनतु उसे दो-दो लड़िकयाँ िदखाई दे ने लगती है । वह बार-बार सपशम करने का पयास करता है िकनतु
उसे बार-बार दो-दो लड़िकयाँ ही िदखाई दे ने लगती है । िफर वह अपनी पूरी शिि से लड़की को झपि पड़ता है । अबकी
बार लड़की उसकी बांहो मे आ जाती है और वह िखलिखला पड़ता है । वह िचललाया-
`` पकड़ ली । पकड़ ली । वाह चौिरी लड़की तो बहुत चकखी लगती है रे ।गोरे -गोरे गाल , लाल-लाल हो्ेठ
और ये कया इतना बड़ा इसका सीना षोषो बाप रे बाप ! मै तो इसमे लापता हो जाऊँगा ।``
संगामिसंह ठहाका लगाकर हं स पड़ा । ठरे Z के नशे मे संगामिसंह और उसके िमत सराबोर हो गए । लड़की नाचे जा
रही है और संगामिसंह के साथ िपोरी तथा िमतो ने लड़की को दबोच िलया । बहुत दे र तक लड़की के अंग-अंग से
खेलते रहे । जब नवयौवना अपना सबकुछ समिपत
म कर चुकी तब संगामिसंह , िपोरी सिहत सारे के सारे िनढाल हो
एक ओर लुढक पड़े । युवित ने अपने वस संभाले , पहने । एक तीवदिि से सबको िनहारा....िवतषृणा से दे खा और
कोिित हो उन पर थूक दी -
`` खाक् थू ! ससाले भेिड़ए !``
और वह बड़ी तेजी से बैठक से चली गई।
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अगले िदन सनधया के समय गाँव के चौपाल पर बरगद के वक


ृ के नीचे गाँव-समाज के लोग और पंच एकत
हुए । चौिरी कमलिसंह , चौिरी िवकमिसंह , चौिरी नीलमिसंह ,मैकू , हिरिसंह ,चौिरी अशोकिसंह ,गोपाल आिद
वयोवद
ृ ो उपिसथत हुए ।दािहनी ओर िरमदास महाजन तथा बांयी ओर भूरा , हिर और अनय गामीण बैठे । वषोZ्ं के
बाद गाँव-समाज मे इस तरह की पंचायत बुलाये जाने पर गामीणो मे एक पकार का आकोश उबल रहा था िकनतु गाँव-
समाज की परमपरा के चलते सभी पंचायत को सवोपिर मानते है । चौिरी अशोकिसंह बोले-
`` शानत ...शानत भाईयो ..शानत ! आज वषोZ्ं के बाद गाँव-समाज मे पंचायत आयोिजत की गई है । जब-
जब भी हमारे गाँव-समाज के िकसी वयिि पर कोई संकि आ पड़ता है तो यह पंचायत पूरी िनषा और ईमानदारी के
साथ उस वयिि के पित उिचत नयाय करती है । आज िफर यही अवसर आया है । हमारे गाँव-समाज का वयिि अपनी
समसया लेकर पंचायत के पास आया और पंचायत ने इसे गाँव-समाज के सामने रख फैसला करने का िनणय
म िलया है ।
इसिलए हम आज भूरा की समसया सुनेगे और जो भी उिचत होगा उस पर फैसला करे गे।हाँ तो भाई भूरा ! तुमहे जो
कहना है वह आज इस पंचायत के सामने कहो।``
भूरा बहुत दे र तक कुछ सोचते हुए बैठा ही रहा । उसके हदय मे अनेकानेक भय उतपनन होने लगे । वह सोचने लगा
,यह भी बहुत रही िक आज महाजन िफर अपनी पर उतर आया है यिद फैसला महाजन के पक मे गया तो वह तो जीता
जी मर जाएगा और कोई कुछ कर न पाएगा । िपता को इस तरह चुपचाप बैठे दे ख हिर ने कहा -
`` बाबा ! यह बहुत अचछा अवसर है । यिद हमने यह अवसर खो िदया तो िफर आजीवन हमे पछताना होगा ।
उठो बाबा , उठो । डरो नहीं । मै तुमहारे पास ही हूँ ।तुमहे कुछ होने नहीं दँग
ू ा । उठो बाबा , उठो ।``
भूरा की आँखो मे आँसू भर आएं। हिर, भूरा को सहारा दे कर खड़े करते है और सवयं ही बाबा के साथ खड़े हो जाते है ।
भूरा का सारा शरीर थरथरा रहा है । वह करबद होकर बोला-
`` पंचो ! आज से बाईस बरस पहले मेरा एक बैल चोरी हो गया था तो दस
ू रा बैल खरीदने के िलए मैने हमारे
िरमदास महाजन से दो सौ रपये का िरन िलया था ।बदले मे महाजन ने कोरे कागज पर अंगेछा लगवा िलया था िफर
उसी साल सूखा पड़ा । मै तब कुछ भी अदा न कर पाया । िमनदर मे्ं आमरण वत पर बैठा।बड़े किठन वत के तीन
माह बाद वषाZ हुई । बाद मे जैसे-जैसे खिलहानी आती रही मै महाजन को रपया चुकता करता गया। मेरी जोर भी
इनके घर काम कर सूद चुकता करते रही । मैने इनके खोतो मे काम करके भी िरन चुकाते रहा।अब बीस-बाईस बरस
बाद महाजन बाईस हज़ार का िरन मुझ पर िनकाल रहे
है । मै पंचो से फिरयाद करता हूँ िक मेरा िनकाल करे ।``
भूरा की पूरी फिरयाद सुनने के बाद पंचो ने िवचार िकया और बाद मे चौिरी कमलिसंह बोले-
`` िरमदास जी ! तुमहे ्े अपनी सफाई मे कुछ कहना है तो कह दो ।``
`` राम ! राम ! राम ! राम !! नीली छतरीवाला मािलक जानता है िक इस बही-खाते मे जो कुछ भी िलखा है
वह सवा सोलह आने िबलकुल सही है दम
ु दबाकर भूरा ने दे ख संभलकर अंगूछा लगाया है । िवशास न हो तो पूछ लो
इससे।``
िरमदास जी बहीखाता उठाकर पंचो के सामने रख िदया। चौिरी और पंचो ने एक-एक करके बहीखाते का अवलोकन
िकया । हालांिक भूरा ने बताया था िक उसने केवल दो सौ रपये का ऋण िलया था िकनतु बहीखाते मे दो हज़ार रपये
िलखे हुए है और भूरा के अंगठ
ू े का िनशान लगा हुआ है ।िपोरी ताली बजाने लगा और मुसकराते हुए बार-बार
संगामिसंह की ओर दे खने लगौ।बोला-
``िवशास तो करना ही पड़े गा न संगाम भैया ।``
िपोरी का इस तरह से ज़ोरो से बात करना पंचो को अचछा न लगा । चौिरी बोले-
``िपोरी चुप रहो....हाँ तो िरमदास जी !कया भूरा पढ़ना-िलखना जानता है षोषो``
`` नहीं...नहीं.....नहीं तो....``
`` इस बहीखाते मे िलखा है िक भूरा ने दो हज़ार रपये का िरन िलया है ।``
`` हाँ , हाँ िलए है तभी तो इस बहीखाते मे दो हज़ार रपये िलखा हुआ है ।``
अब तक चौिरी अशोकिसंह पंचायत की कायव
म ाही चुपचाप दे ख-सुन रहे थे। उनहोने अपनी जेब से एक कोरा कागज़
िनकाला और िरमदास जी को समबोिित करते हुए बोले-
`` िरमदास जी ! मै कैसे मानू षोषो``
`` नहीं, नहीं चौिरी अशोकिसंह जी ! यह तो मानना ही होगा । जो िलखा गया है वह पूरो सवा सोलह आने
सच है ।``
`` अचछा िरमदास जी मान लो तुम िबलकुल अनपढ़ हो ।``
`` कैसे मान लूँ िक मै अनपढ़ हूँ षोषो``
`` नहीं.....नहीं.... मान भी लो....``
`` अचछा मान भी लूँ तो.....``
`` यहाँ आकर इस कोरे कागज पर अंगूठा लगा दो ।``
िरमदासजी नहीं समझ पाए िक चौिरी अशोकिसंह जी आिखर कया जताना चाहते है ।वे कुछ दे र तक सोचते रहे िफर
उठकर पंचो तक गए और कोरे कागज पर अंगठ
ू ा लगा िदया।वे कोरे कागज को बार-बार दे खने लगे । कुछ दे र तक
दे खने के बाद उनहोने कागज चौिरी अशोकिसंह के पास दे िदया । अशोिसंहजी ने वह कोरा कागज पंचो और
पंचायत सुनने आए गाँव-समाज को िदखाते हुए बोले-
`` इस कोरे कागज पर िरमदास महाजन ने आप सबके सामने अंगूठा लगाया है । अब हम इस कोरे कागज
पर िलखते है िक शीमान िरमदास िससौिदया उफम िरमदास महाजन वदारा इस गाँव-समाज के पंचायत से पाँच लाख
का ऋण दस बरस पहले िलया हुआ है । दस बरस मे पाँच लाख पर सूद लगाकर अब िरमदास महाजन पंचायत को
बीस लाख रपये का भुगतान करे । यिद िरमदास जी िरन नहीं चुकाया तो इनकी सारी समपित कुकम कर ली जाए। सारे
गाँव-समाज को मंजूर है षोषो``
समवेत सवरो ने गामीणो ने कहा-
`` मंजूर है । मंजूर है ।``
चौिरी अशोकिसंह की इस कायव
म ाही ने एक नया मोड़ िलया और िरमदास महाजन यह सुनते ही चीख पड़े -
`` नहीं....नहीं.....ये सब िोखा है । मैने पंचायत से कोई िरन नहीं िलया है ।``
`` ये सब इस कागज पर िलखा है । यह कागज झूठ नहीं बोल सकता और तो और सारा गाँव-समाज सवा
सोलह आने सच बोल रहा है । आज ही िरमदास महाजन की सारी समपित कुकम िकए जाने का िनणय
म पंचायत ले रही
है ।``
`` नहीं....नहीं....यह सच नहीं है ।``
`` हाँ...हाँ... सच है । जैसे तुमहारा बहीखाता सच है । वैसे भी यह तुमहारे अंगूठे के िनशान भी सच है ।``
चौिरी अशोकिसंह पूरी ताकत से चीख कर बोले तो पंचायत मे्े बहुत दे र तक सननािा छा गया। िमरदास महाजन
पसीने से तर-ब-तर हो गए।संगामिसंह बार-बार कोिित होकर मुिि््ठयाँ भींचने लगे िकनतु पंचायत मे पंचो के रप मे
उनके नाना और अनय िरशतेदारो को शािमल हुए दे ख वे खून का
घूँि पी कर रह गए । वे भी अपने िपता के नकशे-कदम पर चलनेवाले है । वे भी अनैितक काम करते रहते है िकनतु जब
नयाय की बात सामने आई तो अपने-आपको िववश पा रहे है । उनका पड़ला हलका पड़ गया है । उनहे लगा अब उनकी
सारी अययाशी िमटिी मे िमल जाएगी । अब तो जो एशो-आराम िमल रहा था वह नहीं िमल पाएगा।वे अपना िसर िुन
कर रह गए । उनहोने सोचा नहीं था िक ऐसा भी समय कभी आएगा ।
अब तक सारे चौिरी अशोकिसंह की कायव
म ाही चुपचाप दे ख-सुर रहे थे।उनहोने दे खा िक वासतव मे ही
िरमदासजी ने भूरा के साथ िोखाघड़ी की है । तभी चौिरी कमलिसंह बड़ी िीर-गंभीर तथा ऊँचे सवर मे बोले-
`` अनयाय , अनयाय ही होता है । अनयाय िकसी के भी साथ हो अनयाय ही कहलाता है । िरमदास िससौिदया
उफम िरमदास महाजन तुमने न केवल भूरा के साथ अनयाय िकया है बिलक तुमने ऐसा गाँव-समाज के अनेक लोगो्े
के साथ भी िकया होगा। इसिलए पंचायत यह फैसला करती है िक भूरा के साथ िरमदास महाजन वदारा िोखा कर
कोरे बहीखाते मे अंगठ
ू ा लगवाकर दो सौ रपये के सथान पर दो हज़ार रपये िलख िलए थे। िरमदास महाजन वदारा
भूरा पर लगाए गए आरोप िमथया और गलत है और भूरा पर आज की तारीख मे कोई लेन-दे न बकाया नहीं है । इसिलए
यह पकरण यही समाप िकया जाकर िरमदास महाजन को ताकीद दी जाती है िक वे भिवषय मे ऐसा न करे । इसी के
साथ आज की पंचायत समाप की जाती है ।``
जयोही पंचायत ने भूरा के पक मे िनणय
म िलया उसके मुख पर पसननता छा गई।हिर ने बाबा को काँिे पर उठा िलया ।
िरमदास महाजन एकबारगी भूरा की ओर घण
ृ ा की दिि से दे खते है और बड़बड़ाने लगते है । संगामिसंह ने िपोरी को
ज़ोरदार एक थपपड़ रसीद दी । िपोरी इस अनायास थपपड़ के िलए तैयार नहीं था । वह चीखा-
`` यह कया संगाम भैया ! उिर का गुससा इिर िनकाल रहे हो।``
संगामिसंह िबना कुछ कहे चौपाल से चलते बने।िरमदास महाजन अपना सा मुँह बनाकर रह गए । भूरा ,चौिरी
कमलिसंह के चरणो िसर रखकर बोले-
`` काका ! तुम नहीं होते तो आज महाजन मुझे और मेरे पिरवार को सरे -आम बेच दे ते । तुमने मेरी लाज
रखी ।``
`` नहीं रे भूरा ! यह तो पंचायत है । यिद तुम गलत होते तो तुमहे सज़ा िमलती िकनतु जो सही है उसको नयाय
जरर िमलना चािहए । यही पंचायत का दसतूर है । अचछा, अब तुम आराम से घर जाओ। अरे बेिे हिर ! चूँिक पकरण
तुमहारे बाबा के िवरद था इसिलए तुम सिमित के मुिखया होने के बावजूद पंचो मे शािमल नहीं िकया गया था । यह
तो तुम अचछी तरह से जानते हो ।``
`` हाँ काका ! मै जानता हूँ इसिलए मैने कोई गुजािरश भी नहीं की । सोचा जो सच होगा पंचायत उसी के पक
मे िनणय
म लेगी और यह भी िक मुझे पूरा िवशास था िक मेरे बाबा िबलकुल सच है और बाबा के पक मे ही िनणय
म होगा।
``
``अचछा ,भूरा को अपने साथ घर ले जाओ ।``
`` अचछा काका !पणाम ।``
हिर िनिशनत हो उसके बाबा भूरा को साथ लेकर चले गए ।
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पैसा ,पैसा होता है ,चाहे वह ईमानदारी से कमाया जाय या बेईमानी से,वयिि िवशेष के िलए अनमोल होता
है ।ऐितहािसक समय से यह चला आ रहा है । िजतने भी ऐितहािसक युद अब तक हुए है उनमे पमुख कारण पैसे का भी
रहा है । ज़र,जोर और ज़मीन को लेकर अनेकानेका युद हुए है और भिवषय मे भी इन तीन वसतुओं के िलए िकसी न
िकसी सतर पर युद होते रहे गे।वे युद चाहे शसो से चाहे आनतिरक कूिनीितयो से लड़नेवाले हो,वे होते रहे गे। इस तरह
के गमम और शीत युद युगो-युगो तक होते रहे गे।केवल िरमदास महाजन ही अपवाद नहीं है । पंचायत मे िरमदास
महाजन ने जो िशकसत खाई है ।उससे वे ितलिमला उठे । कोई भी वयिि िकसी भी तरह की िशकसत खाने को तैयार
नहीं रहता । वह िशकसत चाहे नैितक हो या अनैितक । यहाँ िरमदास महाजन ने अनैितक िशकसत खायी है । जो वे
बदाशमत नहीं कर पा रहे है ।
इनदावती कमीजो के बिन िांक रही थी और िरमदास जी बौखलाहि मे इिर से उिर िहलकदमी कर रहे
थे। कभी वे मुटठी भींचकर दरवाज़े पर दे मारते तो कभी दाँत िकििकिाकर थूक दे ते।
`` मै उसका खून पी जाऊँगा । दे खता हूँ कैसे नहीं दे ता वह मेरे पैसे दम
ु दबाकर। उसे तो दे ना ही पड़े गा ।
दे खता हूँ बचचू ।``
`` ईमानदारी की कमाई तो नहीं है िक िन-लकमी चलकर तुमहारे पास चली आएगी । िजस िदन तुम
ईमानदारी से कमाओगे उस िदन ही ऐसा हो सकता है । मै तो कहती हूँ , अब तो बेईमानी छोड़ो।`` इनदावती बिन
िांकते हुए बोली।
`` अरी तू कया जाने रपया-पैसा कैसे कमाया जाता है । इस ज़माने मे मांगने से कुछ नहीं िमलता । यिद
कोई न दे तो छीन के लेना पड़ता है ।``
`` हक की कमाई िछनी जाती है । जो तुमहारे हक की नहीं तो छीनना भी बेमानी ही होगी न । जब कौरवो ने
पाणडवो को उनका हम नहीं िदया तब पाणडवो ने हक की खाितर िमम-युद लड़ा था और जीत भी उनकी ही हुई थी । तुम
तोपाणडवो के वंशज नहीं हो, तब िफर....``
`` अचछा , तो तू मुझे इस उम मे ईमानदारी का पाठ पढ़ा रही है । अरे , ईमानदारी से अब तो कुछ भी हािसल
नहीं िकया जा सकता, समझी ..``
कहा गया है िक जब मित मारी जाती है तो वयिि उल-जलूल हरकते करने लग जाता है । यही िसथित िरमदास
महाजन की हो रही है । उनहे कुछ नया नहीं सूझ रहा था।पित-पती मे बेवज़ह बहस चल रही थी िक तभी जाने कहाँ से
िकशन अपनी सफेद मूँछो पर हाथ फेरते हुए आ िमका । उसे दे खते ही िरमदास बोले-
`` ज़रा तुम जाकर संगामिसंह को बुला लाओ । अब दे खना मै कया करता हूँ।``
`` वे तो यहीं बैठक मे बैठे है । वहीं चलकर बाते कर लीिलए ।``
`` लगता है िकशन अब तू सिठया गया है ।तुझसे अब कुछ बनता नहीं है ।``
`` यह तो उमर का तकाजा है हुजूर । पहले कहाँ दनदनाते हुए भागदौड़ हो जाती थी । अब तो िीरे -िीरे
सबकुछ नरम पड़ता जा रहा है ।``
`` इसिलए तो मै कहती हूँ यह सब कुछ वि का तकाजा है । कल को तुम लोग बलशाली थे आज कमजोर हो
गए हो।बुिद भी कमजोर हो गई है ।इसिलए कहती हूँ , अब तो उम का िलहाज रखो ।``
इनदावती बड़ी शािलनता से समझाने का पयास करने लगी िकनतु जब दे खा िक महाजन अपनी हे कड़ी मे अब तक है
तो वह चुप हो गई। महाजन ,िकशन के साथ बैठक मे ही जा िमके । संगामिसंह अपने िमतो के साथ शतरं ज की बाजी
खेल रहे थे।वे बार-बार जीत जाया करते और उनके साथी बार-बार हार जाया करते।िपता को आते ही वे उठ खड़े हुए।
अिभवादन िकया और आने का कारण पूछा।महाजन ने पंचायत के फैसले की बात सुनाई और अपना पक बयान करते
रहे ।सारी चचाओ
म ं के बाद संगामिसंह ितलिमला उठे ।बोले-
`` हूँ......ये भी कोई नयाय हुआ षोषो दे खता हूँ भूरा से एक-एक पैसा वसूल नहीं िकया तो मेरा नाम भी
संगामिसंह नहीं है िपताजी ....``
`` लेिकन कैसे षोषो पंचायत ने तो अपना फैसला सुना िदया है ।``
`` हम नहीं मानते पंचायत का बेहूदा फैसला । अब तो वही होगा जो हम चाहे गे। चलो सािथयो...``
पुत को अपने कतवमय का पाठ पढ़ाकर िरमदासजी बहुत पसनन हो गए लेिकन उनहोने संगामिसंह को सचचाई कापाठ
नहीं पढ़ाया। इसी का पिरणाम है िक संगामिसंह को उनहोने कुछ भी उिचत-अनुिचत नहीं सीखाया । िपता ने बताया
उसे पुत अपना कतवमय समझकर कर िलया करता। इस समय भी ऐसा ही िरमदास जी ने िकया िफर मुसकराकर
कहकहा लगाया-
`` अब आएगा मज़ा । ऊँि को पहाड़ से उतरना ही होगा ।``
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भूरा िनिशनत था । उसे िकसी अनहोनी का पूवाभ


म ास नहीं था । शहर से सामान खरीदकर वह रात के करीब आठ-नौ
बजे चौराहे पर बस से उतर कर पैदल आ रहा था। बदिकसमत उस समय वह अकेला ही था । गाँव-समाज का कोई भी
वयिि न तो साथ मे था और न कोई आ-जा रहा था। भूरा अपनी िुन मे गाँव की ओर चला आ रहा था । उसने सामान
का झोला काँिे पर लिकाया हुआ था । तभी अचानत दो लठैतो ने पीछे से भूरा के िसर पर भरपूर ताकत से लािठयो का
वार कर िदया । िसर मे लाठी पड़ते ही भूरा िगर पड़ा। जयोही वह िगर पड़ा लठैत उसे काँिो पर उठाकर ले गए ।
महाजन के कहे अनुसार उसे गाँव के बाहर बगीचेवाली कोठरी मे बांिक बना िलया।कोठरी मे तरह-तरह का सामान-
असबा्ाब असत-वयसत पड़ा था । सीलन से कोठरी मे हलकी-हलकी बदबू आ रही थी। वही पर एक खमभे से भूरा को
िरससयो से बाँि िदया । संगामिसंह और िरमदास महाजन ठहाके लगाकर हं सने लगे।महाजन बोले-
`` अब आया ऊँि पहाड़ के नीचे । खाक् थू....``
उनहोने भूरा के कमीज की कालर पकड़कर खींची िकनतु वह तो बेहोश था । कोई पतयुतर नहीं िदया।
`` हरामी अब तक बेहोश है । िकशन इसके चेहरे पर पानी के छींिे तो डाल।अभी होश मे आ जाएगा दम

दबाकर ..``
िकशन ने पानी भरा घड़ा उठाकर भूरा के िसर पर ऊँढे ल िदया । शीतल जल से िीरे -िीरे भूरा ने आँखे खोली । वह कुछ
समझ नहीं पाया लेिकन जैसे ही उसे होश आए संगामिसंह ने उसके कमीज की कालर पकड़ी और चार-छह झापड़ उसे
जड़ िदए।अब भूरा िसथित समझ गया । वह चीख कर बोला-
`` तो तुम अपनी करकतो से बाज़ नहीं आये महाजन ...``
`` महाजन का पैसा हराम का नहीं है बचचू ।जो तू इतनी आसानी से हज़म कर लेगा दम
ु दबाकर । बोल अब
तेरे साथ कया सलूक िकया जाय षोषो``
`` िपता शी !बाप नहीं भरे गा तो बेिे को भरना होगा कुते...कैसे नहीं दे ता तू िरन का पैसा दे खता हूँ।तेरी बोिी-
बोिी कुते को िखला दँग
ू ा । जब तेरी बोिियाँ किे गी तेरे ही बेिे के सामने तो उसे तकलीफ होगी ही िफर दे खते है कया
नहीं होगा षोषो`` संगामिसंह गरज पड़ा और भूरा की िपिाई करने लगा ।
`` मै तेरा खून पी जाऊँगा महाजन । दे ख , भगवान के घर दे र है अंिेर नहीं है । लगता है तेरे पाप का घड़ा
भरनेवाला है और तू उसमे डू ब जाएगा ।अनयाय न कर महाजन कहे दे ता हूँ।अंजाम अचछा नहीं होगा । तू भी मेरी ही
तरह उस पाप के घड़े मे तड़पने लगेगा महाजन ।`` असहाय भूरा चीख-चीखकर बोलने लगा । उसके िसर से
रि की बूँदे चू रही है । पीड़ा के कारण उसका िसर चकरा जा रहा है ।
`` िचलला , कुते की तरह िचलला िजतना िचललाना चाहता है । यहाँ कोई तेरी आवाज़ सुननेवाला नहीं है ।
दे खता हूँ कब तक तेरे इस शरीर मे िकतना दम है । यो ही बंिा रहे गा तो नानी याद आ जाएगी । चलो सािथयो चलो....``
महाजन चीखते हुए कोठरी से बाहर जाने को हुआ । भूरा िफर चीखा-
`` अरे कंस का अतयाचार कब तक चला जो तेरा चलेगा । कभी न कभी तो भगवान का सुदशन
म चक चलेगा
और तेरा िसर कि जाएगा ।``
00
िमनदर पांगण मे हिर अपने सािथयो के साथ साफ-सफाई का अिभयान चला रहा है । राषीय एकता
आनदोलन सिमित के सदसय पित सपाह रिववार के िदन िमनदर और िमनदर पांगण की सफाई िकया करते है । इस
अिभयान को मूतम रप दे ने मे हिर ने कड़ी मेहनत की है । यह वही िमनदर और सथान है जहाँ हिर के िपता ने गाँव-
समाज और िजले की खुिशहाली के िलए सूखे की िसथित को िनपिने के िलए आमरण वत का संकलप पूरा िकया था
और बरसात हुई थी। हिर इस घिना को अब तक नहीं भूल पाया । इसीिलए उसका झुकाव िमनदर की ओर अििक
रहता है । वह अभी सफाई अिभयान मे ही वयसत था िक गोपालिसंह का आना हुआ । आज गोपालिसंह इस अिभयान मे
शािमल होने के िलए दे री से आ पाएं । चूँिक वे अब वद
ृ ावसथा की दे हलीज पर कदम रख चुके है ।इसिलए अपना पूरा
सहयोग नहीं दे पाते िफर भी युवाओं को पोतसािहत करने के िलए वे उनके साथ-साथ रहते है । वे सफेद िोती-कुताम
पहने और माथे पर ितलक िरे हुए है । उनकी भगवान शीकृ षण के इस िमनदर के पित अििक शदा है ।इसिलए भी वे
अििक संवेदनशील हो गए है । आते ही हिर से बोले-
`` हिर बेिे ! तेरे बाबा दो िदनो से िदखाई नहीं दे रहे है । उनकी तबीयत कैसी है षोषो वे अब अििक वद
ृ और
कमजोर भी हो गए है ।``
`` वे तो दो िदन पहले ही शहर गए है ।शायद कोई सामान लाने के िलए । पता नहीं उनको आने मे इतनी दे र
कयो हो गई। हो सकता है िक कोई जररी काम आ पड़ा हो । इसिलए अब तक नहीं लौिे ।``
`` ऐसा कया काम आ पड़ा जो दो िदनो बाद भी शहर से नहीं लौिे ! कोई खबर भेजी है कया षोषो अभी तक तो
वे एक िदन से जयादा कभी शहर मे नहीं रके।``
` हाँ , थे््रशर खरीदना था । हमने सोचा बैलो से अििक काम नहीं िलया जा सकता और उनसे अििक समय भी
लगता है । इसीिलए थे््रशर खरीदने का िवचार मन मे आया । शायद इसीिलए उनहे शहर मे दे र हो गई।``
`` थे््रशर ! अरे वाह हिर बेिे , ठीक है बहुत अचछा है । अचछा मै चलता हूँ हो सका तो हम लोग शहर चलेगे।
चौिरी अशोकिसंह से भी मुलाकात हो जाएगी।``
हिर पुन:सफाई अिभयान मे जुि गए । गोपालिसंहजी यह जानकर पसनन हो गए िक भूरा के यहाँ थे््रशर आ जाने से
उनकी किठनाई भी आसान हो जाएगी । वे यह सोचते हुए चले जा रहे थे। रासते मे ही रािा और गुलाबो से मुलाकात हो
गई। वे दोनो िमनदर मे पूजा के िलए जा रही थी। गोपालिसंह को दे ख रािा बोली-
`` काका , राम-राम । इतनी जलदी कहाँ जा रहे है काका ।``
`` तेरी काकी से पूछ ले।``
`` मै कया जानू बेिी।तेरे काका ही जाने।`` गुलाबो बोली।
``ऐसे है बेिे , घर से िनकलते समय इनहे बता कर नहीं आया था।सोचा कहीं ऐ मुझे ढू ँ ढने न िनकल पड़े और
दे ख सच ही मे मुझे ढँ ्ूढने िनकल पड़ी।``
शरारत के साथ गोपालिसंह बोले।यह उनकी पुरानी आदत है । नीलमिसंह और गोपालिसंह की जोड़ी जवानी के िदनो मे
गुलाबो के आगे-पीछे घुमती थी।हसीन शोख गुलाबो दोनो्े को चारा नहीं डालती थी।लेिकन िीरे -िीरे समय वयतीत
होते रहा और उम के उस मुकाम पर जहाँ सी-पुरष को एक दस
ू रे की जररत पड़ती है वहाँ गुलाबो और गोपालिसंह ने
िववाह कर िलया था। लेिकन अब तक दोनो के बीच शरारत जस की तस होती रहती है । हाँ,यह बात अलग है िक
नीलमिसंह इस बीच नहीं आएं कयोिक उस समय उनकी शरारत ही हुआ करती थी। अभी वे बाते कर ही रहे थे िक
साइिकल पर सवार िपोरी शीघता मे जाते हुए िदखाई िदया।रािा ने उसे आवाज़ दी-
`` अरे िपोरी रक तो । इतनी जलदी कहाँ जा रहा है तू षोषो``
`` अरे दीदी । गजब हो गया । तुमको पता है कया षोषो भूरा काका को तुमहारे बाबा ने कोठरी मे बनद कर
रखा है । बेचारे काका को मार-मारकर अिमरा कर िदया। मै हिर भाई को यही खबर दे ने जा रहा हूँ। काका को तो
मालूम ही होगा।``
`` कया षोषोनहीं मुझे तो नहीं पता ।`` गोपालिसंह बोले।
`` कया षोषो हमे तो नहीं पता ।``रािा और गुलाबो एक साथ चौक पड़ी।
`` यह तो गजब हो गया । हमारे बाबा ने भूरा काका को कोठरी मे बनद कर रखा है ।आिखर वे ऐसा कयो करते
है षोषो``
``चलो पहले हम लोग हिर के पास चलते है । हिर अभी िमनदर मे ही है । लेिकन िपोरी यिद तुमने गलत या
झूठ कहा तो तुमहारी खैर नहीं ्ं``
`` राम कसम काका ! मै भला कभी झूठ बोलता कया षोषो``िपोरी ने कान पकड़कर दह
ु ाई दी।
`` तो ठीक है , चलो िमनदर चलते है ।िपोरी तुम भी तो चलो हिर के पास।िजतना तुम जानते हो उतना हम
लोग नहीं जानते।चलो तुम भी चलो।``गोपाल िसंहबोले
`` हाँ , हाँ चलो । मै सारी खबर सच-सच बताऊँगा।``
वे चारो ही सीिे िमनदर जा पहुँचे।अभी तक िमनदर मे सफाई अिभयान चल रहा था।गोपालिसंह,गुलाबो काकी,रािा
और साथ मे िपोरी को आता दे ख हिर िठठक गए।
`` अरे ! गोपाल काका तो अभी-अभी यहाँ से गए थे िफर लौिकर आए और साथ मे िपोरी भी ....और
रािा.....पूजा की थाली....और गुलाबो काकी भी...बात कया हो सकती है षोषो``
िनकि आते ही हिर ने पूछा-
`` काका ! कया बात है षोषो आप लौिकर आए। आप तो शहर जाने का कह गए थे। और ये िपोरी.... कया
बात है षोषो खैिरयत तो है न षोषो``
`` खैिरयत नहीं है ।इसीिलए तो हम लौि कर आए है ।``गोपालिसंह बोले
`` कयो कया हो गया षोषो`` हिर का पश था
`` बात यह है हिर भैया.........`` कहते-कहते िपोरी चुप हो गया। िफर बोला-
`` कैसे कहूँषोषोमुझे तो डर लग रहा है ।``
`` नहीं .नहीं डरने की कोई बात नहीं । हम सब लोग है न तेरे साथ। बता कया बताना चाहता है । अरे भाई, हम
तुमहारा नाम िकसी को नहीं बताएंगे।``हिर ने उसे हौसला दे ते हुए कहा।
``बात यह है हिर भैया........भूरा काका.....!``
`` भूरा काका....कया हो गया बाबा को षोषो`` हिर हड़बड़ाया ।
`` महाजन काका ने उनहे कोठरी मे बनद कर रखा है और कल रात उनको उनहोने काका को बहुत मारा ।``
िपोरी हड़बड़ाते हुए बोल पड़ा।
`` कया......................षोषो``
हिर आचंिभत हो गया । उसे लगा उसका िसर चकरा गया है और वह अब िगर पड़े गा। उसने गोपालिसंह के काँिे पर
हाथ रखा और कुछ कण तक चुपचाप खड़ा रहा । थोड़ी दे र बाद उसे जाने कया सूझी उसने रािा को झननािे से एक
थपपड़ जड़ िदया।गुलाबो बोली-
`` कयो मारा इस बेचारी कोषोषोइसने कया िकया।ये तो तुमहारी तलबदारी कर रही है ।``षोषो
`` कमा करे काकी गलती हो गई।``
रािा अपना गाल सहलाते रह गई।उसे रआँसी आ गई।हिर पशाताप के्े साथ बोला।गोपालिसंह ने हिर को संभाल
िलया । वे समझ गए िक हिर इस समय आवेश मे है ।वे बोले-
`` हिर यह समय िहममत से काम लेने का है ।हम सब तुमहारे साथ है ।``
`` हाँ हिर, मै भी तुमहारे साथ हूँ।मेरे बाबा हुए तो कया हुआषोषोअनयाय, अनयाय ही होता है ।अनयाय को बदाशमत
नहीं िकया जा सकता।हमे तो अब तक मालूम ही नहीं था।भला हो िपोरी का जो यह रासते मे िमल गया और सारी
बात हमे सच सच बता दी।``रािा ने हिर का पक लेने हुए उसे सानतवना दी ।
`` अचछा बेिे रािा , तुम और तुमहारी काकी पूजन कर घर जाओ ।इिर हम लोग दे खते है िक अब हमे कया
करना है ।``
िमनदर पांगण मे सफाई कर रहे सारे युवक हिर को घेर कर खड़े हो गए। हिर आवेश मे चीख पड़ा-
`` मै महाजन और उसके बेिे संगामिसंह का खून पी जाऊँगा।``
`` हाँ, हाँ....हम सब महाजन का खून पी जाएंगे।चलो....`` सभी ने एक सवर मे कहा और जाने लगे िकनतु
गोपालिसंह काका िचललाएं-
``ठहरो ! यह वि उतेिजत होने का नहीं है ।इस नाजूक िसथित मे समझदारी और होिशयारी से काम लेना
होगा ।``
`` हमारे होते हुए भूरा काका पर कोई आंच नहीं आ सकती । हम सब िमलकर संकलप लेते है िक इस गाँव-
समाज से अनयाय िमिा कर रहे गे।`` एकत सभी युवको ने िरती से मािी उठाकर संकलप िलया और हिर के पीछे चल
पड़े ।
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अनीित ,अनयाय और अतयाचार कभी सथायी नहीं रहते। इनका अिसततव असथायी होता है । अििक समय
तक इनकी सता ििक नहीं पाती । एक िदन ऐसा आता है जब इनका नाश होना िनिशत रहता है । अनाचार इनसान की
नकारातमक सोच का पिरणाम है । यह नकारातमक सोच इनसान को इनसािनयत से नीचे िगराकर है वान बना दे ती है ।
है वािनयत ही नकारातमक सोच है । इसे कटिरता भी कहा जा सकता है । हिििमत
म ा इसका पयाय
म वाची हो सकता है
कयोिक िजतनी नकारातमक िवचारो की शख
ं ृ ला है वे सारी एक वत
ृ मे घुमकर एक िबनद ु पर आकर ही िमलती है ।
नकारातमक सोच के िवचारो को समझाना आसान नहीं है । वे तब ही समझते है जब नकारातमक के पितकूल पिरणाम
सामने आते है और वे परािजत हो जाते है ।हालांिक नकारातमक सोचवाले वयिि अपनी हार सवीकार भी नहीं करते।वे
पुन:अपनी नकारातमक सोच को दढ़ करने मे अपनी शिि का दर
ु पयोग करते है । वे नहीं जानते िक वे कया कर रहे है ।
वे यही समझते है िक वे जो कुछ भी कर रहे है वो ही सौ पितशत सतय है । वे उसी पथ पर चल पड़ते है ।चाहे वह पथ
उनहे पथभि कर दे । वे तब तक हार नहीं मानते जब िक उनके पाण संकि मे नहीं पड़ जाते।
िरमदास महाजन अपनी पिरणित को नहीं जानते।वे हिििमत
म ा और नकारातमक सोच के पुजारी है । वे जो
चाहते है वो ही करते है । उनहे गवम हो गया िक उनहोने भूरा को कोठरी मे बनद कर अपना पितशोथ पूरा कर रहे है । वे
अनयाय को ही अपना िमम औ कतवमय समझ रहे है । जो भी लाचार और िववश उनके पास आता है । वह उनके चंगुल मे
फंस जाता है ।
आज वे बहुत पसनन िदखाई दे रहे है । घर की बैठक को छोड़ आज वे उस कोठरी के बाहर बगीचे मे पेड़ के
नीचे अपना तखत िबछवाकर आराम फरमा रहे है ।इसी बगीचे मे सामान रखने की एक कोठरी बनी हुई है । पीछले दो
िदनो से इस कोठरी मे भूरा खमभे से बंिा कराह रहा है । िरमदास जी आज बगीचे मे जश मना रहे है । िकसमत दे खो
िक रामरितया है रान-परे शान सी उनके पास बगीचे मे आई हुई है । महाजन तखत पर गदे -तिकये के सहारे बड़े
इि्तमनान से ििके बैठे है । हुकका गुड़गुड़ा रहे है । िकशन और दो-तीन लठै त आसपास ही लाठी िरे पहरा दे रहे है ।
रामरितया बहुत ही कम वसो मे तखत से थोड़ी ही दरूी पर करबद खड़ी है । वह संकोची नज़रो से महाजन की ओर दे ख
कर अनुरोि करती है -
`` सेठ जी ! काहे को हम गरीबन को सताते हो । वो जो कंगन िपोरी ने तुमको िदया है , वो मेरे है । मुझे लौिा
दो।``
िपोरी का नाम सुनते ही महाजन की भौहे तन गई । वे बड़े आिशकाना अनदाज़ मे बितयाने लगे-
`` अचछा ! तो तू िपोरी की वो है ....है तो बड़ी तीखी....सोणी...सोणी सी रे ...बहुत खिट्ी-मीठी होगी तू तो...है न रे ....
तुझे दे खकर तो मेरे मुँह मे पानी आ रहा है री....``
वे अपने होठो पर चीभ फेरने लगे। उनके हदय मे काम जवाला ििक उठी । िकशन को समबोिित करते हुए बोले-
`` िकशन.....ये है तो बहुत ही तेज िारवाली । सीिे िहरदय मे वार करती है रे यह तो....वाह..वाह .....िपोरी की
िकसमत बड़ी जोरदार है रे ....``
`` हाँ हुजूर....`` िकशन ने हाँमी भर दी । िफर वे रामरितया से बोले-
`` ज़रा इिर तो आ री......तुझे कंगन चािहए न.....तो यहाँ आकर ले जा...``
`` सेठ जी ! तुम वहीं से हमे कंगन दे दो। हम चले जाएंगे।`` रामरितया सकुचातीहुई बोली और दाँतो तले
अंगुली रख नाखुन कुतरने लगी। महाजन ने िकशन को इशारे से पास बुलाया। आिहसता से बोले-
`` िचिड़या हाथ से जाने न पाएं....अं.....समझ गए ....``
महाजन का आदे श पाते ही िकशन लपककर रामरितया को पकड़ लेता है िकनतु रामरितया उसे दाँतो से ज़ोरो से
कांिती है ।वह छुि जाती है और भागने लगती है । िकशन के लठैत साथी उसका पीछा करते है । बगीचे का फािक आिा
बनद है ।झुककर िनकलना पड़ता है । रामरितया जयो ही झुककर िनकलना चाहती तयो ही उसे िर दबोच िदया जाता है ।
उसे पकड़कर महाजन के पास लाया जाता है । महाजन इतराते हुए बोले-
`` यहाँ आने के बाद वापस जाना इतना आसान नहीं है छोकिरया...समझी...आ इिर आ... मेरे पास आ...``
महाजन उसे झपि कर पकड़ता है । रामरितया के वस िछनन-िभनन हो जाते है । महाजन युवित के उभरे हुए उरोजो को
पकड़कर मसनने लगा । उसके होठो पर िचपक जाता है और बड़ी बेरहमी से अिरामत
ृ पीने लगता है । रामरितया के
अिोवस खुल गए। वह चीखने-िचललाने लगती है । महाजन की िोती खुलकर अलग हो जाती है ।
अभी सूयम असत नहीं हुआ ।वह तभी असत होता है जब सिृि का कम थम जाता है ।अभी सिृि का कम थमा
नहीं है ।रोशनी अभी भी बाकी है । हिर, गोपालिसंह और उसके युवा साथी पूरी रोशनी ले ठीक उसी तरह से आ उतरते है
िजस तरह अिमम के नाश के िलए शीकृ षण ने सूयम की गित रोक दी थी और अजुन
म ने िमाव
म तार शीकृ षण की मदद से
अिमम का नाश िकया था। उसी तरह गोपालिसंह और हिर के आते ही िरमदास का कुचक थम गया। गोपालिसंह काका
ने आवाज़ लगाई-
`` घबरा मत बेिी ।हम आ गए है ।``
गोपालिसंह की आवाज़ सुन िरमदास महाजन हड़बड़ाकर उठ खड़े हो गए।उनहे नहीं पता था िक अनायास ऐसा भी हो
सकता है । पिरिसथित को दे ख िरमदास जी तुरनत सहम तो गए िकनतु उतेिजत भी हो गए। वे चीखे-
`` जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है । लगता है बाप के साथ बेिे की भी मौत साथ मे
िलखी है ।``
``जब-जब िरम की हािन होती है और सािु-संतो का अपमान होने लगता है तब तब भगवान िकसी न िकसी
रप मे अवतिरत हो ही जाते है ।``
िरमदास चीखा-
`` िकशन ! मारो सालो को । कोई यहाँ से बचकर भागने न पाए ।``
हिर और गोपालिसंह के साथ बहुत से युवाओं को दे ख िकशन अपने लठैत सािथयो सिहत पलायन कर गया।
`` महाजन ! अब तुमहारी खैर नहीं । तुमहारे लठै त तो पहले ही भाग गए।अब तुमहारा कया होगा महाजन !``
महाजन बगले झांकने लगा । उनहोने दे खा वे अब अकेले पड़ गए । वे भाग खड़े हुए।हिर उनहे पकड़ने के िलए लपके
लेिकन गोपालिसंह ने रोक िलया । बोले-
`` नहीं....नहीं.....अभी इनहे जाने दो । अकेले पड़ गए बेचारे । इनका नयाय हम नहीं ईशर करे गा । पंचायत मे
पंचो की जबान से परमेशर बोलता है ।``
िरमदास महाजन भाग खड़े हुए। गोपालिसंह ने अपना गमछा रामरितया को िदया और बोले-
`` जा बेिी जा । अब तुझे महाजन दब
ु ारा तंग नहीं करे गा।``
रामरितयाकी आँखो मे आँसू आ गए। हिर बोला-
`` यह िपोरी की वो है ।``
सभी हं सते है । गोपाल िसंह बोले-
`` अचछा अचछा ! भई िपोरी ने ही भूरा काका की खबर दी थी ।भला करे भगवान तुम दोनो का । अचछा ,
अब हम सब साथ ही चले,बेिी।``
गोपालिसंह और हिर ने कोठरी का ताला तोड़ा।भूरा कोठरी मे खंभे से बंिे हुए पाए गए। उसके केश असत-
वयसत हो गए थे। चेहरे पर यहाँ-वहाँ घाव के िनशान । वे अचेत है । गोपालिसंह ने उनके चेहरे पर शीतल जल िछड़का ।
वे बड़ी दे र बाद होश मे आए।हिर बोले-
`` बाबा ! आँखे खोलो बाबा ।``
बड़ी किठनाई से भूरा ने आँखे खोली। चारो ओर दे खा िफर बोला-
`` तुम लोग ..यहाँ कयो आए । महाजन तुमको भी.....``
`` नहीं अब ये अतयाचार नहीं होगा । हम तुमहे लेने आए है । हमारे साथ चलो।``
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रामरितया लगातार रोये जा रही थी। उसके मुख से शबद नहीं िनकल पा रहे थे।िपोरी ने उसे कई-कई तरह से
मनाने की कोिशश की िकनतु उसका रोना रक नहीं रहा था। आिखर मे वह हार मान उसकी ओर पीठ फेर कर बैठ गया
। बहुत समय तक दोनो इस तरह मुख फेरे बैठे रहे । अनतत: रामरितया सवयं उठकर िपोरी के पास गई।आँखो से आँसू
पोछते हुए बोली-
`` ऐ....ऐ....सुन......``
``नहीं.....मुझे नहीं सुनना है । `` िपोरी और मुँह फेर लेता है ।
`` ऐ सुन ! तुझे कया मालूम है िक मै िकतनी परे शानी मे हूँषोषो``
`` तो मै कया करँ षोषो तू जान तेरी परे शानी ।``
`` इसका मतलब यह है िक कल को तूने कंगन बेच िदए । एक िदन तू मेरे को भी बेच दे गा । है न !``
`` तू मेरे को गलत समझ रही है रे । मैने ऐसा तो नहीं िकया ।``
`` तू ऐसी-ऐसी हरकते करता है । दार पीता है । िपोरीपन करता है और महाजन.ऐं...ऐं....ऐं....ऐं.....`` कहते-
कहते रामरितया रोने लगी।
`` अब महाजन का नाम लेते ही कयो रोने लगी षोषोकया तुझे िबचछू काि खाया जो इस तरह इतराकर रोये
जा रही है ।``
``ए्े....ए्े्े....ऐ्े्े....ए्े.... हिर और गोपाल काका नहीं आते तो तेरी रामरितया तेरे को मुँह िदखाने के
लायक नहीं रहती ...ऐं....ऐं....ऐं....ऐं....`` वह रोये जा रही।
`` कयाषोषो महाजन की यह मजाल की वो तेरे पर बुरी नज़र डाले । मै उसकी आँखे िनकाल दँग
ू ा । समझता
कया है वह अपने-आपको षोषो``
िपोरी तैश मे आकर बोला । खड़ा होकर बांहे ऊपर करने लगा। जैसे महाजन सामने ही खड़ा हो और वह महाजन की
आँखे ही िनकालनेवाला हो ।
`` कह तो ऐसे रहे हो जैसे सामने आते ही तू महाजन की आँखे िनकाल ही लेगा और ...और....:`` िहचिकयाँ
लेते हुए रामरितया कहने लगी।
`` हाँ...हाँ...तूने कया मुझको बूदू समझ रखा है । अरे तूने अभी िपोरी का करामात नहीं दे खी । मेरा नाम ऐसे
ही िपोरी नहीं पड़ा । अब तू दे खते जा मै कया-कया गुल िखलाकर महाजन को तबाह करता हूँ।``
`` अरे जा तू ऐस कया कर सकता षोषो एक िदन उसे तबाह करके नहीं छोड़ा तो मेरा नाम ही िपोरी नहीं
समझी षोषो`` कहते हुए उसने घण
ृ ा के साथ थूक िदया।
`` और नहीं तो कया षोषो तू बुदू का बुदू ही तो है । ऐ सुन इिर आ ।``वह इतराते हुए मिकने लगी तो िपोरी
उसके करीब गया और उसके दोनो हाथ अपने हाथो मे लेकर बोला-
`` हाँ...अब बोल मेरी रामरितया....कया कहती है तूषोषो``
`` तू भी पंचायत के िलए खड़ा हो जा न....जीत गया तो कम से कम पंच तो बन ही जाएगा । लोग कहे गे ये
रामरितया है िक िपोरी नाम के पंच की वो है । है न कहे गे न ...`` वह इतराती हुई बोली।
``ित ् तेरे की , ये तेरे मेरे बीच पंचायत कहाँ से आ गई।(रामरितया की ठु डडी पकड़कर) ऐ.....ये जो पंचायत-
वंचायत है न बड़े -बड़े लोगो का चोचलापन है ।हमारा नहीं....हम ठहरे रोज़ कुआँ खोदकर पानी पीनेवाले िपोरी......``
िपोरी की अनोखी सी बाते सुन रामरितया उसके मुख की ओर िकिकी लगाकर दे खने लगी तो वह िफर बोला-
`` ऐ...ऐसी कया दे ख रही है रे ...षोषो``
`` तेरे को....तू िकतना भोला है रे षोषो``
दोनो ठहाके लगाकर हं स िदए और हं सते-हं सते लोिपोि हो गए ।
00

राषीय एकता आनदोलन सिमित के ततकालीन सदसयो और गाँव-समाज के लोगो ने सिमित के


कायस
म ंचालन और आगामी कायव
म ािहयो के िलए सवस
म ममित से हिर का चुनाव िकया था। तरह-तरह की अिकने आने
के बाद सिमित के सदसयो ने हिर को ही अपना नेता बनाने का आवाहन िकया । सभी चाहते है िक हिर जैसे होनहार
युवक को पंचायत िनवाच
म न मे सरपंच के पद हे तु खड़ा िकया जाय । यह हुआ भी । चौिरी कमलिसंह , चौिरी
िवकमिसंह , चौिरी नीलमिसंह भी सहमत हुए । अब तक िजतने भी पंचायत चुनाव हुए उसमे चौिरी कमलिसंह ही
जीत कर आया करते रहे िकनतु अब वे भी चाहते है िक उनके सथान पर हिर यह भार अपने काँिो पर ले। िजला
कायाल
म य से राषीय एकता आनदोलन सिमित को आगामी िनवाच
म न की सूचना पाप हो गई थी। िजलािीश महोदय ने
िजले के सभी गाँवो मे िडं डोरी िपिवा दी -
`` सुनो , सुनो , सुनो ! खास ओ आम को सूिचत िकया जाता है िक हमारी पदे श सरकार ने आगामी मिहने
की 25 तारीख को पंचायत चुनाओं की घोषणा की है । जो कोई गामीण आगामी पंचायत चुनाव मे बतौर पतयाशी खड़ा
होना चाहता है वो िजला कायाल
म यस मे िनिािमरत फामम भरवा सकता है ।``
गाँव-समाज मे पंचायत चुनाव की सुगबुगाहि पारं भ हो गई। राषीय एकता आनदोलन सिमित कायाल
म य मे िनयिमत
बैठके आयोिजत होने लगी। आगमी चुनावो मे िजतने की कायम-योजनाओं पर िवचार-िवमशम होने लगा । िजस-िजस
पद हे तु जो-जो खड़ा होना चाहता है ,वह सिमित कायल
म य की सिमित का सदसय बनकर सिमित के माधयम से
िनवाच
म न का फामम जमा करवा सकता है । इसका सीिा अथम यह होता है िक जो भी सिमित का सदसय बनकर फामम
फरे गा वह सिमित के िहत मे कायम करे गा यािन यिद सिमित के सभी सदसय िमलकर पंचायत िनवाच
म न के उममीदवार
के रप मे खडे ़््े होगे और यिद तीन चौथाई सदसय भी जीते तो पंचायत पर राषीय एकता आनदोलन सिमित का
एकाििकार होगा जैसा िक सभी राजनीितक गुिो मे होता है । इसिलए चौिरी कमलिसंह से लेकर हिर तक सभी ने
सिमित के सदसय के िलए नये िसरे से सदसयत गहण की।राषीय एकता आनदोलन सिमित वदारा आमंितत बैठक मे
चौिरी कमलिसंह ,चौिरी िवकमिसंह,चौिरी नीलमिसंह , मैकू, गोपालिसंह, िह्ारिसंह,शेरिसंह,तेजिसंह,िपोरी से
लेकर अनानय गामीण भी उपिसथत रहे लेिकन इस बैठक मे हिर कहीं िदखाई नहीं िदया । हिर को उपिसथत न पाकर
चौिरी बोले-
`` आज की इस खास बैठक मे हिर िदखाई नहीं दे रहा है । कया बात है षोषो``
कुछ दे र तक सिमित कायाल
म य खामौशी मे खो गया । जब कोई कुछ बता नहीं सका तब मैकू काका बोले-
`` भूरा पर जो वारदात हुई है वह िकसी से िछपी नहीं है और ऐसी नाजुक िसथित मे हिर का यहाँ उपिसथत
होना या न होना कोई माने नहीं रखता ।बावजूद इसके हमे पूरी ईमानदारी के साथ भूरा और हिर के साथ नयाय करना
होगा।``
``हममे से कोई भी उनके सथान पर होता तो शायद नहीं आता ।``हिरिसंह ने समथन
म िकया । गोपालिसंह
बोले-
`` खैर, सवस
म ममित से हिर की उपिसथित मान ली जाने का िनवेदन है ।``
बड़ी गंभीरता से सोचकर चौिरी बोले-
`` पसताव सवीकार है ...आज की यह बैठक पंचायत चुनाव की तैयारी के बारे मे्े आमंितत की गई है । जैसा
िक पहले ही पसताव पािरत िकया जा चुका है िक आगामी पंचायत चुनाव मे हिर को अगुवा िकया जाकर सरपंच के पद
के उममीदवार के िलए खड़ा िकया जाय । आज के हालात दे खते हुए मुझे लगता है िक ऐसे हालात मे एकबार िफर
िवचार कर िलया जाय ।``
`` मै पुन: हिर का नाम पसतािवत करता हूँ।`` हिरिसंह बोले।
`` मै अनुमोदन करता हूँ।`` मैकू बोले।
`` मै भी अनुमोदन करता हूँ।``गोपालिसंह बोले।
`` िकसी को कोई आपित है षोषो`` चौिरी कमलिसंह बोले।
``हम सब अनुमोदन करते है ।`` उपिसथत सभी गामीणो ने समवेत सवर मे कहा तो चौिरी कमलिसंह के मुख पर
पसननता छा गई। बोले-
`` यह पसननता की बात है िक ऐसे किठन समय मे जबिक गाँव-समाज मे िविभनन तरह की घिनाएं हो रही
है , पूरा गाँव-समाज एकमत से पितकूल पिरिसथितयो का सामना करने को तैयार है । यह बहुत अचछा है । इसिलए सवम
सममित से राषीय एकता आनदोलन सिमित , हिर को पंचायत चुनाव
मे सरपंच के पद के िलए खड़े करने का पसताव पास िकया जाता है ।``
तािलयो की घड़घड़ाहि से समूचा सिमित कायाल
म य गूज
ँ उठा । चौिरी बोले-
`` हमे शीघ ही िजला कायाल
म य जाकर हिर का नामांकन करवाना होगा ।कल ही हम लोग िजला कायाल
म य के
िलए पसथान करे गे ।``
`` आज हम हिर के घर जाकर िसथित का जायजा लेगे । इतना ही नहीं हिर का हौसला-अफजाई करना भी
बहुत जररी है अनयथा कहीं ऐसा न हो िक करा कराया सब िूल मे िमल जाए।``चौिरी नीलमिसंह ने करबद होकर
सबसे अनुरोि िकया ।
`` हाँ िकनतु हम दो ही लोगो को वहाँ जाना उिचत रहे गा । बाकी पतीका करे ।``चौिरी िवकमिसंह बोले ।
0
वद
ृ ावसथा मे शरीर इतना कमजोर हो जाता है िक ज़रा सी तकलीफ भी वह बदाशमत नहीं कर पाता।छोिी-
छोिी बीमारी भी तकलीफदे ह हो जाती है । वद
ृ ावसथा सवयं ही एक रोग है । इस अवसथा मे पवेश करते ही शरीर को
तरह-तरह के रोग घेरने पारं भ हो जाते है । िजस वयिि ने पारं भ मे ही शरीर को साि िलया उसके िलए वद
ृ ावसथा
अििक किठन नहीं होती लेिकन िफर भी वद
ृ ावसथा वयिि पर पितकूल पभाव डालती ही है ।वे लोग जो िनतयपित
पितकूल पिरिसथितयो से दो-चार होते है और उनहे शरीर को सािने का अवसर ही नहीं िमल पाता वे अकसर अभागे ही
रह जाते है । िनिन
म ता , भूखमरी ,ऋणगसतता और लाचारी वयिि के समपूणम जीवन को तोड़कर रख दे ती है । भारत के
गाँवो की उन िकसानो की िसथित इतनी सशि नहीं है िक वे जीवन िनवाह
म कर सके वे तािजनदगी उहापोह मे ही अपनी
िजनदगी िबता दे ते है ।उनहे कहाँ पयाप
म अवसर िमल पाता िक वे अपना शरीर सािकर रख सके। यह बहुत िवकि
िसथित है । कुछ ही िकसान इतने जीवि होते है िक वे पितकूल पिरिसथितयो मे भी िैयम नहीं खोते और जो िैयम खो दे ते
है ऐसे कई िकसानो ने आतमहतयाएं की ही । इसके कई कारण हो सकते है । साहूकारो और िनजी संसथानो के ऋण से
वे इतने दब जाते है िक उनके सामने दस
ू रा िवकलप ही नहीं होता और वे आतमहतया का रासता अपना लेते है ।
साहूकार की कोठरी से बंिन मुि करवाने के बाद से भूरा का सवासथय िबगड़ गया। उसे साहूकार वदारा बहुत
जयादा पतािड़त िकया गया । हाथ-पैर िशिथल पड़ गए।िसर,माथे और चेहरे पर चोि के िनशान इस बात की गवाही दे ते
है िक साहूकार ने भूरा के साथ बहुत जयादती की है । जब से उसे लाया गया तब से वह चारपाई पर ही पड़ा हुआ है ।
`` दवाई ले लो जी । चलो उठो ।`` कमली आँसू पोछते हुए बोली। हिर उसे उठाकर िबठाने की कोिशश करता
है लेिकन भूरा ठीक से बैठ नहीं पाता।वह बोला-
`` बाबा ! लो यह दवाई । दि
ू के साथ पी जाओ ।``
तभी बाहर से ही बोलते हुए चौिरी कमलिसंह भीतर पवेश कर आए-
`` हिर ! कैसी तबीयत है भूरा की षोषो``
चौिरी को आया दे ख भूरा उठकर खड़ा होने की कोिशश की िकनतु वह िनढाल हो गया।
`` न..न...न...तकललुफ की जररत नहीं है भूरा । तुम लेिे ही रहो।हमे घिना की सारी जानकारी पाप हो गई
है । जो कुछ भी हुआ अचछा नहीं हुआ । िरमदास ने पंचायत के नयाय की तोहीन की है ।इसकी सज़ा िरमदास को
जरर िमलेगी।``
`` काका !सज़ा भुगतने के िलए हम लोग ही तो है । सारा गाँव-समाज जानता है िक िरमदास महाजन िकस
तरह गाँववालां पर अतयाचार कर रहे है ।``
भूरा ने िीरे -िीरे अपनी बात कहने की कोिशश की।
``तुम ठीक कहते हो भूरा । हमे बहुत अफसोसा है िक िरमदास जैसा वयिि हमारा दामाद है
लेिकन.......लेिकन भगवान शीकृ षण ने भी िशशुपाल को एक सौ बार कमा िकया था।``
`` कमा करे काका । हम और आप भगवान शीकृ षण तो नहीं हो सकते िक अपरािी को कमा करे या सज़ा दे ।
उनहोने तो िशशुपाल को एक सौ बार कमा करने के बाद जब िशशुपाल ने एक और गाली दी तो शीकृ षण ने उनहे तुरनत
सज़ा दे दी।``
`` िीरज रखा जा सकता है । इनसान की लाठी की मार िदख जाती है िकनतु ईशर की लाठी की मार िदखाई
नहीं दे ती हिर ।`` चौिरी बोले।
`` हम उसी की पतीका करे गे ।``
00
राषीय एकता आनदोलन सिमित वदारा पंचायत चुनाव मे खड़े होने की खबर िबजली की तरह सारे गाँव-
समाज मे फैल गई। हर कोई हिर को पंचायत चुनाव मे जीतवाना चाहता है । संगामिसंह को जब जात हुआ िक हिर को
सरपंच के पद के िलए राषीय एकता आनदोलन सिमित वदारा खड़ा िकया गया है ,वह उतेिजत हो गया । उसके मन मे
आया िक जब हिर जैसा लौडा चुनाव मे खड़ा हो सकता है तो वह कयो नहीं हो सकता।उसके पास सब कुछ है ।इतना
रपया है िक वह आसानी से चुनाव जीत सकता है । वह िजला कायाल
म य से लेकर चुनाव अििकारी को खरीद सकता है ।
वह वोििं ग बूथ लुिवा सकता है । वह फजी वोििं ग करवा सकता है । वह कया नहीं करवा सकता षोषो यह सब सारी बाते
उसके िदमाग मे उमड़ने-घुमड़ने लगी। उसने िोती-कुरता और गाँिी िोपी िारणकर िरमदासजी के सामने गया।
बोला-
`` बापू , दस हज़ार रपये चािहए ।``
`` कया कहा षोषो एक बार और कहो तो ।``
िरमदासजी तुनक कर बोले। कयोिक उनके िलए रपया भगवान से कम नहीं है । जब भी जहाँ भी रपये-पैसे की बात
िनकलती है , उनके कान खड़े हो जाते है । संगामिसंह के कहते ही वे तुनक पड़े । संगामिसंह ज़ोर दे कर बोले-
`` दस हज़ार रपये चािहए ...``
`` कयो भला षोषो ऐसा कौन सा काम आ पड़ा है षोषो जो इतने सारे रपये की जररत तुमको आ पड़ी है षोषो``
`` बापू , मै पंचायत चुनाव लडू ँ गा । इस गाँव-समाज का मुिखया बनूँगा । िफर दे खता हूँ कोई कैसे चूँ करता है
।``
अपनी छोिी-छोिी मूँछो पर हाथ फेरते हुए संगामिसंह ने अपने तेवर िदखाए। सं्ग
ं ामिसंह के तेवर दे खकर
िरमदासजी उछल पडे ़्। िखिसयानी हं सी हं सते हुए बोले-
`` मुिखया , गाँव-समाज का मुिखया...हं .हं ..हं ....हं ......तू कहता तो िबलकुल ठीक है लेिकन......संगामिसंह...``
तभी िपोरी न जाने िकिर से आ िपका ।वह आज बहुत पसनन िदखाई दे रहा है । लगता है कहीं से कोई खास खबर
लेकर आया है । बोला-
`` जय हो...जय हो.....जय हो संगामिसंह भैया !``
`` िकस बात का मसका लगाया जा रहा है िपोरी । कोई खास खबर लाये हो कया , जो इतने पसनन िदखाई दे
रहे हो ।``
``खबर सुनोगे तो उछल पड़ोगे।वो कया कहते है िक...............``
``अब कोई पहे ली मत कहो , जो कहना हो साफ-साफ कह दो दम
ु दबाकर।``
िरमदासजी अपने ही अनदाज मे बोले।वे जानते है िक यह िपोरी है तो िपोरी िकनतु खबर पते की लाता है ।
`` दम
ु दबाकर......तो सुनो....भूरा काका का बेिा हिर पंचायत चुनाव लड़ने के िलए खड़ा हो रहा है ।``
`` यह तो मै भी जानूँ लेिकन पककी खबर है कया षोषो``
`` हाँ...हाँ...पककी खबर है संगामिसंह भैया । बाकी तुम जानो।मै तो चला।``
`` अरे रको भी ..ऐसी भी कया जलदी है िपोरी ।``
लेिकन िपोरी रकनेवाला नहीं था । उसे तो इस बात की जलदी पड़ी है िक वह यह खबर उन लोगो को भी सुनाएं जो
भूरा काका और हिर के पितवदनवदी है । िरमदासजी शीघता से ितजोरी खोलकर रपया िनकाल संगामिसंह को दे ते है ।
बड़े उतसाह से बोले।
`` दस हज़ार कया तू तो बीस हज़ार ले जा और िजला कायाल
म य जाकर चुनाव का फारम भर दे ।और हाँ िकसी
को भी िखलाने-िपलाने मे कमी नहीं होनी चािहए िफर दे खना रपया कया-कया खेल िदखाता है । रपये से तो भगवान
भी खरीदे जाते है ।इनसान की कया औकात षोषो जा संगाम जा।``
संगामिसंह ....हो....हो....करते हुए बीस हज़ार रपये जेब मे रख लेता।बोला-
`` बापू ! चुनाव अििकािरयो को रपयो की घूस दे नी पड़ती है । जयोही उनको रपया िदखा िक वो लोग वह
काम कर िदखाते है िक दे खते ही रह जाओ।अरे बापू ! िजतने फजी वोि डलवाना है उतने वोि डलवा दे ते है । और तो
और रपये के बल पर हम आसािमयो को खरीद लेगे और उनसे भी असली वोि अपन पक मे डलवा लेगे यह तो होता ही
रहता है बापू ।``
`` वा बेिा वाह ! तू तो सब कुछ जानता है । चुनाव जीतने के िलए राजनीित मे ऐसा होता ही रहता है । हमने
भी िकया तो कया बुरा िकया षोषो कुछ नहीं।``
दोनो िपता-पुत ठहाके लगाकर हं से और हं स पड़े ।
0
गाँव-समाज मे पंचासत चुनाव को लेकर वद ृ ो्े से लेकर युवओं तक तरह-तरह की चचाए
म ं होने लगी है ।
िपछले सारे अनुभवो और वारदातो को लेकर गाँव-समाज के लोग िचनतागसत तो है ही । वे अब कुछ नया करना चाहते
है । पुरानी पीढ़ी के सथान पर नई पीढ़ी को अवसर दे कर गाँव और आसपास के सभी गाँवो की िसथित सुिारना चाहते
है । वद
ृ ो ने बहुत काम कर िलया है और अब वे इतना अचछा काम नहीं कर सकते िजतना वे पहले करते थे।हाँ, वे अब
केवल मागद
म शन
म कर सकते है । भागदौड़ करना अब उनके बस मे नहीं है । इनहीं सब बातो को लेकर चौिरी कमलिसंह
की बैठक मे िसयो की बैठक आयोिजत हु्ुई है । शीमती अनुसूया चौिराइन बात आगे बढ़ाते हुए बोली-
`` इितहास गवाह है िक इस गाँव पर पीछले कई बरसो से तरह-तरह की िवपदाए काली छाया बनकर मंडराती
रही है और हम हर मुिसबत का मुकाबला करने के िलए कमर कसकर आगे आये है । कभी सफल हुए तो कभी असफल
और अब हम यह दे खते है िक जयो-जयो गाँव और िजले का िवकास हो रहा है तयो-तयो आबादी बढ़ रही है ।समसयाएं
िसर उठाएं हुए है और हमारे अनुभव िरे के िरे रह जा रहे है कयोिक हमारे पास इतनी शिि नहीं है िक इन अनुभवो
का लाभ उठाया जा सके्े।``
`` सरकार ने हम लोगो को इस गाँव के िवकास के िलए िफर मौका िदया है । हम सब िमलकर गाँव की
गनदगी को हिाना है और उसके सथान पर अचछा काम करना है । तब ही हम कुछ पा सकेगे।``गुलाबो बोली
``आप िजस गनदगी की बात कह रही है उसे हम सब अचछी तरह से जानती है और हम उसे जड़ से साफ
करना ही हमारी िजममेदारी समझते है । हम इसके िलए तैयार है ।`` रपा का सवर गूज
ँ ा।
`` हमारी िजममेदािरयाँ हमारी मंशाओं को कारगर करने के िलए हममे से िकसी एक को अगुवा
होना होगा तािक एका के साथ अपने काम मे जुि जाएं।``पावत
म ी ने अपनी मंशा पगि की ।
`` आप लोग िजसे यह काम सौपना चाहती है , वह िनडर, बहादरु और तेज-तरारम होना चािहए।`` अनुसूया ने
सलाह दी ।
`` काकी माँ ! हम गुलाबो काकी को अगुवा नहीं कर सकते है कया षोषो``रािा ने दबी ज़बान से कहा ।
`` हाँ...हाँ...कयो नहीं ।``
`` हमे याद है वो िदन जब गुलाबो ने लठैतो के हाथो से लाठी छीन कर उनहे भगा िदया था।`` रपा ने याद
िदलाया ।
`` कया षोषो गुलाबो काकी से सब सच है कया षोषो`` रािा और पावत
म ी आशयम के साथ बोली ।
``हाँ बचचो, यह सच है ।बीस बरस पहले इस गाँव को शिन गसनेवाला था तो मुझे लाठी लेकर मैदान मे
कूदना पड़ा था।`` गुलाबो मुसकराते हुए बोली।
`` ओह.......बड़ा आशयम काकी ।`` रािा िवसमय सिहत बोल पड़ी।
िसयो की बैठक अभी चल ही रही थी िक तभी बाहर से नीलमिसंह और चौिरी की आवाज़े सुनाई दी। चौिरी बोल रहे
थे।
`` गुणडो और बदमाशो को ििकि नहीं िमलेगा ।``
`` ििकि तो खरीदा भी जा सकता है । ििकत िबकते है काका । बस पैसा फेको और तमाशा दे खो । ऐसा भी हो
सकता है ।`` नीलमिसंह ने मंशा पगि की।
`` ििकि भले ही िबक जाए िकनतु इस गाँव के वोिसम नहीं िबकने चािहए।``
चौिरी ने िचनता जताते हुए कहा । अपनी बैठक मे मिहलाओं की इस बैठक की बाते सुनकर चौिरी कमलिसंह बोले-
`` यहाँ भी चुनाव की सरगिमय
म ाँ तेजी से चल रही है षोषो``
`` हाँ काका ! सामािजक पाणी को राजनीित से भी वासता पड़ता है न लाला।``
गुलाबो की बात से चौिरी हं सते हुए बोले-
`` वाह ! अभी भी वो जोश है जो पहले जवानी मे था ।``
`` हाँ...हाँ...कयो नहीं...।``
गुलाबो के होठो पर लमबी मुसकान िबखर गई।
0
सारे गाँव-समाज मे खबर फैल गई िक संगामिसंह िजला कायाल
म य जाकर पंचायत चुनाव मे खड़े होने के िलए
नामांकन पत भर कर आया है । गाँव के बाहर से ही संगामिसंह को उसके सािथयो ने फूलो की माला पहना दी । शहर से
बैड बाजेवालो को साथ ले आए । गाँव मे पवेश होते ही बैडबाज़ा बजना पारं भ हो गया । बाजे की आवाज़ सारे गाँव मे
गूँजने लगी । िीरे -िीरे टे किर पर सवार संगामिसंह हाथ िहला-िहलाकर गाँव-समाज के लोगो का अिभवादन करने
लगा । गामीण बाजे की आवाज़ सुन घरो से बाहर िनकलने लगे। कयोिक इसके पहले कभी इस तरह बैडबाजे के साथ
िकसी ने जुलूस नहीं िनकाला । आगे-आगे बैडबाजा बज रहा है । बाजे की िुन पर संगामिसंह के साथी नाच-कूद रहे है ।
बीच-बीच मे `` संगामिसंह िजनदाबाद `` के नारे लगाते हुए िीरे -िीरे आगे बढ़ने लगे। संगामिसंह के गले मे पूवम
िनयोिजत अनुसार उसके िमत गले मे फूलो ्ं और रपयो की माला पहनाते जाते और वह उनहे गले से लगा िलया
करता है । यह जुलूस िमनदर से होते हुए चौिरी कमलिसंह , चौिरी िवकिमंसंह और चौिरी नीलमिसंह के मकान के
सामने से होकर िनकला । तीनो चौििरयो ने संगामिसंह को इठलाते और इतराते हुए दे खा । सभी यह अचछी तरह से
जानते है िक यह सब कुछ हिर को लेकर िकया जा रहा है । जुलूस खासतौर पर हिर के मकान के सामने रका ।
संगामिसंह के सािथयो ने जमकर `` संगामािसंह िजनदाबाद `` के नारे लगाए। इतना ही नहीं जमकर बैडबाजा
बजवाया और सारे िमत खूब जोश के साथ नाचे। चारो ओर गुलाल ही गुलाल और जय-जयकार के नारो से सारा गाँव
गूँज उठा । गाँव-समाज के अलावा आसपास के गाँवो तक संगामिसंह के जुलूस की आवाज़ सुनाई दे ने लगी। लोग
जुलूस दे खने के िलए दरू-दरू से आने लगे ।
िजस समय संगामिसंह का जुलूस हिर के मकान के सामने आकर खड़ा हुआ और उसके साथी बैडबाजे के
साथ जोर शोर से नाचने लगे, उस समय हिर कुछ िलख-पढ़ रहा था । चारपाई पर कागज-पुसतके िबखरी पड़ी थी ।
उसने माँ को कहकर दरवाज़ा बनद करवा िदया तािक उसे उसके काम मे बािा न हो । बाहर कुछ भी हो उसे उससे कया
लेना-दे ना। यह बात कमली भी अचछी तरह से जानती है और भूरा भी अचछी तरह से जानते है । चौिरी कमलिसंह और
बाकी सभी चौिरी भी अचछी तरह से जानते है ।बावजूद इसके कोई कुछ कहना उिचत नहीं समझता।कमली आकर
हिर के पास ज़मीन पर बैठी-
`` बेिे! सारी िदन बीत गया ।तूने अभी तक खाना नहीं खाया । अब उठ और खाना खा ले।``
`` माँ तू खाले । बाबा को भी िखला दे । मै बाद मे खुद ही खाना लेकर खा लूँगा।``
वह िफर अपने काम मे संलिन हो गया । जुलूस जोर-शोर पर था । बैडबाजा तेजी से बज रहा था । बितयो की रोशनी से
गाँव मे रोशनी फैल रही थी। बावजूद हिर अपने काम मे वयसत था। कमली बेिे को सनेह से दे खते रही । कण भर बाद
पुन: बोली-
`` तुझे पता है षोषो``
`` कया माँ षोषो``
`` संगामिसंह िजला दफतर मे जाकर फारम भर आया है ।``
`` हाँ, पता है । लेिकन तू िचनता न कर तेरा हिर िनरास नहीं होगा।ईशर पर भरोसा रख माँ । सब कुछ ठीक हो
जाएगा ।``
`` नहीं, िनरास नहीं हो रही । िचनता खाए जा रही है । महाजन अचछा आदमी नहीं
है ....और..........और......संगामिसंह बहुत खूँखार जानवर है ...वो....``
जाने हिर को कया सूझी,उसने कमली का हाथ उठाकर अपने िसर पर रखा और बोला-
`` िजसके िसर पर तुझ जैसी दे वी माँ का हाथ हो उसे काहे की िचनता । तू नाहक िचनता करती है माँ...अब न
कर और जाकर खाना खा लो।मै पीछे से खा लूँगा।``
``मुझे बहुत डर लग रहा है बबुआ...``
`` माँ....! मै अकेला थोड़े ही हूँ ।मेरे साथ चौिरी काका और सारा गाँव-समाज भी तो है ।...अचछा उठ, चल
खाना खाएंगे ।``
माँ को ढाँढस दे ते हुए उसने सारे कागजात उठाकर अलमारी मे रखे और कमली का हाथ पकड़कर उठ खड़ा हुआ ।
`` बाबा कहाँ है । सो रहे है कया षोषो उनको भी खाने का कह...साथ मे खाना खा लेगे । बाकी हम कल दे खेगे
कया हो रहा है षोषो``
माता-िपता और पुत िमलकर एक साथ भोजन करने बैठ गए । जुलूस काफी दरू तक चला गया । भोजन के बाद हिर ने
पुसतक उठाई और चारपाई पर जा लेिा ।
संगामिसंह के सािथयो ने गाँव भर के मकानो और दक
ू ानो पर पोसिर लगाए और दीवारो पर िलखा `` गरीबो
का हमददम संगामिसंह । गाँव की िकसमत संगामिसंह ``।रात भर मे सारे गाँव मे जहाँ दे खो वहाँ पोसिर ही पोसिर लग
गए । चाराहो और चौपालो पर संगामिसंह की तसवीरे ही तसवीरे छा गई। वह दे ख-दे ख खुश हुआ जा रहा ।
सारे गाँव भर मे संगामिसंह के पोसिर लगने की खबर चौिरी कमलिसंह को िमली । उनहोने िबना कुछ कहे
चुपपी साि ली।अनुसय
ू ा पान का बीड़ा मुँह मे रखते हुए बोली-
`` तुमहे मै कई बार याद िदला चुकी हूँ िक बहू की जांच करवाने के िलए शहर के बड़े असपताल मे ले जैयो
िकनतु.....``
`` भई यह मेरा काम नहीं है ।नीलम से कह दो। नीलम अब दो बचचो का बापहो गया है और तुम अब भी
हमको ही....``
अभी पित-पती के बीच बात चल ही रही थी िक संगामिसंह ,िरमदासजी और इनदावती का अचानक आना हुआ ।
बेिी,दामाद और पोतेहू को आया दे ख अनुसूया उठ खड़ी हुई।बहुत िदनो बाद आया दे ख उसने बेिी को गले से लगा
िलया। दामाद और पोतेहू ने चौिरी के चरण सपशम िकए।िरमदास बोले-

`` इिर बहुत िे म से िरशतेदारो से जैसे दिूरयाँ ही बन गई थी। बहुत िदनो से जैसे मेल-िमलाप ठपप पड़ गया
हो। कहीं ऐसा न हो िक ये दिूरयाँ मजबूिरयाँ ही बन जाए । अरे भई नीलम.... कम से कम िमलना-जुलना तो बना ही
रहना चािहए भई !``
``भई ! हमारी भांजी कहाँ है षोषो आजकल कहीं िदखाई नहीं दे रही बहना।``
नीलमिसंह ने बात काि दी और दस
ू री बात लेकर बैठ गए । इनदावती बोली-
`` आपकी भांजी आजकल सवाधयाय और जनसेवा मे रत है भैया ।``
`` आिखर भांजी िकसकी है षोषो``
`` आपकी और िकसकी होगी षोषो बाबू जी इतने खामौश कैसे बैठे है षोषो कया बातहै माँ षोषो`` इनदावती ने
एक साथ दो-तीन बाते कह डाली । बेिी ने जब ऐसा पश िकया तो चौिरी से रहा न गया । बोले-
`` जब अपनेवाले ही पीठ मे छुरा खोपे तो आँखे बनद कर चुपचाप जखम सी लेना ही पड़ता है । आिखर कब
तक अपने जखमो को सहलाते रहे गे षोषो``
`` मै समझी नहीं बाबू जी षोषो`` इनदावती संशयवश बोली
`समझने को अब रहा ही कया है बेिी । जो वारदाते हो रही है वह कया िकसी से िछपी है बेिी । नहीं न...अब तू ही बता
बेिी ।`` चौिरी गंभीर होकर बोले
`` न....न.......न.....न....................गाँव मे हो रही वारदातो का िरशतो-नातो से कया लेना-दे ना षोषो``
िखिसयानी हं सी हं सते हुए िरमदासजी पुन: बोले-
``हम तो चाहते है िक आपका आिशवाद
म संगामिसंह को ही िमलना चािहए ।आिखर संगामिसंह आपका ही
पोतेहू है । कोई पराया थोड़े ही है । बस आपका ही हाथ अपने पोतहू के िसर पर नहीं है । भले ही पराये पर आपका हाथ
है । मै ठीक कहरहा हूँ न सासू माँ षोषो``महाजन िबना संकोच िकए िड़़््ािड़ बो्ेले जा रहे है ।
`` वाह कया चाल चल दी दामाद जी ने ।बेचारी गांिारी कया करे न तो वह दय
ु ोिन को शाप दे सकती है और
न ही वरदान दे सकती है । वह तो.....``
`` नाना जी ...मै तो कुछ नहीं जानता । कौन गांिारी ,कौन दय
ु ोिन और कौन पाणडव।बस ,मुझे तो एकमात आपका
आिशवाद
म ही चािहए ।`` संगामिसंह चौिरी की बात कािते हुए बोला।
`` न तो मै तुझे आिशवाद
म दे सकता और न ही शाप दे सकता िकनतु हाँ इतना तो अवशय कहूँगा िक तुमहारे
हौसले बुलनद रहे ।`` चौिरी बोलते हुए भीतर के कक की ओर चल िदए। संगामिसंह ठहाके लगाकर हं स पड़े -
`` यिद मुझे आिशवाद
म नहीं िमला तो शाप भी नहीं िमलेगा िकनतु यह आिशवाद
म कया कम है िक
हमारे हौसले बुलनद रहे । वाह नाना जी! आपका भी जवाब नहीं।``
`` चलो संगाम चलो लगता है िक मामा शकुिन अपनी िे ड़ी चाल चल रहे है ।``
िरमदासजी ऊँची आवाज़ मे बोले और संगामिसंह के साथ बैठक से उठकर बाहर िनकल आए। बाहर आते ही
संगामिसंह के पक के आठ-दस लठै त नारे लगाने लगे-
`` संगामिसंह...................!``
``िजनदाबाद..................िजनदाबाद...........!``
``हाथो्े मं्े हाथ है ।``
``संगामिसंह......हम तुमहारे साथ है ।``
`` संगामिसंह...``
`` िजनदाबाद......................िजनदाबाद ।``
िरमदास महाजन अपने सुपुत और लठै त सािथयो के नारे लगाते हुए गाँव-समाज की गिलयो मे अपना
छोिा सा जुलूस लेकर पचार करने के िलए िनकल पड़े । िीरे -िीरे उनके पीछे -पीछे कुछ गामीण भी जुलूस मे शािमल
होने लगे। चौपाल तक आते-आते कुल जमा चालीस-पचास लोग ही जमा हो पाए। संगामिसंह ने अपने छोिे से जुलूस
मे लोगो्े को समबोिित िकया -
`` भाईयो ! आप लोगो्े को पता है िक शीघ ही पंचायत चुनाव होने जा रहे है ।मै इस पंचायत चुनाव मै
सरपंच के पद के िलए खड़ा हुआ हूँ। सारा गाँव-समाज जानता है िक अब तक पंचायत वदारा कोई िवकास कायम और
लोगो की रोज़ी-रोिी के िलए वयवसाय,काम-िंिे और रोजगार की वयवसथा नहीं कराई है । मै वादा करता हूँ िक मै आप
लोगो के सुख-द:ख और जो भी काम हो उसे पूरी ईमानदारी और िनषा के साथ िनभाऊँगा।आप भाईयो से मै अपील
करता हूँ िक मेरी जीत आपकी जीत होगी। आप मेरा समथन
म करे । मै आपके िलए सदै व हािज़र रहूँगा।गाँव-समाज मे
बेमाईमानी नहीं होने दँग
ू ा। यह मेरा वादा रहा।``संगामिसंह के विवय पर लठै तो ने तािलयाँ बजाकर नारे लगाने लगे।
`` संगामिसंह...........``
`` िजनदाबाद...िजनदाबाद.....``
`` संगामिसंह संघषम करो।``
``हम तुमहारे साथ है ।``
नारे लगाते हुए संगामिसंह का जुलूस िफर गाँव की गिलयो मे पचार के िलए िनकल पड़ा। जुलूस मे शािमल
लठैत घर-घर मे संगामिसंह को िजताने के िलए परचे बांिने लगे । रासते चलते लोगो को परचे थमा दे ते और कहते-
`` यिद तुम संगामिसंह को वोि दोगे तो हम तुमहे मालामाल कर दे गे।``
गामीण हं सते हुए आगे बढ़ जाते है ।
00
गाँव-समाज मे पंचायत चुनाव को लेकर चल रही खींचा-तानी ने लोगो मे्े तनाव उतपनन कर िदया।
गामीण संगामिसंह और िरमदास महाजन के सवभाव से पिरिचत है ।वे जानते है िक वे दोनो िपता-पुत िकतने जािलम
और बेईमान है । वे चाहे जो कर सकते है ।उनके पास इतना रपया है िक वे गामीणो को रपयो की िरशत दे कर वोि
डलवा सकते है ।बूथ अििकारी को िरशत से खरीद कर सारे वोि बदलवा सकते है । यहाँ तक िक वे बूथ के््रपचर ( बूथ
लुिवाना ) भी करवा सकते है । राजनीित के जंग मे कुछ भी असंभव संभव हो सकता है । राजनीितक भिाचार से कौन
नावािकफ है षोषो सारा जग जानता है िक िकसी भी तरह की सता हिथयाने के िलए कया-कया नहीं हुआ है षोषो
इितहास मे कई-कई उदाहरण भरे पड़े है ।उनहे कहाँ तक िगनवाएं षोषो
गाँव के बाहर िसथत िमनदर मे पीछे की ओर दािहनी तरफ हिर िवचारमिन मुदा मे तललीन बैठा है । वह खादी का
कुरता,पाजामा पहने हुए है । िमनदर मे सननािा छाया हुआ है । दोपहर के समय िमनदर मे कोई आता-जाता नहीं है ।
जब िकसी िवषम िसथित मे होता है या जब कोई गहन िचनतन करना होता है तब वह िमनदर के एकानत मे आकर बैठ
जाता है ।रािा को हिर की इस िसथित को भलीभांित जानती है । जब कभी हिर कहीं नहीं िदखाई दे ता तब रािा सीिे
िमनदर चली आती है । आज भी ऐसा ही हुआ। जब रािा को हिर घर से लेकर गाँव-समाज के चौपाल तक िदखाई नहीं
िदया तो वह भी सीिे िमनदर चली आई। िमनदर के पीछले भाग मे हिर को पाकर उसने गहरी सांस भी िक `` चलो हिर
यहाँ तो िमल ही गए है ``। उसने िमनदर का घणिा बजाया । शीकृ षण की मूितम को पणाम िकया और िमनदर की
पिरकमा लगाने का बहाना िकया।जयो ही वह िमनदर के पीछे की ओर गई।पायल की आवाज़ सुन हिर ने मुड़ कर दे खा
। इस तरह अनायास रािा को आया दे ख चौक पड़ा-
`` ओफ...रािा तुम !``
`` और तुम यहाँ अकेले बैठे कया कर रहे हो षोषो``
`` सोच रहा था माँ और बापू को लेकर शहर चला जाऊँ...बहुत द ु:ख होता है यहाँ....इस गाँव मे...न जाने कैसे-
कैसे लोग होते है । जो न तो िकसी को खुश दे ख सकते है न िकसी को द ु:ख मे साथ दे सकते है ।``
`` एक बात कहूँ !``
`` हाँ...कह दे ....कया बात है षोषो``
`` लेिकन पता नहीं ...मेरी बात कहाँ तक ठीक हो सकती है ।``
``कया.... जो कुछ भी कहना है कह दो..चाहे वह कुछ भी हो ।``
`` यही िक िजतना बड़ा जंगल होता है वहाँ उतने ही अििक जंगली भेिड़ये,जंगली जानवर और जंगली डाकू
भी होते है और.........जंगली डाकू जंगल से भी जयादा खतरनाक होते है ।``
`` बात तो िबलकुल ठीक है लेिकन............``
`` यही हाल शहर का होगा । िजतना बड़ा शहर उतने ही शहरी भेिड़ये,शहरी जानवर और उतने ही शहरी डाकू
होते होगे।शहरी डाकू जंगन के डाकुओं से भी जयादा खतरनाक होते होगे ।``
`` और गाँव मे....``
`` शहर से कम ही होगे हिर.............``
`` हाँ,शहर से कम ही होगे......लेिकन होगे शहर से जयादा खतरनाक....खूँखार।``
``गाँव मे कम भेिड़ये,कम जानवर और कम डाकुओं से लड़ना होता है लेिकन शहर मे तरह-तरह के
भेिड़ये,तरह-तरह के जानवर और डाकू होगे। तुम िकस-िकस से लड़ोगे ।`` कहते-कहते वह हिर के कांिे पर अपना िसर
िसर रखकर िफर बोली-
`` यहाँ मै भी तुमहारे साथ हूँ।शहर मे तुम अकेले पड़ जाओगे ।``
``इसिलए मेरे पैर गाँव से पलायन करने से डगमगाते है ।िजस ज़मीन मे पैदा हुआ हूँ,बड़ा हुआ हूँ,जहाँ की
आबो-हवा शरीर के रोम-रोम मे रची-बसी है । जहाँ मेरा बचपन अठखेिलयाँ लेता रहा है ।िजस ज़मीन से इतने बरस बंिा
रहा हूँ।वहाँ से इतने आसानी से नाता नहीं िू ि सकता ।``
`` तुमहारी इतनी बड़ी बड़ी बाते मेरे िसर से गुज़र जाती है । लेिकन....अचछा-बुरा तो समझती हूँ न.........और
उसी से बचने की सलाह भी दे ती हूँ तुमको.....``
`` तुम ठीक कहती हो। कभी-कभी तो बड़ी समझदारी की बाते करती हो....``
`` कया कहा....िफर से तो कहना....`` हिर को िचकुिी कािते हुए बोली।
`` ऊई............................भई तुमहे तो शरारत सूझती है और यहाँ जान िनकल जा रही है । ज़रा सोचो तो.....``
`` तुमहारी संगत का असर है जनाब । नहीं तो हमारी ये मुलाकात.....इस गाँव-समाज मे हो रही वारदातो मे
अभी तक मै छूमनतर हो जाती ।``
दोनो िखलिखलाकर हं स पड़े । तभी संगामिसंह िमनदर का घणिा बजाते है और कृ षण की मूितम को पणाम कर िमनदर
पिरकमा लगाने लगे।िमनदर के पष
ृ भाग मे हिर के साथ रािा को दे ख वे चौक पड़े । वह इस तरह रािा को एकानत मे
हिर के साथ दे ख कोिित हो गए। वे गरज पड़े -
``रािा....यह कया है षोषो हमारे ही दशुमन के साथ एकानत मे इशक लड़ा रही है ।
बतमीज...नालायक...हरामजादी...तेरी ये मज़ाल...``
िबना कुछ सुने उसने रािा को दो-चार थपपड़ मार िदए। हिर नाराज़ हो गए।बोले-
`` बुजिदलो की तरह औरतो पर हाथ उठाते हुए शरम नहीं आती तुमको...इस तर कोई िकसी को मारता
पीिता है कया षोषो``
`` तो ठीक है । हम गीदड़ पर ही हाथ उठाते है ।``
संगामिसंह बोले और िबना िकसीतरह का िवलमब िकए उनहोने हिर पर घूँसे बरसाना पारं भ कर िदए। अचानक इस
हमले को हिर संभाल नहीं पाए और वे िगर पड़े । पतथर से िसर िकरा गया।रि बहने लगा।वे उठ पाते इसके पहले ही
संगािमंसहषोषोरािा का हाथ पकड़ घसीिते हुए ले गया । रािा चीखती-िचललाती रह गई।
संगामिसंह कोि मे्े रािा को अपशबद बोलने लगा।
`` बेहया, बेशरम....तुझको ज़रा भी अपने िपता का धयान नहीं...``
`` बड़ो को बात करने की तमीज नहीं है तुझको.....हरामी...गुणडा....बदमाश...``
वह रािा को घसीिते हुए ले गया । हिर कुछ दे र तक पड़े रहे । उसी समय हिरिसंह और शेरिसंह कहीं से आ रहे थे।
उनहोने कण भर िमनदर मे रकने का सोचा वे िमनदर चले आए। हिर के िसर से रि बहते और उसे ज़मीन पर पड़ा दे ख
चौक गए।
`` हरे ...हरे .......ये कया हो गया हिर को....चलो....चलो ले चलो हिर को।``
वे दोनो हिर को उठाकर िबठाने की कोिशश करते है । हिर संभल कर उठ बैठे।िसर थामते हुए बोले-
`` कुछ नहीं यो ही ज़रा िसर चकरा गया था । अब ठीक लग रहा है ।``
`` चलो उठो....शेरिसंह दे खना िमनदर मे पानी है कया षोषोिसर से रि भी बह रहा है ।जाने कब से िगरे हो
तुम।कया हो गया तुमहे षोषो``
शेरिसंह िमनदर मे रखे पानी के घड़े से पानी ले आता है ।हिर पानी पीकर उठ बैठे।बोले-
`` कुछ नहीं। अब ठीक है , चलो।``
हिरिसंह और शेरिसंह ,हिर को अपने साथ उसे घर तक पहुँचाने गए ।
इिर संगामिसंह का कोि कम नहीं हुआ । वह रािा को माँ इनदावती के सामने ढकेल िदया।बोला-
`` लो संभालो....तुमहारी लाड़ली को....और इसे समझा दो िक आइनदा हिर से िमलने की कोिशश की तो
मुझसे बुरा कोई न होगा ।``
`` इसे ज़रा भी तमीज़ नहीं है माँ िक िकसी से कैसे बात की जाती है ।``रािा गुससे मे बोल पड़ी।
``कया िकया है रािा ने जो तू इतना गराम रहा है षोषो``इनदावती ने पूछा
``चोरो को तो तारे भी चोर नज़र आते है । जैसी तेरी िनयत है वैसी ही तेरी सीरत भी है बदमाश ।``रािा
उतेिजत हो बोली।
``माँ इसे समझा दे नहीं तो अचछा नहीं होगा । बोले दे ता हूँ। कब से मुँह लगे जा रही है और तू है िक कुछ भी
बोल नहीं रही है ।``संगामिसंह गुराय
म ा।
`` कया अचछा नहीं होगा । बता तो ।``
`` माँ इसने हिर को बुरी तरह से मारा ।उनके मुख से रि िनकल आया और कया करना चाहता है तू बता षोषो``
रािा तड़पकर बोली और जाकर इनदावती की आड़ मे खड़ी हो गई। झगड़ने की आवाज़ सुन िरमदास जी भी आ गए।
बोले-
`` कयो लड़ रहे हो षोषो और ये िकसका खून िनकल आया षोषो मुझे भी तो बताओ।``
`` हिर का और िकसका । भैया ने हिर को िबलावज़ह मारा । अगर वह भी हाथ उठाता तो न जाने कया हो जाता बापू
षोषो`` रािा अब भी चीखे जा रही थी।
`` खून हिर का िनकला और पीड़ा तुझको होने लगी िबििया ।``
िरमदास ने समझाकर कहा । अब तक इनदावती दोनो भाई-बहन के बीच चुप रही लेिकन िरमदास जी ने दखल िदया
तो वह बोल पड़ी-
`` दे खो जी ! खून चाहे िजसका िनकला हो िकनतु भूरा-हिर से तुम बाप-बेिे जो छतीस का आंकड़ा बना रहे
हो न उसका पिरणाम इस पिरवार को बहुत महं गा पड़े गा । हाँ, दे खना ।``
`` तो तू हमे शाप दे रही हो ।``िरमदास जी ितलिमलाएं
`` नहीं, बिलक चेतावनी दे रही हूँ। तुम लोग जो भी कर रहे हो न वह सब अनुकूल नहीं हो रहा है । यह मै नहीं
सारा गाँव-समाज कह रहा है ।``इनदावती समझाइश दे ते हुए बोली।
`` तो तू भी हमे चेतावनी दे रही है । ठीक है , दे ख लेगे िकसमे िकतना है दम है । हम भी नहीं है िकसी से कम।
दम
ु दबा दँग
ू ा सबकी दे खना ...``
बड़बड़ाते हुए िरमदास जी कक से बाहर चले गए।उनके पीछे संगामिसंह भी आँखे ततेरते हुए चल िदए । इनदावती
गंभीर हो उठी।बोली-
`` बेिी रािा ! कहीं ऐसा न हो िक कहीं ऊँच-नींच हो जाए । इसिलए कहे दे ती हूँ िक कोई ऐसा काम नहीं करना
बेिी िजससे िक तेरी इस बुढ़े माँ-बाप को नीचा दे खना पड़े ।``
कहते वह इनदावती रसोई मे चली गई।
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हिर के िसर से रि दे ख कमली घबरा गई।बोली-
`` ये...ये....ये कया हो गया मेरे बेिे को षोषो``
`` कुछ नहीं माँ, िसर चकरा गया था िगर पड़ा।थोड़ी चोि लग गई।``
``िफर िकसी ने दशुमनी िनकाली मेरे हिर पर ।`` कमली रंआई सी हो गई।
`` आप तो जानती है िक इस गाँव का वातावरण आजकल बहुत ही खराब हो चला है । ऐसे मे कब कया हो
जाए कह नहीं सकते।`` हिरिसंह ने आशंका वयि की। हिर बोला-
`` जब इनसान िदल और िदमाग से कमजोर हो जाता है तो वह दस
ू रो को नुकसान पहुँचाने की कोिशश करता
है ।यही िसथित आजकल इस गाँव की हो गई है ।``
`` बौराया हुआ आदमी यह नहीं सोचता िक जो वह कर रहा है वह ठीक है या गलत । उसे केवल अपने
दशुमन के अवगुण ही नज़र आने लगते है ।``हिरिसंह ने कहा और हिर के िसर से चू रही रि की बूँदे साफ करने लगा।
वह िफर बोला-
`` इस गाँव मे आज तक दवाखाना नहीं खुला है और न ही इतने दरू कोईडाकिर आता है । एक दवाखाना खुल
जाए तो कम से कम ऐसी घिना मे काम तो आवै। लेिकन नहीं.....जाने कब इस गाँव की िकसमत खुले।``
`` ऐसा कोई काम मत करो बेिा िजससे दशुमनी पैदा हो कयोिक दशुमनी जंगल मे लगी आग की तरह होती
है । जो सब कुछ जला कर रख दे ती है ।``
कमली समझाइश दे ती जाती और गरम की गई हलदी चोि पर लगा साड़ी के पललो की पिट्ी बांिती। हिर माँ को
िहममत दे ने की कोिशश करता है -
`` नहीं माँ, तू िहममत रख और ईशर पर भरोसा रख । ऐसा कोई काम नहीं होगा िजससे तेरे बेिे को कोई बड़ा
नुकसान हो।``
`` अचछा भाई हिर तू आराम कर ।तू कहे तो शहर से डाकिर को बुलवा लूँषोषो``
हिरिसंह बोले तो हिर ने कहा-
`` नहीं डाकिर की जररत नहीं। डाकिर इलाज नहीं करे गा।यह लड़ाई का केस है और थाने के चककर लगाने
पडे ़््ग
ं े हाँ इतना जरर है िक ईशर ने चाहा तो इस गाँव मे भी दवाखाना खुल जाएगा ।``
हिरिसंह और शेरिसंह जाने ही वाले थे िक चौराहे पर बज रहे नकारे की आवाज़ सुनाई दी। हिर िफर बोले-
`` ये नकारे की आवाज़ ! कोई िडं डोरी पीिवा रहा है कया षोषो``
अभी यह बात हो रही रही थी िक िडं डोरची हिर के मकान के सामने ही आकर खड़ा हो गया और नकारा बजाकर िडं डोरी
पीिने लगा-
`` सुनो ! सुनो!! सुनो!!! गामवािसयो को सूिचत िकया जाता है िक अगले मिहने की 25 तारीख को पंचायत
चुनाव लड़नेवाले पतयािशयो की सूची िजला कलेकिर वदारा पकािशत की गई है । चुनाव लड़नेवालो के नाम इस पकार
है । सरपंच के पद के िलए पतयाशी है संगामिसंह उलद िरदमास चौिरी उफम िरमदास महाजन दस
ू रे पतयाशी है हिर
वलद भूरा । पंच के िलए पतयाशी इस पकार है -िरमदास चौिरी उफम िरमदास महाजन, मैकू,कमलिसंह चौिरी,
नीलमिसंह चौिरी,िवकमिसंह चौिरी , गुलाबो, गोपालिसंह, रपा,पावत
म ी और हिरिसंह.....``
िडं डोरची नकारा बजाते हुए आगे बढ़ गया । हिरिसंह बोले-..``अचछा भाई हिर, अब हम चलते है ।दे खते है ,उिर कया हो
रहा है षोषो``
.इतना कहकर हिर्ािसंह और शेरिसंह चलते बने।
00
.इनदावती पान बना रही थी।िरमदास जी बैठक मे िचिनतत मुदा मे िहल रहे थे । संगामिसंह मसनद पर बैठे बड़े
इि्तमनान से पान चबा रहे थे। िरमदास जी उतेिजत हो बोले-
``मै तो जानूँ िक सरकार ने उस ससाले भूरा के लौडे को कया जानकर चुनाव का ििकि िदया षोषो तू बता
षोषो कया है उस लौडे ़् मे षोषो``
`` ये तो बताओं िक अिावक िकतनी उम के थे जो शासाथम मे बड़े -बड़े िववदानो को परासत कर िदया था । उम
दे खकर िकसी की औकात का पता नहीं चलता । अरे कोई कािबिलयत होगी तभी तो......तुमसे बहस करने से कया होगा
षोषो`` इनदावती ितलिमलाकर बोली।
`` तू तो गिे को भी घोड़ा कहे तो मान लूँ कया मै.....अं.....बता, मान लूँ कया षोषो``
`` मुझे मालूम है गिा िकसे कहते है और घोड़ा िकसे कहते है , खूब समझती हूँ िक घोड़े और गिे मे कया
अनतर है ।``
`` तो यह भी बता दो माँ िक इस कुरकेत मे घोड़ा कौन है और गिा कौन है या िक हम ही बाता दे घोड़े और
गिे का नाम...`` कहते हुए संगामिसंह ठहाका लगाकर हं स िदया ।
`ये जान लो ललला िक घोड़ा कभी दल
ु ती नहीं मारता।हाँ,गिा जररी मारता है और यह भी िक घोड़ा बखत आने पर
अपनी पूरी शिि से अगले पैरो से दशुमन पर वार करता है ,बखत से पहले नहीं। गिा न कोई बखत दे खता है और न
अपना पराया दे खता है वह चाहे जब केवल दल
ु ती मारना ही जानता है ,बस....`` इनदावती किाक के साथ बोली
`` चौिरी की बेिी है बड़ी ऊँची उड़ान भरती है िक सामनेवाला चाहे िकतना भी उड़नेवाला हो पंख फड़फड़ाते
रह जाता है ।कयो संगाम षोषो``िरमदास से वयंिय िकया ।
`` बाबा कुछ करो...इस तरह हाथ पर हाथ िरे बैठना उिचत नहीं जान पड़ता ।``संगामिसंह वयग होकर बोला

`` कुछ करँ....सच मे कुछ करँ....ठीक आ चल ।``
दोनो िपता-पुत जाने लगते है तभी इनदावती किाक करके बोली-
`` ये जरर याद रिखयो..कालयवन से लड़ने के िलए अकेले शीकृ षण गये थे युद के मैदान मे.....``
दोनो रक जाते है । कण भर तक एक दस
ू रे की ओर दे खते है ।उसी समय रािा आरती की थाली सजाकर आई।
`` माँ मै िमनदर जा रही हूँ।``
``अकेली मत जाना बेिी । िकसी को साथ ले जाना और अंिेरा होने से पहले ही लौि आना । नानाजी के घर
जाना है ।``
`` अचछा माँ ,जलदी आ लौि आऊँगी । पावत
म ी को ले साथ ले जाऊँ षोषो``
`` हाँ ,पावत
म ी के साथ जा ।``
रािा ``हाँ माँ`` कहते हुए चली गई । अभी सांझ हो रही थी । पंछी अपने-अपने घोसलो की ओर लौि रहे थे। मुडेरो पर
पंिछयो का झुंड एकत होने लगे थे। रािा पावत
म ी को साथ लेकर िमनदर चली गई ।
आरती और पूजा के बाद दोनो िमनदर की दे हरी पर बैठे काफी दे र तक इिर-उिर की बाते करती रही। िीरे -
िीरे अंिेरा छाने लगा । गाँव मे अभी तक रासतो पर रोशनी नहीं हुई थी। िमनदर के पांगण मे भी रोशनी की वयवसथा
नहीं है ।िमनदर मे लोगो का आना जाना कम हो गया था । वे दोनो अब तक िमनदर की दे हरी पर ही बं्ैठी बितया रही
थी। दरू-दरू तक कोई िदखाई नहीं दे रहा था। तभी अचानक कुछ नकाबपोश िमनदर पांगण मे पगि हुए। रािा और
पावत
म ी बातो मे इतनी अििक मिन थी िक उनहे नकाबपोशो के आने का भान नहीं हुआ । तभी दो नकाबपोशो ने रािा
को िर दबोचा और उसका मुँह बनद कर िदया । रािा छिपिाने लगी। नकाबपोशो को दे ख पावत
म ी घबरा गई और वह
चीखने लगी। उसे चीखते ही उसे नकाबपोश ने पूरी शिि के साथ एक थपपड़ रसीद दी । थपपड़ पड़ते ही पावत
म ी का
िसर िमनदर की दीवार से जा िकराया । वह वहीं गशत खाकर िगर पड़ी। नकाबपोश रािा को उठाकर ले गए । पावत
म ी
बहुत दे र तक बेहोश पड़ी रही । बहुत दे र बाद उसे आिहसता-आिहसता होश आए। वह कराहते हुए उठ खड़ी हुई । दे खती
है िक िमनदर मे चारो ओर कोई नहीं है ।रािा का कहीं पता नहीं है । वह ज़ोरो से चीखती है । लेिकन उस एकानत मे कोई
नहीं है । वह चीखते हुए घर की ओर दौड़ पड़ी। िगरते-उठते दौड़ते हुए वह इनदावती के पास जा पहुँची ।
`` काकी...काकी....काकी....रािा..रािा।``
पावत
म ी कुछ बोल नहीं पा रही है । वह बदहवाश सी घबरा रही है । इनदावती रामचिरत मानस पढ़ रही थी-
`` परिहत सरस िरम नहीं भाई
पर पीड़ा........................
पावत
म ी आकर इनदावती के पास िम ् से जमीन पर िगर पड़ी। पावत
म ी को इस तरह अचानक आकर िगरते दे ख
इनदावती सहम गई।पावत
म ी अब भी ....``रािा....रािा `` बदहवाश सी बड़़्बड़ा रही है । इनदावती घबराई-
`` कया हुआ रािा कोषोषो रािा कहाँ है षोषो``
पावत
म ी अंगुली से बाहर की ओर इं िगत करती है । लेिकन वह कह नहीं पा रही है ।
`` काकी...रािा.. नकाबपोश....उठा....उठा...ले....ले.....गए...काकी....रािा--
`` नकाबपोश....रािा...............उठाकर ले गए......नहीं.................`` इनदावती के तो मानो होश ही उड़ गए।
बड़बड़ाने लगी-
`` वारदाते....दस
ू रो के िलए कुआँ खोदते है और खुद के पैरो पर कुलहाड़ी मारते है । नहीं...ऐसा नहीं हो सकता ।
``वह एक बार पूरी शिि से चीखी और बेहोश हो गई।
0
गाँव के बाहर का बगीचा । यह वही बगीचा है िजसमे एक कोठरी है और िरमदास जी उसी कोठरी मे अपने
आसािमयो को कैद कर उनहे पतािड़त करते है । कोठरी मे तीन-चार कक है । एक कक मे रािा को कैद कर रखा गया है ।
िकशन और दो-तीन लठै त पहरा दे रहे है । िरमदासजी और संगामिसंह घोड़ागाड़ी से उतर कर बगीचे मे गए।िकशन
उनकी पतीका कर रहा था। उनके आते ही बोला-
`` सेठ जी, आपके हुकुम की तािमली कर दी गई।``
`` शाबास िकशन, लेिकन धयान रहे हमारी िबििया को िकसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होने पाए।``
`` वाह सेठ जी,कैसी बाते करते है तुम।यह सब तकलीफ तो होगी ही। बेचारी सारी रात अकेली उस कोठरी मे
मुँह बनद कर भूखी-पयासी पड़ी रहे गी।`` िकशन बोला।
`` ठीक है । ठीक है । बस एक रात की ही तो तकलीफ है । अब तुम लोग जा सकते हो।`` संगामिसंह दढ़ता के
साथ बोला।
िकशन अपने लठैत सािथयो के साथ चला जाता है । उनके जाते ही दोनो िपता-पुत ठहाके लगाकर हं सते है ्ै।
`` अब आएगा मज़ा दम
ु दबाकर....``
िरमदास जी और संगामिसंह सारी रात कोठरी के बाहर बगीचे मे पहरा दे ते बैठे रहे । एक तो वे सवयं ही भयभीत रहे
िक कहीं ऐसा न हो िक लेने के दे ने पड़ जाए।यिद रािा को कुछ हो गया तो वे कहीं के न रहे गे ।दस
ू री ओर वे दोनो िपता-
पुत िकसी गंभीर योजना को मूतम रप दे ने जा रहे है । सुबह तक वे िजस िकसी तरह रािा को `` वाच ् ``करते रहे । सुबह
हो्ेते ही दोनो िपता-पुत वहाँ से तुरनत चल िदए।
सुबह होते ही इनदावती भी माँ अनुसूया के पास चली आई। जैसा पावत
म ी ने बताया उसी अनुसार इनदावती ने
रािा के अपहरण की सारी घिना माँ अनुसूया को कह सुनाई। चौिरी कमलिसंह उस समय घर पर नहीं थे।चौिराइन
ने तुरनत ही नीलमिसंह, गोपालिसंह, गुलाबो, चमपा और अपने िहतैिशयो को खबर करवाकर उनहे ्ं बुलवा िलया । वह
बोली-
`` बड़ी िचनता की बात है िक रािा के अपहरण के समय से ही हमारे दामाद िरमदासजी और संगामिसंह जी
अब तक घर नहीं लौिे ।``
`` और इस वि दोनो चौिरी पंचायत चुनाव के िसलिसले मे चौिरी अशोकिसंह से सलाह-मशिवरा करने के
िलए रोशनपुरा गए हुए है इनदा..`` अनुसूया ने िचनता जताई।
`` दो िदनो से गाँव मे वरदाते हो रही है । यह गाँव-समाज के िलए उिचत नहीं है चौिराइन जी ।`` मैकू बोले
`` तुम ठीक कहते हो लेिकन कया िकया जा सकता है षोषो हमारे दामाद िरमदास और पोतेहू संगामिसंह भी
कल से नहीं है ।
ऐसे मे कोई िनणय
म िलया जाना खतरे से खाली नहीं होगा ।`` अनुसूया बोली।
`` यिद आप उिचत समझे तो मै सलाह दे ना चाहूँगा िक इस मामले की रपि नज़दीक के थाने मे िबना िकसी िवलमब से
कर दे नी चािहए ।`` मैकू काका बोले।
``मैकू काका का कहना भी उिचत ही लगता है चौिराईन जी। यिद आप इज़ाज़त दे तो हम लोग थाने जाकर
रपि दजम करवा आएं।`` गोपालिसंह ने अपनी सहमित वयि करते हुए कहा ।
`` आप लोग जो उिचत हो वहीं करे । मै तो इन सब हथकणडो से पूरी तरह अनिभज हूँ।`` अनुसूया जी ने
जताया ।
``आप ठीक कह रही है चौिराइन जी। चलो गोपालिसंह शीघता की जाना उिचत होगा ।`` मैकू काका बोले।
`` हाँ जी, चलो।``
दोनो उठकर जाने लगे उसी समय िरमदासजी और संगामिसंह जी भी आ गए। इतने सारे लोगो को एक साथ दे ख
पहले तो चौक गए िफर आिहसता से बोले-
`` कया ठीक कह रही है चौिराइन जी । ज़रा हम भी तो सुने।`` िरमदास जी ने तुकका मारा। जैसे वे जानते
ही नहीं हो।
इनदावती कोिित हो उठी बोली-
``हो गई तुम लोगो के कलेजे की आग ठणडी..जाओ...जाओ अब आराम से चैन की नींद सो लो।घर की िचनता
तो है ही नहीं। जाने कहाँ थे सारी रात दोनो बाप-बेिे षोषो``
``कया हो गया अममा षोषो`` संगामिसंह भी अनिभजता पगि कर बोले
``कया हो गया मुझे षोषोपागल कुते ने काि खाया।अब मै तुम दोनो को काि खाऊँगी । सारे गाँव मे आवारा
सांड की तरह घुमते िफरते बाप-बेिे। कभी िकसी की कुकीZ,कभी िकसी की नीलामी । अब हो गई तुमहारी इजजत की
भी नीलामी..समझे गए होगे अब तक तो..`` इनदावती ितलिमला उठी ।
`` अरे ये कया उिपिांग बके जा रही है । होश ठीक है भी या नहीं तुमहारे षोषो`` िरमदास जी उचके।
`` मेरे और इन सब लोगो के होश िबलकुल सही है । होश मे तो तुम दोनो बाप-बे्ेिे नहीं हो।न घर की िचनता
न बाहर की। मै कहाँ-कहाँ तुम दोनो का पक लेते रहूँ।कयो मै सबसे दशुमनी लूँ तुम लोगो की खाितरषोषो`` इनदावती
अब भी उतेिजत थी।
`` अममा , जो कुछ कहना हो शािनतपूवक
म कहो..ज़रा नरम होकर कहो।``संगामिसंह बोला
``िफर भी तू कह रहा है शािनतपूवक
म कहूँ। नरम होकर कहूँ। तुम दोनो ने गाँव-समाज की शिनत नि कर रखी है अब घर
की शािनत भी नि हो रही है ।`` इनदावती कहते जा रही ।
``िीरज रखो अममा !कहो कया आपित है ।``संगामिसंह िफर बोले
`` संगाम बेिे ! कुछ नकाबपोश रािा िबििया को िमनदर से उठा ले गए ।`` गोपालिसंह ने ठणडे िदमाग के
साथ कहा।
`` कया षोषो रािा को उठा ले गए षोषो`` िरमदास और संगामिसंह दोनो एक साथ बोले।जैसे उनहे पता ही
नहीं हो ।
`` हाँ बेिे संगाम `` गोपालिसंह आिहसता से बोले।
`` चलो सबसे पहले िरपोिम करते है पुिलस को । कहीं दे र न हो जाए।`` संगामिसंह सोचकर बोले
`` यह उिचत रहे गा । हमे िजतनी जलदी हो सके्ं िरपोिम कर दे नी चािहए।``िरमदासजी भी बोले।
कहते है िक चोरो को तारे नज़र आते है चोर। चोर चला चोरी की िरपोिम दजम करवाने । ऐसा अकसर होते रहता है ।
पिरणाम भले ही कुछ भी हो । जब चोर सवयं ही चोरी की िशकायत दजम करने जाता है तो कहीं न कहीं तो वह कमजोर
होता ही है । उसका अनतमन
म उसे ििककारता है लेिकन वह अपनी हे कड़ी के आगे कुछ भी उिचत-अनुिचत समझ नहीं
पाता और अनतत: िरपोिम िलखवा ही दे ता है ।
सं्ंगामिसंह, िरमदास महाजन ,नीलमिसंह ,मैकू और गोपालिसंह सब िमलकर थाने जा पहुँचे और रािा के
अपहरण की िरपोिम दजम कर दी। उनहोने िबना िकसी तरह का संकोच िकए सारा आरोप हिर पर ही िर िदया । कहने
लगे-
``दरोगा जी ! हमे तो पूरा िवशास है िक यह काम हिर ने ही िकया होगा । वह रािा को अकेले मे बुलाकर न
जाने िकस िकस तरह से उसे बहलाया करता था । शायद रािा नहीं मानी तो उसने रािा का अपहरण ही कर िलया।
अब वह भी दो िदनो से िदखाई नहीं दे रहा है । हमे तो हिर पर पूरा शक है दरोगा जी।``
`` कहीं ऐसा तो नहीं िक तुम लोग जानबूझकर हिर का नाम िलखवा रहे हो।अपहरण िकसी और ने िकया हो
और तुम लोग हिर पर शक कर रहे हो।``दरोगा ने शंका वयि की।
`` दरोगा जी! हाथ कंगन को आरसी कया। वह तो आप खुद ही पता लगा लेगे।बाद साफ हो जाएगी।``
िरमदास जी बोले।
`` ठीक है !तुम लोग कह रहे हो तो पहले मै पूरी जांच करवा लूँ ।`` दरोगा बोले
`` जैसा आप उिचत समझे करे िकनतु हमारी िबििया हमे वापस िलवा दो दरोगा साहब ।`` गोपालिसंह बोले।
``
`` मै पूरी कोिशश करंगा । तुम लोग अब जा सकते हो ।``दरोगा ने आशासन िदया और िसपािहयो से कहा-
`` दो िसपाही मेरे साथ चले।``
िरमदासजी ,संगामिसंह और सारे लोग थाने मे रपि िलखवा वापस लौि आए। हालांिक िरमदासजी एवं संगामिसंह
अपनी शरारत िछपाएं रखे है । उनहे भीतर ही भीतर इस बात का भय है िक कहीं उन पर शक की अंगुली उठ गई तो
मुिशकल होगा । बावजूद वे दोनो िपता-पुत िबना खौप खाएं चुप रहे ।वे चाहते है िक िजस िकसी तरह से हिर को
िगरफतार िकया जाय और पंचायत चुनाव मे संगामिसंह िबना िकसी बािा के जीत कर सरपंच बन जाय।सरपंच पद
के िलए दो ही पतयािशयो ने फामम दजम िकया है । वे यह नहीं जानते िक मान लो भले ही हिर को िगरफतार कर िलया
जाय िफर भी गामीणो को वोि दे ने से कौन रोक सकता षोषो चौिरी िवकमिसंह और चौिरी अशोकिसंह के होते हुए
वोििं ग मे मनमानी होना इतना आसान नहीं है । इतना जानते हुए भी िरमदास जी और संगामिसंह अपनी िे ड़ी चाल
चलकर ही रहे गे।
0
सुबह तक रािा िनढाल सी बंिी रही।िरमदासजी और संगामिसंह रात को ही जा चुके थे और सुबह कोठरी
पर कोई पहरा नहीं दे रहा था। वे कोठरी पर एक हलका सा ताला लगाकर चल िदए थे। जब कोठरी मे हलका-हलका
पकाश पड़ने लगा,रािा ने कोठरी मे चारो ओर दे खा। कोठरी मे सामान िबखरा पड़ा हुआ था।गैती,फावड़ा,कुलहाड़ी,
दराितयाँ,टे कठर के पूजे आिद-आिद।उसके हाथो मे रससी और मुख पर बड़ा गमछा बंिा हुआ था। उसने िजस िकसी
तरह से अपने दोनो हाथ िरससयो से खोल िदए । मुख पर बंिा गमछा्ा भी खोल िदया। कोठरी के पीछे की िखड़की के
पाि कुछ िू िे हुए से थे।उसने उसमे से बाहर झांककर दे खा। उसे उममीद नज़र आई । हालांिक िरमदासजी ने िकशन
को कहा था िक रािा को तकलीफ नहीं होनी चािहए। इस कारण उसे िरससयो से मजबूत नहीं बांिा था।केवल इतना ही
बांिा था िक वह आसानी से छूि न पाएं और सेठजी के आदे श का पालन भी हो जाए।
उसने बाहर िनकलने के िलए दरवाज़ा ज़ोरो से खिखिाया।बाहर से कोई पतयुतर नहीं िमला । िखड़की से
बाहर आवाज़ लगाई िकनतु कोई जवाब नहीं िमला। अभी सूरज जयादा ऊपर नहीं चढ़ा था और रासते से कोई आ जा भी
नहीं रहा था ।गाँव के पशु यहाँ-वहाँ चरते िदखाई दे रहे थे।उसे आशा लगी िक अवशय ही आसपास कोई न कोई तो होगा
। वह िचललाती है -
`` अरे कोई तो मुझे बाहर िनकालो....अरे कोई है कया बाहर षोषो``
वह बार-बार िचललाती रही । बहुत दे र के बाद कुछ बचचे पशुओं को हांकते हुए िदखाई िदए। रािा उन बचचो को दे खकर
उनहे आवाज़ लगाई-
`` अरे बचचो ! तुम मेरी आवाज़ सुन रहे हो कया षोषो``
कोई पतयुतर नहीं िमला । शायद बचचो ने सुना न हो । वह िफर िचललाती है -
`` अरे कोई बाहर है कया षोषो मुझे बाहर िनकालो ।मुझे कोठरी मे बंद कर रखा गया है ।``
िचललाते-िचललाते वह ज़ोरो से रोने लगती है । बचचे लोग पशु चराते हुए बगीचे के पास पेड़ के नीचे खेलने लगे।तभी
उनहे रोने की आवाज़ सुनाई दी। एक बचचा जो लगभग बारह-पनदह साल का होगा ,आवाज़ को धयान से सुनता-
`` लगता है उस मकान मे से िकसी औरत के रोने की आवाज़ आ रही है । लेिकन वहाँ कोई रहता तो नहीं है ।
चलो चलकर दे खते है ।``
बचचे लोग रोने की आवाज़ की िदशा की ओर जाते है । कोठरी के पास आकर रक जाते है ।उसी समय रािा
िखड़की से बाहर झांककर दे खती है ।कुछ बचचे िखड़की के पास खड़े िदखाई िदए।उसने बचचो को आवाज़ दी-
`` अरे बचचो !इिर आओ । यहाँ िखड़की के पास आओ ।``
बचचे िखड़की के पास जाते है । एक बचचा बोला-
`` तुम कयो रो रही हो दीदी षोषो``
`` अरे भैया ,मै रािा हूँ । चौिरी काका की बेिी । कोठरी का दरवाज़ा बाहर से बनद है । पहले तुम मुझे बाहर
िनकालो।``
`` कयो दीदी षोषो``
`` पहले मुझे बाहर तो िनकालो , िफर बताऊँगी । उिर से रासता है । बगीचे मे आओ और बाहर से सांकल
खोल दो।``
बचचे बगीचे मे पवेश कर कोठरी के पास गए।कोठरी पर बाहर से एक छोिा सा ताला लगा है । बचचा बोला-
``दीदी , बाहर से ताला लगा है । हम इसे तोड़ डाले ।``
`` हाँ बचचो तोड़ डालो । मुझे बदमाशो ने कोठरी मे बनद कर रखा है ।``
बचचो ने िमलकर ताले को पतथर से पीि-पीिकर तोड़ िदया । दरवा़्ज़ा खोला । रािा बाहर िनकल आई । बचचे बोले-
``अरे दीदी !तुम....यहाँ कैसे षोषो``
बचचे लोग रािा को दे खकर पहचान गए। रािा ने बचचो को सारी बात कह सुनाई ।एक बचचा बोला-
`` अब कया करे दीदी षोषो``
तुम लोग जाओ। मै िकसी तरह से घर जाने की कोिशश करती हूँ।``
`` नहीं दीदी !हम लोग भी तमहारे साथ घर तक आते है । दे खो हम तीन बचचे है । तुमको घर तक पहुँचाकर
आएंगे।``
`` ठीक है बचचो! तुमने मुझे इस संकि से िनकाला । मेरी माँ, बाबा और मेरा भैया मेरे िलए परे शान हो रहे
होगे।चलो तुम लोग भी मेरे साथ चलो ।``
अभी तक बगीचे का रखवाला नहीं आया था और न िकशन और उसके साथी । िरमदासजी और संगामिसंह िनिशनत
थे िक अब वह ही होगा , जो वे चाहते है ।
00
भूरा बैलो के िलए चारा काि रहा है । बैलो के पास पानी के बतन
म रखे हए है ।आंगन मे दो चारपाईयाँ िबछी हुई
है । दरोगा और दो िसपाही आंगन के पास आए और डणडे से खिखिाया -
`` अरे सुनो ! ये.....ये....
चारा कािना छोड़ भूरा उठा और हाथ जोड़ दरोगा से बोला-
``नमसते जी दरोगा साहब! आइए , बैिठए । आज इिर कैसी कृ पा कर दी । हमे ही बुला िलया होता ।``
`` हम बैठने नहीं तेरा छोरा हिर को लेने आएं है ।`` दरोगा ने कड़ककर कहा
`` भीतर है ।तबीयत ठीक नहीं । कया बात है दरोगा साहब षोषो``
`` हिर के नाम वारं ि है । हम उसे िगरफतार करने आएं है ।``
`` वारं ि ! िगरफतारी ््! दरोगा साहब ये सब कया हो रहा है षोषो``
`` ये तो थानेदार साहब ही बताएंगे ।हम तो हिर को िगरफतार करने आए है । िसपािहयो चलो हिर को
िगरफतार करलो ।`` दरोगा कड़ककर बोला और साथ मे आए िसपािहयो को आदे श िदया ।
भूरा आगे और दरोगा तथा दो िसपाही उनके पीछे मकान के भीतर गए । हिर चारपाई पर लेिा हुआ था । कमली उसके
माथे पर पानी की पिट्ी रख रही थी । दरोगा और िसपािहयो को आया दे ख कमली खड़ी हो गई। दरोगा कड़ी आवाज़
मे बोला-
`` कया हो गया इसे षोषो``
कहते हुए दरोगा ने हिर के माथे पर अपना हाथ रखा । हिर का माथा तेज जवर से तप रहा था । उसका चेहरा जवर के
कारण तमतमा रहा था वह अिच
म ेतनावसथा मे पड़ा था । कमली बोली-
`` मेरा बेिा िपछले दो िदनो से तेज़ बुखार मे पड़ा है । उसे तो दो िदनो से होश ही नहीं है ।``
`` इसे तो वासतव मे बहुत जवर है । असपताल ले गए थे इसे षोषो`` दरोगा थोड़ा नरम होकर बोला
`` असपताल तो शहर मे है । हम िनिन
म लोग कैसे ले जा सकते शहर के असपताल मे षोषो``भूरा िनराश सा
होकर बोला
`` अचछा , िसपािहयो तुम लोग यहाँ पहरा दो मै थानेदार साहब को खबर कर दँ ू । बाद मे दे खा जाएगा कया
करना है ।``
दरोगा भूरा से बोला-
`` असल मे बात यह है िक िरमदासजी महाजन की बेिी रािा .....षोषो``
`` कया हुआ रािा िबििया को....कोई दघ
ु Z िना तो नहीं हुई न....`` भूरा िवि्समत हो बीच मे ही बोल पड़ा
`` नहीं , असल मे रािा का अपहरण हो गया है । थाने मे हिर के िवरद रपि दजम कराई गई है िक रािा का
अपहरण कल रात हिर ने िकया । लेिकन यहाँ हम दे ख रहे है िक हिर तो तेज जवर मे तप रहा है । खैर , मै दे खता हूँ
आगे कया हो सकता । मुझे तो और कुछ ही मामला लगता है ।`` दरोगा ने भूरा को बताया ।.
दरोगा , दो िसपािहयो को भूरा के मकान के बाहर तैनात कर वापस थाने चले गए । कमली और भूरा को यह जानकर
आशयम हुआ और यह भी आशंका जागी िक रािा का अपहरण महज़ कर षढ़यंत है ,हिर को फंसाने का । अगले माह
पंचायत चुनाव होने जा रहे है और इस नाजुक समय मे्े हिर पर रािा के अपहरण का आरोप लगाकर उसे बेइजजत
िकया जाना । उसे गाँव-समाज की नज़रो मे अपरािा्ी सािबत करवाना और उसे पंचायत चुनाव से बिहषकृ त करवाने
के िलए यह आरोप पयाप
म होगे। यह सोचकर भूरा और हिर का माथा ठनका । उनहोने कभी ऐसा सोचा भी नहीं होगा िक
पंचायत चुनाव के ठीक अवसर पर उनके साथ ऐसा नािक भी खेला जाएगा। लेिकन भूरा और कमली ने सोचा ,यह सब
नािक िरमदास और संगामिसंह का रचाया हुआ ही होगा कयोिक संगामिसंह सरपंच के पद के िलए चुनाव लड़ना
चाहता है । वह नहीं चाहे गा िक हिर सरपंच के पद का उममीदवार रहे और वह जीत कर आएं। िरमदास जी जानते है
िक सरपंच के पद पर हिर इस चुनाव मे अवशय ही जीतेगा लेिकन यह आरोप िसद हो जाता तो उसे पंचायत चुनाव
नहीं लड़ने िदया जाएगा और यिद सरकार ने उसे िफर भी अपात मान िलया तो िफर गाँव-समाज के लोग उससे घण
ृ ा
करने लगेगे और उसे वोि नहीं दे गे । इस तरह संगामिसंह सरपंच के पद पर जीतकर आ ही जाएंगे । तमाम बाते भूरा
और कमली के िदमाग मे हलचल मचाने लगी ।
दरोगा थाने पहुँचा । उसे दे खते ही थानेदार बोला-......
अरे तुमने हिर को िगरफतार कयो नहीं िकया षोषो``
`` सरकार , हिर तो दो िदनो से तेज बुखार मे अचेत पड़ा है । उसे कैसे िगरफतार करे ।उसके माँ-बाप को तो
साहूकार की बेिी के अपहरण की भी जानकारी नहीं थी । वह तो हमने बताई तब उनहे पता लगा ।``
`` नहीं....नहीं....ऐसा नहीं हो सकता । यह सब नािक है । कल ही तो उसने रािा का अपहरण िकया था ।
जरर कोई न कोई गड़बड़ी है । खैर, अभी पता चल जाएगा । मै डाकिर को बुलवाता हूँ । उसके बाद दे खा जाएगा ।
``थानेदार वीरपतापिसंह जी ने फोन डायल िकया । उिर से आवाज़ आने पर वे बोले-
`` मै थानेदार वीरपतापिसंह....डाकिर बेनजी बोल रहे है ......जी हां्ँ....नमसते डाकिर साहब.........आप कृ पया
जलदी से थोन आ जाइए..........हाँ.....एक वयिि......दो िदनो से अचेत है .......हमारा केस है ............िकतनी दे र
मे..................दस मीनि मे....... नहीं और जलदी......................हाँ, अचछा आ रहे है । ठीक है मै पतीका कर रहा
हूँ।`
कुछ ही समय के भीतर डाकिर बेनजी थाने आ गए । वीरपतापिसंह, दरोगा और डाकिर बेनजी को लेकर सीिे भूरा के
घर जा पहुँचे। कमली , हिर के माथे पर पानी की पिट्ी रख रही थी । डाकिर, थानेदार वीरपतापिसंह और दरोगा को
आया दे ख वह उठकर खड़ी हो गई। डाकिर बेनजी , हिर की पूरी जांच के बाद बताते है िक वह तो दीघ Z कामा मे 48
घणिे से है ।उसके माथे पर गहरी चोि के कारण वह कामा मे चला गया है । यिद शीघ ही उसकी िचिकतसा नहीं की जाय
तो उसके पाण संकि मे पड़ सकते है । उसी समय चौिरी कमलिसंह और चौिरी िवकमिसंह ,हिर को दे खने आ गए ।
वहीं पर थानेदार वीरपतापिसंह को दे खकर िवि्समत हो गए।बोले-
`` मुझे पता था आप यहीं िमलेगे । िगरफतार कर िलिजए कामा मे पड़े हिर को । जो वयिि दो िदन अििक से
बेहोश पड़ा हो वह िकसी का अपहरण कैसे कर सकता षोषो आप ही बताइएं वीरपातपिसह षोषो``
`` आप मुझे शिमन
म दा कर रहे है । लेिकन कया करे , हम िववश है ।हमारे पास हिर के िवरद रपि है । उसी
आिार पर हमे हिर को िगरफतार करना था िकनतु जब डाकिर बेनजी ने बताया िक हिर 48 घंिे से कामा मे है तो वैसे
ही रपि अपने आप खािरज हो जाती है ।``वीरपतापिसंह बोले
`` लेिकन गड़बड़ी कहाँ से है षोषो इसका पता तो आपको लगाना ही होगा । हम भी आपको ऐसा नही छोड़े गे
वीरपतापिसंह जी कयोिक मामला अब और अििक उलझ गया है । हम भी चुप नहीं बैठेगे यह तो आप जानते ही है न ।
``चौिरी िवकमिसंहजी ने चेतावनी दे ते हुए कहा।
`` सर हम जानते है िक आप भी पुिलस मे डीएसपी रह चुके है ।कानून कायदे आप अचछी तरह से जानते है ।
हम वादा करते है िक हम केस की तह तक जाने की कोिशश करे गे।``वीरपतापिसंह जी बोले और साथ ही केस की तह
तक जाने का आशासन दे दरोगा से बोले-
`` िजतनी जलदी हो सके डा.बेनजी के साथ हिर को शहर के असपताल ले जाओ । भूरा काका तुम भी इनके
साथ शहर के असपताल जाओ। हम हिर के इलाह की पूरी वयवसथा करते है ।``
वीरपतापिसंह जी ने चौिरी कमलिसंह और चॉ्ैिरी िवकमिसंह जी को नमसते िकया और चल जीप मे बैठकर चल
िदए ।
गाँव के बचचे रासते से होकर वे जीप मे चले जा रहे थे। सहसा उनहोने दे खा एक लड़की बदहवाश दौड़ते चली
आ रही है ।उलझे हुए से उसके बाल और असत-वयसत से उसके कपड़े । दो-तीन बचचे भी उसके साथ मे दौड़ रहे है । उन
सब को बदहवाश स
दौड़ते आते दे ख वीरपतापिसंह ने जीप रोकी --
`` ये लड़की...रको...रको.....इस तरह कयो भागे जा रहे हो षोषो``
`` आपने हमसे कहा षोषो`` रािा रक कर बोली । वह रक गई । वह हांपने लगी।बचचे लोग भी हांप रहे थे।
`` इस तरह कयो दौड़ रही हो तुम........कया नाम है तुमहारा....िकसकी बेिी हो षोषो`` एक साथ ढ़े र सारे पश
िकए वीरपतापिसंह जी ने। थोड़ी दे र तक दम लेकर बोली-
`` आप पुिलस काका है न......म.....म....मै.......िरमदास महाजन की बेिी रािा हूँ ।
वो...........वो..........नकाबपोश..........मुझे..``
`` वह तो हिर था..............``
`` नहीं हिर नहीं...उसे तो उस बदमाश इतने ज़ोर से थपपड़ मारी थी िक उसके िसर से खून......``
`` िसर पर चोि....तुम ठीक कहती हो......चलो बेिी घबराओ नहीं....मै तुमहे घर पहुँचा दे ता हूँ ...असल मे
तुमहारे अपहरण की रपि हमे िमली थी । हम अभी हिर को दे ख आए है वह कामा मे है और इलाज के िलए शहर के
असपताल भेज िदया। तुम िचनता मत करो ।अचछा बचचो अब तुम जाओ। तुम लोगो ने बहुत अचछा काम िकया।
शाबाश बचचो शाबा्ाश....``
वीरपतापिसंह, रािा को जीप मे िबठा िलया ।
00
रािा के अपहरण से चौिरी कमलिसंह और उनकी पती अनुसूया बहुत आहत हो गए।उनहोने कलपना नहीं
की थी िक कभी ऐसा भी हो सकता है । चौिरी बहुत िचिनतत थे वे अभी थाने जाने के िलए िनकलनेवाले थे।अनुसूया
बोल पड़ी-
`` सुनो जी ! भूरा के लड़के हिर पर दामाद ने जो आरोप लगाया है , वह बेबुिनयाद है । इससे और अििक
िवकि िसथित कया हो सकती है । कम से कम दामाद जी ने यह सोचा होता िक हिर ऐसा कयो करे गा षोषो``
`` लेिकन बाबू जी, जीजाजी, हिर और भूरा के पीछे इस तरह हाथ िोकर पड़ने से संगामिसंह का चुनावी
माहौल गड़बड़ा जाएगा। जो बात संगामिसंह के पक होनेवाली होगी वह भी नहीं हो पाएगी।``नीलमिसंह बोले
``दामाद जी जो कुछ कर रहे है ,ठीक नहीं कर रहे है ।हिर के िसर पर भारी चोि के कारण वह दो िदनो से अचेत
है ।कॉमामे है ।वह ऐसी िसथित मे रािा का अपहरण कैसे कर सकता है षोषो यह सोचने का िवषय है ।``
चौिरी कमलिसंह िवचारते हुए बोल रहे थे । अभी वे बात कर ही रहे थे िक थानेदार वीरपतापिसंह ,रािा के साथ सीिे
बैठक मे आ गए। रािा रआंसी सी अनुसूया के गले िलपि पड़ी और िससक-िससककर रोने लगी। अनुसूया उसके िसर
पर हाथ फेरती हुई बोली-
`` रािा बेिे ! कहाँ थी तुम षोषो हम सब लोग परे शान हो रहे थे ।``
`` हाँ बेिे रािा षोषो तुम कहाँ रही अब तक । हम सब लोग परे शान हो रहे थे षोषो``चौिरी ने भी बड़े पयार से
रािा से पश िकया तो रािा िफर रोने लगी।बोली-
`` नानाजी ,न जाने कौन थे वे लोग ।सब के सब नकाबपोश मे थे । लेिकन एक नकाबपोश पहचान मे आ रहा
था ।``
``एक नकाबपोश पहचान मे आ रहा था षोषो मतलब.....हिर था षोषो``चौिरी चौक पड़े
`` नहीं नाना जी.....वह िकशन काका जैसा लग रहा था ।वही ऊँची पूरी कदकाठी ,ऊँचा सीना और ऊँचा माथा
,वह मजबूत हाथ और रौबदार मूँछे....मुझे अभी तक याद है । उस िदन बैठक मे भी मेरे बाबा के साथ मे िकशन काका थे
न....शायद आपको याद होगा ।``रािा िबना संकोच के कहीं जा रही थी ।वीरपतापिसंह बड़े गौर से रािा की बाते सुन रहे
थे।
`` िकशन ! हमारे दामाद का अंगरकक िकशन ! लेिकन वह ऐसा कयो करे गा षोषो``चौिरी को आशयम हुआ ।
`` िकशन ! िरमदासजी का अंगरकक ।`` वीरपतापिसंह बाले
``िकशन ! हमारे जीजाजी का अंगरकक ``नीलमिसंहजी भी चौके
`` अब माज़रा समझ मे आया ।`` अनुसूया जी,रािा को गले से लगाते हुए बोली
`` थानेदार वीरपतापिसंह जी ! आप शीघ ही िकशन को िगरफतार कर सारी हकीकत पता लगाओ ।`` चौिरी
कमलिसंह ने मामला समझते हुए शीघ ही थानेदार से कहा ।
`` मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है ।मै आज ही िकशन को िगरफतार कर जांच करवाता हूँ। अचछा नमसकार ।
मै चलता हूँ।आपको शीघ ही जांच की सूचना दे ने की कोिशश करता हूँ।``वीरपतापिसंह जांच का आशासन दे ते हुए
शीघ ही चल िदए।

उनहोने िबना िवलमब िकए िकशन और उसके सािथयो को िगरफतार कर थाने ले गए । िकशन िसर झुकाए
थानेदार के सामने खड़ा हो गया ।
`` तो िकशन , तूने ही भूरा के मकान को बीस बरस पहले आग लगाई थी । भूरा पर तूने ही हमला िकया था
और अब रािा का अपहरण भी तूने ही िकया था ........( चीखते हुए बोले) सच है षोषो`` वीरपतापिसंह , िकशन पर
गरजा।
`` हाँ थानेदार साहब । लेिकन हम ठहरे नौकर । मािलक की जी हुजूरी करना हमारा कतवमय है ।``
`` कौन मािलक ।िकसका मािलक षोषो`` वीरपतापिसंह िफर गुससे मे आ चीख कर बोले
`` हमारा मािलक सरकार । सेठ िरमदास महाजन और उनका बेिा संगामिसंह चौिरी ।`` िकशन करबद हो
बोला
`` हरामी ! कुते ! तू झूठ बोलता है । तूने मािलक की बेिी का अपहरण िकया है । कोई अपनी ही बेिी का
अपहरण कयो कराएगा । बदमाश ! नमक हराम !! बनद कर दो कुतो को । जेल की हवा खाएंगे तब पता चलेगा
हरािमयो को` ।`` `वीरपतापिसंह तीनो को पीिता है और दरोगा के हवाले कर दे ता है । वीरपतापिसंह ने िकशन की बातो
पर िवशास नहीं िकया ।
िरमदास जी ने इस तरह काम िकया, िजस तरह िकसी के कांिे पर बनदक
ू रखकर िनशाना सािना । िनशाना लग
गया तो सवयं जीत गए और िनशाना चूक गया तो िजसके कांिे पर बनदरू रखी है ,उसके िसर पर हार की िजममेदारी
ओढ़ दी जाती है । िरमदास जी ने ऐसा ही िकया । वे सवयं तो दरू रह गए िकनतु िकशन और उसके तीनो सािथयो को
हवालात मे डाल िदया गया । कमम िकया िकसी ने और उसके पिरणाम अनय िकसी को िमल रहे है । लेिकन कहा गया
है िक कुदरत की लाठी जब चलती है तो वह िदखाई नहीं दे ती । लोक वयवहार मे कहा गया है िक जब गीदड़ की मौत
आती है तोवह शहर की ओर भागता है ।शहर मे जाने पर कया गीदड़ की मौत होती है षोषो यह तो कभी दे खने मे नहीं
आया िकनतु लोकोिि कहीं न कहीं सही असर करते िदखाई दे ती है ।
रािा का रहसयमय ढं ग से अपहरण हो जाना और उसका िफर रहसयमय ढं ग से वापस आना , गाँव-समाज
के लोगो को अजीब से लगा । यकायक रात मे रािा का गायब हो जाना । दस
ू रे िदन सारे गाँव-समाज मे आग की तरह
यह खबर पहुँच गई।हिर पर रािा के अपहरण का आरोप लगाना ।हिर का 48 घणिो से कॉमा मे होना । अनायास रािा
का लौि आना । सारी रात िरमदास महाजन और संगामिसंह का गायब रहना और अब िकशन और अनय लोगो को
िगरफतार कर हवालात मे बनद करना ,ये सारी घिनाएं सीिे िरमदास महाजन की ओर इशारा करती है । यह तथय
गाँव-समाज का पतयेक सदसय समझने लगा । िीरे -िीरे यह खबर सारे गाँव-समाज मे फैल गई। गाँव-समाज के लोगो
का झुणड दे खते ही दे खते िरमदास महाजन के मकान के आसपास एकत हो गयाऔर सारे गामीण नारे लगाने लगे-
`` िरमदास महाजन .....``
`` हाय....हाय....हाय....हाय...``
गामीण िरमदास महाजन के मकान पर पतथर फेकने लगे। कोई दरवाजे पर पतथर फेकता है । कोई मकान की छत
पर पतथर फेकता है ।कोई कुछ करता है तो कोई कुछ करता है । चौिरी कमलिसंह ,चौिरी नीलमिसंह ,गोपालिसंह और
चौिरी िवकमिसंह को जैसे ही पता चलता है वे तीनो शीघ ही आ गए। तैश मे आई भीड़ को दे ख वे भी सहम गए ।
सोचने लगे , अब तो गामीणो की इस भीड़ को िनयंितत करना बहुत ही किठन है । चौिरी कमलिसंह ज़ोरो से चीखे-
`` भाईयो यह शोर कयो हो रहा है षोषो शानत हो जाओ । मै कहता हूँ शानत हो जाओ ।``
गामीणो का शोर थम गया िफर भी एक गामीण ने नारा लगाया -
`` िरमदास महाजन ................!``
`` चोर है ...............चोर है ।`` समवेत सवरो मे गामीणो ने नारा लगाया ।``
`` शानत शानत भाईयो । िकसी पर आरोप लगाना और सज़ा दे ना हमारा काम नहीं है ।