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लेखक

मोहन ितवारी आननद

1857 की कािनत और आजादी के दीवाने

अनुकमिणका
कमाक िवषय वसतु

2. महारानी लकमीबाई
3. तातया टोपे
3. पेशवा नाना साहब
4. वीरागना झलकारी
5. महाराणा - बखतावर िसंह
6. मंगल पाणडेय
7. बीरागना मालती बाई लोधी
5. अजीम उलला खा
6. बहादुर शाह जफर
ृ 7. भीषमाचायर वीर कुँवरिसंह
8. मौलवी- अहमद शाह
9. बेगम हजरत महल
10. मुहममद वखत खा
11. वीर नारायण िसंह
12. सरसवती बाई लोधी
13. वीरागना अवंती बाई
14. कुँवर चैन िसंह
15. रानी गजमाला
16. रंगो बापूजी गुपते
17. सूरज पसाद िसंह
18 उदीराम
19. ठाकुर िकशोर िसंह
20 सेठ अमरचंद बािठया
21 नाहर िसंह
23. ठाकुर रणमत िसंह
24. मैना
25. नरपित िसंह
26. िरचडर िविलयमस
27. शंकर शाह
28. सआदत खा
29. अज़ीज़न बाई
पाकथन

भारतीय इितहास शिकतशाली राजवंशो के उतथान पतन की कहानी है। िकनतु दुभागय
सदैव ये रहा िक यहा कभी पूणर राजनीितक एकता सथािपत नही रही। िहनदू काल मे सबसे
शिकतशाली सामाजय मौयो का तथा मुिसलम काल मे मुगलो का रहा िफर भी समपूणर भारत मे
एककत पभुसता िकसी एक की कभी सथािपत नही हुई। हा कुछ सुदरू दिकणी राजयो को छोड़
िदया जाय तो मुहमद िबन तुगलक तथा औरंजगजेब का शासन काल समपूणर भारत पर
पभुसतासीन कहा जा सकता है। अगर समपूणर भारत एककत िकसी की सता मे रहा है तो वह
थी अँगेजी सता।
भारतीय संसकृित से पमािणत हो चुका है िक भारत के आिद िनवासी दिकण मे कृषणा और
कावेरी निदयो के वेिसन मे बसे लोग थे िजनहे दिवड़ कहा गया। दिवणो को भारत का आिद
िनवासी माना गया। कुछ िवदेशी जो िहमालय की ओर से उतर पूवर की घािटयो मे मधय एिशया से
आये थे उनहे आयर माना गया। आयो ने पंजाब तथा गंगा जमुना के िकनारे बसे उतरी भारत पर
अिधकार कर िलया। कालानतर मे इस केत का नाम आयावतत रखा गया। कुछ िवदानो के
मतानुसार आयर भारतीय मूल के िनवासी थे िकनतु बहुमत इस पक मे नही है। िसकनदर के
आकमण के पूवर तक भारत पर अनय िकसी िवदेशी के आकमण या अिधकार का उललेख नही
िमलता है।
यूनािनयो के बाद भारत मे आने वाले दसू रे पमुख िवदेशी शक थे। शक मधय एिसया का
खानाबदोश कबीला था। शको का आगमन दस ू री शताबदी ईसापूवर मे पारभम हुआ और पंजाब
मथुरा तथा कािठयाबाद मे इनके राजय सथािपत हुए।
शको के बाद ईसा की पथम शताबदी मे मधय एिशया की दस ू री खानाबदोश जाित यूची
भारत मे आई। यूची कबीले का कुषाण वंश सवािधक पिसद हुआ।
पाचवी छठवी शताबदी मे मधय एिशया के पठारो मे रहने वाले लोग िजनहे हूण कहा गया,
भारत मे आए। उनहोने आयो से समपकर बढ़ाकर भारत मे अपनी बृिद सथािपत की। हूण गौरवणर
के लमबे और सुनदर लोग थे। वतरमान के राजपूत, जाट तथा गूजर आिद इनही हूणो की नसल के
माने जाते है।
मकदिू नया के शासक िसकनदर ने 326 ई.पू. भारत पर आकमण िकया। उस समय भारत
कई छोटे-छोटेराजयो मे बँटा था। इन राजयो मे आपसी फूट
थी तथा एक दस ू रे से लड़ते रहते थे।
यही आपसी फूट िसकनदर की िवजय का असली कारण बनी। तकिशला के
राजा ने िसकनदर का सवागतकर उसका साथ िदया था िकनतु झेलम और िचनाव के मधय िसथत
राजय के राजा पोरस ने िसकनदर की आतमसमपरण की माग को ठुकराकर युद की घोषणा कर
दी। यदिप पोरस ने बड़ी बहादुरी से युद लड़ा िकनतु िसकनदर की भारी सेना के सामने वह िटक
नही पाया। कहा जाता है जब िसकनदर ने बनदी बने पोरस से पूछा तुमहारे साथ कैसा वयवहार
िकया जाय। पोरस ने कहा, जैसा एक राजा दस ू रे राजा से करता है पोरस की इस बहादुरी से
पभािवत होकर िसकनदर ने पोरस को आजाद कर उसका राजय लौटा िदया तथा पुरसकार मे
कुछ और पदेश उपहार सवरप भी िदए।
मौयरकाल (322-185 ई.पूव)र को भारतीय इितहास का सवणरयुग माना गया है। मौय
राजवंश के संसथापक चनदगुपत मौयर ने चाणकय की सहायता से ननद राजवंश को राजय सता से
हटाकर (322 ई.पूवर) मगध के राज िसंहासन पर कबजा िकया था। िसकनदर के सेनापित
सेलयूकस ने चनदगुपत पर (303 ई.पूवर) आकमण कर िसकनदर की सता वापस पापत करने का
पयास िकया िकनतु चनदगुपत ने उसे बुरी तरह से परािजत कर िदया। सैलयुकस को मजबूरन
संिनध करनी पड़ी तथा अपनी बेटी कानेिलया का िववाह चनदगुपत से करना पड़ा। नबरदा से
लेकर समपूणर उतर भारत तथा अफगािनसतान उसके राजय मे था।
चनदगुपत के बाद उसका वेटा िबनदुसार (298-273 ई.पूव)र तथा िबनदुसार के बाद उसका
पुत अशोक (273-232 ई.पूवर.) के बाद उसके पुत तीवर तथा कुणाल के राजयो का उललेख
िमलता है िकनतु मोयरवश ं का अिनतम शासक बृहदथ िजसे उसी के सेनापित पुषयिमतशुंग ने (185
ई.पूवर) मार डाला था।
मौयर वंश के बाद पुषयिमत शुंग ने राजय चलाया। शुंगवंश मे दस राजा हुए िजनहोने 112
वषोZ तक शासन िकया। इस राजवंश का 73 ई.पूवर मे अनत हो गया।
शुंगवंश का अिनतम राजा देवभूित था। उसके मंती वसुदेव कणव (बाहण) ने देवभूित को
मारकर सता पर कबजा कर िलया था। कणव राजवंश ने 45 वषर तक राजय िकया। आनधवंश के
दिवड़ राजा ने 28 ई.पू मे कणव राजवंश के अिनतम राजा को सता से हटाकर आनध राजवंश की
सता सथािपत की थी। इस वंश मे 30 राजा हुए िजनहोने 450 वषोZ तक राजय िकया। सन 225
ई. मे आनध राजवंश का पतन हो गया।
आनध राजवंश के बाद कुषाण राजवंश की सता रही। कुषाण राजवंश के बाद आया गुपत
काल। गुपत काल को भारतीय इितहास का सवणरयुग कहा

गया है।
गुपत काल का पथम शासक चनदगुपत (320 ई.) हुआ। चनदगुपत बहुत पतापी राजा था,
उसकी सन 330 ई. मे मृतयु हो गई। चनदगुपत के बाद उसका बेटा समुदगुपत गदी पर बैठा।
समुदगुपत भी अपने िपता के समान पतापी एवं जनिपय राजा हुआ। समुदगुपत के बाद उसका पुत
चनदगुपत िदतीय (375-413 ई.) राजा बना। चनदगुपत िदतीय को ही िवकमािदतय कहा जाता था।
िजसके उजजैन के अनेको िकससे पचिलत है। चनदगुपत िदतीय ने 38 वषर शासन िकया। इसी के
शासनकाल मे चीनी याती फाहान भारत आया था।
चनदगुपत िदतीय के बाद उसका पुत कुमार गुपत (पथम) (413-455) ई. उतरािधकारी बना
और उसने 40 वषर तक शासन िकया। कुमार गुपत की मौत के बाद उसका पुत सकनदगुपत (455-
467 ई.) 455 ई. मे राजा बना। सकनदगुपत के शासन काल मे हूणो ने आकमण िकये। सकनदगुपत
गुपतवंश का अिनतम शासक था। इसके बाद गुपत वंश िछन िभन हो गया।
हूणो ने कुमार गुपत के शासन काल मे आकमण शुर कर िदए थे िकनतु लगभग 500 ई.मे
तोरमन ने मालवा मे अपना राजय सथािपत कर िलया। तोरमन के बाद उसका पुत िनिहरकुल
502 ई. मे गदी पर बैठा। 540 मे उसकी मृतयु के साथ ही हूणो के शासन का अनत हो गया।
मालवा के राजा यशोवमरन ने हूण शासक िमिहरकुल को हराकर मंदसौर मे अपनी
राजधानी बनाई थी।
गुपतवंश के पतन के बाद छठी शतावदी मे भारत मे कोई सवोचच सता नही रही बिलक कई
छोटे छोटे राजय बन गए जो आपस मे लड़ते रहते थे िकनतु इन राजाओं ने हूणो से युद करके
उनके अिसततव को समापत कर िदया था।
गुपतवंश के बाद यिद कोई पतापी राजा हुआ है तो वह था हषरवधरन (604-64 ई.)। उसने
अपने बड़े भाई राजयवधरन की मालवा एवं बंगाल के राजा से िमलकर धोखे से हतया करवा दी
तथा थानेशर का राजा बना। हषरवधरन ने लगातार युद कर अपने राजय का िवसतार िकया।
हषरवधरन का राजय लगभग सारे भारत मे फैल चुका था। हषरवधरन के कायरकाल मे चीनी याती
हेेन साग
( खान चवाग ) 630 ई. मे भारत आया था जो 15 वषोZ तक भारत मे रहा था।
हषर की मृतयु सन् 647 ई. के बाद उसके एक मंती अजुरन ने िरकत िसंहासन पर कबजा
कर िलया। जो ितबबती और नेपािलयो से युद करते हुए बंदी बना िलया गया और चीन भेज
िदया गया।
हषरवधरन की मृतयु 647 के बाद राजपूतो का उदय हुआ। िजनमे चौहान, पिरहार, पँवार
(परमार) और सोलंकी (चालुकय) आिद िवदेशी जाितया आती है िजनहे टॉड़ने सीिथपन
(खानाबदोश) कहा जाता था। राजपूत वंशो मे कनोज के गुजरर पितहार िजनमे राजा िमिहर भोज
बड़ा पतापी हुआ िजसने (836-885 ई.) तक शासन िकया।
कनोज मे ही गयारहवी सदी मे गहरवार राजवंश की सथापना हुई िजसमे चनददेव
गोिवनदचनद तथा जय चनद जैसे पतापी राजा (सन्1100 से 1194 ई.) तक हुए।
बुनदेल खणड मे चनदेल वंश के राजाओं यशोवमरन, धंग, कीितरवमरन, तथा परमाल हुए
िजनहोने 950 ई. से 1182 ई. तक शासन िकया। परमाल के शासन काल मे आला ऊदल नामक
वीर योदा थे िजनहोने अनेको लड़ाइया लड़ी। पृथवीराज चौहान ने परमाल को सन् 1182 ई. मे
हराया था।
मालवा मे परमार (पंवार) राजाओं ने राज िकया। परमारो मे सबसे पतापी राजा भोज
(1018-1060 ई.) हुआ िजसने भोपाल बसाया था।
इनके अलावा पाल राजवंश मे धमरपाल, मिहपाल रामपाल हुए। सेन राजवंश मे सामनत
सेन, िवजय सेन, बललालसेन लकमण सेन आिद 1158 से 1199 तक हुए िजनहोने बंगाल मे शासन
िकया।
अजमेर मे चौहान वंशीय राजाओं का राजय था िजनमे पृथवी राज चौहान बड़ा बहादुर
हुआ। उसने कनौज के जयचनद की बेटी संयोिगता का हरण कर बलात िववाह िकया तथा
चनदेल राजा परमाल तथा मुसलमान आकमण कारी शहाबुदीन गोरी को हराया था। पृथवी राज
चौहान ने िदलली पर कबजा कर िलया था।
चेिद मे कलचुिर राजा, तथा रीवा मे बघेल राजवंश की सता थी।
यह समय भारत के इितहास का सबसे बुरा समय माना गया। देशीराजा एक दस ू रे से लड़ते मरते
रहे तथा अपनी शिकत को कीण करते रहे।
सन् 1000 ई. मे महमूद गजनवी ने भारत पर पहला आकमण िकया। यह आकमण भारत
पर पारंिभक मुिसलम आकमण था। महमूद गजनवी
सन् 997 ई. को उसके िपता सुबुकतगीन की मृतयु के बाद वह गजनी का
उन िदनो भारत की अथर वयवसथा उचचतम् सतर की थी। गजनी भारत मे धन कमाने की
िनयत से आया था। इितहासकारो का मत है िक उसने सन् 1000 से 1027 ई. तक सतह बार
भारत पर आकमण िकये। उसका पथम आकमण 1000 ई. पेशावर के राजा जयपाल से पारमभ
होकर अिनतम सतहवा सन् 1027 ई. मे मुलतान के जाटो पर जाकर समापत हुआ। उसने भारत से
अपार समपित पापत की।
महमूद गजनवी की मृतयु के बाद गजनी वंश का अनत होने लगा सन् 1173 ई. मे
गयासुदीन ने गजनी पर अिधकार कर िलया तथा अपने भाई मुईजुदीन को गजनी का शासक
बनाया। यही मुईजुदीन मुहममद गोरी के नाम से पिसद हुआ।
मोहममद गोरी ने भारत पर कई वार आकमण िकये उसने पहला आकमण सन् 1175 ई. मे
मुलतान िकया। मुहममदगोरी का अिनतम आकमण सन् 1204 ई. मे खवािरजम पर हुआ था।
मुहममद गोरी ने अजमेर के राजा पृथवीराज चौहान पर आकमण िकया तराइन के मैदान मे
सन् 1191 ई. मे भयंकर युद हुआ। गोरी की पराजय हुई। सन् 1192 ई. मे गोरी एक लाख बीस
हजार सैिनको के साथ िफर भारत पर आकमण करने आया तथा तराइन के मैदान मे िदतीय युद
हुआ। िजसमे पृथवीराज चौहान परािजत हुआ और पकड़ा गया। इसी के साथ राजपूत वंशो के
लगभग समसत राजय मुिसलम सता के अधीन हो गए।
भारत मे मुिसलम सता की सथापना कर मुहममद गोरी ने अपे सवािमभकत कुतुबुदीन को
भारतीय राजयो का गवरनर बना िदया और सवयं गजनी लौट गया।
सन् 1206 ई. मे कुतुबुदीन ऐबक ने भारत मे गुलामवंश की नीव डाली। गुलाम वंश ने
1206 ई. से 1290 ई. तक शासन िकया इनमे कुतुबुदीन ऐबक के अलावा इलतुतिमश, रिजया,
बलबन सुलतान हुए। इलतुतिमश के पुत अयोगय होने के कारण उसने अपनी पुती रिजया को
उतरािधकारी िनयुकत िकया था। रिजया ने सन् 1236 ई. से 1240 ई. तक शासन िकया। 13
अकटू बर सन् 1240 ई. को कुछ िहनदू डाकुओं ने उसकी हतया कर दी।

रिजया के वाद आरामशाह सन् 1240 -1242 ई. तक उसकी हतया के बाद
अलाउदीन मसऊदशाह सन् 1242 ई. से 1246 तक शासक रहा। उसको हटाकर 1246 ई. मे
नािसरदीन िदलली का शासक बना जो अपनी मृतयु 1266 ई. तक रहा। नािसरदीन की मृतयु 18
फरवरी 1266 ई. के बाद गयासुदीन बलबन शासक बना तथा 1287 ई. मे उसकी मृतयु हो गई।
बलबन ने अपने पोते कैकुसरो को उतरािधकारी बनाया था जो उसकी मृतयु के बाद सन् 1290 ई.
तक गदी पर रहा।

िखलजी वंश :

जलालुदीन िफरोजशाह िखलजी तुक कबीले का था। जलालुदीन ने बलबन के यहा
नौकरी कर ली थी। गुलामवंश के अिनतम शासक कैकुसरो ने उसे सर-ए-जनदर के पद पर
िनयुकत िकया था।
जलालुदीन ने कैकुसरो की 1290 ई. को हतया कर दी तथा सवयं शासक बन बैठा। जब
जलालुदीन 1290 मे गदी पर बैठा उस समय उसकी उम 66 वषर की थी।
जलालुदीन ने बड़ी वीरता के साथ कई लड़ाइया जीती िकनतु उसके भतीजे अलाउदीन ने
धोखे (1296 ई.) से उसकी हतया करवा दी तथा सवयं सुलतान बन गया। उसने गुजरात,
रणथममौर िचतोड़, मालवा, जालौर, मारवाड़ देविगिर, वारंगल, दारसमुद (मैसूर) मदुरा, आिद पर
िवजय पापत की।
सन् 1303 ई. मे मंगोलो ने भारत पर आकमण िकया िकनतु उनहे हार का सामना करना
पड़ा। सन् 1306 मे मंगोलो ने िफर आकमण िकया िकनतु अलाउदीन ने उनकी वह धुनाई की िक
वे दुबारा भारत की ओर देखने का साहस नही कर पाए।
तुगलक वंश- अलाउदीन िखलजी की मृतयु के वाद मुबारक शाह, और नािसरदीन खुसरो शाषक
बने। नािसरदीन खुशरो को गाजी मिलक हटाकर सन् 1320 ई. मे सवयं शासक बना। गाजी
मिलक की बाद मे गयासुदीन तुगलक के नाम से जाना गया िजसने भारत मे तुगलक वंश की नीव
डाली उसने सन् 1320 ई. से सन् 1325 तक शासन िकया उसकी मृतयु के बाद
उसका पुत मोहममद िबन तुगलक शासनारढ़ हुआ। उसने सन् 1325 ई. से सन्
1351 ई. तक शासन िकया। मोहममद िबन तुगलक की मृतयु (सन् 1351 ई.) के बाद उसका बेटा
फीरोजशाह तुगलक शासक बना और अपनी मृतयु सन् 1388 ई तक राजय करता रहा।

तैमूर का भारत पर आकमण

सन् 1389 ई. की 13 नवमबर को तैमूर भटनेर से चला तथा 17 िदसमबर 1389 ई. को
िदलली पर आकमण िकया। िदलली पर िवजय पापत कर उसने िदलली मे भयंकर रकतपात लूट
पाट की। उसने एक लाख िहनदुओं को मौत के घाट उतार िदया। िदलली के बाद उसने मेरठ
हिरदार, जमबू पर िवजय पापत की। 19 माचर 1409 को वापस लौटने के पूवर तैमूर ने िखज खा का
मुलतान लाहौर और दीपालपुर का गवनरर बनाया और सवदेश लौट गया। ििखज खा ने सैयद वंश
की नीव डाली तथा उसने सन् 1451 ई. तक राजय िकया।
1451 ई. मे बहलोल लोदी ने लोदी वंश की नीव डाली। 1489 ई. मे बहलोल की मृतयु के
बाद िसकनदर लोदी शासक बना तथा सन् 1517 ई. तक राजय िकया।
िसकनदर लोदी के बाद इबाहीम लोदी शासक बना। इबाहीम लोदी के शासन काल मे
बाबर ने आकमण िकया तथा पानीपत के मैदान मे घमासान युद के दौरान इबाहीम लोधी मारा गया
तथा 27 अपैल 1526 ई. को बाबर िदलली का बादशाह बन गया। बाबर ने भारत के देशी राजाओं
से कई लड़ाइया लड़ी तथा िवजय पापत की।
26 िदसमबर 1530 ई. को बाबर की मृतयु के बाद उसका जयेष पुत हुमायँून ू 30
िदसमबर 1530 ईत के गदी पर बैठा। हुमायूँ ने मंदसौर, माणडू , गुजरात, अहमदाबाद, कािलनजर,
खमभात, डयू तथा चमपानेर पर आकमण िकए और उनपर अिधकार कर िलया।

शेरशाह सूरी -

इनही िदनो अफगान अमीर शेरशाह भारत मे अपने राजय का िवसतार कर रहा था। जून 1539 मे
शेरशाह और हुमायूँ के बीच चौसा का युद हुआ िजसमे शेरशाह िवजयी हुआ। कनौज के िबलगाम
मे सन् 1540 ई. मे शेरशाह ने हुमायूँ को परासत िकया। हुमायूँ भारत से अफगािनसतान भाग
गया।
सन् 1551 मे शेरशाह की मृतयु के बाद उसका पुत इसलामशाह बादशाह बना। इसलाम
शाह की 1553 ई. मृतयु हो गई। हुमायूँ ने सन् 1555 ई. मे पुन: भारत पर आकमण िकया और 24
फरवरी 1555 ई. को लाहौर पर अिधकार कर िलया। 27 जनवरी 1556 को अकबर को मुगल
समाट घोिषत िकया गया।
इन िदनो िदलली पर िहनदू राजा हेमू का अिधकार था। अकबर ने पानी पत के युद सन्
1556 ई. मे हेमू को परािजत िकया तथा आगरा और िदलली, गवािलयर, जौनपुर, चुनार पर
अिधकार कर िलया।
अकबर ने भारत मे अपने राजय का िवसतार करने के िलए अनेको लड़ाइया लड़ी। 21
माचर 1561 ई. को बाजबहादुर को परासत कर मालवा पर अिधकार कर िलया। गोड़वाना की रानी
दुगाZ वती की सुनदरता तथा राजय का ऐशयर उसे खटका। उसने आसफ खा को एक िवशाल
सेना देकर गोडवाना पर आकमण कराया। 24 जून 1564 ई. को दुगावती युद मे लड़ते लड़ते
शहीद हो गई।
अिधकाश राजाओं ने अकबर की अधीनता सवीकार कर ली थी िकनतु मेवाड़ के राणा
उदयिसंह ने अकबर की अधीनता नही सवीकारी सन् 1576 ई. मे अकबर ने मेवाड़ पर आकमण
िकया। िजसमे राणा उदय िसंह को भागना पड़ गया। उदयिसंह की मृतयु के बाद महाराणा पताप
ने अकबर की अधीनता को कभी नही सवीकारा तथा हलदी घाटी मे भयंकर युद हुआ यदिप राणा
पताप परािजत हुए िकनतु पूरे जीवन मेवाड़ की आजादी के िलए लड़ते रहे। सन् 1605 ई. मे
अकबर की मृतयु के बाद उसका पुत जहागीर (1605-1627 ई.) गदी पर बैठा। वह बड़ा िवलासी
था उसके शासन मे वासतिवक शिकत नूरजहा के हाथ मे थी। जहागीर की मृतयु (1627 ई.) के
बाद उसका पुत शाहजहा (सन् 1627-1658 ई.) गदी पर बैठा। शाहजहा का शासन मुगलकाल का
सवणर युग कहा जाता है, िकनतु शाहजहा के अिनतम काल मे उसके बेटे ओरंगजेब ने उसे कैद
करके गदी हिथयाली (1658-1707 ई.)।औरंजगजेब ने बीजापुर, गोलकुणडा पर िवजय पापत कर
मराठो पर आकमण िकया िकनतु िशवाजी महराज के आगे उसकी एक न चली और उसे संिध
करनी पड़ी। अपने जीवन काल (1680 ई.) तक िशवाजी का महाराष सवतंत रहा।

अँगेजो का भारत मे पवेश :

मुगलकाल मे भारत की अथर वयवसथा काफी सुदृढ़ थी। पुतरगाली, डच, तथा अँगेज
वयापार करने की इचछा से भारत मे आए। सन् 1600 ई. मे अँगेजो ने वयापार के इरादे से ईष
इिणडया कमपनी का गठन िकया। तो डचो ने भी 1602 मे ईष इिणडया कमपनी बना ली। डच,
कालीकट के रासते, तथा अँगेज गुजरात मे सूरत के रासते से भारत आए।
इंगलैणड के राजा जेमस पथम ने एक पत िलखकर कैपटन िविलयम हॉिकनस को भारत के
बादशाह जहागीर के पास भेजा िजसमे भारत मे वयापार करने की अनुमित मागी। वह अगसत
1608 ई. मे सूरत मे उतरा। सन् 1612 ई. मे पाल केिनंग, सन् 1615 ई. िविलयम एड़वडर भारत
आया। सन् 1612 ई. मे जहागीर ने ईष इिणडया कमपनी को भारत मे वयापार करने की अनुमित दे
दी। अँगेजो ने 1612 ई. मे सूरत मे पहली वयापािरक कोठी सथािपत की। 1640 ई. सनत जाजर
(मदास) के िकले की भूिम खरीद ली तथा भारत मे सवतंत अडडा बना िलया। 1651 ई. मे हुगली
मे कोठी सथािपत की 1652 मे राजकुमार शुजा से बंगाल मे वयापार करने की अनुमित पापत
करली।
मुगल समाट औरंगजेब की मृतयु के बाद पातीय सूबेदार िछन िभन होकर सवतंत राजय
सथािपत करने लगे। ईसट इिणडया कमपनी भारतीय राजाओं के आनतिरक मामलो मे हसतकेप
करने लगी।
सन् 1739 ई. मे फारस (ईरान) के नािदरशाह ने भारत पर आकमण िकया। उसने िदलली
मे भारी कतले आम मचाया। वह लुटेरो की भाित धन दौलत बादशाह का ``तखते-ताऊज´´ नाम
िसंहासन, कोिहनूर हीरा, लूटकर ले गया।
बंगाल के नबाव िसराजुदौला 81751 ई.) ने अँगेजो को िनदेश िदए िक वे उनके आनतिरक
मामलो मे हसतकेप न करे तथा कलकता मे जो अँगेजो ने िकला िनिमरत िकया है उसे तोड़ दे।
उस समय कलकता मे अँगेज अफसर डेक पदसथ था उसने नबाब का आदेश नही माना।
नाराज नबाब ने कलकता पर चढ़ाई कर दी। अँगेजो से कलकते का िकला छीन िलया तथा
उनके वयापार पर पितबनध लगा िदए।
नबाब की राजधानी उन िदनो मुिशरदाबाद मे थी। डेक ने मुिशरदाबाद मे जाकर नबाब से
कमा मागी तथा बंगाल मे वयापार बहाल करने की अनुमित माग ली।
अँगेज ने कूिटनीित का सहारा िलया। नबाब के सेनापित मीर जाफर तथा धनी वयापारी
सेठ अमीचनद को लालच देकर अपने पक मे कर िलया तथा 23 जून 1757 ई. को नबाब पर
आकमण बोल िदया। मुिशरदाबाद के पास पलासी नामक सथान पर भयंकर युद हुआ। मीर जफर
की गदारी के कारण नबाब िसराजुदौला की हार हुई तथा िगरफतार करके उनकी हतया कर दी
गई।
सन् 1772 ई. मे अँगेजो ने िबहार के मुगल बादशाह आलम पर आकमण िकया। बकसर
नामक सथान पर युद हुआ। अँगेजो की जीत के साथ ईसट इिणडया कमपनी का बंगाल, गुजरात,
िबहार, उड़ीसा मे अिसततव कायम हो गया।
अँगेजो ने कलाइव को कलकता का गवनरर िनयुकत िकया तथा ईसट इिणड़ून नन
या
कमपनी के शासन का िवसतार करने लगे। कलाइव के आतंक की िशकायते हुई िजससे उसे
हटाकर सन् 1773 ई. वारेन हेिसटंगस को गवनरर जनरल बनाकर भेजा गया। उसने बनारस के
राजा चेतिसंह अवध की बेगमो, रहेलो और बंगाल के महाराज ननद कुमार पर भारी जुलम ढाये।
वािरन हेिटंगस के जुलमो की िशकायते इंगलेणड की संसद तक पहुँची। हेिटंगस को हटाकर उस
पर महािभयोग चलाया गया।
इसके बाद कानरवािलस िफर बंलेजली, हािडरग तथा डलहौली को गवनरर जनरल बनाकर
भारत भेजा गया। इनहोने भारत मे हड़पनीित चलाई। 1799 मे मैसूर के शेर टीपू सुलतान सन्
1818 ई. मे पूना के पेशवा व नागपुर के भोसले के राजय हड़प िलए। सन् 1843 ई. मे िसनध, सन्
1848 ई. मे िसख राजय कमपनी मे िमला िलए।
डलहौजी ने एक फ़रमान जारी िकया िक िजन राजा नबाबो की कोई सनतान नही है उनके
दतक पुत या िकसी और को वािरस नही माना जायेगा। उनके राजय कमपनी मे िमला िलए
जायेगे। इसी आदेश के तहत झासी, सतारा, तथा कुपबनध के नाम पर अवध के नबाव वािजद
अली शाह को सन् 1856 ई. मे िगरफतार कर राजय हड़प िलए।
नबाव िसराजुदौला से शुर हुई अँगेजो की हड़पनीित लगातार जारी रही िजससे समपूणर
भारत मे िवरोध की आग भड़क उठी। िवदोह का िवसफोट सबसे पहले िमदनापुर िजले के जंगल
महाल मे भड़का। हालािक अँगेजो ने िवदोह को दवा िलया िकनतु यह िवदोह अँगेजो के िवरद
िचनगारी सुलगाने का काम कर गया। खड़गपुर, वीर भूिम, वदरवान आिद के जमीदारो ने िवदोह
िकया।
बंगाल के सनयािसयो िमदनापुर िजले के ख्ून नन
़य नननन
ालदो के िवदोह हुए। बंगाल के
जिलयावाला बाग नरसंहार, बंगाल के बहािबयो का िवदोह, संथाल का िवदोह आिद घटनाओं ने
अँगेजो के िवरद आग भड़कायी। इनही दौरान बैरकपुर की छावनी मे सैिनको मे िवदोह भड़क
उठा। बहरामपुर के िसपािहयो ने चबीZ सने कारतूसो को लेकर बगाबत करदी।
रानी झासी लकमीबाई तथा िबढू र मे नाना साहब ने अँगेजो के िखलाफ खुलकर युद की
घोषणा करदी।
सन्. 1857 ई. तक समपूणर भारत मे कािनत की जवाला धधक उठी थी।
पसतुत कृित मे सन् 1857 ई. की कािनत के कारणो का उललेख करते हुए इस कािनत मे
भारत के िजन वीर बहादुरो तथा वीरागना मिहलाओं ने वतन की आजादी के िलए अपने पाणो की
आहुित दी उनके कृिततव पर पकाश डालने का पयास िकया गया।
झासी की रानी लकमीबाई की वीरता पर केिनदत ``वीरागना लकमीबाई `खणडकावय´
गोड़वाने की महारानी दुगावती के जीवन एवं कमर पर केिनदत नाटक ``बावन गढ़ की रानी, तथा
आजादी के महानायक नेताजी सुभाषचनद बोस के जीवन एवं कृिततव पर केिनदत ``नाटक मै
सुभाष बोल रहा हूँ´´ को पाठको ने सवीकारा और सराहा। पाठको की सनेिहल पितिकयो ने
सन् 1857 की कािनत और आजादी के दीवाने´´ कृित आपके हाथो तक पहँुचाने का मनोबल
िदया।
पसतुत कृित के सृजन मे मेरे नजदीकी सािथयो मे शी चनदभान `राही, डॉ. कृषणशंकर
सोनाने , अिनल िदवेदी, शीमती शारदा ितवारी, िच. अिमत, कुमारी िलली तथा शी िनवास जी का
सहयोग कभी भी नही भुलाया जा सकता। चूँकी इस कृित का समपूणर तानाबाना ऐितहािसक
पृषभूिम पर आधािरत है अत: इितहासकारो की धरोहर कृितयो का िजक करना भी आवशयक
समझता है।
इस कृित के सृजन का कायर कलपनातमक नही बिलक तथयातमक होने की बजह से
घटनाओं का ितिथवार बयौरा पापत करने के िलए इितहास को टटोलना पड़ा । पो. शीकृषण सरल
दारा िलिखत उनके कािनत कारी कोष तथा भारत के पाचीन, मधयकालीन इितहास को टटोलने
के िलए िजन इितहासकारो की कृितयो का सहयोग िमला उनका हृदय से आभारी हूँ।
पूणररपेण आशािनिन
ि ननन
वत हूँ िक यह कृित आपका आशीZ बाद एवं सनेह पापत करेगी।
इनही आशाओं मे।

´महारानी लकमीबाई

भारतीय सवतंतता संगाम का इितहास जहा वीर पुरषो की कुवािनयो से रंगा हुआ है ।
वही वीरागना नािरयो का गौरवगान सारा संसार एक सवर से करता है । ऐसी वीरागनाओं मे
महारानी झासी लकमीबाई का नाम अगणी है । महारानी लकमीबाई का जनम 13 नवमवर 1835 ई.
को मोरोपंत एवं भागीरथी की इकलौती संतान के रप मे हुआ था । इनका बचपन का नाम
मनुबाई था । मनु जब मात छ: बषर की ही थी, तब उनकी माता जी का सवगरवास हो गया था ।
मनु का लालन-पालन बाजीराव पेशवा की देख-रेख मे हुआ था । मनु बाजीराव पेशवा के पुत नाना
साहब के साथ ही पली -बडी थी । बाजीराव पेशवा मनु को अपने बेटे नाना साहब के समान ही
पयार करते थे । मनु बचपन से ही बडी नट-खट थी लोग इसे इसी सवभाव के कारण ``छबीली´´
कहा करते थे । मनु बचपन से ही मदाना खेलो मे रिच िलया करती थी । तीर चलाना
,घुडसवारी करना, भाला-बछी फेकना उसके िपय खेल थे ।
वह नाना साहब के समान कपडे पहनना तथा वयूह रचना मे अिधक रिच िलया करती थी ।
मनु का िववाह झासी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था । कुछ ही िदनो बाद रानी
झासी को एक पुत-रत पैदा हुआ, िकनतु रानी एवं झासी का दुभागय की राजकुमार मात तीन माह
के होकर ही सवगर िसधार गये । महाराजा गंगाधर राव, बेटे की मौत का सदा बदासत नही कर
पाये और कुछ ही िदनो बाद वे भी सवगरवासी हो गये । पहले पुत िफर पित की मौत से रानी अभी
उभर भी नही पाई थी, िक िफरंगी गवनरर जनरल लाडर डलहौजी ने झासी का कोई वािरश न होने
की बजह से झासी को अंगेजी राजय मे िमलाये जाने का फ़रमान जारी कर िदया । रानी िकसी
भी हालत मे झासी अगेजो को नही देना चाहती थी । रानी ने दामोदर राव को गोद लेकर झासी
का उतरा-
िधकारी घोिषत कर दया । िकनतु डलहौजी तो अनाथ हुई रानी के राजय को हड़पने का मन बना
चुका था । डलहौजी ने दामोदर राव को झाँून नन
स ी का उतरािधकारी मानने से इनकार कर
िदया । इतना ही नही डलहौजी ने सैनय शिकत के बल से अंगेजी राजय मे िमलाने के िलए झासी
पर चढाई कर दी । जैसे ही रानी को यह खबर िमली की अँगेजी फौजो ने झासी को घेर िलया
है। रानी ने फौरन ही उन सभी राजाओं को िजनके राजय डलहौजी ने हड़प िलये थे, खबर
भेजकर एकत कर अँगेजी सेना से मुकावला करने की योजना बनाकर यह ऐलान कर िदया, िक
रानी अपने जीते जी अपनी झासी मे िफरंिगयो को कदम भी नही रखने देगी।
सन् 1857 ई. तक अँगेजो के जुलमो से जनता तंग आ चुकी थी िकनतु नेतृतव के अभाव मे
िकसी ने भी िफरंिगयो के िखलाफ आवाज नही उठाई थी। अब िसथित बदल चुकी थी। रानी के
नेतृतव मे सभी असंतुष राजा एक साथ हो, डलहौजी के िवरद आवाज बुलनद करने लगे थे।
जब डलहौजी को यह जात हुआ तो वह आगबबूला हो उठा। उसने चारो ओर से झासी को घेर
िलया। रानी भी कम नही थी। उसने डटकर अँगेजी फौजो का मुकाबला िकया। घमासान युद
होने लगा अनेको राजाओं ने रानी को सहायता भेजी िकनतु अँगेजी फौजो की घेराबंदी के कारण
रानी को ऐन मौके पर सहायता न िमल पाने की बजह से रानी की सेना अँगेजी सेना के सामने
बहुत िदनो तक न िटक सकी। डलहौजी ने अपनी कूटनीित से रानी के कुछ गुपतचरो को अपनी
ओर िमलाकर महल मे पवेश करने का रासता पा िलया। िकनतु रानी की एक सहेली को इस बात
की खबर लग गई। उसने ततकाल रानी को सचेत कर िदया। रानी का घोड़ा बड़ा सवािमनी
भकत था। वह रानी को लेकर महल की भारी ऊँचाई की बगैर परवाह करे कूद गया और रानी को
बचाकर ले गया।
इधर अनेको राजा रानी की मदद के िलए तैयार थे ही रानी ने बड़ी बहादुरी से अँगेजी
सेना का मुकाबला िकया तथा अँगेजो के बड़े बड़े महारिथयो को मौत के घाट उतार िदया। रानी
ने दितया, कालपी, गवािलयर आगरा मे भारी तबाही मचाकर उनहे अपने कबजे मे ले िलया। अपनी
भारी पराजय से बौखलाये डलहौजी ने अपार सेना को एकत कर एक साथ हजारो सैिनको के
साथ रानी पर हमला बोल िदया। इस हमले मे रानी का घोड़ा घायल होकर सवगर िसधार गया।
रानी को घोड़े की मौत का दु :ख अपने पुत एवं पित की मौत के समान ही हुआ था।
रानी चारो ओर से दुशमन की सेना से िघर चुकी थी। िफर भी रानी ने अपना साहस नही
खोया। वह लगातार मार काट करती हुई आगे बढती जा रही थी । िकनतु रासते मे एक नाला आ
गया । रानी का नया घोडा अड गया और वह नाला पार नही कर सका। इतने मे अंगेजी सेना
वहा पर आ गई। रानी अकेले ही हजारो सैिनको से जूझती हुई घायल हो गई ।
अब रानी को अपनी मौत नजर आने लगी । रानी ने अपनी कुल देवी का समरण कर कहा,
मा आज झासी की लाज तेरे हाथ है । हे मा, जब तक मुझमे सामथरय रही मै ने तेरी सेवा के िलए
सब कुछ िकया,िकनतु अब मै असहाय होकर तुझसे आज पहली बार कुछ माग रही हूं । मैने पुत
एवं पित की मौत को बदासत िकया िकनतु तुझसे कोई िशकायत नही की। अकेले ही पूरी
िजनदगी अनेको िवपितयाँून झेलती रही। पर मा आज मै पहली बार कुछ याचना कर
रही हूं। मा मुझे और कुछ भी नही चािहये। जीते जी तो िफरंगी मुझे हाथ नही लगा पाया, िकनतु
मौत के बाद भी वह मेरी काया को न छू सके, यह आज तुझ पर छोडती हूं। रानी ने एक जोर की
पुकार लगाकर कहा जय कुलदेवी, जय झासी । जय भारत माता । जय भारत ।
यकायक एक अचमभा सा हुआ । रानी को सामने ही एक साधू खड़े िदखाई िदए। साधू
ने आकर रानी को सहारा देते हुए कहा बेटी तू िचनता मत कर। मै जो हूँ तेरे पास मेरे रहते तुझे
कोई हाथ भी नही लगा पायेगा। तू मेरी कुिटया मे चल । रानी ने संत जी से पाथरना कर िचता
तैयार करवाई और जीते जी अपने आप को आग की लपटो के हवाले कर िदया । जब तक
अँगेजी सेना वहा पहंच
ु ी । रानी राख हो चुकी थी । रानी के इस बिलदान पर दुशमन की सेना के
जवानो ने आँसू टपका कर शृदाजली। रानी झासी दारा सुलगाई गई सवतंतता की िचनगारी
लाख कोिशशे के बाद भी बुझ नही पाई। अनतत: िफरंिगयो को भारत छोडने को मजबूर होना ही
पडा ।
भारतीय सवतंतता संगाम का इितहास जब भी सन् 1857 ई की कािनत पर चचा करेगा,
रानी लकमीबाई की बहादुरी, देश भिकत एवं बिलदान का मुकत कणठ से गुणगान करना होगा।
आजादी की जो अलख रानी झासी से सुलगाई थी वह आजादी के रप मे सन् 1947 ई. मे
हमारे देश को पापत हुई।

तातया टोपे

पथम सवतंतता संगाम मे सन् 1857 ई. की कािनत उललेखनीय है। िजसके अमर कािनत
वीरो मे तातया टोपे का नाम सदैव सममान के साथ िलया जाता रहेगा।
तातया टोपे का जनम नािसक के पास एक छोटे से गाम येवले मे एक बामहण
पिरवार मे सन् 1814 ई. को हुआ था, इनके िपता जी का नाम पंिडत पाणडुरगं पंत था। वे बाजीराव
पेशवा िदतीय के दरबार के सममाननीय सदसय थे। इनका असली नाम `रघुनाथ´ था, लोग इनहे
पयार से `तातया´ कहा करते थे। तातया अपने िपता जी के साथ पेशवा जी के दरबार जाया करते
थे। जबसे पेशवा ने तातया को टोपी पहनाई तो वह टोपी मानो उनकी िचरसंगनी बन गई। तातया
सदैव टोपी पहने रहने लगे। इसी कारण से उनको लोग `तातया टोपे´ कहने लगे, जो बाद मे
उनका असली नाम बन गया।
सन् 1700 ई. से सन्1798 ई. के समय मे भारत के समाट िहनदू थे। अँगेजी ईसट
इिणडया कमपनी भारत मे वयापार करने के उदेशय से आई और अपने पैर फैलाने शुर कर िदए।
भारतीय राजाओं की आपसी फूट का लाभ उठाकर उसने राजनीित मे दखल देना शुर िकया और
सन्1805 ई.तक भारत का लगभग सारा पूवी िकनारा अपने अिधकार मे कर िलया।
भारत के मराठा शासक िशंद,े होलकर, गायकवाड़ और नागपुर के भोसले सभी
आपस मे एक दस ू रे के शतु हो चुके थे। अँगेज एक को अपने साथ िमलाता तो दसू रे पर
आकमण करता उसे जीतकर पहले को दबाकर अधीन कर लेता ऐसा करते करते सभी अगेजो
के अधीन हो गये। पेशवा बाजीराव िदतीय की कोई संतान नही थी, उनहोने नाना साहब को दतक
पुत के रप मे सवीकार कर िलया था। अँगेजो ने बाजीराव पेशवा पर आकमण िकया मजबूर
पेशवा ने अँगेजो से संिध करली तथा आठ लाख रपये की पेशन सवीकार कर कानपुर के पास
बृहावतर िबठूर मे रहने के िलए चले गए।
नाना साहब पेशवा तथा तातया टोपे का लालन पालन लगभग एक साथ ही हुआ।
दोनो एक दस ू रे से बहुत पयार और सममान करते थे।

लाडर डलहौजी ने समूचे भारत मे एक छत अँगेजी राजय कायम करने के इरादे से
राजाओं, नवावो के राज छीन िलए थे। अवध के नवाब वािजद अली शाह को गदी से उतारकर
कैद कर िलया। झासी की रानी लकमीबाई और उनके गोद िलए पुत दामोदर राव का राजय छीन
लेने तथा पेशवा नाना साहब की पेशन बनद कर देने से सारे अवध व बुनदेल खणड मे अँगेजो के
िखलाफ मोचा खोल िदया तथा `तातया टोपे´ को पधान सेनापित घोिषत कर पूरी कमान सौप दी।
अँगेजो की िवशाल सेना के िवरद `तातया टोपे´ ने अपनी बहादुरी और रणकौशल से अनेको
लड़ाइया लड़ी तथा िवजय पापत की।
उतर भारत के राजा, नवाबो तथा जागीरदारो ने अँगेजो के िवरद कायरयोजना
बनाकर 31 मई 1857 ई. को कािनत िदवस तय िकया। उस िदन रिववार पड़ने वाला था। सभी
अँगेज िगरजाघर मे इकटे होगे उन पर एक साथ हमला बोला जायेगा तथा एक साथ खतम कर
िदए जायेगे। िकनतु मेरठ छावनी के िसपािहयो ने कारतूस काणड को लेकर 6 मई 1857 ई. को ही
बगावत कर दी तथा 10 मई रिववार को िगरजाघरो मे गोरो का कतलेआम कर डाला। मेरठ को
आजाद घोिषत कर िदया। पूरे िहनदुसतान मे आग भड़क उठी। अँगेजी सेना ने भी हमले तेज कर
िदए। नाना साहब की आजा से तातया टोपे ने `िबठूर´ को आजाद घोिषत कर िदया। अँगेज सेना
ने उनहे िगरफतार करने का ऐलान िकया िकनतु बहादुर तातया ने अँगेजो के थी। यदिप नाना
साहब के पास बहवतर मे राजभवन था सुख सुिवधाऐं सेना आिद सब कुछ था िकनतु िजसके
पुरखे भारत के समाट रहे हो वह अधीनता की िजनदगी कैसे बदासत कर सकता है l
नाना साहब पेशवा के पास महान योदा, चतुर साहसी एवं सवामीभकत सेनापित के रप मे
तातयाटोपे, िवदान, देशभकत बुिदमान तथा पराकमी रंगोबापू जी तथा पितिषििन ननन

वकील अजीम उलला जैसे सलाहकार थे। नाना साहब ने भारत से अँगेजो का सामाजय समापत
करने हेतु बहवतर के महल मे तातयाटोपे, अजीमउलला तथा रंगोबापू जी के साथ बैठक कर एक
कायर योजना िनधािरत की तथा शपथ ली िक जब तक भारत से िफरंिगयो को बाहर नही कर
िदया जाता वे चैन से नही बैठेगे। नाना साहब ने रकत कमल हाथ मे उठाया यह रकत कमल
छतपित समभा जी राजा, जो धमर के िलए, धमर रकण के िलए,वीरता से अनेक यातनाएँ सहकर मर,
उनका हौतातमय था। रकत कमल िलए हाथ को ऊपर उठाकर उनहोने शपथ ली एक तीवर धविन
गूँज उठी ´´रकत कमल तुम कज़ली फेको िफर से जयोित चमकने दो।`` रकत कमल को तातया
टोपे, अजीम उलला तथा रंगोबापू जी ने अपने हाथो मे लेकर यही शपथ दोहराई।
यह सवातंतय का शपथ गृहण था। नाना साहब अंितम पेशवा थे। िहनदु पद पादशाही पद
की पितषा का दाियतव वंश परमपरा से नाना साहब पर ही था। वे अतयंत सवािभमानी थे। उनहे
अपने िपता बाजीराव पेशवा के साथ
अँगेजो दारा की गई बदसलूली िदन रात खटकती थी। डलहौजी का आंतक िदन
पितिदन बढ़ता जा रहा था। उसने नाना साहब की मुंहबोली बिहन लकमीबाई के राजय झासी को
हड़पने की चाल चली, लखनऊ के नवाब को गदी से हटा िदया। अयोधया, नागपुर, बुनदेलखणड,
रहेलखणड, बनारस, बंगाल मैसूर आिद राजयो पर हमले बोल बोलकर उनहे अपने कबजे मे कर
िलया थ। िहनदू एवं मुसिलम धमर वालो को इसाई बनाया जा रहा था। कारतूसो मे गाय और
सुअर की चबीZ िमलाई जा रही थी।
नाना साहब इन घटनाओं से उदेिलत हो उठे थे। इसिलए वे रण संगाम की िनिशत
रपरेखा के साथ सवदेश व सवधमर की रका हेतु कूद पडे़ूनन
। संपूणर भारत मे करािनत की
जयोित गई। रकत कमल एवं रोिटया गाव-गाव भेजी गई। नाना साहब ने उतर भारत, रंगोबापू जी
ने दिकण भारत तथा अजीम उलला ने भारत के बाहर, रस, िमश तथा यूरोप के अनय भागो मे
अँगेजो के िवरद पचार पसार िकया। तातयाटोपे ने सैनय शिकत को सुदृढ़ िकया। नाना साहब
पेशवा ने फकीर, मौलवी, बाहण, तापसी तथा सनयािसयो को इस अिभयान के िलए पेिरत िकया।
फैजाबाद के मौलवी अहमद शाह ने तो संपूणर भारत का भमण कर डाला तथा अँगेजो के
िवरद उतेजक माहौल बना िदया।
सवतंतता संगाम का िचनह रकत कमल एक सैिनक के हाथ से दस ू रे के हाथ मे पहुँचने
लगा। रकत कमल के सपशर करते ही सैिनक रोमािचत हो उठते थे।
नाना साहब के िवशासपात िवशेष दत ू भारत के कौने -कौने मे गए। िदलली से मैसूर तक
के सारे देशी राजाओं को कािनत मे सिममिलत होने के िलए आहान िकया गया। गंगाजल, रोटी
तथा कुरान को हाथ मे लेकर शपथ उठाई गई। इसका इतना तीवर असर हुआ िक लोगो ने अपना
सब कुछ कािनतकािरयो के िलए समपरण करना पारंभ कर िदया।
नाना साहब की संगठन कुशलता इतनी पबल थी िक अंगेज सेना मे
जो भारतीय सैिनक थे, वे भी अँगेजो से बगावत करने लगे।
नाना साहब पेशवा की पितभा महान थी। मंगल पाणडेय के बिलदान तथा कारतूसो मे
चबीZ काणड से सैिनको मे िवदोह हो उठा अँगेजो के दमन के िवरोध मे जुट गए ।
कानपुर अँगजो का बड़ा अडडा था। पेशवा ने ततकाल कानपुर पर आकमण कर गोरो
का शासतागार और कोष अपने कबजे मे कर िलया।
4 जून,1857 ई. को डलहौजी ने झासी पर आकमण कर िदया। नाना साहब ने तातया को
िवशल सेना लेकर रानी झासी की मदद को भेजा तथा सवयं ने कानुपर की बागडोर संभाली।
अँगेजो ने जगदीशपुर के कुँवरिसंह, लखनऊ के नवाब, झासी, सीतापुर आिद पर हमले बोल
िदए। जनरल नील ने कई गावो को आग लगा दी।
जब कानपुर से अँगेज सेना इलाहाबाद की ओर जाने के िलए 40 गावो पर सवार हो सती
चौराघाट से गंगा पार कर रही थी उसी समय उन पर हमला बोल िदया। गंगा काजल गोरो के
रकत से लाल हो गया। शेष बचे 125 गोरो को कानुपर के जेल मे बंद कर िदया गया।
28 जून,1857 ई. को नाना साहब ने कानपुर मे सवतंतता का पतीक ´जरी पटका´ धवज
फहराया। शूरवीरो का उिचत सममान िकया। िहनदु पद पादशाही का पुनरतथान िकया िकनतु
अँगेज शानत बैठने वाले नही थे। गंगा धारा हतयाकाणड से अँगेजो ने कानपुर पर घेरा डाल
िदया। नाना साहब ने कानपुर मे अचछी नाकेबदं ी कर ली थी। कई िदनो तक भारी युद हुआ।
इलाहाबाद से भी अँगेज सेना कानपुर आ गई। नाना साहब बुरी तरह से िघर गए थे। उनहोने
सूझबूझ से काम िलया और िवशासपात सैिनको सिहत कानुपर छोड़कर िबठूर पहुँच गए। अँगेजो
ने उनहे िगरफतार करने की योजना बनाकर िबठूर पर घेरा डाला। वे वहा से बच िनकले। अँगेजी
सेना ने जगह-जगह उनहे घेरने का पयास िकया िकनतु उनका कही सुराग न लगा।
भारत की आजादी के पथम संगाम की जवाला को भड़काने मे नाना साहब का
´रकत कमल` तथा रोटी की शपथ अँगेजो की तबाही का
सूतधार बना।
यदिप सन् 1857 ई. का संगाम अँगेजो ने कुचल िदया िकनतु उसी िचनगारी ने सन् 1947
ई. मे अँगेजो को भारत से खदेड़ िदया।

वीरागना झलकारी
आज़ादी के पथम सवतंतता संगाम ई. सन 185 ई. की महानायक झासी रानी लकमीबाई को
माना जाता है। नारी होकर रानी ने िजस बहादुरी के साथ अँगेजो से युद लड़ा उसकी सानी का
इितहास मे कोई दस ू रा नाम नही है। रानी जहा एक बहादुर वीरागना थी वही उसमे संगठन की
अिदतीय कमता था। रानी ने एक सशकत मिहला सैना का गठन िकया था। उनकी सेना मे
शािमल वीर नािरयो को वे अपनी सहेली के रप मे मानती थी। इनही वीर नािरयो मे झलकारी का
नाम सममान के साथ िलया जाता है।
झासी के पास एक गाव `भोजला´ है। इस गाव के एक कृषक थे ``सदोवािसंह´´।
सदोवािसंह की पती `जमुना´ देवी ने 22 नवमबर 1830 ई.को एक कनया को जनम िदया। सदौवा
िसंह सवयं एक वीर था, उसने अपनी बेटी को घुड़सवारी तथा असत शसत संचालन िसखाया
था। बेटी अभी छोटी ही थी िक जमुनादेवी का देहात हो गया। इकलौती संतान को सदौवािसंह ने
बेटा मानकर उसका लालन पालन िकया था। यह केत डाकुओं से पभािवत था। सदौवा ने अपनी
बेटी को एक सैिनक की भाित तैयार िकया था। इस वीर बेटी का नाम झलकारी रखा था।
झलकारी की वीरता की कई कहािनया है। सदौवािसंह ने अपनी वेटी का िववाह रानी
झासी की सेना मे तोपची वीर नवयुवक `पूरनिसंह´ कोरी के साथ िकया। पूरनिसंह ने अपनी पती
को रानी झासी से िमलवाया। रानी झलकारी से बहुत पभािवत हुई। रानी ने उसे मिहला सेना मे
िनयुकत कर िलया। झलकारी की सूझबूझ संगठन कमता, असत शसत संचालन तथा घुड़सवारी
की कुशलता ने उसे रानी के बहुत नजदीकी िवशास पातो मे बना िलया।
रानी झासी ने आपात कालीन युद पिरषद की बैठक बुलाई थी। झलकारी ने रानी से
िनवेदन िकया।
``बाई साहब, दुशमन भारी सेना के साथ हम पर घेरा डाल चुका है। हमारे सैिनक भी घट
रहे है। गदार िकले मे दुशमन को पवेश कराने की कोिशशे करते पकड़े जा चुके है। भगवान न
करे, आप पर कोई संकट आए। आपकी आजा से मै दुशमन को धोखे मे डालने के िलए आपका
वेश धारण करके एक छोटी सी टोली के साथ रहूँ। यिद महलो को छोड़ने का अवसर पडे तो मै
अपका वेश धारण कर अँगेजी सेना पर आकमण करँ। दशु मन मुझे आप समझकर पकड़ने के
िलए पीछा करेगा, तभी आप दस ू रे मोचे से सावधानी से िनकल जाइयेगा।`` रानी को झलकारी की
योजना बहुत पसंद आई िकनतु एक िमनट चुप रहने के बाद वे बोल पड़ी
नू
नन
``मै आपनी जान बचाने के िलए तुमहारी जान को जोिख़म मे डालूँ, यह मै नही कर
सकती।´´
``बाई साहब, झासी को, भारत माता को आपकी जररत है। मै रहूँ या न रहूँ कया फकर
पड़ता है िकनतु झासी के िलए राजकुमार के िलए आपका जीिवत रहना अतयनत आवशयक है।´´
झलकारी ने गंभीर मुदा मे कहा।
रानी ने झलकारी को अपनी छाती से िचपका िलया। आज पहलीवार उनकी आँखो से
नीर टपकते देखा गया। रानी ने तलवार ऊँची करते हुए कहा, ``िजस राजय मे आप लोगो जैसी
वीर नािरया हो जो अपने देश के िलए अपनी जान हथेली पर रखकर िनकल आई हो उस देश का
दुशमन बाल भी बाका नही कर सकता है।´´
रानी को झलकारी की योजना पसंद आई। उनहोने झलकारी को रानी बनकर ही युद
करने की सहमित दे दी तथा बफ़ादार सैिनको को समझा भी िदया िक कोई भिमत न हो।
झलकारी को युद मे रानी के वेश मे देख एक गदार ने पहचान िलया वह यह राज अँगेज को
नन
देेन े की कोिशश कर ही रहा था िक झलकारी ने अपनी तलवार से उसकी गदरन उड़ा
दी। अँगेजो ने झलकारी को घेरना चाहा। झलकारी ने गोली दाग दी। अँगेज सैिनक वही ढेर हो
गया।
गदारो की मदद से अँगेजी सेना महलो मे घुसने को सफल हो गई। अवसर आया िक
रानी को महल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। झलकारी ने अपनी योजनानुसार महल से िनकलने
का उपकम िकया। अँगेज सेनापित ने उसे रानी समझकर घेरा। झलकारी ने वीरता से उसका
सामना िकया। अँगेज को झलकारी ने उलझा रखा तब रानी महलो से सुरिकत िनकलने मे
सफल हो गई। अनत मे झलकारी पकड़ ली गई। अँगेज अफसर जनरल रोज झलकारी को
पहचान कर हका बका रह गया। वह बौखलाकर बोला, तू ने हमे रानी बनकर धोखा िदया हमारे
सैिनको की जान ली। रानी को भागने मे मदद की। मै तुझे छोड़ूगा नही।´´
``तू मुझे गोली मार दे। झलकारी ने दहाड़ते हुए रोज से कहा। अँगेज अफ़सर जनरल
रोज ने कहा, इसे बंदी बनाकर कडे़ून पहर मे रखा जाय। झलकारी को एक तंबू मे बंद कर
पहरा िबठा िदया गया। झलकारी अवसर पाकर रात मे भाग खड़ी हुई। सुबह होते ही जनरल
रोज ने िकले पर भयंकर आकमण िकया। उसने देखा िक वह तो एक तोपची के पास खड़ी है
तथा अपनी बंदक ू से गोिलयो की वषाZ कर रही है।
अँगेज जनरल रोज समझ गया िक यह वही औरत है यह पागल नही चालाक है। उसने
झलकारी का को पकड़ने के आदेश िदया। अँगेज सेना ने उसकी ओर गोला बारी की। तोपची
को एक गोली आकर लगी और िगर पड़ा। वह तोपची कोई और नही बिलक झलकारी का पित
पूरनिसंह कोरी था। पूरनिसंह को िगरता देख तोप झलकारी ने समहाल ली तथा अँगेजी सेना पर
गोला बरसाने लगी। उसने अँगेजो की भारी तबाही की।
जनरल रोज ने अपनी पूरी शिकत उसी पर झोक दी। अँगेजी तोप ने एक गोला उगला जो
झलकारी को लपेट ले गया। जय भवानी का नाद करते हुए इस वीर नारी ने अपने पाण बिलदान
कर िदए।
रानी झासी को िकले से सुरिकत िनकालने के िलए अपने पाणो की आहुित देने वाली वीर
नारी के बिलदान की खबर जब महारानी लकमीबाई को िमली तो उनहोने उसे अशुपूिरत शृदानजिल
दी।
भारत को आजादी िदलाने वाले अमर सेनािनयो मे वीरागना झलकारी का नाम सदैव
सममान के साथ समरण िकया जाता रहेगा।

महाराणा - बखतावर िसंह

मधय पदेश के धार िजले मे अमझेरा नाम का एक छोटा सा नगर है। 1857 के पथम
सवाधीनता संगाम के समय अमझेरा एक राजय था। वहा के राजा थे महाराणा बखतावर िसंह।
महाराणा बखतावर िसंह के पूवरज जोधपुर ( राजसथान ) के राठौर वंशीय राजा थे। मुंगल समाट
जहागीर ने पसन होकर इनके पूवरजो को अमझेरा का शासक बनाया था।
महाराणा बखतावर िसंह के िपता जी का नाम राव अजीत िसंह तथा माता जी का
नाम `रानी इनदुकुँवर´ था। अमझेरा बहुत बड़ा राजय था, िजसमे भोपावर और दतीगाव भी
सिममिलत थे।
पथम सवतंतता संगाम की आग भड़कने ही वाली थी िक िवदोह का पहला,
िवसफोट 29 माचर 1857 का बैरकपुर छावनी मे मंगल पाणडे ने कर िदया। िवदोह की आग मेरठ
िदलली के साथ साथ सारे देश मे फैल गई।
महाराणा बखतावर िसंह और इनदौर के महाराजा तुकोजीराव होलकर मे अचछी
िमतता थी। अँगेजो को इनकी गितिविधयो पर संदेह हुआ और उनहोने इन दोनो पर िनगरानी
रखने हेतु अपनी फौजी छाविनया सथािपत की । इनदौर मे एच.एम.डू रनड तथा भोपावर मे कैपटन
एिचसन को पॉिलिटकल एजेनट बनाकर भेजा।
बैरकपुर की घटना के तुरनत बाद महाराजा तुकोजीराव ने रेजीडेनसी पर तथा
महाराणा बखतावर िसंह ने भोपावर पर आकमण बोल िदया। सानदला के शी भवानी िसंह, तथा
दीवान गुलाबराव के नेतृतव मे एक सशसत सेना ने रात मे भोपावर पर आकमण िकया। अँगेजी
सेना मे मालवा के भील थे िजनहोने महाराणा बखतावर िसंह की कािनतकारी सेना का साथ िदया।
पॉिलिटकल एजेनट कैपटन एिचसन को अपने बचे खुचे सैिनको सिहत झाबुआ की ओर भागना
पड़ा। अमझेरा एक नागिरक मोहन लाल ने अँगेजी झंडा उतार कर अपनी िरयासत का झंडा
लगा िदया। महाराणा ने अजमेरा राजय को कमपनी के शासन से मुकत कर सवतंत घोिषत कर
िदया। राजा तुकोजीराव होलकर के हमले के कारण लेिफ्ननन ् नेन
ट ननन
ट डू रनड धबरा गया
तथा भागकर होशंगाबाद की छावनी मे पहुँच गया।
अँगेजो ने होशंगाबाद छावनी मे योजना तैयार कर 24 जुलाई 1857 ई.
भारी सेना के साथ कै. एिचसन को भोपावर भेजा । उसने कािनतकारी सेना के दीवान
गुलाबराव, कामदार, भवानीिसंह तथा िचमनलाल को कैद कर िलया तथा भोपावर मे पुन: एजेसी
सथािपत की।
10 अकटू बर 1857 ई. को महाराणा बखतावर िसंह ने पेशाबर एजेनसी पर हमला
बोला तथा भोपावर पर िफर कबजा कर िलया।
सरदारपुर मे अँगेजो की काफी बड़ी सेना थी। महाराणा की कािनतकारी सेना ने
सरदारपुर पर आकमण बोला िकनतु अँगेजो की सेना की तोपो के सामने सेना का िटकपाना
समभव नही था। महाराणा ने युद कौशल का कमाल िदखाया, एक टुकड़ी को नदी की ओर से
अँगेज सेना पर धावा बोलने को भेज िदया। राजगढ़ व धार के नागिरको ने महाराणा की
कािनतकारी सेना को मदद की । भारी घमासान युद हुआ िकनतु कािनतकारी सेना को िवजय
िमली।
िवजयी कािनतकारी सेना तथा महाराणा बखतावर िसंह का धार नरेश भीमाराव
भोसले ने जोरदार सवागत िकया। महाराणा बखतावर िसंह, राजा तुकोजी राव तथा नरेश भीमाराव
भोसले की कािनतकारी सेनाओं ने महू, मानपुर और मंडलेशर मे अँगेज छाविनयो पर आकमण कर
उनहे तबाह कर डाला।
ननन
लेिफ््ट नेनट
न डू रंड ने चालाकी से काम िलया तथा महाराणा बखतावर
िसंह से संिध का पसताव भेजकर आजमेरा को सवतंत राजय मान लेने का आगह िकया। महाराणा
बखतावर िसंह संिधवाता के िलए महू जा पहुँचे। डू रनड ने उनका जोरदार सवागत िकया और
उनके सममान मे कायरकम चलाए। एक िदन महाराणा बखतावर िसंह तथा उनके साथी नदी मे
सनानकर रहे थे िक अँगेजी सेना ने धोखे से उनहे िगरफतार कर िलया।
अँगेज सरकार ने नयाय का पूरा नाटक खेला। अनतत: 21 िदसमबर 1857 ई. को
महाराणा बखतावर िसंह उनके दीवान गुलाबराव, िचमनलाल और बशीर उलला खा को फासी की
सजा सुना दी गई। 10 फरवरी 1848 ई.को फासी का िदन तय कर िदया।
महाराणा बखतावर िसंह तथा उनके सािथयो को इनदौर के िसयागंज िसथत छावनी मे
असथायी कैद खाना बनाकर रखा गया तथा पूरी छावनी सीमा
पर फौजी गसत कायम कर दी गई िक कोई भी नागिरक उस ओर झाककर भी न देख
सके।
अँगेज नयायाधीश ने फासी देने के िनणरय मे फासी एक साथ न देकर एक एक करके देने
का आदेश िदया था, िजसपर िववाद उतपन हो गया। महाराणा के सािथयो की माग थी वे महाराणा
को फंदे पर लटकता नही देखना चाहते है। अत: महाराणा के पहले उन लोगो को फासी पर
चढ़ाया जाय। महाराणा का कथन था िक राजा होने के नाते फासी का हक पहले उनका है।
शासन ने तय िकया िक महाराणा बखतावर िसंह को फासी अनत मे दी जाय, िजससे वे अपने
सािथयो को मरते हुए देखकर उस वेदना का भी दंड भोगे।
10 फरवरी 1848 ई. को पहले महाराणा के सािथयो को िफर अनत मे उनहे फासी
पर लटका िदया गया।
पथम सवतंतता संगाम के इन अमर कािनतकारी शेरो ने भारत माता की जय
जयकार के नारो से आसमान को गुंजायमान कर मातृभूिम के िलए अपने पाण नयौछावर करके
अमर इितहास िलखा।

मंगल पाणडेय

भारतीय पथम सवतंतता संगाम सन् 1857 ई.का पथम गोली दागकर शुभारंभ करने वाले
अमर कािनतवीर सेनानी पंिडत मंगल पाणडेय का जनम उतर पदेश के एक गरीब बामहण पिरवार मे
सन् 1831 ई. मे हुआ था। पिरवार के भरण पोषण मे िपता का सहयोग कर सके इसिलए मंगल
पाणडेय ने अँगेजी सेना मे नौकरी करली। अपना काम अचछा, ना जागीर की चाहत ना पशंसा का
मोह। सवभाव से सीधा, सवािभमानी जनम और से कमर. बामहण था।
लाडर डलहौजी की हड़प नीित से भारतीय राजाओं का खून खौल उठा था।
अवध के नबाव वािजद अलीशाह को गदी से उतार कर कैद करने , झासी की रानी लकमीबाई के
गोद िलए पुत को उतरािधकारी न मानते हुए झासी को अँगेजो के अधीन घोिषत करना, पेशवा की
पेशन बंद करने के साथ साथ जबरन िहनदू-मुसलमानो को ईशाई बनाये जाने के कारण िवदोह की
आग धधक रही थी। 23 जून 1857 ई. को पलासी के युद के सौ साल पूरे होने थे। ईसट इिणडया
कमपनी की नीितयो के िवरोध मे भारतीय राजाओं ने अँगेजो के िवरद एक संिध की तथा 31 मई
1857 ई. को समग कािनत का िदवस िनिशत कर अँगेजो को एक साथ ख़तम करने की कायर
योजना मे लग गए।
इधर समग कािनत की तैयािरया जोरो पर थी, उधर अँगेजो दारा भारतीय सैिनको
को िदए जाने वाले कारतूसो मे िमली गाय और सुअर की चबी की सनसनीखेज खबर फैल गई।
बहरामपुर के सैिनक पहले से उतेिजत थे। इनको बहरामपुर से बैरकपुर हिथयार वािपस करने
लाया जा रहा था। इसी समय खबर फैली की यूरोप से भारी संखया मे सैिनक लाए जा रहे है।
भारतीय सैिनको मे असंतोष भड़क उठा। 29 माचर 1857 ई. के िदन बी बटािलयन के सैिनको ने
नए कारतूस लेने से इनकार कर िदया। अँगेज अफसरो ने सैिनको को धमकाया और कहा,
``अनुशासन हीनता की सजा जानते हो।´´
भारतीय सैिनको ने कहा,
``हम ये कारतूस नही चलायेगे। इनमे गाय और सुअर की चबीZ िमली है।´´
अँगेज अफसर ने भड़क कर कहा, ``तुम िसपाही हो, तुमहे हर आजा का
पालन करना होगा। जो आजा नही मानेगा उसे सजा िमलेगी।´´
34 वी बटािलयन के िसपािहयो ने भी बगावत करली। मंगल पाणडेय ने कड़क आवाज मे
कहा, मै बामहण हूँ, चबीZ से सने कारतूस को हाथ नही लागाऊंँूननन
ग न
ा।
``अँगेज अफसर सारजेनट मेजर `हूसन´ ने गाली देते हुए मंगल पाणडेय से कहा, `` डेम
फूल, इिणडयन, मै तुझे ठीक करता हूँ।´´
उसके मुँह से आवाज िनकली और मंगल पाणडे की बनदक ू से गोली `हूसन´ बटेर की
तरह तड़प कर ढेर हो गया। लेिफ््ट ननन
नेनट
न बॉब ने मंगल पाणडे को खबरदार करते हुए
कहा-
``मै तुझे नही छोडँगा, तूने अँगेज अफसर का खून िकया है।´´ वह आगे बढ़ पाता इसके
पहले ही मंगल पाणडे ने उस पर गोली दाग दी। बॉब को जमीन पर पड़ा देख, अँगेज सैिनक व
अिधकारी मंगल पाणडेय की ओर लपक पड़े। पाणडेय ने तलवार िनकाल ली। अँगेजो को ऐसे
हाथ िदखाए िक उनके छके छू ट गए। एक अँगेज अफसर ने िपसतौल िनकालकर मंगल पाणडेय
पर िनशाना साधना चाहा िक एक भारतीय सैिनक ने उसके िसर पर बनदक ू का दसता जड़ िदया
वह जमीन पर िगर पड़ा।
तीन अँगेज अफसर पाणडे के चरणो मे पड़े धूल चाट चुके थे। अपने
अिधकािरयो को पड़ा देख, कनरल हीलर मंगल पाणडे की ओर लपका, तभी भारतीय सैिनको ने
एक सवर से कहा-
``कोई मंगल पाणडे को हाथ नही लगायेगा। खबरदार जो भी आगे बढ़ा, वह मौत की गोद
मे होगा।´´ कनरल हीलर पीछे मुड़ गया।
34 वी बटािलयन का खूनी समाचार जनरल िहयसर ने सुना तो वह भारी संखया मे
सैिनको को साथ लेकर आ गया। उसने 34 वी बटािलयन को चारो ओर से घेर िलया तथा उसने
सैिनको को शसत जमीन पर रखने के आदेश िदए। सैिनक अपने आप को अँगेजो से िघरा पाकर
असहाय महसूस कर रहे थे। उनहोने शसत जमीन पर रख िदए।
मंगल पाणडे ने जनरल िहयसर को ललकारा, ``अगर तूने एक कदम भी आगे
बढ़ाया तो, समझ लेना, िकनतु भारतीय सैिनक शेखर पलटू ने मंगल पाणडे को पकड़ िलया।
मंगल पाणडे ने अपनी तलवार से बचाव िकया िकया िजससे पलटू का हाथ कट गया। मंगल
पाणडे चारो ओर से िघर गए थे। भारतीय सैिनको ने अपने शसत जमीन पर रख िदए थे।
मंगल पाणडे को अपना भिवषय खतरे मे िदखाई िदया,उनहोेेनन ने अँगेजो के हाथो मे
आने से अचछा मौत को गले लगा लेना समझा। उनहोने अपनी बनदक ू से ही अपने सीने मे गोली
दाग ली।
मंगल पाणडे घायल हो गए। खून से लथपथ उनहे असपताल ले जाया गया। उनकी गोली
िनकाली गई। मंगल पाणडे बच गए।
मंगल पाणडे को सैिनक अदालत मे पेश िकया गया। उनपर मुकदमा चलाया गया। 6
अपैल 1857 ई. को उनहे परेड मैदान मे ले जाकर उनसे कहा-``अगर तुम अपने सािथयो का नाम
बता दो तथा सवयं माफी माग लो तो तुमहे िरहा कर िदया जायेगा।
मंगल पाणडे ने गरजते हुए कहा, ``हमने पेट के िलए तुमहारी नौकरी जरर की है, लेिकन
अपना धमर बेचने को नही। हम अिनतम सासो तक भारत माता और उसके वीर सपूतो से गदारी
नही कर सकते।
फोटर िविलयम मे सूबेदार मेजर जवाहर लाल ितवारी के अधीन 14 पेशी अफसरो की
अदालत मे मंगल पाणडे को फॉसी की सजा सुनाई गई।
8 अपैल 1857 ई. को कवायद के मैदान मे सभी िसपािहयो के सामने मंगल पाणडे को
फासी दी जाने वाली थी। भारतीय सैिनक उतेिजत होकर नारे लगा रहे थे। इसी समय बैरफ
पुर के जललादो ने बगावत करदी। उनहोने कहा हम मंगल पाणडे के पिवत खून से अपने हाथ नही
रंगेगे। तुरनत कलकता से चार जललाद बुलाए गए। िकनतु मंगल पाणडे ने गरज कर कहा, मुझे
िकसी के हाथो फासी पर चढ़ाये जाने की जररत नही है। मै सवयं अपने हाथो फासी का फनदा
अपने गले मे पहनूँगा।
मंगल पाणडे ने मुसकुराते हुए फासी के तखते पर कदम रखे और भारत माता की जय के
नारे के साथ फासी का फंदा अपने गले मे डालकर पथम सवतंतता सगाम के पहले शहीद के रप
मे अपना नाम अमर िकया।

बीरागना मालती बाई लोधी

भारतीय सवतंतता संगाम का इितहास, वीर नािरयो की शोयरगाथा से भरा हुआ। सन्
1857 ई. के पथम सवतंतता संगाम काल मे रानी गजमाला, महारानी लकमीबाई, रानी अवंती बाई,
िगरधारी, कानहा, मंदरा, झलकारी, के साथ-साथ वीरागना मालती बाई लोधी का नाम बड़ी शृदा
और सममान के साथ िलया जाता है।
मालतीवाई उन सैकड़ो बिलदानी नािरयो मे से एक है िजनहोने देश को अँगेजी शासन के
चँुून
नन
गल से आजाद कराने मे अपने पाण होम िकया। वेतवा नदी के िकनारे बसे एक छोटे से
गाव मे एक कृषक लोधी पािरवार मे सन् 1840 ई. मे मालती बाई का जनम हुआ था ऐसा उललेख
िमलता है। वे अपने माता िपता की पथम संतान थी तथा उनसे छोटे दो भाई थे। जब मालती
पंदह वषर की ही हुई थी तभी उनकी माता का देहावसान हो गया था।
बुनदेल खणड केत उन िदने कािनतकािरयो की गितिविधयो का केनद बना हुआ था। जैतपुर
के राजा पारीिकत एवं उनकी रानी गजमाला ने अँगेजो के िवरद अनेको लड़ाइया लड़ी थी।
िजससे समपूणर बुनदेल खणड का वातावरण गमाया हुआ था। िकशोरी मालती बाई के मन भी
कािनतकािरयो के िकससे सुन सुनकर कािनतकारी बनने की उमंगे उठने लगी थी। बुनदेल खणड
केत मे लोधी वंश राजपूतो मे िगना जाता है। देश भिकत तथा राषटपेम की भावना से पेिरत
मालतीबाई की बनदक ू चलाने घुड़सवारी करने तथा तलवार बाजी सीखने मे गहरी रिच थी।
उनही िदनो रानी गलमाला, लकमीबाई, अवंतीबाई की वीरता के िकससे घर मे चचा के िवषय बने हुए
थे। अत: मालतीबाई मे भी कािनतकारी भावना का पैदा होना सवभािवक ही था।
एक िदन मालतीबाई अपने खेतपर रखवाली कर रही थी। वह तीर कमान दारा िनशाना
लगा रही थी। उसी समय रानी लकमीबाई वहा से िनकली। रानी की िनगाह मालती बाई पर पड़ी
रानी ने मालती के पास जाकर कहा- ``तुम अचछा िनशाना लगाती हो। कया मेरे बताये िनशाने पर
तीर चला सकती हो।´´
मालती बाई ने रानी का अिभवादन करते हुए कहा,- आपकी आजा का पालन करना
हमारा सौभागय होगा।
रानी बड़ी पसन हुई उनहोने मालती को तीन िनशाने बताये। मालती परीका मे पास हुई।
रानी ने कहा ``मालती तुम झासी मे मेरे साथ रहना पसंद करोगी।´´
``यह तो मेरा सौभागय होगा, रानी मा।´´
``हम तुमहे झासी मे बनदक ू , तीर, तलवार चलाना तथा घुड़सवारी करना िसखायेगे। तुमहे
अपनी सहेली बनाकर रखेगे।´´
रानी मा, ``मेरे दो छोटे भाई है, मा का सवगरवास हो जाने के कारण उनकी िजममेदारी मुझ
पर है। परनतु उिचत समय आने पर झासी मे आपकी सेवा मे हािजर हो जाऊँगी।´´ उदास मन से
अपनी िबबसता बतलाती हुई मालती ने कहा।
रानी लकमी बाई उसकी भावना और कतरवय परायणता को देखकर बहुत खुश हुई। उनहोने
झासी पहुँचकर घोड़ा, अचछी कमान, तलवार तथा अनय सामगी तथा आिथरक मदद मालती के
पास भेज दी।
मालती ने अमयास तेज कर िदया तथा अनय युवितयो को जोड़कर एक टोली गिठत की।
मालती की टोली मे लगभग पाच सौ युवक युवितया शािमल हो गए। वे रोज युद अभयास करने
लगे।
डलहौजी दारा जब रानी के िवरद षणयंत रचा और झासी पर घेरा डाल िदया तो मालती
बाई अपनी सैनय टुकड़ी सिहत झासी पहुँच गई। रानी ने उसका तथा उसकी सैनय टुकड़ी का
सवागत िकया। रानी लकमीबाई ने उसे अपनी सहेली तथा अंगरकक का दजा िदया। मालती बाई
ने मा भवानी की शपथ लेकर कहा, ``मै अपने जीवन की एक एक सास अपकी सेवा मे समिपरत
कर दँगू ी। जब तक हमारी जीत नही हो जाती तब तक मै िववाह नही करँगी। अपने जीवन को
रानी मा के िलए नयौछावर कर दँगू ी।´´
रानी लकमीबाई ने मालती को अपने गले लगा िलया। झासी पर हुए आकमण मे मालती
बाई रानी की छाया बनी बराबर युद करती रही। समपूणर जीवन उसने रानी की सेवा मे समिपरत
कर िदया। वह रानी का रका कवच बन गई थी। वह सदैव रानी के साथ रही। वह अिनतम कणो
मे रानी के साथ पीछे-पीछे चल रही थी। रानी ने दामोदर राव को अपनी पीठ पर बाध रखा था।
रानी का घोड़ा नया था, और नाले पर अटक गया था। रानी को अँगेज सेना ने घेर िलया था।
मालती बाई उनकी रका को अँगेजो पर काल की तरह टू ट पड़ी। रानी उस समय घायल हो चुकी
थी। रानी ने कहा मालती दामोदर राव को बचाकर भाग िनकलो। मालती की टुकड़ी के बहादुर
साथी दामोदर राव को सुरिकत बचाकर बच िनकले िकनतु मालती ने रानी को अकेला नही
छोड़ा।
वह रणचणडी बन दुशमन पर टू ट पड़ी। अचानक अँगेज सैिनक की गोली ने उसका
सीना चीर डाला।
उसने रानी की रका करते हुए रानी से पहले ही सवाधीनता की वेदी पर अपने पाणो की आहुित
देकर अपना पण पूरा िकया।
भारत वासी जब भी झासी के पथम सवतंतता संगाम की चचा करेगे, रानी झासी के
बिलदान का यशगान करेगे तब उनहे मालती बाई लोधी का नाम बड़े आदर और सममान के साथ
याद आयेगा।

अजीम उलला खा

ईसट इिणडया कमपनी की िमशनिरया, भारत मे धमर पिरवतरन करा रही थी। वे िहनदू और
मुसलमानो को लोभ लालच तथा भय जो जहा पर आवशयक होता, उपयोग कर ईसाई धमर
सवीकार कराने मे लगी थी।
एक अकाल और मुशीवत की मारी मिहला कानपुर के िमशन आशम अपने छोटे से बचचे
के साथ रह रही थी। ईशाई िमशनरी के पादरी ने उस मिहला को समझाते हुए कहा, ``देखो तुम
अपने धमर के पित कटर रहो हमे कोई एतराज नही है परनतु अपने इस बचचे को तो ईसाई धमर की
िशका िदला दो। हम इसे पढ़ा िलखा कर िहनदुसतान का सबसे बड़ा आदमी बनायेगे।
``हे, धमर िपता, अपना धमर छोड़ कर ही कोई आदमी बड़ा बन सकता है तो मुझे वह
बड़ापन नही चािहए। अपना धमर छोड़कर दस ू रे
का धमर अपनाने वाला वयिकत पितत होता है वह बड़ा आदमी नही बन
सकता।`` औरत ने दो टू क उतर देते हुए कहा था।
ये औरत थी, अजीम उलला की मा। अँगेजी िमशन आशम मे पला बढ़ा अजीम मुललाह
अपनी िशका पूणर कर कानपुर के िमशन सकूल मे ही अधयापक हो गया। िमशन के सकूलो मे
ईसाई धमर का पचार पसार िकया जाता था। अपनी मा की तरह कटरता वाला अजीम उलला खा,
िमशन की िशका पदित से खुश नही था। उसने इस नौकरी को छोड़ने का िनशय कर िलया।
उनही िदनो िबगेडयर सकॉट के कायालय मे भती हो रही थी। अजीम उलला ने वहा
आवेदन िकया और उसका चयन हो गया। िबगेिडयर अँगेजी कमरचािरयो और भारतीय िहनदू-
मुिशनननन
ि लम मे भेद भाव करता था। उसने अजीम उलला से कहा,
``अगर तुम अँगेजो की सहानुभूित चाहते हो तो ईसाई धमर सवीकार करलो।
´´ अजीम उलला भड़क उठे और बोले, मै तुमहारे एहसानो का मोहताज नही हूँ। तुमहारी
इस दयापूणर नौकरी लात मारता हूँ। अँगेज ऐसे सवतंत िवचार के कटर आदमी को कैसे बदासत
करते। उनहे सेवा से बखासत कर िदया गया।
अजीम उललाह ने इनही िदनो वकालत पास करली थी। डलहौजी ने नाना साहब पेशवा
की पेशन बंद कर दी थी। इन िदनो नाना साहब िबठूर मे रहने आ गए थे। िबठूर मे तातया टोपे का
अजीम उलला से समपकर हुआ। उनहोने अजीम उललाह को वकील की हैिसयत वोडर आफ
डायरेकटसर मे शािमल करवा िलया।
नाना साहब पेशवा ने अजीम उलला को महारानी िवकटोिरया के दरवार मे अपील करने के
िलए लंदन भेजा। लंदन मे अजीम उलला की खयाित बड़े जलदी चिचरत हो गई। लंदन मे उनहे
मान, सममान यश, वैभव, सभी कुछ िमलने लगा। अजीम उलला ने िवकटोिरया के पास अपील की
िक पेशवा का िवशेषािधकार वािपस िकया जाय तथा उनकी पेशन बहाल की जाय िकनतु
िवकटोिरया ने उनकी अपील को सवीकार नही िकया।
अजीम उलला ने भारत लौटने का िनशय िकया। जब उनके भारत लौटने की चचा
अँगेज मेडम रोजी को िमली तो उसने अजीम उलला को अपने घर भोजन के िलए बुलाया और
कहा-
``मैने सुना है िक आप भारत वािपस जा रहे ´
``आप ने ठीक सुना है। मै यहा िजस काम को आया था, वह पूरा नही हो रहा है िफर मै
समय कयो खराब करँ।´´
``नही अजीम, मै तुमहारे िबना नही रह पाऊँगी। मै तुमहे नही जाने दँग
ू ी, तुम मेरा िदल
तोड़कर नही जा सकते।´´
``और यहा आकर मेरा िदल टू ट गया है। ´´
``तुमहारे िदल का इलाज मेरे पास है। मै तुमसे शादी करँगी। मेरा, धन, दौलत, ऐशयर
सब कुछ तुमहारा है। मेरी पहुँच राजघराने तक है। मै तुमहे बहुत अचछी नौकरी िदला दँगू ी। हम
दोनो मौज से रहेगे।
``रोजी मेरा देश परतंत है। मेरे देशवासी एक एक दाने को मोहताज और यहा रंगरेिलया
मनाऊँ। मुझसे नही होगा।´´
``अजीन मै तुमहारे िबना नही रह पाऊँगी। मै तुमहारे िलए कुछ भी करने को तैयार हूँ
परनतु तुमहे नही छोड़ सकती।´´
``तुमने कहा है िक तुमहारी पहुँच राजघराने तक है तुम अपनी पहुँच का सतेमाल करके
नाना साहब को उनसे छीने गए अिधकार िदला दो। मै तुमहारी बात पर िवचार करँगा।
``देखो अजीम यह राषटीय नीित का मामला है। मै वयिकतगत समबनधो से राषटीय नीित
को पभािवत नही कर सकती। ´´
``तो मै, वयिकतगत समबनधो के िलए अपने देश को छोड़कर तुमहारे पीछे पीछे पालतू
बनकर कयो रहूँ , मै जा रहा हूँ। ´´ अजीम उलला बगैर भोजन िकए ही चले आए।
इनही िदनो रंगोबापू लंदन मे थे। अजीम उलला और रंगोबापू की भेट हुई। रंगोबापू ने
अजीम उलला को समझाया िक ईसट इिणडया कमपनी भारत पर एक छत राज सथािपत कर
िनरंकुश शासन करना चाहती है। वह नीित अनीित की परवाह िकए बगैर भारत पर राजय
करेगी। अगर हमे भारत को आज़ाद कराना है तो भारतीय को आज़ादी के संघषर के िलए तैयार
करना होगा। रंगोबापू भारत लौट आए। अजीम उलला यूरोप मे अँगेजो के बल की टोह लेने के
िलए िनकले। वे मालटा, कुसतुनतुिनया, िमश, रस देशो मे गए। कीिमया के युद मे रस से
इंगलैणड व फास की संयुकत सेनाएँ परासत हो चुकी थी। उसे िबटेन की खोखली ताकत मालूम
हो चुकी थी उसने सोचा अगर भारत के देशी राजा एकत हो जाये तो भारत से अँगेजी सता को
उखाड़कर फेका जा सकता है।
अजीम उलला भारत औट आये और नाना साहब को िबिटश नीित को बतलाकर, अँगेजो
के िखलाफ जनमत बनाने का आगह िकया। अजीम उलला तथा नाना साहब समपूणर भारत मे
अँगेजो के िवरद माहौल बनाने मे जुट गए।
यिद तातया टोपे को नाना साहब का बाहुबल कहा जाता तो अजीम उलला को मिसतक।
नाना साहब पेशवा, तातया टोपे, अजीम उलला तथा रंगोबापू ने गुपत बैठक की। पेशवा ने रकत
कमल हाथ मे उठाकर आज़ादी का पण िलया। रकत कमल तातया को िदया, तातया ने रगोबापू को
तथा रंगोबापू ने अजीम उलला के हाथ मे सौपा जो अजीम उलला ने पेशवा के चरणो मे रखकर
आज़ादी की शपथ ली।
अजीम उलला तथा रंगोबापूजी की सलाह पर फकीर, मौलवी, बामहण, तपसवी,
सनयासी सभी आजादी की कािनत मशाल रकत कमल तथा शपथ िदलाने मे िलए रोिटया लेकर
िनकल पडे़ूनन

पेशवा नाना साहब, अपने बंधु बाला साहब और सलाहकार अजीम उलला के साथ, िदलली,
अमबाला, िशमला, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर गए और कािनत की शपथ िदलाई।
सन् 1857 ई. की पथम संगिठत सवाधीनता कािनत मे नाना साहब, तातया टोपे,
महारानी लकमी बाई को बौिदक शिकत देने वाला पुँज अजीम उलला खा ही था। कानपुर को
अँगेजो से िबठूर के कबजे मे करने का पूरा ताना बाना अगर िकसी ने बुना था, तो वह भी था,
अजीम उलला।
कानपुर मे नाना साहब के महल मे अँगेजो का कतले आम तथा गंगा की मधय
धारा मे नावो पर सवार अँगेजो पर गोले-गोिलया की मार मे अजीम उलला की ही िवदोही भावना
था। जब तक भारतीय इितहास भारत की आजादी की पथम कािनत सन् 1857 ई. को याद करता
रहेगा कािनतकारी अजीम उलला का नाम सदैव गौरव के साथ िलया जायेगा।

बहादुर शाह जफर

भारतीय सवतंतता संगाम के अमर शहीद िदलली के अिनतम मुगल समाट बादशाह, बहादुर
शाहजफर को कभी भी भुलाया नही जा सकता।
िहनदु मुिसलम एकता के पतीक, पिसद शाइर तथा आजादी के िलए पाण पण से समिपरत
बहादुर शाह जफर का जनम 24 अकटू बर 1775 को िदलली मे, अकबर शाह िदतीय के पथम पुत
के रप मे हुआ था। बहादुर शाह जफर की मा लालबाई िहनदू राजपूत पिरवार से थी।भारतीय
संसकृित मा से पयार मे तथो वीरता िपता से उनहे िवरासत मे िमली थी। बहादुर शाह जफर जहा
एक वीर योदा तथा कुशल पशासक थे वही वे एक नरम िदल इनसान भी थे। वे बहुत अचछे
शायर थे तथा सािहतयकारो के पित उनके िदल मे अथाह आदर एवं सममान था।
िजन िदनो िदलली पर बहादुर शाह जफर तखताशीन थे उनही िदनो भारत पर अँगेजी
हुकूमत कहर ढा रही थी। देशी िरयासतो मे अँगेजी सता के िवरद आग धधक रही थी। मंगल
पाणडे, नाना साहब, ततया टोपे तथा झासी की रानी लकमीबाई ने खुलकर अँगेजो के िवरद युद
का शंखनाद कर िदया था। अँगेजी ससता पूरी ताकत के साथ सवतंतता संगाम की आग को
कुचलने मे लगी थी तथा भारत माता के वीर सेननी उतने ही उतसाह से अँगेजो के पैर उखाड़ने मे
लगे थे।
यदिप उस समय बादशाह िदलली बहादुर शाहजफर बहुत बूढ़े हो ेगए थे िकनतु उनके िदल
मे भारत की आजादी थी िचनगारी धधक रही थी। मेरठ के िसपािहयो के वीरता के कारनामे
सुनकर वे बहुत खुश थे। िदलली की िसथित बहुत अचछी नही थी, खजाना खाली था, या यूँ भी
कहे िक िदलली एक तरह से अँगेजो के अधीन ही थी।
10 मई 1857 ई. को िगरजाघरो मे पाथरना के िलए एकितत अँगेजो पर मेरठ के िसपािहयो
ने हमलाकर उनका कतलेआम कर डाला। गोरो मे तािह तािह मच गई। बारद व खजाना, शसत
आिद लूट िलए। मेरठ आजाद घोिषत कर िदया गया। िवजयी सैिनको ने िदलली के बादशाह को
अपना नेतृतव करने हेतु मनाने के िलए िदलली के िलए कूच िकया। 32 मील का सफर सैिनको ने
राित मे ही पार कर िलया। मेरठ के सैिनको को िदलली के िकले मे पवेश रोकने के िलए गोरा
कनरल िटपले आगे बढ़ा िकनतु उतसाही सैिनको ने उसे अपनी गोिलयो से भून डाला। लाल िकले
से िदलली की आजादी की घोषणा कर दी गई। बृद बादशाह बहादुर शाह बहुत पसन हुआ।
बादशाह ने कािनत सेना का बड़े उतसाह के साथ सवागत िकया। िदलली की आजादी के साथ ही
अलीगढ़, नसीराबाद, रहेलखणड, इलाहाबाद, जालंधर, बरेली, मुरादाबाद, शाहजहॉंपुर आिद भी
सवतंत घोिषत कर िदए गए। ऐसे मे भला पेशवा नाना साहब चुप कहा बैठ सकते थे। उनहोने
लखनऊ और कानपुर मे भीषण युद छेड़ िदया और पहले लखनऊ मे िफर कानपुर मे आज़ादी का
परचम पहरा िदया। महारानी लकमी बाई ने दामोदर राव को झासी का राजा घोिषत कर िदया।
इसी समय सीतापुर मे िवदोह हुआ, फैजाबाद के राजा मानिसंह तथा मौलवी अहमदशाह
को अँगेजो ने कैद कर रखा था। सवतंतता के वीर सैिनको ने जेल पर आकमण कर उनहे कैद से
छुड़ाया तथा अयोधया पापत भी अँगेजो से मुकत करा िलया।
अँगेज बौखला उठा। सेनापित बनाडर अमबाला से भारी सेना लेकर िदलली की ओर चल
पड़ा। वह भारी सेना गोला बारद लेकर कूरता करता हुआ लोगो को मौत की नीद सुलाता हुआ
आगे बढ़ रहा था। इसी समय जनरल मील ने मदास से कूच कर िदया था।
डलहौजी, हूरोज तथा वॉकर ने झासी की रानी को िगरफतार करने की योजना बनाकर
झासी पर घेरा डाला।
िदलली, कानपुर और झासी पर अँगेजी सेनाओं ने भारी शिकत के साथ आकमण कर
िदए।
मेरठ के िसपािहयो ने बादशाह जफर से कहा, आप सवतंतता की इस कािनत का नेतृतव
करे। बहादुर शाह जफर ने सपष तौर पर कहा ``मै बहुत बूढ़ा हो चुका, मेरा शरीर अब युद
लायक नही बचा। लड़ाई के िलए पैसा चािहए। िफरंिगयो ने िदलली का खजाना खाली कर िदया
है।
सैिनको ने कहा, ``आप केवल हमारे अगुआ बनकर हमे मागरदशन
कीिजए। हम दुिनया भर की दौलत लाकर आपके चरणो मे डाल देगे। हमारी ताकत अँगेजो को
तबाह करने को पयापत है।मात हमे आप जैसे सेनापित की जररत है। बहादुर शाह ने कहा, तो
``मै अिनतम सासो तक तुमहारा साथ दँग ू ा। िदलली मे तुमहारा सवागत है। िदलली मे युद की
तैयािरया की गई। सैिनको को लड़ाई हेतु अभयास कराया गया। मोचे तय कर िदए गए। िदलली
मे नया जोश लहराने लगा।
अँगेज सेना ने िदलली पर घेरा डाला। चारो तरफ से िवशाल अँगेज सेना चढ़ आई। युद
पारमभ हो गया। िदलली की सेना तथा मेरठ के वीर िसपाही बड़े ही उतसाह से युद करने लगे।
अँगेजी सेना की भारी तवाही हो रही थी। अँगेज सेना के बड़े-बड़े योदा मार डाले गए। िदलली
जीत के नजदीक थी। बहादुर शाह जफर के चारो शहजादे िमजा मुगल, िमजा खजर सुलतान,
िमचा अबूबकर और िमजा अबदुलला ने िदलली के चारो फाटको पर मोचा संभाल रखे थे।
अँगेजी सेना का नेतृतव मेजर हड़सन कर रहा था। अँगेजी सेना के पैर लड़खड़ाने लगे
थे। भारी तबाही से वह बौखला उठा था। उसने युद मे हार िनिशत देख, षणयंत का आसरा
िलया। उसने िदलली के गदारो का सहयोग िलया, तथा बहादुर शाह जफ़र के ससुर बखत खा को
अपने साथ िमला िलया। बखत खा ने धोखे से बहादुर शाह जफ़र को हुमायूँ के मकबरे पकड़वा
िदया।
बहादुर शाह के कैद होते ही सैिनको का मनोबल टू ट गया। अँगेज मेजर हड़सन ने
बहादुर शाह जफर के चारो शहजादो के िसर काट डाले और उनका खून पीकर कहा, अगर मै
इनका खून नही पी पाता तो मुझे कभी शािनत नही िमल पाती। वह शहजादो के िसर थालो मे
सजाकर बहादुर के पास लेकर गया और बोला बादशाह िहनद हम आपकी बहादुरी की कदर
करके आपको तोहफा देेन नन
े आए है।
बहादुर शाह अपने बेटो के कटे िसर देखकर खून के घूँट पीकर रह गए अपने को
समहालते हुए बोले-
``अलहमदुललह तैमूर की औलाद ऐसे ही सुखरर होकर बाप के सामने आया करती थी।´´
उनहोने हड़सन से कहा,
``गािजयो मे बू रहेगी, जब तलक ईमान की,
तख़्ून
नन
त े लंदन तक चलेगी तेग िहनदुसतान की।
बादशाह को कैद करके वमा भेज िदया गया। रंगून के कैद खाने मे उनहोने अपने
जीवन के अिनतम िदन गुजारे।
वे बहुत बेजोड़ शाइर थे। कैद मे उनहोने िलखा था,
``उमे दराज माग के लाए थे, चार िदन,
दो आरजू मे कट गए दो इंतजार मे।
है िकतना बदनसीब जफ़र दफ़न के िलए,
दो गज जमीन भी न िमली कुए ं यार मे।´´
7 नवमबर 1862 ई. को भारत के इस बहादुर देश भकत ने अिनतम सास ली। उनहे रंगून मे
ही दफना िदया गया था।
भारत के इस अिनतम मुगल समाट को भारत की िमटी बड़े सममान के साथ याद करती
रहेगी ।

भीषमाचायर वीर कुँवर िसंह

भारतीय पथम सवतंतता संगाम मे अलौिकक वीरता एवं साहस का कीितरमान सथािपत
करने वाले अमर सेनानी वीर कुँवरिसंह िबहार के जगदीश पुर के राजा थे।
अँगेज सरकार की दमननीित जोरो पर थी। अँगेजी सेनाएँ भारतीय राजाओं के
राज हड़प कर उनहे अपने अधीन करती जा रही थी। झासी, कानपुर, लखनऊ, िदलली, दितया,
िबठूर, आिद देशी िरयासतो ने अँगेजो के िवरोध मे सवर तेज कर िदया था। भला कुँवर िसंह का
िबहार कैसे दरू रह सकता। दानापुर की कािनत सेना जगदीश पुर पहुँची और उसने राजा कुँवर
िसंह से सहयोग मागा। कािनत सेवा ने राजा कुँवरिसंह से आगह िकया िक वे उनके सेनापित का
भार सवीकार करे। 80 वषर की उम मे भी कुँवर िसंह ने हँसते हुए कािनत सेना के सेनापित का
दाियतव िनभाने की सवीकृित दे दी तथा कािनत सैिनको का सवागत िकया।
अँगेजी सेना ने कुँवर िसंह के राजय पर आकमण कर िदया। कुँवर िसंह ने
डटकर मुकाबला िकया। िबहार के गाव-गाव मे कािनत का आवाहन िकया। कुँवरिसंह ने कािनत
सेना के सहयोग से अँगेज छावनी आरा पर धावा बोलकर अँगेजी खजाना तथा भारी माता मे गोला
बारद पर कबजा कर िलया। जेल खानो से बनदी छुड़ा िलए। अँगेजो के अनेको सैिनको को
बनदी बना िलया। आरा की िवजय से बौखलायी अँगेज सेना ने भारी सैनयबल के साथ आरा पर
आकमण िकया िकनतु कुँवर िसंह ने आम के बाग के समीप अँगेज सेना को घेर कर तबाह कर
िदया तथा अँगेज सेनापित को मार डाला।
इस असफलता से अँगेजी सेना बड़ी कोिधत हुई। उसने पुन: भारी सैनय बल
तथा सैनय सामगी लेकर कुँवर िसंह पर चढ़ाई की। बीबीगंज के पास कुँवर िसंह तथा अँगेज
सेना के बीच भयंकर युद हुआ। आठ िदन तक कुँवर िसंह अँगेजी सेना से लड़ते रहे। िकनतु
संसाधनो की कमी के कारण कुँवरिसंह को सेना की जगदीशपुर की ओर लौटना पड़ा। कुँवर
िसंह जगदीशपुर पहुँचकर युद की तैयािरया करने लगे। पीछे से अँगेज सेना नेजगदीशपुर पर
आकमण कर िदया। जगदीशपुर नरेश कुँवर िसंह की सेना बड़ी वीरता से लड़ी। अँगेजी सेना
तबाह हो भाग खड़ी हुई। अँगेजी सेनापित की माग पर पुन: भारी सैनय बल जगदीशपुर भेजा
गया। जगदीशपुर को चारो ओर से घेर िलया गया। कुँवर िसंह अपने बचाव के िलए सेना तथा
महल की िसतयो को साथ लेकर जगदीशपुर से िनकल पड़े।
अँगेज सेना ने समझा िक कुँवर िसंह हारकर भाग गया है। अत: िनिशंत होकर
आम के बाग मे खाना खाने तथा आराम करने लगी। तभी कुँवर िसंह ने हमला करके शतु सेना
को तहस नहस कर डाला। अँगेजी सेना की बारदो, तोपो पर कबजा कर िलया। उधर अतरौली
मे कुँवर िसंह ने अँगेजी सेना को जमकर धुना।
अँगेज सैनय टुकड़ी का एक दसता आजमगढ़ मे था। कुँवर िसंह ने छापामार
हमला कर अँगेज सेना के िसपाही मार डाले तथा आजमगढ़ पर कबजा कर िलया। आजमगढ़ पर
िवजय पापत कर कुँवर िसंह बनारस की ओर बढ़ा। रासते मे अँगेज सेना ने िफर घेरा डाला िकनतु
बहादुर कुँवर िसंह ने अँगेज सेना को तबाह कर डाला। तातू नदी के पुलपर िफर अँगेज सेना ने
कुँवर िसंह को घेरने की कोिशश की िकनतु इस बार िफर िवजय कुँवर िसंह को ही िमली। अँगेजी
सेना के िसपाही अपनी जान बचाकर आजमगढ़ की ओर भागे िजनहे कुँवर िसंह की सेना ने दोनो
ओर से घेर कर मारा।
एक िदलचसप उदाहरण है िक कुँवर िसंह को बनारस की ओर गंगा को पार करना था,
उसने खबर फैला दी िक कुँवर िसंह की सेना हािथयो से बिलया के िनकट से गंगापार करने जा
रही है। अँगेजी सेना कमाणडर डगलस बिलया पर घेरा डाल कर कुँवर िसंह की ताक मे बैठा
रहा। उधर बिलया से 7 मील दरू िशवराजपुर से नावो के सहारे कुँवर िसंह ने अपनी सेना को गंगा
पार करा िदया। जब डगलस को पता चला तो वह िशवराजपुर की ओर दौड़ा तब तक सेना पार
हो चुकी थी। अिनतम नाव बाकी थी िजस पर कुँवर िसंह सवयं थे। डगलस ने गोिलयो की बरसा
करा दी। एक गोली कुँवर िसंह के दािहने हाथ मे लगी।
उनहोने िनणरय िलया िक हाथ तो खराब हो ही गया है शरीर मे जहर
न फैलने पाए अत: सवयं ही अपना हाथ काट कर गंगा मैया मे फेकते हुए कहा, ``गंगा मैया
अपने इस सपूत की िकंिचत भेट सवीकार करो।´´
ऐसी घायल अवसथा मे भी इस वीर ने पाणो की परवाह िबना िकये जगदीशपुर पर
आकमण िकया तथा अँगेज सेना की मारकाट कर जगदीशपुर पर कबजा कर अपने महल मे
दािखल हो गया।
कुँवर िसंह ने 23 अपैल 1858 ई. को अपने सवयं के राजय जगदीशपुर पर िवजय पापत
करली थी तथा िवजयी राजा 26 अपैल 1858 ई. को िचरिनदा मे लीन होकर भारत के पथम
सवतंतता सगाम मे अपना नाम जोड़कर भारत माता की गोद मे समा गया।
कुँवरिसंह की मृतयु के वाद उनके छोटे भाई अमरिसंह ने तलवार उठाई और
अँगेजी सेना को आरा, बिलया, हालमपुर, दलीलपुर आिद सथानो पर बुरी तरह परासत िकया।
उसकी बहादुर का बखान सवयं अँगेज सेनापित करते थे।
1857 ई. के पथम सवतंतता संगाम का रणवीर कुँवरिसंह अिदतीय बहादुर था। िजसने
अससी बषर की अवसथा मे भी अपनी तलवार के कौशल पर अँगेजो को मार-काट डाला तथा
अनेको बार िवजय शी पापत की। अिनतम सासो मे वह अपने महल मे िवजय शी का जश मनाते
हुए भारत मा की गोद मे िचरिनदा मे सोया।
िशवाजी महाराज के पशात वृक युद ( गुिरलला युद ) मे यिद िकसी ने सफलता
अिजरत की थी तो वह था कुँवर िसंह।
तातया टोपे तथा कुँवर िसंह दोनो 1857 ई. के सवतंतता संगाम के ऐसे योदा थे
िजनहोने अँगेजो को बुरी तरह से हैरान कर रखा था, हालािक तातया टोपे वृकयुद तथा िवधवंसक
दोनो पको मे कुशल थे िसदहसत थे िकनतु कुँवर िसंह उनसे एक कदम आगे बढ़कर रहे कयोिक वे
अँगेजी सेना पर सवयं आकमण करते थे तबाह करते थे तथा िवजय शी हािसल करते थे।
वीर कुँवर िसंह की चालो को अँगेज समझ नही पाती थी िक वह हमला बोले, कब पीछे
हटे तथा कब कहा पर पहुँच जाये। भारत माता के इस सपूत को इितहास सदा सममान के साथ
याद करता रहेगा।

मौलवी- अहमद शाह

भारत की आजादी के पथम सवतंतता सगाम सन् 1857 ई. मे भारत मूल के िहनदू-मुिसलम,
िसकखो ने अपने पाणो की बाजी लगाकर अंगेजो से मुकाबला िकया। इन बहादुरो मे मौलवी
अहमद शाह का नाम सदैव समरण िकया जायेगा।
अंगेज सरकार भारत मे राजय िवसतार लूट खसोट करने के साथ साथ ईसाई धमर का
पचार पसार करने मे लगी थी। भारत के िहनदू तथा मुिसलमो मे धमर के पित अथाह आसथा होने
के साथ साथ भारत वतन पर अटू ट पयार था। िकनतु अंगेजो की फूट डालो राज करो तथा
भारत के धन धानय को लूटकर भारत को कंगाल बना देने की नीित थी।
भारतीय सैिनको मे चबी कारतूसो के पयोग को लेकर आकोस फूट पड़ा था। सैिनको ने
िवदोह कर िदया था। नाना साहब, लकमीबाई, राजा कुँवर िसंह, बहादुर शाह जफर आिद ने
खुलकर अंगेजो से युद छेड़ रखा था। ऐसे मे महान देश भकत मौलवी अहमदशाह कहा चुप बैठने
वाले थे।
उस समय फैजाबाद मे मानिसंह राजा था। भारत से अंगेजी शासन को उखाड़ फैकने
की िदशा मे बहाबी आनदोलन पारमभ हो चुका था, वैसे तो यह एक धािमरक आनदोलन था, जो भारत
मे अंगेजो दारा कराये जा रहे धमर पिरवतरन का िवरोध कर रहा था, िकनतु ईसाई करण मे बाधा
डालने वाले वहािबयो के इस आनदोलन को राजनीितक सवरप दे िदया गया। भारत मे वहाबी
आनदोलन का नेतृतव रायबरेली के शैयद अहमद शाह, िदलली के शाह बली उलला तथा िबहार के
मौलवी अहमदुलला कर रहे थे। मौलवी अहमद शाह ने अंगेजो के िवरद खुलकर अिभयान छेड़
िदया था। वे घूम घूमकर लोगो को आजादी की लड़ाई के िलए तैयार कर रहे थे। अंगेजो ने
अहमदशाह को िगरफतार कर िलया तथा उनहे फासी की सजा सुनाई िकनतु वहा की जनता तथा
लखनऊ नवाब के सैिनको ने जेल पर धावा बोलकर अहमदशाह को आजाद करा िलया।
लखनऊ के नवाब ने फैजाबाद तथा रायबरेली को पूरी मदद देनी शुर करदी। मौलवी
अहमद शाह मे संगठन कमता तथा बहादुरी अदमय थी। अंगेजो ने फैजाबाद पर आकमण करने
की घोषणा की,। अहमदशाह ने `आलम बाग´ मे अंगेजो से युद कर अंगेजी सेना को मात दे
डाली । जुलाई 1857 ई. मे कैपटन िबलसन तथा हेनरी लारेनस नाम के अंगेजी सेना के अफसरो
को मार डाला गया।
अंगेजो ने कूटनीित का सहारा िलया। उनहोने लखनऊ नबाव की बेगम हजरत महल को
अहमदशाह के िवरद भड़काया। नाराज रानी ने अहमद शाह को िगरफतार करवा िलया। िकनतु
सेना तथा जनता ने बेगम को असिलयत बताकर अहमदशाह को इजजत के साथ िरहा कराया।
बेगम हजरत, अहमद शाह की बहादुरी, देश भिकत तथा जन िपयता से इतनी पभािवत हुई िक
उनहोने अहमद के साथ युदो मे जाना पारमभ कर िदया। बेगम सवयं घोड़े पर चढ़ कर युद मे
अंगेजो से जूझने लगी।
बहादुर शाह जफ़र के शहज़ादो का खून पीने वाला हतयारा हड़सन लखनऊ तथा
फैजाबाद पर आकमण करने आया था। अहमद शाह ने उसका डटकर लोहा िलया तथा हड़सन
को मौत के घाट उतार िदया। अंगेज सेना ने आकोिशत होकर लखनऊ तथा फैजाबाद मे खून
की निदया बहा डाली।
अहमदशाह को िगरफतार करने हेतु घेरा डाले गए। अहमद शाह बचकर ``बारी´´ मे जा
डटा तथा बेगम हजरत महल छ: हजार सैिनको के साथ `िवटावली´ मे जा डटी।
अंगेजी सेना ने अहमदशाह को `बारी´ मे जा घेरा भयंकर युद हुआ। अहमद शाह की
छोटी सी टुकड़ी अंगेजी िवशाल सेना की गोला बारद के सामने िटक नही पाई िफर भी अंगेजी
सेना अहमदशाह को पकड़ने मे नाकाम रही। अहमदशाह अपने बचे हुए सैिनको को लेकर
िनकल गया।
अंगेजो के िवरद पेशवा नाना साहब भी युद छेड़े हुए थे। वे उस समय शाहजहापुर मे
थे। अहमदशाह ने नाना साहब से भेट की। दोनो ने िमलकर अंगेजो से युद करने की योजना
बनाई। इसी समय अंगेज सेना ने शाहजहापुर पर आकमण बोल िदया। नाना साहब तथा अहमद
शाह ने अंगेजो से डटकर युद िकया तथा अपने आप को बचाकर, बरेली पहुँच गए। बरेली मे
खान बहादुर खा ने अंगेजो को घुसने नही िदया था िकनतु अंगेजी सेना घेरा डाले बैठी रही। इधर
से नाना साहब तथा अहमदशाह बरेली मे आ चुके थे। खान बहादुर खा ने बेगम हज़रत महल,
नाना तथा अहमदशाह के साथ अंगेजो के साथ युद छेड़ िदया। बरेली की जनता ने भी
बहादुरशाह की सेना का साथ िदया। िकनतु अंगेजो की िवशाल सेना के सामने िटकपाना इतना
आसान नही थी। खान बहादुर की सेना के अनेको वीर खेत हो गए। अनतत: अहमदशाह, खान
बहादुर खा, नाना साहब तथा बेगम बरेली से बचकर पुन: शाहजहापुर पर जा धमके तथा
शाहजहापुर पर अिधकार कर िलया।
अंगेजी सेना, शानत बैठने वाली नही थी। उसने दुगनी शिकत से शाहजहापुर को घेर
िलया। भयंकर युद हुआ, िकनतु अहमदशाह बचकर पवनपुर के राजा जगनाथ िसंह के पास
पहँुच गया। राजा जगनाथ िसंह ने उसे सहयोग देने का आशासन देकर आमंितत िकया था।
राजा जगनाथ िसंह अंगेजो से िमला हुआ था, अहमदशाह को यह जात नही था। जब
अहमदशाह उसके महल मे िनिशत सोया हुआ था, तब जगनाथ िसंह ने उसे अपनी तलवार से
काट डाला। इस हतया के बदले मे अंगेज सरकार ने उसे र. 50 हजार का इनाम िदया था।
अंगेजो ने अहमद शाह का कटा हुआ िसर शाहजहापुर की कोतवाली के सामने टाग िदया था।
मौलवी अहमद शाह ने देश भिकत से पेिरत होकर धािमरक आनदोलन का नेतृतव पारंभ
िकया था, जो युद मे पिरणत होकर बहादुरी के साथ देश के काम आया। सन् 1857 ई. के नाम से
जारी इस आजादी के संगाम मे अनेको बहादुरो ने अपने पाणो की आहुित देकर आजादी की जयोित
को जीवनत रखा िजसका पितफल 90 वषर बाद हमे आजादी के रप मे िमला।
िहनदुसतान धािमरक नेता से युदवीर वने मौलवी अहमदशाह को सदैव शदा के साथ समरण
करता रहेगा।

बेगम हजरत महल

आजादी के पथम संगाम सन् 1857 ई. मे महारानी लकमीबाई के बाद अगर कोई दस
ू रा नाम
सममान के साथ िलया जाता है तो वह है लखनऊ के नवाब वािजद अली शाह की बेगम हजरत
महल का ।
मुगल शासन का अंितम नवाब वािजद अली शाह सन् 1847 ई. को अवध की गदी पर बैठा
। उसकी रिच शासन चलाने मे नही थी । वह एक शौकीन िमजाज, संगीत, किवता तथा नृतय
का पेमी था। मुजरे सुनना उसका शौक थ । हजरत एक नतरकी थी जो नवाब वािजद अलीशाह
को भा गई थी । वह हजरत महल को महकपरी कहता था । हजरत की सुनदरता और
नृतयकला से पभािवत होकर नवाब ने उनहे अपनी बेगम बना िलया था ।
आिशक िमजाज नवाब ने शासन की वयवसथा कमपनी के हाथो सौप दी थी। नवाब की
लापरवाही का लाभ उठाते हुए कमपनी ने अवध पर िसंकजा कस िलया था । िरयासत के खज़ाने
का अंँून
नननन
ग न ीन
ेज वयवसथा मे मन माना दुरपयोग िकया गया । कमपनी ने अवध को हड़पने
के िलए नवाब को अयोगय घोिषत कर सन् 1854 ई. मे आउटम को रेजीडेनट बनाकर अवध भेज
िदया ।
बेगम हजरत महल ने वुदमता तथा राजय संचालन की कुशलता का पिरचय देते हुए
अंगेजो की कूिटनीित का िवरोध िकया तथा नवाब को डलहौजी दारा पसतािवत संिध पसताव
पर हसताकर करने से मना कर िदया। पिरणाम सवरप 2 माचर 1856 ई. को नवाब को नजरबंद
करके कलकता भेज िदया गया ।
बेगम हजरत महल इस अपमान से भड़क उठी उनहोने अपने बारह वषीZ य बेटे ´िबरजीस
कदर´ को अवध का राजा घोिषत कर ´जनाब-ए-आिलया´ का िखताब हािसल कर राजकाज का
संचालन करने लगी । िहनदू राजा बालकृषण राव को बजीर-ए-आलम बनाया। बेगम ने िहनदू
मुिसलम मे बगैर भेदभाव के योगयता के आधार पर जुममेबािरया बाटी। सैिनको की सुख
सुिवधाओं का धयान रखने के िलए वेतन वृिद की, मुिकत सेना तथा मिहला सेना का गठन िकया।
पधान सेनापित अहमद को िनयुकत कर सैनय शिकत को सशकत िकया। मौलवी अहमद शाह ने
लगभग डेढ़ लाख आज़ादी के दीवाने एकत कर िलए थे। 2 तथा 4 जुलाई 1857 ई. को अंगेज
कैपटन िबलसन तथा हडसन को मौत के घाट उतार िदया। सवयं बेगम हजरत महल घोड़े पर
सवार होकर युद के िलए िनकल पड़ी।
अंगेजो ने कूिटनीित का सहारा िलया तथा अहमदशाह के िवरद बेगम को भड़का िदया।
बेगम ने अहमदशाह को िगरफतार करवा िलया िकनतु वासतिवकता जात होते ही उनहे इजजत
सिहत िरहा कर पुन: पधान सेनापित बनाकर अंगेजो के िवरद युद करने की पूणर सवतंतता दे
दी। 16 जुलाई 1857 ई. को बेगम हजरत महल ने िफरंगी सेना का नामोिनशान िमटाने के िलए
बेलीगारद पर हमला कर िदया। 21 िसतमबर 1857 ई. को अहमद शाह की िवदोही सेना ने
आलमबाग के मोाचे ानननन
ा पर अंगेजी सेना को करारी िशकसत दी।
बेगम हजरत महल की बहादुरी तथा सफलता से उनकी सौतने तथा उनके दरोगा जलने
लगे थे। बेगम से ईषरया करने वालो ने बेगम की योजनाओं को अंगेजी सेना नायको के पास
पहुँचानी पारमभ कर दी। जहा-जहा बेगम हमले करने की तैयारी करती थी अंगेज सेना को खबर
िमल जाती थी और अंगेजी सेना वहा पर भारी गोलाबारद तथा सामगी भेजकर दुगनी शिकत से
युद करने लगती थी।
15 फरवरी 1858 ई. को अहमद शाह घायल हो गए तथा बजीर -ए-आलम मार डाले गए।
बेगम हजरत महल को अहमद शाह की मौत की सूचना ने बहुत आहत िकया िकनतु बेगम
ने बची खुची सेना का हौसला बुलंद रखने के िलए सवयं युद की कमान संभाल ली। बेगम युद
िवदा मे कुशल थी। बेगम ने जौनपुर, आजमगढ़ और इलाहाबाद पर आकमण करने की योजना
को साकार करने हेतु पेशवा नाना साहब तथा तातया टोपे का सहयोग करने के िलए कािनतकारी
सैिनको को आदेश िदए। पवनपुर के राजा जगनाथ िसंह ने गदारी की अहमदशाह को सहयोग
देने का आशासन देकर आमंितत िकया तथा जब अहमदशाह घायल अवसथा मे उसके महल मे
आराम कर रहा था तब जगनाथ िसंह ने अहमदशाह को अपनी तलवार से काट डाला।
माचर 1858 ई.मे कािलन कैपबेल और आउटम ने लखनऊ पर जबरदसत हमले िकये। 6
माचर से 15 माचर 1858 ई. तक घमासान युद हुए। बेगम हजरत महल की वीरता से अंगेजी सेना
घबरा उठी थी। अंगेजी सेना के पैर लड़खड़ाने लगे थे। िकनतु गदारो ने िकले के गुपत रासतो की
जानकारी अंगेजी सेना नायको को देकर िकले मे सेना का पवेश करा िदया। 16 माचर 1858 ई. को
अंगेज सेना ने बेगम के महल और केसरवाग पर अिधकार कर िलया। 21 माचर 1858 ई. को पूरे
लखनऊ पर अिधकार कर िलया िकनतु बेगम सुरिकत िनकल आई थी।
बेगम के साथ 6 हजार सैिनक, शहजादा िबरिजस कदर तथा काफी धन था। इसी दौरान
अहमदशाह ने शाहजहापुर पर कबजा कर िलया था। बेगम ने नाना साहब तथा अहमद शाह के
साथ िमलकर शाहजहापुर को आज़ाद घोिषत कर बरेली के खान बहादुर का सहयोग कर अंगेजी
सेना को तबाह कर िदया। अंगेजो ने भारी सेना बरेली मे भेजकर युद िकया। खान बहादुर की
सेना के बहुत से बहादुर खेत हो गए। बेगम, नाना साहब, अहमद शाह बरेली से बचकर
शाहजहापुर आ गए। अँगेज सेना ने िफर शाहजहापुर पर आकमण कर िदया। अंगेजी सेना ने
अहमदशाह को घेर िलया, इसी समय अंगेजी सेना बेगम तथा नाना साहब को उतर की ओर
खदेड़ रही थी िकनतु अंगेजो के िपटू गदार राजा जंग बहादुर ने उनहे घेरने के िलए षणयंत रचा।
बेगम को जगह जगह किठनाई झेलनी पड़ी। अनेको देश भकतो ने उनका जगह जगह सवागत
भी िकया। बहुत मुिशकलो के बाद भी बेगम ने हार नही मानी तथा अंगेजो के सामने मतथा नही
झुकाया। बड़ी कोिशशो के बाद वे नेपाल मे पवेश कर पाई। सन् 1857 ई. की कािनत असफल
होने पर महारानी िवकटोिरया ने कमपनी को समापत कर भारत की कमान अपने हाथ मे ले ली। 1
नवमबर 1858 ई. को कई देशी रजवाड़ो ने अंगेजो से सिनध करली।
अंँून
नननन
ग न
ेज सरकार ने बेगम जीनत महल के पास पसताव भेजा िक वे अपने देश
वािपस आकर ऐशो आराम की िजनदगी िवताएँ। िकनतु बेगम को अंगेजो पर िवशास नही था।
सवािभमानी वेगम ने अंगेजो की अधीनता मे लखनऊ आना असवीकार कर िदया।
नेपाल की सीमा अपने सीिमत साधनो से बफरबाग नाम से एक छोटा सा महल बनवाया
िजसमे िमसजद और इमामबाड़ा भी था।
बेगम हजरत महल ने अपना जीवन एक बहादुर देशभकत कुशल पशासक एवं सवािभमानी
की तरह िजया। अपैल 1859 ई. मे जनत पसथान कर गई। बफरबाग महल की िमसजद के अहाते
मे ही उनहे दफना िदया गया।
भारत को वे आज़ाद तो नही करा पाई िकनतु भारत की आज़ादी की नीव मे उनके योगदान
का पतथर सथािपत है। सन् 1857 ई. की कािनत के शहीदो का जब समरण िकया जायेगा तब
बेगम हजरत महल का नाम बड़े सममान के साथ िलया जायगा।
एक नतरकी से बेगम बनी हजरत महल भारत की आतमा बनकर सदैव याद की जाती
रहेगी।

मुहममद वखत खा
आजादी के पथम संगाम सन् 1857 ई. के वीर सैनािनयो मे सदा इजजत के साथ याद
िकया जाने वाला एक और महतवपूणर नाम है मुहममद वखत खा का। मुहममद वखत खा राषटवादी
सेना का सेनापित था, बहुत वीर, साहसी तथा देशभकत। मुहममत वखत खा रहेल खणड को
आज़ाद कराकर बहादुर शाह जफर की मदद के िलए िदलली आ गया था। मुहममद वखत खा के
साथ, बड़ी संखया मे तोपे, अनेको घुड़सवार तथा पैदल सेना थी।
मुहममद वखत खा को िदलली आने पर शाही दरवार मे उसे िसपह सालार (सेना पित) की
उपािध से िवभूिषत िकया गया। िदलली मे मुहममद वखत खा को जनरल बखत खा के नाम से जाना
जाने लगा था। बादशाह िदलली ने उनहे चार हजार रपये, ढाल और तलवार देकर सममािनत
िकया था।
वखत खा योगय, और दृढ़ िनशयी था। उसने िदलली मे अंगेजो के िवरद भयंकर लड़ाइया
लड़ी। मेरठ से आए कािनत सैिनको ने मुहममद वखत खा की बहादुरी से खुश होकर उसे अपना
सेनापित मान िलया था।
शहाजादा िमजा मुगल को बादशाह ने युवराज घोिषत िकया था, िजससे उनकी बेगम
जीनत महल अपसन थी। वह अपने पुत, जवा वखत को युवराज बनाना चाहती थी। बेगम
जीनत महल का िपता इलाही वखत अंगेजो से िमला हुआ था। जनरल वखत खा को सेनापित
बनाने तथा उसे सममािनत करने के कारण िमजा मुगल, नीमच पलटन का कमानदार मुहममद
गौस, बेगम जीनत महल तथा उसका िपता इलाही वख्ून न
़श िचढ़ गए और उसके िवरद तरह-
तरह के षणयंत रचने लगे। इनके षणयंतो की बाते मुहममत बख्ून न
़त खा ने बादशाह को
बतलाते हुए कहा था,बादशाह मै अनुशासन पसनद हू,ँ मै नही चाहता िक शाही खानदान से
ताललुक रखने वाले लोग कोई गलत काम करे तथा राजय के पित गदारी करे। यिद बादशाह का
मुझपर भरोसा है तो मै सेवा करने को तैयार हूँ िकतु मै िकसी भी गलत काम को माफ नही
करँगा, चाहे वह भले ही शहजादा या शाही आदमी ही कयो न हो।
बादशाह ने उसकी माग सवीकार करते हुए उसे िदलली का गवनरर तथा सेना का पधान
सेनापित बना िदया।
मेरठ के कािनतकािरयो के िदलली आने की खबर िबिटश सेनापित जान लारेनस को जैसे
ही िमली उसने िदलली के िवरद आकमण करने हेतु भारी सेना तथा गोलाबारद लेकर एनसन को
भेजा। 30 मई 1857 ई. को िहडसन नदी ( िदलली से 17 िक.मी. दरू ) मोहन नगर गािजयाबाद के
िनकट) अंगेजी सेना से मेरठ के कािनतकारी तथा िदलली की सेना ने भयंकर युद िकया।
अँूननननन
ं ग ेज न सेना बहुत देर िटक नही सकी तथा भाग खड़ी हुई। 31 मई 1857 ई. को िफर
युद हुआ िजसमे मेरठ के कािनतकािरयो तथा वख्ून न
़त खान की सेना ने अँगेजी सेना को
जमकर धुना, िकनतु अंगेजी सेना ने कोिधत होकर गाम वािसयो के घरो मे आग लगा दी। िहडसन
नदी के युद से कािनत सेना जब िदलली की ओर लौट रही थी तब जैसे ही सेना यमुना नदी के पुल
को पार करने लगी तभी पुल को बारद से उड़ा िदया िजसमे लगभग दो सौ िसपाही मय युद
सामगी के यमुना की लहरो मे समा गए।
8 जून 1857 ई. को रात मे 2 बजे अंगेज िबगेिडयर गाट तथा बरनाडर ने आगे पीछे से
कािनत सेना पर धावा बोला िकनतु बहादुर बखत खा के नेतृतव वाली िदलली सेना ने अंगेजी सेना
को बहुत कित पहँुचाई।
जनरल एनसन ने 12 जून 1857 ई. को िदलली िकले को फतह करने की तमना लेकर घेरा
डाल िदया। 18 जून 1857 ई. तक लगभग 20 बार हमले िकए िकनतु इन हमलो मे अंगेजो की ही
तबाही हुई। 5 जुलाई 1857 ई. को िबिटश सेनापित बरनाई हैजे से मर गया। रीड को िबिटश
सेना का नया सेनापित बनाया गया वह 17 जुलाई 1857 ई. को तयागपत देकर भाग गया। इसके
बाद िवलसन (चौक) सेनापित बना। जनरल बखत खा की पलटन बरेली िबगेड िबलसन का ऐसा
सवागत िकया िक वह घबरा गया तथा उसने आदेश िदया िक राषटवादी सैिनको का पीछा न िकया
जाय। 14 जुलाई 1857 ई. को अंगेज अफसर िहल को घोड़े से नीचे िगरा िदया। तभी पास मे
खड़े मेजर टामस ने अपनी िपसतौल से उसे गोली मार दी। राषटवादी सैिनको ने टामस तथा िहल
को लथपथ कर िदया।
कािनत सैिनको मे अपार साहस था, मुहममद बखत खा के सेनापिततव मे अंगेजो से भीषण
युद कर रहे थे। सैिनको को महीनो से वेतन नही िमल पा रहा था। सैिनको को महीनो से वेतन
नही िमल पा रहा था। खाने पीने की वयवसथा नही थी िफर भी सैिनक उतसाह के साथ अंगेजो से
दो दो हाथ करने मे लगे हुए थे। जनरल बखत खा की राषटवादी सेना के िलए भोजन नही था, 01
अगसत 1857 ई. को जनरल बखत खा ने बादशाह को िचटी िलखी िक मेरी 2000 की सेना तीन
िदन से भूखी लड़ रही है इनहे 100 मन भुने चने िभजवा दीिजए। बादशाह ने असमथरता वयकत
करते हुए शाही जेबरात सैिनको के सामने रखते हुए कहा -
``इनहे बेचकर खाने की वयवसथा कराई जाय।´´
सैिनको ने जेवरो को हाथ भी नही लगाया और कहा, हमे संतोष है िक आप हमारे िलए
तन, मन, धन से समिपरत है, हम भूखे रहकर भी वतन की आजादी को लड़ते रहेगे।
बेगम जीनत महल, उसका िपता इलाही बख्ून न
़श , शाही हकीम एहसन उललाह, नीमच
पलटन का कमानदास मुहममद गौस तथा शहजादा िमजा मुगल तथा शहजादा जवा बखत, जनरल
बखत खा से िचढ़ने लगे और षणयंत करने लगे। इलाही बखस अंगेजी सेना को सूचना देता था।
इलाही बखस को आधी रात के समय बखत खा ने संिदगध हालत मे यमुना िकनारे अंगेज सैिनको
से बात करते हुए देखा। बखत खा ने बादशाह को पूरी बात बतलाई तथा इलाही बखश की
िनगरानी मे कुछ सैिनक लगा िदए।
7 अगसत 1857 ई. को िबगेिडयर जनरल िनकलसन ने भारी सैनय सामगी के साथ नफ़जगढ़ के
पास डेरा डाला। 25 अगसत 1857 ई. को िबगेिडयर िनकलसन ने बािरस के दौरान ही आकमण
बोल िदया िजससे कािनत सेना लड़खड़ा गई।
7 िसतमबर 1857 ई. को रात के अंधकार मे मोटी गेट के करीब अंगेजी सेना ने तोपखाना
जमाया। 10 िसतमबर 1857 ई. को कािनतकािरयो के पास मात 60 मन बारद तथा 20,000
गोिलया बची थी। बादशाह ने सभा ली तथा कहा यिद आप लोग कहे तो युद रकवा िदया जाय।
सैिनको ने एक सवर मे कहा हम अिनतम दम तक युद करेगे। 11,12,14 िसतमबर 1857 ई. को
िदलली पर हमला िकये गए िकनतु कािनत सेना, बखत खा की बरेली िबगेड ने मुँहतोड़ जबाव िदया
। इसी समय नीमच पलटू न के कमानदार मुहममदगौस ने बखत खा से बगावत कर दी। िफर भी
बखत खा ने बगैर परवाह िकए 15,20,18,19 तथा 20 िसतमवर को कशमीरी गेट, चादनी चौक,
लाहौरीगेट,गली गुिलयान मे सात बार अँगेजी सेना को ट ôा दी ।
20 िसतमबर को जनरल िबलसन, जनरल िनकलसन, कैमपबेल और जोनस मे एक साथ
लाल िकले पर हमला बोला। इस समय बादशाह एवं उनका पिरवार, हुमायूँ के मकबरे मे चले गए
थे। गदार इलाही बखश, मुहममद गौस, बेगम जीनत महल ने बहादुरशाह जफर को कैद करवाने
का षणयंत रचा। लाल िकला अंगेजो ने कबजे मे कर िलया था।
योगय तथा दृढ़ िनशयी बखत खा ने बादशाह से कहा, ``िदलली गई तो कया हुआ, भारत
हमारा है, लड़ाई अनत तक जारी रखेगे। मेरे साथ चिलए। सवतंतता का युद खतम नही होने
देगे। बादशाह की बेगम और िमजा इलाही बखश चकर चला रहे थे िक अंगेजो के सामने आतम
समपरण कर दे। वखत खा कतई सहमत नही हुआ। उसकी एक न चली। 21 िसतमबर 1857 को
इलाही बखश ने मेजर हड़सन को हुमायूँ के मकबरे पर बुलाकर बहादुर शाह को िगरफतार करवा
िदया।
बहादुर मुहममद बखश खा ने बड़ी वीरता के साथ िदलली की रका तथा भारत की आजादी
के िलए युद लड़े िकनतु गदारो की चालो मे फंसे बादशाह के बंदी हो जाने पर वह बादशाह को
अंितम पणाम करके इितहास के पटल से ओझल हो गये। िजनहे अँगेज सेना कभी भी नही पा
सकी।

वीर नारायण िसंह

यह सतय है िक पथम सवतंतता संगाम की शुरआत मेरठ से मानी जाती है तथा पथम
पुषप के रप मे मंगल पाणडेय ने अपने पाण समिपरत िकए थे िकनतु आजादी की िचनगारी समपूणर
भारितयो के िदलो मे सुलग रही थी। देश के कोने -कोने से नर नारी इस महायज मे अपना सवरसव
समिपरत करने के िलए तड़प रहे थे ऐसी िसथित मे मधय पानत, िवनधय, छतीसगढ़ भी इसमे पीछे
कयो रहेगे षोषो इनही बिलदानी वीरो मे जमीदार, वीर नारायण िसंह का नाम बडे़ून सममान के
साथ िलया जाता रहेगा।
वीरनारायण, आिदवासी छतीसगढ़ केत के रायपुर िजले के सोना खाना के जमीदार शी
रामराय के पुत थे। राम राय देश भकत एवं कतरवय परायण थे। उनकी मृतयु के बाद उनके बेटे ने
सन् 1830 ई. मे सोना खाना की जमीदारी समहाली। वीरनारायण िपता की तरह दयालु िनभीZ क
जन िहतकारी तथा देश भकत की भावना से ओत पोत थे।
सन् 1856 ई. मे सोनाखाना केत मे सूखा पड़ गया। भयंकर अकाल की िसथित उतपन हो
गई। धान का कटोरा दाने दाने को मोहताज हो गया। लोग भूखे मरने लगे। खेतो मे बोने के
िलए बीज नही थे। दस ू री ओर वयापािरयो के भणडार भरे हुए थे। पीिड़त जनता ने गाम करोद के
एक वयापारी से पाथरना की िक वह खेतो मे बोने और खाने के िलए अनाज
उधार दे दे तथा फसल आते ही वह उनका मय सूद के अदा कर देगे िकनतु वयापारी सहमत नही
हुआ। तसत होकर पीिड़त लोग अपनी पाथरना लेकर जमीदार वीर नारायण िसंह के पास पहुँचे।
वीरनारायण िसंह ने भी वयापारी को समझाया िक ये वही लोग है जो हर वषर आप से अन उधार
लेते थे तथा फसल आने पर तुमहे लौटा देते थे। इस अकाल के समय मे भी तुमहे इनकी मदद
करनी चािहए। वयापारी ने बहाना बनाकर कह िदया िक इस वषर उसके पास इतना अनाज नही है
िक वह इन लोगो को दे सके।
जमीदार वीरनारायण िसंह ने अपने कमरचािरयो को आदेश देकर वयापारी के अन भणडारो
से जररत मंदो को अनाज बंटवा िदया। वयापारी ने रायपुर के िडपटी किमशर के पास िशकायत
कर दी िक जमीदार ने उसके घर डाका डालकर सब कुछ लूट िलया है। उस समय रायपुर मे
िडपटी किमशर इिलयट पदसथ था। वह बहुत चालाक तथा कूर था। वह वीरनारायण
िसंह की जमीदारी हड़पने की ताक मे था, उसे तो मौके की तलाश थी। उसने वीरनारायण िसह
को िगरफतार करने का आदेश दे िदया। वीरनारायण को 24 अकटू बर 1856 ई. को िगरफतार
करके रायपुर की जेल मे डाल िदया गया। अपने िहतैषी जमीदार को िगरफतार होने की खबर
सुनकर जनता भड़क उठी। जनता ने बगावत कर दी। अँगेज सरकार ने दमन चक चलाया।
जनता व सरकार के बीच झड़पे होने लगी। अँगेज सरकार िजतनी शिकत से बगावत को दबाने
का पयास करती, जनता उतनी अिधक उग होती गई । कई लोगो की जाने गई। जनता ने जेल
पर धावा िकया तथा वीर नारायण को जेल से िनकाल ले गए।
वीरनारायण िसंह ने युद की तैयािरया पारमभ कर दी। उनहोने आिदवािसयो की िवशाल
सेना तैयार की। आस-पास के जमीदारो को भी अँगेजो के िवरद युद करने के िलए आमंितत
िकया।
रायपुर के िडपटीकिमशर इिलयट ने ले. ििसमथ को भारी सेना सिहत सोनाखाना के
जमीदार पर आकमण करने का आदेश िदया। वीर नारायण िसंह पूणर रप से युद की तैयारी कर
चुके थे।
ले. ििसमथ 10 नवमबर 1857 ई.को रायपुर से सोनाखाना के िलए रवाना हुआ।
वीरनारायण के गुपतचरो ने ििसमथ की सेना को भटका िदया। ििसमथ को जब मालूम चला िक
उसे धोखा िदया गया है तो वह बौखला उठा। वीरनारायण िसंह ने अपने गाव के रासते मे बड़ी
उँची दीवाल खड़ी कर दी। ििसमथ ने अपनी सेना का पड़ाव करोदी गाव मे डाल िदया। कटंगी,
बड़ागाव, तथा िबलाई गढ़ के जमीदारो को भी उसने अपनी सहायता के िलए बुला िलया।
िबलासपुर से भी ििसमथ ने अपनी सहायता के िलए सेना बुला ली। उसने सोनाखान को आने
जाने वाले सभी रासते रोक िदए तािक गाव को रसद आिद सामगी न पहुँचने पाए।
देवरी का जमीदार यदिप वीरनारायण िसंह का िरशतेदार था, िकनतु वह भी ले. ििसमथ के
साथ हो िलया। देवरी सोनाखाना से दस मील दरू था। 30 नवमबर 1857 ई. को देवरी के गदार
जमीदार की मदद न िमलती देख वीरनारायण िसंह ने पहाड़ी का सहारा िलया। उसने पहाड़ी मे
मोचा
समहाला । पहाड़ी मे पहली जीत वीर नारायण िसंह को िमल गई। ििसमथ पुन: भारी सेना तथा
गोला बारद लेकर आ गया तथा पहाड़ी को घेर िलया। देवरी का जमीदार नारायण िसंह का
काका था, उसे गुपत िठकानो का पता था। उसने ििसमथ की सेना को गुपत िठकानो का पता
बता िदया। ििसमथ ने रसद बनद करा दी। वीर नारायण िसंह ने िछपकर तगड़ी मोचाबनदी कर
ली। अपने पुत तथा पिरवार के अनय लोगो को सुरिकत सथान पर भेज िदया।
1 िदसमबर 1857 ई. को ििसमथ गाव सोनाखाना मे घुस गया िकनतु उसने सोना खाना
खाली पाया। उसने सोना खाना गाव मे आग लगादी। कोिधत वीर नारायण िसंह ने रात के
समय ही ििसमथ पर पहाड़ से गोिलयो की बौछार कर दी। ििसमथ को जान बचाकर भागना
पड़ा। वीरनारायण िसंह की सेना भूखो मरने लगी। वीरनारायण िसंह अपनी जनता तथा
आिदवासी सैिनको को अपनी औलाद की तरह पयार करता था। उसने कहा मेरी बजह से िनदोष
जनता कयो मारी जाय। वह सवयं अपने पाणो का बिलदान करके अपने सािथयो को बचाने के
िलए तैयार हो गया। 5 िदसमबर 1857 ई. को नारायण िसंह रायपुर पहुँचा और िडपटी किमशर िम.
इिलयट के सामने आतम समपरण कर िदया।
िडपटी किमशर इिलयट तो वीरनारायण के पाणो का भूखा था। उसने वीरनारायण के
िवरद पकरण चलाने का नाटक रचा। पाच िदनो मे ही वीरनारायण पर राजदोह, चोरी, डकैती,
बगावत तथा िनदोष लोगो की हतया का दोषी बताकर फासी की सजा सुना दी। 10 िदसमबर
1857 ई. को रायपुर मे एक चौराहे पर सरे आम फासी पर लटका िदया गया। रायपुर के चौराहे
पर खड़ा जयसतमब आज भी इस वीर बिलदानी की देशभिकत का गुणगान कर रहा है।

सरसवती बाई लोधी

महारानी दुगावती के बावनगढ़ो मे पाटन भी एक राजय था।
सन् 1840 ई. के दरमयान पाटन राजय का राजा अजुरन िसंह लोधी था। लिलतपुर मे अँगेजो की
छावानी थी। राजा अजुरन िसंह लिलतपुर छावानी मे सूबेदार िनयुकत होकर लिलतपुर मे ही रहते
थे। सन् 1840 ई. मे राजा के यहा एक कनया का जनम हुआ िजसका नाम सरसवती रखा गया।
छावनी मे पली बड़ी होने के कारण सरसवती ने असत शसत चलाना घुड़सवारी आिद बालयावसथा
मे ही सीख िलए थे। वह बहुत सुनदर थी। जब वह पंदह वषर की हुई तो पहली जनवरी सन् 1855
ई. को छावनी मे शकुनतला नाटक खेला गया। उन िदनो छावनी का कपतान थोरंटन था।
सरसवती ने शकुनतला तथा थोरंटन ने दुषयंत का िकरदार िकया था। नाटक मे सरसवती ने
थोरंटन के पित जो पित भावना का पदशरन िकया उससे पभािवत होकर कपतान थोरंटन ने
सरसवती से िववाह का पसताव कर िदया।
सरसवती ने, कठोर शबदो मे पितवाद करते हुए कहा ``सुअर और िसंहनी´´ का समबनध
समभव नही होगा। इस अपमान से कपतान थोरंटन िचढ़ गया।
इस घटना के कारण राजा अजुरन िसंह ने सूबेदार के पद से सतीफा दे िदया तथा पिरवार
सिहत पटना आ गए। तथा उनहोने सरसवती का िववाह जलंधर सैदपुर के जागीरदार उमराव
िसंह से कर िदया।
कपतान थोरंटन वािपस लंदन चला गया। सरसवती ने एक पुत को जनम िदया। वह
अपने पिरवार मे सुखमय जीवन जी रही थी। थोरंटन पदोनत होकर िडपटी किमशर बनकर पुन:
लिलतपुर आ गया। उसके मन मे सरसवती की सुनदरता का आकषरण तथा अपने अपमान का
कोध समाया हुआ था।
भारतीय राजाओं मे भी कुछ सवाथी, लालची तथा गदार थे। थोरंटन ने पना के राजा को
लालच िदया तथा शतर रखी की वह पाटन तथा शाहगढ़ के राजा को बनदी बनाकर उसके सामने
पेश करे। पना राजा ने धोखे से पटना के राजा अजुरनिसंह तथा शाहगढ़ के राजा पवरत बली िसंह
को बनदी बनाकर दोनो को दमोह के टीले पर तोप से उड़वा िदया। अपने िपता की मौत का
बदला लेने के िलए सरसवती तथा उमराव िसंह ने पना राजा पर आकमण कर िदया। वह धायल
हो गया। थोरंटन ने अँगेजी सेना भेजकर जलंधर सैदपुर पर आकमण िकया। हथगोलो से िकले
को नष करवा िदया तथा उमराव िसंह को राजदोह के अिभयोग मे बंदी बना िलया। रानी
सरसवती गुपत रप से मड़ावर की गढ़ी मे रहने लगी।
इनही िदनो मदनपुर के चोरो ने पचास बैल चोरी कर िलए थे। रानी सरसवती घोड़े पर
चढ़कर गई और चोरो को घेर िलया। चोर घबराकर भाग खड़े हुए। रानी ने बैल गढ़ी मे वािपस
भेज िदये।
थोरंटन उन िदनो मदनपुर कैमप मे आया हुआ था। उसने रानी सरसवती की बहादुरी का
िकससा सुना। उसने रानी को कैमप मे िमलने को बुलवाया। रानी मुखतार वासुदेव के साथ
थोरंटन से िमली। मुखतार वासुदेव ने थोरंटन से कहा, रानी के पित तथा अनय समबनधी बनदी
है। थोरंटन ने रानी पर जाल फेका तथा कहा आप अपील करो, मै िबचार करँगा तथा समभव
हुआ तो उनहे मुकत कर दँगू ा। रानी ने अपील की। थोरंटन ने अपने अपमान का बदला लेने के
िलए रानी के सामने एक शतर रखी यिद रानी सरसवती मुझसे शादी करने का बचन दे तो
उमराविसंह तथा उसके िरशतेदारो को िरहा िकया जा सकता है नही तो सभी को फासी पर
लटका दँग ू ा।
रानी िबचार करने का बचन देकर वािपस आई। उस समय थोरंटन की कैद मे 1360
बागी बंदी थे। बािगयो के समबिनधयो ने रानी से दुहाई देते हुए बािगयो को बचाने की गुहार की।
रानी अपने पुत को िजठानी की गोद मे सोप कैमप मे थोरंटन के पास गई। थोरंटन ने अपील
सवीकार करली तथा शादी की शतर दोहराई। रानी कुछ घनटो की मोहलत लेकर डाक बंगले आई
और जनता को थोरंटन की शतर बताकर कहा-``मै धमर संकट मे हूँ आप लोग बताएँ मै कया करँ।
जनता ने िनणरय रानी पर रही छोड़ िदया। रानी ने थोरंटन से शादी का फैसला िलया िकनतु वे
बेहोश होकर िगर पड़ी। यह समाचार थोरंटन को जब िमला तब वह डाक बगला मे पहँुच गया।
जब रानी को होश आया उस समय थोरंटन उनके सामने था।
तेरह सौ साठ देश भकतो के पाणो के बदले रानी ने भगवान से कमा मागते हुए थोरंटन से
शादी की बात सवीकार करते हुए कहा िक मैने एक वरत रखा है िजसके छ: माह बचे है तब तक
आप मुझे छुऐगं े नही। थोरंटन रानी का आिशक हो गया था, उसने शतर मान ली। बंदी मुकत कर
िदए गए। रानी थोरंटन के साथ चल दी।
छ: माह की अविध पूणर होने वाली थी। अिनतम िदन रानी ने शृँगार िकया। शी कृषण की
पूजा की। रानी ने भजन गाया, ``पभु मेरे औगन िचत न धरो।´´ थोरंटन भाव िवभोर हो उठा। वह
रानी का आिलंगन करने के िलए बेताव था। वह रानी को अपनी बाहो मे भरने हेतु आगे बढ़ा।
रानी ने शतर याद िदलाते हुए कहा, ``आज अिनतम रात है।´´
थोरंटन ने भूल सवीकार ली तथा पीछे हट गया। रानी ने एक पत िलखा-
``तुम िवदेशी आकानता जरर हो िकनतु तुमने एक भारतीय नारी की इजजत को सुरिकत
रखने मे अपने बचनो का पालन िकया, मै तुमहे धनयबाद देती हूँ।´´
रानी ने अँगूठी का हीरा चबाकर अपने पाण दे िदये। सुबह जब थोरंटन वहा आया, तब
रानी के सीने पर रखे पत को पढ़कर अचेत हो गया। कहा जाता है िक रानी की याद मे वह
पागल हो गया था।
देश की आजादी और सतीतव की रका के िलए रानी सरसवती बाई लोधी ने अपने पाणो की
आहुित दे दी।
िहनदुसतान का इितहास इस वीर नारी का सदैव शदा के साथ गुणगान करता रहेगा।

वीरागना अवंती बाई

अंगेजो की हड़पनीित की िवरोध तथा आज़ादी की िचनगारी संपूणर भारत मे सुलग उठी
थी। रानी झासी लकमीबाई ने अंगेजी सता से बगावत कर दी थी। बहादुर शाह जफर, नाना
साहब, तातया टोपे, राजाकुँवर िसंह वीर नारायणिसंह ने खुलकर युद छेड़ िदये । ऐसे वातावरण
मे मधय भारत के वीर कैसे पीछे रह सकते 1
म.प. के मणडला िजले मे एक छोटी सी िरयासत थी रामगढ़। वहा का राजा िवकमजीत
लोधी था। कहा जाता है िक दलपित शाह - दुगावती के वंशज राजा िनज़ाम शाह ने पसन होकर
अपने सेनापित मोहन िसंह लोधी को पुरसकार मे रामगढ़ की जागीरी दी थी । मोहन िसंह के पुत
गजिसंह ने रामगढ़ को सवतंत राज घोिषत कर िदया था। इनही गजिसंह की तीसरी पीढ़ी मे
िवकमजीत रामगढ़ के राजा थे।
इनही िदनो मनकोड मे जुझार िसंह जागीदार थे। उनके घर 16 अगसत, 1831 ई. को एक
कनया का जनम हुआ। जुझार िसंह की यह बेटी बहुत होनहार और कुशाग बुिद थी। जुझार िसंह
ने अपनी लाडली को असत-शसत का संचालन, वयायाम तथा घुड़सवारी की अचछी िशका दी थी।
जुझार िसंह ने अपनी पुती का िववाह रामगढ़ के राजा िवकम जीत से िकया था।
िवकमजीत िसंह धमर परायण थे । उनका अिधकाश समय पूजा पाठ मे बीतता था। राजकाज के
कामो मे उनकी रिच कम रहती थी। अत: राजय के संचालन का काम भी अवंतीबाई को ही
संभालना पड़ता था। अवंती बाई के दो पुत पैदा हुए-बडे़ून का नाम अमान िसंह तथा छोटे
का शेर िसंह रखा गया।
राजा िवकमजीत के असवसथ रहने के कारण वाइसराय डलहोजी ने उनके राजय को
हड़पने की चाल चली।
उसने रानी को एक फरमान भेजा िक आपके पित िवकमजीत पागल हो गए है। अब वे
राजय करने के योगय नही है। राजय संचालन की देख रेख हेतु एक अनुभवी अफ़सर की िनयुिकत
की गई है जो रामगढ़ का काम काज देखेगा।
´´डलहोजी कौन होता है, मेरे राजय पर अिधकारी थोपने वाला। मै उसकी गुलाम नही
हूँ। मै अपना राजय चलाने मे सकम हूँ। जब तक मेरा बेटा राजय चलाने योगय नही हो जाता, मै
सवयं अपना राजय चलाऊँगी।`` रानी ने डलहौजी को कड़ा पत भेज िदया।
डलहौजी बड़ा चालाक और धूतर था। वह भारतीय राजाओं को आपस मे लड़ाता था।
एक का साथ देकर दस ू रे को परािजत करा देता था तथा िवजयी राजा को अपने अधीन कर लेता
था। डलहौजी की इस हड़पनीित का वयापक िवरोध हो रहा था। रानी अवंतीबाई के रामगढ़ को
वह हड़पना चाहता था।
इधर रानी अवंती बाई भी शानत बैठने वाली नही थी। उसने अपने सभी जागीरदारो,
मालगुजारो तथा पड़ौसी राजाओं को एकत करने हेतु संदेश िभजवाया िक उनको अपने देश के
िलए तयाग और बिलदान को ततपर रहना चािहए। रानी ने उनहे धमर ईमान और इषदेव की शपथ
िदलाकर कहा िक या तो सवदेश की रका के िलए पाणो की आहुितया देने के िलए तैयार होकर
आगे आएँ या चूिड़या पहनकर औरतो की तरह घर के भीतर बैठे रहे।
उन िदनो मणडला का राजा शंकर शाह था। डलहौजी ने मणडला पर आकमण कर
िदया। शंकरशाह तथा उसका बेटा रघुनाथ शाह बड़ी बहादरू ी से लड़े िकनतु डलहौजी ने उनहे
धोखे से िगरफतार कर िलया।
शाहपुरा एक छोटी सी िरयासत थी। इसका राजा जगजीत िसंह था। उसका माल
गुजार बलदेव ितवारी था। बलदेव ितवारी जगजीत िसंह, रघुनाथ शाह आिद ने अँगेजो के िवरद
जनमानस को एकत िकया। अँगेजो के खुिफया तंत को इस बगावत की जानकारी लगी।
अँगेजो ने ततकाल बगावत को कुचलने तथा िवदोह को दबाने की योजना बनाई।
कैपटन वािडंगटन ने एक िवशाल सेना लेकर शाहपुर पर आकमण बोला। जगजीत िसंह ने
बहादुरी से सामना िकया और नारायण पुर मे अँगेजो की छावनी को तहस-नहस कर डाला।
शाहपुर आजाद हो गया। अँगेजो की पूरी सैिनक छावनी भारतीयो के कबजे मे आ गई। भारी माता
मे असतो-शसतो का भणडार भारतीयो के हाथ लगा । अवंतीबाई ने मणडला को आज़ाद कराने के
िलए खैरी नामक गाव पर डेरा जमाया।
अवंती बाई के डर से भागता हुआ वािडंगटन उधर से ही िनकला।अवंतीबाई ने उस पर
घेरा डाला। वह बड़ी वीरता से लड़ा िकनतु रानी ने तलवार से उस पर भीषण वार िकया। उसका
घोड़ा एक कदम हट गया। वािडंगटन तो बच गया िकनतु वार घोड़े की गदरन पर पड़ा। घोड़े की
गदरन कट गई और वािडंगटन जमीन पर िगर पड़ा। रानी ने उसके सीने पर लात रखकर तलवार
गदरन पर रख दी। वािडंगटन पाणो की भीख मागते हुए िगड़िगड़ाने लगा। भूल से भी कभी
आकमण न करने की कसमे खाई।
नारी दया और ममता की मूितर होती है। अवंती बाई भी एक ममतामयी मा थी। उसके
िदल मे दया उमड़ आई। दया मे उसने यह भी नही सोचा िक साप को जीिवत छोड़ना घातक
होता है। वे उस चालाक, धूतर अँगेज पर िवशास कर बैठी । रानी ने उसे छोड़ िदया। मणडला
पर रानी ने िवजय पापत कर ली। डलहौजी दारा िनयुकत अफसर तहसीलदार को मौत के घाट
उतारकर रानी ने रामगढ़ मे िवजया दशवी का पवर ज़श के रप मे मनाया।
रानी अंवतीबाई की िवजय पर पूरे मधय पानत मे उतसाह की िकरण जाग उठी। इस खुशी
की लहर ने अनय राजाओं और जागीरदारो का हौसला बढ़ाया। बहादुर िसंह लोधी ने शाहपुर का
मोचा संभाला। सलीमनाबाद छावनी के भारतीय सेिनको ने अँगेजो से बगावत कर दी। वे पाटन
जाकर सूबेदार बलदेव ितवारी से जा िमले। िवजय राघवगढ़ का शासक सूरज पसाद रानी अवंती
बाई के साथ िमलकर सशसत िवदोह की तैयारी मे जुट गया।
रानी अवंतीबाई के बगावती तेवर तहसीलदार की हतया और मणडला को आज़ाद कराने से
बौखलाए डलहौजी ने जबलपुर किमशर के माफरत 26 अगसत,1857 ई. को अवंतीबाई को नोिटस
िभजवाया िक तीन िदन के भीतर रानी किमशर के सामने हािजर होकर उस पर लगे आरोपो का
जवाब दे या िफर पिरणामो को तैयार रहे।
रानी कहा किमशर के आदेश को मानने वाली थीषोषो उसने अँगेज किमशर के आदेश की
अवहेलना कर रामगढ़ की सुरका वयवसथा को मजबूत िकया। सभी जमीदार, जागीरदार एकत
कर िलए।
18 िदसमबर, 1857 ई. को कैपटन वािडंगटन ने िवशाल सेना लेकर रामगढ़ पर आकमण
बोल िदया। वह रानी के सामने उठाई कसमे भूल गया था, बिलक अपने अपमान का बदला लेने
पर उतार था। वािडंगटन ने िवजय राघव गढ़ पर आकमण िकया । राजा सूरज पसाद ने घुटने
टेक िदए। सूरज पसार बंदी बना िलया गया। उसने जबलपुर के संगामपुर, सलीमनाबाद तथा
नारायण गंज पर िवजय पापत कर ली। उतसाह से भर कर 15 जनवरी, 1858 ई. को कैपटन
वािडंगटन ने रामगढ़ पर घेरा डाल िदया। रानी अवंतीबाई ने सभी दार बंद करवा िदए। उसकी
पुरष और मिहला दोनो सेनाएँ िकले की रका के िलए िनयोिजत सथान पर डट गई। अँगेजी सेना
के अनेको सैिनक मारे गए। बारद की भारी बरबादी हो चुकी थी। उसके पैर उखड़ने लगे थे।
वािडंगटन को डर था िक कही दुबारा रानी के हाथो पड़ गया तो इस बार तो गदरन उड़ा ही देगी।
उसे इस आकमण पर बड़ा पछतावा आ रहा था। वह बड़ी दुिवधा मेेन था, तभी रीवा नरेश
की ओर से सूचना िमली िक उसकी अँगेज सेना की मदद हेतु पहुँचने वाली है। इस गदार राजा ने
नन
वािडग्टन
ं ं की िहममत बढ़ा दी। उसके उखड़ते कदम थम गए।
लगातार 6-7 माह तक अँगेज सेना रीवा नरेश की मदद के साथ रामगढ़ के िकले पर घेरा
डाले रही। िकले अंदर आने जाने के सभी रासते बंद थे। रसद आपूितर भी बंद। रसद की कमी
होने लगी। अनतत: रानी अंवतीबाई ने िकले से बाहर िनकलकर युद लड़ने की योजना बनाई।
अमावसया की कालीगत मे रानी अपनी अंगरकक िगरधारी बाई तथा कुछ िवशासपात
सैिनको के साथ गुपतसुंरग से िनकलकर देवगढ़ की पहािड़यो की ओर चली गई और छापामार
युद की योजना बनाई। रानी के समथरक कािनतकारी सैिनक भी देवगढ़ की पहािड़यो मे पहुँच
गए। वािडंगटन समझ रहा था िक रानी िकले मे ही है। वह िकले पर घेरा डाले रहा तथा
कािनतकारी उसकी सेना पर गुिरलला आकमण करके उसके सैिनको को मारते रहे।
घर का भेदी लंका ढाये, की कहावत वािडंगटन को जीवनदान सवरप िमली। उसे मालूम
चल गया िक रानी देवगढ़ की पहािड़यो मे छुपकर युद संचालन कर रही है। 20 माचर, 1898 ई.
अशुभ घड़ी बनकर आया। वािडंगटन ने रीवा तथा अनय गदार राजाओं की मदद से देवगढ़ के
जंगलो मे रानी पर घेरा डाला। रानी की सेना ने भयंकर युद िकया िकनतु मुटी भर सैिनक
तलवारो की दम पर कब तक िटकते। एक के बाद वीरगित को पापत होते गये। वािडंगटन ने
रानी को आतमसमपरण करने का पलोभन िदया। उसने
कहा मेजर असरकाइन उनहे तथा उनके बेटो को जीवनदान दे देगा उनके साथी कािनतकािरयो को
भी कमा दे दी जायेगी। उनहे तथा उनके पुून नननन
़त ोन को जीवन िनवाह भता िदया जायेगा
िकनतु रानी पहले ही उसकी कसमे आजमा चुकी थी उनहोने उस पर िवशास नही िकया। रानी
अवंतीबाई तथा िगरधारी ने िनशय िकया िक अँगेजो के हाथो मे पड़ने से तो अचछा है लड़ते-
लड़ते पाणो का बिलदान। रानी अंवतीबाई तथा िगरधारी ने `मरता कया न करता´ की भावना से
रणचणडी का रप धारण कर अँगेजो पर बरस पड़ी।दुशमन सेना मे हा हाकार मच गया।
ाानननन
वाािडं गननन
टन घायल होकर भाग खड़ा हुआ। रानी के साथ उनके थोड़े से िवशासपात
बचे थे िजनमे उमराव िसंह भी था। रानी भी घायल हो गई थी । उनहोने उमराविसंह से कहा-
´´उमराव भैया, अँगेज मुझे जीिवत पकड़ना चाहता है। दुशमन के अपिवत हाथ मुझे छू सके,
इसके पहले मै अपनी जीवन लीला समापत करना चाहती हूँ।``
``बिहन अंवती जब तक तुमहारा भाई उमराव जीिवत है तुमहे िचनता
नही करनी चािहए। मुझे अपनी तलवार का जौहर िदखाने दीिजए।´´
सचमुच वह शतुओं की सेना को गाजर मूली की तरह काटते काटते बहुत आगे बढ़ गया था।
रानी को लगा िक अब वे दुशमन से िघर गई है
उनहोने िगरधारी से कहा ´´िगरधारी अब समय आ चुका है महा पयाण का। अब हमे शरीर
तयागना होगा।´´ दोनो एक दस ू रे के गले िमली। कटार हाथ मे हाथ मे ली ऊपर उठाई और पूरी
शिकत से अपने सीने मे घोप ली। हर-हर महादेव, जय भारत, जय भारत माता के जयघोष के
साथ जमीन िगर गई।
रानी को िगरा देख वािडंगटन ने युद रोक िदया और रानी के पास
पहुँचा। रानी को ततकाल उपचार देकर होश मे लाने का पयास िकया।
वािडंगटन ने रानी अवंती बाई को सममान पूवरक सलामी देकर पूछा, आपको िवदोह के िलए िकसने
उकसाया और तुमहारे साथ कौन-कौन हैषोषो रानी ने कहा -``इस युद के िलए मै अकेली
िजममेदार हूँ िशफर मै और हिर ओम।´´
रानी िचरिनदा मे सो गई। 20 माचर 1858 ई. को महारानी अवंतीबाई ने इस दुिनया से पसथान
िकया। 21 माचर 1858 ई. को पालकी से रानी को रामगढ़ लाया गया।
भारतीय सवतंतता संगाम मे रानी अवंतीबाई का बिलदान पेरणादायक बना और अनेक
लोगो ने आजादी के इस अिभयान मे अपने पाणो की आहुित दी।
रामगढ़ की रानी बीरागना अवंतीबाई लोधी का नाम अमर सेनािनयो के साथ सदैव सममान
के साथ िलया जाता रहेगा। मधय पदेश बड़े गौरव के साथ अपनी लाड़ली के शोयर का यशगान
करता रहेगा।
कुँअर चैनिसंह

सन् 1857 ई. की कािनत के पूवर से ही भारतीय राजा अँगेजी सरकार के िवरद बगावत
करते रहे है । इनमे बड़े सममान के साथ नरिसंहगढ़ के राजा कुँवर चैनिसंह का नाम पमुख है ।
कुँवर चैन िसंह राजगढ़ िजले के नरिसंहगढ़ के राजा थे । नरिसंहगढ़ के पास ही सीहोर मे
अँगेजी छावनी थी । इस छावनी मे अँगेज अफसर मैडॉक बहुत चालाक था। वह भारतीय
राजाओ की गितिविधयो की एक एक जानकारी पापत करता रहता था । यह जानकारी वह उसी
राजा के मंितयो या खास किरनदाओं से पापत करता था। उनहे लालच देकर अपनी ओर िमला
लेता था। तथा राजाओं की गोपनीय हर बात का पता रखता था।
कुँवर चैन िसंह के राजय का महामंती आनंद दास बखशी तथा एक अनय मंती रपराम
बोहरा अँगेज अफसर मैडॉक को गोपनीय जानकारी देता था। कुँवर चैन िसंह को यह जानकारी
िमली तो उसने दोनो को अपनी तलवार से मौत के घाट उतार िदया। इन िवशास घाितयो ने
मैडॉक को बतलाया था िक चैनिसंह देशी राजाओं से िमलकर बगावत करने की योजना बना रहा
है। मैडाक ने चैनिसंह को सबक िसखाने की योजना बनाकर मृतको के पिरवार वालो से गवरनर
जनरल के पास चैनिसंह की िशकायत करवाई। गवनरर जनरल ने मैडॉक को जा0161च ं करने
की िजममेदारी सौपी।
मैडाक ने चैनिसंह को सीहोर बुलाया। चैनिसंह ने सीहोर जाने से इनकार कर िदया।
कुछ िदनो बाद मैडाक ने बैरिसया मे कैमप लगाया तथा चैनिसंह को बैरिसया बुलाया।
चैन िसंह बैरिसया कैमप मे अपने दल बल सिहत पहँुच गया। मैडाक ने चैन िसंह पर तीन
शते थोपनी चाही।
(1) आप नरिसंह गढ़ हमेशा के िलए छोड़ दे।
(2) नरिसंह गढ़ राजय अँगेजी सता के अधीन रहेगा।
(3) नरिसंह गढ़ केत मे अफ़ीम की खरीद कमपनी सरकार करेगी।
कुँ चैनिसंह ने मैडॉक की शते मानने से साफ इनकार कर िदया। तथा नरिसंहगढ़ वािपस
आ गये। मैडॉक ने पुन: संिध पत भेजा िक 24 जून 1824 को यिद चैनिसंह सीहोर आकर चचा
करे तो शतो मे ढील दी जा सकती है। कुँवर चैनिसंह 24 जून 1824 ई. को सीहोर पहुँचे।
मैडॉक ने उनका बहुत आदर सतकार िकया।
कुँवर चैनिसंह उस समय दो तलवारे लटकाए हुए थे। मैडॉक ने राजा से पूछा, आप दो
तलवारे कयो रखते है षोषो चैनिसंह ने उतर िदया मेरी एक तलवार देश से गदारी करने वाले
भारतीयो की गदरन काटने के िलए और दस ू री हमारे साथ गदारी करने वाले अँगेजो की गदरन
काटने के िलए है।
मैडॉक बोला, राजा साहब हम तो आपके िमत बन गए है। हमारी ओर से आपके साथ दगा
होने का तो सवाल ही नही बचा। आप हमे वह तलवार िदखा सकते है जो आपने अँगेजो की गदरन
उड़ाने हेतु टाग रखी है। राजा ने मैडॉक को अपनी तलवार देखने हेतु दे दी। चैन िसंह पूणर रप
से चौकने थे। जबिक मैडॉक मौके की तलाश मे था िकनतु चैनिसंह ने जरा सी भी लापरवाही
नही की। मैडाक ने पैतरा बदला, और िफर बोला। राजा साहब, जरा अपनी दस ू री तलवार
िदखाइये मै दोनो मे तुलना करना चाहता हूँ। राजा समझ गए िक यह मेरी दोनो तलवारे छीन कर
मुझपर हमला करना चाहता है।
``राजपूत कभी िबना तलवार के नही रह सकता। मै आपको दस ू री तलवार नही दे
सकता।´´
``ठीक है, कोई बात नही राजकुमार आपने जो अँगेजो की गदरन काटने वाली तलवार मुझे
दी है मै उससे िहनदुसतानी की गदरन काटकर िदखाता हूँ।´´ कहकर उसने कुँवर चैनिसंह पर
तलवार से वार िकया। चैनिसंह तलवार बाजी के मािहर थे वे िछटक कर दरू खड़े हो गए और
तलवार खीचकर बोले, ``तुमहे धोखा हुआ है अँगेजो की गदरन काटने वाली तलवार तो मेरे ही पास
है। ले इसका उपयोग देख। कुँवर चैनिसंह के साथ उनका कुता शेर था, वह मैडॉक पर टू ट
पड़ा तथा मैडाक को लहू लुहान कर िदया। मैडॉक ने शेर पर तलवार खीच ली। कुँवर
चैनिसंह ने मैडॉक का पीछा िकया वह घोड़ा पर बैठकर भाग खड़ा हुआ। चैनिसंह उसका पीछा
करते हुए चौराहे पर आ गए। चौराहे पर अँगेज सेना खड़ी थी। तोपची चैनिसंह पर तोप का
गोला दागने वाला ही था िक चैनिसंह ने अपनी तलवार उसकी गदरन पर दे दी। उसका िसर
कटकर जमीन पर लोटने लगा।वार इतना तेज था िक तोप के ऊपर पड़ने से तोप मे भी गहरा
घाव बन गया।
घमासान युद िछड़ गया। इधर चैनिसंह के साथ िगनती के साथी और उधर अँगेजो की
सशकत भारी फौज। िकनतु चैनिसंह ने अपनी बहादुरी का मजा अँगेजो को चखाया। गोरो की
इतनी तबाही की िक भगदड़ मच गई। शेर ने अपने मािलक की रका के िलए गोरो को काट
काटकर जख्ून नन
़मी कर डाला। शेर की बहादुरी पर अँगेज चिकत थे। एक सैिनक ने शेर
पर गोली दाग दी। सवामी भकत कुता शेर अपने मािलक की रका मे शहीद हो गए। कुँवर चैन
िसंह के सभी साथी मारे गए। िहममत खा तथा बहादुर खा ने दशहरा बाग मे भारी तबाही मचाई।
मैडॉक की भारी सेना को नरिसंहगढ़ के इन तीन वीरो ने गाजर मूली की तरह काटना शुर कर
िदया।
बौखलाए मैडॉक ने तोपो के गोले बरसाने का आदेश िदया। कुँवर चैन िसंह, िहममत खा
तथा बहादुर खा वीरता के साथ युद करते हुए शहीद हुए।
मैडॉक जब इगलैणड गया तो कुँवर चैनिसंह की दोनो तलवारे साथ ले गया।
नरिसंहगढ़ के राजपिरवार ने सीहोर के दशहरा बाग मे कुँवर चैनिसंह की छतरी बनवा
दी। जो नरिसंहगढ़ के राजकुमार कुँवर चैनिसंह की वीरता की कहानी कह रही है। कुँवर
चैनिसंह का बिलदान सन् 1857 ई. के कािनतकािरयो की पेरणा का पमुख सतोत बना।

रानी गजमाला

वीर भूिम बुनदेल खणड के शूर वीरो ने आजादी के पथम संगाम मे अपना उललेखनीय
योगदान िदया। जहा महारानी लकमीबाई का नाम इितहास मे अगणी है वही रानी गजमाला को भी
इितहास सदैव याद रखेगा।
वतरमान उतर पदेश के जनपद महोबा मे एक पिसद नगर है जैतपुर। जैतपुर को महाराज
छतसाल के तीसरे पुत जगतराज ने बसाया था। महाराज छतसाल के तीन पुत थे। बड़े बेटे
िहरदेशाह दस
ू रे धमर पुत बाजीराव तथा तीसरे थे जगतराज।
अजयगढ़, जैतपुर, चरखारी, िबजावर, सरीला, आिद जगतराज को िहससे मे िमले थे।
छतसाल की तीसरी पीढ़ी मे राजा केशरी िसंह हुए। उनके पुत का नाम था परीिकत। राजा
परीिकत की रानी का नाम था गजमाला´´।
गजमाला, चतुर, साहसी तथा वीर नारी थी। राजय संचालन मे वह राजा परीिकत को
सलाह मशिवरा िदया करती थी। परीिकत अँगेज सरकार के घुर िवरोधी थे। जैतपुर से लगा
एक छोटा सा राजय ``पनवाड़ी´´ था। अँगेजो ने सन् 1839 ई. मे पनवाड़ी पर आकमण कर िदया
था। पनवाड़ी के राजा ने परीिकत से सहायता की याचना की। परीिकत ने अपनी सेना लेकर
पनवाड़ी के पक मे अँगेजो से घमासान युद िकया। अँगेजो के छके छू ट गए। अँगेजी सेना जान
बचाकर भाग खड़ी हुई।
राजा परीिकत ने अँगेजो के िवरद बुनदेल खणड के राजाओं जागीरदारो तथा माल गुजारो
को एकत करने का बीड़ा उठाया। बुढ़वा मंगल पर चरखारी मे एक िवशाल मेला लगता था।
राजा परीिकत ने इसी मेले मे सभी को अमंितत िकया तथा अँगेजो के िवरद एकजुट होने का
आहान िकया। सन् 1839 ई. का यह वषर बुनदेलखणड की एकता का वषर माना गया। राजा
परीिकत के साथ उनका वंशज देशपत बुनदेला भी सािमल था उसकी जागीर हमीरपुर छतरपुर
दमोह और िवजावर तक फैली थी।
बुनदेल खणड के राजाओं मे जैतपुर नरेश परीिकत उनकी रानी गजमाला िचरगाव और
झीझन के जागीरदार राव पवरत िसंह, शाहगढ़ के लकमणिसंह हीरापुर के िहरदेशाह लोधी, चनदपुरा
के जवाहर िसंह, सेनापित वोधन दौआ जालौन की रानी ताई बाई आिद भी उनके साथ सािमल हो
गए थे।
अँगेजो के िवरद लोगो को भड़काने , तथा युद करने के अपराध मे अँगेजो ने राजा
परीिकत के राजय की मानयता समापत करदी और जैतपुर के राजा के पद से हटा िदया। राजा
परीिकत ने अँगेज सरकार के इस आदेश को अमानय कर िदया और जैतपुर को सवतंत राजय
घोिषत कर िदया। अँगेजी सेना ने जैतपुर पर आकमण कर िदया। 7 िदसमबर सन् 1842 ई. को
अँगेज िबगेिडयर यंग ने पारीिकत पर घेरा डाला। पारीिकत बड़ी बहादुरी के साथ लड़े उनके
साथ रानी गजमाला, देशपथ बुनदेला भी युद मे थे। परीिकत ने अँगेजी सेना की बुरी हालत कर
डाली िबगेिडयर यंग घायल हो गया। अँगेजी सेना जान बचाकर भाग गई।
जीत की खुशी मे राजा परीिकत बघौरा मे आराम कर रहा था, उनकी रानी गजमाला भी
उनके साथ थी। िकसी गदार ने अँगेजो को सूचना देकर राजा और रानी को िगरफतार करवा
िदया। राजा और रानी को चरखारी के िकले मे कैद रखा गया था तथा कठोर पहरा खड़ा कर
िदया था।
एक िदन एक मदारी बनदर और बनदिरया की जोड़ी लेकर वहा आया। उसने इस तरह
खेल िदखाया की सभी दंग रह गए। सेना नायक तथा पहरेदार भी बनदर बनदिरया के खेल तथा
मदारी की बातो मे अपने आपको भूल गए। पता ही नही चला िक राजा रानी कब कैद से छू ट कर
चले गए। अँगेजो को राजा रानी के भागने का समाचार तब िमला जब वे उनकी पकड़ से बहुत
दरू िनकल गए थे उनहोने अपने गरौZ ली के िकले मे पहुँचकर ही दम ली।
इनही िदनो डलहौजी की हड़पनीित के िवरोध मे झासी मे बगावत मच गई थी। रानी
लकमीबाई ने झासी को आजाद घोिषत कर िदया था। युद िछड़ गया था। तातयाटोपे, नानासाहब
तथा अनय देशी राजा झासी की मदद करने आ चुके थे। राजा परीिकत ने रानी गजमाला, देशपथ
बुनदेला तथा उनके जागीरदारो ने भी अँगेजो के िवरद बगावत कर दी। छतरपुर, दमोह,
िबजावर, महोबा, हमीरपुर आिद ने भी परीिकत का साथ िदया। छतरपुर, दमोह,िवजावर, महोबा,
हमीरपुर आिद ने भी पारीिकत का साथ िदया। जगह-जगह युद िछड़ गए। राठ, पनवाड़ी,
अलीपुरा, गोपालपुरा, झीझन, शीनगर, नौगाव, बकसवाहा, बाजना, राजगढ़ बमौरा, देवरा िकशनगढ़,
पठारी आिद जगहो पर अँगेजी सेवा के कमाणडार मेजर जनरल िवरलाक, िबगेिडयर वीलर,
ले.अलेकजेणडर, कनरल पाईमरोज, कनरल नाट के िहिलयडर, के. िरशटन,के.टी.राबटर तथा कैपटन
जानसन आिद ने मोचा संभाले।
कालपी मे रानी झासी को टातया टोपे की सहायता से िवजय िमली। सन् 1840 ई. से
भड़की युद की लपटे दबाने मे अँगेजो को कामयाबी नही िमल पाई। सन् 1857 ई. मे युद लड़ते
हुए राजा परीिकत घायल हो गए। उनहे कैद कर कानपुर मे नजरबंद कर िलया गया जहा उनकी
मृतयु हो गई।
पित की मौत से दुिखत रानी गजमाला ने अँगेजो से अपने पित की मौत का बदला लेने
का िनशय िकया। उसने बुनदेलखणड के तमाम राजाओं को पुनगरिठत िकया तथा जैतपुर पर
चढ़ाई कर दी। अँगेज सेना बुरी तरह परािजत हुई और रानी ने जैतपुर को आजाद कराकर
राजगदी संभाली। जैतपुर, राठ, पनवाड़ी, गरौZ ली, अलीपुरा, शीनगर छतरपुर पर बुनदेलो का
सामाजय सथािपत हो गया।
सच तो ये था िक सन् 1857 ई. के पूवर ही सन् 1839 ई. मे जैतपुर के राजा परीिकत और
उनकी रानी गजमाला ने आजादी के युद की शुर आत की थी।
यह अितशयोिकत नही हागी िक आजादी के पथम सवंततता संगाम की श्ुार ुाना न
आत सन् 1857 ई. न होकर सन् 1839-42 ई. थी िजसकी िचनगारी जैतपुर, पनवाड़ी, राठ मे
सुलगी थी। यह अतयनत सटीक होगा िक रानी गजमाला को रानी झासी लकमीबाई का पेरणा
सतोत कहा जाय। रानी गजमाला की जलाई मशाल रानी लकमीबाई ने थामी और जन-जन तक
पहुँचाई।
भारतीय आजादी का इितहास इन वीर नािरयो का सदैव गुणगान करता रहेगा।

रंगो बापूजी गुपते

शी रंगोबापूजी गुपते सन् 1857 ई. की कािनत के महानायक माने जाते है। छतपित
िशवाजी भारत के एक ऐसे िहनदू राजा थे िजनका िवजय धवज ´जरी पटका` अशमेध के अजय
घोडे़ून
े के समान सारे भारत मे रामेशर से अटक तक एक साथ लहराया िकनतु धूतर
िफरंिगयो ने चालाकी और धोखे बाजी से िहनदू राजाओं मे फूट डालकर उनहे आपस मे लड़वाकर
कमजोर कर िदया। उस समय भारत पर मराठो का सामाजय था िजनमे िशनदे, होलकर,
गायकवाड़ और नागपुर के भोसले-ये सारे एक दस ू रे के सारे एक शतु बन गए थे। ये थे तो पेशवा
के अधीन िकनतु सभी अनय अंदर पेशा का िवरोध िकया करते थे।
अँगेजो ने एक का साथ िदया, दस ू रे को हराया िफर जीतने वाले को अपने काबू मे कर
िलया। इस पकार एक-एक करके सभी अँगेजो के चुंगल मे फंसते चले गए। अनत मे पेशवा को
हारकर अँगेज के अधीन होना पड़ा। बाजीराव िदतीय आठ लाख रपये पेशन सवीकार कर
कानुपर के पास बहवतर मे रहने चले गए।
पेशवा का पुत नानासाहब तथा उनका सेनापित तातया टोपे अँगेजो से इस अपमान का
बदला लेना चाह रहे थे।
मराठो को अपनी भूल का ऐहसास हो रहा था िकनतु पानी उनके िसर के ऊपर आ जाने
के बाद सतारा मे तािह तािह मच चुकी थी। छतपित पतापिसंह िदगमूढ़ हो चुके थे। उन िदनो
उनका अगर सबसे अिधक िवशासपात वयिकत था तो वह था रंगोबापूजी। वह बुिदमान तथा
बहादुर था। मराठाओं की पराजय का सबसे अिधक आघात रंगोबापू जी पर पड़ा था। वह
चुपचाप गुमसुम बैठा रहता था। ´´अिजकय तारा` नामक िकले मे बैठकर घणटो आकाश की ओर
देखता रहता था। लोगो को लगने लगा था िक ´रंगो पागल हो गया है।` िजसे लोग पागल
समझने लगे थे वह देश को अँगेजो के चुगल से आज़ाद कराने के ताने बाने बुनने मे लगा था।
एक िदन रंगोबापूजी अचानक गायाब हो गया। िकसी को कानो कान ,खबर भी नही िक
वह कहा है 1
वे सतारा से गायब हुए और खैबर दरा लाघकर अरब कािफले के साथ बेरत पहुँचे ।
लोग पहचान न सके इसिलए रंगो जी ने अपनी वेष भूषा मे पिरवतरन कर रखा था। जब वे लंदन
मे थे 1 तब यह जानकार लोग दंग रह गए िक इसट इिणडया कमपनी को छकाकर यह साहसी
युवक इंगलैणड कैसे पहुँच गया .
आदमी का साहस और लगन उसे हर हालत मे कामयाबी तक पहुँचाता है। रंगो जी
अनेक कषो को पार कर मालटा पहुँचे। तमाम िवपरीत पिरिसथितयो के बावजूद भी वह लंदन
पहुँचने मे कामयाब हुए। वषर सन् 1840 ई. से सन् 1853 ई. तक पूरक तेरह वषर रंगोजी इंगलैणड
मेेन संघषर करते रहे। वे छतपित राजा पतापिसंह की ओर से वकालत करते रहे। शरीर
मे अंगरखा, कंधे पर उतरीय, सर पर पगड़ी और ललाट पर आड़ा ितलक लगाए पूणर भारतीय
पिरधान मे यह वयिकत अपने वयिकततव के बल पर चचा का िवषय बन गया। जब यह भारतीय
लंदन मे अँगेजी भाषा मे वयाखयान देता तो लोग दंग रह जाते तथा दातो तले अंगुली दबा लेते थे।
रंगो बापूजी ने ईसट इिणडया कमपनी के िवरोध मे लंदर मे अनेको सभाऐं ली, अनेको सथानो के
दौरे िकए। संसद सदसयो से भेट की। ईसट इिणडया कमपनी के अतयाचारो की कहानी तैयार
कर साठ हजार लोगो के हसताकर सिहत पाथरना पत लंदन मे पािलरयामेट को सौपा। बाधय होकर
ईसट इिणडया कमपनी ने लंदन की पािलरयामेट मे रंगोबापूजी को िनमंितत िकया तथा अपनी बात
संचालक मणडल के सममुख रखने के िलए मौका िदया।
अँगेजी सरकार भारत से अपना पभुतव समापत नही करना चाहती थी। भला वह
रंगोबापूजी से सहमत कैसे होतीषोषो िकनतु रंगोबापूजी ने इंगलैणड मे खलबली मचा दी।
नाना साहब ने अजीम उलला खा को अपना दत ू बनाकर इंगलैणड भेजा जो रंगो बापू जी से
िमले। इन दोनो ने पेशवा की वकालत की िकनतु धूतर, चालाक अँगेज पशासन ने उनकी एक न
सुनी। अनतत: यह िनणरय िलयागया िक भारत मे ही अँगेजो के िवरद जन जागृित पैदा की
जाय। जन िवरोध भड़काया जाय तािक अँगेज मजबूर होकर भारत छोड़ दे।
यही िनणरय लेकर रंगोजी भारत के िलये लौट पड़े। वे भारत लौटकर बहवतर मे
नाना साहब से िमलने गए। वे उस समय साधू के वेष मे थे। उनहोने इंगलैणड के अपने पयास
अजीम उलल खा खान से भेट कर अँगेजो का रख तथा कायर योजना सब कुछ िवसतार से नाना
साहब तथा तातया टोपे को बतलाया तथा अँगेजो को भारत से िनकालने के िलए कायर योजना
तय की।
रंगाबापूजी एवं अजीम उलला ने इंगलैणड मे एक रणनीित बना ली थी। पेशवा के
राजभवन मे नाना साहब ने बैठक कर इस रणनीित को मूतररप देने पर िवचार िकया। पतयक
तेज, शौयर, पजा और अचल िनषा के साथ एक महान यज का संकलप िलया गया।
नाना साहब पेशवा ने रकत कमल उठाकर हाथ मे िलया सवधमर का वह िचनह सवधमर की
रका के िलए तथा िहनदू पदपाद शाही के पुनरतथान के िलए आयोिजत रणयज की शपथ ली।
यह रकत कमल नाना साहब ने तातया के हाथ मे सौपा जो तातया ने रंगो बापू जी को
िदया। रंगो बापू जी भाव िवभोर हो गए। उनकी आँखे भर आई। उनहोने रकत कमल को सीने से
लगाया, आँखे मूंदकर कुछ मन ही मन मे बोला िफर अजीम उलला की ओर बढ़ा िदया।
पेशवा नाना साहब के नेतृतव मे जागृित अिभयान पारंभ हुआ। कािनत के दत ू फकीर,
मौलवी, बाहण, तपसी, सनयासी के रप मे िनकल पड़े। कोई जादगू र, कोई बहुरिपया तो कोई
जयोितषी बनकर िनकला। रंगोबापूजी की सलाह पर शपथ के िलए रकत कमल के साथ रोिटया
गाम गाम पहुँचने लगी।
रंगोबापूजी सवयं दिकण गए। गंगाजल लेकर लोगो को शपथ िदलाने लगे। कोलापुर,
बेलगाव, धारवाड़ और सतारा के संपूणर केत मे उनहोने उग कािनत का पचार िकया। इधर ईसट
इिणडया कमपनी भारत मे अपने पैर पसार रही थी। इसाई धमर का पचार पसार जोरो पर था।
भारत वषर मे िहनदू तथा मूितर पूजक शेष न रह जाय। इस भावना को लेकर तेजी से िमशनरी
अिभयान चला रही थी। उधर पेशवा अजीम उलला, तातया टोपे तथा रंगो बापू जी का अिभयान
जोरो पर था। अँगेज भारतीयो के इस अिभयान को कुचलने मे लगे थे।
अँगेज साम-दाम-दणड-भेद िकसी भी पन मे कमजोर नही था। उनहोने रंगो बापू
जी को िगरफतार करने के िलए रंगो बापू जी के एक िवशास पात को अपने साथ िमला िलया।
सन् 1858 ई. मे रंगो बापू जी का एक िमत उनहे िगरफतार करवाने मे लगा ही था िक रंगो बापू जी
को भनक लग गई और वे फरार हो गए। िफर उनका कही कोई पता नही चला।
भारत माता का यह लाड़ला सपूत भारत की आजादी के िलए अपनी अिनतम सासो तक
परयत करता रहा होगा।

सूरज पसाद िसंह

जबलपुर के पास एक छोटी िरयासत थी, िवजय राघवगढ़। िवजय राघवगढ़ के
राजा की जब मृतयु हुई तब उनका वािरश सूरज पसाद िसंह मात पाच वषर का था।
कमपनी सरकार ने कोटर ऑफ वाडरस के अनतगरत वहा पर तहसीलदार की िनयुिकत कर
िवजय राघवगढ़ अपने कबजे मे ले िलया।
1857 के दौर मे आज़ादी के पथम संगाम की लपटे सारे भारत मे फैल चुकी थी। सूरज
पसाद िसंह उस समय सतह वषर के हो चुके थे। अपने राजय पर अँगेजो का कबजा उसे बदासत
नही हो रहा था। वह अँगेजो से अपनी िरयासत आजाद कराना चाहता था। सूरज पसाद िसंह ने
आस पास के जागीरदारो से िमलकर तीन हजार से अिधक पिशिकत सैिनको की सेना खड़ी की।
िवदोह की खबर तहसीलदार को लग गई। उसने सूरज पसाद िसंह को िगरफतार करने की
योजना बनाई िकनतु सूरज पसाद िसंह बहादुर था, उसने तहसीलदार को मारकर िरयासत को
अपने कबजे मे ले िलया। अँगेजी सरकार के घुड़सवारो को मारकर भगा िदया तथा घुड़सेना को
अपने कबजे मे ले िलया। ``एक सतह वषीZ य छोकरे ने हमारा तहसील मार डाला, हमारी
सेना को मारा उसे ततकाल िगरफतार िकया जाय।´´
कमपनी सरकार के गवनरर जनरल ने कैपटन ऊले को 30 अकटू बर 1857 को सेना सिहत
िवजय राघवगढ़ भेजा।
सूरज पसाद िसंह बहुत वीर बालक था। उसने के. एन.ऊले की सेना को छटी का दध ू
याद करा िदया। के. ऊले की सहायता के िलए 4 नवमबर 1857 ई. को मेजर सुलीवाहन को भारी
सेना के साथ भेजा गया। सूरज पसाद िसंह तथा उसके मुटी भर बहादुरो ने दोनो सेनाओं को
िछन िभन करके उनके हिथयार छीन िलए।
मुड़वारा के पास पड़े अँगेजी सैिनक कैमप पर 6 नवमबर 1857 ई. को हमलाकर उनका
गोला बारद तथा हिथयार लूट िलए । घायल अँगेज सेनापित टोटल अपने पाण बचाकर भाग
खड़ा हुआ।
अपनी लगातार हारो से अँगेज बौखला उठा। उसने िवजय राघवगढ़ पर कबजा करने हेतु
मेजर जॉनिकंग को जबलपुर से भेजा।
सूरज पसाद िसंह ने जानिकंग का मुकाबला िकया। 14 नवमबर 1857 ई. को
जॉनिकंग युद मे मारा गया। अँगेज सेना भाग खड़ी हुई।
अँगेज सरकार ने िवजय राघवगढ़ पर दो तरफ से हमले की योजना बनाकर रीवा नरेश
से सहायता हेतु सेना बुलाई तथा जबलपुर से के. ऊले को भारी सेना तथा गोला बारद के साथ
भेजा। सूरजपसाद िसंह का सहयोगी ठाकुर देवी िसंह बड़ी वीरता के साथ युद करते हुए
िगरफतार िकया गया। दोनो ओर से िघरा समझ सूरज पसाद िसंह ने िगरफतारी से बचने के िलए
भाग जाना उिचत समझा।
अँगेजो ने ठाकुर देवी िसंह को फासी दे दी। सूरज पसाद िसंह को एक गदार ने धोखे से
िगरफतार करवा िदया। अँगेजो के दमन तथा जेल कोिठयो मे यातनाएँ झेलन से तो अचछा है वह
अपना जीवन ही कुबाZ न कर दे, सोचकर उसने अपने पेट मे कटारी घोपकर आतम बिलदान कर
िलया।
भारत की आजादी के पथम संगाम मे अपने पाणो की आहुित देने वाला सबसे कम उम का
वीर था सूरज पसाद िसंह, िजसने अपनी िखलौने खेलने की उम मे तलवारो और गोिलयो का
खेल खेलना चुना तथा भारत की आज़ादी के पथम संगाम के अमर शहीदो मे अपना नाम जोड़ा।

उदीराम

आजादी का पथम संगाम सन् 1857 ई. अपने से जोश पर था। देश भकत अपनी शिकत,
सामथ्Z य तथा सूझबूझ के अनुसार गोरी सरकार का िवरोध करने मे लगे थे। सोनीपत के
युवाओं ने िवरोध का अनूठा ही तरीका अखतयार कर रखा था।
िदलली से सोनीपत जाने वाली सड़क से थोड़ी दरू ी पर एक छोटा सा गाव था िलबासपुर।
इस गाव मे जाट पिरवार रहते थे। जाटो के बारे मे कहावत है िक वे अपनी धुन के पके होते है।
उनहोने जो ठान िलया तो समझ लो िक उसे पूरा करके ही दम लेगे।
उदीराम इसी गाव का नौजवान था। देखने मे सुनदर, हृष पुष इस नौजवान ने अपनी ही
उम के नौजवानो का एक समूह बनाया। ये नौजवान कसरती थे तथा अंगेजो से बदला लेने का
खेल रचा करते थे।
सन् 1857 ई. की कािनत जारो पर थी। अंगेज अपने पाण बचाते िफर रहे थे । जहा
अंगेजो को कोई सथान शानत तथा सुरिकत िदखता वहा जाकर िछपते थे। सोनीपत मे अंगेजो
का कैमप था। अंगेज ऊंट,गािड़यो से िदलली से सोनीपत की ओर जाया करते थे। िलबासपुर के
ये कसरती नौजवान इन ऊंट गािड़यो पर जाने वाले अंगेजो को पकड़कर एकानत मे ले जाकर
उनहे खतम कर देते थे।
एक िदन इन नौजवानो ने एक अंगेज दमपित को पकड़ा। वे उनहेेन एकानत मे ले
गए। अंगेज को उनहोने मार डाला िकनतु भारतीय आदशर संसकृित के अनुसार उनहोने मिहला पर
हाथ नही उठाया बिलक उसे िलबासपुर मेेन लाकर एक कमरे मे बंद कर िदया। उसकी
देख रेख के िलए एक मिहला को िनयुकत कर िदया।
िलबासपुर के बगल मे ही एक गाव है राठधना। इस गाव का िनवासी सीताराम अंगेजो से
िमला हुआ था। उसे अंगेज मिहला के बंदी होने की भनक लग गई। वह िलबासपुर गया तथा
अंगेज मिहला की देख रेख के िलए िनयुकत की गई मिहला से िमला। बंदी मिहला ने इन दोनो से
कहा ´´अगर तुम लोग मुझे मुकत करा दोगे तो तुमहे मुंँून
हन मागा इनाम िमलेगा।`` रात
होने पर इन दोनो ने एक बैलगाड़ी की वयवसथा जुटाई तथा बंदी मिहला को सोनीपत कैमप तक
पहंँून
नन
ुच ा िदया।
अंगेज मिहला की सूचना पर अंगेज सेना ने िलबासपुर को घेर िलया। गाव वालो से कहा
िक वे इन लड़को का आतम समपरण करा दे नही तो पूरागाव जला िदया जायेगा।
उदीराम तथा उसके सािथयो ने सोचा आतम समरपण करने से भी फासी ही िमलेगी इससे
तो अचछा है लड़ते-लड़ते वीरगित को प्नन ाून
ननन
्रा ााप त करे। इन लोगो के पास बंदकू े तो
थी नही। भाले, बछीZ, फरसे, कुलािड़या आिद लेकर पूरे गाव के युवा िनकल पडे़ून न

अंगेजी सेना ने गाव मे मारकाट शुर कर दी। युवाओं का दल अंगेजी सेना पर टू ट पड़ा।
अंगेजी सैिनको को काटना-मारना श्ुाुारना न कर िदया िकनतु अंगेजो की गोिलयो के
सामने छोटा सा गाव कहा िटक पाता। कुछ मरे तथा शेष िगरफतार कर िलये गए। अंगेजो ने
गाँवून
न को लूटा, मिहलाओं के जेवरात उतार िलए। गदार सीताराम ने युवाओं की पहचान
बताई। उनहे ´राई` कैमप ले जाकर कोलुओं मे पेर-पेर कर मारा गया।
उदीराम को पीपल के पेड़ से बाध िदया गया। उसे भूखा पयासा पेतीस िदन तक बाधे
रखा गया। उदीराम ने तड़प-तड़प कर पाण तयाग िदए।
आप सवयं समझ रहे होगे िक िहनदुसतान की ये आजादी हमे िकतनी यातनाऐं झेलकर
िमली है िकनतु आजादी के दीवाने ने इसे हािसल करने के िलए उठाई गई अपनी पितजा से मुँह
नही मोड़ा।

ठाकुर िकशोर िसंह

बुनदेलखणड के िजला दमोह मे एक छोटा सा गाव है, िहणडोिरया। उन िदनो आज़ादी की
कािनत अपने पूरे शबाब पर थी। िहणडोिरया के िकशोर िसंह की पती ने उनसे कहा। `´हमारे केत
के सभी जागीरदार िकानान
ा नन
त मे शािमल हो गए है। सभी ने अंगेजो के िवरद हिथयार
उठा िलए है। केवल आप ही बचे है जो अपने पाणो के मोह से घर मे छुपे बैठे हो।`
िकशोर िसंह ने कहा ´तुम मुझे डरपोक या कायर न समझो मै पाणो मे डर से नही िछपा
हँून
ू बिलक सवािभमानी ठाकुर हूँ। बगैर आमंतण के कैसे शािमल हो जाऊँषोषो`
ठकुराइन ने िकशोर िसंह का उपहास उड़ाते हुए कहा -
´`यह कोई िववाह समारोह है कया, िजसका िनमंतण आयेगा। कोई वयिकतगत आयोजन
नही है िजसमे सवािभमान को आघात पहंँुूननन
च ना।
ेग नन ठाकुर साहब यह तो भारत माता की
आज़ादी का यज है इसमे तो बहादुर अपने पाणोेेन की आहुित देने को पहले मै, पहले मै
की होड़ मे आगे खड़े होते है िधकार है तुमहारे पुरषतव को। अगर आप नही जा सकते तो मुझे
आजा दे।`´
पती दारा ललकारने पर िकशोर िसंह का वीर जाग उठा। ठाकुर ने अपनी सेना को
इकटा िकया तथा दमोह मे रकी अंगेजी सेना पर आकमण बोल िदया। 10 जुलाई, 1857 ई. को
िकशोर िसंह ने दमोह मे अंगेज सेना को परासत कर दमोह पर अिधकार कर िलया। दमोह के
िडपटी किमशर ने भाग कर नरिसंहपुर मे शरण ली।
एक छोटे से जागीरदार से परािजत होना अंगेज सेना को बड़ा शमरनाक लगा। इस
पराजय का बदला लेने के िलए एक बड़ी सेना अंगेज कैपटन के नेतृतव मे 25 जुलाई, 1857 ई. को
िहणडोिरया पहँुून
ंनननन
ची। िकशोर िसंह ने डटकर सामना िकया िकनतु अंगेजो की िवशाल
सेना से िवजय पापत करना आसान नही था। ठाकुर को िगरफतार करने के समसत पयास े
असफल हो गए जब िकशोर िसंह बचकर जंगल मे िनकल गए।
िकशनगंज के सरदार रघुनाथ राव ने भी िकशोर िसंह का साथ िदया था। िकशनगंज पर
जब अंगेज सेना ने आकमण िकया तो िकशोरिसंह ने
रघुनाथ राव की मदद की। रघुनाथ राव िगरफतार कर िलए गए िजनहे बाद मे फासी दे दी गई।
िकशोरिसंह जीवन पयरनत अंगेजो के हाथ नही लगे। अंगेजो ने उनहे संिध के पसताव
भेजे िकनतु ठाकुर को अंगेजो के सामने झुकना सवीकार नही था। वह आजाद नरिसंह पूरे जीवन
आज़ाद ही रहा।
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सेठ अमरचंद बािठया

भामासाह का तयाग इितहास मे सवण् अकरो मे समािहत है उसी कड़ी को आगे बढ़ाने वालो
मे एक नाम है । आजादी के दीवाने सेठ अमरचंद बािठया का ।
मूलरप से राजसथान के बीकानेर के िनवासी शेतामबर जैन पिरवार मे जनमे सेठ अमर
चनद बािठया वयवसाय की खेज मे गवािलयर आ बसे थे। इमानदारी तथा कतरवय िनषा के कारण
बािठया गवािलयर के राजा जयाजीराव िसंिधया के िपय पातो मे िगने जाने लगे थे। राजा
िजयाजीराव ने अमरचनद बािडया को गंगाजली कोष का कोषाधयक िनयुिकत िकया था।
आजादी का पथम संगाम सन् 1857 ई. अपने यौवन पर था। गोरे दमन चक चला रहे थे
और भारतीय एकजुटता के साथ आज़ादी का अिभयान। डलहौजी ने रानी झासी का राजय
हडपने की चाल चली। रानी ने बगावत कर दी। झासी को आजाद घोिषत कर िदया। अंगेज
सेना ने झासी को घेर िलया।रानी बड़ी वीरता से लड़ी। रानी ने कालपी तथा गवािलयर पर
अिधकार कर िलया। लगातार युद करते रहने के कारण झाँून नन
स ी का कोष लगभग खाली
हो चला था। सैिनको को कई महीनो से वेतन नही िमल पा रहा था, िफर भी सैिनको मे उतसाह
बना हुआ था। तातया टोपे रानी की सहायता करने गवािलयर आ चुके थे। उनहोने कोषाधयक
अमरचनद बािठया से कहा गवािलयर अब रानी झाूननन ं सी का हो चुका है। आप
सेैून
िनन
नन
नको के वेतन भुगतान तथा युद सामगी खरीदने के िलए राजकोष से मदद करो। सेठ
अमीर चनद ने सैिनको का वेतन चुकाने हेतु नानासाहब के भाई राव साहब पेशवा को धन दे
िदया।
सेठ अमर चनद बािठया की कतरवय िनषा तथा देश पेम को उनका अपराध मान िलया गया
। उनहे िगरफतार कर िलयागया तथा िबगेिडयर नेिपयर के समक सुनवाई का नाटक िकया गया।
``बािठया तुम पर राजदोह का आरोप है । तुम अपने बचाव मे कुछ कहना चाहते हो षोषो
´´
``यह तो मुझे मालूम है िक आप मुझे फासी का उपहार देगे िफर नयाय का यह नाटक कयो
कर रहे हैषोषो ´

``तुम पर आरोप है िक तुमने गवािलयर राज के गंगाजली कोष का धन महारानी
लकमीबाई के सैिनको को बाटन हेतु िदया है। ´´
``मेरे ऊपर लगाया गया आपका यह अपराध गलत है िजस समय रानी झासी को कोष से
धन िदया गया उस समय रानी ने गवािलयर जीत िलया था और गवािलयर उनके आधीन था। इसी
नाते रानी का राजकोष पर
अिधकार था और मै उनका सेवक। उनका हर आदेश मेरे कतरवयो मे शािमल था। मैने रानी की
आजा का पालन कर सेवक धमर का िनवाह िकया है।´´
``आप पर दस ू रा आरोप है िक तुमने कमपनी सरकार के िवदोिहयो का साथ िदया है।´´
``आपका दस ू रा आरोप सरासर गलत है । कमपनी सरकार हमारे देश की दशु मन है तथा
रानी देशभकत। मैने अपने देश की आजाद के िलए पाणो को नयौछावर करने वाले वीर सैिनको
का वेतन भुगतान करने के िलए अपनी रानी का आदेश माना है । अपने दुशमन के पित िवदोह
करना अपराध नही बिलक अपने देश के पित वफादारी है।´´
जो पहले से तय था होना वही था और हुआ भी वही। सेठ के उतरो से िबगेिडयर खौल
उठा उसने आदेश िदया इसे सावरजिनक सथल पर फासी के फंदे पर लटका िदया जाय।
िद0 22 जून, 1858 ई. को गवािलयर के सराफा बाजार मे अमरचनद बािडया को गले मे
रससी बाधकर नीम के पेड़ से लटका िदया गया। तीन िदन तक शव ऐेेनन से ही लटकता
रहा। गोरी सरकार ने फोैूनन
ज का कड़ा पहरा लगा िदया था तािक कोई उसके शव को उतार
न सक। देश के िलए अपने पाणो की आहूित देने वालो मे सेठ अमरचनद बािठया का नाम सदैव
अमर रहेगा।
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नाहर िसंह

आजादी के पथम संगाम सन् 1857 ई. की कािनत मे अपने पाणो की आहुित देने
वाले बललभ गढ़ के राजा नाहर िसंह का नाम बड़े सममान के साथ िलया जाता है।
बललभगढ़ िदलली से लगी हुई जाटो की िरयासत थी। यहा का राजा नवयुवक वीर,
साहसी, पराकमी तथा चतुर था। िदलली के मुगल समाट बहादुर शाह जफर के दरवार में ं उनहे
उनके बगल मे कुसी रखकर बैठने का औहदा िदया था। बहादुरशाह जफर नाहर िसंह पर बहुत
भरोसा िकया करते थे। समाट ने िदलली के पूवी मोचे की कमान राजा नाहर िसंह पर ही सौप
रखी थी।
मेरठ की कािनत के बाद मेरठ के कािनतकािरयो ने िदलली आकर िदलली के समाट
बहादुरशाह जफर के नेतृतव मे आज़ादी की लड़ाई का ऐलान िकया था, िदलली 134 िदन आजाद
रही। िदलली के पूवी मोचे की सुरका राजा नाहर िसंह के िजममे थी। वह इतना बहादुर तथा
देशभकत था िक अँगेजी फौजो ने कभी भी िदलली के पूवी मोचे की ओर से आकमण की नही
सोची। 13 िसतमबर सन् 1857 ई. को अँगेजो ने िदलली पर आकमण कशमीरी गेट से िकया था।
जब िदलली पतन की कगार पर थी तब नाहर िसंह ने समाट को बललभगढ़ चलने का
िनवेदन िकया था िकनतु इलाही बखश की गदारी पूणर चाल के कारण समाट ने बललभगढ़ जाने पर
सहमित नही दी। बिलक इलाही बख्ून न
़श ने बेईमानी करके बहादुर शाह जफर को मेजर
हड़सन के हाथो हुमायूँ के मकबरे मे िगरफतार करवा िदया। हड़सन ने बहादुर शाह के शहजादो
का कतल कर उनका खून िपया। राजा नाहर िसंह ने पूवी मोचे तथा बललभगढ़ मे अँगेज सेना से
घमासान युद छेड़ िदया। हजारो अँगेज सैिनको को मौत के घाट उतार िदया तथा हजारो को
कैद खाने मे डाल िदया। अँगेजो के पाव उखड़ गए। नाहर िसंह से पार पाते न देख अँगेजो ने
चाल चली। संिध का सफेद झंडा फहराकर, समाचार भेजा िक बहादुर शाह जफर से सुलह हो
रही है। समाट ने सुलह नामे का मसौदा तय करने के िलए आपको याद िकया है।
राजा नाहर िसंह धूतर अँगेज की बातो मे आ गया। अपने िवशसत सैिनको के साथ िदलली
की ओर चल िदया। अँगेज ने राजा को धोखे से िगरफतार करे की योजना बनाई थी। जैसे ही
राजा िकले मे घुसा िछपी हुई अँगेज फौज ने राजा को घेर िलया तथा राजा की सैनय टुकड़ी व
राजा का समबनध िवचछेद कर िदया। राजा नाहर िसंह को िगरफतार कर िलया। अँगेज फौज ने
बललभ गढ़ पर आकमण कर िदया तीन िदन के घमासान युद के बाद राजा िवहीन बललभगढ़ पर
अँगेजो ने अिधकार कर िलया।
हड़सन ने राजा नाहर िसंह से कहा-
``नाहर िसंह यिद तुम फासी से बचना चाहते हो तो थोड़ा झुकजाओ।´´
नाहरिसंह ने हड़सन की ओर पीठ कर ली तथा गरज कर कहा, ``नाहर िसंह वह
राजा नही है जो पाणो की भीख मागने के िलए शतु के सामने झुके। तुम हमारे देश के दुशमन हो।
मै झुकना तो दरू , तुमसे हाथ भी नही िमला सकता। एक नाहरिसंह नही भी रहेगा तो कया फकर
पड़ेगा कल लाखो नाहरिसंह पैदा हो जायेगे।´´
हड़सन ने बौखलाकर नाहरिसंह को चादनी चौक फववारा के पास उसी िदन फासी पर
लटकाने का िनणरय िकया िजस िदन उसने अपने 36 वे वषर मे पवेश िकया था। राजा ने फासी
का फंदा अपने गले मे डालकर जनम िदन मनाया। फासी के तखते पर खड़े राजा नाहर िसंह ने
कहा,
``राजा साहब, तुमहारी अिनतम इचछा कया है षोषो´´
राजा ने कहा- ``मै तुमसे कुछ मागकर अपना सवािभमान नही खोना चाहता बिलक अपने
देशवािसयो से कह रहा हूँ - ``कािनत की इस मसाल को बुझने नही देना।´´
इसवीर राजा को भारत की िमटी सदैव शदा के साथ याद रखेगी।

ठाकुर रणमत िसंह

रीवा नरेश महराज रघुराज िसंह की सेना मे सरदार के पद पर रहे ठाकुर रणमत िसंह का
जनम सन् 1825 ई. मे हुआ था।
आजादी का पथम संगाम सन् 1857 ई. अिनतम सासे लेने लगा था। अँगेजो ने अिधकाश
देशी िरयासतो पर अिधकार जमा िलया था। अँगेज पॉलीिटकल एजेनट देशी िरयासतो की
गितिविधयो पर िनयंतण रख रहे थे। देशी राजाओं को पॉलीिटकल एजेनटो के दबाव मे कायर
करना पड़ रहा था। राजा मन ही मन िखन थे िकनतु मजबूरी थी िक वे कुछ भी कर सकने मे
समथर नही थे।
ठाकुर रणमत िसंह को महाराज रघुराज िसंह के राजय मे बहुत सममान पापत था। राजा
उनके हर िनणरय पर सहमित देते थे। रीवा मे पॉलीिटकल एजेनट जनरल ओसवान का हसतकेप
िदनो िदन बढ़ता ही जा रहा था। यूँ तो राजा रघुराज िसंह थे, िकनतु राज चला रहा था ओसवान।
ठाकुर रणमत िसंह को ओसवान का हसतकेप बदासत नही था। ठाकुर रणमत िसंह ने ओसवान
का िवरोध करना शुर िकया तो ओसवान ने दमन चक चलाया। पिरणामत: ठाकुर रणमत िसंह ने
जनरल ओसवान के िवरद बगावत कर दी। अपने िवशास पात सैिनको के साथ जनरल
ओसवान के बंगले को घेर िलया िकनतु ओसवान अपनी जान बचाकर भाग जाने मे कामयाब हो
गया।
ठाकुर रणमत िसंह ने नागौद की रेजीडेनट पर हमला बोल िदया। नागोद रेजीडेनट ने
भागकर अजयगढ़ मे शरण ली। अजयगढ़ राजा ने शरणागत रेजीडेनट की रका मे अपनी सेना
रणमतिसंह को रोकने हेतु भेज दी। भेल साय मे भयंकर युद हुआ। ठाकुर रणमतिसंह ने
अजयगढ़ की सेना के सेनापित केशरी िसंह बुनदेला को घेर कर मार डाला। रेजीडेनट भागकर
नौगाव छावनी आ गया। अपनी िवजय से पफुिलिनननन लत ठाकुर रणमत िसंह ने नौगाव
छावनी पर हमला बोला। वे तातया टोपे की मदद से नौगाव छावनी, छतरपुर, िबजावर, झासी,
ओरछा, टीकमगढ़ आिद को आज़ाद कराना चाहते थे िकनतु उनका समपकर तातया टोपे से नही हो
पाया और अँगेज सेना से बरौधा नामक सथान पर भारी मुठभेड़ का सामना करना पड़ा। ठाकुर
रणमत िसंह की तलवार मे बड़ी दम थी। अँगेज सेना उनहे िगरफतार करने को घेरा डालती थी,
ठाकुर घेरा काटकर बच िनकलता था। हार कर अँगेज ने अपनीकूरता का सहारा िलया। ठाकुर
रणमतिसंह अपने िमत िवजयशंकर नाग के घर जालपा देवी िमनदर के तहखाने मे िवशाम कर रहे
थे िक अँगेज ने िवजयशंकर नाग को लालच देकर ठाकुर को िगरफतार करवाने को राजी कर
िलया। िवजय शंकर नाग ने गदारी की तथा ठाकुर रणमत िसंह को िगरफतार करवा िदया।
अननत चतुदरशी के िदन 1859 मे ठाकुर रणमतिसंह को आगरा के जेल मे फासी पर
लटका िदया।
अपनी चौतीस वषर की उम मे ठाकुर रणमत िसंह ने वीरता का जो कौशल िदखाया उसका
गुणगान सवयं शतु सेना ने भी िकया। देशभकत, वीरो के सममान मे भारतवासी जब भी चचा करेगे
तब ठाकुर रणमत िसंह की वीरता का बखान कर गौरवािन नू
नननन
वत होगे।
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मैना

मैना िबठूर ( बहवतर ) के शासक अिनतम पेशवा नाना साहब की बेटी थी। अँगेजो से िघर
जाने पर नाना साहब को िबठूर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ गया था। नाना साहब जब िबठूर का
िकला छोड़ने लगे तो मैना ने उनके साथ जाने को मना कर िदया। नाना साहब ने कहा बेटा ``मै
तुमहे अकेला नही छोड़ सकता। तुम मेरे साथ चलो।´´
मैना ने कहा, ``मै अपने महल को असहाय खाली नही छोड़ सकते।´´
``तुम मेरे साथ चलो। महल मे िकसी सेवक को देख रेख के िलए छोड़ देते है।´´
``िपता जी महाराज- हम अपना महल िकसी सेवक की देखरेख मे सूना छोड़ दे इससे कया
अनतर पड़ता है पश तो यह है िक यहा रहकर कािनतकािरयो को आवशयक सूचनाएँ देने के िलए
मेरा यहा रहना अतयंत आवशयक है। यह काम सेवक नही कर सकेगा। इसिलए मै सवयं ही यहा
रहूँगी।´´ मैना ने कहा।
``पर वेटी, तुमहे यहा बहुत खतरा है। ये बहसी अँगेज...।´´
``िपता जी महराज मै अपने पाणो की रका नही कर सकती यह बहुत मुमिकन है पर मै
अपने सममान की रका करने मे सकम हूँ। आप यह न भूले िक मेरी रगो मे भी एक देशभकत
कािनतकारी का ही लहू दौड़ रहा है।´´
मैना कुछ सेवको के साथ िबठूर के महल मे थी। अँगेजो ने महल पर आकमण कर
सेवको को िगरफतार कर िलया तथा कुछ को मार डाला िकनतु मैना उनके हाथ नही लगी।
अँगेज सेनापित ने महल को तोप के गोलो से िगराने का आदेश िदया। तोपो ने गोले बरसाने शुर
िकये तभी मैूनननं ना ने कड़कती आवाज मे कहा, ``ठहरो, बंद करो ये दुषकृतय।´´
``तुम कहा थी, हमने तो तुमहे महल के कौने कौन मे खोज िलया था। ´´सेना पित ने
आशयर से कहा।
यह मेरा महल है मै इसी मे थी इसी मे हूँ तथा इसी मे रहूँगी।´´
``ये लड़की तू कया चाहती है।´´
``मेरे महल को कोई नुकसान नही पहुँचाया जाय।´´
``तू इस महल को कयो बचाना चाहती है ´´
``और तुम िगराना कयो चाहते हो ´´
``यह महल कािनतकारी नानासाहब का है। उसने हमसे बगावत की है। सरकार ने इसे
नष करने का िनणरय िलया है।´´
``बगावत व िवदोह नानासाहब ने िकया है, दीवालो ने नही तुमहारा महल िगराना गलत है।
जड़ पदाथर से बदला लेना कायरता है।´´
``युद मे आदशर का सथान नही रहता है।´´
``तो मै समझ सकती हूँ िक तुमहारा इंसान मर चुका है तुम िसफर सरकार के गुलाम नौकर
हो। मै तुमहे अचछी तरह से जानती हूँ िक तुम वही वयकत हो जो नाना साहब के दरबार मे
झुककर नमसकार िकया करते थे।
``तुम कौन हो षोषो ``मै तुमहारी बेटी `मैरी´ की सहेली तथा नाना साहब की बेटी मैना हूँ।
´´
जब सेनापित तथा मैना मे बाते चल रही थी तभी पधान सेनापित जनरल आउटम ने महल
को िगराने का आदेश दे कर महल धवसत करा िदया। अँगेज समझे िक मैना दब कर मर गई
होगी। िकनतु मैना धवसत महल को देख रही थी। उसके कलेजे मे अँगेजो के पित नफरत थी
और महल की बबाZ दी का दुख तभी उसे अँगेज िसपािहयो ने देख िलया और घेर कर िगरफतार
कर िलया। जनरल आउटम ने मैना से कहा-
``तुमहारा भला इसी मे है िक तुम नाना साहब तथा और कािनतकािरयो की जानकारी हमे
दे दो हम तुमहे बचा लेगे। अनयथा तुमहे िजनदा जला देगे।´´
``लड़की ! कयो अपना जीवन बबाZ द करती है तू हमे कािनतकािरयो का राज बतला दे
हम तुझे छोड़ देगे साथ ही भारी पुरसकार भी देगे। एक अँगेज अिधकारी ने कहा।
``अपना पुरसकार अपने पास रखो। अपना बिलदान सवयं ही मेरा पुरसकार होगा। सचचे
कािनतकारी को मृतयु का भय या पलोभन मागर से िबचिलत नही कर सकता। मेरी मौत अँगेजो के
पतन का कारण बनेगी।´´
आउटम ने मैना को बाधकर चारो ओर से लकिड़यो के घेरे मे आग लगाने का आदेश देते
हुए मैना से कहा- ``अिनतम अवसर दे रहा हूँ , तू अपनी जान बचा सकती है । अगर नाना
साहब तथा अनयकािनतकािरयो का पता बता दे।´´
``एक जनम तो कया, मै कई जनमो तक इसी तरह जलने को तैयार रहूँगी, िकनतु तुम मेरा
मुँह नही खुलवा सकोगे। भारत की वीरागनाओं को आग की लपटे उनके सतय से कभी न िडगा
पाई है और न ही िडगा पायेगी। हा तुमहारे अतयाचार जरर तुमहे जलाकर खाक कर देगे।´´
आग की लपटो के बीच मैना ने जय भारत जय मातृभूिम की जय जय कार के जोर दार
सवर मे नारे लगाए।
भारत की आजादी के सगाम मे अमर शहीदो के साथ मैना की कुबाZ नी सदैव गौरव के
साथ िगनी जायेगी।
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` नरपित िसंह

उतर पदेश मे कानपुर के पास गंगा िकनारे उनाव राजय मे एक िरयासत थी
`रइया´´। िजसका जमीदार था नरपित िसंह। सन् 1857 ई की कािनत का पमुख पभाव झासी,
लखनऊ, िबठूर, कानपुर, उनाव, रायबरेली, मेरठ, िदलली तथा बुनदेलखणड मे था। रइया के
जागीरदार ने ेतातया टोपे का साथ िदया था। अँगेज सेना कािनत का दमन करने पर तुली थी।
बौखलाई अँगेज सेना सेनापित वालपोल के नेतृतव मे रइया के िकले को िमटी मे िमलाने के िलए
घेरा डाल रही थी। नरपितिसंह सचचा देशभकत राजपूत था। वह अँगेजो की िवशाल सेना से
भयभीत नही हुआ। उसने पितजा की -
``अपनी छोटी सी सेना के बल पर भी मे अँगेज सेना के दात खटे करके खदेड़ न द ू तो मै
अपने आप को कितय नही कहूँगा।´´
अपनी पितजा को पूरा करने के िलए राजा िनरपत िसंह ने युद की घोषणा कर दी।
िबगेिडयर वाल पोल को जब राजा की पितजा का पता चला तो वह बोला-
``इस दो कोड़ी के जमीदार की ये मजाल िक वह मुझे नीचा िदखाने की पितजा करे। मै
उसकी नाक को जमीन मे रगड़ दँग ू ा तथा उसके घमंड को पीसकर रख दँग ू ा।´´
जनरल वालपोल ने `रइया´ के िकले पर घेरा डाल िदया। िकले की दीवारो के िबलकुल
पास तक सेना पहुँच गई। `रइया´ के िकले की सुरका खाई से सटी बालपोल की सेना ने
गोिलया बरसानी शुर की। नरपितिसंह ने िकले के अनदर से जवाबी वार करने पारमभ िकये।
पहले ही िदन जनरल वालपोल के िछयालीस सैिनक खेत हो गए। आग बबूला वालपोल ने महल
को धवसत करने के िलए तोपो के गोले दागने के आदेश िदए। गोले महल की दीवारो से टकराकर
उसी की सेना पर लौट लौटकर पड़ने लगे िजनसे उसी के िसपाही मौत के िशकार होने लगे।
जनरल वालपोल की सेना के पाव लड़खड़ाने लगे। उसने ततकाल गनट को सेना सिहत मदद के
िलए बुला िलया। राजा नरपितिसंह की सेना बड़ी बहादुरी के साथ लड़ रही थी। नरपितिसंह की
गोिलयो से होपगनट की सेना भी लड़खड़ा गई। िकले से िनकली गोली ने होपगानट के पाण ले
िलए। उसकी सेना भाग खड़ी हुई। नरपित िसंह ने अपनी पितजा पूरी की तथा िकले मे िवजय
का जश मनाया गया। सन् 1857 ई. की कािनत मे नरपितिसंह `रइया´ ने अपनी बहादुरी से
अँगेजो को छठी का दध ू याद िदला िदया तथा कािनतकािरयो मे खुशी तथा उतसाह मर िदया।
िरचडर िविलयमस

िरचडर िविलयमस एक अँगेज िसपाही थी। जो मेरठ कािनत के समय मेरठ मे पदसथ था।
वह अँगेजो की दमन नीित से सहमत नही था। वह अँगेज सरकार का िवरोध करना चाहता था
तथा मौके की तलाश मे रहता था।
सन् 1857 ई. मे अँगेजो के िवरद भारत मे पथम सवाधीनता संगाम िछड़ गया था। जब
अँगेजो के िवरोध मे मेरठ के िसपािहयो ने बगावत करदी तो कािनत का दमन करने के िलए
िवदोिहयो पर गोली चलाने का आदेश िदया गया। िरचडर िविलयमस मेरठ के िरसाले मे पदसथ
था। उसने गोली चलाने से इनकार कर िलया। िरचडर िविलयमस के िवरद सुनवाई की कायरवाही
चली। िविलयमस ने सुनवाई सैनय अफसर एडजूटेनट टकर की गोलीमार हतया कर दी और
कािनतकािरयो मे िमल गया। िदलली के बादशाह बहादुर शाह की सेना के साथ उसने अँगेजो के
साथ भयंकर युद कौशल िदखाया। जब बहादुर शाह की सेना को िदलली से पलायन करना पड़ा
था तब बादशाह की सेना के तीस हजार सैिनको को उफनती यमुना से नावो के सहारे पार कराने
मे िविलयमस की सूझबूझ तथा साहस की सवरत सराहना की गई।
िदलली के पतन के बाद िरचडर िविलयमस अवध के कािनतकािरयो के साथ उनाव राजय
की िरयासत रइया के राजा नरपित िसंह की सेना से जा िमला। नरपत िसंह ने िरचडर िविलयमस
को सेना नायक की िजममेवारी सौप दी थी। जब अँगेजो ने रइया के िकले पर घेरा डाला तब
िकले की रका का भार िरचडर िविलयमस ने ही समहाला था। िकले को घेरे अँगेज सेना, का पधान
िननननन
सेनापित िबगेिडयर एिडि यन होप अपनी टुकड़ी को िकले पर तोपे दागने का िनदेश दे रहा
था। उसी समय िकले के अनदर एक ऊँूननन ं चे वृक पर चढ़कर िविलयमस ने िबगेिडयर
िननननन
एिड
ि यन होप पर गोली दाग दी। अचूक िनशाने ने िबगेिडयर एिड िननननन
ि यन होप की
जान ले ली। िरचडर िविलयमस की सूझबूझ और बहादुरी की बजह से रइया का िकला ढहाने की
अँगेजो की योजना असफल हो गई।
सन् 1857 ई. की कािनत का अँगेजो दारा दमन िकया जा रहा था।
देशी राजा, जागीरदार मारे जा रहे थे या अँगेजो की गुलामी सवीकार कर रहे थे।
अँगेजी फौजे कािनतकािरयो को पकड़ पकड़कर जेलो मे ठूस रही थी। अपने आप को िगरफतारी
से बचाने के िलए िरचडर िविलयमस भूिमगत हो गया जो कभी भी अँगेजो के हाथ नही आया।
िरचडर िविलयमस अँगेजी सेना का िसपाही था िजसने अपनी ही सरकार की दमन नीित
का खुलकर िवरोध िकया तथा गुलाम देश को आज़ादी िदलाने वाले कािनतकािरयो का साथ
िदया।
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शंकर शाह

ीीन
म.प. का मंडला िजला पाचाीन काल से ही चचा का केनद िवनदु रहा है।
महारानी दुगाZ वती, अवनती बाई लोधी तथा राजा शंकर शाह आिद की गितिविधयो का पभाव
मंडला पर अपनी सपष छाप छोड़ता रहा है। तो सन् 1857 ई. की कािनत से मणडला अछू ता कैसे
रह सकता था। िजस समय भारत पर अँगेज अपना िसकंजा कस रहे थे, उन िदनो मणडला मे
राजाशंकर शाह का शासन था। शंकरशाह के रामगढ़ की रानी अवंतीबाई से बहुत नजदीकी
समबनध थे। रामगढ़ और मणडला राजय के दोनो शासक एक दस ू रे राजय की मदद करते थे।
िजस समय वािडगटन ने रानी अवंती बाई के राजय को हड़पने की इचछा से उनपर आकमण िकया
उस समय मणडला के राजा शंकर शाह ने रामगढ़ का साथ िदया और रानी की मदद मे सेना आिद
भेजे थे। देशी राजाओं जागीरदारो तथा मालगुजारो को अँगेजो के िखलाफ उकसाया था। शंकर
शाह और उनका पुत रघुनाथ शाह खुलकर अँगेजी हड़पनीित का िवरोध कर रहे थे। वे दोनो
किवता तथा गीतो के माधयम से अँगेज सरकार की हड़प नीितयो की जानकारी जन जन को देते
थे।
राजा शंकरशाह का एक बेईमान गदार कमरचारी था िगरधारी दास। राजाशंकर शाह ने
उसे अपने राजय पद से हटा कर राजय से बाहर भगा िदया था। यही गदार िगरधारी दास राजा
शंकर शाह िसंह की बबाZ दी का कारण बना। िगरधारी अँगेजो से िमल गया और उसने
राजाशंकर िसंह की गितिविधयो की जानकारी कै. वािडंगटन को दी। िगरधारी ने अँगेजो को
शंकरशाह तथा उनके पुत दारा िलखे गए आपित जनक किवतो को पढ़कर सुनाया तथा उनका
अथर समझाया।
बौखलाहट मे आकर अँगेजो ने राजा शंकर शाह तथा उनके पुत रघुनाथ शाह को बंदी
बनाकर उनपर राजदोह का अपराध मढ़ िदया। नयाियक सुनवाई का नाटक रचा गया। अनत मे
शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह को तोप के मुँहाने पर बाधकर तोप से उड़ा देने की सजा सुनाई
गई। अँगेजो ने राजा शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह के हाथ पैर बाधकर उनही के नगर मे घुमाया
तो पजा हा हाकार कर उठी। अपने राजा के अपमान को देखकर जनता वौखला उठी थी।
भारी सैनय पहरे के मधय शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह को बध सथल पर ले जाकर तोपो
के मुँह से बाध िदया। तोपे दागने का आदेश देने के पहले अँगेज अफसर ने राजाशंकर शाह और
रघुनाथ से उनकी आिखरी इचछा पूछी।
राजा शंकर ने कहा, ``िजस किवता को िलखने के कारण हम लोगो को मृतयु दणड िदया
जा रहा है, हम लोग वही किवता अपनी जनता को सुनाना चाहते है।´´
अँगेज अफसर, कोध मे भुन गया िकनतु उसने राजा शंकर शाह एवं रघुनाथ शाह को
किवता सुनाने की आजा दे दी।
पहला किवत शंकरशाह ने सुनाया, िजसमे देश के दुशमन अँगेजो को समापत करने हेतु
कालका मा से पाथरना की।
दस ू रा किवत राजकुमार रघुनाथ शाह ने सुनाया िजसमे भी कािलका भवानी से अँगेजो
को काट काट कर खाने की पाथरना थी। देश के दुशमन तथा उनसे िमले देशी गदारो के िसरो को
काट काट कर खा जाने का िनवेदन िकया।
किवता के भाव तथा शबद इतने तीखे थे िक किवता पूरी भी नही हो पाई थी िक अँगेज
अफ़सर चीख पड़ा उसने तोपिचयो को आदेश िदया, इनहे ततकाल तोप से उड़ा िदया जाय।
पलक झपकते शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह के शरीर चीतड़े चीथड़े हो गए। मास के लोथड़े
चारो ओर िबखर गए। एकितत जन समूह चीतकार कर उठा।
महारानी लकमीवाई के बिलदान के ठीक तीन माह पशात 18 िसतमबर सन् 1858 ई. को
राजा शंकर शाह एवं रघुनाथ शाह के बिलदान की खबरे सारे देश मे िबजली तरह फैल गई।
राजा शंकर शाह व रघुनाथ शाह की कुबानी के िकससे और किवताएँ मणडला केत मे
आज भी घर घर मे गाए जाते है। लोगो को अपने वीर राजा और उनके पुत रघुनाथ शाह पर गवर
है।
सआदत खा

भारत के पथम सवतंतता संगाम सन् 1857 ई. की कािनत मे सभी धमो के लोगो बढ़ चढ़
कर िहससा िलया। हर भारतीय के मन मे एक ही संकलप था कुछ भी कयो न हो िकनतु भारत
आजाद होना चािहए। इस कड़ी मे एक और महतवपूणर नाम सममान के साथ याद िकया जाता है
वह है सआदत खा।
सआदत खा के पूवरज जोधपुर के मेवात के िनवासी थे। रोजगार की खोज मे सआदत
खा होलकर राज घराने की राजधानी इनदौर मे पहुँचा। इनदौर मे उन िदनो तुकोजी राव होलकर
(िदतीय) राजा थे।
सआदत खा शरीर और मन दोनो से बलवान था। सआदत खा की योगयता से पभािवत
होकर महाराज तुकोजीराव होलकर ने उसे अपने तोपखाने का पमुख तोपची िनयुकत िकया था।
सन् 1857 ई. मे आजादी की कािनत की जवाला सारे भारत मे धधक रही थी। देशी राजा
एक जुट हो रहे थे। अँगेज देशी िरयासतो का दमन कर रहे थे। सआदत खा का मन भी छटपटा
उठा। उसके मन मे भी अपने मादरे वतन को िफरंिगयो के चंगुल से सवतंत कराने की ललक
थी। सआदत खा ने होलकर के फौजी अफ़सर वंश गोपाल के साथ िवचार मंथन िकया तथा
होलकर महाराज को अपने मंतवय से अवगत कराया। महाराज तुकोजीराव होलकर (िदतीय)
सचचे देशभकत थे उनहोने ततकाल सहमित दे दी। सआदत खा ने सैिनको को एकत कर कहा,
``देश की गुलामी सबसे बड़ा पाप है। हम भारत माता के पैरो मे पड़ी जंजीरो को सहन नही कर
सकते, मेरे देशभकत वीर सािथयो तैयार हो जाओ, आगे बढ़ो और अँगेजो को मार डालो। ये
महाराज का हुकम है।
सआदत खा की ओजसवी वाणी ने सैिनको मे रकत संचार की रफतार बढ़ा दी। सभी
सैिनको ने एक जुट होकर अँगेज सरकार के िखलाफ बगावत कर दी। उन िदनो इनदौर मे अँगेज
रेजीडेनट कनरल डयूरेणड था। जब उसने देखा िक तुकोजी राव होलकर के सैिनक उतेिजत
होकर हमला करने वाले है तो उसने अपनी कूिटनीितक चाल बािजयो के पेतरे फेकने शुर
िकये। सआदत खा ने सैिनको को भली भाित अँगेजो की चालो को समझा िदया था। कनरल
डयूरेड जब रेजीडेनसी के फाटक पर पहुँचकर कािनतकािरयो को अपनी बातो मे फँसाने की
चाल चल रहा था। सआदत खा ने उस पर गोली दाग दी। गोली उसके कान को काटती गाल
को छीलती हुई िनकल गई। डयूरेड अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ। कनरल टेवसर अपनी
सैनय टुकड़ी के साथ मिहदपुर कंिटजेनट के साथ इनदौर रेजीडेसी मे रका हुआ था। वह भी
अपनी जान बचाकर भागा। कनरल डयूरेड अपना पिरवार लेकर िछपता िछपाता सीहोर की ओर
भागा। रेजीडेनसी कोठी तथा अनय बंगलो पर कािनतकािरयो का अिधकार हो गया।
कािनतकािरयो ने अँगेजी खजाना मे लूटे नौ लाख रपये, तोपे, गोले, वारद, हाथी, घोड़े
आिद थे। 4 जुलाई सन् 1857 ई.को कािनतकारी लूट का सारा माल लेकर देवास की ओर बढ़
गए। कािनतकारी जीत की खुशी मे थे तथा अँगेज बदले की आग मे झुलस रहे थे। सीहोर केमप
की मदद से डयूरेड ने कािनतकािरयो को घेर िलया। िवदोही कािनतकािरयो को िगरफतार कर
उनका दमन करना पारंभ िकया। िनमरम दंड िदए गए। गयारह कािनतकािरयो को गोिलयो से भून
डाला। इकीस सैिनको तथा कुछ नागिरको को तोपो के मुँह से बाधकर उड़ा िदया गया।
सआदत खा को पकड़ने मे अँगेज नाकाम रहा। वह राजसथान के झालावाड़ मे रप
बदलकर नौकरी करने लगा था। सआदत खा इतना ईमानदान था, िक जब वह सन् 1877 ई. मे
िगरफतार हुआ तो उसके पास दो समय का भोजन भी नही था।
सआदत खा पर मुकदमा चलाया गया। उससे नयाधीश ने पूछा, ``तुमहे बगावत के िलए
िकसने उकसाया था, तुमहारे साथ कौन कौन था, अगर तुम उनलोगो का सुराग बता दो तो
सरकार तुम पर कुछ रहम कर देगी।´´
सआदत खा ने अिनतम दम तक मुँह नही खोला उसका उतर था, ``हर देश भकत अपने
वतन की आज़ादी चाहता है मै भी आज़ादी चाहता था। मै ने सवयं शपथ उठाई थी िक मै भारत से
ू ा। मुझे खुशी होगी िक आप मुझे
अँगेजो को िनकाल फेकने के अिभयान मे अपनी आहुित दँग
फासी देकर मेरी अिनतम इचछा को पूरा करेगे।´´
फासी के फंदे पर झूलते हुए सआदत खा ने भारत माता की जाय का शबदघोष कर अपने
पाण भारत माता की आजादी के िलए नयौछावर कर िदए।

अज़ीज़न

आज़ादी के िलए उठे सन् 1857 ई. के संगाम मे असंखय पितभाओं ने अपना कतरवय िनभाया। यह
वह काल था जब संपूणर राषट आज़ादी के की चाह मे था । आजादी और िसफर आजादी के उस
महायज मे हर देश वासी अपनी समीधा डाल रहा था । वगर जाित भेद से परे एक ही गूज थी
िफरंिगयो को देश से िनकाल बाहर करना । यह संगाम सैिनक िवदोह से आरमभ होकर जन
आनदोलन मे तबदील हो चुका था। इस महासमर मे जहा बेगम जीनत महल ने बूढे़ून
नवाब बहादुरशाह को संबल िदया और िफर देशी राजाओं को पत िलखकर इस काित को राषीय
काित एक सूत िपरोया गया वही वीरागना रानी लकमीबाई ने अमर नाियका की भूिमका िनभाई।
इसी कम मे रामगढ की रानी अवंती बाई, बेगम हजरत महल इन नामो के साथ समय की िशला
पर एक ऐसा चिरत है िजसने काल पिरिसथित पिरवेश को धता िदखाते हुए अिदतीय पराकम का
पिरचय िदया वह नाम था कानपुर की अज़ीज़न बाइ्र्न Z का ।
पेशे से तवायफ होने के बावजूद उसने देशकी आजादी के िलए घुघरओं की झनकार और
लावणय के संसार को तयाग कर अपने पाणो की परवाह बगैर िकये तातया टोपे की परेणा व फौजी
शमशुददीन के मागरदशरन से समर मे कूद पड़ी। तातया टोपे के आवहान पर ही इस नतरकी ने
आजादी समर मे सशकत भूिमका िनभाई तथा इस िजममेदारी को िविभन पको से संचािलत
िकया। एक तरफ उसने अंगेजो की सैिनक छाविनयो मे जाकर नृतय संगीत दारा मनोरंजन के
माफ़ Z त भारतीय सैिनको मे देश पेम का जज़्ूनबनन
ा पैदा कर उनहे सवधमर और सवराज के
िलए उठ खड़े होने के िलए उकसाया दस ू री तरफ खुिफया तौर पर अंँून
नननन
ग न ीन
ेज टुकिड़यो
की खबरे लाती ही नही रही बिलक इस वीरागना ने अपनी सशसत टोली भी बना ली थी ।
जब काित की जवाला मेरठ, िदलली, बरेली, लखनऊ होती हुई कानपुर मे
पज़्ून
न विलत
ज नननन हुई तो इस मसतानी सती सैिनक टुकडी ने अदुत शौयर का पिरचय
िदया। इसका संचालन िकया अजीजन ने । वह घोडे पर सवार हो बगल मे हिथयार लटकाए
नंगी तलवार से दुशमनो पर वार पर वार करती शहर की गिलयो और छाविनयो मे िनडरता से
घायल काितकािरयो की मदद करती थी। कभी भोजन लेकर तो कभी रसद और हिथयारो से
लबद होकर । अपनी टोली की सैिनक मिहलाओं को उसने वयिकतगत टेिनंग भी
दे रखी थी । उसकी टुकडी का वार कभी चूकता नही था। उनहोने िफरंिगयो के हौसले पसत
कर रखे थे । नाना साहब और अंगेजो के बीच होने वाले संघषर मे अज़ीज़न की भूिमका
अतुलनीय थी ।
अंतत: 21 िदन तक चलने वाले इस युद मे अंगेज परासत हुए तथा कानपुर और आस
ून
ननन
पास के के़त मेआज़ादी का पताका लहरा उठा । कानपुर ही नही देश भर मे िवदोह
का शंखदान हो चुका था और िवजय का िबगुल बज रहा था । एक लाख वगर मील धरती पर
देशभकतो ने अिधकार कर िलया था चार करोड भारतीय िफरंिगयो से मुकत कराये जा चुके थे ।
लेिकन जलद ही कमल और रोटी के पतीक से लडा गया सन् 1857 ई. का यह संघषर हर
जगह कुचला जाने लगा िजसकी वजह देश दोिहयो दारा िनम कोटी का िवशासघात था ।
अंगेजो ने कूटनीित से काम िलया िजससे काित िवफल होने लगी िफर आरमभ हुआ
दमन चक भारतीयो की नशंस हतयाये ,सैकडो गावो को जला डाला, मुकदमे मे सुनवाई के बगैर
हजारो सैिनको को गोिलयो से भून डाला और आंतिकत करने के िलए चौराहे पर फासी के फंदे
पर काितकािरयो को लटका िदया गया । ऐसे मे कानपुर कहाँून अछू ता था । वहा भी दमन
का ताणडव चला। दमन चक के इस िसलिसले मे अज़ीज़न को पकड़ िलया । सेनापित
हैवलाक ने अज़ीज़न के रप से मुगध होकर उसके समक पसताव रखा िक माफी मागकर अंगेजो
की सेवा करके मृतयुदणड से बच सकती
है। राषट के िलए समिपरत सवािभमानी अज़ीज़न ने दो टू क उतर िदया । गोरो की पूणर पराजय
देखने के अितिरकत मेरी अनय कोई इचछा नही है । आप मेरे पाण ले सकते है मुझे झुका नही
सकते ।
इस पर अँगेज अिधकारी भड़क उठा और गोली मारने का हुकम िदया बिलदानी अज़ीज़न
ने हंसते हंसते कुबाZ नी दी और काूननन
ं ित के इितहास में ं वीरागना बन अमर हो गई ।
समापत