You are on page 1of 7

॥ ीह रः ॥

धम क जय हो

अधम का नाश हो

हर हर महादेव

ािणय म स ावना हो

िव

॥ ीम छंकराचाय िवजयतेतराम् ॥

गौह या ब द हो

ीमि िखलमहीम डलाचाय सवत - वत

का क याण हो

गौमाता क जय हो

के वला ैत वतक अन तान त ीिवभूिषत

पदवा य माणपारावारीण सा ाछंकरावतार ीम परमहंसप र ाजकाचाय जग गु

ीमद् आ श कराचाय णीतम्

॥ मठा ायसेतु – महानुशासनम् ॥
शंकरर नीटीका सिहतम्
यो
ाणं िवदधाित पूव यो वै वेदां
िहणोित त मै ।
तं ह देवं आ मबुि काशं मुमु ुव शरणमहं प े ॥
िवनायकं गु ं भानुं
ािव णुमहे रान् । सर वत ण यादौ सवकायाथिस ये ॥
नारायणं प भुवं विस ं श च त पु पराशरं च ासं शुकं गौडपदं महा तं गोिव दयोगी मथा य िश यम् ।
ीशंकराचायमथा य प पादं च ह तामलकं च िश यं तं तोटकं वा तककारम यान म गु न् संततमानतोऽि म ॥
िव दतािखलशा सुधाजलधे मिहतोपिनषत् किथताथिनधे । दये कलये िवमलं चरणं भव शंकर देिशक मे शरणम् ॥

॥ शारदामठा ाय करणम् ॥
स ब ध : मठा ायसेतु के ोक १ से ५ म पि मा ाय शारदामठ के स दाय,
महावा य, आ द का िवधान भगवान् आ शंकराचाय ने कया है।

े , देवता-देवी, आचाय, तीथ, वेद,

थमः पि मा ायः शारदामठ उ यते। क टवारः स दाय त य तीथा मौ पदे1॥१॥ ारका यं िह े ं याद् देवः
िस े रः मृतः। भ काली तु देवी याद् ह तामलक देिशकः॥२॥ गोमतीतीथममलं
चारी व पकः। सामवेद य व ा च त
धम समाचरे त॥् ३॥ जीवा मपरमा मै य बोधो य
सौरा -महारा

भिव यित। त वमिस महावा यं गो ोऽिवगत उ यते॥४॥ िस धु-सौवीर-

तथा तराः। देशाः पि म द था ये शारदामठभािगनः॥५॥

शंकरर नी टीका : पहला मठ पि म दशा ि थत शारदा मठ है। इस मठ का स दाय क टवार है तथा तीथ और आ म
– ये दोनो इसके आचाय के (सं यािसय के ) नाम म पद ह॥१॥ इसका

ारका है तथा इसके देवता िस े र ह। इस मठ क

देवी भ काली ह तथा यहाँ के पहले आचाय ह तामलक ह॥२॥ इसका तीथ गोमती है तथा इस थान के
चा रय के नाम म
व प पद होता है। यहाँ के
चारीगण सामवेद के व ा ह तथा यहाँ धम का (िविधपूवक) आचरण होता है॥३॥ यहाँ जीवा मा
और परमा मा के एक व ( ा मै य) का बोध होता है। “त वमिस” (छा दो योपिनषत् ०६/०८/०७) यहाँ का महावा य है तथा
यहाँ का गो अिवगत है॥४॥ िस धु, सौवीर, सौरा , महारा , आ द पि म दशा म ि थत देश शारदामठ के अन तर ि थत ह।

स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ६ से ९ म भगवान् आ शंकराचाय ने पि मा ाय शारदामठ के आचाय व
चा रय के पद व स दाय का ल ण का वणन कया है।
ि वेणीस गमे तीथ त वम या दल णे।
ाया वाथभावेन तीथना ा2 स उ यते॥६॥ आ म हणे ौढ
आशापाशिवव जतः। यातायातिविनमु एतदा मल णम्3॥७॥ क टादयो िवशेषेण वाय ते य ज तवः। भूतानुक पया िन यं
क टवारः स उ यते॥८॥ व- व पं िवजानाित वधम-प रपालकः। वान दे

डते िन यं व पो बटु

1 - कसी- कसी ित म यहाँ “पदे” के थान पर “शुभौ” पाठ भी उपल ध है।
2 - ाचीन ितय म “तीथना ा” के थान पर “तीथनामा” पाठ भी दे खने म आता है।
3 - कसी- कसी ित म “एव आ म उ यते” कवा “ए

आ म उ यते” – ऐसा पाठ भी ा होता है।

1

यते॥९॥1

बि क क ट. क लग. आ द का िवधान कया है। े . कम. जो वन म िनवास करते ए सदा आ मान द पी न दनवन म ि थत रहता है. आ द के ित भी िजनक समदृ ि है) – वे “क टवार” कहलाते ह॥८॥ जो अपने व प को जानते ह तथा अपने धम का (िविधपूवक) पालन करते ह.ाचीन ितय म “ य वा सविमदं िव मार यं प रक यते” के थान पर “ य वा सविमदं िव मार यं ल णं कल” – ऐसा पाठभेद ा होता है। 5 . उ ह “आ म” कहते ह॥७॥ क ट व ज तु (पशु ) पर भी जो िन य अपनी कृ पादृ ि रखते ह (अथात् के वल मनु य के िलए ही नह . े . जो आ मान द म ही िन य रमण करते ह. तीथ. कवा ज म-मरण के संग म भी जो मु है. वे “वन” कहलाते ह॥१४॥ इस स पूण िव ( प ) का याग करके . त व के बोध करने हेतु ान करते रहते ह. उसे “आर य” कहते ह॥१५॥ जो अपने जीवन म िवषयभोग क वृि को िन करते ह. बंग.कसी. वेद. यथा – “तीथ महोदिधः ो ं चारी काशकः। ॠगाह त यवेद त धम समाचरेत ्॥” 1 . आ द) म िवशारद ह. महावा य. तीथ.ाचीन ितय म ोक १२ म पाठभेद उपल ध है. आ द का िवधान कया है। 1 . वेद. देवता-देवी. ॥ गोवधनमठा ाय करणम् ॥ पूवा ायो ि तीयः याद् गोवधनमठः मृतः। भोगवारः स दायो वनार ये पदे मृत॥े १०॥ पु षो मं तु े ं यां ग ाथोऽ य देवता। िवमला यािह देवी यादाचायः प पादकः॥११॥ तीथ महोदिधः ो ं चारी काशकः। महावा यं 2 च त यात् ानं चो यते॥१२॥ ऋ वेदपठनं चैव का यपो गो मु यते। अ गब गकिल गा मगधो कलबबराः। गोवधनमठाधीना देशाः ाची वि थताः॥१३॥ शंकरर नी टीका : ि तीय मठ पूव दशा ि थत गोवधन मठ है। इस मठ का स दाय भोगवार है तथा वन और आर य – ये दोनो इसके आचाय के (सं यािसय के ) नाम म पद ह॥१०॥ इसका े पु षो म है तथा इसके देवता ीजग ाथ ह। इस मठ क देवी िवमला ह तथा यहाँ के पहले आचाय प पाद ह॥११॥ इसका तीथ समु है तथा इस थान के चा रय के नाम म काश पद होता है। “ ानं ” (ऐतरयोपिनषत् ०३/०३) यहाँ का महावा य है॥१२॥ ॠ वेद इस मठ का वेद ह तथा यहाँ का गो क यप है। अंग. आचाय. (ऐसे चा रय को) “ काश” कहते ह॥१७॥ ॥ योितमठा ाय करणम् ॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक १८ से २२ म भगवान् आ शंकराचाय ने उ रा ाय योितमठ के स दाय. उ कल. आ द पूव दशा म ि थत देश गोवधनमठ के अन तर ि थत ह॥१३॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक १४ से १७ म भगवान् आ शंकराचाय ने पूवा ाय गोवधनमठ के आचाय व चा रय के पद व स दाय का ल ण का वणन कया है। सुर ये िनजने थाने वने वासं करोित यः।3 आशाब धिवनमु ो वननामा स उ यते॥१४॥ अर ये संि थतो िन यमान दे न दने वने। य वा सविमदं िव मार यं प रक यते4॥१५॥ भोगो िवषय इ यु ो वायते येन जीिवनाम्। स दायो यतीना भोगवारः स उ यते॥१६॥ वयं योित वजानाित योगयुि िवशारदः। त व ान काशेन तेन ो ः काशकः॥१७॥5 शंकरर नी टीका : जो कसी सु दर वन के िनजन थान म वास करे तथा आशा (इ छा ) के ब ध से सदा मु रहे. उ ह “तीथ” कहते ह॥६॥ (परमत व क ाि हेत)ु सं यासा म हण करने म जो ि थर है तथा आशा (इ छा ) के पाश से मु है.एक ाचीन ित म ोक ४ से ९ तक का पाठ ा नह होता। 2 . महावा य. आचाय. देवता-देवी.शंकरर नी टीका : जो “त वमिस” के ि वेणी ( ान) तीथ म. ऐसे चा रय को “ व प” कहते ह॥९॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक १० से १३ म भगवान् आ शंकराचाय ने पूवा ाय गोवधनमठ के स दाय.कसी ाचीन ित म “सुर ये िनजने देश े वासे िन यं करोित यः” – ऐसा पाठभेद ा होता है। 4 . यितय को ऐसे स दाय को “भोगवार” कहते ह॥१६॥ त व ाअ के काश से जो अपने योित व प (वा तिवक व प) को जानते ह तथा जो योग (सां य.एक ाचीन ित म ोक १३ से १७ तक का पाठ ा नह होता। 2 .

वे “सागर” कहलाते ह॥२५॥ जो अपने जीवन म िवषयान द (भोगिवलास) क वृि को िन करते ह. जो ग भीर व अचल बुि वाले ह. िजनका ान प रप है तथा जो सार-असार व तु के भेद को जानते ह. वेद.ाचीन ितय म “वासो िग रवने िन यं गीता ययनत परः” के थान पर “वासो िग रवरे िन यं गीता यासो िह त परः” पाठ है। 3 . जो सभी कामना 1 . पवत व सागर – ये तीन इसके आचाय-सं यािसय के नाम म पद ह॥१९॥ इसका े ब का म है तथा इसके देवता ीम ारायण ह। इस मठ क देवी पूणािग र ह तथा यहाँ के पहले आचाय तोटक ह॥२०॥ इसका तीथ अलकन दा है तथा इस थान के चा रय के नाम म आन द पद होता है। “अयमा मा ” (मा डु योपिनषत् ०२) यहाँ का महावा य है॥२१॥ यहाँ के चारीगण अथववेद के व ा ह तथा यहाँ का गो भृगु है। कु .तृतीय तू रा ायो योितनाम मठो भवेत।् ीमठ ेित वा त य नामा तरमुदी रतम्॥१८॥ आन दवारो िव ेयः स दायोऽ य िसि दः। पदािन त य यातािन िग रपवतसागराः॥१९॥ बदरीका मः े ं देवो नारायणः मृतः। पूणािग र च देवी यादाचाय तोटकः मृतः॥२०॥ तीथ चालकन दा यं आन दो चायभूत।् 1 अयमा मा चेित महावा यमुदा तम्॥२१॥ अथववेदव ा च भृ वा यं गो मु यते। कु का मीरका बोजपांचाला दिवभागतः। योितमठवशा देशा उदीची दगवि थताः॥२२॥ शंकरर नी टीका : तृतीय मठ उ र दशा ि थत योितमठ है। इसी मठ को नामा तर से ीमठ भी कहा जाता है॥१८॥ इस मठ का स दाय आन दवार है. भारती व पुरी – ये तीन इसके आचाय-सं यािसय के नाम म पद ह तथा इसका देवता ीवाराह ह॥२९॥ इस मठ क देवी कामा ी ह. यितय को ऐसे स दाय को “आन दवार” कहते ह॥२६॥ जो त विवद् िन य उस स य व प. का बोज. आचाय. जो अपनी मयादा का उ लंघन नह करते. जो िसि देने वाला है। िग र. देवता-देवी. वे “आन द” कहलाते ह॥२७॥ ॥ ृंगेरीमठा ाय करणम्॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक २८ से ३२ म भगवान् आ शंकराचाय ने दि णा ाय ृंगेरीमठ के स दाय. का मीर.एक ाचीन ित म क दा ी ह तथा यहाँ के पहले आचाय सुरे र ह ोक २०-२१ के थान पर एक अलग पाठ ा होता है. तीथ. वे “पवत” कहलाते ह॥२४॥ जो त व के समु म से ान पी र का प र ह करते ह. यथा – “बदरीशा मः आचाय तोटकाः मृतः॥ तीथ वलकन दा यं न दा यो े रामे र है और इसके े ं देवताचस एविह। देवी पु ािग र चायभू त ्। त यवेदो थवा य त धमसमाचरेत”् ॥ 2 . आ द का िवधान कया है। चतुथ दि णा ायः ृ गेरी तु मठो भवेत।् स दायो भू रवारो भूभ वो गो मु यते॥२८॥ पदािन ीिण यातािन सर वती भारती पुरी। रामे रा वयं े मा दवाराहदेवता॥२९॥ कामा ी त य देवी यात् सवकामफल दा। सुरे रा य आचाय तु गभ ेित तीथकम्॥३०॥ चैत या यो चारी यजुव द य पाठकः। अहं ाि म त ैव महावा यं समी रतम्॥३१॥ आ िवडकणाटके रला द भेदतः। ृ गेय धीना देशा ते वाची दगवि थताः॥३२॥ शंकरर नी टीका : चतुथ मठ दि ण दशा ि थत ृंगेरीमठ है। इस मठ का स दाय भू रवार है और भूभवः गो है॥२८॥ सर वती.ान व प- अन त स ा का यान करते ए आ मान द ( ान द) म रमण करते ह. महावा य. आ द उ र दशा म ि थत देश योितमठ के अन तर ि थत ह॥२२॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक २३ से २७ म भगवान् आ शंकराचाय ने पूवा ाय गोवधनमठ के आचाय व चा रय के पद व स दाय का ल ण का वणन कया है। वासो िग रवने िन यं गीता ययनत परः।2 गंभीराचलबुि िग रनामा स उ यते॥२३॥ वसन् पवतमूलेषु ौढं ानं 3 िवभ त यः। सारासारं िवजानाित पवतः प रक यते॥२४॥ त वसागरग भीर ानर प र हः। मयादां वै न ल येत सागरः प रक यते॥२५॥ आन दो िह िवलास वायते येन जीिवनाम्। स दायो यतीनां चान दवारः स उ यते॥२६॥ स यं ानमन तं यो िन यं यायेत त विवत्। वान दे रमते चैव आन दः प रक यते॥२७॥ शंकरर नी टीका : पवत व वन म िजनका िनर तर वास है तथा ीम गव ीता के अ ययन म जो सदा त पर ह.ाचीन ित म ोक २४ का एक अलग व प ा होता है – “वसते पवतमू ल ेष ु ौढो यो यानत परः। सारासारं िवजानाित पवतः प रक ततः॥” 3 ेया . उ ह “िग र” कहते ह॥२३॥ जो पवत क तलहटी म िनवास करते ह. पा ाल. े .

कसी. जो संसारसागर के सार को जानने वाले ह. यितय को ऐसे स दाय को “भू रवार” कहते ह॥३६॥ वह िव ान्.कसी ित म “त संयोगमागण” क जगह “त संयोगमा ेण” पाठ भी ा होता है । 4 . उ ह “चैत य” कहते ह॥३७॥ ॥ शेषा ाय करणम् ॥3 स ब ध : उपरो व णत चार मठ कवा पीठ थूल ह। अब मठा ायसेतु के शेषा ाय करण म तीन िव ान व प सू म-आ ाय का वणन कया जा रहा है। ोक ३८ से ४७ तक शेषा ाय का वणन है। अथो व शेषा आ ायाः4 िव ानैक िव हाः। प म तू व आ ायः सुमे मठ उ यते । स दायोऽ य काशी यात् स य ानािभधे पदे॥३८॥5 कै लासः े िम यु ं देवताऽ य िनर नः। देवी माया तथाचाय ई रोऽ य क ततः॥३९॥ तीथ तु मानसं ो ं त वावगािह तत्6। त संयोगमा ेण7 सं यासं समुपा येत॥् ४०॥ सू मवेद य व ा च त धम समाचरेत।् ष वा मा य आ ायः परमा मा मठो महान्॥४१॥ स वतोषः स दायः पदं योगमनु मरेत।् नभः सरोवरं े ं परहंसोऽ य देवता॥४२॥ देवी या मानसी माया आचाय ेतना वयः। ि पुटीतीथमु कृ ं सवपु य दायकम्॥४३॥ भव-पाशिवनाशाय सं यासं त चा येत।् वेदा तवा यव ा च त धम समाचरेत॥् ४४॥ स मो िन कला ायः सह ाक ुितमठः। स दायोऽ य सि छ यः ीगुरोः पादु के पदे॥४५॥ त ानुभूितः े ं याद् िव पोऽ य देवता। देवी िच छि ना ी िह आचायः स गु ः मृतः॥४६॥ स छा वणं तीथ जरामृ युिवनाशकम्। पूण न द सादेन सं यासं त चा येत॥् ४७॥ शंकरर नी टीका : जो अब िव ान व प वाले तीन शेषा ाय का वणन कया जा रहा है। पाँचवां आ ाय ऊ वा ाय है.कसी ित म शेषा ाय का वणन थ के अ त म आ है। 4 . उस पूणत व ( है तथा दु ःख के भार को जो जानता ही नह . कणाटक.कसी ित म “प र यजन्” के थान पर “प र यजेत”् – ऐसा पाठ भी पाया जाता है। 3 .ाचीन ित म ोक ३३ का पाठभेद है – “ वर ानवशो िन यं वरवादी कवी रः। सं सारसागरासारह ताऽसौ िह सर वती॥” 2 . उ ह ) म ि थत ह.कसी ित म “मठा वार आचायाच वार धुर धराः। स दाया च वार एषा धम वि थितः॥” ोक भी ा होता है। 6 . िजसका मठ महान् परमा मा है। इसका स दाय स वकोष है तथा योग इसका पद है। इसका े सरोवर है. सदा-सवदा पर “पुरी” कहते ह॥३५॥ जो अपने जीवन म सुवण/धन (संचय) क वृि को िन म ही िनरत ह. िजसके संयोगमा से मनु य सं यास हण कर लेता है। यह सू मवेद का व ा है तथा यहाँ धम का आचरण होता है। छठवां आ ाय आ मा ाय है. आ द दि ण दशा म ि थत देश ृंगेरीमठ के अन तर ि थत ह॥३२॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ३३ से ३७ म भगवान् आ शंकराचाय ने दि णा ाय चा रय के पद व स दाय का ल ण का वणन कया है। ृंगेरीमठ के आचाय व वर ानरतो िन यं वरवादी कवी रः। संसारसागरे सारािभ ो यः स सर वती॥३३॥1 िव ाभरेण स पूण ः सवभारं प र यजन्2। दु ःखभारं न जानाित भारती प रक यते॥३४॥ ानत वेन स पूण ः पूण त वपदे ि थतः। पर रतो िन यं पुरीनामा स उ यते॥३५॥ भू रश देन सौव य वायते येन जीिवनाम्। स दायो यतीनां च भू रवारः स उ यते॥३६॥ िच मा ं चै यरिहतमन तमजरं िशवम्। यो जानाित स वै िव ान् चैत यं ति धीयते॥३७॥ शंकरर नी टीका : जो िन य वर (श द) के पारंगत) ह. देवता िनर न ह. िव ान के वािम ह (अथात् े ान म िनरत ह. िजसका मठ सुमे मठ है। इस मठ का स दाय काशी है तथा इसके दो पद ह – स य और ान। इसका े कै लास है. 1 . के रल. उ ह करते ह. वरवादी (श दशा व ाकरणशा म ह).और इसका तीथ तुंगभ ा है॥३०॥ इस थान के पाठक ह। “अहं चा रय के नाम म चैत य पद होता है तथा यहाँ के ाि म” (बृहदार यकोपिनषत् ०१/०४/१०) यहाँ का महावा य है॥३१॥ आ चारीगण यजुवद के . िवड.कसी. देवी माया है तथा आचाय ई र है। इस आ ाय का तीथ त व का अवगहन करने वाला मानसतीथ है. के वल िव ा के भार से यु “भारती” कहते ह॥३४॥ जो – छ दशा ानत व से प रपूण ह.मठा ायसेतु क कसी.ाचीन सं करण म “तत्” के थान पर “तम्” पाठ देखा गया है। 7 .ाचीन सं करण म “अथो व शेषा आ ायाः” के थान पर “अथो व शेषा ाया ते” पाठ देखा गया है। 5 . जो ान प-अजर-अन त-क याण व प (परमे र) को जानता है.कसी. वे ही “सर वती” (कहलाते) ह॥३३॥ जो सभी कार के भार का याग करके .

देवता परमहंस ह. जो सभी पु य का दाता है तथा अ य त उ कृ है। संसार के ब धन का िवनाश करने के िलए इस तीथ म सं यास हण करना चािहए तथा वेदा तवा य का उपदेश करते ए धम का आचरण करना चािहए। सातवां आ ाय िन कला ाय है. तो इनके ऊपर शासन करना चािहए। इन आचाय का धम बनता है क ये लोग (धम चाराथ) सदा-सवदा पृिथवी पर मण करते रहे॥५०॥ इन सं यासी-आचाय को अपने धम का िविधपूवक पालन करना चािहए तथा कसी भी ितरोध (िनषेध) नह करना चािहए। जगत् म हो रहे शा िव अिधकार े क कार से अपने धम का ाचरण को जानने (और उसे रोकने) के िलए तथा अपने-अपने ित ा के िलए मठाधीश-आचाय को अपने मठ के अिधकार म आने वाले े का मण करना चािहए। आचाय को अपने मठ म िनि त प से िनवास करना उिचत नही है॥५१-५२॥ (भगवान् शंकराचाय कहते ह-) हम लोग ने वणा म व था से स ब िजन-िजन शा ो सदाचार का वणन कया है. हमारे भारी आचाय को अपने-अपने े म उन- उन सदाचार का उपदेश करके उनक र ा करनी चािहए। चूं क मृ युलोक म धम का ब त अिधक नाश हो रहा है. इस आ ाय का तीथ है। यहाँ पूणान द क ाि होती है तथा पूणान द के साद से ही सं यास हण करना चािहए॥३८-४७॥ ॥ महानुशासन करणम् ॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ४८ से लेकर ोक ५७ तक भगवान् आ श कराचाय अपने चार मठ के भारी आचाय के िलए पालन करने यो य िनयम का वणन करते ह। मयादैषा सुिव ेया चतुम ठिवधाियनी । तामेतां समुपाि य आचायाः थािपताः मात् ॥४८॥ आ ायाः किथता ेते यतीना पृथक् -पृथक् । तैः सव तुराचाय नयोगेन यथा मम् ॥४९॥ यो त ाः वधमषु शासनीया ततोऽ यथा । कु व तु एव सततमटनं धरणीतले ॥५०॥ िव वरा ाचरण ा ावाचायाणां समा या । लोकान् संशीलय वेव वधमा ितरोधतः॥५१॥ व- िति यै स ारः सुिवधीयताम्। मठे तु िनयतो वास आचाय य न यु यते॥५२॥ वणा मसदाचारा अ मािभय सािधताः। र णीयाः सदैवैते व. देवी मानसी माया है तथा आचाय चेतन है। इस आ ाय का तीथ ि पुटी है. देवी िचद्शि है तथा आचाय स गु है । सत-शा का वण.ाचीन ितय म “प र ाडायमयादो” के थान पर “प र ाडायमयादाम्” पाठ भी दे खने म आता है। 5 . देवता िव प ह. जो जरा-मृ यु का िवनाश करने वाला है. अतः मठाधीश-आचाय को आल य यागकर धम के कसी दू सरे मठाधीश-आचाय के चार म य शील होना चािहए॥५३-५४॥ कसी एक मठाधीश-आचाय को े म कभी वेश नह करना चािहए तथा य पूवक आपस म िमल-जुलकर चािहए॥५५॥ (हमारे ारा व णत) मयादा व था करनी का लोप होने से सभी अ छे िनयम िवन हो सकते ह तथा कलह क वृि होने क स भावना होती है। अतः मयादा के िवनाश से बचना चािहए॥५६॥ सं यासी-आचाय को चािहए क वे हमारे (अथात् भगवान् शंकराचाय) के ारा िन मत इन मयादा का भलीभांित पालन करना चािहए तथा चार पीठ क स ा व अिधकार को पृथक् - पृथक् बनाया रखना चािहए॥५७॥ 1 .व भागे यथािविध॥५३॥ यतो िवनि महती धम या य जायते। मा ं स या यमेवा दा यमेव समा येत॥् ५४॥ पर परिवभागे तु न वेशः कदाचन। पर परेण कत ा ाचायण वि थितः॥५५॥ मयादाया िवनाशेन लु येरि यमाः शुभाः। कलहा गारस पि रत तां प रवजयेत॥् ५६॥ प र ाडायमयादो1 मामक नां यथािविध। चतु पीठािधगां स ां यु या पृथक् -पृथक् ॥५७॥ शंकरर नी टीका : चार मठ के स दभ म कही गयी ये िनयमावली और मयादाएँ भलीभांित (आचाय व शा करमतावलि बय को) ात होनी चािहए। इ ह का आ य लेकर मठ पर भारी आचाय को थािपत (िनयु ) करना चािहए॥४८॥ अब यहाँ तक िविभ सं यािसय के िलए िभ -िभ आ ाय (मठ) ऊपर कहे गय ह। उन सभी सं यासी आचाय को अपने उपरो धम-मयादा का पालन करना चािहए॥४९॥ य द मठाधीश आचायगण उपरो मयादा का पालन न कर. िजसका मठ सह ाक ुितमठ है। इस मठ का स दाय सि छ य है तथा ीगु क दोन पादु काएँ ही इसके दो पद ह। इसका े अनुभूित है.

वे भी से ऐसे िन ल रहना चािहए. आ द) िविधपूवक पालन करना चािहए। िजन ि य का मन बा मनीि सत ऐ य का उपयोग धमसंवधन के िलए कर। सं यासी को तो धन-स पि के उपचार का (अथात् चंवर. जैसे जल के भीतर रहने वाला कमलप जल से िन ल रहता है॥६३-६४॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ६५-७२ तक भगवान् शंकराचाय जीवमा के कत का वणन करते ह। सुध वा िहमहाराज तथा ये4 च नरे राः। धमपार परीमेतां पालय तु िनर तरम्॥६५॥ चातुव य यथायो यं वा नः कायकमिभः। गुरोः पीठं समचत िवभागानु मेण वै॥६६॥ धरामाल य राजानः जा यः करभािगनः। कृ तािधकारा आचाया धमत त देव िह॥६७॥ धम मूलं मनु याणां स चाचायावल बनः। त मादाचायसुमणेः शासनं सवतोऽिधकम्॥६८॥ त मात् सव य ेन शासनं सवस मतम्। आचाय य िवशेषेण ौदायभरभािगनः॥६९॥ आचायाि द डा तु कृ वा पापािन मानवाः। िनमलाः वगमायाि त स तः सुकृितनो यथा॥७०॥ इ येवं मनुर याह गौतमोऽिप िवशेषतः। िविश िश ाचारोऽिप मूलादेव िस यित॥७१॥ तानाचाय पदेशां राजद डां पालयेत।् त मादाचायराजानावनव ौ न िन दयेत॥् ७२॥ शंकरर नी टीका : ( ोक ५३-५४ म व णत अथवा उपरो ही नह . सहासन. वेद-वेदांग का िव ान् तथा सभी शा के योग को जानने वाला ि हमारे थान को ा करे। इन सम त ल ण से स प ि ही हमारे मठ का अिधकारी बन सकता है। य द मठाधी र उपरो व णत गुण से िवहीन ह . उसी कार धम का पालन करने वाले आचाय का भी अिधकार है क वे भी अपने े क जा से कर ा कर। मनु य का मूल धम है तथा मठाधीश-आचाय ही धम का आ य बना आ है। अतः 1 . आ द राजा व णत) धम क इस पर परा का पालन के वल सं यासी को को भी करना चािहए। चार वण के लोग को चािहए क वे (पूवव णत) अपने-अपने े िवभाग के अनु प मनसा-वाचा-कमणा अपनी-अपनी आचायपीठ क भलीभांित सेवा कर। जैसे राजा पृिथवी का पालन करने के कारण जा से कर ा करता है. िजतेि य.ाचीन ितय म “ ुत ेः” के थान पर “ ुितः” पाठभेद ा आ है । 2 . तथािप यह सनातनधम होने के कारण आचरणीय ह। उपयु ल ण से स प सं यासी हमारे आसन पर आसीन हो (अथात् मठाधीश आचाय पद पर िनयु के ीभूत हो जाने. तो िव ान को उसका िन ह करते ए उस गुणहीन मठाधीश को पद से हटा देना चािहए। अिधकारी के उपि थत होने पर भी मठ म कभी उ छेद नह करना चािहए। य िप उपरो िनयम के पालन म ब त से िव हो सकते ह. धन-स पि म लगा रहता है.कसी.ाचीन ितय म “स मतः” के थान पर “सि मतः” पाठभेद ा 3 . वरन् सुध वा. उसे हमारा ही ल ण से यु प समझना चािहए। कसी एक मठाधीश-सं यासी कसी एक ही ि को पीठासीन करना चािहए। अनेक नह करना चािहए – ये अनुिचत है॥५८-६२॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ६३-६४ तक मठाधीश-आचाय के ऐ य व उपचार के स दभ म वणन कया है। सुध वनः समौ सु यिनवृ यै धमहेतवे। देवराजोपचारां यथावदनुपालयेत॥् ६३॥ के वलं धममु य िवभवो 3 चेतसाम् । िविहत ोपकाराय प प नयं जेत॥् ६४॥ शंकरर नी टीका : राजा सुध वा के आ ह से तथा धम का पालन करने के िलए इ द ड. पर उसके थान पर उपयु ि य को उस पीठ पर िनयु हो).ाचीन ितय म “ आ है। चे तसाम्” के थान पर “बा चेतसाम्” पाठभेद ा आ है। 4 .स ब ध : अब मठा ायसेतु के ोक ५८ से लेकर ोक ६२ तक भगवान् आ श कराचाय अपने चार मठ के आचाय के ल ण व यो यता का वणन करते ह। भारी शुिच जतेि यो वेद-वेदा गा दिवशारदः। योग ः सवशा ाणां स मदा थानमापुयात्॥५८॥ उ ल णस प ः या े म पीठभाग् भवेत।् अ यथा ढपीठोऽिप िन हाह मनीिषणाम्॥५९॥ नजातु मठमुि छ ा दिधका र युपि थते। िव ानामिप बा यादेष धमः सनातनः॥६०॥ अ म पीठसमा ढः प र ाडु ल णः। अहमेवेित िव ेयो य य देव इित ुतेः1॥६१॥ एक एवािवषे यः याद ते ल णस मतः2। त पीठे मेणैव न ब यु यते िचत्॥६२॥ शंकरर नी टीका : (भगवान् शंकराचाय कहते ह-) पिव .कसी ित म “िहमहाराज तथा ये” के थान पर “िहमहाराज तद ये” पाठ भी देखा गया है। 6 े आचाय का .

व था क र ा हेतु तथा संसार क र ा हेतु शा ानुसार बनायी गयी है। अतः इस प ित का पालन सभी आचाय को करना चािहए। सतयुग म (शांकरी-के वला ै त पर परा के ) जग गु ाजी थे. तो आचाय के ारा दि डत वह पापी भी िन पाप होकर पु यवान क भांित वगलोक म जाता है। मनु व गौतम. ापर म जग गु भगवान् वेद ासजी थे तथा किलयुग म म (अथात् भगवान् शंकराचाय) ही जग गु ॥ इित ीमि िखलमहीम डलाचाय सवत . आ द आचाय ने भी इस बात हो िवशेष प से कहा है। िविश पु ष का िश ाचार भी मूल से ही िस होता है। अतः आचाय के सदाचारी होने पर उनक जा भी सदाचारी होती है। अतः जा को चािहए क वे आचाय के उपदेश व राजा के द ड का पालन अव य कर। िनद ष राजा और आचाय – दोन क कभी िन दा नह करनी चािहए॥६५-७२॥ स ब ध : अब मठा ायसेतु के अि तम दो ोक म भगवान् शंकराचाय थोपसंहार करते ए मठा ायसेतु को शा ानुकूल बताते ह तथा चतुयुग के जग गु के स दभ म वणन करके थ को िव ाम देते ह। धम य प ित षा जगतः ि थितहे वे। सववणा माणां िह यथाशा ं िवधीयते॥७३॥ कृ ते िव गु ा ेतायामृषीस मः। ापरे ास एव यात् कलाव भवा यहम्॥७४॥ शंकरर नी टीका : (उपरो व णत) धम क यह प ित (अथात् यह थ – मठा ायसेत)ु वणा म. ेतायुग म जग गु विस जी थे. अ य त उदारमना आचाय के शासन का तो पालन अ याव यक है। य द कसी पापी मनु य को आचाय द ड देते ह.वत ँ॥७३-७४॥ के वला ैत वतक अन तान त ीिवभूिषत पदवा य माणपारावारीण सा ाछंकरावतार ीम परमहंसप र ाजकाचाय जग गु ीमद् आ श कराचाय णीत मठा ायसेतुः स पूण म् ॥ ॥ ॐ शाि तः शाि तः शाि तः ॥ 7 .शासन सभी शासन से सव े है। अतः सवस मत शासन का य पूवक पालन करना चािहए। िवशेष प से.