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कहानी

अकबर का घर

- कमल

असमतल, िचकनी सतह पर इधर-उधर िफसलते पारे -सा, अकबर का मन भी िकसी एक
जगह नहीं िटक पा रहा था। कभी तो उसे लगता तुषार की बात मान अपना मकान बेच
दे और सारे झंझट से मुि*त पाये, तो दसरे
ू ही पल लगता िक चंद लोग, के वैसे नाजायज
दबाव म0 भला वह अपना मकान *य, बेच?े इसी पारे -सी िफसलन का पिरणाम था िक वे
ू -
ु थे। उनके बीच टे बल पर अछत
दोन, आमने-सामने बैठे अपनी-अपनी बात, पर अड़े हए
सी चाय 7यािलय, म0 सुलग रही थी।

“तो तुम अपना मकान नहीं बेचोगे?” इधर से तुषार पूछता।

“नहीं, कभी नहीं!” उधर से अकबर का जवाब आता।

हालाँिक लंगोिटया यार होने के कारण तुषार भी नहीं चाहता था िक अकबर अपना मकान
बेच कर बेघर हो जाए। इसिलए भीतर से उसे अकबर का वह उ:र अ;छा लग रहा था।
लेिकन उन िदन, मुह<ले की पिरिःथितयां कुछ इस कदर िबगड़ चुकी थीं िक अकबर के
मकान से ?यादा उसे अकबर के जीवन की िच@ता हो रही थी।

‘चपंडु क हो तुम, पूरे के पूरे चपंडु क!' तुषार बोला.

‘और तुम ढक हो। वह भी ःमॉल नहीं कैिपटल डी से शुF होने वाला ढक!' अकबर ने
जवाब िदया।

‘‘ठीक है ।...तुम मरोगे एक िदन।'' वह झुंझलाया।

मगर उधर से अकबर की लाहौरी-पंजाबी हँ स कर जवाब लायी, “ओय जाण दे परां, मेरा
वाल वी िवंगा नJ होणा (जाने दो यार मेरा बाल भी बांका नहीं होगा)।”

....और हर बार की तरह उस बार भी तुषार अचानक आयी अकबर की पंजाबी से गड़बड़ा
गया। ऐसे मौक, पर वह कभी न समझ पाता िक *य, अकबर अनायास ही पंजाबी बोलने

. “?यादा ःमाटS मत बनो। ...हो. म0 वह अकबर से कभी जीत नहीं पाता था। ‘आप लोग चाय तो पी िलया कीिजए।' अकबर की पTनी नज़मा टे बल पर ताजा चाय की 7यािलयां रख ठं ढी चाय की 7यािलयां उठा लेती। िपछले कई िदन. बात... का सौदा-सुलफ..छे समय म0 हए ु थे?” उसकी बात पर मुःकराते हए ु वह पलट वार करता और तुषार लाजवाब हो कर रह जाता। सच.तुम कबीर के नहीं कंस.. “िमयां.. खेल . को याद कर लेता है । लेिकन तुषार की गड़बड़ाहट दे ख ज<द ही अपनी आज की भाषा पर लौटते हए ु अकबर ने बात जारी रखी.लगता है ? शायद उसके अNबा का असर उस पर पर छा जाता है और वह इस तरह पंजाबी बोलने के बहाने अपने पुराने िदन.पटराग.हो.।” उसकी हं सी तुषार की झुंझलाहट की आग म0 घी का काम कर गई. से तुषार के इस ूँन िक ‘मकान बेचोगे या नहीं?' के उ:र म0 अकबर की ‘नहीं!' के अलावा उनकी उस अंतहीन बहस का कहीं अंत न होता था। इस तरफ तुषार की झ<लाहट और उस तरफ अकबर की मुःकराहट दोन.. िकसी भुलावे म0 ना रहना।” “. आिथSक. पर टे बल हिथया रहे थे। उनकी ग7पबाजी का च*का सारे दिनया ु जहान की सामािजक.हो. अपनी-अपनी जगह पर डटे रहते। 00 दिनयाँ ु के हर आम आदमी की तरह अकबर और तुषार के घर... के भी अपने खटराग. िजस एक िदन दोन.. िम*सचर आिद अपने सामा@य अंतराल.. राजनीितक. पकौिड़यां. के जमाने म0 रह रहे हो समझे..तो कबीर *या अ.. दोःत आराम से बैठने बितयाने की िःथित म0 होते थे। वनाS तो सारा हXता कभी दXतर से लौटने म0 दे र तो कभी घर.. तुPहारे जनाजे को कँधा िदये िबना मQ नहीं मरने वाला। समझे.चटराग बने रहते और उनकी सा7तािहक लंबी बैठकी का रिववार आ पहंु चता.। इस बीच की मुलाकात0 ‘हे लो हाय टाइप' की होती थीं। िपछली बार बैठक अकबर के घर थी तो इस बार तुषार के घर। भीतर से चाय. कभी कुछ तो कभी कुछ लगा ही रहता..

की आड़ म0 हड़पना बहत ु आसान होता है .. कुछ भी नहीं बदला!” तुषार उसे समझाने का ूयTन करता.छा िफर िमल0गे! .. लेिकन हर बार ही बे-नतीजा रह जाती। “समझ म0 नहीं आता.और िफ<म आिद की बात.िक मूल ूवृित तो हड़पना है और दं ग.हो.छा. “िजस दे श म0 मंिदर-मिःजद नहीं हQ . वतSमान का असल और कुFप चेहरा। तुम अपने समाज का केवल खूबसूरत अ*श ही मत दे खा करो. तुम तो सािहTय की दिनया ु म0 नहीं रहते. कभी तो अपनी कहानी-किवता और शेरो-शायरी की का<पिनक दिनयाँ ु से बाहर िनकल कर अखबार भी पढ़ िलया करो। तुPहारे उस सािहTय म0 खूबसूरत अतीत होता है या खूबसूरत भिवंय के जवान मगर हवाई सपने. तुम िकस दिनयाँ ु म0 रहते हो?” तुषार धु-ं धुआ ं रहा था। “मQ तो इसी दिनयाँ ु म0 रहता हँू . सा\ात ् समाज को दे खो िजसकी सूरत आज के समय म0 बहत ु ही भ^दी और डरावनी हो चुकी है ।” “िब<कुल ठीक। अ. “अ. तो िफर इतना िचंितत *य. का मंिदर-मिःजद और धमS के नाम पर लड़ने वाला जमाना अब बदल चुका है । अब वैसा कुछ नहीं होगा समझे।” “तुम मूखS हो... हो। बेिफब रहो और ऐश करो।” “मQ अपने िलए नहीं तुPहारे िलए िचंितत हंू ।” “मुझे कुछ नहीं होगा। तुम परे शान मत रहो।” अकबर हं सता और उठते हए ु कहता. लड़ाई और दं गे-फसाद का है । दरअसल सबसे सीधा और सटीक होने के कारण हमारे दे श म0 धमS को एक बहाना बनाया जाता है । यिद ये न होता तो कोई और बहाना ढंू ढ िलया जाता *य. के साथ ही उनके बीच उस िवषय पर हो रही बात-चीत और त<ख होती जा रही थी. वहां दं गे नहीं होते *या? इतना भी नहीं जानते. समझे। अमां यार. या िफर होते हQ केवल का<पिनक और सुंदर जीवन के कभी भी न सच होने वाले भुरभुरे सपने। जबिक अखबार.हो.. ूँन मंिदर-मिःजद का नहीं.!” .. म0 होता है . तुम अपनी दिनयाँ ु से जरा बाहर िनकला करो। आज की दिनयाँ ु बहत ु आगे िनकल गयी है । हमारे पूवज S . से घूम-घाम कर िफर से अकबर के घर बेचने पर आ अटका था। गुजरते हए ु िदन.

लेिकन इधर के िदन. म0।' ‘बात0 तो हम अब भी हर तरह की िकया कर0 गी.. म0 तेजी से बदलती राजनीितक और सामािजक पिरिःथितय. के िलए यह बात अजीब होगी और एक हद तक पीढ़ादायक भी िक िह@द ू हो कर वह *य. म0 घुलती रहती. से वह भिवंयवाणी सच होने के मुहाने पर पह◌ु ु ◌ंच गई थी। होना तो यह चािहए था िक वह भिवंयव*ता बनने की खुशी मनाता लेिकन वह है िक केवल रोता रहता है । बि<क वह तो िब<कुल नहीं चाहता िक उसकी भिवंयवाणी सच हो। कई लोग. म0 हर तरह की बात0 होती हQ । आपा बना दोगी तो मुझे ‘मेिवटी म0टेन' करनी पड़े गी। केवल ढे ड़ माह का ही तो फकS है हम दोन. ‘मQ तुPहारी आपा नहीं सहे ली बनूंगी! सहे िलय. से कभी भी बाहर न िनकल पाता.*य.. िजनकी नींव कभी उसके अNबा हजू ु र ने डाली थी। ‘*या अकबर भाई साहब को सच म0 अपना घर बेच दे ना पड़े गा?' सरला अपनी बोिझल आवाज़ और उदास आंख. की तरह। लेिकन आप इस मुह<ले म0 मुझसे पहले आयी हQ . िब<कुल सहे िलय. लेिकन अकबर अपने उन िवँवास. एक मुसलमान के िलए रोता रहता है . की शािदय. इस नाते बड़ी हQ ।' सरला को िनa:र करती नजमा के चेहरे पर शोख मुःकान थी। 00 अकबर के मरने की भिवंयवाणी तो तुषार ने झ<लाहट की सहज ूिबया ःवFप की थी.दरू जाती उसकी हं सी बड़ी दे र तक तुषार के कान. जो सारी आशंकाओं तथा झुंझलाहट के बावजूद गरम गुड़-सी मीठी और जलतरं ग के संगीत-सी मोहक लगती। तुषार चाहे जो भी कहता रहे . मुःकराती रहती हQ । इ@हीं आंख0 म0 झांक कर तो अकबर की बीवी नजमा ने पहली बार उसे आपा कहा था और तब से वह िरँता आज तक िनभ रहा है । उस िदन भले ही सरला ने ूितवाद िकया था. वह अकबर की िज@दगी के िलए िचंितत है ? खैर वैसे लोग भी अब इस बात से ूस@न हो रहे हQ िक अंततः तुषार पर तुषारापात होने वाला है और अब अकबर का अंत बहत ु ही िनकट है । . से तुषार के पास आ बैठी। उसकी आंख0 इस बात पर आकर उदास हो जाती हQ वनाS तो वे खूबसूरत आंख0 हमेशा ही चमकती.

“ओए जाण दे . म0.. जब आधा अगःत गये और आधी रात बीते. दा पाकःतान?” . पािकःतान बन चुका है )?” मगर वे तो िकसी भी तरह मानने को तैयार न थे. पाकःतान बण चु*कया ए। (तुPहारे मानने ना मानने से *या होता हQ । बंटवारा हो चुका है . सारी मानवता बंटवारे की सांूदाियक िहं सा म0 लहलु ु हान हो कर छटपटाने लगी। खैर और लोग तो तTकाल संभल कर दोन. तक लूटने और राज करने के बाद उस िदन. गध. म0 बंट गया और दे श की आजादी के िलए हए ु सारे संघषS. हमारे वही लंगोट वाले गाँधी जी. कeटर कांमेसी और गाँधी जी के स.चे भ*त. न हो अगर उसे कहानी बनना है तो मजा दे ना ही होगा। Xलैशबैक की मदद ल0 तो इस कहानी का ूारं भ उसी िदन हो गया था. रहते थे। *या कहा कौन वाले गाँधी जी? अरे भाई. के िकःसे का अंत हआ ु था। अथाSत ् दो सौ साल. िजनके सारे सTयामह. इस तरह बताने से सब कुछ बहत ु सरलीकृ त होता जा रहा है और बेमजा भी। बेमजा कहानी भला कैसी कहानी? *य. गदराया बदन गुःसे से कांप रहा था और मुंह से झाग िनकल रही थी। लोग.. तरफ लूट-मार म0 लग गये। लेिकन उस कeटर कांमेसी यािन अकबर के अNबा हजू ु र को भला कोई कैसे समझाता? उसका मन तो बंटवारे को ःवीकारने के िलए कतई तैयार न था। आम जन के शNद. ने िॄटे न जाते-जाते. मQ नJ मानदा िफरं िगयां दी इस वाँfड नूं (मQ िफरं िगय. का यह बंटवारा नहीं मानता हँू )।” उनका चेहरा तप रहा था। जवान.. िजस िदन अंमेज. के बावजूद अंमेज. ‘दे श आजाद होने के उस समय उसका िदमाग उलटी बात0 कह रहा था। यािन उलटा चल रहा था।' लाहौर म0 अपने घर के बाहर खड़े वे जोर-जोर से कह रहे थे. “तेरे मणण. सन ् सQतािलस म0 अंमेज अपना बोिरया- िबःतर समेट ‘शान से' िॄतािनया को लौट रहे थे। उधर लाहौर म0 अकबर के अNबा. ने उसे समझाना चाहा था.िक कहानी िकतनी भी सच *य.लेिकन जरा ठहर जाएं.. ना मणण न की हंु दा ए। त*सीम हो चु*की ए. को भी मात करती ऐसी दल:ी ु ु झाड़ी िक हमारा दे श दो टकड़. “ओय कैसा पाकःतान? िकTथ.

को ध:ा बताएगा और िक वह आजाद मु<क का नागिरक होने के नाते अंमेज. ने उ@ह0 बड़ा समझाया लेिकन समझाने वाल. की भी बात भला कोई सुनता है ? वैसे भी दे श से ूेम करने वाले पागल ही तो होते है ? तभी तो शहीदे आजम भगत िसंह. को ध:ा बताने के िलए भारत की ओर। अपनी तरफ से वे िब<कुल सही काम कर रहे थे पर@तु तब और उन हालात. आजाद मौत लेते हQ . उसका बदला लेने का यही एकमाऽ राःता है । लेिकन उसकी बात िकसी ने नहीं सुनी! साथ ही उसे बताया गया िक वह पागल है और पागल. की तरह चुपचाप एक तरफ बैठ जाए। अब पागल. ‘पािकःतान म0 अपना सब कुछ गंवाने के कारण सरदार जी का िदमाग चल गया है ।' . के हTथे चढ़ने की जगह ःवयं को गोली मार.उ@ह. ने जाते- जाते हम भारतवािसय. म0 लाहौर छोड़ कर भारत आने का मंसूबा रखने वाले उस मुसलमान को सारे लोग पागल ही तो कहते! और सभी लोग उसे पागल कह भी रहे थे! चढ़ती जवानी का उबाल और पंजािबयत की खािसयत वाला वह तथाकिथत पागल िकसी के भी कहने से नहीं aका। उसका कहना था. भारत आ कर वह अंमेज. को िह@दः ु तान और िह@दओ ु ं को पािकःतान जा कर बस जाना चािहए। अंमेज. खुली दाढ़ी. के बंटवारे वाले फॉमूल S े को पूरी तरह खािरज करता है । उसका तो यह भी कहना था िक सारे मुसलमान.ने अपनी चादर (लुंगी) की गांठ कसते हए ु कहा. उ@ह. मQ तां िह@दोःतान िवच ही रै णा ए (अरे कैसा और कहां का पािकःतान? ऐसा है तो संभालो अपना पािकःतान मQ तो िह@दः ु तान म0 ही रहंू गा)।” घर-पिरवार तथा मुह<ले वाल.. िबिःमल और खुदीराम बोस जैसे पागल हं सते-हं सते फांसी का फंदा चूमते हQ । चंिशेखर ‘आजाद' जैसे पागल अंमेज. िनकले पड़े अंमेज. तो नेताजी सुभाषचंि बोस जैसे िवदे श जा कर िह@द के िलए फौज रचते हQ । अगर वे सब दे श-ूेम म0 पागल न होते तो *या पड़ी थी. के सभी तकS दर िकनार कर. तां संबालो आ7पणा पाकःतान. और उसकी फराSटेदार लाहौरी- पंजाबी सुन कर सन ् सQतािलस म0 अटारी-बॉडS र पार करने पर सब ने उ@ह0 िस*ख ही समझा था। जब वह कहते िक वो मुसलमान है और अंमेज. को जो उ<लू बनाया था. तब लोग उस पर तरस खाते हए ु कहते.. को उ<लू बनाने के िलए भारत आ गया है .ने चटपट अपने मन म0 ठान िलया। बस िफर *या था. “इं ज होया ए. उ@ह0 वह सब करने की? आज के नेताओं की तरह वे भी चुपचाप माल काटते और चैन की बंशी बजाते। 00 i◌़◌ौर.अकबर के अNबा के सर पर बंधी पगड़ी.

समय नहीं aकता। िदन बीतते गये। तारीख0 बदलती गJ। नये दे श.चाई जानी तो लगा िक उ@ह0 एक दसरे ू िक सiत जFरत है । िफर नूर को उनकी िज@दगी का नूर बनते दे र न लगी। 00 जीवन भले थम जाए. म0 7यार से अंगुिलयां िफराते हए ु . जैसा िक उन िदन. और धोखेबाज रात. ने अपने जीवन होम िकये थे और दे शवािसय. का दौर था। कभी भरी दोपहर म0 है वािनयत का अंधेरा छा जाता तो कभी काली रात म0 भी इं सािनयत की रोशनी कkध जाती। तेज आंधी के थपेड़. म0 िदशाहीन उड़ते सूखे प:े की तरह अपनी उन बात. की एक डू बती शाम उ@ह0 नूर िमली थी। पािकःतान जाने के िलए िनकले अपने पिरवार से िबछड़ कर भटकती दखी ु .िफर धीरे -धीरे अकबर के अNबा ने उस तरह की बात0 करनी ःवयं ही बंद कर दीं। लेिकन यह कभी न माना िक पािकःतान छोड़ िह@दः ु तान आ कर उसने कोई गलती की थी। और ना ही कभी पािकःतान लौट जाने के बारे म0 सोचा.. ने उPमीद0 पाल रखी थीं। ..नये ह* ु मरान. म0 सब कुछ था. पहली नजर म0 वह भी उ@ह0 िस*ख समझी थी और जान गई िक अब उसका अंत िनकट है । लेिकन डर के मारे बेहोश होने से पहले अपने कान. नही था तो बस जीवन। सामने पड़ते ही.चे िनकाल कर सहजता से ‘धमS-चेक अनुंठान' संप@न िकये जाते हQ । फलतः वे एक लंबे समय तक लोग. की नजर. म0 पागल-िस*ख ही बने रहे थे। वह बेइमान िदन. म0 न जाने *या-*या होता रहा? नहीं हआ ु तो बस वह सब... उनके पािकःतान वाले िरँतेदार चाहते रहे थे। उनकी दिनयां ु यहीं थी और वह दिनयां ु रXता- रXता यहीं गहरी होती जा रही थी। जब उनके घर पहली संतान के Fप म0 अकबर का ज@म हआ ु तो वे बड़े ूस@न हए। ु “इसका नाम अकबर रख0गे!” अकबर के अNबा ने नूर के बाल. “डर मत.गे जो नीचे से चादर (लुंगी) उठा कर अकबर के अNबा का ‘धमS-चेक' न कर सके! वनाS आज के दौर म0 तो गभS से भी अज@मे ब. म0 पड़े शNद. है रान और परे शान अकेली नूर! िजसकी खौफज़दा आंख. ने एक दसरे ू की स.उस समय के लोग िनँचय ही पुaषाथS म0 ज़रा कमज़ोर रहे ह.. के साथ न जाने वे कहां- कहां भटकते रहे । उ@हीं भटकते िदन.. अ<लाह पर भरोसा रख।” उसे राहत दे गये थे। होश म0 आने के बाद जब उन दोन. िजसके िलए आजादी के दीवान.नई समःयाएं। अलग हए ु उन दोन. दे श.

. म0 वे गुण-दोष तो पीिढ़य. गुFnारा. अरदास और ूेयर की जगह आरती करनी होगी घंटे बजाने पड़0 गे। अगर वैसा न िकया. पािकःतान िमल कर िफर से एक भारत बन िदन सभी लोग िमल जाएंगे और िह@दः जाएंगे.बी. तब िबना िकसी िक@तु-पर@तु (इXस और बoस) के ‘के. से ही करनी पड़े गी! यथा अजान. पर जाता है तो कोई बात नहीं. कभी भी मरने के िलए तैयार रहना होगा। वैसे मोटे तौर पर दे खा जाए तो पूजा आिद वाली इन बात. उस मुह<ले म0 कुछ लोग तथाकिथत Fप से ‘असल िह@द'ू बन गये और गवS से कहने लगे थे िक भारत.के. बात0 मनवाना तो . म0 चमक भर गयी थी। न जाने *य.. िगरजा आिद जगह. लेिकन एक िदन जFर सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। इं सान हमेशा के िलए जानवर बना नहीं रह सकता। ये धमS और जात-पात के नाम पर होने वाले झगड़े बंद हो कर ही रह0 गे। जब तक वे िज@दा रहे अमन और खुशहाली के वे सपने हमेशा उनके िदल म0 जीिवत रहे । पता नहीं अNबा हजू ु र के िवँवास. का असर था या अपने नाम का. से ःवभाव म0 काफी अलग था। अNबा का वह भरोसा जो अणुवांिशकता के माlयम से सबसे ?यादा अकबर म0 बह आया था.-बहन. तक बना रहा।. लेिकन इबादत उसे िह@द ू रीितय..' अथाSत ् कहीं भी. भारत नहीं असल म0 िह@दः ु तान है और हम भारतीय नहीं हQ . ने इसे मुह<ले को बलपूवक S ‘िह@द-ु मुह<ला' बनाना शुF िकया था.छे न ह.कहा था। तब तक उसकी लाहौरी-पंजाबी जाने कहां खो चुकी थी। “अकबर *य. अकबर अपने अ@य भाइय. तक अ\ुण बने साथ-साथ चलते रहते हQ । लेिकन यहां वैसा नहीं हो रहा था। 00 तो हआ ु यूँ िक बीसवीं सदी की अंितम चौथाई म0 तब से.बी. ‘गवS वाले' िह@द ू हQ । अगर यहां कोई गैर-िह@द ू रहना चाहता है तो वह िह@द ू बन कर ही रह सकता है । अथाSत ् यिद वह मिःजद. की दीवार0 िगराएगा।” बोलते-बोलते उनकी आँख. म0 ऐसी किठनाइयां न थीं िक वे मानी न जा सक0। लेिकन सpयताओं का इितहास उठा कर दे ख ल0.वही महान जगतगु ् F की ूितंठा वाला भारत। भले ही आज हालात अ.लेिकन िफर हालात तेजी से बदलते चले गये थे। हालाँिक वैसा होना ‘जेनेिट*स' के मूल िसmांत.. जब से कुछ लोग. के िखलाफ है *य. काफी िदन. के बीच खड़ी नफरत..िक जीव.. उ@ह0 इस बात का हमेशा ही भरोसा रहता िक एक ु तान.?” नूर ने अपनी कजरारी आँख0 उनके चेहरे पर िटका दीं। “िह@द-ू मुसलमान को एक करने के िलए उस अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही' चलाया था। हमारा अकबर भी इं सान.

अशांित!' िफर जैसे अचानक िबजली चली जाए. का िदमाग अभी भी उन पथरीली गुफाओं के उजाड़ अंधेर.तो हािसल ये िक जब तक मार-पीट..िक ‘मान-जाना' मतलब सुलह-सफाई यािन िक शांित! ‘शांित' शNद के उ. सर फुटौrवल से ही िमलती है । वैसे भी लड़ने-मारने के गुण गुफा-युग से ही मनुंय.. नहीं! शांित बहन जी नहीं चलेगी.येड़ा है *या!' तीसरा तेजी से झपटता आता.शां ् ित. पर रहती है । वह स:ा. सहगल की आवाज म0 फैसला सुनाता. ‘ए! *या बोलता तू?' दसरा ू कहता...चारण से ही अचानक चार.. ‘. ‘शांित यहां चाहता कौन है ? गुफा-युग से िनकल आये उन मानव. म0 िचपक-िचपक कर िलपटे हए ु हQ । उन पर ‘पोिजिटव बोमोजोमल Pयूटेशन'(रचनाTमक गुणसूऽीय बदलाव) के िलए िकसी भी रे िडयेशन का असर नहीं पड़ता। वैसे भी मान-मनौrवल से ?यादा जब लड़ने के बहाने ढंू ढना उ^दे ँय हो तो *या िकया जा सकता है ? *य.. ‘ओम.का के..का पूछता.कभी भी कहीं भी ‘गवS वाल.एल. के अंतगSत िह@दओ ु ं के मुह<ले म0 िःथत अकबर का तथाकिथत मुसलमान-घर अड़ गया था। दरअसल घर का िह@द-ू मुसलमान होना नहीं.. ‘नहीं. म0 भटक रहा है ।' और तब पांचवां झ..ओम!'् ितलःमी हवाओं का पहला झ.ओम!् ओम. के गुणसूऽ. . म0 फुसफुसातीं. अचानक ही छा जाने वाला स@नाटा बतलाता िक वहां बात0 करती ितलःमी हवाएं चली गई हQ । तो इसी तरह के कई ऊट-पटांग आदे श. ‘मूखाs! युm.. ‘शांित?. तरफ अजीब सी ितलःमी हवाएं बहने लगतीं िजनकी सरसराहट मजाक उड़ाने के से अंदाज म0 कान. और महाभारत.' का उ^दे ँय भी नहीं रहा है । उनकी ‘अजुन S -qिंट' आम आदमी पर नहीं हर काल म0 स:ा की ग^दे दारी कुिसSय. जो मान मनौrवल से नहीं. और खून-खराबा न हो जाय... हम जी के *या कर0 गे?' और ितलःमी हवाएं कोरस करने लगतीं. की परं परा वाले हमारे दे श म0 शांित?' चौथा भला *य. पीछे रहता. अशांित भाभी जी चािहए। अशांित....शां ् ित.

इसका असल कारण उस घर का मुiय बाजार म0 मेन रोड पर िःथत होना था। कुछ गवS वाले िह@दओ ु ं का सोचना था. का हल कहीं ऊपर से कभी नहीं टपकेगा। अपनी किठनाइय.. िप?जा-बगSर और भी न जाने *या-*या चीज. जलती-बुझती. के हल हम0 ःवयं ही ढंू ढने पड़0 गे. ने? *या कर पाये अकबर के अNबा हजू ु र? अब तैयार रिहए कुछ वैसा ही होगा इस अकबर का! ऐसे लोग बस झूलते रह जाते हQ । अकबर चाहे िजतनी उछल-कूद मचा ले होगा इससे भी बस वो होगा... अगर उस घर को झटक िलया जाए तो वहां एक अ.. उसे बेच कर कैसे और *य.*या कर िलया दे श पर मर-िमटने वाल. अकबर के अNबा हजू ु र िह@दः ु तान आने के िलए अड़ गये थे उसी तरह इ*कीसवीं सदी बीतने वाले इन िदन. िृज. िज@दगी को सुंदर बनाएंगे.. को सुंदर दे श दे कर जाना है . मचलती-चमकती दकान0 ु ह. वह भी नीचे और इसी जमीन पर। लेिकन अकबर जैसे लोग ऐसे मूखS हQ िक मानते ही नहीं। *या कहते हQ . मोबाइल आिद इले*शोिन*स सामान.. आने-वाली नःल.न जाने *या-*या ऊल-जलूल बकते रहते हQ । .. टी. हमारी किठनाइय.तो िजस तरह आधा अगःत गये और आधी रात बीते सन ् सQतािलस वाले उन िदन. मुसलमान बनने कहा जाए मुसलमान बन जाओ। इसम0 *या हजS है ? वैसे भी पूजा करो या इबादत कोई फकS नहीं पड़ने वाला! िज@दगी ऐसे ही रहे गी. को अपने तथा सुनहरी बाजार के बीच एक अकेला अकबर खड़ा नजर आ रहा था। 00 . का खानदान है ! न जाने *य..िक वषx से वह अपने पिरवार के साथ वहां रहता आया है . सpयता-संःकृ ित बचाएंगे. समाज को सुंदर बनाएंगे. उसके अNबा हजू ु र नहीं माने थे तो आज भला वह कैसे मान जाता? उसके अNबा को जानने वाले बात0 करते हQ .. म0 अकबर िह@दओ ु ं के मुह<ले वाले अपने पैतक ृ घर को ले कर अड़ गया है । . कहीं और चला जाए? उन िदन.गी। िजनसे होने वाली आमदनी उ@ह0 दे खते ही दे खते फशS से अशS तक ले जाएगी। उ@ह0 अकबर का घर बुरी तरह ललचाने लगा था। उन लोग.वी. नहीं तो!' 00 ..छा खासा माकuिटं ग कां7ले*स बन जाएगा। जहां दे सी से ?यादा िवदे शी कपड़. की िरं ग-िबरं गी. ‘अजीब अहमक.. अगर बहत ु उॆ हई ु तो भी 70-80 साल की ही िज@दगी होगी न. हमेशा मरने पर लगे रहते हQ । अरे भई. जरा इधर-उधर कर के काट लो। भला *या िबगड़ जाएगा? िह@द ू बनने कहा जाए िह@द ू बन जाओ... हां..

आप लोग.चो7प ःसाले..चे..दे .अकबर को ूारं भ म0 इशार..वो.. को जFर कोई गलत-फहमी हई ु है ।” ..।” वह कुँिकयाया। -“अकबर के ब.. हQ ?” -“दे िखए मQने िकसी का कुछ नहीं िबगाड़ा। आप लोग मुझे मुह<ला छोड़ने के िलए *य. मQ अकेला पूरा मुह<ला कैसे िबगाड़ सकता हंू ? आ .? हम वषx से यहां रहते आये हQ । यहां की िमeटी म0.।” अपनी गुम होती िसeटी-िपeटी म0 उसे सबसे पहले अपनी िमeटी ही याद आयी। -“..” उसे लगा मान.....*य. *या कहा तुमने कुछ नहीं िबगाड़ा?” उसकी कुंिकयाहट को बीच म0 ही काट कर एक और आवाज उठी.. म0 बताया जाता रहा था। लेिकन ‘आंख....नहीं.. पर न उतर0 . तुPहारी िमeटी गई तेल लेने!” अगले ने उसे जोर से िझड़क िदया। -“दे .जी.दे िखए. अपना अकबर ऐसा न था। वैसे समझ कर भी उसने मिटया िदया होगा. इसी का चांस ?यादा है । िफर सुना गया िक एक रात कुछ लोग उसके घर जा चढ़े । वहां उनके बीच कुछ िनPनिलिखत ूकार की बात-चीत हई ु थीः- -“िमयां तुम यह मुह<ला छोड़ दो।” पहला ही वा*य अकबर के सर पर आिzवक बम-सा फटा...-इशार. बे? तू *या कर लेगा? गािलयां न द0 तो *या तेरी आरती उतार0 .. “तुम तो पूरा मुह<ला ही िबगाड़ रहे हो।” -“नहीं.क.. नंगा करके बाजार म0 चौराहे पर खड़ा कर िदया गया हो। -“*य. मुह<ला छोड़ने को बोल िदया सो बोल िदया। अब तुझे मुह<ला छोड़ने की कैिफयत भी बतानी होगी *या?” एक और खूख ं ार आवाज आयी। -“. ही आंख. उसके चार. म0 इशारा हो गया' वाला इशारा समझ जाए.. तरफ िहरोिशमा और नागासाकी बनते चले गये थे। -“क... आप लोग गािलय. कह रहे हQ ?” उसने बात संभालने का ूयTन िकया। -“दे ख बे..

.. समझे। अब हमारा धमS ॅंट हआ ु िक नहीं? बोलो!” उस rयाiया से अकबर अवाक् और िकंक:Srयिवमूढ़ रह गया। एक पल को उसके ज़ेहन म0 बचपन म0 सुनी ‘बाघ और मेमने' वाली कहानी कkध गई। जहां बाघ ने मेमने को नदी की धार के उलटी तरफ वाला पानी जूठा करने के आरोप म0 मार कर खा िलया था। उसने हकला कर कुछ कहना चाहा. सो िकया। अब हम तुPह0 अपना मुह<ला और ॅंट करने नहीं द0 गे।” -“अब कान खोल कर सुनो.” -“जब तुम ‘िजबह' बनाते हो.. तब उसकी गंध हवा म0 उड़ती है । वह गंध उड़-उड़ कर पूरे मुह<ले म0 फैलती हई ु हमारे घर. हम बताते हQ तुमको िक कइसे िबगाड़ रहे हो। सीधी सी बात है .तो इसीिलए तुPह0 मुह<ला छोड़ना होगा.वो.. समझे!” गवS वाल.जैसी थी। -“. पर अवैध कNजे के िलए शहर भर म0 जाना जाता था। उसने सूख आये गले म0 थूक घ...नहीं यह सच नहीं है । तुषार बाबू तो शुm शाकाहारी हQ ।” अकबर का गला सूख गया था। -“तो *या हआ ु ? तुPहारे घर का शाकाहार भी तो उसी चू<हे पर बनती हQ न. मQ यह मकान नहीं बेचग ूं ा।” ..छा िमल जाएगा। उसे बेच कर चुपचाप कहीं सटक लो समझे िक नहीं! ऐसा ‘‘गो<डे न शेक है @ड चांस'' िफर नहीं िमलेगा?” ..टते हए ु िकसी तरह जवाब िदया. तुम ‘बड़ा' बनाते हो िक नहीं? बोलो।” तब तक पीछे खड़ा एक ‘गवS वाला' िह@द ू आगे िनकल आया। -“वो..कूं.-“अरे अकबरवा. वह मिरयल कु:े की कूं.तो.अकबर उनके सेठ को जानता था। वह सेठ अपने मटके के अ|डे और जमीन. उसको भी तो तुम िजबह िखलाते हो!” -“नहीं. “नहीं.. लेिकन उसके गले से जो आवाज िनकली.. ने उसे फैसला सुनाया। -“और ऊ जो तुPहारा चमचा है न तुषरवा.. मकान के िलए माहक की िच@ता मत करो। अपना सेठ तैयार है उसी ने हम0 तुPहारे घर भेजा है । दाम अ. िजस पर अपना ‘िजबह' बनते हो। अब बताओ शाकाहार भी हआ ु िक नहीं ॅंट?” -“आज तक तुमने जो िकया.. म0 घुस आती है । िफर सांस के साथ हमारे शरीर के भीतर घुस जाती है .

उनम0 से कुछ उस रात अकबर को धमकाने वाल. गोबर आिद म0 िबखर गये। उनम0 से एक टकड़ा उठा कर िब<ली भाग चुकी थी और बाकी के िलए आस-पास से कु:े आ जुटे थे। नजीर ने वह qँय दे खा तो घर म0 मार पड़ने की आशंका से जोर-जोर से रोने लगा। ‘चुप बे. और घुटन. कभी उसके घर की मिहलाओं के साथ युm म0 जीती गई मिहलाओं की भाँित rयवहार करने के ूयTन िकये जाते। पड़ोसी दे श का नागिरक तो उ@ह0 हर पल ही घोिषत िकया जाने लगा था। हर वो कोिशश की जातीं. दे ख कर नहीं चलता और अब रो रहा है !' िगराने वाला उसे िझड़क रहा था। . nारा पTथर फ0के जाते. के पास पहंु चना चाहता था इसिलए उसकी चाल तेज थी। मछली बाजार से िनकल कर चौक पर पहंु चते उसे िजन युवक. ‘दे ख बे अकबरवा का बेoटा।' ‘ठहरो तुम सबको तमाशा िदखाता हंू । वह भी फोकट म0।' दसरे ू ने कहा और नजीर की ओर बढ़ गया। जब वह नजीर के पास पहंु चा तो नजीर को पता ही नहीं चला कब उसे बगल से िनकलते उस युवक ने लं}घी मारी। नजीर दरू जा िगरा उसकी बांह.-“दे खो अभी तो हम समझाने आये हQ अगर समझ गये तो ठीक है । न समझे तो पिरणाम भुगतने के िलए तैयार रहना।” उस सारगिभSत वाताSलाप के बाद वे सभी लोग िजधर से आये थे.. ने दे खा. उधर को ही लौट गये। .लेिकन उस िदन के बाद से अकबर के जीवन म0 सारी चीज0 किठन होती चली गई थीं। अपने ही मुह<ले म0 उसे मानिसक तौर पर धीरे -धीरे कर के मारा जाने लगा था। कभी उसके घर पर तथाकिथत भूत.. म0 शािमल थे। एक बोल उठा. पर िछल जाने से खून बहने लगा था। मछली वाला पोलीथीन उसके हाथ से िछटक कर दरू जा िगरा। ु मछली के टकड़े सड़क पर ~ल ु ू . िजससे अकबर का जीना मुहाल होने लगा। 00 एक शाम अकबर का छोटा बेटा नजीर बाजार से मछली ले कर लौट रहा था। बारह-चौदह साल का नजीर ज<द से ज<द घर का काम िनपटा कर खेल के मैदान म0 अपने दोःत.

.. सड़क से जा टकराये। नजमा का सर फूट गया। न जाने कहां से आकर कुछ लड़के उनके पास खड़े हो गये लेिकन उ@ह0 सहारा दे कर उठाने की जगह उन पर हं सने लगे। एक ने बढ़ कर इTमीनान से िर*शे के च*के म0 फंसा अपना बांस िनकाला। अकबर ने उसे पहचान िलया था वह गुःसे से चीखा..हो... की बदमाशी है ।' अकबर बोला। ‘दे िखए आप जबरदःती झगड़ना चाह रहे हQ । इट वॉज एन ए*सीड0 ट। शुब कीिजये बांस िर*शे के च*के म0 फंसा. आपके सर पर नहीं पड़ा। वनाS आपका मुंह नहीं खुलता.. ‘तुम लोग.कर हं सने लगे। संयोगवश उधर से गुजर रहे तुषार ने नजीर को दे ख िलया। वह तेजी से उसकी ओर लपका उसके वहां पहंु चते ही हं सने वाले लड़के इधर-उधर िखसक गये। तुषार ने सारा मामला जान कर पहले नजीर को चुप कराया िफर अपने पास से उसे मछली खरीद कर दी और साथ ही यह िनदu श भी िक घर पर िकसी को कुछ ना बताये। उसके कुछ िदन.तब तक नजीर अपने िगराये जाने का मामला पूरी तरह समझ चुका था। वह जोर से चीखा. हो. शमS नहीं आती।' िगराने वाला उसे डांटने लगा। तब तक उसके बाकी साथी भी वहां आ. ‘हंु ह. बाद की घटना तो और भी उ~ं ड ता से घटी थी। अकबर नजमा के साथ िर*शे पर घर को लौट रहा था। न जाने िकधर से फ0का गया बांस का डं ड ा आ कर िर*शे के च*के म0 फंस गया। गित म0 अचानक आये अवरोध के कारण िर*शा उलट गया। बचते-बचाते भी दोन. तुमने जान-बूझ कर बांस फ0का है । सब तुम लोग. हम तो अपना ूेि*टस कर रहे थे। न जाने कैसे हाथ से िफसल गया।' ‘मुझे पता है . अब तक आपकी खोपड़ी खुल जाती!' . ‘नहीं अंकल आप झूठ बोल रहे हQ । मQ खुद नहीं िगरा.!' उसने अपने कंधे झटकाते हए ु बेिफबी से कहा... आपने मुझे िगराया है ।' ‘चुप रहो! खुद िगरे हो और हम पर इ<जाम लगा रहे हो? झूठ बोल रहे हो.

लो वह आ गया। अब प0च आ गया तो इसम0 कोई *या कर सकता है ? वैसे भी जब सारे लोग बच िनकलने वाला और आसान राःता ढंू ढने लग जाय0 तब तो प0च ही आय0गे? तो हआ ु यूं िक जब भी कोई माहक अकबर का शानदार मकान दे खने आता लौटने के बम म0 सेठ के लोग. यह मकान बेच दो। पता नहीं आगे *या-*या होने वाला है ।” .मकान की घटती कीमत के उ@हीं िदन. मान... ऐसे तो यह कहानी एक बार िफर से सरलीकृ त होती जा रही है । लगता है यहां पर कहानी म0 एक और प0च आना जFरी है . सन ् सQतािलस की पाशिवकता एक बार िफर से उसके अNबा की Fह की आंख. के पास जमा करवा दे । उसके बाद मकान खरीदने की सोचे। यह सुन कर वह खरीददार जो जाता िफर लौट कर कभी न आता। पिरणाम यह हआ ु िक दे खते ही दे खते उसके शानदार मकान की कीमत बीस लाख से घट कर आठ-दस लाख तक पहंु च गई। . हं सते हए ु उधर को ही िनकल गये। अकबर को लगने लगा. िकसी अ@य खरीददार को बेचेगा। मगर ज़रा ठहिरए..और घटती कीमत दे ख कर ‘मकान शुिmकरण' वाले लोग अपनी चाल के ूित आँवःत हो रहे थे। जब खरीददार नहीं आय0गे और मकान की कीमत भी ू चुकेगी. उस संभािवत माहक से कहते िक खरीदने के बाद ‘मुिःलम-मकान' का शुिmकरण करवाना पड़े गा। िजसके िलए पांच लाख का खचS पहले उन लोग. की तरफ से अकबर को आठ लाख का ऑफर िमला था। तुषार की आवाज कांप रही थी.. तब सेठ अकबर का मकान बड़ी आसानी से कौिड़य.. के मोल खरीद बुरी तरह टट कर वहां अपना चमचमाता बाजार खड़ा कर लेगा। 00 . म0 आंख0 डाले अeटहास करने लगी हो। . तो बचना ऐ ूेिमय.और वैसी पाशिवकता के िखलाफ अड़ जाने की िहPमत रखने वाले उसके जीन. म0 इस बार ‘बोमोजोमल Pयूटेशन' हो ही गया था। लेिकन इस इरादे के साथ िक अपना मकान उस सेठ को नहीं.. जो उस रात अकबर को धमकाने गये थे.हा. “ठीक है िक क़ीमत कम है .. म0 एक बार िफर से उसी मकान म0 बैठे चाय पी रहे अकबर तथा तुषार बाबू आपस म0 बहस कर रहे हQ । िपछले हXते गवS वाल..हा. वे लड़के िजधर से आये थे.... लेिकन अब भी कुछ नहीं िबगड़ा.हा..

का हल पा लूंगा। मकान बेच दे ने से सारी समःयाएं हल हो जाएंगी *या? अगर मकान बेच दे ने से समःयाएं हल होने लग0. न आ जाए! मQ लात मारता हँू .और यहां इस मुह<ले के लुटेरे मेरे घर की जगह बाज़ार बनाना चाहते हQ । कभी जान से मारने की बात बताते हQ तो कभी मकान की कीमत घटाने की कोिशश0 करते हQ । नहीं तुषार बाबू. के . मेरी लड़ाई मुह<ले वाल..छाई के नहीं कटु यथाथS के डरावने सपने ही दे खने पड़0 गे।” “नहीं तुषार बाबू. जो तुम िफर से अपना नहीं बेचने वाला पुराना राग अलाप रहे हो?” हालाँिक घर बेचने के िनणSय से लौट कर घर न बेचने का अकबर का वह िनणSय उसे भी अ. हमसे नहीं होगा। कीमत कम हो या ?यादा. पर झूठे दोष मढ़ कर उनकी िनभSरताएं छीनी हQ । कहीं कोई जंगल हड़पना चाहता है तो कहीं कोई रे िगःतान। कहीं कोई मकान हड़पना चाहता है तो कहीं कोई जमीन। कहीं कोई गाँव हड़पना चाहता है तो कहीं कोई पूरा दे श। कहीं कोई पानी हड़पना चाहता है को कहीं कोई तेल। . पर। ये मकान नहीं घर है . से नहीं हड़पने वाले लालच से है । मेरा घर अब हड़पने वाले लुटेर. पर घर नहीं बेच0गे।” अकबर ने qढ़ता से अपना िनणSय सुनाया। उसका उ:र तुषार को है रान करने वाला था। “*य. तुषार बाबू. “अब िफर से वही राग मत अलापो। मेरी मानो तो ज<द से ज<द इसे बेच दो। *या पता अभी िमल रहे आठ लाख से भी बाद म0 हाथ धोना पड़ जाए और इसकी कीमत घट कर दो-चार लाख न रह जाएं। जैसा समय आ गया है उसम0 अ.और उस पर तुराS यह िक अपनी लूट को सही सािबत करने के िलए वे झूठ-मूठ का कोई भी तकS जड़ दे ते हQ । जब तक आप उस तकS के झूठ की दहाई ु दे ते हQ ..चाई जान चुका हँू । हर काल म0 ताकतवर. अब तो अNबा हजू ु र आके कह0 .चे i◌़वाब यहां सरगोिशयां करते हQ । मQ अब समझ गया हंू .. हमारा घर! हमारे कई िज@दा और स. अब *या हआ ु ? रात को सपने म0 अNबा हजू ु र आये और मना कर गये. “सपना तो वह था जो मQने दे खा और सोचा िलया िक मकान बेच कर अपनी मुिँकल.. तो दिनया ु के नNबे फीसदी लोग अपना- अपना मकान बेच दे ना चाह0 गे। नहीं. ने कमज़ोर. तब भी अपना घर नहीं बेचग ूं ा।” अकबर के चेहरे पर qढ़ता थी.. तब तक तो लूट पूरी हो चुकी होती है । इस दिनया ु म0 जो ?यादा ताकतवर है वो उतना ही बड़ा लुटेरा है । .. ऐसे लाख.. के बारे म0 सोच कर वह िवचिलत भी था। इसिलए उसने समझाया.वो मेरी भूल थी। अब मQ उस बुरे सपने की स.छा लग रहा था। लेिकन अकबर को हो रहे कंट.“नहीं. नहीं! मQ अपने घर को बाज़ार नहीं बनने दं ग ू ा। भले ही कोई चालीस लाख ले कर *य.

जमशेदपुर-831005(झारखंड )। दरभाषः ू ... म0 चमक थी....कभी नहीं!.िखलाफ यूं ही और यहीं पर खड़ा रहे गा। मQ इसे नहीं बेचग ूँ ा. “ये की न तुमने असल बात। मQ तुPहारे साथ हंू ।” --0-0-- संपकS: (कमल) डी-1/1 मेघदत ू अपाटS म0ट.0657-2310149 .िकसी भी कीमत पर नहीं!!” तुषार ने अकबर का हाथ कसकर पकड़ िलया उसकी आंख. मरीन साइव रोड कदमा.09431172954. पो.-कदमा..