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कहानी

अंितम तीन िदन

िदया माथुर
-िदया

अपने ही घर म माया चूहे सी चुपचाप घुसी और सीधे अपने शयनक म जाकर िबःतर
पर बैठ गई, ःत'ध. जीवन म आज पहली बार, मानो सोच के घोड़. की लगाम उसके हाथ
ू गई थी. आराम का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था. अब समय ही कहां बचा था
से छट
िक वह सदा की भांित सोफ़े पर बैठकर टे िलिवजन पर कोई रहःयपूण6 टी वी धारावािहक
ु चाय की चुिःकयां लेती. हर पल कीमती था. तीन िदन के अंदर भला कोई
दे खते हए
अपने जीवन को कैसे समेट सकता है ? पचपन वष; के संबंध, जी जान से बनाया ये घर, ये
सारा ताम झाम और बस केवल तीन िदन! मजाक है >या? वह झ?ला उठी िकंतु समय
यथ6 करने का >या लाभ. डा>टर ने उसे केवल तीन िदन की मोहलत दी थी. ढाई या
साढ़े तीन िदन की >य. नहीं, उसने तो यह भी नहीं पूछा. माया ूE नहीं पूछती, बस जुट
जाती है तन मन धन से िकसी भी आयोजन की तैयारी म, वह भी युF ःतर पर, बेटी
महक होती तो कहती, ममा, 'ःलो डाउन.' जीवन म उसने अपने को सदा मुःतैद रखा िक
न जाने कब कोई ऐसी वैसी िःथित का सामना करना पड़ जाए. बुरे से बुरे समय के िलए
ःवयं को िनयंिऽत िकया, तािक वह मन को समझा सके िक इससे और भी तो बुरा हो
सकता था.

ख़ैर, तीन िदन बहत


ु होते हK . एक हLते म तो भगवान ने पूरी दिनया
ु रच डाली थी.
िबगाड़ने के िलए तो एक ितहाई समय भी बहत
ु होना चािहए. िकंतु उसे िबगाड़ क़र नहीं
ये घर संवार के छोड़ना है . सNपिO को ऐसे बांटना है िक िकसी को यह महसूस न हो िक
अंधा बांटे रे वड़ी, भर अपने को दे . संसार से यूं िवदा लेनी है िक लोग याद कर . कमर
कसके वह उठ खड़ी हई
ु .

तीनो अ?मािरय. के पलड़े ख़ोलकर माया लगी अपनी भारी सािड़य., सूट. और गम6 कपड़.
को पलंग पर फ कने. जैसे उस ढे र म दब जाएगी उसकी दिRं
ु ता. छोटे बेटे वSण की शादी
को अभी एक साल भी तो नहीं हआ
ु . िकतने कपड़े और गहने बनवाए थे माया ने. जैसे
अपनी सारी इTछाओं को वह एक ही झटके म पूरा कर लेना चाहती हो. 'हे भगवान! अब
>या होगा इन सबका?’ समय होता तो वह भारत जाके बहन भािभय. म बांट दे ती.
ऑ>सफै म म जाने लायक नहीं हK ये कीमती सािड़यां पर उसकी बहओं
ु और बेटी को इस
'इं िड़यन' पहनावे से >या लेना दे ना.

Sपहली नैट की गुलाबी साड़ी क़ो चेहरे से लगाए माया सोच रही थी िक इसे पहनने के
िलए उसने अपना पूरा पांच िकलो वजन घटाया था. मुंह मांगे दाम पर खरीदी थी ये साड़ी
उसने िरतु कुमार से. छोटी बहन तो बस दीवानी हो गई थी, 'जीजी, इस साड़ी से जब
आपका िदल भर जाए तो हम दे दीिजएगा, Wलीज.' उसे तब ही दे दे ती तो छोटी िकतनी
ख़ुश हो जाती. पर तब उसने सोचा था िक इसे पहन कर पहले वह अपने लंदन और
योरोप के िमऽ. की चचा6 का िवषय बन जाए, िफ र दे दे गी. िकसी ने ठीक ही कहा है , 'काल
करे सो आज कर.' एकाएक उसे एक तरकीब सूझी. >य. न वह इसे छोटी को पास6ल कर
दे और साथ म ही भेज दे इसका मैिचंग कुंदन का सैट भी. कुंदन के सैट के नाम पर
उसका िदल मानो िसकुड़ क़े रह गया. बड़ी बहु उषा को पता लगेगा िक सास ने साढ़े तीन
लाख का सैट छोटी को दे िदया तो वह उसे जीवन भर कोसेगी. पर छोटी िजतनी कि
भला बहओं
ु और बेटी महक को कहां होगी. माया चाहे िकतना कहे िक वह िकसी से नहीं
डरती पर सच तो ये है िक वह मन ही मन सबसे ही डरती है अपने बTच. से लेकर,
सड़क़ पर चलते राहगीर. तक से िक वे >या सोचते ह.गे, कहीं वे यह न कह या कहीं वे
वो न सोच. पर अब वह वही करे गी जो उसका मन चाहे गा. वैसे भी, बTचे अपने अपने
घर. म सुख से हK . न भी ह. तो उसने फ़ैसला कर ही िलया था िक वह अब कभी उनके
घरे लू मामल. म दखलअंदाजी नहीं करे गी. सगे संबंधी और िमऽ भी मरने वाले की अंितम
इTछा का सNमान कर गे ही.

िफ र भी, न चाहते हए
ु भी माया दसर.
ू के िलए ही सोच रही थी. अपने िलये सोचने को
रखा ही >या है . मंिदर जाये, िगड़िग़ड़ाये िक भगवान बचा लो. िजंदगी के इस आखाि◌री
पड़ाव पर >यूं अपने िलये कुछ मांगे और मांगने से >या कुछ िमल जाएगा. अब तक तो
वह जब भी भगवान के आगे िगड़िग़ड़ाई है , सदा और. के िलये. हर सुबह यही ूाथ6ना
करती आई है , 'भगवान सबका भला करना', या 'जो भी ठीक समझो वही करना,' >यूंिक
मनुंय की हवस का तो कोई अंत नहीं. अमेिरका म तो सुना है िक लोग. ने हजार. डालर
दे कर मरणोपरांत अपने शव. के ूितरण का ूबंध करवा िलया है तािक भिवंय म, जब
भी टै कनौलोजी इतनी िवकिसत हो जाए, उ]ह िजला िलया जाए. माया को यह समझ नहीं
आता िक ऐसा >या है मानव शरीर म िक उसे सदा जीिवत रखा जाए. गांधी, मदर टे रेसा
या माट6 न लूथर िकंग जैस. महानुभाव. को सुरित रख पाते तो और बात थी. अTछी से
अTछी Wलािःटक सज6री के उपल'ध होने पर भी एिलजाबेथ टे लर जैसी करोड़पित सुंदरी
भी कु^प िदखती है . ूकृ ित से ट>कर लेकर भला >या लाभ. उसे जो करना था वह कर
चुकी. बTचे अपने अपने घर. म सुख से हK . न भी ह. तो उसने फ़ैसला कर ही िलया था
िक वह अब कभी उनके घरे लू मामल. म दखलअंदाजी नहीं करे गी.

माया एक अजीब सी मनःिःथित से गुजर रही है . उसे लगता है िक कहीं कुछ अूाकृ ितक
अवँय है . वह परे शान है िक उसे मौत से डर >य. नहीं लग रहा. हो सकता है िक
अbयिधक भय की वजह से उसने भय को अपने मिःतंक से ''लॉक' कर रखा हो. जो भी
हो, अTछा ही है . अ]यथा भयवश न तो वह कुछ कर पाती और न ही ठीक से सोच ही
पाती. बTच. को बताने का कोई औिचbय नहीं. बेकार परे शान ह.गे और उसकी नाक म
दम कर डालगे. िपछले महीने ही की तो बात है जब उसे Lलू हो गया था. दभा6
ु dयवश
वSण और िविध घर पर थे. उ]ह.ने तीमारदारी कर करके माया की ऐसी की तैसी कर दी
थी. उसे आराम से सोने भी नहीं िदया था. कभी दवाई का समय हो जाता तो कभी
िखचड़ी क़ा, कभी गरम पानी की बोतल बदलनी होती तो कभी गीली पeटी. नहीं नहीं
चुपचाप मर जाना बेहतर होगा. बTच. को भी तस?ली हो जाएगी जब लोग कह गे िक
माया बड़ी भली आbमा रही होगी िक नींद म चल बसीं. वैसे, कह भर दे ने से ही िकतनी
तस?ली हो जाती है या शायद िदल को समझा लेना आसान हो जाता होगा. लोग. के पास
चारा भी >या है . जीवन के हल म सीधे जुत जो जाना होता है . आजकल तो लोग तेरहवीं

तक भी घर म नहीं Sकते. छिeटयां ही कहां बचती हK . साल म एक बार भारत जाना
होता है . िफ र पिरवार और िमऽ. के साथ दो¬ या तीन बार योरोप की याऽा पर भी जाना

पड़ता है . पहले जमाने म कभी लेते थे लोग छिeटयां ऐसे काम काज के िलए. माया तो

हारी बीमारी म भी उठके दLतर चली जाती थी िक एक छeटी बचे तो मंडे बKक हौिलडे के
साथ जोड़ क़र कहीं आस पास ही हो आए. उसका मानना है िक इं dलKड की तनाव भरी
जलवायु से जब तब िनकल भागना आवँयक है . वैसे भी यहां के बहत
ु से लोग मानिसक
बीमािरय. से मःत रहते हK . िजसे दे िखए वही 'टै ]ःड' है .

माया भी टै ]ःड है . अपनी उं गिलयां उलझाए वह सोच रही है िक पद; को धो डाले और घर


की झाड़ प.छ भी कर ले. मातमपुसg को आए लोग कहीं ये न कह िक दसर.
ू को सफ़ाई
पर भाषण दे ने वाली मायी ःवयं इतने गंदे घर म रहती थी. आज तो केवल बुधवार है
और घर की सफ़ाई करने वाली ममता तो शिनवार को ही आएगी. शिनवार को वे दोन.
िमलकर घर की ख़ूब सफ़ाई करती हK और िफ र दोपहर म एक नई िहं दी िफ़?म दे खने
जाती हK . शाम का खाना भी बाहर ही होता है . रात को ममता को उसके घर छोड़ क़र जब
माया वािपस आती है तो अपने साफ़ सुथरे Lलैट म ख़ुँबुदार िबःतर पर पसर जाना उसे
बहत
ु अTछा लगता है . कभी कभी तो इस संवेदना के रहते, वह सो भी नहीं पाती. उनके
मना करने के बावजूद ममता उसे 'मैड म' कहकर ही पुकारती है और उसकी बहत
ु इhज़त
करती है . हालांिक बTच. को लगता है िक मां ने उसे िसर पर चढ़ा रखा है , माया उसे
अपने पिरवार का एक सदःय ही मानती है . कम6ठ, इमानदार और िनjावान है ममता,
माया की तरह ही. शायद इसीिलए माया को उसका साथ पसंद है . उसकी सहे िलयां उसके
इस बता6व पर नाक भk चढ़ाती रहतीं हK तो चढ़ाया कर .

नारायण को लेकर ममता कुछ अिधक ही परे शान है . उसका इकलौता बेटा नारायण,
िजसके िपता की आकिःमक मृbयु हो गई थी, बुरी संगत म पड़ क़र एक गुंडे के िगरोह म
साईवरी कर रहा है . आजकल उसकी इTछा है िक उसके ूवास के दौरान नारायण एक बार
लंदन घूमने आ जाए. माया ने िद?ली म अपने भाई पारस के जिरए उसका पासपोट6 बनवा
िदया है और वीजा भी लग ही जाएगा. ममता के इसरार पर माया ने िपछले साल पटना
के िकसी अिधकारी को इस बाबत िलखा भी था पर वहां से आज तक कोई जवाब नहीं
आया. िद?ली मुNबई जैसे शहर होते तो शायद कोई जान पहचान िनकल भी आती. हर
शिनवार ममता को बड़ी आस िलए आती है , मैड म कोई िचeठी पऽी आई. न म िसर
िहलाती माया सोचती है िक कुछ करना चािहए िकंतु वह कर >या सकती है ? अपना बेटा
होता तो >या वह चुप बैठ जाती? उसका मन कई बार होता है िक बार>लेज बKक के पांच
हजार के बkmस ममता को दे दे तािक वह नारायण को उन गुंड . से बचा सके. िकंतु िफ र
वही दिवधा
ु िक मेहनत से कमाये उसके धन का सीधी सादी ममता कहीं दSपयोग
ु न कर
बैठे.

बTच. को >या, िकसी और को भी यिद ये पता लग गया िक उ]ह.ने इतनी बड़ी रकम
ममता को दे दी तो वे उसे पागल समझगे. िकंतु धन का इससे अTछा उपयोग भला >या
हो सकता है . महक होती तो कहती, 'ममा, डू हाट यू लाईक, इटज यौर मनी आLटर ऑल.
वSण और िविध को उसके धन से कुछ लेना दे ना नहीं. िविध साn बाबा शःट की सदःय
है , कभी बाढ़ पीिड़त. के सहायताथ6 जाती है तो कभी िकसी सेवा िशिवर के िलए काम
करती है . अSण कहता है िक उ]ह पैसे की कोई कि नहीं और ये भी िक यिद मां चाह
तो उनका पैसा वह िकसी अTछी जगह इ]वैःट कर सकता है . इकलौती संतान के नाते,
उषा को हर चीज अपने नाम करवाने की पड़ी रहती है . इतनी बड़ी रकम उ]ह.ने पहले
िकसी को दी भी तो नहीं. उनकी मृbयु के बाद कहीं बTचे बेचारी ममता पर कोई मुकदमा
ही न ठोक द . दिनया
ु म >या नहीं होता. माया का सोचना ही उसका दँमन
ु है पर सोच
पर िकसी का >या बस.
बस अब और नहीं सोचेगी माया. अभी जाकर वह बkmस भुनवा लेगी और शिनवार को
ममता को दे दे गी. कहीं वह शुबवार को ही ःवग6 िसधार गई तो? हालांिक वह शुबवार की
शाम को मरे तो बTच. और सगे संबंिधय. को सqाहांत िमल जाएगा. इतवार को ही

िःवटजरलKड से वSण और िविध भी छिeटयां मना कर लौट आएंगे. माया को अTछा नहीं
लगा िक आते ही उ]ह कोई बुरी ख़बर दे पर िकया >या जा सकता है .

बKक जाते समय माया सोचने लगी िक िकसी के आिखरी वr म सबसे िवशेष बात >या
हो सकती है ? >य. वह सीधे कपड़. गहन. की तरफ़ भागी? >या ये मामूली चीज उसके
िलये इतना महbव रखती हK ? आज तक तो वह यही सोचती आई थी िक उसके मरने के
बाद बेटे बहु उसका तमाम बोिरया ¬िबःतर बोिरय. म भर कर ऑ>सफ़ैम या िकसी और
चैिरटी को दे आयगे. समय के अभाव म शायद उसका सामान वे कूड़े दान म ही न फ क
द .खैर, ये सोचकर >या वह अपना अमू?य समय यथ6 नहीं गंवा रही? उसे >या लेना दे ना
इस भौितक सामान से िकंतु िकसी के काम आ जाए तो अTछा ही है . भारत म कई
पिरवार इन चीज. से अपने बहत
ु से तीज bयोहार मना सकते हK . ऑ>सफ़ैम वाले >या
समझगे भारतीय पहनावे को? वे इ]ह 'रीसाइिकिलंग' के िलए दािहऽ म ही न कहीं डाल द .

िपछले दो वष; म ही माया ने दो मौत दे खीं थीं और दोन. ही मृतक. ने कोई वसीयत नहीं
छोड़ी थी. अभी अथg भी नहीं उठी थी िक बTच. ने घर िसर पर उठा िलया. िजन मां बाप
ने अपना जीवन अपने बTच. पर ]योछावर कर िदया था, उनकी आbमा की शांित के िलये
ूाथ6ना करने की बजाय उनके बTचे उ]ह ही भला बुरा कह रहे थे. ख़ैर, उसे इस सब की
परवाह नहीं है . उसने अपनी सारी जायदाद, गहने, शेयर इbयािद बांट िदये हK िसवा इन
कपड़. और कुछ पािरवािरक गहन. के और इ]हीं की वजह से वह कल रात भर ठीक से
सो भी नहीं पाई थी. इन भौितक चीज. म मृbयु जैसी िवशेष बात भी डू ब के रह गई थी.

सुबह उठते ही नहा धो कर माया बैठ गई आईने के सामने. िबना मेक अप के चेहरा कैसा
बेरंग लग रहा था, करे ले सी झुिर6 यां और अबg सा रं ग. उसने कहीं पढ़ा था िक िजसने
जीवन म बहत
ु दख
ु झेल ह., केवल वही एक अTछा िवदषक
ू हो सकता है . ठं ड की गुनगुनी
धूप सी मुःकुराहट उसके चेहरे पर फै ल गई. िकंतु ये झुिर6 य. से भरा चेहरा मृbयु के पRात
कैसा लगेगा? जब लोग ब>से म रखे उसके पािथ6व शरीर के चार. ओर घूमकर ौFांजिल
अिप6त कर गे तो उ]ह कहीं मुंह न फे र लेना पड़े . माया को आकष6क लगना चािहये और ये
मेकअप आिट6 ःट पर िनभ6र करे गा िक वह कैसी िदखाई द . शायद और लोग भी इस बारे
म िचंितत होते ह.. िहNमत करके उसने अंbयेिt िनदे शक का नNबर घुमाया.
'हे लो, हाउ मे आइ हे ?प यू?' मीठी आवाज म ःवागती ने पूछा.

ु पूछा, 'सौरी टु बौदर यू, आइ है ड बु>ड ए कौिफ़न फ़ॉर माइसे?फ िद


माया ने िझझकते हए
अदर डे , आइ वंड र इफ़ समवन कुड टे क केयर ऑफ़ माई मेकअप एंड >लोuस आफ़टर
आई एम डे ड .'

'ऑफ़ कोस6 मैड म, यौर िवश इज अवर कमांड .' ःवागती की वरदायनी अदा पर माया
मुःकराने लगी. उसने सोचा िक वह मेकअप आिट6 ःट को अपना भरा पूरा वैिनिट केस ही
दे दे गी तािक कई अ]य भारतीय मिहला मृतक. का भी उFार हो जाए. गोरे गोिरय. के
रं ग का मेकअप तो इन लोग. के पास होता है िकंतु िकसी भारतीय मिहला ने शायद ही
कभी ऐसी मांग की हो. उसे कहां फ़ुस6त इस आडं बर की. उसे यकायक याद आई मीना
कुमारी की, जो पूरी साज सhजा के साथ दफ़नाई गई थी. चलो मेक अप और कपड़. का
तो बंदोबःत हो गया. उसने सोचा िक >य. न वह अपने बाल भी िशम करवा ले? उसे
अपने हे अरसै सर से भी िवदा ले लेनी चािहए. िपछले तीन दशक. म दोन. के बीच एक
अTछा समझौता हो गया है . वह जानता है िक कब उसके बाल. को पम6 करना है , कब
रं गना है या कब िसफ़6 िशम करना है . कभी माया उ?टी सीधी मांग कर भी बैठे तो वह
साफ़ इ]कार कर दे ता है , 'नहीं, ये आप पर अTछा नहीं लगेगा', या 'अपनी जरा उॆ तो दे खो
माया.' हालांिक माया को आज भी लगता है िक वह एक बार उसके बाल. को िकसी सुख़6
रं ग म रं ग दे .

माया झट से उठी और कार म बैठकर चल दी वैNबली हाई रोड की ओर. अभी कार को
उसने दाn ओर मोड़ा ही था िक उसने सोचा िक पहले उसे अपने ह.ठ के ऊपर उग आए
बाल. को 'लीच करवा लेना चािहए. उसने एक खतरनाक यू टन6 मारा. यिद कोई पुिलस
वाला दे ख लेता तो उसे अवँय ही धर लेता. 'ऑन िद ःपौट फ़ाईन' अलग दे ना पड़ता. पर
अब डर िकस बात का और ये पैसा िकस काम का? यकायक उसने िनण6य िलया िक चाहे
िकतने भी पाउं ड लग, वह रीजKट ःशीट पर िःथत सबसे मंहगे 'यूटी पारलर म जाकर
मसाज, िशिमंग, भंवे, 'लीिचंग और फ़ेशल आिद सब करवा लेगी.

'टी टंू टी टंू ' का शोर मचाती एक एNबुलKस पास से गुजरी तो कार को धीमा करके माया
एक तरफ़ हो गई. न जाने िकसको िदल का दौरा पड़ा हो या दघ6
ु टना म घायल कोई दम
तोड़ रहा हो. यिद समय पर डा>टरी सहायता िमल जाए तो कई मौत. को बचाया जा
सकता है पर ये तो सब नसीब की बात है . एकाएक माया को xयान आया िक उसने अभी
तक अपनी आंख भी दान नहीं की थीं. आंख ही >य., गुदy, फे फ ड़े , िदल आिद उसे अपने
सभी अंग दान कर दे ने चािहएं. साथ तो ये जाएंगे नहीं उसके. िकसी के काम ही आ जाएं
तो अTछा है . िकंतु उसके बूढ़े अंग भला िकसके काम आएंगे? डा>टर. को अनुसंधान के
िलए भी तो मृत शरीर. की आवँयकता पड़ती होगी. >य. न वह अपना पूरा शरीर ही दान

कर दे तािक िजसे जो चािहए, ले ले. बाकी के बचे खुचे टकड़. का कीमा बना कर खाद म
डाले या . माया भी कभी कभी कैसी पागल. जैसी बात सोचती है पर अःपताल. से जो
मनो अंग ूbयंग ूितिदन फ के जाते हK , वे कहां जाते ह.गे? Wलािःटक के थैल. से लेकर दही
के िड़'ब. तक माया कूड़े म कुछ नहीं फ कती. जहां दे िखए कचरा ही कचरा. लोग. को
रीसाइि>लंग की ओर xयान दे ना होगा नहीं तो ये िवz अवँय तबाह होकर रहे गा.

अःपताल जाकर वह अपना समूचा शरीर दान तो कर आई िकंतु मन म कई संदेह आते


ु टना म माया के दादा की उं गली कट गई थी. उनकी मृbयु के उपरांत,
जाते रहे . एक दघ6
दादी ने िवशेष तौर पर कृ िऽम उं गली लगवा कर उनका दाह संःकार करवाया था. उनका
िवचार था िक यिद दादा को उनके सभी अंग. के साथ नहीं जलाया गया तो वह अगले
ज]म म िबना उं गली के पैदा ह.गे. हो सकता है , >य.िक माया ने अपना पूरा शरीर दान
कर िदया है , िक माया का ज]म ही न हो. वह यह भी मानतीं है िक हर ज]म म मनुंय
अपने को िवकिसत करता है और जब वह पूरी तरह से पिरप>व हो जाता है , तब ही वह
परमाbमा म िवलीन होने म समथ6 होता है . माया को लगता है िक वह तो एक बTचे से
भी गई गुजरी हK . बTचे भी जब तब कहते रहते हK , 'ममा, यू आर ए चाइ?ड' या 'ममा, यू
शुड मो अप नाओ.' वह कहां इस योdय िक भगवान उसे अपने म लीन कर सक. अभी तो
वह सांसािरक भोग. म आकंठ डू बी है .

खुशबूदार मोमबिOय. के मxयम ूकाश म तैरते भारतीय शा{ीय संगीत म डू बते उतरते
उसके शरीर की मुलायम और सधे हाथ. |ारा मािलश ने उसे ःवग6 म पहंु चा िदया. उसे
लगा िक तन से मानो मन. मैल उतर गया हो. मन हवा से बात कर रहा था. शायद
ु ही ःवग6 और नक6 ह.. 'यूटी पारलर से िनकली तो पहली
संसार के ये छोटे छोटे सुख दख
बार माया ने जाना िक लोग अपने ऊपर इतना पैसा >य. ख़च6 करते हK . वह सचमुच
िकतनी मूख6 थी िक जीवन भर दांत से भींचकर पैसा ख़च6 करती रही. पैसा होते हए
ु भी
ऐसे सुख का उपभोग नहीं कर पाn. हालांिक उसकी बहुएं िनयिमत ^प से 'यूटी पारलर
और िजNज ज़ाती हK . िविध तो उनसे भी चलने को कहती रहती थी. िकंतु वह उसे सदा
हं स कर ये जवाब दे कर टाल दे ती थी, बूढी घोड़ी लाल लगाम.
आज वह बीिसय. साल बाद गुनगुना उठीं, 'ऐ री मK तो ूेम दीवानी, मेरा दद6 जाने कोए' पर
कमजोरी के मारे आवाज ख़ींच नहीं पाn और चुप हो गn. सोचा िक घर जाकर कुछ
िरयाज क़रे गी और िफ र गाने की कोिशश करे गी. अभी तो उसे जोर. की भूख लगी थी.

सामने ही बेजी हौस6 पब था, जो िफ़श ए}ड िचWस के िलए मशहर


ू था. माया उसम ही
जाकर एक कोने म बैठ गई. िकसी के Lयूनरल से लौटी भीड़ शराब और सKड िवचेज म डू ब
उतर रही थी, 'फ़ार सच ए यंग फे लो, ही वाज एन एलीफK ट, माइ शो?डर िःटल हट6 स', एक
लंबा चौड़ा गोरा युवक अपने कंधे दबाता बोला और उसके अ]य सािथय. ने भी उसकी हां
म हां िमलाई, 'ही डाइड ईिटं ग, यू नो.'

माया ने सोचा िक अमेिरका म अथg उठाने वाल. का >या हाल होता होगा >य.िक वहां तो
हर तीसरा यिr मोटापे से मःत है . दो ही िदन बचे हK खाने को. यिद वह दो िदन कुछ
न भी खाए तो भला उसका िकतना वजन कम हो जाएगा. बेचारी ने सलाद और संतरे के
जूस का ही आड6 र िदया. ज?दी से खा पीकर वह सीधे िजम पहंु ची िक यिद वह जम कर
यायाम करे तो एक िकलो वजन तो वह घटा ही सकती है . कम से कम उसके बेटे ये तो
नहीं सोचगे िक ममा िकतनी भारी थी, उनके कंधे तो नहीं दख
ु गे.

खाने से उसे यह भी याद आया िक जीजाजी की तेरहवीं के अवसर पर बनवाई गई क~ ु


की स'जी क़ो लोग आज भी याद करते हK . पर बTच. को तो ये भी नहीं पता होगा िक
क~ ू >या होता है . अपनी तेरहवीं का मे]यु भी वह ःवयं ही बना के रख दे तो बTच. का
एक और िसरदद6 दरू हो जाए. कहीं उसके बTचे भी ये न स.च िक मां को उन पर जरा भी
िवzास न था तभी तो सारे इं तजाम करके गn पर उसे कहां बस था ःवयं पर. िबसमस
के काड6 स तक तो वह अrूबर म िलख कर रख लेती है . अTछा हआ
ु िक केवल िदन का
ही नोिटस िमला अ]यथा मृbयु की तैयारी म वह महीन. लगी रहती.

घर वािपस आकर उसने अपनी तस?ली के िलए एक फ़ाईल खोल ही ली. पहले प]ने पर
अ]bयेिt िनदे शक, उसकी सहायक और दो तीन जाने माने खान पान ूबंधक. के नाम,
पते, फ़ोन और उनके ईमेल आिद िलख िदए, अपनी एक िटWपणी के साथ िक वे चाह तो
मौसा जी की तेरहवीं पर सपना केटरर |ारा परोसा गया खाना ही दोबारा औड6 र कर सकते
हK जो सभी को बहत
ु पसंद आया था. हां, यिद वे कुछ नया या आधुिनक आयोजन करना
चाह तो माया को कोई आपिO नहीं होगी.
आगुंतक. की भीड़ भाड़ म घर की सफ़ाई, चाय पानी के इं तजाम के िलए ममता का होना
आवँयक है . हालांिक माया की मृbयु का समाचार सुन कर कहीं उसके हाथ पांव ही न
ू जाएं. बेटे का जीवन संवारने के िलए ममता रात िदन लोग. के घर. म सफ़ाई करती
छट
है . वह तो शायद कभी ये भी नहीं जान पाती होगी िक कब फू ल िखले, कब पOे झड़े या
कब बरसात हई
ु . 'नारायण, नारायण' जपती वह पोचे मारती है , 'नारायण, नारायण' करती
वह बत6न धोती है और 'नारायण, नारायण' करके उसने माया की नाक म दम कर रखा है .
बफ़6 म भी वह िबना मोजे पहने िनकल पड़ती है घर से. दःतान. की तो बात दरू है .
अकड़े हाथ. से न जाने कैसे काम करती है . ठं ड के मारे उसके पैर. की िबवाइय. म ख़ून
भी जम जाता है .

ममता एक भारतीय राजनियक और उनके पिरवार के साथ लंदन आई थी, िज]ह काय6वश
ज?दी ही ःवदे श वािपस जाना पड़ा. वे उसे को दो वष; के िलए यहीं छोड़ ज़ाने को राजी
हो गए थे िक यहां वह कुछ पैसा कमा लेगी. नारायण तुला है िकसी भी कीमत पर मां के
पास आने को और ममता िदन रात यही सोचकर डरती रहती है िक यिद उसकी मंशा
िकसी को भी पता लग गई तो गुंडे उसका न जाने >या हौ कर . नारायण का पासपोट6
बन चुका है और मां के पास आने की बेचन
ै ी म उसे लगता है िक मां ज?दी से िटकट
>य. नहीं भेज रही. भूखे Wयासे रह कर पैसा जोड़ने के िसवा वह और >या कर सकती है .
बTचे कहां समझते हK मां की मजबूिरयां, उसकी बेबसी और उसकी िचंता.

बTचे >या जाने िक मृbयु >या होती है . उ]ह तो छोटी बड़ी हर चीज चािहए. माया की
पोती, िरया, जब केवल ढाई वष6 की थी तो दादा की बेशकीमती घड़ी लेने की िजद कर रही
थी. माया ने हं सी हं सी म कह िदया िक दादा जी के बाद ये सब उसी का तो ही है . िरया
ने झट पूछा, 'दादी, वैन िवल दाद ु डाई?’ माया स]न रह गई थी. अSण ने बTची को एक
थWपड़ मार िदया. रोती हई
ु िरया को उषा घसीट कर अपने शयनक म ले गई, बोध म
ु , 'आर यू मैड , अSण?’
ये कहती हई

िरया बTची थी और नहीं जानती थी िक उसे घड़ी तो अवँय िमल जाएगी पर वह अपने
Wयारे दाद ु को खो दे गी. वैसे िकतने ही लोग हर रोज अपने संबंिधय. के मरने की राह
दे खते हK . अभी हाल म ही केवल एक हजार डौलस6 के िलए दो पोत. ने िमल कर अपनी
दादी की हbया कर डाली. दहे ज की वजह से बहओं
ु की हbया का भी कारण यही लालच
है . माया सोचती है िक अपने जीते जी ही बTच. को सब दे दे ना चािहए. िकंतु हवस का
तो कोई िठकाना नहीं. िजतना पैसा मां बाप दहे ज म लगाते हK , िकतना अTछा हो िक यिद
वे अपनी बिTचय. की पढ़ाई िलखाई पर ख़च6 कर तािक वे अपने पांव पर खड़ी हो सक,
उनके बुढ़ापे की लाठी बन सक पर न जाने >य. आज भी इसकी अपेा तो बेट. से ही की
जाती हK .

दो बेट. के होते हए
ु भी आज माया िकतनी अकेली है . हालांिक वे मां को अपने पास रखने
को सहष6 तैयार हK , पर उनका मन िकसी के साथ रहने को माने तब न. एक महक ही है
जो िबना नागा फ़ोन पर उनका हाल चाल पूछती रहती है . जब मौका िमलता है , आ जाती
है , उनके िसर म तेल मलती है , उनके नए पुराने कपड़े छांटती है और अब भी उनसे
िचपट कर सोती है . महक और पीटर कभी कभी उसे जबरदःती सट एंज ले जाते है .
िकंतु वही बेिटय. के घर म रहने खाने की बात उसे खटकती है . जबिक यहां सांस दामाद.
के यहां रहती हK . माया सोचती है िक वह ःवयं भी िकतनी दोगली है िक एक तरफ़ जहां
वह दश6न और आदश6 बघारती है , दसरी
ू तरफ़ उ]हीं बात. के िलए दसर.
ू की िनंदा करती है .
जैसी भी है , माया अब तो बदलने से रही. बुराइयां िकसम नहीं होतीं, अTछाइयां भी उसम
कम नहीं. कोई जरा माया से सहायता मांग तो ले, चाहे उसके पास समय या िहNमत हो
न हो, वह न नहीं कर सकती. उbसाह म तो वह ये भी भूल जाती है िक िकसका काम है ,
>या काम है , उसके पास समय होगा भी िक नहीं. पूरे जोर शोर से जुट जाती है . यवःथा
ु जाए.
का कोई भी पहलू मजाल है िक उसकी आंख से छट

शवपेिटका की यवःथा माया कर ही चुकी थी. बTच. पर छोड़ दे ती तो वे सबसे मंहगी


लकड़ी क़ा सुनहरी कुड. से जड़ा ब>सा ही ख़रीदते. शव को कपड़े म लपेटकर भी काम
चलाया जा सकता है . भारत म लोग िकतने यूजर ृKड़ली है . हर चीज क़ो रीसाईकल करते
हK . भाड़ ही म तो झ.कना है , पानी म पैसा बहा दे ने का >या फ़ायदा. इससे तो वो पैसा
िकसी गरीब के काम आ जाए तो अTछा हो. पर कौन दे कर जाता है कुछ गरीब. को. कब
से सोच रही है माया िक रॉयल ःकूल ऑफ़ 'लाइं ड की सहायता करने को पर बात है िक
बस टलती चली जाती है . वह कल अवँय जाएगी. हालांिक िपछले हLते ही उसने कुछ
धन हरे रामा हरे कृ ंण वाल. को िदया था पर उस दान से उसे कुछ भी तृिq नहीं िमली
थी. वह घंट. बैठी सोचती रही िक उ]ह िकतना पैसा दान दे , सब कुछ उ]हीं को दे दे , या
दे भी िक नहीं.

न'बे ूितशत तो सुना है धन इकeठा करने वाल. की जेब म चला जाता है . गोरे लोग
िकतना दान करते हK . वे तो कभी नहीं सोचते िक पैसा कहां जा रहा है . िजनके मन म
लालच हो, उ]ह तो बस कोई बहाना चािहए. वह मन ही मन शिमदा हो उठी. वाःतव म
तो वह अिधक से अिधक धन बTच. के नाम छोड़ना चाहती है . हालांिक वह जानती है िक
उषा तो यही कहे गी, 'हमारे िहःसे म बस इतना ही आया, मNमा वSण और िविध को
ज^र अलग से दे गn ह.गी.' िविध को कुछ भी दो वह यही कहती है , 'मNमी जी पहले
आप महक जीजी और भाभी से पसंद करवा लीिजए, हम बाद म ले लगे.' न जाने अSण
और उषा सदा यही >य. सोचते हK िक माया वSण और िविध को ही अिधक चाहती हK .
कोई मां से पूछे िक उसे अपनी कौन सी आंख Wयारी है .

माया को लगता है िक जैसे जैसे यिr उॆ म बड़ा होता जाता है , अनासr होने के
बजाय आसr होता जाता है . जहां िविध और महक को पैसे अथवा चीज. की जरा परवाह
नहीं, वहीं उषा को और ःवयं उसे छोटी छोटी चीज. से लगाव है . उ]ह ये भी िचंता रहती
है िक दे ने लेने से कौन िकतना ूस]न होगा. अःथाई और िणक ूस]नता के िलए
इतना आयोजन ूयोजन और परम आनंद के िलए कुछ भी नहीं. िकंतु आनंद भी तो
इ]हीं िरँत. से जुड़ा है . जहां जा रही है माया, वहां दख
ु सुख के मायने शायद दसरे
ू ह..
शायद वहां दख
ु सुख ह. ही नहीं. िपछले साल ॠिषकेष म वह दीपक चोपड़ा से िमली थी.
आनंदा म वह अपने पTचीस अनुयाियय. के साथ ठहरे हए
ु थे. मृbयु के िवषय पर उनका
एक याƒयान सुनकर माया को लगा िक जीवन मृbयु जैसे पेचीदा िवषय. को समझना
िकतना सरल था. 'फू ल िखलते हK , मुझा6 जाते हK और िफ र िखलते हK . इस पृ„वी पर जो भी
ज]म लेता है , उसकी मृbयु अवँयंभावी है , पर उसका पुनज6]म भी उतना िनिRत है .' माया
बस यही नहीं समझ पाती है िक ॠिष मुिनय. की बात उसके मिःतंक म िटक >य. नहीं
पातीं. >य.िक शायद ये संसार है और यहां की हर चीज िणक है , णभंगुर है . िकंतु ूE
ये उठता है िक मृbयु और पुनज6]म के बीच के समय म >या होता होगा.

मृbयु के उपरांत >या होगा, इसका भय शायद दसर.


ू को अिधक होता हो. तभी तो इस
वr माया को ःवयं कोई भय नहीं. जबिक िपछले दस बारह वष; म वह जब तब यही
सोचती रही थी िक मृbयु के बाद >या होता होगा और ये भी िक >या बेहतर है , मृतक को
जलाना, जमीन के नीचे दबाना या चील. को िखलाना. आबादी बढ़ती जा रही है , इतने सारे
मृतक. को पृ„वी कैसे और कब तक अपने म जhब कर पाएगी. ःवयं वह जलाने की
पधर रही है . चील. |ारा नोच खसोट मृतक का अपमान नहीं तो और >या है . िकंतु इस
जाित की भावना तो दे िखए, शायद ये ही लोग अ]ततोगbवा 'परम िपता परमाbमा' म समा
जाते ह.. 'परम िपता परमाbमा' से उसे याद आई अपने िपता की जो सारा जीवन राम
नाम की माला जपते रहे . हालांिक उनके बोध, आbमरितक, और मांसाहारी ूवृित से परे शान
उनका पिरवार सदा यही सोचता रहा िक केवल 'परम िपता परमाbमा' ही उनकी रा कर
सकते थे और शायद उ]होने रा की भी. नहीं तो ऐसी अTछी मौत िकसे नसीब होती है .
माया के पित हरीश की मृbयु हए
ु पांच वष6 होने को आए. उ]ह दLतर म िदल का दौरा
पड़ा और एNबुलKस के आने से पहले ही उ]ह.ने दम तोड़ िदया. उनके शव को घंट.
िनहारती बैठी रही थी माया िक अब सांस आई िक तब. नस; के िवzास िदलाने के
बावजूद िक हरीश अब नहीं रहे , उसे लगता रहा िक उनके शरीर म उसने हरकत दे खी.
िववािहत जीवन के दौरान वे कभी अलग नहीं रहे . पढ़ाई, इNतहान या दLतर के िसलिसले
म जब भी हरीश को कहीं जाना पड़ा, वह माया को अपने ख़चy पर साथ लेकर गए. वह
ःत'ध थी िक िबना कुछ कहे वह उसे अकेले कैसे छोड़ क़े चले गए. अब >या बचा था,
केवल चौखट, दरवाजे, दीवार और इन सबसे िसर मारती माया. अSण और उषा तो पहले
ही अलग घर बसा चुके थे. अठारह वष6 की आयु म िववाह करके महक अपने पित, पीटर,
के साथ ःकाटलKड म जा बसी थी और वSण बिमघम म पढ़ रहा था.

आस पडोस म भी िकसी को िवzास नहीं हो रहा था िक हरीश यूं चल बसगे. संबंिधय.


और पडोिसय. ने िमल कर बारी लगा रखी थी. कोई न कोई हमेशा घर म बना रहता िक
न जाने माया को कब और >या आवँयकता आन पड़े . हLत. तक पिरवार के िलए ही
नहीं, अिपतु मेहमान. के िलए भी िनयिमत खाना पीना आता रहा, भजन. के नए नए
सीडीज और कैसेeस बजते रहे , िदये म घी डाला जाता रहा. एक सqाह के अंदर ही माया
ु पर पूरी तरह काबू पा िलया था और घर पिरवार अब उसके पूरे िनयंऽण म
ने अपने दख
था.

नए काले िबःप सूट. म बेट., दामाद और पोते को दे ख माया फू ली नहीं समा रही थी.
िववाह की पTचीसवीं वष6गांठ पर हरीश ने उसे हीरे के छोटे छोटे बुंद और नेकलेस िदये
थे, जो बहओं
ु |ारा पहनाई उस मंहगी सफ़ेद साड़ी क़े साथ कुछ अिधक ही चमक रहे थे.
ु ःवयं िलपटी थीं काली सािड़य. म िजस पर चांदी के धाग. का ह?का बौड6 र था.
बहएं
माया ने ही कहा था िक चाहे िकतना भी बुरा अवसर >य. न हो, सुहागन काला कपड़ा
नहीं पहनती.

घर म अवलोकनाथ6 रखे हरीश के शव को दे ख महक का बेटा आय6न बार बार हे लो दाद ु


हे लो दाद ु पुकारे जा रहा था. आय6न की हरीश से ख़ूब छनती थी. उनसे िमलने वह महीने
म एक या दो बार लंदन से सट एंज ज़ाते थे. जब कभी आय6न शरारत करता, वह उससे
कुeटी कर िलया करते और जहां उसने गाल फु लाए िक हई
ु दाद ु की अ'बा. वाए इज दाद ु
नॉट टॉिकंग टु मी. उसकी आंख. म आंसू थे. 'ममा, टै ल दाद ु आई एम नॉट नौटी एनी
मोर.' माया कुछ न कह सकी. उसे गोदी म ले पीटर बाहर चला गया.
हरीश के फू ल. को गंगा म िवसज6न करने के िलए पूरा पिरवार हिर|ार पहंु चा था. माया
का भारी भरकम भाई पारस यिद उन सबको नहीं बचाता तो पंिडत. की ध>का मु>की म
िघरे इस पिरवार का राम नाम सbय हो जाता. वSण और िविध तो पहली बार भारत आए
थे. उनकी 'ए>स>यूज मी, ए>स>यूज मी' भी िकसी काम नहीं आई थी. माया ने सोचा िक
हरीश की मृbयु यिद भारत म होती और उनका िबयाकम6 यहां करना पड़ता तो बTच. के
ू जाता. हरीश को यिद िपता का कपाल फ ोड़ना पड़ता तो न
सॄ का बांध तो अवँय टट
जाने >या होता.

शायद समय आ गया था माया का वािपस संसार म िलq हो जाने का िक एक िदन


उसकी पड़ोसन, जयौी उसे िजद कर अपने साथ घसीट कर ले गई. ऐरे गैरे नbथु ख़ैरे
सभी बाबाओं के सतसंग. म जाती है जयौी. माया को इन बाबाओं और माताओं पर कोई
ौFा नहीं िकंतु इस बार वह जयौी को टाल नहीं पाn. एक बड़े नामी योगी लंदन आए
हए
ु थे. भीड़ म बैठी हई
ु माया को इं िगत करके जब बाबा ने पूछा, 'बेटी िकसके शोक म
डू बी है .' माया ने सोचा िक बाबा को उसकी रोती धोती श>ल से ही पता लग गया होगा
िक यह नमूना कुछ hयादा ही दखी
ु है , इसम कौन सी बड़ी बात थी. शायद माया के
िवधवा होने की बात उ]ह जयौी ने बताई हो. ख़ैर, जब बाबा मन की बात जानते हK तो
वह माया का कt भी जान ही गए ह.गे. जयौी उसे पकड़ क़र बाबा के ठीक आगे ले गई,
बाबा, इसका हजबड ऑफ़ थेई गया छे , कोई नई साथे वात करती न थी अने कोई ने
मलती न थी. जयौी के हजबड ऑफ़ थेई गया छे , पर माया को हं सी आ गई और बाबा
भी मुःकरा पड़े और जयौी ूस]न थी िक माया के कारण, उसे बाबा के नजदीक जाने की
मौका िमल गया था.

'अपनी हािन को तो बेटी सभी रोते हK , कभी उनकी भी सोचो जो ूभु के पास हK , उनके
लाभ म भी तुNह ूस]न होना चािहए.' माया को लगा िक सचमुच वह िकतनी ःवाथg थी
िक उसने हरीश के िवषय म तो कभी सोचा ही नहीं. जब तक बाबा लंदन म Sके, माया
िनयिमत ^प से उनके पास योगासन सीखने जाती रही. िकंतु उसके बाद न तो बाबा ने
कुछ कहा, न ही माया ने कुछ पूछा. उसके िदल म एक सुकून याq हो गया था जैसे
हरीश िफ र उसके साथ थे.

शादी की हर वष6गांठ पर हरीश मोगरे के फू ल. के हार और गजरे माया के िलए िवशेष


तौर पर बनवाते थे. माया ने सोचा िक यिद हरीश जीिवत होते तो उसकी शव पेिटका को
मोगरे के फू ल. से लाद दे ते. सगे संबंधी गुलदःते लेकर आएंगे. नहीं ह.गे तो बस उनके
िभजवाए मोगरे के फू ल. िकतनी अधूरी और फ ीकी लगेगी माया की शवयाऽा. शायद हरीश
उसकी इं तजार म ह.. वह हलस
ु उठी. पर >या करे . कोई हलक म उं गली डाल कर तो
आbमहbया नहीं कर लेता. कर भी ले तो जो थोड़ा बहत
ु उनसे िमलने का मौका है , माया
कहीं वो भी न गंवा दे . हालांिक हरीश ःवयं एक जाने माने वकील थे, वह उसे 'मी लौड'
कहकर पुकारते थे >य.िक बाल की खाल उतारने की आदी थी माया. हरीश की याद उसे
कभी कभी दीवाना बना दे ती है . िदल है िक संभलता ही नहीं, 'याद आये वो यूं जैसे, दखती

पांव िबवाई जी.'

मां बचपन म माया को हरीशचंि तारामित के अमर ूेम की कहानी सुनाती थी. वही

तारामित जो अपने पित को यमराज से भी छड़ा लाई थी. माया ने हाल ही म बी बी सी
पर एक िफ़?म दे खी थी जो एक ऐसी बीमारी के िवषय म थी िजसम रोगी िब?कुल मृत
िदखाई पड़ता है . डा>टर. को भी उसम जीवन का कोई लण नहीं िदखाई दे ता और जीते
जी उसे मुदा6घर म डाल जाता है . एक ऐसी ही मिहला अब सोने से भी डरती है िक कहीं
िफ र न उसे मृत समझ के मुदा6घर म डाल िदया जाए. माया को लगा की सbयवान के
साथ भी कुछ ऐसा ही घटा होगा. तारामित को पूण6 िवzास होगा तभी तो वह पित के
शव को गोदी म लेकर बैठी रही. जो भी हो, माया का ूेम अमर है और हरीश आज भी
उसके साथ हK . इस िवचार माऽ से वह िसहर उठी. मृbयु के पRात वह उनसे अवँय
िमलेगी. वह इं तजार कर रहे हK उसका उस पार. 'याद आये वो यूं जैसे, दखती
ु पांव िबवाई
जी.'

भाव िव†ल माया ने अ]bयेिt िनदे शक को पऽ िलखकर उसे मोगरे के फू ल. के छ?ले पर


'ःवागतम माया, सःनेह हरीश' िलखवाने की यवःथा करने को कह िदया. यह बात भला
वह िकससे कहती, कहती तो लोग समझते िक उसका िसर िफ र गया है . कोई मृत यिr
भी फू ल िभजवाता है िकसी को? पर िकतना मजा आएगा जब लोग मोगरे के फू ल. के
साथ हरीश का नाम दे खगे, अंितम बार दोन. का नाम एक साथ. वह रोमांिचत हो उठी
और ये सोच कर िक 'वैन इन रोम, बी रोम]ज' उसने एक मरसेड ीज भी बुक करवा दी.
िवदे श. म िववाह के अवसर पर अथवा शवयाऽा म काली रॉ?सरौयज बुलवाना पौश समझा
जाता है .. हरीश होते तो मरसेड ीज. की कतार खड़ी होती. माया की अथg भी शान से
उठनी चािहए. बTच. को भी अTछा लगेगा. काली लंबी रॉ?सरौयज पर मोगरे के फू ल
िकतने भय िदखगे. गली कूच. म लोग िठठक के Sक जाएंगे और सराह गे इस शवयाऽा
को.

मृbयु का भय नहीं सता रहा माया को. जो होना है , सो तो होकर ही रहे गा. नरक, ःवग6,
पुनज6]म या 'कुछ नहीं'. 'कुछ नहीं' के सांप को तो वह मन म ही दबाती रहती है और
शायद उनकी अपनी बीन पर ही, फ न उठाए यह भय जब तब लहराने लगता है . लोग. को
उसने कहते सुना है िक कहीं आbमा ख़ालीपन म भटकती न रहे . भला ये भी कोई बात
हई
ु . दे वमंथ. के अनुसार आbमा को न तो कोई मार सकता है , न ही कोई दख
ु पहंु चा
सकता है . तो िफ र काहे का डर. डर तो बस माया को है पुनज6]म से, वही पढ़ाई िलखाई,
िववाह, बTचे, और िफ र से मृbयु. पर >या पता उसे अगली योिन मनुंय की िमले या न
िमले. िजस ^प म भी पैदा हो बस भगवान मनुंय ज]म की याद भुला द . >या जाने
कीड़े मकौड़े और जानवर. को याद रहता हो अपना िपछला ज]म. शायद इसी का नाम
नरक हो, कम; का फ ल. माया को लगता है िक उ]ह अपने िपछले ज]म की कुछ कुछ
याद है . वैसे तो मनुंय का मिःतंक न जाने >या >या खेल िदखाता है िकंतु यिद यह
बात सच है तो दो बार वह मनुंय योिन म ज]म ले चुकी है और अब मनुंय योिन का
संयोग कम ही है . ख़ैर, जो भी होगा, दे खा जाएगा, अभी से परे शान होने का >या फ़ायदा.
इस आिखिर वr म भजन गाने से तो भगवान ूस]न होने से रहे . तैयारी भी करे तो
>या और कैसी?

जब भी माया िकसी याऽा पर िनकलती हK , ढे र सी तैयारी करके चलती है . हर तरह की


बीमारी की दवाएं, गरम पानी की बोतल, िड़'बे का खाना, अचार मुर'बे, मािचस, चाकू, ःबू
साइवर, असमय की ठं ड के िलए गरम कपड़े , क़ंबल, ॄांड ी, अितिरr पेशोल का कनःतर और
न जाने >या >या. जब वह लौटती है सारे सामान के साथ लदी फ दी, तो बTचे हं सते हK ,
'िड़ड]ट वी टै ल यू टु शै वल लाइट.' पर िकसी चीज क़ी ज^रत पड़ ज़ाती तो माया को
िकसी का मुंह तो नहीं ताकना पड़ता. अब चाहे अंगार. पर चलना पड़े या बफ़6 पर, इस
याऽा पर उसे ख़ाली हाथ ही िनकलना है . काश िक उसने 'शै वल लाइट' की आदत डाल ली
ै ी से दो चार न होना पड़ता.
होती तो आज उसे इस बेचन

समय की पाबंद, माया िब?कुल तैयार बैठी है . जैसे बस और इं तजार नहीं कर पायेगी. >यूं
कर लोग समय का पालन नहीं करते. पर मृbयु को दोष नहीं िदया जा सकता और न ही
डा>टर. को. कोई समय तो तय नहीं िकया गया था. पहली बार उसके िदमाग म ये बात
आई िक डा>टर गलत भी तो हो सकता है . थोड़ी सी आशा बंधी िकंतु जीवन की न]हीं
सी िकरण भी उसे अिधक उOेिजत न कर पाई. डा>टर ने कह िदया, माया ने सुन िलया
और चुपचाप चली आई. एक ूE तक नहीं पूछा. डा>टर ने उससे कोई सहानुभूित भी
नहीं ूकट की. यहां तो टिम6नली इल रोिगय. को िवशेष परामश6 की सुिवधा दी जाती है .
एक जमाना था जब रोिगय. को बुरे समाचार से वंिचत रखा जाता था िकंतु अब तो
िवशेष‡. का मत है िक रोगी और उसके संबंिधय. को सीधे सीधे बता दे ना उिचत है .
काश िक माया िबजली के बटन की तरह जीवन का िःवच खट से बंद कर पाती >य.िक
वह सचमुच तैयार है शरीर bयागने को. बेकार बैठी है और उसकी ऊजा6 यथ6 जा रही है .
शायद उसे इसकी आवँयकता पड़े मृbयु के उपरांत. पर उसके बस म कुछ नहीं है .

मनुंय के बस म कुछ भी नहीं है . माया सोचती है िक आंधी तूफ़ान और भूचाल आिद के


माxयम से ूकृ ित जब तब अपने ूािणय. की संƒया िनयंिऽत करती रहती है , िजसे
भगवान का कोप समझ कर झेलते रहते हK पृ„वीवासी. जो समझ से परे हो, उसे भगवान
का नाम द या िकसी बुिFमान अिभक?पक (intelligent designer) का, >य.िक जगत की
संरचना के पीछे एक ूितशत संदेह तो बना ही हआ
ु है . इसी िवषय को लेकर अमेिरका
ु पुट घटनाएं सुनने म आती हK , िजनम
जैसे िवकासशील दे श म आज भी लोग. के बीच छट
कोई डािव6न के िवकासवादी िसFांत को कोसता है तो कोई िव‡ान को. माया के प?ले जब
कुछ नहीं पड़ता तो वह गाने लगती है , 'कोई तो बता दे जल नीर िक िसया Wयासी है . ये
Wयास जीते जी तो बुझने से रही. शायद मर के ही िमलना हो उस बुिFमान अिभक?पक
से. िकसी से िमलेगी अवँय माया और हरीश का पता िठकाना भी मालूम करके रहे गी.

ौाF. म माया की दादी ःवगgय दादा और पिरवार के अ]य मृतक. की शांित के िलए
पंिड़तो को दान दे तीं और भोजन कराती थीं. िपता की बात याद कर माया मुःकरा
अनायास उठी. जब भी मां ौाF के भोजन का ूबंध करतीं, वह कहते िक उनके िपता और
दादा की आbमा को शांित पहंु चानी है तो कोLते पकाओ, मुग6 मुस?लम बनवाओ. पित की
मृbयु के उपरांत, मां, जो अपनी सास को दिकयानूसी करार दे तीं आयी थीं, ःवयं
अंधिव‰ालय. म कंबल और भोजन आिद बांटने लगीं ये कहकर िक उनकी आbमा को
शांित िमले न िमले, िकसी गरीब का क?याण तो हो ही जाएगा. जब शरीर ही नहीं रहा तो
कैसी शांित और कैसा >लांत, पर वही बात िक िदल को समझाने को गािलब ख़याल
अTछा है . हालांिक पंिडत. को जजमान. की >या कमी, बहत
ु से बेवकूफ़ हK दिनया
ु म, यहां
लंदन म भी. हरीश की ूbयेक बरसी पर माया ःवयं पूजा करवाती है , अंधिव‰ालय. और
अ]य संःथाओं को दान दे ती है . जहां तक हरीश का ूE है , वह कोई ख़तरा नहीं उठाना
चाहती. >या पता िकस दान से और >यूंकर पित को चैन िमल जाए. अगर ये सब करने
से कोई फ़क6 नहीं पड़ता, तो भी पैसा िकसी अTछे काम म ही तो लगा. पूजा पाठ एवं दान
करने का शायद यही औिचbय हो.

बनारस से लायी हई
ु गंगाजल की बोतल को माया ने अपने िसरहाने रख िलया है . डायरी
म उसने झटपट एक और िटWपणी जोड़ दी िक यिद िकसी कारणवश वह ःवयं गंगाजल
नहीं पी पाए तो जो भी उसे मरणोपरांत दे ख,े उसके मुंह म गंगाजल की कुछ बूंदे टपका दे .
और हां ये भी िक उसकी अिःथयां गंगा की बजाय िरवर थेNस म भी डाली जा सकतीं हK .
एक कहावत है िक मन चंगा तो कठौती म गंगा. िफ र भी, अंदर या बाहर, गंगा तो उसके
संग होगी ही.

बरस. पहले िकसी वै‡ािनक ने िवष का ःवाद जानने के िलए अपने ऊपर एक ूयोग
िकया था. जीभ पर जहर रखते ही वह मर गया और उसका ूयोग सफ़ल नहीं हो पाया.
माया ने सोचा िक यिद सभी मरणास]न लोग कोई एक ूयोग करके मर , तो शायद कई
गुिbथयां सुलझ जाएं. जैसे िक वह जानना चाहती है िक मरते समय यिr को कैसा
अनुभव होता है . शांित का या अशांित का. उसने िनण6य िलया िक वह अपनी तज6नी पर
लाल रं ग यािन अशांित और बीच की उं गली पर हरा रं ग यािन िक शांित का रं ग लगा के
इं तजार करे गी मरने का. पलंग पर एक नोट िलख कर छोड़ ज़ाएगी बTच. के िलए िक
चादर पर जो भी रं ग रगड़ा हआ
ु िमले, उसके ूयोग का िनंकष6 वही होगा. मन म ढे र.
दिवधाएं
ु उठीं िकंतु माया ने उ]ह एक ही वार म दबा िदया िक ूयŠ करने म >या जाता
है . इस िवषय पर शायद उसे िकसी की सहायता की आवँयकता पड़े . पारस होता तो वे
दोन. बैठकर इस ूयोग की बारीिकय. म उतरते िकंतु इस बारे म सोच कर माया और
समय यथ6 नहीं करना चाहती.

माया की नजर िफ र पद; पर जा ठहरी. घर के धुले पद; म मजा नहीं आता. साई>लीनस6
के धुले और भारी इ{ी िकए पदy गंदे भी कम होते हK . ममता इस शिनवार को आए िक
न आए. िपछले हLते ही वह बता रही थी िक नारायण ने जब िगरोह के सरदार से मां के
पास जाने की अनुमित मांगी तो उसने न केवल साफ़ मना कर िदया, परं तु उसे जान से
मार दे ने की धमकी भी दे डाली. माया ने सोचा िक शाम को फ़ोन करके ममता को बुला

लेगी और पैसे दे कर कहे गी िक जाके अपने बेटे को छड़ा ले. िकतनी ख़ुश हो जाएगी
ममता अपने इस िनण6य पर माया सचमुच बेहद ूस]न थी.

ू पर चढ़ी ही थी िक घंटी बजी. इस समय कौन हो


माया पदy उतारने को अभी ःटल
सकता है उसने तो िकसी को बुलाया नहीं था. कहीं वह िकसी को बुलाकर भूल न गn हो.
दरवाजा खोला तो दे खा बाहर ममता खड़ी थी.

'तू हजार बरस िजएगी ममता, अभी मK तुझे ही याद कर रही थी.' वह चहकती हई
ु बोली.

'मैड म जी, वो नारायण है न, वो' बदहवासी म वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी.
'हां हां , >या हआ
ु उसे.'

'उसका ए>सीडK ट , माया यिद उसे संभाल न लेती तो ममता वहीं ढे र हो जाती. आंसू थे िक
Sकने का नाम ही नहीं ले रहे थे और िहचिकय. के मारे उसका बोलना मुहाल था. उसके
आधे अधूरे वा>य. से माया इस नतीजे पर पहंु ची िक नारायण के साथ हए
ु इस हादसे के
पीछे उन गुंड . का ही हाथ है . कहीं से उ]ह पता चल गया था िक वह चुपचाप लंदन जा
रहा है िक बस, उ]ह.ने उसे कार के नीचे कुचलने की कोिशश की और िफ र अःपताल म
आकर उसे धमकी दी िक इस बार तो टांगे ही तोड़ी हK , अगली बार वे उसे जान से मरवा
सकते हK . माया ने ममता के हाथ से िनचुड़ा पुचड़ा कागज िलया िजस पर उसके भाई
सवyश का नNबर िलखा हआ
ु था. नNबर िमलाया तो सवyश ने भी वही सब दोहरा िदया जो
ममता बता रही थी, इस अनुरोध के साथ िक, मैड म, आप तो जी बस बहन को Wलेन म
बैठा द , नारायण की हालत ठीक नहीं है मैड म जी. वह भी बहत
ु घबराया हआ
ु लग रहा था
जैसे िक उसकी अपनी जान पर बनी हो. भाई से बात करके तो ममता के सॄ का बांध
ू ही गया.
मानो टट

'अब मK जी कर >या क^ंगी, मैड म, मK उसी के तो िलए इकeठा कर रही थी पैसा. इससे
तो मK उसके साथ ही जीती मरती, अब इस पैसे >या फ़ायदा., कहकर उसने अपनी सारी
जमा पूंजी माया के कदम. म डाल दी. माया ने उसे सीने से लगा के तस?ली दे नी चाही
िकंतु वह तो यूं रोए चली जा रही थी जैसे दिनया
ु म उसका कुछ न बचा हो.

माया ने झटपट अपने शै वल एजKट को फ़ोन िकया और जब वह ममता के िलए िटकट


आरित करवा रही थी तो उसने सोचा >य. न उसके साथ वह ःवयं भी पटना चली
जाए. पटना जैसी जगह म िकसी को पटाना होगा, िकसी से पटना होगा, िकसी को मनाना
होगा तो िकसी को हटाना होगा. ममता अभी इस हालत म नहीं है िक नारायण की कोई
मदद कर सके. कहीं इन गुंड . के च>कर म आकर वह न केवल अपना मेहनत से कमाया
सारा धन ही न गंवा दे , बि?क अपनी जान से भी हाथ धो बैठे. ऐसे समय म धैय,6
िनयंऽण और कूटनीित से काम लेना होगा. सीधी सादी ममता को तो शायद इन श'द. का
अथ6 भी नहीं पता होगा.

ममता ने जब सुना िक मैड म उसके साथ पटना चल रहीं हK तो उसके चेहरे पर आRय6,
कुतूहल और अनुमह के भाव. की छटा बस दे खते ही बनती थी. ःपtतः माया के िदमाग
म एक योजना बन रही थी. ममता को रसोई म यःत करके वह ःवयं कNWयूटर खोल
कर बैठ गई. उसने वेबसाइeस पर एक पांच िसतारा होटल म दो कमरे , एक बड़ी ज़ीप
और साईवर का इं तजाम कर िलया. फ़ोन पर पारस को उसने एक अTछे वकील और
सुरा संबंिधत ूहिरय. का ूबंध करने की िहदायत भी दे दी, जो इ]ह एअरपोट6 पर उतरते
ही िमल जाएं तािक िबना समय गंवाए राःते म ही बात की जा सके. माया ने सोचा िक
अTछा हआ
ु िक बTचे यहां नहीं हK . वे उसे कभी ये जोिखम नहीं उठाने दे ते. पारस को भी
रहःयपूण6 कारनाम. म िदलचःपी है इसीिलए उसने अिधक चूं चपड़ नहीं की. पटना के
नाम पर वह िहचका अवँय था िकंतु जब माया ने कहा, 'मK पटना जा ही रहीं हंू , कोई ूE
नहीं पूछना.' उसके पास कोई चारा नहीं था िसवाय माया के कथनानुसार ूबंध करने के.
वह बोला, 'ठीक है मK भी पटना आ रहा हंू और तुम भी अब कोई ूE नहीं पूछना.'

माया िचंितत थी िक दो मिहलाएं गुंड . के िगरोह का सामना कैसे कर पाएंगी. िकंतु पारस
के आ िमलने से वह आzःत हो गई. बचपन म इस जोड़ी ने पिरवार की नाक म दम
कर रखा था. एक बार दोन. ने आटा फ़श6 पर िबछा कर पांव के िनशान से चोर पकड़ क़े
मां के सNमुख खड़ा कर िदया था. हां, यह अलग बात थी िक मां को पता था िक चोर घर
का नौकर ही था, जो रात को िछप िछप कर िमठाई खाता था और शक इन दोन. पर
िकया जाता था.

'शल‹क होNस', 'मड6 र शी रोट' और 'कोलंबो' जैसे रहःयपूण6 टी वी धारावािहक. की दीवानी


माया को जीवन म पहली बार जोिखम उठाने का मौका िमला है , िजसे वह आसानी से
नहीं गंवाने वाली. कहां वह मृbयु से उबर नहीं पा रही थी और कहां अब उसे कुछ याद न
था िसवाय इसके िक नारायण को कैसे बचाया जा सकता है . पटना और पटना के गुंड . से
िनडर वह सुबह की Lलाइट का इं तजार कर रही है , ममता से अिधक बेचन
ै ी उसे है . सƒत
पहरे म वह नारायण को िद?ली ले जाएगी और जब वह ठीक हो जाएगा तो पारस की
फै >टरी म ही कोई काम पर लग जाएगा.

कहां ममता आbमहbया करने की सोच रही थी और कहां अब उसे िवzास हो चला था िक
नारायण की बाल मजदरी
ू के िदन अब पूरे हो गए थे. कम6ठ ममता को काम की भला
>या कमी. वैसे भी जब तक माया जीिवत है , तब तक तो ममता उसके साथ रहे गी.

तीन िदन म मृbयु वाला सपना इतना सजीव था िक माया अपनी मृbयु के िलए पूरी तरह तैयार थी.
िकंतु इस वाःतिवक घटना ने उसे पूरी तरह िजला िदया था. वह िकतनी भाdयशाली है िक जीवन
के उ~े ँय के साथ साथ, उसे िदशा भी िमल गई. उसके शरीर का रोम रोम ःपंिदत है और अंग
ूbयंग फ ड़क़ रहा है . उसे लगा िक इतनी िजंदा तो वह जीवन म पहले कभी नहीं रही.