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कहनी

बड़े भैया - शैलेÛ] चौहान
बड़े भैया कछ ऐसे बोलते मानो शहद टपकता हो, सँभल-सँभल कर धीरे -धीरे , एकदम ु संजीदगी से । पीपल खेड़ा गाँव क पो टमा टर थे वे । उन िदन थोड़ी बहत ही डाक े ु आती थी गाँव म और एक डाकख़ाने से कोई चार-पाँच गाँव की डाक बँटती थी । चारपाँच गाँव की डाक एक थैले म, मुि कल से चार-पाँच िकलो वजन, बड़े भैया थैले पर लगी लाख की मोहर तोड़ते, थैले पर बँधी र सी खोलते , डाक िनकालते और हरे क गाँव की डाक अलग-अलग करते, पीपल खेड़ा, अकलेरा, अटारीखेजड़ा, जमुआकलां, जमुआखुद[ वगैरह िफर मनीआड[ र, रिज ी वगैरह का िहसाब करते । डाक छाँटते-छाँटते वे चÈकी पर आटा पीसने म मगन छक से बितयाते, आटा िपसाने आए गाँव वाल को उनकी और आसपास की डाक ू दे दे ते और समझाते िक 'फ़लाँ की िचÒठी है इसे याद से दे िदओ' । बÍचे, बूढ़े और जवान सभी से वे िवन सहजता से बात करते । बड़े भैया तमोली थे यानी चौरिसया यानी पान, रओ अब पान-सुपारी क धंधा म जाई से चÈकी डाल दई है , चार े तंबाक, सुपारी वगैरह क åयवसायी पर उÛह ने अपना पु तैनी धंधा छोड़ रखा था । वे मेरे ू े िपता से कहते 'मजा न पैसा आ जात ह'। हम, यानी म, मेरी माँ और िपता बड़े भैया क मकान म एक कमरे म रहते थे । मकान क े े िपछले िह से म बड़े भैया का पिरवार रहता था उनकी प ी, पाँच बÍचे और एक छोटा भाई, आगे की तरफ वाले कमरे म हमारा पिरवार । बीच म छोटा सा आँगन था, आँगन म एक सँकरा पर पÈका कआ था जो अÈसर पानी िनकालने क बाद लकड़ी क ढÈकन से ुँ े े ढ़ं क िदया जाता था । आँगन क बाद बरामदा, जो काफी लंबा था उसी बरामदे म बाएँ हाथ े पर चÈकी लगी हई थी । उनका डाकख़ाना भी बरामदे म ही था, म भी उसी बरामदे म ु खेला करता था । मेरी उ तब कोई तीन और चार वष[ क बीच रही होगी । े मृितयाँ मेरे मन पर

बहत साफ-साफ तो सब कछ याद नहीं पड़ता िफर भी मोटी-मोटी ु ु िकसी ि थर िच] की तरह अंिकत ह । ये तरह रहीं पर व

मृितयाँ बहत िदन तक चमकते हए िच] की ु ु तक डाक का थैला उनक े

की धूल ने धीरे -धीरे इÛह म म बना िदया। रोज दस Êयारह बजे क े

लगभग म बड़े भैया को डाक छाँटते दे खा करता, शायद उस व

माँ यह तो अव य कहतीं ु िक तुमने Èय ले ली पर बड़े भैया का वह बेहद सàमान करतीं सो डाँटती नहीं थीं । हाँ िकसी और से कछ न लेने की ताकीद अव य कर दे तीं। ु मेरे िपता पीपल खेड़ा क े िश¢ा को भावना×मक ायमरी कल म िश¢क थे । उन िदन गाँव म िश¢क का ू िति त åयि जैसे सरपंच. दध. उ उसकी हद से हद पÍचीस-छÞबीस रही होगी । वह पहले थैला ी । बड़े भैया मनीआड[ र क पैसे े रखता िफर मनीआड[ र फाम[ और पैसे दे ता िफर रिज ी दे खकर एक कागज पर द तख़त करते तब वह डाक लाने वाला नम ते करक चल जाता । मुझे बड़े भैया का डाक छाँटना बहत अÍछा लगता था । े ु इसका कारण था डाक म िचिÒठय क साथ कछ िच] वाले पफलेट भी आते या चार-आठ े ु पेज की छोटी साइज की पुि तका जैसी चीज होती िजनक पीछे वाले पÛन पर घिड़य क े े ेत याम िच] छपे होते थे । घिड़य क वे फोटो मुझे बहत आकिष[त करते थे । हाथ े ु घड़ी मेरे िलए बहत बड़े आकष[ण की चीज थी । कभी-कभी बड़े भैया ऐसा एकाध पफलेट ु या पुि तका मुझे पकड़ा दे ते. म माँ को बोल दँ गा' । बड़े भैया की दी हई गोिलय से ू ु म बहत खुश न होता । म वे गोिलयाँ ले जाकर माँ को िदखाता. म उÛह िलए-िलए घूमता. वह एक दबला पतला åयि ु िगनकर और रिज था. बार-बार दे खता और ु घड़ी करक कमीज या िनÈकर की जेब म रखे रहता । दो एक िदन तक मेरा पूरा Úयान े उÛहीं िच] पर लगा रहता । कभी-कभी बड़े भैया मुझे एक-दो पैसे दे ने की भी कोिशश करते पर उन िदन एक तो म पैसे का कोई मह×व नहीं समझता था. सÞजी एक दो िदन क िलए हाट से खरीद ली जाती । बाकी िदन म या तो गाँव का े . दसरे माँ ने िकसी ू से भी पैसे या खाने-पीने की कोई चीज लेने क िलए एकदम मना िकया हआ था और इसे े ु एक खराब आदत बताया था सो म पैसे लेने से एकदम मना कर दे ता और उनसे दर ू भाग जाता। तब हारकर बड़े भैया मीठी गोिलयाँ ले आते और मेरी जेब म यह कह कर ु ठँू स दे ते िक 'माँ कछ नहीं कहे गी. िकरािनए क यहाँ े े े ू से साबुन. घी या सÞजी जो भी उसक खेत या घर म होता वह भी सादर भट करता । े ू यहाँ तो बड़े भैया की चÈकी थी सो अनाज-वनाज का भी कोई झंझट नहीं था. तेल. सीधा आटा ही घर म पहँु च जाता । दध पड़ोस क एक िकसान क यहाँ से आ जाता. मसाले भर खरीदने होते थे । दाल-चावल िपता िविदशा से खरीद लाते. तब मेरी सÛनता का िठकाना न रहता । घिड़य क फोटो े मेरे िलए बहत ही आनंद की व तु होते.पास पहँु च जाता था । डाक का थैला लाने वाले को भी म पहचानने लगा था. पो टमा टर या उÛह अपने घर या इतना सàमान तो था ही िक गाँव का कोई प से ेम करने वाला कोई समझदार åयि बरामदे म रहने क िलए मुÝत म एक कमरा या जगह दे दे ता था । कभी-कभी े अनाज.

कघी. लो लग गई दकान । कोई चालीस पचास दकान होतीं. रहन-सहन और रीित-िरवाज म. खेती क काम का सामान और गाँव की औरत े क िलए चोिटयाँ. यहाँ तक िक खाने-पीने क तरीक म भी िभÛनता थी । पहली बात े . सामान ु िनकालते. आईने वगैरह होते । Üलाि टक. िसवाय कछे क \ामीण क जो बीड़ी क कश क साथ अपनी ु े े े बची हई बात ख×म कर दे ना चाहते थे । ु िपता इसी वष[ खरगोन से ांसफर होकर यहाँ आए थे. खÍचर पर. क ब को पहँु चना होता था । कोई चार-पाँच मील से आता था तो कोई बारह या पं]ह मील से भी आता था । जो िजतनी दर से आता वह उतनी ही जãदी ू अपनी दकान समेटना शु ु कर दे ता । इस तरह चार बजने न बजते सारा मैदान िफर पहले की तरह सूना हो उठता. उसक बाद तीन-चार घंटे तक काफी चहल-पहल बनी े रहती । करीब तीन साढ़े तीन बजे से दकानदार उठने लगते Èय िक शाम ढलने से पहले ु उÛह अपने-अपने गाँव. िबंदी. ु खरीदारी करते । औरत अÈसर चटक लाल रं ग क लहं गे Þलाउज पहने होतीं । उ े औरत आदिमय की तरह लाँग वाली सफद धोितयाँ और ऊपर कमीज जैसे लंबे-लंबे े Þलाउज पहनतीं । िकशोिरयाँ और युवितयाँ चटक रं ग म सजी चहकती िफरतीं । हाट का िदन बहत रौनक भरा होता । सुबह आठ बजे से हाट भरनी शु ु होती और Êयारह बारह तक अपने पूरे शबाब पर आ जाती. बेलन. साइिकल पर और बाकी ु दलकी चाल से चलते हए पैदल आते । उनम िबसाितय की तो िनराली धज होती एक ु ु हाथ म कपड़े क थान नापने क िलए लोहे का गज और दसरे कधे पर कपड़ की गठरी । े े ं ू िबसाितय क पहने हए कपड़े भी अपे¢ाकृ त साफ होते । हलवाइय क कपड़े एकदम े े ु चीकट होते थे । मैदान म बैठकर दकानदार अपनी-अपनी पोटिलयाँ खोलते.आदमी या कल म पढ़ने वाला कोई लड़का जो भी खेत म होता दे जाता. ु ु कपड़े वाले. लकड़ी और टीन े ं ू ं से बनाए गए िखलौने. नहीं तो दाल ू से आराम से गुजर बसर होती थी । बड़े भैया क मकान क बांयी ओर एक बड़ा सा खुला मैदान था िजसम हÝते म एक िदन े े हाट लगा करती । पोटली बाँध कर दकानदार आते. दि¢ण-पि मी उ र े मैनपुरी का वह गाँव कीरतपुर. कछ अकले भी. कगन. उनम हलवाई. आटे े ू की चलनी वाले होते । लकड़ी का सामान. इसिलए ये नया माहौल हमारे िलए दे श क िजला े दराज़ अजनबी था । हम लोग उ र दे श क रहने वाले थे. रबर की गद. चाक. सजाते. अनाज छानने की छÛनी. घर क ज री सामान जैसे चकला. िसंदर. दे ख-दे ख कर बहत मजा आता । एक बार मेरे िजद ु करने पर एक छोटी सी गद िपता मेरे िलए भी खरीद लाए थे । गाँव क लोग अÈसर झुंड े ु े म. पीपल खेड़ा से एकदम िभÛन था । बोलचाल. आपस म खूब जोर-जोर से बात करते दकान पर जाकर भाव-ताव.

कभीकभी वे खरगोन की बात भी करते पर खरगोन मेरे िलए यहाँ से भी अिधक अजनबी जगह थी । यहाँ तो म अपनी आँख से दे ख रहा था. पूड़ी. साथ ही दादी ने मेरे िलए कछ Üलाि टक क िखलौने भी खरीद े ु े िदए और एक मोटर कार भी जो टीन की बनी हई थी । घूमने-घामने क बाद खरबूजे. कचौड़ी. मैनपुरी या इटावा जाने क िलए मोटरगाड़ी हमारे े गाँव से सीधी िमल जाती थी । जब िक पीपल खेड़ा िविदशा से कोई तीस मील दर था ू और यहाँ तक बस भी नहीं आती थी । 'बस' कोई पाँच-छ: मील दर सड़क पर उतार दे ती ू थी. गाँव क और लोग भी थे. े ु मृित मेरे मन म नहीं थी । अलब ा निनहाल और अपना गाँव दोन मेरे मन म सजीव थे । मेरे िलए गाँव का मतलब थीं . िमÒटी क बत[न खरीदे . वहाँ से बैलगाड़ी उफ छकड़े म या िफर पैदल ही आना पड़ता था गाँव तक । दसरे [ ू यहाँ की भाषा भी हमारे िलए अजीब थी. बÍचे काफी उ×सािहत थे । वहाँ े पहँु च कर नहर म हम लोग ने नान िकया. खोए की बरफी और े ु आम क अचार तथा आलू मैथी की सÞजी क साथ खाई ग े े आकर एकाध बार पूिड़याँ बन ही जाती थीं. या कोई मेहमान का हो. िफर घर से लाई हई पूिड़याँ पक आम . कोई बाहर जाए. माँ और दादी उनकी सहायता करतीं । मेले म खूब घूमे. नरम इसिलए Èय िक जभाषा का अÈखड़पन हमारे यहाँ िन कािसत था. े िमÒटी क ही िखलौने भी. कोई गलती से योग नहीं करता था । यहाँ बुंदेलखंड ी की िबãकल अलग ही ु वर क आरोह अवरोह म जमीन े कृ ित थी. हलवा बनना तय था । अÈसर यह सब छोटी अइया ही बनातीं. हमारे गाँव म बड़ी नरम भी तू और तेरा शÞद का बैसवाड़ी का ज भाषा बोली जाती. य िप मेरी माँ बुंदेलखंड क उस भाग की थीं जहाँ से उस पर कÛनौजी और े भाव पड़ने लगता है िफर भी दोन क े आसमान का अंतर था । माँ और िपता अÈसर हमारे गाँव से यहाँ की तुलना करते. ु े साथ म छोटी अइया भी थीं. खीर.यह िक हमारा गाँव सड़क से लगा था. थोड़ी पूजा वगैरह की । एक पंिडत ितलक । गाँव म हÝते दस िदन म लगाए बैठा था उसे दान िदया. कोई बाहर से आए. इससे पहले खरगोन रहे ह गे पर तब म मा] डे ढ़ दो वष[ का था अत: वहाँ की कोई दादी और यहाँ दादी की मुझे बहत याद आती थी । ु भरी गिम[य म जेठ मास की दशमी क िदन हमारे गाँव से तीन मील की दरी पर िसंह े ू पुरा गाँव म नहर क दोन े ओर मेला लगता था । इसी साल गिम[य की बात थी बैलगाड़ी का इं तजाम न होने पर दादी मुझे अपने कध पर िबठाकर ही मेला ले गइं । उनकी उ ं तब पचास की ज र रही होगी पर गजब की फत थी उनक शरीर म । हम कब मेले पहँु च गए पता ही नहीं चला. यहाँ की हवा की गंध मन म भर रहा था । िपछले वष[ तो म और मेरी माँ गाँव पर ही थे.

'किकया आजकल दध क धंधा म कछ बचत नाँय है । अब दौलतपुरा से सबेरे-सबेरे े ू े दय-तीन घरन सै दध इकÓटो करौ िफर िहयां तुàहारे घर से लैक बजार बेचन जाएँ. उस लकड़ी म एक र सी बँधी होती । पला क नीचे अनाज क दाने े े िबखेर दे ता. आलू े भरकर पराठे बनाए जाते.तरबूज और बत[न. जैसे ही िचिड़या दाने चुगने आती. बिड़य . मÒठे क आलू की सÞजी बनती यानी आलू ही आलू खाया जाता े े । दादी आलू काटकर धूप म सुखा लेतीं और उÛह मटक म भरकर रख लेतीं । सÞजी क टोटे क िदन म ये सूखे आलू. िमथौरी या अÛय हरी सिÞजय पालक-मैथी वगैरह े े क साथ बनाए जाते । गिम[य म िमÒटी क मटक को उलटा रखकर उन पर मैदे से े िसवइयाँ बनाकर सुखाई जातीं। म आँगन म िचिड़याँ उड़ाता और िचिड़या पकड़ता । अरहर े की लकिड़य का िबना हआ एक पला (डिलया) उãटा कर एक पतली लकड़ी क सहारे एक ु िकनारे से िटका दे ता. उÛह खूब भून कर खाया जाता. तखतिसंह पास क ही गाँव दौलत पुर क रहने वाले थे । े े दादी उन िदन सुबह-सुबह भस का दध िनकलवा कर चबूतरे पर रख लेती थीं । ू तखतिसंह दध लेने आते. र सी खींच दे ता िचिड़या बेचारी पला क े नीचे िघर जाती। गिम[य म यह खेल खासा मनोरं जक लगता था । हाथ म िचिड़या पकड़ कर उसे पानी या दध िपलाने की कोिशश करता । दादी झुँझलातीं Èय नाहक िचरइया को ू िदक करते हो मुझ पर उनकी बात का कोई असर न होता । उनका सबसे मजेदार िक सा वह था जब एक मछिलयाँ बेचने वाला मछिलयाँ लेकर आया । उÛह ने उससे मछिलयाँ खरीदीं िफर उसीसे उÛह साफ करवा कर कटा भी । इसी तरह जब सामिलया गो त . ु ू साइिकल से गोड़ टोर तब हलवाई कह दे तु ह 'दध पतरो है ।'कहतु है 'िहअ ू खोया बनाय क िदखाय दे त ह।' दादी उनका आशय समझ जातीं और तखतिसंह को फटकार लगातीं िक ै े दध बेचना हमारा धंधा थोड़ी है िक पानी िमला क बेचना पड़े । सुनकर तखतिसंह उठ ू लेते और कहते 'बुरा मत मािनओ किकया तुमाए लएं थोड़ी कह रहे थे ब तो और लोगन की बात बताय रहे थे ।' और तखतिसंह साइिकल पर चढकर तेज-तेज पैड ल मारने लगते । घर म उन िदन बोरे क बोरे आलू भरे रहते थे. िखलौन को लादे हम तखतिसंह की बैलगाड़ी से गाँव वापस लौटे . वे िमिलटरी से िरटायर होकर दध का धंधा करने लगे थे । गाँव ू ू े से दध इकÒठा कर वे मैनपुरी म बेच आते थे । तखतिसंह की तीस िड\ी क कोण पर ू छाँटी गई मूँछ और सर पर लगी खाकी टोपी उनक åयि ×व को अजीब सी छटा े करती। बहत आिह ता-आिह ता और बड़ी िवन ता से बोलते थे वे । उनका ु दान वर भी बहत म म और पतला था । कभी-कभी वे दध क पतले होने की िशकायत कछ इस तरह े ु ू ु ु करते.

भाभी अपनी । ऐसा संवाद मने अपने गाँव और निनहाल म अÈसर सुना था । जब िकसी घर म दो बहएँ अलग-अलग ू गाँव से Þयाह कर आतीं. हालचाल पूछतीं और बीड़ी भी िपलातीं । जेठ की दोपहर म दहलीज म खिटया पर लेटी-लेटी वे स ठ और गुड़ खातीं. घर जैसो ई समझौ झां. हमारे ही मन म कहीं संकोच था । बड़े भैया की प ी िजÛह हम सभी भाभी कहने लगे थे अÈसर माँ से पूछतीं 'कोई चीज की ज रत हो तो बता िदओ. तुम तो भौत सरमात हौ. उनकी बोिलय म अंतर होता तब वे एक दसरे से इसी तरह ू वाता[लाप करतीं थीं । अगर सास-बहू की बोिलयाँ अलग होतीं तब और मजा आता । अÈसर तो सास बोलती रहती और बहू सुनती या हाँ हँू म जवाब दे ती लेिकन जब ि थितयाँ तनावपूण[ हो जातीं और सास-बहू या दो बहओं का आपस म झगड़ा होने लगता ु तब बोिलय की जो ित ं ि ता भरी करती थी । शु -शु ितयोिगता होती वह मेरे भाषा £ान म इजाफा म मुझे यहाँ की बोली समझ म नहीं आती थी पर बड़े भैया. ु आगरा और झाँसी म गािड़याँ बदलते हए दसरे िदन दोपहर तक हम िविदशा पहँु च सक थे े ू ु ु । िविदशा म एक िदन ठहर कर अगले िदन हम पीपल खेड़ा पहँु चे । कछ िदन तक तो अपिरिचत और अजनबी की तरह हम लोग वहाँ रहे .लेकर आता तो वे उसम से कलेजी छाँटती । आसपास क गाँव क लोग जब उधर से े े िनकलते तो जुहार करते । दादी उÛह िबठातीं. ज रत पिरहै तो ज र बतइह ।' तब भाभी मेरी तरफ मुखाितब होतीं. िनरे मौड़ा ह झां ।' बड़ा अजीब सा संवाद होता. पानी िपलातीं. सब अपने ई ह ।' मेरी माँ जवाब दे तीं 'ऐसी कोई ज रत नई है भाभी.जौ और चने क स ू खाती रहती । मुझे न स ठ अÍछी े लगती न गुड़ न ही स ू इसिलए जब कोई बरफ वाला या गुिड़या क बाल वाला िनकलता े तो म दादी को बताता और वे खरीद दे तीं । िजस िदन म अपने माता और िपता क साथ गाँव से िविदशा क िलए चला वह िदन बहत े े ु उदासी भरा था । एक वजह यह थी िक मुझे गाँव से जाने और दादी से िबछड़ने क े कारण रोना आ रहा था । उस िदन जब सुबह आठ नौ बजे हम लोग घर से िनकले तो े बहत बुरा हाल था । छोटी अइया और बड़ी अइया दोन रो रही थीं । गाँव क और लोग ु भी दखी लग रहे थे । आठ दस लोग हम सड़क तक छोड़ने आए । बस आने पर मेरा ु और िपता का उÛह ने दही चावल से ितलक िकया और मेरे हाथ म एक-एक. मुझे भी िखलातीं या िफर गेहूँ . दो-दो पये भी थमाए । बस म बैठे-बैठे भी म कछ दे र तक सुबकता रहा । मैनपुरी. माँ अपनी भाषा बोलतीं. िशकोहाबाद. छै क ू और गाँव वाल की बात सुन-सुन कर म काम चलाऊ बोली समझने लगा था । एक िदन बड़े भैया छै क को समझा रहे थे 'चÈकी क प×थर िघस गए ह अब हाट वारे िदन जब ू े . कहतीं 'मुÛना तुम इतै खूब खेलौ.

थोड़ी दर तक उस गली म गया भी था । सामाÛयत: माँ मुझे कहीं भेजती नहीं ू े थीं. अिधकांश गाँव वाले खेत की तरफ िनकल गए थे । बÍचे या तो कल गए थे या ढोर चरा रहे थे । डर क मारे मेरा बुरा हाल था. बड़ी मुि कल से उÛह ने अंदाज लगा पाया िक िसंह े साहब का लड़का हँू । . अपने िहयां की बा ू म कीचड़ न वारी मÒटी होत है ।' मुझे उनकी बात समझ म नहीं आती । मुझे तो अपना गाँव एक आदश[ गाँव लगता. कल म ही रहे ह गे । बड़े भैया भी घर म नहीं थे. ऐसी कीचड़ तो वहाँ कभी नहीं हई । ु ऐसे ही एक िदन जब बरसात थमी हई थी माँ ने मुझसे िपता को बुला लाने को कहा । ु िपता का कल मने पहले दे खा नहीं था. भाभी कहीं गाँव ू म िनकल ग थीं इसिलए मजबूरन मुझे भेजना पड़ा । म उस गली म थोड़ी ही दर चला ू होऊगा िक मेरे पीछे एक काला क ा लपक िलया । अब म आगे-आगे और क ा पीछे ँ ु ु पीछे । गाँव सूना-सूना था. क जाता तो वहाँ कीचड़ ही कीचड़ बची रहती । माँ कहतीं 'काली मÒटी जãदी फल जात है . मतली सी आने लगती पर गाँव वाले लोग ठाठ से कीचड़ म घूमते । गाँव की सारी गिलयाँ नािलय म पिरवित[त हो गई. पानी बरसता तो गिलय म बहता. िफर सफाई कर लउं गो।' े जुलाई का महीना था अभी तक कोई खास बािरश नहीं हई थी । कछ ही िदन म बािरश ु ु शु हो गई । अब घर क बाहर िनकलना दभर हो गया । इतनी काली-काली कीचड़ मने े ू पहले कभी नहीं दे खी थी. वहाँ की िमÒटी म कालापन नाम को भी नहीं था. हाँ मुझे अंदाज था िक िपता बगल वाली गली से ू ही जाते ह. म ं आसा था पर ू े ठीक तरह रो नहीं पा रहा था । दो एक गाँव वाल ने हमारी दौड़ को दे खा पर उÛह ने मेरी कोई सहायता नहीं की । कर भगाया । कल पहँु चने क थोड़ा पहले एक औरत ने क े को डपट ू े ु कल ू कल पहँु चने पर मेरा बुरा हाल था. कभी-कभार म थोड़ी बहत दर खेलने िनकल जाता था । उस िदन बड़े भैया क बÍचे ू ु शायद घर म नहीं थे. जहाँ जाओ वहाँ कीचड़ । हाट वाला मैदान तो एकदम कीचड़ म पिरवित[त हो गया था । जो भी आदमी आता उसक पैर म या पनहइय म सेर दो सेर े कीचड़ ज र होती । इतनी कीचड़ दे ख कर मेरा मन खराब हो जाता. भूरी-भूरी हãकी पीली िमÒटी. म जोर-जोर से रोने लगा था । ू क िश¢क मुझे पहचानते नहीं थे. चÈकी की सफाई भी हो जाएगी ।' छै क कहता 'हाँ ू खोल क धर दउं गो पैले.िम ी आयगो छै नी लैक तब वाई से टकवा िलओ ।' छै क आटे से सना चेहरा िलए भूत े ू बना हआ कहता 'पैली बार तो आओ न ु थो वौ अबकी बार पकर लउं गो ।' बड़े भैया िहदायत दे ते 'पैले पथरा खोल िलओ.

बड़े भैया हाथ मुँह धोकर. कछ गरम करक ु े ु िपलाया. उससे माँ का दद[ कछ कम हआ । दोपहर को िपता िफर ु कल चले गए. शायद उÛह ने पहले ही पैसे दे िदए थे। दो िदन बाद बड़े भैया ने माँ को डाÈटर को िदखाने का इं तजाम कर िदया । बैलगाड़ी पÈकी कर दी पास क गाँव तक आने-जाने क िलए जहाँ सरकारी डाÈटर बैठता था । उस े े िदन म िपता और माँ क साथ पास क गाँव क अ पताल तक छकड़े म बैठकर गया था । े े े डाÈटर ने दवाएँ िलख दी. सुबह वै ु भी आ गया । वै ने कछ और ु से फीस क े दवाइयाँ दीं और दो िदन बाद िफर आने को कहकर चला गया । िपता ने वै िलए पूछा तो बड़े भैया ने मना कर िदया दे ने को. माँ ने िमठाइयाँ भी बना िदए भी जलाए पर वैसा मजा नहीं आया जैसा गाँव म आता था वहाँ दादी थीं और दादी क िबना सारे वार ×योहार फीक थे । धीरे धीरे मन वहाँ रमने लगा. बड़े भैया थोड़ी ही दे र पहले िविदशा से लौटे थे और तुरंत वै को बुलाने चल े िदए थे । कोई दो-तीन घंटे बाद बड़े भैया लौट आए. ऐसा दद[ उÛह अकसर हो े े जाता था । िपता परे शान िक Èया कर ! वे थोड़ी दे र तक माँ क पास बैठे रहे । गाँव म े कोई वै हकीम भी नहीं था. 'म े भी चलूँ ।' तो बोले 'नहीं आप यहीं रहो बहू क पास. कोई ु ु े अगर Ïयादा बीमार पड़ जाए तो डाÈटर भी नहीं िमलता ।' पास क िकसी गाँव म एक वै था. डाÈटर का तो सवाल ही नहीं । आिखर बाहर िकसी दकान से ु वे एक गोली लेकर आए जो उÛह ने माँ को िखला दी । माँ असहनीय दद[ की वजह से रो रही थीं । म क े क कारण अभी तक सहमा हआ था। माँ की तकलीफ दे ख कर म ु े ु अपना दख तो भूल गया पर मुझे बहत बेचनी हो रही थी । िपता ने मुझसे कहा िक तुम ै ु ु बरामदे म जाकर खेलो लेिकन मेरा खेलने म मन नहीं लग रहा था। आिखर थोड़ी दे र म भाभी लौट आ और उÛह ने माँ की पीड़ा समझने की कोिशश की. म अभी एक घंटे म आता हँू ।' शाम ढ़ल चुकी थी. Ïवार क गदे खेत म ही भून कर खाए े ु जाने लगे धिनया िमच की चटनी और छाँछ क साथ । मÈका वहाँ नहीं होती थी भुÒटे े कभी कभार हाट म ही दे खने को िमलते थे । दशहरा आया दीवाली बीत गई. पेट पर सक िकया. भाभी बार-बार हालचाल पूछ लेती थीं । दे र शाम बड़े भैया लौटे . माँ क पेट म तेज दद[ था. चाय पीकर वै को बुलाने चल िदए । िपता ने रोका. सुबह दे खी जाएगी पर बड़े भैया नहीं माने। िपता ने कहा. म माँ क पास ही खेलता रहा । शाम को िपता ू े कल से लौटे तब तक माँ ू को थोड़ा आराम था. उसने सुबह आने को कहा था । भाभी ने माँ को वे दवाइयाँ । रात म माँ को कछ और राहत िमली. े े . हम सब इस बात से खुश थे। बरसात ख×म हई शरद की खुशनुमा ऋतु आ गई. माँ का हाल-चाल उÛह पता चला तो बहत परे शान हए बोले 'गाँव म यही तो परे शानी है .म िपता क साथ घर वापस आया. माँ को आराम था. उनक हाथ म दवाइय का एक िडÞबा था । वै िखला नहीं आया था. माँ ने भी कहा अब आराम है .

हाट वाले िदन हाट का मजा लेता । सिद[ याँ कब बीत ग पता ही नहीं चला िसवाय इसक िक कभी अड़ोस पड़ोस म अलाव जलता िदख े जाता जहाँ गाँव वाले लोग बैठ कर बितया रहे होते या कछ बÍचे शरारत कर रहे होते । ु गÛने चूसने और गÛने का रस पीने का आनंद भी िमलता और अम द खाने का भी । गेहूँ की बािलयाँ पकने लगीं. िबजली पहँु च गई होगी और े िसंचाई की सुिवधाएँ भी । अब तक वहाँ दो-चार डाÈटर भी अव य बन चुक ह गे पर मेरी याद जो इतने छोटे पिरवेश और छोटी उ की सीमा म कद ह उÛह म अपनी कãपना ै से बढ़ाना नहीं चाहता । पीपल खेड़ा हम लोग करीब आठ दस महीने ही रहे लेिकन वे आठ दस महीने हमारे जीवन म एक खुशबू की तरह थे । काली िमÒटी की स धी और नेह पगी खुशबू । म िपता क साथ दो-एक बरस बाद िफर पीपल खेड़ा गया था तब तक े उस गाँव म जो पिरवत[न आ गया था वह भी मने लि¢त िकया । कल बदल गया यानी ू पुरानी िबिãडं ग की जगह. पता नहीं पीपल खेड़ा अब कसा हो गया होगा । यह सन उनसठै साठ की बात है । अब तक सड़क वहाँ तक पहँु च गई होगी. गाँव म कभी कभी घूम आता.'ये बड़े भैया ह इनक पैर छओ ।' सच उस िदन बड़े भैया क पैर छकर मुझे िकतना संतोष े े . कीचड़ और गोबर की शरीर पर जो िचपकाई हई वह ु दे खकर म भीतर तक िसहर गया । मुझे याद नहीं आया िक कभी गाँव पर मैने ऐसा दे खा हो वहाँ तो रं ग की होली होती थी और गाने वाल की टोली घर घर घूमती थी । लेिकन दसरे िदन से पानी और रं ग का खेल शु ू गिम[याँ शु हो ग हआ तो तीन चार िदन तक चलता ु े रहा कीचड़ वाली होली भूल म पानी म भींगने और रं गे जाने क मजे उठाने लगा । कल म आने वाली परी¢ाओं की सरगम िदखाई दे ने लगी. पिरणाम आए बÍचे फल और पास हए. गिम[य की े ु ु ट दो माह की छिट◌् याँ शु एक अरसा बीत गया. जो गाँव की गोद म थी अब बाहर सरहद पर कछ पÈक कमरे ु े बन गए थे िजनम पढ़ाई हो रही थी। और एक बेहद आ य[जनक बात यह थी िक मुहर[ म क िदन तािज़ये वहाँ िनकल रहे थे जो पहले वास म मने नहीं दे खा था । बड़े भैया अब े भी ठीक वैसे ही थे जैसे दो वष[ पहले थे । बड़े भैया से िफर मेरी एक मुलाकात तब हई ु जब म िकशोराव था पार कर जवानी की दहलीज पर पाँव रख रहा था । िपता ने कहा ु ू . सामने वाली दकान से लेमनजूस की गोिलयाँ खरीद कर े ु चूसता. होली का ै डांड ा गाड़ िदया गया। लकिड़याँ इकÒठी होने लगीं कभी आसपास क जंगला◌्से तो कभी े िकसी क खेत खिलहान से चुरा क । बड़े बÍच क मजे थे उÛह इसम बहत आनंद आ े े े ु रहा था । होली जली िफर िमÒटी. वसंत बीत रहा था धूप खुलकर फलने पसरने लगी. फसल ू हो ग । कटने लग गई । परी¢ाएँ ख×म हु .िदन भर बÍच क साथ खेलता.

िमला था म नहीं जानता पर उनकी सहजता मेरे िलए सदै व एक बहमूãय िनिध की तरह ु मृित म समाई रही । पता नहीं अब बड़े भैया ह भी या नहीं. ह तो िकस हाल म ह लेिकन मेरी ०-०-० मृित म वे आज भी अपनी संपूण[ सहजता म मौजूद ह । .