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अिखलेश शु

ल की रे खािचऽामक कहानी : गोमती बुआ

गोमती बुआ हमारे साथ कई वष! से रह रही थी। म$ने अपने बचपन से युवावःथा तक
उ)ह* एक ही ,प म* दे खा था। ,ई के समान सफेद बाल, पोपला सा मुँह, झुकी हई
ु कमर
उनकी पहचान थी। बुआ की आँख* हमेशा पूरी तरह बंद रहती। जब उ)ह* कहींदे खना होता
तो वे अं
गूठे तथा ऊंगिलय6 की सहायता से पलक* उठाकर कुछ दे ख पाती थीं। उ)ह* सुनाई
भी बहत
ु कम दे ता था। जब िकसी बात को सारा गांव सुन समझ ले उसके बाद ही वे
बात* बुआ को समझ म* आ पाती थीं।

वे मेरे िपताजी की सगी बहन नहींथीं। उनका िववाह आठ वष! की आयु म* हो गया था।
िववाह के प;ात वे केवल एक बार ही ससुराल गई थीं। उसके प;ात जो वापस आई तो
िफर कभी भी दोबारा वहाँ नहींगई। उ)ह6ने अपनी पूरी उॆ गाँव के मकान के िपछवाड़े
बनी एक छोटी सी कोठरी म* ही गुजार दी।

वे गाँव भर की बुआ थीं। आठ वष! के ब?चे से लेकर अःसी वष! के वृA भी उ)ह* बुआ
कहकर पुकारते। बहत
ु हआ
ु तो बुजुग! उ)ह* सBमान से गोमती बुआ कह लेते। मुझे अ?छी
तरह याद है, मेरे पड़ोस म* रहने वाले ल?छू काका ने एक बार उ)ह* गोमती बाई कह िदया
था। उस िदन बुआ ने ल?छू काका को जी भर कर कोसा था। वे तीन6 पहर ल?छू काका
की िपछली सात पीिढ़य6 से लेकर आगे आने वाली सात पीिढ़य6 का सयानाश करके शांत
हई
ु थीं। वह भी तब, जब वे पूरी तरह थक हार कर पःत पड़ गई थीं।

हमारे पिरवार म* िकसी ने भी गोमती बुआ को गहरी नींद म* सोते नहींदे खा था। िकसी
चपल Gान के समान थी उनकी नींद। Hय6 ही कोई खटका होता बुआ खट से चारपाई पर
उठ बैठती और लाठी को चार छः बार जमीन पर पटक-पटक कर हम सब लोग6 को
पुकारती। वे चाचा को आवाज दे ती, “दे खना परे म कौन है? वहाँ पर,? ठठरी बँधा।” दो चार
बार बुआ के पुकारने पर चाचा की नींद म* खलल पड़ता वे िबःतर पर पड़े -पड़े ही कहते,
“सो जा बुआ कोई नहींहै, य6 आधी रात को पूरे गाँव की नींद बबा!द कर रही है।” यह
सुनकर बुआ मन ही मन बड़बड़ाती रहती। न जाने कौन सा मंऽ पढ़ती रहती। यह
िसलिसला जाने कब से चला आ रहा था, मुझे याद नहींहै। बुआ के सोने का कोई समय
तय नहींथा। जब वे भोजन कर लेती, राम नाम की माला जपते हए
ु वे कोठरी म* चली
जातीं। कभी-कभी तो माला उनकी खाट के नीचे होती और वे राम नाम का जाप कर रही
होती। उसी अवःथा म* वे नींद की आगोश म* समा जाती थीं। चाहे उस समय शाम के छः
ही य6 न बजे ह6। लेिकन उनके उठने का समय तय था। वे ूायः चार बजे के आसपास
उठ बैठती थीं। म$ने तो कई बार अपने भाई बहन6 से इस बात को लेकर शत! लगाई थी
िक दे खना आज बुआ Pयारह बजे सोई है, सुबह सात से पहले नहींउठने वाली। लेिकन म$
अपनी शत! हमेशा हार जाया करता था, य6िक वे मेरी आशा के िवपरीत ूातः चार बजे
ही उठ बैठती थीं। वे िबःतर पर पड़े -पड़े कुछ दे र तक राम नाम जपतीं। उसके प;ात
लालटे न जलाकर मंिदम सी रोशनी म* शौचकम! से िनवृQ हो जातीं। िपताजी हमेशा िचं
ता
िकया करते थे िक कही ऐसा न हो ये बुआ रात अं
धेरे म* कही िगर िगरा पड़े और लेने के
दे ने पड़ जाएँ। लेिकन बुआ ने यह कS कभी िकसी को नहींिदया। म$ उस वT सबसे कहा
करता था िक बुआ की भले ही आँख* नहींहै पर उनके हाथ6 म* रखी लाठी म* शायद
जादईु आँखे ह$ , िजसके सहारे वे कभी भी, कही भी, आ जा सकती ह$ ।

कड़ाके की सदU हो, उमस भरी गमV अथवा मूसलाधार बरसात वे हमेशा ूातः ही ःनान
कर लेतीं। उसके प;ात कमरे म* रखी हई
ु रामलला की मूित! के सामने घी का दीपक
जलाकर दो अगरबQी लगातीं। िफर माला लेकर जो जाप करने बैठती तो िपताजी के
पुकारने पर जाप समाX कर चाय पीने आतीं। वे अपना पीतल का िगलास कटोरी साथ ही
रखती थी। वे चाय पीने के प;ात बत!न6 को धो मांजकर जतन से अपनी संदक
ू म* रख
दे तीं।

बुआ को कुQ*-िबिYलय6 से हमेशा नफरत रही। वे उ)ह* दे खते ही िचढ़ जाती थी। एक िदन
रामदास के बड़े बेटे भगवान दास ने एक िपYला बुआ की कोठरी के अं
दर छोड़ िदया था।
बुआ ने उस िपYले को बाहर िनकालने के ूयास म* कोठरी के अं
दर रखी चीनी िमZटी की
बरनी तथा िमZटी के अ)य पाऽ6 को िमटा िदया था। िपYला तो कोठी के एक कोने म*
दबक
ु कर कांय-कांय करता रहा लेिकन सामान की बबा!दी होती रही। बाद म* बुआ ने कुँए
दर बाहर से अ?छी तरह धोकर उसकी िलपाई पुताई की थी।
से पानी लाकर कोठरी को अं
वे उस िदन रामदास के घर तक भी गई थींयिद वह घर िमला जाता तो शायद बुआ के
ूवचन6 तथा लाठी की मार से उसका बच पाना किठन था।

िपताजी हमेशा बुआ को समझाया करते पर वे घर म* अपनी ही चलाती रहती। िपताजी


उनसे खाने के बारे म* पसंद पूछते कहते, “बुआ, कौन सी स[जी खाओगी ला दे ता हँू ।”
ूयुQर म* वे दीवान की बागुड़ से लौकी िगलकी के नीहे (छोटे फल) तोड़कर अBमा के
सामने पटक दे तीं। उन वेःवाद नीहा की स[जी बघारने को कहतीं। अBमा हमेशा उनका
आदर करती थीं, इसिलए उनकी मन पसंद स[जी बाजार से मंगवाकर बना दे ती और
कहती, “लो बुआ ,आज तुBहारी तोड़ी हई
ु स[जी ही बनाई है, इ)ह* तथा ब?च6 को यह बहत

पसंद है।” यह सुनकर बुआ की ूस)नता का कोई िठकाना नहींरहता। वे कभी िपछवाड़े
लगे नीबू के वृ_6 से िगरे अधपके नीबू बीनकर चाची के सामने धर दे ती। बुआ की िजद
होती िक इन नीबू का ही अचार डाला जाए। चाची बुआ से बहस करती, उन नीबू से अचार
न बनने की बात कहती, लेिकन बुआ कहाँ मानने वाली थीं। वे माँ से उन नीबुओंका
आचार बनाने को कहतीं। माँ बहत
ु ही होिशयारी से बुआ की िनगाह बचाकर िपताजी से
अ?छे नीबू बाजार से मंगवा लेती और उनका आचार बनाकर बुआ को पेश करती। इस
तरह उनके साथ सामंजःय िबठा पाना कोई हँ सी खेल नहींथा। कभी कभी तो घर का हर
सदःय उन पर खीज उठता था। लेिकन वह खीज अिधक दे र तक नहींरह पाती थी। बुआ
भी िजतनी जYदी गुःसा होती, उससे भी जYदी वे सामा)य हो जाती थीं। उनकी
ःवभावगत िवशेषताओंको समझ पाना कभी-कभी किठन हो जाता था। लेिकन वे हमेशा
िपताजी का सBमान करती थीं।

जब भी कभी गाँव म* कुछ काय!बम होते वे तुरंत उसका ूमुख िहःसा बन जाती। गाँव म*
ूितवष! होने वाली रामलीला, रासलीला तथा गणेश उसव आिद पर गोमती बुआ सब की
डांट खाने को बावजूद अपनी _मता से अिधक काय! कर सहयोग दे ती। िपताजी ने कई
बार बुआ को टोका था, “ या ज,रत है तुBह* बुआ गांव के लोग6 के काम म* टांग अड़ाने
की? कुछ तो शम! करो। गाँव के लोग या सोच*गे?” बुआ हँ स कर टाल जाती, वे कहती,
“बेटा यह बूढ़ा शरीर गाँव के कुछ काम आ जाए तो अपने आप को ध)य समझूँगीं। ये तो
मेरा सौभाPय है िक तुम सब मुझे सBमान दे ते हो, उसके बदले म* या कुछ सेवा भी नहीं
करने दोगे?”

“बुआ, िफर भी तुम अपनी उॆ का कुछ cयाल तो करो।”

“बेटा उॆ का cयाल िकया तो म$ गई इस दीन दिनया


ु से।” बुआ दाश!िनक अं
दाज म*
गहरी सांस* लेते हए
ु कहतीं।

“तुBह* तो समझाना ही बेकार है,” िपताजी हमेशा की तरह झYला उठते। बुआ अपने पोपले
मुंह, गकढ6 भरे गाल और धं
सी हई
ु आंख6 fारा ूाX अनुभव6 को समेटते हए
ु कहतीं, “बेटा
तूने मुझ बाल िवधवा को रखकर मुझ पर जो उपकार िकया हैउसका कुछ तो बदला
चुका लेने दे मुझे?” बुआ की अं
तरामा की पुकार सुनकर िपताजी हर बार उनके सामने
नतमःतक हो जाया करते। वे अपनी डबडबाई आं
ख6 से बुआ का सामना कर पाने की
िःथित म* नहींरह पाते थे। उस वT उनम* बुआ का सामना करने का साहस नहींरहता
था। वे बुआ से दरू हटकर िकसी और काय! म* लग जाते थे।
गोमती बुआ गांव के िलए सेवा की ूितमूित! थी। बुआ ने कभी िकसी से सहारा नहीं
िलया, उYटे उ)ह6ने वT ज,रत लोग6 पर उपकार ही िकया था।

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ूाथिमक क_ाओंको उQीण! करने के प;ात मेरे भाई बहन शहर म* मेरे पास पढ़ने के
िलए आ गए थे। घर म* बड़ा होने के कारण मेरा भी फज! बनता था िक म$ उ)ह* अपने
पास रखकर उनकी अ?छी िश_ा की gयवःथा क,ँ। हम सबके शहर आ जाने के प;ात
गांव म* माँ-िपताजी तथा बुआ ही रह गए थे। िपताजी हर रिववार शहर आकर हमारे
हालचाल ले जाते तथा गाँव की जानकारी दे जाते। कभी-कभी वे सXाह भर का सामान
रख जाते। उस सामान म* बुआ fारा hयार से भेजी गई कुछ खाने पीने की चीज* भी होती।
वे मौसम के अनुसार इमली, अम,द, आम आिद ज,र भेजतीं।

िपताजी का गाँव से आना और बुआ fारा भेजी गई साममी लाने का यह बम वषj तक


चलता रहा। एक िदन कंपकपा दे ने वाली सदU म* जब हम ःकूल जाने की तैयारी कर रहे
थे, गाँव से खबर आई िक गोमती बुआ नहींरही। उस िदन रोते िबलखते हम भाई बहन
तुरंत गाँव चले गए थे। बुआ की मृयु की खबर से पूरा गाँव शोकमPन हो गया था। गाँव
का ूयेक gयिT उनकी अं
ितम याऽा म* शािमल हआ
ु था। सभी ने उ)ह* सBमानपूवक
!
अं
ितम िवदाई दी थी। उस िदन गाँव के िकसी भी घर म* चूYहा नहींजला था।

बाद म* माँ िपताजी भी शहर आ गए थे।

तब से लेकर आज तक गोमती बुआ मेरी याद6 म* बसी हई


ु है।

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अिखलेश शु ल

63, ित,पित नगर

इटारसी 461111 म.ू.

फोन. 07572 243090


(मो.) 09424487068