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कहानी

हरे राम की डायरी शेली ख]ी


कलम की याही से िलखे शÞद को आँख क मोती फीका बना रहे थे, पर हरे राम ने न े कना वीकार िकया । फले-फले-से शÞद चोट, दद[ ै ै िलखना बं िकया और न आँसुओंने द

और दःख की रािगनी बजाते जा रहे थे । हरे राम इस रािगनी म डू बने लगा । Èया िमला ु यहाँ आकर? आँख म एक-एक कर पिरवार क हर सद य का चेहरा घूम गया । भरी े आँख और ँ धे गले से आशीवा[द दे ता माँ का चेहरा सामने आया तो आकर िटक गया । उन आँख की क णा ने हरे राम क मम[ को और कचोटा । उसने साँसे अÛदर खीं ी और े च माँ-माँ कहकर माँ की क णा][ आँख म खो गया । माँ बार-बार आँसू प छते हए कहती जा रही थी, ‘‘बेटा-भारत बड़ा ही नहींसुÛदर दे श भी , ु ु है । अपने ही दे श जैसा । यही िहमालय वहाँ भी है । सब कछ ऐसा ही िमलेगा । अपने जैसे ही लोग होते ह वहाँ-सुÛदर, Üयारे और भोले । तू जब वहाँ िकसी क खेत क पास े े जाएगा न तो लगेगा अपने ही खेत म खडा है । मालूम है वहाँ िशवराि], होली, दीपावली, दशहरा, भाई दज सब मनाया जाता है । जब ×यौहार आएगा तो तुझे लगेगा िक तू अपने ू ही दे श म अपने ही घर म है । समझ लेना बस, दसरे गाँव आ गया है जैसे-जनकपुर । ू े हम तुझे दर नहींभेज रहे ह बेटा‘‘ और माँ फफक पडी । आगे बढ़कर हरे राम माँ क गले ू लग गया । पर बोला कछ नहीं। ु माँ समझ गयी-अभी सं य है मन म । श धीमे से कपाल चूमते हए समझाने लगी, ‘‘रामा, िबहार ही तो जा रहा है तू । पता है , कहीं ु दसरे दे श जाने पर बड़ी चौकसी बरतनी पड़ती है । सरकार की अनुमित िमली तो जाओ ू वरना बैठो । पर नेपाल से पड़ोस क िबहार जाने म कोई िदÈकत नहींहै । वहाँ काम े अिधक नहींहोगा और पैसे भी ठीक िमलगे । तू खुद को अकला मत समिझये । चाचा े ृ तो ह ही । मािलक लोग से पूछ क जब चाहे चाचा से िमल लेना । और....... िचट◌ी े ृ िलखना तो जानता ही है मन न लगे तो िचट◌ी िलखाना । अगर मािलक क घर फोन े

हआ तो वीरे Û] अं ल क घर फोन करना । दे ख लाएगा ज र और तू है िक रोता है ।‘‘ क े ु माँ ने िफर उसे गले लगा िलया । हरे राम िबना कछ बोले अपना सामान समेटने लगा लेिकन चेहरे का सौàय भाव बता रहा ु था िक वह आ त है । उ उसकी सोलह वष[ हो गयी है पैसे से लाचार िपता पाँचवी से ोत है । पहले हरे राम खेत म ही काम करता था । पूरा पिरवार ताव रखा । Ïयादा न वढा सक । दो बेटे और चार बेिटय का बोझ है िसर पर । आमदनी का जिरया े व प बस दो कÒठे का खेत म पसीना बहाता पर पेट भर से अिधक कछ िमलता ही नहीं। िबहार म काम करने ु वाले बध[न चाचा इस बार जब घर आये तब हरे राम को साथ ले जाने का हरे राम बाहर जाकर कमाएगा तो पैसे आएं े और बेिटय की शादी हो सकगी । पर इसक ग े े े िलए रामा को घर से, अपन से दर परदे श म रहना होगा । सोच-िवचार क बाद िपता ू तैयार हो गये । पर हरे राम ही डर गया । हरे राम चाचा क साथ िनकला । घर से िनकलते ही उसकी धड़कन तेज हो ग े । पता

नहींÈया काम िमलेगा? पता नहींकसे लग ह गे? माँ ने िखड़की क पास आकर आवाज ै े लगाई-‘‘डिरयो मत बेटा ! कोई िदÈकत हो तो चले आइयो ।‘‘ और वह चाचा क साथ े े अपनी जÛम-भूिम ‘इनरवा‘ को छोड़ चला । जÛम-भूिम क ित आदर या ^ ा का भाव ं अब तक कभी उसक मन म उदय नहींहआ था । अभी चाचा लौÈहा जाऍगे । िकसी े ु पिरिचत से िमलना है िफर भारत या िबहार की तरफ चलना होगा । चाचा अपने दो त क े बारे म बताते रहे और हरे राम अपने पिरिचत शहर जनकपुर, वीरगं , इनरवा, लौÈहा आिद ज े से िबहार क काãपिनक शहर की तुलना करता रहा । कभी उसक िदमाग म पटना का े अÈस उभरता, कभी िदãली का पर, चाचा तो िकसी दसरी जगह रहते ह । वह नाम याद ू करने की असफल कोिशश करता रहा । उसकी उàमीद क िवपरीत लौÈहा म चाचा का काम आधे घंे म ही ख×म हो गया । अब े ट हम िबहार चलगे सुनकर उसकी धड़कन िफर से तेज हो गयी । बस म बैठा तो बस परायी-सी लगी । यही तो पराये शहर लेकर जाएगी । बस चल पड़ी । वह िखड़की से ू बाहर झाँकता रहा । पेड़-पौधे, तालाब, लोग पीछे छटने लगे । वह मं मुÊध दे खता रहा । ] इतना सौÛदय[-बोध उसे जीवन म कभी नहींहआ था । वह अपलक िनहारता रहा-अपनी ु जÛम-भूिम को । बीच-बीच म एक टीस-सी उठती थी-वह जा रहा है अपने वतन को छोड़कर । माँ की बात याद आयी-वहाँ लोग अपने जैसे ही ह गे । उसका मन भर आया । ू इÍछा हई मातृभूिम को नमन कर ले । ऐसी दे शभि , इतनी किशश, आह कसे छट रहा है ै ु दे श ! बगल म बैठकर उं रहे चाचा ने बताया, हम िबहार म वेश कर रहे ह । हरे राम घ

नयी फजा को अपलक िनहारने लगा । महसूस करने की कोिशश करने लगा उस अपनेपन को जो माँ क मुतािबक यहाँ भी िमलेगा । आधे घंे तक नये सौÛदय[ का रसपान करने े ट क बाद वह बुदबुदाया, ‘‘पता नहींिकतना अपना होगा, िकतना पराया ।‘‘ े , एक धÈक क साथ बस े े की । Èया मंजल आ गयी, उसने सोचा । नीचे उतरने क बाद ि े

चाचा को दसरी बस की ओर जाते दे ख उसने पूछा-‘‘हम अभी नहींपहं े ह?‘‘ ‘‘अभी?‘‘ ू ुच चाचा हस पड़े - ‘‘पाँच घंे और लगगे । ये तो खुटौना है । मधुबनी का एक शहर । हम ट मुजÝफरपुर जाएं े, बडे शहर म ।‘‘ उसने घूमकर पीछे दे खा और इन खुटौना और मधुबनी ग शÞद को अपनाने की कोिशश की । चाचा की आवाज पर वह पलटा । चाचा सामने की बस म चढ रहे थे । इस बस म एक भी चेहरा अपना या पहचाना नहींलगा । मन ही मन वह मुजÝफरपुर का खाचा खीं ने लगा । Èया ऐसा ही होगा, खुटौना जैसा या अपने च वीरगं जैसा । हाँ, वैसा ही तो अÍछा है । गाड़ी बीच-बीच म कती, लोग चढ़ते-उतरते । ज वह अपने ही Éयाल म खोया रहा । यहाँ की सड़क इतनी खराब Èय है वह समझ नहीं पाया । बडे शहर जा रहे ह, सड़क दे खकर तो नहींलगता । अब वह सोच-सोचकर थक चुका था और मंजल को जãद पा लेना चाह रहा था । इस बार बस ि मु कराए । ‘‘चल उतर बेटा, पहं गए ।‘‘ ु ुच िरÈशे पर बैठकर वह चाचा क डे रे पर आया । हरे राम को शहर, सड़क यहाँ तक िक चाचा े का कमरा भी पराया लगा । हाँ, चादर की बुनावट, टोकिरयाँ, डÞबे और परदे ने घर की याद िदलाई । ‘‘खाना खाकर सो जाओ, म थोड़ी दे र म आता हं ।‘‘ बाहर से मँगवाया ू िटिफन हरे राम को दे कर वे चले गये । भोजन का वाद तो दसरा था ही, पानी का ू वाद भी अपना नहींलगा । थकान काफी हो गई थी इसिलए सो गया । सुबह जब वह जागा तो चाचा तैयार हो चुक थे ।उसे जगा दे ख बोले, ‘‘चल, तू भी तैयार हो जा । जब तक े तुझे काम नहीं िमलता मेरे साथ चल ।‘‘ वह दकान िमठाई की थी । सजी और खुशबू से भरी । चाचा पुराने और वफादार होने क े ु कारण कश काउं पर बैठते ह । हरे राम भी बैठा । िदन भर दकान म आते-जाते \ाहक ै टर ु को दे खा । तरह-तरह क लोग थे । कसे ये अपने हो सकते ह इनकी तो शÈल ही अलग े ै है , उसने कई बार सोचा । रात नौ बजे दकान बं हु ई तो वह चाचा क साथ उनक एक द े े ु कमरे क घर म लौटा । िदन भर बैठा-बैठा थक गया था इसिलए झटपट सो गया । दसरे े ू िदन िफर वही िदनचया[ । दोपहर को अं र से खाना खाकर जब वह चाचा क पास आया द े तो वे खुश िदखे । हँ सकर कहा,‘‘बेटा! एक पिरिचत है । कल से उनक घर तेरी नौकरी े पÈकी । काम कछ खास नहींहै । तीन-चार लोग का खाना बनाना है । थोड़ा घर का ु की तो चाचा

काम भी होगा । पां सौ च

पये महीना िमलगे ।‘‘ हरे राम को कोई खुशी नहींहई । वह ु

कहाँ ठीक से खाना बनाना जानता है । धीमे से बोला,‘‘चाचा!‘‘ पर चाचा अपनी ही रौ म बोलते चले गये-‘‘वहांतीन छोटे बÍचे ह, साथ म खूब खेलना ।‘‘ बÍच और खेल क नाम े से वह हिष[त हआ । ु कलम सरपट दौड़ती जा रही थी और हरे राम की इकलौती डायरी क पÛन को उसकी याद , े अनुभव से सजाती जा रही थी । आज यहांदस िदन हो गए तब फस[त िमली । नहीं ु फस[त Èया िमली? वह तो दःख भुला रहा है इन कागज क अपनेपन म । उसे इस घर ु े ु का पहला िदन याद आया । वह मु कराया और कलम दौड़ चली । सुबह गोल से चेहरे ु पर िखचडीनुमा दाढ़ी तथा औसत कद वाले एक पतालीस-पचास वष य सÏजन आकर उसे िलवा गए । चाचा ने आ ासन िदया -म बीच-बीच म आऊगा िमलने । िफर कागज पर ं अपने िमठाई दकान का नàबर भी दे िदया । ु और हरे राम आ गया एक और अजनबी घर म । सबसे पहले तीन बÍचे िदखे । एक लड़का हमउ , दसरा छोटा और एक Üयारी-सी छोटी बÍची । वह मु कराया, अपनेपन से ,वे ु ू मु कराए कतुहल से । उसे पूरा घर िदखाया गया । तीन कमरे एक ु ु टोर म, एक क आँगन, एक िकचन, बरामदा, बाथ म आिद । गृह मािलक अथा[त ्अं ल (वध[न चाचा ने े इÛह अं ल पुकारने को कहा था) बोले, हरे राम, चलो झाडू लगा क िदखाओ । हम तुàहारी क सफाई दे ख । उसने झाडू उठाया और कमरे , आँगन, छत, सीढ़ी, बरामदा आिद सबको साफ िकया, िफर प छा लगाया, बत[न धोए । वह थक गया । पर अभी शु आत थी । छोटी कचन ने पुकारा, हरे राम, िकचन म आओ । वह पाँव धोकर िकचन म आया । आं ी ं ट नहींह, उनका वग[वास हो चुका है । इसिलए अं ल खुद ही खाना बनाते ह । वे बोले, क अभी दे ख लो हम कसे खाना बनाते ह । कल से तुàह ही बनाना है । हरे राम ने आलूै बगन धोए, काटे , दाल-चावल धोए । लगन से सÞजी बनना दे खता रहा । यहाँ तो सÞजी अलग तरीक से बनती है । पर े ×य¢ म उसने कछ नहींकहा । खाना तैयार होने पर ु उसने सबक िलए खाना परोसा, सबको िखलाया । िफर बत[न धोया । बाãटी म कपड़े पड़े े थे, उÛह भी धोया । तब जाकर अं ल ने आवाज लगाई और एक छोटी थाली म थोडा क चावल-दाल-सÞजी सब एक क ऊपर एक डालकर पकड़ा िदया । पेट तो उसका भरा नहीं े और िकसी ने कछ पूछा भी नहीं। भूखे रहने पर भी सं ोच क कारण वह कछ कह नहीं ु क े ु सका । शाम को सबक िलए पकौड़े बनाए । चाय भी बनाई । पकौड़े बनाते समय उसकी े भूख उबल पड़ी । पर, अं ल से पूछे िबना कसे खाए, सोचकर उसने भूख टालने की क ै कोिशश की । सबक खाने क बाद उसे एक पकौड़ा िमला । बुरा लगने पर भी वह चुप रहा े े

। तीन बÍचे छत पर खेल रहे थे । वह चुपचाप िकनारे खड़ा उÛह लालाियत करनी थी । िमलकर खाना बनाते-िखलाते और बत[न धोते Êयारह बज गए । कारखाने क सामान वाले े

से

दे खता, पहले क धुले कपड़ को तह लगाता रहा । नीचे आया तो रात क खाने की तैयारी े े

टोर म हरे राम को सोने क िलए कहा गया । कमरे म आकर े

दे खा तो चार तरफ क रै क पर सामान भरे थे । जमीन पर एक ओर पाँच-छः काट[ू न रखे े थे । दो तरफ दो पुरानी किटं मशीन रखी थीं। दरवाजे क एक तरफ दो बड़ी बोिरय म ग े लाल रखा था । बीच म थोड़ी-सी खाली जमीन थी, वहींएक टाट िबछा था । अभी वह सोच ही रहा था िक इस छोटी-सी जगह म वह सोएगा कसे, तभी कचन की आवाज आयी, ै ं हरे राम, दरवाजा अं र से बं कर लीिजएगा । उसने पलटकर दे खा ज र पर बोला कछ द द ु द नहीं। दरवाजा बं करने से तो साँस लेना मुि कल होगा, सोचता हआ वह अं र आया द ु और िखचड़ी खोलने की कोिशश करने लगा । मशीन की वजह से िखड़की का दरवाजा थोड़ा ही खुल सका । जब वह लेटा तो पाँव पूरा खोलने म िदÈकत आयी । िकसी तरह े ितरछा होकर लेट सका । माँ-बाबूजी तथा नये घर क बारे म सोचता हआ वह काफी दे र ु म सो सका । दरवाजा खटखटाने की आवाज से हरे राम की नीं खुली । आधी रात क समय मुझे Èय द े उठाया, सोचता हआ दरवाजा खोला तो सामने अं ल खड़े थे-इतनी दे र तक सोते ह हरे राम क ु ! दे िखए, सवा चार बजे ह, कम से कम चार बजे तो उठना ही पड़े गा । हरे राम की समझ म नहींआया । अभी-अभी तो सोया था । इतनी जãदी चार कसे बज ै गए । उसने आकाश की ओर दे खा, पर कछ समझ म नहींआया । इतनी सुबह उठने की ु आदत होती तो ज र समझाता । घर म सबसे अिधक सोता था -साढ़े छह बजे तक । खैर, उसने आँख म पानी क छींे मारे । नीं वाकई पूरी नहींहई थी Èय िक पानी डालने े ट द ु की वजह से आँख जलने लगीं। अहले सुबह यहाँ कौन-सा काम होता है , समझने क िलए े वह अं ल क सामने खड़ा हो गया । क े तुम कभकरण हो? एक तो इतनी दे र तक सोते हो, उठाया तो खड़े खड़े ही सोने लगे । चलो, ुं पहले बरामदा, आँगन म झाडू लगाओ िफर िकचन म झाडू -प छा दोन । और आलसी की तरह काम नहींकरना है । बउआ लोग क िलए ना ता बनाना ह । िनहायत खे े अं ल ने िझड़का । क वर म

सकते म आये हरे राम क पैर सीढ़ी क नीचे बने रै क की ओर बढ़े । झाडू उठाया और े े भरसक तेजी से काम शु िकया । िकचन की ओर जाते समय बÍच क कमरे की ओर े नजर पड़ी, सभी सो रहे थे । हम उ धीमे मधुर त ण भी । बताए गए काय[ समा कर वह अपने वर म बोला, प छा लग गया । सÞजी Èया बनाऊ◌ॅ ? ◌ं

तुàहारी खोपड़ी म भूसा है ।दस बार समझाना पड़े गा? एक बार बताया िक बउआ लोग कल जाऍगे ना ता बनाना है , तब समझ म नहींआया । कल ही न खाना बनाना ू ं िसखाये ह । िदमाग खा जाओ, सबेरे-सबेरे मेरा । अरे जाओ, आलू उबालो, आटा गुं ो । थ िफर खाने क िलए रसीली और िटिफन ले जाने क िलए सूखी सÞजी बनाओ । कचीनुमा े े ं आँख को फलाकर लगभग चीखने ही लगे अं ल । ै क अभी सÞजी अÍछी तरह से बनी भी नहींथी िक बÍच को उठाने तैयार कराने का िनदश िमला । सबको उठाकर उनका िब तर ठीक कर हरे राम मोटर चलाकर पानी भरने गया । यहाँ क पानी की कोई टं ी नहींहै । बस एक नेपाली मोटर है िजससे सÜलाई वाला पानी आसानी से िखं जाता है । अब पानी तो भरकर रखना ही होगा और हरे राम क िसवा है ही कौन? च े एक भरी बाãटी बाथ म म तथा एक आँगन म, दो िकचन म रख वह ना ते क िलए े पराठे सकने लगा । ना ता बनाने, िखलाने म ही हरे राम थक गया । तीन उसे बार-बार दौड़ते । बÍच क े कल जाने क बाद बाकी कमर तथा छत की सफाई की । पहले तãले ू े पर लहिठय (लाख की चूडयाँ) क डÞबे बनाने का कारखाना था । उसकी सफाई भी े हरे राम को करनी थी । क- ककर दो बार जàहाई आयी तो हरे राम सीधे खडे होकर अं डाई लेने लगा तािक ग नीं और थकाना दोन दर हो जाऍ ं। तभी एक जोरदार गज[ना हई , िबना काम िकए ही द ू ु बैठ क दे ह अइठ रहा है ? वह घबराकर सीधा खड़ा हो गया । पास आकर अं ल बोले, े क लगता है तुम बहत आलसी हो, लेिकन यहाँ रहना है तो हमारे तौर-तरीक से चलना पड़े गा े ु । बैठ क दे ह अइठने से काम नहींचलेगा । जãदी से मेरे िलए पराठा सेको । साथ-साथ े दोपहर का खाना भी बनाते चलो । बउआ लोग का कपड़ा भी धो लो । बताए गए काय[ समा करने म दस बज गए । वह अब नहाना चाहता था । पर कल से

अब तक क बता[व क कारण वह ऐसा िबना आ£ा क नहींकरना चाहता था । िकचन क े े े े कोने म खडे होकर वह सोचने लगा - अपना घर आिखर अपना ही होता है । काम करो

या न करो । जैसे चाहो बैठो, चाहे जैसे रहो । घर म

नेह, अपनेपन की धारा बहती रहती

है । सारे घर की वायु उसी गं से पूिरत होती है । तभी तो अपने घर म आदमी हर ध पिरि थित म खुश रहता है । साथ ही मन न लगने की ि थित भी कभी नहींआती है । इस घर म Èया अपना कह सकने लायक अपनापन है ? उसने नाक िसकोडा, साँस खीं कर च सूं ने की कोिशश की िक शायद पता चले । अचानक आवाज आयी- हरे राम! हाथ-पैर धो घ लो, चाहो तो नहा लो । फिãलत-सा हरे राम दौड़ पड़ा । पानी का पहला मग जैसे ही ु अपने ऊपर डाला उसे िमनी की याद आयी । हाथ क गया । उसे नहाते समय िशव-िशव कहने की आदत थी । जब भी वह नहाता िमनी ताली बजा-बजाकर हँ सती । िझलिमल ु क आँख क साथ मु कराकर वह िफर नहाने लगा । अभी कपड़े पहन ही रहा था िक अं ल े एक Üलेट म रात की बची तीन रोिटय क साथ सÞजी लेकर आए । Üलेट उसकी ओर े बढ़ाते हए कहा, यही सब छोटा-मोटा काम करते हए Êयारह बजा दीिजएगा तो और काम ु ु कसे होगा? जãदी से ना ता कीिजए और छत पर आना है । ै ऊपर कारखाने म? मुझे वहाँ भी काम करना होगा? सोचता हआ वह खाने लगा । ऊपर ु आठ-दस छोटे -बडे लड़क काम कर रहे थे । कोई काड[ बोड[ काट रहा था, कोई लेई लगाकर े पÛनी िचपका रहा था । कोई ढÈकन मोड रहा था । कोई सूखे डÞब को एक पर एक गा, रखकर बं ल बना रहा था । चार तरफ नजर दौड़ता हआ वह सोचने लगा, म Èया क ं ड ु मुझे तो ये सब आता नहीं। तब तक अं ल की नजर उस पर पड़ गई । कहने लगे, क आदमी िनहारने क िलए थोड़े ही बुलाया गया है । ढÈकन कसे मोड़ा जाता है सीख े ै लीिजए । और बैठ क मोिड़ए । े ढÈकन मोड़ना कोई िवशेष मुि कल नहींथा । हरे राम दो-तीन बार क े यास से ही सीख

े ं गया । वह बैठकर ढÈकन मोड़ता रहा । थक जाने क बाद तक । नीचे से कचन ने उसे ु पुकारा तब उसी छÒटी हई । नीचे आँगन म उसका खाना परोसकर रखा था । खाना खाने ु े े क बाद बÍच क िलए शाम का ना ता बनाना था Èय िक तीन बज चुक थे । सूजी का े हलवा बनाकर सबको िखलाने क बाद उसने चाय बनायी । अं ल को चाय दे कर खुद े क बत[न साफ करने गया । अभी कपड़े उठाने ह । कारखाना बं होगा तो सारे सामान को द åयवि थत करना है । िफर रात का खाना बनाना है । सोऊ◌ॅ गा कब? अभी भी नीं आ ◌ं द रही है । अपने काम का िहसाब लगाते-लगाते वह अÛयमन क हो उठा । लगा िक बत[न धोना छोड़कर थोड़ा सो ले । पर Èया ये सàभव था? अभी जूत पर पॉिलश लगानी थी । रात को सारे काम िनपटाकर जब वह सोने क िलए जाने लगा तो टे बल पर रखा अखबार े पढ़ना उसे पसं है । वह िहÛदी तो पढ़ ही लेता है । Èया पता नेपाल की कोई खबर छपी द

हो । इसी कमरे म उसका एकमा] थैला भी रखा था िजसम चारा कपड़ क अलावा एक े डायरी और पेन भी थी । यह डायरी उसे म सवा[िधक अं क ा िकये तो ाण से अिधक ि य थी जब उसने पाँचवी क¢ा कल सिहत सारा मोहãला खुश हो गया था ।सबने उसे ू

पढ़ाई जारी रखने की सलाह दी थी । वह खुद भी िकतना लालाियत थ पढ़ने को । पर ू पैसे कहाँ थे? छट ही गई । उसी िदन तो पड़ोस क िवरे न] अं ल, जो डॉÈटर ह, ने खुश े क होकर एक डायरी और कलम दी थी िजसे हरे राम ने आज तक सàभाल क रखी है । े अं ल की बात उसने गाँठ बाँधी थी िक जब भी मौका िमले, िवशेष अवसर को डायरी म क अंकत करो । जब भी कोई िवशेष खुशी होती या जब भी डाँट पड़ती उस िदन उसे उसक ि े जÏबात डायरी को समिप[त हो जाते । उसने डायरी उठा ली । नये दे श का अनुभव........। पहले थोड़ा अखबार पढ़ ले िफर इतमीनान से डायरी िलखेगा, सोचते हए उसे अखबार ु खोला ही था िक त ण आया । हाथ म अखबार दे खकर \ोध से बोला, आप रात म पढ़ाएगा? िबजली िबल नहींबढे गा? पेपर इधर दे दो और लाइट बं करक चुपचाप सो द े े जाओ । िफर खुद ही हरे राम क हाथ से पेपर लेकर लाइट ऑफ कर दरवाजा सटाते हए ु चला गया । बं कमरे क नीम अ◌ॅ ं ेरे म िलखना तो Èया ठीक से सोचने म भी मुि कल आ रही थी द े ◌ध । हरे राम मन मारकर सो गया । िपछले िदन की तरह आज भी सुबह चार बजे उठना पड़ा और वही िबना एक ¢ण िव^ाम क सारे िदन की मेहनत । आज ना ते क समय े े हरे राम ने तय िकया था िक रोज-रोज आधे पेट खाते रहना ठीक नहींहै । आज वह एक रोटी और माँग लेगा । ना ते क समय िसफ िहàमत जुटाने की कोिशश करता रहा । इस े [ सोच-िवचार म भली कार खाया भी नहींगया । दोपहर को ज र माँगूं ा सोचते हए वह ग ु का । बोलने की कोिशश की पर िहàमत दगा दे अपने काम म लग गया । शाम क साढ़े तीन बजे खाना िमला । अब बोलता ह, अब े बोलता ह सोचते-सोचते वह कई बार क े गई । बत[न धोकर कपड़े उठा लेना, कहते हए अं ल बाहर िनकल गये । खाना खाने क ु बाद उसने दे खा अं ल बाहर ह बौर बÍचे छत पर । दबे पाँव वह वह बरामदे म गया । क पेपर उठाया और आँगन म एक ओर बैठकर पेपर खोला-दै िनक िहं ु तान । वह जãदीद ूढ जãदी ढं ने की कोिशश करने लगा-अपने दे श की कोई खबर हो,न हो तो कम से कम मनीषा कोइराला की कोई फोटो या खबर िदखे । हडबडाहट म शÞद धुधले िदखाई दे रहे ं थे ।फटाफट पलट कर सारे पÛने दे ख िलये । कछ खास िदखा नहीं। जãदी से पेपर ु वापस उसी टे बल पर रख आया, कोई दे ख न ले । िफर अपने काम म लग गया, पर डायरी िलखने का अवकाश वह नहींपा सका ।

वह शु

से ही काम क े

ित समिप[त रहा है । यहाँ भी वह हर काम पूरे मन से करता है

। लेिकन थोड़ी-सी चूक या दे र हो जाने पर उसक गािलयाँ िमलतींऔर िनकाल दे ने की े धमकी भी । अजीब लोग ह, जब कोई आस-पास हो तो Üयार से बात करते ह-हरे रामजी । ऐसे तो मुझे आदमी ही नहींसमझते ह । इधर चार िदन से सुबी क काम म एक नया े काम भी जुड़ गया है -त ण की साइिकल को उसक े कल जाने से पहले कपड़े से प छना ू भूल गया और ना ता बनाने लगा । ना ता करक हाथ धोते समय त ण की साइिकल पर े पड़ी तो वह गु से से आग बबूला हो गया । एक नं र क कामचोर हो, अभी तक साइिकल ब े नहींप छा है । सात बज गया और ले दे क कÍची जली सÞजी ही बन सकी है । पाँच े सौ पये Èया ी म लेगा? डे ढ़ सौ म तो लोग इससे Ïयादा काम कर दे ते ह । वह आगे सुन नहींसका । अभी-अभी तो ना ता करते समय वह कह रहा था िक आज सÞजी बहत ु बिढ़या बनी है और अभी? साइिकल तो म अब भी प छ सकता ह; अभी तो उसने कपड़े भी नहींबदले ह । जूते पहनने,कघी करने म भी तो समय लगता है , लेिकन ं जवाब न दे कर वह चुपचाप साइिकल प छने लगा । िदन म कपड़े धोते समय बाहर कछ शोरगुल सुनाई िदया । कछ लोग क साथ एक ु ु े औरत की आवाज भी आ रही थी । कतूहलवश वह दरवाजे से बाहर झाँक कर माजरा ु च क समझने की कोिशश करने लगा । तभी पीछे से उसका टी-शट[ खीं ते हए अं ल ने कहा, ु अब ये बाहर की हवा भी लग रही है ? चुपचाप जो अपना काम कीिजए । िबना कोई जवाब ि िदये वह आकर कपड़े धोने लगा । इधर अं ल ऑल इंडया रे िडयो की तज[ पर बोलते रहे क से े े । उसे तो आलसी, कामचोर की उपमाओं नवाजा ही साथ उसक सारे खानदान क िलए बुरी-बुरी बात की । िफर कहा, इसी तरह आलसी बन क काम िकया तो घर से िनकाल े ै दगे । हरे राम की भूरी छोटी आँख म आँसू आ गए । कसे झूठ बोलते ह ये? सारे िदन तो काम ही करता ह उसने सोचा और जãदी से आँसुओंक बीच ही काम िनपटाने लगा े तािक िफर न रे िडयो बज उठे । कारखाने म काम करने म आज उसका मन लगा । दरअसल आज सबने उससे बात की । इधर-उधर की हãकी-फãकी बात से उसका मन कछ हãका हो गया, सुबह की दोन ु ु झड़प वह भूल गया । खाने म भी जो िमला उसे सं ु त भाव से खाया । शाम का ना ता बनाते समय वह धीरे -धीरे गुनगुना रहा था । बÍचे खेलकर आ चुक थे और टी.वी. दे ख े रहे थे । ना ते की Üलेट सबको पकड़ा दे ने क बाद वह भी एक ओर खड़ा हो गया और े चूहे-िबãली क खेल वाला े ो\ाम दे खने लगा । दोन की झड़प पर बÍच क साथ वह भी े खूब हँ सा । िफर बोला, तुàहारे टी.वी. म काट[ू न ही आता है , गाना नहींआता ह? त ण ने ×य¢तः कोई

एक गाने वाले चैनल को ऑन कर िदया । सभी िहÛदी िफãमी गान की

वरलहरी म खो

गये । तभी अं ल आ गए । अब नौकर जैसा अदना जीव का टी.वी. दे खना वे कसे क ै बदा[ त कर सकते थे । सो एक थÜपड़ रसीद करते हए कहने लगे, मेरे िलए चाय Èया ु तेरा बाप बनाएगा? बाँये हाथ से गाल सहलाता और दाँये हाथ से आँसू प छता हरे राम िकचन म चला आया । उसकी इÍछा हई िक बोल दे , आफ नहींरहने पर चाय िकसक े ु िलए बनाता? पर चुप ही बना रहा । अब उसकी इÍछा हो रही थी वध[न चाचा से बात कर लेता । पर उसक िदल ने समझा िदया, ऐसी इÍछाऍ ंिदल म ही रखनी चािहए । बाहर े आने पर कछ भी हो सकता है । वह चुपचाप खाना बनाता रहा और गाल क िनशान ु े े सहलाता रहा । दःख और गु से क कारण उसकी भूख िमट गई थी । उसने कहा, आज ु खाना नहींखाना खाऊ◌ॅ ं ा । उसे उàमीद थी सभी उससे खाना खाने क िलए कहगे । ◌ग े लेिकन अं ल उसे डाँटने लगे, खाना नहींखायेगा तो । िकसको ध स िदखा रहा है । मत क खाओ । दे खो, हम तुàहारी गम कसे उतारते ह?चार िदन खाना-पीना दोन बं कर दगे ै द तब सारी हे कड़ी िनकल जाएगी । हरे राम अपनी कोठरी म आ गया और सुबक-सुबक कर रोता रहा । आज दस िदन हो गये, इस घर म हर िदन मीन-मेख िनकाला जाता । जब-तब डाँट पड़ती है और आज तो क द े चार बार । वह दे र तक सुबकता रहा । अं ल और तीन बÍचे दरवाजा बं करक सो गए ू । आज हरे राम लाइट जलाएगा, िलखेगा अपनी डायरी म उàमीद का टटना । बेचारी माँ ! उसे माँ पर गु सा नहींआया । उसका Èया दोष? उसे तो लगा थ यहाँ अपने जैसे लोग ह गे । आज वह माँ को िचÓठी भी िलखेगा । कल जब सÞजी खरीदने जायेगा तो डाल दे गा । डायरी से सं ु त होने क बाद िचÓठी म सारा हाल िलखा । िफर लगा िक पढ़कर माँ घबरा े

जाएगी इसिलए उसे फाड़कर एक छोटी-सी िचÓठी िलखी-म ठीक ह, पर मनप नहीं े लगता,बस । कागज पर गम िलख लेने क बाद वह काफी हãका महसूस करने लगा । अब उसे नीं आ रही थी । िदन- ितिदन हरे राम काम क द े ित समिप[त होता गया । अब उसक तौर-तरीक खाना पीने बनाने को ढं दे खकर यह कहना मुि कल था िक वह बाहर े े ग से आया लड़का है । पर उसक साथ घरवाल का ितर कार पूण[ åयवहार दे खकर आसानी े से पहचाना जा सकता था िक वह इस घर का सद य नहींहै । सभी आने-जाने वाले हरे राम की फत और लगन दे खकर कहते काश! ऐसा सुघड़ लड़का हम िमलता । जवाब ु म हमेशा अं ल उसक आलसी और कामचोर होने का रोना शु क े कर दे ते । कहींकाम म लगा हरे राम यह सब दे ख-सुनकर अ×यं ¢ुÞध हो उठता । एकमा] डायरी क अलावा त े

कोई ऐसा नहींथा िजसक साथ वह अपना गम बाँटता । जब भी चाचा से बात करना े चाहता, कोई बात ही करने नहींदे ता । जब कभी चाचा का फोन आता, आसपास कोई न कोई ज र होता । कभी वह चाचा क पास जाना चाहता तो ये लोग जाने ही नहींदे ते । े एक बार चाचा िमलने भी आये पर अं ल एक िमनट क िलए भी वहाँ से नहींहटे । क े उससे ही चाय बनवाकर चाचा को िपलवाया । उसक सामने ही झूठी बात कहने लगे, वध[न े जी, हरे राम एकदम आलसी है । िदन भर टी.वी. दे खना चाहता है । धीरे -धीरे सु त की तरह काम करता है आिद आिद । सुनकर उसका मन ची×कार कर उठा-झूठ,झूठ । सब झूठ है । पर जब वध[न चाचा ने भी उसे ही डाँटना और समझाना शु िकया तो उसका ू ू क कलेजा टक-टक हो गया । लाख रोकने पर भी आँख से आँसू िनकल ही पड़े । तब अं ल कहने लगे दे िखए, सबसे खराब आदत यही है । गलती करता है और कछ समझाइए तो ु े े रोकर िदखा दे ता है । और अिधक दे र तक यहाँ बैठना उसक वश क बाहर की बात थी । वह उठा और िकचन म चला आया । दशहरा शु हो गया है । आ×मीयता की Üयास इन िदन और बढ़ गई है । साथ ही अपने

घर और अपने दे श की याद भी खूब आ रही है । हरे राम Èया करे ? इस घर म भी नवराि] मनायी जा रही है । पर अपने घर वाली बात यहाँ कहाँ? वह सारे काम करता है पूजा थल को धोना-प छना भी उसी क िजàम ह । उसकी बड़ी इÍछा है वह भी माँ की े ू साद बना या छ सकता है । वह गैस प छकर साद की तैयारी साद बनाते पूजा करे । कम से कम दो-चार फल ही चढ़ा ले । पर वह नौकर का नौकर ही ठहरा । न ू पूजा कर सकता है न कर दे ता है । उसक बाद अं ल उसे बाहर िनकल जाने का आदे श दे कर खुद े क

ह । दास को पूजा का Èया अिधकार? आज अ मी की महापूजा है । आज कवारी ुं े कÛयाओंकी पूजा होती है । िपछले सात िदन क åयवहार को भूला हरे राम आज खुश है । पूजा न कर सकगा तो Èया हआ मन ही मन दे वी की वं ना कर लेगा । आज वह सुबहे द ु सुबह ही नान कर लेना चाहता है । पर अवकाश कहाँ था? िफर भी पानी भरते समय उसने हाथ-पाँव अÍछे से धो िलए । झाडू -प छा लगाकर वह बत[न धो रहा था । पूजा क े िलए िजतनी तैयारी का िनदश उसे िमला था उसने सब कछ पूरा कर िदया है । धुले ु बत[न को लेकर वह िकचन म पहं ा । गैस पर हलवे की कड़ाही चढ़ी थी । अं ल वहाँ क ुच नहींथे । हरे राम ने दे खा गैस तेज है , और हलवा कड़ाही म िचपकने लगा है । उसने बाहर िनकलकर दे खा अं ल नहींथे । सोचा य ही छोड़ दे ने से हलवा जल जायेगा, चलकर गैस क बं कर दे ना चािहए । अं र आकर उसने नॉब को हाथ लगाया ही था िक अं ल आ पहं े द द क ुच । जोरदार चाँटा मारकर कहने लगे, पूजा का ु साद तुमने Èय छआ? हरे राम दे वी की दहाई ु ु दे कर कहने लगा -‘‘मने िसफ गैस का नॉब छआ है ।‘‘ पर अं ल कछ सुनने को तैयार [ क ु

नहींथे । कड़ाही उठाकर नीचे फक िदया । िफर हरे राम से गैस साफ करवाया । दसरी ू कड़ाही लेकर िफर से हलवा बनाया साथ ही हरे राम को गािलयाँ दे ते जाते थे । उस िदन हरे राम को सारे िदन खाना नहींिमला,रात को भी नहीं। वह रात भर जागता और सुबकता रहा । उसने तय िकया यहाँ नहींरहं ा िकतना िजद िकया था उसने दशहरा म ूग घर जाने क िलए । पर अं ल नहींमाने । े क आज हरे राम बहत खुश है । सुबह-सुबह ही वध[न चाचा का फोन आया है । अगले बुधवार ु को हमलोग नेपाल चलगे । हे , हे अब िदपावली म अपने घर म रहगे, हरे राम चहका । खुशी क कारण चाचा से Ïयादा बात भी नहींकर सका । आज उसक पैर म पं लगे थे े े ख और हाथ म जाद ू । सारे काम वह इतनी जãदी- जãदी िनपटा रहा था िक अपने ऊपर उसे खुद आ य[ हआ । ु शाम को वह सÞजी लेकर लौटा । रोज की तरह अं ल िहसाब पूछने लगे, ‘‘बगन कसे क ै िमला ?‘‘ ‘‘जी, छह पये िकलो‘‘ , उसने सं¢ ि जवाब िदया । पीछे से त ण ने एक पये म? ज र एक पये की ितवाद िकया । पये थÜपड़ लगाया-रोज पाँच पये िकलो िमलती है । आज छह

टॉफी खरीदी होगी । नहीं ,नहींआज से दाम बढ़ गया है , उसने धीमे से अÍछा आलू? त ण ने पूछा । आठ थे, आज आठ

पये । िफर झूठ बोलता है , कल तक साढ़े सात

पये हो गये?-कहते हए अं ल खड़े हो गये । िफर Èया था अपने पौ ष क क े ु

दश[न का इससे अÍछा मौका और हरे राम से उिचत पा] उÛह Èया िमलता? इसी से लात -घूस से उसे र द डाला । जब थक गए तो छोड़ िदया । हरे राम क ण वर म रो पडा तो जोरदार डाँट पड़ी- चुप, रोना बं और चाय बना ला । द

हरे राम अपने जÉम सहलाता उठा और िनदश का पालन िकया । रात को खाना खाने की उसकी िबãकल इÍछा नहींथी पर और डाँट न पड़े , इसी से चुपचाप दो रोिटयाँ खा ली । ु आज हरे राम क घर लौटने का िदन है । वध[ना चाचा नौ बजे आऍगे । उससे पहले उसे े ं ना ता-खाना बनाकर अपना सामान समेटकर तैयार रहना है । उसने अपने चार कपड़े अपने थैले म डाल िलये । त ण की एक पुरानी टी-शट[ उसे पहनने को िमली थी, उसे भी रख िलया । कल उसे नये कपड़े खरीदकर िमले थे । कचन ने वही पहनकर जाने को ं कहा । एक बार तो सोचा, ये इतनी छोटी होकर, रोज ही झãला-िचãलाकर बोलती है । बात-बात म बुिढ़या अàमा की तरह डाँटती है । इसक कहने पर Èय पहन ? िफर जाने े Èया सोचकर पहन ही िलये । डायरी रखते उसक जÉम हरे हो गए । उसने डायरी थैले से े

िनकाला, उसे कलेजे से लगाया और उसे यहींछोड दे ने को िन य कर िलया । अपने सोने वाले टाट क नीचे इस तरह रख िदया िक उसका कछ िह सा िदखाई दे ता रहे । चाचा क े ु े आने पर वह अं ल को णाम करक चल िदया । सब हँ स-हँ सकर कहने लगे आठ िदन क े म आ जाना । घर पहं कर उसे लगा वह ुच वग[ म आ गया है जबिक सàपÛनता उस घर म अिधक थी । ारा

माँ से िलपटकर वह आधे घंे तक रोता रहा । अपनी बहन क िलए वह वध[न चाचा ट े दी गई िमठाई क अलावा और कछ न ला सका था । लेिकन उसका रोना दे खकर उन े ु लोग ने कछ माँगा भी नहीं। रात को सब बैठे तो वह बताने लगा-सब बहत मारते ह, ु ु काम भी बहत करना पड़ता है । वह तो तेरी सूरत दे खकर ही समझ म आ रहा है , अब ु वहाँ मत जाना । ू वध[न चाचा लौट गए । त ण जब उनक पास हरे राम क बाबत पूछने गया तो दो टक े े जवाब िमला- वह नहींआना चाहता है । वह अपना मुं लेकर लौट गया । उस िदन ह हरे राम क जाने क बाद उसकी डायरी दे खी था । आज उसकी नजर िफर से डायरी पर े े

पड़ी तो उठा िलया । पÛना पलटते ही िदखा -डीयर इÛटे िलजट Þवॉय हरे राम! बे ट िवशेज फॉर योर ाइट Ýयूचर । और नीचे डॉ. वीरे Û] िलखा था । ह-हरे राम और इÛटे िलजट सोचता हआ वह आगे क पÛने पलटा तो अपना नाम दे खकर च क गया । िहÛदी म े ु िलखी उस डायरी को उसने पढ़ना शु िकया तो पढ़ता ही गया । इतना भावुक उसने खुद को कभी नहींसमझा था और न कभी इतना दःखी ही हो सका था । एक नये हरे राम से ु उसका पिरचय हआ । उसकी आँख म आँसू आ गये । अभी आँसू प छ ही रहा था िक ु पापा की आवाज सुनी , हरे राम.......! बाम उसने पूरी की, वो नहीं आएगा कभी नहींऔर , उठकर अपने कमरे म चला गया ।