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संजय िविोही का सपूण कहानी संमह : कभी यूँ भी तो हो

(टीप : पूरी पुःतक बहत
ु बड़ी है , अतः पृ$ लोड होने म) समय ले सकता है . अतः कृ पया
धैय बनाए रख).)

कभी यूँ भी तो हो

रोज मरने का शौक है िकसको?
रोज जीने का हौसला िकसम)?
एक ग ु3छा-सा साँस का अटका,
िज़ःत उलझी है आजतक िजसम)।

तुम िनकल पाओ तो बतला दे ना...

-संजय िविोही.

**********-

अनुबम

1 हम एक-
एक-से
2 झूठ के सहारे
3 कब तक आिखर?
आिखर
4 कबल
5 झुलसे सपने
6 वह
7 अनकही
8 कभी यूँ भी तो हो
9 िडःग िःटं ग
10 िवAासघात
11 उसके िलए
12 ये कहानी नहीं
13 नई सुबह
14 इEवेःटमेFट
15 कॉकटे ल

अिभमत - यशवंत Hयास
आIयान सEदभ - से.रा. याऽी
'एक आKमीय पऽ' - डॉ. दगु ाूसाद अमवाल

1 हम एक-
एक-से

रे िडयो ःटे शन से िरकॉिडN ग के बाद ऑिफस के िलए िनकला था। मोड़ से दे खा बस आ रही
है । मR दौड़ पड़ा। बड़ी मुिँकल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेिकन बस को
छोड़ने का अिभूाय था, अग ले एक घFटे तक तपती दोपहर म) बीच सड़क बेबस खड़े रहना

और चूिँ क मR ऑिफस से छVटी िलए िबना िरकॉिडN ग के िलए आया था, इसिलए भी मेरा
इसी बस से जाना आवँयक था। नाहक िकसी को कुछ कहने का अवसर दे ने से अ3छा
है , थोड़ा कW सह कर टाईम से पहँु च िलया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ म) घुसा और एक जग ह
छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो ग या। खचाखच भरी बस म) ग मX के मारे लोग Y का बुरा
हाल हो रहा था।

मुझसे कुछ दरी
ू पर एक पतली-दबली
ु युवती, िखड़की का सहारा िलए खड़ी थी। उसके एक
हाथ म) पॉिलथीन का एक बैग था और दसरे
ू हाथ से उसने िखड़की को कसके पकड़ा हआ

था। भीड़ इतनी [यादा थी िक वो लोग Y की बीच बुरी तरह फंसकर खड़ी थी। कोई और
ःथान होता तो शायद वो इस तरह नहीं खड़ी होती, परEतु महानग रीय बस सेवाओं म)
ू ग यी हR और Hयि\
सफर करना इतना कWकर हो ग या है िक वजनाएँ आप से आप टट
अित समझौतावादी हो ग या है ।

मR भीड़ म) से िकसी तरह बार-बार उचक कर बस से बाहर झाँक रहा था, ये दे खने के िलए
िक अभी और िकतना दरू है ऑिफस? तभी उस पास खड़ी युवती की आवाज मेरे कानY म)
पड़ी 'ए]स]यूज मी ^लीज, टाईम ]या हआ
ु है ?' मRने इधर-उधर दे खा, ये दे खने के िलए िक
ये टाइम िकससे पूछा ग या है ? सभी को अपने-अपने म) Hयःत पाकर जब मRने उस लड़की
िक तरफ दे खा तो वह मेरी ओर ही ू_भरी िनग ाह से दे ख रही थी। मR अिभूाय समझ
ग या और भीड़ म) से कलाई को ऊपर खींच कर टाइम बताया, 'पौने दो'। उसने मुःकुराकर
'थR]यू' बोल िदया। अब, मेरा aयान उसकी ओर ग या। यूँ भी अभी ऑिफस आने म) दे र थी।
सो मR नजर बचा-बचा कर उसे दे खने लग ा। उसने पीले रं ग का सलवार-सूट पहन रखा

'आप.. हाँ. रोको। बस की रhतार धीमी हई ु और होते-होते बस iक ग ई। मR भीड़ को धकेलता हआ ु बस से उतर पड़ा। उतर कर दे खा तो 'वो' भी मेरे पीछे -पीछे ही उतर आई थी। मR चिकत रह ग या। मR कुछ और सोचता उससे पहले ही वो बोल पड़ी. नजर िमलते ही वो मुःकुरा दे ती और नजर) घुमा लेती। दो-एक बार इस तरह हआ ु . िऽपाठी जी के ऑिफस म) ही तो मR हँू ' मRने अवग त कराया। िफर जरा iककर पूछा 'आप िऽपाठी जी को कैसे जानती हR ?' 'जी. और हम रह-रह कर एक-दसरे ू को दे खने लग े। अचानक कFड]टर िचbलाया 'सैकेशे ट .. वो घर ग ये हYग ') चलते-चलते मRने बताया। ']या? िकतनी दे र म) आ जाएँग े. लग ा घूरने। बदतमीजY की तरह।' मR पुनः बस के बाहर झाँकने लग ा। लेिकन उसका आकषण ऐसा था िक बार-बार aयान दौड़कर उसी की ओर चला जाता। मR उसे दे खता तो उसको अपनी ही ओर दे खता पाता. ऑख ं ) बड़ी-बड़ी और नाक नुकीला था। ग ेहुँ आ रं ग के चेहरे पर दोनY भौहY के बीच छोटी-सी काली िबिEदया आकषक लग रही थी। पसीने की बारीक-बारीक बूँदY से सजा उसका चेहरा िकसी ओस नहाये फूल जैसा लग रहा था। मR 'उसी' म) खोया था िक उसने मुझे इस तरह 'ताकते हए ु ' दे ख िलया। दोनY की नजर) िमली. सैकेशे ट वाले आ जाओ।' मR जैसे चgक कर बोला.था। ग ले म) हbके नीले रं ग का दपVटा ु पड़ा था। चेहरे पर अजब सौयता िमिौत सुEदरता थी. लग भग ?' उसके ःवर म) िऽपाठी जी से नहीं िमल सकने का अफसोस साफ नजर आ रहा था। 'बस आने ही वाले हYग 'े मRने घड़ी दे खते हए ु कहा। दो बज कर दस िमनट हो चुके थे। िऽपाठी जी अमूमन ढाई. पौने तीन तक आ जाते हR । 'चिलए तब तक एक-एक कप कॉफी हो जाए' मRने साथ ही जोड़ िदया। वो ःवीकृ ित म) मुःकुरा दी। हम एक चौड़े दालान को पार करके केFटीन की ओर बढ़ ग ये। . वो मुःकुरा दी। मR बुरी तरह झ)प ग या। ']या सोचती होग ी? टाईम ]या पूछ िलया. इसी ऑिफस म) अदना-सा मुलािजम हँू ' मRने मुःकुराते हए ु जवाब िदया। 'तब तो आप रामग ोपाल िऽपाठी जी को जानते हYग )' उसने जरा िजkासा से पूछा। 'हाँ. तो मन से िझझक जाती रही.. वो मेरे अंकल लग ते हR ।' 'लेिकन अभी तो लंच टाईम है . ]या यहीं काम करते हR ?' 'जी हाँ. 'हाँ-हाँ ..

सुनते ही 'वो' ग भीर हो ग ई। 'मजबूरन ]यY?' उसने पूछा। ू_ म) ग भीर िजkासा थी। ']लक की पग ार िकतनी होती है ? जानती ही हYग ी। उसम) घर चलाना बहत ु ढे ढ़ी-खीर होती है . ये . उनके जिरये महीने-दो महीने म) एक दो कायबम हो जाते हR । थोड़ा कुछ पऽ-पिऽकाओं म) ूकाशन से िमल जाता है । बस ग ुजारा हो जाता है । इसे 'मजबूरन िलखना' नहीं कहँू तो ]या कहँू ?' मR हँ सने की चेWा करने लग ा। मग र मR जानता था िक मR िवफल हो रहा हँू । ]यYिक मेरी हँ सी मेरे चेहरे के भावY से कतई मेल नहीं खा रही थी। वो अभी भी पहले जैसी ग भीर बैठी थी। 'घर म) कौन-कौन हR ?' 'बूढे माँ-बाप हR और दो बिहन) हR ।' 'आपकी शादी . ग ाता नहीं हँू । िलखता हँू । मेरी किवताओं की िरकॉिडN ग थी।' 'आप िलखते हR ? कब से िलख रहे हR ?' वो अब धीरे -धीरे अनौपचािरक हो रही थी। 'यूँ ही थोड़ा-बहत ु िलख लेता हँू । पहले शौिकया िलखता था. 'मRने आपको रे िडयो ःटे शन से िनकलते हए ु दे खा था। वहाँ कैसे?' ु 'कुछ नहीं. लंच-टाईम से कुछ पहले िनकल ग या था।' मRने टालने के-से अंदाज म) जवाब िदया। 'िरकॉिडN ग ? आप ग ाते हR ?' वो चिकत थी। 'जी नहीं. िफर आदतन िलखने लग ा और अब मजबूरन िलखता हँू ।' मRने कॉफी का एक घूँट भरते हए ु कहा। बात कहीं भीतर से िनकली थी. ये नहीं नजर आता? यूँ भी दे श की आबादी कम नहीं है । मेरा शादी नहीं करना मेरे साथ साथ दे श के िहत म) भी है . मैड म। रे िडयो ःटे शन म) कुछ िमलने-जुलने वाले लोग हR . उसको दस का नोट थमाते हए ु मRने कहा। 'ऐसा ]यY सोचते हR आप? ये ]यY नहीं सोचते िक माँ-िपताजी को बेिटयY के जाने के बाद अकेलापन नहीं खलेग ा। उनका मन बहला रहा करे ग ा।' इस बार वो हbका-सा मुःकुरायी भी। 'ये सब कहने की बात) हR । घर म) खाने वाला एक पेट और बढ़ जाएग ा. वहाँ मेरी एक िरकॉिडN ग थी। छVटी लेने की बजाए.. ' उसने थोड़ा िझझकते हए ु ू_ िकया। 'िजस भाई की दो-दो जवान बिहन) घर म) बैठी हY. ये नहीं िदखता आपको? उसके पीछे िफर और िकतने खाने वाले बढते हR . उसकी शादी करना ना तो उिचत है और ना ही आवँयक।' वेटर कप लेने आ ग या था.पहाड़ी छोकरा दो कॉफी दे ग या था। धीरे -धीरे कॉफी पीते-पीते हम बात) कर रहे थे। उसने पूछा..

उसने पलट कर नहीं दे खा। कुछ दे र बैठे रहने के बाद उठकर मR भी ऑिफस की ओर बढ़ ग या। वो िऽपाठी जी के सामने वाली कुसX पर बैठी थी। दरवाजा खुलने की आवाज से चgक कर दोनY का aयान मेरी तरफ ग या। िऽपाठी जी यथावत थे. अंकल।' वो iँ आसी हो ग ई थी। मRने नजर उठा कर दे खा. जहाँ िमलेग ा करना ही पड़े ग ा। िफर सरकारी नौकरी म) तो यूँ भी िबःतर बाँधे रहना चािहए। पापा को तो आप जानते ही हR । वो और उनके मरीज बस उनकी दिन ु या तो वहीं तक है । भैया अहमदाबाद के होकर रह ग ये हR । उEह) घर पिरवार से शायद कुछ लेना-दे ना नहीं है । अनुँका अभी छोटी है । पढ रही है . वही बहत ु है । ऐसे म) माँ की दे खभाल करने वाला घर म) कोई नहीं है . सब ठीक हो जाएग ा.]यY नहीं सोचती आप?' मRने बात को मजाक म) उड़ाने का ूयास िकया और इस बार सफल भी हो ग या। 'आप तो . काम तो यहाँ भी करना है और वहाँ भी। बस िफब है तो माँ की। आजकल उनकी तिबयत कुछ ठीक नहीं रहती।' ']या भाभी जी की तिबयत म) कोई सुधार नहीं है ?' िऽपाठी जी िचिEतत हो उठे । 'पहले से तो बेहतर है . बेटे। यूँ िहमत नहीं हारा करते। भग वान पर भरोसा रखो. मग र मेरे कान उनकी बातY पर लग े हए ु थे। 'अंकल. ये ही वजह है अंकल। वरना काम तो काम है . अंकल। लेिकन अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है । हो भी नहीं सकती. आप तो जानते ही हR । पता नहीं भग वान को ]या मंजूर है ?' उसका ःवर उदास था। 'नहीं.. वो oमाल से ऑख ं ) पgछ रही थी। . उस पर अभी से ]या िजमेदारी डाल)। वो अपना कर लेती है . अnयःत जो थे। हाँ. और िफर िजस माँ की तुम जैसी बहादरु बेटी हो उसको कभी कुछ हो सकता है भला?' 'बस.. ' वो हँ स पड़ी। 'िऽपाठी जी से ]या काम था?' मRने तुरEत बात का iख मोड़ िदया। 'िऽपाठी जी मेरे पापा के दोःत हR । एक शाँसफर कRिसल करवाना है । उसी िसलिसले म) िऽपाठी जी से िमलना था' उसने ूयोजन बताया। तभी मुझे दरू से िऽपाठी जी आते हए ु िदखाई दे ग ये। मRने ईशारे से उसको बता िदया। वो उठकर उस और चल पड़ी। िऽपाठी जी ने उसे ग ले से लग ा िलया और अपने साथ लेकर अEदर की ओर बढ़ ग ए। मR उEह) जाता हआ ु दे खता रहा. वो धीरे से मुःकुरा दी। मR चुपचाप जाकर अपनी टे िबल पर बैठ ग या और कुछ दे र फाईल) इधर-उधर करने के बाद एक काग ज टाईप करने लग ा। हालाँिक मेरी उं ग िलयाँ टाईपराइटर पर चल रही थी.

तुही यूँ भावुक हो उठोग ी तो भाभी जी को कौन सहालेग ा? बेटे. उस व\ बेटी पर आिौत माँ का पित िकतना िववश होता है ? तुम समझ सकती हो। हालाँिक iपये पैसे की कोई परे शानी नहीं है .'बस. 'जी. ये ूतीqा है । मेरी बेटी जैसी है । नग र िनग म म) जूिनयर इं िजिनयर की पोःट पर है । इसका शाँसफर िकसी कारणवश अलवर से उदयपुर कर िदया ग या है । लेिकन इसकी माँ सीिरयस है । सो ये उदयपुर जाने म) असमथ है । इसके शांसफर को कRिसल करना है । इस आशय की एक ए^लीकेशन टाईप कर लाओ . सुनो जरा' उEहYने पुकारा. मR जानता था इसिलए मR और अिधक aयान से टाईप करने लग ा। 'संदीप. बेटे। तुम जैसी समझदार और ग ुणी बेटी भग वान सभी को दे । तुम अपनी ए^लीकेशन दे आओ। मR 'िडजायर' करवाकर तुहारा शांसफर कRिसल करवा दँ गू ा। बेिफब रहो। दो चार िदन म) तुह) ऑड र पहँु च जाएँग े।' कहकर वो मेरी तरफ मुखाितब हए। ु वो ऐसा ही कर) ग ). अपने दख ु ु को छपाकर दसरY ू के दख ु को भोग ना ही तो स3चा पुFय है । मR ]या नहीं जानता िकस तरह अिभषेक शादी के बाद अलग होकर अहमदाबाद जा बसा। ]या उसका यही फज बनता था. बस. जो इतना कुछ सहने के बावजूद भी कुछ कहते नहीं हR । बस. ऐसे िदल छोटा नहीं करते। तुम तो बहत ु बहादरु लड़की हो. एकलौता बेटा होने के नाते? तेरे पापा. युवती भी घूमकर मेरी ओर दे खने लग ी। मR उठकर िऽपाठी जी की टे िबल के पास आकर खड़ा हआ। ु मेरे हाथ म) नोटबुक और पेन था. सर।' मRने धीरे से कहा। 'संदीप. बीणएण ् ्का। उसकी पिरqाएँ भी िसर पर हR । उसकी पढ़ाई म) हज होग ा। मR उसको इस समय पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं करने दे ना चाहती।' 'मR तुहारी भावनाओं की कि करता हँू . अंकल। पापा अपनी जग ह सही हR । तभी तो उनसे कुछ कहते नहीं बन पड़ता। उEहYने तो मुझे शाँसफर कRिसल करवाने को भी नहीं कहा। कह रहे थे िक अनुँका दे ख लेग ी माँ को। पर अंकल अनुँका का अब के अिEतम वष है . मग र अपनY की दे खभाल भी तो कुछ माने रखती है िजEदग ी म)। ऐसे म) वो मरीजY को ःवःथ करने म) अपने को झgके हए ु है और खुद एक अदे खे रोग का मरीज होता जा रहा है . चुपचाप खून के घूँट पीते रहते हR ।' िऽपाठी जी भी भावुक हो उठे थे। 'मै समझती हँू . बेटे जानती हो बहत ु महान हR । वो खुद ]या दoखी ु नहीं हR बेटे के Hयवहार से? उसने ]या इसी िदन के िलए सपने सजाये थे? अब जब सेवा करने के िलए घर म) बहू होनी चािहए. बेटा?तुमको ग व होना चािहए अपने पापा पर. भीतर ही भीतर। उसके जैसा आदमी कहाँ पाओग ी.

ये जoर नहीं बताया था मRने। सो. ये तुह) िबठा आएग ा।' िऽपाठी जी ने कहा। वो कुसX से उठ खड़ी हई ु . अंकल'। उसने िवरोध िकया। 'कोई तकलीफ नहीं होग ी. जूिनयर इं िजिनयर हँू और अपने ही शाँसफर के िसलिसले म) आई हँू . 'संदीप. 'आपने उस व\ बताया ]यY नहीं िक आप नग र िनग म म) जूिनयर इं िजिनयर हR और अपना ही शाँसफर कRिसल करवाने आई हR ।' 'ये तो मRने बताया था ना िक मR शाँसफर कRिसल करवाने आई हँू । हाँ.जbदी से।' उEहYने संिqr म) काम समझाया। 'हाँ' कहते हए ु मRने एक नजर उसको दे खा और चल िदया। थोड़ी ही दे र बाद मRने टाई^ड़ ए^लीकेशन ला कर िऽपाठी जी को दे दी। िऽपाठी जी ने उस पर उसके दःतखत कराये. उससे ]या फक पड़ता है ?' उसने मुःकुराते हए ु कहा। 'फक ]यY नहीं पड़ता? मR अनजाने म) ना जाने ]या-]या बकता रहा?' मRने अपनी हथेली को ग ौर से दे खते हए ु कहा. 'थR]यू अंकल. शायद उससे नजर) बचाकर। 'ऐसा तो कुछ आपने कहा नहीं. हम एक तरफ बRच पर बैठ ग ए। ःथान हालाँिक एकाEत तो नहीं था पर कम भीड़भाड़ वाला अवँय था। मRने बैठने के कुछ दे र बाद बात शुo की. 'इसम) थR]यू की ]या बात है ? नीिलमा म) और तुम म) कोई अEतर है ]या? मेरे िलए तुम दोनY ही बेिटयाँ हो। आराम से जाना. कुछ 'िरमाक' िलखा और अपने पास ही रख िलया। अब उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे। िऽपाठी जी ने उसको घर चलने के िलए कहा. तो उसने माँ की तिबयत का हवाला दे ते हए ु असमथता जता दी। िऽपाठी जी ने अिधक जोर नहीं ु वो मेरे पास आकर iके और बोले. कोई जoरत नहीं है इसकी। बेवजह इनको तकलीफ होग ी. कहते तो शायद बुरा मान जाती।' वो भी हँ स पड़ी। कैसी िनमल हँ सी? मR दे खता रह ग या। . िजससे मR बुरा मानूँ।' उसने ऐसे लहजे म) कहा िक मR हँ स िदया। 'हाँ. संदीप तुह) िबठा दे ग ा। पहँु च का पऽ दे ना और तेरे बाप को कहना िक कभी कभार एकाध फोन कर िलया करे ।' कहते कहते वो उसकी पीठ थपथपाने लग े। बस के जाने म) काफी दे र थी अभी. थR]यू वैरी मच फॉर िदस ूो^ट है bप।' िऽपाठी जी ने उसको सीने से लग ा िलया. ूतीqा को जरा बस ःटै Fड तक िदया। जाते हए छोड़ आओग े?' 'हाँ' मRने हामी भरी। 'नहीं.

अग र मR भी पराये घर चली ग ई तो मेरे माँ-बाप का ]या होग ा? बस अनुँका के हाथ पीले हो जाएँ . मR जड़ बना बैठा रहा। . वो िखड़की वाली सीट पर बैठी थी। मR बाहर खड़ा था। दोनY . ममी को sलड़ कRसर है ।' वो बेहद शाEत थी। कौन कह सकता था िक यही लड़की कुछ दे र पहले िखलिखलाकर हँ स रही थी? मR.'आपकी माँ की तिबयत को ]या हआ ु है ?' मRने िवषय बदलते हए ु पूछा तो वो एकाएक ग भीर हो ग ई. यही मेरी खुशी है . और वो भी िनoशsद। वEदनीय हR . ' कहते-कहते उसका ग ला भर आया. जीते जाग ते उदाहरण। जो अपने पिरवार और पिरवार वालY के िलए इतना कW झेल रहे हR । अपनी भावनाओं का दमन िकए हुए हR । ये ]या कम Kयाग है ?' 'मR पुiष हँू .. ']या?' 'जी हाँ. िबbकुल ठहरी हई ु झील-सी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा 'कRसर . छोटी बिहन पढ़ ् ्म)। ऐसे म) ममी की दे खरे ख के िलए मेरा वहाँ होना बहत रही है बीणएण ु आवँयक है इसीिलए िऽपाठी अंकल से शाँसफर कRिसल करवाने की िर]वेःट की है ।' वो मुःकुराने की कोिशश करती हुई बोली। 'ूतीqा जी.. बिbक ये है िक मेरा भाई अपनी माँ की कीमत पर अपनी भावनाओं को िजलाए है । ]या उसका कोई फज नहीं था? मR इसीिलए ही शादी-sयाह के झंझट म) नहीं पड़ना चाहती। ]यYिक. ऑख ं ) नम हो ग ई। 'ूतीqा .. िनवाक्। 'पापा डॉ]टर हR . sलड कRसर है .. आप वाकई बहत ु िहमत वाली हR । हर िकसी के वश का नहीं है इतना Kयाग ।' बरबस ही मेरे मुँह से िनकल पड़ा। ']यY नहीं है ? आप जो हR .. उसने चेहरा मेरे कंधे पर िटका िदया। मRने चुपचाप उसे अपनी बाँहY म) सहे ज िलया और वो अबोध ब3चे की तरह फफकने लग ी। ना जाने वो िकतनी दे र रोती रही... ूतीqा . नहीं होना कुछ खास अथ नहीं रखता। आप tी हR । जीवन की िवषमताओं को अकेले सहन कर पाना tी के िलए िकतना चुनौतीपूण होता है .. ]या हआ ु ? ऐसे नहीं करते। सब ठीक हो जाएग ा।' मRने उसे चुप कराने को उसके िसर पर हाथ रखा. अपने काम म) Hयःत। बड़े भैया अहमदाबाद म) रहते हR . जानती हR ? ऐसे म) इतनी पीड़ा अकेले सहना.. िनःसंदेह।' ु 'दःख कभी tी और पुiष का भेद नहीं करता संदीप जी। मेरा द:ु ख ये नहीं है िक मुझे अपनी भावनाओं की कीमत पर अपनी माँ को बचाना है . ममी को।' मR एकदम चgक पड़ा.. उसकी बस जाने वाली थी. ूतीqा जी। मेरी भावनाओं का होना...

कुछ नहीं बोल रहे थे। िनoशsद एक-दसरे ू को दे ख रहे थे। उसकी ऑख ं Y की नमी म) मुझे िकसी आAासन की चाह तैरती िदखी। मRने मुःकुराकर धीरे से पलक) झुकाकर उसे आAःत िकया. बस बढ़ ग ई। दो हाथ हवा म) एक-दसरे ू की ओर िहलते रह ग ये। (समाr) 2 झूठ के सहारे जब कोई पास नहीं होता तो जाम पास होता है । िदसबर की सद शाम) यूँ भी अकेलापन कहाँ बदाँत कर पाती हR ? बस uलास मेज पर सजाकर बैठा ही था िक डोरबेल जोर से घEना उठी। उठकर दरवाजा खोला. मानो कह िदया हो िक 'ूतीqा मR तुहारे साथ हँू ।' वो जैसे जी उठी हो। उसने दपVटे ु से ऑख ं ) पgछ ली और अनुमह भरी िनग ाहY से मुःकुराते हए ु मुझे दे खने लग ी। तभी बस चल पड़ी। मR खड़ा रह ग या. सामने स]सेना खड़ा था। दे खते ही दे खते ग ले लग ग ये हम। मRने हाथ पकड़कर मेज की ओर ख)च िलया 'स]सेना बड़े सही समय पर आए हो. चौहान।' ']यY भाई? कािफर कब से रोजे रखने लग े?' मR जोर से ठहाका मार कर हँ सा। सारा कमरा िहल ग या। ठहाका उछल कर जोर से िसर पर आ िग रा। ध^प।् मR झूम उठा। . यार।' 'नहीं। मR नहीं लूँग ा.

. नजरY ही नजरY म)। कोई जानबूझकर अपने लो-कट sलाऊज पर से साड़ी ढलकाती है . िजसने हR ग कर डाला?' मRने पीटर ःकॉच की नई बोतल की सील तोड़ते हए ु पूछा। 'नशा शराब का नहीं था दोःत. अब बता' मRने भी िग लास खाली करके िसग रे ट थाम िलया और धुआ ँ उड़ाने लग ा। कमरे म) धुए ँ के बादल मँड राने लग े। 'हमारे ]लब की हर महीने के आिखरी शिनवार को एक पाटv होती है । जहाँ यार लोग अपनी-अपनी बीिवयY को लेकर आते हR और दसरY ू की बीिवयY को दे ख-दे ख कर लार टपकाते रहते हR । िबिवयाँ भी दसरे ू मदw की िनग ाहY को हँ स-हँ स कर पीती हR . सोहबत का था।' वो जरा शरारत से मुःकुरा िदया। मRने एक uलास उसकी ओर बढाया और 'िचयस' के साथ दोनY ने धीरे से एक िसप ली। 'िकसकी सोहबत फरमा रहे थे जनाब?' मRने िसग रे ट सुलग ाकर उसकी ओर बढ़ाते हए ु कहा। 'बस पूछ मत. ' वो िकसी ःव^नलोक म) खोने लग ा। 'कहाँ जा रहा है ? धरती पर ही रह।' मRने चुटकी बजाते हए ु कहा। 'जEनत को याद कर रहा था ।' ']या बात करता है ?' 'तुमको पता है मRने एक ]लब [वॉईन कर रखा है ?' उसने बात शुo की। 'तुम रईसY के पास और काम भी ]या है ? iपया कमाते हो तो उसे िठकाने तो लग ाओग े ही. परसY हR ग ऑवर हो ग या था यार। उसी का खुमार अभी तक नहीं उतरा।' 'ऐसा कौन हम^याला िमल ग या मेरे सौदाई को. फौजी अफसर भी हR । एडवोकेट भी हR । लेखक भी हR । यहाँ तक िक ूोफेसस भी हR ।' 'सभी हR तो पैसे वाले ना?' 'तुम तो एक जग ह अटक जाते हो। अ3छा चलो सब पैसे वाले हR । अब बात तो सुनो' उसने जरा iक कर एक घूँट ख)चा। 'हाँ. तो कोई बात- बेबात नीचे झुक-झुककर कभी कुछ उठाती है . सब कुछ अपने आप ही बाहर झाँकता रहता है ।' 'ऐसा ]या?' मेरी ऑख ं ) फैलने लग ी। . उस ]लब म) िबजनेसमैन ही नहीं हR ... चौहान। महीने के आिखरी शिनवार को तो बस . कहीं ना कहीं।' 'मेरे भाई. कभी साड़ी की सलवट) ठीक करती है । कोई इतने टाइट कपड़े पहन कर आती है िक बस कुछ भी दे खने के िलए कोिशश ही नहीं करनी पड़ती .'अभी..

' वो ऑख ं Y को ग ोल-ग ोल घुमाने लग ा। ']या भाभी भी जाती है तेरे साथ यह खेल खेलने?' सशंिकत-सा मR असमंजस म) था। ']यY नहीं?' वो तपाक से बोला। 'उनको कोई आपिz नहीं होती?' ']यY भला? उसका भी तो भई ःवाद बदल जाता है िक नहीं? घर का खाना खाते-खाते ऊब होती है ..... ' 'अदला-बदली? िकसिलए? डाँस-वाँस के िलए?' मRने सहजता से पूछा। 'सबकुछ के िलए। शिनवार की पूरी रात के िलए' स]सेना ने ऑख ं मारते हए ु कहा। ']या?' सुनकर मेरी जान हलक म) आ ग ई। 'नहीं यार। ऐसा कभी होता है ?' थूक ग टकते हए ु मRने पूछा। मR अब भी मानने को तैयार नहीं था। मेरे आxय का ठौर नहीं था। 'होता है ? भाई मRने कई बार खेला है ये खेल।' स]सेना तरं ग म) था। ']या?' 'हाँ।' 'िफर?' मRने जbदी से पैग खKम िकया। उसने भी। नए पैग तैयार कर के हम िफर डट ग ए। 'शिनवार की रात खूब दाi-शाi. ये तो कुछ नहीं दोःत। िपछले िदनY से ]लब म) हमने एक नया खेल शुo िकया है । बीिवयY की अदला-बदली . वो रात भर उसके साथ रहे ग ी ....'. चकरा ग या था। मेरे भीतर के संःकार अभी भी ये मानने को तैयार नहीं थे। . ' स]सेना मुःकुरा रहा था। 'िकEतु सामािजक वजनाओं का ]या? कैसे रिववार की सुबह तुम एक-दसरे ू से नजर) िमला पाते हYग ?) एक छत के नीचे कैसे रह पाते हYग )?' मR ठे ठ ग ँवई आदमी. डाँस-वाँस. तो बाहर खाने जाते हR या नहीं? बताओ। आिखर कोई औरत कब तक एक ही आदमी को बदाँत कर सकती है ? चाहे वो िफर मR ही ]यY ना हँू ... ' स]सेना ने चटखारे लेते हए ु खेल का महाKय समझाया। 'िफर?' मR ह]का-ब]का था। 'िफर ]या? वही जो रात म) मद औरत के बीच होता है .. हो-हbला होता है । आिखर म) सभी मद अपनी- अपनी ग ािडयY की चािबयाँ एक बड़े बीयर से भरे जग म) डाल दे ते हR और िफर एक-एक की पyी को एक-एक चाबी िनकालने को कहा जाता है । िजसके हाथ िजस मद की चाबी आ ग ई.

. इतने मासूम और पतले हYठ . सच यार ... मRने थोड़ा-सा थूक िनग ला और िफर एकटक स]सेना का मुँह ताकने लग ा। '. वो मेरे पास आई और बड़े ^यार से िसर पर हाथ िफरा कर मुझे जग ाने लग ी। मR थोड़ी दे र की ना नुकुर के बाद उठा और चाय पीने लग ा। अभी दो एक घूँट ही ली थी िक ु Hयंuय बाण छोड़ िदया... रिववार का िदन। मR सोया पड़ा था। उधर हमारी पyी की पलक) भी नींद से भारी थी.. बड़ी मादक रात थी वो मैनेजरनी ]या थी? बस बला थी। ऐसा संग मरमरी िजःम .....'एक छत के नीचे कैसे रह सकते हR ? झूठ के सहारे ।' 'झूठ के सहारे ? कैसे?' 'तुह) एक बार का िकःसा सुनाता हँू । ऐसी ही एक शाम. 'कैसी रही कल की रात? ]या-]या हआ पyी ने मुःकुराते हए ु ?' बड़ा संवेदनशील ू_ पूछ बैठी पyी सुबह ही सुबह। मR सोच म) पड़ ग या. वाह! िकEतु मRने जािहर ना करते हए ु तुरEत iख बदला. मेरी पyी के हाथ म) आई एक िटिपकल बीमा एजेEट की चाबी। भारी भरकम कमीशन खाने वाला मालदार बीमा एजेEट और हमारी चाबी पहँु च ग ई एक बRक मैनेजर की पyी के हाथ म)। ग जब की साँचे म) ढली काया वाली मैनेजरनी... ऐसी नपीतुली ग ोलाईयाँ . ऐसा सपाट पेट . शायद रात भर वो भी जग ती रही। करीब साढ़े दस बजे हाथ म) चाय का ^याला लेकर.. ' स]सेना ने मेरी उKसुकता को भाँपते हए ु थोड़ा iक कर िफर कहना शुo िकया '... इतनी ू -टट ग हरी काली जुbफ) िक बस पूछ मत यार। लग रहा था. िक हम) होश ही नहीं था िक हमारी ःवयं की पyी का ]या हआ ु ? िकधर ग ई? और चौहान. ']या जवाब दँ ?ू ' िफर अचानक ख)चकर पyी को िबःतर पर भींच िलया और तड़ाक से एक चुबन जड़ िदया 'जाने भी दो रात की बात को। रात ग ई बात ग ई।' 'टालते ]यY हR ? बताओ ना।' बीवी ने मचलते हए ु अपने को मेरी बाहY म) लटका िदया। मेरी रात की ःमृित एकाएक ताजा होकर मिःतंक म) जाग उठी। सफेद मखमल की सैर . मRने पहले कभी नहीं दे खा था। इतना िचकना और शhफाक बदन. 'अब आग े से हम इस तरह के .. दोनY ही मानY कई जEमY के ^यासे थे .. ' 'िफर?' मेरा हलक सूख ग या था. खुद भी कहीं नौकरी करती थी। बड़ा उzेजक माहौल था। हर कोई अलमःत और बहका हआ ु था। उस व\ हम भी उzेजना म) ऐसे डू बे थे िमसेज मैनेजर की कलाई पकड़कर. दसरा ू िदन.. मानो िसतारे टट ू कर मेरे चारY ओर िग र रहे हR । शी वाज वेरी मच कोआपरे िटव लेड ी ...

. 'सिव. ' 'कुछ नहीं िकया? पकड़ा-धकड़ी? िकस-िवस? नYच-खसYट?' ... सच मानY.... सुiिचपूण तुम हो.'िफर रात कैसे कटी?' वो भी शाितर िखलािड़न थी। खोद-खोद कर पूछ रही थी। पर हम भी तो कुछ कम नहीं थे। 'इधर-उधर की बात) करते रहे । वो अपने लै]चरिशप के अनुभव सुनाती रही .'ना' .. मन-मन भावै मुँड ी िहलावै . बाकी का शरीर तो खुशबूदार था िक नहीं?' पyी ने पतली ग ली म) पकड़ िलया था हम)। मRने िफर पलटी मारी. सिवता।' 'जो सच है . वो मैनेजरनी। िदखने की ही चमक दमक थी उसम)। मुँह से तो ऐसी बांस मार रही थी..बेहू दा खेल म) शरीक नहीं हYग ) डॉिलNग ।' 'पर उस मैनेजरनी के हाथ म) अपनी चाबी आई दे खकर तो उछल पड़े थे तुम। मानो कई जEमY के भूखे को छzीस पकवान एक साथ िदख ग ए हY ... अजीब औरत थी. वो कतई नहीं थी। कोई भी औरत नहीं हो सकती।' 'सच?' पyी आKमूशंसा सुनकर मुuध हो ग ई। तीर सही िनशाने पर लग ा था। 'िबbकुल सच' मRने पुनः एक चुबन जड़ िदया उसके हYठY पर। ःमृित म) पुनः पँखिु डयY से 'वो' दो हYठ िहल उठे । 'तो. मुँह से बदबू आ रही थी. वही कह रही हँू । कैसे भूखे भेिड़ये की तरह होठY पर जीभ िफरा रहे थे तुम उस समय?' ']यY ितल का ताड़ बना रही हो? िपनक म) थे सब। माहौल म) मःती थी। हम ]या अकेले थे? और सच कहँू सिव.. मानो ग टर का ढ]कन खुल ग या हो।' मRने सफाई दे नी चाही। 'िकसको बेवकूफ बना रहे हो तुम? मR सब जानती हँू .. लोकट sलाऊज पहन ले या कुछ भी ना पहने ... जैसे तुम हो। अ3छा चलो. मR अपने सैbसमैनिशप के। बहत ु बोलती थी वो . सुघड़. तुह) लग ा होग ा िक वो ग जब की 'सै]सी' थी। मुझे तो जरा भी नहीं लग ी। लाख लीपापोती कर ले कोई. पyी के ग ालY को सहलाते हए ु बोला. तो भी तुम जैसी मासूिमयत कहाँ से लाती भला वो? जैसी सहज. ग जब की सै]सी थी ना वो . ]या तुमने कुछ नहीं िकया रात भर?' .. बेहू दा खेल म) शरीक नहीं हYग )!' पyी ने मुँह बनाते हए ु मेरा मखौल उड़ाया। 'लेिकन ये सच नहीं है ..

.'तुहारे िसवा िकसी और को छू भी लूँ... मRने चुटकी ली. मानो िकसी ताजा घाव म) उं ग ली घुसेड दी हो। कैसे-कैसे पyी उसे परे शान करती है ? सब बखान करने लग ा। रोता जाए.... पीता जाए। पीता जाए. कुछ पता ही नहीं चला और मR पौ फटते ही टै ]सी ले यहाँ चली आई. तुम तो जानती हो।' ' ... ]या बताऊँ? जानते हो उसने पहले ही से एक होटल म) कमरा बुक करवा रखा था। मR तो िबbकुल डरी हई ु थी। कमरे म) पाँव धरते ही जैसे मानो पावY के नीचे से जमीन िखसक ग ई हो। जग मग करते कमरे म) बैड़ के पास शराब की बोतल) रखी थी और िसग रे ट के पैकेट पड़े थे। मR तो मन ही मन भग वान को याद करने लग ी। भग वान ने तुरEत मंऽ िदया. 'इसकी पyी के बारे म) बात करो।' वही िकया। बैठते ही उसकी पyी का िजब छे ड़ बैठी.. तुह) ?' अब मेरी बारी थी और पyी फँस ग ई थी। 'कैसा उbलू का पVठा था. तुहारे पास।' . जान दे दँ गू ी पर आंचल नहीं सरकने दँ गू ी..मR सब ताड़ रहा था। जैसा सच मेरा. ' 'तुहारी कसम. वैसा सच उसका। खैर.-' 'पर तुहारे हाथ म) अपनी चाबी आ ग ई जानकर कैसे लपक कर तुहारी कमर म) हाथ डालकर अपनी ओर ख)च िलया था उसने। तुम भी तब शरमाकर मुःकुराई थी। कहो। . िकसी के सामने . मR करने दे ती? भारतीय नारी हँू .. जो हाथ म) आए िशकार को छोड़ दे . झूंठ .. 'िफर तो तुम भी मेरी बुराईयाँ िग ना िग ना कर रोने लग ी होग ी। ]यY?' 'ऐसी लग ती हँू मR तुह) ?' वो जरा-सा नाराज हो ग ई। 'तुम तो ऐसी नहीं लग ती। पर वो साला बीमे वाला इतना शरीफ नहीं लग ता मुझे. बस पीते-पीते और रोते-रोते कब लुढ़क ग या. जरा अपनी भी तो बताओ। बीमा एजेEट के साथ खूब मौज मःती मारी होग ी। ]यY? कहाँ ले ग या था... रोने-धोने म)।' 'तुहारी कसम डािलNग । कुछ भी तो नहीं िकया उस बीमा एजेFट ने और अग र करना भी चाहता तो तुम ]या सोचते हो. ' 'लो' मRने ध^प ्से उसके िसर पर हाथ रख िदया। उसके चेहरे पर अब संतोष की झलक थी। मRने भी चैन की साँस ली। 'मेरे बारे म) तो तसbली कर ली तुमने. ऐसा िग रा हआ ु मR नहीं। मेरी िहमत भी नहीं. सच।' 'रखो मेरे िसर पर हाथ . रोता जाए .

. बस।' 'हाँ ......... अवाक।् (समाr) 3 कब तक आिखर 'नवाब लेन ..... तो वो कब तक पितोत िनभा पाई होग ी? बदला हआ ु जायका िकसको बुरा लग ता है ? और िफर एक पंचिसतारा होटल के तEहा अकेले कमरे म) एक मद के साथ सारी रात सKयनारायण की कथा तो सुनी नहीं जा सकती .. ' इस बार पyी oँआसी हो ग ई। 'इसका मतलब जनाब केवल रोते रहे और पीते रहे . ये ग ंदमी ं ी म) खड़ी रही हो ऑख ु ग ुदाज िजःम उस साले के नीचे से यूँ ही सरक आया हो. पीते रहे और रोते रहे .. पर मR जानता था िक वो भी मेरी तरह झूठी कसम खा रही थी। तEहाई. ' 'तुहारे िजःम के पेचोखम नहीं दे खे उसने? तुहारी ऑख ं Y के सुख डोरे तो चुग ली कर रहे हR िक रात भर बड़ी तेज ऑध ं ) फाड़े .... ]यY?' कहकर स]सेना ने जोर का ठहाका लग ाया और एक ही घूँट म) पूरा पैग ग टक ग या। मR उसके मुँह की तरफ दे खता रह ग या.. पूरा कमरा घूमने लग ा। 'मRने कसम तो उठवा ली थी चौहान.. बैठो' कहकर िर]शेवाले ने अपने मैले-कुचैले ग मछे से िर]शे की सीट पgछी और जोर से सीट पर हाथ मार कर बैठने का ईशारा िकया। मR एक हाथ से अपनी धोती . चलोग े?' एक िर]शेवाले से पूछा। 'चल)ग े बाबू . जो ग ुनाहY की िहमत बढाती है । िकतनी दे र पyी को 'tी' होने से रोक सकी होग ी। जब मR ही पyीोत नहीं िनभा पाया. ' उसने भी ध^प से अपना हाथ मेरे िसर पर रख िदया। पूरा माहौल मानो Hयंuय से मुःकुराने लग ा। और हम दोनY आिलंग नबaद हो ग ए। . लेिकन यकीन मानो इससे [यादा कुछ नहीं हआ ु ... मR नहीं मान सकता।' 'िछo कैसी बात) करते हो अपनी पyी से। शम नहीं आती तुह) । तुहारे अलावा िकसी ओर के बारे म) सोच भी नहीं सकती मR। और तुम हो िक .. ' उसने जोर दे कर कहा। 'खाओ मेरी कसम . यकीं नहीं आता ... ' मR मुःकुरा रहा था। 'कैसी बात) करते हो तुम?' वो नजर) िमलाने से कतरा रही थी। 'दो जवान बदन रात भर एक कमरे म). एक िबःतर पर रह) और िबःतर पर िसलवट) तक ना आई हY ..नहीं?' 'हाँ .

िफर भी एक धड़का-सा था ~दय म)। 'िकसी की अमानत. वो भी बेटी के sयाह का ग हना लेकर जा रहा हँू मR.सहालते हए ु सावधानी से िर]शे म) बैठ ग या। िर]शेवाले ने उसी ग मछे से माथे का पसीना पgछा और जुट ग या अपने काम म)। आदमी ढोने का काम। मेरे दाँये हाथ की अंग ुिलयY ने कँधे पर लटके थैले म) रखे डsबे को कस कर पकड़ रखा था। मR अजीब कौतूहल से सड़क के दोनY ओर ग द न घुमा-घुमा कर दे ख रहा था। हालाँिक यह कलकzा मेरा बखूबी दे खा भाला था। िकEतु हर बार इस शहर म) एक नयापन लग ता है । हर बार पहले से अिधक जीवEत. अिधक तेज रhतार ूतीत होता है । िर]शा मुIय सड़क से उतर कर अब एक संकरे राःते पर चला जा रहा था। राःते म) एक ओर कुछ औरत) टोकरY म) मछिलयाँ िलए बैठी थी। माहक मछिलयY के मोल भाव कर रहे थे। कुछ माहक िसफ मछली वाली के ऑच ं ल म) झाँक लेने की ग रज से झुक कर नाहक ही मछिलयY को उलट-पलट कर दे ख रहे थे। ग ंदमी ु Kवचा. मेन राःते पर सड़क मरमत हो रही है सो हम आपको इधर से ले आये हR । राःता लबा जoर है लेिकन पहँु चेग ा नवाब लेन ही। आप िचEता ना कर) । आप हम) िकराया उसी छोटे राःते का दे दीिजएग ा।' हाँफते हए ु पैड़ल मारता िर]शाचालक बोला। हालाँिक उसके जवाब से आंिशक संतुिW तो हो ग ई थी. िकEतु ग ठीले बदन वाली एक पाट की धोती कमर म) बैठी वो औरत) अपनी उघड़ी हई ु िपंड िलयY पर िचपकी. माहकY की बेधती नजरY से बेखबर मछली तोलने और पैसे लेने म) Hयःत थी और माहक अपने 'काम' म)। मR ये सब दे खकर मुःकुरा िदया। इतने म) िर]शा उस छोटे से मछली बाजार को पीछे छोड़कर आग े िनकल चुका था। अब माग  म) अिधक चहल-पहल नहीं थी। िर]शा तेज रhतार से चल रहा था। मRने अब भी थैले म) रखे िडsबे को कसकर पकड़ा हआ ु था। अचानक मRने ग ौर िकया िक ये तो वह राःता नहीं है जो हवेली को जाता है । 'अरे भाई इधर कहाँ िलए जा रहे हो? नवाब लेन का ये कौन सा राःता है ? बताओ तो।' मन के िवचार मुँह से िनकल पड़े । 'बाबू. कुछ ऊँच-नीच हो जाये तो सेठ जी की इ[जत का ]या होग ा? ]या जाने िर]शा वाले की िनयत कैसी हो? मन िकसने दे खा है ? सोच रहा था िक अपनी तसbली के िलए पास से ग ुजर रहे एक आदमी से पूछा 'सुिनए साहब. ]या नवाब लेन को यही राःता जायेग ा।' 'जी हाँ' कहकर वह आग े बढ़ ग या। िर]शेवाले ने पलट कर दे खा और अथपूवक मुःकुरा िदया. शायद वह मेरी मनोदशा भाँप ग या था। मR ःवयं म) बहत ु शिमEदा हआ ु और िसर घुमाकर सड़क के एक ओर दे खने लग ा। िपछली बार जब जमीन के काग जY पर सेठ जी के दःतखत लेने कलकzा आया था तब .

वो नहीं जानती थी। 'तो िफर तय रहा कांितलाल जी.. सेठजी से कोई ग भीर चचा कर रहा था। बग ल म) एक सुदशन युवक बैठा था। काली पतलून सफेद कमीज.उनके यहाँ दो Hयि\ बैठे थे। एक तो बूढ़ा था। िजसके चेहरे पर ग जब की चमक थी। सफेद धोती कमीज शरीर पर. िकEतु आपकी इ[जत का पूरा Iयाल रखने का ूयास कoँग ा।' 'अरे सेठ जी कैसी बात) करते हR आप? सेठ कािEतलाल के मुँह से ऐसी बात) शोभा नहीं दे ती। आपको iपये पैसे की ]या कमी? आप तो कई शािदयाँ एक साथ कर द) और साँस तक ना िनकाल)।' हँ सकर घोषाल बाबू ने कहा। 'ये तो आपका बड़^पन है । वरना. जमींदारी के वहम से पुरानी शानोशौकत िजEदा है . सKया का sयाह करना है । ...... पाँव म) चमड़े के जूते और हाथ म) ब)त िलए वह... घोषाल बाबू? हाँ.. सभव भी नहीं है . सेठ जी के पाँव छओ ये तुहारे होने वाले ससुर हR ।' घोषाल बाबू ने बेटे के कं◌ॅधे पर हाथ रखते हए ु ु कहा। बेटे ने बढ़कर चरण छए और सेठजी ने आशीवाद म) अपने दोनY हाथ उसके िसर पर रख िदये। उनको बाहर तक िवदाकर के लौटे तो िनढाल होकर सोफे पर िग र पड़े । मR पास ही बैठा उन काग जY को छाँटकर अलग कर रहा था िजन पर सेठजी के दःतखत लेने थे। उनको इस तरह िनढाल होकर िग रते दे खा तो उठ कर दौड़ पड़ा। ']या बात है मािलक.. ]या हआ ु ?' 'कुछ नहीं अिखलेश बाबू .. अब वो पहले वाली बात कहाँ रही है . बेटा अजीत . खरीदना है लड़का . हम) यह सबEध मँजूर है । अब आप उस बात का aयान रखना। वैसे आप खुद भी खानदानी हR . समझदार हR ।' वृaद ने उठते हए ु कहा। उधर सKया और युवक की ऑख ं ) िमली तो सKया शरमाकर ऊपर दौड़ ग ई। सेठजी और वह युवक भी खड़े हो ग ये। सेठजी ने वृaद का हाथ अपने हाथY म) लेते हए ु िवनॆ लहजे म) कहा 'घोषाल बाबू. यूँ ही। . वैसे तो लड़की वाले कभी भी वरपq की बराबरी नहीं कर सकते .. करीने से कं◌ॅघी िकये ग ये बाल और सीधा ु सादा खानदानी ूतीत होने वाला युवक जो जमाने की हवा से अभी तक अनछआ था। ग द न झुकाए बेवजह अपनी अंग ुिलयY' की अकड़न िनकाल रहा था। बीच-बीच म) नजर उठाकर सामने के बरामदे म) खुलने वाले कमरे के दरवाजे की ओर भी दे ख लेता था और तुरEत संकोच से िW झुका लेता था। वहाँ सKया काँधे पर ऑच ु कर ं ल डाले इस तरह छप खड़ी बात) सुन रही थी मानो उसे कोई ना दे ख रहा हो। लेिकन वह युवक उसे दे ख रहा है . बस।' एक लबी साँस िनकल पड़ी सेठ जी के मुँह से। ु 'अरे जाने दीिजए साहब . िसर पर काली महाजनी टोपी.

सो अलग । भग वान जो भी करे लेिकन सKया को सही सलामत इ[जत सिहत sयाही जाने दे ।' सोचता हआ ु मR अपने कमरे म) आ पहँु चा। चँमा उतारकर एक ओर रखा और धोती के छोर से पसीना पgछते हए ु चारपाई पर लेट ग या। कुछ ही दे र हई ु थी िक सKया कमरे म) आई 'दादा .... कुछ कहना है ?' सुनते ही सKया मुझसे िलपट ग ई और रोने लग ी। 'अरे पग ली रोती ]यY है ? sयाह करवाकर पराये घर तो एक िदन सभी को ... जoरतमँदY को हाथ भर-भर के दे ते रहे और आज वही दाता खुद इस सलीके म) है िक बेटी को कैसे डोली चढ़ाये? उस पर झूठी शानोशौकत के रहते सामने वालY की ना बुझने वाली भूख-^यास. ]या है . sयाह की िचEता आप ]यY करते हR ?' 'अिखलेश बाबू ... बाऊजी बुला रहे हR ।'ए 'चलो मR आता हँू ' मRने उठते हए ु कहा और चँमा लेने को मेज की ओर ग या। लेिकन वो अभी तक खड़ी थी। 'चलो सKया . अभी . आप तो असिलयत जानते हR . िफर जमींदारी तो है .... भग वान ने चाहा तो सKया बेटी राजी-खुशी परायी हो जायेग ी .... 'कुछ काग जY पर दःतखत करने थे.. या बाद म)?'ए 'लाओ अभी ]या और बाद ]या? अब तो िसफ दःतखत करने तक ही की जमींदारी बाकी रह ग ई है ।' मRने चुपचाप लाकर काग ज उनके सामने की मेज पर रख िदये और उEहYने चुपचाप सभी पर अपने हःताqर कर िदये। मR काग ज समेट कर कमरे से बाहर चला ग या। 'सच तो है .. अब कैसी जमीन और कैसी जमींदारी? बंजर जमीन और भूखे काँतकार ]या दे पाते हR ? िजसके भरोसे बेटी sयाहने का हौसला िकया जा सके। और 'अ3छे ' लड़के आजकल सःते कहाँ? िबना माँ की ब3ची को पालने म) वैसे ही आदमी पूरा हो जाता है . सेठजी। कभी काँतकारY.. िफर ]यY सब लोग Y जैसी बात) करते हR ? आप जानते हR िक उस जमींदारी के भरोसे रहा तो हो चुकी सKया अपने घरबार की। कुछ एकड़ बंजर जमीन को आप जमींदारी कहते हR ?' सेठजी का लहजा दीन और परे शान था। 'आपने िकतने ही लोग Y पर अहसान कर रखे हR । िकतनY ही की लड़िकयY के sयाह म) दान-दहे ज दे चुके हR । िकतनY ही के लग ान माफ कर चुके हR । ]या वो सभी इस आड़े व\ हमारे काम नहीं आय)ग ?) आप तो नाहक ही िचिEतत होते हR । हौसला रख) भग वान भला ही कर) ग )।' कहकर मR वापस मुड़कर जाने को हआ ु िक लौटकर धीमे से पूछा. जुलाहY पर सIती नहीं की। जब तक पास म) iपया रहा... ' कहते हए ु सहल कर सेठ जी बैठे। मRने बढ़कर उनकी कमर के नीचे तिकया लग ा िदया। 'आप िचEता ]यY करते हR सेठ जी .. उस पर उसके sयाह की िचEता। सयानी बेटी को [यादा िदन घर िबठाया भी तो नहीं जा सकता। फिरँता समान आदमी हR .

. िजससे तुम? . ' 'नहीं दादा .. ]यY नहीं करोग ी ये शादी . 'हाँ' 'नाराज हो हवेली के सौदे से? . जो आदमी उॆ भर दोनY हाथY से दे ता ही रहा हो ना.. बेटा तुम मेरे मातहत ही नहीं हो . लेिकन ....... बेटी sयाही जाये ... मR अपनी शादी के िलए बाऊजी की इ[जत नीलाम होते नहीं दे ख सकती। इससे तो अ3छा होता. सKया के बड़े भाई भी हो। सारा इं तजाम तुह) ही दे खना है । जो मुनािसब समझो खानदान की इ[जत को दे खते हए ु . यहाँ आओ।' मR चुपचाप उनके पास आ ग या.... तुम भीतर जाओ मR दे खता हँू । कुछ बेजा हरकत की तो मुझसे बुरा मत जानना। बाऊजी को दख ु होग ा।' कहता हआ ु मR तेज कदमY से बैठक की ओर बढ़ा। सKया ऑस ं ू पYछती हई ु भीतर चली ग ई। बैठक म) सेठजी के पास दो महाजन बैठे थे। मR चुपचाप जाकर सेठजी के पास खड़ा हो ग या। सेठजी ने कलम मेरी ओर बढ़ाते हए ु कहा 'अिखलेश बाबू .. तो हवेली ]या चीज है . 'हवेली िग रवीं' तो सुनकर मुझे ध]का-सा लग ा। 'चलो . ऐसी बात नहीं है .. िकEतु अपनापे के साथ कहा। 'दे खो बेटा ... बाऊजी की िचEता ना कर ....... सKया के िलए ग हने .. 'अिखलेश . ग वाह की जग ह दःतखत कर दीिजए' मRने सवािलया िW उनकी ओर घुमायी तो उEहYने धीरे से मेरा हाथ छू िलया और हौले से पहल) झुकाकर उठाली। उन ऑख ं Y म) मजबूरी तैर रही थी। मRने चुपचाप काग ज पर हःताqर कर िदये। महाजन एक छोटी सी संदकची ू वहीं छोड़कर उठ ु वहीं से अपने कमरे की ओर मुड़ने ग ये। मR उEह) बाहर तक छोड़ने ग या और लौटते हए लग ा िक सेठजी ने आवाज दी..... िकसने ऑख ं उठायी बाऊजी की इ[जत पर? बताओ। और ग ह ृ ःथ म) तेजी-मंदी तो चलती रहती है । इसके िलए तुझे रो-रोकर हलकान करने की ]या पड़ी है ? पाग ल कहीं की' सKया को िहचिकयाँ आने लग ी थी। िहचिकयY के बीच जब उसने कहा. तू तो अपना घर बसा।' मRने उसके िसर पर हाथ फेरते हए ु कहा। 'दादा . मR मर जाती। कम से कम बाप की इ[जत खाक म) िमलने का कारण तो ना बनती।' वो सुबकने लग ी थी। 'पाग ल हई ु है ]या . ' ']या कहती हो सKया ......... मR ये शादी नहीं कoँग ी . कोई और है .. उसका हाथ फैलाना अ3छा नहीं लग ता और यकीनन फैला हआ ु वो हाथ खाली ही लौटता है । ]यYिक कुछ लोग तो नजर चुरा लेते हR और कुछ ये सोचते हR िक इतना बड़ा रईस . 'अिखलेश . माँग रहा है ? अजी जाने दीिजए मजाक की होग ी। इ[जत पर परदा पड़ा रहे ...जाना होता है ? इसम) रोने की ]या बात है ? और मR जो हँू .. लेिकन और कोई राःता नजर नहीं आया।' 'हम कहीं ओर से इEतजाम कर सकते थे Fण ्हवेली िग रवी रखने की ]या जoरत थी?' मRने तिनक ऊँचे ःवर म).. ?' कहते हए ु उनकी ऑख ं Y से दो ऑस ं ू ट^प से टपक पड़े । मेरी भी ऑख ं ) नम हो आयी। संदकची ू खोलकर दो तीन iपयY के बंड ल दोनY हाथY से मुझे थमाते हए ु बोले.

. अब हवेली के ितनके-ितनके पर हमारा अिIतयार है . मR कहाँ जाऊंग ी दादा? .. उसी रात उनके िदल की धड़कन बEद हो ग यी।' सKया फूट-फूटकर रो रही थी। मेरी ऑख ं ) भी बहने लग ी थी। 'दादा .. मR भी ]यY ना मर ग ई? .... और ..खरीद लाओ . वैसे भी बाप ना रहे तो बेटा ही बहन को डोली म) िवदा करता है .. ' अिनW की आशंका ने कदमY की रhतार तेज कर दी थी। भीतर ग या तो बैठक म) जमीन पर सKया ग ुमसुम सी घुटनY पर िसर िटकाये बैठी थी। पास ही जoरत का कुछ सामान एक पोटली म) बँधा रखा था। मेरा िदल ध]क से करके रह ग या। कदमY की आहट सुनकर सKया ने नजर उठाकर दे खा। सामने मुझे पाकर दौड पड़ी और िलपट कर िबलख- ू िबलखकर रोने लग ी। मेरे हाथY से जेवरY वाला थैला छटकर जमीन पर िग र पड़ा। सारे शरीर को जैसे काठ मार ग या था। ना कुछ कहते बनता था और ना ही सKया को चुपकर पाने की कोिशश कर रहा था। कुछ दे र बाद सKया के ऑस ं ू मेरी कमीज पर िग रे और एक अनाथ बेटी के असीम दख ु ु की तपत मेरे सीने से छयी तो मुझे मेरे होने का अहसास हआ। ु मR चgक कर नींद से उठा. बराबर ही मानो।' आवाज म) असीम िनराशा और दoख ु था। मR घुटनY के बल िग र पड़ा। मुझ अनाथ को आज पहली बार इतना ःनेह एक साथ िमला था िक ऑख ं Y म) समा नहीं पा रहा था। कदमY म) िसर िटका कर रो पड़ा 'बाऊजी .. बाऊजी की उनसे काफी िजƒ-बहस हई ु . ना कोई रं ग रोग न .. कल वो महाजन भी आये थे . कब हआ ु ये सब?' धीमे से पूछा मRने। 'आप ग ये.. वो दिरEदे िफर आये थे। कहने लग े इतने दान-दहे ज से ]या होग ा ..... सKया ना कुछ कर बैठी हो . ना रोशनी ... मतलब? ]या तेरे दादा का घर तेरा नहीं है ... ' िहचिकयाँ बँध ग ई थी सKया की। 'कहाँ जाऊँग ी. बाऊजी' और सेठजी ने मेरे िसर पर अपना हाथ रख िदया। 'बाबू .. ]या बाऊजी मुझे अपना बेटा नहीं मानते थे? अब जो हो ग या सो भूल जा . हम आज ही इस जलील .? कल शादी है . बाबू आपका िठकाना आ ग या।' जैसे िकसी ने सोते से जग ा िदया हो। मR िर]शे से उतरा और िकराया चुकाकर घर की ओर बढ़ा ']या बात है . रकम थोड़ी और बढ़ाइये .. अEत म) वो िरँता तोड़ कर चले ग ये . ना साज सजावट ........... उसके दसरे ू िदन .. मानो। 'सKया . मुझे हआ ु ना हआ ु ... कहने लग े दो चार िदन म) हवेली खाली कर दे ना ... ये सारी मुसीबत मेरे कारण ही तो है . बाऊजी की तो जैसे जीवन डोर ही तोड ग ये वो नीच Fण ्सारा िदन बाऊजी बैचेन रहे .... ना चहल पहल .......... कुछ अनहोनी ना हो ग ई हो मेरे पीछे ? . सभी कुछ तुह) ही करना है . और ये बाकी के iपये भी अपने पास रखो ... सामान उठा . सेठजी को ना कुछ हो ग या हो? .................

. जहाँ बेटY के मोल तय करते-करते लोग बेिटयY को अनाथ कर दे ते हY। जहाँ बूढ़े लाचार बाप को अपनी इ[जत तक दहे ज म) दे दे ने को मजबूर कर िदया जाता हो। जहाँ iपये के िलए िकसी कुँआरी के अरमानY का कKल कर िदया जाता हो। ऐसी कKलग ाह म) हम और नहीं रह) ग )। . सब कुछ दे खा और सब कुछ पीछे छोड़कर आग े बढ़ ग ये। मेरा एक हाथ सKया के िसर को अपनी सीने पर सहाले सहला रहा था। उसकी िहचिकयाँ धीरे -धीरे धीमी हो ग यी थी। पर उसके अEदर का दद तीो होता जा रहा था. मR अपनी पोट„ बल सEदकची ू उठाकर घूमता हँू . वो है कृ जाड़े की रातY म) कहर को झेलना.. बेिहसाब. जूता पॉिलश करना या पॉलीथीन बीनते िफरना। ये दो तीन ही रोजग ार हम लोग Y की िनयित हR । भीख माँग ने को आसान समझने वाले पॉलीथीन बीनना नहीं ःवीकारते और पॉलीथीन झडका-झडका के उठाने वाले. बूट-पॉिलश करने को। सबके अपने-अपने तक हR . ऑख ं Y के डोरे सुख हो चले थे और ग ालY पर ऑस ं ुओं की सूखी लकीरY से दहे ज की दिरEदग ी टपक रही थी. और फुटपाथ पर रहने वालY का दद । सब कुछ मानY एक-दसरे ू से जुड़ा हआ ु आता है .. सबकी अपनी-अपनी पसंद। लेिकन एक बात जो सबम) एक-सी है . लग ातार। (समाr) 4 कंबल िदसबर का महीना. भीख माँग कर जलील नहीं होना चाहते। बहरहाल मR ना भीख माँग ता हँू ..शहर को छोड़ जाय)ग ). वो सोफा िजस पर अिEतम बार सेठ जी को बैठे दे खा था. आज ही चले जाय)ग ) .. नंग े बदन। . कड़ाके की सदv. बैठक. ना पॉलीथीन बीनता हँू . अभी और इसी व\।' सKया मेरे सीने से मुँह सटाये थी। उसकी बग ल म) एक छोटी-सी ग ठरी थी। ऑस ं ू अब भी बह रहे थे। कदमY म) मौत की सी उदासी थी। हम दोनY धीरे -धीरे बाहर की ओर जा रहे थे। मुड कर एक बार हवेली. िबbकुल नहीं रह) ग ) .. कलैFडर म)। हर साल की तरह आती हR सिद याँ और हर बार हम) अपना कद चादर से बड़ा होने की पीड़ा महसूस होने लग ती है । घुटनY को कलेजे से लग ाकर खुद को चादर म) समेटे पड़े रहना और राम-राम करके उजाला हो जाने की आस करना कैसा पीड़ादायक होता है ? कोई हमसे पूछे। ितस पर आए िदन पुिलस के डFडे और मवािलयY की वसूली। दो व\ पेट म) कुछ डालने भर को कुछ नहीं बचता पास म)। भीख माँग ना.

. ठFड म)?' मRने चाय का कुbलड़ एक ओर लुढ़काते हए ु पुकारा। सब जोर से हँ स पड़े । ठहाका सुनकर एकबार तो सफाई कमचािरयY ने झाडू रोक कर हमारी ओर दे खा और हम) खीस) िनपोरते दे ख िफर झाडू फटकारने लग े। हम िफर एकबार जोर से ठहाका लग ा उठे । 'यार. ठFड थोड़ी कम लग ती है । पर एसी रात) महीने म) एकाध ही होती हR । वरना. इनकी माँ की .-' मु3छड आदमी शायद दारोग ा था। लोग अपना-अपना सामान सVटा समेटने लग े। अचानक वहाँ भग दड़-सी मच ग ई। अफरा- तफरी म) लोग अपना सामान लेकर इधर-उधर िततर-िबतर होने लग े। िकसी ने भी ये नहीं पूछा िक ']यY?' झाडू वाले जोर-जोर से झाडु एँ फटकारने लग े और फुटपाथ पर धूल के ग ुबार उठने लग े। फुटपाथ पर रहने वाले कुछ लोग तो भाग ग ए। मग र [यादातर ने ग ोम„Fट हॉःटल के िपछवाड़े वाली दीवार के सहारे -सहारे अपना सामान िटका िदया और झुFड म) बैठ कर फुटपाथ की सफाई का नजारा दे खने लग े। ौवण बोला. ग ोपी एक बात बता। ये सुसरे सफाई करन लाग रहे । कंबल-कुंबल ]यY ना बंटवाते मादरजात? जाड़े म) . ऐसी-तैसी हई ु पड़ी हम सबन की' दे वा ने मुझसे पूछा। 'दे ख भई दे वा.... तो पता चले। हलक म) साँस ना जम जाए तो . ु फुटपाथ के िजस टकड़े पर मेरा आिधपKय है . उठाओ अपने टीन-ट^पर .. 'ए! हटो यहाँ से . ये लीड़र साले िदन म) ग ुजरते हR इन राःतY से। रात म) साले लग े पड़े होते हR . उसी के बग ल म) राधे रहता है और अग ल म) भीखू। राधे अकेला है .. 'साले. [यादातर तो खाने के ही लाले पड़े होते हR और भूखे पेट रात भर कुकुड़-कुकुड़ करते रहना पड़ता है । एक िदन सुबह-सुबह दे खा नग रपािलका के सफाई कमचारी हाथ म) बड़े -बड़े झाडू लेकर हमारी ओर बढ़े आ रहे हR । साथ म) दो तीन पुिलिसए भी थे। हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही उनम) से एक मु3छड़-से आदमी ने जोर से हाँक लग ाई. भीखू के बाल-ब3चे हR । भीखू की घरवाली और दो ब3चे पॉलीथीन बीनते हR और भीखू भीख माँग ता है । भीखू की औरत मैलेकुचैले कपड़Y म) जैसे-तैसे अपने नारीKव को ढके रखने की कोिशश करती है । पर ब3चे अधनंग े ही रहने को मजबूर हR । जाड़े की रात को एक फटे से कंबल म) चार जने एक-दसरे ू म) जकड़ कर जैसे तैसे काटते हR । राधे और मR दोनY ही बूट पॉिलश करते हR । कभी-कभी अ3छी माहकी हो जाती है तो रात को एक-एक थैली भी पी लेते हR । उस रात. रजाइयY म)। रात म) कभी आएँ साले. ' 'जoर कोई लीडर-शीडर आ रहा होग ा. आज।' राधे ने जोड़ा। 'लीडर यहाँ फुटपाथ पर ]या मराने आएग ा.. सुबह पैले आ ग ए..

.। ' ' रै न-बसेरा का हई ु है भाई? ' दे वा समझ नहीं पाया। 'रै न-बसेरा माने रात का िठकाना। दो-चार iपये लेकर वहाँ रात िबताने दी जाएग ी ग रीबY को।' मRने समझाया। '.. ये सब तो पालिट]स है इन ससुर लीडरन की। कहबे को रै न बसेरा.. धरम का काम और हइबे ु को कमाई का धEधा। अरे ! ग रीब जोन दईु-चार iपया ही दे सकता तो रै न- बसेरा ही मR ]यो सोने आता भला।' मRने भी काका की बात का ही समथन िकया। 'ई से बिढ़या तो. नाक एक साथ पgछे और बताने लग ा. बग ैर च…डी-हाफपैFट के वो अजीब सा लग रहा था। उसके हाथ. िकसी और को पता थी ये बात?' उसने पास बैठी सEतY से कहा। 'कौन कह रहा है . ई हई ु जाए िक कंबल दे िदयो हम). और कंबल भी बाँट)ग े मंऽी जी ..कहना।' 'सुनो-सुनो . वो ही बता रहा था..... िकसी को। मRने सुन ली।' लड़का सग व अपनी उपलिsध बताने लग ा। 'पर ई बताओ ग ोपी भैया.. पास बैठे लोग Y ने हामी भर दी। दे खते ही दे खते सड़क के िकनारे -िकनारे कनात लग ग ई। अःथाई टै Fट लग ग या। दो बाई तीन के लVठे पर 'रै न-बसेरा' िलखकर टाँग िदया ग या। धीरे -धीरे धुध ं छँ टने लग ी थी और सूरज दे वता का परसाद िबखरने लग ा था। ग ाड़ी मोटरY की िचbलपg बढ़ने लग ी थी और . ये सब?' मRने लड़के से पूछा। 'ऊहाँ वो मु3छड़ दारोग ा है ना.. पैर... सुना है आज मंऽी जी आएंग े. ग ोपी चाचा . छोरा? कहो. इहाँ रै न-बसेरा का उ†ाटन करने . ' लड़के की आवाज म) उbलास था। पास ही बैठी ु जा रही थी। 'कैसी भीखू की घरवाली अपने छोरे को चपर-चपर बोलता दे खके िनहाल हई बिढ़या खबर लेकर आया है . कहो तो' घनसी काका ने पूछा। 'काका. सुनो तो।' भीखू का लड़का हाँफता हआ ु ू आया। बटन टटी कमीज. घुटने पर मैल की मोटी परत चढ़ी थी। लड़का चूिँ क सुबह की तेज हवाओं म) दौड़ कर आया था। सो उसकी ऑख ं और नाक दोनY अनवरत बह रहे थे। उसने कमीज की बाँह से ऑख ं . ई ससुर रात सोबे खाितर दईु-चार iपया आई कहाँ से? दईु चार- iपया तो िदर भर की कमाई होय। ऊ भी दे दइबे तो खाइबे का? ऊ दरोग ा का िसर। . मुँह. सो लईह) हम फुटपाथ पर ही।' भीखू ने सुझाव िदया. 'चाचा.

तू .. ब3चे.लोग Y की आवा-जाही शुo हो ग ई थी। हम सब अपने-अपने धEधे पर िनकलने लग े थे। भीखू. एक-एक के पास जाकर कुछ पूछ रहा था और आग े बढ़ता जा रहा था। उसके चेहरे पर अलग -सा कुिटल रौब था। अचानक उसने नजर उठाकर हमारी ओर दे खा और बुलाने का ईशारा िकया। एक साथ कई सारे लोग लपके। वो जोर से दहाड़ा. दीवार के सहारे हम लोग Y की िग रःती पड़ी थी। हम लोग अपने-अपने सामान के पास जा बैठे। सभी को आज उमीद थी िक आज हम) जoर कंबल िमल)ग े और रात को चैन से भी सो सक)ग े। शायद. तू ही। इधर-उधर ]या ताकता है ? इधर आ . राधे और मR बूट पािलश करने. घनसी काका आिद भीख माँग ने. 'हाँ-हाँ . जा।' दरोग ा ने डपटते हए ु कहा। भीखू चुप लग ाकर लाईन म) बैठ ग या। हम लोग Y के समझ म) कुछ नहीं आ रहा था। भीखू बीच-बीच म) मुड़-मुड़ कर .... ौवण. सारे नहीं।' उसका ईशारा भीखू की तरफ था। सभी की नजर) भीखू की ओर उठी। वो खुद भी इधर-उधर दे खने लग ा। उसको कुछ समझ म) नहीं आ रहा था। तब दरोग ा िफर िचbलाया. औरतY के चेहरे पर मुःकान थी और बूढी ऑख ं Y म) चमक झूल रही थी। तभी एक टै ]टर शाली आकर ऐन तबू के सामने iकी और उसम) से कई सारे मैले कुचैले. बूढे उतारे ग ये। सब के सब लाईन लग ा कर बैठ ग ये। सब कुछ जैसे पूवि नयोिजत एवं साठ-ग ाँठ से हआ ु जान पड़ता था। 'ना जाने कहाँ से आ ग ए ये लोग ?' हम सबकी ऑख ं Y म) एक ही ू_ था। दरोग ा. ु र?' 'हजू ु र के ब3चे.. बाकी लोग पॉलीथीन बीनने िनकल पड़े थे। भीखू की औरत और ब3चे भी पीठ पर मैलाकुचैला बोरा लटकाये अपनी िदनचया के िलए िनकल पड़े थे। सब लोग अपनी-अपनी जbदी म) थे। मR भी िनकल ग या। िदनभर की अपनी नौकरी करके शाम को जब हम लौटे तो अपने ही फुटपाथ को पहचान नहीं पाये। सड़क पर टै Fट हाऊस की कुिसयाँ सजी थी। एक तरफ से राःता बंद कर िदया ग या था। माईक लग ा था। कुछ संॅाEत से लोग वहाँ बैठे थे। कुछ ही दे र म) मंऽी जी आने वाले थे। रै न-बसेरा वाले तबू के दरवाजे पर एक लाल िरबन बाँधा ग या था। दे श म) अब रै न बसेरY का उ†ाटन भी फीता काटकर होने लग ा है । दे श की ूग ित दे खकर सभी को आxय हो रहा था। दरू.-' भीखू सहमा-सहमा उठा और दरोग ा के पास जा पहँु चा. 'अबे तू आ .. इसी आस म) आज हम लोग और िदनY की बजाय कुछ जbदी लौट आए थे। ब3चY के चेहरे आज िखले हए ु थे.. दे वा.. कंबल चािहए िक नहीं?' 'हजू 'चािहए हजू ु र' भीखू तपाक से बोल पड़ा। उसकी ऑख ं Y म) कुछ चमकने लग ा। 'तो चल लाईन म) बैठ. औरत. आदमी.

. कंबल बाँटे. दस बीस iपये दे िदये और उEह) भग ा िदया। कुछे क अपने मैले कुचैले चादरY और फटे -पुराने कबलY के साथ रै न-बसेरे म) सोने को iक ग ये। बाकी चले ग ये। लेिकन कुछ लोग Y के पास अब भी नये कंबल नजर आ रहे थे। वो लोग कबल लेकर इस तरह इतराते िफर रहे थे मानो वी. चाचा . चला ग या। बाहर से लाकर खडे कर िदये ग ये ग रीबY से 'िकसी' ने कबल वापस ले िलए.हमारी ओर दे ख लेता था। उसके चेहरे पर ग व के-से भाव थे। इतने सारे ग रीबY म) से भाuयशाली ग रीब चुन िलया जाना.पी. दरोग ा से?' कोई कहता. रात ग हराने लग ी थी. ' मRने अनिभkता जताई। रात के लग भग दस बज रहे थे। कहाँ ग ई होग ी इस समय? रह-रह कर िवचार आ रहा था। कुछ ही qणY बाद भीखू बदहवास सा दौड़ता हआ ु आया। 'औरत को दे खा ]या?' उसकी ऑख ं ) पूछ रही थी। मRने ऑख ं Y ही ऑख ं Y म) मना कर िदया। भीखू के कंधे पर अभी भी 'वो' नया कंबल लटक रहा था। बड़े ही जतन से भीखू ने उसे सहाल रखा था और रह-रह कर उसे कंधे पर सहे ज रहा था। वो भी जरा इधर-उधर दे खकर लौट ग या। रात के लग भग पौने दो बजे हYग े अभी। मR उनींदा-सा अपनी फटी लोई म) खुद को दबकाए ु . ग व ही की तो बात थी। मंऽी जी आए... कोई ओढ़ कर। भीखू के ब3चे मानो आज खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। कंबल की तह लग ाकर दोनY ब3चे उसके पास बैठ ग ये थे। मानो िकसी खजाने की चौकीदारी कर रहे हY। भीखू खुश था। कोई पूछता. माई को दे खा ]या तुमने?' 'नहीं तो . कई तरह के सवाल. फोटो िखंचवाये.. हम) अपना कंबल उलट-पलट कर िदखा रहा था। सब लोग हसरत भरी नजरY से उसके कंबल को दे ख रहे थे। कोई छू कर दे खता. हY। शायद कोई िवशेष बात थी। बड़ा रहःय था। उनम) हमारा भीखू भी एक था। भीखू. सब फुटपािथए अपने-अपने चीथड़Y म) दबक ु े पूवव  त ्सड़क िकनारे के फुटपाथ की शोभा बढ़ाने के िलए अपनी-अपनी जग ह पर आ जमे थे। मR बैठा अभी बीड़ी ही सुड़क रहा था िक भीखू का छोरा दौड़ा-दौड़ा आया. तबू का फीता काटा. भाषण झाड़ा.आई. 'चाचा. चले ग ये। टै ]टर आया. 'भीखू तेरी पहचान है ]या. कई तरह की बात)। सबके जवाब म) भीखू बस मुःकुरा रहा था और िसर िहला िहलाकर बस ग िवत हआ ु जा रहा था। . तेरे।' कई तरह के लोग . धूल उड़ाई... 'चल अबके जाड़े तो चैन से िनकल जाय)ग े. 'तू तो बड़ा भाग ी िनकला रे भीखू।' कोई कहता. कुिसयाँ उठाई.

'अरे ! औरत िमल ग ई थी ]या?' 'हाँ ' .. जैसे ही टै पो दािहने हाथ को मुड़ा. भीखू ने चहक कर जवाब िदया था। 'िकधर हो ली थी?' मेरा दसरा ू ू_। 'कहीं ना. सुबह। मRने भीखू से पूछा. उसको कुछ समझा रही है । धीरे -धीरे भीखू का पारा िग र रहा है । औरत ने पbलू म) बँधी ग ाँठ खोलकर भीखू के हाथ म) कुछ रख िदया। वो अब खुश नजर आ रहा था। दोनY हँ सी-खुशी रै न बसेरे म) चले ग ये। दसरे ू िदन. मRने दे खा टै पो की िपछली सीट पर सुबह वाला मु3छड़ दारोग ा बैठा था.. उसने औरत के हाथ म) कुछ िदया और शायद हाथ को दबाया भी। औरत ने झट-से अपनी लूग ड़ी के पbलू म) कुछ बाँध िलया था। टै पो चल िदया। मेरी नजर टै पो ही म) लग ी थी. मRने दे खा दरू अंधेरे म) सड़क की दसरी ू ओर एक टै पो िर]शा iका और उसम) से भीखू की औरत उतरी। उतर कर वो जरा दे र टै पो के पास ही खड़ी रही। टै पो के भीतर शायद कोई बैठा था. उसको कल िकसी sयाह की लाईट हाँडे उठाने का काम िमल ग या था। बीस iपये लेकर आई है ।' वो खुश था। मR िनizर। . टै पY की िपछली सीट पर मु3छड़ दारोग ा ]या कर रहा था? (समाr) . पसर कर। मRने दे खा भीखू अपनी औरत से हवा म) हाथ िहला-िहलाकर तेज-तेज बात) कर रहा है । वो.पड़ा था। तभी.

तुषार पुनः पिऽका के पEने उलटने लग ा। तभी एक युवती के आग मन ने अचानक उसका aयान अपनी ओर आकिषत िकया। युवती और पटे ल साहब म) मुःकुराहटY का आदान-ूदान हआ। ु पटे ल साहब ने ऑख ं Y से उसकी ओर इस तरह का शरारत भरा ईशारा िकया िक तुषार पुनः पिऽका के पEने उलटने को बाaय हो ग या। उसको लग ा िक पित- पyी के बीच चल रहे कायकलाप को बैठकर नहीं घूरना चािहए। िशWता नहीं है । िकEतु उस युवती को दे खकर पटे ल साहब के और उसके बेमेल साथ पर मन ही मन तुषार बड़ा आxयचिकत था। कहाँ यह कमिसन सौEदय की मूित? और कहाँ यह थुलथुल पटे ल। पटे ल ने युवती का तुषार से पिरचय नहीं करवाया। िकEतु तुषार िशWतावश पिऽका को . जाना िक यहीं से चढ़े हR और अहमदाबाद तक साथ ही हR । वहाँ शाँसपोट का Hयवसाय हR । औपचािरक बातचीत के बाद वो अपनी एक फाईल म) खो ग ये और तुषार पिऽका को उलटने-पलटने म)। ग ाड़ी ग ित पकड़ चुकी थी। उजाला धीरे -धीरे मaदम होता जा रहा था। पिqयY की चहचहाट म) िदन भर की थकान के बाद अपने घYसलY म) लौटने की उKसुकताजEय खुशी ःपW समझी जा सकती थी। तुषार ने दे खा सामने वाली सीट पर एक लेड ीज बैग भी रखा है । िजसके पास ही एक िलिपिःटक और एक छोटा सा शीशा भी अHयविःथत-सा पड़ा है । लग ता था सामने वाली सीट पर कोई मिहला सहयाऽी भी है । मिहला याऽी का Iयाल आते ही वो मुःकुरा िदया। हो सकता है पटे ल साहब की पyी ही हY। पर वो है कहाँ? िदखाई नहीं दीं। शायद बाथoम म) हY। खैर. दगु श „ भाई पटे ल। सामने वाली बथ पर बैठे हथेली पर तबाकू रग ड़ रहे थे। पिरचय हआ ु .5 झुलसे सपने शाम के पाँच बज चुके थे। अहमदाबाद मेल ने अिEतम सीटी दे दी थी। तुषार लपक कर अपने आरिqत कपाट म)ट म) चढ़ ग या था। उसके हाथ म) अंमेजी की एक मािसक पिऽका थी। अपनी सीट पर सामान Hयविःथत करके वो जरा ^लेटफाम पर उतर ग या था। कुछ खरीदने की मंशा से नहीं. बिbक यूँ ही। पर िफर समय काटने के िलए ये पिऽका खरीद ली थी। वैसे भी रात के सफर म) वो सोता तो है नहीं। कपाट मेEट म) उसके अितिर\ एक स[जन और थे.

माथे पर छोटी चमकीली िबिEदया और कसकर जूडे के oप म) बाँधे ग ये बाल। िकEतु माँग म) िसEदरू और ग ले म) मंग ल सूऽ आिद िववाह के कोई िचˆ उसके शरीर पर नहीं थे वैसे भी आजकल ये सब नहीं करना फैशन म) िग ना जाता है । िकEतु िसbक की साडी बाँधे वो बहत ु सुEदर िदखाई पड़ती थी और चेहरे का लावFय बरबस अपनी ओर खींचता था। हाव भाव से लग ता था िक वह अपने जीवन से बहत ु संतुW है । ']या आप भी जयपुर से ही चढ़े हR ?' खनकती आवाज म) उसने पूछा। 'जी हाँ' तुषार ने ग द न िहलाई. मR तुषार चतुवद „ ी।' उzर म) एक मोहक मुःकान उस युवती के होठY पर फैल ग यी। वह बहत ु आकषक िदख रही थी। ग ौरवण. िखड़की के बाहर दरू तक फैली अंधेरी काली चादर को एकटक दे ख रही थी. „ िक बीच म) ही वो युवती बोल पड़ी. िनिनमेष। 'अरे भाई. ऐसा ही कुछ समझ लीिजए। मग र आप कहाँ से आ रहे हR ? लग ता है काफी िदनY बाद घर-Hयापार से समय िनकाल पाये हR घूमने िफरने का।' तुषार ने िकंिचत मुःकुराते हए ु कहा। 'हाँ कुछ यूँ ही समझ लीिजए। कुछ काम था जयपुर म) सो साथ ही चले आये।' दगु श „ ने ु उस युवती पर एक ूेमभरी िचतवन डाली। वो लजा ग यी। कहते हए 'िकतना समय हआ ु आपकी शादी को?' तुषार ने अचानक पूछ डाला। 'शादी?' कुछ कहने को था दगु श. 'मR अहमदाबाद जा रहा हँू । एक िबजनेस िमिटं ग है ।' 'iपये का आकषण ख)च रहा है जनाब को।' दगु श „ बीच म) बोला। 'हाँ. िजसका नाम तक तुषार को नहीं पता था. ']या आप की शादी हो चुकी है ?' तुषार का ू_ अनुzिरत रह ग या। 'जी नहीं अभी तक भाuयशाली हँू ।' मुःकुराते हए ु तुषार ने कहा और तीनY जोर से हँ स पड़े । कुछ दे र के िलए सEनाटा छा ग या। तब तुषार ने पैकेट से िसग रे ट िनकालते हए ु खामोशी तोड़ी। 'यिद आप बुरा ना मान) तो ]या मR एक िसग रे ट पी लू?ँ ' 'जी हाँ.एक ओर रखता हआ ु तुरEत खड़ा हो ग या और धीरे से ग द न झुकाते हए ु बोला 'नमःकार. शौक से।' मुःकुराकर उसने जवाब िदया। तुषार कुछ आराम से बैठ ग या। पिऽका पढ़ते-पढ़ते बीच-बीच म) वो नजर उठाकर दे ख लेता। दगु श „ अपनी फाईल म) Hयःत था और वो युवती. खाना-वाना खाओग ी या नहीं?' दगु श „ की आवाज ने उसकी तEिा भंग की। उसने िखड़की से अEदर मुँह िकया तो उसकी ऑख ं ) नम थी। . चेहरे पर मेकअप की हbकी परत.

इनका ग ुःसा बड़ा खराब है ?' दगु श „ ने छे ड़ते हए ु कहा। 'आप चुप किरये। लीिजए ना. ]या बात है ?' युवती कौर मुँह म) रखते हए ु तुषार से कहा। 'बस यूँ ही। मेरी छोटी बहन भी यही कहती है । पर ]या कoँ? अिधक खाया ही नहीं जाता' िसग रे ट सुलग ाते हए ु वो बोला। ']या उॆ है आपकी बहन की?' 'आपसे उEनीस-इ]कीस होग ी. ' पbलू से ऑख ं ) पgछते हए ु वो िटिफन कैिरयर खोलने लग ी। तुषार ने दे खा. िफर आज कल सुयोuय वर भी तो बातY म) नहीं िमल जाता।' 'सो तो है । सुयोuय वर कहाँ िमल पाता है ?' उसने कुछ उदास लहजे म) कहा। उसके ःवर म) अजीब-सी पीड़ा थी। तुषार समझ नहीं पाया िक उसने ये बात ]यूँ कही? ]या वो अपने पित दगु श „ से खुश नहीं है ? या िक वो दगु श „ की पyी ही नहीं है ? तो? कुछ दे र इधर-उधर की ग पशप के बाद दगु श „ भाई चादर तानकर सो ग ये। साड़ी ठीक करती हई ु वह भी पैरY को ऊपर की ओर समेट कर आराम से बैठ ग यी थी। िकEतु िबbकुल मौन। सामने वाली सीट पर लेटा तुषार अपनी पिऽका म) खोया था। तुषार ने जब उसे चुपचाप बैठे दे खा तो पिऽका को एक ओर पटक-कर ग ोद म) तिकया रखकर पालती मार कर उसकी ओर मुँह करके बैठ ग या। . तुषार बाबू।' 'अरे आप तकलीफ ]यY करती हR ? मR रात के सफर म) खाकर ही चलता हँू ।' 'ना नुकर मत करो भाई.. 'लीिजए.. कोयले का दाना िग र ग या है ऑख ं म) शायद . बस। पर सुEदरता म) आपसे उEनीस ही है ।' सुनकर वो लजा ग यी। ' qमा कर) .'अरे रो ]यY रही हो?' दगु श „ ने िचंितत ःवर म) पूछा। तुषार की नजर) भी एकाएक उस ओर उठी। 'कुछ नहीं। कुछ भी तो नहीं . तुषार बाबू।' तुषार उसके आमह को टाल नहीं सका और िकंिचत ्संकोच के साथ ^लेट ले ली। िकEतु मन ही मन तुषार यही सोच रहा था िक 'वो' रो ]यY रही थी? बहत ु कहने पर भी तुषार ने एक पंराठे से अिधक नहीं खाया। 'आप तो बहत ु कम खाते हR ... मRने आपका नाम तो पूछा ही नहीं? ' तुषार ने ^लेट नीचे रखते हए ु पूछा। ' जी. नेहा। ' उसने संिqr सा उzर िदया। ']या अभी शादी करने का िवचार नहीं है ?' नेहा का अग ला ू_ था। 'अभी वो पढ़ रही है . मग र िफर अनदे खा करके पिऽका म) खो ग या। युवती ने उसकी ओर भी एक ^लेट बढ़ा दी.

हR िक नहीं?' तुषार ने पूछा। सुनते ही झटके के साथ उसने ग द न उठायी। उसके चेहरे पर अनचाहे ू_ पूछ िलए जाने के से भाव थे। िफर फीकी मुःकान के साथ बोली. ू ग या था। लग ता था वो उखड़ी-उखड़ी सी है और बातचीत करने के मूड म) जो कहीं छट नहीं है । मग र उसके इस अचानक बदले Hयवहार को दे खकर तुषार ये भली ूकार समझ ग या था िक कुछ दoखद ु अवँय है । िजसे वो Hय\ नहीं होने दे ना चाहती। कुछ दे र जाग ने के बाद वो अपनी सीट पर लेट ग या और ना जाने कब उसे नींद आ ग ई। वो ना जान) िकतनी दे र तक जाग ती रही उस अंधेरे के साथ। ूातः दगु श „ और नेहा तैयार हो चुके थे। अहमदाबाद ^लेटफाम आने ही वाला था। तुषार उठा. आप रहते कहाँ हR ?' ू_ सुनकर नेहा तो जैसे चgक पड़ी। उसने दगु श „ की तरफ दे खा। दगु श „ तपाक से बोला.. 'अभी तो साईव-ईन म) हR । जbदी ही बुaद िवहार म) िशhट हो जाय)ग )।' 'ये लीिजए मेरा काड । िफर कभी जयपुर आना हो तो याद जoर कीिजयेग ा।' तुषार ने ु कहा। दगु श अपना काड नेहा की ओर बढ़ाते हए „ ने बीच ही म) काड को लपक िलया। „ का ऐसा करना कुछ ठीक नहीं लग ा। तुषार को दगु श ग ाड़ी अहमदाबाद आ पहँु ची। तीनY ग ाड़ी से उतर ग ये। अलिवदा नमःकार आिद हआ ु और अपने-अपने राःते हो िलए। तुषार उनको दरू ओझल होने तक दे खता रहा। एक बार नेहा ने भी मुड़कर दे खा। बदले म) तुषार ने उसकी ओर हाथ िहला िदया और वो मुःकुरा दी। उसकी मुःकुराहट म) एक 'फीकापन' था। दसरे ू िदन लाल दरवाजा पर तुषार अपने एक िमऽ के साथ कुछ खरीददारी कर रहा था। वो एक रे ड ीमेड ग ारमेEट के शोoम पर खड़ा अपनी बहन के िलए सूट खरीद रहा था िक तभी उसने दे खा िक सडक के दसरी ू ओर नेहा चली जा रही है । उसके लबे बाल उसके कंधY पर झूल रहे थे। ःलीवलैस sलाऊज और चटख लाल साड़ी पहने अपनी कमर को लचकाती वो चली जा रही थी। उसके साथ एक तीस-पैतींस साल उॆ का अ3छे कदकाठी वाला धनाठय-सा पुiष भी चल रहा था। दोनY हँ सते हए ु बितया रहे थे। वह पुiष दगु श „ .'ब3चे तो अभी .. 'अरे । आप ये तो बताईये. 'हर िकसी के भाuय म) ब3चY का सुख कहाँ?' कहती हई ु वो पुनः बाहर पसरे हए ु अंधेरे को घूरने लग ी। मानो उसम) कुछ खोज रही हो। शायद अपना ही कुछ अमूbय. हbकी मुःकुराहट के साथ उसने दोनY को 'ग ुड मॉिनNग ' कहा। िफर उठकर कुछ कपड़े लेकर बाथoम की ओर चला ग या। कुछ दे र बाद लौटा। अब वो भी तैयार था। आकर अपनी सीट पर बैठ ग या.

नहीं था। तुषार एकटक उEह) जाते हए ु दे ख रहा था। 'अरे यार। िकसे दे खने लग े?' िफर मेरी िW के लआय को दे खने के बाद 'तुम भी इस चीज का शौक रखते हो ]या?' िमऽ ने ऑख ं ) घुमाते हए ु शरारत से कहा। 'तुहारा मतलब? ]या तुम इसको जानते हो?' तुषार ने qणांश को उसकी ओर दे खकर िफर उEहीं को दे खते हए ु पूछा। 'इसे कौन नहीं जानता दोःत? आधा अहमदाबाद शहर इसके हःन ु का आचमन कर चुका है । ये शहर की मशहर ू नुमाईशी चीज है . तुषार के ग ले म)। फटी-फटी नजरY से तुषार उसे जाते हए ु दे ख रहा था। (समाr) 6 वह 'यह राःता कहाँ को जाता है . समझदार कहीं के।' दोनY अपनी-अपनी राह हो िलए। मR चाय की थड़ी पर बैठा उन दोनY का वातालाप सुन रहा था। वेशभूषा से सादा-सा लग ने वाले उस आदमी की बात) सुनकर.. ये तो .. सफारी सूट वाले 'साब' की साहिबयत पर मुझे तरस आ ग या। वह खादी का पाजामा कुता पहने. पाग ल कहीं का।' 'आप भी जाइये..नेहा पाटनी। अमीरY की 'मौज' का मशहर ू साधन।' कहकर दोःत जोर से हँ स पड़ा। 'नहीं यार . ' शsद झटके से आकर अटक ग ये थे. हbकी-हbकी दाढ़ी-मूछY और बढ़े हए ु बालY वाला 'पाग ल कहीं का' ना जाने एकदम िकधर ग ुम हो ग या। मRने उठकर इधर-उधर दे खा। िकEतु दरू-दरू तक वो िदखाई नहीं िदया। जी म) उससे िमलने-बितयाने की तीोता थी। िकEतु उसको कहीं भी ना पाकर मन मसोस कर रह जाना पड़ा। घड़ी दे खी पौने नौ बज रहे थे। जbदी से चाय का अंितम घूँट उँ डे ला और ःकूटर ःटाट करके ूेस की तरफ बढ़ ग या। . साब?' खादी का कुता पाजामा पहने एक नवयुवक ने एक सफारी सूट पहने Hयि\ से पूछा। 'तुझे कहाँ जाना है ?' 'िजधर इन कदमY की ^यास बुझ सके।' 'शायर है ]या?' 'कदमY का इःतेमाल ]या शायर ही करते हR ?' 'चल जा..

'मैड म बुला रही हR ।' मेरा कहा 'ठीक है . चलो आता हँू ' भी उसने iक कर नहीं सुना। मR खीझकर रह ग या। भीतर ग या तो ूेस की मािलक सरला दीवान सामने ही बड़ी-सी िरवॉिbवंग चेयर पर बैठी थी और एक Hयि\ दरवाजे की तरफ पीठ िकए उनके सामने बैठा था। मRने उसको दे खा भर। पहचानने या जानने की िजkासा के िबना। ]यYिक रोज यहाँ कोई ना कोई लेखक या शायर आता रहता है । पुःतक छपवाने या अपनी पुःतकY की खरीद का अbपाँश बटोरने। शान से िजसे रॉयbटी कहते िफरा जाए। अपने लेखकीय दभ को सहलाते रहने के िलए। 'जी मैम?' मRने बुलवाने का कारण जानने को कहा। 'संचेती जी! अभी अपनी ूेस म) लग भग िकतनी पुःतकY की छपाई चल रही होग ी। बता सकते हR आप?' 'जी मैम। ठीक-ठीक तो नहीं। पर हाँ करीब पाँच सात तो चल ही रही हYग ी।' 'उनम) से िकसी एक के ूूफ इन साहब को दे खने को दे दीिजएग ा।' मR अभी तक 'उस' Hयि\ के ूित िनरपेq भाव से खड़ा था। सरला जी के कहने पर पहली बार आग े की तरफ झाँक कर दे खा और बेसाIता मेरे मुँह से िनकल पड़ा 'आप?' Hयि\ है रान। मैड म है रान। 'आप जानते हR इEह) संचत े ी जी।' सरला जी ने िवःमय से पूछा। 'नहीं मैम। लेिकन िमल चुका हँू आज सुबह ही।' Hयि\ वही 'पाग ल कहीं का' था। 'कहाँ?' उस Hयि\ की िनग ाहY और मैड म दीवान ने एक साथ पूछा। 'आज सुबह ही शालीमार के पास वाले नु]कड़ पर।' वह Hयि\ सुबह का वाकया याद करके हँ स िदया। मRने दे खा िक उस के ग ालY म) हँ सते समय ग …ढ़े पड़ जाते हR । सरला मैड म के भी ग ालY म) ऐसे ही ग ‹ढे पडते हR । उठी हई ु नाक और दबा हआ ु माथा भी ठीक मैड म जैसा ही जान पड़ता है । दोनY म) ग जब का साय था। 'अ3छा ठीक है .जाकर पहँु चा ही था िक िपयून आकर कह ग या. इEह) ले जाईए और काम समझा दीिजए।' 'जी मैम।' कहकर मR दरवाजे की ओर मुड ग या और वो मेरा अनुसरण करता हआ ु बाहर चला आया। मेरे सामने वाली कुसX पर बैठकर वह नजर) घुमा-घुमा कर ऑिफस का जायजा लेने लग ा। 'चाय ल)ग े आप? ]या नाम है आपका?' .

'लूँग ा। अनुराग ' 'बड़ा अ3छा नाम है ।' 'खराब भी लग ा हो तो अ3छा ही कहना पड़ता है । िववशता है हमारे समाज की। औपचािरक िशWता का तकाजा जो ठहरा।' मुःकरा िदया वो। 'जी नहीं. योग ेश दो चाय िभजवाना।' मRने जोर से हाँक लग ाई। 'कहाँ के रहने वाले हR आप?' 'इस शहर म) नया हँू . ]या इतना काफी नहीं है ?' 'िफर भी बताने म) ]या हज है ?' 'ग टर का रहने वाला हँू ।' ']या?' 'है रान ]यY होते हR ? ]या फक पड़ता है अग र मR मंदसौर का हँू और आप इलाहाबाद के? हR तो आिखर हम सभी ग टर के कीड़े । दे खा नहीं आपने सुबह मRने उसको 'साब' कहा और उसने मुझे 'पाग ल'। ]या फक पड़ता है संचेती जी? शहर का नाम बड़ा होने से वहाँ के बािशंदे भी बड़े हो जाएँए ये जoरी तो नहीं।' 'आप ठीक फरमा रहे हR । मR दे ख रहा था उस आदमी का रवैया िबbकुल बेहू दा था।' 'शायरY और पाग लY म) ]या कोई फक नहीं माना जाता आपके इलाहाबाद म)? मेरे मंदसौर म) अभी भी लोग Y को ये फक करना आता है ।' मR िनizर हो ग या। 'चिलए छोिड़ए उस वाकये को। आप मुझे बताइये िक मुझे ]या काम करना होग ा?' इस बीच चाय आ चुकी थी। उसने एक ^याला मेरी ओर सरका िदया और दसरा ू खुद ने उठा िलया था। 'ये लीिजए ये पाFडु िलपी है और ये इसके ूूफ। आपको बस इEह) aयान से पढ़कर ऽुिटिनवारण करना है बस।' 'ऽुिटिनवारण ही कoँ या संशोधन भी?' 'संशोधन लेखक के अिधकार की बात है । हम-तुम नहीं कर सकते।' 'चिलए साहब। ऐसा ही सही।' 'ठीक है ।' 'मुझे इजाजत दीिजए। नमःकार' कहता हआ ु वो उठकर बाहर की ओर चला ग या। मR . ऐसी बात नहीं है । वाकई नाम अ3छा है । अरे .

रम. ']या लाऊँ सर? िजन.. सो मR ही उसको अपने साथ ःकूटर पर ले ग या था। उस िदन पहली बार उसके एक कमरे के घर म) बैठ कर चाय भी पीयी थी। ऐसे ही धीरे -धीरे हम दोनY काफी घुल-िमल ग ए। शाम ढलते ही पूरा का पूरा इलाहाबाद खुशग वार हो उठता है । हिरयाली से ढका शहर हवा के साथ ग ुनग ुनाने लग ता है । कुछ सड़क) घरY की ओर मुड़ जाती है । कुछ मयखानY की ओर तो कुछ इधर-उधर। सूरज जाता जाता सारे माहौल पर बादामी रोग न पोत ग या जान पड़ता है । शै िफक के शोर म) अजीब-सा संग ीत सुनाई पड़ता है । 'ूेस' से िनकलकर घर जाने की बजाए अनुराग की राह तट के िकनारे -िकनारे चलती हई ु एक झYपड़ीनुमा रे ःटोरे Fट म) जा लग ी। अEदर छोटा-सा लॉन। िजस पर जग ह-जग ह ग ोल मेज) और उसके चारY ओर छोटी-छोटी मोिढ़याँ। माहौल म) कोई िरकाड धीमा-धीमा बज रहा है । '. तो कभी यूँ ही। एक िदन अनुराग को दhतर म) दे र हो ग ई थी.. ।' सुनकर उसे अपना एक कमरे का घर याद आ ग या। िजसम) दरी िबछी एक चारपाई...उसको जाते हए ु दे खता रहा। अजीब आग भरी िदखी उस आदमी म)। 'अनुराग ' तो नाम को भी नहीं था. शाम पूरे शबाब पर थी। अनुराग अभी तक चार पाँच पैग ले चुका था। टे िबल पर रखी . भीतर। मन म) सोचा और पुनः अपने काम म) लग ग या। अनुराग को ूेस म) काम करते हए ु दो तीन महीने ग ुजर ग ए थे। धीरे -धीरे उसकी मुझसे और मेरी उससे एक अजीब िकःम की आKमीयता हो ग ई थी। वो फ]खड़पने म) कुछ भी कह दे ता था. ःकॉच।' 'िजसको पीकर मR. अपना ग म लेके कहीं ओर ना जाया जाए . मR ना रहँू । वो ले आ।' 'िHहःकी चलेग ी सर।' 'ले आ। चला हम ल)ग े।' सुनकर बैरा लौट ग या। .. उसके नेचर म)। िवराग ही िवराग जान पड़ता था.... तो भी मR उसकी बातY को हं सी म) टाल दे ता था। एकाध बार वो मेरे घर भी आ चुका था। कभी ूूफ दे ने. िHहःकी. घर म) िबखरी हई ु चीजY को सजाया जाए . एक मेज-कुसX के साथ पड़ी िवलाप करती रहती है । खूट ँ ी पर ग ंदे कपड़े लटके होते हR और फश पर िसग रे ट के टYटे और दाi की खाली बोतल) िबखरी पड़ी रहती हR । िकस सामान को सजाया जाए? उसके 'kं' के सामान की तो सजावट ही िबखरे पन म) है । सजा के उसकी इस सजावट को ]यY िबखेरा जाए? सलीके से सजाना या करीने से रखना तौहीन होग ी उसके 'घर' की। यही सब सोचता हआ ु वो दरू कोने की एक टे िबल पर बैठ ग या। बैरा आया.

आवाज) सुनाई पड़ी। मालूम दे ता है कोई िपय]कड़ दाo पीकर फैल ग या है । मR आग े बढ़ ग या। 'तुम जानते हो मR कहाँ से आया हँू .. ये मेरे यार के जैसी है ... वाह वाह .... ये मेरे यार के जैसी है जो छोड़ी ना जाए . ' बड़बड़ाते हए ु उसने एक ही घूंट म) पूरा पैग हलक म) उं डे ल िलया और जोर से ऑख ं मींच कर 'आह' के साथ चटखारा िलया। मेरे घर का राःता भी उधर से ही होकर जाता है और जाते हए ु यहाँ से मR कोई ना कोई सsजी पैक करवा के ले जाता हँू । रोटी खुद स)कता हँू । मेरा यह रोज का काम है । रे ःटोरे Fट का पूरा ःटॉफ इसीिलए मुझे जानता है । साथ ही 'ूेसवाला' होने के कारण अितिर\ आदर और उधार खाता....... अनुराग बदहवाश हआ ु िचbला रहा है और दो तीन बैरे उसे घेर कर खड़े हR । आसपास बैठे लोग उचक-उचक कर उसे दे ख रहे हR । 'छोड़. ' मRने सुना तो लपक कर उस टे िबल पर पहँु च ग या। बैरY ने समान के साथ मुझे नमःकार िकया और अनुराग को लग भग घसीटते हए ु उठाने लग े। 'छोड़ दो इसे' मRने लग भग चीखते हए ु कहा। अनुराग को होश नहीं था। पर िफर भी मुझको आ ग या जानकर वो मुःकुरा िदया था और नए हौसले के साथ ग रजा. 'छोड़ो मुझे।' 'सर! इस आदमी ने दो सौ चालीस iपये की शराब पी ली है और दे ने के नाम पर इसकी जेब म) कुल तेइस iपये ही हR । उस पर ग ाली-ग लौज और कर रहा है ।' एक बैरे ने बढ़कर मुझे सारा वाकया बताया। 'ठीक है । इनका िहसाब मेरे खाते म) जोड़ दो और जाओ इनको परे शान ना करो। आग े भी कभी ऐसा हो तो मेरे खाते म) िलख िलया करो।' कहता हआ ु मR पास पड़ी मुŒढी पर बैठ .. कॉलर छोड़ बदिदमाग । जानता नहीं िकसी पढ़े -िलखे आदमी से कैसे बात करनी चािहए? ]या यही तमीज है इस शहर की .. शराब चीज ही ऐसी है जो छोड़ी ना जाए ... ु नमकीन की तँतरी लग भग खाली थी। मेज पर इधर-उधर ^याज के टकड़े िछतरे पड़े थे। धीमे-धीमे बज रहे संग ीत पर वो बीच-बीच म) तान म) आकर मेज पर थाप दे मारता था और साथ-साथ ग ुनग ुनाले लग ताथा '. ना मRने ऐसी नौबत आने दी। महीने की दसरी ू तीसरी तारीख को िहसाब चुकता कर दे ना मेरी आदत म) है । रोज की तरह आज भी ःकूटर यहाँ आकर अपने आप iक ग या। भीतर पैर रखा तो जोर-जोर से िचbलाने की. दोनY सुिवधाएँ लबे समय से िमलती चली आ रही हR । ना कभी होटल वाले ने तकादा िकया. वाह . मंदसौर से।' सुनते ही मR झटके के साथ पलटा। मRने दे खा.. वाह ..

. तो कहीं िग र पड़ोग े। चोट लग जाएग ी। इसिलए कहता हँू ... 'िजतनी भारी चोट पडे ग ी उतना ही ग हरा िनशान बनेग ा और िजतना ग हरा िनशान होग ा उसको भुलाने की कोिशश म) उतनी ही [यादा शराब खपेग ी . ? मुझे पुकारते हो?' 'चलो घर छोड़ दँ ू तुह) ।' ']यू?ँ यहाँ बैठने पर पाबEदी है ]या?' 'नहीं.. िफर भी। ]यY पीते हो इतनी?' मRने कहा 'संचेती। ये दे खो'ए उसने जोर-जोर से जमीन पर पैर मारना शुo कर िदया. ' वो िपनक म) था पर बात पते की कर रहा था। 'अ3छा. यहाँ से तो उठो।' जैसे-तैसे उसे उठाकर उसके कमरे तक छोड़ कर आया तो घड़ी की सूईयाँ रात के सवा uयारह बता रही थी। अब कैसा खाना और कैसी रोिटयाँ? सुबह की पड़ी ॄेड को सsजी के साथ खाकर सो ग या। जेहन म) थोड़ी दे र अनुराग रहा। िफर ना जाने कब नींद आ ग ई। .... अलसुबह दरवाजे के खटखटाने की आवाज से नींद खुली। दरवाजा खोलकर दे खा तो मR भgच]का रह ग या। सामने अनुराग खड़ा था। नहाया धोया साफ सुथरा अनुराग । कहीं से भी नहीं जान पड़ता था िक ये वही अनुराग है जो रात ग ये तक बदहवाश और मदहोश था। '...मॉिनNग संचेती साहब।' 'मािनNग ।' मुझे अभी भी अपनी ऑख ं Y पर भरोसा नहीं हो रहा था। 'ऐसे ]या दे ख रहे हR आप?' . ऐसा नहीं है । पर अभी तुम होश म) नहीं हो। अकेले जाओग े. चलो ठीक है । लेिकन. चलो छोड़ दँ ।ू' 'चोट से कौन कमबIत घबराता है संचेती?' मेरा नाम सुनकर मुझे आxय हआ। ु इस हालत म) भी वो मुझे पहचानता है । 'चोट से तुम तो नहीं घबराते िकEतु तुहारे घरवाले तो घबराते हYग े िक नहीं?' 'िकस के घरवाले? कहा तो था िक मR ग टर की पैदाईश हँू । ग टर वालY का कोई घर होता है ? घरवाले होते हR ?' उसकी कही बात को याद करके मR अचानक ग भीर हो ग या। '.ग या। बैरे अचरज से मेरी ओर दे खकर आपस म) खुसुर-पुसुर करते हए ु लौट ग ये। 'अनुराग ' 'हँु ह ..

जैसे िबना िकसी को पता चले पाग ल हआ ु था। उसी तरह िबना िकसी को बताए ठीक हो ग या . चाय बना डाली। वो अब भली ूकार जान ग या था िक मेरे कमरे म) कहाँ. '..'कुछ नहीं। आओ.. अलःसुबह कुछ और। ]यY?' वो मुःकुराया। 'हाँ' मRने ःवीकारोि\ म) िसर िहलाया। 'संचेती जी. कम चीनी.. ]या रखा है ? 'आप सोच रहे हYग े िक रात ग ए तो मR कुछ और था. कम दध ू वाली। ठीक बुिaदजीिवयY के अनुकूल। 'संचेती जी। उस िदन उस आदमी ने मुझे पाग ल कहा था। तो कुछ ग लत नहीं कहा था। वाकई मR पाग ल हो चुका हँू एकबार। कुछ िदनY पाग लखाने म) रह भी चुका हँू । इलैि]शक शॉक भी खा चुका हँू । पर हर शॉक मुझे मेरे अपने झटकY से कमतर ही लग ा। इसिलए इलैि]शक झटकY का कुछ खास फक नहीं पड़ा. आओ भीतर आओ।' कहते हए ु मRने उसको अEदर आने के िलए राःता िदया और दरवाजा भेड़कर खुद भी चला आया। वो चारपाई पर बैठा मेज पर फैली मेरी िकताबY को उलट-पलट कर दे ख रहा था। मुझे दे खकर मुःकराया और पुनः िकताबY के पEने पलटने लग ा। 'कैसे हो अनुराग ?' 'जैसा आपने छोड़ा था। िसवा इसके िक मदहोश नहीं हँू ।' 'चाय िपओग े?' 'पीऊँग ा। मग र बनाऊँग ा मR। कहकर िबना उzर की ूतीqा िकए वो कोने म) पड़े एक मेज पर चाय पानी के सामान की तरफ बढ़ ग या। मRने उसे रोका नहीं। कुछ दे र बाद वो हाथ म) काँच के दो िग लास िलए लौटा। उसने िबना मुझसे िकसी भी चीज के बारे म) पूछे. मR िपय]कड़ नहीं हँू । पर जब कभी भी पीने लग ता हँू तो िफर पीता ही जाता हँू । iकता नहीं।' 'पर. मुझपर। हाँ.. मेरा बाप ना जाने कौन था। पर मेरी एक माँ जoर थी। जो मुझे जनने की पीड़ा तो सह ग ई पर मुझे रखने का हौसला ना कर पाई . इसकी जoरत ]यY पड़ती है तुह) ?' 'लबा िकःसा है साहब। जाने दीिजए।' 'अग र बताना चाहो. तो मR सुनना चाहँू ग ा।' मRने चाय की चुःकी लेते हए ु कहा। चाय िबbकुल बिढ़या। तेज पzी.. शहर के िकसी कचरे के िडsबे म) डालकर . ' ठहर कर उसने चाय की एक बड़ी सी घूँट ली और िफर बताने लग ा... ' 'ऐसा?' मR आxयचिकत। ..

फटे -पुराने पहन पहन कर .. ' 'तुम कैसे बच ग ए पर?' 'िजसकी िकःमत म) ठोकर) िलखी हY उसे हालात मरने नहीं दे ते। िजEदा रहना िजसके िलए मरते रहने की आवँयक शत हो उसे भग वान भी कैसे मरने दे ता .... जूता-पॉिलश करके .... तो ]या होग ा?' 'कम से कम तुह) तुहारा खोया हआ ु अिधकार तो वािपस िमल जाएग ा।' मRने खाली कप एक ओर सरकाते हए ु कहा। 'ग या हआ ु समय भी िमलेग ा ]या?' मR सुनकर अवाक रह ग या। मR कुछ कहता उससे पहले ही वो उठकर बाहर की तरफ चल िदया। .. '. अनुराग को ूेस म) काम करते लग भग छ:सात मिहने होने को था। ूेस भर म) उसके फ]खड़पन और मुँहफट नेचर के चच„ होने लग े थे। पर सभी उसको 'मन का साफ' भी करार दे ते थे। िपछले कुछ िदनY से मR नोट कर रहा था. ना पीछे । एक पित था.. जूठन खा- खाकर..... िक वो कुछ बुझा-बुझा सा रहता है और [यादा बातचीत भी नहीं करता है िकसी से। िकEतु िकसी के Hयि\ग त जीवन म) हःतqेप ना करने की मेरी आदत के चलते मRने उससे कभी कुछ नहीं पूछा। सरला जी के ऑिफस म) मR काफी सालY से हँू । बड़ी भली मिहला है । जीवन म) िजसके आग े कोई. उॆ आग े सरकती रही। कद िनकल आया तो अखबार बेचना शुo कर िदया। एक दयालु आदमी ने पढने म) मदद कर दी। थोड़ा बहत ु पढ़ िलख ग या . भाँडे िघस-िघसकर . न बवाल .. ना मुकदमा। ना वािरस.. अqत यौवना रह जाती है और बाप सफेदपोश शरीफ। ना कोई केस बनता है .. वो बहत ु साल हए ु उसको और इस ूेस को छोड़कर दिनया ु से कूच कर ग या। तब से ये हR और ूेस है । पूरा समय ूेस को दे ना और खाली समय म) कुछ ना कुछ पढते रहना बस ये ही दो काम थे इस भि मिहला के। आिफसकिमयY के साथ भी उसका बड़ा ःनेिहल मेल-िमलाप था। मR चूिँ क काफी पुराना . िघसते-िघसाते आज आपके सामने हँू ..'अ]सर ऐसा ही होता है । कचरे के ढ़े र म) पड़े नवजात िशशु को या तो चील-कौवे खा जाते हR या कुzे घसीट-घसीट कर िचथड़े कर दे ते हR । माँ. िक तुहारे माँ-बाप कौन हR ? कहाँ है ? ]या करते हR ?' मRने पूछा। 'कोिशश करने से हािसल ]या होग ा? और पता चल भी ग या तो ... ' वो ग भीर हो चला था। चाय खKम हो चुकी थी। मRने िसग रे ट सुलग ाकर उसको ऑफर की। उसने ले ली। एक लबा कश ख)चने के बाद धुआ ँ छोड़ता हआ ु वो िफर बताने लग ा. ' वो मुःकुरा िदया। 'तुमने जानने की कोिशश नहीं की..

मैड म के Hयवहार म)। हो सकता है . वापस बाहर की ओर मुड ग या। जाते हए ु मेरी नजर अनुराग से िमली। दे खकर मेरी iह काँप ग ई. छVटी लेकर' मRने मन ही मन कयास लग ाया। उधर मैड म भी बड़ी अनमनी-सी रहने लग ी थी। ना िकसी से पहले-सा हँ सना बोलना. अनुराग ने कोई बदतमीजी कर दी हो. संचेती साहब।' 'सॉरी मैड म मR िफर आऊँग ा।' मR जाने को हआ। ु 'अरे . उसका चेहरा अजब कठोरता िलए था और ऑख ं ) िविचऽ भयावह। मR चुपचाप चला आया। मन म) अजीब-सी ऊहापोह थी। ']या बात थी? मैड म ]यY रो रही थी?' अनुराग ]यY बोिधत था? आिद आिद ..मुलािजम हँू .. इसिलए जब-तब िबना पूछे उनके ऑिफस म) घुस जाया करता था और वो हँ सकर कह उठती िक 'आइये. संचेती साहब।' एक रोज अपनी आदत से मजबूर मR धड़धड़ाता हआ ु मैड म के ऑिफस म) घुस ग या। मेरे हाथ म) एक जoरी फाईल थी। अEदर पाँव धरते ही मR सEन रह ग या। मैड म अपनी िरवॉिbवंग चेयर पर बैठी रो रही थी और अनुराग आबोिशत मुिा म) दीवार की तरफ मुँह िकए खड़ा था। मुझे आया दे खकर मैड म ने जbदी से ऑस ं ू पgछे और बोली. अनुराग ऑिफस नहीं आया। तीसरे िदन भी। चौथे.। कुछ दे र सोचते रहने के बाद मR अपने काम म) लग ग या। मिहलाओं का छोटी-छोटी बातY पर रो पड़ना और अनुराग का अ]खड़पने म) ग ुःसा जाना. छठे िदन भी। 'शायद ु मंदसौर ग या होग ा. दोनY ही ःवाभािवक बात) थी। असामाEय कुछ नहीं था। िकसी बात को लेकर कहासुनी हई ु होग ी। और ]या? बात आई ग ई हो ग ई। दसरे ू िदन. पाँचवे. िकEतु उसके िलए मैड म ]यY उदास होती हR ? अब मुझे ये भी लग ने लग ा था िक हो सकता है मैड म ने ग ुःसे म) आकर अनुराग को िनकाल बाहर िकया हो और अब बेचारे की हालत के बारे म) सोच सोचकर परे शान हई ु जाती हY। करीब दस िदन बाद मेरे पास एक पऽ आया। िलखावट से ही मR पहचान ग या िक पऽ अनुराग का है । मRने जbदी-जbदी पऽ को खोला और पढ़ने लग ा। पऽ बढ़कर मR सEन रह ग या। . 'आईये. आईये-आईये। किहए ]या काम था?' मैड म ने रोक िलया। 'मैड म ये पेपर िमल के ऑड र पर आपके साईन चािहये थे।' मRने फाईल आग े बढ़ाते हए ु धीरे से कहा। मैड म ने चुपचाप साईन करके फाईल मुझे लौटा दी। मR िबना एक भी शsद बोले. ना कोई बातचीत। एकाएक बड़ा पिरवतन आ ग या था.

अनुराग . बस। सरला दीवान और अनुराग दोनY का चेहरा एक साथ मेरे मिःतंक म) कgध ग या। दोनY म) ग जब का साय था . नमःकार। िबना आपको बताए..। (समाr) 7 अनकही कहने को शहर म) अलग घर है । घर का सारा सामान है । सुिवधा की सारी चीज) हR । िकEतु िफर भी खुद को बेघर पाता हँू । घर म) रहता कहाँ हँू ? दसरे ू शहर म) नौकरी और इस शहर . कई दफा िजस चीज के िलए इEसान उॆभर तड़फता है . अचानक ही उसे पा लेने पर उससे िवमुख हो उठता है । तब उस चीज की महzा अपने ःवािभमान के समुख तु3छ जान पड़ती है । कुछ ऐसा ही मेरे साथ हआ ु िक मुझे इलाहाबाद छोड़ना पड़ा। ]यYिक मR अनुराग दीवान होकर जी नहीं सकता था। आपका .. बग ैर कुछ कहे -सुने इस तरह चुपचाप शहर छोड़ आने के िलए qमा चाहता हँू । कुछ कहने-सुनने का अवसर ही नहीं िमला। ना ही हौसला हआ। ु भाई.भाई संचेती जी.

म) बीवी, ब3चे, घर। सब कुछ होते हए
ु भी, ना कुछ का हकदार मR। रात ग ए चोरY की तरह
आना और पौ फटते ही भाग जाना। या हhते म) िसफ एक िदन, रिववार के िलए आना
और वो रिववार भी ःवे3छा से नहीं जी पाना। ददŽु व इससे कुछ िभEन होता है ]या? पyी
की नौकरी और ब3चे की परविरश दोनY कारणY से 'kं' तो मकान होकर रह ग या और
ससुराल म) रहना िनयित। सारे -सारे िदन और कई-कई िदन ससुराल म) रहते रहने पर
'जंवाईपन' कहाँ रह जाता है ? आस-पड़ौस, ग ली-मोहbले वाले भी सोचते हYग े िक 'ये यहीं
पड़ा रहता है ।' िकEतु ग िरमा का iऑस
ं ा चेहरा और भोली ऑख
ं ), अपने ब3चे को दे खने की
चाह, सारे सब के बावजूद भी हँ सते-हँ सते जीने की पैरवी करती हR । तब िववश हो जाता
हँू । जी रोता है , पर बेबसी कुछ करने नहीं दे ती। ितस पर इसी शहर म) आकर नौकरी
करने का आमह मुझे बार-बार मेरी कातरता का अहसास करा जाता है । पहली बात तो
यहाँ नौकरी होती, तो मR ]यूँ परदे स म) पड़ा होता? दसरे
ू , नई नौकरी के िलए पुरानी और
ःथायी नौकरी को छोड़ना कौनसी समझदारी है भई? िकEतु पyी की नौकरी और ब3चे का
निनहाल म) होता पालन-पोषण दोनY िवचार एक साथ मेरी सोच को अपािहज बना दे ते हR ।
ऐसे म) पyी का ःवाभािवक ^यार 'कहीं मत जाओ। यहीं रहो ना। िकतने-िकतने िदन म)
िमलते हR । आपसे बात) करने का जी नहीं करता ]या?' भी तब ःवािभमान को तमाचे
मारता-सा जान पड़ता है । घर के सभी सदःय काम-धंधे पर िनकल जाएँ, औरत) घर के
काम म) Hयःत हो जाएँ। तब 'जँवाईराजा' घर पर बैठकर ]या करे ? अिधक से अिधक टीवी
ऑन कर के बैठा रहे । यही न? कैसी तड़प होती है , तब भीतर।

कई बार जोर से रोने का मन होता है । कई बार सब कुछ छोड़-छाड़ कर, पyी की नौकरी

छड़वाकर ब3चे सिहत अपने साथ ही ले जाने को जी करता है । पर तभी पढ़ी-िलखी पyी
की नौकरी और उसे छोड़ने के बाद उसके मन म) आने वाले 'नारी-उKपीड़न' के िवचारY के
बारे म) सोचकर हिथयार डालने पड़ते हR । ब3चे की परविरश का सदका भी बीच म) आकर
खड़ा हो जाता है । मेरे घरवाले पहले ही पbला झाड़ चुके हR । नौकरीपेशा पyी कैसे ब3चा
पाले, तब?

ितस पर यूँ भी चु^पी साधे रहता हँू िक कहीं मेरे कुछ भी कहने को पyी अEयथा ना ले
जाए 'ये सब इतना करते हR ? िफर भी आप ऐसा सोचते हो। [यादा सोचते हो तो अपनी
माँ को ]यY नहीं बुला लेते? कोई आए तब ना? ले चलो मुझे तो अपने घर। बेचारे परे शानी
उठाकर ही रख रहे हR मुझे, और आप हR िक ... ।'

िदन भर मैला-कुचैला सा कुता पाजामा पहने घर म) पड़े रहना। पyी के पास भी बैठना तो
इस खटके के साथ िक कहीं कोई आ ना जाए। ितस पर ससुराल म) रहते हए
ु अपनी और

अपने िरँते की ग िरमा का Iयाल रखने की अितिर\ सावधानी, सा अलग । इतने मानिसक
तनाव म) ^यार िकया जा सकता है भला? तब पyी कहे िक, 'आप ग ुमसुम ]यY रहते हो?'
तो ]या जबाव दँ ?ू कोई बताए।

मR आज की तारीख म) कहीं का भी तो नहीं हँू । माँ बाप का घर, जो नौकरी के िलए
िनकलते ही छोड़ िदया। छोड़ना ही पड़ता है । ःवाभािवक है । जहाँ नौकरी है वहाँ का घर,
जो अ]सर बंद ही रहता है । वहाँ मR रहता ही िकतना हँू ? िजस शहर म) पyी-ब3चे हR , वहाँ
का घर। िजसका बंद का िकराया दे ना मेरे िससकते ःवािभमान को िजंदा रखने का झूंठा
दं भ है और कुछ नहीं। तथा मेरी पyी का घर, यािन मेरा ससुराल। िकEतु मेरा घर कोई-
सा भी नहीं है । ]या यूँ बेघर होने को घर 'बसाया' था? इससे अ3छा तो मR अकेला ही था।
मेरा जीवन या तो डे ली अप डाऊन करता शे न म) बीत रहा है या रात के अंधेरे म) ससुराल
आकर सोने और पौ फटे ही िनकल जाने म)। ऐसे म) रात को पyी के पास भी रहते हए

अपनेर ्कzHय का िनवाह ठीक से नहीं कर पाता, जानता हँू । मन की कोमल भावनाओं पर
तन की थकन और िदमाग का तनाव ही हावी रहता है । तब पyी के सवाल 'आप हमसे
^यार नहीं करते?' का ]या जवाब दँ ?ू ईAर बताए।

अपने िलए, सोचता हँू तो समय ही नहीं बचा। अपनी iिचयY, अपने दोःतY, अपनी बातY के
िलए अब कहाँ समय रहा? घर से िनकलते समय 'जbदी आ जाना। दे खो एक िदन को तो
आते हो, उसम) भी घूमते रहते हो।' सुनकर इतनी कोhत होती है िक कहीं जाकर मर जाने
का मन करता है । शहर म) हँू तो ]या मुझे चौबीसY घFटे ससुराल म) ही रहना होग ा?
]यYिक वहाँ मेरी पyी है । या घर से दो घड़ी भी बाहर अपनी सुिवधा या अपने काम से
िबना बताये जाना नहीं हो सकेग ा? जाना होग ा तो प]का टाईम टे िबल बताकर। वरना
नहीं। इतनी पाबंदी और ऐसी तनावयु\ िजEदग ी दरयान की दिरयाँ
ू बढ़ा सकती है , ^यार
नहीं। ^यार, कोई ितल का ल…डू थोड़े ही है जो चाहे जब खा िलया जाए या िदनभर खाते
रहा जाए।

िकEतु पyी के भोलेपन और िनहायत िनxछलता के समुख सारे ग ुःसे को पीकर 'जbदी
आ जाऊँग ा' कहने के अलावा कुछ और सूझता ही नहीं। थोड़ा-सा मुःकुराना भी नहीं भूलता
मR ...।
'इतने िहःसY म) बँट ग या हँू मR - मेरे िहःसे म) कुछ बचा ही नहीं।'

... सोचते-सोचते अिखल को पता ही नहीं चला िक कब ःटे शन आ ग या। पैस)जर के
यािऽयY के शोर-शराबे और जन की सीटी ने िमलकर उसकी तEिा भंग की। उसने अपना

छोटा सा बैग , िजसम) एक पानी की बोतल, सुबह का अखबार और चँमे के अलावा कुछ
नहीं होता, उठाया और डsबे के ग ेट पर आ ग या। िघसटती शे न आिखरी एक जोरदार ॄेक
के साथ iकी। चढ़ने-उतरने वालY के बीच जोर आजमाईश) होने लग ी और इसी ध]का-
मु]की म) से राःता बनाते हए
ु अिखल जैसे-तैसे ःटे शन पर उतरा। उतरते ही उसने इधर-
उधर दे खा और तेज कदमY से ःटे शन से बाहर की ओर चल िदया। सामने ही एक टै पू
वाला िचbला रहा था, 'मोदी, मEडी, कैप, सदर ... ' अिखल ने iकने को हाथ िदया और
'... मोदी?' कहता हआ
ु टै पY म) लटक ग या, टै पो चल पड़ा।

'मोदी िमनरल' वो कपनी है , जहाँ, अिखल जूिनयर इं जीिनयर की है िसयत से काम करता
है । मEडी, कैप, सदर ... आिद उस माग  म) पड़ने वाले अEय ःटॉपेज हR । मोदी म) अिखल
को सुबह नौ से पाँच बजे तक काम करने की uयारह हजार iपये पग ार िमलती है । दे खने
ु इधर-उधर का लेना दे ना
म) पग ार कम नहीं है । उस पर पyी की पग ार तथा थोड़ा बहत
आिद िमल-िमला कर एक अ3छी खासी रकम मिहने पर हाथ म) आती है । पर ना जाने
कहाँ चली जाती है ? इतनी जग ह बँटी है िजEदग ी िक खच„ भी बहत
ु बढ़ ग ये हR । िजस पर
माँ बाप के ूित उसकार ्कzHय, अलग । कई बार तो दो-दो मिहने तक एक पैसा तक नहीं
भेज पाता घर। बड़ा अपराध बोध होता है तब 'सारा पैसा उड़ा ]यY दे ता हँू मR?' बचत के
नाम पर भी शूEय। बRक-बैल)स के नाम पर चार पाँच हजार iपये माऽ। कलाई उठाकर
घड़ी, दे खी पौने नौ बज रहे हR । 'समय पर पहँु च जाऊँग ा वरना तो डाँट सुनने को िमलेग ी।'
वैसे अब अिखल डाँट सुनने का भी अnयःत हो चुका है ।' उसकी जग ह कोई और होता तो
अब तक िनकाल िदया ग या होता। िकEतु वह iका है - उसके काम के कारण। काम से
मािलक खुश हR ।

... पाँच बजे का सायरन बजते ही अपना झोला उठाकर सड़क की तरफ दौड़ना, िकसी टै पो
को हाथ दे कर रोकना और पुनः चल पड़ना रे bवे ःटे शन की तरफ। छo बजे वाली
पैसेEजर पकड़ने के िलए। या कभी अपने बंद पड़े एक कमरे के मकान म) जा iकने के
िलए। अिखल का यहाँ वाला मकान मािलक भी उस से बड़ा खुश है । बंद मकान का
िकराया जो िमलता रहता है उसे। ितस पर िबजली पानी का कोई खचा नहीं। पाखाना
खराब होने की कोई िखच-िखच
् ्नहीं और रोज-रोज की िहल-ह[जत
ु नहीं। अिखल के इस
'बेघरपन' का फायदा अग र िकसी को हो रहा है तो वो उसके मकान मािलकY को। यहाँ
वाले भी और वहाँ वाले भी। उसकी बड़ी तारीफ) करते हR 'बड़ा भला आदमी है । इतनी बड़ी
नौकरी करता है , पर जरा भी ग ुमान नहीं। वग ैरह-वग ैरह।'

रात को चारपाई पर पड़ते ही पुनः अपने दभा
ु uय का Iयाल आ जाता है उसे। पyी से दरू,

साइवर के अलावा अग र कोई जाग रहा था तो वो थीकृ दीqा। दीqा ने मुVठी म) कुछ दबा रखा था. ग ँवाने को। .... िजसको सोचने का उसके घर म) िकसी और के पास व\ नहीं था। उसने एक बार िफर पिरमल का पऽ खोला और बस की मिaदम नीली रोशनी म) ऑख ं Y के बहत ु पास लाकर पढने लग ी. बहत ु ूितqा कर ली तुमने। अब और समय शेष नहीं रहा..िसफ धुआ ँ उग लती.ब3चे से दर। ू कैसा ग ह ृ ःथ है ? िकसके िलए कर रहा हँू . खराटे लेती लाश)। . दीqा. ये िनत का तनाव। सबकुछ छोड़छाड़ कर चल दे ने का जी करता है । िकEतु अग ले ही पल वह 'आग े की' सोचकर रह जाता है । मन भावुक होने लग ता है तो मिःतंक िबयाशील हो उठता है । 'सब ठीक हो जाएग ा' कहकर खुद को साEKवना दे ता है और सो जाता है । सुबह उठकर पुनः दौड़ने के िलए . ग म कपड़Y से खुद को लादे यूँ पड़े थे.. वो भी इस कड़कड़ाती ठं ड म) कहीं िकसी िनवाये से कोने म) दबक ु ग ए थे. मानY लाश) पड़ी हY। बस उनके खराटY की आवाज) ही उनके िजEदा होने का ूमाण दे रही थी। सभी ऑिफसरY के वे नाम और ओहदे जो िदन की रोशनी म) एक-दसरे ू को बड़ा-छोटा मानते हR . हम कोट म) शादी कर ल)ग े। मेरे घरवालY को तो शायद मोटे दहे ज के लालच ने इस िववाह के िवiaद कर रखा है । िकEतु लग ता है िक तुहारे माँ-बाप को भी लड़की की कमाई का चःका लग ग या है .. मग र िनणय नहीं कर पा रही थी। ]या करे ? ]या ना करे ? असमंजस के चौराहे पर खड़ी दीqा इस बफली रात म) भी जाग ी ऑख ं Y से बस वही सब सोच रही थी . शायद। इस व\ सब एक जैसे थे .... वरना घर म) बैठी िववाह-योuय लड़की को यूँ अनदे खा ना करते। . सारी बस म).. शायद पिरमल का पऽ था। िजसे वो कई बार पढ़ चुकी थी .. हाड़तोड़ पिरौम? ये रोज की भाग दौड़. (समाr) 8 कभी यूँ भी तो हो पूस की घनी सद रात थी। िदbली से लौटते हए ु ल]सरी बस की फोम वाली सीटY पर बेसुध आिफसस िहचकोले खाते और खराटे ख)चते भारी बोरY की तरह पड़े थे। सद झYके लाख चाहकर भी बस के मोटे कांच को पराःत नहीं कर पा रहे थे। जुग ल की शादी से लौटते हए ु सारे अफसर और कमचारी अपनी-अपनी िनिा म) मuन.... '.

हम लोग शादी कर लेते हR . तभी अचानक उनके िपताजी िकसी जरा- सी कहासुनी पर नौकरी से िनकाल िदए ग ए। तंग ी के िदन शुo हो ग ए थे। घर म) ग ुजारा चलाने के भी लाले पड़ ग ए थे। िशखा.. तुहारा-पिरमल।' अचानक दीqा को जुग ल की शादी का ँय याद हो आया। कैसे सुEदर लग रहे थे... इसिलए तुहारे और मेरे घरवालY की उपिःथित-अनुपिःथित का कोई खास फक नहीं पड़े ग ा . दोनY शादी वाली कुिसयY पर बैठे? वह कbपनालोक म) खो ग ई। सोचने लग ी. तुम चाहो तो इसी हhते एक िदन ही की केजुअल ले लो. दीqा जब इFटर म) थी और िशखा बी... घर का काम चलता रहा। इस बीच िशखा करीब-बzीस साल की हो ग ई। िकEतु माँ और िपताजी ने कभी भी उसके िववाह की िचEता नहीं िदखाई। िपताजी तो शायद मजबूर थे और माँ.. पर िकसी अEय नौकरी का जुग ाड़ नहीं बैठ पाया। एकाध जग ह काम िकया भी तो वहाँ उनकी पटरी मेल नहीं खा पाई। इस बीच दो बार उनको िदल का दौरा भी पड़ चुका था। िजसने पिरवार की माली हालत को और भी चकनाचूर कर िदया था। महँ ग ा ईलाज ही एक उपाय था. उन कुिसयY पर वो ू और पिरमल बैठे हR ...... म). िकस बूते पर िववाह की िचEता जग ाती मन म)? इन लड़िकयY की कमाई से ही तो घर चल रहा है । ये भी जाती रही.. िनशा और ूदीप चारY की पढ़ाई का खच अलग । बड़ा किठन समय आ ग या था। िकसी जान-पहचान वाले की िसफािरश से िशखा दीदी को एक ूाईमरी ःकूल म) टीचरी िमल ग ई। दीqा भी पढ़ाई छोड़कर छोटे -मोटे टयूशन पढ़ाने लग ी। घर की ग ाड़ी जैसे-तैसे सरकने लग ी। ूदीप तब दसवीं म) था और ग ु…डी (िनशा) छठी म)। बेिटयY की कमाई से घर चलने लग ा। लोग बात) बनाने लग े। िपताजी को बेिटयY की रोिटयाँ कचोटने लग ी। लोग Y ने नसीहत) दे -दे कर जीना दभर ू कर िदया था। िपताजी ने बहत ु भाग दौड़ की. अग र मँजूर हो तो फोन करना ... दीqा. जीवन रqा का। िशखा और दीqा दोनY िदन-रात खटने लग ी .ए.. सोचते-सोचते उसके कानY की लव) तपने लग ी। िवचार तब टटे जब ॄेकर पर बस जोर से उछली और सारी सवािरयY के साथ वो भी उछल पड़ी। . िपताजी ने भाग दौड़ करनी शुo की। िकEतु सब जग ह मोटे दहे ज की माँग के समुख बेबस होकर रह ग ये। अंत म) हार कर या शायद रःम आदायग ी की तरह भार उतारने भर की ग ज को उEहYने िशखा का हाथ एक दजबर ू . वैसे भी ःवाथX लोग Y की दआएँ ु बेअसर होती हR . तो माँ चुपचाप वहाँ से उठकर चली आती। िपताजी को िदल के दौरे से अिधक यही घुन खाये जा रहा था। वो िदन-ब-िदन सूखते जा रहे थे। जब सारे िरँतेदार भी टोकने लग े तो. तो? पास-पड़ौस की औरत) बात) बनाती. .

.ए. कर ग ई सो शासन सिचवालय म) अःथाई ]लक हो ग ई। घर और घरवालY को िशखा के जाने का अहसास [यादा नहीं खला। . समय ग ुजरता रहा। दीqा ःथाई हो ग ई। ूदीप को उसने बी. दवा ले आएग ी?' 'ूदीप से कहा था?' दीqा ने पूछा था। ]यYिक वो जानती थी िक परचे म) महं ग ी-महं ग ी दवाईयाँ िलखी हR । 'वो कब सुनता है ? उसके भरोसे तो परचा तीन िदन से पड़ा ही है ।' उसने परचा चुपचाप मोड़कर पस के हवाले िकया था और अपना बैग उठाकर चल पड़ी थी। जुग ल की शादी म) जाने का यूँ तो उसका कोई पूवि नयोिजत कायबम नहीं था। पर घर की घुटन से कुछ समय को दरू जाने की ग रज से वो चल पड़ी थी। कुछ घFटY की ही सही . ये मंशा भी उनके भीतर कहीं छपी लाना चाहती थी। थोड़ा बहत थी। दीqा का Iयाल तब भी उनके जेहन से नदारद था। कभी कभार कह जाती.दो ब3चY के बाप के हाथ म) दे कर मुि\ पा ली और िकसी को कोई फक नहीं पड़ा। िशखा ने भी िनयित के समुख समपण कर िदयाथा। शायद भाuय म) इससे [यादा था भी नहीं। िशखा के चले जाने के बाद ग ह ृ ःथी का बोझ अकेली दीqा के कंधY पर आ ग या। दीqा इस बीच ूाइवेट बी. संकोच के साथ परचा िदया था 'दीqा... 'ूदीप का sयाह हो जाए तो दीqा के भी फेरे िफरा दँ ।ू' दीqा जब यह सुनती तो मानो भीतर तक सुलग उठती। उसको अपने साथ-साथ ग ु…डी का भिवंय भी िदखाई दे ने लग ता। इस बीच दीqा का पिरचय िव’ुत भवन म) जूिनयर इं जीिनयर के पद पर कायरत पिरमल से हआ। ु पिरचय मेल-िमलाप म) बदल ग या और दीqा पिरमल के Iवाब सजाने लग ी। पिरमल भी उसे चाहने लग ा। एक बार वो िकसी बहाने पिरमल को घर भी ले आई। उसकी खूब बढ़-चढ़कर तारीफ) भी की माँ से। िकEतु माँ के कान पर जूँ नहीं र) ग ी। यही सब सोचते हए ु उसने पिरमल का पऽ मोड़ कर पस म) रख िदया। पस बंद करते समय aयान आया िपताजी की दवाओं का पचा भी रह रहा है । कल सबसे पहले दवाएँ लेग ी। सुबह ही तो माँ ने बड़े . तक पढ़ा िदया। अपने सपकw से उसकी नौकरी का भी बंदोबःत करा िदया। चार हजार iपये महावार उसे िमलने लग े। िकEतु दीqा को कोई राहत नहीं िमली। बेटा कमाने लग ा। िकEतु माँ बाप को िफर भी बेटी का Iयाल नहीं आया। दीqा भी उॆ के ढलान की तरफ चल पड़ी .. ठीक िशखा की तरह। िकEतु िकसी की इस ओर कोई तव[जो नहीं जान पड़ती थी। उधर माँ.ए. अब िदन-रात ूदीप की बहू लाने के सपने सजाने लग ी थी। खाती-कमाती लड़की ु ु दान-दहे ज भी आ जाए.

... इस बात का सभी लड़िकयY को बेहद अफसोस था। वो होती तो जoर कुछ करती। लड़िकयाँ उनकी बहत ु इ[जत करती थीं। पास ही मैटन ऑटं ी खड़ी थी. वाली ठसक भरी मुःकुराहट। हॉःटल के सारे दरवाजे बंद करवा िदये ग ये थे। और कैपस म) हर िकसी से कड़ी पूछताछ की जा रही थी। आमतौर पर ऐसा कभी नहीं होता। सभी लड़िकयाँ सपEन खाते-पीते पिरवारY से हR । पढ़ी- िलखी मै3योर लड़िकयY को कभी इस िW से दे खा भी नहीं ग या। िकस पर शक कर) ? और . सब धीरे -धीरे िहलने- डु लने लग े थे। बस ने उसे सीिवल लाईEस ःटॉप पर उतार िदया। . घर जाने के िलए जब वो बाईस ग ोदाम वाली पुिलया चढ़ रही थी तो एक-एक कदम उसका ठोस था। एक-एक साँस ढ़ थी। मन का िनxय अब मिःतंक का िनxय भी हो ग या था। घर पहँु चते ही उसने एक काग ज िलया और अग ले िदन की केजुअल लीव की दरIवाःत िलख डाली। . और एक ग हरी साँस छोड़ती हई ु कुसX की टे क पर ग द न पीछे की ओर लटका कर बैठ ग ई। ओऽऽhफ।् (समाr) 9 िडःग िःटं ग ग bस कॉलेज के हॉःटल म) अजीब-सा तनाव और खामोशी पसरी पड़ी थी। अहाते म) खड़ी लड़िकयाँ कानाफूसी कर रही थी। ग ेट पर खड़ा ग ाड मुःतैदी से अपनी बEदक ू सहाले ु खड़ा था। हॉःटल वाड न वीणा मैड म छVटी पर थी. वही मुःकुराहट। कले]टर की बेटी. आिखर कब तक माँ बाप उसकी भावनाओं को इसी तरह कुचलते रह) ग )? पिरमल भी कब तक मनुहार) करे ग ा? कब तक ूतीqा करे ग ा? दीqा सोचते-सोचते ढ़ होती ग ई। मन ही मन एक िनxय करने लग ी। बस के बाहर धीरे -धीरे उजास फैल रहा था..ताजी हवा तो िमले। अब तो वो बुरी तरह तंग आ चुकी थी अपनी हालत से। अपने जीवन से। वह नहीं जान पा रही थी िक कब तक. जो अचिभत-सी इधर-उधर दे ख रही थी। िर]की अकेली अहाते म) पड़े सोफे पर बैठी िकसी अंमेजी मैuजीन के पEने पलट रही थी। उसके चेहरे पर कोई परे शानी नहीं थी। बिbक थी... चहचहाट) जाग ने लग ी थी। कुछ ही दे र म) जयपुर आने वाला था। ऑिफसस म) भी हलचल होने लग ी थी .

ये ु घटना। वो छVटी पर थी। उसकी ग ैर माजूदग ी म) उससे ए]स^लेनेशन माँग िलया ग या था। पूरे कॉलेज म) यह बात फैल ग ई थी िक ग bस हॉःटल म) रहने वाली िर]की मेवाल का मोबाईल फोन चोरी हो ग या है और वो पुिलस म) िरपोट िलखवाना चाहती थी. ' सभी बूिढ़याँ बैठी खीस) िनपोरती रह ग यी। हॉःटल वाड न वीणा मीिटं ग म) मौजूद नहीं थी और कॉलेज ूशासन का मानना था िक उसी की लापरवाही से लड़िकयाँ अिधक ःव3छं द हई ु हR और उसी की पिरणित है . िूंिसपल. सो कोई भी कुछ भी कहने.. बदनामी हो जाएग ी। लडकी का मामला है . सीिनयर ूोफेसस आिद के साथ कॉलेज मैनेजमेFट की दो घFटे तक चली मीिटं ग म) िकसी एकमत िनणय पर कोई नहीं पहँु च पा रहा था। 'लड़िकयY को बारी-बारी से कमरे म) बुलाकर पूछताछ की जानी चािहए' एक अधेड़ ूोफेसर का सुझाव। 'पूछताछ से कुछ हािसल नहीं होग ा िमसेज भादड़ी। ु सब एक-दसरे ू को बचा जाएँग ी' िूंसीपल बोली थी। 'पुिलस बुलवा ली जाए' िमसेज अवःथी बोली। 'नहीं भई. हाँ बोलो oपा' ूबंधक ने कहा। 'सर ]यY ना टीचस की कुछ टोिलयाँ बना दी जाएँ और एक-एक कमरे की तलाशी ले ली जाए।' उसने धीरे से अपनी बात कही। 'ए]सीलेFटश ्ूबंधक उछल पड़ा. समझा करो। कोई ऊँच नीच हो ग ई तो?' िूंसीपल िफर बोली। 'िफर िकया ]या जाए?' कॉलेज ूबंधक ने झbलाते हए ु कहा। 'सर आप कह) तो मR एक सजेशन दे ना चाहँू ग ी।' एक दबली ु -पतली सी नयी आयी ले]चरर बोली। उसके िवभाग म) कोई और उपलsध नहीं था सो वो िमिटं ग म) आयी थी। सभी ने एक साथ घूर कर उसकी ओर दे खा मानो पूछ रहे हY 'कल की लgिडया ]या बताएग ी?' 'हाँ. सो तो िफर मामला ग ंभीर होग ा ही। हालाँिक कले]टर के िलए पाँच सात हजार का . पर कॉलेज वालY ने रोक िलया। ितस पर यह तुरा और िक िर]की फलाने कले]टर साहब की लड़की है .िकस पर नहीं? बड़ी किठन उलझन थी। चूिँ क पहली बार इस तरह की घटना घटी थी. करने म) समथ नहीं जान पड़ता था। चीफ वाड न.. 'पुिलस वाला लफड़ा भी नहीं होग ा और काम भी हो जाएग ा। तुरEत िस]योिरटी ऑिफसर को कहो िक कुछ ग ाड स ्लेकर टीचस के साथ हॉःटल म) तलाशी के िलए जाए। शाबास oपा .

ग दरायी दे हयिW वाली. चलना िक लोग Y की आह) खुद-ब-खुद होठY पर आ जाएँ। कॉलेज के लड़के भƒे -भƒे ईशारे करते रहते हR । पर वो है िक इस सब से बेखबर मुःकुराती रहती है । दो. साली के पास खुद के पास तो कुछ 'सामान' है नहीं। सपाट छाती लेकर कहाँ जाए? हम) kान दे ती है .. इस बहाने अपनी िग नती वीवीआईपी म) करवाने की और वाड न वीणा मैड म से बदला लेने की। बहत ु टोका-टाकी करती थी साली.. िर]की। जो sवॉय ृेE…स भी कपड़Y की तरह बदलती थी। . वहाँ मत जाओ . हॉःटल की सबसे सीधी लड़की माने जाने वाली के कमरे से इस तरह की साममी का िनकलना? हे भग वान! .. 'िर]की. भडकीले नेल पेEटस ्और ना जाने ]या-]या? उसकी आदत) बन चुके हR । ऑख ं Y म) नीले रं ग के कांटे]ट uलासेज और कानY म) चार-चार बािलयाँ पहनने वाली िर]की दे खने म) ग ेहुँ आ रं ग की. लड़के की कमर पकड़ कर िचपक कर बैठती. िूंिसपल से और ूबँधक से कई दफा िर]की की िशकायत) कर चुकी थी। पर हर दफा कले]टर की लडकी होना उसका कवच हो जाता था। हॉःटल से मोबाइल चोरी होने से वाड न की लापरवाही सािबत होती है . तीखे नैनन]श और ं Y वाली एक शोख लड़की थी। लोकट ग ले वाली टाईट टीशट और िःकन टाइट चंचल ऑख जीEस पहनना और जानबूझ कर इस तरह से उठना-बैठना. मँहग े परhयूम. लड़कY के साथ मत घूमो। ये मत करो वो मत करो। ये पहनो. बाईक का ए]सीलेटर खुद-ब-खुद दब जाता। कुल िमलाकर ग जब की सै]स अपील वाली मॉडन लड़की थी..मोबाइल खो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। बात थी. सनuलासेज लग ाती. िदन का समय था। एक ग ाड को ग ेट पर तैनात करके तथा सभी लड़िकयY को अहाते म) इकVठा करने के बाद। टीचस की दो-तीन टोिलयाँ हॉःटल म) धड़धड़ाती हई ु आई और छापामार पaदित से एक-एक कमरे की तलाशी लेने लग ी। एक कमरे म) लडकी का बैड़ हटाकर दे खा तो ग ƒे के नीचे फRटे सी मैuजीन िनकल कर पड़ी। सुिमऽा जी जो िक ग ह ृ िवkान की ूोफेसर थी और काफी उॆदराज मिहला थी. एक कले]टर बाप की एक िबग डै ल लड़की। नये फैशन के कपड़े . िर]की खुश थी। अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। िर]की मेवाल. वो मत पहनो। टाईट मत पहनो। लोकट मत पहनो। यहाँ जाओ.. प)िसल हील स)ड bस. तीन या चार. या [यादा लडके उसकी अदाओं के चाबुक खाते थे और बारी-बारी से शाम को बाईक लेकर उसकी हाजरी म) मेनग ेट पर खड़े रहते थे। िर]की आती. ।' वीणा. झुकना. ने उस पुःतक के पEने पलटे तो उनके होश ही उड़ ग ए। अ•ील मुिाओं म) नuन tी-पुiषY की कामुक तःवीरY से मैuजीन अटी पड़ी थी। पता करने पर पता चला िक यह कमरा तो आशा का है । सुनकर और अिधक ध]का लग ा। दsबू-सी िदखने वाली..

वो एक अ3छी अaयािपका है . सूखे फूल और ना जाने ]या-]या िनकलने लग ा। मोबाइल को अब टीचस भूल ग  और िनकलने वाली िवःमयकारी चीजY के बारे म) कानाफूसी करने लग ीं। ]यYिक ये तलाशी अिभयान अूKयािशत oप से. अनिग नत ूेम पऽ. िर]की की मेज की दराज म) माला-डी का पzा िमला। िजसम) से कुछ ग ोिलयाँ खाई जा चुकी थी। सुलqणा मैड म ने दे खकर वापस पैकट को दराज म) डाल िदया। पर सोचने लग ी. िबग डै ल तो है ही. ये तुम ]या कह रही हो?' िूंिसपल ने डपटते हए ु कहा। 'मR अ3छी तरह से जानती हँू िक मR ]या कह रही हँू । जब हॉःटल के एक-एक कमरे को छाना ग या है तो वाड न के कमरे को ]यY छोड़ िदया ग या.खोजबीन म) लड़िकयY के पास से मँहग े-मँहग े परhयूम. बताईये?' 'पहली बात तो इस समय वीणा यहाँ है नहीं। उसकी ग ैरहाजरी म) ताला कैसे खुल सकता है ? दसरी ू बात. उसके िखलाफ ऐसी-कायवाही करने से पहले हम) एक बार सोचना पड़े ग ा।' िूंिसपल ने सफाई दी। सारी लड़िकयाँ भी िर]की के ूःताव से अचिभत थी। वीणा मैम चुराय)ग ी इसका मोबाइल? . बदचलन भी हो ]या पता?' और आग े बढ़ ग ई। लग भग तीन घFटे तक चले इस हँ ग ामाखेज तलाशी अिभयान के बाद सारी टीचस आपस म) खुसफुसाती हई ु और अहाते म) खड़ी लड़िकयY को घूरती हई ु हॉःटल से िनकलने लग ी। सभी लड़िकयाँ नजर) झुकाए अपराधी की भाँित खड़ी थी। तभी िर]की ने पीछे से पुकारा 'िूंिसपल मैम'। िूंिसपल पलटी '?' 'मैम. अचानक और िदन म) हआ ु था. हम चाहते हR िक वाड न मैम के कमरे की भी तलाशी ली जाए' िर]की ने बेिझझक कह डाला। ']या?' सब अवाक् एक-दसरे ू की ओर दे खने लग ी। 'तुहारा ]या मतलब है िर]की? तुम जानती हो. sवॉय ृेE…स के साथ िखंचवाये उनके फोटो. 'िर]की को इसकी ]या जoरत पड़ती होग ी?' िफर अग ले ही पल सोचा 'हो भी सकता है . ु अतo लड़िकयY को आपिzजनक चीज) छपाने का अवसर नहीं िमल पाया था। सभी के कमरे से कुछ ना कुछ ग ैरमामूली चीज) िनकल रही थी। एक कमरे की अलमारी से बीयर की कुछ बोतल) और िसग रे ट के खाली िडsबे िनकले। अ•ील फोटो वाले ताश के कई पैकेट िनकले। आxय तब हआ ु जब तलाशी टीम िर]की के कमरे म) आई। अEय फैशनेबल चीजY के अलावा.

सो बेमन से कमरे की तलाशी करनी पड़ रही थी. ये ]या हो ग या? वीणा. घर से लौटी उसे नौकरी से िनकालने का आदे श थमा िदया ग या था। िकसी ने उसकी एक ना सुनी। सफाई तो दरू िकसी ने उसको ये तक कहने का अवसर नहीं िदया िक 'मR बेकसूर हँू ।' वीणा चुपचाप अपना सामान लेकर चली ग ई। जाती हई ु वीणा को सभी संदेह और असमान की नजर से दे ख रहे थे। िजस वीणा को ःटे शन से लेने छोड़ने कॉलेज की ग ाडी जाती थी। उसी वीणा को छोड़ने मेनग ेट तक भी कोई नहीं आया। टै पो म) बैठकर वीणा चली ग ई। पीछे तरह-तरह की बात) होती रही। . कुछ िकताब). मैड म कमरे की चाबी तो एःटे ट ऑफीसर को जमा करा जाती हR । उनसे चाबी लेकर oम खोला जा सकता है ।' िर]की ने ढीठता से कहा। बेशमX उसके चेहरे पर िहbलोर) मार रही थी। . 'नहीं. वीणा। सभी के मन म) उसके ूित सहानुभूित थी। िकEतु इस बेशम लड़की ने िजƒ पकड़ ली. एक दीवार पर टं ग ा छोटा शीशा और उसके साथ ही कील पर अटका कंघा. ऐसा नहीं हो सकता। जoर कोई चाल है ।' िजतने मुँह उतनी बात)। िर]की खुद है रान थी। िर]की ने तलाशी ये सोचकर नहीं करवाई थी िक उसे वीणा मैड़म पर चोरी का शक था। बिbक इसिलए कराई थी तािक उसके कमरे से मामूली चीज). एक िबःतर और कुछ बतन। साधारण घर की ग रीब लड़की थी. दो जोड़ी च^पल.'हमारे iस की तलाशी भी हमारी ग ैरहाजरी म) ही हई ु है । दसरी ू बात. वीणा का कमरा खोला ग या। िूंिसपल और दो अEय अaयािपकाएँ अEदर ग ई बाकी सभी बाहर रहे । कमरे के दरवाजे पर हजू ु म लग ग या। वीणा के कमरे की एक-एक चीज को उलट पटक कर दे खा जाने लग ा। सामान के नाम पर चंद कपड़े . ये मैड म िदखाने की सIत है ।' कोई कहती. सःते कपड़े और सूखी नेल पािलश िनकलेग ी तो बड़ा मजा आएग ा। लड़िकयY के बीच मजाक बनेग ी। मन से तो वो भी जानती थी िक वीणा मैड म ऐसी नहीं हR । अब.. लेिकन वो भी अचिभत थी. 'मR ना कहती थी. उEह) । तभी. सुलqणा मैड म ने वीणा की मेज की दराज खोली तो अचानक चgक ग ई और दराज खुली छोड़कर पीछे हट ग ई। िूंिसपल ने आग े बढ कर दे खा तो वो भी अचिभत रह ग ई। बाकी िटचस भी िघर आई। सबके चेहरे फ]क।् िूंिसपल ने उठाया तो दराज से मोबाइल फोन िनकला। लड़िकयाँ िसKकार कर उठी। कानाफूिसयाँ तेज हो ग ई। िूंसीपल हाथ म) मोबाईल फोन िलए तेजी से कमरे से बाहर िनकल ग ई। टीचस भी। पीछे ग हरा सEनाटा और भgच]का असमंजस मुँह बाए खड़े थे। लड़िकयY के बीच भारी मतभेद था। कोई-कहती..

पूरे समय तो मR तुमम) खोया रहा। और हाँ.. डािकये ने आकर सारी डाक मैटन ऑटं ी को सहला दी। सभी लड़िकयाँ अपनी-अपनी िचिVठयाँ दौड़-दौड़ कर पकड़ने लग ी और एक-दसरे ू को िचbला-िचbला कर बताने लग ी 'लैटस आ ग ए।' िर]की भी अपनी िचिVटयाँ ले ग ई। और िबःतर पर बैठकर लापरवाही से एक-एक िलफाफे को फाड़-फाड़ कर दे खने लग ी। िकसी म) कुछ था िकसी म) कुछ। उनम) से एक पऽ उसके एक ूेमी तथा सहपाठी रहे िवशाल सलूजा का भी था। जो िपछले िदनY उससे िमलने भी आया था। दोनY ने खूब ऐश की थी। वो आजकल अहमदाबाद म) मैनेजम)ट का कोस कर रहा है । िर]की ने िवशाल का खत खोला और लग ी पढ़ने। पऽ म) हाल ही िबताये ग ये मःती भरे िदनY का ही िजब मुIय oप से िलखा था। पढ़त) पढ़ते अचानक वह. '........ दोपहर का समय था.।' (समाr) 10 िवAासघात अ3छा खासा कमा-खा रहा था। बैठे-िबठाये एक कॉलेज म) आवेदन कर िदया और लौटती . िठठक ग ई और खड़ी हो ग ई .... उमीद है िमल ग या होग ा . िर]की याद है हमने लेक म) बोिटं ग की थी तो बोट वाला ]या कह रहा था? तुहारा जोड़ा बहत ु सुEदर है । उस िदन जो िफbम दे खी थी उसकी ःटोरी मुझे कुछ पता ही नहीं चली .समय धीरे -धीरे बीतता ग या। एक िदन .. उस िदन िथयेटर म) पता है तुम अपना मोबाईल सीट पर िग रा आई थी। मRने उठा िलया था और जानबूझ कर तुह) नहीं बताया था। सोचा था खूब परे शान हो लोग ी तब बताऊँग ा। आते हए ु मR वो मोबाईल वीणा मैम को दे आया था .

कोई बात नहीं. ]या इितहास िवषय के साqाKकार खKम हो चुके हR ?' 'हाँ. िकEतु ये तसbली भी थी िक 'कौन से बेरोजग ार हR ?' तभी दे खा िक एक छोटे कद की लड़की बड़ी Hयःत-सी कभी इधर. िवAास' 'अरे ! आप हR डॉ. ]यYिक मेरे हाथ म) ऑलरे ड ी एक नौकरी थी। सो. कॉलेज म) घूमता रहा। िनिxंत था.डाक से साqाKकार के िलए बुला िलया ग या था। इEटरHयू म) बहत ु से लोग आए हए ु थे। कोई कहीं से. यह िकसी मह–वपूण पद पर है और इं टरHयू की अिधकृ त जानकारी इससे िमल सकती है । हमने तेजी से पुकारा 'ए]स]यूज मी ^लीज' वो पलटी और बड़ी तKपरता से हमारी नजर के इशारे पर हमारी ओर बढ़ने लग ी। नजदीक आकर बोली 'जी. सो पेट भी दहाई ु दे ने लग ा था। सोचा. चलता हँू ।' कहते हए ु मRने मुःकुराते हए ु अपना थैला उठाया। 'जरा ठहिरए... चलो कRटीन म) जाकर कुछ खा िलया जाए. जरा। खैर. कभी उधर बार-बार भाग ी दौडी िफर रही है । हम) लग ा हो ना हो. तब तक नबर भी आ जाएग ा। अपना बैग उठाकर कRटीन की ओर चल िदया। लौटकर आया और पता िकया तो मालूम हआ ु िक हमारा नाम कई दफा पुकारा जाकर अनुपिःथत घोिषत कर िदया ग या है और हमारे िवषय का साqाKकार समाr हो ग या है । मन म) ये मलाल तो हआ ु िक इं टरHयू नहीं दे पाये. आपका इं टरHयू हो जाए।' वो थोड़ा 'है िbपंग ' लग ी। 'नहीं. कोई कहीं से। कई िवषयY के िलए एक साथ साqाKकार बुलाया ग या था। अजीब चहल-पहल थी। हर तरफ नौकरी के उमीदवार ही घूमते िफर रहे थे। अजब तनाव भरी रे लमपेल थी। मR अपनी बारी के इEतजार म) इधर-उधर टहलता रहा. आप अिधक उपयु\ िनकल आएँ'ए वो मुःकुराई थी इस दफा। मR खड़ा रह ग या। थोड़ी दे र बाद वह िफर लौटी 'चिलए िवAास जी. कभी के।' 'मR .. िवAास . जाने दीिजए। अब ]या फायदा? सले]शन तो हो ही चुका होग ा।' 'ठहिरए तो जरा। हो सकता है . डॉ. मR जरा भीतर पूछ कर आती हँू । शायद. किहए।' 'मैड म. बेधड़क इधर-उधर घुस-घुस कर दे ख रहा था। सुबह जbदी का आया हआ ु था और दोपहर के दो बज रहे थे. आपको भीतर बुला रहे हR ।' सुनकर एक .. िवAास? कब से पुकार रही हँू मR? कहाँ चले ग ये थे आप?' 'जी नाँता-पानी करने चला ग या था.

. अरिवEद आचाय और काम था. िकसी को माना तो िदल से माना। नहीं माना तो नहीं माना। बस. ' मRने िशWतावश उस लड़की को कहा। 'केवल धEयवाद से नहीं चलेग ा। पाटv होनी चािहए।' लड़की बड़ी बेतकbलुफी से बोली। सहसा कोई जवाब दे ते नहीं बना। सभी हमीं को दे ख रहे थे। 'जoर' मRने िकंिचत ्िवनॆता से कहा। 'मेरा नाम काजल है .. '. ।' मR अचिभत रह ग या। मेरे आसपास के लोग मुझे बधाई दे ने लग े। सावजिनक oप से घोिषत यह पहला सले]शन था.. पसनल अिसःटे Fट टू चेयरमैन।' कहकर चहकती हई ु वो दसरी ू ओर बढ़ ग ई। मुझे अब भी अपने चयन पर आxय हो रहा था। मेरे ही साथ का सले]शन था. वरना हम चले। बाहर आकर भीतर जाने की अपनी बारी का इEतजार कर रही भीड़ पर नजर पड़ी तो मR मुःकुरा िदया। कैसी बेरोजग ारी है ? ना जाने मेरे जैसे िकतने 'नौकरीशुदा' िकसी और के अवसर पर लात मारने के िलए इस भीड़ म) बैठे हYग )? शायद. अभी तक। बड़े िकःसे थे दोनY के। ःटॉफ तो ःटॉफ. पीछे -पीछे ही वो लड़की बाहर िनकल आई. सुिनए।' मR पलटा. बताया। जो नहीं आता था. राजीव ग ुrा का। बुलEदशहर का रहने वाला था. बाकी सबकी फेहिरःत शाम को लग ाई जानी थी। िजसके इEतजार म) बहत ु से उमीदवार बैठे हए ु थे। 'धEयवाद . और लग भग पुकारते हए ु बोली.. दोनY। नीलम और अरिवEद दोनY आमतौर पर साथ दे खे जाते थे। काजल और नीलम दोनY अ3छी सहे िलयाँ थी। .आचाया और थी. बड़ा चलता पुजा था। नाम था. मन ही मन भाई से हमारी ठन ग ई। दसरा ू . छाऽY म) भी बड़े मशहर ू थे. अपनी िसिनयोिरटी बखारते िफरना। हम ठहरे ठे ठ ग ंवई.बार को आxय हआ ु और मन ही मन लड़की का मह–व भी महसूस हआ। ु 'जoर मैनेजमेEट की खास होग ी' मन म) सोचा और भीतर की ओर बढ ग या। जो कुछ आता था. इकनॉिम]स म) आया था। उसकी िसफािरश एक अEय ले]चरर दीपक दआ ु ने लग ाई थी। दीपक का बाप राजीव का िरसच ग ाईड था। राजीव का जो है ड था. वहाँ। नाम था 'सुौी' नीलम। 'सुौी' इसिलए िक लोग Y के अनुसार कहने भर को वह कुँआरी थी... 'डॉण ् िवAास ... नहीं बताया। कहसुन कर बीस िमनट म) बाहर िनकल आया। चलते-चलते ये कह आया था िक बEदा 'नौकरीशुदा' है । 'आंक' सको तो ठीक... आप अपॉइEटमेFट लेटर लेकर जाइयेग ा . उस आचाय की एक 'सह.

साँवली-सी इस लड़की म) अजीब-सा आकषण महसूस ु होने लग ा था. आपका कॉल लेटर मRने ही पोःट िकया था। आपने जो फोटो लग ाया था.एक िदन बातY ही बातY म) हम) हमारे सले]शन का राज पता चला। हआ ु यूँ िक मR अकेला लाइॄेरी म) बैठा अखबार दे ख रहा था। तभी वहाँ काजल और नीलम आ बैठी। औपचािरक हाय-है लो के बाद मR पुनः अखबार म) Hयःत हो ग या। 'डॉ. सवदा चुप। इससे ये तो साफ जािहर था िक उसके कोई अग र सबसे करीब है . िकEतु दै िहक-ःतर पर उसके और अरिवEद के बीच कुछ है . बीकानेर की रहने वाली. अपनी बायोडाटा के साथ. वो बड़ा ही इं ूेिसव था और मR नीलम से ये ही कह रही थी बार-बार. आपको हमारा कॉलेज कैसा लग ा?' काजल ने पूछा। 'अ3छा है ' मRने जवाब दे िदया। 'और कॉलेज के लोग ?' उसका दसरा ू सवाल। 'अ3छे हR 'ए मRने नीलम की ओर दे खा. मुझे। िकEतु उसकी चु^पी म) अजीब-सा रहःय छपा जान पड़ता था। जब कभी वो हँ सती-बोलती थी. वो शरमा-सी ग ई। 'पता है िवAास सर. वो सच है । ऐसा नहीं हो सकता िक इतनी शालीन िदखने वाली लड़की का चिरऽ 'ऐसा' हो। ूेम की संभावना से मेरा इEकार नहीं था. एक मaयमवग X पिरवार की चार लड़िकयY म) से दसरे ू नबर की बेटी थी। जो नौकरी करने सुदरू इस पवतीय qेऽ म) चली आ थी। अकेली कमरा लेकर रहती है । लबी. तो वह अरिवEद है । िकEतु अब मन ये मानने को तैयार नहीं था िक लोग जो उसको दबी जुबान से 'सुौी' कहते हR . तो केवल अरिवEद के साथ। अEयथा. पतली. िक वो फोटो वाला नहीं आया ]या?' 'अ3छा? धEयवाद। असल म) वो फोटो िखंचवाया तो था शादी-वादी के िलए. पर काम आता है अ]सर नौकरी के िलए। वैसे ये रहःय आज जाकर खुला है िक मेरा सले]शन मेरी फोटो के कारण हआ ु है । मेरे कारण नहीं।' मR हँ स पड़ा था। नीलम अब भी नीचे नजर) िकए बैठी थी। कुछ दे र इधर. िवAास.. शाम का व\ था। कॉलेज बEद होने वाला था। सभी लोग अपने-अपने बैग लेकर बाहर की तरफ बढ रहे थे। लड़के-लड़िकयाँ सभी पहले ही जा चुके होते थे। सो कॉलेज म) केवल ूाaयापकY की चहल थी। मR अपने केिबन से िनकल कर ःटॉफ oम की तरफ से होकर बाहर की ओर जा रहा था िक अचानक िकसी 'खुसफुसाहट' ने मेरे कदमY को धीमा कर . मुझे नहीं लग ता था। खैर.उधर की बातY के बाद दोनY चली ग ई। जाते व\ दो पल को नीलम की नजर) मुझसे िमली और िफर झुक ग ई। नीलम.. वह कुल िमलाकर एक अ3छी लड़की है । .

ऑस ं ू पgछने लग ी। मRने पूछा. बताने से जी हbका हो जाता है ।' 'बताने जैसा कुछ नहीं है . वो रो रही थी। मुझे दे खकर. कुछ ःपW सुनाई नहीं िदया। कॉिरडोर चूिँ क खाली पड़ा था. उसकी पीठ थी दरवाजे की तरफ। मR भीतर दािखल हो ग या और जाकर उसके सामने वाली कुसX पर बैठ ग या। दे खकर अचिभत था. जब भी नीलम मुझे िदखाई दे ती तो मन एकाएक उदास हो उठता। सोचता. अंदर अरिवEद और काजल आिलंग नबaद थे। दोनY एक-दसरे ू के चुबन ले रहे थे और एक-दसरे ू के शरीर को भ)ट कर जकड़े हए ु थे। मुझे अपनी आंखY पर िवAास नहीं हो रहा था। मR ठग ा-सा रह ग या। पुनः दे खा. ' मRने एक बार िफर कोिशश की। 'सुनकर ]या कीिजएग ा. सो मRने धीरे से एक िझराख म) ऑख ं लग ाई। दे खा. रोना िकसी भी समःया का हल नहीं है । धैय से काम लो। हर पिरिःथित का मुकाबला िहमत के साथ करना चािहए।' मRने उसको ढ़ाढस बँधाने की कोिशश की। 'ये पिरिःथितयाँ मेरे ही साथ ]यY आती हR ?' उसकी आवाज म) कपEन था। 'दे खो नीलम. तो पिरिःथित हो जाती है ।' मRने समझाते हए ु कहा। वो मेरी भाषा को समझने की कोिशश म) हbका-सा मुःकुरा दी। मR जीत ग या। 'घर से मिःजद है बहत ु दरू . इस लड़की के साथ कोई 'धोखा' ना हो रहा हो। अब मन म) उसके िलए सहानुभूित िमिौत आकषण जाग ने लग ा था। एक िदन मR टहलता हआ ु इकनॉिम]स िवभाग की ओर चला ग या। दे खा नीलम अकेली बैठी है . सर?' इस बार उसके ःवर म) पीड़ा थी। वो सुबक पड़ी। 'चुप हो जाओ। दे खो. ']या हआ ु नीलम?' 'कुछ नहीं. काजल ही तो थी। बड़े भारी कदमY से आग े बढ़ा। मन म) अजब उथल-पुथल थी। एक ओर अरिवEद की नीलम से नजदीिकयाँ और दसरी ू ओर उसके काजल से ऐसे सबEध। अब. मनoिःथित के अनुकूल नहीं होती है . सर।' 'कुछ तो हआ ु है । बताओ. चलो यूँ कर ल) .िकसी रोते हए ु ब3चे को हँ साया जाए' िकसी शायर की पंि\यां बरबस ही जेहन म) आ ग यी। थोड़ी बहत ु औपचािरक बातचीत के बाद मR चला आया। हालांिक रोने .िदया। मR बड़े दबे कदमY से आग े बढने लग ा। आवाज) इकनॉिम]स िवभाग के कमरे से आ रही थी। दरवाजा बंद था। मRने कान लग ाकर सुनने की कोिशश की तो महज खुसफुसाहट- सी ही सुनाई दी. सर।' उसकी आवाज म) परे शानी अलग ही नजर आ रही थी। 'िफर भी। अग र तुम बताना चाहो तो ... पिरिःथित ]या है ? कुछ भी नहीं। जब वःतुिःथित.

जब वःतुिःथित मनoिःथित के अनुकूल नहीं होती है . जानकर बड़ी खुशी हई। ु बेटा मR तुमसे और तुहारे दोःतY से िमलने जiर आऊं◌ॅग ा। लेिकन तुहारे साथ वहाँ सैटल नहीं हो पाऊँग ा बेटा। यहाँ इिFडया म) तुहारी माँ की याद) हR । उनको कैसे छोड़ पाऊँग ा? .. मुझे। जbदी से खोलकर पढने लग ा. तुमको नये सॉhटवेयर की कामयाबी पर पापा की तरफ से ढे र सारी बधाईयाँ। तुमको कपनी ने नया hलैट िदया है .। (समाr) 11 उसके िलए ऑिफस से लौटते ही सबसे पहले अपनी मेल चैक करने की जbदी म) रहता हँू । फटाफट क^यूटर ऑन िकया। इनबॉ]स म) दे खा 'मृदल ु ' की मेल थी। इसी का तो इEतजार था.का कारण उसने तब भी नहीं बतायाथा । अग ले िदन पता चला िक अरिवEद आचाय की सग ाई हो ग ई है और जनवरी म) शादी है । लड़की. अलीग ढ़ की रहने वाली है । नाम है .मृदल। ु ' तुरEत जवाब िलखने लग ा - 'बेटा मृदल ु . अिदित। वाकई. कैसे हो?' मR जानता हँू िक मेरे िबना आप बहत ु लोनली फील करते हYग े। मR भी आपको यहाँ बहत ु िमस करता हँू । सारा िदन अपने दोःतY को अपने ^यारे पापा की कहािनयाँ सुनाता रहता हँू । मेरे कई दोःत तो आपके जबरदःत फैन हो ग ए हR और आप से िमलना भी चाहते हR । पापा मRने जो सॉhटरवेयर िडजाईन िकया था ना वो बड़ा कामयाब सािबत हो रहा है । उसी की कामयाबी से खुश होकर कपनी की तरफ से मुझे नया hलैट िदया ग या है । अब तो आप मेरे पास आकर रह सकते हR िक नहीं? वहाँ इिFडया म) आपका अकेले मन कैसे लग ता होग ा? मR कल रात की hलाईट से ृRकफट जा रहा हँू । आप िलख) आपके िलए ]या भेजूँ? लव यू वेरी मच। आपका बेटा . 'पापा.. तो वही पिरिःथित हो जाती है .

. वग ैरह। इस सारे सोच िवचार के पीछे मृदला ु के ूित मेरे आकषण का बहत ु बड़ा हाथ था. मR मानता हँू । वो लड़की मन ही मन मुझे पसEद थी और उसको खटते दे खकर मR दoखी ु हआ ु करता था और बार-बार ये िवचार अिधक तीो हो .. सो िखड़की से झाँकने पर उस मकान का ऑगं न और दो कमरY का भीतरी ँय सुग मता से िदखता था। िफर भी मRने ऐहितयात के तौर पर एक दरबीन ू खरीद डाली। बस. एक लड़की सुबह सवेरे तैयार होकर िनकल पड़ती और शाम ढले वापस लौटती। कई िदनY जब मRने नोट िकया तो मन म) उस घर म) झाँक कर दे खने की इ3छा हई। ु चूिँ क मेरा कमरा दसरे ू तbले पर था. कायशैली का िनधारण करने लग ा। कैसे मेलजोल बढ़ाया जाए? कैसे िबना ूKयq हए ु उनकी मदद की जाए? वग ैरह.ढे र सारा ^यार। तुहारा . खुश हो लेना.। . िकEतु िफर भी ना जाने मन ने ]यY उसको 'मृदल ु ' मान िलया था। शायद युवा मन का पूवामह रहा हो। खैर.डै ड ी।' बेटे की मेल पढना. सो मन का िवचार और [यादा ढ़ हो ग या था। तब ना जाने भीतर ]यYकर एक संकbप-सा कर डाला मन ही मन िक जैसे भी हो इस पिरवार की मदद करनी चािहए। युवा मन यूँ भी संकbप उठाने म) जbदबाज होता है । बस.. वहाँ उसका मन लग ग या। नौकरी लग ग ई। वो वहीं ठहर ग या। उसकी तर]की से मR बहत ु खुश हँू । कम से कम मृदला ु मुझे उलाहना तो नहीं दे पायेग ी िक 'मेरे बेटे का aयान नहीं रखा आपने।' अब तो बस एक ही साध है िक उसका घर बस जाए . मेरे कमरे के िपछवाड़े वाले घर म) दे खता. लड़की भली जान पड़ती थी। उसके घर म) झाँका तो पाया िक घर म) एक बूढ़ी माँ है और एक छोटी बहन.. उसका जवाब दे ना। रो लेना. अब सवेरे से मेरा एक ही काम। चाय का ^याला लेकर िखड़की पर आ ड़टना और उस लड़की के घर से िनकल जाने के बाद तक डटे रहना। लड़की खासी आकषक और सादग ी पसEद थी। पता लग ाने पर मालूम हआ ु िक उसका नाम 'मृदल ु ा' है । हालाँिक मRने उससे बात करके उसके ःवभाव की मृदता ु को परखा नहीं था. जो भी हो. बस। बहन की दे ह उठान िलए है और छोटी होने के बावजूद भी बड़ी बहन के समq बड़ी जान पड़ती है । 'लड़की के िपता नहीं है शायद' सोचकर मR ये मान चुका था िक हो ना हो लड़की बाहर नौकरी करने जाती है और उसी की कमाई से घर चल रहा है । दे खने से घर की माली हालत [यादा अ3छी नहीं जान पड़ती थी.. चाहे तो वो वहीं अपनी पसंद से शादी करले या यहाँ इिFडया आ जाए तो मR अपने अरमानY से उसकी शादी कर लूँ। तब कहीं जाकर मृदला ु को िदया वचन पूरा होग ा। सोचते-सोचते ना जाने IयालY म) कहाँ िनकल ग या . ये ही िदनचया रह ग ई है अब मेरी। मृदल ु को पढ़ाई करने अमेिरका भेजा था.

' िकEतु तभी बोध ग ायब भी हो ग या। मRने दे खा िक वो ऑगं न म) टहल रही है और टहलते-टहलते तौिलए से अपने भीग े हए ु बालY को सुखा रही है । बड़ा पिवऽ लग रहा था. ']या सोचती होग ी ये लड़की?' िफर धीरे से बाला 'बैिठए ना!' वो यंऽवत एक मुŒढ़े पर जा बैठी। मR भी िकताब) सहे जता हआ ु .जाता था िक 'इनकी मदद करनी चािहए।' एक िदन मR थोड़ा िवलब से उठा.. तो कहीं लूंग ी। िबःतर का हाल ऐसा हो रहा है . ]यYिक रात दे र तक पढ़ता रहा था। सो भाग कर मेज पर से दरबीन ू उठाई और लपक कर िखड़की पर आ डटा। मन ही मन खुद पर बड़ा बोध आ रहा था 'इतनी दे र से उठा हँू । वो तो अब तक चली ग ई होग ी . बदनामी होग ी से अलग . मानो उEह) तहाकर रखे जाने की आदत ही ना हो। खुद पर बड़ा ग ुःसा आने लग ा... था? सोचते हए ु आज डर लग ता है । िकEतु उस समय ना जाने मR कहाँ खो ग या था। तभी मृदला ु ने झटके से अपनी केशरािश पीछे को उछाली और उसकी नजर मुझ पर पड़ ग ई। मेरे हाथ से दरबीन ू ू छटते ू -छटते रह ग ई। मR झट से पलट ग या और िफर तेजी से िखड़की बEद करके जड़वत पलंग पर बैठ ग या। िफर उठकर कमरे म) टहलने लग ा। 'ना जाने अब ]या होग ा?' सोच-सोच कर मन बुझा जा रहा था। 'मकान तो बस अब खाली करना पड़े ग ा . ।' थोड़ी ही दे र बाद दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई. मानो छते ... उसका वह धुला-धुला िनxल oप। मR मोिहत हआ ु उसे िनहारता रहा और मुझे ये भी aयान नहीं रहा िक मR कब िखड़की की ओट से बाहर िनकल आया हँू और राह चलता कोई भी Hयि\ मुझे इस तरह दे ख सकता था। िफर आग े ]या-]या हो सकता. मR सकपका ग या। 'खोलूँ या ना खोलू'ँ अजीब उलझन म) था। खटखटाहट और अिधक अधीर हो ग ई थी। मRने उठकर दरवाजे की िझरांख म) से दे खा 'मृदला ु ' खड़ी है । मेरे पाँव तले से जमीन िखसक ग ई। हालत ये हो ग ई जैसे काटो तो खून न हो। बड़े ही ड़रते ड़रते धीरे से दरवाजे की कुEदी सरकाई और धीरे - धीरे दरवाजा अपनी ओर ख)चा। उसका तमतमाया चेहरा दे खते ही मन म) ऐसा आया िक 'काश! ये धरती फट जाये और मै उसम) समा जाऊँ।' िजस ूकार रं ग े हाथY आज मR पकड़ा ग या था। ऐसी िःथित म) मेरी जग ह कोई और भी होता तो यही सोचता शायद। िहमत जुटाकर हौले से कह पाया 'आईये'। वो कमरे को चारY तरफ से दे खती हई ु भीतर ूिवW हो ग ई। मRने भी उसके साथ-साथ अपने कमरे का िनरीqण कर डाला। पहली बार आज लग रहा था िक मR िकतना लापरवाह और बदिमजाज हँू । कहीं पतलून पटक रखी है .. िवःतर पर िबखरे समानात को थोड़ा िखसका कर बैठ ग या। वो अभी तक कुछ नहीं बोली थी। और अभी भी इधर उधर ही दे ख रही थी। अपने अधभीग े बालY को उसने दपVटे ु से बाँध रखा था और दपVटे ु के दोनY िसरे आग े की ओर लटक रहे थे। ओस नहाये फूल जैसा उसका ग ुलाबी ू ही मैला हो जाएग ा। मR चोर नजर से चेहरा बड़ा ही मोहक लग रहा था। ऐसा.

दरबीन ू भी दरू खूट ं ी पर टं ग ी रही। और नज़रY के सामने वो पिवऽ चेहरा बार-बार आता जाता रहा। मन लान हो ग या था... उसने पूरी बात बताई। उसके आने का कारण सुनकर मRन) थोड़ी राहत की साँस ली। 'थR]स' कहकर मRने िलफाफा खोला। दे खा. 'माफ कीिजए.. तो नाहक परे शानी होती। मRने दबारा ु शुिबया अदा िकया और चाय के िलए भी लग े हाथ पूछ डाला। उसने मना कर िदया. ]यYिक वो दोपहर म) कब आकर चला जाता है . ]यYिक आपका नाम तो जानते नहीं थे. िकEतु िफर भी मR सौजEयवश एक कोने म) रखे ःटोव की ओर बढ़ ग या और झटपट चाय बनाने लग ा। ःटील के दो uलासY म) चाय उं डे ल कर पलटा तो दे खा उसके हाथ म) मेरी डायरी है । मुझे दे खकर वह जरा-सा अचकचा ग ई.बार-बार उसे दे खे जा रहा था। जब वह कुछ नहीं बोली तो मR सोचकर िक 'जो भी होग ा दे खा जाएग ा' मR ही बोल पड़ा. लेिकन सुयोग ही नहीं बन पाया िक आकर दे जाऊँ। अभी आप िदखाई पड़े तो लेकर चली आई . मेरा एमणएण ् ्परीqा का ूवेश पऽ था। ग ुम जाता.. मR संकोच वश नजर बचाने लग ा। 'लीिजए' कहकर उसने हाथ आग े बढ़ा िदया। घबराहट म) मRने ये तो दे खा ही नहीं था िक उसके दाँये हाथ म) कुछ है । दे खता भी कैसे? मेरी तो यूँ ही िसVटी िपVटी ग ुम हो रही थी। ूि_ल िW से दे खते हए ु पूछा ]या है ? 'आपके नाम की िचVठी है । दो-तीन िदन पहले ग लती से डािकया हमारे ऑगं न म) डाल ग या था. कुछ तय नहीं। िफर कल जब आपके िमऽ को नीचे से आपका नाम लेकर पुकारते सुना तो पता चला आपका नाम . 'किहए? ' सुनकर वह थोड़ा चgकी और िफर ूकृ ितःथ होकर मेरी ओर दे खने लग ी. अ3छा ]या? बस व\ काटने की ग रज से काग ज काले करता रहता हँू ।' कहकर एक िग लास उसकी ओर बढ़ा िदया। उसके बाद िबना कुछ बोले चाले हम दोनY ने अपनी-अपनी चाय पीयी। लाख मना करने पर भी उसने अपना िग लास धोकर रखा और हbका-सा मुःकराकर 'चलती हँू . ऊपर से परीqाएँ भी नज़दीक आ ग ई थी। सो सब कुछ भूलाभाल कर अपने आपे को पढ़ाई म) झYक िदया था। िखड़की उस िदन ऐसी .. नमःते।' कह कर दरवाजे की ओर बढ़ ग ई। मRने राहत की साँस ली.. . जरा सोिचए' कहकर वह तेज कदमY से चली ग ई। मR सEन रह ग या मानो िकसी ने घुमाकर तेज तमाचा मेरे ग ाल पर मार िदया हो। कई िदनY तक िफर मR िखड़की म) नहीं बैठा. अ3छी किवताएँ िलखते हR आप।' 'जी. 'चलो जान बची और लाखY पाए।' तभी वह पलटी 'हमारा घर िबना दरबीन ू के भी साफ नज़र आता है आपकी िखड़की से। दो-दो जवान बेिटयY वाले घर म) अग र कोई आपको दरबीन ू से झाँकते दे खेग ा तो ]या सोचेग ा. आपकी अनुमित के बग ैर आपकी डायरी दे ख ली .. सो यही सोचकर िक 'होग ी िकसी की' पड़ी रहने दी। डािकए से भी तःदीक नहीं कर पाए..

अखबार के सपादकY की आिद। इस बात के िलए मR ःटॉफ म) खासी चचा का िवषय था। एक बार मेरी िचिVठयाँ ये सोचकर खोल डाली ग ई थी िक कहीं कोई ूेिमका-वेिमका का च]कर तो नहीं है । िकEतु उस बात पर मR िूिEसपल पर ऐसा िबग ड़ा था िक तब के बाद से िूिEसपल मेरी िचिVठयाँ मेज पर पड़ी ना छोड़कर अपनी दराज म) सहाल कर रखने लग ा था और मुझे ही सgपता था। ऐसे ही एक िदन जब मR अपनी डाक लेने िूिEसपल के पास ग या तो उस ने एक िलफाफा मेरे हाथ म) थमा िदया। िलफाफे पर िलखे हफw से िलखावट िबbकुल ही अपिरिचत लग ी। 'िकसी ूशंसक का होग ा' सोचकर कोट की जेब म) डाल िलया और ]लास लेने चला ग या। िशलांग रोड़ की बाँई ओर पहाड़ पर मेिडकल कॉलेज और अःपताल बने हR और पहाड़ पर भHय इमारतY की कतार) । ऊपर चढ़ने उतरने के िलए चौड़ी-चौड़ी सड़क) पहाड़ को लपेटे थी। आधे से अिधक राःता तय करने के बाद जू रोड़ शुo हो जाता है । वहीं से एक सीधी पग डFडी नीचे उतरती हई ु जा पहँु चती है हमारे कॉलेज। कॉलेज के िपछवाड़े पर एक बःती है ग ढ़वािलयY की। उसी म) एक छोटा-सा दो कमरY का hलैट लेकर रह रहा था मR। घर जाकर सबसे पहला काम था चाय बनाकर पीना। िफर थोड़ा-सा लेटना िफर खाना खाकर .बEद की िक िफर खोली ही नहीं। कई बार उसको दे खने का मन िकया िकEतु हर बार मन मार कर रह ग या और िकसी अEय काय म) खुद को Hयःत कर िलया। िदन ग ुजरते रहे । एक िदन बाहर से लौटा तो कमरे म) दे खा एक िचिड़या ना जाने िकधर से आ ग ई थी। सारे कमरे म) ितनके ही ितनके िबखेरती इधर उधर उड़ रही है । लाख कोिशश करने पर भी बाहर नहीं िनकली। हार कर मRने िखड़की खोली 'शायद िखड़की से ही िनकल जाए।' अनायास ही मेरी नजर उस घर पर पड़ी। जी धक् से रह ग या। उस घर पर ताला पड़ा था। 'कहाँ ग ए हYग े सब? कहीं घर तो खाली नहीं कर िदया? कहीं कोई दघ ु टना तो नहीं हो ग ई? आिद-आिद' अनेकY Iयाल एक साथ मन म) आए और उzर ढँू ढ़ने की कोिशश म) एक-दसरे ू से उलझते चले ग ए। िचिड़या ता िखड़की से िनकल ग ई थी। िकEतु एक ू_ 'ताला?' िखडकी के राःते मेरे कमरे म) आ ग या था। कुछ िदनY तक इस बारे म) सोचता रहा और धीरे -धीरे बात पुरानी हो ग यी। अEय बातY की तरह याद बनकर रह ग ई। इस बीच मेरी एमए पूरी हो ग ई और मR िशलांग के एक कॉलेज म) ूाaयापक होकर चला ग या। िलखने-िलखाने का शौक बदःतूर जारी था. ूशंसकY की. सो छपने छपाने का बम भी िनयिमत था और इस ूकार कॉलेज ःटॉफ म) मR ही एक ऐसा ूाaयापक था िजसकी सवािधक िचिVठयाँ आती थी। लेखक िमऽY की.

चुo तक जाने वाली बस कुछ ही दे र म) जाने वाली है । िटिकट लेकर बस म) जा चढ़ा। सामान के नाम पर बस एक छोटा सा ॄीफकेस था। िजसम) दो जोड़े कपड़े के अलावा थोड़े iपये थे। ये सोचकर रखे थे िक ना मालूम ]या जoतर आन पड़े ? इस व\ बजे थे दोपहर के साढ़े चार। रात के दस . आिद-आिद' पुनः एक बार और पढ़ने के खयाल से थोड़ा अधलेटा हो ग या आराम से। लेिकन जैसे ही पऽ खोला झटके के साथ खड़ा हो ग या। हाथ की िसग रे ट ऐश शे म) डाल कर कुचल दी। पऽ बड़ा संिqr था - सKयेन साहब! यिद सभव हो तो एक बार आ जाइये। मरने तक.. शुबग ुजार रहँू ग ी। आपकी....एक िसग रे ट पीना और िफर कोई छोटा-मोटा काम करने म) खुद को Hयःत कर लेना। उस िदन भी ठीक ऐसा ही सब हआ। ु सोफे पर बैठा जब िसग रे ट का कश ले रहा था तब अचानक उस खत की याद हो आई। जेब से िनकाला... िबना िकसी उKसाह के खोलने लग ा और वही कई बार की पढ़ी-पढ़ाई बात) '. मृदला ु .. ऐसा नहीं था। िकEतु राजःथान की सिद याँ इतनी भयानक होती हR .. ये सोचा भी नहीं था। कोई और अवसर होता तो शायद मR इस याऽा के पयटन अनुभवY को अपने लेखन के िलए संिचत सुरिqत करके रखता। िकEतु अभी मेरी मानिसकता ना लेखन की थी ना लेखन के िलए पिरवेश बनाने-ग ढ़ने-संिचत करने की। अभी तो मुझे जbद से जbद मृदला ु के पास पहँु चना था। आिखर uयारह बरस बाद भी िकसी ने मुझे याद रखा है तो उसके बुलावे का मान तो रखना ही चािहए। िकEतु ऐसी ]या जoतर आन पड़ी जो पऽ िलखकर बुलाना पड़ा। यही िवचार भीतर से खाये जा रहा था मुझे। िशलांग से चल कर राजःथान की ू म) ही दो िदन लग ग ए। अभी और ना जाने िकतने िदन और लग जाएंग े सरहद को छने उस तक पहँु चने म)। चुo िजले के िकसी राजग ढ़ ग ाँव का पता िलखा था उसने पऽ के पीछे । िदbली से मR सीधा जयपुर आ ग या था। जयपुर आकर रे ल का पता िकया तो पता चला िक राजग ढ़ जाने वाली ग ाड़ी रात एक बजे है । 'पूरे िदन का इEतजार' सोचने पर ही अKयिधक लबा जान पड़ा। रे bवे ःटे शन से तुरEत बस अ…डे आया। दौड़ता हआ ु पूछताछ िखड़की पर लपका। पता चला िक सीधे राजग ढ़ तो नहीं। हाँ.. आपकी रचना िदल को छू ग ई. मानवीय संवेदनाओं और िरँतY की सूआमता का सटीक िचऽण दे खने को िमलता है . आपके पाऽY म) समीपता नज़र आती है . पिरवेश अपने आसपास का जान पड़ता है .. दरबीन ू वाली . िजःम को चीरती हई ु सद हवाएँ दे खने सहने का यह पहला अवसर हो.

...बजे तक बस चुo पहँु च जाएग ी। जहाँ से दो घFटे और लग )ग े राजग ढ़ पहँु चने म)। बारह बजते नहीं बजते राजग ढ़ पहँु च जाएंग े। मन म) सोचा और समय की तःदीक करने को पुनः एक बार घड़ी दे खी -चार पRतीस। मन िफर दस साल पुरानी ःमृितयY म) खो ग या। कैसे िखड़की म) बैठकर दरबीन ू से उस लड़की को दे खा करता था? कैसे उस पिरवार की मदद करने का संकbप िकया था। कैसे मृदला ु से पहली मुलाकात हई ु और िफर कैसे अचानक वो पिरवार सिहत ग म ु हो ग ई थी। . 'छोटू ! जरा पास की दकान ु से िवbस िसग रे ट का एक पैकेट तो ला दे यार।' लड़का चला ग या और कुछ दे र बाद िसग रे ट का पैकेट और बचे हए ु पैसे मेज पर रखकर जाने लग ा। मRने रोक कर उसके हाथ पर दो iपये रख िदए और धीरे से एक ऑख ं दबा दी। वो खुश हो ग या और हँ सता हआ ु लौट ग या। . चलिचऽ की भाँित सब कुछ सामने से ग ुजर ग या। पर कहीं भी. जैसा यहाँ लग रहा था। .. कहीं से भी यह सभावना नहीं नजर आती. ना ही उस व\ नजर आई थी िक मृदला ु इतना िवAास करती होग ी मुझ पर। िकतना-सा पिरचय है हमारा? एक मुलाकात भर था। िकतना लबा? साथ बैठकर एक कप चाय पीने भर िजतना। िकतना ग हरा? दरू बैठ कर दरबीन ू से ताकने िजतना। सोचते सोचते ना जाने कब मेरी ऑख ं लग ग ई। ऑख ं तब खुली जब थोड़ा शोर शराबा कान म) पड़ा। दे खा तो चुo आ ग या था। घड़ी पर नजर डाली पौने दस बज रहे थे। 'समय से आ पहँु चे' सोचकर सEतोष हआ। ु उतर कर एक ठे ले पर चाय पीयी और ठे ले वाले से पूछ कर ही एक बस िजस पर िलखा था ु 'राजग ढ़ डीपो' म) जा बैठा। सदv कड़ाके की पड़ रही थी। हाथ पैर िठठरकर ग ल ग ए जान पड़ते थे। सड़क पर लोग जग ह-जग ह आग जलाए ताप रहे थे। मRने भी अपने शॉल को और अिधक कस कर लपेट िलया था और थोड़ी ग रमी पाने के इरादे से िसग रे ट पर िसग रे ट फूँके जा रहा था। बस के शीशे जरा भी िखसक जाने पर आने वाली हवा तीखे बाणY-सी शरीर को बेध-बेध जाती थी। कोहरा ग हराने लग ा था और अब दरू की चीज) ँ ली होने लग ी थी। साइवर बड़े ही कौशल से बस चला रहा था। िशलांग म) भी सदv को धुध कभी इतना भयानक हआ ु नहीं जाना. बाहर से दे खने पर मकान छोटा िकEतु आरामदायक जान पड़ता था। ग ली के नु]कड़ ...रात डे ढ़ बजे बस राजग ढ बस ःटै Fड पर आ लग ी। अब इसके आग े का राःता और भी मुिँकल था। ]यYिक यहाँ के िकस इलाके का पता मृदला ु ने िलखा है . ]या पता? 'रात बस ःटै Fड पर ही ग ुजार कर सुबह िकसी से पूछताछ करना ही ठीक होग ा' सोचकर एक रे ःटोरे Eट म) चला ग या और चाय का आड र दे डाला। चाय रखने आये लड़के को पास बुलाकर उसको बीस का नोट दे कर कहा... सब जैसे कल की ही बात हो ..

मR चाय लाती हँू .. मुःकुराहट की सादग ी और चाल का ःवािभमान तो वैसा ही होग ा अब भी। कैसा तमाचा मार कर ग ई थी उस िदन . बाहर से छोटा िदखाई पड़ रहा था। पर भीतर आकर दे खा िक घर की लबाई काफी थी। थोड़ी दे र म) वही युवती हाथ म) पानी का िग लास लेकर लौटी। मRने िग लास लेते हए ु . घर की सुiिच को परखने नहीं। घFटी का बटन दबाया कुछ दे र बाद दरवाजा खुला। एक सामाEय सी नवयुवती ने दरवाजा खोला। मRने अपना पिरचय दे ते हए ु कहा..... 'मृदला ु जी हR ?' 'जी हाँ' अभी कुछ दे र बाद . थोड़ा आराम कर लीिजए . ' उसने पलट कर जवाब िदया..। बात को अधूरा छोड़कर वह वापस चली ग ई। मR उसकी अधूरी बात को समझ नहीं पाया। बैठा रहा जस का तस। 'uयारह साल बाद आज पुनः मृदला ु को दे खगूँ ा' सोच-सोच कर मन रोमांिचत हो रहा था। कैसी लग ती होग ी? बाल जoर पक ग ए हYग े। मेरे भी तो िकतने ही सफेद बाल नजर आने लग े हR । कनपिटयाँ तो िबbकुल ही सफेद हो ग ई हYग ी। पर िफर भी चेहरे की कमिनतया ऑख ं Y की ग हराई... ' मRने पीछे से हाँक लग ाई। 'जानती हँू . इस बार भीतर चलने का बुलावा लाई हो। िकEतु वह ऐसा कुछ करने नहीं आई थी। खाली िग लास लेने आई थी। 'आप सफर से थके हारे आए हR । मुँह हाथ धो लीिजए... 'मR सKयेन आचाय हँू । िशलांग से आया हँू . जहाँ बैठक की Hयवःथा थी। बरामदे म) एक चार पाँच साल का ब3चा िखलौनY से खेल रहा था। मुझको दे खकर मुःकुरा िदया। मुःकुराहट िबbकुल मृदला ु जैसी लग ी। मुझे उसका ही बेटा लग ा। दो-चार कुिसयाँ रखी थी। एक सेFशल टे िबल। िजस पर अखबार पड़ा था। दीवारY पर एकाध तःवीर लग ी थी. ' 'आप कहािनयY वाले सKयेन आचाय हR ना?' युवती बीच ही म) बोल पड़ी। 'जी हाँ' कह कर मुःकरा िदया था... ' िनवाक रह ग या था मR। अिभभूत हो ग या था उसको दे खकर। तभी वह युवती पुनः आई। शायद. ' कह कर वह िफर पलट ग ई। 'सुिनए! मR इतनी दरू से यहाँ चाय पीने या आराम करने नहीं आया हँू । बुलवाया ग या हँू . िमलने को।' मR पुकारता रह ग या। . पेिFटं ग नुमा। घर... और चली ग ई। 'िफर? मृदला ु जी से किहए सKयेन आया है . दो-दो जवान बेिटयY वाले घर म) अग र कोई आपको दरबीन ू से झाँकते दे खेग ा तो ]या सोचेग ा? सोिचए ...पर होने के कारण दोनY तरफ के राःतY के िमलान िबEद ु पर िःथत यह मकान िकसी सुiिचपूण Hयि\ का सुiिचपूण घर लग ता था। िकEतु मR यहाँ मृदला ु से िमलने आया हँू . मR। अब तो मेरा पिरचय 'कहािनयY वाला' सKयेन आचाय होकर रह ग या जान पड़ता है । 'आईये' कहकर वो एक ओर हट ग ई। दरवाजा खुला छोड़ ग ई। मR भीतर ूिवW हो ग या। घर म) घुसते ही थोड़ा चलने पर एक बरामदा-सा था.

खूब ूिसिaद पा रहे हR आजकल। चारY तरफ धूम मची है आपके नाम की .।' उसने बात टालनी चाही। 'बात मत टालो मृदला। ु ये सब ]या है ? ]या हआ ु है तुह) ? कहाँ है तुहारे घरवाले?' मR अधीर था सब कुछ जानने को। .. अपने ु मुझे दे खकर मुःकुराने का यy कर रही थी। िकEतु ऑख मन म)। मृदला ं Y के कोरY से ढ़लक आए ऑस ं ू मुःकुराहट का साथ नहीं दे रहे थे। उसने कुसX की ओर ईशारा करते हए ु आत ःवर म) कहा 'बैिठए .े जाइये जरा आराम कर लीिजए िफर बाते कर) ग े .. 'ये ]या हाल बना रखा है तुमने?' सीधे 'तुम' कहने लग ा। िलहाज का Iयाल ही नहीं रहा। 'कुछ नहीं। कमw का फल है । आप सुनाइये..कुछ पल यूँ ही बैठा रहा। िफर ना जाने ]या सोच कर ःवयं उठा और अEदर की ओर बढ़ ग या। ग ैलेरी पार करने के बाद एक छोटा-सा चौक था िजसके चारY ओर चार कमरे थे। सभी के दरवाजे चौक म) खुलते थे। ऊपर खुला आकाश नजर आ रहा था और कमरY के भीतर घुटा-घुटा अEधेरा। सीलन-सी महसूस हो रही थीं.. वो दरबीन सा हँ सते हए ू अब भी इःतेमाल करते हR ]या?' मR कुछ नहीं बोला बस एकटक उसी को दे खता रहा। 'सफर काफी लबा रहा होग ा। थक ग ए हYग . ।' अब मुझसे और अिधक ज[ब नहीं िकया ग या। मR फट पड़ा. िकEतु िफर ूकृ ितःथ होकर कातर िनग ाहY से मेरी ओर दे खने लग ी। युवती ने मृदला ु के हाथ पाँव पgछकर कपड़े वग ैरह ठीक करके उसे पुनः िबःतर पर िलटा िदया और सारा सामान समेट कर बाहर चली ग ई। मR अभी भी अवाक् खड़ा था। ']या इसी oप की कbपना िलए मR पहाड़Y से भाग ा आ रहा हँू ?' ]या हालत हो ग ई है उस oपराशी की? िजसे मR ओस नहाया फूल कहा करता था. रह-रह कर। हbकी आहट का अनुसरण करता हआ ु मR एक कमरे के —ार पर पहँु चा भीतर धुध ँ ला धुध ँ ला उजाला था। कुछ साफ िदखाई नहीं पड़ रहा था। भीतर घुसते ही तेज बदबू का एक झgका मेरे नथुनY म) समा ग या। सामने का ँय दे खा तो एकदम मानो िसर पर िबजली ू पड़ी हो। मRने दे खा मृदला टट ु चारपाई पर लेटी है और वो युवती उसको कमर से सहारा दे कर अधलेटा िकए है और धीरे से एक पाऽ उसकी चादर के नीचे से िनकाल रही हR । दोनY ही मुझे यूँ एकदम आ ग या जान कर झ)प ग ई.. ।' मR आkाकारी िशशु की तरह कुसX खींचकर बैठ ग या। मेरी ऑख ं ) अब भी उसके चेहरे पर ही िटकी थी। वो मेरी नजर की उदासी को शायद बदाँत नहीं कर पा रही थी। सो हbका ु पूछा 'किहए..

.... कर िदखाए कम है । बस ये समिझये.... और अब साहकार ू कभी भी कुक लेकर आ सकता है । जब मुझे ये पता चला तो मR खुद उस साहकार ू से िमलने ग ई। इसिलए िक वो कुक लेकर ना आए। हम खुद ही जbदी कहीं और इEतजाम कर ल)ग े . । ' वह पहे ली-सी बुझाने लग ी। 'िकEतु तुम चली कहाँ ग ई थी अचानक। कई िदनY बाद जब अचानक मRने अपनी िखड़की खोली तो तुहारे घर पर ताला लग ा दे खा। पहले सोचा कहीं शादी sयाह म) ग ए हYग े सारे घर वाले। लेिकन िफर जब कई िदनY तक भी वह ताला ही लटकता िदखता रहा तो मुझसे रहा नहीं ग या। पूछताछ करने पर सभी ने ये तो बताया िक तुम लोग हमेशा के िलए घर छोड़ कर चले ग ए हो. ' वो खामोश रही। 'बोलो। कुछ तो कहो' मेरे ःवर म) दीन आमह था। 'सKयेन जी! व\ जब जो कर दे .... जरा दम लेकर वह िफर बताने लग ी. ']या?' 'वो इस हाडमाँस के पंजर को नोचना चाहता था' कहते हए ु उसकी ऑख ं ) नम हो ग ई थी। 'तब?' 'िपताजी की इ[जत के िलए मRने अपनी इ[जत दे दे ना कबूल कर िलया। िजसकी एवज . िकEतु ये नहीं बताया िक कहाँ ग ए हो? िफर एक नया पिरवार आकर उस घर म) रहने लग ा .. ।' मR िबbकुल चुपचाप बैठा ग ौर से सुन रहा था.'. उसकी िमयाद पूरी हो ग ई है . ']यYिक मेरे िपता की शहर म) बड़ी अ3छी इ[जत थी। कुक के नाम से वो खाक म) िमल सकती थी। उनके मरने के बाद उनके नाम को िमVटी म) िमलने द) तो ]या नरक नहीं िमलता हम)? वह इस बात को राजी हो ग या। पर इसकी ऐवज म) वो कुछ और भी चाहता था . ' मRने शुo से सब पूछना ूारभ िकया। इस बीच वो नवयुवती चाय का एक ^याला रख ग ई थी। मेरे उस ओर कोई aयान नहीं दे ने पर मृदला ु ने ही याद िदलाया 'चाय लीिजए। ठFडी हो जाएग ी। माफ कीिजएग ा. व\ ने ही आज इस चारपाई तक ला पहँु चाया है .. आपके यहाँ से िजस िदन होकर ग ई उसी िदन पता चला िक हमारे घर को िग रवी रखवाकर जो कजा िपताजी ने िलया हआ ु था. पहली बार आप यहाँ आए और घर म) आपकी खाितर करने लायक कुछ भी नहीं है । बुरा तो नहीं मान)ग ?े ' मRने इEकार म) धीरे से पलक) मूँद कर 'ना' म) ग द न िहला दी। और पुनः अपने ू_Y के उzर की आशा म) उसकी ओर दे खने लग ा। '.

हम)। इसी दौरान हाट अटै क से माँ ग ुजर ग ई। अब मR और मेरी छोटी बहन शीला. जी छोटा नहीं करते। लो पानी पी लो .म) उसने हम लोग Y को घर म) रहते रहने की इजाजत दे दी। एकाध बार और उसने मेरे शरीर पर अपनी हवस की कािलख मली। अब वो ग ाहे -बग ाहे हमारे घर आने लग ा। मR उसकी नीयत को जानती थी। अब उसकी नजर मेरी छोटी बहन शीला पर थी। मेरी अनुपिःथित म) वो कई बार आकर उसको परे शान भी कर चुका था। माँ मजबूर थी. कभी कbपना ही नहीं की थी मRने। ना जाने अभी और ]या-]या और सुनना पड़े ग ा . ' मR वापस कुसX पर बैठ ग या। वो थोड़ा संयत हो ग ई तो बोलने लग ी. 'मृदला ं ) भी छलक पड़ी। मRने उसको धीरज बँधाते हए ु .. तो वो मर ही जाती। एक िदन साहकार ू ने मुझसे ही कह डाला 'जरा छोटी वाली को भी तो चखा।' मRने जोर से उसके मुँह पर झापड़ मार िदया। उस िदन वो चीखता-िचbलाता लौटा था और जbदी से जbदी घर खाली कर दे ने की धमकी भी दे ग या था। मRने भी उस िदन ठान िलया था िक जbद ही यह मकान छोड़ द) ग े। भग वान ना करे अग र िकसी िदन मेरी ग ैर-मौजूदग ी म) उसने शीला को 'पकड' िलया तो? ]या मुँह िदखाऊँग ी िपताजी की आKमा को .. सुनकर दिनया ु वाले ]या- . बेचारी ]या करती? उसको तो ये भी नहीं पता था िक उसकी बड़ी बेटी अपनी 'इ[जत' ग ँवा चुकी है । शायद मालूम चलता.... बस दो जने रह ग ये थे पिरवार म)। अचानक मुझे पता चला िक हमारे घर के िपछवाड़े वाले दिजयY का सबसे छोटा लड़का ना जाने कैसे शीला से दोःती ग ाँठ बैठा है और दोःती का उपहार भी उसकी कोख म) डाल िदया है । कहते-कहते वह रो पड़ी। मेरी ऑख ु कहा. ' पास रखा पानी का िग लास उठा कर उसकी ओर बढ़ाया। पर अग ले ही पल अपनी ग लती महसूस हई। ु उठा और सहारा दे कर उसे उठाया। उसका सारा शरीर मेरी बाँई बाँह म) िघरा था.. कुछ िदन बाद ही हम यहाँ आ ग ए। यहाँ थोड़ी-सी जमीन थी। सsजी वग ैरह बो कर ग ुजारा करने लग े। कुछ थोड़ा बहत ु मR ग ाँव के दो-चार ब3चY को पढ़ा िदया करती थी। बस इस तरह से िदन ग ज ु र रहे थे। लेिकन शायद भग वान को अभी कुछ और बुरे िदन िदखाने थे... 'छोटी बिहन िबन sयाही माँ बनने जा रही है . अपने पूरे भार सिहत। वह छलछलाती िनग ाहY से मुझे दे खे जा रही थी। उसकी ऑख ं Y म) िववशता थी। दाएँ हाथ से उसे पानी िपलाया। दो घूँट पीकर ही उसने मुँह फेर िलया। मRने िग लास को पकड़े पकड़े ही धीरे से उसे पूवव  त ्िलटा िदया। मन म) उथल-पुथल मची थी िक ']या ]या ग ुजर ग या इस बेचारी की िजEदग ी म)? भग वान इतना िन$ु र भी हो सकता है .' मेरे मन म) मृदला ु का ःथान आकाश से भी ऊँचा हो ग या। कैसी अ˜त ु Kयाग मूित है यह नारी? वह आग े बताती रही '.

. समय ग ुजरता जा रहा था। शीला का ग भ बढ़ता जा रहा था। दो महीने का हो ग या था। एक रोज मRने हलधर के समq अचानक िववाह का ूःताव रख िदया। वो भgच]का रह ग या। पर ूसEन भी हआ ु अKयिधक। वह तुरEत तैयार हो ग या। िववाह तय हो ग या। िववाह से पहले मR खरीददारी के बहाने शहर ग ई। करीब दस-पEिह िदनY म) लौटँू ग ी. हलधर वो भी मुझी को रखने को कहता। जoरत पड़ने पर और माँग लेने म) कोई िहचक ना करने का भी आमह करता रहता अ]सर। .... मR शीला को लेकर शहर ग ई और जैसे-तैसे उसके ग भ का िनराकरण करवाया। आधे से [यादा पैसा उसी म) बीत ग या। बचे हए ु म) जoिरयात की चीज) खरीदी। वापस . खैर. '. वो दौड़ कर आया। बुलाने का कारण पूछने पर मRने अपने िपछले Hयवहार की माफी माँग ते हए ु आमह िकया िक ]यY ना ग ाँव म) एक छोटा-सा ःकूल खोला जाए और इस काय म) वह मेरी मदद करे । वह च™ से तैयार हो ग या। अपने घर की बैठक से लग ा कमरा भी मुहैšया करवा िदया। चॉक. हमारे ग ाँव का एक ूिति$त Hयि\ था। काफी दबदबा था उसका। कई लठै त पाल रखे थे उसने और कोई भी उससे राड़ लेकर चैन से नहीं जी सकता था। सभी उसको 'हbला भाई' कहते थे। हम लोग ग ाँव म) आए उसी िदन से वह मुझ पर आस\ था और मतलब-बेमतलब तरह-बेतरह हमारी मदद करने को आतुर रहता था। लेिकन हर बार उसको मुझसे िनराशा ही हाथ लग रही थी। वो चाहता तो शायद बलपूवक  मुझे ूाr कर सकता था और हम लोग उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते थे। पर उसने ऐसा कुछ नहीं िकया। मRने उसी की आसि\ को इःतेमाल करने का िनxय िकया . मR भी तो दरबीन ू लेकर बैठा करता था... हलधर को। उसने खरीददारी के िलए काफी iपया िदया था मुझे। कम पड़ने पर और माँग लेने को भी कहा था। उस qण उस Hयि\ के िनद›षपन पर दया आई थी मुझे और खुद पर िघEन। कैसी औरत हँू मR? अपने अभावY की पूित के िलए िकसी िनद›ष के िदल के साथ िखलवाड़ करना कौनसा Eयाय है ? .. ' सुनकर मुझे खुद पर ल[जा हो आई..... दरी पिVटयाँ आिद सभी कुछ का खचा उसी ने िकया। दस बारह ब3चे पढ़ने आने लग े। फीस वग ैरह से जो थोड़ा बहत ु आता.. काफी िमलने जुलने वाले और िरँतेदार हR । सभी को िमलने जाना पड़े ग ा। पहले ही बोल िदया था. मRने एक रोज हलधर को बुलवाया .]या नहीं कह) ग ?े सोच-सोच कर िदल बैठा जा रहा था। उसी समय मRने एक तरीका खोज िनकाला और छोटी बिहन की ग ित सुधारने के िलए मRने एक बार पुनः एक कठोर िनणय लेना ःवीकार कर िलया। हलधर मौय. िखड़की म)। लेिकन वो मेरी इस ल[जा को लआय नहीं कर पाई और आग े बताने लग ी. बोड . आप सोच)ग े िकतनी िघनौनी हँू मR? है ना? पर बताइये ]या छोटी बिहन को बेइ[जत हो जाने दे ती? यूँ भी इस जहान म) जवान बेिटयY के घर पर सैकड़Y की नज़र) लग ी रहती हR .

हbका-सा मुःकुराया और जरा दे र को िठठक कर कमरे से बाहर चला आया। मेरे बाहर आने के साथ ही वो युवती भीतर चली ग ई। मR बाहर आकर बरामदे म) पड़ी कुिसयY म) से एक को ख)चकर बैठ ग या। मन बड़ा बेचन ै था... उसने िफर iक कर साँस ली और ऑख ं Y की कौरY म) छलक आये ऑस ं ूओं को पgछ कर िफर आग े कहने लग ी. '. ' मेरे मुँह से जोरY की चीख िनकली और मR वही ढे र हो ग ई। जब होश आया तो दे खा मेरी दिनयाँ ु उजड़ चुकी थी . दीदी . 'चलो अ3छा है िबना माँ-बाप की बेटी को खेवनहार िमल ग या। अब छोटी बहन की ग ित भी सुधर जाएग ी . एक अ3छा पित भी। हर तरह से वह मुझे सहयोग करता. बस। िकतना तो पैसा ऐंठ रही है .। अग ले ही बरस हमारे बेटा पैदा हआ ु और हलधर ने बड़े ही चाव के साथ उसका नाम रखा 'मृदल ु ' हलधर बड़ा भला इEसान था.... 'बड़ी चालू लड़की है । कैसा फँसा िलया हलधर को? ःकूल तो एक बहाना था। इसको तो अपना उbलू साधना था। जरा अपने बदन की झलक िदखा दी होग ी। अEधा हो ग या हलधर.ग ाँव लौट आई। हलधर िववाह की उKसुकता म) फूला नहीं समा रहा था। ग ाँव म) भी सबको पता चल चुका था िक माःटरनी.... ःकूल के साथ-साथ अब जमीन जायदाद की दे खरे ख की िजमेदारी भी मुझ पर आ पड़ी थी। अपना कहने को अग र कोई पास था तो मेरा पाँच साल का बेटा . हलधर की घरवाली बनने वाली है । कुछ कहते.... ।' कुछ कहते..... कभी-कभी पुरानी बात) जoर याद आती थी। आप भी। िफर हलधर ने ही एक लड़का दे खकर शीला का sयाह तय करा िदया। मRने तुरEत ःवीकृ ित दे दी और तुरत-फुरत शीला के हाथ पीले कर िवदा करवा िदया।' मRने दे खा बोलते-बोलते वो काफी थक ग ई है .. जीवन िफर से एकाकी हो ग या . ' और उसको सहारा दे कर िलटाने लग ा। तिकया ठीक िकया..... दीदी .... कहीं तिबयत ना िबग ड जाए सो मRने बीच ही म) टोक िदया उसे 'बस करो मृदला ु . '.. मेरी बात मानता और मR भी पूरी तरह से उसको खुश रखने की कोिशश करती। एक िदन मR ब3चY को पढ़ा रही थी िक पड़ोस का लड़का िबरजू दौड़ा-दौड़ा आया .मृदल। ु अपने आपको अिधक से अिधक Hयःत रखने म) खुद के ूित लापरवािहयाँ बढ़ती ग ई और कई .. बाकी बात) बाद म)। अब आराम करो . हbला भाई कुईया म) िग र ग ए . वो िफर जरा-सी iकी शायद थूक िनग लने के िलए। आग े बताने लग ी '.... िववाह हो ग या। िजEदग ी ग ुजरने लग ी। हाँ. जैसा हम चाहते हR । उसकी अपनी चाल होती है और अपना चलन . आजकल उससे? सुना है sयाह का पूरा खच भी वही बेचारा भुग त रहा है .. िवतृंण भी . चादर ठीक की... सKयेन बाबू जीवन कभी भी वैसा नहीं चलता.. लेिकन अभी भी शायद कुछ सुनना बाकी था। अग ले िदन िफर. ।' बात) ग म शीशे-सी कान म) िग रती। मR िसहर के रह जाती .

मानो बहत ु िदनY बाद चैन की नींद सोई है । 'सोने दो' सोचकर मR बाहर जाने का हआ। ु अचानक मेरे कदम िठठक ग ए। अजीब दँशं ु का ने आकर पाँव जकड़ िलए। वापस पलटा.. जमींदारी आिद का ]या होग ा? बहत ु सोचने के बाद मेरे मन ने आपका नाम पुकारा। आप ही हR . ' मR बस इतना ही कह पाया और बाहर िनकल ग या। वो एकाएक िखल-सी ग ई। रात को उसी के पास मोढ़ा डालकर बैठ ग या और अखबार पढ़ता रहा। वो सो रही थी। दो बार उठाकर उसको दवा िपलाई। अब उसकी ऑख ं Y म) सEतोष की चमक और मेरे ूित अनुग ह ृ िदखाई दे ने लग ा था। ना जाने कब मेरी ऑख ं लग ी। मR भी बैठा-बैठा ही सो ग या। सुबह ऑख ं खुली तो दे खा मृदला ु अभी भी सो रही है । उसके चेहरे पर िदHय तेज नजर आ रहा था। लग रहा था... कम से कम चैन से मर तो पाऊँग ी।' ']यY तुम मरने जीने की बात करती हो बार-बार। लेट जाओ चुपचाप।' मR कहते हए ु जाने को हआ ु .. और इस तरह मR खाट से आ लग ी। अब तो बस एक ही िचEता खाए जा रही है िक मेरे जाने के बाद मृदल ु का ]या होग ा? मेरे ःकूल का. सीने पर रखा उसका हाथ उठाया तो वह िनजXव-सा एक ओर लटक ग या .... खेती-बाड़ी. ऑख ं Y से पानी बहने लग ा और ऑख ं ) लाल हो ग ई। 'तुम कहाँ जा रही हो?' मRने जbदी से उसे सहाला। 'मेरी साँसY का अब कोई भरोसा नहीं है . कुछ नहीं। वो जा चुकी थी। एकाएक ऑख ं ) भर आई। मR तेजी से बाहर िनकल आया। . जो इन सबको सहाल पाओग े। ना मालूम मुझे ]यY लग ा?' अचानक उसको जोर की खाँसी आ ग ई. लपक कर उसने मेरी बाँह थाम ली। मR जड़ हो ग या। पलट कर दे खा उसकी ऑख ं Y म) घोर अनुनय और अथाह िवAास तैरता हआ ु नजर आया। 'ठीक है .. मृदल ु खेल रहा था। मR धीरे से उसके पास आया और अपना ःनेह भरा हाथ उसकी ओर बढ़ा िदया। उसने तपाक से पकड़ िलया और हँ स िदया। मRने लपक कर उसे ग ोद म) उठा िलया और ग ले से लग ा िलया। (समाr) 12 ये कहानी नहीं ... ' पानी की दो घूँट पीकर उसने कहा। 'ऐसा ]यY सोचती हो? सब ठीक हो जाएग ा। मेरे साथ चलो अ3छे -से डॉ]टर को िदखाय)ग े तुह) । िचEता मत करो।' 'आप अग र 'हाँ' कह द) तो िचEतामु\ हो जाऊँ। चैन से जी तो ना सकी. सKयेन जी .. मR पKथर हो ग या। िहला डु ला कर दे खा .सारी बीमािरयY ने एक-साथ आ घेरा ..

झूठ और ऽासदी से ग ुजर रही है उसकी िजEदग ी? और कैसा बेबस है वो? ग िरमा और माँ की शुi से ही आपस म) नहीं बनी। बनती भी कैसे? ग िरमा ठहरी एक साधारण से ]लक की लड़की और माँ ठहरी एक खानदानी रईस ठाकुर पिरवार की मालिकन। बढ़ते बढ़ते बात बढ़ती ग ई। और इस तरह एक ही शहर म) अलग मकान . भई! दीपक बधाई हो। शमा साहब ने बताया. पापा ने। मन को बड़ी पीड़ा होती है जब एक ही शहर म) रहने वाला िपता एकाध िदन म) आने की बात कहे । 'खुशखबरी' अग र वाकई है . तो उसने तौिलये को सहे ज कर वापस ऊपर रख िदया और पुन: िखडकी से बाहर दे खने लग ा . िदन म) दो-दो. तीन-तीन बार फोन िमलाता रहता. वह हर रोज. बड़ी खुशी हई। ु ब3चा ठीक है ? ग िरमा ठीक है ? एकाध िदन म) हम आएंग े। ठीक है ।' कहकर फोन काट िदया। उधर से दीपक हाँ-हँू के अितिर\ कुछ बोला ही नहीं। बोलने का अवसर भी नहीं िदया.. पर घंटी जाती रही। वो लोग लौटे नहीं थे। दीपक ने बग ल वाले शमा साहब के यहाँ मैसेज छोड़ िदया था। एक हhता ग ुजर ग या ग िरमा घर आ ग ई थी। दीपक ने िफर एक िदन फोन िकया तो ू पापा ने उठाया। छटते ही बोले 'हाँ... तो तुरEत आना चािहए िक नहीं? ]या उनके मन म) ये साध नहीं थी िक दीपक के घर भी ब3चा हो। तब 'एकाध िदन' वाली बात भीतर तक ग ड़ ना जाए फाँस की तरह? कहा िकसी को कुछ नहीं। ग िरमा —ारा पूछे जाने पर िक ']या कह रहे थे पापाजी?' ये ही कहना पड़ा िक 'शाम को आ रहे हR ।' जबिक वह खुद जानता था िक शाम को जब वो नहीं आएंग े तो उसे ]या जवाब दे ना है 'कहीं काम से अटक ग ए हYग )' कैसी-कैसी िवड़बना. दीपक के िलए पीड़ा के qण कभी िग नती के नहीं रहे । सदै व अनिग नत रहे हR । िकEतु एक नँतर ऐसा है िक िजसको वह भूलना भी चाहे ग ा तो शायद भूल नहीं पायेग ा। मयंक का जEम हआ ु तो सबसे पहले उसने पापा-ममी को ही फोन लग ाया था। पापा-ममी इसी शहर म) थे। पता चला वो लोग मामा की लड़की की शादी म) जमशेदपुर ग ए हR । जबिक उEह) पता था िक ग िरमा की 'डे ट' आने वाली है और मुझको कभी भी उनकी जoरत पड़ सकती है । मोरल सपोट के िलए भी और iपये पैसY के िलए भी। खैर.. .ग ाड़ी अपनी रhतार से दौड़ी जा रही थी। जग मग ाती रोशिनयाँ और िबखरी िबखरी बिःतयाँ छूटती जा रही थी और हवा को चीरती हई ु ्-छक ु छक ु ् अदे खे लआय की ओर भाग ी जा रही थी। बथ पर लेटे हए ु बुजुग  का तौिलया जब लटक कर दीपक के िसर पर झूलने लग ा.

सास. सलहज. दो-दो िदन म) फोन करके ग िरमा की तिबयत पूछ लेग ी तो तेरा ]या चला जाएग ा?' मौसी ने िफर कहा। 'बडी नाकवाली बनती है ना. जाने लायक हो सकती है । अचानक मौसी से हई ु उनकी बात याद आ ग ई। 'सुरेखा.. तू तो माँ है । तू ही अग र उससे एक-एक. पyी सभी के सामने और कुछ करते नहीं बना। जबिक वह जानता था िक उसके घर के िकसी भी काम के समय उसकी माँ की तिबयत अ]सर खराब हो जाया करती है । और शायद इतनी खराब िक दो iपये की लोकल फोन करने लायक भी नहीं रहती। पाँच सौ मील दरू अपने पीहर. वो। मेरी ]या जoरत है अब उसको? तुझको [यादा लाड़ आ रहा है तो तू चली जाना। माँ और मौसी म) कोई फक थोड़े ही होता है । मेरा ]या लेना- दे ना है ?' सुनकर मौसी जड़ रह ग ई। 'कोई लेना-दे ना ही नहीं है ?' . इसके अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। िकEतु ये यथाथ चल रहा था। कbपना का यहाँ कोई मोल नहीं था। 'माँ ]यY नहीं आई?' दीपक का औपचािरक और खोखला-सा ू_ था। 'अरे ! उसकी तिबयत बहत ु खराब है । सायनस से काफी परे शान रहती है । Eयूरोसजन का इलाज चल रहा है । बेड रे ःट बता रखा है ।' तिबयत खराब होने पर घूमने जाया जा सकता है ? पोते का मुँह दे खने और बहू का हालचाल जानने म) ही 'बेड रे ःट' बीच म) आ पड़ता है ? दीपक मुःकुरा िदया। साला. दे ख उसके ससुराल वालY को कुछ सोचने का मौका ना दे ना।' मौसी ने माँ को समझाया था। 'भई! वो मुझे फोन करे ग ा तो ठीक है । वरना मुझे कोई सपना तो आएग ा नहीं िक उसकी घरवाली के ब3चा होने वाला है । बाकी उसके सुसराल वाले हR तो सही। हमारी जoरत ]या है ?' 'वो तो ब3चा है .लेकर रहने के िसवा अEय कोई उपाय नहीं रहा। दो िदन बाद। हाथ म) िमठाई का एक डsबा लेकर पूजनीय िपताजी आए। अकेले। दीपक ु को इस बात का आभास पहले ही से था। उसने आग े बढ़कर पाँव छए। उEहYने िसर पर हाथ रखकर मुि\ पा ली। दीपक ने सोचा था िक पापा खींचकर उसको ग ले लग ाएंग े. तो उसे हौसला रहे ग ा। . दीपक की पyी के ब3चा होने वाला है । कहीं आना जाना मत। शहर म) ही रहना। वो अभी ब3चा है । घबरा जाएग ा अकेला। तू पास रहे ग ी. कbपना की थी। इतनी बड़ी खुशखबरी सुनकर तो एक बाप अपने बेटे को ग ले ही लग ा सकता है ..

. नहीं आयी। ग िरमा बड़ी लग न से उसको पाल रही है . बस।' इस बार माँ ने घोषणा-सी की। मयंक को पैदा होना था. ना समाचार। .'मेरे िलए मेरा घर दे खना सबसे पहले है । बाकी सब बाद म)। यहाँ कौनसी लाड़ी बैठी है ?' 'आप ]यY कुछ नहीं कहते जीजाजी?' मौसी ने पास ही चुपचाप बैठे सुन रहे पापा को कहा। ']या कहँू ?' कहकर पापा पुनः चुप हो ग ए। 'तुम कुछ भी कहो। यहाँ अपना करल) वो ही काफी है । दसरY ू के काम म) टाँग घुसाने की ना मेरी आदत है और ना मेरा शौक। और उसके ससुराल वाले हR तो सही।'माँ भड़क उठी। 'अपनी कोख से पैदा िकया बेटा 'दसरा ू ' हो ग या तेरे िलए। और ससुराल वाले तो कर) ग े ही बेचारे । िजनके कोई नहीं होता उनके भी काम होते ही हR । तू ये वहम तो िनकाल दे ना िक तेरे िबना उनका काम नहीं चलेग ा . हो ग या। माँ को नहीं आना था. दाएँ-बाएँ ठंु से पड़े हR । सो रहे हR .. ' इस बार मौसी ने माँ को आड़े हाथY िलया। 'चल जाएग ा ना? बस। िफर हमारी ]या जoरत है ? और सब छोड़Y.. जाग रहे हR । उनींदे हR .. मR उससे Hयवहार नहीं रखना चाहती . जैसे शायद दीपक को पाला होग ा उसकी माँ ने। मयंक महीने भर का होने को आया और आज तक दादा-दादी का ना कोई फोन है .... बथ को पकड़े । . बस घर आने वाला था। दीपक चौकEना होकर बैठ ग या था। रात के करीब नौ बज रहे थे। दस बजे तक घर पहँु च जाएग ा। सुबह पाँच बजे उठकर पुन: चल पड़ने के िलए। सोचकर वह मन ही मन मुःकुरा िदया। इधर-उधर दे खा लोग ऊपर नीचे. ठीक वैसे ही.. ग िपया रहे हR । एक कोने पर वह भी लटकता-सा बैठा है .

काका।' 'इतनी छोटी उमर म) ]यY उस पर ग ह ृ ःथी का बोझ ड़ाल रहा है लीbया?' काका ने समझाते हए ु कहा। 'sयाह तो करना ही है काका आग े पीछे । िजतना जbदी िनपट जाये अ3छा है ।' 'चल कोई बात नहीं. अभी तो उसकी उमर ही िकतनी है ?' 'uयारह की होकर बारव) म) लग ी है . काका। पास के ही ग ाँव म) एक छोरा िमल ग या। िमिशक म) पढ़ रहा है ।' 'पर बेटा. कहो।' 'सुना है तूने ँयामली का िरँता तैय कर िदया है ।' 'हाँ. राह की बात बताने वाले और चुके थे। बड़े ही भले मानस हR । सुख-दख मन से सब का भला चाहने वाले। सारा ग ाँव उनकी बहत ु इ[जत करता है । वो भी सारे ग ाँव को अपना पिरवार समझते हR । 'हाँ काका.(समाr) 13 नई सुबह 'अरे लीbया सुनतो' काँधे पे कुदाली धरे मजूरी को जाते हए ु लीलाराम को िकसी ने पीछे से पुकारा। लीलाराम ने पलटकर दे खा तो रघुवीर काका थे। रघुवीर काका ग ाँव के मुिखया रह ु म) काम आनेवाले. आज भूप सरपंच मेरे पास आया था। कहता था . जैसी तेरी इ3छा। हाँ.

. नEद. पाठशाला तो ग ाँव को भी शहर बना दे ग ी और तुम जानो शहर म) ]या-]या िछछोरपन होवे हR ।' लीलाराम अपने िवरोध पर डटा था। 'दे ख लीbया तू मेरे सामने जEमा है . पर िग रःती कुणबा सहाले बैठी हR िक नहीं? ना काका .. वो ऐसा-वैसा िसखा-पढ़ाकर हमारी छोिरयाँ का माथा िबग ाड़ द) ग ी और आप जो जानो छोिरयY को पराये घर जानो होवे। तब ]या भली सुनवाय)ग ी वो छोिरयाँ अपने मैके वालY को? और िफर काका ग ह ृ ःथी चलाणे म) पढ़ाई-िलखाई िकस काम की? हमारी अमा और काकी भी तो पढ़ी िलखी ना है . दौरानी. sयाही जायेग ी। पढ़ना जानेग ी तो अपना दख ु -सुख तुमको िलख तो सकेग ी नहीं तो बेचारी घुट कर ही रह जायेग ी। नहीं?' 'पर काका ये सब तुम मुझसे काहे कह रहे हो?' 'भूप कहता था िक तुम भी नहीं चाहते हो िक यहाँ पाठशाला खुले और तुहारी बात ग ाँव के सारे ग बo मानते हR सो तुहारे नहीं चाहने पर यहाँ ःकूल कैसे खुल सकता है ?' रघुवीर काका ने पास की खेळी म) हाथ धोते हए ु कहा। 'काका मनाही तो नहीं है .अिशqा। िशqा के अभाव म) ही तो हम अपनी बि3चयY की जbदी शादी कर दे ते हR । जbदी बाल-ब3चे होने लग ते हR और उसके बाद सौ मुसीबत)। अरे बेटा.िक ग ाँव म) एक लड़िकयY की पाठशाला खोलने का िवचार है । मRने कहा िक बहत ु अ3छा है । पर बेटा वो कहता था िक.. आधी से [यादा मुसीबतY की जड़ है ... ना . जेठानी तंग करे तो वो अपनी Hयथा िकसको सुनाने जाय। ससुराल म) िकसी को कह नहीं सकती और पीहर वालY को कहे कैसे? पढ़ना-िलखना आये तो अपने भाई-बाबुल को काग द तो िलख सके है िक ना? सोचना बेटा इस पर। जा अभी तो तू . पला बढ़ा है और भग वान की मेहर से इस लायक हआ ु है िक अ3छे -बुरे की पहचान करना जानता है । पर बेटा तू जानता नहीं िक दिनया ु की मुिटयार) कहाँ तक पहँु च ग ई हR और हमारे ग ाँव की छोिरयाँ उपले-थापने और चूbहा- चौका करने म) ही उमर ग ँवा दे ती हR । ग ोबर-बुहारी से उनको इतना समय ही नहीं िमलता िक वो कुछ अपने बारे म) सोच सक)। िफर छोटी उमर म) ही हम लोग उनको sयाह दे ते हR । छोटी उमर म) छोरी ससुराल जावेग ी तो तै है िक जbदी से वहाँ खट नहीं पायेग ी। तब यिद उसे सास. मजूरी पे बखत से पहँु च। लीला ग ुमसुम-सा अपनी राह हो िलया और रघुवीर काका चौपाल की तरफ बढ़ ग ये। . ग ाँव वाले इसका िवरोध कर रहे हR । दे ख लीbया.... हमारी बहू-बेटी पढ ल)ग ी तो काग द िलखने-बाचने को तो िकसी का मुँह नहीं ताक)ग ी। तुम ही बताओ कल को तुहारी ँयामली भी सायनी होग ी.. पर तिनक तुम ही सोचो .. ःकूल म) कःबा से बिहनजी पढ़ाने आएंग ी ...

चलो चलो .... ' सभी उस ओर दौड़े िजधर शारदा जमीन पर पड़ी पीड़ा से िचbला रही थी। लीbया भी दौड़ा। ']या हआ ु .... ]या हआ ु ..... कोई मेरे बापू को बुला दो . दे खो शारदा को ]या हआ ु है .. हटो .... भग वान .. िग र पड़ी .. खबर कर दे ... ' इतने म) ठे केदार आ ग या। 'बाबूजी शारदा .. ठे केदार को बुलाओ .. ? ठे केदार को कहो डा]टर बुलाये ... मR अब और ना जीऊँग ी . ' सभी सEन खड़े थे। कुछ औरत) जो यहीं मजदरी ू करती थी... अभी कपाऊFडर साहब को बुला भेजते हR । अरे दिखया ु ... इस हालत म)' एक ूौढ़-सी मिहला ने धीरे से कहा। 'अरे ठे केदार से कहो ...नहर का काम चल रहा था। सRकड़Y मजदरू काम कर रहे थे। लीbया भी एकतरफ तbलीन हआ ु अपनी कुदाल की चोट से जमीन को खोद रहा था। अब तक वो काका की बात) भूल चुका था। अचानक एक कोलाहल हआ। ु 'अरे भाग ो रे भाग ो ... बीरा को बुला दो .. पKथर उठाकर ले जा रही थी ... इसके मैके ... जbदी .. बेचारी पेट से भी है .... पेट से है बाबूजी' एक बूढ़े मजदरू ने बताया। 'ठीक है ठीक है Fण ्उठाओ इसे और टे Fट म) ले चलो . उमर भी दे खो इसकी पEिह-सोलह की होग ी . ' िकसी और ने कहा। ू उधर शारदा दद से कराह रही थी और टटती हई ु आवाज म) बोल रही थी 'हारे बापू को बुला दो .. अभी कहाँ बाल-ब3चे लायक थी। उस पर ये आफत और। भग वान बचाये ब3ची को। ']या करे िबचारी? आदमी परदे स ग या है कमाने और यहाँ ये अकेली जान. उसको िदलासा दे रही थी। िफर भी वो अस वेदना उसको चैन नहीं लेने दे ती थी। 'हटो .. ' िकसी ने कहा। 'अरे बेचारी पेट से है ... ]या हआ ु .. पKथर पेट पर आ पडा ....... एक पKथर िसर पर उठाये जा रही थी िक पैर के नीचे की िमVटी सरक ग ई और िग र पड़ी। वो पKथर इसके पेट पर आ पड़ा। राम जाने अब ]या होग ा .. सुन Fण ्घनँयाम बाबू के पास जा और कह के पेटी लेकर चल) एक मजूरन मरने को है ।' लापरवाही से कहकर वो चला ग या। 'अरे .. ' चपा ने सुझाया। सुनते ही एक ग बo-सा मजदरू ठे केदार के टे Fट की ओर दौड़ ग या। मग र कुछ दे र बाद ही लौट ग या। िजतने उKसाह और आशा के साथ वो दौड़ा था उतने ही दoखी ु कदमY से वो चला आ रहा . भलो करै ग ो।' वो अभी भी कराह रही थी। लीbया भी सEन खड़ा था। सारा वाकया उसकी ऑख ं Y के सामने घट रहा था। छोटी उमर की शारदा.........

फुरसत नहीं है । अभी कपाऊFडर आता है मर थोड़े ही जायेग ी ....। कम से कम वो अपने बाप-भाई के बग ैर मर तो नहीं जाएग ी ... ' कहते-कहते वो फफक पड़ा। काका ने उसे उठाकर ग ले से लग ा िलया। आसपास ग ाँव के लोग जमा हो ग ये थे। वो अभी भी रोए जा रहा था। दरू आकाश म) एक सुखद िनणय की सुहानी लािलमा फैल रही थी। तमाम सुबह के भूले पिरEदे शाम हई ु .. पढ़ाई िलखाई बहत ु जoरी है काका। अभी उसका sयाह भी नहीं कiँ ग ा मR। पहले वो पढ़े ग ी . घर को लौट रहे थे। ....... ऐसा कौनसा मरने को है ' उधर शारदा िचbला िचbलाकर हलकान हई ु जा रही थी। मुँह पर पसीना चमक आया था और चेहरा िबbकुल लाल हो ग या था। ऑख ं ) बाहर िनकल पड़ने को थी। िकEतु जुबान पर यही था िक 'मेरे बापू को बुलादो ...था। ']या हआ ु ... सबसे पहले मR अपनी ँयामली को ही भरती करवाऊँग ा .. पाठशाला को खुलने से मत रोको काका . ' कपाऊFडर आया तो. ूाथिमक उपचार के बाद उसे उठवाकर पास की िडःप)सरी म) ले जाया ग या। वहाँ भी वह दद से कराहती हई ु अपने बाप को ही बुला रही थी। शारदा को मरना था सो वो मर ग ई। बाप-भाई तक संदेश नहीं पहँु चना था. बेवजह सबको है रान कर िदया।' कहते हए ु उसने ग द न झुका ली। सुनकर लीbया की मुVठी भींच ग ई मग र िफर धीरे -धीरे अपने आप ढीली पड़ ग ई। लाचारी उEहीं की थी िक पढ़ाई िलखाई के अभाव म) अपनी छोटी-छोटी बि3चयY पर मातृKव का बोझा ड़ाल दे ते हR । बहत ु दे र हो ग ई कपाऊFडर नहीं आया। ठे केदार को िफर से कहा तो उसने ये कहते हए ु डांट िदया िक 'आता होग ा जरा दे र म) .... खुलने दो पाठशाला . सो नहीं पहँु चा। उस िदन ु जbदी छVटी कर दी ग ई। लीbया जब मरी हई ु शारदा को दे खने ग या तो शारदा की सूरत म) उसको अपनी ँयामली िदखाई दे ने लग ी। वो रो पड़ा। जैसे-तैसे सहलता हआ ु वहाँ से चला आया। ग ाँव आते ही घर पर कुदाल पटक कर वो सबसे पहले रघुवीर काका के घर ग या। शाम हो चुकी थी। काका बाहर चबूतरे पर बैठे ह]का ु ग ुड़ग ड़ ु ा रहे थे। लीbया दौड़कर काका के पाँवY म) जा िग रा और रोते हए ु कहने लग ा 'काका हमारे ग ाँव म) पाठशाला जoर खुलेग ी ... ]या कहा ठे केदार ने' इस बार लीbया ने बढ़कर पूछा। 'कहता है . काका हम लोग बहत ु भूल कर रहे थे .. अभी ठीक हो जायेग ी ..

पर ये मR जoर जानता था िक बग ैर िकसी ठोस वजह के पारीक ढाई iपये की िवbस िसग रे ट जाया नहीं करे ग ा। मR अभी सोच ही रहा था िक उसने पान खाने की पेशकश भी कर डाली और बग ैर मेरा जवाब सुने ही. एक बात बता। तू िकतना इEवेःट कर दे ता है साल म)?' पारीक ने धुआ ँ छोडते हए ु ू_ िकया। . दौ पRतीस। 'उूेती.(समाr) 14 इEवेःटमेFट ू उसने छटते ही सबसे पहले िसग रे ट ऑफर की। मRने सहज भाव से ले ली। मुझे नहीं मालूम था िक उसको मुझसे ]या काम था. एक म) चार सौ बीस।' पनवाड़ी अपने काय म) पनवाड़ी को आड र दे डाला 'दो सादा टकडे लग ग या। पारीक उसके खोखे पर टे क लग ा कर कश खींचने लग ा. मR भी बेEयाज-सा धुआ ँ का कपास कातने लग ा। दोपहर का ढ़ाई बजा होग ा. दरू मiधर ए]सूेस की िचंघाडन) की आवाज से पता लग ा। घडी दे खी. ु .

कर दे ता हँू ।' मRने औपचािरक-सा जवाब िदया। 'नहीं ए]जे]ट फीग र बता। भई िडसाईड़ तो करता होग ा ना िक अबके इतना करना है या उतना' वो बड़ा ःपेिसिफक था। मR थोड़ा सजग हो उठा। इस बीच पान वाले ने बीड़े थमा िदये थे और कहने की जoरत नहीं है िक छ: iपये का भुग तान भी फराग िदली से पारीक ने ही िकया था। दबारा ु मुझे अचरज हआ। ु हम साथ-साथ फुटपाथ पर टहलते हए ु आग े बढ़ने लग े। 'बता' उसने िरमांईड करवाया। 'यही कोई तीस-चालीस की एनएससी ले लेता हँू । दस पEिह पीपीएफ म) डाल दे ता हँू । बाकी तीन चार हजार एलआईसी का ूीिमयम चला जाता है ।' मRने अपना क3चा िचVठा उसके सामने खोल ड़ाला। 'हँू ' उसने पान को िचग लते हए ु एक ओर से दसरी ू ओर कर िलया। 'मुझको दे ख। मR कुछ इEवेःट नहीं करता। इEवेःटमेFट करने से िमलता ]या है ? पैसा और sलॉक हो जाता है ।' उसने बड़ा भारी रहःय मेरे समुख खोल िदया हो. और ]या?' 'ये कम थोडे ही होता है . एसी उसकी मुखाकृ ित थी। अंितम वा]य कहते हए ु उसने एक ऑख ं भी दबा दी थी। ']या कर) ? टै ]स तो बचाना ही पड़ता है ।' 'मR तो पूरा टै ]स कटवा लेता हँू । मRने तो अकाउFट अफसर को कह रखा है । हाथ की हाथ काट िलया कर भई।' पारीक उKसाह म) था। 'लेिकन एक िलहाज से तो ठीक ही है इEवेःट करना। भिवंय के िलए सेिवंग हो जाती है ।' ']या खाक सेिवंग हो जाती है ? तुहारे पैसे पर बRक) चल रही हR और तुम घर म) एक व\ सsजी बनाकर सेिवंग करने म) जुटे हो।' वो मुःकुराया था। 'तुम ]या करते हो?' मेरी िजkासा जाग त ृ हो ग ई थी। 'जoरतमंद लोग Y की मदद करता हँू . यार।' . बस।' 'िन:शुbक?' मुझे िवAास नहीं हो रहा था। 'िन:शुbक जैसा ही समझ लो।' 'कैसे?' 'डे ढ iपये सैकड़ा sयाज लेता हँू .'जो भी थोड़ा बहत ु हो पाता है .

सो कम है ]या? िफर डे ढ iपया सैकड़ा होता भी ]या है ? पूरा दो भी नहीं होता।' 'िफर भी।' मR अब भी िविःमत था। 'लेिकन कई बार दोःत लोग Y की मदद करते करते खुद िबbकुल खाली हो जाता हँू । तब अपना कोई काम आन पड़े तो इं तजाम करते नहीं बनता . और ]या? तुहारे पास िकतना होग ा अभी अकाउEट म)?' वह तुरEत अपने मंतHय पर आ ग या। िसग रे ट और पान अकारथ थोड़े ही िखलाये जाते हR । ु 'कुछ नहीं। मेरे पास तो अभी [यादा कुछ नहीं है ।' मRने अपने मनोभावY को छपाते हए ु कहा। 'िफर भी। िकतना होग ा?' उसका आमह ूबल था। 'ये ही कोई दस बारह हजार होग ा। ब3चY की फीस.. बीमा पािलिसयY का ूीिमयम आिद के िलए रख छोड़ा है ।' मRने बेमन से बताया। 'एक काम कर दस हजार मुझे दे दे । डे ढ़ iपये सैकड़ा पर लूंग ा.. पर Hयवहार का मR बड़ा प]का हँू । तुमसे दोःती है . sयाज की कोई बात नहीं है । ब3चY की फीस दे नी है . sयाज मR पूरे महीने का दँ गू ा. साहकारी ू का।' उसने जैसे अपनी पूरी ^लािनंग मुझ पर जािहर कर दी हो. अपनी जेब अभी खाली चल रही है . इसका मतलब ये थोडे ही है िक तेरा sयाज मार दँ ।ू नहीं. उसने दो तीन मँहग े टे ःट िलख िदए हR । ..'आड़े व\ रकम खड़ी िमल जाती है .' एकाएक वो िचEतामuन हो ग या। ']या हआ ु ?' मRने सौजEयतावश पूछा। आिखर िसग रे ट का धुआ ं और पान का ःवाद अभी ताजा जो ठहरा। 'बीबी को माइमेन की बीमारी है । डा]टर को िदखाया था.' उसने समःया बतायी। 'अब ]या करे ग ा?' 'कुछ नहीं। यार दोःतY से उधार लूँग ा.. कतई नहीं ...' बड़े अपने पन के साथ उसने मुझे उकसाया। 'नहीं नहीं.. ऑ ंख) फैलाकर बोला। 'आज तो चार तारीख ही हई ु है । पEिह तक फीस जमा करानी होती है । बैठे िबठाये कुछ .. बस।' 'फीस अग ले हhते दे दे ना यार। मुझे तो िसफ तीन िदन के िलए ये iपया चािहए। उसके बाद तो मेरा इं तजाम हो जाएग ा। और हाँ. दे ख। ये कायदा है . दे ख। यारी दोःती अपनी जग ह है .

उसम) एक महीने का मािजन होता ही है ..हाथ म) आता है तो ]या बुरा है ? सुिनता तो यूँ ही समय से पूव फीस जमा कराने की जbदी म) रहती है . िकसान िवकास पऽ आिद म) पैसा लग ाता रहा अब तक। इस तरह की ःकीमY म) पैसा लग ाना कहाँ की बुिaदमानी है ? पैसे को sलॉक कर दे ना है . मेजबान जो ठहरा। मRने एक हाथ से पीछे वाले जेब म) अपना पस सहाला और िनिxEत होकर.। (समाr) कॉकटे ल 15कॉकटे बहत ु बािरश हो रही थी। कार से िनकलते ही दौड़कर मR लॉज म) आ ग या और बालY को झटक कर पानी हटाने लग ा। कमीज भीग कर बदन से िचपक ग ई थी और सारा बदन नुमायां हो रहा था। कbपना म) एकाएक मेरी-सी हालत म) भीग ी लड़की की तःवीर कgध ग ई। ठीक मेरी-सी भीग ी। ठीक मेरे-से भीग कर िचपके कपड़Y म)। ठीक मुझ-सी नुमांया। रोमांच की एक तीखी लहर िसर से उठकर पूरे बदन म) दौड़ ग ई और पंजY के राःते जमीन म) समा ग ई। मR मुःकुरा िदया। मR सबसे पहले आया था. बस। ]या िमलता है आजकल इन ःकीमY म)? . पीएफ..। रही बीमा िूिमयम की बात..।' मRने मन ही मन ग िणत बैठायी। 'बता जbदी' पारीक जbदी म) था। 'कब लौटाएग ा?' मR मानिसक oप से तैयार होता जा रहा था। 'तीन िदन बाद।' 'प]का?' मR प]का ठहरा लेना चाहता था। 'तीन से चौथा नहीं होग ा।' 'दे ख ले?' 'कसम से.. यार। िफर तुमको तो बैठे िबठाये डे ढ सौ oपये sयाज के िमल रहे हR । ]यY घबराता है ? ये भी तो एक इEवेःटमेFट ही है ।' पारीक तेजी से हँ स पड़ा। मR भी मुःकुरा िदया। मुझे भी लग ने लग ा था िक बेकार ही बीमा.... आज उस बात को तीन महीने से [यादा हो चुका है । पारीक के तीन िदन अब तक पूरे नहीं हए ु .. लोग Y की राह .

थR]यू. थR]यू. ऑख ं प™ से खुलीं और मR लपक कर सबसे ग ले िमला। हम^याला लोग सबसे ग हरे दोःत होते हR । यहाँ का मंजर दे खकर कोई भी यह ॄžसKय जान सकता था। सबसे पहले 'पीने' का ूायोजन बताया ग या। एक कुसX पर चढकर ौवण बोलने लग ा. करता रहा। अचानक ौवण िफर मुखर हो उठा.' सुनकर होले होले झूम रहा था। एकाएक बार म) दािखल हए ु शोर के झgके ने मुझको िहलाया.दे खने की बजाए सीधा बार म) चला ग या। धीरे -धीरे लोग आना शुi हो ग ए। सबसे पहले कुंदन आया। दबला ु पतला िसंग ल ःटे पनी कुंदन पीने के मामले म) 'बेवड़ा' था। कहीं और बेशक लेट हो जाये पर पीने के िठकाने पर हमेशा 'िबफोर'। उसके बाद राजेश. धीरे -धीरे िसप कर रहा था। पहला ही पैग था। 'तीन साल तक कैसे 'कंशोल' िकया?' 'सास का जमाना है यार! ढे रY ग ोिलयाँ पड़ी हR माक„ट म)। कोई भी एक चुन लो बस।' . 'ऐ! सुनो बेवड़Y। सालY अभी तुम होश म) हो.. तसbली से कुछ साल हँ स खेलने के बाद करो तो जी को जरा सुकून रहता है . काम की बात सुनो। ये दाo पाटv हमारे यार रौनक के घर की रौनक बढ़ाने की खुशी म) सामूिहक चंदे से आयोिजत की ग ई है । भाई रौनक के घर म) छोटा रौनक आया है । सब िमलकर बधाई दो।' सभी मेरी ओर लपक पड़े और चारY तरफ से 'बधाई'. िदल ही दखाने ु के िलए आ.. लgडा तूने अब जाकर पैदा िकया। अब तक ]या यूँ ही खाट तोड रहा था?' राजेश दो पैग के बाद ही औकात पर आ ग या। 'दोःत शादी हई ु है तो ब3चे तो हYग े ही। करने पड) ग े। िपतृऋण से उऋण जो होना है । हाँ. 'बधाई' ग ूँजने लग ा। मR थR]यू.' मR जbदी म) नहीं था... आशीष..। सभी के हाथ म) पैग था। िकसी-िकसी के हाथ म) िसग रे ट भी सुलग रही थी। सबके सामने तँतिरयY म) भुिजया. एक एक कर आते रहे मR वहाँ कोने की मेज पर एक लाइट पैग िलये बैठा था और लोग Y के इEतजार म) ऑख ं े मूँदे मेहंदी हसन की भारी भरकम आवाज म) 'रं िजश ही सही. मूंग फली के दाने. कहीं िवअःकी. कटी हई ु ^याज और पनीर कबाब पड़े हए ु थे। मेरे घर की रौनक बढ़ने का ज_ जोरY पर था। मुझे आज जेब के अ3छा खासा हbका हो जाने का अनुमान हो चुका था। मR मुःकुरा िदया। 'रौनक एक बात बता यार तेरी शादी को तीन साल हो ग ए.. कहीं िजन. ौवण. कहीं रम. सrेश आिद सारे िपय]कड़. 'बधाई'. 'अबे सालY सारी रात बधाई ही दे ते रहोग े तो इस 'लुग ाई' को कौन चखेग ा।' उसने हाथ म) पकड़ी बोतल की ओर ईशारा िकया। सभी भूखे भेिडयY की तरह उस 'लुग ाई' की तरफ लपक पड़े । बोतल) खुलने लग ी। कहीं बीयर.

टीना..' राजेश झgक म) बोलता चला जा रहा था। 'दो चार के नाम तो बता . वहीं ऑख ं मारी . ौवण सीए. बस' मRने जरा सोचते हए ु अदांजन बताया। 'साले इसको बस कहता है । िफर शे न.' मRने बड़ा-सा घूँट भरते हए ु कहा। 'अ3छा एक बात बता। शादी से पहले िकतिनयY को चटकाया तूने।' राजेश ने एक लबा कश खींचते हए ु पूछा। 'शादी से पहले से ]या मतलब है तेरा? बंदा अब भी 'जोशीला' है । जहाँ दे खी नारी. पसीना. िफर मR बताऊंग ा।' राजेश तरं ग म) था। 'ये ही कोई दस-uयारह. सॉरी.. शाम.. जहाज ]या होग ा? पूरे िहEदःतान ु ु का ठे का छड़ा लेग ा ]या? आशीष जोर से िचbलाया। सारे बेवड़Y ने एक साथ जोर का ठहाका लग ाया। ठहाकY से एक बारग ी बार म) भरा िसग रे ट का धुँआ सहम ग या। उपिःथत लोग Y की शकल).' मR ठहाका मार कर हँ सा. िग लास तोड़ा-बारह आना।' 'कहीं िकसी रोज ग ोली खाना चूक जाओ तो यही होता है ..बीना। संतोष ने आग े बढ़कर जोर से कहा। सब एक . राजेश भी। 'नहीं सही बता. उस आदरणीया भाभी के अलावा साले की तरफ कोई नहीं दे खता . बात).' कुंदन ने हाँक लग ाई। 'लीना. जीना...। 'भाभी का नाम भूल ग या डा]टर . सूरत)..। बाकी सब साला फ)कता है । उस भोली लडकी. अलबzा हमने जoर कईयY को ूेग नेEट िकया है अपनी कमीनी िजEदग ी म) . पर कई बार ग ोिलयाँ धरी रह जाती हR । िपछले महीने दीपक ु ग ए भाई के। बता रहा था। सावधानी रखते रखते साला 'चूक' ग या। पूरे तीन हजार ठक खाया पीया कुछ नहीं. फँस ग ई बेचारी आज इसके ब3चे की माँ है ... और ना जाने िकतने 'ना'. सrेश ॄोकर. पीना. ठहाके आिद दे खकर कोई भी यह नहीं कह सकता था िक यहाँ शहर के नामी िग रामी लोग Y की पाटv चल रही है । सभी अलमःत और मदहोश हए ु जा रहे थे। राजेश डा]टर था. आशीष एडवोकेट. मीना...'अब साले ग ोली तो चुन लो.. मR ूोफेसर। कहने का मतलब समाज के हर ूिति$त पेशे का ूितिनिध इस 'दाo-सभा' म) था। िदनभर की भाग दौड़ से थककर चूर हो ग ए सभी 'ूोफेशनbस' शाम को पूरा 'एEजॉय' करने के मूड़ म) थे। 'चलो अब मR बताता हँू । ये साला झूठ बोलता है । दस-uयारह लडिकयाँ छोड़ो. ग ली की कुितया ने भी इसकी तरफ आज तक ऑख ं नहीं मारी होग ी। एक लडकी ग लतफहमी का िशकार हो ग ई थी। टयूशन पढने आती थी. नग ीना .....

फाईनल ू Fड है . किवता िलखने का शौकीन है । ग ाहे बग ाहे मेरे यहाँ किवता ठीक कराने ईयर का ःटटे आता था। इस नाते मेरा िमऽ हो ग या था। मRने जब उससे पीने-िपलाने के बारे म) पूछा.. िजसे वो बड़ा बेरहमी से मसल रहा था। मR एकाएक चेतन हो उठा. पहले तो ना-नुकुर करता रहा उसके बाद 'पीने' आने को राजी हो ग या। दे खा... 'िहलाया' पर कुछ ही िदनY बाद ऊब ग ई हमसे। आजकल भाग व  से हाथ िफरवा रही है । हमारी ओर दे खती तक नहीं। मादर. औरत है ही ऐसी चीज। आदमी को उbलू बनाकर बरतती है और चुितया बना कर चल दे ती है । आदमी खड़ा रह जाता है .. तो बदन म) सीिटयाँ बजने लग ती थी। साली को खूब िखलाया. सबको शादी की शुभकामनाएँ और ब3चे पैदा करने की आजादी . अग ले साल दसरा ू इँक . िजसको वो िदल से लग ाकर घूमता था। िजसम) उसने इस बेवकूफ को एक लबे समय तक बेवकूफ बनाते रहने की माफी माँग ते हए ु अपनी शादी की तारीख िलखी थी और कोई अ3छी-सी लडकी दे खकर शादी कर लेने की सलाह दी थी। कलेजे से लग ाकर तब से घूम रहा है . उसकी ऑख ं ) नम थी। पैग उसके सामने टे बल पर जस का तस पड़ा था। उसकी मुVठी म) कोई काग ज दबा था.. बड़ा ग ुमसुम- सा बैठा है । मR उठकर उसके पास आया 'सािहल.' मR भी अब 'मूड ' म) आता जा रहा था। अचानक मR िठठक ग या। दे खा... िपलाया. सैकFड ईयर म) िकए ग ये इँक को िदल से लग ाए बैठा है .कॉम. वो साली कभी हमारे से इँक लड़ाया करती थी। बाईक पर पीछे इस कदर िचपक कर बैठती थी िक पीठ पर नम-नम हथौड़े पड़ा करते थे। जाँघY पर हाथ िफराती थी.. दhतर की ग िरमा है ना. अपनी कोई ताजा तरीन ग जल सुनाओं जरा . घुमाया.. रोने की ]या बात है ? कुंदन ने जुग ाली की। 'सािहल िमयां हमको दे खो.' मRने उ†ोषणा के-से लहजे म) सबसे उसका पिरचय कराया। 'अमां यार! यहाँ तो हर साल एक इँक . कैसे हो? यहाँ ]यY बैठे हो भई? चलो उधर. अभी तक। उधर वो तीन ब3चे पैदा कर चुकी है अब तक .. ये खत। सारा माजरा समझ कर मR वापस 'अपने म)' लौट आया और बाँह से पकड़कर उसे मजमे के बीच ले आया। सब एकाएक हमारी ओर दे खने लग े। 'दे खो भाइयY। ये नौजवार शायर है । नाम है सािहल। िसटी कॉलेज म) एम कॉम म) पढ़ता है । बी.. ']या हआ ु ? ]या है ये? िदखा।' उसने मुझे थमा िदया। मRने अपना िग लास एक ओर रखकर काग ज को खोला। उसकी िकसी ूेिमका का एक पुराना खत था. अपना इकतारा िलए और वो चली जाती है चूतड िहलाती हई। ु तू ]यूँ ..साथ ठहाका मार के हँ स पड़े । अचानक मेरी नजर दरू कोने म) बैठे सािहल की तरफ पड़ी। सािहल एम कॉम.

मेरी बात मान जीवन म) ये ॄžवा]य बना ले 'फन एFड फोरग ेट. मR पहली बार दे ख रहा था। वाकई वो बड़ा भावुक हो रहा था। 'पहले ^यार की ऐसी की तैसी। ये लडिकयाँ साली टाईम पास करती हR । तुझ जैसे चूितया के साथ। िखलाने.. िफर लौटकर पहँु च जाता है कुzे की तरह लार टपकाता हआ ु . कान खोल के सुन ले कुँवारा मR भी नहीं हँू .. कुंदन का आमह आया। 'तू बनती है शरीफ. तो आवारा मR भी नहीं हँू । तू करती है बेवफाई तो तुहारा मR भी नहीं हँू । ^यार की आिखरी मंिजल पे आकर कहती है ..' आशीष पूरे रं ग म) था और इस तरह अपनी तकरीर कर रहा था मानो कोट म) खड़ा हो। कहने लग ा '..िकस िकस को याद कीिजए. आजकल हमारे कुंदन जी का एक लड़की से जबरदःत इँक चल रहा है .।' झूम के आशीष ने सुनाया। वाह भाई. छा ग ए. सुनो. चारY ओर से ग ूँज उठा। सभी बेवड़े रिसक हो उठे थे। 'एक और फडकता-सा आने दो आशीष भाई'. सुनो यार . हजार लgिडया िमल)ग ी। दे वदास बना िफरता है Iवामखाह।' एडवोकेट आशीष ने दलील दी। आशीष जी.....ट) शन लेता है यार? अभी जवान है .. िकस िकस को रोईये। आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोईये।' वाह-वाह-वाह-वाह. सुनो . एसा मRने सुना है । एक बार िदbली से आते हए ु बस म) 'कोई' िमली थी। . घुमाने को एक मुग ा िमल ग या.मR शादीखुदा हँू । तो साली. कुँवारा मR भी नहीं हँू । चारY ओर से दाद आने लग ी। लग रहा था मानो कोई मुशायरा चल रहा हो और अब एक-एक शायर नबर से आएग ा। अपना कलाम सुनाने। सािहल अब मुःकुरा रहा था। मRने जोर से उसकी पीठ पर धौल जमा दी। 'िचयर अप'। वो िखलिखला उठा। कुEदन ने लाकर उसो िग लास थमा िदया। लोग Y की ऑख ं Y से खुमार टपकने लग ा था। चेहरे पर मदहोशी साफ पढ़ी जा सकती थी। धुए ँ के बादल इधर उधर मँड रा रहे थे। सभी की याणेिEियाँ धुए ँ की अnयःत हो चुकी थी। सब रं ग म) थे। बिbक धीरे -धीरे रं ग और अिधक चढ़ता जा रहा था। खाली बोतल) इधर उधर लढ़क रही थी। 'सुनो.' अजी.. इस तरह मातम करने लग ो तो जी िलए भईया। सुनो इसी बात पर . िपलाने... पहला ^यार भूलाया जाता है ]या? सािहल िससकने लग ा था। लड़के भी इस कदर िससक िससक कर रो सकते हR ... वा-वा-वा ... बस। इससे [यादा '^यार' नहीं करने द) ती। आदमी साला अपनी आदतY से मजबूर। दKकार ु खाता है ..

.. हर िलहाज से िबंदास थी वो। अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने पर धर िलया। मR इसके िलए तKपर नहीं था। सो एकदम हाथ खींच िलया। उसने दबारा ु वैसा ही िकया। इस बार भीतर का 'पुiष' कंशोल नहीं रख पाया और हमने ःवयं को िनयित के भरोसे छोड़ िदया। अ]सर आदमी अपनी कमजोरी से जब [यादा दे र तक लड़ नहीं पाता है .... आिद आिद। माने.. मॉडिलंग करती थी वो.. बग ल म) बैठती .. बीबी को भी कभी इस तरह से नहीं दे खा था। . '.. एक लडकी िमली जoर थी.। उसने . हम अपनी राह चल िदये .. भाभी को बताऊँग ा आज ही। राजेश इसके घर का नबर बता जbदी . कुंदन साहब ^लीज। ौवण ने मानो मंच पर बुलाकर माईक कुंदन की ओर बढ़ा िदया था। लोग Y ने ताली बजा दी। 'एसी तो कोई खास बात नहीं है । हाँ.. ]या था? इEहYने लपक िलया। इनकी कहानी.... इEहीं की जुबानी .... उं ग ली िमली नहीं िक पूरा हाथ ही पकड़ लेते हR । बस की लाईट) ऑफ थी। हमने तुरंत उसके ग ाल पर एक 'रसीद' लग ा दी। वो िचहंु क उठी। शट और जींस पहने पढ़ी िलखी.. झीनी नाइटी . िजसम) से 'सब कुछ' साफ- साफ िदखता था। मR अब कौतुक से दे खता था। घर म)..' अपना पता दे कर हमारा नबर लेकर iखसत हो ग ई . कुंदन मानो िकसी सभा को संबोिधत कर रहा था। लोग अब छक चुके थे। इसिलए ग ाहे बग ाहे एक एक चुःकी ले रहे थे। िसग रे ट िनरEतर फूँकी जा रही थी। तीन चार िडिsबयाँ लुटी िपटी टे िबल पर पड़ी थी। बार म) घु^प धुआ ँ था। कुंदन ने आग े बताया. एकिदन उसने ःवयं को मेरे सामने िबbकुल िनवt ूःतुत कर िदया।' 'िबbकुल?' सािहल। 'हाँ। सांचे म) ढला. हम उसके ग ालY को हाथY म) िलए दे र तक पलोसते रहते।' 'ग ुi. सुEदर. लरज कर वो हमारे कंधे पर ढह ग ई। कैसे सफर तमाम हआ ु पता ही नहीं चला .. तो उसे ु 'िनयित' कह कर छटकारा पा लेता है । हमारे हाथY ने अपना काम शुi कर िदया..एकाध बार उसके वनoम hलैट पर भी मR ग या। बड़ी ग मजोशी से वो िमली। घर म) वो नाईटी पहने होती थी . एक बार। बड़ी रोचक थी। बग ल वाली सीट पर ही बैठी थी। दस पEिह िमनट की मुलाकात म) ही उसने मेरा हाथ अपने हाथ म) ले िलया था। अपन ठहरे बेवडे . ग माग म कॉफी िपलाती ..इनको। बस. घर म) सभी सुिवधा की चीज) थी . िबbकुल तैयार मादा िजःम अपनी सपूण मांसलता के साथ ... सै]सी ..... आधुिनक. सभी जोर से हँ स पड़े । 'अ3छा िफर?' सािहल बड़े मनोयोग से कथा सुन रहा था। 'िफर ]या.' आशीष िचbलाया. अपने बारे म) बताती ...

अजीब मुःकान के साथ मुझे िनमंऽण िदया। मेरे बदन म) ऐंढन होने लग ी। कानY की लव)
तपकर लाल हो ग यी। कFठ सूख कर काँटा हो ग या और पाँव जड़Y से काँपने लग े ... वो
िबbकुल मेरे नजदीक आ ग ई। इतना नजदीक िक चाहँू तो खींच कर ग ोद म) िग रा लूँ।
सब कुछ मेरे सामने था .... िजEदा-जवान-फडकता ग ोँत..'
'िफर?' राजेश बोला। मFडली म) िपन सॉप साइल)स था।

'मR अपने पर [यादा दे र िनयंऽण नहीं रख सका मRने उसे लग भग झपटते हए
ु बाहY म)
जकड िलया ... और बेसाIता चूमने लग ा ... वो भी बराबर मेरा साथ दे रही थी। तूफान
का-सा समां था। मेरी सांस) धgकनी-सी चल रही थी और ग ला सूख कर कांटा हआ
ु जा
रहा था। बेहद उzेजक िःथित थी। ना जाने एकाएक मुझे ]या हआ
ु मR झटके से दरू हो
ग या ... वो िवःफािरत नेऽY से मुझे दे खने लग ी .. मR अपना िसर पकड कर बैठ ग या। वो
शायद मेरे इस अनअपेिqत Hयवहार के िलए तैयार नहीं थी। वो तो पूरी तरह से 'तैयार' हो
चुकी थी और वासना की आग म) जली जा रही थी। मRने कनिखयY से दे ख िलया था। पर
मन म) अजीब-सी िवतृंणा आ ग ई थी अचानक। ये, मR ]या कर रहा हँू ? मR झटके से उठा
और ग ुड नाईट कहकर िबना कुछ सुने दरवाजा खोल कर िनकल ग या ...।' कुंदन ने एक
लबा सा घूँट भरा।

'िनकल ग या? साले िबना 'कुछ' करे ? चूितये ...' राजेश चीखा।
'लोग तो लार टपकाते घूमते हR , इधर उधर मुँह मारते और एक ये साहब हR ... दे वता बनने
चले हR ... साले ]या सोचती होग ी वो लडकी? सोचती होग ी, साले म) 'दम' नहीं है । िहजड़ा है
साला ... कौनसा तुझे कहीं से चिरऽ ूमाण पऽ लेना था?' अबके आशीष की बारी थी।
'बात वो नहीं है आशीष, माई ॄदर। बात है सेbफ-कािEसयस की। िनःसंदेह मादा िजःम,
िकस िनकमे को बुरा लग ेग ा िवAािमऽ तक िहल ग या था, तो तू-मR ]या चीज हR ? बात है ,
जब कोई चीज आसानी से िमल जाती है , तो उसका इपोट¢ स नहीं रहता। शायद एसा ही
कुछ हआ
ु हो, मेरे साथ, कुंदन जिःटफाई कर रहा था।

'िफर उससे िमलना हआ
ु ? होता है ?' सािहल का बड़ा मासूम सा ू_ था।
'हाँ, मग र एक िनिxत सीमा को aयान म) रखते हए।
ु ये वो भली ूकार जान चुकी है िक
मR सहवास को तैयार नहीं होऊँग ा ... मेरी इस बात पर वो िदलोजान से मर िमटी है ।
कोई और होता, तो ना जाने ]या कर लेता? यह सोचकर वो मेरी बहत
ु इ[जत करने लग ी
है । अब अित उKसाह म) पहले-सी ग ैरमामूली हरकत) भी नहीं करती है । ... मुझे दे वता
कहने लग ी है ... कपड़े भी सलीके से पहनने लग ी है ।'
तभी सrेश के ौी मुख से एक घोषणा और हई
ु , 'मेरे िूय शराबी बंधओ
ु ं। रौनक भाई को

पुऽ रy की बहत
ु -बहत
ु बधाईयाँ। रात के साढे बारह बज चुके हR । आशा है आप लोग Y की
टं िकयाँ फुल हो चुकी हYग े ... कोई कसर हो तो हाथ खड़ा कर) ...', थोड़ा iककर ... 'ओके!
अब पैक अप िकया जाए .. आिखरी जाम के साथ ...।'

सबने जोर से हामी भरी। 'िचयस फॉर बेबी नौनक ... िचयस फॉर ए है ^पी कपल ...
िचयस फॉर बेवड़ा एसोिसएशन' सबने एक साथ जाम टकराया और एक ही घूँट म) अपना
अपना िग लास उदरःथ कर ग ये।
एक कोने म) ौवण, मुझसे पेमेFट को लेकर उलझ रहा था।
'यार रौनक तुम नहीं करोग े पेमेFट।'
'एक ही बात है , ौवण।' मR उसे समझाने की कोिशश कर रहा था।
'नो! एक ही बात कैसे है ? हम ब3चे के ताऊजी हR ... हR िक नहीं? बता।'
'हाँ। हR तो सही।'

'िफर? पेमेFट तू कैसे करे ग ा? [यादा बड़ा आदमी है ]या? पेमेFट हम कर) ग े' ... ौवण पूरे
रं ग म) था। बैरा िबल हाथ म) िलए खड़ा था। िनवाक् वो हम दोनY का वातालाप सुन रहा
था और मंद मंद मुःकुरा रहा था। 'तुम िफर कभी कर दे ना ...' मRने िफर से उसे
समझाया।
'नो! िफर कभी नहीं ... आज... और अभी। बता दोःत िकतना हआ
ु ?' कहते हए
ु ौवण बैरे
से मुखािबत हआ।
ु बैरा पशोपेश म) था। मRने उसे ईशारा िकया तो बैरे ने िबल मुझको थमा
िदया और ौवण को सहारा दे कर िबठाने लग ा। मR काऊFटर की ओर बढ ग या। पीछे से
ौवण के अःफुट ःवर मुझसे टकराते रहे , 'नो रौनक! आई िवल पे, मR ताऊ हँू यार लौFडे
का...।' लोग िवदा हो रहे थे। सािहल 'उस' खत को िचंदी-िचंदी कर वहीं मेज पर फ)ककर
घर चला ग या था।
(इित)

आवरण तथा सभी िचऽ : संजय िविोही . 'मुि\' आवरण को बनाते समय उनके जी म)
नारी की मजबूिरयाँ, दै िहक लाचािरयाँ और सांसािरक िववशताएँ तो थी ही। साथ ही उन
सबको तोड़-छोड़ कर आग े िनकल जाने की इ3छाशि\ भी हो, ऐसी उमीद भी थी। ःकैच
करते समय संजय का िूय िवषय होता है - नारी। अपने सपूण सौEदय और बहआयामी

Hयि\Kव की सपूण ूखरता के साथ। ूःतुत िचऽ पुःतक के शीषक से पूरा मेल खाता
है - कभी यूँ भी तो हो।

ूथम संःकरण: जनवरी, 2005
ूकाशक : लोकभाषा ूकाशन, इEदौिरया िनकेत, छोटा बाजार कोटपूतली, जयपुर (राज.),
फोनः 01421-222973
****-****

अिभमत

यशवंत Hयास
एक समय था जब पिरवार की कहािनयाँ शहरी मaयवग  की दोहरी िजEदग ी के सKय के
इद -िग द घूमती थी। उससे पहले मामीण यथाथ और ग ाँवY से उखड़े शहर म) ठौर ढँू ढ रहे
पिरवारY और बाद म) कामकाजी दिनया
ु के बीच सबEधY के —E— केEि म) रहे ।
उदारीकरण के नए समय म) शहरी अEत— E— और मामीण नॉःटे िbजया के साथ फंतासी
का समय आया। तकनीकी शsदाविलयाँ और यौन कुंठाओं का [वार कुछ कथाओं की
पहचान बना। िःथित यह है िक से]स और दिलत िवमश के बहाने ऊँचे-ऊँचे नाम नई-नई
शsदाविलयाँ ग ढ़ रहे हR । केEि से कुछ जoरी चीज) ग ायब हR और शहीदाना अंदाज म) यौन-
िवAासघातY के िच£ठे िदखाकर िनमल होने का अनु$ान िकया जा रहा है । संजय िविोही,
अपेqाकृ त छोटी राजधानी के युवा कथाकार हR । उनके पास संबमणकालीन समय का हर
एक झgका ग ुजरता रहा होग ा। िरँतY तथा Hयि\ग त आकांqाओं के —E—, बाजार के समय
म) उEह) भी Hयिथत करते रहे हYग े। लेिकन, उनकी कथाएँ बेहद ईमानदारी के साथ िफर-
ू -िफसलते दे ख Hयवहार की
िफर पुराने जोड़ की ओर लौटती हR । वे हर qण को छटते
नैितकता को जाल की जिटलता समझ लेना चाहते हR । इसिलए पाऽY का िविोह नाटकीय
नहीं है , ःवभावग त है । oमानी नहीं है , पर उKकट है । शsदY तथा िःथितयY म) चमKकािरता
के बजाय घटना की सहजता से उनका नाता है ।
'कभी यूँ भी तो हो' की कहािनयY को िजन पारपिरक कसौिटयY पर कसा जाता है , उसम)
इनके खरे पन की पहचान समीqक - आलोचक कर ल)ग ), लेिकन पठनीयता की सुिनिxतता

कथाकार ने बना ली है । छटती चीजY को बचाने की ईमानदार कोिशश िशbप से [यादा
अंतर सnयता की मांग करती है । जो िक संजय िविोही की कहािनयY म) भरपूर है । संजय
के इस कथा संमह से मaयवग Xय कौतुक, पीड़ा, बोध तथा सामंजःय के नये-िबEद,ु जानने
को िमल)ग े। यह सफलता कथाकार के 'Hयि\' की छटपटाहट के साथक होने का संकेत है ।
वे पहले से आग े बढ़े हR , बाकी मंिजलY की उमीद जग ाते हR । िपछली पुःतक 'ग ोदानामा' म)
जो उमीद) संजय िविोही ने जग ाई थी। यह पुःतक, उEहीं उमीदY पर खरा उतरने की

भीख माँग कर अथवा जूता-पॉिलश वग ैरह करके खुले आकाश तले हाड़कंपाती सिद यY की दखदायी ु रात) िकसी ूकार काटते हR । इस पैशािचक यथाथ से कमोबेश हम सभी पिरिचत हR । िकEतु संजय ने इसी संदभ को रे खांिकत करते हए ु सzा और Hयवःथा की िजस बेरहमी का पदाफाश िकया है . आIयान संदभ 'उमीदY'से भरे एक कहानीकार का 'उदय' से. दखी ु . याऽी संजय िविोही के नए कथा संकलन 'कभी यूँ भी तो हो' म) कुल पEिह कहािनयाँ हR । ये कहािनयाँ हमारी सामािजकता की कई िWयY से ग हरी जाँच पड़ताल करती हR । इसी कारण ये अपने क¤य और िशbप म) बहआयामी ु हR । भारतीय समाज की दे शज पिरिःथितयY का इनम) एक िवAसनीय आधार और ःवoप पिरलिqत होता है । इस संमह की समःत कहािनयY को पाठक पूरी िदलचःपी के साथ पढे ग ा.िदशा म) एक और ठोस कदम है । उमीदY के िलए और शुभमानाएँ। (यशवEत Hयास) सपादक दै िनक भाःकर **********. िचथड़े . जो संमह की सभी कहािनयY म) भरपूर है । जहाँ तक इस संमह का सवाल है . वह पाठक के मम को ग हरी पीड़ा से भर दे ता है । भरे जाड़े के िदनY म) इन िनरीह पिरवारY को इनके शरण ःथलY से धकेल िदया जाता है । इनके आौय ःथल िकसी भी नग र के फुटपाथY के अलावा और होते भी ]या हR ? और वहाँ रै न-बसेरा के 'उ†ाटन' का नाटक िकया जाता है । कनात) तानकर. िनxय ही बहत ु कम उॆ म) संजय ने एक बड़ी 'उमीद' जग ाई है िजसके िलए िनःसंदेह वह बधाई का पाऽ है । 'कबल' कहानी बूरता और कiणा की िमलीजुली दाःतान है । इसम) उन घर बार िवहीन असहाय. पॉलीथीन बीनकर. कुिसयाँ जमाकर एक 'रै न-बसेरे' का िविप ू खड़ा िकया जाता है । किथत भिजनY की उपिःथित म) मEऽी जी रै न बसेरे का उ†ाटन कर जाते हR । नग र के िकसी िहःसे से मरे -िग रY को एक शाली म) भरकर लाया जाता है और उEह) एक पंि\ म) खड़ा करके कबल बाँटने का ूहसन िकया जाता है । बाद म) मEऽी जी के जाते ही उन कबल-ूाr बदनसीबY के सारे कबल झपट िलये जाते हR । .रा. ऐसी मR आशा करता हँू । यह लेखन म) ूाथिमकता पाने वाला ग ुण है . दिरिY की पीड़ा है जो कूड़ा-करकट.

िजसकी पyी और सEतान उसके ससुराल म) रहते हR । पyी की नौकरी उसी नग र म) हR । जबिक उसे ःवयं नौकरी के िलए अEय नग र म) जाना पड़ता है तथा वहाँ मकान िकराए पर लेने की भी बाaयता है । वह सrाह म) एक बार ु 'रिववार' की छVटी म) घर यािन अपनी ससुराल आ पाता है । नौकरी.. लग ातार।'' 'झुलसे सपने' एक ऐसी औरत की कहानी है .उन छीने हए ु कबलY के एवज म) दस-बीस oपये उEह) पकड़ा िदये जाते हR । इसी बम म) खदे ड़े ग ए एक भीखू नामक अभाग े की पyी को रात के अंधेरे म) दरोग ा उड़ा ले जाता है । बाद म) उस औरत के साथ मुँह काला करके... समाज और अिःतKव के ूित िनरEतर िविोही तेवर बनाए रखता है और अEततः माँ के पास पहँु चकर भी उसका नाम पाने की बजाए उसे छोड़कर चला जाता है । ग हरी संवेदनाओं की एक अ3छी कहानी है । 'अनकही' एक ऐसे Hयि\ का दद है . ''.हर िकसी के भाuय म) ब3चY का सुख कहाँ?'' इस कहानी म) एक युवती की अधूरी कामनाओं का बड़ा ही स3चा िचऽण है । 'वह' एक नाजायज सEतान की कथा है । जो. सुयोuय वर कहाँ िमल पाता है ?'' और कभी कहती है ''. उसे बीस oपये पकड़ा कर चलता कर दे ता है । कहानी का िविप ू और बेपनाह दद यह है िक भीखू कबल पा लेने और पyी की अःमत लुट जाने के एवज म) बीस oपये पा लेने पर भी ग ौरव अनुभव करता है । ]यYिक वह अEय लुटेिपटY की अपेqा अिधक सुरिqत तो है । 'हम एक-से' समवयःक युवक युवितयY की एक जैसी मारक पािरवािरक िःथितयY म) एक दसरे ू के ूित सहानुभूित तथा आकषण की ग हरी भावना को Hय\ करने वाली कहानी है । 'झूठ के सहारे ' िवदे शी ूभावY से ूदिषत ू यौनोEमाद और हमारे पिरवारY म) फैलते यौनाचार का मुखर िववरण है । ऐसे पिरवारY म) खाए-अघाए पित-पyी के बीच िम¤याचार का आचरण ही सबEधY की पीिठका बनता है । वाःतिवकता से बखूबी पिरिचत होने के बावजूद ऐसे लपट दपzी उसी झूठ को िवAसनीय बनाने म) लग े रहते हR । यह िवदे शY से आयाितत लपटता हमारे दापKय सबEधY म) शनैः शनैः ग हराई से पैठती जा रही है । 'कब तक आिखर' एक मािमक कहानी है । जो भारतीय.. ब3चा सभी कुछ .. पर उसके अEदर का दद तीो होता जा रहा था। ऑख ं Y के डोरे सुख हो चले थे और ग ालY पर ऑस ं ुओं की सूखी लकीरY से दहे ज की दिरEदग ी टपक रही थी.. और खासकर िहEद ू समाज म) दहे ज की दिरEदग ी का आIयान है । इस ग िह त समाज म) बेटी के िववाह के िलये अपनी ु बाहर जाकर िपता ःवयं को दाँव पर लग ा दे ते हR और वर पq की दहे ज सीमाओं से बहत के ूित अमानुिषक बुभुqा उसे ूोणोKसग  करने पर िववश कर दे ती है । संजय ने इस कहानी को ग हरी संवेदना के साथ बुना-सँवारा है . जो िनत नये आदमी के साथ रहने को िववश है । उसकी 'मौज' का साधन है । उसके भी मन म) िववाह के और ब3चY के सपने हR । सपनY के पूरा नहीं होने की पीड़ा भी है । तभी तो कभी वह कहती है ''. बेिहसाब. पyी.

िजसम) एक युवती को एक ऐसा आदमी छल रहा है . िजसम) ूKयेक Hयि\ अपने ही ःवाथ और 'ःव' म) बंदी होकर रह जाता है और अपने िलए मूक रहकर बिलदान दे ते चले जाने वाले की ओर से ऑख ं े मूँद लेता है । िडःग िःटं ग एक अमीर िबग ड़ै ल लड़की की कहानी है . िजसका आचरण ठीक नहीं है । 'जब वःतुिःथित मनःिःथित के अनुकूल नहीं होती है . यह इस कहानी के मूल म) है । 'िवAासघात' एक ऐसी कहानी है . िजसको नायक छप ु कर िखड़की से दे खा करता था.होने के बावजूद वह िवःथािपत की िःथित म) जीने को अिभशr है । यह कहानी आज के जीवन की िवसंग ितयY और येन-केन ूकारे ण आिथक आधार बनाए रखने की िववशता पर एक बेबाक बयान है । युवक की मनोदशा को संजय ने इस कहानी म) खूब वाःतिवकता के साथ िलखने का ूयास िकया है । 'कभी यूँ भी तो हो' एक िननवग Xय कामकाजी लडकी दीqा की अEतHयथा है । तीन भाई- बहनY और माता-िपता के पिरवार के पोषण म) खटते-खटते वह हाँफ उठती है । उसकी भी अपनी कोई िनजी और अEतरं ग िजEदग ी हो सकती है . 'कॉकटे ल' और 'नई सुबह' कहािनयाँ भी अ3छी बन पड़ी हR । यहाँ 'नई सुबह' का िवशेष िजब करना चाहँू ग ा। ]यYिक इसम) बािलका अिशqा और बाल िववाह जैसी दो महKवपूण समःयाओं को लेखक ने एक साथ ूभावी ढं ग से उठाया है और उनके कारण होने वाली समःयाओं को बखूबी रे खांिकत िकया है । . िवदे श भेजता है । ग हरी संवेदनाओं से भरी यह एक पठनीय कहानी है । इसके अितिर\ 'ये कहानी नहीं'. जो िक िनहायत ही बेहू दा िकःम के रहन-सहन की आदी है । िकस ूकार उसकी ग लितयY की सजा एक िनद›ष ूाaयािपका को िमलती है . िकEतु उसके पिरवाजन इस ओर से पूण- oपेण िवमुख िदखाई पड़ते हR । दीqा को लग ने लग ता है िक जीवन उसके िलए महज एक बंजर भूिम अथवा रे िग ःतान बनकर रह ग ई ं ) उठाकर भी नहीं दे खेग ा। है । शादी की उॆ िनकल जाने के बाद कोई उसकी ओर ऑख ऐसी दाoण िःथित म) वह अपने अिःतKव के ूित सजग होकर अपने ूेमी से िववाह करने का फैसला ले लेती है । 'कभी यूँ भी तो हो' इस कहानी म) िनिहत एक बेबाक संदेश है । इस कहानी म) हमारे िनन मaयवग Xय पिरवारY का वह चेहरा भी बेनकाब होता है . तो पिरिःथित हो जाती है ।' नायक —ारा कहे ग ए समझाईश के ये शsद उसके मन म) उस युवती के िलए ग हरी सहानुभूित को दशाते हR । 'उसके िलए' एक लबी कहानी है । िजसम) लेखक ने वषw लबा कथानक बुना है । एक ु -छप लड़की. कई बरसY बाद. उसकी तो जैसे िकसी को िचEता ही नहीं है । उसे ूेम करने वाला युवक 'पिरमल' उसके सामने िववाह का ूःताव रखता है . 'इEवेःटमेFट'. वो उससे िमलता है । एक लडकी के Kयाग और संघष की इस कहानी के अEत म) नायक उसके बेटे को अपनाता है और उसे खूब पढ़ाता िलखाता है .

समाज और समाज म) tी िशqा की िःथित पर यह एक िविशW कहानी है । संजय िविोही की ूायः सभी कहािनयाँ सामािजक सरोकारY से ग हरा साqाKकार तो कराती ही हR .ई. रा. एक बल िमलता है िक संजय िविोही का मनःतKव उEह) सामािजक मुƒY से इसी ूकार ग हराई से जोड़े रहे ग ा और वो पाठकY को िनरEतर अपनी सृजनशीलता से अनुूािणत करते रह) ग े। िनःसंदेह 'ग ोदनामा' के बाद यह दस ू रा कहानी संमह संजय िविोही की सृजनशीलता को नये आयाम दे ग ा। 6 माच. ग ािजयाबाद .7. वह है 'नारी' की उपिःथित। ूKयेक कहानी िकसी ना िकसी oप म) 'नारी' से जुड़ी हई ु है । नारी जग त की समःयाओं और िविप ू िःथितयY का सूआम िचऽण करने के िलए संजय ने कड़े ूयास िकए हR और एक हद तक उसम) सफल भी हए ु हR । इसके िलए उEह) बधाई। दसरी ू महKवपूण बात यह है िक लेखक ने िकसी वाद िवशेष अथवा धारा िवशेष को अपने लेखन म) ूौय नहीं िदया है । वह कहानी लेखन म) सहज अEतः-ूेरणा का अनुग ामी है । लेखक की भाषा पाठक से ःवाभािवक संवाद करने म) कहीं Hयाघात उपिःथत नहीं करती। उसके अनुभव और उEह) क¤य म) ढालने की कुशलता उसके अ3छे लेखन का पिरचायक है । मुझे एक िवAास. 2005 (से. याऽी) एफ. . नया किवनग र.201002 **********. उनके सकाराKमक पहलू भी तलाश करने की िदशा म) अमसर होने म) सqम हR । सभी कहािनयY म) एक बात जो िवशेष उbलेखनीय है .

मR िबना संकोच िबना िकसी पूवामह के यह कह सकता हँू िक इEह) पढ़कर मRने अपना व\ बरबाद नहीं िकयाहै । मुझे बहत ु अ3छा लग ा यह पाकर िक तुमने अपनी कहािनयY के िलए वे ही िवषय चुने हR िजनसे तुहारी ग हरी वाकिफयत है । वरना कई बार यह भी होता है िक कहानीकार. तुहारी पEिह कहािनयY के संमह 'कभी यूँ भी तो हो' की पाFडु िलिप अभी-अभी पढ़कर पूरी की है . बिbक इनका एक-एक शsद. या कभी-कभी तो कुछ वा]य ही पढ़ने के बाद रचना को वहीं छोड़ तेज ग ित से भाग लेते हR । अग र कभी आवँयक लग ा तो अंत को टटोल लेते हR । यह रचना की कमजोरी होती है । तुह) बधाई िक तुम अपने दसरे ू ही संमह म) कथा िशbप को इस तरह साध पाए हो िक पाठक के िलए रचना के साथ कदम से कदम िमलाकर चलना जoरी हो ग या है । मRने तुहारी कहािनयY को कुछ खास आशंकाओं के साथ ही पढ़ना शुi िकया था. उनम) खासा वैिवaय है । एक और बड़ी बात तो तुहारी कहािनयY म) मुझे रे खांकनीय लग ी वह है अकृ िऽम और ूवाहमयी भाषा। ऐसी भाषा को पढ़ते हए ु मुझे अपने दो िूय कथाकार . लेिकन दो ही कहािनयाँ पढ़ने के बाद वे आशंकाएं िनराधार लग ने लग ी थीं। और.एक आKमीय पऽ जयपुर. दोनY ही बात) नहीं हR । असल म) इन कहािनयY म) ही ऐसा कुछ था िक मR इEह) दौड़ कर नहीं पढ़ पाया। और. 16 जनवरी. 2005 िूय संजय. बहत ु अपना है । पर इस सुपिरिचत पिरवेश से जो चिरऽ तुमने उठाये हR . अब जब ये सारी कहािनयाँ. कल से इसी म) लग ा था। यह नहीं िक चौदह कहािनयाँ बहत ु [यादा होती हR . मेरे मन म) है . शि\ है । इस वग  के जीवन की अनेकानेक छिवयाँ तुमने िवAसनीय रं ग Y-रे खाओं से अंिकत की हR । तुहारी कहािनयY का पिरवेश बहत ु पहचाना. अपने kान qेऽ का िवःतार ूदिशत करने के मोह म) उन इलाकY म) घुस जाता है िजससे उसकी कोई वाकिफयत ही नहीं होती। पाठक इस बात को तुरंत भांप लेता है । तुमने अपनी कहािनयY को शहरी मaयम वग  तक ही सीिमत रखा है (एकाध अपवाद को छोड़कर) यह तुहारे लेखन की सीमा नहीं. और यहाँ तक िक शsदY के बीच का मौन भी.ूेमचEद और भींम साहनी याद आते रहे । अग र आपके पास क¤य जानदार है तो भाषा म) प3चीकारी . साफ कर दँ ू िक यह इन कहािनयY का ग ुण है िक ये पाठक को अपने साथ-साथ चलने को िववश करती हR । वरना कई बार यह होता है िक हम रचना पढ़ना शुi करते हR और कुछ ही पEने. यािक मेरे पढ़ने की ग ित धीमी है .

पर आशय यही था। अग र कोई कहानी यह कर सके तो समझो िक तुम कामयाब हो ग ए। तुहारी सभी कहािनयY म) यह लqण बेहद मुखर है । मुझे पूरा िवAास है िक समय के साथ तुम इसम) पारं ग त हो जाओग े। मुझे तुहारी इन कहािनयY को पढ़ कर लग ा िक तुम ऐसी कहािनयाँ िलख सकते हो जो हम) जीवन को दे खने की नई िW द) । कथा कहने का कौशल तुहारे पास है और है वह सूआम िW जो जीवन के कम ूकािशत कोनY तक भी पहँु च सकती है । मR आशा करता हँू िक तुम कहानी िलखने के साथ ही खूब पढ़ोग े भी। केवल सािहKय ही नहीं. अEयाय. असमानता. कम से कम िफलहाल। इसिलए तुहारी सृजन याऽा की साथकता की कामना करते हए ु अपनी बात को यहीं िवराम दे ता हँू । तुहारा अपना दगु ाूसादअमवाल (विर$ लेखक एवं समालोचक) . मR तो पऽ िलखते िलखते उपदे श ही दे ने बैठ ग या। भई उपदे श दे ना तो बूढY का काम है और मR चाहता हँू िक मुझे बूढा ना समझा जाए. अKयाचार और ऐसी बहत ु सारी बात)। मृणाल पाFडे ने कभी बहत ु उदा बात कही थी िक जहाँ भी कहीं शि\ का असंतुलन होता है उसके पीछे कोई न कोई िनिहत ःवाथ सिबय होता है । वे भारतीय समाज म) tी की कमजोर िःथित की चचा कर रही थीं और हम समझ सकते हR िक tी को कमजोर बनाये रखने म) िकनका ःवाथ िछपा है ? जब तुम महान कथाकारY को पढ़ो तो यह सवाल उठाना मत भूलो िक ]या चीज है जो उEह) महान बनाती है ?चेखव बड़े ]यY हR ? परसाई ]यY महान हR ?जब ऐसेसवाल तुहारे मन म) उठ) ग े तो अपने आप ही तुहारी कहानी कला की उKकष की ओर अमसर होग ी। माफ करना.करने की जoरत ही कहाँ रह जाती है ? मR आशा करता हँू िक भाषा की (और िशbप की भी) यह सहजता तुम सहे ज कर रखोग े। मEनू भFडारी ने कभी भींम साहनी की एक कहानी 'भाuयरे खा' पर िट^पणी करते हए ु कहा था िक इस कहानी को पढ़ने के बाद जीवन को दे खने की हमारी िW वही नहीं रह जाती जो इस कहानी को पढ़ने से पहले थी। हो सकता है शsद एकदम यही न हY. अथशाt और राजनीित भी। िविभEन kान शाखाएँ तुह) चीजY के पीछे ले जाएँग ी और यह समझने म) मदद करे ग ी िक जो है वह वैसा ]यY है ? मसलन ग रीबी.