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कहानी की कहानी

-मुंशी मु

ेमचंद

मनु य जाित क िलए मनु य ही सबसे िवकट प हे ली है . वह खुद अप नी समझ म नहीं े आता. िकसी न िकसी प म वह अप नी ही आलोचना िकया करता है , अप ने ही मन क े रह य खोला करता है . इसी आलोचना को, इस रह यो ाटन को और मनु य ने जगत ् म जो कछ स×य और सुÛदर प ाया है और प ा रहा है उसी को सािह×य कहते ह. और कहानी ु या आÉयाियका सािह×य का एक ाचीन आÉयाियका कतूहल ु अप ना Úयेय समझती है . यह धान अंग है . आज से नहीं, आिद काल से ही. हाँ, िच से बहत कछ अंतर हो गया है . ु ु आजकल की आÉयाियका म समय की गित और

धान होती थी, या अÚया×मिवषयक. वत[मान आÉयाियका वीकार कर लेने म हम संकोच न होना चािहए िक

े सािह×य क दसरे अंग की भांित मनोवै£ािनक िव ेषण और मनोरह य क उ ाटन को े ू उप Ûयास ही की तरह आÉयाियका की कला भी हमने प ि म से ली है . मगर प ाँच सौ े वष[ प हले यूरोप भी इस कला से अनिभ£ था. बड़े -बड़े उÍचकोिट क दाश[िनक तथा ऐितहािसक उप Ûयास िलखे जाते थे. लेिकन छोटी-छोटी कहािनय की ओर िकसी का Úयान न जाता था. हाँ, कछ प िरय और भूत की कहािनयाँ अलब ा ु सभी अंग प र िवजय ा चिलत थीं. िकÛतु इसी एक शताÞदी क अÛदर या उससे भी कम म समिझए, छोटी कहािनय ने सािह×य क और े े कर ली है . कोई प ि]का ऐसी नहीं िजसम कहािनय की धानता न हो. यहाँ तक िक कई प ि]काओं म कवल कहािनयाँ ही दी जाती ह. े कहािनय क इस े ाबãय का मुÉय कारण आजकल का जीवन-सं\ाम और समयाभाव है .

अब वह जमाना नहीं रहा िक हम ‘बो ताने खयाल’ लेकर बैठ जाएं और सारे िदन उसी क े कओं म िवचरते रह. अब तो हम जीवन सं\ाम म इतने तÛमय हो गये ह िक हम ुँ

मनोरं जन क िलए समय ही नहीं िमलता. अगर कछ मनोरं जन े ु न होता, और हम िवि¢ मनोरं जन का नाम भी न लेते. लेिकन

वा Øय क िलए अिनवाय[ े

हए िबना िन×य अठारह घंटे काम कर सकते तो शायद हम ु कृ ित ने हम िववश कर िदया है . हम चाहते ह

िक थोड़े से थोड़े समय म अिधक से अिधक मनोरं जन हो जाए. इसीिलए िसनेमा गृह की संÉया िदन ब िदन बढ़ती जाती है . िजस उप Ûयास को प ढ़ने म महीन लगते उसका आनंद हम दो घंट म उठा लेते ह. कहानी क िलए प Û]ह-बीस िमनट ही काफी ह. े अतएव हम कहानी ऐसी चाहते ह िक वह थोड़े से थोड़े शÞद म कही जाए, उसम एक वाÈय, एक शÞद भी अनाव यक न आने प ाए, उसका प हला ही वाÈय मन को आकिष[त े ु कर ले, और अÛत तक हम मुÊध िकए रहे , और इसक साथ ही कछ त×व भी ह . त×वहीन कहानी से चाहे मनोरं जन भले हो जाए, मानिसक तृि नहीं होती. यह सच है िक हम े े कहािनय म उप दे श नहीं चाहते, लेिकन िवचार को उ ेिजत करने क िलए, मन क सुÛदर भाव को जागृत करने क िलए कछ न कछ अव य चाहते ह. वही कहानी सफल होती है , े ु ु िजसम इन दोन म से एक अव य उप लÞध हो. सबसे उ म कहानी वह होती है िजसका आधार िकसी मनोवै£ािनक स×य प र हो. साधु िप ता का अप ने कåयसनी प ु] की दशा से दःखी होना मनोवै£ािनक स×य है . इस आवेग ु ु म िप ता क मनोवेग को िचि]त करना और तदनुकल उनक åयवहार को े ू े दिश[त करना कहानी को आकष[क बना सकता है . बुरा आदमी भी िबलकल बुरा नहीं होता, उसम कहीं न ु कहीं दे वता अव य िछप ा होता है , यह मनोवै£ािनक स×य है . उस दे वता को खोल कर िदखा दे ना सफल आÉयाियका लेखक का काम है . िवप ि प र िवप ि प ड़ने से मनु य दय क िकसी गु े िकतना िदलेर हो जाता है . यहाँ तक िक वह बड़े बड़े संकट का सामना करने क िलए े े ताल ठ क कर तैयार हो जाता है . उसकी दवा[सना भाग जाती है , उसक ु वै£ािनक स×य है . एक ही घटना या दघ[टना िभÛन-िभÛन ु िभÛन प से थान म िछपे हए जौहर िनकल आते ह और हम चिकत कर दे ते ह. यह एक मनो ु कृ ित क मनु य को िभÛने भािवत करती है . हम कहानी म इसकी सफलता क साथ िदखा सक तो े

कहानी अव य आकष[क होगी. िकसी सम या का समावेश कहानी को आकष[क बनाने का सबसे उ म साधन है . जीवन म ऐसी सम याएं िन×य ही उप ि थत होती रहती ह, और उनसे प ैदा होने वाला Û आÉयाियका से चमका दे ता है . स×यवादी िप ता को मालूम Û है . प ाताप ऐसे Û का होता है िक उसक प ु] ने ह×या की है . वह उसे Ûयाय की वेदी प र बिलदान कर दे या े अप ने जीवन िस ांत की ह×या कर डाले? िकतना भीषण अखÖड ोत है . एक भाई ने अप ने दसरे भाई की सàप ि ू छल कप ट से अप हरण कर ली

है . उसे िभ¢ा मांगते दे ख कर Èया छली को जरा भी प ाताप न होगा? अगर ऐसा न हो तो वह मनु य नहीं है . उप Ûयास की भांित कहािनयाँ भी कछ घटना ु धान होती ह. कछ चिर] ु धान. चिर]

धान कहानी का प द ऊचा समझा जाता है , मगर कहानी म बहत िव तृत िव ेषण की ँ ु े गुंजाइश नहीं होती. यहाँ हमारा उ े य संप ूण[ मनु य को िचि]त करना नहीं, वरन ् उसक चिर] का एक अंग िदखाना है . यह प रमाव यक है िक हमारी कहानी से जो प िरणाम या त×व िनकले वह सव[माÛय हो, और उसम कछ बारीकी हो. यह एक साधारण िनयम है िक ु हम उसी बात म आनÛद आता है िजससे हमारा कछ सàबÛध हो. जुआ खेलने वाल को ु जो उÛमाद और उãलास होता है , वह दश[क का कदािप नहीं हो सकता. जब हमारे चिर] इतने सजीव और आकष[क होते ह िक प ाठक अप ने को उनक े तभी उसे कहानी म आनंद ा थान प र समझ लेता है ित प ाठक म होता है . अगर लेखक ने अप ने प ा] क े

यह सहानुभूित नहीं उ×पÛन कर दी तो वह अप ने उ े य म असफल है . मगर यह समझना भूल होगी िक कहानी जीवन का यथाथ[ िच] है . यथाथ[ जीवन का िच] तो मनु य वयं हो सकता है . कहानी कहानी है , यथाथ[ नहीं हो सकती. जीवन म बहधा हमारा अÛत उस समय हो जाता है , जब वह वांछनीय नहीं होता. लेिकन कथा ु े [ सािह×य मनु य का रचा हआ जगत है और प िरिमत होने क कारण सàप ूणतः हमारे ु सामने आ जाता है और जहाँ वह हमारी Ûयाय-बुि सुख मांगे. या अनुभूित का अित\मण करता हआ प ाया जाता है , हम उसे दÖड दे ने क िलए तैयार हो जाते ह. कथा म अगर िकसी को े ु ा होता है तो इसका कारण बताना होगा. दःख भी िमलता है तो इसका कारण ु उसकी मौत न ा को जनता की अदालत म अप नी हर एक कृ ित क िलए जवाब दे ना प ड़े गा. े ािÛत है , प र वह ािÛत िजस प र यथाथ[ का आवरण प ड़ा हो. बताना होगा. यहाँ कोई चिर] मर नहीं सकता जब तक िक मानव बुि काल का रह य