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उपयास

मन-
मन-माटी

असग़र वजाहत

पते की बात सीधी-सची होती है । उसे बताने के िलए न तो चतुराई की ज$रत पड़ती है
और न सौ तरह के पापड़ बेलने पड़ते ह( । सीधी-सची बात िदल को लग ती है और अपना
असर करती है । म( यहांइन पन. म/ आपके सामने कुछ सची बात/ रखने जा रहा हं
ू । ये
बात/ ग ढ़ी हई
ु नहींह( आपकी और हमारी दिनया
ु म/ ऐसा हआ
ु है , हो रहा है और होता
रहे ग ा। कुछ आपबीती है और कुछ जग बीती है ।

एक व6 की बात है । कलक7ा के पाक8 ःशीट इलाके म/ एक पादरी सफेद लंबा कोट पहने,
टोपी लग ाये, हाथ म/ पाक िखताब िलये जोशीली आवाज म/ कुछ कह रहा था। लोग उसे
घेरे खड़े थे। सुन रहे थे।

अकरम को कलक7ा आये तीन-चार िदन ही हए


ु थे। उसके बड़े भाई िमःटर जैAसन के
अद8 ली थे। अकरम की उॆ सोलह-स7रह साल थी। वह अपने पुँतैनी ग ांव अरौली से
आया था और आने का मकसद यह था िक बड़े भाई ने उसकी नौकरी लग वा दे ने का
पAका परोसा िदलाया था।

''दो िदन से पड़ा सो रहा है , उठाओ उसे।'' अकरम जब से आया है सो रहा है । खाना-वाना
खाता है , िफर सो जाता है ।

''उठ अकरम...उठ।'' अकरम की भाभी ने उसे िझंझोड़ िदया। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसके
बड़े भाई असलम की कड़ी और खरखराती आवाज आई, ''Aय.? सोने आया है यहां...चल
उठ जाके बाजार से दही ले आ, तो तेरी भाभी खाना पका ले।''

अकरम हाथ म/ पतीली लेकर बाहर आया, ग ली से िनकलकर सड़क पर आ ग या। यहांसे
उसे उHटे हाथ जाना था लेिकन सामने भीड़ लग ी थी। पादरी का चेहरा धूप म/ लाल हो
रहा था। अकरम ने इससे पहले कभी कोई ग ोरा नहींदे खा था। वह डर ग या, लेिकन िफर
भीड़ म/ पीछे िछपकर तमाशा दे खने लग ा। ग ोरे पादरी का चोग ा पसीने से भीग ग या था।
उसकी घनेरी दाढ़ी हवा म/ लहरा रही थी। सीने पर पड़ा हार इधर-उधर झूल रहा था।
अकरम उसे एकटक दे खने लग ा। उसकी बड़ी-बड़ी नीली आंख/ इधर-उधर घूम रहींथीं। वह
जहनुम म/ दी जानेवाली तकलीफ. के बारे म/ बात कर रहा था। उसकी आंख/ और
खौफनाक हो ग J थी। वह तेजी से घूम-घूमकर चार. तरफ जमा लोग . से कह रहा था,
''सचा और पAका मजहब और एक करारी मेम कौन लेग ा?'' पादरी की आवाज म/ कड़क
थी, ग रज थी, ईमानदारी थी, लालच था। वह सबको घूरकर दे ख रहा था।

अचानक पादरी की आंख/ अकरम की आंख. से टकराJ। पादरी ने ग रजकर िफर अपना
सवाल दोहराया, ''सचा और पAका मजहब और एक करारी मेम कौन लेग ा?''

अकरम को लग ा कलेजा उसके मुंह से आकर लग ग या है । उसका ग ला सूखने लग ा।


जबान पर लग ा कांटे उग ग ये ह( । वह टकटकी लग ाये पादरी को दे ख रहा था। पादरी बार-
बार अपना सवाल दोहरा रहा था। हर बार सवाल के बाद अकरम की हालत खराब हो
जाती थी। ऊपर आसमान म/ सूरज िचलिचला रहा था। भीड़ म/ कुछ अजीब आवाज उठ
रही थी। अकरम को लग ा उसे अपने ऊपर काबू ही नहींहै ।

वह बोल उठा, ''म(।''

अकरम के चेहरे पर एक अजीब तरह का भाव था। वह ग मL से झुलस रहा था। आंख/
फटी जा रही थीं। पूरे मजमे ने अकरम की तरफ दे खा। पादरी के चेहरे पर मुःकुराहट आ
ग ई। वह आग े बढ़ा और अकरम के आग े हाथ जोड़कर खड़ा हो ग या, िफर धीरे -धीरे
अकरम का हाथ पादरी के हाथ म/ चला ग या।

अकरम के भाई ने उसे कलक7ा की हर ग ली म/ खोजा, आसपास के ग ांव. म/ ग या। पुिलस


दारोग ा से पूछा। अःपताल, मुदा8घर, किॄःतान हर जग ह जाकर पता लग ाया, लेिकन
अकरम का कहींपता नहींचला। थक-हारकर घर िचOठी िलख दी। घर यानी यू.पी. के
मेरठ िजले की सरधना तहसील के अरौली ग ांव। अकरम के बूढ़े बाप और मांको यह
खबर िमली तो मांने रो-रो के जान दे दी। छोटे भाई है रत म/ पड़े रहे । बाप ने तौबा कर
ली िक अब िकसी औलाद को कलक7ा नहींभेज/ग े।

अरौली ग ांव म/ सब-कुछ वैसे ही होता रहा-जैसा होता आया था। अकरम के लापता हो
जाने की बात सब भूलते चले ग ये।
पाठक., समय बीतता ग या और बीतता ग या। दस लाख नौ हजार पांच सौ बार सूरज
िनकला और डू बा। खेत. म/ ग ेहूं लहलहाया और कुंदन की तरह लाल हआ।
ु नदी म/ नीला
पानी बहता रहा, हवा चलती रही, प7े िहलते रहे । मौसम पर मौसम बदलते रहे । बदलते
समय के साथ चेहरे भी बदलते रहे । अकरम के वािलद ग ुजर ग ये। कलक7ा म/ असलम
का इंतकाल हो ग या। अकरम के छोटे भाई वहीद है जे से मरे । उनके दोन. बेट., तAकू और
आिबद ने हल-बैल संभाल िलया।

चैत का महीना है , ग ेहूं कट चुका है , लग ता है पृRवी का मुंड न कर िदया ग या है । इधर-


उधर आम के बाग . म/ कोयल/ कूकती िफर रही ह( । आवारा लSड. के िग रोह सीकल बटोरने
की ताक म/ इधर-उधर घूम रहे ह( । घने पेड़. के नीचे बुजुग 8 चारपाइय. पर आराम कर रहे
ह( । खिलहान. म/ मढ़ाई चल रही है ।

दरू से बैलग ाड़ी आती िदखाई दे रही है । इस ग ांव की बैलग ाड़ी नहींहै । िकसी और ग ांव की
है । धीरे -धीरे बैलग ाड़ी अरौली ग ांव के ग िलयारे म/ आ जाती है । धूल का एक बवंड र उठता
है और बैलग ाड़ी Tक जाती है । दो-चार लोग बैलग ाड़ी के पास जाते ह( । बैलग ाड़ी से एक
अजीब तरह का आदमी उतरता है । उसने ग ोर.वाले कपड़े पहन रखे ह( । िसर पर है ट भी
लग ाये है । हाथ म/ छड़ी, कोट की जेब म/ घड़ी की चेन पड़ी है । सब जने इस आदमी को
दे ख रहे ह( और यह आदमी ग िलयारे को और इधर-उधर दे ख रहा है । िफर इस आदमी ने
ू पड़ा। यह आदमी अजीब-सी आवाज म/ जोर से
जो िकया उससे तो अचंभे का पहाड़ टट
िचHलाया और ग िलयारे म/ लोटने लग ा, रोने लग ा। उसका है ट िग र ग या, कपड़े धूल म/ अट
ग ये। घड़ी जेब से बाहर िनकल आई पर यह ग ली म/, ग दU म/ लोटता और रोता रहा।
सबको लग ा िक कोई पाग ल है , पर पाग ल है तो इतने अछे कपड़े कैसे पहने है ?
बैलग ाड़ीवाले ने बताया िक साहब छविलया ःटे शन पर पिसंजर ग ाड़ी से उतरे थे। ःटे शन
माःटर ने उसकी बैलग ाड़ी करा दी थी। कहा था साहब को अरौली ग ांव जाना है ।

''अरौली म/ िकसके घर आना था?''

''यह तो बात नहींहई।


ु ''

''नाम-पता कुछ है ?''

''नहींहमारे पास नहींहै ।''


बीस-पचीस िमनट के बाद यह आदमी धीरे -धीरे उठा अपनी टोपी उठाई। कपड़े ठीक िकये
और रामचं
दर के चाचा के पास ग या। वही भीड़ म/ सबसे बुजुग 8 थे।

''मेरा नाम अकरम है ...''

''अकरम?''

''हां...असलम मेरे बड़े भाई कलक7ा म/ काम करते थे...मेरा छोटा भाई वहीद है ।''

रामचं
दर के चाचा का मुंह खुला-का-खुला रह ग या। आंख/ फटी-की-फटी रह ग J। उसके
मुंह से बोल नहींिनकल रहा था।

''आप वसीउVीन के लड़के अकरमउVीन हो?''

''हां...हांम( वही बदनसीब हं


ू ।'' साहब िफर रोने लग ा।

सब उह/ लेकर तAकू के घर की तरफ चले। ग ांव के ग िलयारे से वे बैलग ाड़ी म/ नहींबैठे।
पैदल चलते रहे । कहीं-कहींTक जाते और िकसी मकान या पेड़ को Wयान से दे खते और
िफर आग े चलते। सब है रान थे िक ग ांव म/ ऐसा Aया अजीब है िजसे यह आदमी, जो
मेज लग रहा है , इस तरह दे खता, हँ सता, रोता या आह/ भरने लग ता है ।
िबHकुल अं

उनके पीछे करीब-करीब पूरा ग ांव चल रहा है । सबसे पीछे बैलग ाड़ी है िजसम/ उनका
सामान धरा है -पहाड़-जैसे चार बAसे ह( , एक ग ोल बAसा है । इस तरह के बAसे ग ांव म/

पहली बार दे खे ग ये ह( । यही वजह है िक ग ांव के लSडे उह/ छकर दे ख रहे ह( और
बैलग ाड़ीवाला या दसरे
ू बड़े लोग उह/ मना कर रहे ह( ।

घर के सामने पहं
ु चकर यह साहब Tक ग ये। तAकू और आिबद भी घर से िनकल आये
थे। साहब ने िसर पर से है ट उतार िलया। घर को इस तरह दे खा-जैसे कोई अपने जवान
बेटे को दे खता है । दसरे
ू लोग उह/ दे ख रहे ह( और वह घर को दे खे जा रहे ह( । ग ांव म/
िजसे खबर नहींथी उसे भी खबर लग ग ई है और सब अZबू के घर की तरफ दौड़े आ रहे
ह( । कुछ दे र खड़े -खड़े मकान को दे खने के बाद साहब दरवाजे की तरफ लपके और जोर-
ू पड़ा। िकसी की समझ म/ न आया
जोर से जंजीर बजाने लग े। सब पर है रत का पहाड़ टट
िक जंजीर Aय. बजाई जा रही है ? घर के मािलक घर के बाहर खड़े ह( । पूरा ग ांव घर के
बाहर खड़ा है और ये साहब जंजीर बजा रहे ह( । िकसको बुला रहे ह( ? िकस तक आवाज
पहं
ु चाना चाहते ह( ? कुछ िकसी की समझ म/ न आया। इतने म/ हाजी वलीउHला और मुंशी
करामत अली आ ग ये। सब लोग मकान के सामने नीम के पेड़ के नीचे चारपाइय. पर
बैठ ग ये। चारपाइयांकम पड़ रही थीं, तो पास-पड़ोस के घर. से आ ग J।

मुंशी करामत अली ने साहब से पूछा, ''पता चला िक आप मरहम


ू वसीउVीन के बेटे ह(
और वहीद िमयांके भाई ह( ।''

उह.ने कहा, ''हां, म( ही वह बदनसीब हं


ू ।'' सनाटा छा ग या। कुछ दे र के िलए सब खामोश
हो ग ये लेिकन क[व. की कांव-कांव जारी रही। ''आप अपने िरँतेदार. से िमलने आये ह( ?''
हाजी वलीउHला ने पूछा।

''हां, म( अपने ग ांव और घर म/ रहने आया हं


ू ... म( अब यहींरहं
ू ग ा।''

चार. तरफ खुसर-फुसर होने लग ी।

कुछ सोचकर मुंशी करामत अली ने कहा, ''हांआपको पूरा हक है । आपका मरहम
ू ... की
जायदाद म/ िहःसा है ।''

उह.ने कहा, ''मुझे जमीन, जायदाद म/ कुछ नहींचािहए... एक ितनका नहींचािहए...म( बस


इस घर और इस ग ांव म/ रहना चाहता हं
ू ... मुझे िकसी चीज की कमी नहींहै । लंदन म/
मेरा Tतबा है । वहांमेरी शादी हो ग ई थी। मेरा एक लड़का है जो फौज म/ है । एक लड़की
है िजसकी शादी हो ग ई है ।''

''सािहब, यह आपके भतीजे ह( । आपके भाई तो दस साल हए


ु ग ुजर ग ये थे।'' तAकूउVीन
उफ8 तAकू िमयांऔर आिबदउVीन उफ8 अZबू िमयांका मुंशी करामत अली ने तआTफ
कराया। साहब दोन. से िलपटकर रोने लग े।

बैलग ाड़ी घर के सामने पहं


ु च चुकी थी। तAकू और अZबू साहब के पहाड़-जैसे बAसे उतार-
उतारकर नीचे रखने लग े। साहब ने अपने बूट खोले और नीम के पेड़ के नीचे िबछी
चारपाई पर लेटकर ऐसे सोये-जैसे िजंदग ी म/ पहली बार नीं
द आई हो।

साहब ने बताया िक उह.ने ईसाई मजहब कुबूल कर िलया है और अब िफर से मुसलमान


नहींहोना चाहते। जो कुछ हआ
ु , हो ग या है । साहब महीने म/ एक बार बैलग ाड़ी करके
िडग लीपुर िग रजाघर जाया करते थे और अपने िहसाब से इबादत िकया करते थे। उह/
बैठक का एक िहःसा रहने के िलए दे िदया ग या था। साहब ने अपने भाइय. से साफ कह
िदया था िक वे जमीन-जायदाद म/ कोई िहःसा नहींचाहते। लंदन म/ उनके पास पैसे की
कमी नहींहै और अरौली वे पैसे के िलए नहींआये ह( । इस तरह भाइय. के िदल से यह
खौफ िनकल ग या था िक कहींसाहब को जायदाद म/ िहःसा न दे ना पड़ जाए और अं
मेज.
का जमाना है , साहब ईसाई ह( , फरा8टेदार अं
मेजी बोलते ह( , कलAटर-किम]र से िमल सकते
ह( । एक काग ज भी चला द/ ग े तो भारी पड़ जाएग ा, लेिकन साहब ने ऐसा कुछ नहींिकया।
हां, उनके ग ांव म/ रहने से छोटे -मोटे अहलकार-जैसे पटवारी और िसपाही ग ांव से कुछ
दबने लग े थे, Aय.िक उह/ मालूम था िक साहब की पहं
ु च लंदन तक है और वे वहांसे
जोर डलवा सकते ह( ।

साहब सुबह खाना खाकर घर से िनकल जाते थे। जी म/ आता तो पूरे ग ांव का चAकर
लग ाते। एक-एक ग ली म/ घूमते। सलाम-राम-राम करते। लोग . की खैर-खबर पूछते। घूमते
रहते। कहींिकसी पेड़ के नीचे दो-चार लोग बैठे होते और साहब से बैठने के िलए कहते
तो बैठ जाते। साहब हAका
ु नहींपीते थे, बताते थे िक लंदन म/ चुरट पीया करते थे। चुरट
यहांनहींिमलता इसिलए और कुछ नहींपीते। साहब लंदन की और बात/ भी बताया करते
िजसे ग ांव के लोग बड़े चाव से सुना करते, लेिकन साहब को बातचीत करना उतना पसंद
नहींथा, िजतना घूमना। वह ग ांव के दो-तीन चAकर लग ाकर खेत. की तरफ िनकल जाते
और पांच-सात कोस का चAकर लग ा लेते।

साहब के पास लंदन से पैसा आता है । साल म/ दो-तीन बार डािकया साहब का मनीआड8 र
लाता था। साहब पैसा वसूल करके इकनी डािकया को दे ते थे। साहब अपने पास एक नाड़े
म/ मोितय.-जैसा िपरोकर छे दवाले एक पैसे के िसAके रखते। जहांमन करता, पैसा िनकाल
लेते थे।

एक िदन साहब को कैथे के पेड़ पर एक पका हआ


ु कैथा लग ा िदखाई िदया। उह.ने बशीर
से कहा िक मेरे िलए कैथा तोड़ लाओ तो तु^ह/ एक पैसा दंगू ा। बशीर फट से पेड़ पर चढ़
ग या और कैथा तोड़ लाया। इसी तरह साहब को कभी जंग ल-जलेबी खाने का शौक होता
तो पैसा दे कर तुड़वाते थे। बूट खाने का साहब को शौक था। होले भूंजने के िलए साहब
पैसा िदया करते। यही वजह है िक साहब जब िनकलते तो लSड. का िग रोह उनके आग े-
पीछे रहता।

ग िम8य. के िदन. म/ साहब खूब तड़के, सूरज िनकलने से पहले उठ जाते और खेत. की तरफ
िनकल जाते। किॄःतान म/ महए
ु के पेड़. के नीचे ग ांव की औरत/ महए
ु बीनतींतो साहब
भी एक-आध महआ
ु साफ करके खा िलया करते। िफर बाग आ जाते अछी कोई सीकल
िमल जाती तो धोकर खाते। एक-दो फालसे चखते, चटनी के िलए दो-चार कचे आम उठा
लेते। पुराही चल रही होती तो खूब मजे म/ नहाते और ग ांव लौट जाते।

रात म/ जहांग ुड़ बन रहा होता, साहब वहांपहं


ु च जाते। कढ़ाव की खुरचन खाते। एक-आध
लोटा रस पीते। इधर-उधर की ग _प सुनते और दे र तक बैठे आग को दे खते रहते। कढ़ाव
के ऊपर आते फेन को तकते रहते। नहींतो ऊपर दे ख लेते। तार.भरा आसमान िदखाई
दे ता।

चांदनी रात म/ ग ांव के बाहर लड़के कब`डी खेलते तो साहब जाकर ज$र दे खते। कभी
खुश होते तो जीतनेवाली टीम के िलए इकनी का इनाम भी रख दे ते। इकनी म/ पांच
सेर हलुआ बनता िजसे िखलाड़ी मजे लेकर खाते। साहब को तालाब म/ तैरना और िसघांड़े
तोड़कर लाना बहत
ु पसंद है । दो िमOटी के घड़. की ड.ग ी बनाकर साहब घंट. तालाब म/
िसघांड़े तोड़ते रहते, कभी-कभी घर भी ले आते।

पूरे ग ांव म/ ही नहींदस-बीस ग ांव. म/ साहब के पास ही घड़ी है । साहब के अलावा अतरौला
के नवाब साहब के पास घड़ी है । साहब सुबह घड़ी म/ कूक िदया करते थे तो लोग जाकर
दे खते थे िक घड़ी म/ कूक कैसे दे ते ह( ! टाइम दे खना तो साहब के अलावा और िकसी को
आता न था। ऐरा-ग ैरा आदमी साहब से टाइम पूछने की िह^मत न कर सकता था। ग ांव
म/ दो ही तीन आदमी ह( जो टाइम पूछने साहब के पास आते ह( । साहब िडZबा खोलकर
घड़ी िनकालते ह( , ढAकन उठाते ह( , घड़ी साफ करते ह( , एक आंखवाला चँमा लग ाते ह( और
घड़ी म/ टाइम दे खकर बताते ह( । ग ांव म/ िकसी को घंटा और िमनट की जानकारी भी नहीं
थी, इसिलए टाइम िकसी की समझ म/ न आता था।

हाजी करीम टाइम पूछने के िलए अपने नौकर जु^मन को भेजते थे। उसे साहब जो टाइम
बताते थे उसे वह रटता हआ
ु हाजीजी के घर की तरफ दौड़ता। जु^मन िफर राःते म/
िकसी से बात नहींकरता था, Aय.िक अग र वह बात कर लेता था तो टाइम भूल जाता था
और िफर साहब के पास जाना पड़ता था। साहब दोबारा टाइम दे खने की बात से िचढ़
जाते थे और कभी-कभी मना भी कर दे ते थे, तब जु^मन कहता िक वही टाइम बता
दीिजए जो पहले बताया था। इस पर भी साहब को ग ुःसा आ जाता था। कहते थे िक
टाइम को Aया समझ रखा है ? Aया टाइम हमेशा एक रहता है ? अरे टाइम तो बदलता
रहता है । यह सुनकर लोग अचरज म/ पड़ जाते थे िक टाइम लग ातार कैसे बदलता रह
सकता है ? कोई ऐसी चीज नहींहै जो लग ातार बदलती रही, िफर टाइम Aय. लग ातार
बदलता रहता है ? बहरहाल तरस खाकर साहब िफर टाइम बता दे ते थे और जु^मन रटता
हआ
ु हाजीजी के घर की तरफ भाग जाता था।

इलाके म/ अग र कभी िकसी जमींदार या नवाब के यहांअं


मेजी का कोई खत आ जाता था
तो साहब को बुलाया जाता था। साहब को लेने बैलग ाड़ी आती थी। साहब उस िदन अपना
काला कोट पहनते थे, है ट लग ाते थे, ग ले म/ सफेद Tमाल बांधते थे। बूट पहनते थे। चँमा
और घड़ी रखते थे। कलमदान लेते थे और बैलग ाड़ी पर बैठ जाते थे। एक-दो बार उह.ने
बैलग ाड़ी पर कुसL रखा दी थी और कुसL पर बैठते थे, लेिकन िहचकोल. से कुसL एक-दो
बार िग र जाती थी। इसिलए साहब अब बैलग ाड़ी के डंडे पर बैठते ह( । साहब जब अं
मेजी
खत पढ़ने जाते होते ह( तो उनके घर के सामने लSड. की भीड़ लग जाती है । साहब के
भतीजे तAकू िमयांऔर अZबू िमयांफूल जाते ह( । िकसी को अपने आग े कुछ नहीं
समझते ह( । है कोई इलाके म/ ऐसा जो साहब की तरह अं
मेजी पढ़-िलख और बोल सकता
हो?

एक बार नवाब अतरौला के यहांकलAटर आ रहा था। नवाब साहब बड़े परे शान थे, उह.ने
साहब के िलए िफटन भेजी थी। उस पर साहब. की तरह बैठकर वो अतरौला ग ये थे और
कहते ह( साहब की अं
ग े◌र्े जी सुनकर कलAटर दंग रह ग या था। उसे यकीन ही नहींथा
िक इस इलाके म/ कोई ऐसी अं
मेजी बोलता होग ा।

तAकू कहता है , ''अब तुम लोग Aया समझते हो? साहब को सरकारी नौकरी नहींिमल
सकती? अरे वो चाह/ तो नायब तहसीलदार तो हो ही सकते ह( । दो-तीन बार नवाब मीर
अजमद अली ने उह/ मनीजर बनाने की बात की है , लेिकन साहब तो मनमौजी ह( । उह/
ग ांव म/ मजा आता है । अरे , ये तो हमारे नसीब ह( िक ग ांव म/ साहब-जैसा आदमी रह रहा
है । कहांिमलेग ा ऐसा आदमी जो लाट साहब से बात कर सकता हो?''

ग ांव के पुराने लोग . को यह अब तक याद है िक साहब चमचे से दाल खाया करते थे।
यह बात आसपास के ग ांव. म/ लोग . को भी पता चल ग ई थी और सबके िलए यह एक
अनबूझ पहे ली बन ग ई थी िक साहब दाल चमचे से Aय. खाते ह( ? साहब जब आये थे तो
ु , कांटा और चमचा िनकाला था। कांटा और छरी
उह.ने अपने एक बAसे म/ से छरी ु
घरवाल. के िलए ही नहींपूरे ग ांव के िलए नई चीज/ थींऔर िकसी की समझ म/ न आता
था िक ये Aया है ?

तAकू ने डरते-डरते पूछा था, ''चचाजान यह Aया है ?''


''ये खाना खाने के िलए है ।'' उह.ने कहा था।

तAकू की समझ म/ कुछ न आया था। वह ये तो जानता था िक बत8न खाये नहींजाते।


Aया साहब बत8न खाते ह( ? ऐसा है तो घर के सब बत8न साहब खा जाएंग े।

''यह खाते ह( ?''

''नहीं, इससे खाना खाते ह( ।''

ु , कांटे और चमचे से जो खाना शु$ िकया तो घर के बाकी लोग िसफ8


...और साहब ने छरी
ु और कांटे को
उह/ दे ख रहे थे। सब खाना, खाना भूल ग ये थे। धीरे -धीरे साहब ने छरी
अलग रख िदया, लेिकन चमचे का इःतेमाल करते रहे । खाना खाने के बाद वह अपने
चमचे को खुद धोते, प.छते और सही जग ह पर रख दे ते थे। ग ांव म/ यह बात धीरे -धीरे
फैली थी और िफर आसपास तक चली ग ई थी। लोग कहते थे िक अं
मेज ऐसा ही करते
ह( । वे हाथ से खाना नहींखाते, Aय.िक हाथ को ग द
ं ा मानते ह( । माना जाता था िक अं
मेज
हाजत के बाद पानी का इःतेमाल नहींकरते ह( , काग ज से प.छ लेते ह( , लेिकन साहब ऐसा
नहींकरते।

साहब के चमचे से eयादा उनके कांटे को दे खकर लोग है रान थे। िकसी ने कभी ऐसी चीज
न दे खी थी और यह तो कोई सोच भी न सकता था िक उससे खाना खाया जा सकता है ।
िजह.ने साहब का कांटा न दे खा था और ऐसे लोग . की बड़ी तादाद थी, उह/ बताया
जाता था िक समझ लो च^मच म/ बबूल के बड़े -बड़े कांटे लग े होते ह( चमचे की जग ह
पर, िजससे साहब खाना खाते ह( । कांटे Aया उनके मुंह म/ चुभ न जाते ह.ग े? या कांटे म/
खाना कैसे आता होग ा? मान लो साहब सालन-रोटी खा रहे ह( तो Aया करते ह.ग े? रोटी तो
पूरी-की-पूरी कांटे म/ फंस जाती होग ी। Aया साहब रोटी दांत से काट-काटकर खाते ह( ? और
साहब कांटे से सालन कैसे खाते ह.ग े? दो-चार लोग जो साहब के नजदीक आ ग ये, उनसे
कांटा िदखाने की फरमाइश भी करते थे। साहब उह/ चांदी का बड़ा-सा कांटा िदखाते थे,
लेिकन कांटा िकसी के हाथ म/ नहींदे ते थे।

कुछ साल के बाद साहब के पास एक खत आया िजसे पढ़कर वह बहत


ु रोये। बताया िक
लंदन म/ उनकी घरवाली के ग ुजर जाने का हाल खत म/ िलखा है । िफर साहब को Wयान
आया। उह.ने सबसे पूछे िक दे खो जब म( मर जाऊंग ा तो Aया तुम लोग लंदन मेरे बच.
को खत िलख सकोग े? खत अं
मेजी म/ होना चािहए, Aय.िक मेरे बच. को उद8 ू नहींआती।
अब तो बड़ा मसला पैदा हो ग या। ग ांव के सबसे eयादा पढ़े -िलखे आदमी मुंशीजी को भी
अं
मेजी म/ िचOठी िलखना न आता था। वे फारसी-उद8 ू जानते थे। आसपास के ग ांव. म/ भी
कोई ऐसा न था। हद यह है िक िडग लीपुर िग रजाघर के पादरी को भी अं
मेजी म/ िचOठी
िलखना न आता था। शहर यहांसे चालीस कोस पड़ता है । जहांका एक-आध वकील
अं
मेजी म/ िचOठी िलख सकता है ।

कोई बात नहीं। एक िदन बात साहब की समझ म/ आ ग ई। वह इमली के पेड़ के नीचे
लेटे थे और ऊपर से सूखी इमिलयांिग र रही थीं। तAकू रःसी बट रहा था। उह.ने तAकू
से कहा, ''सुनो तAकू, िचOठीवाली बात समझ म/ आ ग ई है ।''

''Aया?''

''हम तु^ह/ िचOठी िलखकर दे द/ ग े। हमारे मरने पर डाल दे ना।''

''हमने आज तक िचOठी नहींडाली है चचाजान...पहं


ु च तो जाएग ी न?''

''हां...यह जो डािकया आता है ...उसे दे दे ना...चार आने लेग ा...चार आने भी म( दे ता


जाऊंग ा।''

''ठीक है ।''

साहब खेत., खिलहान., तालाब., निदय., झील. और घास के मैदान. म/ घूमते रहे । न उह/
ग मL लग ती और न सदf। कोई मेला-ठे ला ऐसा न होता िजसे साहब छोड़ दे ते। दस-दस
कोस पैदल चले जाते और बरसात के िदन. की नदी तैरकर पार कर लेते। एक रात खाना
खाने के बाद साहब ने तAकू से कहा, ''पर तAकू एक बात है । खत म/ म( ये कैसे िलख
पाऊंग ा िक म( कैसे मरा?''

''हां, यह तो है ।'' तAकू ने सोचने का सारा काम साहब पर छोड़ रखा है ।

''मान लो म( िचOठी म/ िलखता हं


ू िक है जे से मर ग या और मरता हं
ू बुखार आने से, तो?''

''हां, यह तो है ।''

''तो म( िचOठी जHदी न िलखू?ं यानी जब बीमार पड़ू ं तो िलखू?ं''


''हां, यह तो ठीक है ।''

''पर, मान लो म( सांप काटने से मर ग या।''

''हां, यह तो है ।''

''सांप काटने के बाद म( िचOठी कैसे िलखूगं ा?''

''हां, यह तो है ।''

''तो म( तु^ह/ कई िचिOठयांिलखकर दे दंगू ा...िजस तरह म$ं वैसी िचOठी डाल दे ना।''

''हौव।''

''पर, यह तु^ह/ याद रहे ग ा िक कौन-सी िचOठी िकस बीमारी से मरने पर डाली जाएग ी?''

''यह तो है ।''

''िफर?''

''हां, Aया िकया जाए?''

चलो हर िचOठी अलग -अलग आदिमय. को दे द/ ग े। एक आदमी को एक बीमारी तो याद


रहे ग ी।''

''हां, यह ठीक है ।''

अःसी से ऊपर के होकर साहब मरे , पर...।

घुटन. के दद8 की वजह से साहब िबःतर पर पड़े तो पड़े ही रह ग ये। महीना हो ग या, दो
महीने हो ग ये, साहब पड़े ही रहे , िफर साहब ने दवाएंभी खानी छोड़ दीं...िफर साहब को
नींद न आने की िशकायत हो ग ई। वह न तो िदन म/ सोते थे, न रात म/... िफर अचानक
एक िदन अZबू ने सुना िक साहब नींद म/ बड़बड़ा रहे ह( । वह उठकर उनकी चारपाई के
पास ग या। वह जो कुछ बड़बड़ा रहे थे वह अZबू की समझ म/ नहींआया। शायद साहब
अं
मेजी म/ कुछ कह रहे थे, पर साहब सो भी न रहे थे। अZबू ने उनसे कुछ पूछा तो दे खा
साहब जाग रहे ह( , पर उह.ने यह नहींमाना िक वह अं
मेजी म/ कुछ बोल रहे थे।
धीरे -धीरे यह होने लग ा िक साहब रात-रातभर अं
मेजी बोला करते थे। कभी लग ता था िक
वह िकसी पर नाराज ह( , लड़ रहे ह( , ग ुःसा कर रहे ह( । कभी लग ता था याचना कर रहे ह( ।
धीरे -धीरे रोनी-सी आवाज म/ िवनती कर रहे ह( । कभी लग ता िक साहब बड़े _यारभरे लहजे
म/ ऐसे बोल रहे ह( -जैसे बच. से बोला जाता है । अZबू और बAकू ही नहींघर के सब
लोग यही समझते थे िक साहब का िदमाग पलट ग या है , लेिकन िदन म/ साहब की हालत
ठीक हो जाती थी। ठीक-ठाक बातचीत करने लग ते थे। उह/ पूरी उ^मीद थी िक ग िठया
का रोग मौसम बदलते◌े ही ठीक हो जाएग ा और वह आराम से चल-िफर सक/ग े, लेिकन
ग िम8यांआJ, िफर बरसात आई और िफर जाड़ा आया पर साहब चल-िफर न सके। उनका
वजन भी तेजी से घटता चला ग या और उसी तेजी से रात म/ उनका अं
मेजी म/ बड़बड़ाना
भी बढ़ता चला ग या।

एक रात साहब कुछ नाम ले-लेकर आवाज दे ते रहे , लेिकन वह लोग कौन ह( , कहांह( , यह
िकसी को मालूम न था, ग ांव के बड़े -बुजुग g ने िसफ8 अं
दाजा लग ाया िक साहब अपने बेटे-
बेटी और घरवाली को ही आवाज/ दे रहे ह( । उनके पुकारने के जवाब म/ अग र तAकू या
अZबू बोल दे ते तो साहब चुप हो जाते थे, िफर अचानक साहब एक रात चीखने-िचHलाने
और रोने लग े। उनकी सांस भी उखड़ने लग ी। मुंह से आवाज िनकलनी बंद हो ग ई और
साहब इस दिनया
ु से Tखसत हो ग ये।

साहब के मरने की िचOठी लंदन नहींभेजी जा सकी, Aय.िक साहब ने िजतनी िचिOठयाँ
िलखवाJ थींऔर उन िचिOठय. म/ मरने की वजह/ िलखवाई थी, उनसे साहब न मरे थे। न
तो साहब को जूड़ी दे कर तेज बुखार आया था, न है जा हआ
ु था, न चेचक हई
ु थी, न सांप
के काटे से मरे थे और न कुएं-तालाब म/ डू बकर मरे थे, न घर म/ आग लग ने से, न
डाकुओंने हhया की थी।

साहब के नाम िवलायत से जो खत आया करते थे। लग ातार अपने िहसाब से यानी तीन-
चार महीने म/ एक खत आता रहा। उसको पढ़ता कौन और जवाब कौन दे ता? इसिलए
तAकू खत. को साहब के काले बAसे म/ डाल दे ता था। होते-होते दो साल हो ग ये। साहब
के पांच खत आये थे।

एक िदन ग ांव म/ सुनने को िमला िक कलOटर साहब इलाके के दौरे पर आ रहे ह( और वे


ग ांव भी आएंग े। ग ांव म/ आकर वह साहब के बारे म/ तहक़ीक़ात कर/ ग े। यह सुनते ही
तAकू और अZबू को दःत लग ग या था। दोन. के चेहरे पीले पड़ ग ये थे। ग ांव म/ तरह-
तरह की बात/ फैल ग J थीं। कोई कहता था िक साहब अपनी मौत नहींमरे ह( । तAकू और
अZबू ने उनके सामान पर कZजा जमाने के िलए उनका ग ला दबाया था। कोई कहता था
िक तAकू और अZबू ने साहब की आिखरी वसीयत, िक उनकी लाश ग ांव म/ ही दफन की
जाए, पूरी नहींकी है और इस बात का पता कलOटर साहब को चल ग या है । कोई कहता
था िक साहब कलOटर साहब के सपने म/ आये थे और उह.ने तAकू और अZबू के बारे म/
अं
मेजी म/ िशकायत की थी। कुछ लोग बताते थे िक साहब की अं
मेजन ने अं
मेजी म/
िलखकर एक िशकायत शहंशाहे इंग िलःतान को दी थी। यह िशकायत लंदन दरबार से
सात समंदर पार िहंदोःतान आ ग ई है । उसी पर कार8 वाई करने कलOटर साहब आ रहे ह( ।

बहरहाल, िजतने मुंह थे, उतनी ही बात/ थीं। तAकू और अZबू म/ मोहर8 म आ ग या था।
चूHहा तक न जलता था और औरत/ सोग मनाये बैठी थीं। यह भी कहा जा रहा था िक
तAकू और अZबू की जमीन/ कुक8 हो जाएंग ी और दोन. को फांसी पर चढ़ा िदया जाएग ा।
कोई कहता था िक कम-से-कम काला पानी तो भेज ही िदया जाएग ा। तAकू-अZबू ने
खाना-पीना छोड़ िदया था। िदनभर नीम के पेड़ के नीचे पड़े आपस म/ पता नहींAया-Aया
बात/ िकया करते थे। ग ांव के बड़े -बूढ़े उह/ समझाते थे िक डरने की कोई बात नहींहै और
जाज8 पंचम के दरबार म/ ऐसी नाइंसाफी नहींहो सकती। पूरा ग ांव ग वाही दे ग ा िक साहब
अपने आप मरे ह( ।

कलOटर साहब की मोटर के िलए कचा राःता बनने लग ा था और पटवारी ने ग ांव के


खाते म/ बीस बेग ारी िलख िदये थे। तो बीस बेग ारी जाया करते थे। एक महीने म/ राःता
तैयार हआ
ु था। नवाब है दर खांके आम के बाग म/ बड़ा-सा शािमयाना लग ा था जहां
कलOटर साब को दरबार करना था। शािमयाने के पीछे कलOटर साब के रहने के िलए
फूस का बंग ला भी तैयार हो ग या था। उसके पीछे िड_टी कलOटर., तहसीलदार., नायब. और
दसरे
ू अमले के िलए छोटे -बड़े हःबे-है िसयत बंग ले तैयार िकये ग ये थे। पीछे अद8 िलय.,
ग ुमाँत., नौकर. के िलए झोपिड◌़यांडाली ग ई थीं। पुिलस के िलए अलग इंतजाम था।
, चोर-बि7यां
मेरठ से ग ैस बि7यां , मेज-कुिस8यांमंग वाई ग J थीं। कलOटर साहब के आने से
पहले ही पूरा अमला आ ग या था। धोबी, िभँती, नाई, बावचL, खानसामा सब जमा हो ग ये
थे। पूरे इलाके को सांप सूंघ ग या था। िकसी की िह^मत न थी िक जोर से सांस भी ले
सके।

कलOटर साहब ने दरबार िकया। आिखरी िदन तAकू और अZबू की पेशी हई।
ु यह दोन.
साहब का एक-एक सामान िलए हािजर थे। यहांतक िक साहब का तिकया, दरी और
चादर तक ले ग ये थे। साहब के काग ज प7र भी उनके साथ थे। कलAटर साहब ने उन
खत. को खोला जो साहब के मरने के बाद आये थे। उह/ पढ़ा, तAकू-अZबू ने साहब से
पहले कोई अं
मेज न दे खा था। वह दोन. साहब का लाल चेहरा और भूरे बाल दे खकर
खौफजदा हो ग ये थे। दोन. प7े की तरह कांप रहे थे और हाथ जोड़े खड़े थे। उनके हलक
और जुबान सूख ग J थींऔर कुछ पूछा जाता तो बोल न सकते थे।

कलOटर साहब को वह खत भी िदये ग ये जो साहब ने इस बाबत िलखकर िदये थे िक


अग र उनकी मौत इस तरह से हो तो 'ये' खत डाला जाए और उस तरह से हो तो 'वह'
खत डाला जाए। कलOटर साहब ने उन खत. को भी पढ़ा। िड_टी साहब से अं
मेजी म/
बातचीत की और हAम
ु िदया िक तAकू-अZबू जा सकते ह( । दोन. िकस तरह घर आये थे,
ये इह/ मालूम नहीं
, पर दोन. को तेज बुखार आ ग या था और औरत/ रात-िदन इनके
िजःम पर पीपल के प7े फेरा करती थीं। हकीम शफीउHला की दो खुराक/ रोज दी जाती
थीं। अHलाह-अHलाह करके पंिह िदन म/ बुखार उतरा था। साहब का सामान इहींलोग .
को दे िदया ग या था, पर ये दोन. उसे िनग ाह उठाकर दे खने की िह^मत भी नहींकरते थे।
िकःमत का करना कुछ ऐसा हआ
ु िक साहब का भतीजा तAकू का लड़का जावेद पढ़ाई-
िलखाई म/ तेज िनकला और ग ांव, कःबे और शहर की पढ़ाई पूरी करने के बाद िदHली के
स/ट ःटीफ/स कालेज म/ दािखल हो ग या। तAकू और अZबू ही नहींबिHक पूरे ग ांव को यह
यकीन था िक जावेद बैिरःटर बनेग ा और िफर िकःमत ने जोर मारा। जावेद कालेज म/
अ[वल आया और उसे िवलायत जाकर पढ़ाई करने का वजीफा िमल ग या। िवलायत जाने
से पहले वह ग ांव आया। उसने साहब का वह बड़ा-सा बAसा खोला िजसम/ वह अपने खत
रखते थे। साहब को मरे बीस साल हो चुके थे, लेिकन बAसे म/ उनकी एक-एक चीज
करीने से रखी थी। जावेद ने साहब के पास लंदन से आये खत. को पढ़ा और कई पते
नोट िकये।

जावेद को पानी के जहाज पर बैठाने बंबई तक कई लोग ग ये थे। वह कऽmक


् ् का साल था
और िसतंबर का महीना था। जावेद को लंदन भेजने के िलए उसकी मांतैयार नहींथी
और कहती थी िक जावेद को लंदन भेजा तो म( सांप के िबल म/ हाथ डाल दंगू ी या
संिखया खाके सो जाऊंग ी, लेिकन जावेद जानता था िक उसका लंदन जाना िकतना ज$री
है । उसने मांको समझा िलया था पर मांको यह मालूम था िक लंदन म/ ग ोरी औरत/
मदg को फंसा लेती ह( , इसिलए मांके जोर डालने पर लंदन जाने से पहले जावेद का
िनकाह भी कर िदया ग या था।

जावेद के लंदन जाने के कोई दो महीने बाद उसका एक खत आया था िजसम/ िलखा था
िक वह साहब के घर ग या था। साहब के लड़के राबट8 से िमला था और साहब की लड़की
िवAटोिरया ने भी उसकी अछी खाितर-मदारात की थी। वह दोन. अपने बाप यानी साहब
को याद करके बहत
ु दःखी
ु हो ग ये थे िक पता नहींिहंदःतान
ु के ग ांव म/ साहब की
िजंदग ी कैसे कटी होग ी? लेिकन जावेद ने जब सब-कुछ उह/ तफसील से बताया तो उनको
कुछ चैन आया था। जावेद ने यह भी िलखा था िक ये लोग साहब का सामान, उनके
काग ज-प7र मांग रहे ह( और चाहते थे िक पास8ल के जिरये साहब का पूरा बAसा लंदन
भेज िदया जाए। तAकू िमयांने साहब का बAसा सहारनपुर के मुoतारे -आम बाबू जानकी
ूसाद िमसरा के जिरये लंदन िभजवा िदया था, जिजस पर इAकीस Tपये तेरह आने खच8
आया था। यह भी बड़ी बात थी िक तAकू िमयांने बAसा िभजवाने पर इतना qयादा पैसा
खच8 कर िदया था।

यह तो हई
ु जग बीती। अब म( आपको आपबीती सुनाता हं
ू । ऊपरवाले वाकये म/, अग र कोई
लाग -लपेट है तो उसकी िज^मेदारी सुनानेवाले पर है । अब जो म( आपको बताने जा रहा हं

वह मेरे अपने साथ हआ
ु है और जो हआ
ु है वह सब सच-सच आपके सामने रख रहा हं
ू।

जब िहंदःतान
ु का बंटवारा हआ
ु तो मेरी उॆ चौदह साल थी। मेरा पिरवार बुलद
ं शहर िजले
के िडबाई कःबे म/ रहता था। इस कःबे की एक ग ली को सैयदवाड़ा कहा जाता है । वहीं
हम लोग रहते थे। चार. तरफ मारकाट मची थी। हमारे कःबे और शहर म/ कुछ न था,
लेिकन लोग . के िदमाग . के अं
दर उथल-पुथल चल रही थी। अचानक एक िदन मेरठ से
मेरे मामू आये और बताया िक पूरा खानदान पािकःतान जा रहा है । िदHली से ःपेशल
शे न चल रही है िजसे िमलेशीवाल. की िहफाजत म/ भेजा जा रहा है । इससे पहले ग ई शे न.
म/ बड़ी मारकाट हई
ु थी, लेिकन इस शे न के साथ ऐसा नहींहोग ा। मामू ने कहा िक बड़ी
मुिँकल से म(ने इस शे न के दस िटकट हािसल कर िलये ह( , अग र तुम लोग चलना चाहो
तो चलो। हमारे अZबा और अँमा ने सोचा िक पूरा खानदान ही जा रहा है तो हम लोग
यहांरहकर Aया कर/ ग ?े हमने भी िबःतर बांध िलया। िडबाई म/ हम लोग . के साथ ही
िरँते के एक चचा रहते थे। उनके हवाले घर िकया और हम लोग ज$री समान लेकर
तड़के दो इAक. पर सवार होकर इस तरह िनकले िक हमारे जाने की िकसी को खबर न
हो।

इAक. से हम अलीग ढ़ आये। वहांसे िदHली पहं


ु चे। िदHली के पास फरीदाबाद रे लवे ःटे शन

से ःपेशल छटनी थी। हम वहांग ये। मेरी मांने मेरी बिनयान म/ पांच हजार Tपये सी
िदये थे। छोटे भाई के कपड़. के साथ भी पैसे िसये थे। अZबा की शेरवानी के अःतर म/
पैसे िसये ग ये थे।
ःटे शन पर शे न आई तो अजीब-सी लग ी। हर चार-पांच िडZब. के बीच एक खुली हई
ु बोग ी
लग ी थी िजसम/ आमLवाले रे त के बोरे लग ाये, छोटी-छोटी बैरक. म/ तैनात थे। ग ाड8 के
िडZबे के पीछे भी एक आमL का मोचा8-जैसा िडZबा था और इंजन के आग े भी एक इसी
तरह का िडZबा लग ाया ग या था। सवारी िडZब. की िखड़िकय. पर लकड़ी के तoते जड़े हए

थे।

िडZबे म/ छ_पन लोग . के बैठने की जग ह थी लेिकन उसम/ एक सौ छ_पन लोग बैठे थे।
यह बता िदया ग या था िक ग ाड़ी पािकःतान आने से पहले नहींTकेग ी, इसिलए िजतना
जो इंतजाम कर सकता है , करके बैठे। बेिहसाब सामान ले जाने की इजाजत नहींथी। जो
लोग फालतू सामान ले जाना चाहते थे, उह/ छोड़ िदये जाने की धमकी दी जाती थी।

शे न रवाना हई।
ु कब रात हो ग ई पता ही नहींचला। जो लोग िखड़िकय. के पास बैठे थे, वे
िझिर8 य. से आंख/ लग ाये कुछ दे खकर बता दे ते थे। अAसर ःटे शन. के नाम सुनने म/ आ
जाते थे लेिकन ग ाड़ी वहांTकती नहींथी। कुछ दे र बाद, आधी रात के आसपास ग ाड़ी Tक
ग ई। िमलेशीवाल. ने शे न के दोन. तरफ मोचU लग ा िलये। आसपास म/ अचानक तेज रोशनी
िदखाई पड़ी और ग ोिलयांचलने की आवाज/ आने लग ीं। लोग . ने बताया िक आमLवाले
फसािदय. को भग ा रहे ह( । पांच-छह घंटे ग ाड़ी वहींखड़ी रही। उजाला हो ग या तो पता
चला िक इंजन यह दे खने के िलए आग े चला ग या है िक रे ल की पटिरयांतो उखड़ी हई

नहींह( ? इंजन वापस आया। शे न म/ िफर लग ा और शे न चली, लेिकन रmतार बहत
ु ही धीमी
थी। जैसे फूंक-फूंककर कदम रख रही हो।

िडZबे के अं
दर उठने की तो छोिड◌़ए, पहलू बदलने की भी जग ह न थी। शु$-शु$ म/ तो
काफी चीख-पुकार थी लेिकन िफर इस तरह सनाटा छा ग या जैसे कोई िजंदा ही न हो।
िदHली से लाहौर तक का सफर अड़तालीस घंटे म/ तय हआ
ु था।

अब जो कुछ मेरी िजंदग ी म/ हो रहा था, सपना था। रात म/ मुझे िडबाई के सपने आते थे।
म( लाख चाहता था िक रात म/ िडबाई के सपने न आएं
, लेिकन यह नामुमिकन था। साल.
ग ुजर चुके थे लाहौर आये। शादी हो ग ई थी। बचे हो ग ये थे लेिकन िडबाई के सपने
आना बंद नहींहए।
ु म( िकसी से कुछ कह भी नहींसकता था। म(ने बीवी को समझा िदया
था िक घबराने की कोई बात नहींहै , मुझे डरावने oवाब िदखाई दे ते ह( । वह िबचारी मेरी
बात को सच समझी थी और मुझसे हमददf रखने लग ी थी।
साल-पर-साल ग ुजरते रहे । यहांतक िक म( बूढ़ा होने लग ा। मतलब साठ के ऊपर का हो
ग या, लेिकन मुझे यही लग ता था िक म( िडबाई म/ रह रहा हं
ू । यह वही ग ली है । इसी ग ली
म/ िशय. की मिःजद है । आग े चलकर पंिडत राम आसरे का घर है । लाहौर की िकसी ग ली
से ग ुजरते हए
ु मुझे पंिडत राम आसरे की आवाज सुनाई पड़ जाती।

म( कांपने लग ता हं
ू । यार, ये Aया है ? मुझे चामुंड ा के मंिदर के ऊपर पीपल के ऊंचे-ऊंचे
पेड़. के प7. के खड़खड़ाने की आवाज सुनाई दे ती है और िफर िकसी डग ाल से कोई बंदर
ध^म से मंिदर की छत पर कूदता है और मेरा कलेजा दहल जाता है । या अHलाह, म( Aया
क$ं?

िदन म/ तो म( िफर भी िकसी तरह अपने को काबू म/ रखता, लेिकन रात होते ही, और
सोते ही, म( कुछ नहींकर सकता। एक पुरानी िफHम चलने लग ती है , िजसम/ रोज नया
होता है । आज सुइया के पुल पर हम लोग आम खा रहे ह( । महे श ग ुठिलयांपानी म/ फ/क
रहा है । पता नहींकैसे वह नाले म/ िग र पड़ा। हम सबने उसे नाले से िनकाला। चामुंड ा से
बाहर िनकले तो तेज लू चल रही है और ऐसी ग मL थी िजसम/ चील तक अं
ड ा छोड़ दे ती
है । हम चार दोःत कब8ला तक आये और ग ेट के नीचे बैठकर ग ोिटयांखेलने लग े। आज
ु हारा। वह रोने लग ा तो म(ने उसे ग ुड़ दे िदया, जो म( अ^मा से िछपाकर अपनी
महे श बहत
जेब म/ रखकर लाया था।

रोज रात को एक पुराना सपना नये तरह से िदखाई दे ता है ।

स7र साल पार कर जाने के बाद भी सब-कुछ ऐसा ही रहा तो मुझे oयाल आया-यह पूरा
जनम तो 'इस' संसार म/ िबता िलया। अब दसरा
ू जनम जाने कहांहोग ा तो Aय. न वह
जग ह दे खी जाए जहांजीवनभर रहा हं
ू । लाहौर म/ तो म( रहा ही नहीं।

िहसाब-िखताब दे खा, पैसा-वैसा तो ठीक ही है । दोन. बचे पढ़-िलख ग ये ह( । शािदयांहो ग ई


ह( , बचे हो ग ये ह( । पूरी तरह सेटल ह( , लेिकन म( 'सेटल' नहींहं
ू । तो म( अपने को 'सेटल'
करने का काम शु$ कर सकता हं
ू।

भारत के वीजा के िलए अ_लाई िकया। वजह बतानेवाले कालम म/ िलखा 'अपने को सेटेल'
करना। इस पर वीजा आिफसर बहत
ु हँ सा। बोला, ''जनाब...कोई समझ म/ आनेवाली वजह
िलिखए। िबजनेस करना, शादी म/ जाना है , कोई ग मी हो ग ई है । वग ैरा...वग ैरा...?''
म(ने िलखा, 'Aया ग मी हो सकती है ?' वह िफर िचढ़ ग या और मुझसे पूछे बग ैर िलख िदया
'ग मी हो ग ई है ।'

रात अपने बेड $म म/ लेटकर म( दे र तक भारत के वीजे को दे खता रहा और डरता रहा।
एक अजीब तरह का डर िजसे बताया नहींजा सकता। भारत के साथ लड़ाइयां, भारत के
िखलाफ नफरतभरा 'ूोपेग /ड ा'। भारत म/ िहंद-ू मुिःलम फसादात...सब-कुछ आंख. के सामने
घूमने लग ा, लेिकन िफर खयाल आया म( भारत कहांजा रहा हं
ू , म( तो िडबाई जा रहा हं

िजसे म( सोते म/ अब भी दे खता रहता हं
ू , जहांकी आवाज/ मुझे चाहे -अनचाहे सुनाई दे ती
रहती ह( । चामुंड ा के मंिदर के बराबर पीपल के पेड़ पर बंदर. की क/..क/..क/.. मेरे कान. म/
कहींभी ग ूंज जाती है , लेिकन िडबाई जाने के िलए भारत जाना पड़े ग ा। भारत म/ मुझे कोई
पकड़ न ले? मुझ पर पािकःतानी जासूस होने का इHजाम तो लग ाया ही जा सकता है ।
मुझे मुसलमान समझकर भी नुकसान पहं
ु चाया जा सकता है । िहंद-ू मुिःलम फसाद हो
ग या तो म( भाग भी न पाऊंग ा। िजस-िजस िहंद ू को पता चलेग ा िक म( पािकःतानी हं
ू वह
नफरत से मेरी तरफ दे खेग ा। म( बुढ़ापे म/ यह सब बदा8ँत कर पाऊंग ा? अग र नहींतो िफर
म( Aय. जा रहा हं
ू ? तो Aया न जाऊं?...लग ा िकसी ने िसर पर एक भारी पhथर मार िदया
हो। चामुंड ा के मंिदर की छत पर बंदर कूदने लग े...आम के बाग म/ कुंजड़. का खटहरा
चीखने लग ा...म( जाऊंग ा...ज$र जाऊंग ा...Aय. कोई मुझे मारे ग ा? Aया मेरे चेहरे पर िलखा
है िक म( मुसलमान हं
ू ? म( दाढ़ी नहींरखता, मेरे माथे पर ग Oटःन नहींहै । म( कOटर
मुसलमान.वाले कपड़े नहींपहनता...कोई मुझे Aय. पहचानेग ा िक म( मुसलमान हं
ू।

इतने साल. के उतार-चढ़ाव के बाद अब भारत म/ म( िसफ8 सािजद रहमान को ही जानता


हं
ू । वह मेरी िरँते की एक बहन का सबसे छोटा बेटा है और अलीग ढ़ यूिनविस8टी म/
पढ़ाता है । म(ने उसे अपने भारत आने का ूोमाम िलखा और उसका जवाब आया िक वह
मुझे लेने एयरपोट8 आएग ा और म( जहां-जहांजाना चाहता हं
ू , वहां
-वहांले जाएग ा। म(ने उसे
ू , और कहींनहींजाना चाहता। िसफ8
जवाब िदया था िक म( िसफ8 िडबाई जाना चाहता हं
एक िदन िडबाई म/ ग ुजारकर वापस चला आऊंग ा। िडबाई म/ इसिलए नहींTकना चाहता
िक वहांरहं
ू ग ा कहां
?

िदHली हवाई अ`डे पर उतरते ही मुझे अनायास लग ने लग ा था िक म( सतक8 हो ग या हं


ू।
म( हर काम अपने पूरे होशो-हवास म/ करने की कोिशश कर रहा हं
ू । ये नहींिक कोई मेरे
ऊपर िनग ाह रख रहा है और ये भी नहींिक म( िकसी भी ग लती पर पकड़ा जा सकता हं

पर यह ज$र है िक मुझे सावधान रहना चािहए। म( इमीमेशन की लाइन म/ बड़ी
शालीनता से खड़ा हआ।
ु एक-दो लोग मेरे आग े आकर खड़े हो ग ये थे, लेिकन म(ने कोई
एतराज नहींिकया था। जब मेरा नंबर आया तो मेरा िदल धड़क रहा था, लेिकन म( चेहरे
पर पूरी ग ंभीरता और िवrास के भाव संजोये हए
ु था, िफर मुझे लग ा िक ये भाव कहींमेरे
अं
दर के डर को न रे खांिकत कर द/ । इसिलए म( मुःकुराने लग ा, पर अं
दर से कांप रहा था।
मुझे लग ता ज$र कुछ-न-कुछ ग ड़बड़ हो जाएग ी और मुझे वापस लौटाया जा सकता है ,
लेिकन जब मेरी बारी आई और िसख पुिलस अफसर ने मेरा पासपोट8 और काग ज हाथ से
िलए तो मेरी जान ही िनकल ग ई। िसख, सुना था, मुसलमान. से बहत
ु नफरत करते ह( ।
उह/ दंग . वग ैरह म/ बहत
ु मारा ग या था। कhले-आम िकया ग या था। म( सनाटा मारे
खड़ा रहा, िसख अफसर ने मेरे काग ज दे खकर ठ_पे लग ाये। कायदे से मुझे आग े बढ़ जाना
चािहए था, लेिकन म( कुछ सेकंड के िलए वहांखड़ा-का-खड़ा रह ग या, िफर खयाल आया
िक म( Aया कर रहा हं
ू ? यह तो पहले अपने आप को 'िग Hटी' सािबत करने जैसा काम है ।
म( तेजी से आग े बढ़ ग या।

िदHली हवाई अ`डे के बाहर मुझे सािजद िमल ग या। उसके साथ एक साहब और िमले
िजनका तआTफ यह कहकर कराया ग या िक यह डा. शमा8 ह( और िहंदी के लेAचरर ह( । म(
कुछ पसोपेश म/ पड़ ग या लेिकन जHदी ही यह बात मेरी समझ म/ आ ग ई िक सािजद ने
बड़ी अAलमंदी का काम िकया है ।

होटल म/ सामान-वामान रखने के बाद सािजद ने मेरा पासपोट8 दे खा और एक बहत


ु बड़ी
ग लती का पता चला। म(ने िदHली और अलीग ढ़ का वीजा िलया था। सािजद ने बताया िक
िडबाई तो बुलद
ं शहर िजले म/ है और मुझे बुलद
ं शहर का वीजा लेना चािहए था। मेरे हाथ.
के तो तोते ही उड़ ग ये। या अHलाह यह म(ने Aया कर डाला! म( यह Aय. समझे बैठा था
िक िडबाई अलीग ढ़ िजले म/ है ? वजह यह रही होग ी िक हम लोग अलीग ढ़ होते हए
ु ही
िडबाई से लखनऊ आया-जाया करते थे। यही वजह थी िक म( िडबाई को अलीग ढ़ िजले म/
समझ बैठा था।

''अब Aया िकया जाए?'' म(ने सािजद से पूछा।

सूरते-हाल पता चली िक अब िदHली म/ नया वीजा लग ना तो करीब-करीब नामुमिकन है


और यह हो ही नहींसकता िक बुलद
ं शहर का वीजा लग वाने इःलामाबाद जाऊं? राःता यह
है िक म(...म( कांप ग या और बेसाoता नहीं
-नहींकहने लग ा। स7र साल की उॆ म/, एक
अछी-खासी है िसयत का आदमी होने के बाद अपने को जेल की सलाख. के पीछे खड़ा
दे खकर घबरा ग या।
''यह म( नहींक$ंग ा।''

कलजी... घबराने की कोई बात नहींहै ?'' डा. शमा8 बोले और म( है रत से उनका चेहरा
''अं
दे खने लग ा। उनके चेहरे पर िवrास और दोःती थी। ये दोन. मुझे समझाते रहे िक कुछ
न होग ा, लेिकन मेरी परे शानी कम नहींहई।
ु म( न तो नहींकह सकता था और न हां।

कल आप को दे खकर कौन कह सकता है िक आप पािकःतानी ह( ?'' डा. शमा8 ने कहा।


''अं

''म( तो कह ही रहा हं
ू िक चिलए।'' सािजद ने कहा

''म( सब संभाल लूंग ा। यह कैसे हो सकता है िक आप पचास साल बाद अपना ग ांव दे खने
आये ह( और िबना दे खे चले जाएं?''

ु ु र-टक
म( टक ु ु र शमा8 की तरफ दे खने लग ा। जैसे तोता जाल म/ फंसने के बाद िचड़ीमार को
दे खता है ।

''आपको कुछ न होग ा।''

''दे खो बेटा, मेरे िदल के दो आपरे शन हो चुके ह( ।''

''सर म( आपसे कैसे कहं


ू िक कुछ न होग ा... मेरे मामा लखनऊ म/ डी.आई.जी. ह( । मेरे
िपताजी िरटायड8 चीफ इंजीिनयर ह( ...मेरा भाई आई.आर.एस. म/ है । आप भी अं
कल...।''
शमा8 ने पूरे यकीन से कहा।

तय यह पाया िक म( आराम क$ं, िफर थाने जाकर िरपोट8 क$ं। अपने को 'कंपोज' क$ं-
लाहौर फोन करके बेग म सािहबा से बात कर लूंऔर िफर सो जाऊं।

सब-कुछ मेरे िलए नया है । पचास साल पहले की याद/ खhम हो चुकी ह( । राःते, इमारत/,
पेड़-पौधे, पुल और नदी-नाले लग ता है सब नये ह( ।

म( ग ाड़ी की िपछली सीट पर सािजद और शमा8 के साथ बैठा हं


ू । साइवर के बराबरवाली
सीट पर एक बावदf िसपाही बैठा है । यह शमा8जी का कमाल है । उह.ने मेरा िवrास बढ़ाने
के िलए इस िसपाही का इंतजाम िकया है । अब हम पुिलस की िहफाजत म/ ह( । हम/ कौन
रोक सकता है ? अग र पुिलस ने रोका भी तो पुिलस का िसपाही, डी.आई.जी. आर.के. शमा8
का नाम लेग ा और हम आग े बढ़ जाएंग े।
ग ाड़ी िहचकोले खाती ग ुजर रही थी। म( सब-कुछ इस तरह दे ख रहा था िक िजंदग ी म/
दोबारा यह सब न दे ख पाऊंग ा।

''अब हम िडबाई आ ग ये ह( ।'' शमा8 ने कहा।

म(ने इधर-उधर दे खा। ये तो नहींहै । एक कची सड़क बड़े नीले तालाब के पास से मुड़ती
थी। सड़क के दोन. तरफ दे सी आम के बड़े -बड़े पेड़ थे। आग े थाना था। खपरै ल की
इमारत के सामने पीपल का पेड़ था। उसके तने के पास एक छोटी-सी मूित8 रखी रहती
थी। बाJ तरफ दारोग ाजी की घोड़ी बंधी रहती थी, िजसे कभी िकसी ने कहींऔर न दे खा
था। दारोग ाजी जब िनकलते थे तो बड़ी शान से लखनऊ का कुता8-चूड़ीदार पैजामा पहनते
और टोपी लग ाते थे। उनके पीछे पूरी वदf म/ दो िसपाही हाथ बांधे चला करते थे।
दारोग ाजी को वदf म/ शायद ही िकसी ने दे खा हो। दारोग ाजी ठाकुर राम िसंह की हवेली
तक आते थे और कुछ दे र बैठकर लौट जाते थे। थाने के बाद इसी सड़क पर सरकारी
अःपताल था। वह भी नजर नहींआ रहा है ।

''यह िडबाई है ?'' म(ने िहचिकचाते हए


ु पूछा।

''हांअं
कल, यह िडबाई है ।''

''वह पAका तालाब कहांहै ?''

''सामने आप दकान/
ु दे ख रहे ह( ... उनके पीछे िछप ग या है । वैसे भी अब तालाब म/ कम ही
पानी है । िपछले साल यहांबािरश नहींहई
ु है ...सूखा पड़ा है ।''

एक जग ह ग ाड़ी रोक दी ग ई। िसपाही और साइवर को ग ाड़ी के पास छोड़ िदया ग या और


हम लोग आग े बढ़े । अब हम पुराने कःबे की तरफ जाने लग े।

कल, यहांिकस मोहHले म/ आपका घर था?'' शमा8 ने पूछा।


''अं

''सैयदबाड़ा।''

हम पूछते-पूछते सैयदबाड़ा आ ग ये।

''यही है वह मोहHला?'' सािजद ने पूछा।


म( इधर-उधर दे खने लग ा। कुछ पता नहींचला Aय.िक पुरानी िनशािनयांग ायब हो चुकी
थीं।

''पता नहीं।'' म( धीरे से बोला और अपने आप पर शम8 आने लग ी। आग े बढ़ सािजद ने दो-


एक लोग . से पूछा और सबने यही बताया िक यही सैयदबाड़ा है । एक पतली-सी ग ली के
दोन. तरफ मकान बने थे। अब यह तय हो ग या िक सैयदबाड़ा यही है । म( इस ग ली म/
इन दो लोग . के साथ अपना मकान तलाश करने लग ा। मेरे िदल म/ एक ऐसी हलचल,
ऐसा तूफान और ऐसी बेचन
ै ी थी िजसे बताया नहींजा सकता। लग ता था िक मुझे अपने
ऊपर काबू ही नहींहै । पूरी ग ली दे ख डाली पर मुझे अपना मकान नहींिमला। जहांम(
पैदा हआ
ु था। जहांबचपन और लड़कपन बीता था।

कल और कोई िनशानी याद है ?'' शमा8 ने पूछा जब हम तीन. हताश एक जग ह खड़े थे।
''अं

''ग ली म/ िशय. की मिःजद थी...हमारा घर मिःजद से आठवांमकान था।'' म(ने कहा।


िशय. की मिःजद जHदी ही िमल ग ई।

''यह वही मिःजद है ।'' सािजद ने कहा।

''हां, वही है ।'' म(ने खुद अपनी आवाज को कांपते महसूस िकया। मिःजद का लोहे की
सलाख.वाला दरवाजा बंद था। पूछा तो बताया ग या िक सामनेवाले घर म/ चाबी है । सािजद
चाबी ले आये। ताला खोला ग या। हम मिःजद म/ आ ग ये। मुझे पहली बार लग ा िक म(
िडबाई म/ हं
ू । ये लोग मुझसे कुछ कह या पूछ रहे थे लेिकन मुझे सुनाई नहींदे रहा था।

जाड़े की सद8 रात तेज ठंडी हवा चल रही है । आधी रात ओले पड़े ह( लेिकन दादी फ़जर
की नमाज के िलए चार बजे उठ ग ई ह( ।

''शqजू...ऐ शqजू...उठो...नमाज का व6 हो ग या है ।'' म( िबःतर पर बेखबर सो रहा हं


ू।

''शािकर...उठो...तु^हींने तो कहा था िक...मुझे मिःजद म/ अजान दे नी है । उठो...।''

म( िबःतर पर बेखबर नहीं...कसमसा रहा हं


ू।

ग ली म/ सद8 हवा के तेज झ.के...म( िलहाफ ओढ़े हं


ू ...मिःजद के ठंडे पानी से वजू कर
रहा हं
ू।

''अHलाह हो अकबर...।'' िठठरती हई
ु आवाज कहांतक पहं
ु च रही होग ी मुझे भी नहीं
मालूम।

''यह मिःजद वही है ।'' शमा8 ने पूछा।

''वही है ।'' म(ने कई बार पूछने पर जवाब िदया।

''लेिकन... वह हौज कहांहै जहांपानी होता था?'' आसपास के लोग आ ग ये ह( । वे बताते


ह( जब से नल लग ा है , हौज बंद करा िदया ग या है ।

''...और यह लोहे का दरवाजा?''

''हांपहले लकड़ी का था... हर दो-चार साल बाद बदलना पड़ता था।''


मिःजद के सहे न से आसमान का उतना ही टकड़ा िदखाई दे ता है । अब भी मिःजद उसी
तरह सफेद चूने से पोती जाती है -जैसे उस जमाने म/। ये दर, ये दीवार/ , ऊपर की छत,
मीनार/ और िमंबर। म( खामोशी से यह सब नहींदे ख रहा था। मेरे अं
दर आवाज. का
जमाट था। आवाज/-दादी की-दTद शरीफ पढ़ने की आवाज, अZबा की मिस8या पढ़ने की
आवाज, अ^मा की खाना खा लेने की पुकार, आपा की ग ुिड◌़या की शादी के ग ाने की
आवाज।

सािजद और शमा8 कुछ अलग खड़े थे। वह चाहते थे िक म( िदलभर कर वह सब सोच लूं,
जो सोचना चाहता हं
ू । हमने मिःजद से िनकलकर घर िग नना शु$ िकये। आठवांघर मेरा
होना चािहए।

''यही है आठवांघर।'' शमा8 ने कहा।

''पहचान रहे ह( आप?''

''नहींये नहींहै ।'' म( घर को ऊपर से नीचे दे खता हआ


ु बोला।

कल और कोई पहचान याद है ग ली की?'' शमा8 ने पूछा


''अं

''ग ली के नुAकड़ पर छeजू हलवाई की दकान


ु हआ
ु करती थी।''
छeजू हलवाई की दकान
ु तलाश करने म/ कोई मुिँकल नहींहई।
ु म( है रान हो ग या। पता
नहींAय. अब तक वैसी ही है ये दकान
ु -जैसी हआ
ु करती थी। धुएंसे काली दीवार/ सामने
बड़ी-सी कढ़ाई, तoत पर िमठाइय. के थाल...दकान
ु पर एक आदमी बैठा जलेिबयांबना
रहा था।

''Aय. भाई आप छeजू हलवाई के कौन ह( ।'' शमा8 ने पूछा

''मेरे दादाजी थे।'' वह बोला

''यहांइस ग ली म/ िवकार हसै


ु न साहब का घर है ?''

''वही जो पािकःतान चले ग ये थे?''

''हां-हां, वही।''

''उधर पांचवांघर है ।''

''वहांअब कौन रहता है ?''

''सराफ बाबू रहते ह( ।''

हम घर िग नते आग े बढ़ने लग े।

''यही है रामलाल सराफ।'' दरवाजे पर लग ी नेम _लेट पढ़कर सािजद ने बताया।

''यही घर है अं
कल?''

तीन दर ग ली म/ खुल रहे ह( । उनके बराबर सदर दरवाजा...तीन सीिढ़याँ...हां


, हांयही
है ...यही है ...म( घबरा कर ग ली म/ आग े बढ़ ग या। शमा8 और सािजद दरवाजे पर खड़े रहे ।

''आइए, अं
दर से तो दे ख लीिजए।'' सािजद ने कहा।

''बस दे ख िलया...दे ख िलया।'' म( Tका नहींआग े बढ़ता चला ग या। लग ा िक एवरे ःट फतह
करके वापस लौट रहा हं
ू । म( पीछे मुड़कर भी नहींदे खना चाहता था।
म( आग े बढ़ता चला ग या, मेरा सीना धSकनी की तरह चल रहा था। मुझे न कुछ िदखाई दे
रहा था और न सुनाई दे रहा था। म( बस आग े िनकल जाना चाहता था। अब मेरे अं
दर
िह^मत नाम की कोई चीज न बची थी। म( यह बदा8ँत ही नहींकर सकता था िक हर
रात सपने म/ आने वाला मकान मेरे सामने मौजूद है । यह कैसे हो सकता है िक कHपना
सजीव हो उठी हो। मेरे अं
दर डर और खुशी के जeबे एकसाथ िमल ग ये थे। मुझे लग ता
था बस अब हो चुका...बस अब दे ख िलया। यह भी लग ा िक वह सब अब कहांिमलेग ा
िजसकी तलाश म/ म( आया हं
ू । वह अब कहींहै तो मेरे अं
दर है । मुझे वह सब अपने अं
दर
ही दे खना चािहए। मेरे पैर Tक ही नहींरहे थे।

मेरे पीछे से सािजद की आवाज आई।

''चिलए, वे लोग आपको बुला रहे ह( ।''

''कौन?''

''सराफ साहब.. शमा8 ने उनसे बात कर ली है ।''

म( Tक ग या। म(ने चेहरे से ढे र सारा पसीना प.छा।

''नहीं, अब वापस चलो।''

''इतनी दरू आ ग ये ह( ...मकान िमल ग या है तो अं


दर से भी दे ख लीिजए।''

''दे ख िलया...।''

''वे लोग बुरा मान/ग े।''

''कौन?''

''सराफ साहब... उह/ शमा8 ने आपके बारे म/ बता िदया है ।''

सदर दरवाजे पर एक अधेड़ उॆ आदमी कुता8-पैजामा पहने खड़े थे। उनके ग ले म/ सोने की
एक मोटी-सी चेन थी। उनसे मुझे िमलवाया ग या। उह.ने बड़ी ग म8जोशी के साथ हाथ
िमलाया और सदर दरवाजे से हम अं
दर दािखल हए।
ु बाJ तरफ वाली बैठक म/ आ ग ये।
बैठक सजी हई
ु थी। उह.ने तीन. बाहरी दरवाजे खोल िदये। म( छत की तरफ दे खने लग ा।
सािजद और शमा8 के लाख िछपाने के बाद भी सराफ साहब को ये पता लग ग या िक म(
पािकःतान से आया हं
ू । जािहर है िवकार हसै
ु न का बेटा और सािबर हसै
ु न का भतीजा
पािकःतान से ही आया होग ा। यह मकान मेरे चचा सािबर हसै
ु न ही बेचकर ग ये थे,
Aय.िक पूरे खानदान म/ उह.ने ही सबसे बाद िहजरत की थी।

''आपने छत बदलवाई है ?''

''हां, पहले लकड़ी की पिOटयांथीं...म(ने दस साल पहले ःलेप लग वा िदया था।'' सराफ
बोले। पानी आया, चाय आई, नाँता आया, घर के बचे सब-कुछ ला रहे थे। सराफ साहब
की मेहरबानी से म( मु7ािसर हो ग या।

''भाई जी, आज भी ये आपका ही घर है ...जब तक चाह/ , िजतने िदन चाह/ आराम से रिहए।
हम/ आपकी सेवा करके अछा ही लग ेग ा।'' सराफ बोले। म( कमजोर हो ग या था िक
खामोश था। डर था कहींरोने न लग ूं। सराफजी ने अपनी बहू को बुलाया। उसने मेरे पैर
ु तो म( अपने आंसू रोक नहींपाया।
छए

''जी, भग वान की कृ पा से भरा-पूरा घर है । मेरे दो बेटे ह( । बड़े की शादी हो ग ई है । दो


बचे ह( । दसरा
ू बेटा िदHली म/ है । मोटर पाOस8 का काम है उसका। मेरी यहांहाड8 वेयर की
दकान
ु है । बड़ा बेटा संभालता है । म( तो अब कम ही बैठता हं
ू । घुटन. ने मजबूर कर िदया
है ।'' सराफ ने तफसील से अपने पूरे खानदान के बारे म/ बताया।

दर से घर दे ख/ग े?'' शमा8 ने मुझसे पूछा। वह शायद समझ ग या था िक म( जो चाहता


''अं
हं
ू , वह कह नहींपा रहा हं
ू । रंग ा-चुना साफ-सुथरा आंग न, तीन तरफ बरामदे ...िबHकुल
वही...आंख/ बंद िकये बग ैर सपना दे ख रहा हं
ू और सपने म/ भी ये न सोचा था िक एक
िदन यहांआ सकूंग ा।

''इधर से...इस कमरे से बाहर आने का एक छोटा दरवाजा हआ


ु करता था?'' म(ने सराफ
साहब से पूछा।

''हां, हांहै ...आइए।'' हम कमरे म/ आ ग ये।

''इसी कमरे म/ म( पैदा हआ


ु था।'' म(ने कहा।
''वाह जी, वाह...यह तो हमारे िलए बड़ी बात है ।'' सराफ बोले। मकान अं
दर से दे खकर िफर
बैठक म/ आ ग ये। अब मेरा ग ला कुछ खुल ग या था। म(ने कहा, 'उधर लकड़ी की एक
चौकी होती थी िजस पर अZबा नमाज पढ़ा करते थे। यहां
, इधर कपड़े वाली दो कुिस8यां
और सरपत वाली तीन कुिस8यांहोती थीं।'

म( यह सब उन लोग . को नहींबता रहा था, अपने को िफर से याद िदला रहा था।

कुछ दे र बाद म(ने सराफ साहब से पूछा, ''यहांचामुंड ा का मंिदर है ।''

''हां-हांजी है ।'' वह बोले।

''म( दे खना चाहता हं


ू ।'' म(ने िग ड़िग ड़ाकर कहा।

''हां-हांAय. नहीं
?''

''ग ाड़ी है हमारे पास...पAके तालाब पर खड़ी है ।''

''तब तो और अछा है ...।''


''और छइया का पुल भी दे खना है ।'' म(ने कहा और सराफ साहब हँ सने लग े, ''हां-हांजी,
ज$र।'' एक बरसाती नाले पर बने पुल को दे खने की िदली oवािहश पर हँ सी आना अजीब
लग ा होग ा।

''और कब8ला... ठाकुर साहब की हवेली।''

''हां-हांआपको सब िदखाएंग े।'' वह बोले।


हमारे िलए छइया की पुिलया ग ांव की आिखरी हद हआ
ु करती थी। हम/ वहांजाने की
मनाही थी, Aय.िक वह सुनसान और वीरान जग ह थी। नीचे से नाला बहता था जो बरसात
म/ इतना बढ़ जाता था िक बाढ़ आ जाती थी और ग ांव के लड़के मछली पकड़ने िनकल
पड़ते थे। हम बड़ी हसरत से उन लड़क. को मछली पकड़ने के िलए जाते दे खा करते थे।


म(, सुरेश, अमीन, ूभाकर और महे श दोपहर म/ सबकी नजर. से बचकर छइया आते थे।
सुरेश कमल के फूल तोड़ने की कोिशश म/ एक बार नाले म/ िग र पड़ा था और हमने बड़ी
मुिँकल से उसे िनकाला था। ूभाकर अपने घर से ग ुड़ और चने ले आता था... म(ने
सोचा सराफ साहब से सुरेश, ूभाकर और महे श के बारे म/ पूछू ं, लेिकन िफर डर और घबरा
ग या... लग ा पता नहींAया बात/ पता चल/ और पता नहीं
, उनम/ से िकतनी अछी ह. और
िकतनी अछी न ह., इसिलए इन दोःत. की याद/ अपने िदल म/ ही महफूज रखू।ं


म(ने झुककर छइया को दे खा। मुझे अपना अAस uयारह साल के उस लड़के का लग ा जो

इस पुिलया पर बैठकर दे सी आम चूसा करता था और ग ुठिलयांछइया म/ फ/का करता था,

शायद बरस. से छइया ु
आम की उन ग ुठिलय. के िलए तरस रही है । छइया के उस पार
सड़क के दोन. तरफ आम के बडे -बड़े बाग ह( ।

''आम के ये बाग बहत


ु पुराने ह( ।'', म(ने सराफ साहब से कहा।

''हां, बहत
ु पुराने ह( ... बाग दे ख/ग े?''

मुझे लेकर ये लोग बाग आ ग ये। डा. शमा8 ने दो-चार सीकल/ ले लीं। मुझे आफर कीं, म(ने
मना कर िदया और वे बड़े मजे म/ खाने लग े।

चामुंड ा के मंिदर के सामने ग ाड़ी Tकी।

''यह मंिदर... इतना बड़ा...।'' म( कुछ कहना चाहता था लेिकन सराफ बात पूरी करने से
पहले बोले, ''मंिदर तो अब भी छोटा ही है ...पुजारी के िलए दो कमरे बनाये ग ये ह( ।''

हम मंिदर के अहाते म/ आ ग ये। पीपल के वही पुराने और लहीम-शहीम पेड़। म( उनके


प7. को हवा म/ िहलता दे खता रहा। हर प7े पर मेरा नाम िलखा है । उन प7. पर भी जो
अभी आजकल म/ ही िनकले ह( , िजनका रंग पीला है और जो कमिसन लड़की के होठ.-जैसे
मुलायम ह( ।

मंिदर की छत और पीपल के पेड़. पर बंदर. की पूरी सेना मौजूद है । हम तपती दोपहर. म/


घरवाल. को चकमा दे कर यहांआ जाते, तब यह मंिदर सुनसान हआ
ु करता था। दे वी बहत

सुकून से यहांआराम करती थी। हम यहांचबूतरे पर बैठ जाते थे और तालाब से तोड़े
िसंघाड़े खाते थे। बंदर ललचाई नजर. से हम/ दे खते थे, जैसे कह रहे ह.-'यार सब खाये जा
रहे हो.. एक-आध तो हम/ भी दे दो...'। इसी मंिदर के चबूतरे पर हाथ ग ुलेल बनाया करते
थे। िनशाना साधने की ूेिAटस िकया करते थे, पर हमारे िनशाने शायद ग लत लग ग ये ह( ,
तब ही तो म( बेवतन हो ग या हं
ू ... महे श और ूभाकर के साथ दे वी के दश8न करता था,
अब मुझे याद नहीं, लेिकन उस जमाने म/ पूजा की लाइन/ याद हो ग J थींजो मोहन पढ़ा
करता था।

हम/ दे खकर पुजारी बाहर आ ग ये। उह.ने दश8न कराये और कहने लग ा िक कमर. की
छत. पर ःलैप तो डल ग या है लेिकन िग Oटी नहींपड़ी है । कोई 'ौwालु अग र बीस हजार
Tपये दे दे तो िग Oटी पड़ सकती है । सराफ साहब ने कहा, ''ये मेहमान ह( ...आप बाद म/
मुझसे बात करना।'' कब8ला के आसपास कुछ नये घर बन ग ये ह( , लेिकन कब8ला का फाटक
वही है । फाटक के कंग ूरे, चौहदी वही है । मीनार. पर काली काई भी वैसी है । अं
दर की तरफ
दीवार म/ बनी ताक भी उसी तरह काली है जैसे म(ने दे खी थी।

मुझे लाहौर म/ जो सपने आते थे, वे िकतने सच होते थे। सपने म/ एक-एक 'िडटे ल' हआ


करती थी। चामुंड ा के मंिदर म/ आरती, मोहर8 म का जुलूस, छिरय. का मातम, मोहर8 म की
सुबह तािजय. का ठंडा िकया जाना। चार बजे शाम को फाका िशकनी... म( अपने सपन.
को ही साकार दे ख रहा था। एकटक, एक नजर म/ सब-कुछ भर लेना चाहता था।

''म( कब8ला का चAकर लग ाना चाहता हं


ू ।'' म(ने कहा।

''हां, हांचिलये'', शमा8 मेरे साथ हो िलए। हम ग द


ं ी नािलय. और कूड़े के ढे र से बचते-बचते
कब8ला का चAकर लग ाने लग े।

''वहांतो मोहर8 म बड़े जोर-शोर से मनाया जाता होग ा?'' शमा8 ने पािकःतान के मोहर8 म के
बारे म/ पूछा, म(ने कोई जवाब नहींिदया, Aय.िक कोई सही जवाब मेरे िदमाग म/ नहींआ
रहा था, िफर खयाल आया िक कुछ-न-कुछ तो कहना ही चािहए। म(ने धीरे से 'हां' कहा
और कब8ला के दसरे
ू फाटक पर वह जग ह दे खने लग ा जहांम( अलम खडे ◌़कराता था।
जहांअZबाजान ताबूत रखते थे और जहांतािजए िटकाये जाते थे। म( वहांग या और म(ने

उस जग ह को छआ तो लग ा अZबाजान, बड़े खालू, बने चचा और अ^मा को छू िलया
हो।

सब-कुछ दे खकर वापस आये तो सराफ साहब के घर खाना तैयार था। म(ने िदल म/ सोचा,
इस एहसान का बदला तो म( चुका भी न पाऊंग ा, Aय.िक सराफ साहब पािकःतान Aय.
आएंग े? म(ने सोचा, काश म( अपने साथ कोई अछा तोहफा रख लेता और सराफ साहब की
बहू को दे दे ता, िफर खयाल आया िक बहू को तो पैसे भी िदये जा सकते ह( । म(ने बहू को
बुलाकर उसे पांच सौ Tपये िदये...सराफ साहब बहत
ु रोकते रहे , लेिकन म( नहींमाना।
वापस जाने के िलए हम लोग सराफ साहब के घर से िनकलकर ग ली म/ आ ग ये। एक
छोटी-सी दकान
ु पर शमा8 ने िसग रे ट खरीदी। दकानदार
ु को पैसे दे ने लग ा तो उसने लेने से
इनकार कर िदया। पूछने पर िक पैसे Aय. नहींले रहा है , उसने ग ली के दसरी
ू तरफ खड़े
एक आदमी की तरफ इशारा कर िदया। मतलब यह था िक वह मना कर रहे ह( ।

म( उनके पास ग या। कोई प(सठ-स7र साल उॆ रही होग ी। चेहरे पर लंबी दाढ़ी, माथे पर
िसजदा करने का िनशान। दबला
ु -पतला िजःम। कुता8 और तहमद पहने इन बुजुग 8 से पूछा
तो बोले, ''म( तुझसे पैसा लूंग ा, पता नहींिकतने साल बाद तो तू आया है । तू मुझे न
जानता होग ा लेिकन म( तुझे अछी तरह जानता हं
ू । तेरे बाप को भी जानता था, तेरा चचा
मेरे साथ घूमता था।'' म( है रान खड़ा रह ग या।

इससे पहले िक म( अपनी आपबीती खhम क$ं आप लोग . को िसफ8 एक छोटा-सा ूसंग
और बताना चाहं
ू ग ा। लाहौर म/ मेरे दोःत ह( अकरम अहमद। वह लखनऊ से लाहौर आये
थे। पहली बार जब मुझसे िमले और पता चला िक हम दोन. मोहािजर ह( , तो बोले, ''चिलए
साहब, अपने दे श की कुछ बात/ हो जाएं।''

''अपने दे श की?''

''हां-हां... िहंदःतान
ु की बात/।'' वह राजदारी से बोले। म( है रत से दे खने लग ा।

''आपने सुना नहीं


? कहते ह( ...'' वे शेर-जैसा कुछ सुनाने लग े ''आंख/ है इस दे श म/ मेरी, िदल
मेरा उस दे श म/ है । िदन म/ पािकःतानी हं
ू म(, रात म/ िहंदःतानी।
ु ''

मुझे अपने सपने याद आने लग े।

जैसा िक म(ने आप लोग . से वायदा िकया था िक इस दाःतान म/ कुछ जग बीती है और


कुछ आपबीती है और म( दोन. को सुनाने से पहले बता दंगू ा िक जग बीती Aया है और
आपबीती Aया है । ...तो अब म( आपको कुछ जग बीती सुनाने जा रहा हं
ू।

लाहौर म/ मेरी कंपनी को चीन से लकड़ी स_लाई करने का एक बड़ा आड8 र िमला। कंपनी
के मािलक और एम.डी. रौशन हबीब, िजह/ िसतार-ए-पािकःतान का िखताब भी िमल
चुका है , मेरे बॉस थे। उह.ने आड8 र िदया िक म( लकड़ी का सौदा करने सूरीनाम जाऊं, जो
लकड़ी के इंटरनेशनल बाजार का एक स/टर है । म( पारामारीबो के िलए रवाना हो ग या।
वहांबड़ी तादाद म/ वो लोग भी बसे हए
ु ह( िजह/ डे ढ़-दो सौ साल पहले िहंदःतान
ु से वहां
ले जाया ग या था, तािक उस इलाके म/ ग ने की खेती कराई जा सके। इनम/ से कुछ तो
लौट आये थे लेिकन eयादातर वहींबस ग ये ह( ।

अपने पारामारीबो म/ काम के दौरान म( बहत


ु से ऐसे लोग . से िमला िजनके पुरखे
िहंदःतान
ु से वहांग ये थे। इन लोग . म/ डा. अजीज भी थे। अब म( िजनकी कहानी सुनाने
ू । वह ह( डा. अजीज, जो पारामारीबो के जाने-माने डाAटर ह( । उनकी बड़ी अछी
जा रहा हं
ूैिAटस है । दसरे
ू कारोबार. म/ भी उह.ने पैसा लग ाया है । शहर से सौ िकलोमीटर दरू
उनका हजार. एकड़ का फाम8 है । शहर म/ कई इमारत/ ह( । मुHक के बाइqजत और मालदार
लोग . म/ जाने जाते ह( । उह.ने एक रात मुझे घर खाने पर बुलाया था, जहांजुबैदा भी थी।
जुबैदा भी पढ़ी-िलखी खातून ह( और कई तरह के समाजी काम करती ह( । खाना खाने,
कॉफी पीने के िलए हम उनकी कोठी के पीछे ःवीिमंग पूल के िकनारे आ ग ये। पूल के
अं
दर रोशिनयांजल रही थींऔर नीले पानी म/ लहर. की परछाइयांतैर रही थीं
। एक
तरफ पाम के पौध. का अAस पानी म/ पड़ रहा था, दसरी
ू तरफ कैिरिबयन के फूल. के
पौधे लग े थे। ःवीिमंग पूल के िकनारे कॉफी पीते हए
ु डा. अजीज और उनकी बेग म जुबैदा
ने मुझे अपनी िजंदग ी का एक िदलचःप वाकया सुनाया, जो म( उहींकी जबान म/ आपके
सामने रख रहा हं
ू।

''हमारे परदादा, अलीदीन िग रिमिटया बन ग ये थे। कलक7ा से 'Aवीन आफ योरोप' जहाज


पर सवार हए
ु और दो महीने म/ यहांपहं
ु चे थे। यहांउस व6 कुछ नहींिसफ8 जंग ल था।
ऐसा-वैसा जंग ल नहीं...िबHकुल 'रे न फारे ःट'-जैसा जंग ल। इतना भयानक जं
ग ल था िक
उसम/ दो कदम भी नहींघुसा जा सकता था। इन मजदर.
ू ने उस जंग ल को साफ करने
का काम शु$ िकया जो उस जमाने म/ जानलेवा काम था, Aय.िक मशीन के नाम पर कुछ
नहींथा। सब-कुछ हाथ से करना पड़ता था। कुछ साल पहले दादा की शादी इहीं
खानदान. म/ से िकसी खानदान की लड़की से हई।
ु दादा पैदा हए।
ु दादा को यह डर था िक
कहींहमारी नःल/ यह भूल न जाएंिक वह कौन ह( ? कहांसे आये थे? उनका ग ांव-घर कहां
था? उह.ने एक ग ीत बनाया िजसम/ अपनी जाित, धम8, पुँतैनी ग ांव और इलाके का नाम
था। दादा ने यह ग ाना अZबा को याद करा िदया और अZबा ने यह ग ाना मुझे याद करा
िदया। यानी तीन पीिढ◌़य. से होता यह ग ाना मुझ तक पहं
ु चा था। म( िहंदी नहींसीख
सका और न बोल सकता हं
ू , Aय.िक मेरी पढ़ाई-िलखाई हॉःटल म/ हई
ु थी। साल.-दर-साल
ग ुजरते रहे और जब ये ग ाना म( अपने बेटे को याद करा रहा था तो खयाल अ◌ाया िक
Aय. न अपने ग ांव, दे स, वतन को चलकर दे खा जाए। पैसा म(ने काफी कमा िलया था। वह
िफब न थी जो शायद अZबा या दादा को रही होग ी। म(ने जुबैदा से इस बारे म/ बात की
तो वह भी तैयार हो ग ई। हमारे पास पते के तौर पर वही ग ाना था और इAका-दAका

बात/ पता थींिक हमारा ग ांव पहाड़. के बीच म/ है । ग ांव तक जाने के िलए एक छोटे
पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है । ग ांव के पास एक झरना है , जहांसे ग ांववाले पानी लाते ह( ।
एक छोटा-सा तालाब है जहांजानवर पानी पीते ह( और लोग नहाते-धोते ह( ।'' डा. अजीज
वाकया सुनाते-सुनाते Tके और अपना िसग ार सुलग ाने लग े। म(ने मौका ग नीमत जाना और
पूछा, ''वह ग ाना Aया है ?'' डा. अजीज हँ सने लग े। सुिनए-

''जत पटाना

ग उ समना

मलक दे स हरयाना।''

''म( कुछ नहींसमझा।'' म(ने कहा।

''यही हाल बंबई (मुंबई) म/ था।''

''बंबई म/?''

''हां, म( और जुबैदा बंबई पहं


ु च ग ये और वहांलोग . को हमने ये पता बताया तो कोई कुछ
नहींसमझ पाया...एक लंबा सफर करके बंबई पहं
ु चे थे। पारामारीबो से ए^सटड8 म ग ये थे।
वहांसे लंदन आये थे। वहांसे बंबई की mलाइट ली थी...और ग जब ये िक वहांकोई
हमारा पता ही नहींसमझ रहा था। खैर, हम ताज होटल म/ ठहर ग ये। होटल म/ भी कई
लोग . को ग ाना सुनाया, लेिकन कोई न समझ पाया।''

''िफर Aया िकया?''

''अचानक मेरी समझ म/ एक बात आई। अग ले िदन म(ने बाजार से इंिडया का एक बड़ा
नAशा खरीदा और होटल के कमरे म/ नAशा फैलाकर कोई ऐसा लाज तलाश करने लग ा
जो मेरे ग ाने म/ है । हर लाज को तलाश िकया, Aय.िक मुझे खुद िकसी भी लाज का
मतलब नहींमालूम था।''

''िफर Aया हआ
ु ?'' म(ने बेसॄी से पूछा।

''एक लाज िमला।'' डा. अजीज ने बताया।


''कौन-सा लाज?''

''हिरयाणा।'' उह.ने बताया।

''यह Aया है ?''

''िदHली के नजदीक एक ःटे ट है ।''

''िफर?''

''िफर अग ले िदन हमने mलाइट पकड़ी और िदHली आ ग ये। वहांएयरपोट8 पर टै Aसीवाल.


को यह ग ाना सुनाया...हरयाना को छोड़कर कोई कुछ नहींसमझा।''

''िफर?''

''अब Aया करते? इतनी दरू आना बेकार तो नहींजाना चािहए था। टै Aसीवाले से कहा,
हिरयाणा चलो...।''

''उसने पूछा होग ा हिरयाणा म/ कहां


?''

''िबHकुल यही हआ।


ु ''

''तब Aया िकया?''

''आिखर एक चालाक िकःम का टै Aसीवाला तैयार हो ग या।'' जुबैदा बोली।

''...और उसकी चालाकी हमारे काम आ ग ई।''

''कैसे?''

''उसने तो यह सोचा था िक दो मूख8 िमल ग ये। इह/ हिरयाणा म/ इधर-उधर घुमाता रहं
ूग ा
और खूब पैसे बनाऊंग ा, लेिकन हम लोग बेिफब हो ग ये थे िक अब हम/ हमारे पते पर
पहं
ु चाने की िज^मेदारी टै Aसीवाले की है । हमने उसे पता बता िदया है और उसने हम/
टै Aसी म/ बैठा िलया है ।''

''िफर?''
''िदनभर टै Aसी चलती रही। हम जग ह-जग ह Tककर अपना ग ाना सुनाते रहे । कुछ लोग .
को मजा भी आता था। कुछ हमारी मूखत
8 ा पर हँ सते थे। कुछ हम/ ूशंसाभरी नजर. से
दे खते थे। पूरा िदन ग ुजर ग या, रात हो ग ई। टै Aसीवाला हम/ एक ढाबे पर ले ग या। ढाबे के
मािलक ने पता नहींउसे Aया समझाया िक टै Aसीवाला हम/ लेकर पुिलस ःटे शन आ
ग या। पुिलस को भी हमने अपना ग ाना सुनाया। वे भी नहींसमझ सके, पर एक भले
पुिलस अफसर ने मदद करने का वायदा िकया। हम/ करीब ही एक होटल म/ ठहरा िदया
ग या। अग ले िदन पुिलस अफसर आया और हम/ लेकर पुिलस ःटे शन आया। यहांबहत
ु से
बड़े -बूढ़े लोग मौजूद थे। हमसे पुिलस ने कहा िक इह/ वह ग ीत सुनाओ। म(ने एक बार
सुनाया...दो बार सुनाया...बार-बार सुनाता रहा। वे लोग आपस म/ बातचीत करते रहे ।
ग ाना समझने की कोिशश करते रहे । म(ने बीस बार से अिधक ग ाना सुनाया होग ा, तब
कहींजाकर धीरे -धीरे ग ाना खुलने लग ा। ग ुhथी सुलझने लग ी। एक बूढ़े ने पूछा िक Aया
हम पठान ह( । ये तो मुझे मालूम था। म(ने कहा, पठान ह( ...िफर वे आपस म/ सलाह करने
लग े...और पता चला िक ग ांव का नाम सापना है जहांअब भी पठान. की आबादी है ,
लेिकन उनम/ बहत
ु से पािकःतान चले ग ये ह( ।

टै Aसी करके हम लोग एक ग ाइड के साथ सापना ग ांव पहं


ु च,े वहांचौपाल पर पूरा ग ांव
जमा हो ग या। म(ने अपने परदादा का नाम अलीदीन बताया। यह सुनते आये ह( िक
पिरवार का कोई लड़का सात समंदर पार चला ग या था, पर कभी लौटकर वापस नहीं
आया। अलीदीन के पिरवार का घर इसी ग ांव म/ था। लोग मुझे घर िदखाने ले ग ये।
पिरवार पािकःतान जा चुका था। हमने अपना घर दे खा...डे ढ़ सौ साल बाद वहांअलीदीन
की तरफ से कोई ग या।''

''ग ांववाल. का Aया 'िरएAशन' था?''

''आज हम वी.आई.पी. हो ग ये थे। जुबैदा ने ग ांव पर िफHम बनाई। हम ग ांव के पास बने

एक 'टिरःट िरजाट8 ' म/ रहे । रोज ग ांव जाया करते थे। हम/ वे खेत िदखाये ग ये जो कभी
हमारे थे। चौपाल पर इधर-उधर से लोग आते थे। हमसे िमलते थे।''

''खानदान वाल. का कुछ पता चला?''

''वह पािकःतान चले ग ये थे...इतना ज$र पता चला िक जो पािकःतान ग ये थे उनका


नाम रफीकउVीन था और वह रावलिपंड ी म/ जाकर बसे थे।''
''बस आग े का काम आप मेरे ऊपर छोड़ दीिजए...म( पािकःतान जाकर उह/ तलाश कर
लूंग ा।'' म(ने कहा।

कुछ दे र बाद डा. अजीज बोले, ''अग र म( हिरयाणा म/ अपने ग ांव न जाता तो...उसी तरह
अपने को अधूरा महसूस करता-जैसे मेरे वािलद और दादा िकया करते थे।''

म( है रत से उह/ दे खता रह ग या।

...और अब आिखर म/ आप लोग . को एक वाकया और सुनाता चलूं। यह आपबीती नहींहै ,


जग बीती है , लेिकन जो कुछ है िबलकुल सच है । सोलह आना सच है । िदHली म/ मेरे एक
दोःत ह( , जो कुछ अजीब िकःम के आदमी ह( , लेिकन म( उनके अजीब होने की दाःतान
नहींसुनाऊंग ा, Aय.िक िसफ8 उसी म/ सुबह हो जाएग ी। बस, ये समझ लीिजए िक वह
शोरबे म/ डालकर जलेबी खाते ह( और अपने हाथ से अपने इंजेAशन लग ाते ह( । वे पAके
सैलानी भी ह( । उनका वतन फतेहपुर है । यह कानपुर और इलाहाबाद के बीच जी.टी. रोड
पर एक छोटा-सा शहर है । लीिजए, इतनी बात/ बता दींऔर दोःत का नाम तो आपको
बताया ही नहीं। इनका नाम शफीकुल हसनैन नकवी है । नाम कुछ टे ढ़ा लग सकता है ,
लेिकन इसम/ इनकी कोई ग लती नहींहै । इनके वािलद फारसी-अरबी के िव}ान थे। आप
जानते ही ह( िक िव}ान हमेशा टे ढ़ा काम करते ह( , लेिकन आमलोग उस टे ढ़े काम को
सीधा कर लेते ह( तो इनके नाम को भी शहरवाल. ने सीधा करके सmफू िमयांकर िलया
है । जब थोड़ी औपचािरकता बरती जाती है तो इह/ सmफू नकवी भी कह िदया जाता है ।
ग ांववाले उह/ स_पू िमयांकहते ह( , Aय.िक 'फ' का उचारण उनके बस की बात नहींहै ।

सmफू िमयांबड़े बैठकबाज और बातूनी ह( । लाहौर आये थे, तो उनके साथ महिफल जमा
करती थी। उह.ने बताया िक जवानी के िदन. म/ उह/ सैर-सपाटे का शौक था। िकसी
तरह अमेिरका चले ग ये। हालत ये थी िक जेब म/ पैसा कम था, लेिकन घूमने की इछा
की कोई थाह न थी। मेहाउ~ड बस पर बैठे चले जा रहे थे। अग ली मंिजल अमेिरका का
ूिसw और खूबसूरत शहर िमयामी था, लेिकन ये पता न था िक िमयामी म/ कहांठहर/ ग ?े
सोचा था पहं
ु च जाएंग े तो सोच/ग े। खैर, साहब हआ
ु यह िक बस म/ उनके बराबर जो लड़का
बैठा था, उससे तआTफ हआ
ु तो वह पािकःतानी िनकला। दोन. म/ बातचीत होने लग ी।
उसने इनसे पूछा िमयामी म/ आप कहांठहर/ ग ?े इह.ने बताया िक अब तक तो कोई जग ह
ू Oस के साथ ठहरना पसंद कर/ ग े?
नहींहै । उसने कहा िक Aया आप कुछ पािकःतानी ःटड/
इह/ Aया एतराज हो सकता था। तैयार हो ग ये।
उनका िकःसा अपनी जबानी सुनाने से बेहतर है उहींकी जुबान से उनका िकःसा
सुिनए।

म(ने mलैट की घंटी बजाई। एक पंजाबी-जैसे लग नेवाले लड़के ने दरवाजा खोला। उह/
मालूम हो चुका था िक म( वहांठहरने आ रहा हं
ू । अछा-खासा mलैट था। तीन लड़के
रहते थे। मुझे एक रात ही Tकना था। मेरा सामान िलिवंग $म म/ रख िदया। म( तीन. से
िमला। कुछ दे र बाद एक मुझसे बोला, ''आप आराम करो...हम पाटf म/ जा रहे ह( । रात दे र
से आएंग े।''

म( Aया कह सकता था। दो लड़के चले ग ये और तीसरा िकचन म/ कुछ खाना-वाना पकाने
म/ लग ग या। म(ने सोचा, खाना तो म( भी खाऊंग ा। उठकर िकचन म/ आ ग या। उसने मेरे
सामने एक िबयर का कैन रख िदया और बोला, ''िबयर तो लेते ह.ग ?े ''

''हां, लेता हं
ू ।'' वह भी िबयर पी रहा था।

''पािकःतान म/ तो बड़ी पाबंदी होग ी?'' म(ने िबयर कैन की तरफ इशारा करके पूछा।

''पैसा नहींहै तो बड़ी पाबंदी है , पैसा है तो कोई पाबंदी नहींहै ।'' वह बोला। उसकी
साफग ोई मुझे पसंद आई।

''यही हाल िहंदोःतान म/ भी है ।'' म(ने पािकःतान और िहंदःतान


ु को बराबर ःथािपत करने
की कोिशश जान-बूझकर की थी, Aय.िक मुझे डर था िक कहींबात दोन. दे श. के मुकाबले
यानी कौन qयादा अछा पर न आ जाए। इससे पहले म( एक-दो ऐसे पािकःतािनय. से
िमल चुका था और इस तरह की बहस म/ फंस चुका था िजसका अं
त हमेशा तHखी पर ही
हआ
ु था। एक रात की बात है , िहंदःतान
ु छोटा ही सािबत हो ग या तो कौन-सी मुसीबत
आ जाएग ी?

''आपके दोःत िजस पाटf म/ ग ये ह( वहांआप नहींग ये?'' म(ने बात मोड़ने की कोिशश की।

''पाटf-वाटf म/ कहींनहींग ये ह( ।'' वह काफी तHखी से बोला, ''उह/ भारत के िसख. के


साथ ग Hल करने म/ मजा आता है ।''

उसने मजा शZद इस तरह इःतेमाल िकया िक उसकी सारी कड़वाहट मेरे मुंह म/ भर ग ई।
मेरी समझ म/ नहींआया िक म( इस बात पर 'वाह-वाह Aया बात है ' जैसी बात कहं
ू या ये
कहं
ू िक 'अरे साहब, हद होती है , यानी उह/ आप-जैसे पािकःतानी के साथ बातचीत म/
मजा नहींआता और वे भारत के िसख. के साथ ग Hल करने जाते ह( ।' म( इसी पसोपेश म/
था िक उसने बात बदल दी। बोला, ''ठीक है ...ये तो अपनी-अपनी मजL की बात है ।''

म(ने जHदी से कहा, ''हां, ये तो ठीक है ...जहांजो खुश रहे वहांजाए।'' म(ने पहली बार
महसूस िकया था िक पािकःतान म/ उद8 ू बोलनेवाल. और पंजाबी बोलनेवाल. के बीच इतना
}े ष है ।

कुछ दे र के बाद म(ने पूछा, ''आपकी फैिमली कहांसे है ?'' उसने अजीब तरह से मेरी तरफ
दे खा और बोला, ''कराची से।''

कराची? म( सोचने लग ा। यार मोहािजर तो िहंदःतान


ु से कराची ग ये ह( । यह लड़का अपने
को कराची का Aय. कह रहा है ? शायद पािकःतािनयत उसके िदमाग म/ qयादा ही घुस
ग ई है । मुझे कुछ अजीब लग ा। म(ने पूछा, ''आपकी फैिमली कराची कहांसे ग ई थी?''

वह और qयादा असहज महसूस करने लग ा और कुछ दे र चुप रहा।

िफर बोला, ''भारत से।'' ये बात उसने काफी नफरत से कही थी-जैसे भारत के ूित उसके
मन म/ ग ुःसा और नफरत भरी हो, उसे इस बात का अफसोस हो िक उसका पिरवार
भारत म/ Aय. था और पािकःतान म/ यानी उस इलाके म/ Aय. नहींथा, जो पािकःतान म/
है ।

कुछ दे र तक हम लोग खामोश रहे । वह जानता था, उसने मुझे घायल कर िदया है । म(
बेशमL पर उतर आया और म(ने पूछा, ''भारत म/ कहांसे?''

उसने घूरकर मुझे दे खा। उसे यह िबHकुल असहनीय लग रहा था िक म( उसके शुw
पािकःतानी होने पर सवािलया िनशान लग ा रहा हं
ू । उसने अपना जबड़ा सoत करके और
ह.ठ भींचकर कहा, ''यू.पी. से।''

अब मुझे अग ला सवाल नहींपूछना चािहए था, लेिकन िबयर के दो केन म( पी चुका था


और मेरी िह^मत बढ़ ग ई थी। म(ने पूछा, ''यू.पी. तो बहत
ु बड़ा है भाई... यू.पी. म/ कहां
से?'' वह कुछ दे र खामोश रहा, िफर बोला, ''आप नहींजानते ह.ग े। यू.पी. का एक छोटा-सा,
ग ुमनाम िजला है फतेहपुर...वहांसे हम लोग कराची आये थे।''
''कौन-सा फतेहपुर...जो इलाहाबाद और कानपुर के बीच है ?''

वह िचढ़कर और उपे€ा से बोला, ''हां, वही।''

''वहांतो म( रहता हं
ू ...फतेहपुर हःवा भी कहते ह( उसे।''

''हां, वही।'' वह बेखयाली म/ बोला और िफर सतक8 हो ग या।

म( भी खामोश हो ग या। म( जानता था िक अब 'बॉल उसके कोट8 ' म/ है । दे खो Aया होता है ।


िकचन म/ मसाल. की खुशबू फैल रही थी। कुछ सेकंड की खामोशी भारी पड़ने लग ी।

''आप फतेहपुर के ह( ।'' वह मरी हई


ु आवाज म/ बोला।

''हां...वहींका हं
ू ...पता नहींिकतनी पीिढ◌़य. से वहांरह रहा हं
ू ।''

वह िफर खामोश हो ग या। म(ने उसके खामोश चेहरे पर तूफान दे ख िलया था। एक रंग आ
रहा था और दसरा
ू जा रहा था। तेज रोशनी म/ उसके चेहरे की मांसपेिशयांिथरक रही थीं।

''वहांकोई खेलदार मोहHला है ।'' उसने कांपती हई


ु आवाज म/ पूछा।

''हां, है ?''

अब वह जो कुछ कह या पूछ रहा है , वह इस तरह जैसे उसे अपने ऊपर काबू ही न रह


ग या हो।

''फतेहपुर जी.टी. रोड पर बसा है ?''

''हां।'' म(ने जवाब िदया।

''जी.टी. रोड पर तहसील है ?''

''हां, है ?''

''उसके सामने से कोई ग ली खेलदार मोहHले तक जाती है ?''

''हां, जाती है ।''


''ग ली आग े जाकर मुड़ती है तो वहांमुिःलम ःकूल है ?''

''हां, है ।''

''ःकूल के पीछे तालाब है ?''

म( उसके सवाल. के जवाब दे रहा था और मेरे िदमाग म/ अजीब तरह की उथल-पुथल


चल रही थी। वह फतेहपुर का आंख. दे खा िववरण दे रहा था। उसकी बताई हर बात ठीक
थी।

''फतेहपुर म/ लHलू िमयांकोई जमींदार थे?''

''हां, बड़े जमींदार थे।''

''वहांकोई मोहHला बाकरग ज


ं है ? जहांजानवर. की बाजार लग ती है ?''अमेिरका के िमयामी
शहर के आधुिनक mलैट म/ ये सब नाम, जग ह/ और लोग अपनी उपिःथित दज8 करा रहे
थे। िकचन की िखड़की से हाई-वे नजर आ रहा था, िजस पर दौड़ती कार. की हे ड लाइट/
चमक रही थीं।

''Aया आप फतेहपुर ग ये ह( ?'' म(ने उससे पूछा।

''नहीं, कभी नहींग या?'' वह बोला। उसके लहजे म/ कुछ न था। न दःख
ु , न सुख, न uलािन,
न अवसाद।

''कभी नहींग ये?''

''हां, कभी नहींग या?'' वह िफर बोला।

''लेिकन वहांके बारे म/ जो आप बता रहे ह( वह ऐसा लग रहा है जैसे दे खा हआ


ु हो।''

''नहीं, म(ने वह सब नहींदे खा।''

''तो िफर?''

ू पर बैठ ग या। िचकन शायद पक चुका था। उसने ग ैस बंद कर दी। िबयर का
वह ःटल
एक और केन खोल िलया और बोला, ''कराची म/ दादी हमलोग . को जो कहािनयांसुनाया
करती थीं, वे फतेहपुर की होती थीं। रोज रात को हम दो बचे दादी के साथ फतेहपुर
पहं
ु च जाते थे। वहांग िलय. म/ घूमते थे। अम$द के बाग म/ ललग ुिदया अम$द खाते
थे...।''

वह बहत
ु दे र तक बोलता रहा और मुझे कई बात/ याद आती रहीं। मुझे 'साहब' याद आये
जो लंदन म/ तीस साल रहने के बाद अपने ग ांव वापस आये थे और ग ांव के ग िलयार. म/
लोट-पोटकर रोया करते थे। मुझे डा. अजीज याद आये, जो एक ग ीत के सहारे अपना
वतन तलाश करने सूरीनाम से इंिडया चले आये थे। मुझे िडबाई याद आया जो मेरी नस-
नस म/ बसा हआ
ु है ।

अग र आप लोग . को मेरी बात. पर यकीन न आ रहा हो तो म( ग वाही के तौर पर अपने


एक िमऽ ूयाग शुAल को आपके सामने खड़ा कर सकता हं
ू।

ूयाग शुAल िहंदी के ूिति‚त और स^मािनत सािहhयकार ह( । वे भी फतेहपुर के रहनेवाले


ह( । हम दोन. का बचपन एक ही िजले म/ बीता है । यही वजह है िक म( जब ूयाग जी को
ू तो मेरे िदल के कोने म/ एक खुशी की उमंग उठती है । ूयाग जी के साथ भी
दे खता हं
ऐसा ही होता होग ा।

ूयाग जी ने मुझे बताया है िक वह याऽाएँ बहत


ु करते ह( । इन छाऽाओंके दौरान िदHली-
ु ामी शे न. से भी आते-जाते ह( , जो फतेहपुर-जैसे छोटे
हावड़ा लाइन पर चलनेवाली ितग
ःटे शन पर नहींTकतीं। अब दे िखए, Aया अयाय है । महानग र, महानग र. से जुड़ रहे ह(
ू ग ये ह( ।
और छोटे शहर पीछे छट

बहरहाल, ूयाग जी ने मुझसे कई बार कहा है िक रात का चाहे जो टाइम हो, ग ाड़ी जब
फतेहपुर ःटे शन से ग ुजरती है तो उनकी आंख खुल जाती है । वह पूछते ह( िक ग ाड़ी िकस
ःटे शन से ग ुजर रही है तो बताया जाता है िक फतेहपुर से।

म(, जी कोई िव}ान नहींजो आपको Aय.? कैसे? िकसिलए? आिद-आिद सवाल. के जवाब दे
सकूँ। आप ःवयंअकलमंद ह( । जवाब खोज सकते ह( ।

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