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कहानी

पोटली
राकेश कुमार पाडे य


िबसमस की छिटयां करीब थीं, ऑिफस म कं!यूटर के सामने ःबीन पर बैठी म' अपने
बचे हये ु
ु पेिडं ग काम िनपटा रही थी, हर वष. की भांित इस बार की छिटय2 म भी म'ने
अपने मायके जाने का !लान िकया हआ
ु था। महानगर2 की साल भर की आ पाधापी और
भागमभाग की िदनचया. से मुि: पाने का जब कभी मुझे अवसर िमलता, मै सदै व अपनी
मां के घर म ही सुकुन तलाशने का ूयास करती। वैसे तो मां श>द ही सुकुन के पया.य
के ?प म पया.@ है इसे िकसी AयाBया अथवा िवशेषण2 की आ वँयकता नहीं होती। एक
औरत के िलये मायके का सुख और साथ म मां का सािGनHय िजतना सुख और सुकुन दे
पाता है , वह साल भर की जGनतनुमा िजGदगी म शायद कहीं भी नसीब नहीं होती। मां
के ममता भरे आ ंचल से िलपटे हये
ु चेहरे के धुध
ं ली तःवीर2 म िछपी मुःकुराहट म वह
चमक होती है जो साजन की बांह2 म आ िलंगनबI गोरी के तेज म कहीं से भी शायद ही
नजर नहीं आ ती हो ।वाःतव म साजन का !यार जहां कत.Aय2 और अिधकार2 के दोपाये
पर िटकी होती है वहीं मां का !यार िनँछल िनःःवाथ. और िकसी भी ूितदान की कKपना
से परे होता है । मां के !यार म जहां गंगा सी िनम.लता होती है वहीं सागर सी पूणत
. ा
भी। मुझे भी वह खुशनसीबी बस जKदी ही नसीब होने वाली थी, बिKक मेरे िलये तो
इसिलए भी यह सौभाMय का अवसर हआ
ु करता Nय2िक इससे मुझे मां के ःनेह ?पी इस
अOत
ु सPदय. यु: पुंप के साथ ही गांवनुमा एक छोटे से नगर के जीवन की सहजता भी
दोहरे उपहार के ?प म हर साल िमला करती ।

मेरा मायका भी पिSम बंगाल के एक छोटे से गांव म है िजसने अपनी फैलती हई



आ बादी के साथ यUिप आ ज छोटे से नगर का ?प ले िलया है , लेिकन लोग2 की सहज
जीवनशैली, सरल िदनचया. एवं गली मुहKल2 के बीच के मुहबोले िरँत2 की िमठास म वही
आ Wमीयता आ ज भी दे खने को िमलती है । महानगर2 की कृ िऽम जीवनशैली से दरू वहां
लोग2 के बीच का अपनापन तेजी से पिरवित.त होती सामािजक संरंचना से िकंिचत माऽ
भी आ ज भी ूभािवत नहीं हआ
ु है । गांव की उन हसीन वािदय2 म मेरी इठलाती और
इतराती जवानी बचपन बनकर जब कभी घूमते अथवा खेलते हये
ु थक जाती है तो आ ज
भी मुझे कभी िकसी पिरचय की आ वँयकता नहीं होती, जो िमला िजनसे और जो कुछ भी
िमला उनसे लेने म न कोई संकोच और न ही िझझक । सभी अपने ही होते ह' , कोई
काका तो कोई दादा तो कोई बुआ और मामा। न कहीं आ ने जाने का रोकटोक न िकसी
का भय अथवा डर। अGजाने भी राह चलते अगर िमल जाये तो अपने बात2 की शु?वात
ही बोन (बहनजी) से करते ह' , इस श>द म महानगर2 की भांित कोई कृ िऽमता अथवा
बनावटीपन नहीं होता। आ ज िजस तरह महानगर2 की पिरवित.त होती जीवनशैली के बीच
तमाम िरँते नाते िसफ. औपचािरकता बनकर रह गये ह' और कहीं कहीं तो िरँते नात2 की
आ ड़ म ही औरत2 के शोषण की कहानी अखबार2 के पGन2 को रं गकर लोग2 का चंद पल2
के िलये मनोरं जन करती ह2 वहीं गांव2 की सहज और िनँछल जीवनशैली मुझे अनायास
ही अपनी ओर आ किष.त करती है ।


इस बार की छिटटय2 म लंबे अवकाश पर जाने की तैयारी म म' अपना काम जKदी जKदी
समेट रही थी, ूोजेNट पर मेरा काम अभी भी अधूरा था, वहीं अपने सहकम^ साथी को
जहां एक ओर काम हे ड ओवर करने थे तो दसरी
ू ओर बचे हये
ु काम को िनपटाने की
जKदी भी थी, इसी बीच मुझे एक मेल ूा@ हआ
ु । वैसे तो वह मेल करने वाला मेरे िलये
अब भी अजनबी ही था, अजनबी इस िलहाज से िक मैने उसे कभी दे खा नहीं था और न
ही मै कभी उससे िमल पायी थी िफर भी उसे िपछले छः महीन2 से उसके श>द2 के _ारा
उसे बेहतर तरीके से जानने लगी थी। हम िकसी Aयि: से िमलकर भी उतना नहीं जान
पाते िजतना उसके िवचार2 के माHयम से उसे बड़े सहज तरीके से जान लेते ह' । उसे पऽ2
के _ारा मै िजतना जान पायी थी वह यही था िक वह एक छोटे से रा`य के छोटे से शहर
का रहने वाला िनहायत ही सaय इं सान था। अब उसका मेल मेरे िलये कोई नया नहीं था
वह तो मुझे रोज िमला करता, उसके हर मेल म एक अजीब सा अपनापन, गहरी िनकटता
और कुछ ना कुछ नया ज?र होता। उसे मुझे मेल करने की आ दत सी हो गयी थी, जब
कभी वह मुझे िकGही कारण2 से मेल न कर पाता तो उसकी लंबी चैड़ी Aयथाओं से दसरे

िदन का मेल भरा पड़ा होता। मै भी पहले तो इस तरह के मेल को सामाGय तौर पर लेती
पर अब मुझे ूितिदन उसका मेल पाने की आ दत सी हो गयी थी । अब तो जब कभी
उसका मेल मुझे न िमल पाता तो एक अजीब सा अधूरापन महसूस होता। अपने िलखे
हये
ु चंद खूबसूरत श>द2 के _ारा उस अजनबी ने भी मेरे हदय की गहराईय2 म थोडी सी
जगह बना ली थी।

म'ने उसे िपछले मेल म यह बताया था िक हम अब 15 िदन2 तक कोई पऽाचार नहीं कर


पायगे Nय2िक मेरे मायके म नेटवक. कनेिNटिवटी की समःया बनी रहती है और िफर म'
अपने लेपटॉप घर पर ही छोड़कर जा रही हंू । उसे 15 िदन2 का पऽ2 का िवयोग िबKकुल
भी मंजूर नहीं था सो आ ज वह मुझसे जी भरकर बात करना चाहता था, पर मेरे साथ
िववशता यह थी िक आ ज काम कुछ `यादा ही थे । लेिकन म' उसके दीवानेपन को अपने
काम के बोझ तले आ ज दबाना भी नहीं चाहती थी, वैसे तो ःवभाव से ही संकोची होने के
कारण वह हर पऽ म मुझसे िलखा करता िक मै आ पको िडःटब. तो नहीं कर रहा,
अWयिधक मेल िलखने अथवा थोड़ी सी भी मेरी नाराजगी महसूस करते ही उसका पूरा पऽ
cमा याचनाओं से भरा होता, सो म' आ ज उसे िकसी भी हाल म टोकना भी नहीं चाहती
थी । उसकी इस सरलता और सहजता ने ही तो मुझे इस कदर ूभािवत कर िदया था िक
धीरे -धीरे म' उसके नजदीक आ गयी थी और उस अजनबी की दोःती को हौले हौले मै
ःवीकार भी करने लगी थी वरना िजंदगी के हर एक पड़ाव म बहत2
ु से लगातार िमलने
पर भी हम उतने ूभािवत नहीं हो पाते िक िकसी को भी बड़ी सहजता से दोःत के ?प म
ःवीकार कर ल ।

उसने ई-मेल के _ारा भेजे अपने पऽ म िलखा - आ प मां के पास जा रही ह' , किहये मेरे
िलये Nया लायगी ?

म' उसका मेल पाकर थोड़ी दे र के िलये संकोच म पड़ गयी िक पता नहीं ये Nया लाने को
कह बैठेगा? वैसे म' जानती थी िक या तो वह मां के हाथ की बनी लeडू खाना चाहे गा या
िफर ऐसा ही कुछ छोटा मोटा उपहार। Nय2िक वह तो एक सरल इं सान था, उसकी
आ वँयकताएं जहां सीिमत थी वहीं उसके िनँछल और सरल ःवभाव से मै वािकफ हो
चुकी थी। िफर भी था तो वह अब भी मेरे िलये अजनबी ही, इसीिलए मै उससे धिनg पऽ
िमऽ होने के बाद भी वाःतव म दिरय2
ू को कुछ हद तक बनाये रखना चाहती थी ।

मैने उGहे तुरंत िलखा -आ प जो किहये लेते आ उं गी, पर शत. यह है िक उसे लेने के िलये
आ पको दे हली आ ना पड़े गा। मै इस शत. के _ारा उसे एक दायरे म बांधना चाहती थी,
Nय2िक म' जानती थी िक वह छोटे मोटे उपहार के िलये इतने ?पये खच. कर िदKली तो
आ येगा नहीं और यिद आ ने का भी ठान ले तो िफर दे खा जायेगा।

म' उसके मेल का बड़ी बेसॄी से इं तजार कर रही थी, मन म यह जानने की उWसुकता थी
िक आ िखर वह मां से Nया लेना चाहता है ? पल2 और लiह2 की लंबी ूतीcा के बाद
उसका मेल मुझे िमला, उस मेल को पढ़कर म' गदगद हो गयी, उसके श>द वैसे तो मेरी
अपेcा के अनु?प ही थे, लेिकन िफर भी हर मेल म मेरा वह आ राधक मेरी नजर2 म थोड़ा
उपर उठ जाता। उGहोने अपने मेल म िलखा - आ प लौटते हये
ु मां से मेरे िलये ढे र सारा
आ शीवा.द लाईयेगा और मां को मेरी ओर से सादर चरण ःपश. किरयेगा । मैने तुरंत
जवाब म िलखा और कहा -ओ.के.

मै उसके िवचार2 को पऽ2 म पढ़कर ूायः यह स2चा करती िक कैसे ह2गे उसके माता-
िपता, िजसने ऐसे बेटे को जGम िदया है , चाहे जो भी हो मुझे ऐसे दोःत िमलने पर
आ िखर गव. तो था।

म' अपना काम अब जKदी-जKदी िनपटाने लगी, अपने ूाजेNट पूरा करने की िदशा म बस
थोड़ा ही बढ़ पायी थी िक इसी बीच उसका एक दसरा
ू लंबा चैड़ा ई मेल मुझे िमला । वैसे
तो वह पऽ लंबी चैड़ी िहदायत2 से भरा हआ
ु था परं तु इसम कुछे क िनवेदन भी थे, िनवेदन
के नाम पर बस केवल यही था िक नये साल पर उसने मुझसे शुभकामनाएं ूा@ करने की
इmछा जािहर की थी, इसके अलावा बाकी सब कुछ िहदायत ही थी। उसकी इन लंबी चैड़ी
गुजािरश2 और िहदायत2 को पढ़कर एक ओर जहां म' काफी अचरज महसूस कर रही थी
वहीं cण भर के िलये गुःसा भी आ रहा था। मै वाःतव म यह नहीं समझ पा रही थी
िक यह सब िलखकर उसने मुझसे बहत
ु करीब होने का पिरचय िदया है या िफर मेरी
कािबिलयत का उसे तिनक भी अंदाजा ही नहीं ।

वैसे तो मेरे _ारा भेजे गये कई पऽ2 एवं जालघर2 म ूकािशत मेरे लंबे चैड़े ूोफाईल के
_ारा वह जान ही चुका था िक म' एक जानी मानी अंतरा.शीय कंपनी म साफटवेयर
इं जीिनयर के पद पर काय.रत ्हंू । यहां मेरा एक ःवतंऽ अिःतWव है जहां िविभGन
िजiमेदािरय2 को िनभाते हये
ु मेरी ूबंध cमता पर मेरे सीिनयस. को भी तिनक भी कभी
संदेह नहीं हआ
ु , िफर शे न म बरती जाने वाली तमाम तरह की िहदायत2 िजसम याऽा के
दौरान ठड से बचने, सेहत का Bयाल रखने एवं राःते की अनावँयक चीज खरीद कर ना
खाने की बात कहकर आ िखर वह Nया सािबत करना चाहता है , मै उसी उधेड़बुन म पड़ी
हई
ु थी । म' आ ज से 16 साल पहले अपना गांव छोड़कर िदKली पढ़ने आ यी थी तब से
लेकर आ ज तक हमेशा अकेले ही सफर करती रही परं तु आ ज तक िकसी ने इस अजनबी
की भांित रोका और टोका नहीं, म' उसके इस पऽ को लेकर इसिलये भी cण भर को
आ हत हई
ु थी िक वह मुझे अथवा मेरे Aयि:Wव को कहीं अडर इःटीमेट तो नहीं कर
रहा, पर मन म Bयाल आ या िक िजसने मुझे ही एक आ दश. Aयि:Wव का संपूण. ?प मान
िलया हो उसके मन म भला ऐसे िवचार कैसे आ सकते ह' ? यह सब तो वाःतव म उसके
!यार, अपनापन और उसके िनँछल Aयि:Wव की पहचान थी और िफर म' उसे उसी ?प
म लेकर मंद मंद मुःकुरा रही थी। म' खयाल2 म डू बी हई
ु सोच रही थी िक यह अजनबी
िजससे न मेरा कोई वाःता है न दरू दरू तक कोई िरँते और नाते िफर भी मेरे जरा सी
दद. पर उसका उफ, मुझे मेरा ही खयाल रखने को जैसे मजबूर सा कर दे ती थी । उसे
तिनक भी गंवारा नहीं था िक कभी भी मुझे cणमाऽ को कोई भी कp हो ।

मैने उसके पऽ के जवाब म िलखा- आ प िचंता ना कर म' आ पकी सभी िहदायत2 का पूरा
Hयान रखूग
ं ी और आ िखर म AयंMयाWमक लहजे म यह भी िलखना ना भूली िक - आ पका
पऽ पढ़कर आ ज ऐसा लगा जैसे म' शे न म पहली बार याऽा कर रही हंू ।

अगली सुबह भोर म मेरी शे न थी, शे न म बैठते हये


ु म' उसे याद कर रही थी, उसकी
िहदायत2 के अनु?प मैने घर से ही अपने और बेटे के िलये पूड़ी-स>जी और गाजर का
हलवा बनाकर रख ली थी तािक राःते म कोई खाने का सामान खरीदना ना पड़े । सुबह-
सुबह जब कभी राःते म कान खुल जाती म' जKदी से गम. कपड़े से अपने और बेटे का
कान ढकती और वह अजनबी मुझे अनायास ही याद हो आ ता।

शे न धीरे धीरे आ गे बढ़ने लगी और म' अपने मायके की उन हसीन वािदय2 और गिलय2
म खो गयी जहां मेरा बचपन बीता था और जहां की िमटी की सPधी खुँबू ने मेरे अंदर
दसर2
ू को भी महकाने की कािबिलयत पैदा की थी। बािरश के िदन2 म कागज की कँती
बना गिलय2 म तैराने का वह बालहठ, संगी सािथय2 की िठठोिलयां और ःकूल के टीचरजी
की वह डांट रह-रहकर याद आ रही थी । हम ःकूल के जमाने म खूब मःती िकया करते,
कभी-कभी तो टीचरजी की डांट के डर से ही हम एकाध पीिरयड िमस भी कर िदया करते,
खासकर गिणत का पीिरयड तो ऐसा होता जहां हमारा धैय. टीचरजी की डांट के आ गे
जवाब दे जाता। बस मन उGही िवचार2 म खोया हआ
ु था और कब मेरा वह गांव नजदीक
आ गया मुझे पता ही न चला। म'ने अपने बेटे को नींद से जगाया और अपना सामान
समेटने लगी ।

!लेटफाम. पर इं तजार म खड़ी हई


ु मेरी मां मुझे दरू से िदखायी दे रही थी, म' !लेटफाम. से
उतर ही रही थी िक मेरी मां दौड़ती हई
ु मेरे पास आ यी और मेरे कुछ सामान को हाथ2 म
लेते हये
ु कहा-ला बेटा, मुझे दे , थक गयी होगी ।

मैने मां के चरण ःपश. करते हये


ु कहा - थकी तो ज?र हंू मां, पर इतना भी नहीं िक ये
सामान ना उठा सकूं, और िफर घर जाकर खूब आ राम क?ंगी ना आ प Nय2 िचंता करती
हो?

पर मां भला कहां मानने वाली थी, उGहोने मेरे एक बेग को हाथ2 से उठाते हये
ु िरNशे वाले
को बुलाया और हम िरNशे म बैठकर घर की ओर जाने लगे । राःते म िमलने वाले सभी
पहचान के होते, कोई हाथ िहलाकर अिभवादन करता तो कोई जोर से िचKलाते हये
ु कहती
- अरे बड़ी िदन2 बाद आ यी रे अ`जू ! कैसी है ? तेरी नौकरी कैसी चल रही है ? म' भी
ु कहती, बिढ़या हंू , मौसी दे खो ना िकतनी मोटी हो गयी हंू ।
खुशी से इठलाते हये

हां- हां, खूब कमाओं बेटी जुग जुग िजयो ।

िकसी का आ शीवा.द, िकसी की शुभकामनाएं, िकसी की नसीहत यह सब हदय से और वह


भी मुrत म केवल गांव2 म ही िमलता है और वह सब बटोरती हई
ु म' घर को जा रही
थी।

घर जाकर मां के हाथ2 की बनी हई


ु गरम-गरम पकौड़े खायी, िजसकी मुझे बरस2 से
ूतीcा थी और िफर अपने 27 घटे की लंबी थकान िमटाने पैर फैलाकर सो गयी । अभी
नींद पड़ने को ही थे िक मुझे वह अजनबी िफर से याद आ गया, और म' नींद से अचानक
जाग उठी। मैने मां के पैर को दोबारा ःपश. करते हये
ु उGहे ूणाम िकया ।

मां मेरी इस हरकत को दखकर अजरज से कह उठी- Nया हआ


ु तूने तो !लेटफाम. पर ही
...

मैने कहा - हां मां, यह ूणाम मेरी ओर से नहीं, एक अजनबी दोःत की तरफ से था,
िजसने आ पको ूणाम करने को कहा था और आ पसे अपने िलये ढे र सारा आ शीवा.द मांगा
है , !लीज, उसे आ शीवा.द दीजीयेगा मां ।
मां ने कहा - कौन दोःत है ?

अरे मां, उसकी कहानी सुनोगे तो आ पको भी बड़ा मजा आ येगा, है एक पागल है , िपछले
पांच महीन2 से मुझे लगातार मेरे मेल आ ई. डी. पर रोज पऽ िलखता है , अब उससे दोःती
हो गयी है । पहले तो म' भी उससे अजनबी समझकर डरती थी पर अब उसके घर के सभी
लोग मुझे जानते ह' और म' भी उसे अब जानने लगी हंू । जब मैने बताया िक म' अपने
मायके जा रही हंू तो उसने आ पसे आ शीवा.द लाने को कहा है ।

ठीक है बेटा, पर अजनबी लोग2 से `यादा घिनgता अmछी नहीं, वैसे तो तू समझदार है ।

अरे मां िचंता मत करो, वह बहत


ु अmछा लड़का है , वह भी उसी कंपनी म काम करता है
जहां से आ प िरटायर हई
ु ह' ।वह एक िनहायत ही सaय इं सान है , उसे म' अब अmछे से
जान गयी हंू । उस पर मुझे भरोसा है , वह संःकािरत पिरवार का एक संःकारवान लड़का
है । उसके हर श>द2 म गजब की शालीनता होती ह' मां, आ प भी जब उसके पऽ2 को पढ़े गी
तो कह उठगी - वाह Nया बात है ?

मां आ पको एक मजेदार बात पता, िक जब कभी वह इस तरह का खत िलखता है तो


मुझे गुःसा भी आ ता है पर cण भर म जब वह खुद को मेरे भ: और आ राधक के ?प
म रखकर मेरी पूजा करने लगता है तो म' अपना सारा गुःसा भूल जाती हंू और बmचे की
तरह उसे माफ कर दे ती हंू । मां सच कहंू तो मुझे उसके और िकसी बmचे के ःवभाव की
सहजता म कुछ `यादा अंतर िदखायी नहीं दे ता । उसके खत के कई ूसंग बड़े ूेरणादायी
होते ह' मां, अभी िपछले िदन2 उGहोने ौीमOगवतगीता का एक ूसंग सुनाया था, बड़ा
?िचकर था। _ापर युग म यदवं
ु िशय2 के पतन से जुड़ी उस कथा को वत.मान ूसंग से
जोड़ने की उसकी कKपना से म' बहत
ु ूभािवत हई
ु थी, कभी उसकी कहानी आ पको भी
सुनाउं गी, मां ।

अmछा मां, बहत


ु िदन हये
ु अपने पुराने दोःत2 से नहीं िमल पायी हंू , लगता है साल2 हो
गये कुछ से तो िमले हये
ु , आ प कह रही थी आ शा आ यी हई
ु है , सुना है बंगलौर म टीचर
हो गयी है आ जकल । मां आ प बेटे को थोड़ा दे ख ल तो म' उससे िमल आ उं , बड़ी इmछा
है ।

15 िदन2 की लंबी छिटयां ु
कब गुजर गयी, पता ही न लगा, इस बार की छिटय2 म मेरी
ूायः उन सभी से मुलाकात हो गयी थी, िजनसे अपेcाएं लेकर म' आ यी थी। मां की
ममता, पड़ोिसय2 का ःनेह और गांव के बड़े बुजुगt के आ शीवा.द से मन तृ@ हो चुका था ।
अगली सुबह मेरी िदKली वापसी का िरजवuशन था। म'ने अपना सारा सामान पेक कर
िलया था। मां ने पूछा - बेटा कल तुम जा रहे हो, Nया- Nया ले जाना चाहोगे? तुiहारे
िलये मैने अपने हाथ2 से पापड़ बनाये ह' , कुछ बिड़यां है , दध
ू और दही तो म' िड>बे म ही
रख दे रही हंू । लेिकन दे खना, कहीं खराब ना हो ।

अरे नहीं मां ! मुझे कुछ नहीं चािहये, सब कुछ तो आ जकल बाजार2 म िमल जाता है
आ प बेकार परे शान न ह2 ।

अरे बेटा - घर और बाहर की चीज2 म थोड़ा अंतर तो होता है ना !

ठीक है मां िफर भी !

अचानक मुझे वह अजनबी दोःत िफर से याद हो आ या । मैने मां से कहा- अरे मां उस
अजनबी दोःत के िलये तो कुछ रख दो, वह मेरे जाते ही मुझसे पूछेगा िक म' मां के पास
से उसके िलये Nया लायी, तो Nया जवाब दं ग
ू ी ?

तो तू ही बता उसके िलये Nया बनाउं बेटा, सब तो खराब हो जायेगा, िफर उसके पास
कैसे िभजवायेगी आ िखर तू ?

मां अरे वो आ धा पागल है , चला आ येगा, मकर संबाित का पव. नजदीक है उसके िलये
अपने हाथ2 से ितल के लeडू बना दो ना, उसे म' पास.ल से भेज दं ग
ू ी, पव. के आ स पास
उसे िमल भी जायेगा।

ठीक है , म' रात को बना कर रख दं ग


ू ी ।
मां ने रात को दो ितल के बड़-बड़े लeडू बनाये और उसे एक पोटली नुमा थैली म भरते
ु कहा - ये रख अपने दोःत को उसे दे दे ना,इस थैली म लeडू के साथ मेरा आ शीवा.द
हये
भी है ।

बड़ी सुबह मेरी शे न थी, मैने सारे सामान सेमेटे और घर को अलिवदा कहा । अब िफर से
साल भर के िलये आ ना नहीं होगा, यह म' जानती थी, मैने अौुपूण. नेऽ2 से मां से िवदाई
ली। मां का िवयोग बड़ा कp दे ता है , यही एक ऐसा नाता होता है जो तमाम िरँत2 और
नात2 की अपिवऽता एवं ःवाथ. के बीच भी अपने Wयाग और समप.ण के िलये िकसी भी
इं सान को सहष. शीष झुकाने मजबूर कर दे ता है । इसकी ममता म वो गजब की ताकत
होती है जो जीवन के किठन संघषv म ढाल बनकर खड़ी हो जाती है । मां की बचपन म
िसखायी गयी उन नसीहत2 के जिरये ही तो भारतीय wी आ ज भी अपने अनचाहे
पारं पिरक िरँते नात2 को तमाम मतभेद2 के बाद भी बड़ी संजीदगी से बखूबी िनभाती है
और ढे र2 कp2 के बीच भी कभी उफ नहीं करती।

इसे मां का वह अपूव. ःनेह Wयाग और संःकार2 की चरम पिरणित का ही एक ?प कह


िक जब कोई wी बहू बनकर िकसी पु?ष के चैखट पर कदम रखती है तो वह अपने पित
के सारे संःकार2 को िबना िकसी िहचक अथवा िवरोध के अंगीकार कर लेती है , परं तु पु?ष
का दं भ उसकी उन अmछाईय2 को भी अपनाने से सौ बार िहचकती है जो वह अपने घर
से सुसंःकार2 के ?प म सहे ज कर लाती है ।


x◌ेन छटने लगी, मां के िहलते हये
ु िवदाई के हाथ2 को म' दरू तक दे खते हये
ु ौIा से
नमन करती रही, मेरा बेटा भी इस बार नानी के !यार को पाकर बेहद खुश था, वह भी
हाथ िहला-िहलाकर दरू तक अपने नGहे -नGहे हाथ2 से मां का अिभवादन करता रहा ।

म' सुबह की ठडी-ठडी हवा से बचने के िलये अपने बेटे के साथ कँमीरी शाल म अपना
चांद सा चेहरा िछपा ओढ़कर दबक
ु गयी। इस बीच मुझे गहरी नींद भी आ गयी, नींद से
जागी तो अचानक उस दोःत के िलये मां के हाथ2 रखी पोटली की याद आ यी । मैने उस
पोटली को बड़ी िहफाजत से रखा था, सो िफर से उसके बारे म आ zःत हो जाना चाहती
ू , इधर-उधर कहीं नहीं िमला ।
थी। म'ने एक बार िफर से अपना पस. टटोली, बेग म ढढ़ा
अब तो म' Aयिथत होकर उस पोटली के बारे म याद करने लगी िक आ िखर कहां रखा
होगा मैने उस पोटली को, Nय2िक घर से तो मै उसे लेकर चली थी, अचानक याद आ या
िक िक शे न की ूतीcा म सीट पर बैठे हये
ु वाटर बाटल िनकालते समय वह पोटली
िनकालकर रखी थी िफर उसे अंदर डालना भूल गयी ।

मैने आ नन फानन म मां को फोन िकया और कहा - मां मुझे लगता है िक म' वह पोटली
!लेटफाम. म उसी सीट पर ही भूल गयी हंू जहां बैठे हये
ु हम शे न की ूतीcा कर रहे थे ।

मां उस अजनबी से मेरे गहरे लगाव और आ Wमीयता को भलीभांित जान चुकी थी, अतः
cण भर भी दे र िकये िबना वह ःटे शन के िलये िनकल पड़ी और उGहोने घर से िनकलते
हये
ु मुझे फोन पर कहा िक यिद वह पोटली मुझे िमल जाती है तो म' ःटे शन से ही
पास.ल कर दं ग
ू ी ।

लेिकन दभा.
ु Mय से वह पोटली मां को न िमल सकी, वह अपने ःथान से गायब थी। मां ने
इधर उधर बहत ू पर अंततः थक हारकर मुझे उGहोने फोन िकया - बेटा शायद कोई
ु ढढ़ा
उसे उठाकर ले गया।

मां की बात2 को सुनकर जैसे मेरी नींद ही गायब हो गयी, मुझे बड़ा दख
ु हो रहा था, मन
इस बात से Aयिथत था िक आ िखर म' उस अजनबी दोःत को Nया जवाब दं ग
ू ी? यिद उस
पोटली के बदले मेरा कोई सामान गुम हो जाता तो शायद मुझे उतना दख
ु नहीं होता,
लेिकन आ िखर कुछ िकया भी तो नहीं जा सकता था। मन म कई तरह के िवचार आ रहे
थे, वह मेरे आ िफस `वाइन करते ही पूछेगा िक मेरे िलये Nया लाये तो मेरा उ{र Nया
होगा? मैने उस पोटली म ितल के लeडू के साथ अपना एक नया िविजिटं ग काड. भी डाला
था िजसम नये ऑिफस के पते के साथ मेरे पस.नल फोन नं. का भी उKलेख था और इस
तरह उस पोटली के खो जाने से मेरे िविजिटं ग काड. के अनावँयक लोग2 के हाथ2 पहच

जाने का एक अGजाना सा भय भी सता रहा था ।

दखी
ु मन से मै िदKली के !लेटफाम. पर उतरी और घर के िलये ूःथान कर गयी। दोपहर
मुझे ऑिफस `वाइन करनी थी, मै जैसे ही ऑिफस पहंु ची, सबसे पहले अपना मेल अकाउं ट
चेक िकया तो जैसा िक मुझे अंदेशा था मेरे ःवागत म उसके मेल मेरी ूतीcा कर रहे थे
।उसने अपने ई-मेल म मेरे ःवागत के साथ वही सवाल िकये थे िजसकी आ शंका से म'
परे शान हये
ु जा रही थी ।

म' सवाल2 के जवाब तो पहले ही तैयार कर चुकी थी, न चाहते हये


ु भी उसके नाजुक से

िदल को टटने से बचाने के िलये झूठ का सहारा मुझे आ िखर लेना ही था, इसके अलावा
म' सारे िवकKप2 को दरू-दरू तक पहले ही तलाश कर चुकी थी ।

म' बचपन से िकसी िसIांत2 म बंधने की बजाय Aयवहािरक िवकKप2 को `यादा तरजीह
दे ती रही हंू । म' सदा से उस सच से परहे ज करती रही, जो अनावँयक िकसी की सहज
जीवनचया. म बाधक बन जाये या िकसी का बेवजह हदय तोड़ दे । म' तो उस झूठ को भी
सच का ही एक ?प मानती रही हंू जो िकसी के पथ की िदशा कुमाग. से सुमाग. की ओर
बदल दे या िफर िकसी को पितत अथवा िदMॅिमत होने से बचा ले ।

म' उसे िकसी भी कीमत पर तोड़ना नहीं चाहती थी, म' जानती थी िक वह मुझे बहत
ु !यार
करता है , शायद दीवानगी की हद तक, सiमान भी इस कदर करता है मानो िनँछल भि:
का एक जीता जागता ःव?प हो । मेरे वाःतिवक िःथित से अवगत कराने पर भी शायद
उसे यकीन नहीं होता अतः मैने उसे िलखा - मां ने तुiहारे िलये आ शीवा.द ःव?प ितल के
लeडू भेजी ह' , अब तुम बताओ िक Nया उसे लेने िदKली आ ओगे या िफर पास.ल कर दं ,ू
पर पास.ल तुम तक पहंु चने म िकतने िदन लगगे, कहना मुिँकल है , हो सकता है तुम तक
पहचते
ु हये
ु यह खराब भी हो जाये और जहां तक रही बात आ शीवा.द की, तो वह तो मां ने
कहा ही ह' िक उनका आ शीवा.द सदै व तुiहारे साथ है ।

ऐसा िलखकर म'ने सारे िवकKप2 का हल, एक साथ उसे सुझाने का ूयास िकया था और
साथ ही संकेत2 म यह कहने का भी ूयास की थी िक िजस चीज की वाःतव म उसे
अिभलाषा थी, वह तो उसे िमल ही गया और बाकी सब के िलये अनावँयक परे शान होने
की उसे आ वँयकता ही नहीं है । मुझे यकीन था िक बात उसके समझ म आ येगी भी।
उसने ूWयु{र म िलखा - शुिबया ।

दसरे
ू िदन म' दे र से ऑिफस पहंु ची थी, शाम के 5 बज रहे थे िक अचानक उसका फोन
आ या, उसने जKदबाजी म कहा - म' वह मां के हाथ2 का बना ितल के लeडू लेने िदKली
आ या हआ
ु हंू , बताईये मुझे कहां उतरना होगा ।

cण भर को तो उसके इन अजीबगरीब हरकत2 को दे खकर म' आ Sय. म पड़ गयी, सोचने


लगी िक आ िखर यह उसकी कैसी दीवानगी है ? Nया सचमुच यह पागल है अथवा जुनुन
का पNका? Nया इसकी नजर म भावनाओं की इतनी कीमत है जो मां के इस ितल के
लeडू को लेने हजार2 ?पये खच. कर िदKली चला आ या, Nया मेरे साथ ही मां की भी वह
इतनी ही कि करता है , मेरी मां का आ शीवा.द िजसकी नजर2 म अनमोल हो उसे दे खने की
उWकंठा मुझे भी होने लगी थी।

मैने उGहे अपने ऑिफस का लोकेशन बताते हये


ु कहा - तुम ःटे शन से टे Nसी पकड़कर 2
िकमी दरू इं िदरा गांधी नगर चले आ ओ और वहां शाwी िबिKडं ग म सातव माले पर मेरा
ऑिफस है , मेरी कंपनी का नाम िकसी से भी पूछ लेना, वहां गाड. तुiहे मुझ तक ले
आ येगा ।

मैने उसके आ ने के पहले ही बाजार से दो ितल के लeडू मंगवाये और उसे िलफाफे म पेक
कर िदया, उसे म' िकसी कीमत पर तोड़ना नहीं चाहती थी, अब तो झूठ ही एक माऽ
सहारा बचा था और झूठ को सच का ?प दे ना सचमुच बहत
ु किठन होता है पर कहते ह'
िक िववशता जो न कराये वो शायद कम है । उस िलफाफे को अपने डे ःक पर रख, पूरी
तरह आ zःत हो म' उसकी ूतीcा करने लगी। दो घटे बीत गये उसका कुछ अता-पता
नहीं था जबिक िजस ःथान से उसने मुझे फोन िकया था, वह माऽ आ धे घटे का ही
राःता था, मैने उसके सेलफोन पर फोन करना चाहा लेिकन वह ऑफ बताने लगा । म' तो
उसकी राह दे खते उससे िमलने की उWसुकता म पल2 को िगन रही थी । तभी अचानक
मुझे एक फोन आ या - है लो आ प िमसेज अंजू िसंह बोल रही ह' ?

जी हां - मैने कहा ।

उGहोने अपना पिरचय दे ते हये


ु कहा - म' अंजूमन हॉिः!टल से डॉ. मेहता बोल रहा हंू ,
Nया आ प िम. रिव शमा. को जानते ह' , उनका एNसीडट हो गया है , उनकी हालत ठीक नहीं
है , उGहोने अI. चेतन अवःथा म आ पका फोन नं. िदया है , ऐसा कहते हये
ु उGहोने अपना
फोन काट िदया।
इतना सुनना था िक मेरे पैरो तले मान2 जमीन िखसक गयी, म'ने अपनी गाड़ी पकड़ी और
ु हॉिःपटल की ओर पहंु ची । हॉिःपटल म उसकी हालत िचंताजनक थी। इस
भागती हई
शहर म मेरे अलावा उसका कोई था भी नहीं, मैने डॉNटर से उसका पूरा हालचाल जानना
चाहा और उGहे आ zःत कर दी िक जो भी ज?री जांच ह2 वे सब िकये जाय। मेरे आ ंसू
आ ंख2 से छलक रहे थे, मेरे चारो ओर अंधेरा था। मुझे कुछ भी समझ म नहीं आ रहा था
िक आ िखर म' उसके िलये Nया क?ं? उसके घर फोन कर उनके घर वाल2 को कैसे बताउं ?
मुझे मालूम था िक वह अपने घर का इकलौता िचराग है , अपने मां बाप की आ ंख2 का
तारा है , उसके बारे म ऐसा सुनते हये
ु उसकी प~ी और उसके मां- बाप मर जाये◌ेगे । मै
Nया जवाब दं ग
ू ी उGहे ? मेरा कहीं कोई दोष न होते हये
ु भी Aयिथत थी। भगवान से बस
उसके शीय ःवःथ होने की कामना कर रही थी ।

मुझे फफक कर रोता दे ख पास खड़े एक Aयि: ने मुझसे पूछा - मेडम, Nया यह आ पका
िरँतेदार है ?

मैने कुछ बोलने की बजाय बस रोते हये


ु ःवीकारोि: म िसर िहला दी।

उसने अपराध बोध से मिसत मेरे पास खड़ा हो घटना का िववरण बताते हये
ु कहने लगा
- मेडम, यकीन मािनये मेरी इसम कोई गलती नहीं है , म' तो बाईक से घीमी रफतार म
जा रहा था िक ये आ दमी मुझसे हKका सा धNका खा गया और बगल से गुजरती >लू
लाईन बस से टकरा गया । मेडम... म' इसके इलाज का खच. उठाने को भी तैयार हंू , पर
बेवजह थाने का चNकर... । मेडम म' गािजयाबाद की एक कंपनी म काम करता हंू , म' तो
बस इस सामान को पहंु चाने इं िदरा नगर जा रहा था वहां एक मेडम का सामान पिSम

बंगाल म मेरे घर के नजदीक बाराकर ःटे शन पर छटा हआ
ु मुझे िमला गया मैने सोचा
िक म' िदKली तो जा ही रहा हंू , पहचा
ु दं ग
ू ा ।

म' अब तक िकसी अGजाने भय से आ शंिकत खामोश सी खड़ी थी, लेिकन जैसे ही उसने
बाराकर ःटे शन का नाम िलया, म' कौतुहल से उसकी ओर दे खने लगी और िफर अचानक
मेरी नजर उसके हाथ पर रखे उस पोटली की ओर पड़ गयी। मैने उसके हाथ2 से उस
पोटली को छीनते हये
ु कहा - यह तो मेरी पोटली है , कहां िमली यह आ पको ।
मेडम Nया यह आ पकी पोटली है ?

हां हां... यह मेरी ही है , म' इसे ःटे शन पर भूल आ यी थी, भाई साहब आ पका लाख-लाख
शुिबया ! यह बहत
ु कीमती पोटली है , िजसे पाने के िलये ही यह आ दमी जान की बाजी
लगाकर यहां तक आ या है ।मैने पोटली को खोलकर दे खा तो उसम मेरा वह खत उन
लeडु ओं के बीच `य2 का Wय2 पड़ा हआ
ु था और मेरे िविजिटं ग काड. उस युवक के हाथ2
म थे । म' उस पोटली को िफर से पाकर बेहद खुश थी, और इस बात पर संतोष Aय:
कर रही थी िक मुझे उस पोटली के िलये अब झूठ नहीं बोलना पड़े गा ।

म', दे र रात तक उसके िबःतर के पास बैठी उसका हाल चाल लेते उसके िसर को सहला
रही थी । उसके िसर म गंभीर च2ट आ यी थी, काफी खून बाहर िरस चुका था, सो अभी भी
बेहोशी से वह उबर नहीं पाया था। म' उसके होश म आ ने की ूतीcा कर रही थी । रािऽ
के 12 बजे उसने अपनी आ ंख खोली, वह अपने पास बैठे हये
ु दे ख मुझे पहचान गया और
पागल2 की भांित अपनी खुशी का इजहार करने लगा, यUिप वह ःवयं को अस: महसूस
कर रहा था, िफर भी अपनी आ ंख2 और ह2ठ2 की मुःकुराहट से िजतना अपनी खुशी का
बयां कर सकता था, सब कुछ वह कर रहा था । उसके चेहरे के भाव2 म वही दीवानगी थी
जो मुझे उसके हरे क पऽ2 म िदखायी िदया करती।

उसने दद. के बीच कराहते हये


ु कहा - मां ने Nया भेजा मेरे िलये, मां का वह ...

मैने बहते हये


ु अौुधारा के बीच उस पोटली की ओर इशारा करते हये
ु कहा - ये रखी है
मैने, मां ने तुiहारे िलये ितल के लeडू भेजे ह' , तुम ठीक हो जाओ, िफर हम साथ बैठकर
खायगे ।

उसने इशारे से उस पोटली को मांगा और मैने बड़ी सहजता से उसे दे भी िदया, उस


पोटली को सीने से लगाते हये
ु इशारे म मुझसे कहने लगा-एक लeडू खा लूं ।

मैने ःनेह भरी डांट से उसके गाल2 म हKकी चपत लगाते हये
ु कहा - नहीं, िबKकुल नहीं,
डॉNटर साब डाटगे, तुम ठीक हो जाओ, िफर हम ढे र सारे लeडू खायगे । म' तुiहे खुद मां
के पास ले चलूंगी, बस ।

वह मुःकुराकर मेरी ओर िनहारने लगा । अब वह कभी पलक2 को बंद करता तो कभी


मुझे जी भरकर िनहारता। म' भी उसे अपलक दे ख रही थी, आ ज उसकी दीवानगी को
सामने बैठ म' भी अंतम.न की गहराईय2 तक महसूस करना चाह रही थी।

रािऽ के 2 बज रहे थे, अचानक उसकी हालत िबगड़ने लगी, मै डॉNटर को आ वाज दे ने के
िलये जैसे ही लपकी, उसने मेरा हाथ पकड़ िलया और कहने लगा - अंजू जी मुझे लगता
है , म' शायद नहीं बच पाउं गा । आ प मेरे मiमी पापा और प~ी से किहयेगा िक वे िचंता
न कर, मेरी आ यु भगवान ने शायद इतने ही िदन2 तक की िलखी थी । अंजू जी, एक बार
घर जाकर मेरी मां को दे ख लीिजयेगा वो मेरे िबना नहीं रह सकती, उनसे किहयेगा वे
अफसोस ना कर, मै अगला जGम लेकर उGही के घर आ उं गा। वह मेरे दोनो हाथ बड़े जोर
से पकड़ा हआ
ु था और एक सांस म बोले जा रहा था, कहने लगा- अंजू जी आ प अगले
जGम म िफर से मुझे िमलगी ना।

मेरे आ ंसू ?कने का नाम नहीं ले रहे थे, मैने रोते हये
ु उससे कहा - नहीं रिव !लीज ऐसा
मत कहो, आ पको कुछ नहीं होगा । आ प ही कहा करते थे ना, िक आ पने िकसी का कुछ
नहीं िबगाड़ा, इसिलए आ पका कभी बुरा नहीं होगा, िफर ऐसी बात Nय2 कर रहे हो ?

हां, लेिकन बुरा कहां? मेरी मौत भी तो आ पके ... उसे बोलने म किठनाई हो रही थी, िफर
भी वह बोलता रहा । मुझे शायद ऐसी ही मौत का इं तजार था, एक बार घर के सभी
लोग2 को दे खने की इmछा ज?र थी, पर लगता है ... अंजू जी आ प मुझे िफर से िमलगी
ना, ऐसा कहते हये
ु उसे एक लंबी िहचकी आ यी और उसका अभी बोलता, मुःकुराता चेहरा
िनंूाण हो गया। म' अवाक् हो अौु के सागर म डू बी फफकती हई
ु उसे अपलक िनहारती
रही, और इसी बीच वे ितल के लeडू मेरे कदम2 म िगरकर िबखर गये ।
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राकेश कुमार पाडे य


िहर डोलोमाईट माइं स

िभलाई इःपात संयंऽ

फोन - 097704-07139