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1

विपरीत प्रत्यङ्गिरा-विधानम्
एिम्
विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्रम्
भाषा टीकोपेतम्
।।सम्पादक।।
भििवत चरणारविन्द मधुप
डा.जिदीश नारायण नायक ''सनाढ्य''

2

।। श्री िणेशाय नमः ।।

ध्यानम

खिं कपालं डमरुम् वत्रशूलं सम्बिभ्रतीम् चन्रकलाितंसा ।
वपिोर्धिवकेशोऽससत भीमदंष्ट्रा भूयाद् विभूत्यै मम भरकाली ।।

3

खड्ग ,कपाल, डमरू तथा वत्रशूल को धारण करने िाली देिी
भरकाली, जजनके मस्तक में चंरकला सुशोभभत हैं, जजनके केश पीले
एिम् ऊपर को उठे हुए हैं तथा जजनके दााँत िडे भयङ्कर एिम् अससत
िणव के हैं, हमारा कल्याण करें ।

4

विपरीत प्रत्यङ्गिरा - स्तोत्र विधानम्
(मातृका सम्पुवटतम्)
विगनयोि: --ॐ अस्य श्री विपरीत-प्रत्यङ्गिरा मंत्रस्य भैरि ऋवष: अनुष्ठुप
छं द:श्री विपरीत प्रत्यङ्गिरा देिता ममाऽभीष्ठ ससध्यथेव जपे पाठे च विगनयोि:।

दावहने हाथ में जल ले कर, 'ॐ अस्य विपरीत प्रत्यङ्गिरा मंत्रस्य' से
'जपे पाठे विगनयोि:' तक मंत्र को पढ़ कर हाथ का जल भूभम या
वकसी पात्र में छोडें ।अथिााँ केिल मंत्र का पाठ करें

5

।।करन्यास:।।
"ॐ ऐं अिुष्ठाभ्याम् नम: ।"

से दोनो अंिूठे का स्पषव करें ।

" ॐ ह्ीं तजवनी भ्याम् नम:।" से तजवनी अंिुली का स्पषव करें ।
"ॐ श्रीं मध्यमा म्भ्यम् नम:।" से मध्यमा अंिल
ु ी का स्पषव करें ।
" ॐ प्रत्यङ्गिरे अनाभमकाभ्याम्

नम:।" से अनाभमका अंिल
ु ी का स्पषव करें ।

" ॐ मां रक्ष रक्ष कगनवष्ठकाभ्याम् नम:।"

से कगनवष्ठका अंिल
ु ी का स्पषव करें ।

" ॐ मम् शत्रून भञ्जय भञ्जय करतलकरपृष्ठाभ्याम् नम:।" से दोनो हाथों की
हथेललयों एिम् उनके पृष्ठ भािों का स्पषव करें ।
।।हृदयाङ्गद न्यास: ।।
" ॐ ऐं हृदयाय नम:।" से हृदय का स्पषव करें ।
" ॐ ह्ीं भशरसे स्वाहा ।" से ससर का स्पषव करें ।
" ॐ श्रीं भशखायै िषट् ।" से भशखा का स्पषव करें ।
" ॐ प्रत्यङ्गिरे किचाय हुम् ।" से दोनों हाथों की भुजाओं का स्पषव करें ।

6

" ॐ मां रक्ष रक्ष नेत्रत्रयाय िौषट् ।" से दोनों नेत्रों का स्पषव करें ।
" ॐ मम् शत्रून मञ्जय

भञ्जय अस्राय फट् ।"

को पढ़कर दावहने हाथ की

तजवनी और मध्यमा अंिुली से िााँयें हाथ से ताली िजा देिे ।

।।ङ्गदग्िन्ध:।।
" ॐ भूभवि
ु :स्व:" इवत ङ्गदग्िन्ध: मंत्र पढ़ कर सभी ङ्गदशाओं में
चुटकी िजायें ।

।।जप मंत्र:।।
।। ॐ ऐं ह्ीं श्रीं प्रत्यङ्गिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून भञ्जय
भञ्जय फे हाँ फट् स्वाहा ।।
अष्ठोत्तरशतं चाऽस्य

जपं चैि प्रकीवतवतम् ।

ऋवषस्तु भैरिो नाम छं दोऽनुष्ठुप् प्रकीवतवतम् ।।1।।
देिता दैभशका रक्ता

नाम प्रत्यङ्गिरे वत च ।

पूिविीजै: षडिागन

कल्पयेत् साधकोत्तम: ।

सिवहृष्ठोपचारै श्च ध्यायेत् प्रत्यङ्गिराम् शुभाम् ।।2।।

7

।।ध्यानम्।।

खड्गं कपालं डमरुम् वत्रशूलं सम्बिभ्रतीं चन्रकलाितंसां ।
वपिोर्धिवकेशोऽससत - भीमदंष्ट्रा भूयाद् विभूत्यै मम भरकाली ।।3।।
एिम् ध्यात्वा जपेन्मन्त्रमेकविंशवतिासरान् ।
शत्रूणाम् नाशने ह्येतत्प्रकाशोऽयम् सुगनश्चय: ।।4।।
अष्टबयामधवरात्रे तु शरत्काले महागनभश ।
आररगधताचेत्श्रीकाली तत्क्षणाम्त्सभिदा नृणाम्।।5।।
सिौवपचारसम्पन्न िस्र रत्न फलाङ्गदभभ: ।
पुष्पैश्च कृष्णिणैवश्च साधयेत् काललकाम् िराम् ।।6।।
िषावद ूर्धिवमजं मेषं मृदं िाऽथ यथाविगध ।
दद्यात् पूिं महेशागन ! ततश्च जपमाचरे त् ।।7।।
एकाहात् ससभिदा काली सत्यं सत्यं न संशय: ।
मूलमंत्रेण रात्रौ च होमं कुयावत् समावहत: ।।8।।
मरीच लाजा लिणै: साषवपैमावरणं भिेत् ।
महािनपदे चैि न भयं विद्यते क्वलचत् ।।9।।

8

प्रेतवपण्डं समादाय िोलकं कारयेत् तत: ।
मध्ये नामाङ्गङ्कतं कृत्वा शत्रुरूपांश्च पुत्तलीम् ।।10।।
जीिं तत्र विधायेि लचताग्नौ जुहुयात्तत: ।
तत्राऽयुतजपं कुयावत् वत्ररात्रं मारणं ररपो: ।।11।।
महाज्िाला भिेत्तस्य तप्तताम्रशलाकया ।
िुदद्वारे प्रदद्याच्च सप्ताह्ान् मारणं ररपो: ।।12।।
प्रत्यङ्गिरा मया प्रोक्ता पङ्गठता पाङ्गठत: नरै : ।
ललखखत्वा च करे कण्ठे िाहौ भशरसस धारयेत् ।
मुच्यते सिवपापेभ्यो नाऽल्पमृत्यु: कथञ्चन ।।13।।
ग्रहा ऋक्षास्तथा ससंहा भूता यक्षाश्च राक्षसा: ।
तस्य पीडां न कुिवजि ङ्गदवि भुव्यिररक्षिा: ।।14।।
चतुष्पदेषु
श्मशाने

दुिेवषु
दुिवमे घोरे

िनेषूपिनेषु

च ।

सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे ।।15।।
।।भाषा टीका।।

(ॐ ऐं ह्ीं श्रीं प्रत्यङ्गिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून भंजय भंजय फे हुाँ फट् स्वाहा) यह
भििती प्रत्यङ्गिरा का जप मंत्र है।
इस मंत्र का 108 िार जप करें । इसके भैरि ऋवष हैं छं द अनुष्टुप तथा देिता
दैभशका, रक्ता, और प्रत्यङ्गिरा देिी हैं।(1)
साधक को चावहए वक पूिोवक्त िीज युक्त षडं िन्यास के साथ जप करे तथा

9

प्रसन्नलचत्त एिं यथोलचत सामग्री से प्रत्यङ्गिरा देिी का ध्यान करे ।(2)
खड्ग, कपाल, डमरू तथा वत्रशूल को धारण करने िाली देिी भरकाली, जजसके
मस्तक में चन्रकला सुशोभभत है, जजनके केश पीले एिम् ऊपर को उठे हुए हैं तथा
जजनके दााँत िडे भयङ्कर एिम् अससत िणव के हैं, हमारा कल्याण करें ।(3)
इस प्रकार ध्यान करके इक्कीस ङ्गदनों तक " ॐ ऐं ह्ीं श्रीं प्रत्यङ्गिरे मां रक्ष रक्ष
मम शत्रून् भञ्जय भञ्जय फे हुं फट् स्वाहा " इस मंत्र का 108 िार जप करें । शत्रु
नाश के ललये यह मंत्र गनभश्चत रूप से ससभिप्रद कहा िया है ।(4)
शारदीय निरात्र की महागनशा सबिम्न्धत अष्टमी को आधवरावत्र में श्री महाकाली
की आराधना करने से साधक को तत्क्षण ससभि प्राप्त होती है ।(5)
साधक को चावहए वक, समस्त पूजन-सामग्री सवहत िस्र,रत्न और फल आङ्गद
तथा कौिाठोठी के कृष्ण िणव पुष्प से श्रेष्ठ श्री महाकाली का पूजन करे ।(6)
इस प्रकार एक िषव तक जप करने के पश्चात् भेड
ं एिम् िकरी के िच्चे की यथा
विगध िलल प्रदान करे । उसके िाद पुन: जप करे ।(7)
इस प्रकार करने से श्री महाकाली एक ङ्गदन में ही गन:सन्देह ससि हो जाती हैं।
रावत्र में अत्यंत सािधान लचत्त से मूल मंत्र से हिन करें ।(8)
काली भमचव, लािा, नमक और सरसो से हिन करने से शत्रु गनश्चय ही मृत्यु को
प्राप्त होता है, और साधक को घनघोर जंिल में भी वकसी प्रकार का भय नही रहता,
अथावत् िह गनभवय रहता है।(9)
जजसपर मारण करना हो, उसके गनभमत्त प्रेत वपण्ड से िोलक यंत्र िना कर तथा

10

उसमें शत्रु का पुतला िनाकर, उसके मध्य में शत्रु का नाम ललखें तथा प्राणप्रवतष्ठा
कर लचता की अलग्न में उसे हिन करें ।(10)
तीन ङ्गदन तक मूल मंत्र से दस हजार जप करने से शत्रु का मारण होता है,
तथा उस शत्रु को इस िात का ज्ञान होता है वक, मुझे कोई तप्त ताम्र शलाका से
छे द कर रहा है, और मेरे शरीर से भयंकर ज्िाला उत्पन्न हो रही है । इसी प्रकार
उस पुतले के िुदा में सात ङ्गदनो तक जप करने से शत्रु का मारण होता है। (1112)
इस प्रत्यङ्गिरा मंत्र को भोजपत्र पर ललख कर कलाई, कण्ठ, भुजा अथिााँ
मस्तक पर धारण करें । जजससे साधक समस्त पापों से मुकत होता है, तथा कभी
भी अल्प मृत्यु का ग्रास नहीं िनता है।(13)
इसको धारण करने से समस्त ग्रह, रीछ, ससंह, भूत, यक्ष, राक्षस और आकाश,
पृथ्िी तथा अंतररक्ष मे विचरण करने िाले समस्त िण उसे वकसी प्रकार की पीडा
नहीं पहुाँचा सकते।(14)
िह चतुष्पाद, वकला, िन, उपिन, भयंकर श्मशान तथा घोर युि एिम् शत्रुओं से
गघर जाने पर भी कभी दु:खी नहीं होता।(15)
माला मंत्र गनम्नित् है ।।

11

।। माला मंत्र: ।।
।। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ कुं कुं कुं मां सां खां चां लां क्षां ॐ ह्ीं ह्ीं
ॐ ॐ ह्ीं िां धां मां सां रक्षां कुरु । ॐ ह्ीं ह्ीं ॐ स: हुं ॐ क्षौं िां
लां धां मां सां रक्षां कुरु । ॐ ॐ हुं प्ुं रक्षां कुरु ।
ॐ नमो विपरीतप्रत्यङ्गिरायै विद्याराभज्ञ त्रैलोक्यिशंकरर तुवष्ट-पुवष्ट-करर
सिवपीडापहाररलण सिावपन्नाभशगन सिवमिलमािल्ये भशिे सिावथवसागधगन मोङ्गदगन
सिवशास्राणाम् भेङ्गदगन क्षोभभणी तथा परमन्त्र-तन्त्र-यन्त्र-विष-चूणव-सिवप्रयोिादीन्नेषां गनिवतवगयत्वा यत्कृतं तन्मेऽस्तु कललपावतनी सिववहंसा मा कारयवत
अनुमोदयवत मनसा िाचा कमवणा ये देिाऽसुर-राक्षसाम्स्तयवग्योगनसिववहंसका
विरुपेकं कुिवजि मम मन्त्र- तन्त्र- यन्त्र- विष- चूणव- सिव- प्रयोिादीनात्महस्तेन
यः करोवत कररष्यवत कारगयष्यवत तान् सिावन्येषां गनितवगयत्वा पातय कारय
मस्तके स्वाहा ।।
।।श्री भैरि तन्त्रे भैरिी सबिादे विपरीत प्रत्यङ्गिरा विधानम् सत्या: सिु मम
कामा: ।

।।ॐ तत्सत् श्री देव्यापवणमस्तु ।।

12

।। विपरीत प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् ।।
महेश्वर उिाच
श्रृणु देवि ! महाविद्यां
यस्य

सिव ससभि प्रदागयकाम् ।

विज्ञानमात्रेण

शत्रुििाव लयं

विपरीतमहाकाली

सिवभत
ू भयङ्करी ।

यस्या: प्रसिै मात्रेण कम्पते च
न च शाजिप्रद:

अभभचाराङ्गदका:
ससभिविद्या
सप्तलक्ष

जित्त्रयम् ।।2।।

कोऽवप

देिता: प्रलयं याजि
पठनाद् धारणाद्देवि

िता: ।।1।।

परमेशो न चैि वह ।
वकं पुनमावनिादय:।।3।।

!

सृवष्ठ संहारको भिेत् ।

सिाव या या
महाकाली

महाविद्या

साध्यतमा विया ।।4।।
यत्रेिह

िोवपता

मोदते ।

परमैश्वरर ।।5।।

13

महाकाली

मवहदेवि !

यस्या:

शङ्करश्रेष्ठदेिता: ।

प्रसादमात्रेण

परब्रह्म

कृभत्तमाङ्गद-विषघ्नीशा प्रलयाङ्गद
त्वदङ्गिदशवनादेि
यस्य

गनिभत्तवका ।।7।।

कम्पमानो

गनग्रहमात्रेण

दशविद्या

यदा

प्राचीद्वारे

भुिनेशी

नाक्षत्री

पभश्चमे

महेश्वर ।

पृलथिी

ज्ञाता

महेश्वर: ।।6।।

प्रलयं िता ।।8।।

दशद्वारसमालश्रता ।

दभक्षणे

काललका
उत्तरे

तथा ।।9।।

भैरिी

तथा ।

ऐशान्याम् सततम् देवि ! प्रचण्डचम्ण्डका तथा ।।10।।
आग्नेय्याम्
धूमािती
सम्मुखे

ििला

देिी

िायव्ये

षोडशी

देिी

अधे

नैऋत्ये

मतंगिनी ।

ऊर्धिेव च

सुन्दरी ।।11।।

जाग्रत स्वप्न स्वरूवपणी ।

14

िामभािे

देिश
े ी

अंशरूपेण

देिभे श

महाप्रत्यङ्गिरा

चैि

महाविष्णुयद
व ा

ज्ञाता

कताव पाता

सिावदव्े य:

प्रवतवष्ठता: ।

प्रत्यङ्गिरा

तथोङ्गदता ।।13।।

भुिनानाम्

संहताव

भुभक्त मुभक्तप्रदा देवि !
िेदशास्र

प्रिुप्ता

सिवमंत्रमयी
गनिमाऽिमकारी
यस्याऽिधमवलिा

सत्यं

सा

।।12।।

महेश्वरर ।

सत्यं िदाभम ते ।।14।।

महाकाली

अनिकोवटसूयावभा
ध्यानज्ञानविहीना

महावत्रपुरसुन्दरी

नन्दस्या

सुगनभश्चतम् ।
देितैरवप ।।15।।

सिवजिुभयंकरी ।
सा
काली
सा

िेदािामृतिवषवणी ।।16।।
गनिमाऽिमकाररणी ।
महाप्रलयकाररणी ।।17।।

च सा िंिा परमोङ्गदता ।

15

महाकाली
विपरीता

निेऽनुस्था
प्रत्यङ्गिरा

विपरीता

तत्र

साधकस्मरणमात्रेण

महोदया ।।18।।

काली

शत्रूणां

प्रवतवष्ठता ।

गनिमाऽिमा ।।19।।

नाशं जग्मु: नशीं जग्मु: सत्यं सत्यं िङ्गदभम ते ।
परब्रह्म

महादेिी

भशिकोवटसमो
सिैवरारागधता
िुरुमन्त्रशतं

योिी
सा

पूजनैरीश्वरो
विष्णुकोवटसम:

भिेत् ।।20।।
म्स्थर: ।

िै

भुभक्त - मुभक्तप्रदागयनी ।।21।।

जप्त्वा

श्वेतसषवपमारयेत् ।।22।।

।।ॐ हुं स्फारय स्फारय मारय मारय शत्रुििावन् नाशय नाशय स्वाहा ।।
(विंशाक्षरी मंत्र:)
आत्मरक्षां

शत्रुनाशं

ऋवषन्यासाङ्गदकम्

सा करोवत

तत्क्षणात् ।

कृत्वा सषवपम
ै ावरणम् चरे त् ।।23।।

16

।।भाषा टीका।।
श्री महेश्वर भििान शंकर ने, माता पािवती से कहा हे देवि, सम्पूणव ससभियों को प्रदान करने िाली महाविद्या के स्तोत्र को सुने, जजसके
जानने मात्र से ही शत्रुओं का विनाश हो जाता है ।।1।।
विपरीत महाकाली सम्पूणव प्रलणयों को भय उत्पन्न करने िाली हैं । इनके स्मरण
मात्र से ही तीनों लोक कााँपने लिते हैं ।।2।।
परमेश्वर आङ्गद कोई भी देि उसे शाि नहीं कर सकते । उसके समक्ष देिताङ्गद
भी विनष्ट हो जाते हैं; वफर मनुष्यों की क्या सामथ्यव है ? ।।3।।
मनुष्य महाविद्या-महाकाली के इस स्तोत्र को पढ़ने से सृवष्ट के संहार करने में
समथव हो जाता है । अभभचाराङ्गद (मारण मोहन उच्चाटनाङ्गद) सभी वियायें इस स्तोत्र के
स्मरण मात्र से ही नष्ट हो जाते हैं ।।4।।
ससभिविद्या महाकाली जहााँपर आन्नद पूिवक विहार करती हैं, िहााँ सात लाख
महाविद्या िुप्त रूप से गनिास करती हैं ।।5।।
हे महाकालल! हे महादेवि! आप शंकर की श्रेष्ठ देिता है, आप की प्रसन्नता मात्र

17

से ही सदाभशि परब्रह्म हे िये ।।6।।
यह महाकाली कृभत्तमाङ्गद विषों का विनाश करने में समथव हैं,तथा प्रलयाङ्गद को भी
रोकने में सक्षम हैं ।।7।।
भििान महेश्वर तो आप के चरण दशवन मात्र से ही प्रकम्म्पत हो जाते हैं; जजनके
िोध मात्र से ही प्रलय को प्राप्त होने लिती है ।।8।।
देवियााँ इस महाकाली के दस द्वार पर रहने िाली दशविद्या के नाम से प्रख्यात हैं
।पूरि द्वार पर भुिनेशी दभक्षण द्वार पर काललका नाम की देिी रहती हैं ।।9।।
पभश्चम द्वार पर नाक्षत्री उत्तर द्वार पर भैरिी तथा ईशान कोण पर प्रचण्ड चम्ण्डका
देिी रहती हैं ।।10।।
इस महाकाली के आग्नेय कोण मे ििला देिी नैऋत कोण में मातङ्गिनी िायव्य
कोंण में धूमािती देिी ऊपर तथा नीचे सुन्दरी नामक देवियों का गनिास है ।।11।।
जाग्रत स्वप्न तथा सुषुवप्त स्वरूप िाली षोडशी देिी सम्मुख में तथा िाम भाि में
वत्रपुर सुन्दरी का गनिास है ।।12।।
महाकाली के अंशरूप से ये विद्यायें प्रवतवष्ठत (पूजजत) हैं ।यह महाकाली
महाप्रत्यङ्गिरा तथा प्रत्यङगिरा नाम से विख्यात हैं ।।13।।

18

यह भििती महाविष्णु रूप से लोकों का श्रृजन पालन तथा संहार करती हैं। मैं
यह सत्य सत्य कहता हाँ ।।14।।
यह महाकाली भुभक्त तथा मुभक्त को देनेिाली हैं । िेद शास्रों की रक्षा करने िाली
हैं, तथा देिताओं को आनंद

देने िाली हैं ।।15।।

अन्नतकोवट सूयों के समान तेजस्वी हैं । सम्पूणव प्रालणयों को भय उत्पन्न करने
िाली हैं । ध्यान तथा ज्ञान के विना भी िेदािाऽमृत् की िषाव करने िाली हैं ।।16।।
यह महा काली सभी मन्त्रों का स्वरूप हैं तथा गनिम (िेद) आिम (तंत्र शास्र)
को प्रकट करने िाली हैं ।।17।।
जजसके अंि के स्वेद मात्र से ििा प्रिावहत हैं तथा जो पिवत राज पर विद्यमान
पािवती के रूप में विपरीत प्रत्यङ्गिरा काली कही जाती हैं । साधक के स्मरण मात्र से
ही शत्रुओं के गनिम तथा आिम नष्ट हो जाते हैं, मैं यह सत्य सत्य कहता हाँ ।
महादेिी के पूजन से मनुष्य सिव समथव होकर परब्रह्म रूप हो जाता है ।।18-1920।।
कोवट भशि के समान योिी तथा कोवट विष्णु के समान म्स्थर हो जाता है ।
आराधना से प्रसन्न होकर िे भोि तथा मोक्ष प्रदान करने िाली हैं । िुरु मंत्र का सौ

19

िार जप करके श्वेत सषवप लाना चावहए ।।21-22।।
' ॐ हुं स्फारय स्फारय मारय मारय शत्रुििावन् नाशय नाशय स्वाहा ' यह
विंसाक्षरी मंत्र है । इसके जप से भििती महाकाली उसी क्षण साधक की रक्षा तथा
शत्रुओं का नाश करती हैं । यङ्गद मारण करना हो ,तो ऋष्याङ्गदन्यास कर श्वेत सषवप
(सरसो) का प्रयोि करना चावहए ।।23।।

20

।।विपरीत महाप्रत्यङ्गिरा माला मंत्र:।।
(मावत्रका सम्पुवटतम्)

विगनयोि:-ॐ अस्य श्री महाविपरीत प्रम्त्िरास्तोत्र मन्त्रस्य
महाकालभैरि ऋवषम्स्रष्टुपछन्द: श्री महाविपरीतप्रत्यङ्गिरा देिता,
हं िीजम् ह्ीं शभक्त:, क्ीं कीलकम्, मम सिावथव ससध्यथेव जपे
विगनयोि: ।

21

(मावत्रका मंत्र:)
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं
लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ झाँ ञाँ टाँ ठाँ
डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ लाँ क्षाँ ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत परब्रह्ममहाप्रत्यङ्गिरे ॐ ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ
औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ
धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ लाँ क्षाँ मम सपररिारस्य
सिेवभ्य: सिवत: सिवदा रक्षां कुरु कुरु मरण भयापन
पापनय वत्रजितां पररूपवित्तायुमेव सपररिारकाय देवह देवह
दापय दापय साधकत्वं प्रभुत्वं च सततं देवह देवह विश्वरूपे धनं

22

पुत्रान् देवह देवह मां सपररिारकस्य मां पश्येत्तु देवहन:
सिेववहंसका: प्रलयं यािु मम सपररिारकस्य शत्रूणां
िलिुभिहागनं कुरु कुरु तान् स सहायान् स्वेष्टदेितान्
संहारय संहारय स्वाचारमपनयाऽपनय ब्रह्मास्रादीगन व्यथीं
कुरु हं हं स््ें स््ें ठ: ठ: फट् फट् ॐ ।

।।माला मंत्र:।।
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ नमो विपरीत प्रत्यङ्गिरायै
सहस्रानेककायवलोचनायै कोवट विद्युभिह्वायै महाव्यावपन्यै
संहाररूपायै जन्मशाजिकाररण्यै मम सपररिारकस्य भावि
भूत भिच्छत्रु दारापत्यान् संहारय संहारय महाप्रभािं दशवय
दशवय वहलल वहलल वकलल वकलल भमलल भमलल लचलल लचलल भूरर

23

भूरर विद्युभिह्वे ज्िल ज्िल प्रज्िल प्रज्िल र्धिंशय र्धिंशय
प्रर्धिंशय प्रर्धिंशय ग्रासय ग्रासय वपि वपि नाशय नाशय
त्रासय त्रासय वित्रासय वित्रासय मारय मारय विमारय
विमारय भ्रामय भ्रामय विभ्रामय विभ्रामय रािय रािय
विरािय विरािय

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ

उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ
झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ
लाँ क्षॅँ हाँ फट् स्वाहा ।
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं ॐ ॐ ॐ
ॐ ॐ विपरीतप्रत्यङ्गिरे हाँ लाँ ह्ीं लाँ क्ीं लाँ फट् फट् स्वाहा ।

24

हाँ लाँ ह्ीं क्ीं ॐ विपरीतप्रत्यङ्गिरे मम सपररिारकस्य
यािच्छत्रून देिता वपतृ वपशाच नाि िरुण वकन्नर विद्याधर
िन्धिव यक्ष राक्षस लोकपालान् ग्रह भूत नर लोकान्
समन्त्रान् सौषधान् सायुधान् स सहायान् पाणौ लछम्न्द लछम्न्द
भभम्न्द गनकृिय गनकृिय छे दय छे दय उच्चाटय उच्चाटय मारय
मारय तेषां साहङ्काराङ्गदधमावन् कीलय कीलय घातय घातय
नाशय नाशय विपरीतप्रत्यङ्गिरे स््ें स््ेत्काररणी ॐ ॐ जाँ ॐ
ॐ जाँ ॐ ॐ जाँ ॐ ॐ जाँ ॐ ॐ जाँ ॐ ठ: ॐ ठ: ॐ ठ:
ॐ ठ: ॐ ठ: मम सपररिारकस्य शत्रूणां सिाव: विद्या:
स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय हस्तौ स्तम्भय स्तम्भय मुखं
स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय नेत्रालण स्तम्भय स्तम्भय नेत्रालण

25

स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय दिान् स्तम्भय स्तम्भय नाशय
नाशय जजह्वां स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय पादौ स्तम्भय
स्तम्भय नाशय नाशय िुह्यं स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय
सकुटु बिानाम् स्तम्भय स्तम्भय नाशय नाशय स्थानम् स्तम्भय
स्तम्भय नाशय नाशय साँ प्राणान् कीलय कीलय नाशय नाशय
हं हं हं हं हं हं हं ह्ीं ह्ी ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं
क्ीं क्ीं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट्
स्वाहा ।मम सपररिारकस्य सिवतो रक्षां कुरु कुरु फट् फट्
स्वाहा

26

( ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ) ऐं ह्ं ू ह्ीं क्ीं हं सों विपरीतप्रत्यङ्गिरे !
मम सपररिारकस्य भूतभविष्य - च्छत्रूणामुच्चाटनं कुरु कुरु
हं हं फट् स्वाहा ।
ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं िं िं िं िं िं लं लं लं लं लं रं रं रं रं रं यं यं
यं यं यं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ नमो विपरीतप्रत्यङ्गिरे दुष्ट
चाण्डाललनी वत्रशूल िज्राङ्कुश शभक्त शूल धनु: शर
पाशधाररलण शत्रुरुगधर चमव मेदोमांसाऽम्स्थमिाशुि मेहन
िसा िाक् प्राण मस्तक हेत्वाङ्गदभभक्षणी परब्रह्म भशिे
ज्िालादागयनी माललनी शत्रूच्चाटन मारण क्षोभन स्तम्भन
मोहन रािण जृम्भण भ्रामण रौरण सिापन यन्त्र मन्त्र

27

तन्त्राियावि पुरश्चरण भूतशुभि पूजाफल परम गनिावण
हारणकाररणी कपालखट्वाि परशुधाररलण मम सपररिारकस्य
भूतभविष्यच्छत्रून् सहायान् सिाहनान् हन हन रण रण दह
दह दम दम धम धम पच पच मथ मथ लङ्घय लङ्घय खादय
खादय चिवय चिवय व्यथय व्यथय ज्िरय ज्िरय मूकान् कुरु
कुरु ज्ञानं हर हर हं हं फट् स्वाहा ।
ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं हं हं हं हं हं हं हं

क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं

क्ीं क्ीं क्ीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीतप्रत्यङ्गिरे
ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं हं हं हं हं हं हं हं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं
क्ीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा ।

28

मम सपररिारकस्य कृतमन्त्र यन्त्र तन्त्र हिन कृतौषध
विषचूणव शस्राद्यभभचार सिोवपरिाङ्गदकम् येन कृतं काररतं
कुरुते कररष्यवत िा तान् सिावन् हन हन स्फारय स्फारय
सिवतो रक्षां कुरु कुरु हं हं फट् फट् स्वाहा ।
हं हं हं हं हं हं हं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं क्ीं क्ीं क्ी क्ीं क्ीं
क्ीं कालीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा ।
ॐ हं ह्ीं क्ीं ॐ अं विपरीत प्रत्यङ्गिरे मम सपररिारकस्य
शत्रि: कुिवजि कररष्यजि शत्रुश्च कारयामास कारयजि
कारगयष्यजि याऽन्यां कृत्यािै: साधं तांस्तां विपरीतां कुरु
कुरु नाशय नाशय मारय मारय श्मशानस्थानं कुरु कुरु

29

कृत्याङ्गदकां वियां भावि भूत भिच्छत्रूणां याित्कृत्याङ्गदकाम्
वियां विपरीतां कुरु कुरु तान् डावकनीमुखे हारय हारय
भीषय भीषय त्रासय त्रासय परम शमन रूपेण हन हन
धमाविम्च्छन्न गनिावणं हर हर तेषाम् इष्टदेिानाम् शासय शासय
क्षोभय क्षोभय प्राणाङ्गद मनोिुद्ध्यऽहङ्कार क्षुत्तष्ृ णा कषवण लयन
आिािमन मरणाङ्गदकं नाशय नाशय हं हं ह्ीं ह्ीं क्ीं क्ीं ॐॐ
फट् स्वाहा ।
क्षाँ लाँ हाँ साँ षाँ शाँ िाँ लाँ राँ याँ माँ भाँ िाँ फाँ पाँ नाँ धाँ दाँ थाँ ताँ णाँ ढाँ
डाँ ठाँ टाँ ञाँ झाँ जाँ छाँ चाँ ङाँ घाँ िाँ खाँ काँ अः अाँ औँ ओँ ऐँ एाँ ॡाँ लृाँ
ॠाँ ऋाँ ऊाँ उाँ ईँ इाँ आाँ अाँ हं हं हं हं हं हं हं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं

30

ह्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
विपरीतप्रत्यङ्गिरे हं हं हं हं हं हं हं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं क्ीं
क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट्
स्वाहा ।
क्षं लं हं सं षं शं िं लं रं यं मं भं िं फं पं नं धं दं थं तं णं ढं
डं ठं टं ञं झं जं छं चं ङं घं िं खं कं अः अं औं ऐं एं ॡं लृं ॠं
ऋाँ ऊं उं ईं इं आं अं हं हं हं हं हं हं हं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं ह्ीं

क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं क्ीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट्
स्वाहा ।

31

अः अं औं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं ङं घं िं खं
कंञं झं जं छं चं णं ढं डं ठं टं नं धं दं थं तं मं भं िं फं पं क्षं लं
हं सं षं शं िं लं रं यं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ सपररिारकस्य
स्थाने शत्रूणां कृत्यान् सिावन् विपरीतान् कुरु कुरु तेषां तन्त्र
मन्त्र तन्त्राचवन श्मशानारोहण भूभमस्थापन भस्म प्रक्षेपण
पुरश्चरण होमाभभषेकाङ्गदकान् कृत्यान् दूरी कुरु कुरु हं
विपरीतप्त्यङ्गिरे मां सपररिारकम् सिवत: सिेवभ्यो रक्ष रक्ष हाँ
ह्ीं फट् स्वाहा ।
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं
िं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं िं भं मं यं

32

रं लं िं शं षं सं हं लं क्षं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं
श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ हं ह्ीं क्ीं ॐ
विपरीतप्रत्यङ्गिरे हाँ ह्ीं क्ीं ॐ फट् स्वाहा ।
ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं
ॐ क्ीं ह्ीं श्रीं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं
अः कं खं िं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं
िं भं मं यं रं लं िं शं षं सं हं लं क्षं विपरीतप्रत्यङ्गिरे मम
सपररिारकस्य शत्रूणां विपरीतवियां नाशय नाशय त्रुवटं कुरु
कुरु तेषाऽभभष्देिताङ्गद विनाशं कुरु कुरु ससभिम् अपनय
अपनय विपरीतप्रत्यंगिरे शत्रुमर्द्द्दवगन भयंकरर नाना

33

कृत्यामर्द्द्दवगन ज्िाललगन महाघोरतरे वत्रभुिन भयंकरर शत्रूणां
मम सपररिारकस्य चक्षु:श्रोत्रालण पदौ सिवत: सिेवभ्य:
सिवदा रक्षां कुरु कुरु स्वाहा ।
श्रीं ह्ीं ऐं ॐ िसुन्धरे मम सपररिारकस्य स्थानं रक्ष रक्ष
हं फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ

महालम्मम मम सपररिारकस्य

पादौ रक्ष रक्ष हं फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ चम्ण्डके मम
सपररिारकस्य जङ्घे रक्ष रक्ष हं फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ
चामुण्डे मम सपररिारकस्य िुह्यं रक्ष रक्ष हाँ फट् स्वाहा ।
श्रीं ह्ीं ऐं ॐ इन्रालण मम सपररिारकस्य नाभभं रक्ष रक्ष
हाँ फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ नारससंवह मम सपररिारकस्य

34

िाहं रक्ष रक्ष हाँ फट् स्वाहा । श्रीं ह्ीं ऐं ॐ िारावह मम
सपररिारकस्य हृदयं रक्ष रक्ष हाँ फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ
िैष्णवि मम सपररिारकस्य कण्ठं रक्ष रक्ष हाँ फट् स्वाहा ।श्रीं
ह्ीं ऐं ॐ कौमारर मम सपररिारकस्य िक्त्रं रक्ष रक्ष हाँ फट्
स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐमाहेश्वरर मम सपररविरकस्य नेत्रे रक्ष रक्ष
हाँफट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ ब्रह्मालण मम सपररिारकस्य भशरो
रक्ष रक्ष हाँ फट् स्वाहा ।श्रीं ह्ीं ऐं ॐ लछरं सिविात्रालण रक्ष रक्ष
हाँ फट् स्वाहा ।

35

(मावत्रका मंत्र:)
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ
ऐँ ओँ औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ
धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ लाँ क्षाँ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
ॐ विपरीत परब्रह्ममहाप्रत्यङ्गिरे ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ
इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ
झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ लाँ
क्षाँ मम सपररिारकस्य सिेवभ्य: सिवत: सिवदा रक्षां कुरु कुरु
मरण भयापन पापनय वत्रजितां पररूपवित्तायुमेव सपररिारकाय
देवह देवह दापय दापय साधकत्वं प्रभुत्वं च सततं देवह देवह विश्वरूपे
धनं पुत्रान् देवह देवह मां सपररिारकस्य मां पश्येत्तु देवहन:

36

सिेववहंसका: प्रलयं यािु मम सपररिारकस्य शत्रूणां िलिुभिहागनं
कुरु कुरु तान् स सहायान् स्वेष्टदेितान् संहारय संहारय
स्वाचारमपनयाऽपनय ब्रह्मास्रादीगन व्यथीव कुरु हं हं स््ें स््ें ठ:
ठ: फठ् फट् ॐ ।
संतावपनी संहाररणी रौरी च भ्राभमणी तथा ।
जृम्म्भणी राविणी चैि क्षोभभणी मोवहनी तत: ।।24।
स्तम्म्भनी चांऽशरूपास्ता: शत्रुपक्ष॓ गनयोजजता: ।
प्रेररता:

साधकेन्रेण

दुष्टशत्रुप्रमङ्गदवका ।।25।।

1- संतावपनी 2- संहाररणी 3- रौरी 4- भ्राभमणी 5- जृम्म्भणी 6- राविणी 7क्षोभभणी 8- मोवहनी 9- स्तम्म्भनी , यह नि महाविद्यायें साधक की प्रेरणा से शत्रुपक्ष
में अंश रूप से गनयोजजत होने पर , समस्त दुष्ट शत्रुओं का संहार करती हैं ।।2425।।
ये गनम्न ललखखत नि महाविद्याओं के मंत्र हैं ।

37

ॐ संतावपनी स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून रौरय रौरय
हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ संहाररलण स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून संहारय
संहारय हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ रौवर स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् रौरय रौरय हाँ
फट् स्वाहा ।
ॐ भ्राभमलण स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् भ्रामय
भ्रामय हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ जृम्म्भलण स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् जृम्भय
जृम्भय हाँ फट् स्वाहा ।

38

ॐ राविलण स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् रािय
रािय हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ क्षोभभणी स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् क्षोभय
क्षोभय हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ मोवहनी स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् मोहय
मोहय हाँ फट् स्वाहा ।
ॐ स्तम्म्भनी स््ें स््ें मम सपररिारकस्य शत्रून् स्तम्भय
स्तम्भय हाँ फट् स्वाहा ।

39

।। फलश्रुवत:।।
िृणोवत य इमां विद्यां श्रृणोवत च सदाऽवप ताम् ।
याित्कृत्याङ्गद

शत्रूणां

मारणं शत्रुििावणां

तत्क्षणादेि
रक्षणाय

नश्यवत ।।1।।

चात्मनम् परम् ।

आयुिभृव ियवशोिृभिस्तेजोिृभिस्तथैि
कुिेर इि वित्ताढ्य:

सिवसौख्यमिाप्नुयात् ।

िाय्िादीनामुपशमं
परवित्तहरा

विषमज्िर
सा

परक्षोभाङ्गदककरा
स्मृवतमात्रेण
इदं

च ।।2।।

िै
तथा

देिेभश !

सत्यभमदम्

नाशनम् ।।3।।
परप्राणहरा

सम्पत्करा
शत्रुििां

सत्यम्

दुलवभा
प्रकाश्या

शठाय

परभशष्याय

पुत्राय

भभक्तयुक्ताय

स्वभशष्याय

तथा ।

शुभा ।।4।।
लयं

िता: ।
दैितेरवप ।।5।।
कदाचन ।

तपम्स्वने ।

40

प्रदातव्या

महाविद्या

चात्मििवप्रदा

विनाध्यानैविवनाजापैविवनापूजा
विना

षोढा

यत: ।।6।।
विधानत: ।

विना ज्ञानैमोवक्षससभि: प्रजायते ।।7।।

परनारीहरा

विद्या

पररूपहरा

िायुचन्रस्तम्भनकरा

तथा ।

मैथुनानन्दसंयुता ।।8।।

वत्रसन्ध्यमेकसन्ध्यम् िा य: पठे त् भभक्तत: सदा ।
सत्यम् िदाभम देिेभश

मम कोवटसमो भिेत् ।।9।।

िोधादेि िणा: सिेव लयं यास्यजि गनभश्चतम् ।
वकं पुनमावनिा देवि !

भूतप्रेतादयो

विपरीता समा विद्या न
पठनािे परब्रह्म

मृता: ।।10।।

भूता न भविष्यवत ।

विद्या सभास्करा तथा ।

मावत्रकाम्पुवटतम् देवि! दसधा प्रजपेत सुधी: ।।11।।
िेदाङ्गदपुवटका देवि !

मातृकाऽनिरूवपणी ।

तथा वह पुवटताम् विद्याम् प्रजपेत् साधकोत्तम:।।12।

41

मातृका मंत्र:ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ औँ अाँ अः
काँ खाँ िाँ घाँ ङाँ चाँ छाँ जाँ झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ
शाँ षाँ साँ हाँ लाँ क्षाँ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत परब्रह्ममहाप्रत्यङ्गिरे ॐ ॐ ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ अाँ आाँ इाँ ईँ उाँ ऊाँ ऋाँ ॠॅं लृाँ ॡाँ एाँ ऐँ ओँ औँ अाँ अः काँ खाँ िाँ घाँ
ङाँ चाँ छाँ जाँ झाँ ञाँ टाँ ठाँ डाँ ढाँ णाँ ताँ थाँ दाँ धाँ नाँ पाँ फाँ िाँ भाँ माँ याँ राँ िाँ शाँ षाँ साँ हाँ
लाँ क्षाँ मम सपररिारकस्य सिेवभ्य: सिवत: सिवदा रक्षां कुरु कुरु मरण भयापन पापनय
वत्रजितां पररूपवित्तायुमेव सपररिारकाय देवह देवह दापय दापय साधकत्वं प्रभुत्वं च सततं
देवह देवह विश्वरूपे धनं पुत्रान् देवह देवह मां सपररिारकस्य मां पश्येत्तु देवहन: सिेववहंसका:
प्रलयं यािु मम सपररिारकस्य शत्रूणां िलिुभिहागनं कुरु कुरु तान् स सहायान्
स्वेष्टदेितान् संहारय संहारय स्वाचारमपनयाऽपनय ब्रह्मास्रादीगन व्यथीव कुरु हं हं स््ें
स््ें ठ: ठ: फठ् फट् ॐ ।
मनोजजत्वा जपेल्लोकम् भोिम् रोिम् तथा यजेत् ।
दीनताबहीनतालित्वा काभमगनभम्निावणपिवतम्।।13।।

42

।। फल श्रुवत ।।
जो लोि इस महाविद्या को सदैि िरण तथाश्रिण करते हैं, उसी समय से उनके शत्रुओं के
समस्त प्रयत्न गनष्फल हो जाते हैं ।।1।।
यह स्तोत्र या मन्त्र शत्रुओं को मारने िाला है,तथा साधक की रक्षा करता है । साधक की
आयु यश तथा तेज की िृभि करता है ।।2।।
इस मंत्र तथा स्तोत्र का जप करने विला कुिेर के समान धनिान हो कर समस्त सुखों को
वप्रप्त करता है । इस मेत्र के जप से िायु रोि तथा विषम ज्िर नाश हो जाता है ।।3।।
यह स्तोत्र शत्रुओं के धन तथा प्राण का अपहरण करने िाला है , तथा शत्रुओं के अि:करण
में क्षोभ पैदा कर साधक को सम्पभत्त प्रदान करता है ।।4।।
हे देिेभश ! इस स्तोत्र के स्मरण मात्र से ही शत्रु ििव नष्ट हो जाते हैं , यह सत्य है, यह सत्य
है । यह स्तोत्र देिताऔं को भी दुलवभ है।।5।।
शठ (मूखव ) तथा द ूसरे से दीक्षा ले ने िाले भशष्य को यह विद्या नहीं देनी चावहए ।यह विद्या
केिल अपने पुत्र तथा भभक्त से युक्त अपने भशस्य और तपस्वी को ही देनी चावहए, क्यों वक, इस
विद्या को आत्म ििव मे ही देने का विधान है ।।6।।
यह विद्या ध्यान जप पूजा सेिा तथा ज्ञान के विना ही मोक्ष ससभि को देने िाली है ।।7।।
यह विद्या शत्रुििव के नारी तथा रूप का अपहरण करने िाली है, तथा िायु सूयव एिम् चन्रमा
की िवत को स्तम्म्भत करने िाली है, और मैथुन के समान आनंद देने िाली है ।।8।।

43

जो लोि तीनों सन्ध्या मे अथिााँ एक सन्ध्या में भभक्तपूिवक इस स्तोत्र का पाठ करते है,ं हे
देिेभश ! मैं सत्य कहता हाँ वक, िे लोि मुझसे करोणों िुना अगधक हैं ।।9।।
उस मनुष्य के िोध मात्र से मेरे िण नष्ट हो जाते हैं । वफर मनुष्यों की िात ही क्या ? और
भूत प्रेताङ्गद तो मृतप्राय ही हैं ।।10।।
इस विपरीत प्रत्यङ्गिरा महाविद्या के समान आज तक न कोई विद्या हुयी है न भविष्य मे होिी
। सूयव क् समान तेजश्वश्वनी इस महाविद्या के पाठ मात्र से ही मुष्य परब्रह्म के समान समथव हो
जाता है ।।11।।
भििान शंकर पािवती जी से कहते हैं वक, हे देवि ! मातृका से सम्पुवटत कर इस महाविद्या
का साधक को दस िार पाठ करना चावहए । हे अनि रूवपणी मातृके ! तुम िेदाङ्गद से सम्पुवटत हो
।इस प्रकार साधक को सम्पुवटत कर प्रत्यङ्गिरा स्तोत्र का पाठ करना चावहए ।।12।।
साधक को अपने मन को िश में कर तथा दीनता एिम् हीनता का पररत्याि कर भोि रोि
काभमनी तथा मोक्ष को भििती के गनभमत्त अपवण कर इस स्तोत्र का पाठ एिम् जप करना चावहए
।।13।।

44

।। काली कपूवर स्तोत्रम् ।।
कपूवरं मध्यमान्त्य स्वरपर रवहतम् स्वेन्दुमािाभक्षयुक्त्तम्,
िीजं ते मातरे तत् वत्रपुरहरिधुं वत्रष्कृतं ये जपजि।
तेषां िद्यागन पद्यागन च मुखकुहरादुल्लसन्त्येििाच:,
स्वच्छन्दबध्यािधाराधर रुलचरुलचरे सिवससभिितानाम् ।।1।।
ईशान: सेन्दु िाम श्रिण पररितो िीजमन्यन्महेभश,
द्वन्दं ते मन्दचेता यङ्गद जपवत जनो िारमेकं कङ्गदलचत्।
जजह्वा िाचामधीशं धनदमवप लचरं मोहयन्नबिुजाक्षी-

45

िृन्दं चन्राधवचड
ू े

प्रभिवत

ईशो िैश्वानरस्थ:

शशधर

महाघोररािाितंसे ।।2।।

विल्सद्वामनेत्रण

युक्तम् ,

िीजं ते द्वन्दमन्यद् वििललत लचकुरे काललके ये जपजि ।
द्वेष्टारं ते गनहजि वत्रभुिनमससते िश्यभािं नयजि ,
सृक्कद्वन्द्वास्रधारा द्वयधरिदने दभक्षणेकाललकेवत ।।3।।
ऊर्धिं िामे कृपाणं करतलकमले लछन्नमुण्डं तथाऽधव:,
सव्ये भीतं िरं

वत्रजनदधहरे

दभक्षणे काललके

च ।

जप्त्वैतन्नामिणं ति मनुविभिमं भाियिस्तदथवम्,
तेषामष्टौकरस्था: प्रकवटतिदने ससियस््यबिकस्य ।।4।।
ििावद्यं िविसंस्थं विधुरवत लललतं तत्त्रयं कूचवयग्ु मं ,
लिाद्वन्दं च पश्चात् सभमतमुखख तदधष्ठ द्वयं योजगयत्वा ।
मातयेव िा जपजि स्मरहरमखखले भाियं ते स्वरूपं ,
ते लममीलास्यलीला कमलदृश: कामरूपा भिजि ।।5।।
प्रत्येकं िा द्वयं िा त्रयमवप च परं िीजमत्यि िुह्यं,
त्वन्नाम्ना योजगयत्वा सकलमवप सदा भाियिो जपजि ।
तेषां नेत्रारविन्दे विहरवत कमला िक्त्र शुभ्रांशवु िबिे ,
िाग्देिीङ्गदव्यमुण्ड स्रिवतशयलसत्कण्ठपीनस्तनाढ्ये ।।6।।

46

ितासूनां

िाहु

पारकरकृतकाञ्ची

गनतबिां

ङ्गदग्िस्रा

पररलसन् ,

वत्रभुिनविधात्रीं

वत्रनयनाम् ।

श्मशानस्थे तल्पे

शिहृङ्गद महाकालसुरत

प्रसक्तां ,

त्वां

जनगन !

अवप

ध्यायन्

भशिाभभघोवराभभ:
परं

सङ्कीणावयां

प्रविष्ठां
सदा

गनिह

त्वां

वकं

िा

त्वद्भभक्तमुवखरयवत

त्वदेतत् क्षिव्यो
समंतादापीन


स्तन
यङ्गद

ियमुच्चैजड
व गधयो,
ते

िेभत्त

परमम् ।

चाऽस्माकमससते ,

खलु

जघन

पररभि:।।8।।

पशुरोष:
धृि्

समुलचत: ।।9।।

यौिन िती-

जपवत भक्तस्ति

मनुम् ।

वििासास्त्वां ध्यायन्

िललतलचकुरस्तस्य

िशिा: ,

समस्ता

भुवि

जीिवत

सम:

नक्तं

गनकरै : ,

युितीं,

तेषां

जनगन

हरररवप

कवि: ।।7।।

हरिधूम् ।

नाऽवत

क्वलचदवप

धाता नापीशो

रतासक्तो

सुरते

ध्यायजि

तथाऽवप

मुण्डाम्स्थ

प्रकवटतलचतायां

संतष्ट
ु ामुपरर

िदामस्ते

शि

जडचेता

ससिौिा
स्वस्थीभूतो

जपवत

लचरतरं
विपरीतोऽवप

कवि: ।।10।।

सदा ,

47

विलचन्त्य

त्वां

तदा

तस्य

कराम्भोजे

ध्यायन्नवतशय

क्षोणीतलविहरमाणस्य

िश्या:

प्रसूते

महाकालसुरताम् ।

स्मरहरिधू

संसारं

जनगन

ससभिगनिहा: ।।11।।

जिवतं

समस्तं

भक्षत्याङ्गद

प्रलयसमये

अतस्त्वं

धाताऽवप

वत्रभुिनपवत:

महेशोऽवप

प्राय:

अनेके

सेििे

विमूढास्ते

मात: ! वकमऽवप

सकलमवप

धररत्री

हरर हर
स्वैरं

कीलालं
कल्याणी

स्तुवत:

का

ते

प्रसन्ना

त्वः

भूया

सहस्रं

संहरवत

िा,
च ।

श्रीपवतरवप ,
स्तौभम

वह

विरञ्च्याङ्गद

भितीम् ।।12।।

जानंवत

परमम् ।

वििुध:ै ,

रवतरसमहानन्दगनरताम् ।।13।।
शुलचरवप

त्वमेका

श्मशानस्थ:

वकं

पालयवत

भिदगधकिीिावणगनिहा ,

समाराध्यामाद्यां
प्रपन्नोऽम्स्म

विदुष: ,

गिररशरमणी

समीरे ऽवप
कालल

सकलम् ।

मातगनवजकरुणया
भिमनु

स्वस्थो

िललतलचकुरो

त्वकावणां

गनजिललत

ििनमं,

मामिवतकम्,
भूयान्मम

जनु: ।।14।।

ङ्गदक्पटधर: ,
िीयेण

कुसुमम् ।

48

जपंस्त्वत्प्रत्येकं
िृहे

मनुमवप

सम्माजवन्या

समूलं

मध्यािे

समुच्चायं

प्रेम्णा

िजारूढो

यावत

ध्यायन्

ध्यानगनरतो ।।15।।

पररिललतिीयं
वितरवत

वह

सकृत्कालल

कुसुमधनुषो

मम्न्दरमहो,

जपवत यङ्गद भक्तस्ति मनुम् ।

िन्धिवश्रेणीपवतरवप

नदीन:

पयविे

परमपदलीन:

वत्रपञ्चारे

पीठे

शिभशिहृङ्गद

महाकाले नोच्चैमदनरस

सलोमाम्स्थ
परं

चोष्ट्रं

िललं

ते

सतां

ससभि:

स्वैरं

कवित्वामृतनदी,
प्रभिवत ।।17।।
स्मेरिदनां ,

लािण्य

नक्तं

योध्यायेत्वामवप

सततं ,

सत्कवििर: ।।16।।

जनो

कुजङ्गदने ।

भक्षवतपररिृढ:

ध्यायन्

समासक्तो

लचकुरं ,

लचतायां

मनुमवप

स्वपुष्पैराकीणं
पुरो

ति

गनरताम् ।

स्वयमवप
जनगन

रतानन्दगनरतो,
स्यात्

पललमवप

मेषं

स्महर: ।।18।।

माजावरमससते ,

नर मवहषयोश्छािमवप

पूजायामवप
सिाव

वितरतां
प्रवतपदमपूिाव

िा ।

मत्यवमसतां ,
प्रभिवत ।।19।।

49

िशी

रक्षं

ङ्गदिा:

मन्त्रं

प्रजपवत

मातयुष्व मचरण

युिल

परं

नक्तं

जनो

लक्षं

इदं

नग्नो

िा

मनं,

भक्षवततले ।।20।।

मनुसमुिारणजप-

पूजासमयिगध

कुरिाक्षीिृन्दं

लचरं

पादाबिुज - युिलपूजाविगधयुतम् ।

प्रलापस्तस्याऽवप

ररपु:

गनरत: ।

गनधुिनविनोदेन

मातस्ति

स्वरूपाख्यं

िशस्तस्य

ध्यान

सबयक्स्मरहरसमानः

स्तेत्रं

गनशाधेव

हविष्याशनरतो,

िा

प्रसरवत

यस्तु

कवित्वामृतरस: ।।21।।

तमनुसरवत
क्षोणीपवतरवप

कारािारं
जीिन्मुक्त:

प्रेमयरलम्,

कुिेरपारवतगनगध: ।

कलयवत

पठवत,

भिवत


सुभक्तः

तत्केललकलया,
प्रवतजनुः ।।22।।

।। श्री महावकलविरलचतम् काली कपूवरस्तोत्रम् सत्या:सिु मम कामाः।।

50

।। अथ श्री काली प्रत्यङ्गिरा ।।
श्री देव्युिाचः
कथयेशान ! सिवग्य !

यतोऽहम् ति िल्लभा ।

या प्रोक्ता त्वया नाथ ! ससि विद्या पुरा दश ।।
तासां प्रत्यङ्गिराख्यं तु किचं चैकशः परम् ।।
श्री भशि उिाच:
श्रृणु

वप्रये ! प्रिक्षाभम

िुह्याद्

िुह्यतरं

परम् ।

विनाज्ञाने न ससद्ध्यजिमंत्रा: कोवटवियाम्न्िता।।

51

प्रत्यि रक्षण करी
काली

प्रत्यङ्गिरा िक्ष्ये

तेन

प्रत्यङ्गिरा मता ।
श्रृणष्ु िािवहतानघे ।।

श्री देव्युिाच:
प्रभो ! प्रत्यङागिरा विद्या सिव विद्योत्तमास्मृता ।
अभभचाराङ्गद दोषाणां
मह्यं तत् कथयस्वाद्य

नाभशनी ससभि दागयनी ।
करुणा यङ्गद ते मगय ।।

श्री भशि उिाच:
साधु साधु महादेवि !

त्वं वह संसार मोलचनी ।

श्रृणष्ु ि सुख लचत्तेन िक्ष्ये देवि !

समासत:

।।

देवि ! प्रत्यङ्गिरा विद्या सिव ग्रह गनिाररणी ।
मर्द्द्दवनी सिव दुष्टानां सिव पाप पारमोलचनी ।।
स्री िाल प्रभीतीनां च जिूनां वहत काररणी ।
सौभाग्य जननी देवि िल पुवष्ट करी सदा

।।

52

विगनयोि:
ॐ ॐ ॐ अस्य श्री प्रत्यङ्गिरा मन्त्रस्य श्री अंगिरा ऋवष: अनुष्टुप छं दः श्री प्रत्यङ्गिरा
देिता हं िीजम् ह्ीं शभक्तः िीं कीलकम् ममाभीष्ट ससिये पाठे विगनयोिः ।

अंि न्यास
श्री अंगिरा ऋषये नमः

भशरसस ।

अनुष्टुप छं दसेनमः

मुखे ।

श्री प्रत्यङ्गिरा देितायै नमः

हृङ्गद ।

हं िीजाय नमः

िुह्ये ।

ह्ीं शक्तये नमः

पादयोः ।

िीं कीलकायै नमः

सिाविे ।
ममाभीष्ट ससियये पाठे विगनयोिाय नमः
अंजलौ ।

53

।। ध्यानम् ।।
भुजश्च
ै तुभभवधत
ृव

तीक्ष्ण

िाण
धनुिरव ाभीश्च

शिांगि युग्मा ।

रक्ताबिरा रक्त तनम्स्रनेत्रा
प्रत्यङ्गिरे वत प्रणतं पुनातु ।।

।। श्री काली प्रत्यङ्गिरा प्रारम्भः ।।
ॐ नमः सहस्र सूयेवक्षणाय श्रीकण्ठानाङ्गद रूपाय पुरुषाय पुरु हुताय ऐं
महा सुखाय व्यावपने महेश्वराय जित् सृवष्ट काररणे ईशानाय सिव व्यावपने
महाघोरावतघोराय

ॐ ॐ ॐ प्रभािं दशवय दशवय ।

ॐ ॐ ॐ वहलल वहलल ॐ ॐ ॐ विद्युभिह्वे िन्ध िन्ध मथ मथ प्रमथ
प्रमथ विर्धिंसय विर्धिंसय ग्रस ग्रस वपि वपि नाशय नाशय त्रासय त्रासय

54

विदारय विदारय मम शत्रून् खावह खावह मारय मारय मां सपररिारं रक्षरक्ष
करर कुम्भस्तगन सिोवपरिेभ्यः ।
ॐ महा मेघौघ राभश सबितवक विद्युदंत कपङ्गदगव न ङ्गदव्य कनकाम्भोरुहविकच
माला धाररलण परमेश्वरर वप्रये ! लछम्न्द लछम्न्द विरािय विरािय देवि ! वपशाच
नािासुर िरुड वकन्नर विद्याधर िन्धिव यक्ष राक्षस लोकपालागन स्तम्भय
स्तम्भय कीलय कीलय घातय घातय विश्वमूवतव महातेजसे ॐ ह्ं सः मम
शत्रूणां विद्यां स्तम्भय स्तम्भय ॐ हं सः मम शत्रूणां मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ
हं सः मम शत्रूणां हस्तौ स्तम्भय स्तम्भय ॐ हं सः मम शत्रूणां पादौ स्तम्भय
स्तम्भय ॐ हं सः मम शत्रूणां िृहाित कुठु बि मुखागन स्तम्भय स्तम्भय स्थानं
कीलय कीलय ग्रामं कीलय कीलय मण्डलं कीलय कीलय देशं कीलय
कीलय सिव ससभि महाभािे ! धारकस्य सपररिारस्य शाजिं कुरु कुरु फट्
स्वाहा , ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अं अं अं अं अं हं हं हं हं हं खं खं खं खं
खं फट् स्वाहा । जय प्रत्यङ्गिरे ! धारकस्य सपररविरस्य मम रक्षां कुरु कुरु
ॐ हं सः जय जय स्वाहा ।

55

ॐ ऐं ह्ीं श्रीं ब्रहाभमलण ! भशरो रक्ष रक्ष हं स्वाहा ।ॐ ऐं ह्ीं श्रीं कौमारर !
मम िक्त्रं रक्ष रक्ष हं स्वाहा ।ॐ ऐं ह्ीं श्रीं िैष्णिी ! मम कण्ठं रक्ष रक्ष हं
स्वाहा ।ॐ ऐं ह्ीं श्रीं नारससंवह ! ममोदरं रक्ष रक्ष हं स्वाहा ।
ॐ ऐं ह्ीं श्रीं इन्रालण ! मम नाभभं रक्ष रक्ष हं स्वाहा ।ॐ ऐं ह्ीं श्रीं
चामुण्डे ! मम िुह्यं रक्ष रक्ष हं स्वाहा ।
ॐ नमो भििवत उम्च्छष्ट चाण्डाललगन वत्रशूल िज्राङ्कुशधरे मांस भभक्षलण
खट्वाि कपाल िज्रासस गधररलण ! दह दह धम धम सिव दुष्टान् ग्रस ग्रस ॐ
ऐं ह्ीं श्रीं फठ् स्वाहा ।
ॐ दंष्ट्राकरालल मम मन्त्र तन्त्र िृन्दादीन् विष शस्राभभचारकेभ्यो रक्ष रक्ष
स्वाहा ।
स्तम्म्भनीमोवहनी चैि क्षोभभणीराविणी तथा।
जृम्म्भणीत्राससनीरौरी तथा संहाररलणवत च।।
शक्तयः िम योिेन शत्रु पक्षे

गनयोजजता: ।

56

धाररताः साधकेन्रेण सिव शत्रु गनिाररणी ।। ॐ स्तम्म्भनी

! स््ें स््ें मम

शत्रून स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा ।ॐ मोवहनी ! स््ें स््ें मम शत्रून मोहय
मोहय स्वाहा ।। ॐ क्षोभभणी ! स््ें स््ें मम शत्रूनक्षोभय क्षोभय

स्वाहा ।

ॐ राविलण स््ें स््ें मम शत्रून रािय रािय स्वाहा ।।ॐ जृम्म्भलण ! स््ें
स््ें मम शत्रून जृम्भय जृम्भय स्वाहा । ॐ त्राससगन ! स््ें स््ें मम शत्रून
त्रासय त्रासय स्वाहा ।।
ॐ रौवर ! स््ें स््ें मम शत्रून रौरय रौरय स्वाहा ।ॐ संहाररलण ! स््ें
स््ें मम शत्रून संहारय संहारय

स्वाहा ।।

।। फल श्रुवत: ।।
य इमां धारयेत् विद्यां वत्र सन्ध्यं िावप यः पठे त् ।
सोऽवप व्यथाितश्चैि
सिवतो
महा

रक्षतो
भयेषु सिेवषु

हन्याच्छत्रून् न संसयः।।
देवि ! भयेषु

भयं


विद्यते

विपभत्तषु ।
क्वलचत् ।।

57

विद्यानामुत्तमा
ललखखत्वा

मुच्यते

दुष्ट

ग्रह

पीडां

विद्या
करे

पुष्प

धाररता

पुनः ।

कण्ठे िाहो भशरसस

धारयेत।् ।

महा

घोरै मवत्ृ यु

व्याल चौर

रक्षो

तुल्यदुरासदे ।

यक्ष

िणास्तथा

।।

तस्य कुिवनावत ये चान्ये पीडका ग्रहा ।

हरर चन्दन भमश्रेण
ललखखत्वा

िालचता

िोरोचन

भूजव पत्रे

तु

कुंकंमेन

धारणीया

धूप विलचत्रैश्च

सदा

िल्युपहार

पूजगयत्वा यथा न्यायं

वत्र लोहेनि

नृभभ: ।
िन्दनै: ।।

िेष्ठयेत् ।

धारयेद् य इमां मन्त्री ललखखत्वा ररपु नाभशनीम्।।
विलयं याजि ररपिः
यं

यं स्पृशवत

प्रत्यङ्गिरा विधारलणत् ।

हस्तेन

यं

यं

।।

खादवत जजह्वया ।।

58

अमृतत्वं
वत्रपुरं

भिेत्
तु

तस्य

मया दग्धभममं

गनजजवतास्ते

सुरा:

ङ्गदव्यैमवन्त्र

पदैिुवह्य:ै

पठे द्

रक्षा

िांता

एतद्

सिेव

संस्कृतं

िणं

चैि

देिता च स्वयं

विजानता ।।

देिवै िवद्याधराङ्गदभभ: ।

रोचनम्
ससिाथं

सुरभक्षतै: ।।
प्रकीवतवतः ।

कुंकुंमं
मालती

तथा ।।

तथा ।

भरे ! िोलमध्ये गनधापयेत् ।।

धारयेन्मन्त्री

अंगिरास्य

मन्त्रं

मन्त्रराज

विषाविष्टं

रव्य

कदाचन ।

सुखोपायै:

विधानेन

दमनकं

अरुष्करं

मृत्युनावम्स्त

साधको

मुगन
काली

ब्रह्मवित् सदा ।

प्रोक्तश्छन्दोनुष्टुपुदाहृत: ।।
काबयेषु

विगनयोजयेत् ।।

।।ॐ तत्सत् श्री अंगिरा ऋवष कृतं श्री काली प्रत्यङ्गिरा सत्या:सिु मम कामा: ।।

59

।।श्री काललकाष्टकम् ।।
िलद् रक्तमुणाडािली
महाघोररािा

कण्ठमाला

सुदंष्ट्रा

कराला ।

वििस्रा श्मशानालया

मुक्तकेशी

महाकालकामाकुलाकाललकेयम् ।।1।।
भुजे िामयुग्मे
िरं

भशरोऽसी दधाना

दक्ष युग्मेऽभयं

िै

तथैि ।

सुमध्याऽवप

तुिस्तनाभार नम्रा

लसरक्तसृक्कद्वया

सुम्स्मतास्या।।2।।

शिद्वन्द्वकणावितंसा

सुकेशी

60

लसत्प्रेतपालण

प्रयुक्तैककाञ्ची ।

शिाकार मञ्चागधरूढ़ा

भशिाभभ

श्चतुङ्गदवक्षु शब्दायमानाऽभभरे जे ।।3।।
विरञ्च्याङ्गददेिास्रयस्ते

िुणांस्रीन्

समाराध्य काली ! प्रधाना िभूि:ु ।
अनाङ्गदं

सूराङ्गदं मखाङ्गदं

भिाङ्गदं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दजि देिाः ।।4।।
जिन्मोहनीयं

तु

सुहृत्पोवषणीं

शत्रुसंहारणीयं ।

िचःसातम्भगनयं

िाग्िाङ्गदनीयं

वकमुच्चाटनीयं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दजि देिाः ।।5।।
इयं स्विवदात्री

पुनः

कल्पिल्ली

मनोजांस्तुकामान् यथाथं

प्रकुयावत् ।

कथा ते कृताथाव

भििीवत गनतायं

61

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दजि देिाः
सुरापानमत्ते !

।।6।।
सुभक्तानुरक्ते

लसत्पूतलचत्ते !

सदविभविस्ते ।

जपं

सुधाधौतपंका ।

ध्यान

पूजा

स्वरूपं त्वदीयं

न विन्दजि देिाः ।।7।।

लचदानंदकंदं

हसन्मन्दमन्दं

शरच्चन्रकोवट
मुनीनां

प्रभापुञ्ज विबिम् ।
किीनां

स्वरूपं त्वदीयं

द्योतमानम्

न विन्दजि देिाः।।8।।

महामेघकाली

सुरक्ताऽवप शुभ्रा

कदालचद्
न िाला

हृङ्गद

विलचत्राकृवतयोविमाया ।
न िृिा

स्वरूपं त्वदीयं
क्षमस्वापराधं

न कामातुराऽवप
विन्दजि

देिाः ।।9।।
महािुप्तभािं

62

मया लोकमध्ये

प्रकाशीकृतं यत् ।

ति ध्यानपूतेन

चापल्यभािात्

स्वरूपं त्वदीयं
यङ्गद

न विन्दजि

ध्यानयुक्तः

पठे त् यो मनुष्य

स्तदा सिवलोके

विशालो भिेच्च

िृहे चाऽष्टससभिमृवते
स्वरूपं त्वदीयं

देिाः।।10।।

चावप मुभक्तः

न विन्दजि देिाः ।।11।।

( श्रीमद्आद्य शंकराचायव विरलचतम् श्री काललकाष्टकम् ) सत्याःसिु मम् कामाः