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धन
Prapti Prayog)

(Aghor Aakashmik Dhan

धमम ऄथम काम और मोक्ष जीवन के चार मुख्य स्तंभ है. आन सभी
पक्षों मे व्यक्ति पूणमता प्राप्त करे यही ईद्देश्य साधना जगत का भी है.
आसी क्तिए व्यक्ति के गृहस्थ और अध्याक्तममक दोनों पक्ष के सबंध मे
साधनाओ का ऄक्तस्तमव बराबर रहा है. हमारे ऊक्ति मुक्तन जहा एक
और अध्याम मे पूणमता प्राप्त थे वही भौक्ततक पक्ष मे भी वह पूणम
रूप से सक्षम थे. साधना के सभी मागो मे आन मुख्य स्तंभों के
ऄनुरूप साधनाऐ क्तवद्यमान है ही. आस प्रकार ऄघोर साधनाओ मे
भी गृहस्थ समस्याओ सबंक्तधत क्तनराकरण को प्राप्त करने के क्तिए
कइ साधना क्तवद्यमान है. आन साधनाओ का प्रभाव ऄमयक्तधक तीक्ष्ण
होता है, तथा व्यक्ति को ऄल्प काि मे ही साधना का पररणाम
तीव्र ही क्तमि जाता है. धन का क्तनरं तर प्रवाह अज के युग मे ज़रुरी
है. साधक के क्तिए यह एक क्तनतांत समय है की सभी पक्षों मे पूणमता
प्राप्त करनी चाक्तहए. जब तक व्यक्ति भोग को नहीं जानेगा तब तक

वह मोक्ष को भी के से जान पाएगा. आस मुख्य चचतन के साथ हर
एक प्रकार की साधना का ऄपना ही एक ऄिग स्थान है. व्यक्ति
चाहे ककतना भी पररश्रम करे िेककन भाग्य साथ ना दे तो सफिता
क्तमिना सहज नहीं है. ऐसे समय पर व्यक्ति को साधनाओ का
सहारा िेना चाक्तहए तथा ऄपने कायों की क्तसक्ति के क्तिए देवमव का
सहारा िेना चाक्तहए. पूणमता प्राप्त करना हमारा हक़ है और
साधनाओ के माध्यम से यह संभव है. ककसी भी कायम के क्तिए
व्यक्ति को अज के युग मे पग पग पर धन की अवश्यकता होती है.
हर व्यक्ति का सपना होता हे की वह श्रीसम्प्पन हो. िक्ष्मी से
सबंक्तधत कइ प्रयोग ऄघोर मागम मे क्तनक्तहत है िेककन जब बात तीव्र
धन प्राक्तप्त की हो तो ऄघोर मागम की साधनाए िाजवाब है.
ऄघोररयो के प्रयोग ऄमयक्तधक मवररत गक्तत से कायम करते है तथा
आच्छापूर्तत करते है. अकक्तस्मक रूप से धन की प्राक्तप्त करने के क्तिए
जो क्तवधान है ईसके माध्यम से व्यक्ति को ककसी न ककसी रूप मे
धन की प्राक्तप्त होती है तथा मवररत गक्तत से होती है. आस महमवपूणम
और गुप्त क्तवधान को साधक सम्प्पन करे तब चाहे ककतने भी भाग्य
रूठे हुए हो या कफर पररश्रम साथमक नहीं हो रहे हो, व्यक्ति को
क्तनक्तित रूप से धन की प्राक्तप्त होती ही है.
साधक ऄष्टमी या ऄमावस्या की राक्ति को स्मनान मे जाए तथा
तेि का दीपक िगाये. ऄपने सामने िाि वस्त्र क्तबछा कर ५ सफ़े द
हकीक पमथर रखे तथा ईस पर कुं कु म की चबदी िगाये. साधक के

वस्त्र िाि रहे. तथा कदना ईत्तर या पूवम. ईसके बाद साधक सफ़े द
हकीक मािा से क्तनम्न मंि की २१ मािा जाप करे .
ॐ शीघ्र सर्व लक्ष्मी र्श्यमे अघोरे श्वराय फट
साधक को यह क्रम ५ कदन तक करना चाक्तहए. ५ वे कदन ईन
हककक पथ्थरो को ईसी िाि कपडे मे पोटिी बना कर ऄपनी
क्ततजोरी या धन रखने के स्थान मे रख दे.
(AGHORESHWAR
PRATYAKSHIKARAN SAABAR PRAYOG)

साबर साधनाओ के ऄद्बुध कररश्मो के बारे मे तो सब पररक्तचत ही
है. ऄघोर मागम का ईिार करने वािे भगवान श्री दत्तािेय और
साबर मंिो का सबंध ऄपने अप मे ऄटूट है. श्री दत्तभगवान की
प्रेरणा तथा अनीवमचन से नाथ योक्तगयो द्वारा साबर मंिो का
प्रचार प्रसार हुअ था. आस प्रकार ऄघोर साधनाओ मे भी साबर

मंिो का प्रयोग प्रचुरमािा मे होने िगा था. ऄघोरी के क्तिए
भगवान ऄघोरे श्वर मुख्य देव है, क्तजनके मुख से समस्त तन्त्िो का
सार क्तनकिता रहता है. जो क्तनवतमव को ऄपने ऄंदर स्थाक्तपत कर
सदा क्तनव अनंद से युि हो कर ऄपने अप मे ही क्तिन रहता है
वही ऄघोरी है. क्तसि ऄघोरी की यही पहचान है जो ऄघोरे श्वर की
तरह ही क्तनर्तिप्त रहता है समस्त क्तवकारों भेदभाव तथा पानो के
बंदन से छू ट गया है. ज़रुरी नहीं की वह स्मनान भष्म से युि हो,
नग्न रहे या घृणा पर क्तवजय होने का प्रदनमन करे . जो आन सब से
उपर ईठ चूका हो, क्तजसके क्तिए ये भेद ही न हो, वही तो है
ऄघोरी. ककसी समय मे आनका घर मे अना, स्वयं क्तनव के अने
क्तजतना सौभाग्यदायक माना जाता था िेककन कु छ स्वाथमपरस्तो ने
तो कु छ हमारी ऄविेहना भ्रम और कु तकम ने आस मागम का ग्रास कर
ईसे भय का रूप दे कदया. खेर, ऄघोरी के क्तिए यह ज़रुरी है की वह
ऄघोरे श्वर के चचतन मे क्तिन रहे. भगवान ऄघोरे श्वर स्मनान मे
क्तबराजमान है, सपो से क्तिप्त वह स्मनान भस्म को धारण ककये हुए
है. क्तजनके चेहरे पर अनंद ही है तथा और कोइ भाव हे ही नहीं.
ऐसे ऄघोरे श्वर के श्रेष्ठ रूप का ध्यान करना साधक के क्तिए ईत्तम
है. प्रस्तुत साधना भगवान ऄघोरेश्वर के आसी रूप के दनमन प्राप्त
करने की साधना है. वस्तुतः यह ऄपने अप मे ऄमयक्तधक महमवपूणम
साधना है क्तजसको करने के बाद साधक का क्तचत हमेना क्तनममि

रहता है, भेद से मुक्ति क्तमिती है तथा सवमसवामममक भाव का ईसमे
ईदय होता है. साथ ही साथ ऄघोरे श्वर के वरदान से साधक
ऄष्टपानो से मुि होने िगता है. आस प्रकार की भावभूक्तम प्राप्त होते
साधक को क्तवक्तवध प्रकार की साधनाओ मे सफिता प्राप्त होने
िगती है. वैसे भी ऄघोरी के क्तिए यह एक ऄमयक्तधक महमवपूणम क्रम
है की साधनामागम के आष्ट के दनमन कर ईनके अनीवामद प्राप्त करना.
साधक को चाक्तहए की वह आस साधना को स्मनान मे ही सम्प्पन
करे . रािी मे ११:३० के बाद आस साधना को नुरू करना चाक्तहए.
साधना को सोमवार से नुरू करे . साधक को स्नान कर ऄघोर गुरु
पूजन सम्प्पन कर क्तवनेि नाबर मन्त्ि का ५१ मािा जाप करना
चाक्तहए. मंि जाप के क्तिए साधक को रुद्राक्ष मािा का प्रयोग करना
चाक्तहए. असान तथा वस्त्र कािे हो. असान के क्तनचे क्तचता भष्म
को क्तबछा देना चाक्तहए. आस क्रम को ११ कदन तक करने पर क्तवक्तवध
ऄनुभूक्ततया होने िगती है, साधक जब आसे २१ कदन कर िेता है
तब ईसे भगवान ऄघोरे श्वर के दनमन होते है.
ॎ ऄघोर ऄघोर प्रमयक्ष वाचा गुरु की ऄघोरनाथ दनमय दनमय अण
क्तसिनाथ की
साधक को भयभीत ना हो कर वीर भाव से यह साधना करनी
चाक्तहए.
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TEEVRA AGHOR VASHIKARAN SADHNA

अबी भहर्षि
अॊदय

दे व दत्त

औय भें एक र्वशार गप
ु ा के

फैठे हुए हैं, जहाॉ ऩय भैं एक उजाि के एक उच्च

औय र्वशार स्त्रोत

का अहसास कय ऩा यहा हॉ. एक ऐसी

प्राकर्तिक

स्त्वत् फनी हुए गप
ु ा, जजसभे स्त्वत्

रूऩ से

की प्रकाश की प्राकर्तिक व्मवस्त्था हैं
अॊत्मत

स्त्वच्छ

साप जर

औय इसभें एक

से बया छोटा सा तार

हैं | .ऩास की एक र्वशार चट्टान रूऩी
सॊत

ऩद्मासन

भुद्रा

ध्मानस्त्थ

अवस्त्था

,

अत्माकषिक

चेहया ,गरे भें सुशोभबत रुद्राऺ भारा ,सुॊदय

रराट

फैठे

दीवार ऩय एक

की

फभरष्ठता

भें

बी

ऩय

हुए

हैं

त्ररऩुॊड

.

ऩणित्

सश
ु ोभबत,

मुक्त शयीय ,औय रहयाते हुए केश याभश

की चट्टान से नीचे

जो

तक ऩहुच यही हैं. इसभें कोई बी

सॊदेह नहीॊ र्नश्चम ही वे एक उच्च सॊत हैं

क्मा तुभ उन्हें जानना चाहोगे भहर्षि दे वदत्त ने कहा नाभ भुॊड दीऺा कैसे प्राप्त हुए. ऩय भें दे खा की उनके केश याभश की राफी ५ पीट से कभ तो नहीॊ होगी | भैंने भहर्षि की औय आश्चमिचककत दृष्टी से दे खा .भरॊग र्ऩॊड प्रचभरत हैं .उन्होंने भुस्त्कुयाते हुए कहा कक उनके १०८ नाभ हैं .कक मह तथ्म तो भैं बी नहीॊ जनता था कक १०८ प्रकाय कक अघोय दीऺा हैं .भहर्षि दे वदत्त ने कहा की उनका नाभ ऋर्ष भॊड ु केश . बगवान ् भशव से सीधे ही प्राप्त की हैं. भैं अवाक् सा खड़ा यह गमा .ऩय कबी बी मे .ऩय उनका ऩहरा केश ऋर्ष हैं. अघोय दीऺा .दॊ ड दीऺा . न मे ही वह प्रथभ व्मजक्त हैं जजन्होंने बगवान ् भशव से सीधे ही दीऺा प्राप्त की उन्होंने कुर १०८ प्रकाय की हैं. भुॊड केश .आज कुछ ही अघोय दीऺा बी होती जैसे कक भुॊड स्त्थाऩन.जजसका शाजददक अथि तो मे हैं की वो जो अऩने केश को भुडडत कयता हो .

दे वदत्त कहते गए".इन्होने बगवान ् भशव से ही सीधे ही सफ ऻान प्राप्त ककमा हैं औय .| दे वदत्त कहते गए . न केफर मही फजकक ..."१००० से बी अधधक र्वभबन्न शाश्रों के यधचमता हैं मे. भैं फेहद प्रसन्न हुआ .ककस प्रकाय से सॊबव होती हैं उनके फाये भें कबी बी र्ववयण नहीॊ एक ऐसे भभरता हैं.. मे दोनों ग्रन्थ बी इन्ही के द्वाया भरखे गए हैं. भहान सॊत के दशिन भैं कयके ..तुभने एक फाय ऩछा एक उच्च मोगी र्ऩछरे जन्भ भें था ककयावण र्नश्चम ही यहा होगा . शामद तुभने तॊरश े औय साफयी दऩिण के फाये भैं सुना हो .यसामन शाश्र के बी मे ऩणि ऻाता औय भसद्ध हस्त्त हैं. भैं इन भहान व्मजक्त के फाये भैं सम्ऩणिता से जानना चाहता था ." औय क्मा .तुभने यावन के फाये भैं सुना ही हैं .तो .

. मह साधना वशीकयण भाध्मभ रा कय फहुत ही उच्च कोदट की साधना हैं की... औय ग्रन्थ के फाये हभ रौट इस भहान सॊत आमे | जफ भैंने तॊरश े भें दे वदत्त जी से ऩछा . साधना . तॊरश े अफ केफर भसद्धाश्रभ भें ही उऩरदध हैं .जजसके से आऩ ककसी को अनक ु र भैंने भहर्षि दे वदत्त को इतने उच्च बी अऩने र्नमॊरण फना सकते कोदट की भें हैं.मेतम् ु हाये भरए उत्तय कक मही हैं वह भहान सॊत . इनके उऩरजदधमाॊ अनधगनत हैं . ऩय भये ऩास इस साधनाए भहान ग्रन्थ कक कुछ हैं मदद तुभ चाहो तो इन्हें भरख सकते हो .मद्दर्ऩ भें नहीॊ चाहता था.तो उन्होंने कहा कक भेये र्प्रम भभर ..भैंने झुक कय को प्रणाभ ककमा.उन भेंसे एक " अघोय वशीकयण साधना " हैं . इसभें कोई दो भत हैं ही नहीॊ ..ककसी तयह से भैंने दो साधनाए भरख ऩामा .जजन्होंने यावण के रूऩ भें जन्भ भरमा था . भें आश्चमिचककत ..

भरखे (काजर को इस प्रकाय से हटा हैं की ) " ॐ अघोरे भ्यों घोरे भ्यों नमः " उस प्रेट के उऩय जजस व्मजक्त का वशीकयण कयना हैं उसका एक वस्त्र का टुकड़ा र्वछा दें | मदद मे ककसी बी प्रकाय से सॊबव न हो तो . |उस के ऊऩय उस व्मजक्त का नाभ भरख दे .भसन्दय से ही की जाना चादहए | मे .| अॊदय ऩयी तयह काजर औय र्नम्नाककत भॊर रगा दे .जो रोहे मा स्त्टीर की फनी हो .प्रदान कयने के भरए धन्मवाद ददमा इस साधना को ककसी बी सोभफाय की यात्रर ११ फजे के फाद प्रायॊ ब ककमा जा सकता हैं . कोई एक प्रेट इसके रे .तो कोई बी नमा कऩडे का टुकड़ा उस ऩयी प्रेट ऩय त्रफछा दें .वह बी इस भहान सॊत की . जजस ऩय मे प्रमोग कयना हैं नाभ रेखन की प्रकिमा .साधना भें प्रायॊ ब कयने से ऩवि स्त्नान कयके रार वस्त्र धायण कयरे ..

इसके फाद ऩणि भनोमोग से उसी यात्रर भें .. कारी हकीक मा रुद्राऺ भारा से ५१ भारा र्नम्नाककत भॊर जऩ कयें . जफ मे भॊर जऩ ऩणि हो आऩ बगवान ् से ऋर्ष भॊड ु केश औय इस साधना भें सपरता के भरए प्राथना कयें . अऩने साभने बगवान ् भशव का कोई बी धचर जो बी आऩके ऩास हो औय उस व्मजक्त का बी (जजस ऩय मे प्रमोग ककमा जाना हैं ) यखे. शिवे वश्ये श्ये हुं वश्ये वश््मे वश््मे अमक वश्ये वश््मे हुं वश्ये शिवे व फट इस भॊर भें अभक ु की जगह उस व्मजक्त का नाभ उच्चारयत कयें जजसे आऩको वश भें कयना हैं . साधना कार के दौयान आऩको कुछ आश्चमि जनक अनुबव हो सकते हैं. ऩय इनसे न ऩये शान .

मे तो साधना सपरता के रऺण हैं . भ भ धन “बमभजु क्त बैयव प्रमोग” मेन-मेन दह रुऩेण साधक् सॊस्त्भये त सदा | तस्त्म तन्भमताॊ मार्त धचॊताभार्नरयवेश्वय: || .मा त्रफचभरत न हो .

.. जऩ आदद ककसी डय के कय सकता है .. साधक उसके जजस जजस स्त्वरूऩ का धचॊतन कयता है उसी स्त्वरुऩ की प्राजप्त उसे होती है | सदगरु ु दे व ने कहा है कक ऩरु ु ष की शोबा उसकी प्रचॊडता भें होती है औय उसके ह्रदम की कोभरता से उसके व्मजक्तत्व का ऩरयचम| जजसका साऺात ्. औय बगवन बैयव शददभम हैं क्मोंकक भशव शददभम हैं औय बैयव उनका अॊश.अथाित ईश्वय धचॊताभणण के सद्रश हैं.. ऐॊसे ही एक छोटा ककन्तु अत्मॊत तीव्र प्रमोग जो अबम के साथ यऺा बी प्रदान कयता है . बगवान भशव की ही बाॊर्त अर्त अकऩ ऩजन से ही प्रसन्न होने वारे हैं. जो कक एक ओय सफ कुछ ऩर बय भें र्वध्वॊश कयने वारा स्त्वरुऩ तो दसयी ओय साधक को सफ कुछ प्रदान कयने वारा . सभजन्वत रूऩ ही बैयव हैं.. . अत् कोई बी साधक इनका ऩजन.

अफ प्रश्न मे कक. हे बैयव हभायी यऺा कयें ककसी बी भॊगरवाय को यात्रर भें एक प्रहय के फाद ककसी ताम्र ऩार भें कुभकुभ से यॊ गे चावरों की ढे यी फना रें औय उस ऩय एक बैयव गदु टका. मे कहाॉ से प्राप्त होगी तो भेये ख्मार से अनेक रोगों के ऩास मे गुदटका हो सकती है क्मोंकक अनेक रोगों भैंने ही मे उऩरदध कयवामा है . मा कपय सबी के घय भशवभरॊग तो होगा ही अत् भशवभरॊग को ही स्त्थार्ऩत कय दें . मा स्त्वणािकषिण गदु टका मा भशवभरॊग स्त्थार्ऩत कय दें | अफ प्रश्न मे है की मे कौन सी गट ु ीकाएॊ हैं मे बैयव भन्र से अभबभॊत्ररत स्त्वमभ बैयव ् के प्रतीक स्त्वरुऩ हैं चॉकक हभ सबी प्रतीक स्त्वरूऩ की ही ऩजा अचिना मा साधना कयते हैं.बैयव ऩणि रूऩाॊ दह शॊकयस्त्म ऩयात्भन् ---अत् हे भहादे व.

तथा उनका कुभकुभ अऺत भसॊदय औय रार ऩष्ु ऩ से ऩजन कयें . कपय रुद्राऺ भारा से ११ भारा र्नम्न भन्र की कयें ---भन्र – || || ॐ ह्रीॊ बैयव बमॊकय हय भाॊ यऺ-यऺ हॊ पट स्त्वाहा भन्र— || ॐ HREEM BHAIRV BHAYANKAR HAR MA AM RAKSHA-RAKSHA HUM FATTA SWAHA || प्रमोग सॊऩन्न कयें औय रयजकट स्त्वमभ दे खें | . तथा रोफान धुऩ तथा र्तर के तेर का दीऩक रगाएॊ.

. प्राथिना है कक ऩहरे सॊऩन्न कयें कपय ---- औय जी हाॉ र्नणखर-अककेभी ऩय भन्र ददए जाते हैं साधना दी जाती है औय इसी वजह से आऩ औय हभ जुड़े हैं. अत् साधना कयें त्रफना ककसी के फातों भें आमे. ककसी को सराह दे ना फुया नहीॊ है ककन्तु ददग्भ्भ्रभभत कयना गरत है .एक फात का सदै व ध्मान यखें कक औय अऩने ईष्ट के प्रर्त श्रद्धा ही आऩको ककसी बी साधना भें सपर कयती भैं आजकर हभाये ग्रऩ ु ऩय फहुत ज्मादा वैचारयक र्वषभता दे ख यही हॉ जो की नए साधकों को भ्रभभत कय यही है . हैं ना . औय मही इसकी र्वशेषता है .. जो स्त्वमभ साधना कयके दे खते हैं उन्हें सत्मता का फोध होता ही होता है ककन्तु भसपि फातें कयने से कुछ बी हाभसर नहीॊ होता------ अत् ककसी बी भॊर को ककमे फगैय उसभें नक् ु स र्नकारने से अच्छा है उसे कय के दे खा जामे.....

सभी स्वरुप ऄपने अप में ननराले तथा नवलक्षण. यह देव ऄपने साधकोको शीघ्र नसनि एवं कल्याण प्रदान करने के कारण सनदयों से महत्वपूणण ईपास्य देव रहे है. वस्ततु ः भगवान भैरव से सबंनधत कइ कइ प्रकार की तांनत्रक साधना नवनवध मत के ऄंतगण त होती अइ है. तंत्र के क्षेत्र में भैरव के यूूँ तो ५२ रूप प्रचनलत है लेनकन ८ रूप मख्ु यरूप से ज्ञात है. तंत्र में जहां एक और गणपनत को नवघ्न ननवारक के रूप में पूजन करना ऄननवायण ्रमम है तो साथ ही साथ नसिो के मत से नकसी भी साधना के नलए भैरव पूजन भी एक ऄननवायण ्रमम है क्यों की यह रक्षात्मक देव है जो की साधक तथा साधक के साधना ्रमम की सभी रूप .*** यजनी र्नणखर *** KRODH BHAIRAV SADHNA ========================================== तंत्र के क्षेत्र में भगवान भैरव का स्थान तो ऄपने अप में ननराला है. आनको संयक्त ु रूप से ऄष्ट भैरव के नाम से जाना जाता है. भगवान नशव के स्वरुपसमही ईनके ये नवनवध रूप. कापानलक. नाथ. ऄघोर आत्यानद साधना मत में तो भगवान भैरव का स्थान बहोत ही ईच्चतम माना गया है.

अनद शंकराचायण गोरखनाथ से ले कर सभी ऄवाण चीन प्राचीन नसिोने एक मत में भगवान भैरव की साधना को ऄननवायण तथा जीवन का एक ऄनत अवश्यक ्रमम माना है. सेना मारण अनद ऄनत तीक्ष्ण न्रमयाओं के नलए होती अइ है. शत्रु के परु े घर पररवार को भी तहस महस कर सकता है. यह स्वरुप पूणण तमस को धारण करने के कारण साधक को ऄत्यनधक तीव्र रूप से तथा तत्काल पररणाम की प्रानि होती है. वस्ततु ः आनकी साधना आतनी प्रचनलत नहीं है आसके पीछे भी कइ कारण है. भगवान ्रमोध भैरव के सबंध में भी ऐसा ही है.में रक्षा करते है. वस्ततु ः भैरव को संहारात्मक देवता के रूप में प्रस्ततु कर नदया गया है नजसके कारण सामान्य जनमानस के मध्य आनको भय की द्रनष्ट से देखा जाता है लेनकन आनकी संहारात्मक प्रकृनत साधक के नलए नहीं वरन साधक के शत्रु तथा कष्टों के नलए होती है तथा आसी तथ्य का ऄनभु व तो कइ महानसिो ने ऄपने जीवन में नकया है. यह स्वरुप ्रमोध का ही साक्षात स्वरुप है ऄथाण त पूणण तमस भाव से यक्त ु स्वरुप. यूूँ तो भगवान भैरव से सबंनधत कइ कइ प्रकार के प्रयोग साधको के मध्य है ही तथा आसमें भी बटुकभैरव एवं कालभैरव स्वरुप तो तंत्र साधको के नप्रय रहे है लेनकन साथ ही साथ भैरव के ऄन्य स्वरुप भी ऄपनी एक ऄलग ही नवलक्षणता को नलए हुवे है. आस नलए ईग्र प्रयोग होने के कारण भी आस प्रयोग को यहाूँ पर प्रस्ततु नकया जा रहा है नजससे की अवश्यकता पड़ने पर साधक ऄपने जीवन की तथा ऄपने पररवार की गररमा को रख सके तथा पूणण सरु क्षा को प्राि कर सके . खास कर आनकी संहारात्मक प्रकृनत. ईच्चाटन. प्रस्ततु साधना भगवान के आसी स्वरुप की साधना है नजसको पूणण कर लेने पर साधक आसका प्रयोग ऄपने नकसी भी शत्रु पर कर ईसको जमींन चटा सकता है. अज के यगु में जहां एक तरर् ऄसरु क्षा सदैव ही साधक पर हावी रहती है तथा पग पग पर ज्ञात ऄज्ञात शत्रओ ु का जमावडा लगा हुअ है तब एसी नस्थनत में आस प्रकार के प्रयोग ऄननवायण ही है. आसी नलए भयवश भी आनकी साधना साधक नहीं करते है. . साक्षात् तमस का रूप होने के कारण आनके प्रयोग ऄसहज भी है तथा थोड़े कनिन भी. आनकी ईपासना शत्रओ ु के मारण. यह प्रयोग भी नसर्ण नसिो के मध्य ही प्रचनलत रहा है क्यों की भले ही यह प्रयोग ईग्र है लेनकन आसमें ज्यादा समय नहीं लगता है तथा एक बार साधना सम्प्पन कर लेने पर साधक ईससे जीवन भर लाभ ईिा सकता है.

साधक को नकसी पात्र में मनदरा भी ऄनपण त करनी चानहए. साधक लाल रंग के पष्ु प का प्रयोग करे. प्रयोग के मध्य साधक को तीव्र ऄनभु व हो सकते है. साधक को आस प्रयोग को रक्षात्मक रूप से लेना चानहए तथा ऄपनी तथा घर पररवार की सरु क्षा के नलए साधक यह प्रयोग कर सकता है. करन्यास भ्ाां अङ्गष्ठु ाभयाां नमः भ्ीं तर्जनीभयाां नमः भ्ूां मध्यमाभयाां नमः भ्ैं अनाममकाभयाां नमः भ्ौं कमनष्टकाभयाां नमः . ईस पर नसन्दूर ऄनपण त करे. साधक गरुु पूजन कर नचत्र या नवग्रह का पूजन करे.यह प्रयोग ऄत्यनधक तीव्र प्रयोग है ऄतः साधक ऄपनी नववेक बनु ि के ऄनस ु ार स्वयं की नहम्पमत अनद के बारे में सोच कर ही प्रयोग करे. आसके बाद साधक को गरुु मंत्र का जाप करना चानहए. यह प्रयोग साधक नकसी भी ऄमावस्या या कृष्ण पक्ष ऄष्टमी को स्मशान में या ननजण न स्थान में करे. जाप के बाद साधक न्यास करे. साधक को ऄगर कोइ व्यनक्त ऄत्यनधक परेशान कर रहा हो तथा नबना कारण ऄनहत नकये जा रहा हो तब यह प्रयोग करना ईनचत है लेनकन नसर्ण नकसी को बेवजह परेशान करने के ईद्देश्यअनद को मन में रख कर यह प्रयोग नहीं करना चानहए वरना साधक को आसका पररणाम भगु तना पड़ सकता है. साधक ऄपने सामने भैरव का कोइ नवग्रह या नचत्र स्थानपत करे. समय रानत्र में १० बजे के बाद का रहे साधक काले रंग के वस्त्र को धारण करे तथा काले रंग के असन पर बैिे. साधक का मख ु दनक्षण नदशा की तरर् होना चानहए.

ॎ भ्ां भ्ां भ्ां क्रोधभैरवाय अमक ु ां उच्चाटय भ्ां भ्ां भ्ां फट् (OM BHRAM BHRAM BHRAM KRODHBHAIRAVAAY AMUKAM UCCHAATAY BHRAM BHRAM BHRAM PHAT) मन्त्र जाप पूणण होने पर साधक वही ूँ पर नकसी पात्र में अग प्रज्वनलत कर के १०८अहुनत बकरे के मांस में शराब को नमला कर ऄनपण त करे. दस ू रे नदन नकसी श्वान को दहीं या कुछ भी ऄन्य खाध्य प्रदाथण नखलाएं. ऄगर साधक प्रयोग की अहुनत देने के बाद ननमाण ल्य या भष्म को ईिा . भोग के नलए ऄनपण त की गइ मनदरा वही ूँ छोड़ दे. आस प्रकार करने से ईस व्यनक्त का ईच्चाटन हो जाता है तथा वह साधक के जीवन में कभी परेशानी नहीं डालता. मन्त्र में ऄमक ु ं की जगह सबंनधत व्यनक्त या शत्रक ु ा नाम लेना चानहए नजसके उपर प्रयोग नकया जा रहा हो.भ्ः करतल करपष्ठृ ाभयाां नमः हृदयामदन्यास भ्ाां हृदयाय नमः भ्ीं मिरसे स्वाहा भ्ूां मिखायै वषट् भ्ैं कवचाय हां भ्ौं नेत्रत्रयाय वौषट् भ्ः अस्त्राय फट् न्यास के बाद साधक रुद्राक्ष माला से ननम्पन मन्त्र की ५१ माला मन्त्र जाप करे. आसके बाद साधक को जब भी प्रयोग करना हो तो साधक को रात्री काल में १० बजे के बाद ईपरोक्त न्रमयाओं ऄनस ु ार ही पूजन अनद न्रमया कर आसी मन्त्र की १ माला मन्त्र का जाप कर १०१ अहुनत शराब तथा बकरे के मांस को नमला कर देनी चानहए.

. घर के सभी सदस्यों को दःु ख एवं कष्ट का सामना करना पड़ता है तथा शत्रु पूणण घर पररवार सनहत बरबाद हो जाता है.कर शत्रु के घर के ऄंदर दाल देता है तो शत्रु का पूरा घर परेशान हो जाता है. 2013 MAHARSHI KAALAAGNI RUDRA PRANEET MAAHAAKAAL BATUK BHAIRAV SADHNA PRAYOG जय सगुरुदेव. THURSDAY. FEBRUARY 28.

क्तजस प्रकार नब्द को ककसी भी प्रकार के बंधन में नहीं बााँधा जा सकता ईसी प्रकार भैरव भी ककसी भी क्तवघ्न या बाधा को सहन नहीं कर पाते और ईसे क्तवध्वंन कर साधक को पूणम ऄभय प्रदान करते हैं.यं यं यं यक्ष रूपम दनकदनीवदनं भूक्तमकम्पपयमानं | सं सं सं संहारमूती नुभमुकुट जटानेखरं चंद्रक्तबम्पबम || दं दं दं दीघमकायं क्तवकृ तनख मुख चौध्वमरोयम करािं. पं पं पं पापनानम प्रणमत सततं भैरवं क्षेिपािम || सदगुरुदेव ने भैरव ईपासना के ऄनेक अयाम न के वि बताए हैं ऄक्तपतु ऄनेक साधकों को आसमें क्तनपुण भी ककया है ईनका कहना था कक प्रमयेक साधक को साधना क्षेि में ईतरने से पहिे भैरव साधना ऄवश्य कारण चाक्तहए. क्योंकक आससे ना के वि साधना में अने वािे क्तवघ्न दूर होते हैं बक्तल्क भगवान भैरव कक कृ पा भी प्राप्त होती है. भगवान भैरव को नब्दमय रूप में वर्तणत करने का कारण क्तसफम आतना है कक ऄन्त्य देव कक ऄपेक्षा पूरे ब्रहांड में सवमि क्तवद्दमान हैं. ईनकी आसी नक्ति को साधक ऄनेक रूपों वर्तणत कर साधनाओं के द्वारा प्राप्त कर ऄपने जीवन के दुःख और कष्टों से मुक्ति प्राप्त करते .

भैरव भी क्तनव की ही तरह ऄमयन्त्त भोिे हैं. एक तरफ ऄमयक्तधक प्रचंड स्वरूप जो पि भर में प्रिय िा दे और एक तरफ आतने दयािु की अपने भि को सब कु छ दे डािे.गुप्त निु.हैं... आसके बाद भी समाज में भैरव के नाम का आतना भय कक नाम सुनकर ही िोग कााँप जाते हैं. आस साधना की क्तवनेिता है की ये भगवान् महाकाि भैरव के तीक्ष्ण स्वरुप के बटुक रूप की साधना है जो तीव्रता के साथ साधक को सौम्पयता का भी ऄनुभव कराती है और जीवन के सभी ऄभाव.प्रकट वा गुप्त निुओं का समूि क्तनवारण करती है...मनोकामना पूती और भगवान् भैरव की कृ पा प्राक्तप्त. ईससे तंि मन्त्ि या जादू टोने से जोड़ने िगते हैं. गुरुदेव ने आन्त्हीं भ्रांक्ततयों को दूर करने के क्तिए "भैरव् साधना" नामक पुस्तक भी प्रकाक्तनत की ताकक िोग आसकी समयता को समझें और िाभाक्तन्त्वत हों सकें .. वस्तुतः भैरव साधना भगवान क्तनव कक ही साधना है क्योंकक भैरव तो क्तनव का ही स्वरुप है ईनका ही एक नतमननीि स्वरुप. भैरव की ईन ऄनेक साधनाओं में एक साधना है महर्ति कािाक्तग्न रूद्र प्रणीत"महाकाि बटुक भैरव" साधना.आस १ कदवसीय साधना प्रयोग से संभव है. बहुधा हम प्रयोग की तीव्रता को तब तक नहीं .क्तवपन्नता.ऊण.

ऊष्याकदन्त्यास – .क्तजस के उपर काजि और कु मकु म क्तमक्तश्रत कर उपर क्तचि में कदया यन्त्ि बनाना है और यन्त्ि के मध्य में कािे क्ततिों की ढेरी बनाकर चौमुहा दीपक प्रज्वक्तित कर ईसका पंचोपचार पूजन करना है.सदगुरुदेव और भगवान् गणपक्तत का पंचोपचार पूजन और मंि का सामथ्यामनुसार जप कर िें तमपिात सामने बाजोट पर पीिा वस्त्र क्तबछा िें.स्नान अकद कृ मय से क्तनवृत्त्य होकर पीिे वस्त्र धारण कर दक्तक्षण मुख होकर बैठ जाएाँ.समझ पाते हैं जब तक की स्वयं ईसे संपन्न ना कर िें.पुष्प गेंदे के या रि वणीय हो तो बेहतर है. ऄस्य महाकाि वटुक भैरव मंिस्य कािाक्तग्न रूद्र ऊक्तिः ऄनुष्टुप छंद अपदुिारक देव बटुकेश्वर देवता ह्रीं बीजं भैरवी वल्िभ नक्तिः दण्डपाक्तण कीिक सवामभीष्ट प्राप्तयथे समस्तापक्तन्नवाराणाथे जपे क्तवक्तनयोगः आसके बाद न्त्यास क्रम को संपन्न करें .आस प्रयोग को अप कररए और पररणाम बताआयेगा. ये प्रयोग रक्तववार की मध्य राक्ति को संपन्न करना होता है.ऄब ऄपनी मनोकामना पूती का संकल्प िें.पूजन में नैवेद्य ईड़द के बड़े और दही का ऄर्तपत करना है .और ईसके बाद क्तवक्तनयोग करें .

कािाक्तग्न रूद्र ऊिये नमः क्तनरक्तस ऄनुष्टुप छन्त्दसे नमः मुखे अपदुिारक देव बटुकेश्वर देवताये नमः हृदये ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये भैरवी वल्िभ निये नमः पादयो सवामभीष्ट प्राप्तयथे समस्तापक्तन्नवाराणाथे जपे क्तवक्तनयोगाय नमः सवाांगे करन्त्यास ह्रां ऄङ्गुष्ठाभयां नमः ह्रीं तजमनीभयां नमः रृूं मध्यमाभयां नमः ह्रैं ऄनाक्तमकाभयां नमः ह्रौं कक्तनष्टकाभयां नमः ह्रः करति करपृष्ठाभयां नमः .

मूग ं ा या कािे हकीक मािा से ११ मािा जप करें ॎ ह्रीं वटुकाय क्ष्रौं क्ष्रौं अपदुिारणाय कु रु कु रु वटुकाय ह्रीं वटुकाय .ऄङ्गन्त्यासह्रां हृदयाय नमः ह्रीं क्तनरसे स्वाहा रृूं क्तनखायै विट् ह्रैं कवचाय हूम ह्रौं नेिियाय वौिट् ह्रः ऄस्त्राय फट् ऄब हाथ में कु मकु म क्तमक्तश्रत ऄक्षत िेकर क्तनम्न मंि का ११ बार ईच्चारण करते हुए ध्यान करें और ईन ऄक्षतों को दीप के समक्ष ऄर्तपत कर दें. नीि जीमूत संकानो जरटिो रि िोचनः दंष्ट्रा कराि वदन: सपम यज्ञोपवीतवान | दंष्ट्रायुधािंकृति कपाि स्रग क्तवभूक्तितः हस्त न्त्यस्त ककरीटीको भस्म भूक्तित क्तवग्रह: || आसके बाद क्तनम्न मूि मंि की रुद्राक्ष.

स्वाहा|| Om hreeng vatukaay kshroum kshroum aapduddhaarnaay kuru kuru vatukaay hreeng vatukaay swaha || प्रयोग समाप्त होने पर दूसरे कदन अप नैवद्य े . सदगुरुदेव अपको सफिता दें और अप आन प्रयोगों की महत्ता समझ कर क्तगडक्तगडाहट भरा जीवन छोड़कर ऄपना सवमस्व पायें यही कामना मैं करती हूाँ.अपको क्या ऄनुभव होंगे ये अप खुद बताआयेगा.RUDRA PRAYOG .ें ये प्रयोग ऄनुभत ू है.पीिा कपडा और दीपक को ककसी सुनसान जगह पर रख दें और ईसके चारो और िोटे से पानी का गोि घेरा बनाकर और प्रणाम कर वापस िौट जाएाँ तथा मुड़कर ना देख. तमव क्तवनेि के कारण हर व्यक्ति का नुभव दूसरे से प्रथक होता है.मैंने ईसे यहााँ नहीं क्तिखा है. “क्तनक्तखि प्रणाम” ITARYONI BADHA SE MUKTI HETU .

===================================== यह ऄनंत ब्रह्माण्ड में हम ऄके ले नहीं है आस तथ्य को ऄब विज्ञान भी स्िीकार करने लगा है. खेर. राक्षश. विद्याधर. वजतनी ही ज्यादा िासना प्रबल होगी मनष्ु य की योनी आतनी ही ज्यादा वहन् होती जायेगी. यह विर्षय ऄवयतं िहृ द है लेवकन यहााँ पर विर्षय को आतना समजना ऄवनिायि है. अवद मनष्ु य के ही अवम तवि के साथ लेवकन िासना और दसू रे शरीरों से जीवित है. अधवु नक विज्ञान का विकास और परीक्षण ऄभी कुछ िर्षों की ही देन है लेवकन आस वदशा में हमारे ऊवर्ष मवु नयों ने सेंकडो िर्षों तक कइ प्रकार के शोध और पररक्षण वकये थे तथा सबने ऄपने ऄपने विचार प्रस्ततु वकये थे. मनष्ु य के ऄलािा भी कइ प्रकार के वजि आस ब्रहमाड में मौजदू है. जेसे की भतु योनी से ज्यादा प्रेत योनी वहन् है. वपशाच. वनश्चय ही मनष्ु य से तावविक द्रवि में ऄथाित शरीर के तविों के बंधारण में ये वभन्न है लेवकन आनका ऄवस्तवि बराबर बना रहता है. ऄब आन्ही िासनाओ की पवू ति के वलए या ऄपनी ऄधरू ी आच्छाओ की पवू ति के वलए ये ये वजि एक वनवश्चत समय तक एक वनवश्चत शरीर में घमू ते . अधवु नक विज्ञान में भी कइ प्रकार के परीक्षण आससे सबंवधत होने लगे है तथा एसी कइ शवियां है वजनके बारे में विज्ञान अज भी मौन हो जाता है क्यों की विज्ञान की समज के सीमा के दायरे के बाहर िह कुछ है. आसी क्रम में मनष्ु य के ऄदं र के अवम तवि जब मवृ यु के समय स्थल ू शरीर को छोड़ कर दसू रा शरीर धारण कर लेता है तो िह भी मनष्ु य से ऄलग हो जाता है. जब मनष्ु य की मवृ यु ऄवयवधक िासनाओ के साथ हुइ है तब मवृ यु के बाद ईसको सक्ष्ू म की जगह िासना शरीर की प्रावि होती है क्यों की मवृ यु के समय वजि या अवमा ईसी शरीर में वस्थत थी. िस्ततु ः प्रेत. भतू . आसके ऄलािा लोक लोकान्तरो में भी ऄनेक प्रकार के वजि का ऄवस्तवि हमारे अवद ग्रन्थ स्िीकार करते है वजनमे यक्ष. ऄब यहााँ पर बात करते है मनष्ु य के ही दसू रे स्िरुप की. गान्धिि अवद मख्ु य है. मख्ु य रूप से सभी महवर्षियों ने स्िीकार वकया था की ब्रह्माण्ड में मात्र मनष्ु य योनी नहीं है.

कइ जीिो में यह सामथ्यि भी होता है की िह दसू रों के शरीर में प्रिेश कर ऄपनी िासनाओ की पवू ति करे . प्रस्ततु विधान एक दवक्षणमागी लेवकन तीव्र विधान है वजसे व्यवि सहज ही सम्प्पन कर सकता है तथा ऄपने और ऄपने घर पररिार के सभी सदस्यों को आस प्रकार की समस्या से मवु ि वदला सकता है तथा ऄगर समस्या न भी हो तो भी ईससे सरु क्षा प्रदान कर सकता है. वनश्चय ही आनकी प्रिवृ त और मल ू स्िभाि हीनता से यि ु होता है और आसी वलए ईनको यह योनी भी प्राि होती है. ऄशद्ध ु और ऄचेतन पारद वशिवलंग पर वकसी भी प्रकार की कोइ भी साधना सिलता नहीं दे सकती है. यह प्रयोग साधक वकसी भी सोमिार को कर सकता है. यह पारदवशिवलंग से सबंवधत भगिान रूद्र का साधना प्रयोग है. मल ू तः आसमेंपारद वशिवलंग ही अधार है परु े प्रयोग का. आन आतरयोनी से सरु क्षा प्रािी हेतु तत्रं में भी कइ प्रकार के विधान है लेवकन साधक को आस हेतु कइ बात विविध प्रकार की वक्रया करनी पड़ती है जो की ऄसहज होती है. साधक स्नान अवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्रों को धारण करे तथा लाल असान पर बैठ जाए. साधक रात्रीकाल में यह प्रयोग करे तो ज्यादा ईत्तम है. कइ बार यह ऄपने जीिन काल के दरवमयााँ जो भी कायिक्षेत्र या वनिास स्थान रहा हो ईसके असपास भटकते रहते है. िैसे ऄगर रात्री में करना संभि न हो तो आस प्रयोग को वदन में भी वकया जा सकता है. आस वलए पारद वशिवलंग विशद्ध ु पारद से वनवमित हो तथा ईस पर पणू ि तत्रं ोि प्रवक्रया से प्राणप्रवतष्ठा और चैतन्यकरण प्रवक्रया की गइ हो यह वनतांत अिश्यक है. आनमे भवू म तथा जल तवि ऄल्प होता है आस वलए मानिो से ज्यादा शवि आसमें होती है. साथ ही साथ ऐसे प्रयोग के वलए स्थान जेसे की स्मशान या ऄरण्य या विर मध्य रात्री का समय अवद अज के यगु में सहज संभि नहीं हो पता. आस प्रकार के कइ कइ वकस्से अये वदन हमारे सामने अते ही रहते है. साधक का मख ु ईत्तर की तरि हो. .रहते है. कइ बार ये ऄपने परु ाने शत्रु या विविध लोगो को वकसी न वकसी प्रकार से प्रतावडत करने के वलए कायि करते रहते है.

साधक आसका ईपयोग कइ बार कर सकता है. यह वक्रया ऄदं ाज़े से १० वमवनट करनी चावहए. आस प्रकार यह वक्रया साधक मात्र ३ वदन करे . ॐ नमो भगवते रुद्राय भूत वेताल त्रासनाय फट् (OM NAMO BHAGAWATE RUDRAAY BHOOT VETAAL TRAASANAAY PHAT) मंत्र जाप के बाद साधक पारद वशिवलंग को वकसी पात्र में रख कर ईस पर पानी का ऄवभर्षेक ईपरोि मत्रं को बोलते हुिे करे . ववशेष बात.और मेरा प्रयास मात्र आतना है की सौभाग्य और ईन्नवत पर सभी का ऄवधकार है तो.क्याँू ना हम १ . माला का विसजिन करने की अिश्यकता नहीं है.साधक ऄपने सामने पारदक्तनवचिग को स्थावपत करे . आसके बाद साधक ईस पानी को ऄपने परु े घर पररिार के सदस्यों पर तथा परु े घर में वछड़क दे. ऄगर साधक को कोइ समस्या नहीं हो तथा मात्र ईपरी बाधा से तथा तंत्र प्रयोग से सरु क्षा प्रावि के वलए भी ऄगर यह प्रयोग करना चाहे तो भी यह प्रयोग वकया जा सकता है.भाआयों और बहनों "वतब्बती साबर लक्ष्मी वशीकरण यन्त्त्र" का ऄमोघ विधान वजसे मैंने २१ निम्पबर को देने को कहा था. साधक गरुु तथा पारद वशिवलगं का पजू न करे तथा गरुु मत्रं का जाप करे और विरं वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र जाप पारदवशिवलंग के सामने करे . यह जाप रुद्राक्ष माला से करना चावहए.ईसे मात्र ऄभी आसवलए नहीं वदया है.क्यंवू क बहुत से भाआयों को िो यन्त्र ऄभी भी वकसी ऄपररहायि कारण से प्राि नहीं हो पाए हैं.

.औय मह अत्मधधक प्रबावशारी दे व भाने गए हैं .जजनका अऩने आऩ भें कोई सानी नही ..हफ्ते और प्रतीक्षा कर लें. घॊटाकणि भहावीय की उऩासना जैन धभि भें कहीॊ अधधक होती हैं . ऩय अबी बी वे साये र्वधान जो अत्मधधक चभकृत कयने वारे हैं साध को के साभने आना फाकक हैं . .इनके मन्र के अनेको त्रफबेद भभरते हैं जो की अऩने आऩ भें ही एक अद्भत ु तथ्म हैं ..औय हय मन्र से सॊफॊधधत एक से एक सयर औय उच्च कोदट की साधनाए .तावक सबको यन्त्र वमलते ही ईस ऄवद्रय्तीय वक्रया को सपं न्न करने का विधान एक साथ दे दें.

कबी कबी ऩरयवाय भें ऐसे उऩद्रव प्रायम्ब हो जाते हैं जजसका कोई कायण ही सभझ भें नही आता . औय अफ सफ से तो फच नही जा सकता हैं.कबी कबी ग्रहों के दोष से बी ऩरयवाय भें अनेको घटनामे होने रगती हैं जजनको कोई सख ु द नही कहा जा सकता हैं .. ऩय जफ बी ऐसी सभस्त्मा आमे तो अऩने यऺाथि मह सयर सा प्रमोग आऩ कये आऩ के भरए मह राब दामक भसद्ध होगा... फहुत फाय इन उऩद्रवो के होने का कायण ककसी ककसी व्मजक्त द्वया हभाॉये ऊऩय कोई प्रमोग कयामा बी हो सकता औय ऐसे कर्तऩम ताजन्रको से आज मह सभाज बया ऩड़ा हैं .. फस अचानक ही कर तक सफ साभान्म था औय आज ऩय क्मा हो गमा ... कई फाय इसकी कोई वजह सभझ भें आती हैं तो कई फाय नही. .

भॊर : ॐ महामाया घुंटाकाररणी महावीरी मम सवव उपद्रव.मह सयर प्रमोग हैं कोई ज्मदा ताभ झाभ बी नही हैं .. फाद भें जफ मह भसद्ध कयने की प्रकिमा ऩयी हो जाए तफ जफ मे सभस्त्माए आमे तो र्नत्म १०८फाय गगर औय घी से हवन कयते यहे . आसन वस्त्र ऩीरे हो तो ठीक हैं औय ददशा ऩवि मा उत्तय की होना चादहए . वह बी १०८ फाय . मह आऩके ऩरयवाय भें आ यही अनेको वाधाए दय कयने भें राब दामक ही भसद्ध होगा ..ककया कराया. .ग्रह पीडा हवा बयार.चढा चढाया.. फाद भें गुगुर की छोटी छोटी गोभरमा फना रे उन्हें दे शी घी भें अच्छे तयह से डुफो रे कपय उनसे हवन कये .नािन करु करु स्वाहा || भसद्ध कयने की र्वधध भसपि इतनी हैं ही ककसी बी शुब भहति भें इस भॊर का ११०० फाय जऩ कय रे ककसी बी भारा से .

कफर ईस पंख को अग िगा कर भस्म कर दे. आस . kiya karaya . आस प्रकार १०८ बार करे . nashan kuru kuru swaha | नभ )KUCHH ANUBHOOT TOTKE कौऐ का एक एक पूरा कािा पंख कही से क्तमि जाए जो ऄपने अप ही क्तनकिा हो ईसे “ॎ काकभूनड ुं ी नमः सवमजन मोहय मोहय वश्य वश्य कु रु कु रु स्वाहा”आस मंि को बोिते जाए और पंख पर फूं क िगाते जाए.chadha chadhaya .************************************************************ ****** Mantra : om mahamaya ghantakarini mahaviri mam sarv updrav. ईस भस्म को ऄपने सामने रख कर िोबान धुप दे और कफर से १०८ बाद क्तबना ककसी मािा के ऄपने सामने रख कर दक्तक्षण कदना की और मुख कर जाप करे . grah peeda hawa byaar.

क्ततिक करते समय भी मंि को ७ बार बोिे. आसे ऄपने घर मे स्थाक्तपत कर के महाकािी का पूजन कर “क्रीं” बीज का जाप ककया जाए तो धन सबंधी समस्याओ से मुक्ति क्तमिती है ऄपने घर मे ऄपराक्तजता की बेि को ईगाए. ऐसा क्तनयक्तमत रूप से करने से ग्रह बाधा से मुक्ति क्तमिती है धतूरे की जड़ ऄपने अप मे महमवपूणम है. ईल्िू का पंख क्तमिे तो ईसे ऄपने सामने रख कर “ॎ ईल्िुकाना क्तवद्वेिय फट”का जाप १००० बार कर ईसे क्तजस के घर मे फें क कदया जाए वहा पर क्तवद्वेिण होता है अक के रुइ से दीपक बना कर ईसे क्तनव मंकदर मे प्रज्वक्तल्ित करने से क्तनव प्रस्सन होते है. ऐसा करने पर सवम जन साधक से मोक्तहत होते है मोर के पंख को घर के मंकदर मे रखने से समृक्ति की वृक्ति होती है गधे के दांत पर “ॎ नमो कािराक्ति सवमनिु नानय नमः”का जाप १०८ बार कर के ईसे क्तनजमन स्थान मे रािी काि मे गाड दे तो सवम निुओ से मुक्ति क्तमिती है.भस्म का क्ततिक ७ कदन तक करे . ईसे रोज धुप दे कर “ॎ महािक्ष्मी वाक्तन्त्छताथम पूरय पूरय नमःका जाप १०८ बार करे तो मनोकामना की पूर्तत होती है .

धुप करते समय चन्त्दन का टुकड़ा ड़ाि कर धुप करने से ग्रह प्रस्सन रहते है ककसी चेतनावान मज़ार पर क्तमठाइ को बांटना ऄमयंत ही नुभ माना गया है ऐसा क्तववरण कइ प्राच्य ग्रंथो मे प्राप्त होता है. आससे सभी प्रकारसे ईन्नक्तत की प्राक्तप्त होती है.क्तनजमन स्थान मे “प्रेत मोक्षं प्रदोमभवः”का ११ बार ईच्चारण कर के खीर तथा जि रख कर अ जाए ऐसा ३ कदन करे तो मनोकामना पूर्तत मे सहायता क्तमिती है. अक्सय व्मजक्त छोटी चीजों को बर कय र्वर्वध फड़े फड़े अनष्ु ठान कयवाने के भरए तैमाय हो जाता है . (AMAZING TOTKA TANTRA) ऩॊच तत्व अऩने आऩ भे ही भहत्वऩणि है औय मह हभाये आसऩास ककसी न ककसी रूऩ भे होते ही है . रेककन अगय . अत् इन तत्वों की अवरेहना बी कई फाय र्वर्वध स्त्वास्त्थ्म सफॊधी तथा रक्ष्भी सफॊधी सभस्त्माओ को आभॊरण दे ता है .

हभाये वेदों ने जफ इन तत्वों को दे वताओॊ की सॊऻा दी है तफ इनका ककसी बी रूऩ भे अऩभान मोग्भ्म नहीॊ है . मथा सॊबव भुख्म द्वाय के साभने फहाय की तयप बया हुआ जर स्त्रोत ठीक नहीॊ है . तो फड़ी सभस्त्मा की ऩष्ृ ठबभभ ही नहीॊ फनेगी. इससे घय भे रक्ष्भी तथा स्त्वस्त्थ सफॊधधत सभस्त्माए फढती है . इस प्रकाय जफ कोई ऩौधा घय भे सख ु जाए तो उसे अऩनी भभटटी के साथ ही नदी मा सभद्र ु भे प्रवादहत कय दे . मह बभभ तत्व से सफॊधधत दोष है. इससे बी साधक रक्ष्भी से सफॊधधत सभस्त्माओ से ऩीडड़त यह सकता है . र्नचे र्वर्वध ग्रॊथो से सॊगह ृ ीत तत्वों से सफॊधधत कुछ टोटके प्रस्त्तुत ककमे जा यहे है. · अऩने घय के भख् ु म द्वाय के ऩास जस्त्थय ऩानी नहीॊ यखना चादहए. · घय भे तर ु सी का औय मथा सॊबव ककसी बी प्रकाय का ऩौधा सख ु जाए तो उसे घय भे नहीॊ यखना चादहए.व्मजक्त छोटी छोटी चीजों ऩय ही ध्मान दे ना शुरू कय दे . इसके र्नवायण हे तु साधक को अऩने दयवाज़े ऩय स्त्वाजस्त्तक का धचन्ह फनाना चादहए .

· भॊददय की ध्वजा की ऩयछाई अगय ककसी घय ऩय ऩड़ती हो तो वहा ऩय ऩथ् ृ वी दोष रगता है ऐसा र्ववयण कई ग्रॊथो भे है . व्मजक्त को अऩने घय भे ऺेरऩार की स्त्थाऩना कय योज गुड का बोग रगाना चादहए · स्त्भशान के ऩास गह ृ होने ऩय घय के अॊदय से जरती हुई धचता को दे खने से अजग्भ्न तत्व से सफॊधधत दोष रगता है . ऐसे घय भे यहने वारे व्मजक्त ककसी न ककसी रूऩ भे योग के भशकाय होते यहते है . घय भे ऩानी का टऩकता यहना मोग्भ्म नहीॊ कहा जाता तथा ऐसे घय के सभ्मो भे भानभसक योग की सम्बावना फढ़ जाती है .· घय भे जहा ऩय बी ऩानी रीक हो यहा हो उसे तयु ॊ त ठीक कयवा रेना चादहए. इसके र्नवायण हे तु साधक को ३ अॊजर ु ी जर समि को मा तर ु सी को चडा कय अजग्भ्न दे व से भाफ़ी भाॊगे तथा भत ृ आत्भाओ की भुजक्त के भरए प्राथिना कये · समि को समोदम के सभम अध्मि दे ना अत्मधधक उत्तभ होता है . उस सभम “ औभ घण ृ ी समि आददत्माम सवि दोष र्नवायणाम नभ्” का ११ फाय उच्चायण कयने से सबी दोषों से भुजक्त भभरती है .

इसके फाद ककसी दयगाह मा भज़ाय ऩय भभठाई का बोग रगा कय एक हया धागा वहा से उठा रे. यात्रर कार भे उस जर से वही ऩय नग्भ्न हो कय स्त्नान कये . औय योज “अकराहु भदद” का मथा सॊबव जाऩ कये . . एक हफ्ते की बीतय भदद प्राप्त होती है . जर कुवे का ही होना चादहए औय स्त्नान वही ऩय कयना है . उस धागे ऩय “अकराहु भदद” का ८८ फाय जाऩ कय के ककसी तावीज़ भे बय कय हाथ मा गरे भे ऩहे न रे.· सॊध्मा कार भे साधक अगय र्नजिन वातावयण भे ५ अगयफत्ती ऩॊच तत्वों को माद कय के रगा दे तथा ऩविजो को भदद के भरए प्राथिना कये तो सवि रक्ष्भी तथा स्त्वास्त्थ्म सफॊधधत दोषों की र्नवर्ृ त होती है · समािस्त्त के सभम अऩने जर सॊग्रह स्त्थान के ऩास एक दीऩ जरने ऩय आकाश तथा जर स्त्वास्त्थ्म सफॊधधत सवि दोषों की र्नवर्ृ त होती है · रक्ष्भी सफॊधधत गेफी भदद प्राप्त कयने के भरए कोई कुवाॊ खोजे औय समािस्त्त भे उसभे से जर र्नकारे. एक हफ्ते फाद तावीज़ को उसी भजाय ऩय चडा दे .

aur ye sab prapt hota hai sammohan shakti ke dwara। Yadi aap me Sammohan shakti jagrat hai to safalta aapse door rah hi nahi sakti.koi neta ho . ध !!! .aapka jeevan sathi ho.ek samanya se charvaahe ne us vishaal rajya ko apna gulam hi bana liya. aapka pyar ho . . is shakti ke saamne kisi ki bhi daal nahi galti. ?????? .abhineta ho ya phir koi aam aadmi . Kya aapko ye lagta hai ki sirf sammohit karne ka gun hi is shakti ke dwara mil pata hai to ye matr aapki galat-fahmi hai . dhan aur poornta bhi isi shakti ki anugami upshaktiyan hain. ??? ki.aapka grahak ho .phir chahe wo aapke office me aapka boss ho. Ashtadas siddhiyon me se ek vashitva siddhi ka hi ye ek roop .kyunki is shakti ke vividh aayam hain. drin ichchha shakti ki . jaise ki aarogya. Shayad aapko pata nahi hoga ki Ruso Rasputin ne isi shakti ke bal par Roos par shasan kiya .न . Aap apne sabhi saduddeshya is shakti ke dwara poore kar sakte hain . !!! .

yakshini ki sadhna ki hain. Bhale hi aapko ye baaten atishiyokti poorn lage par ye satya hai . Yakshini ho. Bas sadhna ki satyata par iljaam daal kar aur in sadhnaon ko kapol kalpit kah kar apne kartavya ki iti shri kar lete hain. Apara shakti ka ye aadhaar hai.hai. is satya ko maine Sadgurudev ke aashirvaad se maine G. Adhikansh sadhak jinhone apsara. . Sammohan ki uchchavastha me ye prataykshikaran ki ghatna to samanya baat ho jaati hai. shayad aapne kabhi dhyan hi nahi diya hoga. unhe pratayakshikaran to door koi anubhuti bhi nahi hoti kya aapne socha hai ki jo sadhak safal huye hain unme kya visheshta hai. saamanya manav ki to baat hi chhod dijiye. par ye to apni kamiyon ko najar-andaaj hi karma hai . Sammohan ke paash me abaddh hokar saamne hath baandh kar khadi hoti hain. ध ध औ . phir chahe wo Apsara ho. . lakshmi ho ya anya koi bhi shakti . Kyunki aantrik miya karne ke baad dhatvik miya to saamanya baat hi rah jati hai। .

.औ ध . . . . औ ख . . . ५० . . . . ख ध . .

ध . २४ . . . ध ध . ध .. . औ . . औ .

.औ . . . औ . २४ . . ख .औ औ औ . ध- ध - . - .

त त त त त त .त इ त त त त ए .ए त फ त औ त . त त . त त . ए .औ . औ । (AMOGH SHIV GORAKH PRAYOG) .

आन साधनाओ का क्तवनेि महमव आस क्तिए भी है की क्तसि मंि होने के कारण आन पर देवी देवताओं की क्तवक्तभभन नक्तिया वचन बि हो कर अनीवामद देती ही है साथ ही साथ साधक को नाथक्तसिो का . . नाथयोक्तगयो के गुप्त प्रयोग ऄपने अप मे बेजोड होते है. नैव साधना और नाथयोक्तगयो का सबंध तो ऄपने अप मे क्तवख्यात है. आस प्रकार ईच्च कोरट के नाथयोक्तगयो की क्तनव साधना ऄपने अप मे ऄमयक्तधक महमवपूणम रही है. ए . त फ त त त त .त . एक धारणा यह है की क्तनव रािी के कदन साधक ऄगर क्तनव पूजन और मंि जाप करे तो भगवान क्तनव साधक के पास जाते ही है. वैसे भी यह महाराक्ति तंि की द्रक्तष्ट से भी ऄमयक्तधक महमवपूणम समय है. त त . क्तनव तो ऄपने अप मे तन्त्ि के अकदपुरुि रहे है. क्तनवरािी तो आन साधको के क्तिए कोइ महाईमसव से कम नहीं है. ऄगर आस समय पर क्तनव साधना की जाए तो चेतना की व्यापकता होने के कारण साधक को सफिता प्राक्तप्त की संभावना तीव्र होती है. चाहे वह क्तनव साधना से सबंक्तधत हो या नक्ति साधना के सबंध मे. भगवान के ऄघोरे श्वर स्वरुप तथा अकदनाथ भोिेनाथ का स्वरुप ऄपने अप मे आन योक्तगयो के मध्य क्तवख्यात रहा है.

आसमें साधक का मुख ईत्तर कदना की तरफ होना चाक्तहए. रािी काि मे १० बजे के बाद साधक सवम प्रथम गुरु पूजन गणेन पूजन सम्प्पन करे तथा ऄपने पास ही सद्गुरु का असान क्तबछाए और कल्पना करे की वह ईस असान पर क्तवराज मान है. यह प्रयोग ऄमयक्तधक गुप्त और महमवपूणम है क्यों की . ईसके बाद ऄपने सामने पारद क्तनवचिग स्थाक्तपत करे ऄगर पारद क्तनवचिग संभव नहीं है तो ककसी भी प्रकार का क्तनवचिग स्थापीत कर ईसका पंचोपचार पूजन करे . धतूरे के पुष्प ऄर्तपत करे . साधक को पुरे कदन क्तनराहार रहना चाक्तहए. आस प्रकार ऐसे प्रयोग ऄपने अप मे बहोत ही प्रभावकारी है. वस्त्र असान सफ़े द रहे या कफर कािे रं ग के .अनीि भी प्राप्त होता है. ॎ क्तनव गोरख महादेव कै िान से अओ भूत को िाओ पक्तित को िाओ प्रेत को िाओ राक्षस को िाओ. यह गुप्त प्रयोग श्री गोरखनाथ प्रक्तणत है. ईसके बाद रुद्राक्ष मािा से क्तनम्न मंि का ३ घंटे के क्तिए जाप करे . अओ अओ धूणी जमाओ क्तनव गोरख नम्पभू क्तसि गुरु का असन अण गोरख क्तसि की अदेन अदेन अदेन मंि जाप समाप्त होते होते साधक को आस प्रयोग की तीव्रता का ऄनुभव होगा. दूध तथा फि क्तिए जा सकते है. यह मंि जाप ३:३० बजने से पहिे हो जाना चाक्तहए. साधक थक जाए तो क्तबच मे कु छ देर के क्तिए क्तवराम िे सकता है िेककन असान से ईठे नहीं. क्तनवरािी पर ककये जाने वािे गुप्त प्रयोगों मे से एक प्रयोग है ऄमोध क्तनव गोरख प्रयोग.

यह क्तसफम महाक्तनवरािी पर ककया जाने वािा प्रयोग है.. एक ही राक्ति मे साधक भगवान क्तनव का अनीवामद प्राप्त कर सकता है और ऄपने जीवन को धन्त्य बना सकता है. और आस प्रयोग के माध्यम से मंि जाप पूरा होते होते साधक ईसी रािी मे भगवान क्तनव के क्तबम्पबाममक दनमन कर िेता है.. PAARAD SIDDH SOUNDARYA KANKAN ( धन न . ) ======================================== ================ . ऄगर आस प्रयोग मे साधक की कही चूक भी हो जाए तो भी ईसे भगवान क्तनव के साहचयम की ऄनुभूक्तत क्तनक्तित रूप से होती ही है.

. आसी वलए सदावशि ने बद्ध पारद को ऄनंत क्षमता का अशीििचन वदया. यह कर के वदखाया भी .और वबना सौंदयि के जीिन का कोइ ऄथि नही .हलावक यह सारा कायि सदगरुु देि जी ने ऄपनी पवत्रका मंत्र तंत्र यंत्र विज्ञानं के माध्यम से बहुत िर्षों पहले प्रारंभ कर चक ु े हैं.क्योंवकसवयम वशिम सन्ु दरम की धारणा तो भारतीय मानस मे पहले से हैं .ईन्होंने स्ियं न के बल लेख वलख कर बवल्क ईनके द्रारा अयोवजत वशविरों मे ईन्होंने स्ियं प्रायोवगक रूप से आन बातो को समझाया बवल्क कै से संभि हो सकता हैं आनका वनमािण .पारद मे और विर विवशिं गवु टकाओ मे बदलने की वस्तवथ मे अ पाता हैं... जो देिताओ के द्रारा ईपास्य है ईसकी ईपासना भला मनष्ु य को क्या प्रदान नहीं कर सकती है. और ईसके क्षमताओ की सीमा ही नही पर कहने की ऄपेक्षा जब विवशि संस्कार करके वबवभन्न मंत्रावमक और तंत्रावमक प्रवक्रयाओ ं से गजु रने के बाद ही पारा . सकलसरु मवु नदरे िवै द सििईपास्य तः शंभु बीजं सभी ऊवर्षमवु नयों तथा सरु ऄथाित देिताओ देिगणों के द्रारा पवू जत यह शंभबु ीज ऄथाित वशिबीज पारद है. बात ईठती हैं की पारद एक वदव्यतम धातु हैं.ईसकी पररभार्षा मे सारा विश्व ही अ जाता हैं . आसी वलए यह देिताओ ं के द्रारा भी पवू जत है. मात्र िेधन क्षमता प्राि होने से सभी जन सामान्य का कल्याण सभं ि नहीं है. जब बात सौंदयि की हो तो .. हमने ऄपने आस ब्लॉग और तंत्र कौमदु ी के माध्यम से साथ ही साथ िे सबक ु के ग्रपु के माध्यम से आस पर ऄवयतं सरल भार्षा मे ऄनेको पोस्ट प्रकावशत की हैं .और पारद का संयोग ऄगर आन .पारद पर अज हमारे मध्य आतने लेख और पोस्ट अ चक ु े हैं की ऄब कोइ भी आस धातु को जो की जीवित जाग्रत तरल हैं ईसके वदव्य गणु ों के प्रवत ऄवनवभज्ञता नही रख सकता हैं.... अप मे से ऄनेको ने यह विवशि गटु ीकाए/विग्रह /कंकण प्राि वकये हैं और आनके लाभों को ऄपने वदन प्रवतवदन के जीिन मे देख कर अश्चयि चवकत भी हुये हैं . विर ईसे िेधन क्षमता यि ु करना पर .तो सौंदयि तो जीिन का अधार हैं.

ईपलब्ध कराया गया . एक वदिसीय ऄ्सरा यवक्षणी साधना रहस्य एिं सत्रू पर अधाररत सेमीनार का अयोजन वकया गया .क्योंवक ऄगर सच मे सौंदयि को समझना हैं.अप सभी के वलए ऄ्सरा यवक्षणी रहस्य खडं वकताब और ईस बहु प्रतीवक्षत पणू ि यवक्षणी ऄ्सरा सायज्ु ज्य र्षष्ठ मंडल यन्त्र का प्राि होना वजस यन्त्र पर कोइ भी ऄ्सरा यवक्षणी की साधना के साथ साथ सौंदयि साधना.. तो साधनाओ के प्रवत क्या रुझान रख जाए .सब बातों मे हो जाए तो विर क्या कहना ...पर आन सरल सी लगने िाली साधनाओ मे सिलता बहुत कम को वमली हैं . यवक्षणी.और यह सवय भी तो हैं ..कारण हैं की आनके गोपनीय सत्रू ों का साधको मे न जानकारी होना और वजनके पास जानकारी भी तो ..िास्ति मे आतनी सरल हैं नही . और ऄनभु ि करना हैं तो आन साधनाओ को देखना पड़ेगा ही अवमसात करना पड़ेगा ही पर यह ऄवयन्त सरल सी लगने िाली साधनाए .अकर्षिण साधना भी असानी से समपन्न की जा सकती हैं .वजसका नाम पारद सौंदयि कंकण हैं .पर पारद का संयोग साधना क्षेत्र के माध्यम से ही आस ओर हो सकता हैं.कुबेर साधना.और प्रसन्नता के आन्ही क्षणों मे अररि भाइ जी द्रारा घोवर्षत वकया गया की .आसी बात को ऄपने मन मे रख कर एक .क्योंवक वकन्ही एक की साधना से हमें जो लाभ प्राि हो सकते हैं शायद ईनके ऄलग ऄलग ऄनेको साधनाए करनी पड़े. सदगरुु देि ने ऐसी विविध गवु टकाओ के बारे में विविरण प्रदान वकया तथा ईनके .वशि साधना. वकन्नरी अवद का वििरण न अये यह कै से हो सकता हैं . जहााँ बात सौंदयि साधनाओ की अये तब वनश्चय ही िहां पर ऄ्सरा. जानना हैं.ईन्होंने कृपण भाि बनाए रखा ..अप सभी के द्रारा वजस ईवसाह पिू िक माहौल मे आसका अयोजन हुअ िह तो एक ऄलग ही तवि हैं ..सम्पमोहन साधना.ईनकी तरि से एक ऄदव्् तीय ईपहार जो आस सेमीनार मे भाग लेने िालों सभी व्यवियों के वलए वनशक्ु ल रहा हैं. पर पारद गवु टका/या आस कंकण का आतना महत्त्ि हैं ही क्यों ? रस वसवद्ध के ऄतं गित पारद के दल ु िभ विग्रह तथा गवु टकाओ कंकण का वििरण तो है लेवकन आनकी प्रावि सहज नहीं है क्योंकी आनके वनमािण से सबंवधत सभी प्रवक्रयाए ऄवयवधक गढ़ु तथा दस्ु कर रही है. गन्धिि कन्याए .

दसू री गवु टकाओ के मक ु ाबले भले आस गवु टका में लागत कम लगती है लेवकन आसका महत्त्ि और साधनावमक ईपयोवगता को ज़रा सा भी कम अाँका नहीं जा सकता. देिता या देिगण को प्रवयक्ष ईपवस्थत कर सकता है.  ईन्होंने आस कंकण की विशेर्षता बताते हुये कहा की सबसे पहले तो यह की तंत्र कौमदु ी मे अये हुये यवक्षणी सायज्ु ज्य गवु टका की जगह आस पारद सौंदयि कंकण का प्रयोग वकया जा सकता हैं ..वनमािण पद्धवत को जनसामान्य के मध्य रखा तथा िे ऄपने स्ियं के वनदशिन में ऐसी गवु टकाओ तथा विग्रहों का वनमािण कराते थे. रस वसद्ध सौंदयि कंकण या रसेंद्र सौंदयि कंकण कहा गया है.आस प्रकार से हैं .हालावक ईस गवु टका के ऄन्य प्रयोग भी हैं . िह दसू रों को बााँध देता है. जो खदु मतृ हो कर दसू रों को जीिन देता है. और जब बात सौंदयि तथा श्ंगृ ार की हो तो पारद वसद्ध सौंदयि कंकण का ईल्लेख ऄवनिायि ही है.और िह बहुत ऄवधक मल्ू यिान भी हैं . ऄथाित भस्म के रूप में या ऄपने अप की गवत को बद्ध कर स्ियं की ईजाि स्ियं के वलए ना ईपयोग कर ऄपने साधक को प्रदान कर नतू न जीिन प्रदान करता है. . आसी गवु टका कोपारद वसद्ध सौंदयि कंकण. िशीभतू करने का गणु धारण कर लेता है. वकसी भी देिी. ऄथाित वकसी को भी सम्पमोवहत करने का. मवत को रोक कर ठोस रूप बन कर विविध गढ़ु ज्ञान का साधक को प्रदान करता है ऐसे दल ु िभ तथा रहस्यमय पारद की प्रावि कोन ज्ञानी नहीं करना चाहेगा?‛ आस देि दल ु िभ पारद सौंदयि कंकण के कुछ गणु और लाभ अप सभी के वलए .. मोह्येधः परान बद्धो वजव्येच््मतृ ः परान मवू च्छि तोबोध्येदन्् यन तं सतु ं कोन सेिते ‚ जो खदु बद्ध हो कर दसू रो को बााँध देता है ऄथाित ठोस विग्रह या गवु टका रूप में जो पारद बद्ध हो जाता है.पर ईसके लाभ आस कंकण से भी प्राि वकये जा सकते हैं . अकवर्षित करना का... जो खदु ही मवू छि त हो कर ऄथाित ऄपनी गवत.

. काम्पय प्रयोग का ऄथि ही होता है की गढ़ु शवि का अकर्षिण कर के साधना में ऄभीि को प्राि करना या मनोकामना को पणू ि करना. ऄभीि की प्रावि की संभािना ऄवत तीव्र हो जाती है. मल ू तः यह सौंदयि तथा अकर्षिण गवु टकाओ के ऄतं गित है.  साथ ही साथ यह ऄपने अप मे एक पारद वशिवलगं का भी कायि करे गी .  सौंदयि कंकण के बारे में जैसे कहा गया है.  या वकसी भी प्रकार के काम्पय चाहे िह धनप्रावि हो या विर घर में सख ु शांवत से सबंवधत प्रयोग हो. ऄगर ऐसे वकसी भी प्रकार के काम्पय प्रयोग में आस गवु टका का ईपयोग वकया जाए तोऄथाित गवु टका को रख कर मत्रं जप वकया जाए तो प्रयोग में वजस शवि का प्रभाि है.यह सही हैं की एक पणू ि पारद वशिवलंग एक पारद वशिवलगं ही हैं .पर आसका ईपयोग भी ईस तरह से वकया जा सकता हैं . सौंदयि कंकण पारद गवु टकाओ की श्ेणी में एक ऄवत विशेर्ष गवु टका है वजसका अकार बड़ा नहीं होता है. ऄगर व्यवि ऄपने जीिन में ऐसी अकर्षिण क्षमता को प्राि कर ले की देिता भी ईससे अकवर्षित होने लगे विर जीिन में रस ईमगं तथा सख ु भोग होना तो स्िाभाविक है. लेवकन वजसके उपर कइ प्रकार के प्रयोग सम्प्पन वकये जा सकते है. ईस पर अकर्षिण होता है तथा मंत्र का प्रभाि कइ गनु ा बढ़ जाता है. िह पणू ि अकर्षिण क्षमता से यि ु होता है. साथ ही साथ वकसी भी देिी तथा देिता की साधना में आस गवु टका का होना सौभाग्य सचू क है क्यों की तीव्र अकर्षिण क्षमता के माध्यम से यह वकसी भी देिी तथा देिता का भी यह गवु टका अकर्षिण कर सकती है. ऄतः वकसी भी व्यवि विशेर्ष के अकर्षिण प्रयोग को आस गवु टका के सामने करने पर ईसका विशेर्ष प्रभाि होना स्िाभाविक है.सौंदयि का ऄथि यहााँ पर मात्र व्यवि के सौंदयि से नहीं बवल्क व्यवि के पणू ि जीिन तथा ईससे सबंवधत सभी पक्षों के सौंदयि से है तथा अकर्षिण का भी ऄथि यहााँ पर देह से वनसतृ होने िाले अकर्षिण मात्र से ना हो कर वकसी भी व्यवि या देियोनी के अकर्षिण से भी है.

भौवतक ईन्नवत को प्राि करना. कुण्डवलनी से सबंवधत साधनाओ को आस कंकण के सामने करने से वनश्चय ही कइ साधक के लाभों में िवृ द्ध होती ही है. गन्धििकन्या अवद की साधना चाहे िह ईनके प्रवयक्ष साहचयि के वलए हो या विर ईनके माध्यम से ऄप्रवयक्ष रूप से धन. यवक्षणी. ऄ्सरा. वकन्नरी.  िैभि प्रावि से सबंवधत विशेर्ष लाभ प्राि करने के वलए वजन साधनाओ का ईल्लेख होता है िे कुबेर साधना. आसी प्रकार वकसी भी िशीकरण साधना में भी आस गवु टका को ऄपने सामने स्थावपत करने पर साधक को वनश्चय ही लाभ प्रावि की और छलांग लगाता है. आसको प्रिावहत या विसवजित करने की अिश्यकता नहीं होती.  आस गवु टका में प्रवतष्ठा तथा स्थापन संस्कार वशि शवि सायज्ु ज मंत्रो के माध्यम से वकया जाता है.. आद्रं साधना. ऄिलक्ष्मी साधना जेसे प्रयोग आस कंकण के सामने करने पर साधक को लाभ तीव्रता से प्राि होता है क्यों की कोर्षाध्यक्ष तथा देिराज स्थापन प्रवक्रया जेसी गढ़ु वक्रयाए आस गवु टका पर प्राणप्रवतष्ठा के समय ही संम्पपन की जा चक ु ी होती है. ऄतः मल ू रूप से यह वशि तथा शवि का समवन्ित स्िरुप हीहै आस वलए आस पर वकसी भी प्रकार की कोइ भी वशि ऄथाित कोइ भी देिगण या देिता की साधना और कोइ भी शवि साधना की जा सकती है.  लेवकन साथ ही साथ एक विशेर्ष तथ्य यह भी है की साधक आसके माध्यम से जीिन भर लाभ ईठा सकता है.  आस गवु टका की सब से बड़ी विशेर्षता यह भी कही जा सकती है की यह गवु टका साधक को कोइ भी देिी देिता से सबंवधत कोइ भी प्रयोग को करने पर साधक की सिलता की संभािनाओ ं तीव्रता पिू क ि बढ़ा देता है. या ऐसा .. दोनों ही रूप में सौंदयि कंकण साधना. साध्य ऄ्सरा यवक्षणी या दसू री योनी के प्रवयक्ष ऄप्रवयक्ष रूप से साधक को तीव्रतम रूप से वनकट लाने के वलए कायि करता है. ऐश्वयि.  वकसी भी प्रकार की सौंदयि साधनाओ में यह देि योनी के साक्षावकार में साधक को पणू ि सहयोग प्रदान करती है. आसके ऄलािा आस गवु टका का सबंध चक्र देिताओ ं के साथ है.

सभी को ईपलब्ध कराइ जा सकती हैं .क्योंवक . या देिी देिता की ही साधना आस गवु टका पर हो सकती है. और यह कंकण के बल मात्र ईस सेमीनार मे भाग वलए हुये व्यवियों के वलए ही ईपलब्ध रही .भी नहीं है की वकसी एक वनवश्चत योनी.हम कै से ऄपनी ओर से कुछ भी कह सकते हैं . व्यापर अवद में ईन्नवत आवयावद कइ प्रकार से यह गवु टका साधक को लाभ प्रदान करने में समथि है. आसके ऄलािा भी आसके कइ कइ लाभ साधक को वनवय जीिन में प्राि होते रहते है. पारद से सबंवधत सभी गवु टकाओ की ऄपनी ऄपनी विशेर्षता तथा महत्त्ि है हालााँवक ईनके महत्त्ि को शब्द के माध्यम से ऄवभव्यवि वकतनी भी की जाए कम ही पड़ती है.  वनश्चय ही ऐसे कइ रहस्यमय पदाथि आस श्वृ ि में है वजसके माध्यम से व्यवि ऄपने जीिन को ईध्ििगामी बनाने के प्रयासों में देि बल तथा देि योग को जोड़ कर ईसी कायि को तीव्रता के साथ सम्प्पन कर लाभ को प्राि कर सकता है. कायि क्षेत्र में ऄनक ु ू लता.यह तो ऄवत विवशि स्तर की गवु टका/कंकण के वलए जब तक सदगरुु देि जी के सन्याशी वशष्य वशष्याओ द्रारा ऄनमु वत नही वमल जाये की. पारद वसद्ध सौंदयि कंकण के बारे में ऄ्सरा यवक्षणी साधना पर एक वदिसीय सेमीनार में कुछ चचाि हुइ थी तथा आसके रहस्यमय तथा गढ़ु पक्ष और क्रम के बारे में कुछ तथ्यों के सभी भाइ बवहनों के सामने रखा था.बाद मे ऄनेको भाइ बवहनों ने आस दल ु िभ सौंदयि कंकण को कै से प्राि वकया जा सकता हैं ईसके वलए वलखा पर हमारे द्रारा आस विर्षय मे मौन ही रखा गया . गहृ स्थ सख ु .. .  ऄगर साधक यवक्षणी साधना कर रहा है तब भी आस गवु टका का ईपयोग िह कइ कइ बार ऄलग ऄलग यवक्षणी साधनाओ के वलए कर सकता है.  सौंदयि कंकण के बारे में उपर वजतने भी तथ्य है िह चनु े हुिे मख्ु य तथ्य ही है.

पर यहााँ बात कीमत की नही बवल्क ऄनमु वत की हैं .शेर्ष जो ऄवतबवु द्धमान हैं . .. समय का मल्ू य जानते हैं. क्योंवक आस तरह से सस्ं कार यि ु कोइ भी पारद विग्रह प्राि करना ऄपने अप मे भगिान शंकर का मानो घर पर स्थापन और पारद मे स्ित ही लक्ष्मी तवि रहता हैं. क्योंवक आसके लाभ से अप ऄिगत हो ही चक ु े हैं .े जो की . ऄतः ऄब और ऄवधक क्या वलखा जाए .ईन्होंने आसमें प्रकावशत होने िाली वकताब ‚ऄ्सरा यवक्षणी रहस्य खडं ‚ को प्राि वकया हैं हम ईन्हें भी यह गवु टका ईपलब्ध नही करा पाए हैं .वजनको भी ऄ्सरा यवक्षणी साधना मे पणू िता प्राि करना हो ईसमे यह सहयोगी कारक कंकण .वसिि आतना ही की .यह वसिि आसवलए ईपलब्ध हो पा रही हैं की िस् आसे सौभाग्य कहा जा सकता हैं . या सनु ा हैं.और .या वजनका प्रारंभ होना मानो जीिन मे साधना सिलता के वलए एक द्रार सा खल ु जाना हैं . ईस लक्ष्मी तवि का अपके घर पर स्थापन हैं और साधना समय मे एक आस तरह के ईच्च कोवट का पारद कंकण अपके सामने रहेगा तो स्ित ही अपके ऄतं : शरीर मे सक्ष्ू म पररितिन प्रारंभ होने लगेग..ईन्हें क्या और वलखा जाए ...और जो भी उपर बताये लाभों को प्राि करना चाहते हो ईन्हें यह ऄिसर का लाभ ईठाना ही चावहये . या जो भी आसको प्राि करना चाहते हैं... अप मे से वजन को भी यह गवु टका प्राि करना हो .यह हमारा सौभाग्य हैं की वजन्होंने भी आसके बारे मे पढ़ा हैं.और वजन भी भाइ बवहनों ने जो आस सेमीनार मे भाग नही ले पाए हैं.ईनके वलए यह एक ऄिसर हैं की आस देि दल ु िभ गवु टका को प्राि कर सकते हैं ..जो समझदार हैं . ज्ञानिान हैं. प्रज्ञा सम्पपन्न हैं.ईनके वलए तो आशारा कािी हैं . यहााँ सौंदयि कंकण की कीमत पारद की ऄन्य गवु टकाओ की कीमत की तल ु ना मे बहुत कम हैं ..हालावक ईन सभी ने यह वलखा था की िे वकसी भी कीमत पर आसको प्राि करना चाहेंगे .

. तथा जैन तंत्र पद्धवत में यक्ष तथा यवक्षणी के सबंध में वकस प्रकार ऄनेको तथ्य है. आस प्रयोग के माध्यम से साधक वनवश्चत रूप से यवक्षणी साधना में सिलता की और ऄग्रसर हो सकता है. आसके ऄलािा भगिान मवणभद्र की साधना का यवक्षणी साधना से क्या सबंध है. ऄब हम यहााँ पर विशेर्ष चचाि करें गे यक्षमडं ल स्थापन प्रयोग की.पारद सौंदयि कंकण ऄिश्य वलख दे .. .com पर आ मेल कर और भी जानकारी ले सकते हैं . क्यों की यह प्रयोग जैन तत्रं पद्धवत का गिु तथा महविपणू ि प्रयोग है. धन 5) ===================================== यवक्षणी साधना के पररपेक्ष में ऄब तक हमने जाना की वकस प्रकार अकाश मडं ल की अिश्यकता क्या है तथा आसमें क्रोध बीज और क्रोध मद्रु ा का वकस प्रकार से संयोग होता है.हााँ आ मेल के विर्षय मे ..अप मे से जो भी आस गवु टका को प्राि करना चाहे िहnikhilalchemy2@yahoo.

आसके बाद यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग मंत्र का जाप वकया जाता है वजसके माध्यम से यन्त्र में स्थावपत देिता को स्थान प्राि होता है तथा यन्त्र पणू ि चैतन्यता को प्राि कर सके . ऄतः ईनका स्थापन भी वनतांत अिश्यक है ही. यह स्थापन विशेर्ष मंत्रो के द्रारा होता है. और जहां तक बात सेमीनार की है तो कुछ तथ्य वनवश्चत रूप से हरएक व्यवि के सामने रखने के योग्य नहीं होते है. हमारी सदैि कोवशश रही है की हम वमल कर ईस प्रकार के ज्ञान को सब के सामने ला पाए. आस प्रयोग के ऄंतगित साधक को सिि प्रथम २४ यक्ष. तथा २४ तीथंकर ऄथाित जैन धमि के अवद महापरुु र्षों के अशीर्ष के वबना यह कै से संभि हो सकता है. २४ यक्ष वजनके बारे में जैन तन्त्रो में ईल्लेख है िह सभी यक्ष के बारे में यही धारणा है की ईन सभी देिो का यक्षलोक में महविपणू ि स्थान है. यही बात २४ यवक्षणी के बारे में भी है.यह प्रयोग भी यवक्षणी साधना संयि ु ऄथाित क्रोध बीज यि ु िायु मंडल पर वकया जाता है. २४ यवक्षणी तथा २४ तीथंकरों का स्थापन यन्त्र में करना रहता है. आसके बाद साधक को यवक्षणी वसवद्ध मत्रं का जाप करना रहता है. और यह काम्पय प्रवक्रया है ऄथाित जब भी कोइ भी यवक्षणी साधना करनी हो तो आस अकाशमडं ल के सामने आससे सबंवधत एक विशेर्ष मत्रं का ११ माला ईच्चारण कर साधना करने से साधक सबंवधत यवक्षणी का िशीकरण करने में समथि हो जाता है. वजनका लक्ष्य हो ईनके सामने मात्र ही ईन तथ्यों को रखा जाए तब . आस मंत्र जाप से अकाश मंडल में स्थावपत यक्षमडं ल को साधक की ऄवभलार्षा का ज्ञान हो जाता है तथा साधक एक रूप से मंत्रो के माध्यम से यवक्षणी वसवद्ध की कामनापवू ति हेतु प्राथिना करता है. यवक्षणी साधना से सबंवधत ऐसे कइ दल ु तम विद्धान है वजनको ऄपना कर साधक ु िभ तथा गह्य ऄपने लक्ष्य की और ऄपनी पणू ि क्षमता के साथ गवतशील हो सकता है. या यु कहे की यह क्रम पणू ि होता है. ऐसे कइ विधान जो वसिि गरुु मख ु ी है तथा ईनका ज्ञान मात्र गरुु मख ु ी प्रणाली से ही हो सकता है. वजनकी रूवच हो. यह पणू ि यक्ष मंडल है. यह प्रवक्रया साधक के यवक्षणी साधना के द्रार खोल देती है. आस मत्रं जाप के बाद साधक पजू न अवद प्रवक्रयाओ को करता है तथा आस प्रकार यह प्रयोग पणू ि होता है. आसके बाद मवणभद्र देि प्रशन्न प्रयोग तथा ऄंत में यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग वकया जाता है. वजसमे अकाशमंडल का वनमािण और स्थापन.

और ऐसे साधक को रहस्यों की प्रावि हो जाती है तथा िह ऄपना नाम सिल साधको की श्ेणी में ऄवं कत कर लेता है. और ज्ञान के क्षेत्र में तो ऄनंत ज्ञान है ऄतः जो अगे बढ़ कर वजतना प्राि करने का प्रयवन करे गा ईसको ईतना ज्ञान ऄिश्य रूप से वमलता ही है. रहस्यों को प्रकाश में लाना ईतना ही ज़रुरी है वजतना की ईनकी प्रवक्रयाओ को समजना और आन सब के मल ू में होता है योग्य पात्र. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 1:27 PM No comments: Labels: APSARA. 2012 धन 4) . MY VIEW. और ऄगर सब कंु जी या गढ़ु प्रवक्रयाए प्रकाश में होती तो िो भी ईपेक्षा ग्रस्त हो कर एक सामान्य सी प्रवक्रया मात्र बन जाती तथा ईसकी ना कोइ महत्ता होती न ही वकसी भी प्रकार गढू ाथि. वजसको वजतनी ज्यादा ्यास होगी िो ईतना ही ज्यादा प्रयवनशील रहता है. विर सदगरुु देि का अशीर्ष तो हम सब पर है ही. ईस प्रवक्रया की तथा ईस गरुु मख ु से प्राि प्रवक्रया से सबंवधत रहस्यिाद की गररमा बनी रह सकती है.साधक की . तो साधनामय बन सिलता को प्राि कर हम ईनके ऄधरों पर एक मस्ु कान का कारण ही बन जाये तो एक वशष्य के वलए ईससे बड़ी वसवद्ध हो भी नहीं सकती. क्यों की ऄगर यह महविपणू ि नहीं होता तो अज कुछ भी गिु होता ही नहीं. AUGUST 4. ईस साधना की. लेवकन आन सब के मल ू में भी एक तथ्य है. ज्ञान प्रावि के तष्ृ णा. SEMINAAR. वजनमे लोलपु ता है िह ज्ञान प्राि करने के वलए वकसी भी विपरीत पररवस्थवत यो में भी कै से भी गवतशील हो कर ज्ञान को ऄवजित करता ही है. YAKSHINI SADHNA SATURDAY.

महािीर स्िामी को २४ िे तीथंकर कहा जाता है तथा ईनसे पहले के सभी तीथंकर के वलए भी यह बात स्िीकार की जाती है की सभी तीथंकरों के वलए एक यक्ष तथा एक यवक्षणी ने समय समय पर आतं ज़ार वकया . वजस तरह अगम शाश्त्रो में सौंदयि साधनाओ का महत्त्ि है ईसी प्रकार से दसू रे तंत्र मागि में भी ऄ्सरा तथा यवक्षणी साधनाओ का भी ईतना ही अधार है. जैन तंत्र पद्धवत ऄपने अप में दल ु िभ रहस्यमय तथा गढ़ु पद्धवत है. वकस प्रकार से अकाशतवि की ऄवनिायिता है ईसकी प्रवतकृवत स्िरुप मडं ल क्यों ऄवनिायि है. सभी में सौंदयि साधनाओ का ईल्लेख है तथा सौंदयि साधनाओ का ईतना ही महविपणू ि स्थान सभी जगह वनधािररत है. चाहे िह बौद्ध धमं से सबंवधत यमारी तत्रं हो या जैन तत्रं शाश्त्र. और जहां पर हम बात यक्ष लोक के सबंध में कर रहे हो तो जैन तंत्र का नाम ईल्लेवखत करना अिश्यक ही नहीं ऄवनिायि कहा जा सकता है.========================================= वपछले लेखो में हमने जाना वकस प्रकार साधना में तविों का महत्त्ि है. आसके ऄलािा साधक में िीरभाि क्यों होना ज़रुरी है और िीरभाि में क्रोध मद्रु ा का ऄथि क्या होता है. जैन समाज का एक बहोत ही बड़ा योगदान है यक्ष लोक से सपं कि सत्रू स्थावपत करने तथा ईससे सबंवधत तथ्यों को सब के सामने रखने का.

पद्मािती. आसके पीछे का रहस्य यह है की मवणभद्र साधना करने िाले साधक को यक्ष तथा यवक्षणी ऄद्रश्य रूप से सहयोग प्रदान करती रहती है. पाश्विनाथ. ऄगर जैन आवतहास को योग्य रूप से जाना जाए तो यह ज्ञात होता है की आन सभी देिी देिताओ का सबंध यक्ष लोक से बताया जाता है. घंटाकणि. जैन तांवत्रक ईपासना पद्धवत में कुछ देिी तथा देिताओ की साधना मख्ु य रूप से होती है. तो जब आन देिी तथा देिताओ ं की साधना ईपासना की जाती है तब आनके वलए यक्ष लोक से सबंध स्थावपत करना ईनके वलए सहज हो जाता है. कुछ सालो पिू ि ही राजस्थान में ऐसे ही एक गिु भिन को एक जैन मवु न ने प्रकाश में लाने का प्रयास वकया था साथ ही साथ ईन्होंने सब के सामने ईस भिन में प्रिेश कर के िहााँ से ऄज्ञात धातओ ु की तथा कीमती रवनों की मवु तिया बहार वनकाल कर लोगो के सामने दशिन हेतु २-३ वदन रखी थी. सायद यह बात लोगो को कल्पना लग सकती है लेवकन आस घटना के साक्षी सेकडो लोग रहे है तथा ऐसे कइ ईदहारण है जो की परु ातन नहीं है. और ऐसा आस वलए होता है क्यों की यक्षों की सेना के सेनापवत . आसके साथ ही साथ गोपनीय तथ्य यह भी है की भगिान मवणभद्र के साधक को ऄनायास ही धन की प्रावि होती रहती है.है. मवणभद्र आवयावद. जैन मवु नयों तथा तंत्र साधको के बारे में वजन्होंने भी जानने की कोवशश की होगी ईन्हें यह तथ्य वनवश्चत रूप से ज्ञात होगा की यक्षों के पथ्ृ िी लोक पर जो गिु भिन है ईनसे जैन मवु नयों तावन्त्रको का बहोत ही वनकटिती सबंध रहा है. जब िो भिन में कुछ और अगे गए थे तब ईनको यक्षों ने नम्र विनंती कर रोक वलया था क्यों की िहााँ से ईनके वनगिदद्रार बने हुिे थे वजसके माध्यम से यक्ष लोक में सीधा प्रिेश प्राि वकया जा सकता है. यहााँ पे हम यह चचाि आस वलए कर रहे है की यह ज्ञात हो पाए की अवखर िह कोनसा तथ्य वजसके माध्यम से ईन योवगयो के वलए यह सहज सभं ि हो जाता है. क्यों की यक्षलोक के मख्ु य देिी तथा देिताओ के अशीिािद की प्रावि िह कर लेते है. यहााँ पर एक विशेर्ष तथा ईल्लेखनीय तथा यह है की मवणभद्र तांवत्रक साधना कइ प्रकार से जैन पद्धवत में होती रही है तथा जैन तंत्र साधको के मध्य ईनकी साधना ईपासना हमेशा ही अकर्षिण का के न्द्र रही है क्यों की भगिान मवणभद्र की साधना तीव्र रूप से िल प्रदान करती है. आसके ऄलािा परु ातन जैन ग्रंथो में कइ कइ जगह ऐसे ईदहारण प्राि होते है वजनमे जैन मवु नयों का संपकि यक्ष यवक्षणी तथा यक्ष लोक से रहा है.

भगिान मवणभद्र को माना गया है और जैन तंत्र की धारणा ऄनसु ार मवणभद्र देि का आस प्रकार एक ऄवत महविपणू ि स्थान यक्ष लोक में है. आस वलए यवक्षणी साधना से पहले ऄगर मवणभद्र देि से सबंवधत कोइ प्रयोग कर वलया जाए तो वनवश्चत रूप से सिलता की संभािना बढ़ जाती है. SEMINAAR. AUGUST 1. याँू भगिान मवणभद्र से सबंवधत कइ प्रयोग है लेवकन गिु रूप से ऐसे प्रयोग भी प्रचलन में रहे है जो प्रयोग यवक्षणी साधना से सबंवधत है तथा वजसके माध्यम से साधक को यवक्षणी साधना में सहयोग वमलता है. यह प्रयोग मात्र एक ही रावत्र में वसद्ध हो सकता है. लेवकन क्या जैन तत्रं में यवक्षणी साधना में सिलता के वलए वसिि आतना ही विधान है? ‘यक्ष मंडल स्थापन प्रयोग’ एक ऐसा प्रयोग है वजसके माध्यम से व्यवि जैन तंत्र के माध्यम से यवक्षणी साधना में पणू ि सिलता की प्रावि कर सकता है. ऐसा ही प्रयोग मवणभद्र प्रसन्न प्रयोग है वजसके माध्यम से साधक न ही वसिि यवक्षणी साधना में सिलता प्राि कर सकता है साथ ही साथ मवणभद्र देि से सबंवधत सभी काम्पय प्रयोग में भी पणू ि सिलता प्राि करता है. क्या है यह प्रयोग आस पर चचाि करें गे ऄगले लेख में. 2012 धन 3) . MY VIEW. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 2:15 PM 1 comment: Labels: APSARA. YAKSHINI SADHNA WEDNESDAY.

======================================= पररणाम को प्राप्त करने के क्तिए हम क्तजस प्रकार मानक्तसक क्तवचारों का अधार बनाकर साधना नुरू करने के क्तिए क्तजस मानक्तसक पृष्ठभूक्तम का क्तनमामण करते है ईसे ही भाव कहा जाता है. मुख्य रूप से तंि में क्ततन भाव के बारे में ईल्िेख क्तमिता है. पनुभाव वीरभाव कदव्यभाव आन भावो का ऄपना ऄपना क्तवस्तृत ऄथम है तथा साधक कोइ भी साधना आन क्ततन भावो में से ककसी एक भाव से युि हो कर करता है. .

कदव्यभाव आन दोनों भाव से उपर है.आसका सामान्त्य ऄथम क्तनकािा जाए तो पनु ऄथामत ऄबोध भाव से या क्तसफम नरीर को ध्यान में रख कर ककसी भी साधना को करना पनुभाव है. यह दोनों को पनुभाव की साधना आस क्तिए कहा गया है क्यों की यह साधना करते वि साधक की मनःक्तस्थक्तत पूणम . तंि में कॉि मागम की साधनाओ को ही कदव्य भाव से युि साधना कहा गया है या कफर कइ बार कॉिमागम तथा क्तसिंताचार में ही कदव्यभाव का प्रयोग हो सकता है ऐसा क्तववरण क्तमिता है. जो व्यक्ति यक्तक्षणी तथा ऄ्सरा साधनाओ को नारीररक सुख से सबंध में साधना देखता है ईसकी साधना पनुभाव युि हो जाती है या जो व्यक्ति खुद को दारुण मानक्तसकता के साथ या दास हो कर साध्य को सवमश्रेष्ठ मानकर भी आस साधना को करता है वह भी पनुभाव युि साधना कही जाती है. क्तजस साधना में साधक नौयम से पररपूणम हो नक्ति को प्राप्त करने का भाव रख कर साधना करता है ईसे वीर भाव कहा जाता है. साधक क्रमनः पहिे पनुभाव तथा वीरभाव में पूणमता प्राप्त करने पर माि ही ईसे कदव्यभाव की और ऄग्रसर ककया जाता है. वीर भाव में साधक माि नरीर से ही नहीं अतंररक रूप से नक्ति के संचार के क्तिए कायमरत हो जाता है. यह भाव एकीकरण का भाव होता है तथा साधक और आष्ट में कोइ भेद नहीं रहता है. यहााँ पर हम प्रथम दो भाव की चचाम करें गे.

यही बात सदगुरुदेव भी कइ बार बता चुके है. यहााँ पर सौंदयम का अधार है प्रकृ क्तत. नारीररक नक्ति तथा मानक्तसक नक्ति. ऄब यहााँ पर हम वीरभाव की चचाम करते है की ऄगर आस साधना को वीर भाव के साथ करना है तो आसका ऄथम क्या हुअ. आस क्तिए ऄगर साधक आसे पनुभाव के साथ सम्प्पन करता है तो सफिता क्तनक्तित रूप से क्तमि ही नहीं सकती. यहााँ पर व्यक्ति की दो प्रकार की नक्तियां कायम करती है.रूप से नारीररक धराति पर ही क्तस्थर है. ककस प्रकार अतंररक सौंदयम तथा बाह्य सौंदयम का क्तमिाप योग्य रूप से होना ज़रुरी है. और साधना को माि बाह्य रूप से ना देख कर अतंररक रूप से भी देखा तथा समजा जाए. मूि प्रकृ क्तत की साधना है. कै से? यक्तक्षणी माि भोग्या नहीं है. और साधक की मानक्तसकता क्तसफम नरीर पर ही क्तस्थर है. हमारे नरीर तथा हमारे मनः दोनों क्तस्थक्ततयो में हमारा ध्यान माि हमारी साधना ही हो. और सौंदयम साधना मूितः सौंदयम तमव की साधना है. िेककन सौंदयम साधना वीर भाव की साधना है. सौंदयम का अधार क्तसफम यहााँ पर नरीर नहीं है. और सौंदयम का ऄथम माि खूबसूरती नहीं है. आसके बारे में कइ बार क्तववेचना दी जा चुकी है. ऄगर साधक को सौंदयम प्राप्त भी हो जाए और ईसके घर में दो समय रोटी नहीं हो तो क्या ऄथम है? साधक के अस पास की .

साधना प्रकक्रया तो बहोत बाद की बात है.प्रकृ क्तत में साधक को ईस सौंदयम का ऄहेसास हो सके . मुद्राप्रदनमन अकद सभी नारीररक रूप से होता है. मानक्तसक रूप से सवम अवश्यक तमव है अपका मनोबि तथा दृढ क्तवश्वास. यन्त्ि. साधक को कु छ अवश्यक तथ्यों से यहााँ पररक्तचत कराना चाहूाँगा. तृक्तप्त का बोध हो सके . अपका असान. और आस साधना को पनुभाव से नहीं ककया जा सकता आसका कारण भी यही है की सौंदयम साधना माि नरीर से सबंक्तधत नहीं है. आसके ऄिावा दृढ . ऄगर साधक आन साधनाओ की गंभीरता को समज सकता है तो क्तनक्तित रूप से वह वीरभाव से युि हो कर साधना कर सकता है. नारीररक रूप से अपकी साधना प्रकक्रया होती है. अपकी मनः क्तस्थक्तत आष्ट साध्य तक पहोचाती है और ऄगर अपका मनोबि टूट रहा है की में नहीं कर सकता या मुझसे तो ये संभव ही नहीं है तो प्रमयक्षीकरण संभव नहीं है. ऄब यह ककस प्रकार से संभव होगा की हम मानक्तसक तथा नारीररक दोनों नक्तियों को साधना में जोड़ दे ? सवमप्रथम साधक को आस बात से उपर ईठाना होगा की यह भोग्या की साधना नहीं है. मंिजाप.

क्रोध मुद्रा पौरुि का प्रदनमन करती है. हर एक बीज मंि की सामथ्यम ककतनी हो सकती है यह कल्पना से . आसके क्तिए ज़रुरी है बीज मंिो का प्रयोग. िेककन आसके बारे में थोडा समजना होगा. आस प्रकार से यह मानक्तसक तथा ईसके ऄनुरूप नारीरक अचरण से युि होना ही साधना को वीरभाव से युि हो कर साधना करना है. जब हम क्रोध में हो तो मानक्तसक धराति से नारीररक धराति का प्रदनमन होता है. ऄगर हमने मुट्ठी तन कर बैठ भी गए है िेककन मन में तो यही है की ऐसा होता हे भी की नहीं? तो ये नहीं हो सकता. तो ईसे वीरभाव से संचाररत करने के क्तिए क्या ईसका क्तनमामण कै से हो. ऄब हम वापस ऄपने कि वािे मुद्दे पर अते है. िेककन आन साधनाओ में तीव्रता के क्तिए एक और क्तनतांत अवश्यक तथ्य सदगुरुदेव ने बताया है.क्तवश्वास की साधना में प्रमयक्षीकरण होगा ही क्यों की यह अपके मंिो की तीव्रता का अधार आस पर ही अधाररत है. मतिब की क्रोध है ही नहीं और ना ही क्रोध मुद्रा है. वह है क्रोधमुद्रा. क्यों की मंडि हमें ईस प्रकार से क्तनमामण करना है क्तजससे की हमें यक्तक्षणी साधनामें सफिता क्तमिे. क्रोध सारी नक्ति को मन में एकक्तित कर एक ही क्तवचार पर कें कद्रत करने की प्रकक्रया है जहां पर ककसी भी तरह िक्ष्य माि ही सब कु छ हो जाता है और तब मुट्ठी बांधने की ज़रूरत नहीं है तब मुट्ठी ऄपने अप तन जाती है.

2012 ( धन २) ============================================ पिछले लेख में हमने जाना की पकस प्रकार आकाशतत्व तथा दूसरे तत्वों में सबंध है तथा आकाशतत्व का साधना से क्या सबंध है. MY VIEW. आस क्तिए आस मंडि क्तवधान को क्रोधबीज युि अकानमंडि यन्त्ि प्रकक्रया कहा जाता है. JULY 30. पनपित रूि से .बाहर का क्तविय है िेककन यहााँ पर में ईल्िेख करना चाहूाँगा की ऄगर आस प्रकार का मंडि क्तवधान क्रोधबीज से युि हो तो वह साधक में भी वाही भाव का संचार करे गा. SEMINAAR. ****RAGHUNATH NIKHIL**** ****NPRU**** Posted by Nikhil at 2:56 PM 2 comments: Labels: APSARA. YAKSHINI SADHNA MONDAY.

यहााँ िर हम यपिणी साधना के बारे में चचाा करें गे. सवा प्रथम हमें ये जानना ज़रुरी है की मंडल का तात्पयव क्या है. हााँ लेपकन सभी से सबंपधत प्रपियाए अलग अलग है. इष्ट साधको के सामने प्रत्यि नहीं है तो साधक उनकी प्रपतकृपत को ही अिने सामने पनमाा ण कर ले और इसके बाद साधक उसमे प्रपतष्ठा कर दे तो वह इष्ट रूि आकृपत मंडल बन जाती है जो की एक साथ अनेक काया कर सकती है या दूसरे शब्दों में मंडल उस इष्ट से सबंपधत सभी कायों को सम्प्िन कर सकता है पजस के पलए उसका पनमाा ण हु आ हो. यह सामन्त्य भेद है. यन्त्त्र उजाा को रूिांतररत कर के उसे सबंपधत देवी या देवता तक िहोचाना है जब की मंडल इससे पभन्त्न है. सामान्त्यजन को यंरो के बारे में जानकारी भले ही हो लेत्रकन मंडल त्रर्धान की जानकारी बहोत ही कम प्राप्त होती है.?? यन्त्र तथा मंडल तांत्ररक पद्धत्रत के दो महत्र्पर् ू व अंग है. लेपकन यह पजतना सामन्त्य पदखता है . उदहारण के पलए एक साधक शत्रु समस्या से मुपि के पलए प्रयोग करता है और उसके सामने शत्रु गपत स्तम्भन यन्त्त्र है तो उसके द्वारा की गयी प्रपिया तथा मंत्रो की उजाा से काया सम्िापदत करने के पलए जो शपि है. यन्त्र एक एसी आकृत्रत होती है त्रजनमे प्रत्रतष्ठा करने पर र्ह आपकी मांत्ररक उजाव को इष्ट तक या अभीष्ट तक पहोचाने का कायव करती है या सबंत्रधत देर्ी देर्ता तक पहोचने का कायव करती है. मंडल का तात्िया एसी आकृपत है जो की इष्ट की प्रपतकृपत हो. चाहे वह अप्सरा यपिणी हो या कोई भी देवी देवता हो. जो उस काया से सबंपधत देवी या देवता या इष्ट है उन तक यह उजाा िहोचाने का काया यंत्रो के द्वारा होता है.आकाशतत्व का सबंध पकसी एक साध्य से नहीं वरन सभी साध्य से है.

उसे बदलने की या पवसपजा त करने की आवश्यकता नहीं होती. सदगुरुदेव के समय में ऐसे दुलाभ मंडलयन्त्त्र प्रचलन में थे पजनमे वह एक साथ कई देवी तथा देवता का स्थािन सदगुरुदेव खुद ही सम्प्प्न करते थे तथा एक ही ऐसे मंडलयंत्र में कई यन्त्त्र एक साथ होते थे. इससे सदगुरुदेव के यंत्रो तथा मंडलों के सबंध में उनके ज्ञान की पवशालता का िररचय होता है तथा हर प्रयोग से िहले वह यंत्रो की महत्ता उनसे सबंपधत प्रपिया तथा प्रपतष्ठा िम के बारे में साधको को बताते थे. कई बार सदगुरुदेव ने एक साथ ७ – ८ देवी देवताओ से सबंपधत यन्त्त्र आकृपत का एक िण ू ा मंडल बना कर उसे यंत्रो के स्वरुि में साधको को प्रदान पकया है. अब इसको इस प्रकार से समझा जाए की एक सामान्त्य व्यपि के पलए यह कैसे संभव हो . पनिय ही यह पवद्या एक अमल्ू य पवद्या है तथा इनकी महत्विण ू ा ता को द्रपष्ट में रखे तो मंडलयंत्र दुलाभ ही कहे जा सकते है. कई मंडलों को बनाने में कई महीने तथा कई बार कई साल लग जाते है. मेने कुछ िुराने गुरुभाइयो के िास ऐसे दुलाभ यंत्रो को देखा है तथा उनका कथन भी यही है की ऐसे दुलाभ मंडल की प्रापि पनपितरूि से सवा सफलता की प्रापि है. मंडलयंत्रो के सन्त्दभा में पकतने ही भेद तथा उिभेद है. पतब्बत के कई बौद्ध मठो में कई सपदयों िुराने मंडलयन्त्त्र पवद्यमान है पजन िर इतने साले से साधनाए होती आई है. इसके बाद इन मंडलों का लाभ कई िीपढ उठा सकती है. इन िंपियों की गंभीरता वही समझ सकता है जो ऐसे यंत्रो के सबंध में ज्ञान रखता हो तथा पजन्त्होंने इनकी प्रपतष्ठा होते हु वे देपख हो या खुद कभी पकसी यन्त्त्र की प्रपतष्ठा की हो.उतना ही गुढ़ है और उतना ही रहस्य से िण ू ा है.

इसमें भी कई भेद तथा उिभेद है. पिछले लेख में हमने जाना की अगर हमारा आकाशतत्व से संिका हो जाए तो पनपित रूि से यह संभव है की हम आवाज़ दे तो वह सबंपधत इष्ट तक िहोच जाए क्यों की आकाशतत्व सवा व्यािी है.की वह महीनो तक या सालो तक एक मंडल बनाये तथा उसके बाद उस िर साधना करे . लेपकन आकाशतत्व तो सवा व्यािी है तो उसे पकसी एक जगह केसे एकपत्रत पकया जाए? ऐसा केसे संभव हो सकता है की हम आकाश तत्व को ही अिने सामने रखे तथा उसके सन्त्दभा लाभों की प्रापि कर सके. इसी पलए मंडलों तथा यंत्रो से सबंपधत भी कई गुि पवधान प्रचलन में रहे पजसके माध्यम से व्यपि इनका पनमाा ण कुछ समय में ही कर सकता है तथा उसका लाभ प्राि कर सकता है. अगर एसी आकृपत का पनमाा ण कर के उसमे सबंपधत देवी देवता या साध्य की प्रपतष्ठा कर दी जाये तथा उनके प्राणों को जोड़ पदया जाये तो वह मंडल इष्ट की प्रपतकृपत बन जाता है. तथा उसके बाद उससे सबंपधत सभी प्रपियाओ का लाभ प्राि पकया जा सकता है. साधक को आकाशतत्व से सबंपधत मंडल की आकृपत पमल भी जाए लेपकन उसका पवधान नहीं हो तो वह मात्र एक आकृपत ही है. लेपकन आकाशतत्व के मंडल का पवधान गुि रहा है. जेसे की मंडलयंत्रो के बारे में कहा गया है की वे इष्ट की प्रपतकृपत होते है. अब हम वािस बात करते है आकाशतत्व की. साधको के मध्य िञ्चतत्वों के मंडल की कई पवपध प्रचपलत है. . अगर आकाशतत्व का ही मंडलयन्त्त्र का पनमाा ण कर पलया जाये तो यह संभव हो सकता है.

अब वह पकस तरह से होगा? . हमने पस्वच बना ली है और पनपित रूि से यह पस्वच पकसी भी िंखे को या बल्ब को या पकसी भी चीज़ को चालू करने में सिम है लेपकन हमें तो इससे िंखा चलाना है तो उसे िंखे के साथ तारों से जोड़ना िड़े गा. क्या ऐसा संभव है? हााँ ऐसा संभव है. साधक ऐसे मंडल का पनमाा ण कर एक ही रापत्र में उसमे यपिणी से सबंपधत प्रपतष्ठा भी कर सकता है क्यों की यपिणी वगा के पलए वह पवशेष रूि से काया शील हो सके. ठीक उसी तरह आकाशमंडल का पनमाा ण करना है तो इसके साथ ही साथ उसे यपिणी साधना के प्रयुि करना है.अथाा त यहााँ िर यह बात समजी जा सकती है की आकाशमंडल की कई पवपधयां है पजनमे से एक ऐसा पवधान हो जो की समय अनुरूि हो तथा कम समय में मंडल का पनमाा ण हो जाये. अब बात यह आती है की आकाशमंडल चाँपू क सवा व्यािी है तथा हमें उस मंडल से यपिणी से सबंपधत लाभ प्राि करना है तो उसका अंकन केसे पकया जाये तथा उसमे कोन से मंत्र का अंकन पकया जाए. तथा इसका पवधान ऐसा हो की सामान्त्य साधक भी सम्प्िन कर सके.

SEMINAAR.भ -5 ) .यह होता है मंडल का आधार स्तंभ एक बीज मंत्र बना कर और उसको अंपकत कर उसके अनुरूि मंडल बनाया जाए तथा उसमे प्रपतष्ठा युि संिका मंत्र का जाि करने से. और साधक को इसमें सायद एक घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता. JULY 26. लेपकन ऐसा पवधान करने में तो बहोत समय लग जायेगा? पबलकुल नहीं. YAKSHINI SADHNA THURSDAY.. 2012 ( न . यह गुि प्रपिया को करने में साधक को आकृपत बना कर मात्र ११ माला जाि करे तो िण ू ा पवधान सम्प्प्न हो जाता है. MY VIEW. Posted by Nikhil at 6:33 PM 3 comments: Labels: APSARA.

...======================================== == यह ऄक्तत दुिमभ िेख अपके क्तिए नीिमक सक्तहत . क्योंकक कक्ततपय िोग आस बात का माखौि भी ईड़ा सकते हैं की यह सारी कक्रयाए तो मन गढंत हैं और धन कमाने के क्तिए ........अवनयक होती हैं एक यक्तक्षणी साधना मे . .अप सभी आस िेख के माध्यम से समझ सकें गे की सच मे यक्तक्षणी साधना करना और ईसमे सफि होना असान या मजाक नही हैं.ऄब अप आस िेख के पढ़ने के बाद अप समझ सकते हैं की ककतने महमवपूणम .और ऄब अप पर हैं की ऄभी भी माखौि ईडाये और आस ऄवसर को हाथ से जाने दे .... आस ऄक्तत दुिमभ िेख के माध्यम से अप समझ सकें गे ..तथ्य अपके सामने अयेंगे .की यहााँ तक यन्त्ि..और जो मैंने कि अपको एक क्तिस्ट अपके सामने रखी ..मािा का क्तनमामण भी ककतना करठन हैं .एक नया तररका हैं तो अप सभी आस िेख को पढ़े और स्वयम ऄनुभव करे की ककतनी कक्रयाए .

. आसके बाद हीसदगुरुदेव जी के द्वारा ... अप सभी भाइ बक्तहन जो सेमीनार मे भाग िे रहे हैं या जो भाग िेने का मन बना रहे हैं वह..या वहभी जो माखौि ईड़ने की कोक्तनन मे हैं .... यक्तक्षणी साधना क्तनक्तवर का अयोजन हुअ .. ==================================== ऄब यह दुिमभ िेख अपके क्तिए ====================================== कौन कहता हैं की यक्तक्षणी क्तसि नही होती .रमौिी बाबा ......वह सभी .जो ईस पक्तिका मे अया रहा .......ऄब यह दुिमभ िेख .ध्यान रखे यह िेख जब सद्गुरु भौक्ततक िीिा काि मे रहे तब ऄप्रेि १९८५ मे मंि तंि यन्त्ि पक्तिका मे प्रकाक्तनत हुअ ....ईन सभी के सामने ...अने वािी सेमीनार का ऄथम समझे .

मैं पूरी क्षमता के साथ धनदा यक्तक्षणी की साधना करने के क्तिए तैयार हो गया .देवता गन्त्धवम ककनार मनुष्य से उाँचे स्तर के वगम हैं . क्योंकक एक तरफ यह सारी साधना जहााँ एक तरफ मंिाममक हैं वही दूसरी ओर कक्रयाममक . आसी प्रकार यक्ष भी देवताओं के समकक्ष वगम के हैं . “यह सौम्पय और सरि साक्तमवक साधना हैं जो साधक गायिी का ईपासक हैं . क्तजनका सम्पमान क्तजनकी स्तुक्तत और क्तजनकी ऄभयथमना हमारे पुराणों एवं धार्तमक ग्रंथो मे भरी हुयी हैं .क्तजसके जीवन मे सदाचार और नैक्ततकता का बाहुल्य हैं ईसे ऄपने जीबन मे यक्तक्षणी साधना ऄवश्य करना चक्तहये “ ये पंक्तिया जब गुरू देव ने मुझसे कहीं तो मेरी सारी क्तहचककचाहट दूर हो गयी और गायिी का ईपासक होते हुये भी. यूाँ तो भारतीय मंि ग्रंथो मे सैकडो यक्तक्षणी साधनाए हैं . आसमें कोआ दो राय नही की यक्तक्षणी साधना जरटि और पेचीदा होती हैं क्तबना समथम और योग्य गुरू के यह साधना सम्पपन्न नही हो सकती हैं .परन्त्तु धनदा यक्तक्षणी साधना आससमे महमवपूणम एवं प्रमुख हैं .

क्तनव् प्रोि ‘रहस्य साधन “ नामक ग्रन्त्थ के चौथे पटि मे स्पस्ट क्तिखा हैं की धनदा यक्तक्षणी यन्त्ि के बाक्तहबामग दस पिाममक होना चाक्तहए .व्यवहाररक दृष्टी से आस प्रकार साधना करने से सफिता क्तमि नही पाती हैं . तभी धनदा यक्तक्षणी यन्त्ि क्तनर्तमत होता हैं . मंि की साधना क्तवक्तध महाणमव के तीसरे कइ खंड ग्रंथो मे जो धनदा यक्तक्षणी का क्तवबरण और यन्त्ि कदया हैं वह प्रामाक्तणक नही ठहरता हैं क्योंकक ईसका अधार नून्त्य से हैं . पूज्य गुरुदेव जी ने िगभग अठ ईल्िेक्तखत धनदा यक्तक्षणी साधना का दस क्तववरण ग्रंथो मे देने के बाद बताया की ये सारे वणमन क्तववरण ऄधूरे और ऄप्रामाक्तणक हैं . जबकक धनदा यक्तक्षणी का अधार चबदु से होना चक्तहये . यो तो धनदा यक्तक्षणी मे प्रकाक्तनत हैं . ऐसा बताकर ईन्त्होंने सवमथा नवीन क्तवक्तध .भी आसक्तिए आस साधना मे मंि और कक्रया का परस्पर घक्तनष्ठ सबंध हैं .

यह समय होिी सेअठ कदन पहिे मतिब होिाष्टक मे ही यह साधना समपन्न होना चक्तहये .के द्वारा धनदा यक्तक्षणी साधना सम्पपन्न करवाइ क्तजससे मुझे पहिी बार मे ही पूणम सफिता क्तमि गयी . ऄष्टमी से प्रारं भ होने वािे आस प्रयोग मे ऄधोमुखी और ईध्वम मुक्षी क्तिकोण से युि यक्तक्षणी यन्त्ि का क्तनमामण दीपाविी की राक्ति को ककया जाता हैं . तमपिात रे नम के धागे से ८८ अवृक्तत युि संजीवनी मंि प्रयोग यंि पर करते हुये करते हुये ईसे प्राण चैतन्त्य करना चक्तहये क्तजस् से . और धनदा पंचदनी से िोम क्तबिोम मंिा से सम्पपुरटत हो कर प्राण प्रक्ततष्ठा युि होना चाक्तहए . साधना समय :: विम मे के बि एक ही बार आस साधना को समपन्न ककया जा सकता हैं. और दीपाविी की रात को ही धनदा पञ्च दनी मंि से ८८ अवृक्तत जाता हैं आस बात युि आस का ध्यान यन्त्ि का क्तनमामण रहे यंि की ककया का मध्य चबदु दीपाविी की राक्ति ऄथामत ऄमम्पसस्य की ऄधम राक्ति की क्तनर्तमत होना चक्तहये .

बृहस्पक्तत की पीिा . नुक्र की स्वेत तथा नक्तनवार को कािे रं ग का असन क्तवछा कर साधना समपन्न की जाती हैं .. ऐसा होने पर धनदा यक्तक्षणी का साधक से पूणम तादाम्पय स्थाक्तपत हो जाता हैं . सोमवार को सफ़े द .परन्त्तु आसका भी एक क्तवनेि तरीका हैं दीपाविी की मध्य राक्ति को रे नम या सूती धागे की ८८ अवृक्तत िेकर ईसका धागा बनाये और सुमरु े . मगंवार को िाि . आसमें कु बेर यक्तक्षणी अधार बीज का सहारा क्तिया जाता हैं . प्रथम कदन गुरू पूजन क्तवक्तध के साथ कर यंि को प्राण चैतन्त्य ककया जाता हैं .बुध को हरा . साथ ही साधक मे मनस से सामंजस्य स्थाक्तपत ककया जाता हैं . आसमें असन का क्तवधान ध्यान देने योग्य हैं . रक्तव को गुिाबी . और ऐसे ही क्तसि यन्त्ि पर होिी के ऄवसर पर प्रयोग ककया जा सकता हैं . आसमें हककक मािा का प्रयोग ककया जाता हैं .फाल्गुि नुक्ि ऄष्टमी को जो वार हो ईसी ग्रह का असन साधक को क्तवछाना चाक्तहए .की की ऄनग चबदु और रक्तत योनी का सबंध बन सके और धनद यक्तक्षणी का रूप क्तनर्तमत हो सके .

कफर फाल्गुन नुक्ि ऄष्टमी के कदन मैंने राक्ति को आसी प्रकार तैयार की हुयी मािा से प्राण चैतन्त्यता प्राप्त की और नारीर की तीनोअवृक्ततयों मे तीनो महानाक्तियों की स्थापना की .तभी आस मािा मे अियम जनकता और प्राणवत्ता अ जाती हैं . चबदु और् योनी के नब्द सामंजस्य करते हुये गाठ िगा दें.नारीर मे ऄनंग और रक्तत की प्रक्ततष्ठा करते हुये असन पर बैठ कर दीपक प्रज्ज्वक्तित कर गुरुदेव के बताए हुये तरीके से मंि जप प्रारं भ ककया . कफर दूसरे कदन् मध्य राक्ति को दूसरा हककक पमथर आसी प्रकार कक कक्रया करते हुये . आसमें प्रमयेक कदन ऄिग ऄिग क्तवधान संपाकदत ककया जाता हैं .आसतरह क्तनमय एक मनका क्तपरोया जाता हैं औरईसके उपर एक गाठ िगाइ जाती हैं .वाणी मे धनदा का समावेन ककया .गाठ िगते समय महाकािी महािक्ष्मी महासरस्वती का परस्पर िोम क्तविोम. यह मािा साधक या गुरू भाइ तैयार् कर सकते हैं . आस तरह यह मािा होिी तक जा कर तैयार हो पाती हैं .प्रथम कदन नरीर मे गुरू पूजन और यंि स्थापन ककया जाता .क्तपरोकर गााँठ िगाये .ध्वक्तन ऄध्वानी.

आसकी ऄपेक्षा पूज्य गुरू .वे ऄपने अप मे एक ऄिग ही कहानी हैं .तीसरे कदन धनदा पंचदनी मंि की जागृक्तत की जाती हैं .ऐसा करने पर मुझ जैसे ऄनाडी साधक को जो ऄनुभव हुये हैं .हैं तो दूसरे कदन स्वणाम किमणभैरव मंि को प्रस्फु रटत ककया जाता हैं .और िगभग सभी ग्रंथो मे धनदा यक्तक्षणी साधना का समावेन ककया हैं परन्त्तु आन सारे ग्रंथो मे क्तजस प्रकार का प्रयोग कदया हैं.वे ऄपूणम हैं . मेरे पास तंि और् मंि से सबंक्तधत सैकडो ग्रन्त्थ हैं .मै ऄनुभव करता हूाँ की यकद कोइ भी साधना पूणम प्रमाक्तणकता के साथ संपन्न की जाए तो क्तनिय की ऄनुकूिता प्राप्त होती हैं .सातवे कदन सबंक्तधत जप और पुणामहुक्तत समपन्न की जाती हैं .पाचवे कदन भैरब गुरटका पर भैरव मंि जप तथा छठे कदन भैरवी गुरटका पर भैरवी धनदा को क्तसि ककया जाता हैं . ये सारे मंि गोपनीय और गुरू मुख से ही प्राप्त रहे हैं .चौथे कदन धनदा यक्तक्षणी यन्त्ि चैतन्त्य और मंि सम्पपुरटत ककया जाता हैं . ईनमे प्रमाक्तणकता ऄनुभव नही हुयी .

यकद पूणम प्रामाक्तणकता के साथ साधना की जाए तो क्तनिय ही सफिता प्राप्त होती हैं .देव ने मुझे जो क्तवक्तध मंि जप बताया ईस प्रकार से करने पर प्रमयक्ष साधना क्तसि हुयी .धनदा यक्तक्षणी के बीज मन्त्ि जप से ८८ कमि बीजो को जहााँ होिी प्रज्जक्तित होती हैं ईसी होिी मे ईन कमि बीजो को एक एक करके डािा जाता हैं और मंि जप समपन्न होता होता हैं . और ऐसा करने पर ईसी रात मे ऄमयंत हो सौम्पय और मधुर रूप मे यक्तक्षणी प्रमयक्ष हुयी आसके बाद अज तक मैं भौक्ततक और अध्याक्तममक योग एवं साधना क्षेिमे क्तजस गक्तत से अगे बढ़ा हूाँ .और मैं चैिज ें के साथ अज आस बात को क्तसि करसकता हूाँ. और सफिता पायी हैं . वह सब कु छ आस साधना की बदौित ही सम्पपन्न हुयी हैं . मुझे मंि तंि यन्त्ि क्तवज्ञानं पक्तिका ने धनदा यक्तक्षणी साधना पर कु छ पंक्तिया क्तिखने को कहा था परन्त्तु यह . आस साधना की समाक्तप्त होिी के कदन होती हैं .

क्तविय गोपनीय और गुरू मुख गम्पय हैं ऄतः क्तजतना भी स्पस्ट
कर सकता था मैंने आस िेख मे साधना क्तवक्तध को स्पस्ट ककया ,मैं
ऐसा अवश्यकता ऄनुभव करता हूाँ के मंि और साधनाओ से
सबंक्तधत क्तजतने भी ग्रथ प्रकाक्तनत हैं ईनका ऄमयन्त्त ही योग्य
क्तवद्वान से पुनः संपादन होना चक्तहये ,मैं चेिज
ें के साथ स्पस्ट
करता हूाँ की कोइ भी मेरे द्वारा संपाकदत धनदा को स्पस्ट देख
सकता हैं . अर्तथक वैभव धन यन प्रक्ततष्ठा एवं अगे की समस्त
साधनाओ मे ऄक्तद्वतीय सफिता के क्तिए यह अधरभूत और
महमवपूणम साधना हैं .
साभार

सक्तहत

..मंि तंि यन्त्ि क्तवज्ञानं ..ऄप्रेि 1985
तो मेरे क्तमिो आस ऄद्भुत िेख से अप समझ सकते हैं की
..यक्तक्षणी ऄ्सरा साधना बहुत

गभीरता का

क्तविय हैं

..और ऄब अप पर हैं की अप आस ऄवसर को समझे ...
Smile
क्तनक्तखि प्रणाम

ITARYONI BADHA SE MUKTI HETU - RUDRA
PRAYOG

NOTE – Brothers and sisters Amogh Vidhaan of “Tibbeti Sabar
Lakshmi Vashikaran Yantra” which I told to give it on 21 November , it
has not been given only because many of our brothers have not yet got that
yantra due to unavoidable reasons and my effort is only this that everyone
has got right of progress and good-fortune. So let’s wait for one more
week so that once all of us get yantra, Vidhaan of this amazing Kriya can
be given to all.
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यह ऄनंत ब्रह्माण्ड में हम ऄके ले नहीं है आस तथ्य को ऄब विज्ञान भी स्िीकार करने लगा है.
अधवु नक विज्ञान में भी कइ प्रकार के परीक्षण आससे सबंवधत होने लगे है तथा एसी कइ
शवियां है वजनके बारे में विज्ञान अज भी मौन हो जाता है क्यों की विज्ञान की समज के सीमा
के दायरे के बाहर िह कुछ है. खेर, अधवु नक विज्ञान का विकास और परीक्षण ऄभी कुछ िर्षों
की ही देन है लेवकन आस वदशा में हमारे ऊवर्ष मवु नयों ने सेंकडो िर्षों तक कइ प्रकार के शोध

और पररक्षण वकये थे तथा सबने ऄपने ऄपने विचार प्रस्ततु वकये थे, मख्ु य रूप से सभी
महवर्षियों ने स्िीकार वकया था की ब्रह्माण्ड में मात्र मनष्ु य योनी नहीं है, मनष्ु य के ऄलािा भी
कइ प्रकार के वजि आस ब्रहमाड में मौजदू है, वनश्चय ही मनष्ु य से तावविक द्रवि में ऄथाित शरीर
के तविों के बंधारण में ये वभन्न है लेवकन आनका ऄवस्तवि बराबर बना रहता है. आसी क्रम में
मनष्ु य के ऄंदर के अवम तवि जब मवृ यु के समय स्थल
ू शरीर को छोड़ कर दसू रा शरीर धारण
कर लेता है तो िह भी मनष्ु य से ऄलग हो जाता है. िस्ततु ः प्रेत, भतू , वपशाच, राक्षश, अवद
मनष्ु य के ही अवम तवि के साथ लेवकन िासना और दसू रे शरीरों से जीवित है. आसके ऄलािा
लोक लोकान्तरो में भी ऄनेक प्रकार के वजि का ऄवस्तवि हमारे अवद ग्रन्थ स्िीकार करते है
वजनमे यक्ष, विद्याधर, गान्धिि अवद मख्ु य है. ऄब यहााँ पर बात करते है मनष्ु य के ही दसू रे
स्िरुप की. जब मनष्ु य की मवृ यु ऄवयवधक िासनाओ के साथ हुइ है तब मवृ यु के बाद ईसको
सक्ष्ू म की जगह िासना शरीर की प्रावि होती है क्यों की मवृ यु के समय वजि या अवमा ईसी
शरीर में वस्थत थी. वजतनी ही ज्यादा िासना प्रबल होगी मनष्ु य की योनी आतनी ही ज्यादा वहन्
होती जायेगी. जेसे की भतु योनी से ज्यादा प्रेत योनी वहन् है. यह विर्षय ऄवयतं िहृ द है लेवकन
यहााँ पर विर्षय को आतना समजना ऄवनिायि है. ऄब आन्ही िासनाओ की पवू ति के वलए या ऄपनी
ऄधरू ी आच्छाओ की पवू ति के वलए ये ये वजि एक वनवश्चत समय तक एक वनवश्चत शरीर में घमू ते
रहते है, वनश्चय ही आनकी प्रिवृ त और मल
ू स्िभाि हीनता से यि
ु होता है और आसी वलए ईनको
यह योनी भी प्राि होती है. कइ बार यह ऄपने जीिन काल के दरवमयााँ जो भी कायिक्षेत्र या
वनिास स्थान रहा हो ईसके असपास भटकते रहते है, कइ बार ये ऄपने परु ाने शत्रु या विविध
लोगो को वकसी न वकसी प्रकार से प्रतावडत करने के वलए कायि करते रहते है. आनमे भवू म तथा
जल तवि ऄल्प होता है आस वलए मानिो से ज्यादा शवि आसमें होती है. कइ जीिो में यह
सामथ्यि भी होता है की िह दसू रों के शरीर में प्रिेश कर ऄपनी िासनाओ की पवू ति करे . आस
प्रकार के कइ कइ वकस्से अये वदन हमारे सामने अते ही रहते है.
आन आतरयोनी से सरु क्षा प्रािी हेतु तंत्र में भी कइ प्रकार के विधान है लेवकन साधक को आस हेतु
कइ बात विविध प्रकार की वक्रया करनी पड़ती है जो की ऄसहज होती है, साथ ही साथ ऐसे

साधक स्नान अवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्रों को धारण करे तथा लाल असान पर बैठ जाए. यह जाप रुद्राक्ष माला से करना चावहए. यह पारदवशिवलंग से सबंवधत भगिान रूद्र का साधना प्रयोग है. साधक का मख ु ईत्तर की तरि हो.प्रयोग के वलए स्थान जेसे की स्मशान या ऄरण्य या विर मध्य रात्री का समय अवद अज के यगु में सहज संभि नहीं हो पता. मल ू तः आसमेंपारद वशिवलंग ही अधार है परु े प्रयोग का. िैसे ऄगर रात्री में करना संभि न हो तो आस प्रयोग को वदन में भी वकया जा सकता है. साधक रात्रीकाल में यह प्रयोग करे तो ज्यादा ईत्तम है. आस वलए पारद वशिवलंग विशद्ध ु पारद से वनवमित हो तथा ईस पर पणू ि तत्रं ोि प्रवक्रया से प्राणप्रवतष्ठा और चैतन्यकरण प्रवक्रया की गइ हो यह वनतांत अिश्यक है. ॐ नमो भगवते रुद्राय भतू वेताल त्रासनाय फट् . साधक गरुु तथा पारद वशिवलंग का पजू न करे तथा गरुु मत्रं का जाप करे और विरं वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र जाप पारदवशिवलंग के सामने करे . ऄशद्ध ु और ऄचेतन पारद वशिवलंग पर वकसी भी प्रकार की कोइ भी साधना सिलता नहीं दे सकती है. यह प्रयोग साधक वकसी भी सोमिार को कर सकता है. प्रस्ततु विधान एक दवक्षणमागी लेवकन तीव्र विधान है वजसे व्यवि सहज ही सम्प्पन कर सकता है तथा ऄपने और ऄपने घर पररिार के सभी सदस्यों को आस प्रकार की समस्या से मवु ि वदला सकता है तथा ऄगर समस्या न भी हो तो भी ईससे सरु क्षा प्रदान कर सकता है. साधक ऄपने सामने पारदक्तनवचिग को स्थावपत करे .

और मेरा प्रयास मात्र आतना है की सौभाग्य और ईन्नवत पर सभी का ऄवधकार है तो. माला का विसजिन करने की अिश्यकता नहीं है. ****NPRU**** Posted by Nikhil at 11:17 PM 1 comment: .क्यंवू क बहुत से भाआयों को िो यन्त्र ऄभी भी वकसी ऄपररहायि कारण से प्राि नहीं हो पाए हैं. ववशेष बात. आसके बाद साधक ईस पानी को ऄपने परु े घर पररिार के सदस्यों पर तथा परु े घर में वछड़क दे. ऄगर साधक को कोइ समस्या नहीं हो तथा मात्र ईपरी बाधा से तथा तत्रं प्रयोग से सरु क्षा प्रावि के वलए भी ऄगर यह प्रयोग करना चाहे तो भी यह प्रयोग वकया जा सकता है.(OM NAMO BHAGAWATE RUDRAAY BHOOT VETAAL TRAASANAAY PHAT) मत्रं जाप के बाद साधक पारद वशिवलंग को वकसी पात्र में रख कर ईस पर पानी का ऄवभर्षेक ईपरोि मंत्र को बोलते हुिे करे .भाआयों और बहनों "वतब्बती साबर लक्ष्मी वशीकरण यन्त्त्र" का ऄमोघ विधान वजसे मैंने २१ निम्पबर को देने को कहा था.तावक सबको यन्त्र वमलते ही ईस ऄवद्रय्तीय वक्रया को संपन्न करने का विधान एक साथ दे दें.ईसे मात्र ऄभी आसवलए नहीं वदया है. साधक आसका ईपयोग कइ बार कर सकता है. आस प्रकार यह वक्रया साधक मात्र ३ वदन करे .क्याँू ना हम १ हफ्ते और प्रतीक्षा कर लें. यह वक्रया ऄंदाज़े से १० वमवनट करनी चावहए.

bhoot-pret.Labels: BHAY MUKTI SADHNA. लेवकन अज के अधवु नक यगु में िैज्ञावनक पररक्षण में भी ऐसे कइ तथ्य सामने अये है वजसके माध्यम से यह वसद्ध होता है की मनष्ु य की गवत वसिि जन्म से ले कर मवृ यु तक की यात्रा मात्र नहीं है िरन मवृ यु तो एक पड़ाि मात्र ही है. SHIV SADHNA TUESDAY. मनष्ु य मवृ यु के समय शरीर वयाग के बाद कोइ विविध योनी को धारण करता है विविध नाम और ईपनाम वदए जाते है. 2012 BHOOTINI SADHNA ============================================== ============== मनष्ु य की कल्पना का एक वनवश्चत दायरा होता है वजसके अगे िह सोच भी नहीं सकता है और तकि बवु द्ध ईनको स्ि ज्ञान से अगे कुछ स्िीकार करने के वलए हमेशा रोक लगा देती है. OCTOBER 16. .

यहााँ पर हम चचाि करें गे तंत्र में आन से जडु ी हुइ प्रवक्रया की. राक्षस या ब्रह्मराक्षस अवद है जो की कमिजन्य होते है. तामवसक साधना में भयक ं र रूप प्रकट होना एक ऄलग बात है लेवकन सभी साधना में ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है. िरन सवय तो यह है की भवु तवन का स्िरुप भी ईसी प्रकार से होता है वजस प्रकार से एक सामान्य लौवकक स्त्री का. वपशाच. लेवकन यह साधनाए वदखने में वजतनी सहज लगती है ईतनी सहज होती नहीं है आस वलए साधक के वलए ईत्तम यह भी रहता है की िह आन आतरयोवनयों के सबंध में लघु प्रयोग को सम्प्पन करे . वजस प्रकार भतु एक परुु र्षिाचक सज्ञं ा है ईसी प्रकार भवु तनी एक स्त्रीिाचक सज्ञं ा है. विविध योवनयो से सबंवधत विविध प्रकार के प्रयोग तंत्र में प्राि होते है. ईसमे भी संदु रता तथा माधयु ि होता है. यह विर्षय ऄवयंत ही िहृ द है. आसके भी कइ कइ भेद है. प्रस्ततु एक वदिसीय प्रयोग एक ऄचरज पणू ि प्रयोग है.भले ही अज का विज्ञान ईसके ऄवस्तवि पर ऄभी भी शोध कर रहा हो लेवकन हमारे प्राचीन ऊवर्ष मवु नयों ने आस विर्षय पर सेकडो हज़ारो सालो पहले ही ऄवयंत ही प्रगाढ़ ऄन्िेर्षण कर के ऄवयवधक विस्मय यि ु जानकारी जनमानस को प्रदान की थी. यह . वजसमे साधनाओ के माध्यम से विविध प्रकार के कायि आन आतरयोवनयो से करिाए जाते है. िस्ततु ः यह भ्रम ही है की भवु तवनयााँ डरािनी होती है तथा कुरुप होती है. िस्ततु ः यह साधना तथा साध्य के स्िरुप के वचंतन पर ईनका रूप हमारे सामने प्रकट होता है. मनष्ु य के मवृ यु के बाद ईसकी वनश्चय ही कावमिक गवत होती है तथा आसी क्रम में विविध प्रकार की योनी ईसे प्राि होती है या ईसका पनु जिन्म होता है. साधको के वलए यह प्रयोग एक प्रकार से आस वलए भी महविपणू ि है की आसके माध्यम से व्यवि ऄपने स्ि्न में भवु तनी से कोइ भी प्रश्न का जिाब प्राि कर सकता है. प्रेत. लेवकन जो प्रचवलत है िह योनी है भतु . वजसे सम्प्पन करने पर साधक को भवु तनी को स्ि्न के माध्यम से प्रवयक्ष कर ईसे देख सकता है तथा ईसके साथ िातािलाप भी कर सकता है.

साधक िट िक्ष ृ के लकड़ी की कलम का प्रयोग करे . भ्रं भ्रं भ्रं भतु ेश्वरी भ्रं भ्रं भ्रं फट् (bhram bhram bhram bhuteshwari bhram bhram bhram phat) . आसके वलए साधक को के ले के वछलके को वपस कर ईसका घोल बना कर ईसमे कुमकुम वमला कर ईस स्याही का प्रयोग करना चावहए. गरुु पजू न तथा गरुु मंत्र का जाप करने के बाद वदए गए यन्त्र को सफ़े द कागज़ पर बनाना चावहए. साधक को वनम्पन मंत्र की ११ माला मंत्र जाप करनी है आसके वलए साधक को रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चावहए.प्रयोग भवु तनी के तामस भाि के साधन का प्रयोग नहीं है. सिि प्रथम साधक को स्नान अवद से वनितृ हो कर लाल िस्त्र पहेन कर लाल असान पर बैठ जाए. ऄतः व्यवि को भवु तनी सौम्पय स्िरुप में ही द्रश्यमान होगी. यन्त्र बन जाने पर साधक को ईस यन्त्र को ऄपने सामने वकसी पात्र में रख देना है तथा तेल का दीपक लगा कर मंत्र जाप शरू ु करना चावहए. िैसे यह प्रयोग वकसी भी बधु िार को वकया जा सकता है. यह प्रयोग साधक वकसी भी ऄमािस्या को करे तो ईत्तम है. साधक को यह प्रयोग रात्री काल में १० बजे के बाद करे .

वजस पात्र में यन्त्र रखा गया है ईसको धो लेना चावहए. ईस समय प्राि जिाब को वलख लेना चावहए ऄन्यथा भल ू जाने की सभं ािना रहती है. Posted by Nikhil at 8:32 PM No comments: Labels: bhoot-pret THURSDAY. आसके बाद साधक ऄपने मन में जो भी प्रश्न है ईसके मन ही मन ३ बार ईच्चारण करे तथा सो जाए. साधक दीपक को तथा माला को वकसी और साधना में प्रयोग न करे लेवकन आसी साधना को दबु ारा करने के वलए आसका प्रयोग वकया जा सकता है. यन्त्र की जो भष्म बनेगी ईस भष्म से ललाट पर वतलक करना है तथा वतन बार ईपरोि मंत्र का ईच्चारण करना है. OCTOBER 11. ऄगर यन्त्र की राख बची हुइ है तो ईस राख को तथा वजस लकड़ी से यन्त्र का ऄक ं न वकया गया है ईस लकड़ी को भी साधक प्रिावहत कर दे. जिाब वमलने पर साधक की नींद खल ु जाती है.मंत्र जाप पणू ि होने पर जल रहे दीपक से ईस यन्त्र को जला देना है. साधक को रात्री काल में भवु तनी स्ि्न में दशिन देती है तथा ईसके प्रश्न का जिाब देती है. साधक दसू रे वदन सबु ह ईठ कर ईस वतलक को चेहरा धो कर हटा सकता है लेवकन वतलक को सबु ह तक रखना ही ज़रुरी है. ईसका ईपयोग वकया जा सकता है. 2012 TANTRA AUR PRET SIDDHI .

.वकन्तु यह ग्रथं ईस ज्ञान को कुछ हद तक समझने में हमारी सभं ि सहायता जरूर करते हैं. ऄवपतु आसमें वनवहत है ऐसे रहस्य और ऐसा ज्ञान वजसका ऄगर एक ऄंश मात्र भी यवद वकसी की भी समझ में अ जाये तो ईसकी जीिन धारा ही बदल जाती है!!!! क्योंवक ब्रह्मांडीय ज्ञान कोइ कोरी कपोल कल्पना ना हो के आस समस्त चराचर विश्व की ईवपवत्त और विध्िसं का करोडों बार साक्षी बन चक ु ा है और जब तक सजृ न और संहार का क्रम चलता रहेगा आस ब्रह्मांडीय ज्ञान में आजािा होता जायेगा......======================================== =========== हमारे चारों ओर िै ला ब्रह्मांड हिा और धएु ं का के न्द्र मात्र नहीं है...पर यह ज्ञान हम वकताबों से या बड़े बड़े ग्रंथो को पढ़ कर प्राि नहीं कर सकते..खैर वनगम ज्ञान या िेद शास्त्र यहााँ हमारा विर्षय नहीं है तो हम बात करते हैं तंत्र ज्ञान की वजसे गहु ा ज्ञान या रहस्यमय ज्ञान भी कहते हैं. परमसत्ता ऄपना ज्ञान देने में कभी कोइ कोतावह नहीं करती पर ईसके वलए मात्र एक ही शति है की अप में पात्रता होनी चावहए.. ब्रह्मांडीय ज्ञान को हम दो तरह से ऄवजित कर सकते हैं – १) अगम स्तर २) वनगम स्तर !!!! अगम ६४ तरह के तांवत्रक ज्ञान पर अधाररत है और वनगम िेदों पर वनभिर करता है. क्योंवक तंत्र कोइ वचंतन- ...

आस प्रयोग के विधान को समझने से पहले या ये प्रयोग करने से पहले अपको दो ऄवत महविपणू ि बातों को ऄपने ज़हन में रखना होगा – १) यह साधना प्रेत प्रवयक्षीकरण साधना है तो हम ये भी जानते हैं की यवद अपने ईसे प्रवयक्ष करके वसद्ध कर वलया तो िो अपके द्रारा वदए गए हर वनदेश का पालन करे गा वकन्तु ईससे यह . पर हमने तब यह तथ्य नहीं समझा था की पथ्ृ िी के के न्द्र में ही यह दोनों मागि क्यों वमलते हैं कहीं और क्यों नहीं तो आसका एक सीधा सरल ईत्तर यह है की भू के गभि में ऄथाित ईसके के न्द्र में उजाि का घ्नन्तवि सबसे ऄवधक मात्रा में होता है या याँू कहें की के न्द्र में कहीं ओर की तल ु ना में गरुु विाकर्षिण की वक्रया सबसे ज्यादा होती है और आसी गरुु विाकर्षिण की शवि के कारण ही प्रेत योवनयााँ भू लोक की तरि खींची चली अती हैं.. पर यहााँ हम बात कर रहे हैं प्रेत वसवद्ध की तो िो दसू रे स्तर की ऄनभु वू त है... ३) ऄंवतम ऄनभु वू त होती है ईस ऄलौवकक.. २) दसू रे स्तर पर हमें ईस दसू रे की ऄनभु वू त होती है वजसे हम वसद्ध कर रहे होते हैं या वजसका अिाहन वकया जा रहा होता है.असन पर बैठा नहीं जाता. ऄब जब ऄनभु वू तयों की बात करते हैं तो एक साधक साधना करते समय तीन तरह की ऄनभु वू तयों का ऄनभु ि करता है – १) साधना के प्रथम स्तर पर ईसे ऄपनी आवन्द्रयों का बोध होता है वजसे हम ऐसे समझते हैं की हाथ पैर दःु ख रहे हैं... ऄखडं परम सत्ता की वजसे हम समावध की ऄिस्था कहते हैं...मनन करने िाली विचार प्रणाली नहीं है या याँू कहें की तंत्र कोइ दशिन शास्त्र नहीं है यह शत प्रवतशत ऄनभु वू तयों पर अधाररत है.. यवद अप सब को याद होगा तो वपछले लेख में हमने पढ़ा था की प्रेत वजस लोक में रहते हैं ईसे िासना लोक कहते हैं और िासना वजतनी गहन होगी ईतना ही ऄवधक समय लगेगा अवमा को प्रेत योवन से मि ु हो के सक्ष्ू म योवन प्राि करने में और साथ ही साथ हमने यह भी समझा था की आन प्रेतों और वपशाचों का भू लोक पर अने िाला मागि महािासना पथ कहलाता है वकसका महावदव्योध मागि से एकीकरण पथ्ृ िी के के न्द्र में होता है..

. नैिेद्य में काले वतलों को भनू कर शहद में वमला कर लड्डू जैसा बना लें.३० से ३ बजे के मध्य आस साधना को वकया जाना ईवचत होगा. वदशा दवक्षण होगी....साथ ही ईडद के पकौड़े या बड़े की भी व्यिस्था रखें और एक पत्तल के दोनें या वमटटी के दोने में रख दें.. बाजोट पर काला ही िस्त्र वबछे गा. क्योंवक िो असन भू के गरुु वि बल से अपका सम्पपकि तोड़ देता है.ऄथाित रावत्र के ११... रोज मरा की वदनचयाि में यह पल कौन सा होता है और कब अता है यह तो बहुत अगे का विधान है पर आस प्रयोग को करते समय यह पल तब अएगा जब अप साधना सम्पपणू िता की कगार पर होंगे तो अपको ईस समय खदु के डर पर वनयंत्रण करते हुए ईस मक ू संकेत को समझना है.. क्योंवक जहााँ अप कमजोर पड़े अपकी साधना ईसी एक क्षण विशेर्ष पर खवम हो जायेगी. िीरासन का प्रयोग कही ज्यादा सिलतादायक है. िस्त्र ि असन का रंग काला होगा. ऄमािस्या की मध्य रावत्र का प्रयोग आसमें होता है...सब करिाने के वलए अपको ऄपने संकल्प के प्रवत दृढ़ता रखनी पड़ेगी ऄथाित अपको परू े मन.और ईस पर वमटटी का पात्र स्थावपत करना है वजसमें यन्त्र का वनमािण होगा. . िचन और क्रम से ये साधना करनी पड़ेगी.. २) हम में से बहुत कम लोग यह बात जानते है की वदन के २४ घटं ों में एक क्षण ऐसा भी होता है जब हमारी देह मवृ यु का अभास करती है ऄथाित यह क्षण ऐसा होता है जब हमारी सारी आवन्द्रयााँ वशवथल हो जाती है और ह्रदय की गवत रुक जाती है.और हााँ एक बात और ऄब चक ंू ी ये योवनयााँ मंत्राकर्षिण की िजह से अपकी तरि अकवर्षित होती है तो यथा सभं ि कोवशश करें की यवद अपने असन वसद्ध वकया हुअ है तो अप ईसी असन पर बैठ कर आस प्रयोग को करें .. दीपक सरसों के तेल का होगा. विधान – मल ू तः ये साधना वमश्रडामर तंत्र से सम्पबंवधत है..िो वजसका कोइ ऄवस्तवि नहीं है ईसके ऄवस्तवि को पहचानते हुए ईसकी मल ू पद ध्िवन को सनु ना है....

ऄथाित वछड़क दें.िो दीपक.और तब ईसे िो भोग का पात्र देकर ईससे िचन लें लें की िो अपके श्ेि कायों में अपका सहयोग ३ सालों तक करे गा.िो अपका कायि पणू ि कर देगा. रक्षा विधान हेतु सदगुरुदेव के कवच का ११ पाठ ऄवनिायि रूप से कर लें.और तब िो ऄपना कडा या िस्त्र का टुकड़ा अपको देकर ऄदृश्य हो जाता है. और ईस यन्त्र के मध्य में वमटटी या लोहे का तेल भरा दीपक स्थावपत कर प्रज्िवलत कर दें.और भैरि पजू न संपन्न कर लें. मत्रं जप के मध्य कमरे में सरसराहट हो सकती है.ईबकाइ भरा िातािरण हो जाता है.मंत्र जप में लगभग ३ घंटे लग सकते हैं.ऄब काले हकीक या रुद्राक्ष माला से ५ माला मंत्र जप वनम्पन मंत्र की संपन्न करें . ध्यान रवखये ऄवहतकर कायों में आसका प्रयोग अप पर विपवत्त ला देगा.और जब भी भाविओश्य में अपको ईसे बल ु ाना हो तो अप मल ू मंत्र का ईच्चारण ७ बार ईस िस्त्र या कड़े को स्पशि कर एकांत में करें .कइ बार तीव्र पेट ददि या सर ददि हो जाता है और तीव्र दीघि या लघु शंका का ऄहसास होता है.एक ईदासी सी चा सकती है.जो जप पणू ि होते ही साक्षात् हो जाती है. कमरे को पनु ः स्िच्छ जल से धो दें और वनवखल किच का ईच्चारण करते हुए गंगाजल वछड़क कर गगू ल धपु वदखा दें.और भोग का पात्र जो दोना आवयावद हो सकता है या वमटटी का पात्र हो सकता है.पात्र और बाजोट के िस्त्र को विसवजित कर दें. मंत्र:- . जप के मध्य में ही धएु ं की अकृवत अपके अस पास वदखने लगती है. ऄब ईपरोि यन्त्र का वनमािण ऄनावमका उाँगली या लोहे की कील से ईस वमटटी के पात्र में कर दें और ईसके चारों और जल का एक घेरा मल ू मत्रं का ईच्चारण करते हुए कर बना दें.ईस ्लेट के सामने रख दें.गणपवत पजू न.जप के बाद पनु ः गरुु पजू न.दरिाजे या वखडकी पर तीव्र पत्रों के वगरने का स्िर सनु ाइ दे सकता है.रावत्र में स्नान कर साधना कक्ष में असन पर बैठ जाएाँ.आनटू विचवलत ना हों.वकन्तु साधना में बैठने के बाद जप पणू ि करके ही ईठें . गरुु पजू न.आवयावद सपं न्न कर ईठ जाएाँ और दसु रे वदन ऄपने िस्त्र ि असन छोड़कर. क्यंवू क एक बार ईठ जाने पर ये साधना सदैि सदैि के वलए खवं डत मानी जाती है और भविष्य में भी ये मत्रं दबु ारा वसद्ध नहीं होगा.

ाँ “वनवखल प्रणाम” ****ROZY NIKHIL**** ****NPRU**** Shamshan sadhana workshop ( A great way to overcome fear /one of among eight pash from life ).यही मैं सदगरुु देि से हम सभी के वलए प्राथना करती ह.काला प्रेत रे वचररया.कारज करे सरल.कारज मोरो कर रे काली को गण.इररया रे वचररया.काली को गण.धुंआ सो बनकर आ.साधन को साकार कर.वपतर की शवि.हवा के संग संग आ. क्तप्रय क्तमि .काली की आन.जो कारज ना करें शत्रु ना कांपे तो दुहाई माता कालका की. मझु े अशा है की अप आस ऄहावनकर प्रयोग के द्रारा लाभ और वहतकर कारों को सिलता देंगे. . भय को वयाग कर तीव्रता को अश्य दें.वदखा अपना रूप.शत्रु डरें कापें थर थर.

पक्तवि क्तसिाश्रम के बाद आस धरती पर सबसे पक्तवि जगह हैं .हम में से कोन ऐसा होगा साथ ऄपने ह्रदय पर के समय कह सके की ईसे ककसी भी जो साहस हाथ के रख प्रकार का ज्ञात /ऄज्ञात भय नहीं हैं . जहााँ आस जीवन से सरे स्वाथममय ररश्ते ऄंत को प्राप्त होते रहते हैं .नमनान . कोन नहीं होगा जो क्तनभमय होना नहीं चाहेगा वह भी मााँ महाकािी के ऄभय से .. जहााँ भगवान् महाकाि . चरों और एक नीरवता का वातावरण हमेना छाया रहता हैं.भय ऄष्ट पानों में से एक हैं जो मानव को को ईसके स्वयं के स्वरुप से पररचय नहीं होने देता . मााँ के साथ क्तवचरण करते रहते हैं . ये स्थान डरने/भय की नहीं बक्तल्क ऄपने ऄक्तस्तमव को जानने या पहचानने की जगह हैं त . "मा भे " मैं ऄभय देती हूाँ . थोडा या ऄक्तधक ये महमव की बात नहीं हैं . मााँ तो यही कह रही हैं .. पर हम कहा ईनके अनीवामद को प्राप्त कर सकते हैं भिा ईनके क्तनवास से ज्यादा ऄच्छी जगह कहााँ होगी.

आस पर पञ्च महाभूत पुनः ऄपने मूि स्वरूप मैं अ ही जाते हैं . औघड़ भगवान् राम हो सभी ने कभ न कभी आस पक्तवि भूक्तम पर साधन की ही हैं . या दोनों में होगा . चचक्ततत न हो . आस तथ्य को में रख कर ही आस कायमनािा का अयोजन करने की योजना बनाये जा रही हैं . हमें साधना में जल्दी सफिता क्तमि जाती हैं. घर पर की साधना की ऄपेक्षा .. यकद यह साधना पूणम की जाये ककसी कु नि मागमदनमन में /या क्तनदेनन में तो सफिता का प्रक्ततनत कइ गुना ज्यादा होगा.आस स्थान पर प्राण ईजाम आतनी ऄक्तधक होती हैं आसी कारण . तो कु छ तो क्तनिय ही क्तवनेिता होगी ही .ये कायमनािा ईनके क्तिए ही के बि नहीं हैं जो भयमुि हैं बक्तल्क जो भी ऄपने भय रूपी पान से मुि होना चाहता हैं ईनका भी स्वागत हैं . पर क्या यह आतना असान होगा आसका ईत्तर हााँ ओर न . परमहंस क्तनगमानंद .ऄक्तधकांन या.त महायोगी चाहे वे वामक्षेपा हो जी . या परमहंस क्तवनुिानंद जी हो .

3. कै से पहचाने? हम त /मरघटेश्वर को कै से .औ कै से हो ईनका अवाहन और पूजन ?. क्तखिना क्या हैं औ क्यों आनकी ऄक्तनवायमता हैं ? 5. कै से पूणम ऄघोरे श्वर क्तनव पूजन होता हैं ?सदगुरुदेव पूणम पूजन और नमनान में कै से ईनका अवाहन ककया जाता हैं ?.नमनान को सुसुप्त कै से करे ? 6. क्या वहां पर कोइ िक्ष्मी का स्वरूप भी होता हैं . ऄष्ट भैरव में से हर कदन कोन से भैरव अज जाग्रत होते हैं ईन्त्हें पहचानना कै से हो . ककस प्रकार की सावधानी ऄक्तनवायम हैं औ बस्तु अपके पास हो ? 4. नमनान जागरण तो सीख कर कर क्तिया पर नांत करना न अया तो ? ईसे नांत कै से करे . अप को कै से कीिन.1. 7. हम ऄपने सुरक्तक्षत करे ? कदग्बन्त्धन. 2.

क्या ए कक यह एक स्वर्तणम ऄवसर होगा क्तजसको खोना नहीं चाक्तहए .. क्तिखनी चाक्तहए ? .ईनके चुने जाने कक ऄक्तनवायम नतों मेंसे एक ईनकी कु डिी एक अधार होगी . मानक्तसक गुरु पूजन जो की सूक्ष्म नव साधन का ही एक प्रकार हैं कै से करे संपन्न ? आस तरह के ऄनेकों के ईत्तर /रह्नय पहिी बार अपके सम्पमुख होंगे ..क्तवगत पारद कायमनािा कक तरह आसके पुनः होने ही सम्पभावना न के बराबर हैं नहीं ये बार बार ही सकती हैं . हम आस कायमनािा के क्तिए गुरुदेव जी से ऄनुमक्तत प्राप्त करने की कोक्तनन में हैं.8... हर कोइ आसकी प्रक्ततना कर रहा हैं पर के बि कु छ ही साधक को चुना जायेगा. ओर मुझे क्या आसकी महमवता औ कदम रुके नहीं .. ऄभी तो यही योजना हैं कक ये कायमनािा 1.5 महीने के ऄन्त्दर ही हो..बस अपके . ओर आस कायमनािा की ऄवक्तध िगभग ७ से १० कदन ही होगी .

जो भी आसमें भाग िेने के क्तिए चुने जायेगे.तो आस संदभम में भी एक कायमनािा करने कक योजना बनाये जा रही हैं . 14 ...आससे ऄक्तधक भाग्य भी क्या कर सकता हैं .पारद संस्कार कायमनािा ( के बि माि 13. क्तजसे कोइ भी खोना नहीं चाहेगा . कहााँ होगी . इ फ २०११ ***************************************** . 15 वे संस्कार के क्तिए ): क्तवगत दो पारद कायमनािा में हमने १ से िेकर १२ त के संस्कार को समझा ओर सीखा पर आससे भी अगे हम बढ़ कर अपको ऄक्तग्रम संस्कार से भी पररचय कराने के क्तिए प्रयत्ननीि हैं हमने अपके यह वायदा ककया था .. पहिे दो पारद संस्कार कायमनािा में भाग क्तिए जाने वािे भाग्यनाक्तियों के क्तिए एक स्वर्तणम ऄवसर.कब होगी अप को सूचना दी जाएगी .एक ऐसा ऄवसर जो अपके ओर रस क्तसिता को प्राप्त करने कक कदना में एक और कदम होगा . ऄब अगे अप ओर अपका भाग्य .

कहााँ पर ? कब ? होगी अपको कदया जायेगा .िगभग १० कदवसीय आस कायमनािा में हमारा अपको आस क्तवज्ञानं के पहिु से भी /रह्नयों से भी पररक्तचत कराते हुए ऄग्रसर करे . ऄ्पको हम सूक्तचत करें गे ....आस क्तवज्ञानं के से धातुक्तवक नहीं संभव हैं माध्यम पररवतमन से िेकर जो भी अप सोच सकते हैं क्या .. पारद संस्कार ही नहीं बक्तल्क नव जीवन क्तनमामण से िेकर हर प्रकार कक क्तसक्ति संभव हो सकती हैं .सूयम क्तसिान्त्त कायमनािा : हमारा जीवन ही नहीं बक्तल्क सारा हमारा सौयम चक्र भी पुणमतः सूयम पर ही क्तनभमर हैं . इ २०११ . जैसे ही ईनकी ऄनुमक्तत क्तमिेगी . हम ये दावा तो नहीं करते कक अप अप आस क्तवज्ञानं क्तवनेिज्ञ बन जायेंगे पर प्रायोक्तगक रूप से आस क्तवज्ञानं को औ समझ सकते सूक्तचत कर हैं . हम एस हेतु गुरुदेव से अज्ञा प्राप्त करने कक कोक्तनन में हैं ..क्तजन्त्होंने भी परमहंस क्तवनुिानंद जी कक जीवनी पढ़ी हो वे ही आसकी ऄक्तत महत्त्व पूणमता को समझ सकते हैं. आस में चुने जाने वािे व्यक्तियों के चुनाव का एक अधार कु डिी भी होगी.. .

.....ऄब अप ओर अपका भाग्य . हम तो प्रतीक्षा करें गे ही अपके क्तिए ... ******************************************** ******* ....