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फारकहानी

कथा-गणतंत्र
ओभप्रकाश कश्मऩ

२५ पयवयी, २०१०
रेखक भहोदम कहानी की तराश भं थे . एक नन्ही भासूभ-सी कहानी. जिसे सुनते
ही भन-कभर जखर उठे . सांसं भं सायं गी फिने रगे. ऩय वाहनं के शोय, चिभचनमं
से चनकरते धुंए के फीि ऐसी कहानी आए कहां से! इधय सुफह की ओस उतयी नहीं
कक हवा भं कारे झकोये घुसऩैठ कयने रगे . रेखक का भन ऩहरे ही उदास था .
उन्हं दे ख वह औय बी जखन्न हो उठे .

‘िैसी कहानी भं िाहता हूं , वह इस वातावयण भं तो िी नहीं सकती ...धुंए के फवं डय


भं िफ फड़े -फड़े दयख्त नहीं किक ऩाते तो कोभर करी-सी कहानी का क्मा?’

रेखक भहोदम ने अऩने आऩ से कहा . कहानी की तराश भं वे आगे फढ़ते


िरे गए . िरते-िरते ऩांव थके, ऩय भन की उभंग ने रुकने न कदमा . कपय िफ
हल्की हवा की गुनगुनाहि कान भं ऩड़ी . ऩंचिमं की िहिहाि ने भन को िुआ
तो योभ-योभ प्रपुजल्रत हो गमा ...सायी थकान उडनिू . उन्हंने भग्न भन गदद न
उठाकय दे खा , िायं ओय हरयमारी की कनातं तनी थीं . ऊऩय दयू तक पैरा हुआ
नीरांफय. वृऺं-रताओं की कोभर ऩंखुकड़मं ऩय झूरा झूरती ओस की फूंदं . औय
उनसे िकयाकय वाऩस रौितीं , स्वणद- आबा बफखेयतीं िंिर सूम-द यजश्भमां. सफ कुि
िीवन की नई उभंगं से बया था. भगय रेखक के भन भं तो उदासी ऩसयी हुई थी.
इतना कुि था, ऩय कहानी नहीं थी.

कहानी नहीं तो कुि नहीं—रेखक ने सोिा.

‘भुझे इतनी िल्दी चनयाश नहीं होना िाकहए . कहानी िफ हय िगह है तो महां
बी िरूय होगी.’ भन के दस
ू ये कोने से तत्कार आवाि आई. उसी की प्रेयणा ऩय वह
आगे फढ़ने रगे . ऩांवं के नीिे भानो कारीन बफिा हुआ था . हरयमारी का कारीन.
घास इतनी कोभर औय भासूभ कक रेखक उसऩय ऩांव यखते हुए सकुिा यहे थे .
अिानक एक पुनगी उनके ऩांव भं पंसी . उसको भुक्त कय ने के चरएवे िभीन की
ओय झुके. तबी उनकी चनगाह घास के नन्हे -नन्हे पूरं ऩय ऩड़ी.

उसी सभम दयू िंगरी िानवयं का एक काकपरा दौड़ रगाते हुए वहां से गुिया.
उनके कदभं की आहि से कदशाएं धभक उठीं .रेखक ने फड़ी ककठनाई से खुद को
फिामा. थोड़ी दे य ऩहरे िहां शांचत थी , वहां अव्मवस्था िा गई . घास की नन्ही
पुनचगमां िो कुि दे य ऩहरे तक शान से चसय उठाए थीं , िभीन ऩय बफिकय अऩने
हारात ऩय आंसू फहाने रगीं. कपय बी कुि पूर थे, िो अफ बी ज्यमंकी त्मं भुस्कया
यहे थे . उनकी दे खा- दे खी घास िो थोड़ी दे य ऩहरे बफि- सी गई थी , दफ
ु ाया गदद न
उठाने का प्रमास कयने रगीं . थोड़ी दे य फाद सफ कुि ऩहरे िैसा हो गमा . मह दे ख
रेखक दं ग यह गए.

‘िो बी महां से गुियता है , वही तुम्हहं कुिरकय िरा िाता है . क्मा तुभ
अऩनी हारत से खुश हो?’ उन्हंने पुनगी से ऩूिा.

‘कतदव्मऩारन भं बरा औय फुया क्मा ?’ िवाफ चभरा. रेखक कुि सभझे , कुि
नहीं, फस अगरा प्रश्न दाग कदमा—

‘रोग तुम्हहं कुिरं नहीं तो औय बी सुंदय जखर सकोगी?’

‘वैसा हो तो बी फुया नहीं है, ऩय िो है उतना बी कापी है.’

‘क्मा तुम्हहं ऩहे चरमां फूझने की आदत है?’

‘इसभं ऩहे री कैसी . घास न हो तो बी धयती सहती ही हं . बफना ककसी


चशकामत, फगैय उप् ककए . भं जिस चभट्िी से अन्न- िर रेती हूं . जिसके ऩोषक
तत्वं से भेया शयीय फना है . उसके औय प्राजणमं के ऩैयं के फीि आकय मकद भं
धयती का थोड़ा-सा बी फोझ फांि रेती हंू , तो इसभं कैसा फड़प्ऩन . फजल्क भुझे तो
इसी भं अऩने िीवन की साथदकता निय आती है .’ घास की फात सुन रेखक को
अऩना अजस्तत्व िोिा निय आने रगा . भाभूरी पुनगी का अऩनी भातृबचू भ के
प्रचत प्माय औय सभऩदण दे खकय वह चनरुत्तय हो गए . वहां से िरते हुए वे नदी
ककनाये ऩहुंि.े वहां एक किुआ अऩने सात फच्चिं के साथ ये त भं फैठा हुआ था.

‘आि तो सफकुि फदरा हुआ-सा है . रगता है कक अफ भेयी कहानी भुझसे


दयू नहीं है .’ रेखक के भुंह से फयफस चनकरा.

‘क्मा तुभ इन्हं ऩढ़ा यहे हो?’ उन्हंने ऩूिा.

‘भं तो केवर अऩने अनुबव फांि यहा हंू . उसभं कुि बी दचु नमादायी से अरग
नहीं है .’ किुआ फोरा , कपय अऩने फच्चिं को संफोचधत कयके फोरा , ‘भेया सभम ऩूया
हो िुका है . फहुत िल्दी िंगर के यािा का िुनाव होगा . तुभ भेये अऩने फच्चिे हो .
िुनाव के सभम िो बी पैसरा कयो, खूफ सोि-सभझकय कयना.’

‘कैसा िुनाव...’ फड़ा फेिा उग्र स्वय भं फोरा , ‘ ऩुत्र अऩने बऩता की बवयासत का
स्वाभी होता है . आऩका फेिा हो ने के नाते नदी के प्राजणमं का यािा फनना भेया
अचधकाय है . आऩकी फात कोई िारेगा बी नहीं . ऩयं ऩया-अनुसाय नए यािा को ताि
आऩ ही ऩहनाएंगे . इसचरए आऩको िाकहए कक बऩता होने के नाते भेये अचधकायं
की यऺा कयं .’

‘यािा की जिम्हभेदायी तो इस नदी के प्राजणमं ने ही भुझे सं ऩी है . वह


साधायण बवयासत नहीं . यािा वही फनेगा िो सुशासन कयसके . आिादी को
संबारकय यख सके.’

‘उऩदे श दे कय आऩ हभाया अचधकाय नहीं िीन सकते . िंगर भं दे खो , हभेशा


शेय ही वहां का यािा फनता है.’
‘मह नदी है , महां ककसी की भनभानी नहीं िरती . हभ सफ चभर- फैठकय
अऩना यािा िु नते आए हं .’ फूढ़े किुए ने फच्चिं को सभझाने की राख कोचशश
की. ऩय उनभं से एक बी सभझने को तैमाय न था.

‘ठीक है . भं तुम्हहं एक कहानी सुनाता हंू . उसके फाद तुभ िो पैसरा कयो ,

वही भुझे भंिूय होगा.’ फच्चिे शांत हुए तो किुए ने कहानी आयं ब कय दी—

‘वषं ऩहरे की फात है . उन कदनं आदभी बी अंधकाय भं था. ताकत का याि


िरता था. जिसके हाथं भं ताकत आ िाती , वही दचु नमा ऩय सवायी गांठने रगता.
तो जिन कदनं की मह कहानी है , उसके ठीक ऩहरे दचु नमा भं खुशहारी थी . रेककन
रोग सुख भं इतने डू फे कक धीये - धीये अऩना कतदव्म औय सायी नैचत कताएं बफसयाने
रगे थे . सभाि भं अनुशासन फनाए यखने के चरए रोकसंसद थी . स्वाथद भं डू फे
रोग उसकी बी उऩेऺा कयने रगे . ऐसे भं उसको भौका चभरा . रोकसंसद को बंग
कय वह खुद यािा फन फैठा.’

‘वह कौन?’ फच्चिं भं से एक ने ऩूिा.

‘डमारू था उसका नाभ....एक ताकतवय, घभंडी औय क्रूय व्मबक्त. यािा फनते ही


डमारू ने दे श के रोगं का वह हार ककमा ककसफ त्राकह-त्राकह कय उठे —‘आि के फाद
वही होगा, िैसा भं िाहं ूूगा. रोग वही सोिंगे िो भं कहूंगा. हिकय सोिने, हुक्भ न
भानने वारे का चसय करभ कय कदमा िाएगा.’

डये हुए रोग डमारू के आगे नतभस्तक होने रगे . दयफाय भं िाऩरूसं का
िभाफड़ा फढ़ता ही गमा . उनके चरए डमारू कदन कहे तो कदन , यात कहे तो यात .
इससे डमारू का दस्
ु साहस औय बी फढ़ने रगा—
‘भं महां का एकऺत्र सम्राि हूं . धयती-िांद-चसताये -सूयि सफ भेया आदे श
भानते हं .’

‘भहायाि, िंगर के गुस्ताख िानवय अफ बी आऩके आदे श के बफना िैकड़ी


बयते हं . उदं ड नदी आऩकी अनुभचत के फगैय कर-कर फहती है औय िफ िाहे तफ,
ककनायं को तोड़ भनभाने ढं ग से इधय-उधय िरी िाती है.’

‘अच्चिा!’ डमारू गयिा . अगय ऐसा है तो िगर को िरा डारो . नदी का


यास्ता योक दो .’ आदे श सुनामा गमा . तानाशाह का हुक्भ. सैचनक िंगर को साप
कयने भं िुि गए. नदी को योकने की तैमारयमां की िाने रगीं.

आभ िनता अबी तक शांत थीं . डमारू औय उसके भुंह रगे दयफायी अऩनी
सीभा भं यहकय कुि बी कयं , इतना वह सह सकतीथी , ‘कोउ नृऩ होम हभं का हाचन!
के नकायात्भक बाव से सहती बी आई थी . रेककन िंगर को साप कयना , नदी का
फहाव योकना , इससे तो िनिीवन ऩूयी तयह नष्ट हो िाएगा . ऩेड़े-ऩौधे हं तो िीवन
है . ऩानी है तो जिंदगानी है . यािा का आदे श सुनकय रोगं भं खरफरी भि गई .
कुि रोग कहम्हभत कयके डमारू के दयफाय भं बी गए. आदे श वाऩसे रेने की प्राथदना
की. तानाशाह उन्हं दे खते ही उफर ऩड़ा—

‘मे बी िंगर के िानवयं जितने गुस्ताख हं , नदी जितने ही उदं ड हं ूै . इन्हं


कैद कय चरमा िाए.’ परयमादी कैद कय चरए गए . कहते-कहते किुआ रुका. फच्चिे
सांस योककय कहानी सुन यहे थे.

‘आगे क्मा हुआ?’ एक ने ऩूिा. फाकी बी उसके स्वय भं स्वय चभराने रगे.

नदी ककनाये काष्ठकायं का एक गांव था . वहां के चशल्ऩकाय रकड़ी की सुंदय-


नक्काशीदाय िीिं फनाते. नाव फनाने भं तो उनकादयू -दयू तक सानी न था. फड़े -फड़े
सभुद्रों, भहानकदमं भं उनकी फनाई नौकाएं यात- कदन तैयतीं . एक कदन डमारू के
सैचनकं का एक ित्था उस गांव भं ऩहंु िा—

‘नदी सम्राि डमारू का अनुशासन नहीं भानती . उसको योकना है . सम्राि का


आदे श है कक फड़ी- फड़ी नावं फनाई िाएं . उनभं ये तबयकय उदं ड नदी के फहाव को
योका िाएगा. उसके फाद भहायाि डमारू जिस ओय िाहं गे , नदी को उसी कदशा भं
फहना ऩड़े गा . इसके चरए भहायाि ने गांव के सबी काष्ठकायं औय भिदयू ं को
यािधानी ऩहुंिने का आदे श सुनामा है .’ रोग िुऩ . ककसी के भुंह से फोर न पूिा .
उसके फाद तो िफ तक सैचनक यहे, वातावयण भं िुप्ऩी िाई यही.

उसी शाभ सैचनकं के कंू ि कयते ही गांव भं एक सबा हुई . वहां के भुजखमा
का नाभ था, बवद्यानंद. वह फहुत ही अनुबवी. फुबिभान औय व्मवहाय-कुशर आदभी
था.

‘सैकड़ं नाव फनाने भं तो भहीनं रगंगे . इतने सभम तक यािा की फेगाय


कयनी ऩड़ी तो हभाये ऩरयवायं का क्मा होगा ?’ शाभ की सबा भं काष्ठ- चशजल्ऩमं ने
चिंता व्मक्त की.

‘डमारू जिद्दी , क्रूय औय तानाशाह है . सभझदायी की कोई फात उसके गरे नहीं
उतयती. उसको सभझाने बेिे नागरयकं का हार तो तुभ दे ख ही िुके हो . आि
तक वे उसकी कैद भं िक्की ऩीस यहे हं.’

‘आऩके अनुसाय हभं डमारू का आदे श भानना ही होगा ?’ बवद्यानंद को कहम्हभत


हायते दे ख एक ने ऩूिा.

‘कपरहार तो दस
ू या यास्ता निय नहीं आ ता. इतना बयोसा यखो कक मुबक्त भं
ही भुबक्त है .’ अगरे कदन काष्ठकायं का दर डमारू के दयफाय भं उऩजस्थत हुआ .
भुजखमा बवद्यानंद ने कहा —‘हभं अऩने यािा का आदे श स्वीकाय है . भगय यािधानी
तक साये औिाय राना संबव नहीं है . आऻा हो तो मह काभ हभ अऩने गांव भं
यहकय कयना िाहते हं.’

‘भेये सैचनक तुभ सफ ऩय निय यखंगे . िो बी काभ भं राऩयवाही फयतेगा ,

उसका चसय करभ कय कदमा िाएगा.’ डमारू गयिा.

‘भहायाि सैकड़ं नावं के चरए ढे य सायी रकड़ी की िरूयत ऩड़े गी.’

‘भुझे िंगर को बी सफक चसखाना है, इसचरए भेये सैचनक उसे साप कयने ऩय
तुरे हं .’

‘नाव फनाने के चरए कऩड़ा, यस्सी, भोभ िैसी िीिं बी िरूयी हं.’

‘याि के जितने बी िुराहे , यं गये ि, यस्सी फिने वारे बीर औय भिदयू हं , सबी
को काष्ठकायं के गांव बेि कदमा िाए.’ डमारू ने आदे श कदमा.

‘भहायाि की दमा हो . गांव भं हिायं की संख्मा भं रोग िुिंगे ...उन्हं खाने-


ऩीने के अरावा....’

‘हभ सभझते हं . सफ सभझते हं .’ डमारू ने गदद न कहराई , कपय सैचनकं को


संफोचधत कय फोरा , ‘ककसानं से कहो , अनाि की कभी नहीं ऩड़नी िाकहए .
दक
ु ानदाय भिदयू ं औय कायीगयं के चरए फाकी िीिं का फंदोफस्त कयं , जिसने बी
िूक की, उसका चसय करभ कय कदमा िाएगा.’

‘आऩकी दमारुता के क्मा कहने ! भहायाि काभ िल्दी से िल्दी का ऩूया हो ,

इसके चरए आदभी- औयत सफको एकिुि होकय काभ कयना ऩड़े गा . फच्चिं के
भनोयं िन के चरए मकद एक- दो ककस्सागो औय गामक बी गांव बेि कदए िाएं
तो....’
डमारू ककस्सागो , गामकं औय महां तक चशऺकं को बी नाऩसंद कयता था .
उसकी निय भं मे रोग रोगं को गरत ऩाठ ऩढ़ातेथे . इसचरए यािा फनते ही
याज्यम की सायी ऩाठशाराओं को फंद कया कदमा गमा था . ऩयं तु उस सभम उसका
साया ध्मान नदी को ‘सफक चसखाने’ ऩय कंकद्रोत था . इसचरए उसने बवद्यानंद की
फात भान री . वे रोग वाऩस गांव रौि आए . अगरे कदन से ही वहां कायीगयं
का िभाफड़ा होने रगा . िंगर से राए गए वृऺ वहां िभा होने रगे . डमारू ने
सैचनकं की एक िु कड़ी रोगं ऩय निय यखने के चरए यख िोड़ीथी . ऩय कायीगयं
को अऩने- अऩने काभ भं िुिा दे ख सैचनक चनजिंत हो गए . नाव फनाने का काभ
आगे फढ़ता गमा . चशल्ऩकाय काभ भं िुिे थे . रेककन उसभं भन ककसी का नहीं
था. सफ बीतय से व्मचथत थे.

‘भं रोगं के तन ढकने के चरए कऩड़ा फुनता था . अऩने ऩेशे को ऩबवत्र


भानता आमा हूं. ऩयं तु अफ भुझे एक तानाशाह के चरएकाभ कयना ऩड़ यहा है . भुझे
अऩने ऊऩय शभद आ यही है .’ एक िुराहा फया फय भं काभ कय यहे यं गये ि से फोरा .
वह कोई उत्तय दे उससे ऩहरे ही उसके साथ काभ कय यहा मुवक काष्ठकाय कहने
रगा—

‘भेयी फनाई गई नावं सभुद्रो का सीना िीयकय आगे फढ़ती िाती हं . िाने
ककतने माबत्रमं को योि उनके गंतव्म तक रे िाती हं .सैकड़ं व्माऩायी भेयी फनाई
नावं से व्माऩाय कयते हं . रेककन अफ तानाशाह के चरए काभ कयते हुए िी द्ु खता
है . इससे तो अच्चिा है कक भं अऩने हाथ ही किवा रू.ं ’

भुजखमा बवद्यानंद खुद बी अच्चिे काष्ठकाय थे . रकड़ी को िू दे ते तो उसभं


भानो िान आ िाती . फाकी कायीगयं के साथ वे बी काभ ऩय िुिे थे . िेहये ऩ य
गंबीयता थी. मुवक काष्ठकाय ने उन्हं बविचरत कय कदमा—
‘तुम्हहाया क्मा कहना है?’ बवद्यानंद ने फयाफय भं फैठे ककस्सागो से ऩूिा.

‘अऩने िीवन भं भंने रंफा सभम दे खा है . हिायं रोगं से चभरा हूं . भगय
इस बवऩबत्त भं कुि माद नहीं आता , रेककन वषं ऩहरे एक कहानी भंने सुनी थी. न
िाने क्मं, वह बुराए नहीं बूरती!’

‘तुभ तो खुद फड़े ककस्सागो हो , कपय ऐसी कौन- सी कहानी है िो तुभसे


बुराए नहीं बूरती?’ बवद्यानंद ने आिमद-चभचित स्वय भं ऩूिा.

फ्रांस के दाशदचनक की चरखी िोिी- सी कहानी है . ऩय कहानी से ज्यमादा तो


मह ऩहे री है ?’

‘ऩहे री! डमारू के याि भं क्मा मह ऩहे री फूझने का सभम है ....’ यं गये ि ने
फुझे भन से कहा.

‘कोई फात नहीं , कहानी सभझकय ही सुन रीजिए ....’ बवद्यानंद ने कहा तो
ककस्सागो ने कहना आयं ब कय कदमा—

‘कहानी इस तयह है —भान रीजिए फ्रांस भं इ स सभम दो हिाय डाूॎक्िय ,

वकीर, अध्माऩक, दो राख ककसान , दो राख भिदयू , दो हिाय िोिे व्माऩायी तथा
इतने ही चशल्ऩकाय हं . अफ कल्ऩना कीजिए , हारांकक मह फहुत फुयी कल्ऩना होगी ,

रेककन फुये सऩने की बांचतबुरा दे ने के चरए ही सही , कल्ऩना कीजिए कक इस एक


फड़े हादसे भं वे सफके सफ एक साथ भाये िाते हं. तफ फ्रांस का क्मा होगा?’

‘िफ िनता ही न यहे गी तो दे श कैसा...कोयी फंिय धयती, जिसऩय सांऩ-बफच्चिु


औय िभगादड़ ही फसेया कयं गे . चशल्ऩकायं भं से एक ने बफना एक बी ऩर गंवाए
उत्तय कदमा. बवद्यानंद ने दे खा, सफ कथा का भं डू फे हुए थे.
‘ठीक कहा आऩने, िनता है , तो दे श है , आदभी के बफना धयती तो फंिय फनेगी
ही, अफ एक ओय कल्ऩना कीजिए...उसी फ्रांसभं सौ नेता औय भंत्री, दो सौ अचधकायी,
प्रशासक, औय कुि दिदन धभादिामद हं . मकद एक हादसे भं मे सफ के सफ िर फसं ,

तफ उस दे शका क्मा होगा?’

‘ि..च्चि...च्चच्चि! फहुत फुया होगा. इस झिके से उफयने भं तो उस दे श को वषं


रग िाएंग.े ’ चशल्ऩकायं की ओय से तत्कार िवाफ आमा.

‘सभम रगेगा , भगय उफय िाएंगे .....दाशदचनक ने बी मही चरखा था . उसका


नाभ था संत साइभन . िानते हं उसके फाद फ्रांस भं क्मा हुआ था ? ककस्सा भहि
डे ढ़ सौ वषद ऩुयाना है .’

‘आऩ ही फताइए....!’ सफकी आंखं ककस्सागो ऩय किकी थीं.

‘फ्रांस की िनता सभझ गई कक दे श यािा से नहीं , िनता से फनता है . उसके


फाद उसने गिफ की हुंकाय बयी , जिससे यािसत्ताएक ही झिके भं िभीन ऩय आ
चगयी.’

**

इतनी कहानी सुनाने के फाद किुआ रुक गमा . चशराखंड ऩय फैठे रेखक की सांस
बी धंकनी की तयह िर यही थी. किुआ के फच्चिे सांस थाभे उसकी ओय दे ख यहे
थे.

‘आऩने हभं मह कहानी क्मं सुनाई . क्मा आऩको रगता है कक डमारू औय


फ्रांस के यािा की तयह हभ बी आततामी औय तानाशाह चसि हंगे ?’ फड़े फेिे ने
चशकामत-बये स्वय भं ऩूिा.
‘हयचगि नहीं , बऩता होने के नाते भुझे तुभऩय ऩूया बयोसा है . तुभभं यािा
फनने के सबी आवश्मक गुण हं . इसचरए भं काभना कयता हंू कक तुभ महां के
यािा फनो.’

‘मह क्मा फात हुई .’ किुआ के फच्चिं के साथ- साथ रेखक भहोदम बी उसकी
ऩहे री भं उरझ गए.

‘तुभ नदी के यािा फनो, इसभं कुि बी गरत नहीं है . गरत होगा यािसत्ता
को बवयासत भानकय तुम्हहं संऩ दे ना . ऐसी ऩयं ऩयाओं से ही डमारू िैसे तानाशाह
ऩैदा होते हं , िो एक न एक कदन िनता के आक्रोश का चशकाय फनते हं . क्मा अफ
बी तुभ....?’ किुआ ने अऩनी नियं फडे ़ फेिे ऩय गढ़ा दीं.

‘नहीं, ऩयं तु भं िुनाव भं कहस्सा िरूय रूंगा ; औय िाहूंगा कक आऩ भुझे


आशीवादद दं .’

‘बफरकुर.’ किुआ के िेहये ऩय अिानक िभक िा गई . भानो िाती ऩय यखा


भनो फोझ हि गमा हो . आशीवादद ही क्मांूे ? िुनाव भं खड़े उम्हभीदायं भं से मकद
भुझे रगा कक तुभ उन सफसे मोग्म हो तो भं तुम्हहाये ऩऺ भं भतदान बी करूंगा.’

उसके फाद किुआ ने नदी भं डु फकी रगा दी . ऩीिे -ऩीिे उसके फच्चिे बी
िरते फने . रेखक भहोदम चशरा ऩय िड़वत फैठे यहे . तंद्रोा िू िी तो उठे , िायं ओय
दे खा. प्रकृ चत वहां अऩना वैबव रुिा यही थी.

इस प्रकृ चत ने आि तक ककसी को चनयाश नहीं कक मा, ऩय आि भुझे िो


कदमा है , वह ऩूयी भनुष्मता के चरए फहुभल्
ू म उऩहाय है.
ओभप्रकाश कश्मऩ
िी- 571, अचबधा,
गोबवंदऩुयभ, गाजिमाफाद-
उत्तय प्रदे श, बायत
opkaashyap@gmail.com