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मेरा जन्म एक हहिंदी भाषी पररवार में हुआ। ऐसे तो हम लोग मल

ू तः लखनऊ के ननवासी थे पर पपताजी की नौकरी
के चलते मेरे शुरूआती साल पश्चचमी उत्तर प्रदे श के छोटे छोटे कस्बों और शहरों में बीते।

जहााँ लखनऊ अपनी अदबी तहज़ीब के ललए मशहूर है वहीिं पश्चचमी उत्तर प्रदे श की भाषा है लट्ठमार। लखनऊ वाले
अपने से छोटों को भी आप कह कर बुलाते हैं और पश्चचमी उत्तर प्रदे श के वालशिंदे अपने माता पपता को भी बुड्ढा
बुहिया कहते लमल जाएिंगे।
तो हम साल भर तो प्यार से अपने दोस्तों के साथ तू तड़ाक करते और गमी की छुट्हटयों में लखनऊ नानी के घर
जाते। पर अब तू से आप पर जाते जाते वक्त को लग ही जाता है । उस बीच हम लोगों की बेहूदी भाषा पर सब

लोग हाँसते और हम लोग हफ्ता दो हफ्ता गुज़रते गुज़रते नवाबी अिंदाज़ में बोलने लगते। जब दो महीने बाद वापस
घर जाते तो थोड़े समय तक लोग हमे ऐसे दे खते जैसे कोई रामलीला का ककरदार पूरे costumes और मेकअप में
सड़क पर आ गया हो।
बाद में हम लोग लखनऊ में ही रहने लगे और ये समस्या पीछे छूट गयी। पर मेरे घर की और स्कूल की भाषा ना
तो पश्चचमी उत्तर प्रदे श की लट्ठमार भाषा थी और ना ही लखनऊ की उदू जड़ी हुई ज़ुबान। वो तो एक बिंधी
सम्भली शहरी भाषा थी श्जसे Modern Standard Hindi कहा जाता है ।

अिंत में वही मेरी मातभ
ृ ाषा कही जा

सकती है ।
हहिंदी और उदू के बिंटवारे से हुए नुकसान को महसूस करने के ललए लखनऊ एक सही जगह है । वैसे तो आप

लखनऊ की मशहूर सिंस्कृनत के उत्तराधधकारी हैं पर उदू आपको आती नहीिं क्योंकक वो तो मस
ु लामानों की हो गयी।

दस
ू रों के मुकाबले में तो ककसी लखनऊ वाले का लहज़ा और बोली ज्यादा उदू नुमा मालूम पड़ेंगे पर दरअसल वो एक
धिंध
ु लाती हुई छाप की तरह ही है । मेरे पपताजी को ग़ज़ल और क़व्वाली का शौक था जो पवरासत में मझ
ु े भी लमला।
उसी को सुनने पिने की वजह से उदू से थोड़ी ज्यादा जान पहचान हुई। किर एक बार उदू -अिंग्रेजी मशीन ट्ािंसलेशन
पर काम करते करते उदू ललपप को पिना भी सीखा जो अब तक तो किर भल
ू गया हूाँ।

पर अगर हहिंदी मेरी

मातभ
ृ ाषा है तो उदू को भी मैंने हमेशा अपने हदल के बहुत पास महसूस ककया है । हहिंदी और उदू ही ऐसी दो भाषाएाँ
हैं श्जनमे मैं कपवता, शेर, पोएट्ी का मज़ा ले पाता हूाँ।

ऐसे तो अिंग्रेजी के साथ भी अब कािी पुराना ररचता हो

गया है पर एक दरू ी है श्जसका लमटना मुश्चकल है ।

तो जहााँ हहिंदी और उदू जन्म के सिंयोग से लमलीिं, दो और भाषाओिं से श्जिंदगी ने लमलवा हदया। जया की मातभ
ृ ाषा
मैधथली है । मानक हहिंदी और उदू के उलट मैधथली एक लमट्टी से जुड़ी हुई और उसके रस में भीगी हुई भाषा है ।
पवद्यापनत का प्रलसद्द गीत गोपवन्द मैधथली में ही ललखा गया है ।

और अिंत में कन्नड़। उन लोगों की, उस जगह की भाषा जहााँ अब मैं अपने जीवन के १० साल बबता चक
ु ा हूाँ। उन्हें
उनके सन्दभू में अगर जानना समझना है तो वो उनकी भाषा के बबना सिंभव नहीिं। क्योंकक मुझे पिने में ज्यादा
रूधच है , तो मैंने कन्नड़ ललपप को पिना पहले सीखा। जहााँ बोल कर आप लसिू अपने आस पास के कुछ लोगों से
बात कर सकते हैं, ककताबें आपके ललए दे शकाल के सारे दरवाजे खोल दे ती हैं।

उदू , मैधथली और कन्नड़ के ललए कोई नाम नहीिं है । उनके साथ अपने ररचते को मनाने के ललए कोई अलग हदन
भी ननधाूररत नहीिं है । और ये भी सच है कक मैं इन सबको लसिू सरसरी तौर पर ही जानता हूाँ। पर किर भी
मातभ
ृ ाषा हदवस पर अगर मैं लसिू हहिंदी की बात करूाँ तो कुछ अधूरा सा लगता है ।