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नव आि त व क तलाश

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olar 2016

20
16
-2

मेहमान स पादक य – डॉo वजय शंकर

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बु ले शाह का कलाम “इ मो बस कर ं ओ यार”
इंद ु लेखी क क वता
कहानी - वण जे. ओमकार
अंध व वास ले रहा है ल मी के वाहन क जान
हम मालम
ू है ज नत क हक़ क़त (सम-सामयक चचा

izLrqr vad% ^ ान क सीमा’

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डिजटल सं करण

Lo.kZ ts- vksedkj

Hindi
Literary
MarMay
2016

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"तु ह से" का

olar 2016

तत
ु अंक एक वचारो तेजक वषय " ान क सीमा" (Limitations of knowledge)

पर आधा रत है . हम ने इसे एक सामािजक मनो व ा नक व दाश नक व लेषण क तरह
कया है . हम आशा है क

तुत अंक आप को "अलग तरह क अंत ि ट "

"आप को" (पाठक को) सम पत है. --तु ह से...

D;k

तुत

दान करे गा. यह अंक

dgka

मेहमान स पादक य – डॉo वजय शंकर (9)
कलाम सा

बु लेह शाह (16)

सं कार ने ख म कर द यो यता- ओशो (17)
अनुभू त -गुलाब कोठार (20)
क वता इंद ु लेखी (22)
कहानी - वण जे. ओमकार (24)
मेर सुबह क वता (नीलू हष) (31)
बु जीवी और बंदर- गरु मीत बेद (32)
समपण पुरनूर कौर (34)

आप तुलना और

पधा क दौड़ म

य रहना चाहते ह?(35)

जब हम

यान करते ह (40)

गम
ु शद
ु ा त ृ ष शमा (41)
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D;k

मेर चु नंदा क वताएँ -कुलवंत

dgka

ेवाल (42)

पानी और लहर - परमजीत चु बर (43)

थाई त भ

तुत अंकः

ान क सीमा (5)

संपादक क कलम से (7)

च लये शा वत गंगा क खोज कर (10)
“तु ह से” रपो्रताज (23)
हम मालूम है ज नत क हक़ क़त (सम-सामयक चचा) (37)
आप क

त-

याएँ (44)

हमार फ मी शायर (48)

पांच इि

य ने एक त कया

दरवाजे बंद कये चेतना के,

ान.

य के.

म ृ त म. सम ृ त ने

ान बासी हुआ तो अनुभू त का
दरवाज़ा खुला. अनुभू त ने बासी गले सड़े अनभ
ु व को उखाड़ फका. चेतना नयी
हुई.

ानइि

ान ने डेरा जमाया

ान व मत
ृ हुआ - इसी अंक से

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संक पना व संसथापन
डा-

वण जे- ओमकार
कृ णा

वण

कृ णा

काशन

वण

सह-संपादन
सु या

वण

व ष ट सहयोग
डा- मोहन
भुप

ीत

वै ा नक षोध
डा- मोहन

कला व टाइ पंग स जा
रै व
सु या

laf{kIr mns’;
fo’kq) HkkSfrDrk
va=ho ;k ckg~;
fo’kq) psruk dk izokg
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वण जे- ओमकार

कायकार संपादन एवं

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ान क सीमा

आनरे र संपादन
डा-

olar 2016

वण
वण

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e-mail –
jswaran09@gmail.com

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olar 2016

तुत अंक :
अंधम तमाह

ा वसं त ये 'अ व यम

ततो भया ईवा ते तमो या उ

ान क सीमा

उपासते

व यायां रताः

य द आप अ ान क पूजा करते ह तो न संदेह अंधेरा ह आप का भ व य है अगर आप

क पूजा करते ह तो और अ धक से अ धक अंधेरा आप का भ व य है .... ईशा उप नष
यह

ान क पूजा

या है? कैसे आप

ान क पूजा व

बु लेह शाह का कथन है - इ मो बस कर ं ओ यार!

ान

से अ धक से अ धक अंधेरे म

वेश करते

है?

ान

या इ म ह बड़ी व तु नह ं द ु नया म. अ या म म आगे
बढ़ने के लए.

ान परू िज़ंदगी का चेतना का एक छोटा

पाट है . बड़ा पाट है चेतना क
वचरना.

मान ल आप के पैर म एक
एक बड़े कांटे

चेतनता से द ु नया म

कांटा चभ
ु जाता है । आप छोटे

का उपयोग करते ह।

उस बड़े कांटे का बाद म आप

फक कर, चलते बनते है । बस इतना ह
बाहर खींचने के लए

ान का बड़े

कर आगे बढ़ जाते ह. ऐसा

म ह भलाई है?
बु

कांटे को बाहर नकालने के लए

कांटे

ान का उपयोग

या करते ह? आप इसे दरू

है । आप अ ान के छोटे कांटे को

का उपयोग करते ह. फर आप दोन काँट को फक

य है क कुछ समय के बाद अ ान के साथ

ान को भी फक दे ने

ने कहा था य द आप नद पार करने के लए नाव का उपयोग करते ह, ले कन एक बार आप

ने नद पार कर ल

है, फर आप अपने सर पर नाव नह ं ढोते

है । यह हो रहा है द ु नया म.

ान के सं ह - बड़े बड़े

ह आप इसे पीछे छोड़ दे ते

थ, बड़ी बड़ी पु तक केवल पूजा थल

का ह सा ह. चंद मानव उन

ंथ को सर पर उठाए खड़े है और शेष नमन क मु ा म

को तोड़ नह ं सकते. अपने ह

बछाये जाल म उलझ चुके ह हम. सम त

ंथ को

दे ख रहे ह. आप पढ़ भी ल तो उन पर सवाल नह ं कर सकते. उन के बछाये धारणाओं के जाल
ान कसी और चीज़

क और इशारा करता है . ले कन हम सफ वा य को सूि तओं को र ा लगाने म लगे है . कस
राइटर ने

या कहा. गीता के क़ुरान के

थ सा हब के लोक को र ा लगाने म लगे है . सो इस

ान क सीमा नधा रत है. जो जान लया गया है - हम उसे पूजने म लगे है .जो अभी जाना

नह ं गया उस क और दे खते तक नह ं .
कैसे अ धक से अ धक

ान अ धक से अ धक अंधेरे म मानव को धकेल रहा है ?

ान के बहुत से खतर म से एक है आप का अहम ्. आप को यह व वास हो जाता है क
ान पर यान क त करने से आप को अ धक से अ धक ा त होगा। यह एक ऐसी ि थ त

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है जहां

यि त

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वयं को ‘जानकार’ महसूस करने लगता है और एक फूला सीने और एक

फूला हुआ अहं कार आप के साथ चार ओर चलता है । कभी कभी ान हम
लए कहता है जो हम कताब पढ़ कर याद दलाया जाता है । तब हम वन

करते

वन

होने

के

होने का नाटक

है, तो यह एक नाटक य वन ता है िजसे हम ओढे रहते है . जब क भीतर से हम ती

अहम ् से भरे रहते है क हम बहुत ान है .
हमारा ेम ववेक और बोध से है . होना भी चा हए. पूवािजत

ान से नह .ं

मानव

ाचीन समय से ह

ान क असीम पपासा लए हुए है . वह पूव अिजत ान क पूजा म त ल न नह ं
रहता था. वे मानव चेतना को हरदम नया रखते थे. वे उस ान म
च रखते थे जो अभी
जाना नह ं गया है . उस

ान म नह ं जो जान लया गया है . पहले से जाना हुआ
ान तो
पूवज
थम ै ण के
ानवान थे. वे ऐसे ानवान थे िजनके बोध

बंधन है आप का. हमारे

का उ गम थल बाहर संसार नह ं उनका अपना अंतस ् था. वे अंतर-आ मा क गहन ् खामोशी

से बोलते थे. पर उनक एक सम या थी जो आज हम सब क है. स यता (reality) क

अवधारणा (concept) इसी संसार म बनीं और संसार के लोग क समझ के अनु प ह कह

या लखी जाने लगी. उसी धारणा के अनु प स य को अ भ य त करना उन क , hamari

बेबसी है . वे लोग क भाषा के अनु प बात करते थे. ले कन हरदम नयी व उ कृ ट बात

करते थे. उन क बात को
अंतस का

दस
ू र

ान था.

ु त (या revelation या वेद) कहा जाता था. ये

ै ण के वचारवान स य के खोजी नह ं थे. वे केवल पूव घो षत

(followers) थे. वे पहले से बछ
वारा

बसात पर खेलते थे. उ ह ने

य त अवधारणा (concept) के केवल बा य अथ को

व तार को बढ़ावा दया. इन क

रामायण , महाभारत या परु ाण
इससे अगल

ान के अनुगामी

ै ण के वचारवान

हण कया और बु

के इसी

व तत
ृ लेखनी को सम ृ त सा ह य कहा जाने लगा. िजन म

आ जाते

है .

ै ण के वचारवान ने तो इन अथ को भी छोड़ दया और केवल बाहय ् श द

को ह उ साह से अपनाया और इ ह स ांतक

ठोस

थम

ु तयां उन के शु

श द म ढाल दया एवं

जकड़ गई.

प दे दया और उन स ांत को ठोस मु तओं,

ंथ म बाँध दया. तब

बु

अवधारणाय के ठोसाकार म

आज भी कभी कभी कोई मौ लक वचारवान पैदा होता है जो तमाम परु ानी अवधारणा को

तोड़ दे ता है.यह सारा

ा त

कया

ान केवल एक पुरानी मनो म ृ त है . यह चेतना क

ती णता को कुँ ठत करता है . उसे अतीत म रहना सखाता है . उसे उज ड व
उसे मंदबु

बनाता है . उसे नयी धारणा म

च रखने को रोक दे ता है .

खा बनाता है .

कला-- सैल बल वंदर

नवेदनµ वण ओमकार

ऋ ष बात नह ं करते, तेज वी लोग बात करते ह और मूख बहस करते ह।
रामधार

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संह दनकर

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Ekkuoh; psruk dk niZ.k

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क क कलम से--मा यवर…
...मानव स यता के शशु

काल से ह मानवता दो

े णय म बट गई. एक

ेणी म वे

बु

मानव ह, जो मन क गहराई म उतरते ह, जो मानव के कये पूव काय का अवलोकन करते ह.

उसे रा ता दखाते ह. दस
ू र
जाल म उलझे ह, मन से
…इस

चेतना

बु

है , वे

ेणी म शेष

यादा रा त

सभी मानव जो अपने कम और अपनी इ छाय के

पर उतरते ह. ये मानव

ेणी के मानव भी कमशील ह? हाँ
कृ त के महान ् पु

य क उन क कम भू म उन का मन बु

ह जो उस के भेद जानने म अपना

और उस क सौगात का आनंद उठाने म कम. यह

को इतना ब ढया
मि तषक दया है और वे

उतारने म लगे ह.

से अलग नह .ं तो

कमशील ह- कहा जाता है .

कृ त का क़ज़

कृ त ह

यादा समय लगाते ह

है हम पर क उसने मानव

कृ त क कोख़ म गहरे उतर कर उस क़ज़

कृ त के अंतस ् म उतर कर वे इस त य से एकमत

या

होते ह क हम

कृ त क खोज कर रह है ? जब वे गंभीरता से

गहन स य खोज नकालते है तो शेष

को

कृ त

कृ त के ऐसे

लोग उनका अनग
ु मन करते ह, उन से लाभाि वत होते ह.

...पर दभ
ु ा यवश से यह बात अधूरा स य है . हमेशा ह ऐसा हो यह ज़ र नह .ं ये तथाक थत
बु

मानव शेष समाज से न का शत

उन क अं

ा ण है . जीवन को बदल सकने यो य उस

का प र ान

ि ट केवल धूल चाटती पु तक का ह सा हो कर रह जाती है . या उन पु तक का

िज ह केवल पूजातु य माना जाता है और पूजा के समय ह उन का पठन या गान होता है . उन

म संक लत महान ् स य को लोग अपनी मन बु
काम से अनजान रहते ह.

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से दरू रखते ह. लोग इस बु जीवी वग के

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…हमारे आस-पास ऐसे लोग क
साधारण और

बु

मानव म अं

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कमी नह ं जो अथ चारे म उलझी अपनी अधरू

ि ट से

नह ं कर पाते. आ म- ववेचना से नतांत दरू ये लोग व व के

येक बड़े धम के "masses" मे कहलाते ह और यह लोग मानव न मत मानव संकट का

कारण बनते ह.

...दस
ू र ओर हमारा यह
बु

को भी

बु

मानव भी क लयग
ु -

त हो गया है . तमस ् का यह यग
ु उस क

मत कर रहा है . मि तषक का पसीना बहा कर क कमाई को वह अ त- साधारण

द ु नयावी काय म लगा रहा है .

…उसने अब ऐसी व याय का समथन शु

और न वै ा नक स चाई.

यो तष, श न पूजा इ या द -ये सब मनु य का शोषण करने क

व याएँ ह जो तमस ् के इस युग म

अ धक

कपट और

कर दया है िजन म न अ याि मक ईमानदार है

मानव म और अंधापन ला रह ह.

तमस ् के इस युग म

ान ह अ ान का कारण बन रहा है . मानवीय मन कभी भी कपट नह ं छोड़ पाया.
ान ने मानवीय मन म अब गहरा संयोयन कर लया है . मूलतः यह कपट है िजसम

मानव क

च है .

ान और

ानी जन से लोग का व वाश

अ याि मक अब केवल मानवीय शोषण का तर का है .

उठ रहा है .

ान तकनीक हो या

... ावीन काल म ह ऋ ष लोग ने “ ान क इस सीमा” को समझ लया था. वेद या न

अजन से

वेदांत या न

को महा तम

ान का अंत तक जाने वाले उन महान ् मानव ने केवल आ मानभू त

ान माना है . ले कन यह एक ऐसा

बन पाया है . जीवन क सम ता का
आ मा िजससे

आ मानभू त है .

...

ान का

ान है िजस के संबंध म कभी एकमत नह ं

ान, केवल बौ क

ान नह ं बि क प र ान ; बु

नह ं

भा वत हो, भीतर व बाहय ् दोनो, पयावरण िजस से अलग नह ं ह सम

तुत अंक से हमारा

योयन यह है . सूचना

मरणशि त व तकनीक बुौ

योग मानवीय नसल के लये घातक बन रहा है . यह केवल उस म

बढ़ावा दे रहा है . इस भावना से

ता का यह

त पधा क भावना को

े रत वे मानवीय संसाधन को बेदद से लूटते ह. एक दस
ू रे से

आगे बढ़ने क यह होड़ हमार पिृ व व पयावरण को कतना गहरा नुकसान पहुंचा रह है इस का
अंदाज़ा लगाना आसान नह .ं हम अपनी ह आगामी नसल को या एक ठूंठ पिृ व दे कर
जायगे?

... "तु ह से"

वारा

ान क सीमा क चेतना को, पिृ व व पयावरण क चेतना को जन-

मानस ् तक पहुंवाने म हम आप के आशीवाद क ज रत है . हम पिृ व पयावरण चेतना व
आ मानभू त जनक आप क रचनाय क ज रत है .

... "तु ह से" के आगामी अंक - ‘परमा मा है

या’, चेतना है

इ या द से सबं धत आप क रचनाय सादर आमं त ह.

या’, ‘ या भला

या बुरा’

"तु ह से"

कृ णा

वण

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तुत अंक :

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इसम

ान क सीमा

और

कोई संदेह नह ं क व ान, यां क
व वध तकनी क

योग

ने

मानव

जीवन को बहुत सरल और सुगम बना दया
है पर इसम भी संदेह नह ं क आदमी का

मेहमान स पादक य

जीवन काफ कुछ यं -तु य एवं यं -वत हो

– डॉo वजय शंकर

गया।

सम या , वांस लेने के लए

शहर

जीवन

पयावरण

व छ वायु का अभाव अ या धक आ यौ गक उ न त का

ह प रणाम है । यंू भी कह सकते ह क उ योग को एक ह

थान पर कुछ महानगर म

ह क त कर दे ने से आ यौगीकरण को हम लाभ पहुंचाने म सफल तो हुए पर कह ं
मानव जीवन को कृ त से ओत ोत जीवन से वं चत कर हम बहुत बड़ी भूल कर बैठे ह।
महानगर के

वा

जीवन के हर

नवासी

वांस और

य स ब धी आंकड़े तो यह संकेत करते ह क वहां के अ धकाँश
दष
ू ण ज नत रोग से कतने गंभीर

म तकनी क का

योग

प से

त और

त ह।

वयं जीवन के लए कतना साथक है , आइये

इस पर वचार करते ह। आज से लगभग दो दशक पूव बा◌ॅयो-टे नॉलजी वषय क बड़ी

धूम थी। चँू क मेरा स ब ध उ च श ा वभाग से ह रहा है और मेरे दाइ व म नवीन

महा व यालय

का खोला जाना और मा यता के

स म लत था, अत: मने यह दे खा था क

करण

का

नर

इ क वीं शता द के कुछ

ण करना भी

ारि भक वष म

बायोटे नॉलजी वषय क मा यता हे तु बड़ी मा ा म आवेदन आते थे। एक जूनून सा था
क इस बा◌ॅयोटे नॉलजी से

या- या हो जाएगा, टमाटर चार गुना बड़ा होगा, और सभी

सि जयां भी खूब बड़ी बड़ी और
ाि त आ जाएगी।

यह है क

भूत मा ा म

उस तकनीक

ह गी। कृ ष उ पादन म

एक तरह क

ाि त को तो च लए जाने दे ते ह पर जो हुआ वह
सि जय के साथ औग नक सि जयां अलग और काफ मंहगी बकने लगी।

बा◌ॅयोटे क सि जय म

वाद आ नह ं रहा है , उनक ं पौि टकता भी वचारणीय है , और सच

यह है क ऑग नक सि जयां अपने महं गे रे ट के कारण साधारण आदमी क पहुँच से
बाहर ह। और तो और अब औग नक घर के भी व ापन आ रहे ह। ऐसे म या

हमारे

लए यह सोचना आव यक नह ं हो जाता है क व ान का हर कसी

तकनीक

योग हमारे जीवन के लए कतना हतकार है ? इस

म ह या हम पर भार है ?
यह भी वचारणीय क

मनु य के

वा

या

कार का

ान हमारे हत

ान का ल य केवल धन-अजन है, कसी भी क मत पर,

य और जीवन के मू य पर भी?

उसक कह ं कोई सीमा रे खा है या नह ?ं

ान का वा त वक

या है ?

डॉo वजय शंकर (;w-,l-,-)

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वण जे ओमकार

अभी तक कुछ धारा तो बची है -साफ़! व छ! नमल!
अभी तक कुछ

ान तो बचा है-

शु ! शा वत! महा तम स य!

मानवीय कु ठाय , मानवीय अहम ्, और मानवीय मन से अ भा वत! जो
अं गत ह अंतस ् म उतरा और जैसा आया वैसा बांट दया गया. ( थम
( वतीय
पूव कथा:
य थत

गंगा क

कृती के नयम के

करण से..)

करण)
गंगा

ा न से संबो धत है .

यथा ने

ा न के

दय को झजकोर दया है . गंगा उसे बताती है मनु य क तमाम

वसंग तय , मुसीबत , परे शा नय का कारण उस का ओछा
याय मान रहा है .

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ान है िजसे वह अपनी तर क का

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इस

ान ने उसे

कृ त से दरू कर दया है . वह

मानता है .

पिृ व पर मानव के अपने

भौ तक

कृ त को अपना ल य नह ं ल य का साधन

वाथमय कई ल य ह. जैसे मन लभ
ु ावनी

ग त िजस के लये वह

स य

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णक चकाचध से

े रत

कृ त क मह वपूण संपदा न दय नाल के समीप अपने लये

साधन इ या द के बड़े बड़े उ योग लगाता है . उन से नकलता रासायणक ज़हर न दय

नाल को

द ू षत करता है और पेय पदाथ

वारा वा पस

उसी के शर र म

वेश कर रहा है .

भरे पूजा

थल बनाता है जो उस के तथाक थत ‘परमा मा’ व ‘परमा मा के अवतार ' वण गह
ृ व

और भी ल य ह मानव के जैसे वह अ याि मक उ थान के नाम पर भौ तक सुख व चकाचध

परमा मा के पुजा रय के वलास गह
ृ बन गये ह.

उस का यह तथाक थत ‘परमा मा’ उस क असुर ा क भावना से उपजा है . उस ने इस

‘परमा मा’ को भी अपने यापार व भौ तक तर क का साधन बना लया है .

इस सारे पचड़े म मनु य क बड़ी वसंग त

यह है क वह अपने इस ‘परमा मा’ से भी उसी

न दयां भी उस के लये इसी तरह भय का

तीक ह, उ ह दे वयां मानता है पर उन के द ू षत

तरह भयभीत है िजस तरह अपनी असुर ा क भावना से उपजे दे वी दे व श न, राहु, केतु आ द से.

जल के रासायणक

भयभीत है .

भाव को उन का

कोप मानता है और भौ तक

भाव या न बाढ़ इ या द से

अपनी भौ तक व मान सक तुि ट के लये मानव के जो भी पिृ व पर ल य ह पर अभी तक

कृ त का स दय और उस क मह वपूण संपदाय को अपने व अपने ब च के भ व य के लये

बचाना उस का ल य नह ं बना है .
इसी ओछे

ान से मानव को नकालना और सह व

ानो चत अनुभू त का सं े ण करना अब

‘ ा न’ का ल य है . इस के लये उस ने मानवीय अ धवास म जा कर
लया है .
तुत

ंखला उ ह ं

ानी का दस
ू रा

वचन का ल खत

पां

मा

वचन दे ने का मन बना

है ....

वचन-2

दे श क भू म पर उतर है गंगा, वग से, बादल के शखर से. गंगा का उ गम

थल है

या न जल से भरे बादल. जल क नमी ले जाती हवा. पूव से पि चम क और बहती हवा.

वग

पुरवाई. स दय से लोग गाते रहे ह पुरवाई के गीत, नग़मे. कतनी बाढ़ आये बादल बरस, घर ढह,

जीवन बखरे , प ृ वी जल मगन हो- बरखा ने, पानी ने जल ने कभी परे शान नह ं कया मानव को.

परे शान कया तो - बरखा के न आने ने, सूखे ने, रे त कण के अ बार ने, म

थल ने.

दे श क भू म पर उतर है गंगा, वग से, बादल के शखर से. मन क भू म पर उतर है वह
गंगा

जमाया

ान क गंगा अनभ
ु ू त के शखर से. पांच इि

य ने एक त कया

म ृ त म. सम ृ त ने दरवाजे बंद कये चेतना के

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ानइि

य के.

ान.

ान ने डेरा

ान बासी हुआ तो

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olar 2016

अनुभू त का दरवाज़ा खल
ु ा. अनुभू त ने बासी गले सड़े अनुभव को उखाड़ फका. चेतना नयी हुई.
ान व मत
ृ हुआ.
बात तब क है जब गंगा केवल बादल म बसी थी. बादल जो सुखी म
नकल जाते थे. उन का यह खेल सूखे म

म बसने वाले समझ न पाते थे. दान पु न करते थे.

मं दर म पूजा अचना से ले कर पशु ब ल, नर ब ल तक क
अनुभू त क गंगा भी मन को ऐसे ह

भू म को छोड कर आगे

यव था करते थे.

चढाती थी. मन के मनन क तो पकड म न आती थी.

साधना व अ यास से कतराती थी. अ यासरत मन को ...अ यासरत मानव को तो मंुह न

लगाती थी.

अ यासरत मन केवल

वयं का पुजार था अ यासरत मानव केवल अहम ् का पुजार था. वह

खोज को अहम ् से अपनी इ छा से आगे न ले जा पाता था.

अनुभू त क गंगा केवल अनुभू त म बसी थी. अनभ
ु ू त क गंगा तो केवल पमानुभू त म बसी थी.
पमानभ
ु ू त का नयम पमानभ
ु ू त के ह अधीन था. मन से परे , मनन से भी परे , कह ं शू य म

ल न था.

मन क भू म तो अहम ् म गत थी इसी मन को खोना अनभ
ु ूत क
अनुभू त तो थी समझ से परे - मन व बु

थम शत थी.

क सीमा से परे . अनभ
ु ू त तो ञैका लक थी- अनुभू त

तो सवका लक थी. समझ मन क पकड़ म थी- अनुभू त पकड़ म आती न थी. तक दल ल वचार

से परे - कुछ तो था जो बच जाता था. वह अहम ्

था.

त मन क भू म को छोड़ आगे नकल जाता

ऐसी ह तो थी जल क गंगा. वह तो केवल बादल म बसी थी. बादल म बसी गंगा सूखी म

को छोड़ आगे नकल जाती थी. मानव कतना पसीना बहाये- पसीने से गंगा तो न बन पाती थी.
सूखे म

म बसे लोग

रहते थे- ‘गंगा तो इं

वग क ओर ताकते रहते थे.

वग म बसी गंगा क वे दं तकथाय बनाते

रा य क अ सरा है , भैया! वह यूं न धर ण पे आवेगी. कोई भार उपकम

करना होगा तभी सूखी धरा कुछ दे पावेगी.'

तो वे कसी भार उपकम क योजना म खो जाते थे. समय और सीमा म बंधे वे लघु मानव

कसी महा मानव क कलपना करते सो जाते थे. जो उन के लये आवारा बादल को मनाने के

लये तैयार हो जाये. जो उन के लये सहष प ृ वी पर गंगा को लाने के लये तैयार हो जाये.

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या कभी यूं हो जाता क गंगा आती तो थी धरती पर. पर तु

हो जाती थी. और शेष वष भर जल ह न लोग सूखी म

िजन म अमु य गंगा बह जाती थी.

ऐसे म कसी भा गरथ सर खे महामानव का उस सूखी म

छुट पुट नाल म बह कर बेकार

को ताकते रहते या उन सूखे नाल को

म गंगा लाने को वचनब व होना

आ चय न था. जो केवल वषा ऋतु म ह नह ं साल भर जलह न लोग को जल मुहैया करवा

सके. गंगा धर ण पर ला सके.
अब

वग म बसी गंगा के- बादल म रची गंगा के अपने ह सपने थे वह धरती पर आना न

चाहती थी. उस ने तय कर लया था- य द

को वह कह दे गी. पवत

ाकृ त के नयम ने ज़ोर डाला भी तो अपने बादल

ंखलाय पर पानी बरसायेगी. पेड के झुंड पर, या उं ची बफ लद चो टय

पर. मैदान म यहां मानव ने पेड को काट कर अपमा नत कया

उद डता का दं ड दे गी. बंूद बंूद के लये तरसायेगी.

ाकृ त को, उसे उस क

धरती पर आने का उस का मोल हमालय से कम न था. शव सर खे हमालय ने हामी भर . तो

गंगा

स नतापूवक धरती पर आने को तैयार हो गई. बादल को खींच लाई पवतमालाय तक.

खूब बरखा बन कर बरसी. इतना ज़ोर इतना शोर पर कोई धारा न बनी न कोई छुट पुट नाला.

पूर क पूर समा गई गंगा-महा हमालय महा शव क महाजटाय म. पेड पौध क टह नय म

जड म लताओं म. उलझ गई गंगा. वन प त जगत म. समा गई पूर क पूर

गंगा.

सब अहम धुल गया पर लहजा नरम न हुआबोल शव से-‘ओफ़ हो, कहां से नकलं-ू ओफ़ हो कहां से जाऊं- अरे भाई रा ता दो’

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शव मु कराये- ‘इतनी ज द

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या है गंगे? अभी कुछ दे र व ाम करो मेर जटाओं म मेरे पेड

क पि तय म शाखाओं म लताओं म.
ये वन उपवन, ये सह

वन

ा ण, यासे ह तु हारे जल के वे यथ तु ह न बहने दगे. कह ं और

न जाने दगे. अब आई हो तो थोडी सेवा सु ा कर लो इनक . बहने का

लेना.'

या है -कभी भी बह

गंगा नरम पड गई बोल ‘ओ शव ! ओ महा हमालय!! तुम तो अ त संुदर हो. यह तु हारा ललाट पवत से उं चा. अंबर से

मला हुआ. वहां सुसि जत चं तु हार शोभा बढा रहा है . ये तु हारे उं चे दे वदार के व ृ
कतने
घने ह. कतने पास पास सटे ह. अपनी िजद पर डटे ह. मुझे रा ता दो भाई. मेरा वचन है-

जब म बह नकल - तो तु हारे स दय को कम न होने दं ग
ू ी. तु हारे पग से बहती रहूंगी- वयं
को उ चतम न होने दं ग
ू ी. तुम अपने रौ से संपूण जगत म महा ऊजा भर दे ते हो. मेर ऊजा

पर

य बंधन डाल रहे हो. मेरा चंचल

रहे हो?

वभाव है तुम जानते हो. मुझे

वयं ह म

य संभाल

शव और जोर से मु काये‘ य तड़प रह हो गंगे. तुम तो

वयं बखर पड़ी हो. तु ह तो

वयं को समेटना भी नह ं आता.

बखर ऊजा से तुम महा ऊजा क बात करती हो. रा ता मल जायेगा तु ह-नीचे जाने का

है ? कसी भी दे व त

या

क झुक शाखा को पकडो और बह नकलो. नमन से नमनतर होना बड़ा

आसान- उ च से उ चतर होना अ त क ठन.’
‘प रहास करते हो शव’, गंगा

ट हुई-

‘अंश हूं तु हारा. तु हार ह तरह मेरे लये नमन या उ चतम या. इन दे व त य न खींचा है
मुझे पाताल से. इ ह ने ह छोडा है मुझे आकाश म. उस उ चतम आव था म भी मुझे व ाम
नह .ं तु हारे ये त

पहाड म मैदान म’

खींच लायगे मुझे. फर बरसंूगी बरखा बन कर. फर बहूंगी गंगा बन कर.

शव हं सने लगे‘पर चेता रहा हूं गंगे फर न कहना शव का भार

वर:

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तु ह हष न होगा बहने म मैदान म. यह हमालय ह घर है तु हारा. वहां पार मैदान म त हार

ती ा कर रहा है -हजार टन मानव मल. मानवीय आबा दय से बहता हुआ. जल व मल बंधन
म मानव अभी भी हसर वष जैसा ह है . जल से मल नकालने के लए मानव अभी तक
कृ त क च ुता पर ह

होते ह, मानव

वारा’

नभर है . जल व मल अभी भी साथ साथ बहते ह, साथ साथ उपयु त

‘हत ्!’ गंगा ब ल ,ं ‘कैसी बात करते हो! शव!
या मानव ऐसा है

अपनी इ छा का एक
‘और गंगे,’ शव का
‘उस च य
ु ु त अत

या वह क ट से भी नमनतर है . द ु नयां भर के क ट वन प त जगत से
य चुन लेते ह उसे ले लेते ह और शेष

कृ त का नुकसान नह ं करते'

वर
ा न मानव के लए अभी भी जै वक

जलचर म मीन या घ डयाल. जल म रहते

हसर सू म

ा ण वनचर प रंदे व क ट ह या

ा ण नह .ं वे उस का

ास बनते ह.

बाद म वह उन का. पुनः कहता हूं उस ा न वै ा न मानव के लए भौ तक कृ त ह सब कुछ
है रासायण है कृ त म तो कृ त क सरदद . रासायणक मल जल व पिृ व म मलाना उस
का

वभाव है . वहां कनार पर न जाने कतने रासायणक गह
ृ ह. वह सारा रासायणक मल

तु हारे पा नय म घल
ु जाने को तैयार है . तु हारे सु म ा णय को बेवजह म ृ यु दं ड दे ने को

तैयार है .

गंगा जी डर ग

‘ या कहते हो शव भाई म प व

जल से मल का नाला बन जाउं गी. म तो

बादल म. म तो आना न चाहती थी धरती पर आह! अब म कहा जाउं ’
गंगा जी गहन पीडा म उूब गई.

गई.

स न थी

वग म

ानी के माथे क रे खाय खंच ग . उस क वा ण गले म ं ध

वह आगे कुछ बोल न सका....
(इ त

वतीय

करण) ( मश:)

म धम से छूटकर सौ दय पर और सौ दय से छूटकर धम पर आ जाता हूँ। होना यह चा हए
क धम म सौ दय और सौ दय म धम दखाई पड़े। सौ दय को दे खकर पु ष वच लत हो
जाता है। नार भी होती होगी। फर भी स य यह है क सौ दय आनंद नह ,ं समा ध है। रामधार

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संह दनकर

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सं कार ने ख म कर द यो यता- ओशो
मानव समाज म हर जगह हर यि त के खलाफ यह अपराध कया गया है । तु ह लगातार
सं का रत कया गया है और कहा गया है क तुम अपा

हो।

य क इन सं कार के कारण

मानवता के अ धकांश ह से ने कसी भी साह सक इ छा को दबा दया है । ब च के माता पता
उ ह कह रहे थे, 'तुम अयो य हो।' उनके श क उ ह कह रहे थे, 'तुम अयो य हो।' उनके
धमगु

उ ह कह रहे थे, 'तुम अयो य हो।' हर कोई उन पर इस वचार को थोप रहा था क वे

अयो य थे। वाभा वक

प से उ ह ने इस वचार को

एक बार जब तुम अयो यता का वचार

वीकार कया।

वीकार करते हो तो तुम

वाभा वक

प से बंद हो जाते

हो। तु ह नह ं लगता क तु हारे पंख ह, क सारा आकाश तु हारा है , क तु ह सफ अपने पंख

को खोलना है और सारा आकाश अपने सभी सतार के साथ तु हारा है । सवाल यह नह ं है कह ं
तुम एक दरवाजा खोलना भूल गये हो, कोई

वार ह ह नह ,ं न कोई द वार ह। यह अयो यता का

याल बस एक अवधारणा, एक वचार है । तुम वचार से स मो हत हो गए हो।

बहुत शु से, सभी सं कृ तय , सभी समाज ने स मोहन का उपयोग कया यि तय को न ट
करने के लए-उनक वतं ता, उनक अ वतीयता, उनक
तभा- य क न हत वाथ को

तभाशा लय क ज रत नह ं है, अ वतीय यि तय क ज रत नह ं ह, उन लोग क ज रत

नह ं है जो आजाद से यार करते ह. उ ह गल
ु ाम क ज रत होती है, और गुलाम बनाने के

मनोवै ा नक तर के केवल यह ह क तु हारे दमाग म डाल दया जाए क तुम जरा भी लायक
नह ं हो, क तु हारे पास जो कुछ है उसके भी तुम लायक नह ं हो, तु ह इससे अ धक पाने क
इ छा नह ं करना चा हए। तु हारे पास पहले से जो कुछ है वह तु हार यो यता से बहुत
है ।
स मोहन नरं तर दोहराव क एक साधारण

यादा

या है । सफ एक नि चत वचार दोहराए चले

जाना है और यह तु हारे अंदर पैठता जाता है, और यह एक मोट द वार बनती है , अ
कोई दरवाजे, न खड़ कयाँ; व तुत: कोई द वार ह नह ं होती।

य। न

जॉज गुरिजएफ ने अपने बचपन के सं मरण म लखा है ...वह काकेशस, द ु नया के एक सबसे

आ दम भाग म पैदा हुआ था। वह अभी भी उस ि थ त म है जैसे मानवता जब यह शकार के
वारा रहती थी, वहाँ पर अभी खेती भी शु नह ं क गई है । काकेशस के लोग को बहुत तेज
शकार ह और जो भी समाज शकार के

वारा जीता है उसका खानाबदोश होना वाभा वक है । वे

मकान नह ं बना सकते ह, वे शहर नह ं बना सकते, य क आप जानवर पर नभर नह ं कर

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सकते। आज वे यहाँ उपल ध ह, कल वे यहाँ उपल ध नह ं ह। नि चत

प से तुम उ ह मारोगे,

और तु हार उपि थ त क वजह से वे भाग जाएँगे, या तो वे मारे जाएँगे या वे भाग जाएँगे।
गुरिजएफ एक खानाबदोश समाज

वारा पाला-पोसा गया था, तो वह लगभग कसी और

ह से

आया था। वह कुछ बात जानता था जो हम भूल गए ह। उसे याद था क उसके बचपन म
खानाबदोश अपने ब च को स मो हत करते थे

य क जब वे शकार करने जाते थे तो वे उ ह

लगातार साथ नह ं ले जा सकते। वे उ ह कह ं एक पेड़ के नीचे एक सुर
ले कन

त जगह म छोड़ दे ते।

या गारं ट है क वे ब चे वह ं रहगे? उ ह स मो हत कया जाना ज र था। तो वे एक

छोट रणनी त का

योग करते, और उ ह ने इसे स दय से इ तेमाल कया है ।

बहुत शु से जब ब चा बहुत छोटा होता है तभी से, वे उसे एक पेड़ के नीचे बठाते। फर वे एक
छड़ी से ब चे के चार ओर एक घेरा बनाते और उसे बताते, 'तुम इस च से बाहर नह ं जा
सकते, अगर तुम इससे बाहर जाओगे तो तुम मर जाओगे।'

अब उन छोटे ब च को तु हार तरह व वास होता। तुम ईसाई
पता ने तु ह बताया। तुम हंद ू

य हो? तुम

तु हारे माता पता ने तु ह बताया।

उन ब च का मानना है क अगर वे च

य हो?... य क तु हारे माता-

य जैन हो? तुम य मुसलमान हो?... य क

के बाहर जाएँगे तो वे मर जाएँगे। वे इस कंडीश नंग के

साथ बड़े होते ह। आप उ ह मनाने क को शश कर 'बाहर आओ, म तु ह एक मठाई दँ ग
ू ा।' वे

नह ं आ सकते, य क म ृ यु...! यहाँ तक क कभी-कभी अगर वे को शश करते ह, उ ह लगता है
मानो एक अ

य द वार उ ह रोकती है, उ ह घेरे म वापस ध का दे दे ती है । वह द वार उनके

दमाग म ह मौजूद है, वहाँ कोई द वार नह ं है, वहाँ कुछ नह ं है । वह यि त िजसने उ ह घेरे

म डाल दया है जब तक नह ं आता और घेरा मटा नह ं दे ता, ब चे को बाहर नह ं ले जाता, तब
तक ब चा अंदर रहता है ।
ब चे क उ

बढ़ती रहती है, ले कन यह वचार अवचेतन म रहता है । तो एक बूढ़ा आदमी भी,

अगर उसके पता उसे चार ओर एक घेरा बना दे ते ह तो इससे बाहर नह ं नकल सकता। तो यह
न केवल ब चे का सवाल है, बूढ़ा आदमी भी अपने अवचेतन म अपने बचपन को वहन करता है ।
यह एक ब चे का सवाल नह ं है, खानाबदोश के पूरे समूह ने नकटवत पेड़ के नीचे अपने ब च

को रख दया है , और सभी ब चे पूरे दन वहाँ बैठे ह। अपने माता- पता के वापस आने के समय
तक, यह एक ऐसी कंडीश नंग बन गई है क कुछ भी हो जाए, ब चा च
बलकुल इसी तरह के घेरे तु हारे चार ओर तु हारे समाज

नह ं छोड़ेगा।

वारा तैयार कए जा रहे ह। बेशक वे

और अ धक प र कृत ह। तु हारे धम कुछ भी नह ं महज एक घेरा है , ले कन बहुत प र कृत।
तु हारे चच, तु हारे मं दर, तु हारे प व पु तक, ले कन एक स मोहक घेरे के अलावा कुछ भी
नह ं है ।

एक बात समझने क है क यि त कई घेर

वारा घरा हुआ है जो केवल तु हारे मन म ह।
उनका कोई वा त वक अि त व नह ं है, ले कन वे लगभग असल के प म काय करते ह।

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यह केवल एक कंडीश नंग है क तुम अयो य हो। कोई भी अयो य नह ं है । अि त व अयो य

लोग का उ पादन नह ं करता है । अि त व मूख नह ं है। अगर अि त व इतने सारे अयो य लोग
का उ पादन करता है , तो पूर िज मेवार अि त व क हो जाती है । तो यह नि चत

न कष नकाला जा सकता है क अि त व बु मान नह ं है , क इसके पीछे कोई बु

प से

नह ं है,

क यह एक मूख, भौ तकवाद , आकि मक घटना है और इसम कोई चेतना नह ं है । यह हमार

पूर लड़ाई है, हमारा परू ा संघष है, यह सा बत करना क अि त व बु मान है , क अि त व बेहद
सचेत है ।

यह वह है जो अि त व गौतम बु
अयो य नह ं हो। तो कोई

बनाता है, वह अयो य लोग को नह ं बना सकता। तुम

वार खोजने का सवाल ह नह ं है, केवल एक समझ चा हए क

अयो यता एक झूठ धारणा है जो तुम पर उनके
के लए गल
ु ाम बनाना चाहते ह।

वारा आरो पत क गई है जो तु ह पूरे जीवन

तुम इसे बस अभी छोड़ सकते हो। अि त व तु ह वह सूरज दे ता है जो गौतम बु
दे ता है जो जरथु

को, वह चाँद

को, वह हवा जो महावीर को, वह बा रश जो जीसस को। कोई फक नह ं

पड़ता, कोई भेद-भाव क जानकार नह ं है । अि त व के लए, गौतम बु , जरथु

बो धधम, कबीर, नानक या तुम सब एक ह ह। फक सफ इतना है क गौतम बु
होने के वचार को

वीकार नह ं कया है, वह वचार खा रज कर दया।

, लाओ सु,

ने अयो य

तो अयो यता का वचार छोड़ दो, यह एक वचार है । और इसे छोड़ने के साथ, तुम आकाश के
नीचे हो।

वार का कोई सवाल नह ं है, सब कुछ खल
ु ा है , सभी दशाएँ खुल ह। क तुम हो, यह

पया त है सा बत करने के लए क अि त व को तु हार ज रत है, वह तम
ु से यार करता है,
तु हारा पोषण करता है, तु हारा स मान करता है ।
अयो यता के वचार को सामािजक परजीवी

वारा बनाया है । इस वचार को गरा दो। अि त व

के लए आभार होओ... य क यह केवल यो य लोग को बनाता है, वह कभी उसे नह ं बनाता
जो बेकार है । वह केवल उ ह ं लोग को बनाता है िजनक ज रत है ।
मेरा जोर है क हर सं यासी अपना स मान करे और अि त व के
वह समय और

थान के इस अवसर पर यहाँ है ।

त आभार महसूस करे क

साभार : ओशो, बयांड एनलाइटनमट

सौज य : ओशो इंटरनेशनल फाउं डेशन

श ा का अथ है उस पूणता क अ भ यि

त, जो सब मनु य म पहले से ह

- वामी ववेकानंद ( संगारावेलु मुदा लयार को प

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व यमान है ।

म, 3 माच 1894)

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अनभ
ु ूत

गल
ु ाब कोठार

जीवन म एक है
यावहा रक

ान जो कम का माग दशक होता है । दस
ू रा है अनभ
ु व जो क

त ब ब है ।

छाप ह भ व य म

ान का

ान का

ान और कम क सि म लत छाप जो मन पर अं कत हो जाती है, यह
थान ले लेती है । उ

बढ़ने के साथ अनुभव का सं ह बढ़ जाता

है । यूं भी कह सकते ह क बुढ़ापा अनुभव का सं हालय है । इसी लए 'ओ ड इज गो ड' कहा
जाता है । वशेष

का एक अथ

ान के साथ अनभ
ान
ु व क बहुलता भी है । बना अनभ
ु व के
का मह व बड़ा नह ं माना जाता। कम से कम जीवन से जुड़े वषय म तो ऎसा ह दे खा जाता

है ।

भूत श द के भी अनेक अथ होते ह। सिृ ट के

थूल

व प का नमाण करने वाले तžव भूत

आ द अनेक भेद कए जा सकते ह। भूत श द

ाक य के साथ स ब ध रखता है ।

कहलाते ह। भूत का एक अथ बीता हुआ काल प भी है । पा थव जगत भी भूत कहलाता है ।
भटकने वाल आ माओं म भत
ू - ेत का ववरण मलता है । भूत के अ भभत
ू , अनभ
ु ूत, आ वभूत

ान का

ाक य, पदाथ का

ाक य। भूत तो कारण है । अ र सिृ ट अथवा

ाण समूह का अंग

है । अत: केवल अनुभव म आ सकता है । अनुभूत होता है । स ा त के यावहा रक

प रणाम आते ह, वे अनुभूत होते ह।

म ृ त पटल पर अनुभव बनकर

थाई

प- ान

व प से जो
प बनते

ह। इस दे श म योग- योग- यान क यह भू मका है । म ण-मं -औषध भी अनभ
ु ू त के आधार पर
टके ह।

अनुभू त।
अनभ
ु ूत

है । िजस

योग क सफलता ह

यि त को अ भभूत करती है । जीवन क धरोहर होती है

थल
ू से सू म क ओर भी होती है । व भ न वषय के

ान और

योग को करके दे ख लया, वह होता है अनभ
ु ूत तथा उसका जो

वह है अनुभू त। अनभ
ु ूत का

जाती हं ◌ै। इसम बु
ेरणादायी है ।

केवल

भाव

म ृ त म पहुंचा,
ान तक ह सी मत है । अनभ
ु ू त म संवेदनाएं भी जुड़

के साथ मन का धरातल भी है । आ म व वास अनुभू त से आता है ।

पु षाथ-धम, अथ, काम, मो
अथ, काम के

योग क भी होती

क अवधारणा म मूल तžव अनभ
ु ू त ह है । धम क अनभ
ु ू त से ह

भाव को समझा जा सकता है । धम क प रभाषा और भू मका तो अनभ
ु ूत म ह

समझ सकते ह। अथ प रणाम है, काम पीछे का कारण है । कामना अ

य होती है । अथ

यमान

जगत का अंग है । धम दोन के म य सेतु है । सच तो यह है क धम का काय अथ के मा यम

से कामना के पार जाना है । ' लाई ओवर' का काम करता है । कामना

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वीकारना, नकारना अथवा

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दबा दे ना, इन तीन

आधार पर छ:
शर र, मन, बु

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प म अपना अलग-अलग

भाव दखाती है । धम यु त और धम मु त के

कार के हो जाते ह। सत, रज, तम के

भाव म अठारह

प हो गए।

और आ मा के प रपे ्र य म ह पु षाथ को दे खना चा हए। पु ष आ मा को

कहते ह। अत: सिृ ट म एक ह पु ष माना गया है । शेष सारा यापार

शर र के लए, कामना मन म, धम बु /

ान

प और मो

कृ त का ह है । अथ

को आ म तžव माना है । मो

का

अथ है कामना के पार नकल जाना। मन म कोई कामना न रहे । सभी कामनाएं पूण हो जाएं।

ऎसे यि त आ तकाम हो जाते ह। यह जीवन क सबसे बड़ी अनभ
ु ू त भी है ।

का आकलन करके, जीवन म उसक भू मका तय क जाती है । इस
अनुभू त से भावी काय के

त मन को संकि पत कया जाता है ।

येक अनभ
ु ूत

कार एक-एक करके

येक

प र कार के अ यास क शु आत कामना को समझकर क जाती है ।
कब मन म कस

कार क कामना पैदा होती है, कैसे वचार उठते ह और

य । इस

य का

उ तर ढूंढ़ पाना ह ल य होता है । बहुत क ठन काय है। यि त क कई कमजो रयां भी बाधक
बनती ह। अ ान, राग- वेष, यसन-वासनाएं आ द के अपने-अपने भाव होते ह। भाव और अभाव
के

भाव भी

वभावत: बने रहते ह। कसी यि त या व तु के रहने क मन पर भ न

है ।

ाण को

े रत करके काय

होती है और उसक अनुपि थ त क
नभाते ह।

भ न। मन पर होने वाल सार

या

प दन

या

प होती

प म प रणत करती है। इसम भाव और अभाव मूल भू मका

अभाव से ह मन म इ छा उठती है । यह भी कह सकते ह क इ छा कसी अभाव क ह

अनुभू त है । इस अभाव का जीवन पर
या

या

भाव होगा और इ छा को दबा दे ने का

भाव पड़ेगा। पू त का

भाव, इ छा नकार दे ने का

या प रणाम आएगा। इन

बना कम अनभ
ु ूत नह ं होगा। प रणाम भी प रल

श ्A◌ो◌ं के उ तर के

त नह ं ह गे। सामने खाने क थाल म अनेक

यंजन रखे ह। उनको बना वचारे भी खाया जा सकता है और वचार करके भी खा सकते ह।

वचार करते ह

प दन अपना काय शु

खाना दे खकर कैसा लगा, सूंघकर

कर दगे।

या भाव जागे, छूकर, चखकर अलग-अलग

याएं घ टत

होने लगगी। आप अपने मन क आवाज को भी सुन सकगे। मन कहे गा क आज बगन नह ं

खाने और आप बगन वाल कटोर को

क भाषा म बु

वत: ह

नकाल कर बाहर रख दगे। दे खा आपने, शर र

और शर र दोनो के संदेश। अब खाना शु

आपके दमाग म कई वषय चल रहे ह, य द आप

तो आप वतमान म जी ह नह ं रहे ।

क िजए। हुई कुछ अनुभू त? य द
म ृ त या भावी
याकलाप म य त ह, तब

आपको कैसे अनभ
ु ू त होगी क कौनसी चीज ( यंजन) आपक मां-प नी-बहन ने बनाई। कौनसे
यंजन रसोइए ने तैयार कए अथवा इनम बाजार से लाया हुआ

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या- या है । इसके लए आपका

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वतमान म रहना (जीना) अ नवाय है । वतमान म जीना ह पूजा है, साधना है और अनुभू त का

जनक है । तब आप अ यास के सहारे सू म शर र क तरं ग के भी आगे कारण शर र के

प दन का भी अनभ
ु व कर सकगे। आपको समझ म आने लगेगा क बनाने वाले ने खाने वाले

को

या संदेश दया है ।

तब खाना बनाने वाला और खाने वाला एक ह धरातल पर होते ह। सं कार का, वशेषकर

वातावरण ज नत सं कार का, पा तरण इसी तरह कया जाता है । य द सलाह द जाए तो कोई
नह ं मानेगा। मं

भी अनुभू त कराने का स म मा यम है । बना अनुभू त के

नह ं है । या तो यि त

वयं अनभ
ु ू त करे अथवा परो

प से प रवार का सद य/ गु

करावे। आपक अनभ
ु ू त ह आपक तप या है । आप कसी को अनभ
ु ू त माग से

सकते ह, तो आप गु / स त ह।

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पा तरण संभव

अनुभूत

पा त रत कर

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अंध व वास ले रहा है ल मी के वाहन क जान
सु या
जाद-ू टोने के

लए अंग

वण

उपयो गता (अंध व वास) का

खा मयाजा प ी उ लू को चुकाना पड़ रहा है। इसक सं या
म लगातार घट रह
लाइफ

है। यह खुलासा

द ल

म वाइ ड

े ड पर नजर रखने वाल सं था ‘ े फक इं डया’ क

एक रपोट से हुआ है। रपोट के मुता बक आ दवासी समुदाय
के लोग खाने और जाद-ू टोने के लए उ लू का शकार करते
ह। म य दे श, महारा

और आं

दे श के

नवासी पारद

आ दवासी इसे पकड़कर दे शभर म बेचने का काम कर रहे
ह।

उ तर-पि चमी म य ेदश के नीमच िजले म रह रहे 100 पारद प रवार उ लुओं के अंग से बनी कई

क व तुएं दे शभर म बेच रहे ह। इ ह ं सब वजह से उ लुओं क सं या दे शभर म तेजी से घट रह है।
भारतीय उपमहा वीप म उ लओ
ु ं क 32
ले कन शकार के कारण इन
ह।

जा तयां पाई जाती ह। इनम से 30

जा तय म से

यादातर संकट

त और लु त ाय

कार

जा तयां भारत म मलती ह।

जा तय म शा मल हो चक

अवैध शकार म ल त समह

बहे लया, मर शकर, फा सया, भ टयारा, पठामी, ह क पु क , कु वकारा, कलंदर, वागर , पारद , दमोरा, भील,
मुंडा, लोडी, बाव रया, लंबादास, नाथ सपेरा, गल
ु गल
ु वास, करबी, गारो। राज थान म पकड़े गए थे: नीमच से
15 पारद कोटा म लगने वाले दशहरे मेले म गए थे। उनके पास 20 मत
ु ं के अंग
ृ उ लू और 35 उ लओ

मले िज ह वे कोटा बेचने ले गए थे। बाद म इस मेले म राज थान पु लस ने द बश द थी। इस दौरान कुछ

पारद पकड़े भी गए थे।
ये ह सबसे बड़े बाजार:
1. उ तर

दे श/म य दे श 2. पि चम बंगाल/आं

उ लओ
ु ं क ये पांच

जा तयां ह नशाने पर:

1. रॉक ईगल आउल 2.
आउल

दे श 3. द ल 4. गज
ु रात 5. राज थान/ बहार।

ाउन फश आउल 3. ड क ईगल आउल 4. कॉलड

यहां से सबसे अ धक पकड़े जाते ह उ ल-ू 1. उ तर दे श 2. म य दे श/आं
राज थान 5. गज
ु रात/उ तराखंड

कू स आउल 5. मॉट ड वड

दे श 3. छ तीसगढ़/झारखंड 4.

नव भारत टाइ स से साभार
‘तु ह से ’ रपो्रताज

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कहानी
इस बार कहानी

डा.

त भ म मनु य के

ानोपजन पर एक

हसन (satire)

तुत है

वण जे. ओमकार

अ त
ु घुम कड अपने रा ते पर था. वह वन दे श म घूम रहा था. या थी उस क खोज, भोजन
था या कुछ और, कोई या कह सकता है? वह जब भू म और कभी सूख़े प त पर सरकता था
तो उस क आहट से डर कर प र दे शोर मचा दे ते थे. कभी प त के वीच से नकलता था तो

उस क चमक ल पीठ खुल रौ नी म और द ि तमान हो उठती थी. तभी उसे एक शकार दखा.
वह एक बड़ा मडक था. उस ने फुंकारा छोड़ा. मडक वह ं का वह ं

क गया. उस ने अपने फण

को व श ट र त से मडक के सर पर घम
ु ाया और अगले ह पल वह उस के भेदक दांत म फंस
चुका था. अगले दो चार पल म वह उस के पेट म था.

वह वन म ऐसे ह ठाठ से घम
ू ता रहा. तभी वह एक ग ढे के पास से गज
ु रा तो उसे फंु कारने क
आवाज़ सुनाई द . आवाज़ ग ढे के भीतर से आ रह थी. कुतूहल-वश वह ग ढे कनारे के पास
गया और उस ने भीतर झांका. अगले ह पल वह अपनी आख झपकने लगा.

उसे अपनी आंख पर यक न न आया. यह दे ख कर नह ं क भीतर उस जैसा एक और

ाण

मौजूद था और वह भी उसी क तरह फुंकारे लगा रहा था. बि क यह दे ख कर क वह

ाण

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अपनी पूंछ को अपने मुंह म डाले हुए था और उसे जोर जोर से चीथ रहा था. वह पूछे बना न

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रह सका,
‘अरे यह

या, तुम

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या कर रहे हो वहां?’

‘ओ तुम! लग रहा है क जंगल से आये हो. तभी तो श टाचार क कमी है. तुम बतायो तम

यहां

या कर रहे हो? भागो यहां से. मेरे ग ढे पर शायद तु हार नज़र है .’

‘मुझे नह ं चा हये तु हारा ग ढा. म तो यह जानने के लये बेताब हूं क तुम ग ढे म
रहे हो. बाहर य नह ं घम
ू रहे, भोजन के लये?

य क ं भोजन क तालाश. यहां मेरे पास

या कर

या त भोजन है . काफ मडक ह और सब पंजरे

म. मुझे मडक पालने का ढं ग आ गया है . य य प म उ ह यहां नह ं पालता. मेरे जैसे बहुत सारे
ह जो यह काम करते ह. वे मेरे भोजन क आपू त करते ह.’

‘अ त
ु ! और यह सब पिृ व पर हो रहा है ! मुझे तो अपनी आंख पर यक न नह ं हो रहा. पर तुम
अपनी पंूछ

य मंुह म डाले हुए हो?’
‘यह मेरा अपना गु त आन द है . म कसी बाहर के

ा ण को अपना भेद

य बताउं ?

‘शायद इसी लये तु ह मुझे बताना चा हये. म बाहर का हूं और तु हारे अपने भाईचारे का नह ं.
तुम बे झजक मुझसे बात कर सकते हो. मुझे जानने क ती इ छा भी तो है, म !’
कुछ दे र और इसरार करने के बाद पूंछ कुतरा चचा के लये तैयार हो गया.

‘तुम ठ क कहते हो! मने भी बड़े समय से अपना मन नह ं खोला. तुम शायद सह

िजससे म अपने दल क बात कर सकता हूं.’
‘हां, हां म ! यथ श टाचार से वयं को अलग करो. मुझे बताओ तुम अपनी पूंछ

यि त हो

हो?’

य चीथ रहे

‘खुजल ! मुझे बस खुजल होती है, मेरे भाई! और मुझे इसे खुजाने म आन द मलता है .’
‘दे खो म , मज़ाक छोड़ो. मेर उ सुकता न बढ़ाओ.’

‘ठ क ह तो कह रहा हूं. और मुझे हमेशा इस
या से आन द नह ं मलता”,
“ कभी कभी पीड़ा भी मलती है’, गहर सांस ले कर पूंछ कुतरा बोला.

‘पीड़ा! वह भला कस लये?’ घु म कड़ के लये यह अब नई उ सुकता का व य था.
‘जब म अपने दांत गहरे गडा दे ता हूं.’ दोन हं स पड़े.
‘दे खो म , फर मज़ाक कर रहे हो. मुझे बतायो तुम ऐसी
बाद म पीड़ा का कारण बनती है .’

या म सं ल त ह

यूं होते हो जो

‘पुंछ चीथना असल म हमार पुशतैनी परं परा है . यह मुझे सोच- वचार म सहायता करती है . म
चंतक हूं और चंतन मनन करता हूं.’ पूंछ कुतरा अब
क अब वह बात को यादा नह ं खींच पायेगा.

‘लोग मेरे चीथने से मेर सोच

प टवा दता पर उतर आया था. उसे लगा

या का अंदाज़ा लगा सकते ह. आन दायक चंतन म म अपनी

पंूछ को धीरे धीरे काटता हूं. जब गहरा चंतन करता हूं या जब म कसी सम या के समाधान
पर काम कर रहा होता हूं तब मेरे वचार मि त क म उ पात मचा दे ते ह. तब म अपनी पूंछ को
जोर जोर से काटता हूं. मुझे पता है क यह अ छा नह ं लगता पर म लाचार हूं मेरे भाई!’
‘पर सोच वचार तो लगपग
येक ा ण करता है. म भी तो सोच वचार करता हूं पर म अपनी

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पूंछ नह ं काटता. तुम ऐसा कौन सा चंतन करते हो?’

‘अपने चंतन से म वचार पैदा करता हूं. ये वचार मुझे ान दे ते ह. ान मुझे बढ़ने म, वकास
करने म, उ न त करने म सहायता करता है , हां मेर समझ को भी बढ़ाता है. कई बार म यादा
काम कर लूं तो ढे र

वचार एक त कर लेता हूं.’
या करते हो?’

‘ फर तुम उनका

‘म उ ह पु तक म
भी.’

‘वाह! मुझे
करते ह.’

का शत करता हूं. यह मेर बेहतर न मनो चत

स नता हुई यह जानकार

ड़ा है और मेर उपजी वका

ा त करके. तु हारे जैसे और भी ह गे जो यह काम

‘हां, बहुत सारे . कोई समय था जब एक इंट उखाड़ो तो नीचे दो मलते थे अब तो इंट उखाड़ने क
ज़ रत नह .ं इंट पर बैठे दो मल जायगे. ये सभी

ा ण लेख़क कहलाते ह, लेख़क, फला फर,

‘तो तुम लोग अपनी पहचान बनाये रखने के लये

या करते हो?’

चंतक, अ या मवेता....’

‘ज टलता..! हम अपनी रचनाय को

यादा से

यादा ज टल बनाते ह. जो िजतना

लखता हे उतना ह वह बड़ा लेखक है. कई बार तो हमारे वचार हम

ये ग णत शा

क पहे ल जैसे होते ह.’

‘तो तुम उनका अथ कैसे नकालते हो?’
‘अथ क

कसे परवाह है . हां हम म ह एक और

यादा ज टल

वयं समझ म नह ं आते.

ेणी के लेखक है िज ह हम आलोचक कहते ह.

वे शेष लेखको के बारे म बड़ी बड़ी पु तक लखते ह, झान गोि ठयां एवं चचाय करते ह. वे
संरचना को समझने के लये वरचना का सहारा लेते ह....’

‘संरचना हो या वरचना, है तो दोनो वचार ह .... वचार िज़ंदगी तो नह .ं िज़ंदगी तो वचार के

बाहर है या वचार के बाद है जैसा तुम कहते हो. और य द वरचना उससे भी ज टल हुई तो...’
घुम कड़ अपनी ठे ठ जांगल शु कता से बोला.
‘ह .. ह .. ह ..,’ पूंछ कुतरा हंसा,‘यह तो हमारा आ लाद है यारे , हमारा परम य सुख है, हमारा
दशन है ! इस परम य काय म संलगन एक नह ं लाख ह. हमारा अलग एक शै

णक समुदाय

है . यह हमार उपजी वका है . हां हम सब लोग अपनी पूंछ चीथते ह. पूंछ चीथना हमार
का

तीक है .’

‘ब ढ़या! तो तुम एक

ानवान

ा ण हो. चलो तु हारे

‘शौक से!’ पूंछ कुतरा नमरता से बोला.
‘तु हारा बेहतर न आनंदायक चतंन

त ठा

ान क बात करते ह.’

या है?’

‘मेरे बेहतर न चीथने यो य... मेरा अ भ ाय है ... वचारने यो य व य ह....सम त जीवन का
दशन.. सम याय जैसे क दख
ु व सुख, भला बरु ा है
के पार

या, शा वत चरकाल न स दय, ज म म ृ यु

या, मूरत अमूरत परमा मा; इस के इलावा सम याऐं जैसे उ वाद,

‘ठ क है ..ठ क है .. तो
‘ कस के बारे म?’

या है तु हारा न कष!’

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े वाद, आतंक...’

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‘इन म से कसी के बारे ...जैसे.... भला बुरा है

या?’

‘यह म कुछे क श द म नह ं बता सकता. तुमने जानना है तो पु तकालय चले जाओ. यहां से
पांच ग ढे छोड़ कर छठा. यहां तक मेरा अपना
नह ं सकता.’

न है म इस के बारे नि चत

प से कुछ कह

‘तुम इस महान ् काय म कब से कायरत हो?’
‘कई पी ढ़य से.’

‘कई पी ढ़य से? और अभी भी नि चत नह !ं अभी भी अंधेरे म ह हाथ पांव चला रहे हो!’

‘पर हमने बड़े आंकड़े इक े कर रखे ह. बड़ी वचाराधीन साम ी जमा क है! हम इ ह ज द
संक लत कर लगे. पर सम या यह है क आंकड़े
अ या क व शोधकता का

येक वष बढ़ जाते ह. असल म हमारे यहां

चलन है. अब शोध बढ़ रह है तो शोधकता बढ़े गे. शोधकता बढ़गे तो

अ या क भी बढ़गे. सो हमन इस के लये बड़े बड़े व व व यालय बना रखे ह. यह एक बड़ा
यवसाय है, मेरे भाई! सभी अ या क व शोधकता मल कर बड़े बड़े शोधप

भी! फर वे

वयं के बीच बड़े बड़े पद एवं उपा धयां बांटते ह और

लखते ह, पु तक

ान क महा न ध को

प रत ृ त करते ह. अब हमार शोध से पु तकालय इतने भर चक
ु े ह क हम ने
करने क एक नई व ध खोज नकाल है... वह है कं यूटर और ......’

ान को सं ह

‘बस म समझ गया! तुम वे आंकड़े अपनी कबर म ह संक लत करोगे. पर मुझे यह बताओ क
तुम ऐसा

ान ए

‘लो! इसी से तो
‘पर पर
शु

य करते हो िजसके संशोधन क , पुनःअवलोकन क ज रत पड़ती है .’

ान बढ़ता है .’ पूंछ कुतरा बड़े आ म वशवास से बोला.

ान का कोई अंत तो होगा! कोई अं तम बात! अं तम अं

करो! एक पूरे युग म तु हारे कतने

ि ट! और उस के बाद जीना

ानी और मसीहा मलते ह तु हे उन से तुि ट नह ं

मलती. तु ह तो हर वष म हर नये दन म नया मसीहा चा हये जो तु हार हर

का मागदशन करे !’ अ त
ु कड हंसते हुए बोला.
ु घम
‘हां, हां..अं ि ट! हम म भी बहुत लोग अं ि ट से प रपूण लखते ह पर वह सब

या

या

ान क

बहुतात म खो जाता है .’
‘तुम स य क खोज तो कर लेते हो पर स य का मु य नह ं जानते! हां बताओ, तु ह नह ं लगता
क ऐसे

ान क पगडंडी का अनुकरण करना, िजसका जीवन म

एवं उजा क बबाद है .’

‘लगता तो है कई बार... हां.... पर ऐसा है क....हम

यादा उपयोग नह ं बेशक समय

ानवान लोग अपनी यो यताय के बारे म

बहुत हठ होते ह. हम दस
ू रे को सुनते नह ं केवल अपने अहम ् को बचाये रख कर ो सा हत
करते ह बस. सुनना हमार आदत नह ं. जब सभी कह रहे ह और सुनता कोई न हो तो केवल

शोर इक ा होता है, समझ से नदारद केवल भार भरकम उ पाद पैदा होता है. कोई था हम ह से.
हमह का भाई व ् बंधू िजसने कहा था क हम अपने पु तकालय
दे ने चा हय और नये सरे से खोज करनी चा हये...’

येक दस वष के बाद जला

‘यह भी तु हार सम या का समाधान नह .ं तु हारे पु तकालय फर इससे भी बड़े ह गे.’
‘तो हम

या कर?’

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‘स य तो

होता है, साफ़ एवं

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प ट. वह हमारे सहज

ान म, हमार

यवहा रक बु

लपट कर हमारे पास आता है .बौ क ज टलता से तुम अ भ यि त का स दय न ट कर दे ते हो.’

‘पर हम अपने समाज क सम याय का

या कर. समद
ु ाय का

लये हमार ओर टकटक लगाये बैठा है.’

‘उसका कारण भी तु हार बु

ह है . तुम यह मान कर बैठे हो क तुम समुदाय क

सम या, ाकृ त क हर आपदा का समाधान अपनी बुौ
नह

मल रहा तो यह तु हार बु

तुम सोचते हो क बुौ

या कर जो उनके समाधान के

ता

येक

वारा कर सकते हो. अगर समाधन

क कमी है न क यह जीवन क अ न चतता कोई पहलु है .

ता

वारा तुम सम या के मूल तक पहुंच जाओगे. जब क तुम सम या
के साथ जुड़ीं दस और सम याय को नकाल लेते हो. तु हार बौ
ता तु हार सम याय का
हल नह ं कर सकती.’ अ त
ु घुम कड़ ने एक टुक जवाब दया.

‘पर एक बड़ी सम या के छोटे टुकड़ को नज़र अंदाज़ करना बाद म एक बड़ी सम या को ज म
नह ं दे गा

या.’

‘म इससे इनकार नह ं करता. म तो कहता हूं क सम या वहां नह ं यहां तुम उसे दे ख रहे हो.
सम या कह ं और है . वह है तु हारा मन, तु हार इ छा!’

‘एक ईमानदार इ छा जो सम या का समाधान खोजने के लये त पर है कैसे सम या का कारण
हो सकती है?’

‘वह इस लये क ईमानदार इ छा कहती है क वह

वयं नह ं बि क दस
ू रे लोग समाज क

अ यव था के कारण ह, सुधरने क भी ज़ रत उसे नह ं दस
ू र को है . वह मान चुक है क
बुौ

ता के बल पर वह अपनी क मय को या तो जीत सकती है या छुपा सकती है . तम
ु आंकड़े

समुदाय को बदलने के लये इ
‘म समझा नह ं...’

े करते हो

वयं को नह ं.’

‘यह मन है मेरे भाई जो सम या का मूल है . अपने तमाम छल कपट स हत, अपनी दबी
का अपनी गु त इ छाय का दास!’

व ृ तय

‘मतलब..?’
‘मतलब.. बना मेहनत कये दस
ू र क मेहनत के बल वूते पर अपने लये वलासता के उपकण
हा सल करना इसे ह तुम बु मता, बु
पंूछ कुतरा चीख़ पड़ा,
‘यह यवसायक बौ

क कमाई कहते हो.’

ता एक दन म तो नह ं मल जाती! इस के लये वष के वष रात को

जगना पड़ता है . अगर तुम सफ़ल होते हो और द ु नयां तु ह उ कृ ट मानती है तो इस म बुरा
या है ? और मन ने भी वे दबी

व ृ तयां और गु त इ छाएं एक दन म नह पैदा कर ल ं. वे

उस के साथ पी ड़य से ह. और तुम मुझे बताओ इ छाओं को मारना अ छा है

या?’

‘जीवन के उ लास को मनाना बुरा नह ं और न ह इ छाओं क पू त करना! म तो उन के फैलाव
के व

हूं. म तो उन के छल वारा और लुक छप कर क पू त के व
हूं. म तो बेइ तहा
पूंिज के व
हूं जो तुम भ व य के लए जमा करते हो. दे खो म अपने पास कुछ नह ं रखता
फर भी म स न हूं.’

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‘हमारा स य समाज इन आ दम तौर-तर क़ से नह ं चलेगा. हमारे लोग भ व य के लए जमा

नह ं करगे तो एक दस
ू रे को लूट खायगे. हम दो एक नह बहुत सारे ह.’
‘............’, अ त
ु कड कुछ समय के लए क गया. उसे लगा शायद उसे मुख बनाया जा
ु घम
रहा है . वह आगे कुछ कह न सका.
‘ठ क है ! शायद तुम थक गए हो.
तैयार है .’

ान चचा को यह ं छोड़ कर चलो पेट पूजा करते ह. मढक

दोन ने मढक खाये. घुम कड को पजरे म बंद मढक खाना अ छा नह ं लगा. पहल बार उस ने
मढक क आंख म डर को दे खा. उसे अब समझ म आया क

अनै त ता, भला या बुरा, पाप व पु य के जाल म उलझे रहते ह.

यूं ये लोग दख
ु व सुख, नै त ता

फर कई दन दोन ने लगपग जीवन के हर पहलु पर चचा क . एक समय ऐसा आया क अ त

घम
ु कड को लगा क वह चचा बीच म छोड़ कर चल पड़े और पंूछ कुतरे को उसके हाल पर
छोड़ दे . उसका वचारवान म

तक के मामले म कह ं भी कम नह ं था.

फर एक दन आया जब घम
ु कड जाने को तैयार था. उसे वशवास हो गया था क उसका
ानवान म

केवल सरल करण एवं सप टता के लए अपनी बौ

ता का याग नह ं करे गा.

ग ढे म धंसे उस पूंछ टुकने वाले महान ् ष द श पी को वह ं छोड़ कर चलने के लए तैयार होते
हुए घुम कड ने कहा‘असल म बु
का फैलाव नह ं बु

क सू मता तु हार सम या का हल है . इससे भी

यादा

तु हे कहने से अ धक समझना, समझने से अ धक महसूस करना, महसूस करने से भी अ धक
चेतन होना चा हए.
‘और इससे भी

यादा?’ पूंछ कुतरे ने फर दलचि प.

‘तु ह अपने चेतन होने के

त भी चेतन होना चा हए.’

‘अरे वाह! तम
ु तो ऐसी बात कर रहे हो जो हम ने कई बार अपनी लेखनी म दोहराई ह.’
‘तु हारे बह
ृ दाकार सा ह य म स य बु
है . तु ह वचार एवं
‘वह

या है?’

के पास तो होता है पर चेतना से, िज़ दगी से दरू रहता

ान के एक नये रा ते क खोज करनी है .’

‘वह है वचार शू य चेतनता, धारणा शू य मन, वचार शू य
‘ फर वरोधाभासी बात करने लगे हो. बना वचार के

ान!’

ान कैसे हो सकता है?’

‘कोई बड़ा वरोधाभास नह ं है इस म. तुम को शश से नह ं बि क सहज भाव से इस रा ते पर
चल सकते हो. यह ान शू य ान, अपनी खामोशी म से बोलने क
या है ....’
‘.......’
‘पूव काल म ववेक व बोध के महा ेमी, महा मु न ऐसा ह करते रहे ह. वे थम
ानवान थे. वे ऐसे

ै ण के

ानवान थे िजनके बोध का उ गम थल बाहर संसार नह ं उनका अपना

अंतस ् था. वे बा यमुखी नह ं अं मुखी

ानवेता थे. वे अंतरमन क गहन ् खामोशी से बोलते थे.

पर उनक एक सम या थी जो आज हम सब क है. भाषा एवं स यता क अवधारणा इसी संसार
म बनीं और संसार के लोग क समझ के अनु प ह कह या लखी जाने लगी. उसी धारणा के

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अनु प स य को अ भ य त करना उन क बेबसी थी. वे लोग क भाषा के अनु प बात करते
थे. लोग क भाषा से ह उ ह ने

कृ त के महान रह य को वचार बध कया उ ह लोग ने

कृ त के महानतम स य का नाम परमा मा या न परम आ मा रखा या न ‘परम हम.’ वे कहना

चाहते थे क हमी वह स य ह. दस
ू र
अनुगामी थे. वे पहले से बछ

ै ण के वचारवान स य के खोजी नह ं केवल स यता के

बसात पर ह खेलते रहे. उ ह ने

य त अवधारणा के केवल संसार अथ को

दया. इससे अगल

हण कया और बु

थम

ै ण के वचारवान

वारा

के इसी व तार को बढ़ावा

ै ण के वचारवान ने तो इन अथ को भी छोड़ दया और केवल बाहय ्

श द को ह उ साह से अपनाया और इ ह स ांतक
समा त हो गई और बु

प दे दया. तब खामोशी क तरलता

अवधारणाय के ठोसाकार म जकड़ गई. आज भी कभी कभी कोई

मौ लक वचारवान पैदा होता है जो तमाम पुरानी अवधारणा को तोड़ दे ता है पर दभ
ु ा यवष नई
धारणा को पनपने से नह ं रोक पाता.
हमने अब तक बात क है .’
‘पर हम

या कर क ‘ ान क

या सं प
े म यह तु हारे

े ठता’ के बहकावे म न आय और

क तरलता के साथ कैसे एकाकार ह ’

ान क कहानी है िजसक

ान शू य अंतस ् क खामोषी

‘तुम अपने अंदर वचार का वचार न बनने द. तु ह कोई एक श द दे दे ता है- जैसे ‘चेतना’ और
तुम एक पल म उस के इरद गरद हजार तान बान के साथ उन तमाम अवधारण को इ
कर लेते हो जो आज तक तु हार जानकार म ह. चेतना का यह

ान ह तु ह वासि वक चेतना

को समझने नह ं दे ता. तुम श द को, वा यांश को, कसी महान ् स य को बना वचार के अपने

अंदर घस
ु जाने दो. उसे अपना काम करने दो. स य जानने से पहले स य जानने वाले को जान
जो तुम

वयं हो.’

‘यह सब मुझे मेर सम याय को समझने एवं हल करने म कैसे साहायता करे गा.’

‘दे खो तुम फर वचार के वचार के पीछे भाग रहे हो. तु हे व तुि थ त बदलने से पहले
व तुि थ त के बदलने का
सको.’

ान

ा त करने क ज द है ता क तुम गलत सह का नणय कर

‘शायद तुम ठ क कहते हो. कोई और अं तम बात?’
‘एक ह

वचार को दो बार न सोचो न लखो. वचार के गोलाकार वत
ृ से बु

को आज़ाद करो

और अपने मंुह को पंूछ से!’ अ त
ु कड हं सा और हं सता हुआ आगे बढ़ गया और फर पीछे
ु घम
मुड़ कर बोला,
‘ग ढे बाहर नकलो और अपने अंदर के घुम कड को मरने न दो!’
कह कर अ त
ु कड जंगल म गायब हो गया.
ु घम
लेखक के नोटसः
अ त
ु कड- चेतना या न यम
ू न कांसयसनैस जो
ु घम
संभावनाय क ओर बढ़ती रहती है

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ात या न नालेज का पीछा कये बगैर नई

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पछ
ूं कुतरा- मन या न

यम
ू न माइंड जो

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ात या न नालेज को अपनी अमु य संप त और बु

ह थयार मानता है. अगर मन ने भूतकाल म कह ं चोट खाई है तो वह हम अपने
दोबारा वहां जाने को रोकेगा जब क चेतना के लये यह कोई अनवाय नह .ं वु

को अपना

ान के आधार पर

चेतना के लये भी उसी

तरह काम करती है पर वह उस के पांव म बे डयां
नह ं डालती.

पछ
ुं मुंह म डालने का अथ - वत
ृ ाकार सोच (circular thinking) म
तहत वे पव
ू -प रभा षत
अभी

ान वान लोग

च है िजस के

ान को बार बार प रभा षत करते है.

यम
ू न कांसयसनैस मन व बु

वारा जकड़ी हुई है अगर यम
ू न कांसयसनैस ने अपने अगले पड़ाव
‘एज आ◌ॅफ कांसयसनैस’ क ओर अ सर होना है तो हम ‘ ान क े ठता’ या न ाइमेसी आ◌ॅफ नालेज
को छोड़ना होगा (Translated from English by author)

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बु जीवी और बंदर
गुरमीत बेद

बु जी वय क बैठक चल रह थी
और उस बैठक म एक से बढ़कर एक बु जीवी बैठे थे। कोई अ वल दज़ का बु जीवी तो कोई

परले दज़ का बु जीवी । अपने चेहरे मोहरे , भाव-भं गमाओं और बैठने के

टाईल से सभी वाकई

बु जीवी लग रहे थे। कुछ हालाँ क पैग-शैग लगाकर आए थे ले कन उनके बु जीवी होने पर

कतई शक़ नह ं था। गठबंधन सरकार क तरह वे अपना मान सक व शार रक संतल
ु न बनाए हुए
थे। कह ं से भी गर नह ं रहे थे। कुछ पान चबा रहे थे तो कुछ सगार पीते हुए लगातार धुए
ँ के

छ ले उड़ा रहे थे। इससे सा बत हो रहा था क वे वाकई बु जीवी ह। इस बैठक म कोई यूं ह
मँुह उठाकर नह ं चले आए ह।

खैर ! बु जी वय के सामने सम याओं क फ़ेह र त रखी गई िजसे उ ह सुलझाना था। पहल
सम या यह थी क जंगल से नकलकर जो बंदर शहर म आ गए ह, उनका

या कया जाए ?

एक बु जीवी क राय थी क बंदर को समझा बुझा कर वा पस जंगल म भेज दया जाए। दस
ू रे

बु जीवी का कहना था क बंदर को यह बताया जाए क शहर म रहना उनके लए ख़तरनाक
सा बत हो सकता है । शहर बीमा रय का घर बनते जा रहे ह।

दष
ू ण बढ़ रहा है । संयु त प रवार

टूटने से ब चे घर म अकेले हो रहे ह। लोग फ़ा ट फूड खाकर डाय ब टज और मोटापे का

शकार हो रहे ह। इससे बंदर क भावी पी ढय़ पर भी बुरा असर पड़ सकता है । जब बंदर को

शहर करण के ख़तरे बताये जायगे तो नि चत

प से वे अपनी औलाद क सुर ा और उसे

बगाडऩे से बचाने के लए वा पस जंगल म चले जायगे। एक बु जीवी क राय थी क जंगल

म सरकार क ओर से फल और खा य पदाथ नय मत

प से भजवाये जाय ता क बंदर का

दाल-फु क़ा चलता रहे और उ ह शहर आने क मजबूर न रहे । ले कन इस वचार पर कुछ

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बु जीवी सहमत नह ं थे। उनका कहना था क सरकार ग़र ब आदमी को तो स ती दर पर ये

चीज़ मुहैया करवा नह ं पा रह है, बंदर को मु त म कैसे मुहैया करवायेगी? एक बु जीवी क

यह च ता भी थी क िजस तरह सरकार स लाई म बड़े लेवल पर गोलमाल व अ नय मतताएँ
होती ह, वैसे ह बंदर को फल और खा य पदाथ क स लाई म भी यह कुछ हो सकता है ।

लोग सरकार तं

म कहाँ-कहाँ नह ं ह ? एक अ य बु जीवी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा क
' सरकार स लाई म गोलमाल व अ नय मतता तो बाद क बाद है , पहले तो बंदर के लए जंगल

म फल और खा य पदाथ भेजने के लए ठे क के आबंटन म ह नेताओं क ख़ूब सफ़ा रश

चलगी। हर ल डर चाहे गा क ठे का उसके आदमी को मले। वप

भी हो-ह ला मचाकर आरोप

लगायेगा क ठे क के आबंटन म क़ायदे -क़ानून क धि जयाँ उड़ी ह। हो सकता है क वप

इस

मु े पर वधानसभा कारवाह ठ प कर दे या फर मुँह पर काल प याँ बांधकर सदन के बाहर
बैठ जाए। वप

अपने कायकताओं को च का जाम करने के लए भी कह सकता है । च का जाम के

दौरान कोई रोगी अ पताल न पहुँच पाने से अ लाह को यारा भी हो सकता है ।
मी डया के एक साथ चार टॉ पक लग सकते ह— बंदर, वप , च का जाम और रोगी क मौत। हो
सकता है कुछ अख़बार इस पर एडीटो रयल भी लख डाल । अगर यह मसला सरकार नपटा भी दे ती

है तो भी

या गारं ट होगी क बंदर को जो फल और खा य पदाथ जंगल म भेजे जायगे, उनक

वा लट सह होगी। हो सकता है क बंदर घ टया सरकार स लाई पर अपना रोष जताते हुए इनके
सेवन से मना कर द और गु से म फर शहर क तरफ नकल आय ? एक अ य बु जीवी ने कहा
क सम या का हल तभी हो सकता है, जब बंदर क नसबंद कर द जाए । ले कन दस
ू रे बु जीवी

ने उसक बात काटते हुए कहा क पहले तो इस बात क कोई गारं ट नह ं है क बंदर सरकार के हाथ
आयगे भी क नह ं। और अगर आ भी गए तो इस बात क भी गारं ट नह ं है क वे नसबंद के लए

सहमत हो जायगे......। बात को लपकते हुए एक और बु जीवी ने कहा - ' ड ट वर , सबसे पहले हम
बंदर को प रवार नयोजन के फ़ायदे बतायगे। उ ह यह भी बतायगे क प रवार नयोजन से जनसं
या कं ोल म रहती है और जनसं या कं ोल म रहने से ि थ त कं ोल म रहती है और जब ि थ त

कं ोल म होती है तो सरकार वकास के लए योजनाएँ बनाती है और जब वकास के लए योजनाएँ
बनती ह तो उसम पैसा इ वा व होता है और जब कसी चीज म पैसा इ वा व होता है तो उसम
टांका लगाने का मौक़ा मलता है । टांका लोकतं

जाता है ........।

का बु नयाद मं

है । नसबंद म भी टांका ह लगाया

एक अ य बु जीवी ने यह कह कर बीच म टोक दया - ' बंदर ने अगर आपक बात सुनने से मना
कर दया तो.....? बंदर यह कहकर भी नसबंद करवाने से मना कर सकते ह क इं डया के अ पताल

म आपरे शन करते समय डा टर कई बार कची, कपड़ा और दस
ू रे औजार मर ज़ के शर र म ह

छोड़कर टांके लगा दे ते ह ... और जब इंसान क है थ के साथ ऐसी लापरवाह हो सकती है तो फर
बंदर तो बंदर ठहरे । उनके साथ आपरे शन क

है क डा टर आपरे शन क

म डा टर कुछ भी कर सकते ह । यह भी हो सकता

म मोबाइल पर कसी नस से ब तयाने म मशगूल हो जाएँ क बंदर क

चीरफाड़ करने के बाद उ ह टांके लगाना ह भूल जाएँ ... । ऐसी ि थ त से बचने के लए बंदर
वदे श म उ ह नसबंद के लए भेजे जाने क माँग भी कर सकते ह और सरकार अगर उनक यह

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माँग अ वीकार कर दे ती है तो बंदर नसबंद से ह मना कर सकते ह। बंदर अगर अड़ जाएँ तो
सरकार उनका बगाड़ भी

या सकती है? सरकार सफ़ ग़र ब आदमी को ह आँख दखा सकती है ...।

इस पर एक और बु जीवी तैश म आते हुए बोले-- बंदर क एैसी क तैसी। उ ह पता नह ं सरकार
के पास बहुत बड़ी पॉवर होती है । सरकार अगर कमचा रय को दरू -दराज इलाक़ म फक सकती है ,
अपने राजनै तक वरो धय पर झठ
ू े केस बनाकर उ ह अंदर ठूँस सकती है , तो बंदर कस खेत क

मूल ह ? कई अ य बु जी वय ने हाँ से हाँ मलाई। अ त म यह न कष नकला क बंदर का
मसला एक बैठक म नह ं सल
ु झ सकता लहाज़ा चचा अगल बैठक के लए टाल द जाए। इसके साथ

ह बैठक म िजन दस
ू र सम याओं पर बु जी वय ने चचा करनी थी, उसे भी अगल बैठक के लए

टाल दया गया। अगल बैठक क तार ख अभी मुकरर नह ं हुई है
ह। -गुरमीत बेद

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य क बु जीवी बजी हो गए

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आप तुलना और

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पधा क दौड़ म

य रहना चाहते ह?

- जे. कृ णमू त

जब आपक तुलना कसी दस
ू रे से क जाती है आपक पढ़ाई के बारे म, आपके खेलकूद
के बारे म अथवा आपके

प या चेहरे के बारे म-तब आप य ता, घबराहट और

अ नि चतता के भाव से भर जाते ह।
इस लए यह नतांत आव यक है क हमारे व यालय म तल
ु ना का यह एहसास, यह
अंक या

ेणी दे ना और सबसे बड़ा तो पर

ा का भूत समा त कया जाए।

आप तब बेहतर अ ययन कर पाते ह जब

वतं ता रहती है , जब

स नता रहती है, जब

कुछ दलच पी बनी रहती है। आप सब जानते ह क जब आप कोई खेल खेल रहे होते
ह, जब आप कोई ना य काय म कर रहे होते ह, जब आप चहलकदमी के लए बाहर
जाते ह, जब आप कसी नद को नहार रहे होते ह, जब आप
व थ रहते ह तब आप कह ं अ धक सरलता से सीख लेते ह।
परं तु जब तुलना का,

ेणी का, पर

स न चत रहते ह, खूब

ा का भय सामने खड़ा हो, तब आप न उतना अ छा

सीख पाते ह, न उतना अ छा अ ययन कर पाते ह। कभी-कभी यह
आता है क बना
इस

पधा कए

या इस

त पध समाज म रहा जा सकता है?

न को दे ख तो हम यह मानकर चलते ह क हम इसी

है और इस लए हम

त पध समाज म रहना

त पधा म बने रहने का वक प चन
ु ते ह। यह वजह है क यह

आधार वा य बन गया है। जब तक आप कहते रहगे क मझ
ु े इसी
रहना है , तब तक आप

न भी सामने

पध समाज म

पध ह बने रहगे।

यह समाज सफलता का पूजक है और य द आप सफल बनना चाहते ह तो
क आपको

पध रहना होगा। परं तु सम या केवल

पधा करने क इ छा के पीछे

वाभा वक है

पधा से कह ं अ धक गंभीर है।

या है?

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येक व यालय म हम
बालक क

कसी कुशा

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पध होना ह

सखाया जाता है, है न? अंक दे कर, कसी मंद

बालक से तल
ु ना करके, लगातार इस ओर इशारा करके क एक

नधन बालक भी जनरल मोटस का अ य
तरह के उदाहरण
हम

या सव च अ धकार बन सकता है, या इसी

तुत कए जाते ह।

पधा पर इतना बल

य दे ते ह? इसक साथकता

या है?

पधा म एक बात तो

नि चत है और वह यह क इसम अनुशासन ज र है, है न? आपको

वयं पर नयं ण

रखना होता है , आपको अनुकरण करना होता है , अनुदेश का पालन करना होता है ,
आपको और सब लोग जैसा होना होता है- बस और बेहतर।
इस

कार आप सफल होने के लए

जब भी

पधा को

वयं को अनश
ु ा सत करते ह। कृपया इसे सम झए।

ो सा हत कया जाता है तब

अनस
ु ार मन को अनश
ु ा सत करने क एक

याकलाप के एक वशेष ढर के

या भी साथ-साथ चलती है।

या कसी लड़के या कसी लड़क को नयं त करने के लए अपनाए जा रहे तर क म
से ह यह एक तर का नह ं है? य द आप कुछ बनना चाहते ह तो आपको नयं ण,
अनुशासन और

पधा यह सब तो करना ह होता है। इसी म हम पले-बढ़े ह और यह

हम अपने ब च को वरासत म दे रहे ह।
और फर भी हम ब च को खोजबीन करने क , अ वेषण करने क ,
बात करते ह ?

पधा यि त के वा त वक

समझना चाहते ह तो
इसे यूं दे खए क

व प को ढांप दे ती है। य द आप

या आप कसी अ य से

या आप कसी च

वतं ता दे ने क
वयं को

पधा करगे ?

को अ य च

के साथ तुलना करके समझ

सकते ह, या उसे आप केवल तभी समझ सकते ह जब आपका मन बना कसी तुलना
के उसी च

को

यानपूवक दे ख रहा हो?

वयं समझना संपण
ू जीवन-

भी नह ं है और

या को समझना है और आ म प रचय से बढ़कर कुछ

पधा से मु त मन ह

वयं से प र चत हो सकता है।

ऐसा मन िजसे कसी तरह के बदलाव से कोई सरोकार नह ं रह जाता, उसे
भय नह ं होता और इस लए वह परू तरह मु त होता है तब वह अपने को
कसी अ य

प म बदलने, कसी अ य ढर सा सांचे म ढालने क को शश

नह ं करता, ना ह वह कसी अनुभव क तलाश म रहता है , ना ह

कसी चीज

के बारे म कहता'सुनता या कसी तरह क मांग रखता है तो ऐसा मन पूर

वह ह शांत ...तरह मु त होता है ,ि थर अचल होता है और तब .., कदा चत
वह अि त व म आता है जो अनाम है ..

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जे कृ णमू त

.

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...

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थाई

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त भ हम मालूम है ज नत क हक़ क़त...

( सम-सामयक व य पर चचा)

म छर व अस ह णुता

म घर म बैठा था,
मेरे इद गद कई म छर बावेला मचा रहे
थे. तभी कुछ म छर ने आकर मेरा खन

चस
ू ना शु

कर दया।

वाभा वक

या म मेरा हाथ उठा

और बाजु पर स का जमाये बैठे म छर
पर चटाक हो गया और दो-एक म छर
ढे र हो गए.!!
फर

या था बाक के म छर ने

मचाना शु

शोर

कर दया क म अस ह णु

"आज़ाद " श द सन
ु ते ह कई बु
म छर उनके प

जीवी

म उतर आये और

बहस करने लगे.!!
इसके बाद नारे बाजी शु

हो गई., "िजतने

म छर मारोगे हर घर से म छर
नकलेगा".
बु

जी वय ने अखबार व मी डया पर

म तपते तक के साथ बड़े-बड़े लेख
लखना शु

कर दए.

उनका कहना था क म छर दे ह पर

हो गया हूँ.!!
मने कहा तम
ु खून चूसोगे तो म मा ं गा

मौज़ूद तो थे ले कन खून चस
ू रहे थे ये

वो कहने लगे खून चूसना उनक आज़ाद

हो सकता है , ले कन 'दे ह ोह' क

है. यह आजाद उ ह जनम से मल है.

नह ं आता, य क ये "ब चे" ह और

यह उनका ज म स

बहुत ह ग तशील रहे ह., कसी क भी
दे ह पर बैठ जाना इनका 'अ धकार' रहा

ह . इसम अस ह णुता क

या बात है .

अ धकार है.

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कहाँ स

हुआ है.
अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो
ेणी म

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है. आप क दे ह पर बैठ कर वे आप को
चेत न करने आए थे. दे श मुि कल दौर
से गुज़र रहा है . आप उ ह खून दो वे

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इस पर वो कहने लगे क तु हारे पास
तक़ नह ं ह इस लए तुम भ व य क
क पनाओं के आधार पर अपने

आप को आज़ाद दगे.

'फासीवाद ' फैसले को ठ क ठहरा रहे हो..

मने कहा – “म अपना खून नह ं चूसने

मने कहा ये साइं ट फक त य है क

तो कहने लगे ये आप का "ए स म

मुझे इससे पहले अतीत म भी ये झेलना

दं ग
ू ा बस.”

म छर के काटने से मले रया होता है.,

दे ह ेम" है. यह एक दे ह केवल आप क

पड़ा है.!!

ह धरोहर नह ं है. यह दे ह दे श क

पर मेरा तक उ ह समझ म नह ं आया!!

अमानत है.

त य के जवाब म वो कहने लगे क म

“तुम क रपंथी हो, डबेट से भाग रहे हो."

इ तहास म जी रहा हूँ और म छर
समाज के
त अपनी घण
ृ ा का बहाना

मने कहा तु हारा उदारवाद तु ह मेरा

खून चूसने क इज़ाज़त नह ं दे सकता.

इस पर उनका तक़ था क भले ह यह

बना रहा हूँ., जब क मझ
ु े वतमान म
जीना चा हए.

गलत हो ले कन फर भी थोड़ा खून

इतने हंगाम के बाद उ ह ने मेरे पर

चूसने से तु हार मौत तो नह ं हो जाती,

माहौल बगाड़ने का आरोप भी मढ़

िज़ दगी छ न ल . और वे आप का खून

मेरे ख़लाफ़ मेरे कान म घुसकर सारे

ले कन तुमने मासम
ू म छर क

दया.!!!

थोड़े चस
ू रहे थे. वे तो आप से दे श क

म छर भ नाने लगे,

आज़ाद के लए थोडा र तदान करने

"हम लेके रहगे आज़ाद ".!!!

क गज़
ु ा रश करने आए थे. आप ने उ ह

"लेके रहगे आज़ाद ".!!!

और झटका दया.

हो रहा था. उससे

इतने म ह कुछ राजनेता भी आ गए

खन
ू चस
ू े जाने पर हुआ था.
म छर चले गए. म कुछ सी रयस हो

"फेयर

ायल" का मौका भी नह ं दया

और वो उन म छर को अपने बगीचे क
'बहार' का बेटा बताने लगे.!!

म बहस और ववाद म पड़कर परे शान
यादा िजतना क

गया.

हालात से हैरान और परे शान होकर मने

आचाय चाण य

वारा कह एक बात

कहा क ले कन ऐसे ह म छर को खून

याद आती है — क “जब समाज के अ त

चूसने दे ने से मले रया हो जाता है ,

व वान ् लोग नाराज होने लग तब

कमज़ोर होकर मौत हो जाती है .

क, राजा क

तुरंत न सह बाद म बीमार और

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स नता पूवक यह समझ लेना चा हए

यव था बहुत ब ढ़या ढं ग
से काय कर रह है।” तो या चाण य
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ऐसी रा य वयव था क बात ह करते
रहे ह जो बु

व बौ

क लोग के

धकेल दये गए थे गाँव के द खन टोल

तकूल हो. जो सफ डंडे से ह कं ोल

होती हो.

या चाण य सह थे अगर हाँ तो

या

भारत कभी भी स ह णु नह ं था.

के क लेआम के व त या महाभारत यु
के दौरान लंका म आग लगाते हुए या
खांडव वन जलाते हुये, कुछ याद पड़ता

है?

पड़े तुम पर इ सान को अछूत बनाकर
या ये

ऊपर वाला भी हँसता होगा हम ये दे ख
कर क मि दर को तोड़कर, मि जद
बनाल तो

या हुआ! तम
ु मि जद को
तोड़कर अब, मि दर बनालो! ऊपर बैठा
हुआ वो हंस रहा होगा…. मेरे ह घर को
तोड़ तोड कर, कब तक बनाओगे, मैने तो

आ खर बार कब थे आप स ह णु?

वहाँ रहना, कबका छोड़ दया है। मै तो

मा ने

बनाये थे वण रच डाल थी ऊँच नीच
भर सिृ ट या तब, जब वषमता के

जनक ने लखी थी वषैल मनु म ृ त

िजसने औरत को सफ भोगने क व तु
बना दया था, शू

पीठ पर झाड़ू नकल सकते थे वे सफ
भर दप
ु हर ता क उनक छाया भी ना

नह ं थी अस ह णुता ?

य संहार के समय,बौ

या तब थे आप स ह णु जब

म, लटका द गई थी गले म हं डया और

उसक छाया तक से परहे ज़ !

आ खर आप कब थे स ह णु?
परशरु ाम के

जीवनो े य बन गया था और अछूत

से छ न लए गए थे

तमाम अ धकार रह गए थे उनके पास
महज़ कत य सेवा करना ह उनका

रहता हूँ, मानव के
जाओ अब

दय म.

दय को भी बाँट दो धम के

नाम पर?
व व का सबसे बड़ा लोकतं
दे श हमे गव भी है पर
लोकतं

है...?

है हमारा

या यहाँ स पूण

इंसतो
ान यह
अपनेहै कम
पहचाना
श द खतरनाक व तु ह। सवा धक खतरे क बात
क वेसेहमसे
यह जाएगा
क पना
अ हछे जब
बरु े क
क वापरख
वो नह
यादं समझते
रख पाएगा
करा लेते ह क हम बात को समझते
तव कहाँ
म हम

म ीराजगोपालाचाय
से सोना, समु से मोती तो नकाल लाएगा
- च वत
पर भीतर के सच को

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या कभी बाहर लाएगा
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जब हम

यान करते ह तो

'जब हम

यान करते ह तो अपने भीतर को समझने के

- जे. कृ णमू त

यान हमारे भीतर उतरता है
यास पर होते ह। वहां त य

नह ं होते बि क अनुभव ह होते ह। वहां खोज नह ं बस एक शां त होती है।'

यान, न त ध और सुनसान माग पर इस तरह उतरता है जैसे पहा ड़य पर सौ य वषा।

यह इसी तरह सहज और
या के

ाकृ तक

प से आता है जैसे रात। वहां कसी तरह का

करण या व ेप वकषण पर कसी भी तरह का नयं ण नह ं होता। वहां पर

कोई भी आ ा या नकल नह ं होती। ना कसी तरह का नकार होता है ना

यास

यान म

मृ त क

नरं तरता होती है।

मि त क अपने प रवेश के

त जाग क रहता है पर बना कसी

रहता है , बना कसी दखलंदाजी के, वह जागता तो है पर
वहां नतांत शां त

वीकार। ना

या के शांत

याह न होता है।

त धता होती है पर श द वचार के साथ धंध
ु ले पड़ जाते ह। वहां

अनठ
ू और नराल ऊजा होती है , उसे कोई भी नाम द, वह जो भी हो उसका मह व नह ं
है, वह गहनतापव
ू क स

य होती है बना कसी ल य और उ े य के।

वचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नह ं हो सकते। वह कसी

भी चीज से पण
ू तया अस ब

है और अपने ह असीम व तार और अन तता म अकेल

ह रहती है। उस अंधेरे माग पर चलना, वहां पर असंभवता का आनंद होता है ना क
उपलि ध का।
वहां पहुंच, सफलता और ऐसी ह अ या य बचकानी मांग और त याओं का अभाव
होता है। होता है तो बस असंभव असंभवता असंभा य का अकेलापन। जो भी संभव है
वह यां क है और असंभव क प रक पना क जा सके तो को शश करने पर उसे
उपल ध कए जा सकने के कारण वह भी यां क हो जाएगा।
उस आन द का कोई कारण या कारक नह ं होता। वह बस सहजत: होती है , कसी
अनुभव क तरह नह ं बस अ पतु कसी त य क तरह। कसी के

वीकारने या नकारने

के लए नह ,ं उस पर वातालाप या वाद ववाद या चीर फाड़- व लेषण कए जाएं इसके
लए भी नह ं।
वह कोई चीज नह ं क उसे खोजा जाए, उस तक पहुंचने का कोई माग नह ं। सब कुछ
उस एक के लए मरता है, वहां म ृ यु और संहार े म है। या आपने भी कभी दे खा है-

कह ं बाहर, गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदरू कसान को जो सांझ ढले अपनी

म रयल ह डय का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है।
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अपने बल से बलह न को तो चप
ु करा पाएगा

पर कहाँ फर वो द ु नया से यार का ल ज़ सुन पाएगा

अपनी दौलत शोहरत से गर ब का घर तो उजाड़ पाएगा
पर कौन सी दक
ु ान से अपनी खु शयाँ

खर द पाएगा

ऐ ब दे तू कब तक यूँ ह चलता जाएगा?

संग

चाल तेर म म है , चल नह रग रहा है तू

तेरे सारे है पर अकेला कह ं खो गया है तू

जलता तपता तू रात को भागने के सपने दे खता है

पर फर भी चलती िज़ दगी म सो गया है तू

बता ब दे तू कब तक यूँ ह चलता जाएगा ?

साँस का क़ज़ एक दन तझ
ु े, अकेले को चक
ु ाना है
कम का मोल एक दन, खद

ह को भग
ु ताना है

जब अकेले का ह रा ता एक दन शमशान तक जाना है
मो
तो

का वहम सीने म ले कर

यँू यँू ह गम
ु शद
ु ा बन दन गने जाएगा ?

ऐ ब दे तू कब तक यूँ ह चलता जाएगा?
- त ृ ष शमा

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पतन क ओर उ मुख

क नया उ थान हो
नया इंसान हो
(2) मेर क

म दे खता हूँ ये
और साथ ह दे खता हूँ
तु हार गोद म खेलती

(1) मृ यु....
नैरा य......

ढे र सी पयाँ

सुकून.......

म चम
ू ता हूँ तु हे
न दय म बह कर

न तेज......

सबका वराम
एक महा नवाण
एक नींद
छपी हुई समय क
अपूण गभ म
अ वक सत

पर उगा नीला फूल

ूण.....

एक समट हुई
रात के अँधेरे म....
मेर काल बदरं ग
वभ स अंतस म

जो अ सर ची कार करती है , एक रोज़
अचानक ह सन
ु ा मने

नःश द खल खलाहट

मासम
ू सी....

अपन व भर

यह मृ यु थी

मेर चौखट पर
लए स पूण अँधेरा

एक शू य.....

और म.....
तैयार था

एक नई शु आत के लए
TUMHI SE –Hindi Literary Magazine

काश तम
ु इस तरह
समट ना होती

काश तम
ु भी होती कोई
मासूम से मालन

और हर सुबह मुझे
चुन लेती

मेर शाख से......
काले कौए इस तरह से
फैले ह
जैसे,
आसमां काला हो
फज़ाय काल ह
हवा म भी का लख है,
म पूछता हूँ?
ये या संदेश लाये ह,
इस से पहले वो कुछ कह,
मेरे त वर पर
लख गए ह,
म काल का एक
कल हूँ,
कभी इसका शकार हूँ,कभी ये मेरा.....
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TUMHI SE –Hindi Literary Magazine

olar 2016

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olar 2016

(डॉ) वजय शंकर (;w-,l-,-)
डॉ०

वण ओमकार जी,

नव वष मंगलमय हो। "तु ह से" के कई पेज मने दे खे ह, वशेषतः स पादक य। पर
कुछ पा रवा रक य ताओं के चलते लख नह ं पाया , हाँ इस बीच नाना अव य बन
गया।

वदे श म य तताओं का

व प थोड़ा भ न होता है पर आप जैसे म

के लए

तो हर हाल म समय है और आगे भी रहे गा।
मल
वषय पर आते ह, आप लखते अ छा हो, सोच कर लखते हो।

लखते ह, आपने , स पादक य म, जो एक आम आदमी का च

साम यक वषय पर

अं कत कया है वह हर

दे श के साधारण आदमी जैसा ह सामा य यि त है पर वह कुछ असामा य प रि थतय
म फंसा हुआ आदमी है जो सफ हमारे दे श म ह हो सकती ह। शायद हमार सबसे
बड़ी सम या यह है क हम सांसा रक ान के ऊपर अपना ान लाद दे ते ह ,और

वयं को अ य-आधु नक बताते हुए अपनी सं कृ त के त व को उपे त करते रहते ह।
उदाहरण के लए हमार स ह णुता और सा दा यकता क व व क अपनी अनूठ ह
प रभाषाय और समझ है, अतः प रणाम भी वैसे ह ह।
हमने

जनतं

पर परा के ह

अपनाया है, पर हमारे अ धनायक म य - युगीन वंशवाद - साम तवाद
पोषक ह, वे

यह मानने को तैयार ह

नह ं ह जनतं

म जन

भी कुछ

होता है , वे उसे अभी भी वैसे ह लेते ह जैसे वदे शी शासक लेते थे। द ु नयाँ म आम
आदमी के सार

द ु नयाँ म छोटे छोटे , सामा य से सपने

होते ह और वह उ ह ं के पूण

तु ह से का आगामी अंक: चेतना
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या है
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होने म अपनी खुशी ढूँढता है।

olar 2016
पर हमारे कणधार नह ं मुह या कराते बि क हर आदमी

को बताते ह क तुम मं ी, मु यमं ी बनने

बहुत का बल हो , जैसे
भी हो , वैसे ह रहो , सबकुछ तु ह उसी हाल म मलेगा। संदेह नह ं क ऐसे म वह

पाता

या है

यह तो वह

रखते हो।

जाने वह उनका आ

तुम

त अव य बन जाता है।

अब सो चये , कतना आसान है , इस तरह के सपने दखाना , न श ा क ज रत ,
कूल क ।

कतना क ठन है सारे दे श को

कूल दे ना, अपने पैर

पर खड़े साम य

दे ना , और कतना आसान है इस तरह के सपने दखा कर अपनी स ता जमाये रखना।
इसके लए उ ह

या करना पड़ता है , कुछ नह ं।

एक

कूल खोलने म तो बहुत कुछ
करना पड़ता है , उससे भी कतने लोग खुश होग, इससे तो सारा दे श खुश, सपने म खो

जाता है और ऊपर बहुत ऊपर पहुँचने के नै तक - अनै तक, धा मक, जाद ू - टोने, र वत,
ाइम आ द आ द को कौन से तर के नह ं अपनाने लगता है, पाता या है ? हम इसे
जनतं

कहते ह, यह है हमार जनतं

जनतं

का ऐ तहा सक

व प का अभी - अभी times now पर कनाटक स ब धी वी डयो

भी आपने दे खा होगा।

म य - युगीन लगा क नह ं ? इं लड म एक कॉ टे बल से अभ

ढं ग से बात करने मा
वैसे यह जनतं
है।

क प रभाषा।

से एक जन त न ध का राजनै तक जीवन समा त हो गया।

हम अं ेज ह दे गए , उसे अपने रं ग -

हम कुछ भी दे दो , हम उसका ऐसा

प म हमने खुद ढाल

लया

प बना दग क दं ग रह जाओगे।

टै स आप हर चीज़ का दो, तकल फ आप झेलो , सफाई आप खुद कर , य , टै स के

पैसे

या हुए, इतने सफाई कम ह, फर भी इतनी ग दगी, वाभा वक है उसी अनप
ु ात म
डा टर बढ़ग, दवाइयाँ बकगी, सब भा य ह, यव था का कह ं कोई दोष नह ं है।

वा त वकता यह है क जनता के लए काम करो तो
पर अपने लए करोगे तो अपने लए
सम याएं ह, समाधान भी ह , बस सह

य नह ं होगा , जनता के नाम

होगा।
दशा नह ं है।

य क लाभ इसी दशा है।

आगे इस पर वचार करना चाह। ...
एक नवेदन है , स तीन
कहते ह और श
करगे।

ताल य

कार होते ह, स, ष, श।
तीन के

योग म

स को द त स कहते ह, ष मूल द स

यान अपे

त है, टाय प ट को इं गत

शासन श द है।

च लए लखते रहगे ......... आपको इस साथक

यास पर ढे र बधाइयां।

सादर। वजय शंकर (डॉ)

शभ
ु कमण संह, Govt. MedicalCollege, Amritsar
Sir i have read tumhe se today . Ur concept on knowledge and understanding is
very nyc . And also there are some very nyc contributions
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olar 2016

from trishi sharma dr mohan ji indu lekhi. It is a wonderful litrary nowdays. But at
same time i think to retain orignal essence of literature it is best served as orignal.
Also i await in next part more english literature and your more and more writtings
in magazine attempt.Comprehension of hindi text had always been mine problem
which i think is true for more students PART2 HIGHLY अवेटेड -शभ
ु कमण संह
डॉ परमजीत चु बर साइके
गुड एफट डॉ.

ट यू इस ए

वण ओमकार – माय congratulations एंड गुड वशेस

डॉ मोहन बेगोवाल मे डकल कॉलेज अमत
ृ सर

इंद ु लेखी क क वता बनाम फूल क प ती संद
ु र अथ दे ती, इस समय क सचाई को पकड़ती,
कमाल क रचना के लए बधाई

त ृ ष शमा, Govt. MedicalCollege, Amritsar recieving comments upon Sir

issue was published with lots of work was required. Afterall responses
lead to further course of thinking...Rest layout and immense efforts of
yours were really appreciable efforts. But response to writing may not be
acheived. As you thought of
Inderjit AhluWalia
Tum hi say ka pihla ank peda bahut hi jaanverdak or poems lajabab
hats off to you
(मेर अपनी

या ) डॉ०

वण ओमकार

मेरे दो त क दरया दल Dard-e- dil direct from Facebook यह मने पहले भी
कई बार महसस
ू कया है ले कन इस बार तो कुछ

यादा ह हो गया. पहले से ह

जानता था क मेरे दो त बड़े दया दल ह. वे मेर पो

स के से

ल आई डया को

समझते है . और उस पर मेरे कहने मत
ु ा बक तह दल से अमल करते है . जैसे अगर

म कहता हूँ क यादा ान जमा नह ं करना चा हए और यह हमारा नरं कुश ान ह
है जो हमे लाइफ म सीध दे ने क बजiये हम ान व ानवान लोग क गुलामी
(िजसे हम गलती से

ा कहते ह) करने को े रत करता है . तो इस तरह क पो ट

को पढ़ने क बजाये वे सीधा अमल म लाना पसंद करते ह. या न ऐसी पो ट को वे

पढ़ते ह नह ं. अगर म अपनी धन
ु म लगा रहूँ और दो त क इस दया दल को न
समझँ ू और यह सोचूं क कुछ क ठन लखा गया होगा जो दो त ने यादा मान सक
मेहनत करने क बजाये उसे "दे ख के अण डठ" कर दया होगा. इस के एवज म म

TUMHI SE –Hindi Literary Magazine

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अगर अपनी मान सक फैक ट ज को फर से पुरे जोरशोर से काम म ला कर " हंद

या पंजाबी" भाषा म

ांसले शन कर के, क ठन श द को चन
ु चन
ु कर वहां आसान व

आम बोल चाल क भाषा के श द भ ँ तो अगर फर दब
ु ारा दो त वह दया दल
दखाएँ तो म सर धन
ु ने के इलावा और कुछ नह ं कर सकता हाँ

पो ट लख सकता हूँ.
"तु ह से" को मने एक मैगज़ीन का

प दे ना चाहा. को शश क

यादा से

यादा नै

क दो त को

इनवॉ व क ँ . हम सज
ृ न का कुछ बेहतर अथ समझ और गहरे अंतर म या पत

अपनी सज
ृ नाि म ता को बाहर नकाल. सूए दो त से साझा कर तो यहाँ भी दो त
ने वह दरया दल

दखाई. उ ह ने नए वष के बधाई स दे श के साथ "तु ह से"

मैगज़ीन क "कवर फोटो" को केवल एक अ छा "बधाई स दे श" मान कर फट से like
कया और अगले स दे श क तरफ ख कया. मने और ढ ठताई बरती और हर एक
दस
ु रे दन "तु ह से" को नए नए angle से शेयर कया तो दो त ने अपनी

"सप
ु र चत दरया दल को और आगे ले कर एक बार फर ऐसी पो ट को ब ढ़या

तर के से " रजे ट" कया. और कुछ इक ने "गुड" "congratulations " और इ तयाद

दल लभ
ु ावने संदेश से "जले पर पानी छटका" िजस के लए म उन का तहे दल से

आभार हूँ."
अभी तक इस "द ु नया क आठवीं न वन दसवीं है रानी" से अब तक उभर नह ं पा

रहा हूँ क २४ म से २० घंटे फेसबुक पर वराजमान मेरे दो त ने ऐसा दया दल का
पाठ कहाँ से सीखा. और उस से भी यादा िजन दो त को मने "तु ह से" म लेखक
तौर पर शा मल कया उ ह ने भी अपने इस दो त क नई को शश को तहे दल से

रजे ट कर दया. म मनाता हूँ के फेसबुक पर पो ट क भरमार है . और एक आम
इंसान के पास इतना समय नह ं क वह हर पो ट को पढ़ सके या उस पर कोई
ताव पेश कर सके. पर फर भी मन म अ त र त ढ ठताई ले कर सोचता हूँ क म
अभी भी दो त के "ब ढ़या मन- मि त क" के तु य लख नह ं पा रहा हूँ और मझ
ु े

और को शश करनी चा हए.
डॉ०

वण ओमकार

हट जाओ, जब तक लोग यह पूछते ह क हटता
लोग कहना शु

य है। उस समय तक मत

कर द क हटता

रामधार

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को, जब

य नह ं है ?

संह दनकर
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प थर क तरह बे हस-ओ-बेजान सा

हमार फ मी शायर
( थाई

त भ)

त हाई क ये कौन सी मि ज़ल है रफ़ क़ो

गाना / Title: सीने म जलन आँख
म तफ़
ू ान सा

यँू है

य है - siine me.n

jalan aa.Nkho.n me.n tuufaan
saa kyo.N hai

ता-ह -ए-नज़र एक बयाबान सा

यूँ है

हम ने तो कोई बात नकाल नह ं ग़म क
वो ज़ूद-ए-पशेमान पशेमान सा

यूँ है

या कोई नई बात नज़र आती है हम म

च पट / Film: Gaman

आईना हम दे ख के है रान सा

संगीतकार / Music

आज के

Director: Jaidev

यूँ है

शायर पु तक "शहरयार :

" म जानेमाने लेखककमले वर लखते "

गीतकार / Lyricist: Shahryar

:ह ह द ु तानी अदब म शहरयार वो नाम

गायक / Singer(s): सुरेश वाडकर-

शायर के साथ उद ू अदब क द ु नया म

(Suresh Wadkar)

है िजसने छठे दशक क शु आत म
अपना सफ़र शु

कया। यह दौर वह था

जब उद ू शायर म दो धाराएँ बह रह थीं
और दोन के अपने अलगअलग रा ते -

अलग मंिज़ल थीं। ए-और अलगक शायर
वह थी जो पर परा को नकार कर
बगावत
़ को सबकुछ मानते हुए नएपन
पर ज़ोर दे रह थी और दस
ू र अनभ
ु ू त,
शैल और जद दयत क अ भ यि त के

बना पर नया होने का दावा कर रह थी
और साथ ह अपनी पर परा को भी
सहे जे थी शहरयार ने अपनी शायर के !
लए इस दस
ू र धारा केसाथ एक नए

शहरयार
सीने म जलन आँख म तूफ़ान सा
इस शहर म हर श स परे शान सा

यूँ है

यूँ है

दल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे

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नखरे और ब कुल अलग अ दाज़ को

चुना—और यह अ दाज़ नतीजा था और
उनके गहरे समाजी तजुब का, िजसक

तहत उ ह ने यह तय कर लया था क
बना व तुपरक वै ा नक सोच के द ु नया
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olar 2016

म कोई कारगर रचना मक सपना नह -ं
दे खा जा सकता। उसके बाद वे अपनी
तनहाइय और वीरा नय के साथसाथ -

इनका पहला का य सं ह‘इ मेआज़म-’
का शत हो चुका था १९८३इसके बाद

म वह ं

ोफ़ेसर हो

१९८७म र डर और

द ु नया क खुशहाल और अमन का

-म इसका दस
ू र का य १९६९सन ् !गए

कुँवर अख़लाक मोह मद खाँ उफ

मौसम’ १९७८ म, फर १९८५ म ‘ याल

!सपना पूरा करने म लगे रहे

सं ह‘सातवाँ दर’ छपा। फर ‘ ह

शहरयार का ज म ६ जून १९३६ को

आंवला, िजला बरे ल म हुआ। वैसे
क़द मी रहने वाले वह चौढ़े रा ब नेशर फ़,
िजला बुलद
ं शहर के ह। वा लद पु लस

अफसर थे और जगहज-गह तबादल पर
रहते थे इस लए आरि भक पढ़ाई हरदोई
म पूर करने के बाद इ ह १९४८ म

अल गढ़ भेज दया गया। वह कदकाठ से मज़बूत और सजीले थे। अ छे

क यह इ छा थी क ये उ ह ं के

पर चलते हुए पु लस अफसर बन जाएँ।
ले कन तम◌ाम को शश के बावजद
ू ऐसा
हो न सका। आगे चलकर सन ् १९६१ म

उ ह ने अल गढ़ मिु लम व व व यालय

से उद ू म एम कया। व याथ जीवन .ए.

मअ
ह अंजम
ु ला के सै े टर -उद-ए-म

ु न
और‘अल गढ़ मैगज़ीन’ के स पादक

बना दए गए और तभी से इनके इराद
ने पकना शु

कर दया। अपने इलाके

क सांझी तहजीब ने इनके लए मज़हब
का

के

का दर ब द है’ का शत हुआ और इसे
सा ह य अकादमी अवाड से नवाज़ा गया
म १९९५इसके बाद

!‘नींद क

करच’

का शत हुआ। सल सला अब भी ज़ार
है और शहरयार बद तरू शे’र कह रहे ह।
और अब तो इनका समूचा का य लेखन
नागर

ल प म भी आ गया है और

ह द भाषी लोग ने भी भरपूर

वागत

कया।

खलाड़ी और एथल ट भी थे और वा लद

क़दम

!

आप क

या हमारे लये अमु य है

हमारा यह यास आप के सहयोग के

बना अधूरा है .

आप का एक मा सहयोग आप क

या है.आप फेस बुक या इ-मेल या से

भी अपनी

या य त कर सकते ह.

आप हम बताय क हमारे यास म या
अधरू ा है अभी संपरक सू - इ-मेलabcinnerworld@gmail.com
Facebook
https://www.facebook.com/groups/164
1827909407252/

प अि तयार कर लयाउद ू और !

ह द भाषा के बीच द वार बनावट नज़र
म ह शहरयार

१९६६आने लगी। सन ्

व व व यालय के उद ू वभाग म

म ह

१९६५जब क सन ्

व ता

नयु त हुए

TUMHI SE –Hindi Literary Magazine

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अं तम प ना

अमत
ृ (उप यास)

काशक : अयन

ा त पु तक

काशन , नई

द ल

जसबीर कालरवी का यह उप यास िजसके बारे म

यात सा ह यकार मह प संह लखते

है- य द यह उप यास के चौखटे म मानना हो तो अनेक वचारो तेजक सूि तय से भरा

हुआ है . यह उन रचनाओं म नह ं है िज हे एक ह सांस म पढ़ा जा सकता है. यह रचना
हर दस
ु रे कदम पर आप को रोक लेती है और कहती है - ठहरो आगे बढ़ने से पहले इस
उ दलवन को पचाओ जो इस ने तु हारे अंदर उ प न कया है. हंद म चंतन परक

रचनाओं का औप या सक

प जैने

और अ ेय जी क रचनाओं म मलता है. मुझे

जसबीर उन से भी दो कदम आगे लगे है. ये लेखक अपनी कृ तय म कथा सू
कसी सीमा तक पकडे रहते ह. जसबीर ने इन

थूल सू

को

क भी चंता नह ं क है.

Tumhi se- rqEgh ls (Hindi Literary Magazine)
March- June 2016

नव आि त व क तलाश
Editor- Dr. Swaran J. Omcawr Executive- Editor- Krishna Eswarn
e-mail: abcinnerworld@gmail.com Website: abcinnerworld.com