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(http://rachanakar.blogspot.com ) क  तु त

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हद क अतर- ेीय, सावदेशीय एवं अतरराय भूमका 
ोफेसर महावीर सरन जैन
एम0ए0, डी0फल, डी0ल 0
(सेवानवृ त नदे शक, केय हद संथान)

123, ह"रएकलेव, चांदपरु रोड, बल
ु दशहर - 203001
अन
ु म

अयाय 1. 
हद भाषा का े एवं हद के े गत प

अयाय 2. 
हद
एवं उद ू का अवैत

अयाय 3. 
हद
भाषा क सावदेशीय भूमका ( भारत म" हद
का स#पक भाषा के %प म" &यवहार

अयाय 4.
'वदे शी 'ववान( वारा हद
वा)मीमांसापरक अ*ययन

1

(*फलॉलािजकल टडीज) (सन ् 1940 ई वी तक)

रचनाकार क  त ु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भू#मका – ो. महावीर सरन जैन

अयाय 5. 
वदे श म
ह द शण : समयाएँ और समाधान

अयाय 6. 
वतीय महाय
ु के प"चात ् वदे श म
ह द भाषापरक अ(ययन

अयाय 7. 
वतीय महाय
ु के प"चात ् वदे श म
ह द सा
ह)य सज
ृ न एवं सा
ह)य समीा

अयाय 8. 
वतीय महाय
ु के प"चात ्
ह द क- सा
हि)यक कृ/तय का वदे शी भाषा म तथा वदे शी सा
हि)यक कृ/तय/लोककथाओं
का
हंद म अनुवाद

अयाय 9.
संयु1त रा23 संघ क- आ6धका7रक भाषाएँ एवं
ह द

भूमका 
वाधीनता के लए जब-जब आ(दोलन ती) हुआ, तब-तब ह(द क गत का रथ भी ती) गत से आगे बढ़ा। ह(द
रा य चेतना क तीक बन गई। ह(द को राभाषा क मा(यता उन नेताओं के कारण ा4त हुई िजनक मातभ
ृ ाषा
ह(द नह ं थी। 

वाधीनता आ(दोलन का नेत7ृ व िजन नेताओं के हाथ8 म9 था उ(ह8ने यह पहचान लया था ;क <वगत

600-700 वष= से ह(द स>पूण भारत क एकता का कारक रह है , यह संत8, फकर8, AयापाBरय8, तीथ याCय8, सैनक8 Dवारा
दे श के एक भाग से दस
ू रे भाग तक यE
ु त होती रह है । बंगाल के केशवच(F सेन, राजा राम मोहन राय, रवी(Fनाथ ठाकुर,
नेताजी सुभाष च(F बोस, पंजाब के Cब<पनच(F पाल, लाला लाजपत राय, गज
ु रात के वामी दयान(द, रा<पता महा7मा
गाँधी, महारा के लोकमा(य तलक तथा दHण भारत के सुIJमKयम भारती, मोटूBर स7यनारायण आ द नेताओं के रा
भाषा ह(द के स>बंध म9 AयEत <वचार8 से मेरे मत क संपुिट होती है ।

जब सं<वधान सभा ने दे श क राजभाषा के स>ब(ध म9 <वचार ;कया तब तक रा य चेतना क धारा का वाह इतना तेज
था ;क सं<वधान सभा ने एकमतेन ह(द को संघ क राजभाषा घो<षत ;कया। सं<वधान सभा म9 इस <वषय पर कोई मतभेद
कभी नह ं हुआ ;क संघ क राजभाषा ह(द को बनाया जाए अथवा नह ं। बहस का मO
ु ा कभी भी यह नह ं रह ;क संघ क
नेहS ‘ ने एक अTखल भारतीय भाषा क आवVयकता ' पर बल दे ते हुए यह पट कहा ;क एक वतं दे श को अपनी ह
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

2

राजभाषा ह(द को बनाया जाए अथवा अंPेजी को। दनांक 8 नव>बर, 1948 को दे श के धानमंी पंQडत जवाहर लाल

भाषा म9 राजकाज चलाना चा हए तथा यह भाषा अ(तत: जनता के मWय से ह <वकसत होगी (का(ट Xयू(ट एसे>बल
QडबेXस, दनांक 8 - 11 - 1948)। बहस के मुOे रहे ;क (1) अंPेजी के चलते रहने क अवYध 10 वष रखी जाए अथवा 15 वष
(2) ह(द का वSप कैसा हो (3) अंक दे वनागर के नागर अंक ह8 अथवा अ(तररा य ह8। 26 अगत,1949 को इस
<वषय पर काफ बहस हुई िजसम9 मुZय मुOा अंको का था। मतदान म9 समान मत पड़े। यह मत <वभाजन इतना चYचत
हुआ ;क बाद म9 अंPेजी के कुछ <वDवान8 ने यह मथक गढ़ दया ;क सं<वधान सभा म9 इस <वषय पर बहस हुई ;क संघ
क राजभाषा ह(द हो अथवा अंPेजी हो। वातव म9 सं<वधान सभा ने एकमतेन अथात सवस>मत से संघ क राजभाषा
ह(द को वीकार ;कया। 14 सत>बर,1949 को भार तालय8 क गड़गड़ाहट म9 ‘ मुंशी - आयंगर' फामूला वीकार करते
हुए जब ह(द राजभाषा के पद पर एकमतेन तिठत हुई तो सभा के अWय ने अपने जो उDगार AयEत ;कया वह
त7काल न सभा के सदय8 के मनोभाव8 को आ7मसात करने का लTखत दतावेज है : ‘आज पहल बार हम अपने सं<वधान
म9 एक भाषा वीकार कर रह9 ह] जो भारत संघ के शासन क भाषा होगी। - - - हमने अपने दे श का राजनैतक एककरण
स>प(न ;कया है । राजभाषा ह(द दे श क एकता को कVमीर से क(याकुमार तक अYधक स^
ु ढ़ बना सकेगी। अंPेजी क
जगह भारतीय भाषा को था<पत करने से हम नVचय ह और भी एक दस
ू रे के नज़द क आय9ग।े ' 
वतंता ाि4त के बाद स7ताधीश8 ने सामा(य जन से अपनी दरू दखाने तथा सामा(य जन को अपनी भुता दखाने के 
लए सामा(य जन क भाषा को शासन एवं शण क भाषा नह ं बनने दया। तक दया गया - ह(द म9 वैaानक एवं
तकनीक शbदावल का अभाव है । वैaानक एवं तकनीक शbदावल आयोग का गठन कर दया गया। काम सcप दया गया
- शbद बनाओ, शbद गढ़ो। आज िथत यह है ;क एक ओर ह(द के मातभ
ृ ा<षय8 क संZया <वVव म9 चीनी भाषा के बाद
सवाYधक है तथा इसका चार सार एवं अWययन अWयापन अ(तररा य तर पर है वह ं दस
ू र ओर कुछ ताकत9 ह(द
को उसके अपने ह घर म9 तोड़ने का कुचd रच रह ह] । इनक शिEत यDय<प कम नह ं है ;फर भी मेरा आकलन है ;क
ह(द को आगे बढ़ने से अब कोई ताकत रोक नह ं सकती Eय8;क ह(द नर(तर आगे बढ़ रह है । बीसवीं शताbद के
अि(तम चरण म9 एक स>मेलन का समापन करते हुए म]ने यह मत AयEत ;कया था ;क 19वीं शताbद e9च भाषा क थी,

20 वीं शताbद अंPेजी भाषा क थी तथा 21 वीं शताbद ह(द क होगी। इस मत क थापना के कारण थे - भाषा बोलने
वाल8 क संZया, भाषा Aयवहार े का <वतार, ह(द भाषा एवं ल<प Aयवथा क संरचना7मक <वशेषताएँ, भ<वय म9
क>4यूटर के े म9 Text to Speech तथा Speech to Text तकनीक का <वकास , भारतीय मूल के आवासी एवं अनवासी
भारतीय8 क संZया, gमशिEत, मानसक तभा म9 नर(तर अभव<ृ h।
सन ् 1998 के पूव, मातभ
ृ ा<षय8 क संZया क

^िट से <वVव म9 सवाYधक बोल जाने वाल भाषाओं के जो आंकड़े मलते

थे, उनम9 ह(द को तीसरा थान दया जाता था। सन ् 1991 के सै(सस आफ इिKडया का भारतीय भाषाओं के <वVलेषण का
P(थ जुलाई, 1997 म9 काशत हुआ (दे 0 Census of India 1991 Series 1 - India Part I of 1997, Language : India and

states - Table C - 7) यून
े को क टे Eनीकल कमेट फॉर द वkड ल]lवेिजज Bरपोट ने अपने दनांक 13 जुलाई, 1998 के प
के Dवारा यूनेको-Vनावल के आधार पर ह(द क Bरपोट भेजने के लए भारत सरकार से नवेदन ;कया। भारत सरकार ने
उEत दाय7व के नवाह के लए के(F य ह(द संथान के त7काल न नदे शक ोफेसर महावीर सरन जैन को प लखा। 
ोफेसर महावीर सरन जैन ने दनांक 25 मई ,1999 को यूनेको को अपनी <वतत
ृ Bरपोट भेजी। 
ोफेसर जैन ने <वभ(न भाषाओं के ामाTणक आंकड़8 एवं तmय8 के आधार पर यह सh ;कया ;क योEताओं क
^िट से <वVव म9 चीनी भाषा के बाद दस
ू रा थान ह(द भाषा का है । Bरपोट तैयार करते समय ोफेसर जैन ने CI टश
काउि(सल आफ इिKडया से अंPज
े ी मातभ
ृ ा<षय8 क पूरे <वVव क जनसंZया के बारे म9 तmया7मक Bरपोट भेजने के लए
फैEस Dवारा भेजा। CI टश काउि(सल Dवारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे <वVव म9

अंPज
े ी मातभ
ृ ा<षय8 क संZया

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

3 

नवेदन ;कया। CI टश काउि(सल ऑफ इिKडया ने इसके उ7तर म9 Yगनीज बुक आफ नालेज (1997 संकरण, पृ ठ-57)

33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) है । सन ् 1991 क जनगणना के अनुसार भारत क पूर आबाद 83,85,83,988 है ।
मातभ
ृ ाषा के Sप म9 ह(द को वीकार करने वाल8 क संZया 33,72,72,114 है तथा उद ू को मातभ
ृ ाषा के Sप म9 वीकार
करने वाल8 क संZया का योग 04,34,06,932 है । ह(द एवं उद ू को मातभ
ृ ाषा के Sप म9 वीकार करने वाल8 क संZया
का योग 38,06,79,046 है जो भारत क पूर आबाद का 44.98 तशत है । ोफेसर जैन ने अपनी Bरपोट म9 यह भी सh
;कया ;क भा<षक ^िट से ह(द और उद ू म9 कोई अंतर नह ं है । इस कार CIटे न, अमेBरका, कनाडा, आयरल]ड, आे लया,
(यूजील]ड आ द सभी दे श8 के अंPेजी मातभ
ृ ा<षय8 क संZया के योग से अYधक जनसंZया केवल भारत म9 ह(द एवं उद ू
भा<षय8 क है । Bरपोट म9 यह भी तपा दत ;कया गया ;क ऐतहासक, सांकृतक एवं सामािजक कारण8 से स>पूण भारत
म9 मानक ह(द के AयावहाBरक Sप का सार बहुत अYधक है । ह(द तर भाषी राoय8 म9 बहुसंZयक D<वभा<षक-समुदाय
D<वतीय भाषा के Sप म9 अ(य ;कसी भाषा क अपेा ह(द का अYधक योग करता है ।
यह कहना असांYगक न होगा ;क ह(द भाषा क अथव7ता, ह(द - उद ू का स>ब(ध, ह(द भाषा े तथा ह(द का
Aयवहार े आ द Cब(दओ
ु ं को लेकर न केवल सामा(य AयिEत के मन म9 बहुत सी pा(त धारणाएँ बनी हुई ह] बिkक
ह(द भाषा के कतपय <वDवान8, आलोचक8 तथा अWयेताओं का मन भी त7संबंYधत pाि(तय8 से मE
ु त नह ं है । 
थम अWयाय म9 ह(द भाषा क अथव7ता को पट करने के लए ‘ ह(द भाषा े' क मीमांसा क गई है । इस अWयाय
म9 यह भी पट ;कया गया है ;क 

7येक भाषा े म9 अनेक ेगत, वगगत एवं शैल गत भ(नताएँ होती ह]। 7येक

भाषा े म9 ;कसी े <वशेष के भा<षक Sप के आधार पर उस भाषा का मानक Sप <वकसत होता है , िजसका उस भाषाे के सभी े8 के पढ़े -लखे AयिEत औपचाBरक अवसर8 पर योग करते ह]। पूरे भाषा े म9 इसका Aयवहार होने तथा
इसके काया7मक चार-सार के कारण <वकसत भाषा का मानक Sप भाषा े के समत भा<षक Sप8 के बीच संपक
सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा Sप के आधार पर उस भाषा क पहचान क जाती है । ;कसी भाषा
के मानक Sप के आधार पर उस भाषा क पहचान भले ह क जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक Sप होता है :
मानक भाषा ह भाषा नह ं होती। इस अWयाय म9 ह(द भाषा के संदभ म9 यह पट ;कया गया है ;क खड़ी बोल के आधार
पर मानक ह(द का <वकास अवVय हुआ है ;क(तु खड़ी बोल ह ह(द नह ं है । त7वतः ह(द भाषा े के अ(तगत
िजतने भा<षक Sप बोले जाते ह] उन सबक समिट का नाम ह(द है । ह(द भाषा े के 7येक भाग म9 AयिEत थानीय 
तर पर ेीय भाषा Sप म9 बात करता है । औपचाBरक अवसर8 पर तथा अ(तर-ेीय, रा य एवं सावदेशक तर8 पर
भाषा के मानक Sप अथवा AयावहाBरक ह(द का योग होता है ।
दस
ू रे अWयाय का तपाDय ह(द एवं उद ू के अDवैत क <ववेचना है । इस अWयाय म9 म]ने यह सh ;कया है ;क भा<षक
^िट से ह(द और उद ू म9 कोई अंतर नह ं है ।
तीसरे अWयाय म9 ह(द क भारत के ह(द तर े क भू मका के स>बंध म9 स
ू वत <ववेचना क गई है । वाधीनता
आ(दोलन म9 ह(द क भूमका के स>बंध म9 पया4त <वचार हो चुका है । ;कस कार <वभ(न ह(द तर े8 के नेताओं ने
ह(द के रा य मह7व का आकलन ;कया तथा ह(द को राभाषा माना तथा इसके चार सार म9 अपना योगदान दया
- इस स>बंध म9 <वपुल सामPी उपलbध है । इस ^िट से भी चुर सामPी उपलbध है ;क ह(द म9 उन रचनाकार8,
सा ह7यकार8, अनुसंधानकताओं एवं चारक8 का ;कतना योगदान है िजनक मातभ
ृ ाषा यDय<प ह(द नह ं है । इस कारण म]ने 
तुत अWयाय म9 AयवहाBरक ह(द भाषा के स>पूण भारत म9 सार एवं Aयवहार को रे खां;कत करने का यास अYधक
;कया है ।
ह(द क अ(तररा य भूमका के बारे म9 <वचार अपेHत है ।

4

आगे के अWयाय8 म9

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

<वVव के लगभग 93 दे श8 म9 ह(द का या तो जीवन के <व<वध े8 म9 

योग होता है अथवा उन दे श8 म9 ह(द के

अWययन अWयापन क स>यक् Aयवथा है । चीनी भाषा के बोलने वाल8 क संZया ह(द भाषा से अYधक है ;क(तु चीनी
भाषा का योग े ह(द क अपेा सीमत है । अंPेजी भाषा का योग े ह(द क अपेा अYधक है ;क(तु ह(द
बोलने वाल8 क संZया अंPेजी भा<षय8 से अYधक है ।
<वVव के इन 93 दे श8 को हम तीन वग= म9 <वभािजत कर सकते ह] -

( I ) इस वग के दे श8 म9 भारतीय मल
ू के आवासी नागBरक8 क आबाद दे श क जनसंZया म9 लगभग 40 तशत या
उससे अYधक है ।

( II ) इस वग के दे श8 म9 ऐसे नवासी रहते ह] जो ह(द को <वVव भाषा के Sप म9 सीखते ह], पढ़ते ह] तथा ह(द म9 लखते
ह]। इन दे श8 क <वभ(न शण संथाओं म9 ायः नातक एवं / अथवा नातको7तर तर पर ह(द क शा का ब(ध
है । कुछ दे श8 के <वVव<वDयालय8 म9 ह(द म9 शोध काय करने तथा डाEटरे ट क उपाYध ा4त करने क भी Aयवथा है ।

( III ) भारत क राजभाषा ह(द है तथा पा;कतान क राoयभाषा उद ू है । इस कारण ह(द -उद ू भारत एवं पा;कतान म9
संपक भाषा के Sप म9 Aयवrत है । भारत एवं पा;कतान के अलावा ह(द एवं उद ू मातभ
ृ ा<षय8 क बहुत बड़ी संZया <वVव
के लगभग 60 दे श8 म9 नवास करती है । इन दे श8 म9 भारत, पा;कतान, बंगलादे श, भूटान, नेपाल आ द दे श8 के आवासय8 /
अनवासय8 क <वपुल आबाद रहती है । इन दे श8 क यह आबाद स>पक-भाषा के Sप म9 ‘ ह(द -उद 'ू का योग करती है ,
ह(द क ;फkम9 दे खती है ; ह(द के गाने सुनती है तथा टे ल <वजन पर ह(द के कायdम दे खती है ।
अंPेज8 के शासनकाल म9 भारत म9 केवल CI टश नागBरक ह नह ं आए; हालैKड, जमनी, eांस,Sस एवं अमेBरका आ द दे श8
के नागBरक भी आए। आगत <वदे शी पादBरय8, कमचाBरय8, शासक8 म9 से बहुत से <वदे शय8 ने gम एवं नठापूवक 
ह(द
सीखी तथा ह(द सीखकर ह(द क पाsय पुतक8, ह(द के Aयाकरण8 एवं कोश8 का नमाण ;कया। उनके अWययन आज
के भाषावैaानक <वVलेषण एवं पhत के अनS
ु प भले ह न ह8 ;क(तु ह(द भाषा के वाt.मीमांस ापरक अWययन क ^िट
से इनका ऐतहासक मह7व बहुत अYधक है । चौथे अWयाय म9 इ(ह ं <वदे शी <वDवान8 के Dवारा स>प(न ह(द भाषा से
संबंYधत अWययन8 का लेखा जोखा तुत है ।
पाँचवे

अWयाय म9 <वदे श8 म9 ह(द शण क समयाओं क <ववेचना क गई है तथा इनके समाधान के लए Eया

करणीय है , ह(द क गत एवं <वकास के लए ;कन ;कन दशाओं म9 कदम उठाना जSर है , - इस बारे म9 दशा नदv श दे ने
का <वनw यास ;कया गया है ।
छठे अWयाय म9 D<वतीय महायh
ु के बाद ह(द भाषा के <वभ(न प8 पर <वदे शी <वDवान8 Dवारा स>प(न अWययन8 क
<ववेचना तुत है ।
सातव9 अWयाय म9 D<वतीय महायh
ु के बाद <वदे शी <वDवान8 एवं सा ह7य सजक8 के Dवारा ह(द सा ह7य सज
ृ न एवं सा ह7य
क आलोचना एवं समीा क झाँक तत
ु है ।
आठव9 अWयाय का तपाDय है ;क ह(द क ;कन ;कन सा हि7यक कृतय8 का ;कन ;कन <वदे शी भाषाओं म9 अनुवाद हो
चुका है तथा ;कन ;कन <वदे शी सा हि7यक कृतय8 एवं लोक कथाओं का ह(द म9 अनुवाद हो चुका है ।

आYधकाBरक भाषाएँ ह]। इन भाषाओं के मातभ
ु ना ह(द के
ृ ा<षय8 के बोलने वाल8 क संZया के ामाTणक आँकड़8 क तल
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

5

अि(तम अWयाय का <वषय है - ‘ संयुEत रा संघ क आYधकाBरक भाषाएँ एवं ह(द '। वतमान म9 संयE
ु त रा संघ क 6

मातभ
ृ ा<षय8 क संZया से क गई है तथा ह(द को भी संयुEत रा संघ क आYधकाBरक भाषा बनाए जाने क ता;कक
अनुशंसा क गई है ।
जो अWयेता तत
ु पुतक को पढ़कर एसy सामPी क सच
ू ना दे ने क अनक
ु >पा कर9 गे िजसे इसम9 जोड़ा जा सके तथा
अWययन सामPी को अDयतन बनाया जा सके, लेखक उनके त

आभार होगा।

अयाय 1. 
हद
भाषा

का े एवं हद
के ेगत प

‘ ह(द भाषा े' के अ(तगत भारत के न>नलTखत राoय ⁄ के(F शासत दे श समा हत ह] - 1.उ7तर दे श 2.उ7तराखंड
3. Cबहार 4. झारखंड 5. मWयदे श 6. छ7तीसगढ़ 7. राजथान 8. हमाचल दे श 9. हBरयाणा 10. दkल 11. चKडीगढ़।
‘ ह(द भाषा े ' म9 ह(द भाषा के जो मुख ेगत Sप बोले जाते ह] उनक संZया 20 है । भाषा<वaान का 7येक
<वDयाथy जानता है ;क 7येक भाषा े म9 भा<षक भ(नताएँ होती ह]। ;कसी ऐसी भाषा क कkपना भी नह ं क जा
सकती जो िजस ‘भाषा े' म9 बोल जाती है उसम9 ;कसी कार क ेगत एवं वगगत भ(नताएँ न ह8। भ(न7व क ^िट
से तो ;कसी भाषा े म9 िजतने बोलने वाले AयिEत रहते ह] उस भाषा क उतनी ह ‘AयिEत बोलयाँ' होती ह]। इसी कारण
यह कहा जाता है ;क भाषा क संरचक ‘बोलयाँ' होती ह] तथा बोलय8 क संरचक ‘AयिEत बोलयाँ'। इसी को इस कार भी
कह सकते ह] ;क ‘AयिEत बोलय8' के समह
ू को ‘बोल ' तथा ‘बोलय8' के समह
ू को भाषा कहते ह] । बोलय8 क समिट का
नाम ह भाषा है । ;कसी भाषा क बोलय8 से इतर Aयवहार म9 सामा(य AयिEत भाषा के िजस Sप को ‘भाषा' के नाम से
अभ हत करते ह] वह त7वत: भाषा नह ं होती। भाषा का यह Sप उस भाषा े के ;कसी बोल ⁄ बोलय8 के आधार पर
<वकसत उस भाषा का ‘मानक भाषा Sप' होता है । भाषा <वaान से अनभa AयिEत ‘मानक भाषा Sप' को ‘भाषा' कहने एवं
समझने लगते ह] तथा ‘भाषा े' क बोलय8 को अ<वकसत, ह न एवं गँवाS कहने, मानने एवं समझने लगते ह] । भारतीय
भा<षक पर>परा इस ^िट से अYधक वैaानक रह है । भारतीय पर>परा ने भाषा के अलग अलग े8 म9 बोले जाने वाले
भा<षक Sप8 को ‘दे स भाखा⁄ दे सी भाषा' के नाम से पुकारा तथा घोषणा क ;क दे सी वचन सबको मीठे लगते ह] - ‘ दे सल
बअना सब जन मzा '। ( <वशेष अWययन के लए दे ख9 - ोफेसर महावीर सरन जैन : भाषा एवं भाषा <वaान, अWयाय 4 भाषा के <व<वधSप एवं कार, लोकभारती काशन, इलाहाबाद, 1985 )
ह(द भाषा े म9 ह(द क मुZयत: 20 बोलयाँ अथवा उपभाषाएँ बोल जाती ह] । इन 20 बोलय8 अथवा उपभाषाओं को
ऐतहासक पर>परा से पाँच वग= म9 <वभEत ;कया जाता है - पिVचमी ह(द , पूवy ह(द , राजथानी ह(द , Cबहार ह(द
और पहाड़ी ह(द ।

1. पिVचमी ह(द - 1.खड़ी बोल 2. Iजभाषा 3. हBरयाणवी 4. बु(दे ल

5.क(नौजी

2. पूवy ह(द - 1.अवधी 2.बघेल 3. छ7तीसगढ़

6

3.राजथानी - 1.मारवाड़ी 2.मेवाती 3.जयपुर 4.मालवी
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

4. Cबहार - 1. भोजपुर 2. मैYथल 3. मगह 4.अंYगका 5.बिoजका ( इनम9 ‘मैYथल ' को अलग भाषा का दजा दे दया गया
है हालाँ;क ह(द सा ह7य के पाsयdम म9

अभी भी मैYथल क<व <वDयापत पढ़ाए जाते ह] तथा जब नेपाल म9 रहने वाले

मैYथल बोलने वाल8 पर कोई दमना7मक कारवाई होती है तो वे अपनी पहचान ‘ ह(द भाषी' के Sप म9 उसी कार करते ह]
िजस कार मु>बई म9 रहने वाले भोजपुर , मगह , मैYथल एवं अवYध आ द बोलने वाले अपनी पहचान ‘ ह(द भाषी' के Sप म9
करते ह]। )

5. पहाड़ी - ‘आधुनक भारतीय भाषाओं का वगyकरण' के अ(तगत डॉ. सर जॉज YPयसन Dवारा तुत वगyकरण के संदभ
म9 इसका उkलेख ;कया जा चुका है ;क YPयसन ने ‘पहाड़ी' समुदाय के अ(तगत बोले जाने वाले भा<षक Sप8 को तीन
शाखाओं म9 बाँटा - पूवy पहाड़ी अथवा नेपाल , मWय या के(F य पहाड़ी एवं पिVचमी पहाड़ी। ह(द भाषा के संदभ म9 वतमान
िथत यह है ;क ह(द भाषा के अ(तगत मWय या के(F य पहाड़ी क उ7तराखंड म9 बोल जाने वाल 1. कूमाऊँनी

2.गढ़वाल तथा पिVचमी पहाड़ी क हमाचल दे श म9 बोल जाने वाल ह(द क अनेक बोलयाँ आती ह] िज(ह9 आम
बोलचाल म9 ‘ पहाड़ी ' नाम से पुकारा जाता है ।
ह(द भाषा के संदभ म9 <वचारणीय है ;क अवधी, बु(दे ल , Iज, भोजपुर , मैYथल आ द को ह(द भाषा क बोलयाँ माना
जाए अथवा उपभाषाएँ माना जाए। सामा(य Sप से इ(ह9 बोलय8 के नाम से अभ हत ;कया जाता है ;क(तु लेखक ने अपने
P(थ ‘ भाषा एवं भाषा<वaान' म9 इ(ह9 उपभाषा मानने का ताव ;कया है । ‘ - - े, बोलने वाल8 क संZया तथा परपर 
भ(नताओं के कारण इनको बोल क अपेा उपभाषा मानना अYधक संगत है । ( भाषा एवं भाषा<वaान, पृ ठ 60)
इसी P(थ म9 लेखक ने पाठक8 का Wयान इस ओर भी आक<षत ;कया ;क ह(द क कुछ उपभाषाओं के भी ेगत भेद ह]
िज(ह9 उन उपभाषाओं क बोलय8 अथवा उपबोलय8 के नाम से पुकारा जा सकता है ।
यहाँ यह भी उkलेखनीय है ;क इन उपभाषाओं के बीच कोई पट <वभाजक रे खा नह ं खींची जा सकती है । 7येक दो
उपभाषाओं के मWय संdमण े ह]।
<वVव क 7येक <वकसत भाषा के <व<वध बोल अथवा उपभाषा े8 म9 से <वभ(न सांकृतक कारण8 से जब कोई एक 
े मह7वपूण हो जाता है तो उस े के भाषा Sप का स>पूण भाषा े म9 सारण होने लगता है । इस े के भाषाSप
के आधार पर पूरे भाषाे क ‘मानक भाषा' का <वकास होना आर>भ हो जाता है । भाषा के 7येक े के नवासी इस
भाषाSप को ‘मानक भाषा' मानने लगते ह]। भाषा के 7येक े के नवासी भले ह इसका उ{चारण नह ं कर पाते, ;फर भी
वे इसको सीखने का यास करते ह] , इसको मानक मानने के कारण यह मानक भाषा Sप ‘भाषा े' के लए सांकृतक
मूkय8 का तीक बन जाता है । मानक भाषा Sप क शbदावल , Aयाकरण एवं उ{चारण का वSप अYधक निVचत एवं िथर
होता है एवं इसका चार, सार एवं <वतार पूरे भाषा े म9 होने लगता है । कला7मक एवं सांकृतक अभAयिEत का
माWयम एवं शा का माWयम यह मानक भाषा Sप हो जाता है । इस कार भाषा के ‘मानक भाषा Sप' का आधार उस
भाषाे क ेीय बोल अथवा उपभाषा ह होती है , ;क(तु मानक भाषा होने के कारण इसका सार अ(य बोल े8
अथवा उपभाषा े8 म9 होने लगता है । इस सार के कारण इस भाषाSप पर ‘भाषा े' क सभी बोलय8 का भाव भी
पड़ता है तथा यह भी सभी बोलय8 अथवा उपभाषाओं को भा<वत करता है । उस भाषा े के शHत AयिEत औपचाBरक
अवसर8 पर इसका योग करते ह]। भाषा के मानक भाषा Sप को सामा(य AयिEत अपने भाषा े क ‘मूल भाषा', के(Fक
भाषा', ‘मानक भाषा' के नाम से पुकारते ह]। य द ;कसी भाषा का े ह(द भाषा क तरह <वतत
ृ होता है तथा य द उसम9

‘ ह(द भाषा े' क भॅ ांत उपभाषाओं एवं बोलय8 क अनेक परत9 एवं तर होते ह] तो ‘मानक भाषा' के Dवारा समत
उपभाषी अथवा बोल बोलने वाले परपर अपनी उपभाषा अथवा बोल के माWयम से <वचार8 का आदान दान नह ं कर पाते
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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भाषा े म9 <वचार8 का आदान दान स>भव हो पाता है , संेषणीयता स>भव हो पाती है । भाषा े के य द अबोधग>य

तो इसी मानक भाषा के Dवारा संेषण करते ह]। भाषा <वaान म9 इस कार क बोधग>यता को ‘पारपBरक बोधग>यता' न
कहकर ‘एकतरफ़ा बोधग>यता' कहते ह]। एसy िथत म9 अपने े के AयिEत से ेीय बोल म9 बात9 होती ह] ;क(तु दस
ू रे
उपभाषा े अथवा बोल े के AयिEत से अथवा औपचाBरक अवसर8 पर मानक भाषा के Dवारा बातचीत होती ह]। इस 
कार क भा<षक िथत को फगस
ु न ने बोलय8 क परत पर मानक भाषा का अWयारोपण कहा है (Ferguson: Diglossia:

Word,15 pp. 325 - 340) तथा ग>पज ने इसे ‘बाइलेEटल' के नाम से पुकारा है । ( Gumperz: Speech variation and the
study of Indian civilization, American Anthropologist, Vol. 63, pp. 976 - 988)
हम यह कह चुके ह] ;क ;कसी भाषा े क मानक भाषा का आधार कोई बोल अथवा उपभाषा ह होती है ;क(तु काला(तर
म9 उEत बोल एवं मानक भाषा के वSप म9 पया4त अ(तर आ जाता है । स>पूण भाषा े के शट एवं शHत AयिEतय8
Dवारा औपचाBरक अवसर8 पर मानक भाषा का योग ;कए जाने के कारण तथा सा ह7य का माWयम बन जाने के कारण 
वSपगत पBरवतन वाभा<वक है । 7येक भाषा े म9 ;कसी े <वशेष के भा<षक Sप के आधार पर उस भाषा का मानक
Sप <वकसत होता है , िजसका उस भाषा-े के सभी े8 के पढ़े -लखे AयिEत औपचाBरक अवसर8 पर योग करते ह] । पूरे
भाषा े म9 इसका Aयवहार होने तथा इसके काया7मक चार-सार के कारण <वकसत भाषा का मानक Sप भाषा े के
समत भा<षक Sप8

के बीच संपक सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा Sप के आधार पर उस भाषा

क पहचान क जाती है । 7येक दे श क एक राजधानी होती है तथा <वदे श8 म9 ;कसी दे श क राजधानी के नाम से ायः
दे श का बोध होता है , ;क(तु सहज Sप से समझ म9 आने वाल बात है ;क राजधानी ह दे श नह ं होता।

ह(द भाषा का े बहुत <वतत
ृ है । इस कारण इसक ेगत भ(नताएँ भी बहुत अYधक ह]।‘खड़ी बोल ' ह(द भाषा े
का उसी कार एक भेद है , िजस कार ह(द भाषा के अ(य बहुत से ेगत भेद ह]। ह(द भाषा े म9 ऐसी बहुत सी
उपभाषाएँ ह] िजनम9 पारपBरक बोधग>यता का तशत बहुत कम है , ;क(तु ऐतहासक एवं सांकृतक ^िट से स>पूण
भाषा े एक भा<षक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी े के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने ेगत भेद8 को ह(द भाषा के
Sप म9 मानते एवं वीकारते आए ह]। भारत के सं<वधान क ^िट से यह िथत है । सन ् 1997 म9 भारत सरकार के
सै(सस ऑफ इिKडया Dवारा काशत P(थ म9 भी यह िथत है । वतु िथत यह है ;क ह(द , चीनी एवं Sसी जैसी
भाषाओं के ेगत भेद8 क <ववेचना यरू ोप क भाषाओं के आधार पर <वकसत पाVचा7य भाषा<वaान के तमान8 के
आधार पर नह ं क जा सकती।

अपने 28 राoय8 एवं 07 के(F शासत दे श8 को मलाकर भारतदे श है , उसी कार भारत के िजन राoय8 एवं

शासत 

दे श8 को मलाकर ह(द भाषा े है , उस ह(द भाषा-े के अ(तगत िजतने भा<षक Sप बोले जाते ह] उनक समािट
का नाम ह(द भाषा है । ह(द भाषा े के 7येक भाग म9 AयिEत थानीय तर पर ेीय भाषा Sप म9 बात करता है ।
औपचाBरक अवसर8 पर तथा अ(तर-ेीय, रा य एवं सावदेशक तर8 पर भाषा के मानक Sप अथवा AयावहाBरक ह(द
का योग होता है । आप <वचार कर9 ;क उ7तर दे श ह(द भाषी राoय है अथवा खड़ी बोल , Iजभाषा, क(नौजी, अवधी,
बु(दे ल आ द भाषाओं का राoय है । इसी कार मWय दे श ह(द भाषी राoय है अथवा बु(दे ल , बघेल , मालवी, नमाड़ी आ द
भाषाओं का राoय है । जब

संयुEत राoय अमेBरका क बात करते ह] तब संयुEत राoय अमेBरका के अ(तगत िजतने राoय

ह] उन सबक समिट का नाम ह तो संयE
ु त राoय अमेBरका है । <वदे श सेवा म9 कायरत अYधकार जानते ह] ;क कभी दे श
नाम से दे श क चचा भले ह होती है , मगर राजधानी ह दे श नह ं होता। इसी कार ;कसी भाषा के मानक Sप के आधार
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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के नाम से तथा कभी उस दे श क राजधानी के नाम से दे श क चचा होती है । वे ये भी जानते ह] ;क दे श क राजधानी के

पर उस भाषा क पहचान क जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक Sप होता है : मानक भाषा ह भाषा नह ं होती। इसी 
कार खड़ी बोल के आधार पर मानक ह(द का <वकास अवVय हुआ है ;क(तु खड़ी बोल ह ह(द नह ं है । त7वतः ह(द
भाषा े के अ(तगत िजतने भा<षक Sप बोले जाते ह] उन सबक समिट का नाम ह(द है । ह(द एक <वशाल भाषा है ।
<वशाल े क भाषा है । अब यह न<ववाद है ;क चीनी भाषा के बाद ह(द संसार म9 दस
ू रे न>बर क सबसे अYधक बोल
जाने वाल भाषा है ।

अयाय 2. 

हद
एवं उद ू का अवैत

सामा(य धारणा है ;क ह(द एवं उद ू अलग अलग भाषाएँ ह] , दोन8 ज़बान9 तो जुदा-जुदा ह]। यह धारणा केवल आम
आदमी क ह नह ं है अ<पतु पढ़े लखे तथा उ{चतर य पद8 पर आसीन AयिEतय8 क भी है तथा केवल भारत के लोग8 क
ह नह ं अ<पतु अ(य दे श8 के लोग8 क भी है । ह(द तथा उद ू के स>बंध म9 pाि(तं ;कतनी अYधक हो सकती है - इसका
लेखक को अनुभव है । अपने उस अनुभव को म] पाठक8 से बाँटना चाहता हूँ।
रोमानया क राजधानी ‘बुकारे त' (रोमानयन भाषा म9 उ{चारण ‘बुकुरे िVत', भारत म9 अंPेजी के अनक
ु रण पर ‘बुखारे ट') म9
अEटूबर 1985 ई. म9 हमने पा;कतानी राजदत
ू ावास के भार राजदत
ू (शाज दै अफ़ेअस) मटर एस.वाई. नEवी को Cबदाई
द । वे थम सYचव-तर के राजनयक थे। इसके थोड़े दन8 बाद ह बुकारे त म9 ‘इKडो-रोमानयन oवाइंट कमीशन' क
बैठक हुई िजसम9 भाग लेने के लए भारत से मंी एवं अYधकार गण आए। इस उपल~य म9 भारत के त7काल न राजदत
ू gी
हरदे व भkला ने अपने आवास पर वागत-समारोह का आयोजन ;कया तथा इसम9 उ(ह8ने रोमानया म9 नवागत पा;कतानी
राजदत
ू gी रbबानी को भी आमंCत ;कया। भkला साहब ने मेरा एवं रbबानी साहब का पBरचय कराया। रbबानी साहब ने
मुझसे कहा, ‘‘ोफेसर साहब! आप बुकारे त यूनवसट म9 ह(द के ोफेसर ह] । हम भी पा;कतान से उद ू के ोफेसर को
यहाँ बुलाना चाहते ह]। इस बारे म9 हम9 तरकब बताइएगा।''
म]ने उ7तर दया, ‘‘आप उद ू के ;कसी ोफेसर को बुलाना चाहते ह] -यह मेरे लए खुशी क बात है , मगर जब तक वे
नह ं आते तब तक आप मुझे ह उद ू का भी ोफेसर मान सकते ह] Eय8;क म] ह(द एवं उद ू को एक ह ज़बान मानता हूँ।''
मेर इस बात को सुनकर वे चcक पड़े और उ(ह8ने 

तवाद ;कया, ‘‘ये आप Eया कह रहे ह]? दोन8 ज़बान9 तो जुदा-

जद
ु ा ह]।''
म]ने कहा, ‘‘ज़बान9 जद
ु ा-जद
ु ा नह ं ह], ह(द -उद ू एक ह ज़बान क दो टाइल9 ह]।''
उ(ह8ने कहा, ‘‘हरYगज़ नह ं, हम यह नह ं मानते।''

अYधक है ;क ह(द को ह(दओ
ु ं क तथा उद ू को मुसलमान8 क भाषा मान लया गया है । तुत अWयाय म9 इसी pांत
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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इस संदभ से यह पट है ;क ह(द तथा उद ू के स>बंध को लेकर ;कतनी pांत धारणाएँ ह]। यह pांत इस कारण और

को दरू करने का यास ;कया जाएगा। लेखक पा;कतान के राजदत
ू क pांत दरू करने म9 सफल रहा। ( दे ख9 - ह(द -उद ू
का सवाल तथा पा;कतानी राजदत
ू से मुलाकातः ‘‘मधुमती''- राजथान सा ह7य अकादमी क पCका, वष 30, अंक 6,
उदयपुर (जुलाई, 1991), पृ ठ 10-22) 

हद
क यु पित
ईरान क ाचीन भाषा अवेता म9

‘स'् Wवन नह ं बोल जाती थी। ‘स'् को ‘' Sप म9 बोला जाता था। जैसे संकृत के

‘असुर' शbद को वहाँ ‘अहुर' कहा जाता था। अफ़गानतान के बाद स(धु नद के इस पार ह(दु तान के पूरे इलाक़ े को 
ाचीन फ़ारसी सा ह7य म9 भी ‘ ह(द', ‘ ह(दश
ु ' के नाम8 से पुकारा गया है तथा यहाँ क ;कसी भी वतु, भाषा, <वचार को

‘एडजेिEटव' के Sप म9 ‘ ह(द क' कहा गया है िजसका मतलब है ‘ ह(द का'। यह ‘ ह(द क' शbद अरबी से होता हुआ Pीक म9
‘इं दके', ‘इं दका', लै टन म9 ‘इं दया' तथा अंPेजी म9 ‘इंQडया' बन गया।
अवेता तथा ‘डेBरयस के शलालेख' म9 ( 522 से 486 ईवी पूव ) म9 ‘ ह(द'ु शbद का योग ‘संध' के समीपवतy े के 
नवासय8 के लए हुआ है । ‘ ह(द' शbद धीरे धीरे भारत म9 रहने वाले नवासय8 तथा ;फर पूरे भारत के लए होने लगा।
भारत क भाषाओं के लए ‘ ह(द ' शbद का योग मलता है । ईरान के बादशाह नौशेरवाँ के काल म9 ( 531 - 579 ईवी )
उसके एक दरबार क<व Dवारा संकृत भाषा के ‘पंचतं' के ईरानी भाषा ‘पहलवी' म9 ;कए गए अनुवाद ‘कल लहउ दमना' म9
पंचतं क भाषा को ‘जबान-ए- ह(द ' कहा गया है । सातवीं शताbद म9 महाभारत के कुछ अंश8 का पहलवीं म9 अनव
ु ाद करने
वाले <वDवान ने मूल भाषा को ‘जबान-ए- ह(द ' कहा है । दसवीं शताbद म9 अbदल
ु हमीद ने भी पंचतं क भाषा को ‘ ह(द '
कहा है । तेरहवीं शताbद म9 मनहाजुिसराज Dवारा अपने P(थ ‘तबकाते नासर ' म9 भारतीय दे सी भाषाओं के लए ‘जबाने
ह(द ' शbद का योग ;कया है । इस कार दसवीं - lयारहवीं शताbद तक अरबी एवं फारसी सा ह7य म9 भारत म9 बोल
जाने वाल ज़बान8 के लए ‘ज़बान-ए- ह(द ' लज़ का योग हुआ है । भारत आने के बाद मुसलमान8 ने ‘ज़बान-ए- ह(द ',

‘ ह(द जुबान' अथवा ‘ ह(द ' का योग दkल -आगरा के चार8 ओर बोल जाने वाल भाषा के अथ म9 ;कया। भारत के गैरमुिलम लोग तो इस े म9

बोले जाने वाले भाषा-Sप को ‘भाखा' नाम से पुकराते थे, ‘ ह(द ' नाम से नह ं।

िजस समय मुसलमान8 का यहाँ आना शु‚ हुआ उस समय भारत के इस हसे म9 सा ह7य-रचना शौरसेनी अपpंश म9
होती

थी। बाद म9 Qडंगल सा ह7य रचा गया। मुग़ल8 के काल म9 अवधी तथा Iज म9 सा ह7य लखा गया। आधुनक ह(द

सा ह7य क जो जुबान है , उस जुबान ‘ ह(दवी' को आधार बनाकर रचना करने वाल8 म9 सबसे पहले रचनाकार का नाम अमीर
खुसरो है िजनका समय 1253 ई0 से 1325 ई0 के बीच माना जाता है । ये फ़ारसी के भी <वDवान थे तथा इ(ह8ने फ़ारसी म9
भी रचनाएँ लखीं मगर ‘ ह(दवी' म9 रचना करने वाले ये थम रचनाकार थे। इनक अनेक पहे लयाँ इसका माण है ।
उदाहरण के लए

खुसरो क दो रचनाएँ तुत ह]।

(1)Eया जानँू वह कैसा है । जैसा दे खा वैसा है ।
(2)एक नार ने अचरज ;कया। साँप माBर <पंजड़े म9 दया।
अमीर खुसरो ने अपनी भाषा को

‘ ह(दवी' कहा है । एक जगह उ(होने लखा है िजसका भाव है ;क म] ह(दु तानी

10

तक
ु  हूँ, ह(दवी म9 जवाब दे ता हूँ। ( उनक मल
ू पंिEत इस कार है : ‘तक
ु  ह(त
ु तानयम ह(दवी गोयम जवाब')

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

उद ू क यु पित
‘उद'ू मूलतः तुक„ लज़ है िजसके मायने होते ह] : छावनी, लVकर। ‘मुअkला' अरबी लज़ है िजसके मायने होते ह] :
सबसे ब ढ़या। शाह पड़ाव, शाह छावनी, शाह लVकर के लए पहले ‘उद-ू ए-मुअkला' शbद का योग आर>भ हुआ। बाद म9
बादशाह से ना के पड़ाव8, छावनय8 तथा बाज़ार8 (लVकर बाज़ार8) म9 ह(दवी अथवा दे हलवी का जो भाषा Sप बोला जाता था
उसे ‘ज़बाने-उद -ू ए-मुअkला' कहा जाने लगा। बाद को जब यह जुबान फैल तो ‘मुअkला' शbद हट गया तथा ‘ज़बाने उद 'ू रह
गया। ‘ज़बाने उद 'ू के मतलब ‘उद ू क जब
ु ान' या अंPेजी म9 ‘ल]lवेज ऑफ उद 'ू । बाद को इसी का संेप म9 ‘उद'ू कहा जाने
लगा।
उद ू म9 सा ह7य-रचना बाद म9 आर>भ हुई। उद -ू सा ह7य के इतहासकार वल औरं गाबाद (रचनाकाल 1700 ई. के
बाद) को उद ू का थम शायर मानते ह]। आधुनक सा हि7यक ह(द का इतहास लखने वाले इनको खड़ी बोल क

‘दिEखनी ह(द ' का एक क<व मानते ह]। शाहजहाँ ने अपनी राजधानी, आगरा के थान पर, दkल बनाई और अपने नाम पर
सन ् 1648 ई. म9 ‘शाहजहाँनाबाद' आबाद ;कया, लाल;कला बनाया। ऐसा मालूम होता है ;क इसके बाद से राजदरबार8 म9
फ़ारसी के साथ-साथ ‘जबाने-उद -ू ए-मुअkला' म9 भी रचनाएँ होने लगीं। यह माण मलता है ;क शाहजहाँ के समय म9 पंQडत
च(Fभान Cबरहमन ने बाज़ार8 म9 बोल जाने वाल जनभाषा को आधार बनाकर फ़ारसी शैल म9 रचनाएँ कं। ये फ़ारसी ल<प
जानते थे। अपनी रचनाओं को इ(ह8ने फ़ारसी ल<प म9 लखा। धीरे -धीरे दkल के शाहजहाँनाबाद क उद -ू ए-मुअkला का
मह7व बढ़ने लगा।
उद ू के शायर मीर साहब (1712-1810 ई.) ने एक जगह लखा है -

‘‘दर फ़ने रे ख़ता ;क शेरत बतौर शेर फ़ारसी ब ज़बाने
उद -ू ए-मोअkला शाहजहाँनाबाद दे हल ।''

ज़बान तथा िट
बादशाह दरबार8 क भाषा फ़ारसी थी तथा ल<प भी फ़ारसी थी। उ(ह8ने अपनी रचनाओं को जनता तक पहुँचाने के 
लए भाषा तो जनता क अपना ल , मगर उ(ह9 फ़ारसी ल<प म9 लखते रहे ।
मगर ज़बान (भाषा) अलग चीज़ है , िd4ट (ल<प) अलग चीज। ज़बान है जो बोल जाती है , ल<प है िजसम9 उसे 
लखा जाता है । एक ज़बान को एक से अYधक ल<पय8 म9 लखा जा सकता है तथा एक ह िd4ट (ल<प) म9 एक से
अYधक ज़बान9 लखी जा सकती ह]। रोमन ल<प म9 यरू ोप क ;कतनी भाषाएँ लखी जाती ह]। रोमन िd4ट तो एक ह है
उसी एक िd4ट म9 ;कतनी भाषाएँ लखी जाती ह]। ह(द के बहुत से क<वय8 ने अपनी रचनाएँ फ़ारसी ल<प म9 लखीं
मगर उनक रचनाएँ फ़ारसी भाषा क नह ं, ह(द क ह]। सन ् 1928 ई. म9 जब तक
ु = ने अरबी के थान पर रोमन िd4ट
म9 लखना वीकार ;कया, तो उनक ज़बान नह ं बदल गयी, तब भी वे उसी कार बोलते रहे जैसे पहले बोला करते थे।

18वीं सद के अ(त तक ह(द , ह(दवी, उद,ू रे खता, दे हलवी, ह(दु तानी, आ द शbद8 का ‘‘सनानम'' (समानाथy) Sप म9 
योग होता रहा। नासख, सौदा, मीर तथा आतश ने अपने शेर8 को एकाYधक बार ह(द शेर कहा है तथा ग़ालब ने अपने
रे खता का कई जगह8 पर सनानम (समानाथy) Sप म9 योग ;कया है ।

11

ख़त8 म9 ह(द , उद,ू तथा

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

अंेज़ तथा हद
और उद ू का अलगाव 
Vन उपिथत होता है ;क ह(द एवं उद ू को अलग-अलग जुबान Eय8 माना जाने लगा।
इसके लए अंPज
े 8 क ह(दओ
ु ं एवं मुसलमान8 म9 ‘फूट डालो और राoय करो' वाल नीत को समझना आवVयक है ।
जैसे पाल टEस क अलग तरह क ज़बान होती है उसी कार ज़बान क पाल टEस भी होती है िजसे अंPेजी म9

Glottopolitics कहते ह]। अंPेज8 ने कलक7ता म9 फोट <वलयम कॉलेज क थापना क। इसका उOेVय भारत म9 आने वाले
अंPेज कमचाBरय8 को दे शी भाषाओं का aान कराना तपा दत ;कया गया। उOेVय तो बहुत अ{छा था। मेरा सवाल है ;क

19वीं सद म9 ईसाई मशनBरय8 ने उ7तर भारत म9 इसाई धम के चार-सार के लए बाइCबल के अनुवाद8 म9 िजस सरल
एवं जनसुलभ भाषा-Sप को अपनाया, फोट <वलयम कॉलेज म9 अंPेज कमचाBरय8 को सखाने के लए उस भाषा-Sप म9
भाषा-पाsय सामPी का नमाण Eय8 नह ं ;कया गया। फोट <वलयम के डाइरे Eटर Yगलdाइट ने लkलूलाल को ‘ेमसागर'
के लखते समय ‘यामनी (मस
ु लमानी) भाषा छोड़ दkल आगरे क खड़ी बोल म9 कह' क हदायत Eय8 द । उ(ह8ने सदल 
मg से यह Eय8 ठहराया और उ(ह9 यह आaा Eय8 द ;क वे अWया7म-रामायण क रचना ऐसी बोल म9 कर9 िजसम9 अरबीफारसी के शbद न आने पाव9 । सबसे पहले Yगलdाइट ने सन ् 1804 ई. म9 ‘ ह(द
ु तानी' एवं ‘खर बोल ' का अंतर बतलाते
हुए कहा ;क खर बोल म9 ;कसी भी अरबी एवं फारसी शbद का योग नह ं होता। जनता तो अरबी-फारसी शbद8 का योग
अंPेज8 के आने के पहले भी करती थी उनके ज़माने म9 भी करती थी और आज भी करती है । मगर YगलPाइट के सर पर
तो भाषा के शुhीकरण क Yच(ता सवार थी। वे खर , शुh, Cबना मलावट क, खालस तथा <वशुh भाषा का नमाण कराने
म9 लग गये। 1804 ई. म9 जो अंतर ‘ हंद
ु तानी' एवं ‘खर बोल ' म9 तपा दत ;कया गया था उसे सन ् 1812 ई. म9

‘ ह(दु तानी - रे †ता' एव ‘ ह(द ' का भेद बतलाया गया। सन ् 1812 ई. मे फोट <वलयम कॉलेज के वा<षक <ववरण म9
कै4टन टे लर ने यह भेद बतलाते हुए कहा,

‘‘म] केवल ह(दु तानी या रे Zता का िजd कर रहा हूँ जो फ़ारसी ल<प म9 लखी जाती है । म] ह(द का िजd नह ं कर
रहा हूँ िजसक अपनी ल<प है तथा िजसम9 अरबी-फ़ारसी शbद8 का योग नह ं होता।''
म]ने केवल इशारा ;कया है ;क जनता के Dवारा जो भाषा बोल जाती थी, उसको ;कस कार दो भ(न भाषाओं के
Sप म9 दशत करने के लए ष‡यं रचा गया तथा एक को मुसलमान8 क भाषा तथा दस
ू र को ह(दओ
ु ं क भाषा कहा
गया। एक ह भाषा क दो टाइल9 <वकसत कराकर उनको भ(न भाषाओं के Sप म9 चाBरत साBरत करने तथा तदन(तर
उ(ह9 भ(न धम= के साथ जोड़ दे ने क गहर सािजश रची गई। उद ू को इलाम धम या मुसलमान8 के साथ जोड़ दया
गया। YPयसन तक ने कहा ;क ‘उद'ू इलाम के साथ दरू -दरू तक फैल ।
य द दो ल]lवेज भ(न होती ह] , तो एक भाषा के वाEय का हम दस 
़ ा कर सकते ह] । म]
ू र भाषा म9 अनुवाद या तज़ुम
ह(द के कुछ वाEय तत
ु कर रहा हूँ, <वDवान लोग मुझे यह बतलाने क कृपा कर9 ;क उद ू म9 इनका अनुवाद ;कस कार
होगा।

1. म] रोजाना जाता हूँ।
2. मुझे चार रो टयाँ खानी ह]।

म] भाषा <वaान का <वDयाथy हूँ तथा भाषा<वaान का सDघा(त है ;क भ(न भाषा-भाषी AयिEत परपर बातचीत
नह ं कर सकते, <वचार8 का आदान-दान नह ं कर सकते। जैसे य द मुझे e9च भाषा नह ं आती तथा e9च भाषी AयिEत को
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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3. ह(दु तान और पा;कतान क धरती के पानी तथा आकाश क हवा म9 Eया फरक है ?

मेर भाषा नह ं आती, तो य द वह e9च बोले गा तो म] उसक बात नह ं समझ पाऊँगा तथा म] ह(द म9 बोलँ ूगा तो वह मेर
बात नह ं समझ पाएगा। दोन8 के बीच संकेत8, मुख-मुFाओं, भावभंYगमाओं के माWयम से भले ह भाव8 का आदान-दान हो
जाए मगर भाषा के Dवारा <वचार8 का आदान-दान नह ं हो पाएगा। तथाकYथत ह(द एवं उद ू बोलने वाल8 को परपर एक
दस
ू रे क बात समझने म9 दEकत नह ं होती। वे परपर

बातचीत करते ह]

और एक-दस
ू रे क बात को समझते भी ह] ।

इसलए म] कहता हूँ ;क ह(द तथा उद ू अलग-अलग जुबान नह ं ह]।

भाषा एवं धम
धम क कोई भाषा नह ं होती, ;कसी धम के Pंथ8 क भाषा अवVय होती है । इस ^िट से इलाम के धमPथ

‘कुरान' क ज़बान अरबी है । मुसलमान8 क कोई भाषा नह ं है , मुसलमान8 के इलाम धम क ‘कुरान' क भाषा अरबी है
।इसी कार ईसाइय8 क कोई भाषा नह ं है , ईसाइय8 के धम-Pंथ ‘बाइCबल' (ओkडटे टामेKट) क भाषा हIू है । अरबी एवं
हIू दोन8 ह ‘सामी' या सेमे टक पBरवार क भाषाएँ ह]। इलाम धम एवं ईसाई धम के अनय
ु ायी संसार के अलग-अलग
मुkक8 म9 रहते ह] तथा जहाँ रहते ह] वहाँ क भाषा बोलते ह] । भारत म9 केरल के मुसलमान मलयालम बोलते ह] , तमलनाडु के
मस
ु लमान तमल तथा पिVचम बंगाल के मुसलमान बंगला। बंगलादे श म9 भी जो मुसलमान रहते ह] वे उद ू का नह ं, अ<पतु
बंगला भाषा का योग करते ह] ।

जैसे म] मज़हब तथा भाषा (ज़बान) का संबंध नह ं मानता, वैसे ह जात तथा भाषा, मज़हब तथा जात, तथा मज़हब
एवं कkचर का भी अटूट संबंध नह ं मानता। हम9 इनका फ़क पहचानना चा हए।

जा#त तथा भाषा
एक जात के लोग ायः एक भाषा बोलते ह], इस कारण जात और भाषा का संबंध मान लया जाता है । अमेBरका म9

‘Vवेत' जात अलग है , ‘नीPो' अलग है । वहाँ लाख8 नीPो अंPेजी भाषा बोलते ह]। अंPज
े ी बोलने के कारण इन नीPो लोग8 को
Vवेत जात का नह ं माना जा सकता। इसी कार जमनी म9 दो जातयाँ रहती ह] (1) नाQडक (2) आkपाइन। मगर दोन8
जातयाँ जमन भाषा बोलती ह] । रा◌ेमानया म9 रोमानयन, माlयार (हं गेBरयन), जमन, िज4सी, उdेनयन, सेIेनयन, यहूद ,
तुक अनेक जातय8 के लोग रहते ह] मगर सब रोमानयन भाषा बोलते ह] ।

जा#त तथा धम
सामा(य Aयवहार म9 हम धम को जात से जोड़ने क भूल करते आए ह] : ह(द ू जात, मुिलम जात, ईसाई जात।
वैaानक ^िट से इस तरह क बात9 pामक ह]। अंPज
े जात, Sसी जात, मlयार जात, चैक जात - ये अलग-अलग जातयाँ
ह]। ये सभी ईसाई धम को मानती ह] । भारत एवं पा;कतान म9 भी ‘ईसाई' रहते ह]। Eया इ(ह9 इंlल]ड के ईसाइय8 क अंPज़

जात का माना जा सकता है ?

धम एवं सं&कृ#त
धम को संकृत के साथ जोड़ना भी ठŠक नह ं है । ह(द ू संकृत, मिु लम संकृत, ईसाई संकृत, बौh संकृत है । धम क ^िट से तीन8 दे श बौh धम को मानते ह]। मगर तीन8 दे श8 क भाषाएँ अलग ह], संकृतयाँ अलग ह]।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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जैसे शbद8 का योग होता है मगर ये योग अवैaानक ह]। बौh धम का चार-सार तbबत, लंका, जापान तीन8 दे श8 म9

अंPेज लोग8 ने ह(द
े ी भाषा का भाव ह(द
ु तान पर शासन ;कया। अंPज
ु तान क भाषाओं पर पड़ा। यूरोपीय
कkचर ने ह(द
ु तान क संकृत को भा<वत ;कया।

यह कहना अवैaानक है ;क ईसाई भाषा ने हमार भाषाओं को 

भा<वत ;कया या ईसाई कkचर से हमार कkचर भा<वत हुई।
इKडोनेशया, इराक, ईरान तथा सूडान ये चार8 दे श इलाम धम को मानते ह]। धम क ^िट से ये चार8 मुिलम दे श
ह]। मगर इनक भाषाएँ अलग ह]। इनक कkचर अलग ह] ।
इKडोनेशया म9 आिने<षयन

पBरवार क इKडोनेशयन-बहासा तथा जावी आ द भाषाएँ बोल जाती ह] तथा यहां जावा-

सुमाा-बोनयो आ द Dवीप8 क कkचर है ।
इराक म9 सामी या सेमे टक पBरवार क अरबी तथा कु द श भाषाएँ बोल जाती ह]। इराक मासोपोटामया कkचर का वंशधर
है ।
ईरान म9 इKडो-यूरो<पयन पBरवार क ‘इKडो-ईरानयन' शाखा क फ़ारसी (पशयन) भाषा बोल जाती है तथा इसक ईरानी या
पशयन कkचर है ।
फ़ारसी क ाचीन भाषा का नाम ‘अवेता' था िजसम9 जोरोियन (अवेता म9 ‘ज़रथु') धम Pंथ क रचना हुई थी।
सूडान म9 अeका महाDवीप क संकृत है तथा वहाँ अeकन पBरवार क Qड(का, नूबा आ द भाषाएँ बोल जाती ह] । 

हद&
ु तान एवं इ&लामी सं&कृ#त
म]ने अनेक ;कताब9 पढ़ ह] िजनम9 ह(द
ु तान क कkचर पर इलामी कkचर का असर साफ-साफ दखलाया गया है ।
उदाहरण के लए डॉEटर ताराचंद क ;कताब ‘‘इ(लुयेि(सस ऑफ इलाम ऑन इिKडयन कkचर'' का नाम लया जा सकता
है । ोफ़ेसर हुमायूँ कबीर ने भी ‘अवर हे Bरटे ज़' नामक ;कताब म9 यह बात कह है । इस बारे म9 म] <वDवान8 के <वचार के 
लए न>न तmय तत
ु करना चाहता हूँ -

1/- ;कसी मज़हब के असूल8 का भाव दस
ू रे मज़हब8 पर पड़ता है या पड़ सकता है या ;कसी दे श या जात के लोग8 के
सोचने के ढ़ं ग को भी भा<वत कर सकता है मगर भाषाएँ तो भाषाओं से भा<वत होती ह] तथा संकृतयाँ संकृतय8 से 
भा<वत होती ह]। हमार भाषाओं पर अंPेजी भाषा का भाव पड़ा, हमार कkचर यूरोपीय कkचर से भा<वत हुई, न ;क
हमार भाषाएँ एवं हमार कkचर ‘ईसाई मज़हब' से भा<वत हु‹।

2/- ह(दु तान म9 एक ह दे श, एक ह जुबान तथा एक ह जात के मुसलमान नह ं आए। सबसे पहले यहाँ अरब लोग
आए। अरब सौदागर, फ़कर, दरवेश सातवीं शताbद से आने आरं भ हो गए थे तथा आठवीं शताbद (711-713 ई. ) म9 अरब
लोग8 ने स(ध एवं मुलतान पर कbजा कर लया। इसके बाद तुक„ के तुक तथा अफ़गानतान के पठान लोग8 ने आdमण
;कया तथा यहाँ शासन ;कया। शहाबुOीन गौर (1175-1206) के आdमण से लेकर गल
ु ामवंश (1206-1290), Tखलजीवंश
(1290-1320), तुगलक वंश (1320-1412), सैयद वंश (1414-1451) तथा लोद वंश (1451-1526) के शासनकाल तक
ह(द
ु तान म9 तक
ु  एवं पठान जात के लोग आए तथा तक
ु „ एवं पVतो भाषाओं तथा तुक-कkचर तथा पVतो-कkचर का 
भाव पड़ा।
मुगल वंश क नींव डालने वाले बाबर का संबंध यDय<प मंगोल जात से कहा जाता है और बाबर ने अपने को मंगोल
का ज(म मWय एशया े

के अंतगत फरगाना म9 हुआ था। मंगोल एवं तुक„ दोन8 जातय8 का वंशज बाबर वह ं क एक छोट सी Bरयासत का मालक
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बादशाह ‘चंगेज़ खाँ' का वंशज कहा है और मंगोल का ह Sप ‘मग
ु ल' हो गया मगर बाबर

था। उŒबेक लोग8 के Dवारा खदे ड़े जाने के बाद बाबर ने अफ़गानतान पर कbजा ;कया तथा बाद म9 1526 ई. म9 भारत

पर आdमण ;कया। बाबर क सेना म9 मWय एशया के उoबेक एवं तािज़क जातय8 के लोग थे तथा अफ़गानतान के
पठान लोग थे।
बाबर का उ7तराYधकार हुमायूँ जब अफ़गान नेता शेरखाँ (बादशाह शेरशाह) से युh म9 परािजत हो गया तो उसने

1540 ई. म9 ‘ईरान' म9 जाकर शरण ल । 15 वष= के बाद 1555 ई. म9 हुमायूँ ने भारत पर पुनः आdमण कर अपना खोया
हुआ राoय ा4त ;कया। 15 वष= तक ईरान म9 रहने के कारण उसके साथ ईरानी दरबार साम(त एवं सपहसालार आए।
हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरं गजेब आ द मुगल बादशाह यDय<प ईरानी जात के नह ं थे, ‘मुगल' थे (त7वतः मंगोल
एवं तक
ु र् जातय8 के रEत मgण के वंशधर) ;फर भी इन सबके दरबार क भाषा फारसी थी तथा इनके शासनकाल म9
पशयन कkचर का ह(द
ु तान क कkचर पर अYधक भाव पड़ा।

इ&लाम धमावलंबी अने क जा#तय- क भाषाओं-सं&कृ#तय- का /भाव
इस कार िजसको सामा(य Sप म9

इलाम संकृत का भाव कहा जाता

है

वह इलाम धम को मानने वाल

<वभ(न जातय8 क संकृतय8 के भाव के लए अंPेज8 Dवारा दया हुए एक नाम है , लफ़ज़ है । अरबी, तक
ु „, उŒबेक,
तािज़क, अफगानी या पठानी, पशयन या ईरानी अनेक जातय8 क भाषाओं एवं संकृतय8 का हमार भाषाओं पर तथा
ह(द
ु तान क कkचर पर भाव पड़ा है ।
जीवन के िजस े म9 हमने संकृत के िजस त7व को Pहण ;कया तो उसके वाचक शbद को भी अपना लया।
तुक„ से काल न (क़ाल न) और गल चा (ग़ाल चः), अरबी से कुसy तथा फ़ारसी से मेज़, तZत (त†त) तथा तख़ता

शbद आए।

फ़ारसी से जाम तथा अरबी से सरु ाह तथा साक (साक़) शbद8 का आदान हुआ। कंगरू ा (फ़ारसी-कंगरू ः), गंब
ु द, बुजy (अरबीबुज) तथा मीनार आ द शbद8 का चलन हमार थाप7यकला पर अरबी-फारसी कkचर के भाव को बताता है । कAवाल
(फ़ारसी-क़Aवाल ), गजल (अरबी -ग़ज़ल) तथा ‚बाई शbद8 से हम सब पBरYचत ह] Eय8;क उ7तर भारत म9 कAवाल लोग
कAवाल गाते ह] तथा अ(य संगीतa गजल एवं ‚बाई पढ़ते ह]। जब भारत के वातावरण म9 शहनाई गँज
ू ने लगी ते अरबी
शbद ‘शहनाई' भी बोला जाने लगा। मद
ृ ं ग और पखावज के थान पर जब संगत करने के लए तबले का योग बढ़ा तो
तबला (अरबी-तbलः) शbद हमार भाषाओं का अंग बन गया। धोती एवं उ7तर य के थान पर जब पहनावा बदला तो कमीज
(अरबी-क़मीस, तुक„-कमाश), पाजामा (फ़ारसी-पाजामः), चादर, दताना (फ़ारसी-दतानः), मोजा (फ़ारसी - मोजः) शbद चलत
हो गए।
जब क़ाबुल और कंधार (अफ़गानतान) तथा बुख़ारा एवं

समरकंद दे श ( उŒबे;कतान) से भारत म9 मेव8 तथा

फल8 का आयात बढ़ा तो भारत क भाषाओं म9 अंजीर, ;कशमश, <पता, बादाम, मुनEका आ द मेव8 तथा आलू बुखारा,
खरबूजा, खुबानी (फ़ारसी-खुबानी), तरबूज, नाशपाती, सेब आ द फल8 के नाम- शbद भी आ गए। मुिलम-शासन के दौरान
मWय एशया और ईरानी अमीर8 के र तBरवाज8 के अनुकरण पर भारत के साम(त भी बड़ी-बड़ी दावत9 दे ने लगे थे। यहाँ क
दावत8 म9 गल
ु ाबजामुन, गoजक, बफ„, बालूशाह , हलवा-जैसी मठाइयाँ परोसी जाने लगीं। खाने के साथ अचार का तथा पान के
साथ गुलकंद का योग होने लगा। गमय8 म9 शरबत, मुरbबा, कुkफ का चलन हो गया। नरामष म9 पुलाव तथा सामष म9
कबाब एवं कमा दावत के अभ(न अंग बन गए । gंग
ृ ार-साधन तथा मनोरं जन के नए उपादान आए तो उनके साथ उनके
शbद भी आए । खस का इ, साबुन, Tखजाब, सुमा, ताश आ द शbद8 का योग इसका माण है । कागज़, कागज़ात, कागज़ी जैसे अरबी शbद8 से यह संकेत मलता है ;क संभवतः अरब के लोग8 ने भारत म9 कागज बनाने का चार ;कया। मीनाकार ,

जानकार मलती है ।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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नEकाशी, रसीदाकार , रफूगीर - जैसे शbद8 से कला-कौशल के े म9 शbद8 से जुड़ी जुबान8 के े8 क कkचर के भाव क

बोलचाल क भाषा तथा साहियक भाषा का अतर

बोलचाल क भाषा तथा सा हि7यक भाषा (लटरे र ल]lवेज) का अ(तर ह(द उद ू के संदभ म9 पट है । ;कसी भाषा
को हम उसके ‘Pामर' से पहचानते ह]। म] Monday को Market जाऊँगा- यह जुमला ह(द -उद ू का कहलाएगा। इसका कारण
यह है ;क इसका Pामर ह(द -उद ू का है , इसम9 भले ह अkफाज़ अंPेजी के अYधक ह]।
शbद भाषा म9 आते रहते ह] , जाते रहते ह]। जब जीवन बदलता है , कkचर बदलती है , तो शbद भी बदल जाते ह] । Pामर
के बदलने क रŽतार बहुत धीमी होती है । इसी कारण कोई भाषा उसके Aयाकरण से पहचानी जाती है ।
मुिलम शासन के दौरान तुक„, अरबी, फ़ारसी, उŒबेक, तािज़क, पVतो अ◌ा द भाषाओं के शbद ह(द
ु तान क भाषाओं
मे आकर घुलमल गए।

उद ू बोलने वाले भले ह अरबी-फ़ारसी शbद8 का अYधक योग करते ह8 मगर भारत क भाषाओं म9

घुलमल जाने वाले शbद8 का सभी लोग योग करते ह]। मूल शbद8 के पहले या बाद म9 जुड़कर उनका अथ बदलने वाले
तुक„, अरबी, फारसी के ‘<;फ़िEसस' (उपसग=) एवं ‘स;फ़िEसस' (7यय8) का भी ह(द क सभी उपभाषाओं एवं बोलय8 के
बोलने वाले तथा सा ह7य-रचना करने वाले योग करते ह]। बदलचन, बावजूद, बाकायदा, बेईमान, बेशक आ द शbद8 का सभी 
योग करते ह] िजनम9 ‘बद-', ‘बा-', ‘बे-' उपसग ह]। इसी कार पानदान, पीकदान, जादग
ू र, बाजीगर, सौदागर, जेलखाना,
कारखाना, इलाहाबाद, है दराबाद, अहमदाबाद आ द शbद8 म9 ‘-दान ', ‘-गर ',‘-खाना ', ‘-आबाद ' पर 7यय ह]। ;dया क कुछ
धातुओं का भी सभी योग करते ह]। ख़र दना, गुज़रना, वसूलना, आ द धातुओं का ह(द -सा ह7य म9 भी योग होता है तथा
उद-ू सा ह7य म9 भी। इस कार जो भाव पड़ा है वह शbद8, उपसग=, 7यय8, धातओ
ु ं पर पड़ा है । उद ू पर अYधक, शेष भाषा-Sप8
पर कम।
मगर अरबी, फारसी तथा तक
ु „ के Aयाकरण को हमार भाषाओं ने Pहण नह ं ;कया। ह(द -उद ू के ‘Pामर' म9 कोई
अ(तर नह ं है । अपवादवSप स>ब(धकारक Yच(ह तथा बहुवचन 7यय को छोड़कर। ह(द क उपभाषाओं, बोलय8,
AयवहाBरक ह(द , मानक ह(द म9 बोला जाता है - ‘गालब का द वान'। उद ू क ठे ठ टाइल म9 कहा जाएगा -‘ द वाने गालब

'। [ अब दै नक ह(द समाचार प8 म9 इस कार के योग भी धड़kले से हो रहे ह]।] ह(द म9 ‘मकान' का अ<वकार
कारक बहुवचन वाEय म9 ‘मकान' ह बोला जाएगा। ‘ उसके तीन मकान '। उद ू म9

‘ मकान ' म9 ‘-आत' जोड़कर बहुवचन 

योग ;कया जाता है -‘मकानात'। <वकार कारक बहुवचन वाEय म9 योग होने पर ह(द -उद ू म9 ‘ - ओं ' जोड़कर ‘ मकान8 '
ह बोला जाएगा।‘मकान8 को Yगरा दो ' - यह योग ह(द म9 भी हा◌ेता है तथा उद ू म9 भी। कुछ शbद8 का योग ह(द म9 
ीलंग म9 तथा उद ू म9 पुिkलंग म9 होता हे । ह(द म9 ‘ ताज़ी खबर9 ' तथा उद ू म9 ‘ ताज़ा ख़बर9 '। [ इस कार का अ(तर

‘पिVचमी - ह(द ' तथा ‘ पूवy - ह(द ' क उपभाषाओं म9 कई शbद8 के योग म9 मलता है ।] इनको छोड़कर ह(द -उद ू का
Pामर एक है । चँ ू;क इनका Pामर एक है इस कारण ह(द -उद ू भाषा क ^िट से एक है । इसलए बोलचाल म9 दोन8 म9 फक
नह ं मालूम पड़ता।

‘सा हि7यक भाषा' म9 भाषा के अलावा अ(य बहुत से त7व होते ह]। सा ह7य म9 कथानक होता है , वहाँ ;कसी क ;कसी से
उपमा (समल ) द जाती है , अलकं ृ त शैल (ऑरनेट टाइल) होती है , तीक Sप म9 (स>बॉलक) वणन होता है , छं द (मीटर)
होते ह]। 7येक दे श के सा ह7य क अपनी पर>परा होती है , कथा, कथानक, कथानक- S ढ, अलंकार-योजना, तीक-योजना,

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Cब>ब-योजना, छं द-<वधान क <वशेषताएँ होती ह]।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

एक भाषा - Sप से

‘ ह(द -उद 'ू क दो सा हि7यक शैलयाँ (टाइkस) <वकसत हु‹। एक शैल ‘आधुनक ह(द

सा ह7य' कहलाती है िजसम9 भारतीय तीक8, उपमान8, Cब>ब8, छं द8 तथा संकृत क त7सम एवं भारत के जनसमाज म9 
चलत शbद8 का योग होता है तथा जो दे वनागर ल<प म9 लखी जाती है । ‘उद'ू टाइल के अदबकार8 ने अरबी एवं
फारसी-सा ह7य म9 चलत तीक8, उपमान8, Cब>ब8, छं दो का अYधक योग ;कया। जब अरबी-फारसी अदब क पर>परा के
अनुSप या उससे भा<वत होकर सा ह7य लखा जाता है तो रचना म9 अरबी सा ह7य तथा फारसी-सा ह7य म9 यE
ु त होने
वाले शbद8 का बहुल योग तो होता ह है , उसके साथ-साथ शैल गत उपादान8 तथा लय और छं द म9 भी अ(तर हो जाता है
िजससे रचना क जमीन और आसमान बदले-बदले नजर आने लगते ह]। य द कथानक रामायण या महाभारत पर आधाBरत
होते ह] तो ‘रचना-वातावरण' एक कार का होता है , य द कथानक ‘लैला-मजनँू', ‘युसुफ-जुलेखा', ‘शीर -फरहाद' क कथाओं पर
आधाBरत होते ह] तो ‘रचना-वातावरण' दस
ू रे कार का होता है ।
उपमा ‘कमल' से या चाँद से द जाती है तो पेड़ क एक शाखा पर िजस रं ग और खुशबू वाले फूल Tखलते ह] , उससे 
भ(न रं ग और खुशबू वाले फूल पेड़ क दस
ू र शाखा पर तब Tखलने लगते ह] जब उपमान ‘आबे जमजम', ‘कोहे नूर', ‘शमा',

‘बुलबुल' आ द हो जाते है । बोलचाल म9 तो ‘ ह(द -उद'ू बोलने वाले सभी लोग रोट , पानी, कपड़ा, मकान, हवा, दध
ू , दह , दन,
रात, हाथ, पैर ,कमर, 4यास, 4यार, नींद, सपना आ द शbद8 का समान Sप से योग करते ह] , मगर जब ‘चाँद उगा' के लए एक
शैल के सा ह7यकार ‘च(F उ दत हुआ' तथा दस
ू र शैल के अदबकार ‘माहताब उ‚ज हो गया'' लखने लगते ह] तो एक ह
भाषा-धारा दो भ(न वाह8 म9 बहती हुई दखाई पड़ने लगती है । जब सा ह7य क भ(न पर>पराओं से भा<वत एवं ेBरत
होकर लखा जाता है तो पानी क उन धाराओं म9 अलग-अलग शैलय8 के भ(न रं ग मलकर उन धाराओं को अलग-अलग
रं ग8 का पानी बना दे ते ह]।

अयाय 3. 

हद
भाषा क& अतरदे शीय भू)मका
ऐतहासक, सांकृतक एवं सामािजक कारण8 से स>पूण भारत म9 मानक ह(द के AयावहाBरक Sप का सार बहुत अYधक
है । ह(द तर भाषी राoय8 म9 बहुसंZयक D<वभा<षक-समुदाय D<वतीय भाषा के Sप म9 अ(य ;कसी भाषा क अपेा ह(द का
अYधक योग करता है जो ह(द के सावदेशक Aयवहार का माण है । भारत क राजभाषा ह(द है तथा पा;कतान क
राoयभाषा उद ू है । इस कारण ह(द -उद ू भारत एवं पा;कतान म9 संपक भाषा के Sप म9 Aयवrत है । 
वाधीनता के लए जब-जब आ(दोलन ती) हुआ, तब-तब ह(द क गत का रथ भी ती) गत से आगे बढ़ा। ह(द
रा य चेतना क तीक बन गई। ह(द को राभाषा क मा(यता उन नेताओं के कारण ा4त हुई िजनक मातभ
ृ ाषा
ह(द नह ं थी। 

वाधीनता आ(दोलन का नेत7ृ व िजन नेताओं के हाथ8 म9 था उ(ह8ने यह पहचान लया था ;क <वगत

600-700 वष= से ह(द स>पूण भारत क एकता का कारक रह है , यह संत8, फकर8, AयापाBरय8, तीथ याCय8, सैनक8 Dवारा
दे श के एक भाग से दस
ू रे भाग तक यE
ु त होती रह है । बंगाल के केशवच(F सेन, राजा राम मोहन राय, रवी(Fनाथ ठाकुर,
नेताजी सुभाष च(F बोस, पंजाब के Cब<पनच(F पाल, लाला लाजपत राय, गज
ु रात के वामी दयान(द, रा<पता महा7मा
भाषा ह(द के स>बंध म9 AयEत <वचार8 से मेरे मत क संपुिट होती है ।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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गाँधी, महाराट के लोकमा(य तलक तथा दHण भारत के सुIJमKयम भारती, मोटूBर स7यनारायण आ द नेताओं के रा

जब सं<वधान सभा ने दे श क राजभाषा के स>ब(ध म9 <वचार ;कया तब तक रा य चेतना क धारा का वाह इतना तेज
था ;क सं<वधान सभा ने एकमतेन ह(द को संघ क राजभाषा घो<षत ;कया। सं<वधान सभा म9 इस <वषय पर कोई मतभेद
कभी नह ं हुआ ;क संघ क राजभाषा ह(द को बनाया जाए अथवा नह ं। बहस का मुOा कभी भी यह नह ं रह ;क संघ क
राजभाषा ह(द को बनाया जाए अथवा अंPेजी को। दनांक 8 नव>बर, 1948 को दे श के धानमंी पंQडत जवाहर लाल
नेहS ‘ ने एक अTखल भारतीय भाषा क आवVयकता ' पर बल दे ते हुए यह पट कहा ;क एक वतं दे श को अपनी ह
भाषा म9 राजकाज चलाना चा हए तथा यह भाषा अ(तत: जनता के मWय से ह <वकसत होगी (का(ट Xयू(ट एसे>बल
QडबेXस, दनांक 8 - 11 - 1948)। बहस के मुOे रहे ;क (1) अंPेजी के चलते रहने क अवYध 10 वष रखी जाए अथवा 15 वष
(2) ह(द का वSप कैसा हो (3) अंक दे वनागर के नागर अंक ह8 अथवा अ(तररा य ह8। 26 अगत,1949 को इस
<वषय पर काफ बहस हुई िजसम9 मZ
ु य मO
ु ा अंक8 का था। मतदान म9 समान मत पड़े। यह मत <वभाजन इतना चYचत
हुआ ;क बाद म9 अंPेजी के कुछ <वDवान8 ने यह मथक गढ़ दया ;क सं<वधान सभा म9 इस <वषय पर बहस हुई ;क संघ
क राजभाषा ह(द हो अथवा अंPेजी हो। वातव म9 सं<वधान सभा ने एकमतेन अथात सवस>मत से संघ क राजभाषा
ह(द को वीकार ;कया। 14 सत>बर,1949 को भार तालय8 क गड़गड़ाहट म9 ‘ मुंशी - आयंगर' फामल
ू ा वीकार करते
हुए जब ह(द राजभाषा के पद पर एकमतेन तिठत हुई तो सभा के अWय ने अपने जो उDगार AयEत ;कया वह
त7काल न सभा के सदय8 के मनोभाव8 को आ7मसात करने का लTखत दतावेज है : ‘आज पहल बार हम अपने सं<वधान
म9 एक भाषा वीकार कर रह9 ह] जो भारत संघ के शासन क भाषा होगी। - - - हमने अपने दे श का राजनैतक एककरण
स>प(न ;कया है । राजभाषा ह(द दे श क एकता को कVमीर से क(याकुमार तक अYधक सु^ढ़ बना सकेगी। अंPेजी क
जगह भारतीय भाषा को था<पत करने से हम नVचय ह और भी एक दस
ू रे के नज़द क आय9ग।े '
;कस कार <वभ(न ह(द तर े8 के नेताओं ने ह(द के रा य मह7व का आकलन ;कया तथा ह(द को राभाषा
माना तथा इसके चार सार म9 अपना योगदान दया - इस स>बंध म9 <वपुल सामPी उपलbध है । इस ^िट से भी चुर
सामPी उपलbध है ;क ह(द म9 उन रचनाकार8, सा ह7यकार8, अनुसंधानकताओं एवं चारक8 का ;कतना योगदान है िजनक
मातभ
ृ ाषा ह(द नह ं है ।
के(F य ह(द संथान Dवारा जनवर 2001 म9 भारत Aयापी ह(द के वSप के सवvण पर आधाBरत पBरयोजना का जो 
तवेदन काशत हुआ है उससे यह माTणत है ;क ह(द तर D<वभा<षक समुदाय D<वतीय भाषा के Sप म9 अ(य ;कसी
भाषा क अपेा ह(द का अYधक योग करते ह]। तवेदन ‘ भारतीय बहुभा<षक पBरवेश और ह(द ' शीषक से काशत
है । इसका मह7व AयवहाBरक ह(द भाषा के स>पूण भारत म9 सार एवं Aयवहार को रे खां;कत करने क ^िट से बहुत
अYधक है । ह(द के <वDवान8 को इस शु‚आत को आगे बढाना चा हए।

अयाय 4.

+वदे शी +ववान, वारा हद
वा-मीमांसापरक अययन

18

(;फलॉलािजकल टडीज) (सन ् 1940 ईवी तक)

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

अंPेज8 के शासनकाल म9 भारत म9 केवल CI टश नागBरक ह नह ं आए; हालैKड, जमनी, eांस, Sस एवं अमेBरका आ द दे श8 के
नागBरक भी आए। आगत <वदे शी पादBरय8, कमचाBरय8, शासक8 म9 से बहुत से <वदे शय8 ने gम एवं नठपूवक 
ह(द सीखी
तथा ह(द सीखकर ह(द क पाsय पुतक8, ह(द के Aयाकरण8 एवं कोश8 का नमाण ;कया। उनके अWययन आज के
भाषा वैaानक <वVलेषण एवं पhत के अनुSप भले ह न ह8 ;क(तु ह(द भाषा के वाt.मीमांसापरक अWययन क ^िट से
उनका ऐतहासक मह7व बहुत अYधक है । इन <वदे शी <वDवान8 म9 डॉ0 हानले, डॉ0 YPयसन तथा डॉ0 टनर जैसे Zयात एवं
मेधावी भाषा<वD भी ह] । इनके काय= से न केवल ह(द भाषा का <वकास हुआ अ<पतु भारतीय आयभाषाओं क अWययन पर>परा का माग भी शत हुआ। भारत <वDया के े म9 काय करने वाले <वदे शी <वDवान8 क संZया शताYधक है । आगे
ह(द वाt.मीमांस ा के मुख <वदे शी <वDवान8 एवं उनक कृतय8 का काल dमानुसार पBरचय तुत ;कया जा रहा है :-

1. जान जेशुआ केटलेर (1659-1718)
डच भाषी केटलेर Aयापार के लए सूरत शहर म9 आए। Aयापार के लए इ(ह9 सूरत से दkल , आगरा और लाहौर आना पड़ता
था। भारत आने के बाद इ(ह8ने ह(द सीखी तथा अपने दे श के लोग8 के लए डच भाषा म9 ह(द
ु तानी भाषा का Aयाकरण 
लखा। इस डच मूल क नकल इसाक फान दर हूफ (Isaac Van der Hoeve) नामक हॉलैKडवासी ने सन ् 1698 ईसवी म9
क। इसका अनुवाद दावीद मल ने लै टन भाषा म9 ;कया। हॉलैKड के लाइडन नगर से लै टन भाषा म9 सन ् 1743 ईवी म9
यह पुतक काशत हुई। इस काशत पुतक क एक त कोलकता क नेशनल लाईIेर म9 उपलbध है ।
इस Aयाकरण का <ववरण सवथम डॉ0 YPयसन ने तुत ;कया :-

‘‘अब हम पहले ह(दु तानी Aयाकरण पर आते ह]। जान जेशुआ केटलेर(यह कोटलर, केसलर तथा केटलर भी लखा जाता है )
धम से लूथरन थे। इ(ह8ने शाह आलम बहादरु शाह तथा जहाँदरशाह से डच तनYध के Sप म9 मा(यता ा4त क थी।'' (1)
डॉ0 YPयसन ने अनुमान के आधार पर इसका रचनाकाल सन ् 1715 माना है ;क(तु वातव म9 इसका रचनाकाल सन ् 1698
के पूव का है ।
डॉ0 सन
ु ीत कुमार चाटुoया ने अपने नबंध संPह ‘ऋत>भरा' म9 इस कृत के
स>ब(ध म9 पBरचय एवं <ववरण तत
ु ;कया। डॉ0 चाटुoया के लेख का शीषक है - ‘ ह(द
ु तानी का सबसे ाचीन
Aयाकरण'। डॉ0 चाटुoया का इसके रचनाकाल के स>ब(ध म9 अभमत है -

‘‘हाल]ड के लाइडन नगर म9 कन इंट XयूX नामक एक नवीन सभा है । यह भारत तथा बहृ 7तर भारत क संकृत क
आलोचना के लए था<पत क गई है । उसके मुZय अYधठाता वनामध(य पंQडत डाEटर फां◌ॅगल ने वयं एक प 
लखकर केटलेर के Aयाकरण के <वषय म9 बहुत कुछ तmय बताये ह]। उनसे पता चलता है ;क केटलेर ने ह(द
ु तानी और
फारसी दोन8 भाषाओं के Aयाकरण डच भाषा म9 लखे थे। डच मल
ू क एक नकल इसाक फान दर हूफ (Isaac Van der

Hoeve) नामक हाल]डवासी ने सन ् 1698 ई0 म9 लखनऊ म9 क थी। यह पुतक हालैKड के हाग (Hague) नगर के पुराने
राजकय प8 के संPहालय म9 सरु Hत है ।'' (2) 
तुत लेखक ने जुलाई 1985 म9 नीदरलैKtस क याा के दौरान पुतक क त का अवलोकन ;कया। त का मुख पृ ठ

19 

न>न है :-

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

"instructe off onderwij singe der hindostane en persianse talen nevens hare declinatie en conjugative etc. door
joan josua katelaar, Ellingensem en Gekopiert door Isaacq Van Der Hoeve Van Utreght tot Gechenawe A. 1698.
ह(द के कुछ <वhान8 म9 यह pा(त धारणा है ;क केटलेर ने इस Aयाकरण क रचना सूरत के आसपास Aयापार वग म9 
चलत ह(द के आधार पर क थी। इस pा(त धारणा का नराकरण ह(द म9 सवथम डॉ0 उदयनारायण तवार एवं gी
मैmयु वे{चुर ने ;कया। इस कृत के स>ब(ध म9 डॉ0 उदयनारायण तवार के <वचार तुत करना समीचीन होगा :-

‘‘............... केटलेर कृत ‘‘ ह(दु तानी भाषा'' क रचना आगरे म9 हुई थी। अतएव इस पर Iजभाषा एवं पिVचमी ह(द का 
भाव पट Sप से ^िटगोचर होता है ।........ केटलेर का Aयाकरण अत संH4त है । यह लगभग 30 पृ ठ8 का है ;क(तु
इसम9 ह(द सीखने वाल8 के लए ायः सभी आवVयक बात8 का समावेश है । इसक एक <वशेषता यह भी है ;क इसम9 अत 
युEत ;dयाओं क Sपरे खा, ‘कालरचना-साBरनी' स हत, द गई है । पुतक के अ(त म9 ाथनाओं का ह(द
ु तानी अनुवाद भी
दया गया है । इनम9 ‘‘दस नयम', ‘‘ेBरत8 का <वVवास'', और ‘‘हे <पता'' के अनव
ु ाद उपलbध ह]। जैसा म]ने ऊपर कहा है , इन
गDयांश8 म9 आगरे क ह(द या खड़ी बोल का आरि>भक Sप दे खा जा सकता है और उस पर Iज-भाषा का भाव भी
दखाई पड़ता है ।(3)
gी मैmयु वे{चूर ने कोलकता क नेशनल लाइIेर म9 इस कृत के लै टन अनुवाद को आधार बनाकर इसका ह(द अनुवाद 
तुत ;कया है । (4)
इसक भाषा म9 कह ं-कह ं अशुh Sप मलते ह] जैसे ‘‘म]'' के थान पर ‘‘मे'', ‘‘तु>हारा'' के थान पर ‘‘तो>मारा'' तथा ‘‘तुम''
के थान पर ‘‘तोम''। ‘ने' परसग का योग नह ं हुआ है । ‘‘इसने'' के थान पर ‘‘इ(ने'', ‘‘मुझको'' के थान पर ‘‘मुक8
(मोक8), ‘‘नह ं'' के थान पर ‘‘नई'' का योग हुआ है जो आगरे म9 बोल जाने वाल थानीय ह(द के भाव का Dयोतक
है । अन ू दत ाथनाओं म9 से एक उदाहरण तुत है , ‘‘मे है साहे ब तो>मारा अkला, वह जो तोम एिजि4त गुलामी से नकाल
ले गया, तोम और अkलाहे मेरा बराबर मत ल िजयो।'' (म] भु त>
ु हारा ईVवर हूँ, जो त>
ु हे म‘ दे श क दासता से नकालकर
ले आया, मेरे सवाय तुम और ;कसी ईVवर को न मानना)

2. ब जामन शू:ज़ : <ामा
टका
ह दोता/नका
डेनश भाषी डॉ0 शूkज़ ोटे टे (ट मशनर थे। ये पहले तमलनाडु म9 कायरत थे, बाद म9 है दराबाद आ गए। आपक म7ृ यु
सन ् 1760 ई0 म9 जमनी के हाले नगर म9 हुई। काय करते हुए इनको दाय7व-बोध हुआ ;क भारत म9 आने वाले मशनBरय8
को ह(द
ु तानी भाषा से अवगत कराना चा हए। ह(द
ु तानी भाषा के स>ब(ध म9 लेखक ने अपनी भूमका म9 लखा, ‘‘यह
भाषा अपने आप म9 बहुत ह सरल है । म] जब यह भाषा सीखने लगा तो मुझे अ7यYधक क ठनाई का अनुभव हुआ
............. ले;कन इस भाषा को सीखने क ती) इ{छा के कारण लगातार दो मह ने के पBरgम के फलवSप सार क ठनाई
जाती रह । आर>भ म9 ह म]ने इस भाषा के aान क आवVयक बात8, <वशेष Sप से शbद-dम को लख लया था। धीरे -धीरे
एक Aयाकरण क सामPी एक हो गयी। बाद म9 इसे dमानुसार सजाकर पुतक का Sप दया गया।'' (5)
शूkज़ ने अपना Aयाकरण लै टन भाषा म9 लखा। भूमका क तYथ 30 जून सन ् 1741 ई0 है । काशन तYथ 30 जनवर

1745 ई0 है ।

ह(द
ु तानी भाषा के स>ब(ध म9 तमल भा<षय8 क इस मा(यता का तपादन ;कया है ;क ह(द
ु तानी भाषा या
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

20

इस Aयाकरण म9 कुल छह अWयाय ह] । अWयाय एक म9 वणमाला से स>बि(धत <वचार ह]। इसी अWयाय म9 लेखक ने

दे वनागरम सार भाषाओं क माता है । अWयाय दो म9 संaा एवं <वशेषण, अWयाय तीन म9 सवनाम, अWयाय चार म9 ;dया,
अWयाय पांच म9 अAयय (परसग, ;dया <वशेषण, समु{चय बोधक, <वमया द बोधक) तथा अWयाय छह म9 वाEय रचना का
<ववेचन है । पBरशट म9 ेBरत8 के <वVवास क ाथना, खावंद क बंदगी, बपतसमा, खावंद क रात क हािजर , दस नयम, हे
<पता ाथना का <वVलेषण आ द ह(द
ु तानी भाषा म9 दए गए ह] िजस पर है दराबाद म9 उस समय बोल जाने वाल
दिEखनी ह(द का भाव पBरलHत है । शbद8 को रोमन ल<प एवं फारसी ल<प म9 दया गया है ।
डॉ0 YPयसन ने इस रचना के स>ब(ध म9 लखा है :-

‘‘............... इसका पूरा शीषक है Benjamini Schulzii, Grammatica, Hindostanica, .................. Aयाकरण लै टन म9 है ।
ह(द
ु तानी शbद फारसी-अरबी ल<प म9 अनव
ु ाद स हत दये गये ह]। ..........उ(ह8ने मूध( य वण= क Wवनय8 को और अपने
अनुवाद म9 महााण8 को छोड़ दया है । वे पुSषवाचक सवनाम8 के एकवचन एवं बहुवचन Sप8 से पBरYचत ह] , ;क(तु सकमक
;dयाओं के भूतकाल8 के साथ युEत होने वाले ‘‘ने'' के योग से अनभa ह]।''(6)
लेखक ने कमकारक एवं स>दान कारक का Sप ‘‘कँु '' माना है जो दिEखनी ह(द के भाव के कारण है ।
हुमाकंु (हमको, हमारे लए), मझकंु (मझ
ु े, मेरे लए)। इसी कार ‘‘तझ
ु कंु '' ‘‘कौन कंु '' ‘‘उन कंु '' ‘‘इनकंु '' ‘‘इसकंु '' ‘‘;कन कंु ''

‘‘कोई कंु '' आ द Sप दए गए ह] ।
इस पुतक से एक उदाहरण तत
ु है :-

‘‘छोटा भाई भाग गया कको हमारा बाप मझकुं मालूम ;कये।''
(हमारे <पता ने मुझे समझाया (मालूम कराया) ;क छोटा भाई भाग गया।)

3. कैसयानो बेलग)ती : अ:फाबेतम
ु CDहा/नकुम
आप कैथलक कैपूYचन मशनर इटल के मचेराता नगर के रहने वाले थे। आर>भ म9 इ(ह8ने तbबत म9 काय ;कया था।
बाद म9 नेपाल होकर Cबहार के बेतया नगर म9 आ बसे। इ(ह8ने पटना म9 भी धम चार का काय ;कया। पटना म9 रहकर
इ(ह8ने ‘‘अkफाबेतम
ु I>हानकुम' का लै टन भाषा म9 णयन ;कया। इसका काशन सन ् 1771 ई0 म9 हुआ। इसक <वशेषता
यह है ;क इसम9 नागर के अर एवं शbद सु(दर टाइप8 म9 मु Fत ह] । YPयसन के अनुसार यह ह(द वणमाला स>ब(धी
gेठ रचना है :-

"taking it together, the Alphabetum Brammhanicum is, for its time, a wonderfully good piece of work." (7)
अWयाय एक म9 वर, अWयाय दो म9 मूल Aयंजन, अWयाय तीन म9 Aयंजन8 के उ{चारण के <वशेष <ववरण, अWयाय चार म9
Aयंजन8 के साथ वर8 का संयोग, अWयाय पाँच म9 वर-संयुEत Aयंजन, अWयाय छह म9 संयुEतार और उनके नाम, अWयाय
सात म9 संयE
ु तार क तालका, अWयाय आठ म9 ;कस कार ह(द
ु तानी कुछ अर8 क कमी पूर करते ह] , अWयाय नौ म9
नागर या जनता क वणमाला, अWयाय दस म9 ह(दत
ु ानी वणमाला क लै टन वणमाला के dम और उ{चारण के साथ

अWयेताओं के अ’यास के लए कुछ ाथनाएं भी ‘‘ ह(द
ु तानी ल<प'' म9 द गई ह]। इसम9 लै टन ाथनाओं का ‘‘ ह(द
ु तानी 
ल<प'' म9 केवल ल4यंतरण मलता है । अंत म9 ह(द
ु तानी भाषा म9 ‘‘हे <पता'' आ द ाथनाएं अनू दत ह]।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

21

तुलना, अWयाय lयारह म9 अरबी अंको के साथ ह(द
ु तानी अंको और अर8 म9 संZयाएं तथा अWयाय बारह म9

अWयाय नौ के अंतगत जनता क वणमाला पर काश डालते हुए ले खक ने लखा है :-

‘‘यहाँ जनता के ‘‘नागर '' वण= के स>ब(ध म9 कुछ कहना शेष रह गया है । यह वणमाला साधारणतः घरे लू प8, साधारण
पुतक8, राजनीतक या धामक बात8 को लखने के लए यE
ु त होती है । इसे यहाँ क बोल म9 ‘‘भाखा बोल '' कहते ह]।
इसम9 केवल चcताल स वण ह]।'' (8)
इस रचना क भूमका इटल क राजधानी रोम म9 ;dिVचयन धम के चाराथ संथा ‘‘ोपग(दा फदे '' के अWय योहन
T“तोफर अमादस
ु ी ने लखी। डॉ0 जाज YPयसन ने इस भूमका को बहुत मह7व दया। (9)
भू मका म9 ह(द
ु तानी भाषा क सावदेशक Aयवहार क भूमका पट Sप म9 तपा दत है :-

‘‘ ह(दु तानी भाषा जो नागर ल<पय8 म9 लखी जाती है , पटना के आसपास ह नह ं बोल जाती अ<पतु <वदे शी याCय8 Dवारा
भी, जो या तो Aयापार या तीथाटन के लए भारत आते ह] , युEत होती है । हम इसके लए यह कह सकते ह] ;क यह भारत
क माWयम-भाषा (linqua media) है ।''(10)
इस भूमका से यह पट है ;क सन ् 1771 ई0 म9 भी नागर ल<प म9 लखी जनभाषा ह(द या ह(द
ु तानी का राAयापी 
चार-सार था। जो <वदे शी उस समय भारत म9 Aयापार करने के लए अथवा घूमने ;फरने के लए आते थे, वे भारत आने
के पूव इसको सीखते थे तथा भारत के <वभ(न े8 म9 इसके माWयम से अपना काय स>प(न करते थे।
इन तीन रचनाकृतय8 का ऐतहासक मह7व बहुत अYधक है । इनके समे;कत मह7व क डॉ0 उदय नारायण तवार ने
सारगभत <ववेचना क है :-

‘‘यह तीन8 कृतयाँ, दkल से लेकर है दराबाद तक और सन ् 1650 से लेकर 1800 तक, चलत ह(द के Sप को हमारे
सम कट करती ह]। हम इन तीन8 <वदे शी लेखक8 के त अ7यYधक कृतa ह]।
इ(ह8ने इन Aयाकरण8 को लखने म9 जो यास ;कया है वह वातव म9 तु7य है । चूं;क ये कृतयाँ आरि>भक ह] अतएव
इनम9 ु टयां वाभा<वक ह] । ;क(तु इ(ह9 तैयार तथा तुत करने म9 इन <वदे शी <वDवान8 को ;कतना क ठन पBरgम करना
पड़ा होगा, इसका अनुमान भी आज सहज नह ं है ।'' (11)
इन तीन8 रचनाओं को gी मैmयु वे{चुर ने लै टन से ह(द म9 अनु दत ;कया है । उनक सेवाएं भी शंसनीय ह]। (12)
आगे शेष <वदे शी <वhान8 एवं उनक मुख रचनाओं के नाम दए जा रहे ह]। जहाँ बहुत आवVयक होगा, वह ं संH4त
ट4पTणयाँ तत
ु क जाएंगी :-

4. जॉजF हे डले : (भारत म /नवास सन ् 1763-1771) (म)ृ यु /त6थ सन ् 1798 ई0)
Pैमे टकल BरमाEस ऑन द ैिEटकल एKड वkगर डाइलेEट ऑफ द ह(दोतान ल]lवेज
यह रचना ल(दन से सन ् 1773 म9 काशत हुई। डॉ0 YPयसन ने जाज हे डले के इस Aयाकरण से ह(द Aयाकरण पर>परा
म9 एक नवीन युग का आर>भ माना है ।(13) इसके अनेक संकरण काशत हुए। लखनऊ के मजा मुह>मद ;फतरत ने
इस संकरण के भी कई अ(य संकरण बाद के वष= म9 काशत हुए।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

22

इसम9 पBरवधन एवं संशोधन ;कया। सन ् 1801 ई0 म9 ल(दन से इसका पBरवYधत एवं संशोYधत संकरण काशत हुआ।

(5) जॉन फगस
ुF न : ए Hड1शनर ऑफ द
ह द
ु तान लIJवेज
यह कोश ‘ ह(द
ु तानी-अंPेजी' एवं ‘अंPेजी- ह(द
ु तानी' dम से है । इसका काशन भी ल(दन से सन ् 1773 ई0 म9 हुआ।

(6) जॉन बाथFवक 6गलKाइट : (1759-1841)
(i) इंिlलश- ह(दु तानी QडEशनर , कलक7ता (1787)
(ii) ह(दु तानी Pामर (1796)
Yगलdाइट का मह7व इस ^िट से बहुत अYधक है ;क शा माWयम के Sप म9 इ(ह8ने ह(द का मह7व पहचाना।
मािEवस बेलेज़ल ने अपने गवनर जनरल के कायकाल (1798-1805) म9 अंPेज शासक8 तथा कमचाBरय8 को शHत
करने तथा उ(ह9 भारतीय भाषाओं से पBरYचत कराने के लए कलक7ता म9 4 मई सन ् 1800 ई0 को फोट <वलयम कॉलेज
क थापना क। सन ् 1800 म9 काले ज के ह(द
ु तानी <वभाग के अWय के Sप म9 Yगलdाइट को नयुEत ;कया गया।
आप ईट इं Qडया क>पनी म9 सहायक सजन नयE
ु त होकर आए थे। उ7तर भारत के कई थान8 म9 रहकर इ(ह8ने भारतीय
भाषाओं का aान ा4त ;कया। सन ् 1800 ई0 म9 ह Yगलdाइट के सहायक के Sप म9 लkलू लाल क नयुिEत स ट ;फकेट
मुंशी के पद पर हुई। Yगलdाइट ने ह(द म9 पाsय पुतक9 तैयार कराने क दशा म9 यास ;कया। Yगलdाइट ने भारत
म9 बहुयुEत भाषा Sप को ‘खड़ी बोल ' क संaा से अभ हत ;कया। ‘खड़ी बोल ' को अपने भारत क खालस या खर बोल
माना है । Yगलdाइट ने इसको ‘4योर टल”ग' माना तथा अपने कोश म9 Sterling का अथ ;कया है - Standard, Genuine.
इसी भाषा Sप म9 Yगलdाइट ने लkलूलाल को लखने का नदv श दान ;कया। लkलूलाल ने अपने P(थ ‘ेमसागर' क
भूमका म9 लखा है :-

‘‘ gीयुत गुनगाहक गु नयन-सुखदायक जान Yगल;कBरत महाशय क आaा से स>वत ् 1860 (अथात ् सन ् 1803 ई0) म9 gी
लkलू जी लाल क<व IाJमन गुजराती सह‘ अवद च आगरे वाले ने िजसका सार ले, यामनी भाषा छोड़, दkल आगरे क
खड़ी बोल म9 कह, नाम ‘ेमसागर' धरा''।(14)

7. हे नर है 7रस : Hड1शनर : इंगलश एMड
ह दू तानी, मNास (1790)

8. हे रासम तेपनोवच लेOबदोव (1749-1820)
जैसा ;क इनके नाम से पट है ;क ये Sसी भाषी थे। आप सन ् 1785 से सन ् 1800 ई0 क अवYध म9 भारत म9 रहे ।
भारत म9 रहकर इ(ह8ने ह(द सीखी तथा ह(द का Aयाकरण तैयार ;कया। इनका Aयाकरण अपेाकृत अYधक माTणक है ।
सन ् 1801 ई0 म9 इ(ह8ने यह Aयाकरण अपने Aयय से ल(दन म9 काशत कराया। Aयाकरण P(थ का नाम है - ‘Pामर
ऑफ् द 4योर एKड मEड ईट इंQडयन डाइलेEXस'।

इ(ह8ने ‘ ह(द
ु तानी-अंPेजी' कोश अपने वाWयाय के लए नमत ;कया था। कोश अ7यंत उपयोगी था। फोट <वलयम
कॉलेज के अWयापक8 ने इसका संशोधन ;कया। इसका काशन सन ् 1808 म9 डbkयू हं टर Dवारा कराया गया।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

23

9. कैPटन जोसेफ टे लर (1793-1835)

10. वलयम हं टर (1755-1812)
(i) ह(दु तानी-अंPेजी QडEशनर , कलक7ता (1808) (जोसेफ टे लर Dवारा वाWयाय के 
लए नमत शbदकोश का स>पादन)।

(ii) ए कलेEशन ऑफ् ोवbस : परशयन एKड ह(दु तानी (अपूण कृत)

11. जॉन शे1सपयर : (1774-1858)
(i) <वलयम हं टर के कोश का आपने सन ् 1808 म9 संशोधन ;कया। इसका चतथ
ु  संकरण सन ् 1849 ई0 म9 काशत हुआ
िजसम9 ‘ ह(द
ु तानी-अंPेजी' के बाद ‘अंPेजी- ह(द
ु तानी कोश' भी जोड़ दया गया।

(ii) ए Pामर ऑफ् द ह(दु तानी ल]lवेज (1813) - इसके अनेक संकरण काशत हुए। D<वतीय संकरण- 1818, तत
ृ ीय
संकरण - 1826, चतथ
ु  संकरण - 1843, पंचम संकरण - 1846 आ द।

(iii) इ(ोडEशन टु द ह(दु तानी ल]lवेज (1845)

12. Qांसस Jलैडवन - इनक म7ृ यु सन ् 1813 ई0 म9 हुई। इसके पूव इनका
फारसी- ह(द
ु तानी-अंPेजी कोश सन ् 1805 ई0 म9 काशत हुआ। लेखक को यह कृत 
ा4त नह ं हो सक।

13. वलयम Rाइस : (1780-1830)
(i) ए वोकेबुलर : खरु बोल एKड इंगलश ऑफ् द <ि(सपल व•स आकBरंग इन द ेम सागर ऑफ् लkलू जी लाल क<व,
कलक7ता (1814) - शbद नागर तथा रोमन दोनो ल<पय8 म9 दए गए ह]।

(ii) ह(दु तानी भाषा का Aयाकरण (1828)
(iii) ह(द - ह(दु तानी सलेEशंस (1828)

14. टामस रोएबक : (1781-1819)
(i) एन इं गलश एKड ह(दु तानी नेवल QडEशनर ऑफ् टे िEनकल >स एKड सी फरे िज़ज, कलक7ता (1811) यह छोट सी
है ।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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रचना है । इसका मह7व ऐतहासक है । इससे ह(द के आधु नक पाBरभा<षक कोश8 क पर>परा का आर>भ माना जा सकता

(ii) आपने होBरस हे मैन <वलसन के साथ मलकर <वलयम हं टर (दे 0 dम सं0 9) क अपूण  कृत को पूण ;कया। आपक
म7ृ यु सन ् 1819 ई0 म9 हो गई थी। आपक म7ृ यु के बाद सी0 िमथ ने इसे कलक7ता से सन ् 1824 ई0 म9 काशत
कराया।

15. हो7रस हे मैन वलसन (1786-1860)
इनके योगदान क चचा क जा चुक ह]। (दे 0 dम सं0 14)

16. पादर मैSयू थामसन एडम (भारत म /नवास 1819-1830)
(i) ए Pामर ऑफ् ह(द ल]lवेज ( ह(द भाषा का Aयाकरण) (1827)
gी कामता साद गS
ु ने ह(द क सवमा(य पुतक8 म9 इसे थम थान दया है । (15)

(ii) ह(द कोश संPह ;कया हुआ पादर एडम साहब का, कलक7ता (1829)
डॉ0 Vयाम सु(दर दास ने इसे दे वनागर अर8 म9 आधुनक पDयत का वणdमानुसार संयोिजत पहला एक भाषीय ह(द
कोश माना है । (16)

17. ऐवर ड वलयम येUस (1792-1845)
(i) ह(दु तानी भाषा का पBरचय (Aयाकरण एवं संH4त शbदकोश स हत) (1827)
(ii) ह(दु तानी-अंPेजी कोश, कलक7ता (1847)

18. चा:सF वि:क स आपक म7ृ यु तYथ सन ् 1836 ई0 है । इसके पूव आपने भारत म9 रहकर दे वनागर के वण= के टाइप ढलवाने का काय कर
दे श म9 दे वनागर के टाइप-मुFण क नींव रखी।

19. जेDस राबटF बैलन टाइन(i) आपक म7ृ यु तYथ सन ् 1864 है । इसके पूव आपने ह(द म9 वैaानक शbदावल क समया पर <वचार ;कया।
रसायनशा के एक संदभP(थ का ह(द म9 अनव
ु ाद करने के लए अंPेजी पाBरभा<षक शbदावल क समानाथy ह(द

(ii) Iजभाषा Aयाकरण, लंदन एKड एQडनबरा (1839)

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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शbदावल का नमाण ;कया। शbदावल नमाण करते समय आपने संकृत को आधार बनाया।

(iii) ह(दु तानी Aयाकरण, एQडनबरा (1839)
AयाकरTणक अ’यास8 क ^िट से पुतक का मह7व अYधक है ।

20. डंकन फोVसF : (1798-1868)
(i) ह(दु तानी मैनुअल : संH4त Aयाकरण और संH4त शbदावल , ल(दन (1845) इसका नवीन संकरण सन ् 1850 ई0 म9 
काशत हुआ। जॉन टामसन 4लाXस ने इस पुतक को संशोYधत ;कया। संशोYधत पुतक का काशन सन ् 1874 म9 हुआ।
बाद म9 , लंदन से ह इसके अनेक संकरण काशत हुए।

(ii) ए Pामर ऑफ् द ह(दु तानी ल]lवेज इन द ओBरयंटल एKड रोमन कैरे Eटर, लंदन (1846)
(iii) ए QडEशनर ऑफ् ह(दु तानी एKड इं गलश, लंदन (1847)

21. जोसेफ ट 0 थाDपसन :
(i) QडEशनर इन ह(द एKड इं गलश, कलक7ता (1846)

22. एडवडF बIकहाक ईटवक : (1814-1883)
(i) ह(दु तानी Aयाकरण, लंदन (1847)

23. एडवन ट 0 एटXक सन : (म)ृ यु /त6थ 1890)
(i) टै टकल Qडिdि4टव एKड हटॉBरकल अकाउ(Xस ऑफ् द नॉथ वेटन ो<व(सेस ऑफ् इं Qडया, इलाहाबाद (1847)
(थम खKड म9 पृ ठ 104-105 म9 बु(दे लखंडी का संH4त शbदकोश)

24. हे नर एन0 <ा ट :
(i) एन ऐंlलो- ह(दोतानी वोकेबुलर , कलक7ता (1850)

25. वलयम नासू ल स (1825-1889)

26. गासाY द तासी : (1794-1878)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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था>पसन (दे 0 dम संZया-21) के कोश के तत
ृ ीय संकरण का स>पादन ;कया।

eांसीसी लेखक गासा” द तासी क तभा बहुआयामी थी। ह(द सा ह7य के इतहास क जानकार रखने वाले ह(द
सा ह7य के <वDवान इस तmय से पBरYचत ह] ;क आधुनक ^िट से ह(द सा ह7य का इतहास लखने क पर>परा का
सूपात आपके Dवारा e9च भाषा म9 लTखत ‘इतवार द ला ले7यूर ऐंदई
ु -ए- ऐंद
ू तानी'( ह(दईु तथा ह(द
ु तानी सा ह7य
का इतहास) के काशन से होता है । इस P(थ का काशन पैBरस से सन ् 1839 ई0 म9 हुआ। इसका पBरवYधत एवं
संशोYधत संकरण सन ् 1870 ई0 म9 काशत हुआ।
आपने ह(द भाषा स>ब(धी अनेक मह7वपूण P(थ8 क भी रचना क।

(i) ले ओ7यरू ऐ(दु तानी ए kयूर उबरत, पैBरस (1868)
(ii) ल लांग ऐ ल ले7यूर ऐ(दु तानी (1850)
(iii) ह(द - ह(दोई मु(तखबात, पैBरस (1849)
(iv) ‚द मां द ल लांग ऐ(दईु
(v) ‚द मा द ल लांग ऐ(दु तानी

27. चा:सF Xफलप Cाउनः
(i) द िजkलाह QडEशनर इन द रोमन कैरे Eटर, मFास (1852)

28. रे वर ड के0 वलयम : (1820-1886)
(i) द डे टव एKड अEयूजे टव केसस इन ब9गाल एKड ह(दु तानी, जनरल ऑफ् एशया टक सोसायट , बंगाल Vol. XXI
(1852)

29. एस0 डV:यू फैलन (1817-1880)
(i) ए इं गलश - ह(दु तानी लॉ एKड कामाशयल QडEशनर , कलक7ता (1858)
(ii) (यू इं गलश एKड ह(दु तानी QडEशनर , बनारस (1876)
(iii) ए (यू ह(दु तानी- इंगलश QडEशनर , बनारस (1879)
(iv) QडEशनर ऑफ द ह(दु तानी ोवbस (आर0सी0 टे >पल Dवारा संशोYधत) बनारस (1886)

(i) ह(दु तानी अंPेजी संH4त शbद कोश (1861)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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30. राबटF काटन मैथर (1808-1877)

(ii) ह(दु तानी Aयाकरण (1862)
(iii) मोनयर <वलय>स के ‘ए पै ्रिEटकल ह(दु तानी Pामर (1862) म9 ह(दु तानी पाठावल का संकलन ;कया।

31. सर मो/नयर वलयDसः
ऑEसफोड यू नवसट म9 बोडन-चेयर के ोफेसर, संकृत Aयाकरण, संकृत-अंPेजी कोश, अंPेजी-संकृत कोश आ द
<वVव<वZयात रचनाओं के णेता सर मोनयर <वलय>स ने ह(द Aयाकरण पर भी काय ;कया है ।

(i) ‚डीमे(Xस ऑफ् ह(दु तानी Pामेर (1858)
(ii) ह(दु तानी : ाइमर एKड Pामर (1860)
(iii) ैिEटकल ह(दु तानी Pामर (1862)

32. हे नर जॉजF रै वेट\ : (ज म सन ् 1825 ई0)
संदभ मलता है ;क इ(ह8ने अंगे ्रजी- ह(दुतानी के पाBरभा<षक एवं ा<वYधक शbद8 का कोश बनाया िजसका काशन सन ्

1859 ई0 म9 हुआ। तुत लेखक को यह P(थ उपलbध नह ं हो सका।

33. पादर एथ7रंगटन सा
हब :
(i) भाषा-भाकर अथात ् ह(द भाषा का Aयाकरण, लाहौर (1871)
पादर एथBरंगटन का सन ् 1870 ई0 म9 अंPज
े ी म9 ‘टूडेKXस Pामर ऑफ् द ह(द ल]lवेज' बनारस से काशत हुआ था।
नाथ-वेटन ो<वि(सस के डी0पी0 आई0 ने इस कृत पर पुरकार दे ने के लए लेिटन9ट गवनर को संतु त क।
लेिटने(ट गवनर ने सुझाव दया ;क इसका ह(द अनव
ु ाद ;कया जाए। इस कारण एक वष बाद ह(द म9 ह(द -भाकर
का काशन हुआ। यह ह(द का एकमा Aयाकरण-P(थ है िजस पर CI टश शासन ने पुरकार दान ;कया। यह
<वDयाYथय8 को Wयान म9 रखकर बनाया गया था। कूल8 म9 ह(द शा के लए पाsय पुतक के Sप म9 यह लोक<य
हुआ।

34. जान डाउसन (1820-1881)
(i) ए Pामर ऑफ् उद ू एKड ह(दु तानी ल]lवेिजज, लंदन (1872)
(ii) ह(दु तानी एEसरसाइिजज बुक (1872)

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35. जॉन बीDस (1837-1902)

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

जॉन बी>स स<वल स<वस म9 थे। सन ् 1857 ई0 म9 भारत आने के बाद इ(ह8ने भारतीय भाषाओं का अWययन आर>भ
;कया। इनके अनेक ले ख एशया टक सोसायट बंगाल, रायल एशया टक सोसायट लंदन, इंQडयन ए(ट Eवेर आ द शोध
पCकाओं म9 काशत हुए।
इनका तीन खKड8 म9 काशत ‘क>पैरे टव Pामर ऑफ् द माडन एBरयन ल]lवेिजज़ ऑफ् इंQडया' अत सh P(थ है िजसम9 
स(धी, पंजाबी, ह(द , गुजराती, मराठŠ, बंगला, उQड़या आ द आधुनक भारतीय आय भाषाओं के Aयाकरण8 का ऐतहासक एवं
तुलना7मक अWययन तुत ;कया गया है । 
थम खKड सन ् 1872 ई0 म9 , D<वतीय खKड सन ् 1875 ई0 म9 तथा तत
ृ ीय खKड सन ् 1879 ई0 म9 काशत हुए।

36. जॉन टामसन PलाUस (1830-1904)
(i) ए Pामर ऑफ् द ह(दु तानी एKड उद ू ल]lवेिजज, लंदन (1874) अ(य संकरण 1926, 1941
(ii) ए QडEशनर ऑफ् उद ,ू Eलासकल ह(द एKड इं गलश, लंदन (1911)

37. रे वर ड सेमुअल एच0 केलाग : (1839-1899)
आपसे ह(द Aयाकरण के इतहास म9 एक नए यग
ु का आर>भ होता है । आप अमेBरक पादर थे। आपके समय तक िजन
<वदे शी <वDवान8 ने Aयाकरण P(थ लखे थे, केलाग महोदय ने उन सबका पारायण ;कया। Yच(तन एवं मनन के पVचात ्
अपना Aयाकरण P(थ तैयार ;कया। आपने ह(द भाषा के अ(तगत गढ़वाल , खड़ी बोल , Iजभाषा, क(नौजी, बैसवाड़ी, अवधी,
भोजपुर राजथानी और र वांई आ द को वीकार ;कया है । केलाग ने त7सम और त–व के साथ <वदे शी शbद8 पर भी
<वचार ;कया है । आपके Aयाकरण म9 Wवन, Sप रचना, वाEय <व(यास, शbद ‘ोत, Aय7ु पि7त आ द सभी पर <वचार ;कया गया
है । एक अमेBरक पादर ह(द भाषा क ऐसी सू~म <ववेचना कर सकता है - यह <वमयपूण आJलाद का <वषय है । आपके
P(थ का नाम है -

(i) Pामर ऑफ् द ह(द ल]lवेज (1875-76)
इसका संशोYधत संकरण लंदन से सन ् 1893 म9 काशत हुआ। gी कामता साद गS
ु ने केलाग के Aयाकरण को अंPेजी
म9 लखी ह(द Aयाकरण क पुतक8 म9 थम थान दया है । (17)

38. सर चा:सF जेDस :याल (ज म-सन ् 1845 ई0)

39. आगतस ]डो:फ हानFले : (1841-1918)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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(i) ए ह ऑफ ह(दु तानी ल]lवेज (1880)

आधुनक भारतीय आय भाषाओं के तुलना7मक अWययन करने वाले भाषा<वद8 म9 जमन भाषी हानले का मह7वपूण  थान
है । सन ् 1880 ई0 म9 डॉ0 हानले ने अपना यह सhा(त तपा दत ;कया ;क आय= के भारत पर कम से कम दो बार
आdमण हुए। पहला आdमण करने वाले आय पंजाब म9 बस गए थे। दस
ू र बार िजन आय= ने भारत पर आdमण ;कया वे
मWय एशया से चलकर काबुल नद के माग से YगलYगत एवं Yचाल होते हुए भारत के मWय दे श म9 आए। मWय दे श क
सीमा उ7तर म9 हमालय, दHण म9 <व(Wय पवत, पिVचम म9 सर ह(द तथा पूरब म9 गंगा-जमुना के संगम तक थी। इस दस
ू रे
आdमण का पBरणाम यह हुआ ;क पूव आdमण म9 आगत आय= को तीन दशाओं (पूरब, दHण तथा पिVचम) म9 फैलने के 
लए बाWय होना पड़ा।
मWय दे श अथवा के(F म9 होने के कारण दस
ू रे आdमण म9 आगत आय= को के(F य अथवा भीतर आय के नाम से
अभ हत ;कया गया। पूवागत आय बाहर आय कहलाए।
इसी सhा(त को आधार बनाकर परवतy भाषा वैaानक8 ने आधुनक भारतीय आयभाषाओं का बाहर उपशाखा तथा के(F य
अथवा भीतर उपशाखा म9 <वभाजन ;कया।
डॉ0 हानले ने आधुनक भारतीय आयभाषाओं क ;dयाओं पर ग>भीर अ(वेषण काय ;कया है ।
ह(द भाषा क ^िट से डॉ0 हानले के न>नलTखत काय उkलेखनीय ह] :-

(i) ए कलेEशन ऑफ् ह(द SXस <वद BरमाEस ऑन दे यर डेBरवेशन एKड Eलास;फकेशन
( ह(द क 582 - मूल एवं यौYगक धातुओं का संPह एवं <ववेचन) जनल ऑफ् एशया टक सोसायट , बंगाल (1880)
(ii) Pामर ऑफ् द ईटन ह(द (1880)
(iii) क>परे टव QडEशनर ऑफ द Cबहार ल]lवेज, (सहलेखक-डॉ0 YPयसन), कलक7ता (1885)
(iv) ए क>परे टव Pामर ऑफ् द गौQडयन ल]lवेिजज, लंदन (1880)
इसम9 आधुनक भारतीय आय भाषाओं का तुलना7मक Aयाकरण है । इ(ह8ने चार कार क गौQडयन भाषाएं मानी ह] ।

(क) पूवy गौQडयन - पूवy ह(द , बंगाल , उQड़या
(ख) पिVचमी गौQडयन - पिVचमी ह(द , पंजाबी, गुजराती, स(धी
(ग) उ7तर गौQडयन - गढ़वाल , कुमायूँनी, नेपाल
(घ) दHणी गौQडयन - मराठŠ
यह आधुनक आय भाषाओं क <ववेचना क ^िट से मह7वपूण कृत है ।

40. रे वरे Mड थामस Kावेन (ज म-सन ् 1846 ई0)

(ii) इंगलश- ह(दु तानी एKड ह(दु तानी - इंगलश QडEशनर , लखनऊ (1888)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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(i) द रायल कूल QडEशनर इन इं गलश एKड रोमन उद ,ू बनारस (1881)

(iii) द इं गलश एKड ह(द QडEशनर , लखनऊ (1889)

41. एडवडF हे नर पामर : (1840-1882)
(i) स>पलफाइड Pामर ऑफ् ह(दु तानी, पशयन एKड अरे Cबक, ल(दन (1882)

42. फेH^क पंकॉट (1836-1896)
(i) ह(द मैनअ
ु ल, लंदन (1882) अ(य संकरण 1883, 1890. कामता साद ग‚
ु ने अंPेजी म9 लखी हुई ह(द Aयाकरण क
उ7तम पुतक8 के लेखक8 के अ(तगत <पंकाट का उkलेख ;कया है । (19)

(ii) आपने बाबू अयोWया साद खी कृत ‘खड़ी बोल का पथ' शीषक पुतक क सन ् 1888 ई0 म9 भूमका लखी तथा
उसका स>पादन ;कया।
आपने पंQडत gीधर पाठक तथा वामी दयान(द को जो प लखे उनम9 ह(द को नेशनल ल]lवेज का अYधकार माना। डॉ0
कैलाश च(F भा टया ने सन ् 1888 म9 पंQडत
gीधर पाठक को लखे प का एक अंश उhृत ;कया है िजसम9 आपके CI टश शासन पर डाले जाने वाले उस भाव का
उkलेख है िजसके कारण CIटे न से भारत जाने वाले अंPज
े शासक8 के लए ह(द क पर ा पास करना अनवाय माना
गयाः

‘‘बीस साल पहले म] एकमा यूरो<पयन था, िजसने सरकार पर ह(द के बारे म9 दबाव डाला और दस साल बाद इस नयम
को बनवाने म9 सफल रहा ;क भारत जाने वाले अंPेज8 को ह(द क पर ा पास करना अनवाय ;कया जाए।''(20)

43. जॉजF अCाहम 6<यसFन (1851-1941)
भारतीय भाषाओं एवं सा ह7य के अWययन क ^िट से <वदे शी <वDवान8 म9 डॉ0 YPयसन का नाम सवाYधक मह7वपूण है ।
इस ^िट से यह तmय उkलेखनीय है ;क भारत सरकार के मानव संसाधन <वकास मंी क अWयता म9 के(F य ह(द
संथान क शासी पBरषD ने सन ् 1993 ई0 म9 अपनी बैठक म9 ह(द सेवी स>मान योजना के अ(तगत तवष एक <वदे शी
ह(द सेवी <वDवान को भी स>मानत करने का नणय लया तो सवस>मत से पुरकार का नाम ‘‘डॉ0 जॉज YPयसन
पुरकार'' रखा गया। भारत के रापत ने 14 सत>बर, 1994 को आयोिजत समारोह म9 अपने भाषण म9 थम जॉज
YPयसन स>मान ा4त करने वाले <वदे शी <वDवान को <वशेष Sप से अपनी हा द क बधाई द । (21)
सा ह7येतहास क ^िट से इनक ‘मॉडन वनाEयल
ू र लटरे चर ऑफ् ह(द
ु तान' P(थ का मह7व है । इसका काशन
एशया टक सोसायट ऑफ् बंगाल, कलक7ता Dवारा सन ् 1889 ई0 म9 हुआ। आपने Pामीण शbदावल एवं लोक सा ह7य पर
भी काय स>प(न ;कए। आपने काVमीर भाषा पर Aयाकरण एवं कोश स>ब(धी वत( P(थ8 क भी रचना क। आपके

क उपभाषाओं का भी <वतत
ृ <ववेचन समा हत है :रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

31

Cबहार भाषाओं तथा भारत क भाषाओं से स>बि(धत न>न P(थ8 का उkलेख करना ासंYगक है िजनम9 ह(द भाषा े

(i) से<वन Pैमस ऑफ् द डाइलेEXस एKड सब-डाइलेEXस ऑफ् Cबहार ल]lवेिजज, जनल ऑफ् एशया टक सोसायट , बंगाल
(1883-1887)

(ii) माडन आयन ल]lवेिजज, जनल ऑफ् एशया टक सोसायट , बंगाल, Vol. 64, No.-1
(iii) लंिlविटक सवv ऑफ् इं Qडया
सन ् 1894 ई0 म9 इ(ह8ने भारत के भाषा सवvण का काय आर>भ ;कया। 33 वष= के अनवरत पBरgम के फलवSप यह
काय सन ् 1927 ई0 म9 समा4त हुआ। मूलतः यह lयारह खKड8 म9 <वभEत है । अनेक खKड8 (खKड एक, तीन, पॉच, आठ एवं
नौ) के
एकाYधक भाग ह]। lयारह हजार पृ ठ8 का यह सवvण-काय <वVव म9 अपने ढं ग का अकेला काय है । <वVव के ;कसी भी दे श
म9 भाषा-सवvण का ऐसा <वशD काय नह ं हुआ है । शासनक अYधकार होते हुए आपने भारतीय भाषाओं और बोलय8 का
<वशाल सवvण काय स>प(न ;कया। चँ ू;क आपका सवvण अ7य-<वYध पर आधाBरत था, इस कारण इसम9 ु टय8 का
होना वाभा<वक है । सवvण काय म9 िजन ाWयापक8, पटवाBरय8 एवं अYधकाBरय8 ने सहयेाग दया, अपने अपने े8 म9 बोले
जाने वाले भाषा Sप8 का पBरचय, उदाहरण, कथा-कहाँनयां आ द लखकर भेजीं, वे वन-<वaान एवं भाषा <वaान के <वDवान
नह ं थे। अपनी समत ु टय8 एवं कमय8 के बावजूद डॉ0 YPयसन का यह सवvण काय अभूतपूव है तथा भारत क 
7येक भाषा एवं बोल पर काय करने वाला शोधकता सवथम डा0 YPयसन क मा(यता एवं उनके Dवारा तत

AयाकरTणक ढॉचे से अपना शोधकाय आर>भ करता है । यह कहा जा सकता है ;क आपके काय का ऐतहासक मह7व
अतम है ।

44. टामस हे नर थानFटन (ज म सन ् 1832 ई0)
(i) पेसमेन स8lस eाम पंजाब लटरे चर एKड फॉक लोर, रायल एशया टक जनल,
लंदन,Vol. XVIII (1885)
इस लेख म9 पंजाब ा(त के ह(द एवं उद ू सा ह7य क चचा एवं उनके नमूने दए गए ह] ।

45. Cे टल हे मलन बडले (ज म सन ् 1849 ई0)
आप अमेBरक पादर थे। आपने dावेन (दे 0 dम संZया 40) के Dवारा सन ् 1888 म9 काशत QडEशनर का सन ् 1889 ई0
म9 संशोYधत एवं पBरवYधत संकरण नकाला।

46. जान XKि"चयन :

32

(i) Cबहार ोवbस, लंदन (1891)

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

47. एडवन <ी_ज (ज म सन ् 1854 ई0)
(i) Pामर ऑफ् माडन ह(द (1896)
gी कामता साद ग‚
ु ने अपने ह(द Aयाकरण म9 अंPेजी म9 लखी हुई ह(द Aयाकरण क पुतक8 के ले खक8 के अ(तगत
इनका उkलेख ;कया है । इ(ह8ने तल
ु सीकृत रामचBरतमानस क भाषा के Aयाकरण पर भी नब(ध लखा।

48. वलयम एफ0 जॉनसन (ज म सन ् 1838 ई0)
(i) ह(द कहावत संPह, इलाहाबाद (1898)

49. सर 7रचडF कारनेक बोरोनेट टे Dपल (ज म 1850 ई0)
(i) ए lलासर ऑफ् इंQडयन >स, लंदन (1897)
(ii) सहवीं शताbद म9 ह(दु तानी, इंQडयन ऐ(ट Eवेर , fVol. XXXII (1903)

50. डगलस Kावेन Xफलाट (1860-1930)
(i) ह(दु तानी मेनुअल, कलक7ता (1910)
(ii) अंगे ्रजी- ह(दुतानी शbद-संPह (1911)

51. डV:यू सIट 1लेयर /तदाल
(i) ए क(वसvशन Pामर ऑफ् द ह(दु तानी ल]lवेज, लंदन-हाइडेलबग (1911)

52. डॉ0 एल0पी0 टे सीटॅ र (1888-1919)
इतालवी भाषी डॉ0 टे सीटॅ र ह(द के थम शोधकता ह] िज(ह9 शोधकाय के लए ;कसी <वVव<वDयालय से डॉEटर ऑफ्
;फलासफ क उपाYध ा4त हुई। आप तल
ु सीदास एवं उनक मख
ु रचना ‘रामचBरतमानस' के अनस
ु ंधानकता ह]। आपने अपने
शोध म9 रामचBरतमानस क कथावतु क तुलना बाkमी;क कृत ‘रामायण' क कथावतु से क है । ‘इल रामचBरतमानस ए
इल रामायण' शीषक आपका शोध लेख इतालवी पCका ‘oयोनvल डेला सोसाइटा एशया टका इटालयाना' म9 सन ् 1911 ई0 म9 
काशत हुआ। इसका अंPेजी अनुवाद ‘इंQडयन ऐि(टEवेर ' म9 सन ् 1912 से सन ् 1913 ई0 म9 काशत हुआ।

(i) तुलसीदास क ाचीन बैसवाड़ी के Aयाकरण के कुछ नमूने, जनरल ऑफ् रायल एशया टक सोसायट , लंदन (1914)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

33

भाषा स>ब(धी आपके मुख काय न>न ह] :-

(ii) पिVचमी राजथानी का Aयाकरण, इंQडयन ऐ(ट Eवेर , Vol. XXXXIII & XXXXIV
(1914-1916)

53. ट 0 <ाहम बैल
(i) ह(दु तानी, लंदन (1934)
(ii) टडीज इन नाथ इंQडयन ल]lवेिजज, लंदन (1938)
54. एच0सी0 शोलवगF
(i) क(साइज Pामर ऑफ् द ह(द ल]lवेज, लंदन (1940) D<वतीय संकरण (1950)
कामता साद ग‚
ु ने अंPेजी म9 लखी हुई ह(द Aयाकरण क पुतक8 क सच
ू ी के अ(तगत रे वर9 ड शोलवग के ह(द
Aयाकरण का उkलेख ;कया है ।

55. सर रा:फ लल टनFर
(i) नेपाल QडEशनर (1931)
यह कोश केवल नेपाल भाषा का ह नह ं अ<पतु आधुनक भारतीय आयभाषाओं का थम वैaानक कोश है िजसम9 नेपाल
भाषा के शbद8 क Aय7ु पि7त द गई है तथा अ(य धान आधुनक भारतीय आय भाषाओं के शbद8 से तुलना भी क गई है ।

‘भारतीय आयभाषाओं से स>ब(ध रखने वाला वातव म9 यह थम वैaानक नै‚िEतक कोश है ।' (22)
(ii) ए क>पेरे टव QडEशनर ऑफ् द इंडो-आयन ल]lवेिजज, लंदन (1969) भारतीय आयभाषाओं के ऐतहासक अWययन तथा
भारतीय आय भाषाओं के पुननमाण के अWययन क ^िट से इस P(थ का अतम मह7व है । डॉ0 सुम मंगश
े के ने
इसके काशन को भारतीय आयभाषाओं के लए युगा(तरकार योगदान क संaा से अभ हत ;कया है । (23) तुत P(थ
वाt.मीमांसा परक अWययन क सीमा रे खा से परे तुलना7मक भाषा <वaान एवं कालdमक भाषा <वaान क सीमा के
अ(तगत आता है । इस कारण बीसवीं शताbद म9 D<वतीय महायुh के बाद <वभ(न दे श8 म9 ह(द भाषा से स>बि(धत भाषा
वैaानक अWययन8 के <ववरण के अ(तगत इसका उkलेख ;कया जाएगा।

अयाय 5.

+वदे श, म0 हद
)श1ण : समयाएँ और समाधान
उनम9 ह(द को तीसरा थान दया जाता था । सन ् 1997 म9 सै(सस ऑफ इंQडया का भारतीय भाषाओं के <वVलेषण का
P(थ काशत होने तथा संसार क भाषाओं क Bरपोट तैयार करने के लए यन
ू ेको
ू ेको Dवारा सन ् 1998 म9 भेजी गई यन
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

34

सन ् 1998 के पूव, मातभ
ृ ा<षय8 क संZया क ^िट से <वVव म9 सवाYधक बोल जाने वाल भाषाओं के जो आंकड़े मलते थे, 

Vनावल के आधार पर उ(ह9 भारत सरकार के के(F य ह(द संथान के त7काल न नदे शक ोफेसर महावीर सरन जैन
Dवारा भेजी गई <वतत
ृ Bरपोट के बाद अब <वVव तर पर यह वीकृत है ;क मातभ
ृ ा<षय8 क संZया क ^िट से संसार क
भाषाओं म9 चीनी भाषा के बाद ह(द का दस
ू रा थान है । चीनी भाषा के बोलने वाल8 क संZया ह(द भाषा से अYधक है
;क(तु चीनी भाषा का योग े ह(द क अपेा सीमत है । अंPेजी भाषा का योग े ह(द क अपेा अYधक है
;क(तु मातभ
े ी भा<षय8 से अYधक है ।
ृ ा<षय8 क संZया अंPज

<वVव के लगभग 100 दे श8 म9 या तो जीवन के <व<वध े8 म9 ह(द का योग होता है अथवा उन दे श8 म9 ह(द के
अWययन अWयापन क Aयवथा है । इन दे श8 को हम तीन वग= म9 <वभािजत कर सकते ह] -

(i) वे दे श िजनक भारतीय मूल के आवासी नागBरक8 क आबाद अपने दे श क जनसंZया म9 लगभग 40 तशत या
उससे अYधक है ।

(ii) इस वग म9 वे दे श आते ह] जो ह(द को <वVव भाषा के Sप म9 सीखते ह]।
(iii) वे दे श िजनम9 ह(द -उद ू मातभ
ृ ा<षय8 क बड़ी संZया नवास करती है । इन दे श8 म9 भारत, पा;कतान, बंगलादे श, नेपाल,
भट
ू ान आ द दे श8 के अवासय8/अनवासय8 क रहने वाल <वपुल आबाद स>पक भाषा के Sप म9 ‘ ह(द -उद'ू का येाग
करती है , ह(द -उद ू क ;फkम9 दे खती है , गाने सुनती है , टे ल <वजन के कायdम दे खती है ।
ह(द के वैिVवक Aयवहार एवं योग क संH4त <ववेचना के साथ ह यह <ववे{य है ;क <वदे श8 म9 ह(द शण क मुख
समयाएँ कौन सी ह] तथा उनका AयवहाBरक ^िट से Eया समाधान है , Eया करणीय है । इस स>बंध म9 सूवत शैल म9
कुछ <वचार ह(द के <वDवान8 के लए तुत ह]।

(1) 7येक दे श के शण तर एवं ह(द शण के ल~य8 एवं उOेVय8 को Wयान म9 रखकर ह(द शण के पाsयdम
का नमाण करना चा हए। पाsयdम इतना Aयापक एवं पट होना चा हए िजससे शक एवं अWयेता का मागदशन हो
सके।

(2) <वदे श8 म9 ह(द शण करने वाले शक8 के लए शण-शण एवं नवीकरण पाsयdम8 का आयोजन एवं संचालन
होना चा हए ।

(3) gवण कौशल, वाचन कौशल, वातालाप कौशल एवं रचना कौशल के शण क ^िट से सामPी के नमाण क पBरयोजना
बननी चा हए एवं उस दशा म9 <वDवान8 को काय स>प(न करना चा हए।

(4) <वदे शी अWयेताओं के भाषा शण के उOेVय एवं ल~य को Wयान म9 रखकर आविृ 7त के आधार पर आधारभूत शbदावल
के नमाण का काय होना चा हए।

(5) दे वनागर लेखन तथा ह(द वतनी Aयवथा क ^िट से न>न लTखत े8 म9 काय स>प(न होने चा हय9 :

( ख ) एक ल<प Yच(ह से Sपा(तBरत होने वाले अ(य ल<प Yच(ह8 का dमक <वतार।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

35

( क ) दे वनागर ल<प के ल<प Yच(ह8 का <वVलेषण।

( ग ) मााओं से युEत Aयंजन एवं संयुEत Aयंजन तथा ह(द वतनी क अ(य <वशेषताओं के अनुSप वण= से बनने वाले
शbद8 के अनुयोगा7मक पाठ8 का नमाण।

(6) वात<वक भाषा Aयवहार को आधार बनाकर AयावहाBरक ह(द संरचना - Wवन संरचना, शbद संरचना तथा पदबंध
संरचना - के अनुयोगा7मक पाठ8 के नमाण के े म9 <वDवान8 को काय करते समय समत सामPी का नमाण
अभdमत Sप म9 करना चा हए तथा शाथy के अYधगम क पुिट के लए 7येक Cब(दु पर <वभ(न अ’यास8 क
योजना भी होनी चा हए।

(7) ह(द के आथy योग8 के लए सामPी का नमाण होना चा हए।
(8) जीवन के <व<वध योजन8 क स<h के लए ह(द भाषा के आधारभूत AयाकरTणक एवं संरचना7क Cब(दओ
ु ं क
अन
ु ताBरत सामPी नमत होनी चा हए।

(9) ह(द सा ह7य का अWययन करने वाले <वदे शी अWयेताओं के लए ‘ ह(द सा ह7य के इतहास' का नमाण करते समय 
7येक काल क मुZय धाराओं, मुख विृ 7तय8, सh रचनाकार8 तथा उनक रचनाओं का <ववरण भारत के ह(द समाज
के उस काल क सांकृतक, सामािजक एवं दाशनक पृ ठभूम को Wयान म9 रखकर तत
ु क जानी चा हए।

(10) ह(द क संकृत :- ह(द सा ह7य म9 अभAयEत सांकृतक संकkपनाओं से पBरYचत कराने के लए सामPी का 
नमाण सYच होना चा हए।

(11) क>4यूटर साYधत ह(द भाषा शण क भूत सामPी के नमाण के लए ऐसी पBरचालन णाल का <वकास ;कया
जाना चा हए िजससे ह(द म9 काम करना अYधक सु<वधाजनक हो◌े। ह(द इ(टरफेस सभी 4लेटफाम= पर उपलbध हो,
िजससे सारे आदे श उपकरण प Xटयाँ, संवाद क तथा मदद ह(द म9 उपलbध हो सके।

(12) <वदे शी अWयेताओं को Wयान म9 रखकर ‘पेल चैकर' तथा ‘आन-लाइन शbदकोष' क सु<वधा का <वकास ;कया जाना
चा हए।

(13)ल ला बोध क तज पर जीवन के <व<वध योजन8 क स<h के लए ह(द म9 वयं शण पैकेज क दशा म9 गत
एवं <वकास होना चा हए।

(14) क>4यूटर आधाBरत भाषा योगशाला के उपयोग म9 आने वाल सामPी का नमाण होना चा हए।
(15) डाउनलोड करने वाल अनेक सh साइट8 पर <वVव क अ(य सभी मख
ु भाषाएं उपलbध ह] ;क(तु ह(द नह ं है ।
इसके लए साथक पहल क जानी चा हए।

(16) महा7मा गाँधी ह(द <वVव<वDयालय, वधा, के(F य ह(द संथान, आगरा आ द संथाओं को ह(द म9 ऐसे पॉट ल
<वकसत करने चा हए िजससे कोई भी <वदे शी अWयेता ह(द से सबि(धत 7येक जानकार ा4त कर सके। लाइनेEस और
ओपन सोस साटवेयर के जBरए इन संथाओं को ह(द का लोकलाइजेशन Pुप <वकसत करना चा हए जो ह(द भाषा क
Wवन, ल<प, शbद, भाषा योग आ द के स>ब(ध म9 अपने <वचार ह(द म9 दे सक9, ह(द म9 अभले ख एवं ई-मेल
अYधकाYधक भेज सक9, <वभ(न <वषय8 पर अपने <वचार तत
ु कर सक9, तुत <वचार-सामPी म9 संशोधन कर सक9। ह(द 
भूत सामPी क4यट
ू र पर उपलbध होनी चा हए।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

36

म9 साटवेयर नमत का काय ती) गत से होना चा हए। ह(द म9 aान-<वaान क 7येक शाखा के 7येक <वषय पर

अयाय 6. 

+वतीय महाय5
ु के प6चात ् +वदे श, म0 हद
भाषापरक अययन
<वदे श8 म9 ह(द सा ह7य के े म9 चुर एवं मह7वपूण काय हुआ है । तुत आलेख म9 उन अनेक दे श8 के ह(द सा ह7य
के सजक8 के योगदान क चचा करना अभीट नह ं है । तुत लेख म9 ह(द भाषा क शण सामPी , वातालाप , शbदकोश
तथा ह(द - Aयाकरण एवं ह(द भाषा के भाषा वैaानक अWययन के स>ब(ध म9 ह संेप म9 <वचार ;कया जाएगा।

1 हद
भाषा क पा3य पु&तक4 (1) संयE
ु त राoय अमेBरका - यहां के <वभ(न <वVव<वDयालय8 के हंद ाWयापक8 ने हंद भाषा क अनेक पाsयपुतक8 क
रचना क है । मुख पुतक9 अPलTखत ह] -

1. हे नंlसवाkड - पोकन हंदु तानी - दो खKड (सन ् 1945) अमेBरकनकcसल आफ लनvड सोसाइट , वाशंगटन
2. फेअरब]Eस : हंद एEसरसाइजेज एKड र Qडंlज (सन ् 1955) कोनvल यूनवसट ेस, (यय
ू ाक
3. ग>पज : हंद र डर - भाग - 1 (1960) यूनवसट आफ केल फोनया, बकले
4. हा ट नः हंद बेसक र डस - यू नट 1-8 (1960) से(टर फार ए4लाइड लंिlविटक ऑफ मॉडन ल]lवेजेज, वाशंगटन
5. अlयल
ू र तथा Iूस आर.े. तथा अ(य (ीत कौल, जौहर तथा Iजे(F संह) : ए बेसक कोस इन हंद (1961) मशीगन
यूनवसट

6. ग>पज एवं जून Sमर तथा अ(य (डॉ0 अमर बहादरु संह एवं सी0एम0 नईम) : क(वसvशनल हंद - उद ू - दो खंडो म9
(1962-63) यू नवसट ऑफ केल फोनया

7. फेअरब]Eस तथा पंQडत : हंद : ए पो;कन एोच (1965) दकन कॉलेज, पूना
8. फेअरब]Eस तथा डॉ0 मg : पोकन एKड Bर टन हंद (1966) कानvल यूनवसट ेस, (यूयाक
9. डॉ0 यमुना काच‚ : इंटरमीQडएट हंद कोस (1966) इलनाय यू नवसट
10. ऊषा सEसेना : इंटरमीQडएट हंद <वद lलोसर एंड Eचरल नोXस (1967), <वकोि(सन यू नवसट , मैडीसन

(2) सो<वयत Sस - डॉ0 द मश7स, डॉ0 उलि7सफेरोव एवं डॉ0 गोयून 
ोव ने तीन खKड8 म9 हंद भाषा क पाsयपुतक का 
नमाण ;कया है िजसका काशन माको से 1979 से 1983 क अवYध के बीच हुआ। भारतीय राजदत
ू ावास के जवाहर लाल
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

37

11. Bरचड एम है Bरस तथा रमानाथ शमा : ऐ बेसक हंद र डर (1969) कानvल यूनवसट ेस, (यूयाक

नेहS के(F ने इ(टरनेट Dवारा ह(द शण कायdम आर>भ ;कया है । शणाथy इ(टरनेट पर ह(द के पाठ पढ़ सकते
ह]। इलैEानक ह(द -Sसी शbदकोश भी उपलbध है ।

(3) जमनी - ह>बोkट <वVव<वDयालय म9 सन ् 1967 म9 ह(द Aयाकरण गाइड का नमाण हुआ। डॉ0 लोठार लु7से तथा डॉ0
बहादरु संह Dवारा नमत ‘D<वतीय भाषा के Sप म9 हंद ' का काशन सन ् 1970 म9 हुआ।

(4) CIटे न (इंlल]ड) - डॉ0 मैकPेगर के संपादक7व म9 ‘एEसरसाइिजज इन पोकन हंद ' शीषक पाsयपुतक सन ् 1970 म9 
नमत हुई। सन ् 1972 म9 इनक ‘ऐन आउट लाइन ऑफ हंद Pामर <वद एEसरसाइिजज' शीषक पुतक काशत हुई।

(5) जापान - ो0 Eयूयादोइ ने हंद Aयाकरण और पाठमाला (1963) तथा हंद पाठमाला (1966) का नमाण ;कया। ो0
का7सुरो कोगा के स>पादक7व म9 1966 म9 हंद पाठमाला भाग - । तथा 1977 म9 हंद पाsयपुतक भाग-॥ काशत हु‹।
जापान म9 अ(य पाsयपुतक9 भी नमत हुई ह] िजनम9 ो0 तोमओ मज़ोकामी कृत ‘ हंद : Pेमे टकल मेनअ
ु ल' (अ’यास
पुितका)
उkलेखनीय है िजसका काशन dमशः 1980 एवं 1999 म9 हुआ। ह(द भाषा क ारि>भक पाsयपुतक8 म9 ो0 का7सुरो
कोगा कृत ‘ ह(द वेशका', ोफेसर एइजो सावा कृत ‘ ह(द वेशका'- जापान म9 दे वनागर ल<प म9 काशत ह(द क
पहल पुतक, तथा ो0 तोशओ तानाका एवं ोफेसर काजु हको मािजदा कृत ‘एEसेस ह(द ' का भी उkलेख ;कया जा
सकता है ।

(6) चेक - डॉ0 <व(तसvथ पोर Œका क ‘ ह(दोट ना' ( हंद भाषा का पाsयdम) एक उkलेखनीय पाsयपुतक है िजसका सन ्
1963 म9 ाग के टे ट पैडागािजकल पिbलशंग हाउस से काशन हुआ। इस पाsयपुतक क <वशेषता यह है ;क इसम9 चेक
भाषा के साथ-साथ अंPेजी म9 भी AयाZयाएं तत
ु ह] ।

(7) हं गर - आपाद दै Iै7सैनी (1911-1984) ने हंद क दो पाsयपुतक9 तैयार कं :
1. नौसTखय8 के लए हंद क पाsयपुतक , बुदापेत (1959)
2. हं गर भा<षय8 के लए हंद भाषा पाsयdम, बुदापेत (1983)

(8) रोमानया - रोमानयन छा8 के लए डॉ0 <वDयासागर ने सन ् 1972 म9 ‘कुस द ल>बा हंद ' तथा डॉ0 सूरजभान संह
ने सन ् 1980-81 म9 ‘मेनअ
ु ल द ल>बा हंद ' (दो भाग) का नमाण ;कया। बुकारे त <वVव<वDयालय ने इनका काशन

38

;कया।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

(9) पेन - पेनश छा8 के लए gीमती आ(ना थापर ने ‘Pामे टका द हंद ' शीषक हंद भाषा पाsयपुतक लखी िजसका 
काशन अkह>Iा काशन संथान, मेQ˜ड से सन ् 1987 म9 हुआ।

(10). कोBरया - कोBरयन छा8 के लए ो0 उ-जो-;कम ने ‘ हंद पाठ' एवं ो0 ह]गजंग सू ने ‘ हंद उ{चारण शण' का 
णयन ;कया है ।

(11) Cनडाड एKड टुबेगो - केरे Cबयन दे श8 म9 ह(द क पाsयपुतक8 क रचना क ^िट से Cनडाड का नाम उkलेखनीय
है । इस दे श के छा8 को हंद पढ़ाने क ^िट से कमला रामलखन ने ‘ हंद भात' शीषक से 11 आधारभूत पाsयसामPी
का नमाण ;कया है । इसका काशन दे वनागर पिbलशस Dवारा 1993 म9 ;कया गया ।

(12) चीन - ोफेसर िजन दंग हान, ोफेसर थाड. रन हू एवं ोफेसर मा मां कांग ने ह(द क बुनयाद पाsय पुतक
(चार भाग) का णयन ;कया है ।

(13) उoबे;कतान - ह(द भाषा क तीन पाsय पुतक8 का नमाण ोफेसर रहमान Cबरद मुह>मद जानोव ने ;कया है ।

(14) थाईल]ड - डॉ0 चांलोt. सारबदनूक ने ‘ ह(द भाषा' (व सीखनी, थाई भा<षय8 के लए) का नमाण ;कया है ।

2 वातालाप-

Sस से हंद भाषा क जो पाsय पुतक9 काशत हुई ह] उनम9 हंद म9 बातचीत के भी नमन
ू े ह]। वातालाप

पुितकाओं क ^िट से चेक <वDवान डॉ0 ओदोले न मेकल कृत ‘ हंद वातालाप', जमन के डॉ0 (gीमती) डगमर मक™बा
अंसार तथा एम0 अहमद अंसार क ‘जमन- हंद बातचीत' तथा जापान के ो0 Eयूया दोई क ‘ हंद -जापानी वातालाप', 
ोफेसर हदे आ;क इशदा दाइतो बुंका कृत ‘AयावहाBरक हंद वातालाप' एवं ोफेसर नोBरओ ओकागुYच एवं उनक धमप7नी
gीमती योशको कृत ‘सरल ह(द वातालाप' अYधक चYचत ह] ।

3 श6दकोश<वदे श8 म9 िजन <वदे शी भाषाओं के साथ हंद के शbदकोश काशत हुए ह] उनम9 अंPज
े ी, जमनी, हं गेBरयन, रोमानयन, Sसी,
उoबेक, जापानी मख
ु ह]।

1. अंPेजी - ह(द कोश : फादर कामल बुkके
2. ह(द - अंPेजी कोश : डॉ0 आर0एस0 मेPेगर (क9CIज)

4. हंद - जमनी शbदकोश : एBरका Eलेम
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

39

3. हंद -जमनी शbदकोश : डॉ0 हे kमट नेिपताल

5. जमनी- हंद कोश : डॉ0 gीमती मारPेट गा7सलाफ
6. ह(द - eांससी कोश : नकोल बलबीर
7. हं गेBरयन - हंद शbदकोश : पेतरै कोश
8. हंद -रोमानया शbदकोश : डॉ0 <वDयासागर दयाल - सहलेखक-इयोन
पेतेरेकु

9. रोमानया - हंद शbदकोश : डॉ0 <वDयासागर दयाल - सहलेखक इयोन
पेतेरेकु

10. हंद -Sसी कोश : डॉ0 अलेEजेइ पेो<वच बाराि(नकोव
11. Sसी- ह(द शbदकोश - जे0एम0 दमश7स
12. संH4त ह(द -Sसी एवं Sसी- ह(द शbदकोश - जे0एम0 दमश7स
13. संH4त ह(द कोश ( ह(द -जापानी तथा जापानी- ह(द ) : ो0 Eयूयादोइ
14. जापानी- ह(द शbदकोश - ोफेसर का7सुरा कोगा
15. ह(द - जापानी शbदकोश - ोफेसर का7सुरा कोगा
16. ह(द -चीनी कोश - पेइYचंग <वVव<वDयालय के ह(द अWयापक8 Dवारा लगभग 30 वष पूव नमत शbद कोश (लगभग
45 हजार ह(द शbद)
17. बहृ द ह(द -चीनी कोश - पेइYचंग <वVव<वDयालय के ह(द अWयापक8 Dवारा नमत लगभग 90 हजार ह(द शbद8 का
कोश

18. ह(द -उoबेक शbदकोश : डॉ0 श0 अहमेदोव

4 हद
-भाषा का भाषा वै8ा#नक अययन

1- संयुEत राoय अमेBरका -

e9कलन साउथवथ : ‘द टूड9Xस हंद - उद ू Bरफर9 स मैनुअल
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

40

यमन
ु ा काच‚ : ‘एन इंोडEशन टू हंद स(टै Eस

2- इंlल]ड - ो0 आर0एस0 मैकPेगर : आउटलाइन ऑफ हंद Pामर <वद एEसरसाइिजज'। सन ् राkफ लल टनर के भाषा
वैaानक काय= का मह7व न केवल ह(द अ<पतु भारतीय आयभाषाओं के अWययन क ^िट से है । इनक QडEशनर ने
भारतीय भाषा वैaानक अWययन पर>परा के नए अWयाय का सूपात ;कया है ।

3- जमनी - डा0 gीमती मारPेट गा7लाफ : ‘ हंद Aयाकरण'

4- Sस - डॉ0 लाoमन द मश7स : ‘ हंद Aयाकरण क Sपरे खा'। ह(द भाषा के <वभ(न प8 पर काय करने वाले Sसी
<वDवान8 म9 रोमश7स, चेनशेव, लपरोAक तथा <पयो एले Eसे<वच बाराि(नकोव के नाम सवाYधक उkलेखनीय ह]।

5- ;फ(ल]ड - डॉ0 बतल तEकनेन ने ‘ हं दन ;कएलओि4प' ( ह(द का Aयाकरण) लखा जो हे लसंक से सन ् 1991 म9 
काशत हुआ।

6. जापान - जापान के भाषा वैaानक8 ने हंद के <व<वध प8 पर भाषा वैaानक ^िट से अनेक काय स>प(न ;कए ह]। 
काशत पुतक8, शोधबंध8 एवं लेख8 क सूची ो0 का7सुरो कोगा ने ‘जापान म9 हंद अWययन-अWयापन क िथत' शीषक
लेख म9 तत
ु क है । इनम9 न>नलTखत अWययन अYधक उkलेखनीय ह] :

1- इ(दोबु(तेन ् ( ह(द Aयाकरण) : ो0 एइजो सावा 2. हंद WवनPाम और वतनी : तेजीसाकाता 3. ह(द फोनोलॉजी :
नोBर हको उYचदा 4. हंद भाषा का पBरचया7मक Aयाकरण : तोशओ तानाका एवं काजु हको मािजदा 5. आधुनक हंद म9
संयुEत ;dयाएं : तोमयो मज़ोकाम 6. मुkला वजह कृत ‘ सबरस ‘ क दिEखनी ह(द का भाषा <वVलेषण : ोफेसर
अ;करा ताकाहा<ष।

2- ोफेसर काजु हको मािजदा ने क>4यट
ू र क सहायता से ेमच(द के गोदान म9 युEत सभी ;dयाओं का भाषा वैaानक
अWययन स>प(न ;कया है । यह अWययन वणानुdम तथा 7येक ;dया क उप(यास म9 आविृ 7त स हत स>प(न हुआ है ।

7. चीन - ोफेसर यन ह8ग युएन का ह(द Aयाकरण (चीनी भाषा म9 ) उपलbध है ।

41

8. थाईलैKड - डॉ0 चालोड. सारबDनक
ू ने AयावहाBरक ह(द Aयाकरण क रचना क है ।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

अयाय 7. 

+वतीय महाय5
ु के प6चात ् +वदे श, म0 हद
साह:य सज
ृ न एवं साह:य समी1ा
संसार के अनेक दे श8 म9 आवासी भारतीय8 के Dवारा <वपुल माा म9 ह(द सा ह7य का सृजन ;कया जा रहा है । इस दशा
म9 अनेक <वDवान8 ने काय ;कया है । इस आलेख म9 <वदे शी ह(द सा ह7यकार8 के अतBरEत मार शस, फजी, सूर नाम आ द
दे श8 के भारतीय मूल के नागBरक8 के Dवारा रYचत ह(द सा ह7य के स>बंध म9 ह <वचार ;कया जाएगा। इस आलेख म9
अमेBरका, कनाडा, इंगलैKड आ द दे श8 म9 भारत म9 ज(मे तथा अब उन दे श8 म9 बसे हुए अथवा नवास करने वाले आवासी
भारतीय ह(द सा ह7यकार8 के सा ह7य के स>ब(ध म9 <वचार नह ं ;कया जा रहा है । मार शस, फजी, सूर नाम आ द दे श8 म9
हंद के रचनाकार8 क संZया भी सैकड़8 म9 है । इस लेख म9 सभी रचनाकार8 के नाम दे ना संभव नह ं है । यहां हंद के मुख
रचनाकार8 का पBरचय एवं उन सh Pंथ8 का उkलेख ;कया जाएगा िजनम9 रचनाकार8 क रचनाएं संकलत ह] अथवा
िजनम9 रचनाकार8 का पBरचय तत
ु है :-

1- मार शस - 1971 म9 काशत ‘वासी वर' म9 मार शस के 11 क<वय8 क क<वताएं संकलत ह] । मुख क<व ह] बज
ृ े(F भगत, सोमद7त बखौर तथा अभम(यु अनत। कहानीकार8 म9 मुख ह] - gीमती भानुमती नागदान, हBरनारायण
महावीर, रामदे व धुर(दर, ईVवर जागा संह। डॉ0 कामता कमलेश Dवारा संकलत ‘मार शस क हंद कहानयां' शीषक Pंथ म9
मार शस के हंद कहानीकार8 क 23 कहानयां संPह त ह]। गगनांचल के मार शस अंक म9 8 हंद रचनाकार8 क सा हि7यक
कृतय8 का तथा 10 हंद लेखक8 के लेख8 का समावेश है । रचनाकार ह] - सhहत एकांककार, कथाकार एवं लेखक
अभम(यु अनत तथा गंगाद न; कथाकार ह] - पूजानंद नेमा तथा सोनालाल नेमधार तथा क<व ह] - परमेVवर तवार , हBर
नारायण सीता, बज
ृ े(F भगत मधुकर एवं इ(Fदे व भोला। लेखक ह] - 1. जी ब(धु.2. अन‚h Dवारका 3. धमवीर धूरा शाी

4. पुल7य ‚Fमन 5. खे. ल ला 6. धनदे व बहादरु 7. अजामल माताबदल 8. राजव(ती अजोWया 9. स7यदे व ीतम 10.
मुनीVवर लाल YचंतामTण।
मार शस क हंद चाBरणी सभा ने ह रक महो7सव के अवसर पर ‘काAय पBरचय' शीषक पुतक का काशन ;कया िजसम9 
व0 सय 
साद भगत, जयSप दोसया, सोमद7त बखौर जैसे gेठ सा ह7यकार8 क रचनाओं के साथ-साथ वतमान था<पत
ू 
क<वय8 - हBरनारायण सीता, जनाद न काल चरण, सYचदानंद शमा, परमेVवर Cबहार ‘शवर7न', डॉ0 वीरसेना जागा संह, डॉ0
मन
ु ीVवर लाल YचंतामTण, हे मराज स(
ु दर, राजव(ती अजोWया ‘नेहा', जयव(ती रं गू ‘शोभा' क कृतयां संकलत ह]। gी <वणु 
भाकर ने अपने एक लेख म9 मार शस के अनेक रचनाकार8 का उkलेख ;कया है । मार शस के सवाYधक सh रचनाकार ह]
-

1- सोमद7त बखौर 2. अभम(यु अनत 3. पं0 वासुदेव <वणु दयाल 4. हलादरामशरण 5. रामदे व धुर(धर

1-

gी सोमद7त बखौर - इ(ह8ने काAय कृतय8 तथा याा व7ृ ता(त8 का णयन ;कया है । काAय कृतय8 म9 ‘मझ
ु े कुछ

कहना है (1967)' तथा ‘बीच म9 बहती धारा (1971)' तथा याा व7ृ ता(त8 म9 ‘गंगा क पुकार' (1972) <वशेष चYचत ह]। भारत

42

सरकार Dवारा इ(ह9 1979 म9 ‘<वVव ह(द पुरकार' से स>मानत ;कया गया।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

2-

अभम(यु अनत - आपका सजना7मक AयिEत7व बहु आयामी है । आपने उप(यास, कहानी, नाटक तथा क<वता इन

सभी <वधाओं म9 मह7वपूण योगदान दया है । इ(ह8ने 25 उप(यास8 क रचना क ह] िजनम9 ‘और नद बहती रह ', ‘एक बीघा
4यार', ‘गांधी जी बोले थे', ‘मुQड़या पहाड़ बोल उठा', तथा ‘लाल पसीना' <वशेष Sप से चYचत ह]। ‘एक बीघा 4यार' के काशन
के बाद अभम(यु को सा ह7य संसार म9 तठा ा4त हुई। ‘और नद बहती रह ' तथा ‘गांधी जी बोले थे' इन दोन8
उप(यास8 म9 आपने भारतीय मूल के मजदरू 8 क दद भर कहानय8 का तथा जमीन मालक8 के अ7याचार8 का ममपशy
Yचण ;कया है । ‘मुQड़या पहाड़ बोल उठा' का कथानक दे श क एक सh लोककथा पर आधाBरत है । ‘लाल पसीना' अंPेज8
के औपनवेशक शासनकाल म9 ताQड़त एवं संत4त भारतीय मूल के कुल मजदरू 8 क दद भर गाथा है । उप(यास म9 भारतीय
मजदरू 8 का अपार gम, उनक काय के त नठा, कठोर यातनाओं के बावजूद उनका धीरज तथा समयाओं का साहसपूवक 

सामना करने का उनका ^ढ़ संकkप आ द क सशEत एवं मामक अभAयंजना हुई है ।

3-

पं0 वासुदेव <वणु दयाल - बहुमुखी तभा से स>प(न आप हंद के सार-चार के पुरोधा ह]। अनेक भाषाओं म9

आपक लगभग 50 पुतक9 काशत ह] । आपक रचनावल भी काशत हो चुक है ।

4- 

Jलाद रामशरण - इतहासकार, बाल सा ह7य के णेता, लोक सा ह7य के <वDवान, कथाकार, नबंधकार Jलाद

रामशरण मार शस के नवलेखक8 म9 सवाYधक उभरकर सामने आए ह]। आपक लगभग 25 पुतक9 काशत हो चुक ह] ।

5-

रामदे व धुर(धर - चेहर8 का आदमी, सहमे हुए लोग, पराजय बोध, बड़ी मछल छोट मछल आ द कथाकृतयाँ चYचत

ह]।

(2) फजी - gी जगद श साद चतव
ु vद ने अपने ‘ हंद : घर से बाहर' शीषक लेख म9 फजी के अनेक सा ह7यकार8 का
उkलेख ;कया है । इन सा ह7यकार8 म9 जोYग(दर संह ‘कंवल' का नाम सh है िज(ह8ने छह उप(यास8 का णयन ;कया है ।
आपको उ7तर दे श शासन Dवारा ‘सबेरा' उप(यास पर 1978 म9 पुरकृत ;कया जा चक
ु ा है । इनक धमप7नी gीमती
अमरजीत ‘कंवल' के गीत भी शा(त Dवीपीय दे श8 म9 सh ह]। डॉ0 <ववेकान(द शमा क भी अनेक कृतयाँ काशत ह] ।

(3) सूर नाम - पुरानी पीढ़ के रचनाकार8 म9 व0 gी रहमान खान का नाम उkलेखनीय है । इ(ह8ने ‘दोहावल ' एवं ‘aान 
काश' का णयन ;कया। वतमान पीढ़ के रचनाकार8 म9 अमर संह रमण, gी नवासी, जीत नारायण, पं0 सय
ू  साद वीरे
शूरवीर, सुरजन परोह , सूरज, रामदे व रघुवीर के नाम उkलेखनीय ह]। gी उमाशंकर सतीश ने सूर नाम के लगभग 15 क<वय8

43

क क<वताओं क चचा क है ।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

(4) नेपाल - gी सूयन 
ाथ गोप ने ‘नेपाल म9 हंद ' शीषक नबंध म9 नेपाल के हंद सा ह7य तथा हंद के रचनाकार8 क
जानकार तुत क है । नेपाल के ले खक8 म9 बु(नीलाल, केदार ‘AयYथत' एवं धूवा धूवा सायम क अनेक कृतयां ह(द
म9 मूल अथवा अनुवा दत Sप म9 काशत ह] ।

(5) चेक गणराoय - <वVव के धरातल पर हंद के <वदे शी रचनाकार8 म9 चेक के क<ववर डॉ0 ओदोलेन मेकल मह7वपूण
हतार ह]। इनक क<वताओं म9 भारतीय चेतना सशEत Sप से अभAयंिजत हुई है । डॉ0 मेकल क 8 काAय कृतयाँ 
काशत ह] 1. तेरे दान ;कए गीत (1982) 2. मेर ीत तेरे गीत (1982) 3. वाती बूंद (1983) 4. नमो नमो भारतमाता (1983) 5.
अ<वराम (1984) 6. कलम को लेकर चल (1985) 7. मधुमलन े (1988) 8. हमारा हBरत नीम (gेठ क<वताएं खंड-1
एवं 2) (1984)

(6) चीन - gीमती याङ ई फङ क 1. चीन और भारत 2. चीन म9 भारत शीषक रचनाएँ काशत ह]। 

वदे श म
हंद सा
ह)य का आलोचना)मक अ(ययन हंद सा ह7य का इतहास तथा सा हि7यक कृतय8 का उ(नीसवीं शताbद एवं बीसवीं शताbद के थम चरण म9
आलोचना7मक अWययन करने वाले <वदे शी <वDवान8 म9 गासा” द तासी, YPयसन एवं डॉ0 एल0पी0 टे सीटॅ र के नाम सव<व दत
ह]।

समकाल न <वDवान8 म9 Sस के ई0पी0 चेल शेव का 1968 म9 लटरे चुरा हंद ( हंद सा ह7य) तथा 1992 म9 नताkया 
मखाइलोना साजनोवा का मWयकाल न अटछाप के सh भEत क<वय8 के AयिEत7व एवं कृत7व पर Pंथ काशत हुए।
चीनी भाषा म9 ोफेसर kयू आन ऊ ने ‘भारतीय ह(द सा ह7य का इतहास' , ‘ेमच(द और उनके उप(यास एवं कहानयां'
तथा एसोसएट ोफेसर {याङ चुङ खुई ने ‘ ह(द नाटक एवं एकांक का इतहास‘ शीषक P(थ8 का णयन ;कया।

जापान के <वDवान ो0 तानाका ने आधु नक हंद सा ह7यकार8 एवं <वDवान8 पर मौलक Sप से <वतत
ृ शोध काय ;कया
है । सा ह7य का इतहास, मWयकाल न हंद सा ह7य तथा आधुनक हंद सा ह7य के े म9 आलोचना7मक अWययन करने
वाले जापानी <वDवान8 का <ववरण ो0 का7सरु ो कोगा ने अपने एक लेख म9 तत
ु ;कया है । ोफेसर आ;करा ताकाहाश के 
मYथलेVवर क कहानय8 एवं मुkला वजह कृत सबरस क दिEखनी ह(द पर ;कए गए काय= के अतBरEत दkल
<वVव<वDयालय से सन ् 1999 म9 पी-एच॰डी॰ के लए वीकृत शोध ब(ध भी उkलेखनीय है । इनके शोध ब(ध का शीषक

44

है - ‘ नव9 दशक के ह(द उप(यास8 म9 नैतकता बोध '। ोफेसर तेइिज़ साकाता के जापानी म9 ह(द सा ह7य का इतहास

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

तथा सूरसागर पर लखे गए शोध-नब(ध8 का उkलेख करना आवVयक है । ोफेसर ताइगेन हा<षमोतो ने स(त सा ह7य तथा
<वषेशत : कबीरदास क <वचारधारा एवं भाषा पर काय ;कया है ।

इंlल]ड के डॉ0 Sपट नेल ने राधा वkलभ स>दाय पर अनस
ु ंधान ;कया है ।

नेपाल सा ह7य के Zयाता4त वBरठ क<व केदार ‘AयYथत' क हंद क दो काAय कृतयां <वशेष चYचत ह] - 1. हमारा दे श :
हमारा व4न 2. अिlन gंृगार। लोक<य उप(यासकार एवं कहानीकार gी बु(नीलाल ने अनेक रचनाओं का णयन ;कया।
इनके ‘नयन कहर दBरयाव' शीषक उप(यास म9 नेपाल के पूवा”चल का जीवन सशEत Sप म9 YचCत है । नेपाल सा ह7य के
Zयाता4त वBरठ क<व केदार ‘AयYथत' क हंद क दो काAय कृतयां <वशेष चYचत ह] - 1. हमारा दे श : हमारा व4न 2.
अिlन gंृगार।

अयाय 8. 

+वतीय महाय5
ु के प6चात ् हद
क& साहि:यक कृ=तय, का +वदे शी भाषा म0 तथा +वदे शी
साहि:यक कृ=तय,/लोककथाओं का हंद
म0 अनव
ु ाद

ह द क- सा
हि)यक कृ/तय का अनव
ु ाद :

1. Sस - अकादमशयन अलेEसेइ पेो<वच बाराि(नकोव ने तुलसीकृत रामचBरत मानस का Sसी भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया।
मWययुगीन हंद क<वय8 म9 कबीर, सूर, तुलसी तथा मीराबाई क रचनाओं के Sसी भाषा म9 अनव
ु ाद हो चुके ह]। हंद के िजन
कहानीकार8 क कहानय8 के Sसी भाषा म9 अनुवाद हुए ह] उनम9 ेमचंद, व(ृ दावन लाल वमा, यशपाल, जैने(F कुमार,
भगवतीचरण वमा, इलाचंF जोशी, अमत
ृ लाल नागर, उपे(Fनाथ अVक, फणीVवर नाथ रे णु, मोहन राकेश, रांगेय राघव, भीम
साहनी, <वणु भाकर तथा अमत
ृ राय उkलेखनीय ह] । उप(यास8 म9 ेमचंद के ‘गोदान' और ‘कमभूम'; यशपाल के ‘झूठा-सच'
तथा ‘ दAया'; रे णुकृत ‘मैला आंचल' के अनव
ु ाद हो चुके ह] । िजन आधुनक क<वय8 क चुनी क<वताओं के अलग-अलग संPह
अन ू दत होकर काशत हुए ह] उनम9 नराला, पंत, दनकर, ब{चन तथा रघव
ु ीर सहाय अYधक मह7वपूण ह]। सन ् 1973 म9

‘द पावल ' शीषक से आधुनक हंद क<वताओं का जो संPह काशत हुआ उस संPह म9 27 हंद क<वय8 क 200 रचनाएं
संकलत ह] । इन क<वय8 म9 मैYथल शरण ग4ु त, जयशंकर साद, नराला, पंत, महादे वी वमा, दनकर, ब{चन, शवमंगल संह
सुमन, केदारनाथ अPवाल, मुिEतबोध, अaेय, शमेशर बहादरु संह, सवvVवर दयाल सEसेना, Yगरजा कुमार माथुर, रघव
ु ीर सहाय,

45

धमवीर भारती, gीकांत वमा, नरे श मेहता, नागाजुन 
तथा धूमल समा हत ह]।

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

हंद सा हि7यक कृतय8 का Sसी भाषा म9 अनव
ु ाद करने तथा सा ह7य संबंधी अWययन करने वाले अWयेताओं म9 1. ई0पी0
चेल शेव 2. वेकायेवा 3. <वVवेAकाया 4. वालन 5. गफरोवा 6. गुनामोवा 7. सेरेIया(नी आ द के नाम <वशेष Sप से
उkलेखनीय ह]।

2. जापान - आधुनक हंद सा ह7य के रचनाकार8 एवं उनक रचनाओं का जापानी भाषा म9 <वपुल माा म9 अनव
ु ाद हुआ है ।
अaेय, अमरकांत, काशीनाथ संह, कैलाश वाजपेयी, कंु वर नारायण, गजानन माधव मुिEतबोध, केदारनाथ संह, जगद शचंF
माथुर, जयशंकर साद, जैने(F कुमार, नागाजुन 
, नमल वमा, पाKडेय बेचेन शमा उP, ेमचंद, बेढब बनारसी, भगवतीचरण वमा,
भगवती साद वाजपेयी, भीम साहनी, मधुकर संह, म(नू भKडार , मतराम कपूर, महादे वी वमा, माकKडेय, मYथलेVवर, मोहन
राकेश, यशपाल, रामधार संह दनकर, राह मासम
ू रजा, <वजयदे व नारायण साह , <वणु भाकर, शमशेर बहादरु संह, शवानी,
शेखर जोशी, gीकांत वमा, सुदशन, सुभFा कुमार चौहान, सुमानंदन पंत, सूयक 
ांत CपाठŠ नराला, हजार साद D<ववेद ,
हBरशंकर परसाई आ द 121 सा ह7यकार8 क रचनाओं का अनव
ु ाद हो चुका है । 

न>नलTखत अनव
ु ादक8 एवं उनके Dवारा अनव
ु ा दत कृतय8 के नाम <वशेष Sप से उkलेखनीय ह] :
1. ोफेसर Eयय
ू ा दोइ(ेमचंद - गोदान)
2. ोफेसर तोशओ तानाका ( भीम साहनी - तमस)
3. ोफेसर का7सुरो कोगा (ेमचंद - गोदान)
4.ोफेसर अ;करा ताकाहाश (राजे(F साद क आ7मकथा , राहुल सांकृ7यायन क कुछ कृतयाँ )
5. ोफेसर यूइYचरो म;क ( उपे(Fनाथ अVक - Yगरती दवार9 )
6.ोफेसर तेइिज़ साकाता ( हजार साद D<ववेद - ह(द सा ह7य क भूमका ,ेमचंद क कहानयाँ - दो बैल8 क कथा ,
पूस क रात , नशा , बड़े भाई साहब)
7. ोफेसर ताइगेन हाशमोतो ( कबीरदास कृत बीज़क )
8. ोफेसर तोमओ मज़ोकाम ने सन ् 1951 से 1980 क अवYध के ह(द के 201 लोक<य ;फkमी गीत8 का जापानी 
ल<प म9 ल4य(तरण तथा जापानी भाषा म9 अनुवाद ;कया है ।
9. सुgी हरोक नागासाक ( कृण बलदे व वैद - उसका बचपन , म(नू भKडार - यह सच है , क(है या लाल मg भाकर द प जले शंख बजे)
10. gी ताताकुरा ने इ(टरनेट पर जापानी भाषा म9 ह(द क अनेक कृतय8 के अनव
ु ाद सुलभ कराने का शंसनीय काय
;कया है ।
.जमनी - डॉ0 (gीमती) मारPेट गा7लाफ ने यशपाल, ेमचंद एवं कृशनच(दर क कहानय8 का तथा ेमचंद के

‘नमला' एवं भीम साहनी के ‘बसंती' उप(यास8 का जमन भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया है । gीमती इरोना 7सेहरा के संपादक7व म9
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

46

3

‘आधुनक हंद गीत' पुतक काशत है । gी सेता(दवीर ने ‘सूरदास कृणायन' शीषक से दो खKड8 म9 सूरदास के पद8 का
जमन भाषा म9 अनुवाद ;कया है ।
4

इटल - वेनस <वVव<वDयालय क डॉ0 माBरयोkला ऑफरे द ने ेमचंद के‘गोदान' तथा कंु वर नारायण क काAयकृत

‘आ7मजयी' का तथा डॉ0 चेचीलया कोिसयो ने फणीVवर नाथ रे णु के उप(यास ‘मैला आंचल' का इतालवी भाषा म9 अनुवाद
;कया है ।
5

इंlल]ड - डॉ0 अट;क(स ने रामचBरतमानस का अंPेजी म9 अनव
ु ाद ;कया। डॉ0 बंगा इमरै ने मीरा, घनान(द एवं

रसखान के काAय का अनव
ु ाद ;कया। डॉ0 मैकPेगर ने नंददास के पद8 का अनुवाद ;कया है । डॉ. Sपट नेल ने ेमच(द,
अaेय, अमत
ृ राय क रचनाओं का अनुवाद ;कया है ।
6

नीदरल]ड - ो0 वेगेल ने ेमचंद क कहानय8 का डच भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया है ।

7

नावv - Eनत
ु ;dितयान सेन ने ेमचंद क कहानय8 का नावvिजयन भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया है ।

8. ;फनल]ड - बतल तEकनेन ने Eलोस कातुनvन के सहयोग से ‘गोदान' का ;फि(नश भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया है ।
9. eांस - gीमती वौदवील ने रामचBरत मानस, सूरसागर, पावत, ढोल माS रा दह
ू ा तथा कबीर क रचनाओं क eे(च
भाषा म9 <ववेचना क है तथा काAय-अंश8 का eे(च म9 अनव
ु ाद ;कया है ।
10. पौल9ड - gी पारनोAक ने ‘मैला आंचल' का तथा डॉ0 माBरया HVतोफ ब
ृ क ने ल~मीनारायण लाल और सवvVवर
दयाल सEसेना के नाटक8 का अनुवाद ;कया है । आधुनक हंद लेखक8 क रचनाओं का अनुवाद भी हो रहा है । ेमच(द,
जयशंकर साद, जैने(F कुमार, कृशनचंदर, फणीVवरनाथ रे णु, ऊषा <यंवदा, म(नभ
ू Kडार आ द क रचनाओं का अनव
ु ाद
पोलश भाषा म9 काशत है । सू7कोAसका ने कबीर तथा पारनोAक एवं ब
ृ क ने ेमच(द क कहानय8 का अनुवाद ;कया
है ।
11. हं गर - डॉ0 एवा अराद ने ेमचंद तथा आधुनक हंद कहानीकार8 क कहानय8 का हं गBे रयन भाषा म9 अनुवाद ;कया
है । डॉ0 बंगा इमरै ने मीरा के पद8 का हं गBे रयन भाषा म9 अनुवाद ;कया है ।
12. रोमानया - ‘गोदान' तथा ‘मैला आंचल' के रोमानयन अनुवाद काशत हो चुके ह]। gी नकोलाय oबेया ने ह(द के
कुछ नबंध8 का, gी तेBरयान कोनvल ने gी जयंत <वणु नारल कर एवं gी अिlनहोी क कुछ वैaानक कहानय8 का तथा
दनल एंका ने ेमचंद क 22 कहानय8 का सीधे हंद से रोमानयन भाषा म9 अनुवाद ;कया है ।
13. बkगाBरया - ‘गोदान' तथा ‘नमला' का अनुवाद हो चुका है ।
14. चेक - डॉ0 ओदोलेन मे कल ने ेमच(द के ‘गोदान' तथा राजे(F अवथी के ‘जंगल के फूल' का चेक अनव
ु ाद ;कया
है ।
15. बेिkजयम - ो0 डॉ0 वीनंद कलवात ने ह(द भिEत सा ह7य के कुछ अंश8 का डच एवं अंPेजी म9 अनुवाद ;कया है ।
कबीर क रचनाओं का माTणक संकलन नकालने के लए आप कायरत ह]।

47

16. चीन -

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

1. ोफेसर िजन दंग हान ने तुलसीकृत ‘रामचBरत मानस', ेमच(द कृत ‘नमला' और यशपाल कृत ‘झूठा सच' का चीनी
भाषा म9 अनुवाद ;कया है ।‘नमला' के सह-अनुवादक ोफेसर मा0 मड0. काड0 ह]।
2. ोफेसर kयू आन ऊ ने ेमच(द क 80 कहानय8 का अनव
ु ाद ;कया है ।
3. ेमच(द क कहानय8 का अनव
ु ाद अ(य चीनी ह(द <वDवान8 ने भी ;कया है । उkलेखनीय नाम ह] (क) ोफेसर िजन दंग हान (ख) Vवेङ {येन फू (ग) सुन Yचङचओ (ङ) žवान तङ (च) ई मन (छ) मङ फान (ज) शी.पी.
{वाङ (झ) यन ह8ग žवान (ञ) चओ YचZवान (ट) सुन पाओ कांड (ठ) थान रन हू (ड) चाङ Vवाt. कू
4. ोफेसर येन शाओ7वान ने ‘गोदान' का अनुवाद ;कया है ।
5. ोफेसर मा मङ काङ तथा उनके साYथय8 ने मलकर ‘{वाङ चुङ' उपनाम से ‘रं गभूम' तथा ‘गबन' का अनुवाद ;कया है ।
6. चओ YचZवान तथा उनके साYथय8 ने मलकर ‘ेमाgम' का अनव
ु ाद ;कया है ।
7. ोफेसर यन ह8ग यए
ु न ने व(ृ दावनलाल वमा कृत ‘झाँसी क रानी' तथा इलाच(F जोशी कृत ‘संयासी' का अनव
ु ाद ;कया
है ।
8. gी थाङ रन हू ने जैने(F कुमार कृत ‘7याग-प' का अनुवाद ;कया है ।
9. डॉ0 चाङ चुङ Zवै ने नराला, महादे वी वमा, दनकर, अaेय, ब{चन, नरे (F शमा एवं भवानी साद मg के काAयांशो का
मामक अनव
ु ाद ;कया है ।
17. उoबे;कतान - उoबेक भाषा म9 महाभारत, रामायण तथा गोदान एवं झांसी क रानी के अनव
ु ाद उपलbध ह]।
18. >यंमार - gी च(F काश भाकर ने ह(द क अनेक कृतय8 का बमy भाषा म9 अनव
ु ाद ;कया है । गोदान के अनुवाद
के लए >यंमार सरकार ने आपको ‘gेठ सा ह7यकार' पुरकार से स>मानत ;कया है । 
वदे शी सा
हि)यक कृ/तय/लोककथाओं का
हंद म अनव
ु ाद1-

Sस - माEस, लेनन, दोतोAक, तॉलतोय, चेखव, पूिVकन आ द रचनाकार8 क कृतय8 के ह(द अनुवाद गतशील 

काशन गह
ृ (बाद म9 रा द ु गा काशन) Dवारा काशत हुए ह]।
2-

पोल]ड - डॉ0 माBरया HVतोफ ब
ृ क ने पोkक (पोलश) के रा य महाकाAय ‘आदमत म7Eय ए<वच' का हंद

अनुवाद ;कया है ।
3. चेक - डॉ0 ओदोलेन मे कल एवं शारदा यादव ने चेक और मोरा<वया म9 चलत 27 लोककथाओं का संकलन एवं हंद
अनुवाद ;कया है ।
डॉ0 ओदोलेन मेकल तथा उमाशंकर सतीश ने नोबेल पुरकार <वजेता <वVव<वZयात चेक क<व व0 यरोलाव साईफत क
67 क<वताओं का हंद Sपांतर ;कया है ।
.रोमानया - कामv न कारािजउ ने रोमानयन महाक<व महाइ एमनेकु क कुछ क<वताओं का ह(द अनुवाद ;कया

है । gी नकोलाय oबेया ने ‘रोमानयन दं त कथा' का ह(द अनुवाद ;कया है ।
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

48

4

5
6-

. चीन - gीमती सू-इन-हुवान ने चीनी लोककथाओं का हंद अनव
ु ाद ;कया है ।
जापान - gी Yगर श बZशी एवं ो0 तोमयो मजोकाम ने 101 जापानीगीत8 का हंद अनव
ु ाद ;कया है । इन गीत8

को अंतरा य वर ल<प के साथ-साथ हंद
ु तानी संगीत क वर ल<प म9 भी तत
ु ;कया गया है । लोक<य जापानी
गीत8 के हंद म9 दो सी0डी0 भी नमत हुए ह]। ोफेसर महे (F साइिज मा;कनो ने जापानी बाल-सा ह7य क अनेक कथाओं
एवं कहानय8 का ह(द अनव
ु ाद ;कया है ।
7-

>यंमार - gेठ बमy सा ह7य का ह(द म9 अनव
ु ाद हुआ है । अनव
ु ादक8 के नाम ह] - टै Eतोफ8नाई, जनक वैद, भो

टाया, मौ ठन, ऊ पारगू, ऊ फेमंय। बमy भाषा क अनेक सा हि7यक कृतय8 का ह(द म9 अनुवाद करने वाल8 म9 सवाYधक 
सh नाम gी च(Fकाश भाकर का है । इनक अनू दत रचनाओं म9 सवाYधक चYचत कृत >यंमार (बमा) के भूतपूव 
धानमंी ऊ नू क आ7मकथा का मूल बमy से ह(द अनुवाद है । अनुवाद ‘उ7पाद शानपु' शीषक से सन ् 1992 म9 
काशत हुआ है । (काशक-इरावद पिbलकेश(स, नई दkल )।
------

अयाय 9.

संय@
ु त राAB संघ क& आEधकाFरक भाषाएं एवं हद

संयुEत रा संघ क 6 आYधकाBरक भाषाएँ ह] : 1. अरबी, 2. चीनी 3. अंPेजी 4. e9च, 5. Sसी 6. पेनश
(दे 0 Year Book of the United Nations 1955, Vol. 49, pp. 1416-17, New

York )
संयE
ु त रा क ये 6 आYधकाBरक भाषाएं◌ँ अ(य अ(तरा य संगठन8 क भी आYधकाBरक भाषाएँ ह]। उदाहरणाथ : (1)
अ(तरा य परमाणु ऊजा एज9सी (IAEA) (2) अ(तरा य <वकास एज9सी (IDA) (3) अ(तरा य दरू संचार संघ (ITU) (4)
संयE
ु त रा शैHक, वैaानक एवं सांकृतक संगठन (UNESCO) (5) <वVव वाmय संगठन (WHO) (6) संयE
ु त रा
औDयोYगक <वकास संगठन (UNIDO) (7) संयुEत रा अ(तरा य बाल-आपातक नYध (UNICEF)
संयुEत रा क आYधकाBरक भाषाएं एवं ह(द :
सन ् 1998 के पूव, मातभ
ृ ा<षय8 क संZया क ^िट से <वVव म9 सवाYधक बोल जाने वाल भाषाओं के जो आंकड़े मलते
थे, उनम9 ह(द को तीसरा थान दया जाता था। सन ् 1991 के सै(सस आफ इिKडया का भारतीय भाषाओं के <वVलेषण का
P(थ जुलाई, 1997 म9 काशत हुआ (दे 0 Census of India 1991 Series 1 - India Part I of 1997, Language : India and
के Dवारा यूनेको-Vनावल के आधार पर ह(द क Bरपोट भेजने के लए भारत सरकार से नवेदन ;कया। भारत सरकार ने
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

49

states - Table C - 7) यन
ू ेको क टे Eनीकल कमेट फॉर द वkड ल]lवेिजज Bरपोट ने अपने दनांक 13 जल
ु ाई, 1998 के प

उEत दाय7व के नवाह के लए के(F य ह(द संथान के त7काल न नदे शक ोफेसर महावीर सरन जैन को प लखा। 
ोफेसर महावीर सरन जैन ने दनांक 25 मई ,1999 को यूनेको को अपनी <वतत
ृ Bरपोट भेजी। 
ोफेसर जैन ने <वभ(न भाषाओं के ामाTणक आंकड़8 एवं तmय8 के आधार पर यह सh ;कया ;क योEताओं क ^िट से
<वVव म9 चीनी भाषा के बाद दस
ू रा थान ह(द भाषा का है । Bरपोट तैयार करते समय ोफेसर जैन ने CI टश काउि(सल
आफ इिKडया से अंPज
े ी मातभ
ृ ा<षय8 क पूरे <वVव क जनसंZया के बारे म9 तmया7मक Bरपोट भेजने के लए नवेदन ;कया।
CI टश काउि(सल ऑफ इिKडया ने इसके उ7तर म9 Yगनीज बुक आफ नालेज (1997 संकरण, पृ ठ-57) फैEस Dवारा भेजा।
CI टश काउि(सल Dवारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे <वVव म9 अंPेजी मातभ
ृ ा<षय8 क संZया 33,70,00,000 (33
करोड़, 70 लाख) है । सन ् 1991 क जनगणना के अनुसार भारत क पूर आबाद 83,85,83,988 है । मातभ
ृ ाषा के Sप म9
ह(द को वीकार करने वाल8 क संZया 33,72,72,114 है तथा उद ू को मातभ
ृ ाषा के Sप म9 वीकार करने वाल8 क
संZया का योग 04,34,06,932 है । ह(द एवं उद ू को मातभ
ृ ाषा के Sप म9 वीकार करने वाल8 क संZया का योग
38,06,79,046 है जो भारत क पूर आबाद का 44.98 तशत है । ोफेसर जैन ने अपनी Bरपोट म9 यह भी सh ;कया
;क भा<षक ^िट से ह(द और उद ू म9 कोई अंतर नह ं है । इस कार CIटे न, अमेBरका, कनाडा, आयरल]ड, आे लया,
(यूजील]ड आ द सभी दे श8 के अंPेजी मातभ
ृ ा<षय8 क संZया के योगसे अYधक जनसंZया केवल भारत म9 ह(द एवं उद ू
भा<षय8 क है । Bरपोट म9 यह भी तपा दत ;कया गया ;क ऐतहासक, सांकृतक एवं सामािजक कारण8 से स>पूण भारत
म9 मानक ह(द के AयावहाBरक Sप का सार बहुत अYधक है । ह(द तर भाषी राoय8 म9 बहुसंZयक D<वभा<षक-समुदाय
D<वतीय भाषा के Sप म9 अ(य ;कसी भाषा क अपेा ह(द का अYधक योग करता है जो ह(द के सावदेशक Aयवहार
का माण है । भारत क राजभाषा ह(द है तथा पा;कतान क राoयभाषा उद ू है । इस कारण ह(द -उद ू भारत एवं
पा;कतान म9 संपक भाषा के Sप म9 Aयवrत है ।
<वVव के लगभग 93 दे श8 म9 ह(द का या तो जीवन के <व<वध े8 म9 योग होता है अथवा उन दे श8 म9 ह(द के
अWययन अWयापन क स>यक् Aयवथा है । चीनी भाषा के बोलने वाल8 क संZया ह(द भाषा से अYधक है ;क(तु चीनी
भाषा का योग े ह(द क अपेा सीमत है । अंPेजी भाषा का योग े ह(द क अपेा अYधक है ;क(तु ह(द
बोलने वाल8 क संZया अंPेजी भा<षय8 से अYधक है ।
<वVव के इन 93 दे श8 को हम तीन वग= म9 <वभािजत कर सकते ह] ( I ) इस वग के दे श8 म9 भारतीय मूल के आवासी नागBरक8 क आबाद दे श क जनसंZया म9 लगभग 40 तशत या
उससे अYधक है । इन अYधकांश दे श8 म9 सरकार एवं गैर-सरकार ाथमक एवं माWयमक कूल8 म9 ह(द का शण होता
है । इन दे श8 के अYधकांश भारतीय मूल के आवासी जीवन के <व<वध े8 म9 ह(द का योग करते ह] एवं अपनी
सांकृतक पहचान के तीक के Sप म9 ह(द को Pहण करते ह] । इन दे श8 म9 न>नलTखत दे श उkलेखनीय ह] - 1.मार शस
2. ;फजी 3. सूर नाम 4. गयाना 5. Cनडाड एKड टुबेगो। Cनडाड के अतBरEत अ(य सभी दे श8 म9 ह(द का Aयापक 
योग एवं Aयवहार होता है ।

( II ) इस वग के दे श8 म9 ऐसे नवासी रहते ह] जो ह(द को <वVव भाषा के Sप म9 सीखते ह], पढ़ते ह] तथा ह(द म9 लखते
ह]। इन दे श8 क <वभ(न शण संथाओं म9 ायः नातक एवं / अथवा नातको7तर तर पर ह(द क शा का ब(ध

दे श8 म9 न>नलTखत दे श8 के नाम उkलेखनीय ह] रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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है । कुछ दे श8 के <वVव<वDयालय8 म9 ह(द म9 शोध काय करने तथा डाEटरे ट क उपाYध ा4त करने क भी Aयवथा है । इन

महाDवीप दे श
(क) अमेBरका महाDवीपः 6. संयुEत राoय अमेBरका 7. कनाडा 8. मैिEसको◌े 9. Eयूबा
(ख) यूरोप महाDवीप : 10. Sस 11. CIटे न (इंlलैKड) 12. जमनी 13. eांस 14. बेिkजयम 15. हालैKड (नीदरलैKtस) 16.
आिया 17. िवटजरलैKड 18. डेनमाक 19. नावv 20. वीडन 21. ;फनल]ड 22. इटल 23. पौल]ड 24. चेक 25. हं गर
26. रोमानया 27. बkगाBरया 28. उdैन 29. dोशया
(ग ) अeका महाDवीप : 30. दHण अeका 31. र -यूनयन Dवीप

(घ) एशया महाDवीप : 32. पा;कतान 33. बंlलादे श 34. gीलंका 35. नेपाल 36. भूटान 37. >यंमार (बमा) 38. चीन
39. जापान 40. दHण कोBरया 41. मंगोलया 42. उजबे;कतान 43. तािजकतान 44. तुक„ 45. थाइलैKड

(ङ ) आे लया : 46. आे लया

( III ) इसका उkलेख ;कया जा चुका है ;क भारत क राजभाषा ह(द है तथा पा;कतान क राoयभाषा उद ू है । इस कारण
ह(द -उद ू भारत एवं पा;कतान म9 संपक भाषा के Sप म9 Aयवrत है । भारत एवं पा;कतान के अलावा ह(द एवं उद ू
मातभ
ृ ा<षय8 क बहुत बड़ी संZया <वVव के लगभग 60 दे श8 म9 नवास करती है । इन दे श8 म9 भारत, पा;कतान, बंगलादे श,
भूटान, नेपाल आ द दे श8 के आवासय8 / अनवासय8 क <वपुल आबाद रहती है । इन दे श8 क यह आबाद स>पक-भाषा के
Sप म9 ‘ ह(द -उद'ू का योग करती है , ह(द क ;फkम9 दे खती है ; ह(द के गाने सुनती है तथा टे ल <वजन पर ह(द के
कायdम दे खती है । इन दे श8 म9 संयुEत राoय अमेBरका , कनाडा , मैिEसको , CIटे न (इंlलैKड) , जमनी, eांस ,हालैKड
(नीदरलैKtस) , दHण अeका, दHण कोBरया, उजबे;कतान, तािजकतान, थाइलैKड, आे लया आ द दे श8 के अलावा 
न>नलTखत दे श8 के नाम उkलेखनीय ह] :- 47. अफगानतान 48. अजv(ट ना 49. अkजेBरया 50. इEवेडोर
51.इKडोनेशया 52. इराक 53. ईरान 54. उगांडा 55.ओमान 56. कजा;कतान 57. क़तर 58. कुवैत 59. के(या 60. कोट
डी ' इवोइरे 61.lवाटे माला 62. जमाइका 63. जाि>बया 64. तंजानया 65. नाइजीBरया 66. नकारागुआ 67.(यूजीलैKड 68.
पनामा 69. पुतग 
ाल 70. पे‚ 71.पैरागुवै 72. ;फलपाइ(स 73. बहर न 74. Iाजील 75.Iुनेई 76. मलेशया 77. म‘ 78.
मेडागाकर 79. मोजाि>बक 80.मोरEको 81.मौBरटानया 82. यमन 83. ल Cबया 84. लेबनान 85.वेनेजुएला 86. सऊद
अरब 87. संयE
ु त अरब अमीरात 88. संगापुर 89.सड
ू ान 90. सेशेkस 91. पेन 92. हांगकांग (चीन) 93.ह8डूरास
ह(द क ;फkम8, ह(द के गान8 तथा ट 0वी0 कायdम8 का सार :

ह(द क ;फkम8, गान8, ट 0वी0 कायdम8 ने ह(द को ;कतना लोक<य बनाया है - इसका आकलन करना क ठन है ।
के(F य ह(द संथान म9 ह(द पढ.ने के लए आने वाले 67 दे श8 के <वदे शी छा8 ने इसक पुिट क ;क ह(द ;फkम8
तथा िजतने <वदे शी नागBरक8 से बातचीत क उनसे भी जो अनुभव हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है ;क ह(द
क ;फkम8 तथा ;फkमी गान8 ने ह(द के सार म9 अतम योगदान दया है । सन ् 1995 के बाद से ट 0वी0 के चैनल8 से
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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को दे खकर तथा ह(द ;फkमी गान8 को सुनकर उ(ह9 ह(द सीखने म9 मदद मल । लेखक ने वयं िजन दे श8 क याा क 

साBरत कायdम8 क लोक<यता भी बढ.◌ी है । इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है ;क िजन सेटेलाईट चैनल8 ने
भारत म9 अपने कायdम8 का आर>भ केवल अंPेजी भाषा से ;कया था; उ(ह9 अपनी भाषा नीत म9 पBरवतन करना पङा है ।
अब टार 4लस, जी0ट 0वी0, जी (यूज, टार (यूज, Qडकवर , नेशनल oयोPा;फक आ द ट 0वी0 चैनल अपने कायdम ह(द
म9 दे रहे ह]। दHण पूव एशया तथा खाड़ी के दे श8 के ;कतने दशक इन कायdम8 को दे खते ह] - यह अनुस(धान का अ{छा
<वषय है ।
सन ् 1984 से सन ् 1988 के बीच लेखक ने यूरोप के 18 दे श8 क यााएं कं। यूरोप के दे श8 म9 कोलोन, बी0बी0सी0,
CI टश रे Qडयो, सनराइज, सबरं ग के ह(द सेवा कायdम8 को ह(द ेमी बड़े चाव से सुनते ह]। यरू ोप के दे श8 म9 ऐसी
गायकाएं ह] जो ह(द ;फkम8 के गाने गाती ह] तथा टे ज शो करती ह] ।
( अपने <वदे श वास क उEत अवYध म9 जो ;फkमी गाने <वभ(न यूरोपीय दे श8 म9 सवाYधक लोक<य थे उनके नाम इस 
कार ह] - 1. आवारा हूँ 2. मेरा जूता है जापानी 3. सर पर टोपी लाल, हाथ म9 रे शम का Sमाल, हो तेरा Eया कहना 4. जब
से बलम घर आए िजयरा मचल मचल जाए 5. आई लव यू 6. मुड़-मुड़ के न दे ख, मुड़-मुड़ के 7. ईचक दाना, बीचक दाना,
दाने ऊपर दाना, छoजे ऊपर लड़क नाचे, लड़का है द वाना 8. मेघा छाये आधी रात, न दंया हो गई बैरन 9. मौसम है
आशकाना, है दल कह ं से उनको ढूँढ लाना 10. दम मारो दम, मट जाये गम 11. सुहाना सफर है 12. तेरे Cबना िज(दगी
से कोई शकवा तो नह ं 13. बोल रे पपीहरा 14. च(दो ओ ! च(दा 15. याद8 क बारात नकल है या दल के Dवारे 17.
िज(दगी एक सफर है सुहाना, यहां कल Eया हो, ;कसने जाना 17. न कोई उमंग है , न कोई तरं ग है , मेर िज(दगी है Eया ?
एक कट पतंग है 18. बहार8 ! मेरा जीवन भी संवार8, 19. आ जा रे परदे सी, म] तो खड़ी इस पार ।)
सन ् 1995 के बाद टे ल<वजन के सार के कारण अब <वVव के 7येक भूभाग म9 ह(द ;फkम8 तथा ह(द ;फkमी गान8
क लोक<यता सव<व दत है ।
संयुEत रा संघ क आYधकाBरक भाषाओं क तुलना म9 हंद मातभ
ृ ा<षय8 क संZया :
सन ् 1998 के बाद <वVव तर पर ह(द क संZया के आंकड़8 म9 पBरवतन आ गया।भा<षक आंकड़8 क ^िट से सवाYधक 
ामाTणक P(थ8 के आधार पर संयुEत रा संघ क 6 आYधकाBरक भाषाओं क तल
ु ना म9 हंद के मातभ
ृ ाषा वEताओं क
संZया न>न तालका म9 तुत है (मलयन म9 )

‘ोत (1)

चीनी

800

874

874

ह(द 333

550

366

366 

पेनश 332

400

322-358

अंPेजी

322

400

341

341

अरबी

186

200

-----

----

Sसी

170

170

167

167

836

‘ोत (2)

‘ोत (3)

‘ोत (4)

322-358

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

52

भाषा का नाम

eांसीसी 072

090

077

077

(1) Encarta Encyclopedia--- article of Dr. Bernard Comrie (1998)
(2) D. Dalby: The Linguasphere Register of the World’s Languages and Speech

Communities, Cardiff, Linguasphere Press (1999)
(3) Ethnologue, Volume 1. Languages of the World: Edited by Barbara F. Grimes, 14th. Edition, SIL

International (2000)
(4) The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group(2003)

---------------------------------------------------------------(1)एनकाटा ए(साइEलोपीQडया म9 भाषा के बोलने वालो क संZया क ^िट से जो संZया है वह इस कार है :
1. चीनी 836 मलयन (83 करोड़ 60 लाख)
2. ह(द 333 मलयन (33 करोड़ 30 लाख)
3. पेनश 332 मलयन (33 करोड़ 20 लाख)
4. अंPेजी 322 मलयन (32 करोड़ 20 लाख)
5. अरबी 186 मलयन (18 करोड़ 60 लाख)
6. Sसी 170 मलयन (17 करोड़)
7. eांसीसी 72 मलयन (7 करोड़ 20 लाख)

(2) दस
ू रे ‘ोत के P(थ म9 संZया इस कार है 1. चीनी 800 मलयन (80 करोड़)
2. ह(द 550 मलयन (55 करोड़),
3. पेनश 400 मलयन (40 करोड़)
4. अंPेजी 400 मलयन(40 करोड़ ),

53

5. अरबी 200 मलयन (20 करोड़)

रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

6

. Sसी 170 मलयन (17 करोड़)

7. e] च 90 मलयन (9 करोड़)।

(3) तीन एवं चार ‘ोत8 के P(थ8 के आंकड़े एक जैसे ह]। इसका कारण यह है ;क द वःkड अkमानेक एKड बुक ऑफ
फैEXस (The World Almanac and Book of Facts) के आंकड़8 का आधार एथनोलॉग ह है ।
इन दोनो P(थ8 म9 तपा दत संZया इस कार है :
1. चीनी 874 मलयन (87 करोड़ 40 लाख)
2. ह(द 366 मलयन (36 करोड़ 60 लाख)
3. पेनश 322-358 मलयन (32 करोड़ 20 लाख से 35 करोड़ 80 लाख)
4.अंPेजी 341 मलयन (34 करोड़ 10 लाख)।
इन P(थ8 म9 अरबी को BरEत दखाया गया है । इसका कारण इन P(थ8 म9 यह तपा दत है ;क अरबी एक Eलासकल
ल]lवेज है तथा इ(ह8ने भाषाओं के जो आँकड़े दये ह] , वे मातभ
ृ ा<षय8 के ह] , D<वतीयभाषा वEताओं (सैके(ड ल]lवेज पीकस)
के नह ं। इस कारण इ(होन9 टे Cबल म9 अरबी ल]lवेज को नह ं रखा है ।
5.Sसी भा<षय8 क संZया 167 मलयन (16 करोड़ 70 लाख) है ।
7

. e9च भा<षय8 क संZया 77 मलयन (7 करोड़ 70 लाख) है ।

मातभ
ृ ाषय क- संbया का अ तर :-

तालका का अWययन करने से यह पट है ;क इन P(थ8 म9 <वभ(न भाषाओं के मातभ
ृ ा<षय8 क संZया के आँकड़8 म9
एकSपता/समानता नह ं है । तालका म9 ‘ोत-2 के P(थ म9 ह(द भा<षय8 क संZया है - 550 मलयन(55 करोड़), ;क(तु
तीन एवं चार ‘ोत के P(थ8 म9 ह(द भा<षय8 क संZया तपा दत है - 366 मलयन (36 करोड़ 60 लाख) । जब
वैaानक ढं ग से आँकड़े इकzे हो रहे ह] तथा मात ृ भा<षय8 क ^िट से आँकड़े तुत ;कये जा रहे ह] तो यह अ(तराल Eय8
है ? ‘ोत 3 एवं 4 के P(थ8 का Wयान से अWययन करने के बाद आंकड़8 के अ(तर का रहय उDघा टत हो जाता है । इन
P(थ8 म9 ह(द के ेगत भेद8 एवं शैल गत भेद8 को अलग-अलग भाषाओं के Sप म9 दशत ;कया गया है । ह(द भाषा 
े के अ(तगत बोले जाने वाले इन ेगत एवं शैल गत भेद8 के मातभ
ृ ा<षय8 क जो संZयाएँ तपा दत ह] उन संZयाओं
को 366 मलयन (36 करोड़ 60 लाख) संZया म9 जोड़ने पर ह(द के मातभ
ृ ा<षय8 क संZया पहुँच जाती है - 553 
मलयन(55करोड़ 30 लाख) । ‘ोत-2 म9 ह(द भा<षय8 क संZया का योग है - 550 मलयन( 55 करोड़)। ‘ोत-3 एवं
‘ोत-4 के P(थ8 म9 ह(द भाषा के िजन 11 ेगत (Regional) तथा शैल गत (Stylistic) भेद8 के मातभ
ृ ा<षय8 क संZया
हो जाती है - 553 मलयन (55 करोड़ 30 लाख)
रचनाकार क तु त. हंद क अंतरेीय, सावदेशीय एवं अंतररा य भूमका – ो. महावीर सरन जैन

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को अलग-अलग दशत ;कया गया है , उनक संZयाओं का योग कर दे ने पर इन दोनो P(थ8 म9 ह(द भा<षय8 क संZया

संसार म9 ऐसा कोई भाषा े नह ं होता, िजसम9 ेगत भेद नह ं होते। कहावत है - चार कोस पर बदले पानी, आठ कोस
पर बानी। चीनी भाषा के बोलने वाल8 क संZया 700-800 मलयन (70 करोड़ से 80 करोड़) है तथा उसका भाषा े
ह(द भाषा े क अपेा बहुत <वतत
ृ है । चीनी भाषी े म9 जो भा<षक Sप बोले जाते ह] वे सभी परपर बोधग>य
नह ं ह]। जब पाVचा7य भाषा वैaानक चीनी भाषा क <ववेचना करते ह] तो ;कसी कार का <ववाद पैदा नह ं करते ;क(तु
‘ोत-3 एवं 4 जैसे P(थ8 के <वDवान जब ह(द भाषा क <ववेचना करते ह] तो ह(द भाषा े के अ(तगत बोले जाने
वाले ह(द भाषा के उपभाषा Sप8 को भाषा का दजा दे दे ते ह]। ह(द भाषा े के अ(तगत भारत के न>नलTखत
राoय/के(F शासत दे श समा हत ह] :-1. उ7तर दे श 2. उ7तराखंड 3. Cबहार 4. झारखKड 5. मWय दे श 6◌़. छ7तीसगढ़
7. राजथान 8. हमाचल दे श 9. हBरयाणा 10. दkल 11. चKडीगढ़।
ह(द भाषा का े बहुत Aयापक है । ह(द भाषा े म9 ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ ह] िजनम9 पारपBरक बोधग>यता का 
तशत बहुत कम है , ;क(तु ऐतहासक एवं सांकृतक ^िट से स>पूण भाषा े एक भा<षक इकाई है तथा इस भाषाभाषी े के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने ेगत भेद8 को ह(द भाषा के Sप म9 मानते एवं वीकारते आए ह]। भारत के
सं<वधान क ^िट से यह िथत है । सन ् 1997 म9 भारत सरकार के सै(सस ऑफ इिKडया Dवारा काशत P(थ म9 भी
यह िथत है ।

‘खड़ी बोल ' ह(द भाषा े का उसी कार एक भेद है , िजस कार ह(द भाषा के अ(य बहुत से ेगत भेद ह]। 7येक
भाषा े म9 अनेक ेगत, वगगत एवं शैल गत भ(नताएँ होती ह]। 7येक भाषा े म9 ;कसी े <वशेष के भा<षक Sप
के आधार पर उस भाषा का मानक Sप <वकसत होता है , िजसका उस भाषा-े के सभी े8 के पढ़े -लखे AयिEत
औपचाBरक अवसर8 पर योग करते ह]। पूरे भाषा े म9 इसका Aयवहार होने तथा इसके काया7मक चार-सार के कारण
<वकसत भाषा का मानक Sप भाषा े के समत भा<षक Sप8 के बीच संपक सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी
मानक भाषा Sप के आधार पर उस भाषा क पहचान क जाती है । 7येक दे श क एक राजधानी होती है तथा <वदे श8 म9
;कसी दे श क राजधानी के नाम से ायः दे श का बोध होता है , ;क(तु सहज Sप से समझ म9 आने वाल बात है ;क
राजधानी ह दे श नह ं होता।
िजस कार भारत अपने 28 राoय8 एवं 07 के(F शासत दे श8 को मलाकर भारतदे श है , उसी कार भारत के िजन राoय8
एवं शासत दे श8 को मलाकर ह(द भाषा े है , उस ह(द भाषा-े के अ(तगत िजतने भा<षक Sप बोले जाते ह] उनक
समािट का नाम ह(द भाषा है । ह(द भाषा े के 7येक भाग म9 AयिEत थानीय तर पर ेीय भाषा Sप म9 बात
करता है । औपचाBरक अवसर8 पर तथा अ(तर-ेीय, रा य एवं सावदेशक तर8 पर भाषा के मानक Sप अथवा
AयावहाBरक ह(द का योग होता है । आप <वचार कर9 ;क उ7तर दे श ह(द भाषी राoय है अथवा खड़ी बोल , Iजभाषा,
क(नौजी, अवधी, बु(दे ल आ द भाषाओं का राoय है । इसी कार मWय दे श ह(द भाषी राoय है अथवा बु(दे ल , बघेल ,
मालवी, नमाड़ी आ द भाषाओं का राoय है । जब संयुEत राoय अमेBरका क बात करते ह] तब संयुEत राoय अमेBरका के
अ(तगत िजतने राoय ह] उन सबक समिट का नाम ह तो संयE
ु त राoय अमेBरका है । <वदे श सेवा म9 कायरत अYधकार
जानते ह] ;क कभी दे श के नाम से तथा कभी उस दे श क राजधानी के नाम से दे श क चचा होती है । वे ये भी जानते ह]
;क दे श क राजधानी के नाम से दे श क चचा भले ह होती है , मगर राजधानी ह दे श नह ं होता। इसी कार ;कसी भाषा के
मानक Sप के आधार पर उस भाषा क पहचान क जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक Sप होता है : मानक भाषा ह
भाषा नह ं होती। इसी कार खड़ी बोल के आधार पर मानक ह(द का <वकास अवVय हुआ है ;क(तु खड़ी बोल ह ह(द
को उसके अपने ह घर म9 तोड़ने का षडयं अब <वफल हो गया है Eय8;क 1991 क भारतीय जनगणना के अंतगत जो
भारतीय भाषाओं के <वVलेषण का P(थ काशत हुआ है उसम9 मातभ
ृ ाषा के Sप म9 ह(द को वीकार करने वाल8 क
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नह ं है । त7वतः ह(द भाषा े के अ(तगत िजतने भा<षक Sप बोले जाते ह] उन सबक समिट का नाम ह(द है । ह(द

संZया का तशत उ7तर दे श (उ7तराखंड राoय स हत) म9 90.11, Cबहार (झारखKड राoय स हत) म9 80.86, मWय दे श
(छ7तीसगढ़ राoय स हत) म9 85.55, राजथान म9 89.56, हमाचल दे श म9 88.88, हBरयाणा म9 91.00, दkल म9 81.64
तथा चKडीगढ़ म9 61.06 है ।
ह(द एक <वशाल भाषा है । <वशाल े क भाषा है । अब यह न<ववाद है ;क चीनी भाषा के बाद ह(द संसार म9 दस
ू रे
न>बर क सबसे अYधक बोल जाने वाल भाषा है ।
य द हम स>पूण योEताओं क संZया क ^िट से बात कर9 िजसम9 मातभ
ृ ाषा वEता (First Language Speakers) तथा
D<वतीयभाषा वEता(Second Language Speakers) दोन8 ह8 तो ह(द भा<षय8 क संZया लगभग एक हजार मलयन ;सौ
करोड़ hहै । दस
ू रे ‘ोत के P(थ (The Linguasphere Register of the World's Languages and Speech Communities) म9
इस ^िट से ह(द भा<षय8 क संZया 960 मलयन मानी गई है । जो माTणक तmय तत
ु ह] उनसे यह न<ववाद है
;क ह(द को संयुEत रा संघ क आYधकाBरक भाषा के Sप म9 मा(यता मलनी चा हए।

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