This file is an attempt to consolidate the information about

Amir Khusro given at the following website:
http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/amirgnth.htm
(August 23, 2007)
Note: This file is to be circulated with due credit given to above
website. This file is not meant for commercial use.

अमीर ख़ुसरो दहलवी
आज हम आपको ते रहवीं-चौदहवीं सद (संवत १२५३ ई./६५३
१३२५ ई./७२५
अजीम श

ह ी तक) के

ह ी से सन

ह द ु तान क उस रं गारं ग हनरमं
द, शानदार

सयत और अमर ह ती से िमलवाएँगे जसने बरबाद और आबाद ,

तबाह और तामीर (िनमाण करना), जंग और अमन तथा दख
ु और सुख के बीच
िनडरता एवं अपने बु
यह

िस

कौशल से एक बेहतर न कंज़दगी के बह र साल गुज़ारे ।

एवं लोक य श ख़सयत ह - तूती-ए- हं द यानी हज़रत अमीर

खुसरो दहलवी। इनका वा त वक अथात बचपन का नाम था - अबुल हसन

यमीनु न मुह मद। यह नाम इनके पता ने इ ह दया था जो बहत
ु ह िनडर

िसपहसालार एवं यो ा थे। अमीर खुसरो को बचपन से ह क वता करने का
शौक़ था। इनक का य
हसन ब कुल ह

ितभा क चकाच ध म, इनका बचपन का नाम अबुल

व मृत हो कर रह गया। अमीर खुसरो दहलवी ने धािमक

संक णता और राजनीितक छल कपट क उथल-पुथल से भरे माहौल म रहकर
ह द-ू मु लम एवं रा ीय एकता,

ेम, सौहादय, मानवतावाद और सां कृ ितक

सम वय के िलए पूर ईमानदार और िन ा से काम कया।
जयाउ न बरनी ने अपने ऐितहािसक

िलखा है

ंथ 'तार खे- फरोज शाह ' म

क बादशाह जलालु न फ़ रोज़

चुलबुली फ़ारसी क वता से

िस

इितहासकार

खलजी ने अमीर खुसरो क

प से

एक

स न होकर उ ह 'अमीर' का ख़ताब दया था जो

उन दन बहत
ु ह इज़ज़त क बात थी। उन दन अमीर का ख़ताब पाने वाल
का एक अपना ह अलग

तबा व शान होती थी।

अमीर खुसरो दहलवी का ज म उ र- दे श के एटा जले के प टयाली नामक
ाम म गंगा कनारे हआ
था। गाँव प टयाली उन दन मोिमनपुर या मोिमनाबाद

के नाम से जाना जाता था। इस गाँव म अमीर खुसरो के ज म क बात हमायू


काल के हािमद

बन फ़जलु लाह जमाली ने अपने ऐितहािसक

ंथ 'तज़ करा

सै ल आरफ न' म सबसे पहले कह । तेरहवीं शता द के आरं भ म द ली का
राजिसंहासन गुलाम वंश के सु तान के अधीन हो रहा था। उसी समय अमीर
खुसरो के पता अमीर सैफु न महमूद (मुह मद) तु क तान म लाचीन कबीले
के सरदार थे। कुछ लोग इसे बलख हजारा अफ़गािन तान भी मानते ह। चंगेज
खाँ के इस दौर म मुगल के अ याचार से तंग आकर ये भारत आए थे। कुछ
लोग ऐसी भी मानते ह क ये कुश नामक शहर से आए थे जो अब शर-ए-स ज

के नाम से जाना जाता है । ये व ते एिशया के तजा क तान और उ बे क तान
दे श क सीमा पर

थत है । उस समय भारत म कुतुबु न ऐबक (१२०६-१२१०

ई.) का दे हांत हो चुका था और उसके

थान पर उसका एक दास श शु न

अ तमश (१२११-१२३६ ई.) रा य करता था। अमीर खुसरो के

पता अमीर

सैफु न अपने लाचीन वाल के साथ पहले लाहौर और फर द ली (दे हली)
पहँु चे। यहाँ सौभा य से श शु न अ तमश के दरबार म उनक पहँु च ज द हो

गयी। अपने सैिनक गुण के कारण वे दरबार म फ़ौजी पद पर सरदार बन गए।
श शु न अ तमश के प ात शर फ और अ न पंसद बादशाह नािस

महमूद ने इ ह नौकर द । गुलाम खानदाने शाह के एक ज़बरद त और दबदबे

वाले त तनशीं बलबन ने अमीर को औहदा और प टयाली जला एटा म गंगा
कनारे जागीर द ।

अमीर खुसरो क माँ दौलत नाज़ ह द ू (राजपूत) थीं। ये द ली के एक रईस
अमीर एमाद ु मु क क

पु ी थीं। ये बादशाह बलबन के यु

मं ी थे। ये

राजनीितक दवाब के कारण नए-नए मुसलमान बने थे। इ लाम धम

हण करने

के बावजूद इनके घर म सारे र ित- रवाज ह दओं
के थे। खुसरो के निनहाल म

गाने-बजाने और संगीत का माहौल था। खुसरो के नाना को पान खाने का बेहद
शौक था। इस पर बाद म खुसरो ने 'त बोला' नामक एक मसनवी भी िलखी। इस

िमले जुले घराने एवं दो पर पराओं के मेल का असर कशोर खुसरो पर पड़ा।
जब खुसरो पैदा हए
ु थे तब इनके पता इ ह एक कपड़े म लपेट कर एक सूफ़
दरवेश के पास ले गए थे। दरवेश ने न हे खुसरो के मासूम और तेजयु

चेहरे

के दे खते ह त काल भ व यवाणी क थी - "आवरद कसे राके दो कदम। अज़
खाकानी पेश

वा हद बूद।" अथात तुम मे रे पास एक ऐसे होनहार ब चे को

लाए हो खाकानी नामक व

िस

व ान से भी दो कदम आगे िनकलेगा।

चार वष क अ प आयु म ह खुसरो अपने पता के साथ द ली आए और

आठ वष क अव था तक अपने पता और भाइय से िश ा पाते रहे । अमीर
खुसरो के पहले भाई ए जु न (अजीउ न) (इजजु न) अली शाह (अरबीफारसी

व ान) थे। दसरे
भाई

हसामु न कुतलग अहमद (सैिनक) थे। तीन

भाइय म अमीर खुसरो सबसे अिधक ती

बु

कमाल क भूिमका म अमीर खुसरो ने अपने

वाले थे। अपने

ंथ गुरतल

पता को उ मी अथात ् अनपढ़

कहा है । ले कन अमीर सैफु न ने अपने सुपु

अमीर खुसरो क िश ा-द

ा का

मकतब (मदरसा) म हई।
ु वे छ: बरस क उ

से ह मदरसा जाने लगे थे।

वयं

बहत
ु ह अ छा (नायाब)

बंध कया था। अमीर खुसरो क

ाथिमक िश ा एक

खुसरो के कथनानुसार जब उ ह ने होश स भाला तो उनके वािलद ने उ ह एक

मकतब म बठाया और खुशनवीसी क महका के िलए काजी असुद ु न मुह मद

(या साद ु न) के सुपुद कया। उन दन सु दर लेखन पर काफ बल दया जाता

था। अमीर खुसरो का लेखन बेहद ह सु दर था। खुसरो ने अपने फ़ारसी द वान
तुहफतुिस

(छोट उ

आयु) म

वंय इस बात का

अिभ िच और का य

का तोहफ़ा - ६७१

ह ी, सन १२७१, १६-१९ वष क

कया है

ितभा दे खकर उनके गु

क उनक

गहन सा ह यक

साद ु न या असद ु न मुह मद

उ ह अपने साथ नायब कोतवाल के पास ले गए। वहाँ एक अ य महान व ान
ख़वाजा इ जु न (अज़ीज़) बैठे थे। गु

ने इनक का य संगीत

ितभा तथा

'बैज' (अंडा). सद बैज-ए-अ बर बर आँ मूये जम अ त. 'तीर' और 'खरपुजा' (खरबूजा) .मधुर संगतीमयी वाणी क अ यंत तार फ क और खुसरो का इ तहान लेने को कहा। वाजा साहब ने तब अमीर खुसरो से कहा क 'मू' (बाल). फ़ौरन गले से लगाया और कहा क तु हारा सा ह यक नाम तो 'सु तानी' होना चा हए। यह नाम तु हारे िलए बड़ा ह शुभ सा बत होगा। यह वजह है क खुसरो के पहले का य सं ह 'तोहफतुिस ' क लगभग सी फ़ारसी गज़ल म यह सा ह यक नाम ह। बचपन से ह अमीर खुसरो का मन पढ़ाईिलखाई क अपे ा शेरो-शायर व का य रचना म अिधक लगता था। वे बड़े ह वनोद य.इन चार बेजोड़. चूँ खरपुजा ददांश िमयाने िशकम ् अ त।' अथातः उस यतम के बाल म जो तार ह उनम से हर एक तार म अ बर मछली जैसी सुग ध वाले सौ-सौ अंडे परोए हए ु ह। उस सु दर के जैसा सीधा-सादा मत समझो व जानो चुभनेवाले दाँत भी मौजूद ह। दय को तीर य क उसके भीतर खरबूजे जैसे वाजा साहब खुसरो क इस शानदार बाई को सुनकर च क पड़े और जी भर के खूब तार फ़ क . रिसक. हसोड़. और अ यंत मह वकां ी थे। वे जीवन म कुछ अलग हट कर करना चाहते थे और वाक़ई ऐसा हआ भी। खुसरो के ु रईस नाना इमाद ु मु क और स दय से दाय के महान सूफ़ पता अमीर सैफु न दोन ह याम वण िच तया सूफ़ साधक एवं संत हज़रत िनजामु न औिलया उफ़ . बेमेल और बेतरतीब चीज़ को एक अशआर म इ तमाल करो। खुसरो ने फौरन इन श द को साथकता के साथ जोड़कर फारसी म एक स :: रिचत क वता सुनाई 'हर मूये क दर दो जु फ़ आँ सनम अ त. चूँ तीर मदाँ रा त दलशरा जीरा.

क बामा यकनफस हमराज गरदद। अगर अबलह बुअद आँ मरदे . बयायद अंद या बाज़ गरदद।।' अथात: तू ऐसा शासक है क य द तेरे साद क चोट पर कबूतर भी बैठे तो तेर असीम अनुकंपा एवं कृ पा से बाज़ बन ज़ाए। खुसरो मन म यह सोच रहे थे क भीतर से संत का एक सेवक आया और खुसरो के सामने यह पद पढ़ा 'बयायद अंद मरदे हक कत. कबूतर गर नशीनद बाज गरदद। गुर बे मु तमंदे बर-दर आमद.नादाँ। अजाँ राहे क आमद बाज गरदद।।' .सु तानुल मशायख के भ साहब से धमद अथवा मुर द थे। उनके सम त प रवार ने औिलया ा ली थी। उस समय खुसरो केवल सात वष के थे। अमीर सैफु न महमूद (खुसरो के पता) अपने दोन पु को लेकर हज़रत िनजामु न औिलया क सेवा म उप थत हए। उनका आशय द ु िनजामु न क ख़ानक़ाह के पता के इस महान उ े य का ा दलाने का था। संत ार पर वे पहँु चे। वहाँ अ पायु अमीर खुसरो को ान हआ। खुसरो ने कुछ सोचकर न चाहते हए ु ु भी अपने पता से अनुरोध कया क मुर द 'इरादा करने' वाले को कहते ह और मेरा इरादा अभी मुर द होने का नह ं है । अत: अभी केवल आप ह अकेले भीतर जाइए। म यह बाहर ार पर बैठू ँ गा। अगर िनजामु न िच ती वाक़ई कोई स चे सूफ़ ह तो खुद बखुद म उनक मुर द बन जाऊँगा। आप जाइए। जब खुसरो के पता भीतर गए तो खुसरो ने बैठे-बैठे दो पद बनाए और अपने मन म वचार कया क य द संत आ या मक बोध स प न ह गे तो वे मेरे मन क बात जान लगे और अपने भीतर जाकर उनसे द ारा िनिमत पद के ा ा ारा मेरे पास उ र भेजगे। तभी म क गा अ यथा नह ं। खुसरो के ये पद िन न िल खत ह 'तु आँ शाहे क बर ऐवाने कसरत.

आहे आहे वा। मुँह माँगे बर संग है र . मेरे महबूब के घर रं ग है र । मोहे पीर पायो िनजामु न औिलया. तुम भीतर आओ.अथात . आहे आहे वा. फर द ु न औिलया. वो तो जहाँ दे खो मोरो (बर) संग है र । मोहे पीर पायो िनजामु न औिलया. आहे . मुइनु न औिलया मुहै यो न औिलया। आ मुहै योद न औिलया. ता क कुछ समय तक हमारे रह य-भागी बन सको। य द आगु तक अ ानी है तो जस रा ते से आया है उसी रा ते से लौट जाए।' खुसरो ने य ह यह पद सुना. ऐ गोरा रं ग मन भायो िनजामु न। . दे स-बदे स म। आहे ."हे स य के अ वेषक. फर द ु न औिलया. मेरे महबूब के घर रं ग है र । अरे अ लाह तू है हर. जग उ जयारो जगत उ जयारो। वो तो मुँह माँगे बर संग है र । म पीर पायो िनजामु न औिलया। गंज शकर मोरे संग है र । म तो ऐसो रं ग और नह ं दे खयो सखी र । ू म तो ऐसी रं ग। दे स-बदे स म ढढ़ फर हँू . वो तो मुँह माँगे बर संग है र । िनजामु न औिलया जग उ जयारो. िनजामु न औिलया-अलाउ न औिलया। अलाउ न औिलया. कुताबु न औिलया। कुताबु न औिलया मोइनु न औिलया. वे आ म वभोर और आनं दत हो उठे और फौरन भीतर जा कर संत के चरण म नतम तक हो गए। इसके प ात गु ने िश य को द ा द । यह घटना जाने माने लेखक व इितहासकार हसन सानी िनज़ामी ने अपनी पु तक तज क-दह-ए-खुसरवी म पृ ९ पर स व तार द है । इस घटना के प ात अमीर खुसरो जब अपने घर पहँु चे तो वे म त गज़ क भाँती झूम रहे थे। वे गहरे भावावेग म डू बे थे। अपनी य माताजी के सम कुछ गुनगुना रहे थे। आज क़ वाली और शा ीय व उप-शा ीय संगीत म अमीर खुसरो ारा रिचत जो 'रं ग' गाया जाता है वह इसी अवसर का मरण ह दवी म िलखी यह िस रचना इस व प है । कार है - "आज रं ग है ऐ माँ रं ग है र . मुहै योद न औिलया। वो तो जहाँ दे खो मोरे संग है र । अरे ऐ र सखी र .

मुँह माँगे बर संग है र । सजन िमलावरा इस आँगन मा। सजन. सजन तन सजन िमलावरा। इस आँगन म उस आँगन म। अरे इस आँगन म वो तो. द एवं पारांगत हो गए। यु ा द क ये कई वधाओं म वभू षत. म जब खुसरो केवल सात वष के थे तब इनके बहादरु पता ८५ वष क आयु म एक लड़ाई म शह द हो गए। तब इनक िश ा का भार इनके रईस नाना अमीर नवाब एमादलमु क रावत अज़ ने अपने ऊपर ले िलया। ु इनक माँ न इ ह नाज़ो िनयामत से पाला। वे वंय प टयाली म रहती थीं या फर द ली म अमीर रईस पता क शानदार बड़ हवेली म। नाना ने थोड़े ह दन म अमीर खुसरो को ऐसी िश ा-द िनपुण. कला क बार कयाँ भी खुसरो ने पहले अपने पता और फर नाना से सीखीं। इनके नाना भी यु जलवा अनेक बार के मैदान म अपना दिशत कर चुके थे। वे वंय बहत ु ह साहसी. उस आँगन म। अरे वो तो जहाँ दे खो मोरे संग है र । आज रं ग है ए माँ रं ग है र । ऐ तोरा रं ग मन भायो िनजामु न। म तो तोरा रं ग मन भायो िनजामु न। मुँह माँगे बर संग है र । म तो ऐसो रं ग और नह ं दे खी सखी र । ऐ महबूबे इलाह म तो ऐसो रं ग और नह ं दे खी। दे स वदे श म ढँू ढ़ फर हँू । आज रं ग है ऐ माँ रं ग है ह । मे रे महबूब के घर रं ग है र । सन १२६४ ई. बहादरु और िनडर थे और खुसरो को भी वैसी ह िश ा उ ह ने द । एमादलमु क खुसरो से ु अ सर कहा करते थे क डरपोक और कमज़ोर िसपाह कसी दे श ोह से कम नह ं। यह वह ज़माना अथवा दौर था जब खुसरो अपने समय के बहत ु से बु जी वय और शासक से स पक म आए। खुसरो ने बना कसी हचक व संकोच के अनेक सव म गुण को आ मसात कया। खुसरो म लड़कपन से ह का य रचना क वृ थी। कशोराव था म ह उ ह ने फ़ारसी के महान और जानेमाने क वय का गहन अ ययन शु अनुकरण म का य रचने का कर दया था और उनम से कुछ के यास भी कया था। अभी वह २० वष के भी नह ं हए ु थे क उ ह ने अपना पहला द वान (का य सं ह) तुहफतुिस (छोट उ .

कसी . ६७१ ह ी सन १२७१. जवानी के हालात का ज़ तथा येक कसीदे के आर भ म शे र है जो कसीदे के वषय को प है करता है । इन तमाम शेर को जमा करने से एक कसीदा हो जाता है जो खुसरो क ईजाद है । ये ज़यादातर सु तान गयासु न बलबन और उसके बड़े बेटे सु तान नसी न क शंसा म िलखे गए ह। एक तरक़ ब बंद म अपने नाना इमादल ु मु क का मिसया िलखा है जो सु तान गयासु न के कर बी सलाहकार और हमराज म से एक थे। उनके पास कई नाज़ुक व गु सूचनाएँ रहती थीं। इस ंथ म खुसरो ने अपना तख लुस या उपनाम सु तानी रखा है ।) पूण कर िलया। बावजूद इसके क वय क शैली का अनु म करने का भी एक वशेष ितभा क प िसयासी जानका रयाँ व य क अमीर खुसरो ने कुछ फ़ारसी कया था उनक इन क वताओं म कार क नवीनता और नूतनता थी। इस पर उनक अिभनव छाप है । उस समय खुसरो केवल एक होनहार क व के नह ं उभरे थे ब क उ ह ने संगीत स हत उन तमाम वधाओं का भाँित ा प म ान भी भली कर िलया था जो उस समय और दौर के कसी भी सुस य य िलए अिनवाय था। वह एक खर.का तोहफ़ा. राजधानी म हर एक गए। हर य य को उनक रोचक और आनंदमय संगित ने अपनी पु तक तुहफतु स क भूिमका म के वे ेम पा बन य थी। अमीर खुसरो वंय िलखा है क . १६-१९ वष) (जवानी के आरं भ काल म रिचत यह द वान फ़ारसी के िस क व अनवर . संवेदनशील. सनाई आ द उ ताद से भा वत है । इसक भूिमका म बचपन क बात."ई र क असीम कृ पा और अनुकंपा से म बारह वष क छोट अव था म ह लगा जसे सुनकर बड़े -बड़े के बाई कहने व ान तक आ य करते थे और उनके आ य से मेरा उ साह बढ़ता था। मुझे और अिधक या मक क वता िलखने क ेरणा क वता क उ च िश ा दे कर मेर लेखनी को बेचाल चलने से रोकता। म ाचीन िमलती थी। उस समय तक मुझे कोई का य गु नह ं िमला था जो मुझे और नवीन क वय के का य का गहराई व अित ग भीरता से मनन करके उ ह ं से िश ा करने क हण करता रहा।" इससे यह साफ़ प ितभा खुसरो म ज मजात थी तथा इसे उ ह ने होता है क क वता वंय सीखा. हा ज़र जवाब और जीव त य थे। इसी कारण बहत ु ज द ह . खाकानी.

१२९८ ई. तक) इसम कुल पाँच मसन वयाँ ह – (१) मतला उल अनवार . १३०१ ई. क तु इनके का य गु शमशु न माने जाते ह। इसका कारण यह बताया जाता है खुसरो के व िस क ंथ 'पंचगंज' अथवा ख़ साऐ खुसरो को शु ख़वाजा वा रजी ने कया था। ख साऐ खुसरो . नैितक तथा आ या मक बात ह। इसम खुसर इकलौती लड़क को सीख द है । उ ने अपनी ४५ वष। (२) शीर व खुसरो .िनजामी के खुसरो व शीर ं का जवाब है । ६९८ ह ी। सन १२९८ ई.गु से नह ं। आशु क वता करना उनके िलए बाँए हाथ का खेल था। यह भी सवमा य है क खुसरो स ह वष क छोट आयु म ह एक उ कृ के प म द ली के सा ह यक ितभा पर उनके गु कंथ इनक सरस एवं े कव म छा गए थे। उनक इस अ ुत का य हज़रत िनजामु न औिलया को भी फ था। इनका मधुर ांजल क वता का ॠंगार था। जस का य गो ी अथवा क व स मेलन म अमीर अपनी क वता सुनाते थे उसम एक ग भीर स नाटा छा जाता था। िनसंदेह अमीर खुसरो दहलवी ज मजात क व थे। इ ह ने क वता िलखने व पढ़ने का ढं ग कसी से नह ं सीखा. उ ४५। खुसरो ने ेम क पीर को ती तर बना दया है । इसम खुसरो ने अपने बड़े बेटे को सीख द है । .या पंचगंज या खुसरो क पंचपद । अमीर खुसरो क वशाल और सावभौिमक ितभा ने 'खुदाए सुखन' अथात का य कला के ई र माने जाने वाले क व िनजामी गंजवी के ख स के जवाब म इसे िलखा है । यह उ ह ने ६९८ ह ी से ७०१ ह ी के बीच िलखा यानी (१२९८ ई.िनजामी के 'मखजनुल असरार' का जवाब है । ६९८ ह. (अथात रोशनी िनकालने क जगह) क व जामी ने इसी के अनुकरण पर अपना तोहफतुल अबरार (अ छे लोग का तोहफा) िलखा था। इसम अिधकांश धािमक.

िनज़ामी के िसकंदरनामा का जवाब। ६९९ ह ी। (सन १२९९ ई. अरबी से फ़ारसी क वता क भारत क फ़ारसी अ य दे श के मुक़ाबले शु आ द अनेक बात पर व े े ता.(३) मजनूँ व लैला . क वता के गुण.िनजामी के ह त पैकर का जवाब। (१७०१ ह ी। १३०१ ई. इसक भूिमका काफ़ बड़ एवं व तृत है । इसम खुसरो ने अपने जीवन संबंधी बहत ु सी रोचक बात द ह. बहत ु .) वीर रस। इसम िसकंदरे आजम और खाकाने चीन क लड़ाई का व तृत वणन है । इसम खुसरो अपने सबसे छोटे लड़के को सीख दे ते ह। इसम रोजी कमाने.िनजामी के लैला मजनूँ का जवाब। ६९९ ह ी (१२९९ ई.) उ ४६ ेम तथा ॠंगार क भावनाओं का िच ण। (४) आइने िसकंदर . सबसे बड़ा द वान. मज़हब क पाबंद करने और सच बोलने क वह ु तरक़ ब है जो उ ह ने अपने बड़े बेटे को अपनी मसनवी शीर खुसरो म द है । (५) ह त-ब ह त . ह. सूफ़ और म खाकानी और सनाई एवं कसीदे के इ माइल ह। खुसरो क गज़ल तो भाव और कला क बड़े -बड़े संगीत य कया है े म कमाल से इतनी उ म ह क उ ह गा गा कर लोग को आनंद वभोर करते थे। उनम अनेक ेम के दशन होते ह। इन सभी का य म का य का मनो गोचर होता है । खुसरो ने वयं अपनी क वता क अनेक शंसा क है । वे अपने द वान गुरतुल कमाल (शु ल प प थल पर क पहली कलाम क रात) (६९३ ह ी। सन १२९३ ई. हनर (कला) सीखने.) फ़ारसी क सव े कृ ित। इसम इरान के बहराम चोर और एक चीनी हसीना (सु दर ) क का पिनक ेम गाथा है । कहानी वदे शी है । अत: भारत से संबंिधत बात बहत ु कम ह। इसका वह भाग बेहद ह मह वपूण है जसम खुसरो ने अपनी बेट को संबोिधत कर उपदे शजनक बात िलखी ह। अमीर खुसरो ने वंय अपने गु ओं के नाम उ ह ने अनुसरण कया है अथवा उनका भाव पड़ा है । गज़ल के नीित संबंधी का य े य का उ लेख अथवा अ े म साद . का य और छं द के भेद काश डाला गया है । इस द वान म व मसन वयाँ. मसनवी के े थल पर उदा हम जनका प से इन पर म िनज़ामी. तीसरा द वान ३४-४३ वष.

ु इितहासकार. िन ावान राजनीित . म खुसरो जब बीस वष के थे तब ११३ वष क आयु म उनके नाना एमादलमु क रावत अज़ का वगवास हो गया। ऐसे समय ु म जब क खुसरो को इतनी अिधक लोक यता िमल रह थी. नता और कसीदे ह। मसन वय म िमफताहल ु फ़तूह बहत ु िस है । मरिसय म खुसरो के बेटे तथा फ़ रोज़ खलजी के बड़े लड़के या साहबज़ादे महमूद ख़ानखाना के मरिसए उ लेखनीय ह। एक बड़ नात ( तुित का य : मुह मद साहब क तुित) है जो खाकानी से भा वत ज़ र है पर अपना अनोखा व नया अंदाज िलए है । कसीद म खुसरो का सबसे अिधक िस क़सीदा 'द रयाए अबरार' (अ छे लोग क नद ) इसी म है । इसम हज़रत िनजामु न औिलया क तार फ़ है । अ य कसीदे जलालु न और अलाउ न खलजी से संबंिधत है । इसम अरबी . खगोल शा ी. वदषक ू . गीतकार. संगीत शा ी.सी बाइयाँ. संगीतकार. दाशिनक. नृतक. शान से िलखते ह - "जब म केवल आठ बरस का था मेर क वता क ती उड़ाने आकाश को छू रह ं थीं तथा जब मेरे दध ू के दाँत िगर रहे थे. वादक. उस समय मेरे मुँह से द ि मान मोती बखरते थे।" यह कारण है क वे शी ह तूत-ए. कोषकार. वैध. मरिसये. तथा िस ह त शूर वीर यो ा थे। सन १२७३ ई. बहभाषी . गायक. भाषा व .और तुक अमीर खुसरो गुरतुल कमाल क श द का योग है ।) भूिमका म गव से. गज़ल. सा ह यकार.ह द के नाम से मशहर ू हो गए थे। यह नाम खुसरो को ईरान दे श के लोग ने दया है । य तो खुसरो म ितभा नैसिगक थी तथा प क वता म सवत: स दय और माधुय ख़वाजा िनजामु न औिलया के वरदान का भी प रणाम माना जाता है । उ ह ं के से खुसरो के का य म सूफ़ शैली एवं भ क गहराई तथा भाव ेम क उदा यंजन उपल ध होती है । वा तव म औिलया साहब के आश वाद ने उ ह ई र य दत ू ह बना दया था। इतना असीिमत व गहरा ेम। अ त। ु अमीर खुसरो बहमु ु खी ितभा संप न य थे। वे एक महान सूफ़ संत. लेखक. योतषी. कते . उनके नाना के . पु तकालया य . क व (फारसी व ह दवी).

दे हावसान से उ ह जीवन का एक अित चंड आघात पहँु चा य क उनके वािलद तो पहले ह परलोक िसधार चुके थे। अब खुसरो को अपनी रोज़ी रोट क िच ता हई। अत: अब उ ह अपने िलए एक ु शी ह खुसरो को एक थाई रोज़गार खोजने पर ववश होना पड़ा। नेह और उदारचेता संर क ा हो गया। ये था द ली का सुलतान गयासु न बलबन का भतीजा अलाउ न मुह मद कलशी खाँ उफ़ मिलक छ जू। (सन १२७३ ई. आ मां हे मिलक छ जो नमोद।" अथात . कड़ा इलाहबाद का हा कम) ये अपनी वीरता और उदारता के िलए व यात था। इसक वीरता के चच सुनकर और वच के दवाब के कारणवश इराक क गवनर िस और श संप न मंगोल हलाकू ने उसे आधे ताव दया था और उसक ने उसे एक आदश य वीकृ ित चाह थी। अमीर खुसरो तथा शासक पाया और दो वष वे उसके राजदरबार म शान बने रहे । मिलक छ जू भी खुसरो से बड़ कृ पा और ेम का यवहार करता था। एक बार अमीर खुसरो उसके दरबार म बहत ु ह दे र से पहँु चे। बादशाह बहत ु गु से म था य क कुछ चुगलखोर व खुसरो से जलने वाले दरबा रय ने खुसरो के ख़लाफ़ बादशाह के कान भर दए थे। इन दरबा रय ने बादशाह को भड़का दया क आजकल खुसरो अपने गु अिधक समय िनजामु न औिलया क सेवा म यतीत करते ह और राजदरबार से उ ह कोई मतलब नह ं। बादशाह ने जरा स ती से खुसरो से दरबार म दे र से आने का कारण पुछा। खुसरो ने अपने वनोद य.आज जब म घर से दरबार के िलए बाहर िनकला तो मेर सुबह से मुलाक़ात हो गई। मने सुबह से पूछा क बता तेरा सूरज कहाँ है ? तो आसमान ने मुझे मिलक छ जू क सूरत दखा द ।" यह वाक़या कसीदे के प म सुनकर बादशाह के चेहरे पर अचानक ह मु कुराहट आ गई और उसका सारा गु सा . चुलबुले वभाव व हा ज़र जवाबी का सबूत दे ते हए ु तुर त बादशाह क तार फ़ और हा यजनक क़सीदा सुनाया। ये है - के जवाब म एक फ़ारसी का चुलबुला व "सुभा राव गु तम क खुश द अद खुजा त.

खुद ह मेहमान ह। कभी हमार तरफ़ समाना आओ तो तु ह और भी इनाम दगे। छ जो तु ह नागवारा तो नह ं गुज़रा सरकार क ओर से इनाम य मेरे भाई क तु हारे दरबार शायर को हमार दया जाए। और वो भी तु हार मौजूदगी म तथा . हमारे मेहमाने अजीज के सामने"। तब अमीर खुसरो ने अपनी एक ताजा फ़ारसी क गज़ल सुनाई – "सर इन खदद ु ु जुई न दौरत क ितदौर । इन नरिगसी जौबई न दौलत क ितदौर । इ नुशते अमा जुल खबमा यास खरामा इन ह केई गेसूई न दौरत क ितदौर ।" अथात .काफ़े◌ूर हो गया। दरबा रय के मुँह से भी वाह िनकली। अमीर खुसरो से जलने वाले सम त दरबार बहत ु ह मायूस हए ु तथा हत भ रह गए। बादशाह ने स न होकर अमीर खुसरो को दरबार म दे र से आने के िलए माफ़ ह नह ं कया ब क इस हा यजनक क़ से को सुनाकर हँ साने के िलए इनाम भी दया। मिलक छ जू के राजदरबार म खुसरो केवल दो वष ह टक पाए। हआ ु यूँ क एक रात शहनशाह ह द ु तान गयासु न बलबन का बड़ साहबज़ादा. गवैये और शायर भी। हम भी तो ज़रा इसक झलक दे ख।" यह सुनकर मिलक छ जू ने हु म दया ."वाह ! अरे ऐसे ह रे िलए बैठे हो जाने ादर। अरे ऐसे आबदार ह रे मोती तो हमारे खजाने म भी नह ं। हम बहत ु ख़ुश हए। ु अश कफ़य का ये थाल हमार ओर से शायर खुसरो को सस मान दया जाए। खुसरो अभी तो हम सफ़र म ह."यमीनु न खुसरो अपना कलाम पेश कर. 'बुगरा खाँ' िमलने आया मिलक छ जू से । उसने त काल फ़रमाइश क . "मेरे अज़ीज़ भाई छ जू तु हारा बड़ा नाम है । अरे एक से एक नामवर तु हारे सामने गदन झुका कर बैठता है । सूरमाँ .तेर इन नरिगसी आँख और काली हसीन जु फ के आगे दौलत या चीज है । यह मधुर व कण य गज़ल सुनकर बुगरा खाँ बोला .

लेखक के नाते उनके नाजुक व भावुक दल को बहत ु दख पर तु खुसरो के ह ठ िसले रहे । इस ददनाक मं पर खुसरो ने कुछ ु हआ। ु नह ं िलखा। उनक लेखनी मौन रह । खुसरो जैसे होश था? इस खूनी मं म। लखनौती म वजय ेमी जीव को शायर का कहाँ ा करने के प ात बलबन ने बुगरा खाँ को लखनौती व बंगाल का माशल लौ (एडिमिन वह ं छोड़ े टर) मुकरर कर के दया। शाहजादे को सलाह और राय दे ने के िलए शमशु न दबीर को िनयु िस कव कया गया था। उसने व बुगरा खाँ ने दरबार शायर . चीड़-फाड़ और अंधाधुध ं लूटमार क िशकायत क । अमीर खुसरो ने अपनी जंदगी म पहली बार इतने कर ब से जंग को दे खा तथा उसके दद को गहराई से महसूस कया। उ ह ने बड़े पैमाने पर तबाह को महसूस कया। एक कलाकार. क लगाह हई। ु खुद शहज़ादा बुगरा खाँ ने अपने पता बलबन से इस बेदद."सामाने शफर को ख करो। त ते दे हली से यह हु म पहँु चा है क पंजाब क फौज ले कर बंगाल पहँु चो। हम खुद ल कर ले कर जाएँगे। शायर खुसरो साथ जाऐगा। फर सामाना से लखनऊ क ओर कूच करगे।" मैदाने जंग म भयंकर यु हआ। जतनी ु जबरद त बगावत थी उतनी ह बेरहमी से कुचली गयी। दे हली और पंजाब क फौज ने खड़े खेत जला दए। बािगय को गधे क खाल म भरवाकर सरे बाज़ार जलाया गया। फाँिसयाँ. शायर. कताबखानी और श ले जवानी के रात.तुमसे बना पूछे।" ऊपर से तो मिलक छ जू ने कह दया क उसे बुरा नह ं लगा पर अंदर से उसे अमीर खुसरो पर बेहद गु सा आया क उसके दरबार म बना उसक इजाज़त के अमीर खुसरो ने दसर सरकार से ईनाम िलया। कड़ा के होने ू वाले सूबेदार मिलक छ जू क कड़ नज़र अमीर खुसरो ने पहचान ली थीं। इससे पहले क मिलक छ जू के गु से का तीर.दन चल रहे थे क अचानक ह बंगाल से बगावत क खबर आई। बुगरा खाँ ने कहा . खुसरो को िनशाना बनाता. शरोशायर . वे तीर क तरह उसक कमान से िनकल गए। और सीधे बलबन के छोटे लड़के बुगरा खाँ (सन १२७६ ई.) के यहाँ गए जो मुलतान (पंजाब) के िनकट सामाना म बलबन क छावनी का शासक व संर क था जो अब मौजूदा दौर म प टयाला (पंजाब) म है । बुगरा खाँ ने अमीर खुसरो को अपना 'नमीदे खास' (िम ) बना कर रखा। बुगरा खाँ ने खुसरो को बुलबले-हजार-दा तान क उपािध द । मौज़-म ती.

गु आ या मक लगाव.'तब आश वाद के बदले रोट बेचता हँू ।' इस के प रणाम व प हसन और खुसरो म ऐसी घिन ो र ू िम ता हई व अटट क वे ु ज म भर साथ-साथ रहे । शर र दो थे पर आ मा एक। इस िम ता के िलए ."माँ क ममता.खुसरो को बहत ु रोका मगर वो हज़ार बहाने कर के शाह ल कर के साथ द ली चले आए। अपनी माँ दौलत नाज और गु िनजामु न औिलया के कदम म। खुसरो ने बुगरा खाँ और कलशी खाँ क श ुता के कारण वहाँ रहना उिचत न समझा और त काल सरकार सेना के साथ द ली चले आए। द ली म इस वजय क खुशी म घर-घर द प जलाए गए थे। वंय अमीर खुसरो अपने एक द वान म. इस वषय म व तार से िलखते ह क .'म एक पलड़े म रोट रखता हँू और ाहक से कहता हँू दसरे पलड़े म सोना रख। सोने का पलड़ा झुकता है तो रोट ख़र ददार ू को दे ता हँू ।' खुसरो ने कया क ाहक गर ब हो तब? हसन ने बेहद ह सहजता से जवाब दया . और दे हली क मोह बत. और दरबार आना-बान व ठाट-बाट के तो कहने ह या?" इस दौरान अमीर खुसरो क िम ा हसन िस जी दे हलवी से हई। हसन भी ु फारसी म कवता करता था। उसक नानबाई क दकान थी। वह खुसरो क तरह ु रईस नह ं था पर फर भी खुसरो ने उसके नैसिगक गुण दे ख कर उससे िम ता क । ये जग िस कृ ण और सुदामा क िम ता से कसी भी थी। समय-समय पर खुसरो ने अपने िम कार कम न के िलए कपट सहे । इसका ज़ आगे करगे। पहले यह दे ख क यह िम ता व मुलाकात कैसे हई ु ? हसन अपनी दक ु ान पर रो टयाँ बेच रहा था। तँदरू से गरम-गरम गदबाद रो टयाँ थाल म आ रह ं थीं। तो उनक ाहक हाथ हाथ खर द रहे थे। अमीर खुसरो दकान के सामने से गुजरे ु हसन िस जी पर पड़ । अमीर खुसरो बचपन से ह हँ सी-मज़ाक़ व शरारत म आनंद लेने वाले बेहद ह हसन से पूछा . गंगा-जमुना के का कनारे मुझे हर जगह से. हर एक कदरदान से खच लाती थी। मेर शायर तो उड़ फरती थी और म खुद उड़ फर कर दे हली या प टयाल चला आता था। मगर आ खर घर बढ़ा.'नानबाई रो टयाँ वनोद य य थे। उ ह ने हँ सते हए ु या भाव द ह?' हसन ने भी बहत ु सोच समझ कर त काल उ र दया . खच बढ़े .

दल बढ़ाता था। सु तान मोह मद ने ईरान के िस फ़ारसी क व शेख़ साद को अपने दरबार म आने के िलए आमं त कया। शेख़ साद ने अपनी वृ ाव था के कारण आने म असमथता य क और कहा क ह द ु तान म अमीर खुसरो जैसा कमाल का शायर मौजूद है । उनक जगह अत: खुसरो को बुलाया जाए। खुसरो के िलए साद क यह िसफ़ा रश उनक महानता का ह प रचायक है । इससे पता चलता है क उस समय खुसरो क दरू-दरू तक फैली थी। बीच म खुसरो याित व िस ित वष द ली आते जाते रहे । अंितम वष मंगोल के एक ल कर ने अचानक ह हमला कर दया। बादशाह के साथ अमीर खुसरो भी अपने िम हसन िस जी के साथ लड़ाई म स मिलत हए। ु कतनी रोचक बात है क एक शायर यु के मैदान म जंग लड़ रहा है । कहते ह क अमीर खुसरो जंग के मैदान म एक हाथ म तलवार तो दस ू रे हाथ म कताबदान िलए बड़ शान से िनकला करते थे। खैर.खुसरो को अनेक लांछन सहने पड़े पर िम ता म कसी आई। दोन िम कार क कोई कमी न को गयासु न बलबन के दरबार म उ च ारं िभक दन म खुसरो ने बलबन क थान िमला। शंसा म अनेक कसीदे िलखे। द ली लौटने पर गयासु न बलबन ने अपनी जीत के उपल य म उ सव मनाया। उसका बड़ा लड़का सु तान मोह मद अहमद (मु तान. द पालपुर क सरहद छावनी) भी उ सव म स मिलत हआ। खुसरो को अब दसरे आ यदाता क ू ु ज़ रत थी। उ ह ने सु तान मुह मद को अपनी क वता सुनाई। उसने खुसरो क क वताएँ बहत ु पसंद क और उ ह अपने साथ मुलतान ले गया। यह सन १२८१ का वाक़या है । वहाँ िसंध के रा ते सू फ़य . इस यु म द ु मन क ताक़त का पता बहत ु दे र से चला। ह द ु तानी फ़ौज बेख़बर का िशकार हो गई। हवा पलट गई। शाहज़ादा जंग के मैदान म मारा गया। खुसरो और हसन भी मैदाने जंग म िगर तार हए। एक मंगोल सरदार खुसरो को घोड़े के पीछे दौड़ाता ु . साधुओं और क वय का अ छा आना जाना था। मु तान म पंजाबी-िस धी बोिलयाँ िमली-जुली चलती थीं। खुसरो ने यहाँ लगभग पाँच साल शायर और संगीत के नए-नए तजुब कए। शहज़ादे क परख गज़ब क थी। हर कमाल क जी खोल कर तार फ़ करता. दरवेश .

"शह द के र ने जल क तरह धरती को लीप दया। क़ै दय के चेहर को र सय से इस तरह बाँध दया जैसे हार म फूल गूँदे जाते ह। ज़ीन के त म क गाँठ से उनके िसर टकराते थे और लगाम के फ दे म उनक गदन घुटती थी। मुझे जल वाह के समान तेज़ी से भागना पड़ा और ल बी या ा के कारण मेरे पैर म बुदबद क तरह फफोले उठ आए तथा पैर छलनी हो गए। इन मुसीबत के कारण जीवन तलवार क मूठ क तरह कठोर जान पड़ने लगा। और शर र कु हाड़ के ह थे के समान सूख गया।" दो वष प ात कसी कार अपने कौशल और साहस के बल पर अमीर खुसरो ू कर वापस द ली लौटे । लौटने पर वे गयासु न बलबन श ुओं के चुग ं ल से छट के दरबार म गए और सुलतान मोह मद क मृ यु पर बड़ा क ण मिसया पढ़ा। इसे सुनकर बादशाह इतना रोये क उ ह बुखार आ गया और तीसरे दन उसका दे हांत हो गया। (सन १२८७)। इसके प ात खुसरो द ली म नह ं रहे । अपनी माँ के पास प टयाली गए। वहाँ कुछ समय िचंतन म बताया। ाम चले वंय खुसरो िलखते ह-"म इ ह ं अमीर क सोहबत से कट कर माँ के साए म रहा। दिनयादार से आँख मूँद कर ु गरमा गरम गजल िलखी. ह.६८४ ह ी सन १२८४) पूरा करने म लगा था। एक तरफ कनारे पड़ा हआ दल को गरमाने वाली गजल िलखता रहता था। राग-रगािनयाँ ु बुझाता था।" वसतुल हयात म १८-२४ वष और ब ीस से ततीस साल क उ तक का कलाम है । कसीदे यादातर सुलतान मोह मद.हआ और फर घसीटता हआ हरात और बलख ले गया। वहाँ खुसरो को क़ले ु ु म बंद बना िलया गया। कारागार म रहते समय खुसरो ने अनेक शोक गीत (मिसये) िलखे जनम मंगोल के साथ यु करते समय राजकुमार सुलतान मोह मद क वीरतापूण मृ यु का उ लेख था। खुसरो ने अपनी कारावास कथा बड़ ह मािमक शैली म िलखी है . शमशु न दबीर तथा जलालु न खलजी क तार फ म ह। सु तान मोह मद पर मिसया भी है । कसीद म खाकानी और . कैकुबाद. कशलू खाँ. बलबन. दोहे िलखे। अपने भाई के कहने से पहला द वान तोहफतु स तो तैयार हो चुका था। दसरा द वान व तुल हयात ( जंदगी के ू बीच का भाग . िनजामु न औिलया. बुगरा खाँ.

लुटाया. खलाया.कमाल अ फहानी क का य शैली को अपनाने क कोिशश क गई है । इसके बाद सन १२८६ ई. त कालीन इमारत. मगर म चला। वतन बुलाता धरती पुकारती है । अब तक अमीर खुसरो क भाषा म बृज व खड़ (दहलवी) के अित र पंजाबी."वाह या सादाब सरजमीं है ये अवध क । दिनया जहान के फल-फूल मौजूद। कैसे अ छे मीठ ु बोली के लोग। मीठ व रं गीन त बयत के इं सान। धरती खुशहाल जमींदार मालामाल। अ मा का खत आया था। याद कया है । दो म हने हए ु पाँचवा खत आ गया। अवध से जुदा होने को जी तो नह ं चाहता मगर दे हली मेरा वतन. मूल वषय है बलबन के पु कैकुबाद का ग पर बैठना. दिनया का अलबेला शहर और ु फर सबसे बढ़कर माँ का साया. फर पता बुगरा खाँ से झगड़ा और अंत म दोन म समझौता। उस समय के रहन सहन. मेरा शहर. नृ य आ द क िच ण। इसम द ली क वशेष प से तार फ है । अत: इसे मसनवी दर िसफत-ए-दे हली भी . ज नत क छाँव। उ फो ओ दो साल िनकल गए अवध म। भई बहत ु हआ। ु अब म चला। हाितमा खाँ दलो जान से तु हारा शु या मगर म चला। जरो माल पाया. संगीत. बंगला और अवधी क भी चा ी आ गई थी। अमीर खुसरो क इस भाषा से ह द के भावी यापक व प का आधार तैयार हआ जसक सश ु नींव पर आज क प रिन त ह द खड़ है । सन १२८८ ई. म खुसरो द ली आ गए और बुगरा खाँ के नौजवान पु कैकुबाद के दरबार म बुलाए गए। कैकुबाद का पता बुगरा खाँ बंगाल का शासक था। जब उसने सुना क कैकुबाद ग वे छाचार और वलासी हो गया है तो अपने पु पर बैठने के बाद को सबक िसखाने के िलए सेना ले कर द ली पहँु चा। ले कन इसी बीच अमीर खुसरो ने दोन के बीच शांित संिध कराने म एक मह वपूण भूिमक िनभाई। इसी खुशी म कैकुबाद ने खुसरो को राजस मान दया। खुसरो ने इसी संदभ म करानु सादै न (दो शुभ िसतार का िमलन) नाम से एक मसनवी िलखी जो ६ मास म पूर हई। (६८८ ु ह ी। सन १२८८ उ ३५ वष. म खुसरो अवध के गवनर (सूबेदार) खान अमीर अली सृजनदार उफ हाितम खाँ के यहाँ दो वष तक रहे । यहाँ खुसरो ने इ ह ं अमीर के िलए 'अ पनामा' नामक पु तक िलखी। खुसरो िलखते ह .

आज कुछ कल कुछ।" खुसरो को करानु सादै न मसनवी पर मिलकुशओरा क उपािध से वभू षत कया गया। सन १२९० म कैकुबाद मारा ् गया और गुलाम वंश का अंत हो गया। बीच म कुछ समय के िलए शमशु न कैमुरस बादशाह बना पर अंतत: स र वष य जलालु न खलजी सन १२९० म द ली के तख़त पर आसीन हआ। ु स मान दया। ये ेम से खुसरो को हदहद ु ु (एक सुर ला प ी) कह कर पुकारते खुसरो से इसका संबंध पहले से ह था। इ ह ने भी अपने दरबार म खुसरो को थे। इ ह ने अमीर क पदवी खुसरो को द । अब अबुल हसन यमीनु न 'अमीर खुसरो' बन गए। इनका वज़ीफ़ा १२. वधा एवं कला ेमी तथा पारखी था। फ़ारसी क व ख़वाजा हसन. श शा खातून और तुमती आ द का उनके दरबार से संबंध था। जालालु न क तार फ़ म . ये न भूलो क तुम दिनयादार भी हो. िन ा. साधु कृ ित. नाराज ह. नुसरत नतक . दल म गाँठ है . त वीर मने इसम खच द है फ ज क रहती दिनया तक रहगी। कैसा इनाम? कहाँ के हाथी-घोड़े ? मुझे तो ु है क इस मसनवी म अपनी पीरो मुरिशद हजरत वाजा िनजामु न का कैसे परोऊँ? मेरे दल के बादशाह तो वह ह और वह मेर इस न म म न ह . शाद क . मुफिलस और खुशहाल क . दरबार सरकार ु से अपना िसलिसला बनाए रखो। मगर दरबार से िसलिसला या है िसयत इसक । तमाशा है . यह कैसे हो सकता है ? वाजा से बादशाह खफा है .००० तनका सालाना तय हआ और बादशाह ु के ये ख़ास मुहािसब हो गए। जलालु न स य. ऐसी-ऐसी रं गीन. संगीत ाएँ फुतूहा. गमी क . जलता है । वाजा िनजामु न औिलया ने शायद इसी याल से उस दन कहा होगा क दे खा खुसरो." या तार खी वाकया हआ। बेटे ने अमीर क सा जश ु से त त हिथया िलया. बाप से जंग को िनकला। बाप ने त त उसी को सुपुद कर दया। बादशाह का या? आज है कल नह ं। ऐसा कुछ िलख दया है क आज भी लु फ दे और कल भी जंदा रहे । अपने दो त . इितहासकार जयाउ न बरनी.कहते ह। शेर क भरमार है । अमीर खुसरो अपनी इस मसनवी म िलखते ह क कैकुबाद को उनके गु िनजामु न औिलया का नाम भी सुनना पसंद नह ं था। खुसरो आगे िलखते ह . द ु मन क . संगीत मुह मद शाह.

मुगल को हराना. सु दर कशोर ललनाएँ नृ य करने लगती तो अमीर खुसरो क गज़ल मधुर वर लह रय पर उ चा रत हो उठतीं। ले कन इसके बावजूद भी खुसरो अपनी सूफ़ वाले प से पूणत: याय करते । खुसरो अपे ाकृ त एक धािमक य थे। उ ह ं के एक कसीदे से यह व दत होता है क वे मु य-मु य धािमक िनयम का पालन करते थे. हँ सते थे. नत कय के नृ य एवं गायन को भी दे खते थे और सुनते थे. नमाज पढ़ते थे तथा उपवास रखते थे। वे शराब नह ं पीते थे और न ह उसके आ द थे। बादशाह क अ याशी से उ ह ने अपने दामन को सदा बचाए रखा। वे द ली म िनयिमत औिलया साहब क ख़ानक़ाह म जाते थे फर भी वे नीरस संत नह ं थे। वे गाते थे. अवध क जीत. उ ३७ म जलालु न क चार वजय का वणन. मिलक छ जू क बगावत और उसको सजा.अमीर खुसरो ने कसीदे िलखे जो गुरतुल कमाल म ह। खुसरो ने अपनी िस मसनवी म ताहल ु फ़तूह ( वजय क कंजी) (६९० ह ी/ सन १२९० ई. छाइन क है । इसम शेर क भरमार है । जलालु न वजय आ द का वणन खलजी ने खुसरो को मुसहफदार ( मुख लाइ े रयन) और क़ुरान क शाह ित का र क बना दया। जलालु न ने अपनी इस अिधक आयु म भी अपनी िचय को नह ं बदला था। खुसरो हर शाम उसक मह फ़ल म एक गज़ल तुत करते और जब साक़ जाम भर दे ता. तथा शाह और शहजाद क शराबमह फ़ल म भाग ज़ र ले ते थे मगर तट थ भाव से । यह कथन खुसरो के समकालीन इितहासकार जयाउ न बरनी का है । खुसरो अब तक अपने जीवन के अड़तीस बसंत दे ख चुके थे। इस बीच मालवा म िच ौड़ म रणथ भोर म बगावत क ख़बर बादशाह जलालु न को एक िसपाह ने ला कर द । बगावत को कुचलने के िलए बादशाह वंय मैदाने जंग म गया। बादशाह ने जाने से पूव भरे दरबार म ऐलान कया- 'हम यु को जाएँगे। तलवार और साज़ क झंकार साथ जाएगी। कहाँ है वो हमारा हदहद। वो शायर। वो भी हमारे साथ रहे गा साये क तरह। ु ु खुसरो अपने य खुसरो?' थान से उठ खड़े हए ु और बोले-"जी हजू ु र। आपका हदहद ु ु साये क तरह साथ जाएगा। जब हु म होगा चहचहाएगा सरकार। जब तलवार और ..

जम जाती है तब शायर का नगमा गूँजाता है . मालवा. कलम क सरसराहट सुनाई दे ती है । अब जो म आँख दे खी िलखूँगा वो कल सैकड़ साल तक आने वाली आँख दे खगी हजू ु र।" बादशाह ख़ुश हए ु और बोलेशाबाश खुसरो। तु हार बहादरु और िनडरता के या कहने। मैदाने जंग और मह फ़ल रं ग म हरदम मौजूद रहना। तुम को हम अमीर का ओहदा दे ते ह। तुम हमारे मनसबदार हो। बारह सौ तनगा सालाना आज से तु हार त वा होगी। सन १२९६ ई. दे हली. गुजरात. िचतौड़ आ द के आ मण एवं वजय का वणन है । साथ ह अलाउ न का शासन बंध. जनता क सुख शांित हे तु उसके ारा कए गए य आ द का उ लेख है । अमीर खुसरो क वशाल और सावभौिमक ितमा ने 'खुदाए सुखन' अथात 'का य कला के ई र माने जाने वाले क व िनजामी गंजवी के ख स का जवाब िलखा है । जो ख साए खुसरो के नाम से मशहर ू है । ख स का अथ है पाँच। खुसरो ने यह उ ह ं छं द म.पायल दोन क झंकार थम जाती है . म अलाउ न खलजी ने रा य के लोभ और लालच म अपने चाचा जलालु न खलजी क ह या कर द और द ली का राज िसंहासन हड़प िलया। वंय अमीर खुसरो ने एक इितहासकार के नाते अपने वणन इस ंथ म इसका कार कया है -"अरे कुछ सुना अलाउ न खलजी सुलतान बन बैठा। सुलतान बनने से पहले इसने या. ख के खुदा को राजा जा को दे खो। लोग अश कफ़य के िलए दामन फैलाए लपके और ख़ून के ध बे भूल गए। हे ल मी सब तेर माया है ।" अलाउ न र ते म जलालु न का भतीजा और दामाद था। अलाउ न ने खुसरो के ित बड़ा उदार कोण अपनाया। खुसरो ने उस काल क ऐितहािसक घटनाओं का आँख दे खा उ लेख अपनी ग रचना खजाइनुल फतूह (तार खे -अलाई. ६९५ ह ी/७११ ह ी. कन १२९५-सन-१३११ ई. तक क घटनाएँ। अथात फ़तह का ख़ज़ाना। (इस ंथ म दे विगर . भवन िनमाण. उ ह ं वषय पर िलखा है । खुसरो अपने इस ख से को .या नए करतब दखाए। हाँ वह ं कड़ा से दे हली तक सड़क के दोन तरफ़ तोप से द नार और अश कफ़याँ बाँटता आया। लोग कहते ह अलाउ न ख़ून बरसाता हआ उठा और ख़ून क होली खेलता हआ ु ु तख़ते शाह तक पहँु च गया। हाँ भई.

सनक . तक। इसम पाँच मसन वयाँ ह। इ ह खुसरो क पंचपद भी कहते ह। ये इस कार है – (१) मतला-उल-अनवार : िनजामी के मखजनुल असरार का जवाब है । (६९८ ह.यासे सोते ह। खुसरो क जलालु न खलजी जैसे बादशाह को ऐसी हदायद करना िन नैितक बल का तीक है तथा उनक त ह खुसरो के दलेर का परचायक है । अमीर खुसरो ने अपना पंचगंज ६९८ ह ी से ७०१ ह ी के बीच िलखा यािन सन १२९८ ई. से १३०१ ई.) अथात रोशनी िनकलने क जगह। उ ४५ क व जामी ने इसी के अनुकरण पर अपना 'तोहफतुल अबरार' (अ छे लोग का तोहफा) िलखा था। इसम खुसरो ने अपनी इकलौती लड़क को सीख द है जो बहत ु सु दर थी। ववाह के फ चात जब बेट वदा होने लगी तो खुसरो ने उसे उपदे श दया था - खबरदार चखा कभी न छोड़ना। झरोखे के पास बैठकर इधर-उधर न झाँकना। ाचीन काल म यह रवाज़ था क जब कोई बादशाह अथवा शाहज़ादा अपने हमराह के साथ सैर-सपाटा करने को िनकलते थे तो जो भी युवती अथवा क या पसंद आ जाती थी तो वह अपने िसपहसालार के मा यम से उनके अिभभावक . जािलम व हठ बादशाह को जनता क भलाई और उदारता का यवहार करने का सुझाव दया है । एक क जब खुदा ने तुझे यह शाह क याण का त त दान याल रखान चा हए। ता क तू भी थान पर खुसरो ने िलखा है कया तो तुझे भी जनता के स न रहे और खुदा भी तुझसे स न रहे । य द तू अपने खास लोग पर कृ पा करता है तो कर क तु उन लोग क भी उपे ा मत कर जो लोग बेचारे भूखे./सन १२९८ ई.िनजामी के ख से से अ छा मानते ह। कुछ ने इसे एक शे र को िनजामी के पूरे ख से से अ छा माना है । इसे पंचगंज भी कहते ह। इसम कुल िमलाकर १८.००० पद ह। कुछ लोग यह भी मानते ह क इसे खुसरो ने सुलतान अलाउ न खलजी के कहने पर िलखा है । इसम बादशाह क शंसा भी है । इतना ह नह ं इसम खुसरो ने अपने क व उिचत कत य का पालन करते हए ु अलुउ न जैसे धमाद.

अथवा पित अथवा क या के पता के पास भेज कर कहलवाते थे क उनक पु ी. ब ब द वारो पु त बर दर कुन। गर तमाशाए-रोज़नत हवस अ त. क या अथवा प ी को राजदरबार म भेज द। य द कोई तैयार नह ं होता था तो अपने िसपहसालार के ज़ रये उसको उठवाकर अपने हरम म डाल दे ते थे तथा वह पहले बाँ दय के प म और बाद म रखैल बन कर रखी जाती थी। अत: वह बादशाह व शाहजाद क बुर नज़र से उसे बचा कर रखना चाहते थे। अमीर खुसरो ने अपनी बेट को फ़ारसी के िन न पद म सीख द है - "दो को तोजन गुज़ा तन न पल अ त. रोज़नत च मे-तोजने तो बस अ त।। भावाथ यह है छोड़ना अ छ क .बेट ! चरखा कातना तथा सीना.परोना न छोड़ना। इसे बात नह ं है य क यह परदापोशी का. हालते-परदा पो कंशशे बदन अ त। पाक दामाने आ फयत तद कुन. ज ढकने का अ छा तर क़ा है । औरत को यह ठ क है क वे घर पर दरवाज़े क ओर पीठ कर के घर म सुकून से बैठ। इधर-उधर ताक-झाँक न कर। झरोखे म से झाँकने क साध को 'सुई' क नकुए से दे खकर पूर करो। हमेशा परदे म रहा करो ता क तु ह कोई दे ख न सके। उपयु थम पं म यह संदेश था क जब कभी आने जाने वाले को दे खने का मन करे तो ऊपर मं ज़ल म परदा डालकर सुई के धागा डालने वाले छे द को आँख पर लगाकर बाज़ार का नज़ारा दे खा करो। चरखा कातना इस बात को इं िगत करता है क घर म जो सूत काता जाए उससे कढ़े या गाढ़ा (मोटा कपड़ा) बुनवाकर घर के सभी मद तथा औरत पहना कर। महा मा गाँधी जी ने तो बहत ु साल के बाद सूत कातकर खाद तैयार करके खाद के कपड़े पहनने पर ज़ोर दया था। ले कन हमारे नायक अमीर खुसरो ने बहत ु पहले तेरहवीं-चौदहवीं शता द म ह खाद घर म तैयार करके खाद कपड़े पहनने के िलए कह दया था। मतला-उल-अनवार मसनवी पं ह दन क अवधी म िलखी बताई जाती है । इसम ३३२४ पद ह। इसका वषय नैितकता और सूफ़ मत है । खुदाब श पु तकालय पटना म इसक एक पांडुिल प सुर त रखी है । .

उसका उदाहरण खुसरो के पूव के क वय के हम यहाँ अमीर खुसरो क इस मानी मसनवी . असद अली के अनुसार यह रचना अब उपल ध नह ं तथा इसक खोज क जानी चा हए। (३) मजनूँ व लैला . वह 'मजनूँ' के नाम से कहता। यह स य है क लैला और मजनूँ वा तव म इस दिनया म थे। न द इनका वतन था। यह अरब का एक भाग है जो शाम ु से िमला हआ है । यह ु थल बहत ु ह हरा-भार तथा खूबसूरत वा दय वाला है । इसके हरे -भरे पहाड़ तरह-तरह क खुशबू म महकते ह। लैला और मजनूँ दोन .यह क व िनजामी क खुसरो व शीर का जवाब है । यह ६९८ ह ी/ सन १२९८ ई. उ ४६ वष। ेम तथा ॠंगार क भावनाओं का िच ण। इसम २६६० पद ह। इसका येक शेर गागर म सागर के समान है । यह पु तक कािशत हो चुक है । कुछ व ान इसका काल ६९८ ह ी भी मानते ह। कला मक से जो वशेषताएँ 'मजनूँ व लैला' म पाई जाती ह.िनजामी के लैला मजनूँ का जवाब ६९९ ह ी. व और कसी मसनवी म नह ं ह। णय के रह य. सन १२९९ ई. सरलता. फैजी िलखते ह क ऐसी मसनवी इन तीन सौ वष म अ य कसी ने नह ं िलखी। डॉ.(२) शीर व खुसरो . भाव और मनोभाव जस सु दरता. उ पीर को ती तर बना अिभ य ४५ वष म िलखी गई। खुसरो ने इसम ेम क दया है । इसम बड़े बेटे को सीख द है । इस रोमां टक म भावा मक त मयता क धानता है । मु ला अ दल का दर ु बादयूनी. सहजता.'मजनूँ व लैला' का सं वणन करते ह – मजनूँ के का पिनक होने के संबंध म कई कथन व णत ह। इन सबका ता पय यह है क बनी उ मया के खानदान का कोई शहज़ादा कसी पर प सु दर पर आिशक़ था। अपने ेम के रह य को िछपाने के िलए वह जो अशआर द वानगी ् म कहता. रं गीनी और तड़प तथा लगन के साथ खुसरो ने इसको का य का प का य म अ ा य है । दया है . य व या क रह यमयी बात..

पता ने बदनामी के डर से शाद से इं कार कर दया। बदनामी का डर यह था क मजनूँ कुछ रोजी रोट कमाता न था और एक आवारा के प म पूरे शहर म मशहर ू था। इस इं कार से मजनूँ के संयम का खिलहान जलकर खाक हो गया। मान उसके अरमान का गला घ ट दया गया हो। अंतत: और कोई सकारा मक प र थित क कोई गुंजाइश जब नह ं न आई तब मजनूँ अपने सारे कपड़े फाड़कर द वाना सा जंगल को िनकल गया। वह जंगल म मारा-मारा फरने लगा। जंगल म करते हए ु ेम के चम कार भरे अशआर कहलवाए ह वे मर कट हए। ेम अ न ने इस दशा म उससे जो दद ु ेम क व वध भावनाओं का दपंण है । इस मण म सहरा के हरन मजनूँ के खास राजदार थे। पु क इस तबाह और बरबाद से माता.पता ने ममता के भाव से लैला के घर शाद का पैगाम भेजा ले कन लैला के माता.पता ने उसक शाद कसी और जगह कर द । उस समय मजनूँ ू िगरा होगा उसका वणन ज र नह ं। लैला क पर जो संकट का पहाड़ टट बेचन ै ी और वकलता ने उसके पित का जीवन दभर कर दया। उसने तंगा आ ू कर उससे संबंध तोड़ दया। मजनूँ कभी कभार द वानगी के जोश म अपनी या क गली म िनकल आता और अपने दद भरे अशआर से लैला तथा उसके कबीले वाल को तड़पा जाता। प रणाम व प लैला ने इसी वरह दशा म अपने ."ऐ मेरे रब। लैला क मुह बत मे रे दल से कभी न िनकालना। खुदा क रहमत हो उस बंदे पर जो मेर इस दआ ु पर आमीन कहे ।" (अरबी शेर का पांतर) िसतम बलाए िसतम यह हआ क लैला ु के कठोर माता.भी बनी अमीर नामक कबीले से संबंिधत थे। बचपन म दोन अपने-अपने घर म मवेशी (पशु) चराया करते थे। इस थित म ेम भावना ने सर उठाया। जब दोनो ज़रा बड़े हुए और उसके हु न व खूबसूरती क चार तरफ़ ज़ोर-शोर से चचा होने लगी तो लैला पदानशीन हो गई। मजनूँ को ये नागवारा गुज़रा। आ खर वह अब कैसे अपनी यतमा को िनहारे । उसके पागलपन को और तेज कर दया जसके कारण दोन क वरह ने मजनूँ के ेम कहानी भी आग हो गई। यानी क मशहर ू हो गई। मजनूँ के माता.पता का दल कुढ़ता था। एक दफा वह उसको हरमे-मोहतरम म ले गए और कहा क काबे का िगलाफ थामकर लैला के ेम से मु पाने क ाथना करो। मजनूँ ने िगलाफ पकड़ कर कहा .

ाण दे दए। लैला क मृ यु क दद भर खबर सुनकर मजनूँ कब जी वत रह सकता था। अमीर खुसरो ने अपनी मसनवी म कला क ह द.पता का इं कार करना. लैला क बीमार का समाचार सुनकर मजनूँ का उसके पुस को आना और उसक अथ दे खना. उसके माता. मजनूँ का बुलबुल से बात करना. लैला के कु े से मजनूँ क मुलाकात. क़ से क ऊपर द हई ु ेम अ न तथा करता है और यह वन वरह का यह अफ़साना मन को अित भा वत मण क एक आकषक दा तान है । इसके िलए भगवान क ओर से खुसरो को एक दद भरा औिलया परे खा म बड़ ह सरलता और ाथना करते समय उनके दल ा हआ था। हज़रत िनजामु न ु दय क तड़प का वा ता दे ते थे और उनका िच ती वंश से संबंिधत होना उनके इस उ साह का कारण था। मजनूँ क इस दा तान म गज़ल क तमाम वशेषताएँ पाई जाती ह। अत: वा तववा दता अमीर खुसरो का वैिश य था। मसनवी के हर क़ से पर हमको स य का . दो त ारा मजनूँ को बाग म ले जाना. नौ फल क पु ी से मजनूँ का िनकाह. मजनूँ के पागलपन का और बढ़ना. लैला का वकल हो कर घर लौटना और मृ यु शै या पर फँस जाना. इस लड़ाई म मजनूँ क ओर से क ब क दावत. पर तु उसका द वानगी म भाग खड़ा होना. कबीले के सरदार नौ फल का लैला के प रवार से लड़ना. मजनूँ का पागलपन. लैला का स खय के साथ बाग म जाना. मजनूँ का उ र दे ना. लैला के यहाँ शाद का पैगाम भेजना. पता का मजनूँ को समझाकर जंगल से लाना. कई दलच प शीषक कायम कए परे खा "लैला व मजनूँ का पाठशाला म एक त बैठना. लैला का सपने म ऊँटनी म सवार हो कर मजनू के पास पहँु चना. और मुनाजात आ द के अित र हए ु ह। इनके क से क सं से आव यक बात. नात. मजनूँ का म त होकर गीत गाना. पदा-नशीनी. मजनूँ के एक िम का लैला को पहचान कर दद भरे वर म मजनूँ क गजल गाना. िन निल खत ेम पाठ क पुनरावृ है - भेद कट होना. लैला के अंितम सं कार के समय मजनूँ का दम तोड़ दे ना और साथ ह दफन होना।" मजनूँ व लैला के सहजता है . लैला के िनकाह क खबर सुनकर मजनूँ को खत िलखना. माँ का लैला को उपदे श.

) इसम िसक दरे आजम और खाकाने चीन क लड़ाई का वणन है । इसम अमीर खुसरो ने अपने छोटे लड़के को सीख द है । इसम रोज़ीरोट कमाने. व कुवते बाज़ू क रोट को ाथिमकता.आभास होता है । खुसरो के का य म श द िच ाकृ ितक िच कार है । उनक लेखनी ने जो खीच ह.िनजामी के ह त पैकर का जवाब (७०१ ह ी/सन १३०१ ई. चाहे वह कसी भी काल क हो. इसका मुक़ाबला नह ं कर सकती। आज के संदभ म खुसरो क क वता का अनुशीलन भावा मक एकता के पुर कताओं के िलए भी लाभकार होगा। खुसरो वतन पर त अथात दे श के सरताज कहलाए जाने यो य ह। उनका स पूण जीवन दे श भ ेिमय के िलए एक संदेश है । दे श वािसय के दल को जीतने के िलए जाित. ु मज़हब क पाबंद करने और सच बोलने क वह तरक़ ब है जो उ ह ने अपने बड़े बेटे को अपनी मसनवी शीर खुसरो म द है । इस रचना के दखाना चाहते थे क वे भी िनजामी क तरह वीर रस सकते ह। ारा खुसरो यह धान मसनवी िलख (५) हशव-ब ह त. आ द क एकता क कोई आव यकता नह ं। अ पतु धािमक स ह णुता. वचार क उदारता. मानव . धम. वे 'माना' तथा बहजाद का िच कोष ह तो है । (४) आइने-िसकंदर -या िसकंदर नामा .) फ़ारसी क सव े कृ ित। इसम इरान के बहराम गोर और एक चीनी हसीना (सु दर ) क का पिनक ेम गाथा का बेहद ह मािमक िच ण है जो दल को छू जाने वाली है । इसम खुसरो ने मानो अपना य गत दद परो दया है । कहानी मूलत: वदे शी है अत: भारत से संबिं धत बात कम ह। इसका वह भाग बेहद ह मह वपूण है जसम खुसरो ने अपनी बेट को संबोिधत कर उपदे शजनक बात िलखी ह। मौलाना िशबली (आजमगढ़) के अनुसार इसम खुसरो क लेखन कला व शैली चरमो कष को पहँु च गई है । घटनाओं के िच ण क से फ़ारसी क कोई भी मसनवी.िनजामी के िसकंदरनामा का जवाब (६९९ ह ी/सन १२९९ ई. हनर (कला) सीखने.

जो सर झुकाएँ तौबा कर. जहाँ अब हमायू ँ का मक़बरा है . मेरे महबूब के तलव म म बल बल जाऊँ।" रात गए जमुना कनारे गयासपुर गाँव के बाहर. िच ती सूफ़ ु . उनके कान म हलका टकाओ। शहर से दस कोस दरू एक ब ती बसाकर रहने क इजाज़त है इन नामुराद को। ब ती होगी मंगोल पुर । पहरा चौक । जनसे सरकशी का अंदेशा हो. उनके सर उतार कर मीनार बना दो। इनके बाप दादा को खोप ड़य के मीनार बनाने का बहत ु शौक़ था और अब इनके सर उतारते जाओ. लहू डालो। सुना मीरे तामीर. सुख गारा (गाड़ा) खून। शहर पना क सुख द वार। अ ह ह ह हा। तैयार क जाय। गुजरात क बख़ा त।" ओर फ़ौज रवाना हो। कसी कार क कोई दे र न हो। दरबार खुसरो आगे कहते ह क शाह तलवार पर मंगोल का जो गंदा खून जम गया था सुलतान अलाउ न खलजी िसकंदर सानी उसे गुजरात पहँु चकर समु दर के पानी से धोना चाहता था। अपने दल का हाल बयां करते ह खुसरो कुछ इस तरह .मा के साथ एकता क ेम का यवहार. मेरे पीर ू क ओर."फ़ौज चली। म मेरे गु य जाऊँ? मेरा दल तो दसर तरफ़ जाता है . सबक भलाई (क याण) क कामना तथा रा ीय आव यकता होती है । इस लेख म उ त खुसरो क ृ मसन वय के उ रण से यह बात भली-भाँित वषयक आ यंितक ेम का प रचय िमलता है । विभ न भा वत होती है तथा उनके भारत इसी बीच मंगोल ने अचानक दे हली पर हमला बोल दया। अलाउ न खलजी क फ़ौज ने ख़ूब डटकर सामना कया। मंगोल को आ ख़रकार मुँह क खानी पड़ । कुछ तो अपनी जान बचा कर भागने म सफल हए ु तो बहत ु से बंद बना िलए गए। इितहासकार अमीर खुसरो आँख दे खा हाल सुनाते हए ु कहते ह - या ख़बर लाए हो। हजू ु र फ़तेह क । वो तुमसे पहले पहँु च चुक है । सच-सच बताओ कतने मंगोल ल कर मारे गए ह? हजू ु र बीस हज़ार से ज़यादा। कतने िगर तार कए? अभी िगना नह ं मगर हज़ार . दे हली पर चढ़ाई करने वाल का ख़ून डालो. मीनार बनाते जाओ। इ ह दखाते जाओ। शहर क द वार बनाने म जो गारा लगेगा. उसम पानी नह ं.

मोहताज . साधुओं. नह ं उसका। उसे भी द ु मन ने बहका दया है . दरवेश या सूफ़ िनजामु न औिलया क ज़बरद त मक़बूिलयत को चैलज कया मगर वो अपनी जगह से न हले। कई बादशाह ने िनजामु न क ख़ानक़ाह म आने क इजाज़त उनसे चाह मगर उ ह ने कबूल न क। एक रात िनजामु न िच ती क ख़ानक़ाह म हज़रत अमीर खुसरो हा ज़र हए। ु आते ह बोले . और बैरािगय को खला पला कर अब अपने त हा हु े म जौ क बासी रोट और पानी का कटोरा िलए बैठा है । ये ह वाजा िनजामु न िच ती। वाजा िनजामु न उफ़ महबूबे इलाह उफ़ सु तान उल मशायख. दला साफ़. चोर है . मुसा फ़र .ख़ानक़ाह म एक फ़क़ र बादशाह. उलेमाओं. नागार . ज ह ने कंज़दगी भर रोज़ा रखा और बानवे साल तक अमीर और बादशाह से बेिनयाज़ अपनी फ़क़ र म बादशाह करते रहे "। अमीर खुसरो जब भी करते और द ली म होते इ ह ं के क़दम म रहते। राजो यास क बात हानी शांित क दौलत समेटा करते । अपने पीर से क ठन और नाजुक प र थितय म सलाह मशवरा कया करते और समय समय पर अपनी गलितय क माफ़ अपने गु व खुदा से माँगा करते थे। खुसरो और िनजामु न अपने दल क बात व राज क बात एक-दसरे से अ सर कया करते थे। कई ू बादशाह ने इस फ़क़ र. बादशाहे व के िलए हा ज़र क इजाज़त।' ख़वाजा साहब ने . ज़ रत मंद ." वाजा जी मेरे सरकार. आ द का कोई भेद भाव नह ं। वह अपनी आँख यहाँ का हाल दे खना चाहता है । उसम खोट है . बरगला दया है क हज़ार आदमी दोन व यहाँ लँगर से खाना खाते ह तो कैसे ? इतनी दौलत कहाँ से आती है ? और साथ ह शाहज़ादा ख़ ह।' ख़वाजा बोले-'तुम खाँ य बार-बार हा ज़र दया करते या चाहते हो खुसरो? खुसरो कुछ उदास होते हए ु बेमन से बोले . फ़क़ र दरवेश .हजू ु र. गवैय . ह द-ु मु लमान. शहनशाह अलाउ न खलजी ने आज एक राज क बात मुझसे त हाई म क । कह दँ ू या? वाजा जी ने कहा कहो "खुसरो तु हार जुबान को कौन रोक सकता है ।' खुसरो ने गंभीर हो कर कहा क "अलाउ न खलजी आपक इस प व ख़ानक़ाह म चुपके से भेष बदल कर आना चाहता है । जहाँ अमीर-गर ब. संत . ऊँच-नीच. सू फ़य .

"और अगर अलाउ न खलजी ने नाराज़गी से तुमसे पूछा क खुसरो ऐसे राज तु हार ज़बान से? खुसरो इसम तु हार जान को खतरा है ? तुमने मुझे यह राज आ बताया ह य ? खुसरो भार आवाज़ म बोले .'मेर खुशनसीबी बसत शौक़' िनजामु न ने कहा 'खुसरो हमने तु ह तुक अ लाह ख़ताब दया है । बस चलता तो वसीयत कर जाते क तु ह हमार क़ म ह सुलाया जाए। तु ह जुदा करने को जी नह ं चाहता मगर दन भर कमर से पटका बाँधे दरबार करते हो जाओ कमर खोलो आराम करो। तु हारे न ज का भी तुम पर हक है । श बा ख़ैर! . म कल खुदा को कंज़दगी म खुदा का या मुँह दखाऊँगा? तुम इन दन द ली म रहोगे न। कल हम अपनी पीर फर द ु न गंज शकर क दरगाह को जाते ह। हो सके तो साथ चलना। खुसरो चहकते हए ु अपनी शायराना ज़बान म बोले .फ़रमाया . 'खुसरो ु ये टकड़े भी गले से नह ं उतरते । आज भी द ली शहर क लाख मावलूख म न जाने कतने ह गे ज ह भूख से नींद न आई होगी। मेर कोई भी बंदा भूखा रहे . जौ क सूखीबासी रोज़ी. पानी म िभगो-िभगो कर खाते ह।' ख़वाजा साहब ने फ़रमाया. शाह तख़त या वे यह जवाब बादशाह तक पहँु चा द? तब ख़वाजा ने फ़रमाया . शाह हक ु ू मत से.'मेरे ख़वाजा जी बता दे ने म िसफ़ जान का ख़तरा था और न बताता तो ईमान का ख़तरा था।' ख़वाजा ने पूछा 'अ छा खुसरो तुम तो अमीर के अमीर हो। शाह दरबार और बादशाह से अपना िसलिसला रखते हो। या हमारे खाने म तुम आज शर क होगे?' यह सुनते ह खुसरो क आँख से आँसू टपक आए। वे भार आवाज़ म बोले .'खुसरो तुम से ज़यादा मेरे दल का राजदार कोई नह ं। सुन लो। फ़क़ र के इस त कये के दो दरवाज़े ह। अगर एक से बादशाह दा ख़ल हआ तो ु दसरे ू से हम बाहर िनकल जाएँगे। हम शाहे व से या लेना दे ना।" खुसरो ने पूछा क से. तमाम रात इबादत और आप सारे जहाँ के खला कर भी ये खुद एक रोट ."यह या कह रह ह पीर साहब। शाह दरबार क या है िसयत? आज तख़त है कल नह ं? आज कोई बादशाह है तो कल कोई। आपके ु थाल के एक सूखे टकड़े पर शाह द तरखान कुबान। राज दरबार झूठ और फ़रे ब का घर है । मगर मेरे ख़वाजा ये या िसतम है क तमाम दन रोज़ा.

य प अमीर खुसरो दरबार से संबंिधत थे और उसी तरह का जीवन भी यतीत करते थे जो साधारणतया दरबार का होता था। इसके अित र के कमांडर जैसे बड़े -बड़े पद पर भी रहे क तु यह उनके वे सेना वभाव के व था। ु रता आ द से बहत अमीर खुसरो को दरबारदार और चाटका ु िचड़ व नफ़रत थी और वह समय समय पर इसके व वंय के िलखे वचार भी य कया करते थे। उनके ंथ के अलावा उनके समकालीन तथा बाद के सा ह यकार के ंथ इसका जीता जागता माण है । जैसे अलाई रा य के शाह इितहासकार अमीर खुसरो ने ६९० ह ी (१२९१ ई.) म तुगलकनामा िलखा। इसके अलावा एमामी ने रवीउल अ वल ७५१ ह ी (मई १३५० ई. ७२० खाँ क ेम ह ी (१३२० ई. ७११ ह ी (१३११-१२ ई.) म िमफताहल ु फुतूह.) म िसंध पहँु चा। भारत वष लौटने पर उसक या ा का वणन इ बे-तुहफनु न जार फ़ गराइ बल अमसार व अजाइबुल असफार रखा गया। महं द हसै ु न ने इसका नाम रे हला रखा। (REHLA (BARODA १९५३) अनुवाद म केवल अनाइबुल असफार रखा गया है । मुह मद कािसम ह द ू शाह अ तराबाद जो फ़ र ता के नाम से इितहासकार है । उसने अपने से िस िस है सोलहवीं शती का बड़ा ह व यात ंथ 'गुलशने इ ाह मी' (जो तार ख़ फ़ र ता के नाम है ) क रचना १०१५ ह ी (१६०६-०७ ई.) म समा अमीर खुसरो ने अपने गु के वचन तथा उपदे श क । आ द। को अपने एक 'अफजलुल फवाियद' के नाम से संपा दत कया। इसे कितपय पृ सेवा म अवलोकनाथ ंथ आपने संत क तुत कए। संत ने गंभीरतापूवक अ ययन करके कहा .) म समा क। या ी अबू अ द ु लाह मुह मद इ ने बतूता (७३७ ह ी / १३३३ई.) म नुह िसपहर. के तानजीर का िस जयाउ न बरनी का तार ख़ फ़ रोज़शाह ७४ वष क अव था म ७५८ ह ी (१३७५ ई. फरदौसी का शाहनामा.) म खजाइनुल फुतूह. (एमामी ने अमीर खुसरो के ऐसे ंथ भी पढ़े थे जो इस समय नह ं िमलते। उसने अमीर खुसरो क क वताओं का अ ययन कया था। चौदहवीं शता द ई. ७१५ ह ी (१३१६ ई.) म दवल रानी ख कथा ७१८ ह ी (१३१८-१९ ई.) ४० वष क आयु म 'फुतूहु सलातीन'.

बहत ु नाराज़ हो गए। जब शेख़ गर ब संत क सेवा म उप थत हए ु तो िनजामु न िच ती ने उनक ओर शेख़ बड़े ह िचंितत हए ु य क उ ह ात था क य द गु यान नह ं दया। ठे तो कता भी सहायता नह ं करता। ववश हो कर शेख़ को अमीर खुसरो क शरण म जाना पड़ा। अमीर खुसरो ने तब एक वायदा कया। यह दोहा इस ह दवी दोहा सुनाकर.'तूने ब ढया िलखा और नामकरण भी उपयु है ।" आपने इसम कुछ प रवतन कए और अपनी मंडली के लोग को संबोिधत करके कहा. उनक मदद करने का कार है - 'खुसरो मौला के ठते . मौला न हं होत सहाय।।' . अ लाह ने अमीर खुसर के शार रक अवयव को ान और ा से मं डत कया है । वह दन रात वचार के समु म खोया रहता है और हज़ार क़ मती मोती िनकाल लाता है । उसके जैसी वल ण बहत ु कम लोग म व मान होती है ।" गु नतम तक हए ु और िनवेदन कया क 'मेर वरदान का ह यह द य फल है ।' गु और ितभा के इन उ ार को सुनकर खुसरो े ता का य े आपको ह है । आपके और िश य के म य जो पार परक ेम नेह के संबंध थे वे इतने गहरे थे क अ य जब भी इससे लाभा वत होने के िलए लालियत रहते थे। संत य द कसी से कभी-कभी उ ह मनाने के तमाम से अपने अपराध क भी हो जाते और यास वफल हो जाते तो वह अमीर खुसरो क सहायता मायाचना करवाता। इनम छोटे ह नह ं ब क बड़े -बड़े िश य और उ रािधकार भी शािमल थे। ऐसी ह एक बार क घटना है क संत िनजामु न िच ती कसी बात पर शेख़ बुराहानु न गर ब से हो गए. पीर के सरने जाय। कहे खुसरो पीर के ठते . "वा तव म खुसरो के िलए गव का वषय है रखा और िल प ब क उसने इतने असं य व अनिगनत वषय को याद कया। य प यह स पूण प से सदा वचार के समु म िनम न रहता है । भगवान ने .

हर मज़हब और हर क़ौम के लोग को अपनी ओर कया है । सूफ़ संत हज़रत िनजामु न औिलया ने फ़रमाया है क ये इबादत ह तो है जो इस दिनया के च कर को घुमाए रखती है । एक बार जमुना ु नद के कनारे िनजामु न िच ती वजू (नमाज़ के पूव हाथ-पाँव का ालन (साफ़-सफ़ाई) कह रहे थे। उनक टोपी वजू के कारण टे ढ़ हो गई थी। टोपी सीधी करने के िलए अनायास ह उनक नज़र नद के दसरे छोर पर गई। वहाँ ू . दो शर र क दशा इसका अंितम उ मेष है । खुसरो यह मानते थे क ेम जतना ह महान होगा उसक क़ मत भी उतनी ह अिधक होगी।' फर खुसरो ने एक दोहा इसी वषय से संबंिधत कहा "खुसरो रै न सुहाग क जागी पी के संग। तन मेरा मन पीहू का दोउ भए इक रं ग।।" इसी समथन म संत कबीर दास भी कहते ह – "सीस दए जो गु ठ गए जो गु सूफ़ आकृ िमले तो भी स ता जान। तो.'गु उसक ाि के प ात गु जस उस थान पर के िलए िश य को अपना सव बिलदान करना पड़ता है । गु के ित िश य का ेम और बिलदान ह उसे गु के थत है ाि य े से मं डत कर सकता है । एक आ मा.उसके प ात अमीर खुसरो अपनी द तार शेख के गले म डालकर उनको अपने पीर संत िनजामु न औिलया क सेवा म लाए। दोन को साथ दे खकर संत सब कुछ समझ गए और मु कुराए। फर इतिमनान से पूछा .' या समाचार है ? इसके प ात संत ने दोन से आिलंगन कया। इस शेख़ बुराहानु न गर ब को कार िनजामु न औिलया ने मा कर दया। संत के गले लगने के बाद शेख बुराहानु न क आँख से आँसू बह आए और फर वे संत के चरण म िगर गए और पुन: माफ माँगने लगे। पीर ने उसके शीष को हाथ से उठा िलया। इस पर अमीर खुसरो ने शेख़ बुराहानु न से कहा . ई र क भी मौन जबान।।" वचार धारा ने हर धम.

ॠ षय -मुिनय .ह दवी पद को पूरा कया। "मन क ला रा त करदम बर िस त ए कज कुलाहे । ू काशी को कोई चाहे ।।" म के म कोई ढढ अथात ई र ाि का मेरा रा ता उसके (गु ) ज रए है जसने यह ितरछ टोपी ू रहा है तो कोई काशी जाकर ई र पहनी है । कोई म के म खुदा को ढढ़ िलए मारा-मारा फर रहा है पर ई र तो हमारे भीतर है .बहत ु से ह द ू नर-नार नान करते हए ु भजन गा रहे थे। यह दे ख ख़वाजा साहब को बड़ा लु त आया। एकाएक उनके मुह ँ से िनकला "हर कौम रा त राहे द ने व क ल गाहे । संसार हर को पूजे कुल को जगत सराहे ।।" अथात विभ न धम . पैग बर . रा ते ह। िनजामु न औिलया के सबसे के या ई र के पास य िश य क वराज अमीर खुसरो वह ं खड़े थे। उ ह ने फौरन इस फारसी. साधुू संत आ द को हिगज़ बुरा न कहना। इस ज़मीन पर खुदा ने समय समय पर पैग बर उतारे ह और वो सब हमारे ह। आमने-सामने क दोन क़ा बल ताक़त . हमारे उपरो ाि के दय म है । पद के मा यम से ख़वाजा िनजामु न िच ती साहब यह संदेश दे ना चाहते ह क दसरे मज़हब के अवतार . मजहब और इं सान के ई र ाि पहँु चने के अलग-अलग तर के ह.रवाज . अक द . बुज़ुग . हमार स यता परवान चढ़ है । अपने पू य दे य और आदरणीय गु फर उनके मेल से हमार के िलए पता नह ं खुसरो ने कतने बिलदान कए। एक बार अमीर खुसरो कह ं से या ा करके दे हली लौट रहे थे। . के टकराव से और तहज़ीब. र म . र ित.

शाहज़ादा दारािशकोह) ."य द वह मेरे वनीत ाण और सम त धन भी माँगता तो भी म ख़ुशी से उसे सम पत करता। ( ोत : सफ मतुल औिलया ."िसफ़ यह है तु हारे िलए। ले जाओ। इससे तु हार आव यकता क पूित हो जाएगी।" वह उदास हो गया यह कहकर। फर बोला इतने बड़े दरबार से यह दान? कैसे होगी मेर बेट क शाद ? कस मुँह से घर वाल के पास वापस जाऊँ? आ य है ? बड़ा नाम सुना था ख़वाजा साहब का। मेर ह क मत खोट है । ख़ैर फर भी संत क खड़ाऊँ ले आया हँू एक छोट सी उ मीद पर क या पता अ छ दाम बक ह जाए। आ इतने बड़े सूफ़ संत क ज़बान है उनके मुँह से िनकला वचन है । खुसरो बोले क अ छा मेरे पीर क खड़ाऊँ है तु हारे पास। तभी उनक गंध मुझे बड़ दे र से सता रह थी। अब बताओ .पाँच लाख उसके बदले अपने गु पये उस फ़क़ र को दे दए और के पैर क जूितयाँ या खड़ाऊँ ले ली। फर वे खड़ाऊँ को गव से सर पर उठाए संत िनजामु न क सेवा म उप थत हए ु और उनके स मुख स पूण घटना का उ लेख कया। संत ने यह सुनकर कहा "बिसयार अरजाँ ख़र द ।" अथात बहत ु स ते म ख़र द । उस पर खुसरो ने बहत ु ह भाव से कहा ."हजू ु र. यहाँ गु क सुगंध आती है ।" सेवक ने कहाँ? इस सुनसान. कल मेरे पास जो कुछ हो लेते जाना।" दभा दन भी कुछ नह ं िमला। अंत म संत ने अपनी खड़ाऊँ ु यवश दसरे ू दे कर कहा .मुझे बेचोगे खड़ाऊँ? उसने हामी भर । यह सुनकर खुसरो ने तुर त बादशाह सुलतान मोह मद ारा अ पत व भट क रकम . वरान और उजाड़ रे िग तान म।" पर खुसरो नह ं माने। वे अपने ऊँट से उतर गए और दौड़ते हए ु बार-बार यह कहते रहे क मुझे सुंगध आती है । इस पर सेवक ने चार तरफ़ काफ़ खोज क य को अ यंत द न अव था म वहाँ सोते हए ु पाया। अमीर खुसरो के पूछने ले कन अमीर खुसरो के गु का कह ं पता नह ं चला। अ त म एक अजनबी पर उसने बताया क वह दे हली से संत िनजामु न औिलया से िमल कर आ रहा है । कारण है उसक पु ी का ववाह। अपनी द नता के कारण वह अपनी बेट क शाद के िलए संत के पास सहायताथ गया था। थम रोज़ संत ने कहा "इस व तो अ लाह का नाम है ठहर जाओ.माग म एक थान पर व ाम के िलए के तो खुसरो ने अनायास ह कहा - "बूये शेख मी आयद"। अथात "मुझे अपने गु कहा .

यता. संगीत-मधुरता. गु और ई र भ . संत समागम एवं संवेदनशीलता आ द उन सभी गुण से प रपूण थे जो एक ानवान सूफ़ म उपे त है । अमीर खुसरो सूफ़ िस ांत के अनुसार इ के मजाज़ी (लौ कक हक़ क़ (आ या मक ेम) से इ के ेम) के भी अनुसता थे। अमीर खुसरो और जमु न हसन िस जी क दो ती बहत ु मशहर ू थी। खुसरो ने उनक वल ण एवं अ त ु का य ितभा दे खकर उ ह अपना गु भाई बना िलया था। द ली से अमीर खुसरो युवराज मुह मद के साथ मुलतान चले गए जहाँ यह प व ेम इतना गाढ़ हो गया क लोग दराचरण क चचा करने लगे और बात युवराज तक पहँु ची। ु उसने हसन िस जी को अपने सामने कोड़े लगवाए और अमीर खुसरो के पास जाने से रोका पर वह न माना। तब बादशाह ने दोन को बुलाया और इस पर सवाल कया तब खुसरो ने कहा क हम अपनी बात को ाण म एक ह य प शर र दो ह। मा णत करने के िलए खुसरो ने अपनी बाँह खोलकर दखाई. जस पर कोड़े के ताज़ा िनशान साफ़ नज़र आ रहे थे। यह दे खकर सब अवाक .याग और आ मसमपंण क इस भावना ने संत क दया था। खुसरो को संत का वयोग असा म खुसरो को े बना था। आ म प रशोधन के हे तु संत क संगित परम आव यक है पर जब ववश हो कर खुसरो या ा या यु जाते थे तो गु ेम के मरण और गु पर यान सतत उनके साथ रहता। खुसरो ने इस म रखकर ह संत ने कहा था क खुसरो को मेर क़ पर आने न दे ना। कह ं ऐसा न हो क क़ फट जाए और शर यत के रह य क अवहे लना हो। िनजामु न औिलया ने अमीर खुसरो के पता के िनधन ने उ ह और भी अिभवृ ू प ला छटा तब तो इनका दय म भ क लौ लगा द थी। कया और जब माँ का ममतामयी दय चूर-चूर हो गया। दभा ु य से भाई भी चल बसा। उस समय खुसरो सौ-सौ आँसू रोए और एक ऐसी दद भर क ण क वता िलखी जसे सुनकर जी गले को आता है । इस घटना ने उ ह और भी संवेदनशील बना दया। इस कार खुसरो ार भ से ह क वता.

नमाज़ पढ़ते थे तथा उपवास रखते थे। वे म दरा अथवा शराब नह ं पीते थे और कम से कम उसके आ द न न थे। वे द ली म .व त ध रह गए। बादशाह ने आ य से पूछा क खुसरो तु ह कोड़े कसने मारे । उसे सजाए मौत द जाएगी। इस पर खुसरो ने बादशाह को समझाया क ये वह कोड़े के िनशान ह जो बादशाह सलामत के कहने पर हसन िस जी को मारे गए थे। आ या मक लगाव होने के कारण ये िनशान खुसरो के शर र पर भी आ गए। बादशाह को अपनी गलती का अहसास हआ तथा भार श कमदगी हई। ु ु उ ह ने खुसरो से फ़ौरन माफ माँगी तथा उ ह व हसन को मरहम के िलए तुर त राज वै के पास िभजवाया। िस इितहासकार फ़ र ता ने िलखा है क उस समय अमीर खुसरो ने अपने भीतर के भाव पं य करने के िलए यह याँ िलखीं - "इ क आमदो शुद चु खूनम अ दर रगो पू त। ता कद मरा तु हयो पुरकद जद ू त जजाइए बजूदम हमगी दो त िग र त। नामी त मरा वरमन बाक हमाऊ त।" अथात ' ेम मेर िशराओं म र से र क भाँित वा हत हआ। इसने मुझे अ य त व ु कर मे रे िम से भर दया। मेरे स ा के सम त कण मेरे संबंध रखते ह. फर वंय ह का-फु का भोजन करते ू ु पहले दसर थे। हसन भी अमीर खुसरो क तरह िनजामु न औिलया के खुसरो अपे ाकृ त एक धािमक एवं सूफ़ वचार वाले य य िश य म थे। थे। उ ह ं के ारा िल खत एक कसीदे से यह व दत होता है क वे मु य-मु य धािमक िनयम का पालन करते थे. मेरे शर र म तो नाम मा ह मेरा है ।' यह ेमपा से ेम आ या मक ेम था। खुसरो के साथ हसन िम जी भी एक नामी िगरमी और सु िस क व हए ु जो राजदरबार म रहते हए ु भी सूफ जीवन बताते थे। अपने पीर के प िच पर चलते हए को खला कर.

शुमाली ह द का ये ल कर ार समु जा पहँु चा। अमीर खुसरो ने एक इितहासकार के नाते ख़ूब छान बीन कर के िलखा है क दे शी राजाओं क तरफ़ से जो फ़ौज तीरं दाज़ी म आगे िनकलती थी और तोपख़ाना सँभालती थी. तलवार सूत के शे र क तरह ज़ोरदार मुक़ाबला रणथ भौर। छ: मह ने क़ले का महासरा रहा। राजा और उसके कुटु ब ने जौहर कया। मारे गए। मालवा म मांडु का क़ला फ़तेह हआ। फर िच ौड़गढ़ पर चढ़ाई हई। छ: मह ने ु ु क इस फ़ौजी मु हम का खा मा भी द ली क फ़तेह पर हआ। खुसरो इस जंग ु म बादशाह के साथ थे। सु तान ने कला फतेह कर के राजा के सुपुद कर दया और शाहज़ादा ख़ खाँ को वहाँ इं तज़ाम के िलए वहाँ बठा दया। दे विगर और मराठवाण म भी यह हआ। सामना और फर उसके बाद ितलंगाना। द ली से ु वारं गल तक घने जंगल और द रयाओं को पार करके मह न बाद फ़ौज. जवाहारात समेट लाई। फर वहाँ से फ़ौज का अगला पड़ाव हआ ु करा के. उस फ़ौज म मुक़ामी और बाहर के साँवले मुसलमान ल कर भी होते थे। वो भी अपने-अपने बादशाह क तरफ़ से मर िमटते थे और अगर राजा को हार मान कर हिथयार डालने पर राज़ी दे खते तो वे राजा के ख़लाफ़ हो जाते थे। वा तव म वे राजा के व नह ं होते थे ब क उ ह सर झुका कर हार मानने से बहतर. िनडरता के साथ लड़ते लड़ते मरना या शह द होना अिधक . नितकय के नृ य एवं गायन को भी दे खते थे और सुनते थे तथा शाह और शहज़ाद क शराब मह फ़ल म एक दरबार क व क है िसयत से भाग ज़ र ले ते थे मगर तट थ आइए अब हम पुन: अमीर खुसरो के जीवन के घटना द ली क शाह भाव से। म से वाब त ह । फ़ौज गुजरात गई। गुजरात फ़तेह कर के दिनया भर क ु दौलत. बड़ तदाद म क ड़े -मकोड़ क भाँती मारे गए। आ ख़रकार आग और ख़ून का द रया पार हआ। मिलक काफ़े◌ूर को तिमलनाडु ु म एक बड़े ल कर के साथ यु के िलए भेज दया गया। यहाँ तक सारे इलाक़े को वह र दता हआ ु . हँ सते थे.िनयिमत प से औिलया साहब क ख़ानक़ाह म जाते थे. ितलंगाना से हनुमान कुंड पहँु ची। कला-ए-वरं गल पर सख़त लड़ाई हई। दोन ु तरफ़ के पैदल और सवार. ह र. फर भी वे नीरस संत नह ं थे। वे गाते थे.

इस सूफ़ शायर अमीर खुसरो क यह मोह बत थी क आम लोग क दे शी जुबान म इसने मज़े-मज़े क रचनाएँ. हर जगह दे शी और वदे शी मुसलमान नज़र आते ह जनक वफ़ादार अपने इलाक़े वाल से होती थी। आम जनता से. पहे िलयाँ. फुटकल छं द व पद.पसंद था। अलाउ न क फ़ौज म और िसपहसालार म भी ह द-ू मुसलमान साथ जाते थे और साथ-साथ ह मरते थे। उनम आपस म धम के नाम पर कोई भेदभाव नह ं हआ करता था। हमलावर ु और बचाव करने वाल के दरिमयान ज़ोरदार लड़ाई होती थी। हार-जीत के फ़ैसले म भी ह द-ू मुसलमान शर क रहते थे। ज़र और ज़मीन क जंग थी। द ली क स तनत और इराकाई खुद मु तयार क जंग थी। अरब और अ ु ◌़◌ीक िसपाह भी राजाओं क फ़ौज म जगह-जगह िमलते ह। अलग-अलग पेश . दे विगर आ द क अनेक भाषाओं क जानकार कव ह ा थान पर रहकर उ ह ने भारत क थी। अमीर खुसरो भारत के पहले ऐसे ज ह ने सम त भारतीय भाषाओं का सव ण अपनी मसनवी नूह िसपहर म कया है जसका ऐितहािसक मह व है । सर जाज ि यसन के लगभग छ: सौ वष पूव भाषाओं क जो व मान है । खुसरो ने वंय अपने के संबंध म जानकार फ़ारसी भाषा म ा इसी थित खुसरो ारा बताई गई थी वह आज भी ंथ म िलखा है क उ ह ने वंय कई भाषाओं क है और उनम से कई वे बोलते व समझते ह। वषय पर उ ह ने िलखा है क - . क़ वाली. पंजाब. आवाम से. मुलतान. (दोहे . द तका रय . गज़ल. अवध. तुक और अरबी भाषा के कांड पं डत थे। खड़ बोली उ ह वरासत म िमली थी। सं कृ त पर भी उ ह पूरा अिधकार था। बंगाल. आ द) िलखीं। अमीर खुसरो ने अपने दौर म राजभाषा अथवा दरबार भाषा फ़ारसी होते हए ु भी आम आदमी क दे शी जुबान ह दवी म िलखा। अब यह उठता है क यह ह दवी भाषा या है ? वंय अमीर खुसरो ने ह दवी को दो अथ म िलया है । एक तरफ़ ह दवी से उनका मतलब है खड़ बोली ह द तो दसर ओर वे अपने समय म ू अमीर खुसरो बहभाषा व ु चिलत कई भाषाओं को भी ह दवी कहते ह। थे। वे फ़ारसी. गीत. व मेहनत के काम म.

कबर (क नड़). लाहौर (पंजाबी)."दानम व दरयाफता व गु ता हम. ह दवी बूद अ त दर अ यामे कुहन। 'िसंद व लाहौर व क मीर व कबर धुर समु दर व ितलंगी व गु माअबर व गौर व बंगाल व अवद दे हली व पैराम श अ दर हमह अद। ई हमह ह दवी त क जे अ यामे कुहन। आ मह बकार त बहर गूनह सुखन।' अथात भारत म भाषा संबंधी यव थत विध िनयम है । ह दवी का अ त व ाचीनकाल से है । और आज भी है । िस धी. क मीर . अवद (अवधी- ह द ) तथा दे हली ( द ली) तथा उसके आस-पास क भाषा। दे हली तथा उसके आस-पास क ' ह दवी है जो सीमाओं के अ दर बोली जाने वाली भाषाऐं ( ह द ) ाचीन काल से ह हर कार क आव यकता के िलए साधारण जन के काम आती रह है ।" ह द श द का अपने (तेलुगु). उ ड़या. गौर (गौड़ . धूर समुंदर (तिमल). गु िस फारसी - योग खुसरो ने लगभग बारह बार ह दवी श द कोश खािलक बार म कया है । . बंगाल (बंगला). ितलंगी (मलयालम). प पूव (गुजराती). जु त -रोशन शुदा जाँ बेशोकम।" अथात कई भाषाओं म मैन वंय बहत ु कुछ प रचय ा कर िलया है । उ ह म बोलता व जानता हँू । मैन उनक खोज क है और म इनको कमोबेश जानता हँू । अमीर खुसरो ने अपनी िस मसनवी 'नूह िसपेहर' (नौ आकाश) के एक अ याय (सग ३ अ याय ५) म भारतीय भाषाओं का सव ण तुत कया है । वह है - ह द हमी कायदय दारद बसुखन. माअबर मी बंगाल).

जौके इबारत कम अजानी त दर ने '' अथात य प दर भाषा मीठ और श कर के समान है क तु सं कृ त भाषा म उससे सा ह य सृजनशीलता कसी भी खुसरो के उपयु िस कार कम नह ं है । श द कई कारण से मह वपूण ह। एक तो इस उ रण से यह होता है क खुसरो का ' लािसक ' के अित र गहरा था और भाषा प रपे य भारतीय भाषा कतना यापक था। दसरे यह ू आसपास क खड़ बोली के भाषागत प पर.अपनी मसनवी ख़ मानते। वे कहते है - खाँ दे वल रानी म खुसरो ह दवी को फ़ारसी से कम नह ं 'न ल जे ह दवी त अज फ़ारसी कम।' अथात ह द भाषा के श द फ़ारसी भाषा के श द इससे जाज ि यसन क इस से कमतर नह ं ह। ाँित का िनराकरण हो जात है क यहाँ ह द से वा तव म खुसरो का ता पय सं कृ त से है न क उस भाषा से जसे हम आज इस नाम से अिभ हत करते ह। इस बात का साफ़ अथ है क ह दईू भाषा ाचीन काल से है और आज भी है । हं दईू का ता पय सं कृ त नह ं है जैसा क ि यसन का कथन है । सं कृ त के वषय म खुसरो का कथन है - 'सं कृ त नाम ज़ अहदे कुहनश. उसक ान कतना क दे हली के यंजना श पर उनक आ था अनुभवज य थी। जो भाषा (उस समय बोली) हर कार क आव यकता क है उसका पूित के िलए जब साधारण ारा यु होती रह वाभा वक . आ मह न दारद खबर अज़ कुब मकुनश।' अथात ् ाचीन काल से इस भाषा का नाम सं कृ त है । जन-साधारण के साथ उसके याकरण क बार कय क वाता नह ं है । सं कृ त के संबंध म ह वे आगे कहते ह - ""गरवे क शीर नी त दर व शकर ने .

उनक कालजयी त व दिशता व दरू शता दय क धूिमल वचार मूढ़ता को पार कर गई है । प का य े खुसरो को ह द या आज क या है क मागदशन ह दवी से हमारा ता पय प रिन त उद ू से नह ं ब क उससे आ य वह ाचीन भाषा है जो तेरहवीं सद ईसवी म का वह जो कई ा य है । अमीर खुसरो के ह दवी का य क चचा करते व मानक चिलत ाचीन प थी जो कालांतर म धीरे -धीरे मानक प ज भाषा अथवा खड़ बोली हण कर गई। ह द . अ लड़ थी धीरे -धीरे पनप रह थी. जो भाषा अभी क ची थी. बोली से शनै: शनै: भाषा म प रवितत हो रह थी. आकार ले रह थी. ज भाषा या ह रयानी बोिलय के नाम भी ऐसे ह जो कालांतर म दए गए या चिलत हए। खुसरो क ु ह दवी रचनाओं म जो भाषा िमलती है वह आज क ह द से मेल खाती है । सामा यत: खुसरो का ह दवी से ता पय तेरहवीं सद क उस ांरिभक भाषा से है जो वतमान ह द -उद ू का ाचीन प थी अथात ् जो ल कर भाषा उस काल म बन रह थी. अनधड़ थी. और पूणत: कोई नाम या एक भाषा का दजा उसे खुसरो के काल म नह ं िमला था। अत: वह केवल आम लोग क बोलचाल क भाषा थी जसका उस दौरा म कोई सा ह यक मह व नह ं थी। अपने ंथ गुरतुल कमाल के ा कथन म ह दवी का नाम बार बार इसी द ली व आस-पास क िमली-जुली भाषा के िलए खुसरो गया है । ारा यु कया जन भाषाओं और बोिलय का उ लेख खुसरो ने नुह िसपहर म कया है उनको नैसिगक ववतन के कारण ह वह थान अब नह ं िमला जो उस काल म िमला . उद. बन रह थी. जो यापार करने के उ े य से यापा रय व नाग रक ारा बॉडर पर बोली जाती थी.अिधकार खुसरो ने ह साथ अपने का य म सहज थम वीकार कर िलया था और उसको बड़े अिभमान के थान दया था .ू ह द ु तानी से जो वतमान भा षक अथ हमने संबंध कर दए ह उनका तेरहवीं सद म व मान होने का नह ं उठता। इसके अित र खड़ बोली.वह था खड़ बोली का लोक प और अंितम कारण.

ह द श द ने कसी उ प न नह ं क वता उसके त कया। सबसे बड़ बात यह थी कार का रस दोष क पाठक को लगता था क ित दन के जीवन के अित िनकट आ गई. न दारम ऐ जाँ. रस क अनुभूित िनबाध थी. ह द श द के कारण कह ं छ ददोष नह ं आ पाया. और इतनी बोिलय म उ ह ने खड़ बोली को ह जन स पक भाषा के प म चुन िलया। उपयु भाषा-भाषी े को एक सू क क पना करने के बाद खुसरो के सम म परोने के िलए एक रा भाषा यह सम या आई क खड़ बोली ह द ( जसको इ ह ने हं दवी भी कहा है ) का भाषािभजा य िस कर द . उसक संवेदनाओं क य को छे ड़ गई। खुसरो का पाठक समाज भी िन वशेष हो गया था। एक अनूठा उदाहरण यह िस गज़ल है जो अमीर खुसरो ारा रिचत है - " जहाल-ए-िम क ं मकुन तगाफुल. दरा ु य नैना बनाय बितयाँ। कताबे ह ाँ. फ़ारसी का सा ह य बोलबाला था उस युग म खड़ लािसक भाषाओं के समक बोली या पं य ह द य िस े म को सं कृ त या फ़ारसी जैसी करना िन संदेह क ठन काम था पर तु वचारशील ख़ुसरो म भाषा संबंधी पूवा ह नाम भर का भी न था। यह कारण है क उ ह ने अनेक रचनाओं म फ़ारसी के साथ-साथ ह द का योग कया। यह फ़ारसी के मूध य क वय तथा समालोचक के िलए एक चुनौती सी थी य क वज़न ब कुल ठ क था.होगा पर तु यह इस समय हमारे अ ययन का वषय नह ं है । ल णीय तो यह है क भारत क व वध बोिलय का ान खुसरो को कस सीमा तक था.ऐसा अनुमान करना उिचत न होगा। जस युग म. न लेहु काहे लगाय छितयाँ।। शबाने ह ाँ दराज चूँ जु फ बरोजे वसलत चूँ उ कोताह। सखी पया को जो म न दे खूँ तो कैसे काटँू अँधेर रितयाँ। यकायक अज़ दल द ू च मे जाद ू बसद फरे बम बवुद त क ं। कसे पड़ है जो जा सुनावे पयारे पी को हमार बितयाँ .

राम राम कहना) खुसरो ने इस पदो चय को फ़ारसी म कस खूबी से चिलत कया . हमेशा िग रयाँ ब इ के आँ माह। न नींद नना.'रामह मन हिगज़ न शु हरच द गु तम राम राम।' (तुगलक नामा) . आँख चुराते हो और बात बनाते हो। जुदाई क रात तु हार कार जु फ़ क तरह लंबी व घनी है । और िमलने के दन उ क तरह छोटे । शमा क िमसाल म सुलग रहा हँू . न आप आये न भेजे पितयाँ।। बह के रोजे वसाले दलबर के दाद मारा फरे ब खुसरो। सपीत मन के दराये राखूँ जो जाय पाऊँ पया क खितयाँ।। या (दरु ाय राखो समेत साजन जो करने पाऊँ दो बोल-बितयाँ।) अथात मुझ गर ब िम क न क हालत से यूँ बेख़बर न बनो। आँख िमलाते हो.चूँ शमआ ् सोजाँ. मुह. न अंग चैना. चूँ जरा है राँ. न आप आते ह न ख़त िलखते ह।'' प है क यह एक योग है पर तु योग कालीन जड़ता से मु । ऊपर िल खत ह दवी-फारसी िमि त गज़ल म ह द पं फ़ारसी पं य या अधाश म य या अधाश रस वचार से यून नह ं ठहरते। खुसरो ने इस कार िस कया क रा भाषा का आसन अलंकृत करने वाली ह द म वह िमठास भी है जो फ़ारसी गज़ल म होती है । इसी तरह अरबी और ह द के मेल क गज़ल भी खुसरो ने िलखीं। खुसरो ने ह द श द का भी फ़ारसी म योग कया और बड़ िनपुणता से कया। ह द म राम राम एक वल ण पदो चय है जसम ल णा के अित र बहमु ु खी यंजना भी है । (तु. जल रहा हँू और ज़र क तरह है रान हँू । उस चाँद क लगन म आ मेर ये हालत हो गई क न आँख को नींद है न बदन को चैन.

साजन. बाबुल. बसीठ. मंढा. काठघर. परो करते हए ु सूफ प से कोई तीक है । अफजलुल फवायद याकरण खुसरो ने भले ह न प म इसका ढाँ चा बनाकर आगे आने वाली पी ढय के िलए उसे अपने सा ह य म सुर अमीर खुसरो ने य वल त कर दया। ह दवी म लोक जीवन तथा धािमक आड बर का वरोध वचारधारा से ओत. वैसा ह प आज से साढे सात सौ वष पहले खुसरो क भाषा म उपल ध है । लोक चिलत भाषा के लािसक सा ह यक भाषा के समान मा यता दे ना खुसरो के कालाित ा त साहस का ठोस माण है . शाद . उनक िन ा का उ क भाँित भावी रा भाषा का िलखा हो. जो कार कया यय होने पर जतनी क 'ने' का योग या का कम के प आजकल पाया जाता है . हं डोला (झूला).च दन. जैसे-कूबते हची त: यार को कब दे खए? उ र: सदा या माशूक / रा चे मी वायद कंद: ह दओं का रखवाला कौन? ु उ र: राम। इसम बौ क यायाम के साथ साथ मनो वनोद तो है ह . पटरा. पनघट. बरखा. सावन. या यह संकेत भी नह ं है क ह द बौ क श द व यास म फ़ारसी से कसी अंश म कम नह ं? कुछ अंश तक तो सखुन म और पूणतया मुक रय और पहे िलय म खड़ बोली का प और अिधक िनखरा है । जैसे 'एक नार ने अचरज पंजरे म दया।" म ने का बात को पु जानकार योग (जो पूव बोिलय म नह ं पाया जाता ह।) इस करता है । कई बोिलयाँ ह जनम ने का हआ िमलता है जस ु ा कया। सांप मा र कार आज योग उसी कया जाता ह। अब तक हम हई ु है उसके आधार पर हम कह सकते ह खुसरो से पहले नह ं िमलता। कतृ कारक के स िलंग वचनानुसार वकार होना.याह. होली.ोत तरह तरह के बसंत. दह . वदाई. च क . आ द ह द श द का डटकर अपने फ़ारसी कार क ंथ म योग उ ह ने कया और इससे उनक फ़ारसी भाषा म कसी यूनता या ह नता नह ं आई। फ़ारसी और ह द दोन भाषाओं का योग करते हए ु उ ह ने दो सखुने िलखे. ईश . गर ब.

अराधना आ द गीत िलखे तथा दोहे , गजल, क वाली व तरह-तरह क पहे िलयाँ
रची। खुसरो बचपन से ह चंचल, मह वकां ी, खुशिमजाज, हा जर जवाब, चतुर
और हं समुख तथा वनोद

वभाव के थे। अपनी फारसी रचनाओं म अमीर खुसरो

ने ब च क तुलना बाग म

खलते और महकते फूल से क है । कई जगह

उ ह ने अपनी लड़क और लड़के के मा यम से नसीहत द है ।
अमीर खुसरो ने ह द सा ह य को पहे िलयाँ द है जो उनसे पूव सं कृ त म गौढ़
प म थी। भारत म पहे िलय क पर परा बहत
ु पुरानी है । हमारे

ॠगवेद म य -त
का य

तक म

बहत
सी पहे िलयाँ ह।

या अ

पहे िलयाँ मूलत: आम जनता क
पहे िलय

ा ण , उपिनषद

प म पहे िलय

ाचीनतम

और कह ं-कह ं

के दशन हो जाते ह।

चीज है । सा ह यक पहे िलयाँ उन लौ कक

का ह अनुकरण ह। खुसरो ने भी कदािचत लोक के

पहे िलय क रचना क । इतना ह नह ं लोक

कार क पहे िलय म कुछ तो ब कुल एक ह

म सव थम अमीर खुसरो ने इस

ंथ

भाव से ह

चिलत और खुसरो क दोन ह

प म िमलती ह। लोक सा ह य

कार क पहे िलयाँ बनाने का

रवाज़ शु

कया। इससे पहले सं कृ त सा ह य म पहे िलयाँ बेहद गौढ़ प म

नाम से िमलती ह। अमीर खुसरो ने ब च के िलए दो
:

हे िलका के

कार क पहे िलयाँ िलखी

(१) बूझ पहे ली (अंतला पका)
यह वो पहे िलयाँ ह जनका उ र
होता

है

यािन

(क) गोल
खुसरो

कहे

जो

मटोल

उ र - लोटा।

नह ं

पहे िलयाँ

और

है


पहले

छोटा-मोटा, हर
झूठा,

जो

या अ
से


दम

प म पहे ली म दया

बूझी
वह

बूझे

तो

गई

ह।

जमीं

अ कल

पर

का

जैसे

-

लोटा।

खोटा।।

यहाँ पहली पं

का आ खर श द ह पहे ली का उ र है जो पहे ली म कह ं भी

हो सकता है । इन पहे िलय का उ र पहे िलय म ह होता है । खुसरो क बूझ

पहे िलय के भी दो वग बनाए जा सकते ह। कुछ म तो उ र एक ह श द म
रहता है जैसा क हम ऊपर दे ख चुके ह। दसर
पहे ली म कभी-कभी उ र के

िलए दो श द को िमलाना पड़ता है । जैसे –

(ख) याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नार ।
दोन हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ र ।।
उ र - आर । यहाँ दसर
पं

िमलता

के आ खर श द 'आ' और 'र ' को िमलाने से उ र

है ।

(ग) हाड़ क दे ह उज ् रं ग, िलपटा रहे नार के संग।
चोर क ना खून कया वाका सर

य काट िलया।

उ र - नाखून।
(घ) बाला था जब सबको भाया, बड़ा हआ
कुछ काम न आया।

खुसरो कह दया उसका नाव, अथ करो नह ं छोड़ो गाँव।।
उ र - दया।

(ञ) नार से तू नर भई और याम बरन भई सोय।
गली-गली कूकत फरे कोइलो-कोइलो लोय।।

उ र - कोयल।
(च) एक नार तरवर से उतर , सर पर वाके पांव
ऐसी नार कुनार को, म ना दे खन जाँव।।
उ र - मना।
(छ) सावन भाद बहत
ु चलत है माघ पूस म थोर ।
अमीर खुसरो यूँ कह तू बुझ पहे ली मोर ।।
उ र - मोर (नाली)
(२) बन बूझ पहे ली या ब हला पका, इसका उ र पहे ली से बाहर होता है ।
उदाहरण –

(क) एक नार कुँए म रहे , वाका नीर खेत म बहे ।
जो कोई वाके नीर को चाखे, फर जीवन क आस न राखे।।
उ र – तलवार
(ख) एक जानवर रं ग रं गीला, बना मारे वह रोवे।
उस के िसर पर तीन ितलाके, बन बताए सोवे।।
उ र - मोर।

(ग)

चाम

मांस

वाके

नह ं

नेक,

हाड़

मो ह अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।

मास

वाके

छे द।

पंजड़ा। (घ) याम बरन क है एक नार . माथे ऊपर लागै यार । जो मानुस इस अरथ को खोले. सबके सर पर औंधा धरा। चार ओर वह थाली फरे . डाले हरा िनकाले लाल। ू उ र . कु े क वह बोली बोले।। उ र .पान। (च) एक थाल मोितय से भरा. एक िच दो दे खत म तो साधु है .बगुला (प ी) यान। .भ (भ ए आँख के ऊपर होती ह।) (ञ) एक गुनी ने यह गुन क ना. ह रयल पंजरे म दे द ना। दे खा जादगर का हाल.उ र . पर िनपट पार क खान।। उ र . मोती उससे एक न िगरे । उ र – आसमान (३) दोहा पहे ली कुछ पहे िलयाँ अमीर खुसरो ने ऐसी भी िलखीं जो साथ म आ या मक दोहे भी ह। उदाहरण (क) उ जवल बरन अधीन तन.

कु हार क चाक (ञ) अचरज बंगला एक बनाया.(ख) एक नार के ह दो बालक. बुरका ओढ़े मइया।। उ र – भु टा (घ) चार अंगुल का पेड़. फे बार बर। चातुर हो तो जान ले मेर जात गँवार।। उ र – कु हार . सवा मन का ता। फल लागे अलग अलग.च क। (ग) आगे -आगे ब हना आई. कहे खुसरो घर कैसे बने।। उ र . पीछे -पीछे भइया। दाँत िनकाले बाबा आए. फर भी दोन संग। उ र . पक जाए इक ठा।। उ र . दोन एक ह रं ग। एक फर एक ठाढ़ा रहे .बयाँ पंछ का घ सला (च) माट रौदँ ू चक ध . बाँस न ब ला बंधन धने । ऊपर नींव तरे घर छाया.

और जल म कया िनकास। परदे परदे आवना. केहर काले रं ग। यारह दे वर छोड़ कर चली जेठ के संग।। उ र .अहरह क दाल। (ज) ऊपर से एक रं ग हो और भीतर िच ीदार। सो यार बात करे फकर अनोखी नार।। उ र – सुपार (झ) बाल नुचे कपड़े फटे मोती िलए उतार। यह बपदा कैसी बनी जो नंगी कर दई नार।। उ र .भु टा (छ ली) अमीर खुसरो के नाम पर ारा सं द ध चिलत कुछ पहे िलयाँ जो कई व ान सा ह यकार से दे खी जाती ह - (क) अ न कुंड म िघर गया. अपने पया ( यतम) के पास।। उ र .(छ) गोर सु दर पातली.हु के का धुआ ँ (ख) नयी क ढ ली पुरानी क तंग। बूझो तो बूझो नह ं तो काना हो जाए।। .

हाथ पकड़ा जब से। आह ऊह कब से.उ र – िचलम (ग) हात म लीजै दे खा क जै। उ र . श द ान और साधारण जानकार हे तु ह द सा ह य म कुछ नई वधाऐं ईजाद क । ये पूणत: शु क इस पहे िलयाँ तो नह ं ह पर तु इनम भी कुछ पहे िलय क भाँित बुझौवल कृ ित व मान है । ये नवीन वधाएँ उनके पूव अनय कार है – (१) िन बत कह ं नह ं िमलती। ये . आधा गया तब से। वाह-वाह कब से पूरा गया जब से। उ र .शीशे क चूड़ । व तुत: हु का. शीशा. ब दक ू आ द का चार खुसरो के बाद म हआ। ु इसके अलावा सा ह यकार अमीर खुसरो ने आम लोग को मनोरं जन.आइना (शीशा) (घ) एक नार वो ओखद खाए. अंधा नह ं तो काना हो जाए।। (िनशाना लगाते समय एक आँख बंद कर लेते ह।) उ र – बंदक ू (ञ) चटाख-पटाख कब से. िचलम. जस पर थूके वो मर जाए। उसका पया जब छाती लाए.

यह अरबी भाषा का श द है । इसका अथ है संबंध या तुलना। यह भी एक कार क पहे ली या बुझौवल कह जा सकती है । इसम दो चीज म संबंध.क र । क र उस आम को कहते चौड़ाई को पाट कहते ह। ह जस पर प े का दाग लगने से कुछ भाग काला हो जाता है । दसर ओर ू क र एक गहने का भी नाम है जो हाथ म पहना जाता है । पंजाब ांत म इसका रवाज है । (ञ) जानवर और ब दक ू म या िन बत है ? उ र .बाल। आदमी के सर पर केश को बाल कहते ह और वह ं दसर ओर ू खेत म उगे गेहूँ क भी बाल होती है । (ख) मकान और पायजाम म या िन बत है ? उ र .मोर । मकान म नाली को मोर कहते ह और पायजाम म भी मोर होती है । यािन पायजामे क मोहर को भी मोर कहते ह। (ग) कपड़े और नद म या िन बत है ? उ र पाट। कपड़े और नद दोन क ह (घ) आम और जेवर म या िन बत है ? उ र .घोड़ा। घोड़ा जानवर है तो वह ं ब दक ू का एक भाग भी। (च) बादशाह और मुग म या िन बत है ? उ र . तुलना या ू समानता ढढ़नी या खोजनी होती है । िन बत का मूल आधार है एक श द के कई अथ। उदाहरण :- (क) आदमी और गेहूँ म या िन बत है ? अथात दोन म या चीज एक समान है । उ र .ताज। बादशाह के मुकुट को .

लोटा न था। पिथक (या ी) के पास पानी पीने के िलए कोई लोटा (बतन) न था। अत: वह यासा रह . गला हआ नह ं था.गला न था। मांस क चा झ पड़ (मढ़ ) या कुट न थी और ढोलक चमड़े से मढ़ हई ु नह ं थी। था.मढ़ न थी। रहने के िलए (ग) गो त य न खाया? डोम यो न गाया? उ र . अत: खाया नह ं गया। गाने के यो य अ छा गला नह ं ु था. अत: डोम गाया न गया। (घ) पिथक यासा य ? गधा उदास य ? उ र .राज न था। ू द वार बनाने वाला राजिम ी या राजगीर नह ं था। अत: द वार टट रह गई। रा य (राज) यव था नह ं थी अत: राह लुट गई। (ख) जोगी य भागा? ढोलक य न बजी? उ र .ताज कहते ह और मुग क लाल कलगी को भी जो उसके सर के ऊपर लगी होती है । य तो पहे िलय से श द के िन बत म वह िच और भी प ित खुसरो क िच का पता चलता है है । आइए अब खुसरो क तु ारा अ व कृ त दोसखुन दे ख। (२) दो सखुन सखुन फारसी भाषा का श द है । इसका अथ कथन या उ दोसखुन म दो कथन या उ है । अमीर खुसरो के य का एक ह उ र होता है । इसका मूल आधार भी श द के दो-दो अथ ह। उदाहरणाथ (क) द वार ू ? राह य टट य लूटू? उ र .

गया। गधे क ज मजात आदत होती है ज़मीन (िम ट ) म लोट लगाना। गधा िम ट म लोटा (ञ) रोट जली नह ं था यो? घोड़ा अड़ा अत: वह भी य ? पान सड़ा नीरस और उदास था। यो? उ र . वािलयर. ब च आ द आम लोग से ले कर विभ न संगीत घराने के लोग गाते ह। जैसे रामपुर सहसवान. सैिनया आ द। कहमुक रय अथ है क कसी उ पं का को कह भी दया और मानने से भी मुकर गए। यह चार य म होती है । तीन या उससे अिधक म पहे ली होती है और चौथी या आ खर पं म पहले तो खुसरो 'ए सखी साजन' के प म पहे ली का उ र दे ते . १६. या १९ होती है । इ ह परदा कहते ह। इसके बना िसतार नह ं बज सकता। औरत के संबंध म पदा का अथ है . कराना. युवितय . कपड़े का पदा लगाया करते थे। य ? फक र बगड़ा य ? उ र . शर र ढकने के िलए कपड़े का पदा। खुसरो के समय म आजकल क तरह होते थे। उन दन (छ) न घर अिधंयारा नान घर नह ं लोग नहाते समय. एक जगह खड़े होकर फेरा लगाना। न लगा सकने क थित म वह चलता नह ं और एक जगह पर ह अड़ जाता है । पानी म पड़े पान के प को पनवाड़ बार-बार फेरता रहता है । इससे पान का प ा सड़ता नह ं। न फेरो तो सड़ जाता है । (च) िसतार यो न बजा? औरत य न नहाई? उ र . रे .परदा न था। िसतार के डाँड पर स.दया न था। घर म दया यािन द पक होने से अंधेरा था और फक र को कुछ दान म दया नह ं था. शहर म औरत . प टयाला.फेरा न था। रोट को फेरा (पलटा) नह ं गया था। अत: वह जल गई। घोड़े क पैदाइशी आदत होती है . ग. आगरा. सो वह बगाड़ गया। (३) कहमुक रयाँ या मुक रयाँ (पहे ली नुमा गीत) अमीर खुसरो ह द के पहले ऐसे क व ह ज ह ने पहे लीनुमा गीत िलखे। इ ह विभ न राग म बाँधकर आज भी गाँव म. म आ द बजाने के िलए धातु के मोटे तार या ताँत से बँधे रहते ह। इनक सं या ाय: १३.

ऐ सखी साजन न सखी दया।। (३) िनत मेरे घर आवत है . ढोलक. गो त. बकर . कोयल. मोर. मना. हं डोला. चूड़ा. म खी. द वार. गम . जोगी. हार. चंदा. गधा. पान. को हू का तेल. घोड़ा. पंखा (हाथ). चाँद . मोती. राग. भंग. पानी. बंदर. मीठ यार बात करे । याम बरन और राती नना. रबाब. बसंत. मुकुट आ द। उदाहरण (१) बरसा-बरस वह दे स म आवे . बाल. कपड़े . ऐ सखी साजन न सखी मना।। (५) वो आवे तब शाद होवे. तेल. ऐ सखी साजन न सखी ढोल।। . पखावज. लोटा. भोर भई तब बछड़न लागा। ु वाके बछड़त फाटे हया. ऐ सखी साजन न सखी आम।। ु (२) सगर रै न मोरे संग जागा. म छर. आम. रात गए फर जावत है । मानस फसत काऊ के फंदा. बरखा. कु ा. चोली.जो इस उ ू यतम और का आ खर श द है । इसम अमीर खुसरो ने ब च . पजड़ा. ऐ सखी साजन न सखी चंदा।। (४) आठ हर मेरे संग रहे . बाल. उस बन दजा और न कोय। ू मीठे लागे वाके बोल. सोना. गगर . तोता. हाथी. तबला. मुँह से मुँह लाग रस यावे। वा खाितर म खरचे दाम. िसतार. मढ़ . पायजामा. ढोल. सुनार. ढयोड़ . चौखट.ह। इनम से अिधकांश पहे लीनुमा गीत का जवाब साजन है यािन साथ म एक दसरा जवाब भी है . चोर. गेहूँ क बाल. टे सु के फूल. गाँव क गो रय और दै िनक जीवन से जुड़े वषय को िलया है जैसे सावन. चौसर. मोर. नन. हु का. भ . चुनर . खेत म उगी पीली सरस .

नए जमाने क . ऐ सखी साजन न सखी हार।। कुछ मुक रयाँ छ: पं य क भी अमीर खुसरो ने िलखीं – (७) घर आवे मुख घेरे-फेरे . द दहाई मन को हर. अपनी खचड़ अलग पकावे। भीतर त व न झूठ तेजी. य स ख स जन? न हं ेजुएट।। ू । (३) प दे खावत सरबस लूटै. ऐ सखी साजन न सखी तोता।। आधुिनक ह द के जनक बाबू भारते द ु हर शच तो अमीर खुसरो से इतना भा वत थे क खुसरो क ह शैली म उ ह ने उ ह ं का अनुकरण करते हए ु . फ दे म जो पड़े न छटै कपट कटार हय म हिलस। य स ख स जन न स ख पुिलस।। ू . कभी करत है खे नन। ऐसा जग म कोऊ होता.(६) सगर रै न गले म डाला. ु कभू करत है मीठे बैन. रं ग प सब दे खा भाला। भोर भई तब दया उतार. मुक रयाँ रच डाली। उदाहरण - (१) सब गु जन को बुरा बतावे. य स ख स जन? न ह अंगरे जी।। (२) तीन बुलाए तेरह आवे. िनज िनज बपता रोई सुनावै। आँख फूटे भरा न पेट.

दसरा खंड . सीस मुकुट नीचे वह खड़ा। दे खत घटा अलापै जोर. ऐ सखी साजन न सखी केला।। अमीर खुसरो क कुछ मुक रयाँ ऐसी भी ह जो केवल कसी और पर लागू होती ह क तु साजन पर ब कुल नह ं और न ह साजन क अ य के सा कसी अंग पर। केवल य पर उनम भी 'ऐ सखी साजन 'जोड़' दया गया है । जैसे यह िन निल खत मुकर केवल मोर पर ह लागू होती है . भोलानाथ ितवार का कहना है क अमीर खुसरो के नाम से िमलने वाली बहत ु सी मुक रयाँ कुछ बाद क रिचत लगती ह। उदाहरण - . वाके ह ड न वाके पसली। लटाधार गु का चेला. ८१०-८११) ू अमीर खुसरो क कुछ कहमुक रयाँ ऐसी ह जो केवल कसी और पर तो लागू होती है क तु साजन पर नह ं। हाँ वे साजन के कसी अंग पर अव य लागू होती ह। इसी कारण इनम से कुछ म अशलीलता क झलक आ गई है । ये अशलीलता का पुट वा तव म लोक सा ह य के कारण है । उदाहरण आठ अंगुल का है व असली.( ोत: भारते द ु ंथावली. साजन पर ब कुल नह ं "नीला कंठ और प हरे हरा. ऐ सखी साजन न सखी मोर।।" इस अथ का अथवा अनुमान का कुछ व ान भाषा वद एवं सा ह यकार ने कड़ा खंडन भी कया है । वे तक दे कर कहते है क यह मुकर साजन व मोर दोन पर ह खर उतरती है । मुकर म मोर का जो व तृत वणन कया गया है वह प एक ह द के ी अपने यात भाषा व ेमी या यतम के िलए भी क पना कर सकती है । डॉ.पृ.

ऊपर ठाट-बाट या एक कार क क वता. ढ ंगे मारने आ द का पुराना रवाज है जो स दय से ामीण अंचल के मा यम से लोक सा ह य म चला आता है । अनूठ . य कोई संदेश या िश ा भी दे ते ह। उदाहरण - (क) भार भुजावन हम गए. प ले बाँधी ऊन। कु ा चरखा लै गयो. पी पी कर मोहे मुँह आवे। एक म अब मा मु का. फुटकल छं द . ला कथूरा म डोराई डा र लाऊँ।। को कोई न . मनोरं जक व समय गुजारने क इ ह ं ामीण पर पराओं म अमीर खुसरो ने भी अपना योगदान दया है । उ ह ने आम लोग क ज रत को यान म रखते हए ु लोक मनोरं जन हे तु ब च व बड़ दोन के िलए ह द सा ह य म एक नवीन वधा का पदापण कया। यह है ठकोसले। ढकोसले या अनमेिलयाँ ढकोसल का चिलत अथ है आड बर. ग प. ऐ सखी साजन न सखी हु का।। हँ सन हँ साने और मनोरं जन के िलए चुटकुले . काएते फटकूँगी चून।। (ख) काक फूफा घर म ह क नायं. जसका अथ न हो और जो इतनी बेतुक हो क ू । इनका अ व कार खुसरो ने आम लोग का मन सुन कर फौरन सी हँ सी छटे बहलाने व हँ साने के उ े य से कया था। अमीर खुसरो एक सूफ संत भी थे। सूफ मत या सूफ पर परा म सू फय ारा िल खत रचनाओं (पद . क से. उ वशेष . पाखंड. गीत आ द) के दो अथ होते ह। एक ऊपर अथ तो आसानी से हम न ु आता है और एक दसरा उसका आ या मक अथ जो भीतर छपा हआ है । अत: ू ु जहाँ अमीर खुसरो जी के ठकोसले हँ सा कर लोटपोट करते ह और मन म गुदगुद पैदा करते ह तो वह ं वे सूफ वचार धारा िलए हए ु . दोहे . नायं तो न दे ऊ पांवरो होय तो ला दे ."आप जले औ मोय जलावे. दोह .

तू बैठ ढोल बजाय. ला पानी पलाय। (घ) भस चढ़ बबूल पर और लपलप गूलर खाय। दम ु उठा के दे खा तो पूरनमासी के तीन दन।। (ड़) पीपल पक पपेिलयाँ. कह ं ह ज न फट जाए।। (३) भस चढ़ा बबूल पर गप गप गूलर खाय। दम ु उठा के दे खा तो ईद के तीन ितन।। इन ढकोसल के साथ रोचक एवं हा या मक क से भी जुड़ ह। तो आइए एक ऐसा ह क सा सुने - 'एक बार आशु क व अमीर खुसरो गाँव क क ची पगडं ड से होते हए ु पैदल कह ं जा रहे थे। रा ते म उ ह बहत ु जोर से यास लगी। गला यास के मारे सूखा जा रहा था। खुसरो ने फौरन आसमान क ओर दे खा। कुछ ह दरू पर आसमान म उ ह प वह ं पानी ह य का एक झुंड मँडराता न आया। वे फौरन भॉप गए क य क प ी पानी के आसपास ह उड़ा करते ह। वे तुर त उसी . वाह रे तेर िमठास।। (च) लखु आवे लखु जावे. बड़ो कर ध मकला।। ऊपर िल खत (घ) ढोकसले के कइ अ य प भी िमलते ह। जैसे (१) भस चढ़ बबूल पर और लप लप गूलर खाए। उतर उतर परमे र तेरा मठा िसरान जाए।। (२) भस चढ़ बटोर और लप लप गूलर खाए। उतर आ मे रे साँड क . झड़ झड़ पड़े ह बेर। सर म लगा खटाक से .(ग) खीर पकाई जतन से और चरखा दया जलाय। आयो कु ो खा गयो. बड़ो कर ध मकला। पीपर तन क न मानूँ बरतन धधरया.

अरे ठहर तो जरा। ये तो अमीर खुसरो ह. वदाई.तुम तो दरबार शायर हो.दशा म चल दए। पहँु च कर दे खा क एक कुँए पर चार ामीण पिनहा रने अपनी-अपनी मटक म पानी भर रह ह। और आपस म खूब हँ सी मजाक और ठठोली कर रह ह। वे चार बहत ु ह हँ समुख कुँए के पास जा कर उनम से एक से पानी कृ ित क दखती थीं। खुसरो ने पलाने को कहा। अचानक एक अजनबी को दे ख कर सब चुप हो गयीं। इनम से एक उ ह पहचानती थी। वह बाक औरत से बोली . 'तुझे तो हमेशा खाने-पीने क पड़ रहती है । पेटू कह ं क । अरे तुरकवा तुम खीर पर नह ं। चरखे पर सुनाओ.ठ क है सबक फ़रमाइश पर सुनाऊँगा। ले कन पहले पानी तो पलाओ। मारे मेरा दम िनकला जा रहा है । वे सभी युवितयाँ एक यास के वर म एक साथ बोलीं 'जब तक हमार बात पूर नह ं कर दोगे हम पानी नह ं पलाएँगी और न ह तु ह पानी दगे। अजी तुम तो ऐसे ह नाम के खुसरो बनते फरते हो। कुछ सुनाओ जरा चटपट जरा ठनकदार। तब खुसरो ने झट कहा - . बसंत. आशु क व मीर खुसरो तुरकवा। तब सब ने िमल कर उनसे पूछा - या तुम ह दरबार सावन. शाद याह आ द के गीत शायर अमीर खुसरो हो जो भाँित-भाँित क मुक रय . हं डोला (झूला). बरावा. दरबार के िलए अिधक िलखते हो। हमारे िलए भी तो कुछ िलखो। चलो खीर पर कुछ सुनाओ? मेर दाद बहत ु ह वा द खीर बनाती है । इस पर दसर युवती ने पहली क ू बात काटते हए ु कहा. साजन.हाँ हँू तो वह । इतना सुनते ह एक बोली . िलखते हो। खुसरो ने बेहद सहजता एवं िश ाचार से जवाब दया .अरे चरखा भी कोई सुनाने क चीज़ है । उसने मज़ाक के उ े य से कहा कु े पर सुनाओ कु े पर। इस पर चौथी युवती बगड़ते हए ु ज़ोर से बोली. िछ: िछ: कु ा। कु ा तो मरा होता है गंदा। यह भी कोई सुनाने क चीज़ है । सुनाना है तो ढोल पर सुनाओ। मेर अ माँ बहत ु ह अ छा ढोल बजाती है और मुझे भी िसखाती है । इस पर खुसरो ने ज़रा सख़ती से कहा . िन बत. ठकोसले. मेरे दादा जी चरखे पर सूत बहत ु अ छा कातते ह। तीसर युवती भी फर चुप न रह सक । तपाक से उसने भी अपनी फ़रमाइश क . पहे िलय .

गज कौ पछलौ अंक। सो तरकार लाय दै . वशाल य."खीर पकाई जतन से और चरखा दया जलाय। आया कु ा खा गया (अब तू). चातुर मेरे कंत।।" उ र .इस उ उ कंठा ा म रह यवाद ढं ग से नायक क नाियका से िमलने क ती तीत होती है । इस भाँित का य िनमाण संबंधी खुसरो क उ होती ह। उ याँ भी का अथ कथन. राजनीित नवंरस। षट भाषा पुणांच कुराणांच किथतं गया।। नोट . चम कार पूण कथन आ द है । िश त वग म अमीर खुसरो दहलवी क िन न जाती रह ह। उदाहरण "अजा पु कौ श द लै. वचन. अनोखा वा य. वचार. बैठ ढोल बजाय। ला पानी पलाय। यह सुनकर सभी पिनहा रने आ य च कत रह गयीं। इतनी शी तुकबंद । अमीर खुसरो क वल ण ितभा व बु इतनी ब ढया दे खए क उ ह ने एक ह दोहे या ठकोसले म चार पिनहा रन क फ़रमाइश ह नह ं पूण कर द वरन उसके मा यम से सूफ़ संदेश भी दया। इसी तरह अ य कई क़ से ठकोसल के सात मशहर ू ह। जैसा क हम पहले ह व दत कर चुके ह क अमीर खुसरो बहभाषी थे। उ ह ने ु दे वभाषा सं कृ त म भी िलखा। अमीर खुसरो क का य िनमाण संबंधी उ ा "उ होती ह। यह सं कृ त से भा वत लगती ह। जैसे - याँ भी धम.मैथी। कार क हे िलकाऐं भी बूझी .

और जुबान म बसा हआ है । यह झगड़ा ु शोधकताओं ने पैदा कया है क यह कलाम उस शायर का है भी या नह ं . नारं ग ने इस दावे का उद ू और ह द के कई व ान ने खंडन कया है । ये वा तव म अमीर खुसरो के वरोधी लोग ह। खैर इस अ ययन करने पर पता चलता है ह दवी कलाम का क इनम से अिधकांश रचनाएँ पहली बार काश म आई ह। डॉ. नारं ग कह यह योगदान शंसनीय है । अगर यह कहा जाए क उ ह ने खुसरो को पुन: जी वत कया है तो यह गलत न होगा। फारसी का सवमा य क व ह द भाषा म आकर ववाद पद बन गया मगर आम लोग के िलए नह ं ब क शोधकताओं के िलए। लोग ने इस शायर के ह दवी कलाम को इस प ात उनके दल .अजा पु हआ बकरा. उसका श द (आवाज) हआ 'म' गज ु ु हआ हाथी। उस श द का अंितम अ र हआ 'थी'। ु ु यहाँ यह एकमा प कर द क अमीर खुसरो ारा िल खत ह दवी कलाम क जो ित उपल ध है यह है दे वनागर िल प म न हो कर फारसी अथवा उद ू िल प म है । यह बिलन (जमनी) के रा ीय पु तकालय ( टा स ब लओिथक) म सुर त रखी है जसे उद ू के िस सा ह यकार डॉ. कार वीकार कया है क वह आज भी कई शता दय मृितय . शायद जानबूझ कर अपने िनजी वाथ के कारण। झगड़ा तो तब पैदा हआ जब खुसरो ु क सार फारसी शायर तो िल खत अपने िस प म सुर त चली आती है पर शायर ने ह दवी कलाम का संकलन और संपादन नह ं कया। फारसी के इस क व ने चलते-चलते उस भाषा म भी अपनी सृजना मक मता का प रचय दया जो अभी बन रह थी और जसे आगे चलकर ह द ू और उद ू का प धारण करना था। ले कन यह का य सं ह के उसका कतना ह भाग समय के हाथ न प म संपा दत नह ं हआ। सो ु हो गया या गुम हो गया और कुछ .यह इस कार है . गोपी चंद नारं ग ने खोज िनकाला है । यह ह तिल खत पांडुिल प इस बात को मा णत करती है क अमीर खुसरो फारसी के अलावा ह दवी भाषा म भी िलखते थे। इस पु तकालय म रखा हआ ह तिल खत पांडुिल पय ु ज का यह खजाना ओरं टािलया और गयाना के नाम से मशहर ू है । इस पांडुिल प म खुसरो क डे ढ़ सौ पहे िलयाँ ह। डॉ.

फुटकल पद. 'अमीर खुसरो बहै िसयत' ह द शायर म िलखते ह . वाह द िमजा जैसे व ान यह गलत िन कष िनकालने क चे ा करते ह क खुसरो क नज़र म उनक अपनी ह दवी रचनाओं का कोई मह व नह ं था इसिलए उ ह ने उसे एक त करने के बजाय िम दया। आज भी उद ू े म बाँट म ऐसे लोग क कमी नह ं है जो अपने घ टया िनजी . ोफेसर कसी पॉकेट बुक से कुछ क वताऐं चुराकर.भाग जानबूझ कर इ मी डाकुओं ने बरबाद कर दया। ले कन इसका कुछ भाग सामू हक जन मृित ने सुर त कर िलया यािन जो पी ढ दर पी ढ मौ खक पर परा म बचा चला आया है । कुछ शेर. उ ह अमीर खुसरो कािशत कर दया है । दरअसल ये लोग खुसरो के ह दवी कलाम तैया रयाँ कर रहे थे। बाज उद ू मह क न ने खुसरो के सारे ह दवी कलाम क मा णकता से जानबूझ कर इं कार कया है ता क खुसरो का ह द से कोई संबंध न रहे । उद ू आलोचक का एक वग खुसरो को सा ह य से जोड़ने के ह चाहते ह। इसी व ह द रहा है । वे उसे फारसी तक सीिमत कर दे ना कार डॉ. खुसरो क रचना ह मानने से इं कार कर दया है । यह नह ं महमूद शीरानी ने अपनी पु तक 'पंजाब म उद'ू म जानबूझकर िसराजु न आ क के नाम से पर हमले क ो. गीत या छं द और पहे िलयाँ जहाँ-तहाँ तज़कर म उ त हए ु ह। एक समय तक इसी कलाम के अमीर खुसरो का कलाम होने म कसी को कोई भी संदेह नह ं था। मगर जब शोधकताओं ने जोर बाँधा तो उ ह ने जबरद ती इस कलाम को ववाद पद बना दया। उद ू के कुछ नामी िगरामी सा ह यकार काफ अस से ह ह द -उद ू को िनकट लाने के स त वरोधी रहे ह। इसी पर परा म वे अमीर खुसरो जैसे ह दवी के जनक व का िस ह द से कसी कार का ता लुक बदाशत नह ं करते। उद ू के व ान तथा आलोचक सफदर आह अपनी पु तक.'उद ू के शोधकता ोफेसर महमूद शीरानी और काजी अ दल ु वदद ू जैसे सा ह यक लुटेर और अदबी डाकुओं ने अमीर खुसरो क वधमान ह दवी क वताओं को िनजी वाथ और ह द से धािमक घृणा के कारण. दोहे .

जो क कबीर व अ य क वय के साथ भी हआ है । पर इसका अथ यह ु नह ं क कुछ भी खुसरो का नह ं कुछ चीज तो खुसरो क ह गी। अब कौन सी है . साजन आ द। और अगर बूझ के श द आऐंगे सजनी. वे य नह ं? तो फर अमीर खुसरो के साथ ह सौतेला यवहार य? माना क बहत ु सी चीज अमीर खुसरो के नाम से. ीिलंग . मीरा के साथ भी यह हआ। फर भी उनका कलाम ु दिनया ु यो मानती है ? य . अवधी. दल बा आ द। यािन इशारा कया गया है । यह पहे ली है आग पर यािन चकमाक और प थर पर। उस जमाने म दयासलाई तो होती नह ं थी। आग कैसे जलाते थे? दो प थर को रगड़ते थे। एक चकमाक और एक प थर । उससे शरार. ीिलंग है तो ीिलंग यतमा. जमाने के साथ जुड़ गयी ह गी. राज थानी. माशूका. िचंगार या आग झड़ती थी जो सूखे प को पकड़ लेती थी। अब पहे ली म नार सं कृ त श द है . सखी. व कौन सी नहं यह बताना क ठन है . पुरानी पंजाबी. उसको दे खा सार ।।" अब सुनने म यह बहत ु सरल मालूम पड़ती है । अगर पहे ली क बूझ पु ज लग है तो श द आऐंगे ीतम. जब तक क कोई ठोस सबूत न िमले। अमीर खुसरो क ह द रचनाओं म ज. अप ंश आ द भाषाओं का असर िमलता है । उदाहरण . जुबानी चले आने के कारण खुसरो के ह दवी कलाम क भाषा का प ज र बदला होगा। लोक रवायत या लोक सा ह य म ऐसा होता है । सूफ क व कबीर. खड़ बोली.अमीर खुसरो क एक पहे ली दे ख "नार से नार िमले और ज म भी लेवे नार । ू इसके रं ग क टटते दे खी. पी. िल खत फुटकल रचनाऐं ववाद पद माण न होनेपर भी उनका सा ह य अथवा कूल व कॉलेज म पढ़ाई जाती है ? उनके सबूत कहाँ ह.वाथ और ऊँचे पद का लाभ उठाकर अमीर खुसरो का ह दवी कलाम जानबूझ कर बबाद करने पर तुले हए ु ह। पीढ़ दर पीढ़ मौ खक. जानम.

ू पूरे के अथ म भी है । एक चकमाक तो दसरा प थर। चकमाक तो टटता है पर ू ू प थर नह ं टटता। तो सार . सं कृ त. फ़ारसी और सं कृ त तीन के ू हसाब से अथ ठ क बैठ रहा है । अब अगला िम ा दे खए . सारा हाथी. कभी नह ं आता। यूँ भी यार क भाषाओं म आज भी पूव म साड़ को सार कहते ह। तो सार के भी दो माने हो गए। पूरा. तो पहे ली क बूझ सामने आएगी। जैसे .'इसके संग क टटते दे खी. गोया सै स का िछपा हआ इशारा भी है । इ लामी समाज म संगसार .है और उसक पहचान भी ीिलंग है यािन आग या अ न जो जलाती है । आप कभी नह ं कहगे क आग. संग के साथ िमल कर संगसार हआ। 'संग' श द फ़ारसी म भी है और सं कृ त म भी। ु सं कृ त हआ ु संगीसाथी और साथी श द भी आ रहा है । अब दे खए कतने अथ इन दो लाइन के िनकले और कैसा (२) क र मा इसम है . उसको दे खा सार ।' संग + सार = संगसार । संगसार करना यानी प थर से कसी को मारना। प थर से कसी को भी सजा दे ने के िलए पुराने जमाने म संगसार करते थे। ये ब लओिथक तर क़ा चला आता है . साड़ भी है . नार क पहचान के िलए और सार . पहे ली क बूझ है गजरा। बकरा को आधा करो. तुक और ह दवी श द को ले कर। पहे ली खड़ बोली क उ कृ रचना है । इन पहे िलय म आप जतना गहराई से उतर कर दे खगे। आप उतना है रान ह गे। एक ु जमाने म पहे िलयाँ यूँ भी बनाई जाती थी क श द के टकड़े करो और कुछ जो विनयाँ ह इधर लगाओ या उधर लगाओ. जलता है । अरबी म नार का मतलब है अ न या आग। श द ह ऐसा है । नार सं कृ त म भी अथ दे ती है ी के मान म और अब म आग लगाने वाली चीज के माने म भी। न + ई = नार यािन आग लगाने वाली चीज. फ़ारसी. सजा दे ने का ख़ास तर क़ा ु है । अब उससे हट के दे खए। हम नार का ज़ कर रहे ह। पहे ली शु हो रह है नार श द से। जब उस जमाने क उद ू भाषा म साड़ िलखा जाएगा तो वह हो जाएगा सार य क 'ड़' भी आता है . बक + रा = बजरा। अब एक तरफ बक है दसर तरफ रा है । ू . प थर से मौत थी। यहाँ ल ज़ संगसार आ रहा है और नार से नार िमलने का. अब .आधा बकरा. हाथ बँधा दे खा एक साथी. िसमे टक है और इ लािमक पर परा म भी है । पहले अवैध संबंध क सजा. चकमाक और प थर । चकमाक और प थर दोन श द अरबी से फ़ारसी म भी ीिलंग ह। यह नार चिलत ह। तो अरबी.

कहमुक रय . गीत. ऐनामोटापोइया। आवाज़ का विनय का आपस म िनबाह और जो एक संगीत पैदा होता है विनय के आपस म िमलने से. र के साथ जो गजरा बने। हाथी तो गज़ है । यािन क सं कृ त भी आ गई इसम। अब है हाथ बँधा दे खा इक साथी। गजरा हाथ पर बाँधते ह या औरत उसे बाल म लगाती ह। इसम फ़ारसी. अनमेिलयाँ या ठकोसल से िनिमत है । जैसा क हम ऊपर बता चुके ह। इसके अित र फ़ारसी क गज़ल ( जनक हर दसर पं ू ह। जैसी क खुसरो ने कितपय ॠतु संबंधी पद. वो भी है । कोई पहे ली ऐसी नह ं है जसम ये गहराइयाँ न ह । पहे िलय का अंद नी ढाँचा बहत ु मज़बूत है । अमीर खुसरो क ह दवी रचनाओं का कलेवर बूझ-अनबूझ पहे िलय . क़ा फ़या भी दे खए. दो सुखन . अरबी और सं कृ त तीन भाषाएँ आ गई। हाथी और साथी.साथ हाथी या द गज। गज + रा = गजरा।जो लोग सं कृ त बैक ाउं ड से आए ह वो तो जान लगे पर उद ू वाला आदमी नह ं पहचानेगा। वो चकरा जाएगा क हाथी कैसे लगाऊँ. दो-एक फ़ारसी भाषा म है ) खुसरो वंय भी कहा है क उनका फुट का य िम ारा रिचत के वनोद के िलए रखा गया है । सूफ़ परं परा म हज़रत िनजामु न िच ती का िश य होने के कारण उनक रचनाओं म भाव या वषय क सम या अथवा सूफ़ साधना आ द से स ब पर तु दभा ु य से उनका अिधकतर भाव क अनेक पता अव य है ह दवी का य समय के हाथ खो गया। केवल बहत ु ह कम उपल ध है । खुसरो एवं भावपूण ह। इन रचनाओं म से उसम जीवन क गहन ारा रिचत पद एवं दोहे िन य ह गंभीर ाय: वह भाव ल त होते ह जो आजकल चिलत िनगुिनया गीत म दख पड़ते ह। य द उ ह सूफ़ गीत कह तो इस कार के गीत के उदाहरण हज़रत अमीर खुसरो के अन तर लगभग तीन सौ वष तक बहत ु कम िमलते ह। व तुत: जन जीवन म सा ह य का थान दलाने का थम य े चिलत लोक सा ह य को ह दईु के क व खुसरो को ह है । खुसरो ने फ़ारसी भाषा के समान ह दवी म गंभीर सा ह य क रचना अव य क होगी पर जब तक उनक लु नह ं िमल जाती यह पूण रचनाएँ 'द वाने. िनसबत .ह दवी' और 'हालाते-क है या' आ द प से कहना बहत ु ह मु कल है । कुछ व ान कहते ह .

रा ीय एकता एवं धािमक स ावना के वचार ज म ले सक। उनक ह दवी रचनाओं म इतना तो वीकाय ह है क भाव क अपे ा बौ क चम कार कह ं अिधक ह और वह क व क अ ितम सूझ का सा ी है । एक अ य से भी अमीर खुसरो क ये रचनाऐं बहत ु ह मह वपूण ह। वह यह क इसके पूव क ह द रचनाऐं या तो क वय के आ यदाताओं क व दाविलयाँ थी या धम संबंधी। य प अमीर खुसरो के पीछे गोरखनाथ क पर परानुगािमनी नाथपंिथय क पद क िभ न धारा चली आ रह थी क तु खुसरो का उस पर कोई भाव नह ं पड़ा। उनक रचनाओं के ारा सा ह य जन .""'यहाँ यान पर कैसे चड़ गई इसका कारण यह हो सकता है क खुसरो परदे सी होने के कारण यहाँ के सा ह य से इतने प रिचत नह ं रहे ह गे क उसक पर परा उन पर आंतक जमाती। अपने मु य भाव तो वे फ़ारसी म िलखते थे। हाँ जनता के मनोरं जन के िलए कुछ चीज़ उ ह ने यहाँ क भाषा म भी कह द । वयं अमीर खुसरो ने िलखा है क वे ह दवी के क व ह तथा उ ह ह दवी म िलखना बेहद य है । यह कारण है आ दकाल के क वय म अपनी हा य वनोदमयी एवं सूफ़ ोत रचनाओं के कारण एक विश रचनाओं के भरपूर व गु क अमीर खुसरो वचार धार से ओत- थान रखते ह। उनक अिधकांश ह दवी णयन का उ े य था जनसाधारण का श द के व थ मनोरं जन तथा िच ती सूफ़ वचार धारा व स खलवाड़ ारा दाय के अपने हज़रत िनजामु न औिलया के सूफ़ संदेश का अपने गीत व पद के मा यम से लोग के दय म पहँु चाना ता क उनम आपसी भाईचारे .क खुसरो ने ह दवी म गंभीर सा ह य क रचना नह ं क य क स भवत: फ़ारसी के समान ह दवी म पट नह ं थे या फर उस समय तक ह दईु उ च गंभीर सा ह य के िलए मँज भी नह ं पाई थी। वह केवल सामा य जन क बोलचाल क भाषा ह थी। ह दईु म मनोरं जक सा ह य क सृ स भवत: लोक जीवन म उनक वाभा वक का मूल कारण िच एवंम उ र भारत के शा ीय और लोक संगीत से उनका िनकट का प रचय था। डॉ. रामधार िसंह दनकर सं कृ ित के चार अ याय ंथ म एक क जनभाषा ( ह दईु) खुसरो के थान पर वशेष प से िलखते ह.

जीवन के समीप ह नह ं आ गया अ पतु उसम रच बस गया.१२३८ .) के ऐसे मुर द थे जो बेशक अपने गु के ग नशीन न हए ु पर गु कर ब थे। उनके यत कंिचत साधना के मु थे। उनम मौिलक ा दोह एवं पद प का बीज िन हत पाते ह। वह ितभा थी। फारसी क के बहत ु म हम सूफ य व सा ह य एवं ढय के अ धानुयायी नह ं ेम प ित के व भारतीय ेम पर परा अपनाते हए ु खुसरो ने िलखा है ""इ क अ वल दर दले माशूक पैद मीशबद. या जन जीवन क पसंद बन गया.१३२५ ई. बन रह थी. वहाँ पर खुसरो ने अंत रक भाव का दशन अपने गीत म कया है । अमीर खुसरो िच ती स दाय के िस पीर हजरत िनजामु न औिलया (जीवन काल सन ् . पद व गीत म भावो मेष के साथु साथ शांत एवं ग ं ृ ार रस का समावेश वशेष प से हआ है पर तु उसम पया ु का यत व एवं प र कार नह ं य क ह दवी (आज क ह द व उद)ू उस समय क ची थी.इसी को ह दवी म खुसरो इस 'पहले ितय के ह य म. हाँ इतना अव य है क उनम अपने पूववत नाथ एवं िस क पर परा से पया नवीनता िमलती है । िस ने जहाँ केवल दाशिनक िस ांतो को पद म ढाला. म ती और चुलबुलेपन का आनंद दे ता है । ह का ह अरबी सं करण है । यह दसर बात है ू खुसरो पारं गत सूफ क व तो ह ह साथ म वह प है । सूफ वाद मधुरा भ ग ं ृ ार के म त आनंद क व का . डमगत कार िलखते ह - ेम उमंग। आगे बाती बरित है . पीछे जरत पतंग।। खुसरो सूफ क व थे और कहते ह फारसी म उ ह ने तस वु◌ुफ क बहत ु ऊँची क वताऐं िलखी ह। यह तो रहा उनका एक प। खुसरो का दसरा ू प ह दवी म खुला। वहाँ वे रह यवाद क व भी हो कर सामा य जन जीवन के सरस क व का प भी है और यह क व मनु य को परलोक का संदेश तो दे ता ह है पर उसका अिधकतर जोर यह ं के ेम. उसक आदत बन गया। इससे जनता को सा ह य सुलभ आनंद क ाि भी हई। खुसरो के फुटकल छं द. अनधड़ थी. ता न सोज़द शमा के परवाना शैदा मोशवद।'' अथात .

गु ड़या . ध रह वाके पाव रे । सोना द हा पा द हा बाबुल दल द रयाव रे । हाथी द हा घोड़ा द हा बहत ु बहत ु मन चाव रे । ट पणी .. रह गई। खेलने क साम ी अथात गु ड़या आ द व तुऐं नैहर म ह रखी रह गयी। (आ य . दोउ भये एक रं ग।। खुसरो ने अपने गु िनजामु न औिलया के नाम कहते है िन निल खत पद क रचना क थी जसम ववाह का संबंध को पित और प ी के पक बाँधकर उ ह ने आ मा और परमा मा के ेमभाव ारा दिशत कया था - "परबत बास मँगवा मोरे बाबुल.. दल द रयाव-उजाक दय। डोिलया फँदाय - ववाहोपरांत डोली म बठाकर। दाव-दाँव.. अनुकूल अवसर.. मौका. नह ं खेलन को दाँव रे । िनजामु न औिलया ब दयाँ पक र चले.क वह यौिगक भ याओं से भी कुछ दरू तक भा वत है पर तु उसके मूल म ह है इससे इं कार नह ं कया जा सकता है । ह द के म यकालीन सूफ क वय से ह नह ं ब क भ काल के पूव ह अमीर खुसरो ने कुछ ऐसे ह दवी पद िलखे थे जनम दा प य भाव क अिभ य थी और दोन के पार प रक िमलन का वणन भी उसी के अनुकूल श द ारा कया था। एक दोहरा म वे कहते ह - 'खुसरो रै न सोहाग क . न ह खेलन को दाँव रे । गु ड़या खलौना ताक ह म रह गए.मृ यु उपरांत अपनी सार व तुऐं जहाँ क तहाँ छोड़ कर चला जाना .बाबुल (हे मेरे पता) मँडवा ( ववाह क िनमाण विध स प न करने के िलए कया जाने वाला मंडप). जागी पी के संग। तन मेरो मन पीउ को. नीके मँडवा छाव रे । डोिलया फँदाय पया लै चिल ह अब संग न हं कोई आव रे । गु ड़या खेलन माँ के घर गई.

सब ह िसंगार बनाई। वदा करन को कुटु ब सब आए. मात पता औ भाई। मो र कौन संग लिगन धराई धन धन ते र है खुदाई। बन माँगे मेर मंगनी जो.पड़ता है और जीवन काल के पूव प रिचत काय के करने का फर अवसर नह ं िमला करता।) अमीर खुसरो का एक अ य पद म भी इ ह ं भाव का थान िमला है - "बहत . कँगना अंगूठ प हराई। नौशा के संग मो ह कर द ह ं. केसर ितलक लगाई। खुसरो चले ससुरार सजनी संग. अंत कर लरकाई। हाय धोय के ब तर प हरे . लाज संकोच िमटाई। सोना भी द हा पा भी द हा बाबुल दल द रयाई। गहे ल गहे ली डोलित आँगन मा पकर अचानक बैठाई। बैठत मह न कपरे पहनाये. द ह ं पर घर क जो ठहराई। अंगु र पक र मोरा पहँु चा भी पकरे . चल तेरे पी ने बुलाई। ु ु रह बाबुल घर दलहन बहत ु खेल खेली स खयन स . िसगरे लोग लुगाई। चार कहारन डोली उठाई संग पुरो हत नाई चले ह बनैगी होत कहा है . नह ं कोई आई। . काहू क कछु ना बसाई। मौज खुसी सब दे खत रह गए. नैनन नीर बहाई। अंत वदा है चिलहै दल ु हन.

गोपीचंद नारं ग ने इसक खोज कर इस पर अहम शोध काय कया है । . एलवस ज था। गर जमनी ले गया िस शोधकता डॉ.अमीर खुसरो के ह दवी कलाम क एकमा पांडुिल प जमनी (बिलन) के सं हालय टा स ब लओिथक म रखी है । इसक िल प फारसी है । इसे भारत म अं ेज के समय एक जमन शोधकता डॉ.

गोपीचंद नारं ग ने इसक खोज कर इस पर अहम शोध काय कया है । . एलवस ज था। गर जमनी ले गया िस शोधकता डॉ.अमीर खुसरो के ह दवी कलाम क एकमा पांडुिल प जमनी (बिलन) के सं हालय टा स ब लओिथक म रखी है । इसक िल प फारसी है । इसे भारत म अं ेज के समय एक जमन शोधकता डॉ.

बंद कर दो.. तुलसीदास.ट पणी . पर घर क जो ठहराई। गुन नह ं एक औगुन बहोतेरे कैसे न शा रझाई। खुसरो चले ससुरार सजनी संग नह ं कोई आई। जस कार कबीरदास.. सगरे लोग लुगाई। चार कहार िमल डोिलया उठाई. संग परो हत और भाई। चले ह बनेगी होत कहा है नैनन नीर बहाई। अंत बदा हो चली है दलहन काहू क कछु न बने आई। ु मोज खुसी सब दे खत रह गए मात पता और भाई। मोर कोन संग लगन धराई धन धन ते र है खुदाई। बन माँगे मेर मँगनी जो क नी. आ द के दोहे बहत ु मशहू र ह ऐसे ह अमीर खुसरो ने भी बहत ु से सूफ दोहे िलखे। कह ं-कह ं तो कबीर और खुसरो अपने अलग-अलग दोह के मा यम से एक ह बात कहते न आते ह। आइए अमीर खुसरो के कुछ सूफ दोहे पढ़ - . कसी क इ छा न रहते हए ु भी अप रिचत के साथ ववाह क बात िन त कर द । नौशा ... रह मदास..अंतकर .. ठहराई .. नेह क िमसर खलाई। एक के नाम क कर द नी सजनी. समा कर दो अथवा बंद कर दया। लरकाई - जीवन काल के बा यसुलभ यवहार। लगन.. वैवा हक संबंध थर कर दया। बन माँगे .. चल तोरे पी ने बुलाई। ु बहोत खेल खेली स खयन से...म गँवार उ मत सी बनकर अपने आँगन म इतराती चलती थी क आशय इस पद म भी मरणोपरांत जीवन काल के आनंद न लूट सकने के िलए पछतावा है । इसी पद का एक अ य प भी िमलता है - बहोत रह बाबुल घर दलहन .. अंत कर लरकाई। वदा करन को कुटु ब सब आऐ... धराई। .द ू हा। गहे ल डोलित .

साती तेरा चाव। मुझ जलती का जनम गयो तेरे लेखन भाव।। (९) नद कनारे म खड़ सो पानी झलिमल होय। पी गोर म साँवर अब कस वध िमलना होय।। . सो उ ट वाक धार। जो उबरा सो डू ब गया जो डू बा हआ पार।। ु (२) रै नी चढ़ रसूल क सो रं ग मौला के हाथ। जसके कपरे रं ग दए सो धन धन वाके भाग।। (३) खुसरो बाजी ेम क म खेलूँ पी के संग। जीत गयी तो पया मोरे हार पी के संग।। (४) चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय। ये मारे करतार के रै न बछोया होय।। (५) खुसरो ऐसी पीत कर जैसे ह द ू जोय। पूत पराए कारने जल जल कोयला होय।। फारसी .(१) खुसरो द रया ेम का.खुसरवा दर इ क बाजी कम ज ह द ू जन माबाश। कज़ बराए मुदा मा सोज़द जान-ए-खेस रा।। (६) उ जवल बरन अधीन तन एक िच दो यान। दे खत म तो साधु है पर िनपट पाप क खान।। (७) याम सेत गोर िलए जनमत भई अनीत। एक पल म फर जात है जोगी काके मीत।। (८) पंखा होकर म डु ली.

दे हर भई वदे स। जा बाबुल घर आपने. ेम बना का होय।। (१६) संत क िनंदा करे . बाजत है दन रै न।। . पीर के सरने जाय। ठते .(१०) साजन ये मत जािनयो तोहे बछड़त मोहे को चैन। दया जलत है रात म और जया जलत बन रै न।। (११) रै न बना जग दखी और दखी च ु ु बन रै न। तुम बन साजन म दखी और दखी ु ु दरस बन नन।। (१२) अंगना तो परबत भयो. मौला न ह होत सहाय।। (१८) खुसरो सर र सराय है य सोवे सुख चैन। कूच नगारा सांस का. रखे पर नार से हे त। वे नर ऐसे जाऐंगे. सो पलक ढाप तोहे दँ ।ू न म दे खूँ और न को. जैसे रणरे ह का खेत।। (१७) खुसरो मौला के कहे खुसरो पीर के ठते. कुरान. न तोहे दे खन दँ ।ू (१४) अपनी छ व बनाई के म तो पी के पास गई। जब छ व दे खी पीहू क सो अपनी भूल गई।। (१५) खुसरो पाती ेम क बरला बाँचे कोय। वेद. पोथी पढ़े . म चली पया के दे स।। (१३) आ साजन मोरे नयनन म.

। (२) बहत ु क ठन है डगर पनघट क । कैसे म भर लाऊँ मधवा से मटक म जो गई थी पिनया भरन को दौड़ झपट मोर मटक पटक िनजामु न औिलया म तोरे बिलहार लाज रखो तुम हमरे घूँघट क । लाज राखो मोरे घूँघट पट क । (३) िनजाम तोर सूरत पे बिलहार सब स खयन म चुद ं र मोर मैली दे ख हँ से नर नार । अब के बहार चूद ँ र मोर रं ग दे .आइए अमीर खुसरो क कुछ म हर ू रचनाऐं पढ (१) अपनी छ व बनाई के जो म पी के पास गई.... जब छ व दे खी पीहू क तो अपनी भूल गई। छाप ितलक सब छ ह ं रे मोसे नना िमलाई के बात अघम कह द ह ं रे मोसे नना िमला के। बल बल जाऊँ म तोरे रं ग रजना अपनी सी रं ग द ह ं रे मोसे नना िमला के। ेम वट का मदवा पलाय के मतवार कर द ह ं रे मोसे नना िमलाई के। गोर गोर बईयाँ हर हर चू रयाँ बइयाँ पकर हर ली ह ं रे मोसे नना िमलाई के। खुसरो िनजाम के बल-बल जइए मोहे सुहागन क ह ं रे मोसे नना िमलाई के। ऐ र सखी म तोसे कहँू . िनजाम पया . म तोसे कहँू . छाप ितलक.

मेरे घर िनजाम पया। कुतुब-फर द िमल आए बराती खुसरो राजदलार ु वाजा िनजाम तोर सूरत के बिलहार िनजाम पया रख ले लाज हमार । (४) सकल वन फूल रह सरस अमुवा मोरे टे सू फूले कोयल बोले डार-डार और गोर करत िसंगार मलिनयाँ गढ़वा ले आई घर स । तरह तरह के फूल लगाए. हार गई म तन मन को। जसका पया संग बीते सावन. उस द ु हन क रै न सुहागन। जस सावन म पया घर ना ह. आग लगे उस सावन को। अपने पया को म कस वध पाऊँ. चरन लगायो िनधन को। म तो खड़ थी आस लगाए. घुँघटा म आग लगा दे ती. लाज क मार म तो डू बी डू बी जाऊँ तुम ह जतन करो ऐ र सखी र . रख ले लाज हमार िनजाम पया िनजाम तोर सूरत के बिलहार . म लाज के बंधन तोड़ सखी पया यार को अपने मान लेती। इन चू रय क लाज पया रखाना. महद कजरा माँग सजाए। दे ख सूरितया अपने पया क . आवन कह गए आिशक रं ग और बीत गए बरस । (५) ऐ र सखी मोरे पया घर आए भाग लगे इस आँगन को बल-बल जाऊँ म अपने पया के. मै मन भाऊँ साजन को। (६) जो म जानती बसरत ह तृया जो म जानती बसरत ह तृ या. ये तो पहन लई अब उतरत न। मोरा भाग सुहाग तुमई से है म तो तुम ह पर जुबना लुटा बैठ । . ले गढ़वा हाथन म आए वाजा िनजामु न के दरव जे पर.रख ले लाज हमार । सदका बाबा गंज शकर का.

बेट तेरा बाबा तो बूढ़ा र क सावन आया। अ मा मेरे भाई को भेजो जी क सावन आया बेट तेरा बाई तो बाला र क सावन आया अ मा मेरे मामू को भेजो जी क सावन आया बेट तेरा मामू तो बाँका र क सावन आया। (८) दै या र मोहे िभजोया र शाह िनजम के रं ग म। कपरे रं गने से कुछ न होवत है या रं ग म मने तन को डु बोया र पया रं ग मने तन को डु बोया जा ह के रं ग से शोख रं ग सनगी खूब ह मल मल के धोया र । पीर िनजाम के रं ग म िभजोया र । (९) मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल। कैसे घर द ह ं बकस मोर माल। िनजामु न औिलया को कोई समझाए. म तो बन के द ु हन पछताई सखी। होती न अगर दिनया क शरम म तो भेज के पितयाँ बुला लेती। ु उ ह भेज के स खयाँ बुला लेती। जो म जानती बसरत ह सै या। (७) अ मा मेरे बाबा को भेजो जी क सावन आया. य . म तो तन मन उन पर लुटा दे ती। घर आए न तोरे साँव रया.मोरे हार िसंगार क रात गई. म तो तन मन उन पर लुटा दे ती। मोहे ीत क र त न भाई सखी. पयू संग उमंग क बात गई पयू संत उमंग मेर आस नई। अब आए न मोरे साँव रया.य मनाऊँ वो तो सो ह जाए। चू डयाँ फूड़ पलंग पे डा ँ इस चोली को म दँ ग ू ी आग लगाए। .

झम रम.सूनी सेज डरावन लागै। बरहा अिगन मोहे डस डस जाए। मोरा जोबना। (१०) जो पया आवन कह गए अजहँु न आए. पौ ढयो मेरे ललना। (१४) परदे सी बालम धन अकेली मेरा बदे सी घर आवना। बर का दख ु बहत ु क ठन है ीतम अब आजावना। इस पार जमुना उस पार गंगा बीच चंदन का पेड़ ना। इस पेड़ ऊपर कागा बोले कागा का बचन सुहावना। (१५) आ िघर आई दई मार घटा कार । बन बोलन लागे मोर दै या र बन बोलन लगे मोर। रम. पौ ढयो मेरे ललना। खाजा हसन को म गुजर िमली. सदा र खए लाल गुलाल। हजरत वाजा संग खेिलए धमाल। (१२) ऐ सरवंता मवा. आए न बाहर मास। जो पया आवन कह गए अजहँु न आए। अजहँु न आए। आवन कह गए। आवन कह गए। (११) हजरत वाजा संग खेिलए धमाल. बाइस ताम हजरत रसूल साहब जमाल। हजरत वाजा िमल बन बन आयो वाजा संग। अरब यार तेरो (तोर ) बसंत मनायो. सब बना। खेलत धमाल और वाजा मुइनु न वाजा कुतुबु न। शेख फर द शकर गंज मुलतान मशायाख नसी औिलया ऐ सरवंता। (१३) औिलया तेरे दामन लागी. मोर ला. वामी हो। आवन कह गए. पौ ढयो मेरे ललना। खाजा कुतुतबु न को म मुजरे िमली. अजहँु न आए वामी हो ऐ जो पया आवन कह गए अजुहँ न आए। अजहँु न आए वामी हो। वामी हो.झम बरसन लागी छाय र चहँु ओर। आज बन बोलन लगे मोर। कोयल बोल डार-डार पर पपीहा मचाए शोर। .

ऐसी बीन बजाई सांवरे । तार तार क तान िनराली.ऐसे समय साजन परदे स गए बरहन छोर। (१६) हजरत िनजामु न िच ती जरजर ब स (ब श) पीर। जोई-जोई यावै तेई तेई फल पावै। मेरे मन क मुराद भर द जै अमीर। (१७) बन के पंछ भए बावरे . य दरस नह ं दे ते? ु बहत दन बीते। ु (१९) जब यार दे खा नैन भर दल क गई िचंता उतर। ऐसा नह ं कोई अजब. भूल गई खुसरो पिनया भरन को। (१८) बहत दन बीते पया को दे ख. य चुनर नह ं रं गते ? बहत दन बीते। खुसरो िनजाम के बिल बिल जइए. राखे उसे समझाय कर। जब आँख से ओझल भया. ए शब िमलो तुम आय कर। जाना तलब मेर क द गर तलब कसक क ँ । तेर जो िचंता दल ध । एक दन िमलो तुम आय कर। मेरो जो मन तुमने िलया। तुम उठा गम को दया। तुमने मुझे ऐसा कया। जैसा पतंगा आग पर। खुसरो कहे बात गजब दल म न लावे कुछ अजब। कुदरत खुदा क है अजब। जब जव दया गुल लाय कर। . पया को बुलाय लाओ ु म हार वो जीते पया को दे खे बहत दन बीते। ु सब चुन रन म चुनर मोर मैली.े अरे कोई जाओ. तुझ दो ती विसयार है . झूम रह सब वन क डाली। (डार ) पनघट क पिनहार ठाढ़ . तड़पन लगा मेरा जया। ह का इलाह या कया आँसू चले भर लाय कर। तू तो हमारा यार है . तुझ पर हमारा यार है .

परदा उठा कर जो दे खा आऐ बेगाने दे स ल ख बाबुल मोरे । तो आइए फर लौटते ह हम अमीर खुसरो क जंदगी क ओर। यह अलाउ न खलजी का दौर चल रहा है । एक रोज राजकुमार ख खाँ चुपचाप रात के स नाटे म अमीर खुसरो के घर आए। खुसरो ने दे खते ह कहा 'अरे ख मेरे नौजवान दो त। इतनी रात आ गए और त हा।' ख क खाँ खाँ ने कहा. हमर कोइिलया। य रोवे है .(२०) (क) काहे को याह बदे स रे ल ख बाबुल मोरे । हम तो बाबुल तोरे बाग क कोयल. "मेरे बाप जंदगी का हाल तो तुमने िलखा और खूब नाम कमाया।" मेर तु हार . ु ल ख बाबुल मोरे । म तो बाबुल तोरे पंजड़े क िच ड़या रात बसे उ ड़ जाऊँ. आम तले से डोिलया जो िनकली। कोयल ने क है पुकार ल ख बाबुल मोरे । तू हम तो चले परदे स ल ख बाबुल मोरे । तू य रोवे है . ल ख बाबुल मोरे . छोड़ दादा िमयां का दे स. कुहकत घर घर जाऊँ ल ख बाबुल मोरे । हम तो बाबुल तोरे खेत क िच ड़या चु गा चुगत उ ड़ जाऊँ जो माँगे चली जाऊँ ल ख बाबुल मोरे . हम तो बाबुल तोरे खूंटे क गइया। जत हॉको हक जाऊँ ल ख बाबूल मोरे लाख क बाबुल गु ड़या जो छाड़ । छो ड़ सहे िलन का साथ. हमर कोइिलया। हम तो चले परदे स ल ख बाबुल मोरे । नंगे पाँव बाबुल भागत आवै। साजन डोला िलए जाय ल ख बाबुल मोरे । इसी का दसरा प। ू (ख) काहे को याह वदे स रे ल ख बाबुल मोरे । भइया को द है बाबुल महला-दमहला . ल ख बाबुल मोरे । महल तले से डोिलया जो िनकली भाई ने खाई पछाड़. बरना ने काई पछाड़. ल ख बाबुल मोरे . ल ख बाबुल मोरे । ताक भर मैने गु ड़या जो छोड़ . ल ख बाबुल मोरे । यार भर मने अ मा जो छोड़ . हम को द है परदे स.

हाँ हाँ। कँवल रानी आ खर कल तक गुजरात क रानी थी। मेरे बाद ख बैठेगा। य न वो लड़क ."इस बीच गुजरात क फतेह के बाद रानी कँवल दे वी ने अपनी बेट दे वल दे वी को भी शाह महल म बुलवा िलया। ख खाँ और दे वल दे वी दोन बचपन से एक साथ पले बढ़े थे।' चंद साल बाद एक शाम सुलतान अलाउ न खलजी ने जरा ख़फगी (नारजगी) से बड़ बेगम मिलकाए जहाँ को बुला भेजा। बादशाह से बेगम ने कहा - "आपको बाहर क तो सब खबर ह। िसयासी शतरं ज से फुसत नह ं िमलता। कुछ अंदर क भी खबर है । " ख खाँ बड़ा हो रहा है ।" बादशाह बोले . हाँ वो रानी बने. वो उस लड़क का खाँ ह त त पर या नाम है ? हाँ दे वल दे वी. ये पुज. मेरे और दे वलद के. दोन क शाद मुनािसब रहे गी।" इस पर बेगम ने कहा .इतनी गहर दो ती। वाजा िनजाम के हम दोन चेले। तुम मेरे राजदार। अरे कुछ मेरा दद दल भी तो सुनो खुसरो? मेर अपनी कलम से मेर मोह बत को भी अमर कर दो। लो ये रे शमी खी-सूखी माल। इसम ये िच ट ठयाँ ह. लड़कपन से अब तक के मोह बत नामे। इनम सब कुछ है । अब म चलता हँू मने अपनी राम कहानी तु ह स पी बचपन से अब तक क ।" अमीर खुसरो ने अपने िम और सु तान अलाउ न के बेटे के नाम से ६२ वष क उ म ७१५ गुजरात के राजा कण क बेट दे वल दे वी के ेम कथा ख ख खाँ और खाँ वा दे वल रानी ह ी यािन सन ् १३१५ म िलखी। यह मसनवी 'इ कया' या ' ख नाम' या मु शर शाह के नाम से भी मशहर ू है । इसम भारत के ाकृ ितक सौ दय का वणन भी है तथा संगीत के भारतीय पा रभा षक श द भी ह। खुसरो िलखते ह .मेरे बाई उलुग खाँ आपके िसपहसालार ह। कल अगर ख खाँ शाह त त पर बैठेगा तो उसे तलवार क मदद भी चा हए। मेरे भाई क एक खूबसूरत बेट है । म बाप बेट को पंजाब से बुलवाती हँू । अगर ये र ता हो जाए तो मेरा भाई कल अपने होने वाले दामाद क हफाजत करे गा और उसक ताकत भी बनेगा। सुलतान आप गुजरात से कनाटक तक तो खूब भली भाँित सोचते ह ले कन फर आ खर .

"मिलक जहाँ अ मा जान ने अपने सगे भाई और उसके खानदान के खास-खास लोग को अपने खच पर दे हली बुलवा िलया और कई म हन बहत ु ह धूम-धाम से मेर शाद क र म अदा क गई। मामू क बेट से मेर शाद कर द गई। खूब उ साह से मेरा ज मनाया गया.जैसी मिलका जहाँ क मज । िसयासी दावपच म आपसे कोई जीत नह ं सकता।' अमीर खुसरो अपनी मानी ( ेम कथा) मसनवी ख खाँ व दे वल रानी म अपने िम ख खाँ क जुबानी िलखते ह . गाने.म नाक के नीचे का नाटक मुझे ह करना पड़ता है ।" बादशाह बेगम सा हबा के यह ट ट भरे अ फाज सुनकर हँ सते हए ु बोले . गुजरात के राजा कण क बेट । अत: उसके वयोग म वह बहत ु बमार पड़ गया। शर र कमजोर पड़ गया व ह डयाँ िनकल आ । शाह हक म और वै इधर अपने ने उसका बहत ु इलाज कया मगर सब यथ। कोई लाभ नह ं। य एवं लाडले पु ख खाँ राजकुमार को स त बमार व दखी ु दे ख कर बादशाह अलाउ न खलजी भी बमार पड़ गए। अब उनका सारा समय शाह आरामगाह म बेतरतीब गुजरने लगा। एक रोज उ ह ने अपनी बेगम को बुलवाकर उनसे कहा क त काल ख खाँ दे वल दे वी का िनकाह करवा दया जाए। मिलका जहाँ बेगम ने बादशाह से इसका वायदा कया। ले कन समय को कुछ और ह मंजूर था। शनशाहे हक ख ु ू मत ख म हई। ु खाँ को ह द सु तान अलाउ न खलजी क बेपनाह कला-ए. बजाने. नाच आ द हए ु मगर खुिशय क इस आितशबाजी ने मरे अरमान क होली भी जला द । दे वल द को मुझसे दरू अलग महल म रख दया गया जब क मेरा दल उसके बगैर बेकरार रहता था। बीच म ये कैसी द वार क आइ दा िमलने न पाऐं। ख खाँ अपनी मामू क लड़क से शाद होने पर खुश नह ं था। उसका दल दे वल दे वी म बसा था.वािलयर म कैद कर िलया गया। अमीर खुसरो ने इस घटना का आँख दे खा ववरण करते हए ु आगे िलखा है - 'मिलक काफूर' सु तान खलजी को ऐसा िसपहसालार जसक कभी मने इतनी तार फ क थी। आज दे खो तो अपने बदन क कािलक पर शहजादे के खून क सुख मल रहा है । लो आधी रात गई। ये रे शमी माल अब खाली सामने रखा .

लोग . मुस मन. मनमोहक और दलकश कसीदा लाओ और हमारे दौर क . योितष ान का पता चलता है ।) आ द ह। आठव अ याय म इ के हक क को चौगान और गद के तीक ारा प कया गया है । मसनवी के हर अ याय म नए छं द ह जनम कुछ ऐसे ह जनका योग खुसरो के पूव कसी ने कया ह नह ं था। जैसे मुतका रब. सं कृ ित आ द क जो खोल कर तार फ. सािलम आ द। ह दवी का ज पर खुसरो अलाउ न के दसरे पु ू तथा उसम िलखने गव। कुतुबु न मुबारक शाह के वषय म िलखते ह - 'चलो इस मंचले को भी चलते -चालते दे ख लेते ह। इसे भी खुश रखना होगा. . जवाहरात िमलेगा क कभी अपनी आँख न दे खा होगा और अपने कान न कभी सुना होगा। शु खरा सोना।" अमीर खुसरो ने बादशाह के कहे अनुसार मसनवी नुह िसपहर (नौ आसमान) (७१८ ह ी १३१८ उ ६५) को िलखा। इसके िलए एक हाथी के बराबर सोना तौल कर खुसरो को बादशाह क तरफ से ईनाम दया गया। इस ऐितहािसक मसनवी म मुबारक शाह क जीत . राज व जा के कत य और हक. भारतीय नगर . धम . सू फय क आलौ कक व शाहजादा मुह मद क ज म कुंडली (इससे अमीर खुसरो के द य ेम प ित. मेरे बचपन का साथी. खबर आई है क मिलक काफूर ने कैद म उसक आँख िनकाल लीं। ओफ ओ इतना जु म।" इस बीच अलाउ न खलजी के दसरे पु ू शाह कुतुबु न ने (१३१६ द ली) मुबारक खलजी का नकाब इ तयार कर के त ते स तनत पर जलवा मुशीरे सलतनत मिलक काफूर का ज लाद ने बेरहमी से सर उड़ा कया। दया। नौजवान बादशाह सलामत ने दरबार शायर अमीर खुसरो को तलब कया और उनका ओहदा बहाल कया। बादशाह ने खुसरो से कहा "सलामी म कोई ताजा.है । ख खाँ मेरा नौजवान दो त. ह रे . उसक बनवाई इमारत . थाओं. हमारे जमाने क तार ख न म करके सुनाओ तो शाह खजाने से इतना सोना. िनजामु न औिलया.

बहत ु होिशयार से। लड़का है । ऐश पसंद है । अभी से नशे से धु कह ं द ु मन के हाथ म न खेल जाए। मेरे अंधे भाई ख पड़ा रहता है । वाजा से खार न खाए। कह ं अपने खाँ को न सताए। म उसके कर ब रहँू । उसे फरे ब म. दमाग तेज. बाग म ु चहक. केले . पहाड़. फूल म महक. उनके तौर-तर के. हाथी क दानाई और मोर क जेबाई. योितष व ा. बीमा रयाँ. आम. बंद ह। कुतुब न मुबारक शाह भी मिलक काफूर क तरह ख खाँ और . बरबा दयाँ। घोड़े क पीठ पर बैठकर शेर कहँू गा। इस बार म नौजवान बादशाह के कान म घुमा फरा के काम क बात डालूँगा। ये फौज एक जुनून का सफर है । तरह-तरह क जबान. दिनया क ु वािलयार याह होती है । याह से हु न है और हाँ ह द ु तान क पुरानी जबान से बढ़कर मालामाल और हमार जो है ह दवी. एक से एक नाजुक शाल और बावफा नमक न. मेर माँ क भाषा बेिमसाल। दे विगर द कन के इस ल बे सफर म ये सब म िलखता जाता हँू थम थम कर। बादशाह दे हली पहँु च कर दरबार करे गा. या कंधार या समरकंद। िमठास और नमक क िमलवाट दे खनी हो तो यहाँ िमलेगी। सलोने साँवले लोग। दिनया भर के फल. िम ट गुल रे ज. द रया. दिनया को दया। ये गोरे लोग। ये लोग ु अपनी खाल के रं ग पे या अकड़ते ह। आँख क पुतली म तो याह से रोशनी है । बाल क जबान सं कृ त. तीन म हने का सफर। गम . फलसफे का मजा और फर िस हमारे (शू य. जंगल. हाथ का काम करने वाले ु बेिमसाल. जुदा जुदा खाने और गाने। सच पूछो तो ये ह दसातान क रं गारं ग सर ज़मीन ु बड़ ह मनमोहक है । आदमी यहाँ का जह न. हनर मंद. जीरो)। िस ह द ु तािनय ने ईजाद कया. आने से होिशयार रखूँ। उसे छल-कपट करने से रोकूँ। हु म हआ है द खन म जाने वाली ु फौज के साथ रहो। दे हली म दे विगर तक. फतेह का ज मानएगा। मेरा कलाम सुना जाएगा। म ये अपनी मसनवी 'नुह िसपहर' (नवाँ आसमान) ये पेश क गा बादशाह के स मुख। दिनया ु को अपना वतन ह द ु तान ऐसे दखा दँ ग ू ा क तीन सौ साल पहले इितहासकार अल इधर ब नी ने या वािलयर के कले म वजय मं दर म ख दखाया होगा?" खाँ व दे वल रानी एक साथ कैद ह. अंजीर. िसतार का इ म. बरसात. सद . पान.

एक खत भेज कर कहलवा भेजा . दो ेिमय हई। इस इ कया व ऐितहािसक ु मसनवी म पहली बार अमीर खुसरो ने भारतीय नार का बेहद ह सु दर िच ण कया है । इस वषय पर डॉ. बांद है । तुम उसे सर चढ़ाते हो। शमनाक ख खाँ शहजादे . फौरन. जैसे. पराए. ान चंद जैन ने लछमी नारायन शफ क के चमिन तान-ए-शुअरा (११७५ ह ी म संकिलत) से अमीर खुसरो का एक दोहा उ त कया है । हाशमी दकनी के अनुवाद म ृ ह द म ेम क क पना का उ लेख करते हए ु 'शफ क' ने अमीर खुसरो का एक फारसी शेर और उसी वषय का उनका दोहा अ त ृ कया है - "खुसरवा दर इ क बाजी कम ज ह द ू जन मबाश कज़ बराए मुदा मी सोजंद जान-ए-खेस रा।" अथात ऐ खुसरो य द ेम करना है तो कर पर ऐसा ेम कर जैसा ह द ू नार करती है जो पित के मरने पर जल जाती है यािन अपना सव दे ती है । इस फारसी शेर का अमीर खुसरो यौछावर कर ारा िल खत ह दवी दोहा - "खुसरो ऐसी पीत कर जैसे ह द ू जोय. जल-जल प त: खड़ बोली के त व ह। ."तुम मेरे बाप के नालायक बड़े बेटे. बेहद शमनाक। अगर तु ह अपना सर अजीज है तो उस ब तमीज लड़क उस बाँद उस कनीज को यहाँ भेज दो. पूत पराए कारने जल जल कोयल होय।" इस दोहे म ऐसी. वरना?" इस खत का ख खाँ व दे वल दे वी पर कोई असर नह ं हआ। फलत: बादशाह के हु म से दोन का क ल कर दया ु गया। इस घटना के साथ ह खुसरो क मसनवी दे वल रानी ख क कहानी ददनाक अंजाम के साथ समा खाँ. कनीज है . खलजी शहजादे हो कर एक कनीज एक बांद के पांव पर सर रखते हो। उसे बेवजह सर चढ़ाते हो। खानदाने शाह का नाम डु बाते हो। गुजरात को हमने बतौर शमशीर फतह कया था। दे वल रानी हमार कैद है . हमारे आदिमय के साथ.दे वल दे वी के इ क के स त खलाफ था। उसने कारागार म अपने भाई को डाँटते हए ु .

) ने आकर द ली पर अिधकार कर िलया। चालीस अमीर क काउं िसल ने इस तुगलक अमीर को सुलतान बना दया। जब शाह खजाना खुलवाया गया तो वह एकदम खाली िनकला। गयासु न तुगलक ने फौरन एक आपातकालीन बैठक बुलवाई। बादशाह . िनजामु न फक र से कह दो क चाँद रात आती है । अगर नए चाँद के बाद जु मा क सुबह दरबार म हमारे सामने सलामी के िलए हा जर न हए ू ु तो दसरे दन उनका सर हा जर कया जाएगा।" खुसरो घबराते पाते तामील हो' कह कर दरबार बखा त कर हए ु बोले मगर हजू ु र! 'इससे पहले क खुसरो नासमझ बादशाह को कुछ समझा उसने 'हु म क दया। सन १३२० का साल है । चाँद रात आई। गरमी और घुटन क रात। आधी रात को कला सीर क छत पर खुले आसमान के नीचे." य शायर खुसरो.आइए अब पुन: खुसरो के जीवन काल म ेवश कर। तो हम बात कर रहे थे बादशाह कुतुतबु न मुबारक शाह खलजी क । वह बेहद ह घमंड . नशे म धुत बादशाह को उसके एक खास जवान (मं ी) खुसरो खाँ गुजराती ने मार डाला। उसने बेहद फुत से बादशाह का सर काट कर नीचे फ◌ै ् ◌ंक दया। व वाजा िनजामु न उस नमाज़ पढ़ रहे थे। उनका सर अ लाह के सजदे म झुका हआ था। इसी के ु साथ खलजी वंश का रा य एक अिभशाप क भाँित समा हो गया। चंद म हने न गुजरे थे क पंजाब म एक अनपढ़. "हमारा हु म है अमीर खुसरो के पीर से. और जािलम वभाव का था। कुछ राजदरबा रय ने जो अमीर खुसरो क शोहरत से जलते थे ने बादशाह को खुसरो के गु हजरत िनजामु न िच ती के व भड़का दया। एक दन दरबार म बादशाह ने जरा स ती से अमीर खुसरो से कया . फौरन स भल कर कहा . स तगीर और दलेर फौजी िसपहसालार स र वष य गाजी खाँ उफ गयासु न तुगलक (सन १३२१ ई. ये तु हारे पीर िनजामु न औिलया कस नशे म ह? य वे आज तक हमारे सलाम को हा जर नह ं हए। ु " खुसरो ने मौके क नज़ाकत को भाँपते हए ु .'हजू ु र उ हे इबादत से फुसत कहाँ? अ लाह म दन रात मशगूल रहते ह। अ लाह के ज रत मंद बंदे उ ह हर व खुबहो-शाम घेरे रहते ह सरकार।" यह सुनकर बादशाह ने जोर से कड़क आवाज म अमीर खुसरो क बात को अनसुना करते हए ु कहा. मग र.

"अमीर और फौजदार हा जर ह । और जतना माल पहँु चा हो सब सरकार खजाने म पुन: वापस कर द।" ब शी ने पूछा . क अपना शाह द तरखान. कल क ोध से आग-बबूला हो उठा। आँखे लाल सुबह नह ं कए वह स त आवाज म बोला .ू मुसलमान. अमीर. म कार.हजू ु र मुनािसब याल फरमाते ह। अमीर खुसरो से दरया त कर। वो रोजाना रात गए तक अपने पीर क खानकाह म हा जर दया करते ह।" बादशाह ने जवाब दया . फौरन वापस कर द वरना सजाए मौत द जाएगी। दो हजार तनके रोज का खाना पकवाता है । हजार आदिमय क खलाया जाता है । ह द. फौजदार . िभखार सब एक जगह खाते ह। यह या तमाशा है ? यह या सा जश है ? रोज रात को गाने बजाने क मह फल होती है । खूब नाच गाना होता है । यह कैसा अजीब षडयं है शाह दरबार के खलाफ। ज र कोई गहर सा जश है । फक र म बादशाहत करता है । अंदर का हाल त काल मालूम कया जाए।" एक दरबार ने आग म घी का काम करते हए ु बादशाह के कान भरे ." य ब शी। दो सौ साल का जमा कया हआ शाह खजाना खाली ु य है ?" ब शी ने कहा "हजू ु र द ली पर आपक चढ़ाई से पहले सब का सब वाँट दया गया।" बादशाह ने पूछा " कस कस के घर भेजा?" ब शी बोला 'हजू ु र! अमीर. दरवेश. ताम-झाम कह ं और ले जाए। कह दो क शाह फौज अवध और बंगाल क तरफ कूच करती है । हम द ु मन का कड़ा व स त सामना है । हमार दे हली को वापसी तक फक र िनजामु न औिलया शहर खाली . मं य और फक र के घर।' बादशाह ने फौरन हु मनामा जार कया .ने बेहद गु से म अपने वजीर से पूछा .'कल क सुबह म उ ह दे ख लूँगा। कह दो क मे र फतेह से पहले शाह खजाने का जतना ह सा उ ह पहँु चा हो.'पीर और फक र? ये सब झूठे. धोखेबाज होते ह। इनके ईमान का कोई भरोसा नह ं। पैसे के लालच म दन रात झूठ बोलते ह। सबसे एक एक तनगा उगलवा िलया जाए।' ब शी ने कहा 'मगर हजू ु र! सलामत रह। रात को झाड़ू द दखता।' बादशाह वाजा िनजामु न औिलया क खानकाह म तो रोज जाती है । वहाँ आज का पहँु चा माल. फक र.'हम फौजी आदमी ह। हम न पीर से गरज है न शायर से मतलब। कह दो िनजामु न से. जालसाज."जहाँपनाह! और पीर और फक र के िलए या हु म है ?" बादशाह गु से म बोला . बैरागी.

'हम कसी से खुदा क या लेना दे ना। हम शहर के एक कनारे पड़े ह। ख के खदमत करते ह। सालमती क दआ करते ह। हनोज द ली दरू त। ु (अथात द ली अभी दरू है ।) सुबह जैसे ह गयासु न तुगलक ने महल म वेश कया.'हमार जान पर रहम क जए पीर साहब। शहजादे जूना खाँ ने जमुना पार इ तकबाल के िलए महल खड़ा कया है । कल सुबह वह उसम उतरे गा। द ली म उसके इ तकबाल को िसफ एक रात बाक है हजू ु र। साहब हम अपनी जान से यादा आपक जान अज़ीज़ है । उसके वाजा द ली म उतरने से पहले ह आप फौरन यहाँ से िनकल चिलए।" यह सब सुनकर भी वाजा के चेहरे पर कोई िशकन न आई। बेहद इतिमनान व तस लीपूवक वह बोले . उसक छत िगर पड़ और बादशाह छत के नीचे दब कर मर गया। सन १३२५ का वष है । िनजामु न क बीमार क खबर पहँु च रह थीं। जस समय वाजा वाजा िनजामु न िच ती का दे हांत हआ ु . वे उनसे फौरन िमल और कहा . मुख पर डारे केस। चलो खुसरो घर आपने .कर के अपने मुर द के साथ कसी और तरफ चला जाए। वाजा का मुर द राजक व शायर अमीर खुसरो ल कर के साथ जाएगा। और आ खर माल भर बाद जब गयासु न तुगलक फतेह के न कारे बजाता हआ वजय उ सव मनाता ु हआ जमुना नद ु के कनारे द ली शहर के सामने ब क यासपुरा क खानकाह िनजामु न के सामने आ पहँु चा? िनजामु न िच ती के मुर द को जैसे ह ये समाचार िमला. उस समय अमीर खुसरो बंगाल से दे हली लौट रहे थे। द ली पहँु चकर जब उ ह ने अपने पीर क मृ यु का समाचार सुना तो वह पागल क भाँित वहाँ से िच लाते हए ु उनक क बेहद क ण भर आवाज म यह दोहा पढ़ा "गोर सोवे सेज पर. रै न भई चहँु दे स।।" पर दौड़ कर िगर पड़े और .

. नौरोज कबीर. आ द। गायक क जगह अमीर खुसरो ने खुसरो ने पूव पु तक म याल गायन शैली का अ व कार पद कया। चिलत क वाली और गजल को एक नया गाने का अंदाज दया। ा कथन या तावना िलखने का चलन भी खुसरो ने शु कया। अमीर खुसरो ने फारसी. नुसरत नतक .ह दवी का थम श द कोष 'खािलक बार ' िलखा और वो भी क वता के प म। ंथ सूिच . ६८४ ह ी ू क वताऐं। उ १९-२४ वष तथा ३२-३४ वष। .इनके अन तर अमीर खुसरो के पास जो कुछ भी धन-स प दया। गर ब और यतीम म बाँट दया और वंय उनक (गु थी उसे लुटा िनजामु न िच ती) क मजार पर काला कपड़ा पहनकर शोक म जा बैठे। रोते-रोते बस एक ु ह बात कहते थे . आ द। उ ह ने अपने कई सांगीितक िश य तैयार कए जैसे तुमत खातून. तुहका-तुस-िस ई. तवा फक. उ ारा िल खत फारसी ंथ - (बचपन का तोहफा) पहला द वान ६७१ ह ी सन १२७१ १६-१९ वष तथा ३२-३४ वष। 2. जलफ. शहाना. अडाना. सनम-गनम. वसतुल हयात : (जीवन का म य भाग) दसरा द वान.अमीर खुसरो 1. क बाना.कौल. इशाक. ढोलक और तबला का अ व कार अमीर ने ह कया। ह द ु तानी संगीत म तराना का अ व कार भी खुसरो ने कया। खुसरो ने ईरानी और ह द ु तानी राग के िम ण से कई हजार राग बनाए। जैसे . साजिगर .क आफताब (सूरज) जमीन म छप गया है और उसक करण िसर धुनती फर। गु के दे हांत से उनको इतना अिधक हा दक आघात पहँु चा क छ: मास के अ दर उनका भी दे हांत १८ श वाल ७२५ ह ी (१३२५ ई.) को हो गया। उनक क भी द ली म उनके गु के बगल म ह है । आज भी उनक मजार पर उस होता है और मेला लगता है । यहाँ ह द-ू मु लम तथा अ य धम के लोग एक त हो कर संगीत के े ा पु प अ पत करते ह। म भी अमीर खुसरो का योगदान अ व मरणीय है । िसतार. फरगाना.

नुह िसपहर (नौ आसमान) ७१८ ह ी। अलाउ न के बेटे कुतुबु न मुबारक शाह के कहने से खुसरो ने इस िलखा। बादशाह ने इसके िलए एक हाथी के बराबर सोना तौल कर खुसरो को दया। ह द ु तान के र ित रवाज . कृ ित। पशु-प य वा लोग क तार फ। ५. गुर-तुल-कमाल (शु ल प क पहली रात) ६९३ ह ी उ तीसरा व सबसे बड़ा एवं सव े ३४-४३ वष द वान। इसम ९ मसन वयाँ ह। 4. दवल रानी ख खाँ या इ कया या ख नाम: (७१५ ह ी) गुजराती के राजा कण क बेट दे वल रानी और अलाउ न खलजी के बड़े पु खाँ के शहजादे ख ेम क कथा। इसम भारतीय नार का बेहद सु दर िच ण खुसरो ने तुत कया है । ४. सं कृ ित.3. ब कया न कया (बाक साफ) चौथा द वना उ ४४-६४ वष। ७१६ ह ी। 5. िम ताहल ु -फुतूह ( वजय क कुंजी) ६९० ह ी। जलालु न फ़रोज खलजी क चार वजय का वणन। मिलक छ जू क बगावत। ३. करान-उस-सादै न (दो शुभ िसतार का िमलन) बादशाह बुगरा खाँ और उसके पु कैकुबाद के झगड़े और फर समझौते पर। ६८८ ह ी। इसे मसनवी दर िसफत-ऐ-दे हली भी कहते ह। २. िनहातयुल कमाल (कमाल क सीमा) पाँचवाँ और अंितम द वान। मसन वयाँ १. तुगलक नामा अपनी मृ यु से कुछ दन पूव िलखी। ऐितहािसक मसनवी। .

मजनू व लैला ञ. शीर व खुसरो घ. एज़ाजे खुसरवी (खुसरो के कारनामे). अफजलुल फ़वायद (सबसे अ छा फ़ायदा) गु हज़रत िनजामु न क िश ाऐं। ४. खजाइन-उल-फुतूह या तार खे-अलाई (फ़तह का ख़जाना) ६९५ ह ी से ७११ ह ी तक। अलाउ न के शासन बंध का ववरण। ३. मसनवी िशकायत नामा मोिमन प अपने ज म प टयाली। थान क ख ता हालत पर गहरा दख ु खुसरो ने य बाद म िमली है । ग कया। यह रचनाऐं १. भाषा शा त। २. उ ७० वष.ह िनजामु न औिलया के उपदे श का सं ह। . ७१९ ह ी. आइने-िसक दर क व िनजामी के कुसरो के जवाब म ६९८-७०१ ह ी के बीच खुसरो ने िलखी। ७. ख सा-ए-खुसरो (पाँच छोट मसन वयाँ) क. मतला उल अनवार ग. ह त-ब ह त ख. क सा चार दरवेश (कहानी सं ह) .६. राहतुल मु ह बीन .क स क यह पु तक खुसरो ने अपने गु िनजामु न औिलया को सुनाने के िलए िलखी। ५.

६. इनशाए खुसरो - यह प

का संकलन है ।

७. मकाल: तार खुल खुलफा - टामस विलयम ने ओ रयंटल बाइ ै फकल
श दकोष म खुसरो के

संग म इसका उ ले ख कया है । ३५४ ई.। इसम

खलीफा, सू फय , दरवेश व विलय आ द धािमक य

ह द रचनाऐं (खुसरो

य के वृ ा त है ।

ारा िल खत) -

१. खािलक बार ( ह दवी-फारसी श द कोष, क वता के

प म)

२. द वाने ह दवी - आम आदमी के िलए। पहे िलयाँ, सावन, बरखा, शाद आ द
गीत।

३. हालात-ए-क है या- अपने गु

िनजामु न

ारा

व न म भगवान

के दशन दे ने के उपरा त इनके आदे श पर खुसरो ने
ह दवी भाषा म िलखा।

आ - अमीर खुसरो से संबंिधत अ य लोग
अं ेजी, फारसी) -

ी कृ ण क

ी कृ ण
तुित म इसे

ारा िल खत पु तक (उद,ू ह द ,

१) फवायद उल फवायद - हसन आला िस जी (अमीर खुसरो के जगर दो त)
ह. िनजामु न औिलया क िश ाऐं।
(२) तार खे फरोज़ भाह - जयाउ न बन ।
(३) िसया-उल-औिलया - अमीर खुद करमानी।
(४) तार खे फर ता - मौला कािसम फ रशता।

(५) मदन - उल - मूिसक - मोह मद करम इमाम खान।
(६) आबे हयात - मोह मद हसै
ु न आजाद।
(७) िनकातुशओरा
- मीर तक मीर

(८) राग दपंण - फक

ला।

(९) बनी - वा जद अली शाह।
(१०) सौतुल मुबारक - वा जद अली शाह।
(११) हयात-ऐ-खुसरो - सईद अहमद मरहरवी।
(१२) हयाते खुसरो - मौलाना िशबली नोमानी।
(१३) फरहं ग-ए-आस फया - मौलवी सईद अहमद दहलवी।
(१४) जवाहर-ए-खुसरवी (उद)ू मोह मद अमीन अ बासी िचरै यकोट ।
(१५) लाइफ आ◌ॅफ अमीर खुसरो -

ो. मोह मद हबीब

(१६) सू फया तुल औिलया - दारा िशकोह।
(१७) तज़ ा-ए-उ माए- ह द - रहमान अली।
(१८) शे ल आजम - मौ. िश ली नौमानी।
(१९) उद-ू ए-कद म - श भु ला कादर ।
(२०) खुसरो क

ह द क वता - बृज र

दास, नािगर

चा रणी सभा काशी।

(२१) लाइफ ए ड वकस आफ अमीर खुसरो - मौ. वह द िमजा।

(२२) हयात-ए-अमीर खुसरो - नक मोह मद खान खुरजवी।
(२३) ह द ु तान अमीर खुसरो क नज़र म - सईद सबाहु न अ दररहमान।

(२४) खुसरो का

हनी सफर - डॉ.

(२५) खुसरो शनाशी - डॉ.

यो अंसार ।

यो अंसार व अबुल फैज सहर।

(२६) अमीर खुसरो - शेख सलीम अहमद।
(२७) अमीर खुसरो - अश म सयानी।
(२८) अमीर खुसरो दहलवी - मुमताज हसै
ु न, पा क तान।
(२९) मूसक हजया अमीर खुसरो - डॉ. चाँद खाँ।
(३०) अमीर खुसरो बहै िसयत ह द शायर - डॉ. सफदर आह।

े ड शन - वी.पी. वटक।

(३१) अमीर खुसरो ए ड इं डयन र डल
(३२) अमीर खुसरो और उनक

ह द शायर - शुजात अली संदेहलवी।

(३३) अमीर खुसरो का ह दवी कलाम - बिलन श ंगर
चंद नारं ग। सीमांत

काशन।

(३४) अमीर खुसरो संपादक राज नारायन राय।
(३५) अमीर खुसरो - सईद गुलाम शमनानी।
(३६) अमीर खुसरो मेमो रयल वा यूम (३७) खुसरो क

ह द क वता - िम

काशन वभाग।

बंध।ु

ित स हत। डॉ. गोपी

मुइन व अ य.रसच एकेडमी। (४७) लुगात-नामा-ए-दे हखुदा. ह ए ड व स आ◌ॅफ तूती-ए. २००३. भोलानाथ ितवार । (३९) खुसरो व शीर . लाइफ. १३३५. अली अकबर दे हखुदा संपादक डॉ. परमानंद पांचाल ह द बुक सटर। (५१) ह द ु तानी जुबान. इदारा-एअद बयात-ए-दे हली। (४४) गनयत उल मुनया . अ द ु स ार दलवी. तेहरान.(३८) अमीर खुसरो और उनक ह दवी रचनाऐं . द ली। (४९) अमीर खुसरो. १३३९ ई. सोहनपाल सुमना ट. ताराचंद। (४१) खुसरो नामा - ो. ह द ु तानी चार सभा महा मा गाँधी मेमो रयल रसच सटर ब बई। .दौलत शाह समरकंद । (४३) अमीर खुसरो एस ए जीिनयस सबाहु न अ दरु रहमान.ए .। वा यूम ३४ व ३९ (४८) खुसरो दे िच रसमे टक. मुजीब र वी। (४२) तज करा .ठाकुर जयदे व िसंह। संगीत नाटक रसच एकेडमी। (४६) मौिसक -ए-फरे बी.शाहब सरमद । (४५) इं डयन यू जक . रयाज जाफर. काशन वभाग। (५०) भारत क महान वभूित अमीर खुसरो.ह द. एजुकेशनल प ल कंशग हाउस. मरकज़-ए-मुतालयात-ए-हमाहं मी-ए. डॉ. अमीर खुसरो न बर एड टर डॉ.मसूद कुरे शी। (४०) अमीर खुसरो और ह द ु तान डॉ.डॉ.

नवाँ सं करण.(५२) रा ीय एकता के अ दत ू अमीर खुसरो डॉ. २०२७ व. मिलक मोह मद पीता बर प ल कंशग कंपनी द ली। (५३) अमीर खुसरो संपादक सुरे ितवार . १८७० ई. ह द म सन १९६४ के अंत तक ंथ का वै ािनक या अनुसार वग कृ त एवं म ब कािशत सभी ववरण.। (५६) तज़ कहद-ए-खुसरवी .। (५५) ह द सा ह य सा रणी. सूचना वभाग लखनऊ। (५४) खािलक बार सूरजमल कम न खाँ पटना. उ र दे श सरकार. भाग-१ पीता बर नारायण एवं भा करन नारायण. होिशयार पुर.हसन िनजामी. व े रानंद सं थान. दरगाह िनजामु न (पो ट आ◌ॅ फस के पास) .