गाँधीजी एवम ् भीषम िितामह

गाँधीजी

भारतीय राजनीित के िितामह सवरि या राषवादी राजनीितक िकले के ििमि

थे। गाँधी जी सभी वगो के िलये ठीक उसी तरह आदशश थे, िजस तरह भीषम िितामह
िाणड़वो एवं कौरवो दोनो के आराधय थे। इककीस वषश दििण अफ़ीका मे रहने के िाद,
गाँधीजी की भारत की राजनीितक याता का आरमभ कागेस िाटी के झणड़े तले जरर हुआ
था, लेिकन कुछ समय िाद उनहोने अिने आि को औिचािरक रि से congress party से
अलग कर िलया था एवं िूरे दे श के नेता िन गये थे।
गाँधीजी कागेस िाटी मे रहते हुए भी कागेसी नेताओं की सता लोलुिता से उतने ही द :ु खी
थे, िजतने भीषम िितामह कौरव दल मे रहते हुए भी दय
ु ोधन की महतवाकांिाओं से द ु:खी

थे। इसके िावजूद दोनो ने सता लोलुिो का साथ िदया। िजस तरह भीषम िितामह ने राष
िवभाजन को सवीकृ ित दे दय
ु ने टे के ,उसी तरह जि
ु ोधन की महतवाकांिा के सामने घट

भारत के िवभाजन के सनदभश मे कांगेस की िैठक हो रही थी, गाँधीजी उस सभा मे मौन
धारण िकये हुए थे। दोनो अिनी इचछाओं के िवरद दे श के िवभाजन के मूक दशक
श िन
कर रह गये। दोनो ही कमश: नेहर व िजनना की महतवाकांिाओं से हारे । “वीर भोगये

वसुंधरा” या िौरष के िवचार से अजुन
श या कणश को ही सता िमलनी चािहये थी। गांधीजी
ने भी अगर जािहर तौर िर नेहर के िजाय सरदार िटे ल को दे श के नेततृव के िलये
चुना होता तो िनःससनदे ह दे श का इितहास काफ़ी िभनन होता।
गांधी जी का िववािदत बहचयश और भीषम की बहचयश की भीषम पितजा दोनो ही िनरथक

थे। गांधी जी के ििता के दे हानत के समय का अवसाद उनके िूरे जीवन िर भारी था,और
एक िदन इसी अवसाद ने उनहे बहचयश का वत लेने के िलये मजिूर कर िदया। बहचयश
को इतना महतव दे ना दोनो के िलये एक कमजोरी क पतीक था न िक िौरष क।
भीषम िितामह

ने जहां भूलसवरि यिुधििर की दूतकीड़ा ,शकुिन का किट, लािागह
ृ के

षडयंत को नजरनदाज िकया वहीं गांधी जी का िािकसतान के तमाम नािाक कारनामो

यथा काशमीर मे यद
ु के िावजूद िािकसतान को 56 करोड़ िदलवाने हे तू अनशन िर िैठ
जाना उससे भी िड़ी भूल थी।
दोनो की हतयाओं के िीछे दो मुखौटो का हाथ था। जहां भीषम को सवेचछा मतृयु का
वरदान था,मतृयु उनके िाँव के िास उनकी आजा की पतीिारत खड़ी रही। वहीं गांधी का
वयिितव इतना वह
ृ त ् था िक िकसी भी िनदक
ू की गोली से उनकी हतया असमभव थी।

भीषम िितामह की मतृयु शरशैया िर होती है । ये वाण िकतने भी नक
ु ीले रहे हो वे उनके
उिर आराम से लेटे हुए थे। मतृयु उनके िाँव के िास उनकी आजा की पितिा मे खड़ी
थी। िवभाजन के सवभािवक चरोमोतकषश महाभारत की समािि िर ही मतृयु को आजा

िमलती है । उनके शरीर को लहुलुहान करने वाले वाण अजुन
श के नहीं वरन ् उनकी अिनी
निुंसकता के थे। धत
ृ राष के िुत मोह का िवरोध नहीं करना,अिने वद
ृ ििता की

वयािभचािरता के िलये िौरष का तयाग कर, अिनी चेतना का ििरतयाग, एक वयिि की
गलत इचछाओं के सममान हे तू अिना एवं अिने राजय के भिवषय को गलत िदशा
दे ना,अमिा का अिहरण एवं ििरतयाग, दौिदी के चीर हरण का पितरोध नहीं करना आिद
िचनह िौरष के नहीं कहे जा सकते थे।
िवभाजन के फलसवरि हुए दं गो मे िििमी भारत मे नर संहार िुवी भारत की तुलना मे
कम से कम दस गुना हुआ। नोआखली मे महज एक िखवाड़े मे शािनत िहाल हो चुकी
थी। इस समय गांधी जी का दीघक
श ालीन कलकता पवास कुछ वैसा ही था जैसा भीषम

िितामह का दौिदी का चीरहरण के समय सभा मे मूक उििसथत रहना। यहां एक दौिदी
का चीर हरण हुआ था वहां िििमी भारत मे लाखो दौिदीयो का चीर हरण हो रहा था।
लेिकन गांधी जी उनकी तरफ िीठ कर नोआखली मे िैठे रहे ।

नाथुराम गोडसे या कोई भी अनय वयिि ििसतौल से गांधी जी हतया नहीं कर सकता था।
गांधी जी िक हतया भले ही गोडसे ने 1948 मे की हो,गांधीवाद की हतया की पिकया
िवभाजन की सवीकृ ित के साथ ही हो गई थी। िजस तरह तुलसी दास कहते है िक “राम
का नाम,राम से कहीं िड़ा था” उसी तरह गांधी एक वयिि से उिर एक िवचारधारा का

नाम था।

उनकी हतया उनके अिने नामधारीयो ने की। िजस तरह भीषम िितामह की

हतया उनके अिने िोते अजुन
श के हाथो हुई, उसी तरह गांधी जी की हतया भी उनके ही

राजनीितज वंशजो ने ही की है । राजघाट िर िनी हुई समािध तो िसफश एक पतीक मत
है । उनकी हतया भारत के हर गांव हर शहर मे हुई है ।

जहां गांधीजी की समुिचत िवचारधारा का केनद भारतीय गमीण समाज था वहीं उनके
राजनीितक िुत नेहरजी िकके दे शपेमी होते हुए भी एक अिभजातय (elitist) सोच से

गिसत थे। जहां गांधी जी की पाथिमकता गांव के शौचालयो की थी वहीं नेहर जी की
पधान मनती के रि मे िहली मानिसक संरचना िवदे शी मेहमानो हे तू अशोक होटल की
थी। अशोक होटल का िनमाण
श भारत के drawing room के सवरि िकया गया। ये अजुन

के तरकश का िहला तीर था, िजसने भीषम सवरि गांधी को ििंधा। हाल मे िदये गये एक
भाषण मे यह कहा गया है िक, “नेहर जी भारत िर राजय करने वाले अंितम अंगेज थे।“
यह संवाद अिनी िूरी भंिगमाओं के साथ अगाह होते हुए भी कई अथो मे एक
ऐितहािसक सतय है ।

भारत के िवभाजन के िलये अगर िजनना मुखय दोषी है तो नेहर जी की वयििगत
महतवाकांिाओं के वजूद को नकारा नहीं जा सकता । िराकािा सवरि आज तो
ििरिसथित

यह है िक

िािु तेरे चरखे िर , खदरधारी आज कात रहे है
सोने के

धागे

सन ् 1937 के चुनाव के ििात महातमा गांधी ने िचनता वयि करते हुए कहा था िक ,

“आज सता मे िैठे हुए लोगो के भष आचरण को दे ख कर मै भारत के भिवषय के पित

सशंिकत हूँ।” उसी समय आवशयकता थी एक समानानतर भषाचार के िखलाफ़ आनदोलन
की। गलत महतवाकांिाओं की हतया ही समुिचत समाधान है।

भीषम िितामह भी महाभारत के पारमभ मे अिनी भूल सवीकार करते हुए कहते है िक “
मुझे िवभाजन सवीकार नहीं करना चािहये था। यह यद
ु उसी समय छे ड़ दे ना चािहये था।

वयििगत महतवाकांिाओं का समाधान िवभाजन नहीं यद
ु है । अगर वयििगत
महतवाकांिाएं जीिवत रहीं तो िवभाजन के ििात भी महाभारत ही होगा।”
भातर िाक के चार यद
ु िांच हजार वषश के ििात भी उस कथन को पमािणत ही करते
है ।
िफर भी िनःशंक दोनो ही महािुरष, यग
ु ावतार थे।
by Shashi’s The Great Indian Novel”

(My musings here are inspired