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ये िशक कहलाते है …… »

Teachers Day ki duniya mein GURU-PURNIMA
Posted by hemjyotsana "Deep" on जुलाई 29, 2007
Teacher’s Day क इस दिनया
म आज गु पुणमा जैसे वशेष !दन म" अपनी वो कवता आप

सब के सामने रख रह( हँू जो म"ने अपने व+ालय के !दनो म िलखी थी ।
वो कौन सा है पद , 
जसे दे ता ये जहाँ स/मान ।
वो कौन सा है पद ,
जो करता है दे श0 का िनमाण ।
वो कौन सा है पद ,
जो बनाता है इं सान को इं सान ।
वो कौन सा है पद , 
जसे करते है सभी ूणाम ।
वो कौन सा है पद , 
जकसी छाया म िमलता 5ान ।
वो कौन सा है पद ,
जो कराये सह( !दशा क पहचान ।
गु7 है इस पद का नाम ।
मेरा सभी गु7जनो को शत-शत ूणाम ।

रोज सुबह िमलते है इनसे , 8या हमको करना है ,
ये बतलाते है ।
ले के तःवीर इ:सान0 क ,सह( गलत का भेद हम ,
ये बतलाते है ।
कभी ड़ांट तो कभी =यार से , !कतना कुछ हमको ,
ये समझाते है ।
है भवंय दे श का जन म , उनका सबका भवंय ,
ये बनाते है ।
है रगं कई इस जीवन म ,रग0 क दिनया
से पहचान ,

ये करवाते है ।
खो ना जाये भीड़ म कह(ं हम , हम को हम से ह( ,
ये िमलवाते है ।
हार हार के !फर लड़ना ह( जीत है सBची , ऐसा एहसास ,
ये करवाते है ।
कोिशश करते रहना हर पल , जीवन का अथ हम ,
ये बतलाते है ।
दे ते है नेक मज़ल भी हम , राह भी बेहFर हमे ,
ये !दखलाते है ।
दे ते है 5ान जीवन का , काम यह( सब है इनका ,
ये िशक कहलाते है ।

अXील बात0 से कांपे व+ालय क धरती ऐसे ह" व+ाथW जैसे व+ाथW वैसे िशक न पढ़ने वाला कोई न है पढ़ाने वाला आये !दन कॉलेज पे लटका रहता ताला ु ट(चर खुश हो गई छYट( ू ट कहे चलो कर मःती ःटड गु-िशंय का पवन [रँता ]यिभचार म िलO हआ ु . ज:ह0ने हमारे जीवन-दशन को कह(ं न कह(ं से ूभावत !कया। गु7 को इMर से अिधक महNव ूाO है । गु7 का नाम ज़7र बदला है . नारे . माःटर0. िशक0. ले!कन हरे क के जीवन म कह(ं न कह(ं गु7 7पी तNव का समावेश ज़7र है । ज़7र( नह(ं !क गु7 !कसी गु7 के च0गे म ह( हो। ूNयेक का गु7 अलग है । !कसी के िलए माँ गु7 है . गुओं. ट(चर0 को बधाइयाँ दे ते ह" .आज पाँच िसत/बर है यानी िशक !दवस। आज हम सभी उन अHयापक0. नमन कर रहा है । यह !दन मेरे िलए बहत ु महNवपूण है । मेर( माँ ूधानाHयापका होकर सेवािनवृF हई ु ह" । म" गौरखपुर म सट पॉल ःकूल म पढ़ती थी। और ज:म भी मेरा इसी !दन हआ। है ना ु मज़े क बात !क आज अHयापक !दवस भी है और मेरा ज:म!दवस भी। 5 का भी 5ान नह(ं पढ़ना उनका काम नह(ं ऐसे तो ह" िशक व+ा क िनकाले खुले आम अथW हड़ताल. आचायJ. याद करते ह" . !कसी के िलए पता तो !कसी के िलए िमऽ। आज !ह:द-युQम भी ऐसे ह( गु7 के विभ:न 7प0 को अपने ूितभागी कवय0 क कवताओं Rारा याद कर रहा है .

ौ_ा के काबल था जो वोह(. पथ भ` हआ ु िशक के िलए िशा ]यापार हई ु पढ़ा Yयूशन उ:ह(ं से तभी जा के नैaया पार हई ु सरकार( व+ालय0 क हालत जो खःती हई ु तो गर(ब0 के हाथ0 से ू गई िशा क डोर( छट ूाइवेट ःकूल0 क मँहगी िशा अमीर0 क धरोहर बन गई व+ादान महादान अब कहाँ होता है मे!डकल हो या इं जीिनय[रग मैनेजमट हो या संगणक शे िनंग हर व+ा का एक दाम होता है गु भी अमीर िशंय0 का पधर होता है गोव:द भी अब गु को बड़ा (बिलहार() नह(ं कहता है पर मुYठf म बची रे त से कुछ महान िशक बा!क ह" अभी जनक िशा के बदौलत वहाँ पहँु चे ह" हम जहाँ न पहँु चे थे कभी उनके चरण0 म चलो शत ् शत ् नमन कर सभी .

ःवयं मधुप बन जाऊं. कभी चुनु मई पीत-पराग. भय सताए हमे कदा. मेरे संग वे पल पल मे| ज:मे हम मानव बनकर. समय क हे रा-फेर(. मुYठf मे वे लेते हर वे सहभागी मेरे हर कल मे. नयन उ:हे हो िनiु र कहते. मेरे संग वे पल पल मे| य!द कभी कटु वचन हो कहते. मHय नह( कोई ूितबंध. वे नावक जीवन क कल-कल मे मेरे संग वे पल पल मे| कभी उपवन हो जीवन मेरा . कभी पऽ सा वह आबंध| वे सदै व मेरे उर-तल मे. उनका होता इस जल मे| मेरे संग वे पल पल मे| य!द जीत हो तो उनक है . इनसे जो अौु बहते.कभी सोचता वह . . य!द धृ◌ा`ता हो मेर( या. कभी सखा तो कभी hयेi सा. स:ःबत बनाते उनके कर. य!द हार हो तो मेर(.

मेरे संग वे पल पल मे| --पीयू पीयूष पnडया ूणाम गु7 जी ! सारता सरगम जीवन क अ आ इ ई 5ान कराया. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । धन ऋण गुणा भाग जीवन के भले बुरे का भान कराया. नई. अंधकार म माग !दखाया.कभी वहाँ मै मंडराऊं. दे षा इं सान बनाया. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । षा बन पशुवत ् है जीवन. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । जीवन म भटकाव बहत ु है . िनदm शक. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । ण भंगुर नंवर है जीवन जीवन का इितहास बनाया. सृ` क Qणत और व5ान िसखाया. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । भाषा.पुंप0 क शतदल मे. . q`. तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । अंितम सNय मुr जीवन क.

धम और आHयाNम पढ़ाया.ूणाम . तुमने तु/ह ूणाम गु7 जी । --ववे ववेक रं जन ौीवाःतव 'वनॆ वनॆ' वनॆ िशक हर !कसी का जो ]यrNव िनमाण है | माँ पता के साथ गु का भी ःथान है | गु अथवा िशक महNवपूण भूिमका िनभाता है | वह ह( राt क संःकृ ित का िनमाता है | गु िशंय [रँते म गु का दाियNव ूधान है | तो उसका अिधकार िशंय से पाना स/मान है | !कंतु [रँते तो आज भी वह( मौजूद ह" | पर दाियNव भी िशिथल है ...ूणाम . नह(ं स/मान का वजूद है | िशक !दवस पर हम िशक का स/मान भले न कर पाय| ले!कन पोिलयो !दवस पर उसे घर घर घुमाएं। मतदाता सूिचय0 के िलए भी िशक काम आता है | लोकसभा से लेकर पंचायत तक के चुनाव भी कराता है | िशा दे ने के िसवाय दसरे बहत ू ु काम ह" | बडं बना !क !फ़र भी िशक नाम है | दे श क हवा म फैले ॅ`ाचार से वह भी नह(ं बच पाया है | धन क चमक म वह भी इतना भरमाया है | !क भवंय िनमाण के दाियNव से मुंह मोड़ रहा है | िोणाचाय सी गु ग[रमा को ख़ुद ह( तोड़ रहा है | !फ़र एकल]य से िशंय कहाँ से पाओगे ? स/मान तो दल ु भ होगा ह( पर िशक !फ़र भी कहलाओगे| --ूद(प ूद(प मानो[रया ूणाम मेरे अHयापक .

.ूणाम मेरे अHयापक ूणाम मेरे उRारक जननी और जनक से hयादा आपका स/मान है मेरा होना इFफाक हो सकता है ले!कन मेरा बनना तो आप क साधना का प[रणाम है मै जो भी हँू बना आज सब आपका करम है . जो कुछ भी बन पाया हँू मै उसके योQय तो नह(ं था पर आपका आशीवाद हर पल साथ रहता है ूणाम मेरे संःथापक ूणाम मेरे अHयापक याद आ रहा है वो ूाथना करना भगवान से क आप क साइ!कल म पं8चर हो जाये और आप ःकूल न आ पाए और जब कभी आप नह(ं आते तो हम ख़ुशी से झूम उठते पर आप ने तो सदै व कामना हमारे भले क ह( क होगी ूणाम उBच वचारक ूणाम ् मेरे अHयापक आपक जुबान से श{द नह(ं ह(रे मोती िगरा करते थे हम नादाँ थे जो उनका मोल न समझ पाए आपक डांट म औिचNय था .

सचम था मजा आ जाता। कभी-कभी जब वे. था पता चल जाता. पूछगे सवाल और !फ़र. . हम उस !दन बहत ु भाते। खेलने के च8कर म. मन कहता था. वो आते तो सर नीचे !कए. जब पाठ याद नह( करता. भय का अहसास था िमटता. शाबासी िमलेगी या डांट पड़े गी। पूछते अगर आते ह("मजे म तो हो?" उनके अBछे मूड का. गु7जी आ गए. घं!टयाँ बजाते.आपक मार म ूेम भाव ूणाम मेरे पथ ूदशक ूणाम मेरे अHयापक --सु सुरे:ि कुमार अिभ:न गु जी और म" साइ!कल पर. थे वो रोज आते। समय पर !कताब खोले. दो-चार कहािनयाँ सुनाते. वो आवाज घं!टय0 क. कंधे पर थैला लटकाए. कान0 म जैसे ह( जाती. बैठे करता था इ:तजार.

!फ़र बनो ू|यात. "कु|यात बनो या. पशु सामान अ5ानी को. जो हम आजीवनयाद आते ह" . हो जाओ सुव|यात"। ऐसे ह( होते ह" िशक. मनुंय बनाते ह" । --ूमोद ूमोद कुमार. िशा क hयोत जगाकर.िशंय है घडा गु तो ईंवर से भी है बडा झुक कर गु के ौी चरणो मे िशंय पैरो पर होता खडा गु तो वह द(पक है जलकर जो ःवयम भःम हो जाता है िमटते-िमटते भी औरो को जो ूकािशत कर जाता है ौी राम कृ ंण औ हनुमान भी गु के आगे झुकते थे . मार जामतारा. जीवन म कुछ करो ऐसा.था अपराधी सा बैठा रहता। उनक एक िशा. म"ने गांठ बाँध राखी है . जामतारा झारखnड अHयापक !दवस हम भारत के वासी है गु पर/परा के अनुगामी नत ् मःतक हो गु चरणो मे हम बना ले अपनी ज:दगानी कु/भकार गु .

गु के ह( एक इशारे पर न कदम !कसी के कते थे गु वाणी तो अमृत वाणी जो शुभ ह( शुभ फल दे ती है और क` िमटा कर जीवन के भाQय को उदय कर दे ती है गु तो सदै व है पूजनीय गु क िन:दा है िन:दनीय जीवन क जो राह !दखाता है वह गु सदै व है व:दनीय ू गु िशंय नाता है अटट नह( डाले इसमे कोई फूट यह स~यता थी भारत क कुछ द`ो ु ने जो ली है लूट दख ु तो है यह पावन नाता 8यो रास !कसी को नह( आता न गु तो न िशंय है वह( स~यता भारत क कहाँ गई पैसे के ब:धन मे ब:ध गए गु िशंय दोनो आपस मे न ूेम =यार का स/ब:ध है न कोई भावुकता मन मे बस एक !दवस अHयापक !दवस बस यह( गु िशंय पर/परा िनभानी है हमे उस भारत मे जसके बल पर यह दे श खडा वह गु कहाँ ? जो !दखला दे माग सNय का िशंय को जल कर के ःवयम द(पेक क तरह उhhवल कर दे जो भवंय को माना जीवन यापन के िलए पैसा भी बहत ु ज7र( है .

पर भूल जाएँ गु के िनयम ऐसी भी 8या मजबूर( है सNय का माग अHयापक है जो अपना ह( नह( सकता इस राt का िनमाता वह अHयापक हो ह( नह( सकता नह( कोई हक कहलाने का अHयापक उस इ:सान को जो केवल पैसे क खाितर बेचे अपने इमान को मा चाहती हँू !फर भी कडवा सBच मुझको है कहना लालची .अयोQय तो छोड ह( दे अHयापक बनने का सपना --सीमा सीमा सचदे व मेरा पहला गु7 मां ने बहत ु सरल बहत ु =यार( बहत ु भोली मां ने बचपन म मुझे एक गलत आदत िसखा द( थी !क सोने से पहले एक बार बीते !दन पर .

नजर डालो और सोचो !क तुमने !दन भर 8या !कया बुरा या भला साथक या िनरथक मां तो चली गई सुदरू ितज के पार और बन गई एक तारा नया इधर जब रात उतरती है और नींद क गोली खाकर जब भी म" सोने लगता हंू तो अचानक एक झटका सा लगता है और म" सोचते बैठ जाता हंू !क !दन भर म"ने 8या !कया? !क आज के !दन म" !कतनी बार मरा !कतनी बार जया !फर जया इसका !हसाब बड़ा उलझन भरा है .

मेरा वजूद जाने !कतनी बार मरा है यह !दन भी बेकार गया म"ने दे खे मर(ज बहत ु ठfक भी हए ु कई पर नह(ं है यह बात नई इसी तरह तमाम ज:दगी गई जो भी था मन म जसे भी माना म"ने साथक तमाम उॆ भर वह आज भी नह(ं कर पाया म" न तो कभी अपनी मजW से जया न ह( अपनी मजW से मर पाया म"। .

0 ःने!हल हल शुभकामनाएँ आज िशक !दवस है । !दवस0 क भीड़ म एक और !दवस! कहने को आज म" आपक िशका हँू . वकास और रण क क‡पना क जा सकती है ? 8य0 असमथ ह" हम यह िशा दे ने म !क 'तुम भी जीतो. संःकार. म" भी जीतूँ? 8य0 नह(ं िनिमत कर पा रहे ह" हम वह प[रवेश. यह( ू€ संभवत: आपके मानस म भी उठते ह0गे। मैडम 8य0 परे शान हो रह( ह" ? उ:ह 8या करना है ? वे अपना वषय पढ़ाएँ और चली जाएँ। आपक गलती नह(ं है . !कंतु सच तो यह है !क जाने-अनजाने न जाने !कतनी बार म"ने आपसे िशा महण क है । कभी !कसी के तेजःवी आNमवMास ने मुझे चमNकृ त कर !दया तो कभी !कसी वलण अिभ]यr ने अिभभूत कर !दया । कभी !कसी क उhhवल सोच से मेरा िचंतन ःफु[रत हो गया तो कभी स/मानवश लाए आपके न:हे से उपहार ने मुझे श{दह(न कर !दया। का म अHयापन के अित[रr जब म" ःवयं को उपदे श दे ते हए ु पाती हँू तो ःवयं ह( लhजत हो उठती हँू । म" कौन हँू ? 8य0 दे रह( हँू ये ूवचन? आप लोग मुझे 8य0 झेल रहे ह" ? कभी !कसी के तेजःवी आNमवMास ने मुझे चमNकृ त कर !दया तो कभी !कसी वलण अिभ]यr ने अिभभूत कर !दया । कभी !कसी क उhhवल सोच से मेरा िचंतन ःफु[रत हो गया तो कभी . जसम हर व+ाथW जीता हआ अनुभव करे । ु .ूय व+ािथय0. स†भावना... ूखर ू€0 व रचनाNमक सोच का 8या इस िशा प_ित म कोई ःथान नह(ं? हमार( िशा ूणाली क यह वडं बना 8य0 है ? पुःतक0 म छपा हआ ह( ॄ„सNय है ? चाहे वह !कतना ह( ु अूासंिगक हो। वह( शाह( फरमान है ? िशक0 को का म उसे ह( पढ़ दे ना है और व+ािथय0 को रटकर वह( उFर पुःतका म िलख दे ना है ? और जाने-अनजाने उस कँट(ली ूितःपधा म शािमल हो जाना है . स!हंणुता और सौहाद जैसे सुखद श{द0 से रच-पच इस दे श के छाऽ0 म यह कैसा वषैला बीजारोपण है ? 8या दे रहे ह" िशक उ:ह ? पछड़ने का भय और पछाड़ने क दता? ऐसे कुं!ठत और असुरत मानस के चलते कैसे एक ःवतंऽ ]यr के िनमाण.. जसक अंितम प[रणित है सव…Bच अंक? एकता. पर गलत म" भी नह(ं हँू । कल तक म" भी ब"च के उस पार हआ करती थी। आज सौभाQयवश इस तरफ हँू । उस पार रहकर अ8सर कुछ ू€ मेरे मन को ु मथते रहे ह" । 8या िशक माऽ !कताब0 म ूकािशत वषयवःतु को समझाने का 'माHयम भर' है ? 8य0 िशक अपने व+ािथय0 से माऽ रट( हई ु पा‚यसाममी को ह( ूःतुत करने क अपेा रखता है ? व+ािथय0 के मौिलक िचंतन.

जसम ॐोत0 क ूचुरता है . 0 आप उस युग म जी रहे ह" . 5ान. आगे बढ़ने के बहत ु से Rार ह" पर याद रखना.! ता!क आपके मन के तार0 को झंकृत कर सकूँ और ओजःवी बना सकूँ। मेरे व+ािथय0. आपके 'कत]य बोध' पर ह( हमारे 'अःतNव बोध' का ू€ !टका है । इस वr बहत ु -सी का]य पंrयाँ याद आ रह( ह" । 8य0 न अटलजी क पंrयाँ आपको भट क7ँ? छोटे मन से कोई बड़ा नह(ं होता 'छोटे ू मन से कोई खड़ा नह(ं होता टटे मन हारकर मैदान नह(ं जीते जाते न ह( मैदान जीतने से मन ह( जीते जाते ह" । .अनवरत ्-अनथक. अनुशासन और ग[रमा का प[रचय नह(ं !दया होता तो आज म" कहाँ होती िशका? मेर( समझ. ऊँचाई क उNकंठा म और तेजी क Nवरा म यह मत भूलना !क महNवपूण सफलता नह(ं ब‡क वह राःता है जस पर चलते हए ु आप उसे हािसल करते ह" । आपने पढ़ा भी होगा !क जो लोग वनॆता और नेक के ऊँचे राःते पर चलते ह" उ:ह 'शै शै !फक' !फक का खतरा कभी नह(ं होता। !फक आप मेरे सुयोQय सुशील व+ाथW ह" . मेरे िशका होने क सबसे अहम वजह। य!द ूथम ]या|यान म आपने धैय. रखना छोट( सफलता के छोटे Rार0 के िलए आपका कद बहत ु बड़ा है । ूितःपधा क ू!बया म. जो सीिमत पा‚यबम दे ती है और उसम से भी महNवपूण ू€0 को रट लेने का सबक दे ती है । तब भावनाओं के अितरे क म म" बोलती हँू .जीत ईंया पैदा करती है . वैचा[रकता और अिभ]यr आपके बेखौफ . 8य0!क मुझे द:ु ख होता है जब आपको बँधी-बँधाई लीक पर चलते हए ु दे खती हँू । उस ']यवःथा' का िशकार होते हए ु दे खती हँू ... बेबाक ू€0 से ह( तो समृ_ और वःता[रत हो सक है । आपक ूफु‡लता ह( मेरे अHयापन क ूेरणा है । आपक ूखर मनीषा और ज5ासु संःकार ह( मुझे िनरं तर पठन-अHययन के िलए उNसा!हत करते ह" । आपका ःनेह और स/मान ह( मेरे वMास को मजबूती दे ता है । आज का !दन हमारा नह(ं आपका है . हार वैमनःय। 'तुम भी जीतो म" भी जीतूँ' क भावना के पोषण से ह( तो 'सवm भव:तु सुखन: ' का संःकार ज:म ले सकेगा। म" आपक हमउॆ िशका हँू . !फर भी जब आप लोग0 क आँख0 म सपन0 के समंदर दे खती हँू तो ˆदय से को!ट-को!ट आशीवाद िनकलते ह" । आशीवाद क अवःथा नह(ं है पर न जाने 8य0 िशक होने का अनुपम अहसास माऽ ह( मुझे ऐसा करने के िलए बाHय कर दे ता है । म" आपको कई बार डाँटती हँू .

जो दसर0 को 5ान का उजाला बाँटकर उनके जीवन को गितशील.। शुभकामनाओं स!हत. स!हत शत ् शत ् नमन आज का युग क/=यूटर युग है । क/=यूटर के आने से दे श. सवप‡ली राधाकृ ंणन के बहाने िशक0 को स/मािनत करने का !दन है । यूँ तो सह( मायने म दे खा जाए तो 'गुर ॄ„ा गुर वंणु' के वचार और उससे जुड़े अHयाNम को अंगीकार करने वाले दे श को िशक0 के ूित आदर भाव ूकट करने के िलए !कसी !दन क ज7रत नह(ं होनी चा!हए.. गु-िशंय के संबंध0 क आदश प[रभाषा को तो याद !कया जाता है । ले!कन वतमान म हो िशक0 के साथ बBच0 का बदलता ]यवहार गु-िशंय संबंध0 म आए बदलाव को रे खां!कत करता है . उससे एक !दन ऐसा आ जाएगा जब समूचा ॄ„ांड 5ान के सम छोटा लगेगा। आज बढ़ती ूितयोिगता और बBच0 के बढ़ते 5ान ने जस ूकार कम के साथ समझौता !कया है ..... एमबीए का िनमाण करते ह" । बBच0 के अंदर भावना और संभावनाओं का वकास कर उ:ह दे श को उ:नित क राह पर ले जाने क िशा दे ते है । िशक वह जीवन क मूित है .. डॉ8टर. इस पवऽ [रँते क कई-कई बार हNया तो तभी हो जाती है जब हम ट(वी या कई ःकूल0 म एक छाऽ को एक िशक से ये कहते हए ु पाते ह" !क 'दे खना एक !दन हम तुम से इस व+ालय म प0छा लगवाएँगे. यूँ तो सह( मायने म दे खा जाए तो 'गुर ॄ„ा गुर वंणु' के वचार और उससे जुड़े अHयाNम को अंगीकार करने वाले दे श को िशक0 के ूित आदर भाव ूकट करने के िलए !कसी !दन क ज7रत नह(ं होनी चा!हए.. वे अपने कम के ूतीक बड़े से बड़े इं जीिनयर. उससे लगता है !क 5ान और कम क िशा आज के समय म जंदा रहने क अिनवायता बन गई है । ले!कन इसम 5ानी और कम दोन0 को रोना पड़ता है । हमारे तमाम िशक जब 5ान और कम क िशा म ःकूल से लेकर वशेष संःथान0 और वMव+ालय0 तक जुड़े ह" . उनका आदर सNकार तो !दल से !कया जाता है । जब छाऽ अपने िशक से अरे -तुरे करके बात करते ह" . उनके सामने दादािगर( से पेश आते ह" या !फर उनके सामने िसगरे ट के धुएँ के छ‡ले उड़ाते ह" तब ऐसा ूतीत होता है जैसे बBचे अपने िशक0 के नह(ं अपनी माँ के मुँह पर कािलख पोत रहे ह" ।' बBच0 को चा!हए !क वे िशक0 के सम ऐसे पेश ना आए िशक गु .माँ शारदा से ूाथना है !क आप मन भी जीत और मैदान भी. समाज म एक नई बांित का आŠान हआ है । ु ले!कन !फर भी बBच0 के !दल0 !दमाग म 5ान का भंडार भरने वाले िशक0 का आज भी उतना ह( महNव है जतना भी पुराने जमाने म था। माता-पता के बाद बBच0 को सह( िशा दे ने म िशक0 का महNवपूण ःथान है । िशक Rारा द( जाने वाली 5ान क जो र‹तार है . उनका आदर सNकार तो !दल से !कया जाता है । पर ठfक है इस बहाने ह( सह(. भावना.. और ू उBच वचार0 से जुड़े कम कर जीवन क ऊँचाइय0 पर ले जाते ह" । आज िशक !दवस है । इस !दन डॉ.

कृ ंण क तरह और भी नए बरले आते रह गे.. समाज.होता है जो व+ा म माHयम से आपके जीवन को रोशन करता है ऐसे म िशक0 के साथ !कया जाने वाले गलत ]यवहार के कारण शम से इं सािनयत क गद न झुक जाती है । हमार( दिनया म िशक एक महान मूित क तरह होता है पर कई बार छाऽ0 Rारा क गई अवांछनीय ु हरकत0 के कारण ऐसा ूतीत होता है जैसे िशक चौराहे पर लगी उपेत मूित के समान है । मूित बनने का सबसे बड़ा अिभशाप ह( यह है !क उसे उपेत होना पड़ता है । जस ूकार !कसी मूित का उ†घाटन केवल उसी !दन क शोभा होती है । उसी ूकार हम केवल एक !दन यानी '5 िसतंबर' को 'िशक !दवस' मनाने का ढ0ग रचकर िशक0 को उपेत करते है । असल म िशक0 का स/मान तो हर पल.. ! आज के युग म 5ान उपल{ध है हनर भी उपल{ध है ु !फर भी 5ान और हनर ु होने के बाद भी िशक0 क ज7रत आज भी है इस दे श को दिनया को ु िशक0 के सहयोग के बना संभव नह(ं है दे श को बदलना संभव नह(ं है इं सान0 को बदलना चाहे राम हो या रह(म अजुन  हो या कृ ंण सभी को थी ज7रत िशक0 क तभी तो इस दिनया म ु राम. वँव.. हर समय होना चा!हए ता!क हम 5ान का भंडार दे ने वाले उन िशक0 को हम सह( मायने म पूज सक। उनके Rारा !दए गए गुण0 को महण कर हम दे श. हमारे पा[रवारजन0 का सह( मायने म कज अदा कर पाएँगे। उ:ह सह( मायने म पूज पाएँगे। ऐसे महान िशक0 को िशक !दवस पर सभी क ओर से शत ् शत ् नमन. हर !दन. बनते रह गे .

जसे आज भी लोग ःवामी ववेकानंद और उनके गु रामकृ ंण परमहं स के नाम से याद करते ह" । ववेकानंद एक ऐसे िशंय थे ज:होने अपने गु से जीवन जीने का सह( तर(का सीखा। उ:होने अपने गु के !दखाए पथ पर चलते हए ु न जाने !कतने लोग0 के जीवन म ूेम. एक गु क या !फर एक पथूदशक क। गु और िशंय के बीच इस अनूठे बंधन को मजबूत करने के िलए अगर !कसी चीज़ क ज़7रत होती है तो वह है गु के ूित िशंय का वMास. उन सभी ने अपने गुओं के सा:नHय म ह( जीवनयापन के तय0 के बारे म जाना और उ:ह अपने जीवन म अपनाया। गु और िशंय के अनूठे [रँते क बात हो तो एकल]य और िोणाचाय का ज़ब होना ःवाभावक है ।एकल]य ने अपने गु िोणाचाय को गु दणा के 7प म अपना अँगूठा दे कर उनका मान रखा। उसने एक सBचा िशंय होने का कत]य िनभाया। यह( नह(ं इस अनुपम [रँते का एक उदाहरण और !दया जा सकता है . िन:ःवाथ सेवा और सNयता का द(पक ूhविलत !कया। इसके वपर(त हमारे कलयुग के बहत ु से िशंय और गु इस पवऽ बंधन को कलं!कत करने म कोई कसर नह(ं छोड़ते। आज आप चाहे कोई भी समाचार पऽ उठा ल. उसम इस तरह क अूय घटना का ज़ब ज़7र ह( होगा। .वह िशक जो हमेशा से अपने 5ान का उजयारा फहराए बाँट रहे ह" दिनया और दे श को ु िनत नए 5ानी। आज भी ज7रत है उन िशक0 क इस दे श और समाज को। गु और िशंय के बीच एक अनोखा [रँता होता है । गु एक घने वृ क तरह अपने िशंय को हर तरह से छाया ूदान करता है । चाहे वह एक पता क भूिमका हो. ौ_ा और स/मान। िशक !दवस एक ऐसा !दन है जब हम उन गुओं का ध:यवाद कर जो हम िशा ूदान कर हमारे जीवन म उजाला भर हम जीवन जीने के सह( तर(के से अवगत कराते ह" । अगर हम हमार( पौराणक कथाओं का ख कर तो हम गु और िशंय0 के [रँते के कई ऐसे उदाहरण िमल जाएँगे जो आज के समय म िमलना मुँकल ह" । हमारे पुराण0 म जतने भी महान लोग0 का वणन है .

सहपाठf. सNय का माग !दखाते ह" ।अगर वह( गु. गुओं को पाएगा। साथ बैठे सहकमW उसके सहपाठf ह" तो बॉस उसके गु और वह खुद अपने जूिनयस के िलए वह गु। य!द हम खेल के ेऽ म जाएँगे तो आपके कोच हमारे गु क भूिमका िनभाएँगे। संभव ह( नह(ं !क जीवन म कभी हम अपना छाऽ जीवन से नाता तोड़ ले। कभी भी कोई ]यr पूण नह(ं . 8य0!क माता-पता जीवन दे ते ह" और गु उस जीवन का सह( अथ समझाकर. िशंय0 के जीवन म अंधकार का कारण बन जाएँ तो कैसे कोई िशंय एकल]य और ववेकानंद बन पाएँगे। साथ ह( िशंय0 को भी यह नह(ं भूलना चा!हए !क गु का पद भगवान के समान होता है अत: वे पूण आदर और स/मान के अिधकार( ह" । इसिलए कबीर के इस दोहे को हमेशा याद रख‘गु गुर धोबी िसख साबू िसरजन हार सुरित िसला पर धोइये िनकसे hयोित अपार। अपार।’ गु श{द सुनते ह( हमारे मःतंक म छव बनती है उन िशक0 क जनसे हमने ःकूल या कॉलेज म िशा महण क ह" । इनके साथ ह( गु वो भी है जो जनसे हम कुछ न कुछ सीख िमले। !फर चाहे वह न:हा बBचा ह( 8य0 न हो। य!द वह भी हम भटकाव से सह( राह पर ले जाए तो वह भी हमारा गु ह( कहलाएगा। एकल]य और िोणाचाय जैसे गु-िशंय के कई उदाहरण हमारे सामने है । व+ाथW जीवन म ह( नह(ं ब‡क जीवन के हर पथ पर हम कोई न कोई ऐसा ]यr िमलता ह( है जो हमारे जीवन म एक सकाराNमक प[रवतन लाता है । सह( अथJ म दे ख तो हम हमारे दोःत0 से भी कुछ न कुछ सीखते ह" । घर म भाई-बहन0 से भी कुछ सीख िमलती है । तो वे भी हमारे गु ह( हए ु ना। वाःतव म आदमी हमेशा ह( छाऽ बना रहता है । वो नौकर(.गु का ःथान तो माता-पता से भी ऊँचा होता है . पेशा या धंधा कुछ भी करे । उसे हमेशा ह( अपनी 8लास.

मेरा बBचा पढ़ने म बहत ु कमजोर है । य!द आप इसे घर पर Yयूशन पढ़ा द तो बहत ु अBछा रहे गा।’ एक अिभभावक ने िशक से कहा। ‘ले!कन. हम समाज म रहते ह" और !कसी ेऽ या शहर का ूितिनिधNव करते ह" । 'अंदर से सहारा दे और बाहर मारे चोट'। जस ूकार कु/हार िमYट( के घड़े को मजबूत करने के िलए अंदर से सहारा दे कर ऊपर से चोट मारता है । उसी ूकार गु क भूिमका बहत ु ह( चुनौतीपूण होती है । उसे गु के साथ-साथ हमारे माता-पता क भूिमका भी िनभानी होती है । इन ज/मेदा[रय0 के साथ ह( हम िशत और संःकारवान बनाना भी गु क ज/मेदार( है । हम पर अपार कृ पा बरसाने वाले गु बदले म हमसे कुछ नह(ं चाहते ह" । उ:ह तो बस हमार( तर8क और खुशहाली चा!हए। उ:ह जब भी यह खबर लगेगी !क मेरा अमुक छाऽ आज इस मुकाम पर पहँु च गया है । तो उ:ह इसी खबर से सार( खुिशयाँ िमल जाएँगी ले!कन बदले म इ:ह हम 8या दे ते ह" । शायद पीठ पीछे पुकारने वाले !दए गए 'िनक नेम'। कई बार तो वाःतवक नाम याद करने के िलए !दमाग पर वशेष जोर डालना पड़ता है । बड़े ह( द:ु ख क बात है !क का के मेधावी छाऽ भी इस 'बीमार(' से बच नह(ं पाते। 8य0 पुकारते हो अपने गुओं को इन नाम0 से? एक बात हमेशा यह बात याद रख। गु आखर गु होते ह" । उनके ूित हमेशा आदर और ौ_ा का भाव रखए। जीवन म कभी भी उ:ह याद कर गे तो आNमक सुख िमलेगा। इस िशक !दवस पर इस छोटे से स/मान क अपेा तो छाऽ पीढ़( से क ह( जा सकती है । सर. मेरे पास समय नह(ं है । वैसे भी ःकूल म अित[रr का लगा रहे ह" ..होता। उसे !कसी न !कसी से.. वहाँ भेज दे ना।’ ‘परं तु सर. या घर का कोई सदःय कह(ं परे शानी म फँसा है । तो हम भी यह(ं चाह गे !क कोई हमार( मदद को आ जाए तो मुँकल आसान हो जाए। ऐसे सहयोगपूण माहौल म मुँकल-मुँकल नह(ं रहतीं। तभी तो हम कह सकते ह" !क हाँ.. कह(ं न कह(ं कुछ न कुछ सीखना पड़ता है । कभी आपक संतान. पŽी.. िमऽ या सड़क चलता कोई भी आदमी भी आपके िलए गु क भूिमका िनभाते ह" । एकल]य और िोणाचाय जैसे गु-िशंय के कई उदाहरण हमारे सामने है । व+ाथW जीवन म ह( नह(ं ब‡क जीवन के हर पथ पर हम कोई न कोई ऐसा ]यr िमलता ह( है जो हमारे जीवन म एक सकाराNमक प[रवतन लाता है . कल सड़क पर दे खा एक बुजुग !कसी कोिचंग जा रह( लड़क क मदद कर रहे थे। लड़क क गाड़( का पेशोल खNम हो गया था। उसे अपनी मदद से पेशोल पंप तक पहँु चाने क कोिशश कर रहे थे। उनसे भी कुछ सीखने को िमला। मुँकल म पड़े ]यr क मदद करने का ज़hबा। आज कभी हम परे शानी म ह0. म" चाहता हँू !क आप केवल इसे ह( समय िनकालकर पढ़ाएँ। आपका आशीवाद िमलेगा तो अBछा पढ़ जाएगा।’ िशक ने ःवीकृ ित दे द(। बBचा ूित!दन जाने लगा। ःकूल म भी वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा। अBछे नंबर0 से पास हो गया। अिभभावक ने !दल खोलकर िशक क तार(फ क और उिचत .

हम आपको एक क दे दे ते ह" . उसी म बBच0 को पढ़ाओ। हम अBछf दणा द गे। िशक का भी अपना प[रवार होता है । उसके भी अरमान होते ह" । माता-पता.दणा द(। िशक क पढ़ाई क चचा होने लगी। अगले सऽ म और भी अिभभावक आ गए अपने बBच0 को लेकर। कहा.Yयूशन नह(ं आओगे तो फेल कर दँ ग ू ा। यानी तरहतरह के इ‡जाम िशक0 पर लगने लगे। उस ईमानदार आहत िशक ने ऐलान कर !दया !क म" Yयूशन नह(ं पढ़ाऊँगा। अिभभावक िनवेदन करने लगे !क आप दिनया क बात0 पर न जाएँ। बBच0 को पढ़ाएँ। मजबूर िशक !फर ु शु7 हो गए। इसे दे ख अ:य िशक0 के पास भी बBच0 का मेला लगने लगा। ले!कन समाज के कितपय लोग0 को िशक0 का इस ूकार 5ान बाँटना ‘धंधा’ लगने लगा। .और शु7 हो गया िशक0 को बदनाम करने का िसलिसला। समय आगे बढ़ता गया। और इसके साथ-साथ िशक श{द क ग[रमा पर महण लगता चला गया। इन सबके पीछे कितपय ःवाथW तNव0 और सरकार0 का भी कम योगदान नह(ं रहा। िशक0 से अनेक गैरिशकय काय करवाए जाने लगे। उनक िनगरानी के िलए दत ू िनयुr होने लगे। थोड़( सी चूक होने पर राई का पहाड़ बनने लगा। िशक व+ालय म कम !दखने लगे और चचा म hयादा। नतीजा शासकय ःकूल0 म पढ़ाई का औसत िगरने लगा। बBच0 क असफलता को िशक क लापरवाह( माना जाने लगा। िशक0 के साथ द]य ु वहार क बाढ़ आने लगी। आए !दन इसके उदाहरण q`गोचर होते ह" । इस ूकार क हालत के चलते उधर एक नया संसार भी बनने लगा। . पुऽ-पुऽयाँ उसके भी होते ह" । अपनी मह(ने क सरकार( तन|वाह को याद कर िशक ने भरे -पूरे प[रवार क बेहतर परव[रश के िलए ूःताव ःवीकार कर िलया। कुछ !दन बाद बBच0 क सं|या म बढ़ोतर( होने लगी। िशक पूरे मनोयोग से उ:ह पढ़ाते। ःकूल म भी उ:ह0ने पयाO समय !दया। ले!कन कहते ह" !क !कसी क लोकूयता सबको नह(ं सुहाती। िशक के साथ भी ऐसा ह( हआ। वरोधी ु स!बय हो गए। अखबार0 म छप गया. भाई-बहन... एक !दन केवल एक !दन िशक क इhजत करने से अपना कत]य पूरा नह(ं हो जाता। आज के !दन हम संक‡प ल !क िशक को उसक खोई ग[रमा लौटाने के िलए कुछ ऐसा कर !क हमारे पूजनीय गुजन कह उठ !क िशंय ह0 तो ऐसे। .. गली-गली िनजी ःकूल नजर आ रहे ह" । उनम ‘िशक’ क हालत बहत ु दयनीय नजर आती है । कहाँ से कहाँ आ गया िशक। यह सोचनीय है । आज िशक !दवस है । ःकूल0 म बBचे िशक0 के िलए तरह-तरह के िग‹ट लाएँगे। उनक शान म दो-चार श{द कहे जाएँगे और शाम होते-होते िशक को आम बना द गे। दोःत0..जगह-जगह िनजी ःकूल खुलने लगे। वतमान म हालत यह हो गई !क गाँव-गाँव.Yयूशनखोर िशक। ःकूल म पढ़ाते नह(ं और घर बुलाते ह" बBच0 को। कह(ं-कह(ं तो पढ़ने म आया !क िशक ने कहा.

अतः 5ान क ूािO के िलए गु का होना परम आवँयक माना गया है । उवरायुr पा[रवा[रक धरातल पर िशक संःका[रत 5ान क फसल बोता है और ःवBछ एवं ःवःथ ेऽीय वातावरणीय जलवायु म ौेiता 7पी नाग[रक क उ:नत उपज दे ता है । इस q` म िशक संःकार0 का पोषक है । सह( अथJ म राt क संःकृ ित का कुशल िश‡पी है .'गु गु बनु 5ान कहाँ जग माह(' माह( 'अHयापक राt क संःकृ ित के चतुर माली होते ह" । वे संःकार0 क जड़0 म खाद दे ते ह" और अपने ौम से उ:ह सींचकर शr म िनिमत करते ह" ।' महष अरवंद का उr कथन िशक क ग[रमा के सवथा अनुकूल ह( है । िशक राt िनमाता है और राt के िनमाण क ूNयेक ू!बया म िशकय महNव को नकारा नह(ं जा सकता । महाकव तुलसीदास 'गु बनु 5ान कहाँ जग माह(' अथात बना गु के 5ान ूाO नह(ं होता. जो संग!ठत. ॅातृNव भाव. संःकारवान. नैितकता. सुस~य और ःवBछ-ःवःथ समाज का िनमाण करने का सामय रखते ह" । संःकृ ित का उम ह( ौेi संःकार0के गभ से होता है . उनक बु_ पर ूहार करते हए ु तथा उ:ह समझाइश दे ते हए ु कबीरदास ने कहा है - कबीरा ते नर अंध ह" . समाज एवं राt को गौरवा:वत करते ह" । उFम िशा. गु 7ठे नह(ं ठौर॥ . योQय िशक और अनुशािसत िशाथW ह( संःका[रत. उदारता. धैयव  ान. अनुशासन जैसे चा[रऽक सण0 क सम` गु के माHयम से ह( संभव होती है । ु समाज-जीवन म ःनेह एवं स‘ाव तथा सामंजःय क स†ूेरणा गु से ह( ूाO होती है 8य0!क िशा का मूल उ’े ँय ह( च[रऽ िनमाण करना है । िशक िशा के माHयम से व+ािथय0 के सवा“गीण वकास का हरसंभव ूयास करता है । िशक को एक ऐसा द(पक माना गया है जो सेवापय“त द(Oमान रहते हए ु व+ािथय0 के ूगितपथ को अपने 5ान का आलोक ूदान करता रहता है । जो लोग गु क महFा को अःवीकार करते ह" या उसे कमतर आँकते ह" . जो िशाथW को िशा के उhhवल प0 से जोड़ता है । संःका[रत िशाथW िशा के उपवन को अपने 5ान-पुंप क सुरिभ से महकाते ह" तथा प[रवार. जससे सामाजक गितविधय0 को सांःकृ ितक शr का संबल ूाO होता है । राt िनमाण क ू!बया म िशक क भूिमका का कोई सानी नह(ं है । व+ािथय0 म ःनेह. ववेकवान युवा शr का िनमाण करता है । िशक संःकृ ित से तादाN/य ःथापत कर िशाथW म 5ान के ग[रमामय प का बीजारोपण करता है । फलःव7प िशाथW म िशा के ूित गहन अिभिच जामत होती है । िशक वह सेतु है . गु को कहते और। ह[र 7ठे गु ठौर है . स‘ाव.

5ानयोग. भावनामय. उससे एक !दन ऐसा आ जाएगा जब समूचा ॄ„ांड 5ान के सम छोटा लगेगा। 5ान ने जस ूकार कम के साथ समझौता !कया है . काम यानी कम और कामना से युr. उससे लगता है !क 5ान और कम क िशा आज के समय म जंदा रहने क अिनवायता बन गई है । ले!कन रोता तो 5ानी भी है और कमवाद( भी। भावना तो 5ानी के पास भी होती है और कम के ूतीक बड़े से बड़े इं जीिनयर. िगजुभाई और वनोबा इनम से कोई पेशेवर िशक नह(ं था ले!कन िशा म जो वचार इ:ह0ने !दया. जैसे आजाद( के बाद क हमार( पूर( तालीम !कसी ताबूत म रखी ममी के समान है । उ:नीसवीं और बीसवीं सद( म जो बड़े -बड़े नाम िशक0 के हमारे पास थे. वंणु के 7प म पालनकता और िशव के 7प म :यायकता माना गया है . जो कत]यपथ क स†ूेरणा ूदान कर िशंय को परमौेi क ओर ूवृF करता है । महाकव सूयक  ांत ऽपाठf 'िनराला' का यह कथन !क 'गु के आसन पर मनुंय नह(ं. ठfक जीवन क तरह गितशील. ःवयं परमाNमा आसीन है ' गु के महNव को ह( ूितपा!दत करता है । िशक मूित नह(ं मूितकार है िशक क बनाई मूित न पNथर क होगी. जो ूयोग इ:ह0ने !कए. तो !फर भावना और संभावना क िशा कौन दे गा? मनोव5ान कहता है !क मनुंय के जीवन के तीन योग होते ह" या उ:ह तीन आयाम या प[रेऽ कहा जाता है .5ान का प[रेऽ. कम को ौम और संघष म बदला है . न टे रेकोटा क. गुवंणु. तब जाकर वह कह सकेगा !क उसने 5ान को आनंद और ूेम म बदला है . न िसरे िम8स क. गुदm वो महे Mरः। गुसाात ् परमॄ„. न लकड़( आ!द क। उसक मूित तो जीवन क मूित होगी. संभावनाओं से जुड़(. तःमै ौी गुवैनमः॥ गु को ॄ„ा के 7प म सृजनकता. डॉ8टर या तकनीककमW और ूौ+ोिगककमW के पास भी। हमारे तमाम िशक जब 5ान और कम क िशा म ःकूल से लेकर वशेष संःथान0 और वMव+ालय0 तक जुड़े ह" . भावना का प[रेऽ और कम का प[रेऽ। गीता म हमारे यहाँ इ:ह तीन योग कहा गया है . भrयोग और कमयोग। य!द सबकुछ 5ान ह( 5ान हो गया और सब उ_व ह( उ_व हो गए तो कृ ंण कौन होगा? सबकुछ कम ह( कम हो गया या कम . गाँधी. उतना बड़ा एक भी नाम आज नह(ं है । रवी:िनाथ.गु 7प म परमॄ„ परमेMर क ह( वंदना क जाती है - गुॄ„ा. उपल{ध को सुख और संतोष म बदला है । ऐसा लगता है . उनसे ये इतने बड़े िशक बन गए !क पेशेवर िशक भी इनके आगे बौना नजर आने लगा। कहा जाता है !क 5ान क जो र‹तार है .

उससे यह तो जा!हर हआ है !क िशा का संःथागत मॉडल पट गया है और ःकूल से लेकर ु वMव+ालय तक अूासंिगक-से लगने लगे ह" । सीखने-िसखाने के माHयम पर क/=यूटर के हे डःटाट हावी ह" । अब बBचे. सरकार और बBच0 ने ःवीकारा हआ ु है । वह िशा दे ने का सवािधक ौेi और वMसनीय ःथल माना गया है । भले ह( हमारे पुरातन आौम0 क तरह न हो. कणा. न लकड़( आ!द क। उसक मूित तो जीवन क मूित होगी. कठोर. उपेत होता है और अंततः उसे चौराहे क !कसी भी उपेत मूित का दभा ु Qय ह( भोगना होता है । उसका काम है !क वह एक मूितकार क तरह उभरे . वह भी आम मूितकार क तरह नह(ं। िशक क बनाई मूित न पNथर क होगी. सुख-दःख ु . स‘ाव. न िसरे िम8स क. काम यानी कम और कामना से युr. मकतब या चबूतरा-ःकूल क तरह. बूरता और कठोरता का ूतीक जैसा माना जाता रहा है । !फर भी भौितक 7प से हमारे सामने ःकूल है जसेसमाज.मा आ!द अनेक मू‡य समाO नह(ं हो जाएँगे और मनुंय एक ऐसे बूर और !हं सक पशुलोक का िनवासी नह(ं हो जाएगा. समाज भी बहत ु हद तक अqँय है । अगर qँय ह" तो दो लोग : बBचे और िशक। ःकूल के यथाथ को झुठलाया नह(ं जा सकता। !कतना भी अम. न मं!दर. तो वह अपिशा का माHयम 8य0 हो? वह मरा हआ 8य0 माना जाए? उसक नई मूित कौन गढ़े गा? िशक ह( वह काम कर सकता है । ु अब िशक 5ान क चुनौती और हनर क िचंता के सामने खड़ा है । िशा ने दिनयाभर म जो वातावरण ु ु रचा है . न टे रेकोटा क. वनॆता. मगर ःकूल है और वह रहे गा। जब ःकूल है . !कशोर या युवक केवल ःकूल या िशक से ह( नह(ं सीखते. अब तो वे मशीन0 से बात करते ह" . मगर कैसा भी हो वह भौितक और मानिसक 7प से हमारे बीच उपःथत है । इस ःकूल के पीछे क ]यवःथा यानी सरकार अqँय है . तब जाकर वह कह सकेगा !क उसने 5ान को आनंद और ूेम म बदला है .के योग को कुशलता से साध लेना ह( योग कहलाने लगा तो जीवन-मरण. जसम िशा बहराtीय बाजार क बड़( मंड( ु बनती जा रह( है । . संभावनाओं से जुड़(. कम को ौम और संघष म बदला है . उपल{ध को सुख और संतोष म बदला है । आजाद( के बाद का िशक कई श{द0 के सह( अथ भूल गया है । वैसे तो 'ःकूल' श{द बहत ु अBछा नह(ं माना जाता है 8य0!क वह भी !कसी न !कसी ूकार क जड़ता. ु ले!कन अ8सर वह चौराहे पर लगी उपेत मूित के समान होता है । मूित बनने का सबसे बड़ा अिभशाप ह( यह है !क उसे उपेत होना पड़ता है । वह केवल उ–ाटन !दवस0 क शोभा होती है । इसिलए कोई िशक अगर मूित बनने क कोिशश करता है तो वह जड़ हो जाता है . जड़ या िशा के िलए ूितकूल हो. ोभ और ेम जैसे संवेदन0 से कौन जोड़े गा? 8या ऐसे म दया. उ:ह आदे श दे ते ह" और उनसे अपना हर ह8म मनवा लेते ह" । मनुंय पर मशीन हावी है । िशा का ु भूमंडलीकरण एक ूकार का भूमंड(करण बनकर आ गया है . 7खा. भावनामय. जहाँ 5ान और कम होने के बावजूद भावना के अभाव म जीवन क समःत आनंददायी संभावनाएँ समाO हो जाएँगी? इस ू€ पर कौन िशक या िशाशा•ी वचार करे गा? हमार( दिनया म िशक एक महान मूित क तरह होता है जसक पूजा क जा सकती है समय-समय पर. ठfक जीवन क तरह गितशील.

जीवंत और गितवान मूितकार बनने का ौेय िशक को ह( िमलेगा। अब िशक यह ःवयं सोचे !क उसे मूित बनना है या मूितकार? समाज क आधारिशला िशक आधुिनक युग म िशक क भूिमका महNवपूण है । िशक वह पथ ूदशक होता है जो हम !कताबी 5ान ह( नह(ं ब‡क जीवन जीने क कला िसखाता है । भारतीय संःकृ ित म िशक को दो ःव7प0 म दे खा जाता है । ज:ह आHयाNमक गु और लौ!कक गु के 7प म प[रभाषत !कया गया है । चूँ!क बात िशक !दवस के ूसंग से जुड़( है इसिलए यहाँ लौ!कक ःव7प म िशक के बारे म चचा करना ूासंिगक है । िशक को मौजूदा प[रूेआय म एक अHयापक के 7प म ह( दे खा जाता है । य+प सामाजक ]यवःथा म यह( उसक सेवा है इसिलए िशक को अHयापक तक ह( सीिमत कर !दया गया है जब!क इसे ]यापक अथJ म दे खा जाना चा!हए। कहते ह" य!द जीवन म िशक नह(ं हो तो 'िशण' संभव नह(ं है । िशण का शा{दक अथ 'िशा दे न'े से है ले!कन इसक आधारिशला िशक रखता है । िशक का दजा समाज म हमेशा से ह( पूhयनीय रहा है 8य0!क उ:ह 'गु' कहा जाता है ले!कन अब जब!क सामाजक ]यवःथाओं का ःव7प बदल गया है इसिलए ू िशक भी इस प[रवतन से अछता नह(ं रहा है । आज िशक कह(ं ूोफेसर सभरवाल के 7प म अपने िशंय0 से पूजा नह(ं जाता ब‡क जीवन से हाथ धोता है तो कह(ं 'लव गु' होकर समाज म ितरःकृ त होता है । यह न तो िशक के िलए हमारा ग[रमापूण आचरण है और न ह( िशक का स/मानजनक आचरण। िशक जब 5ान ूदाता है तो उसक िशाएँ समाज के िलए अनुकरणीय है । अब सवाल यह है !क हम समाज क नींव रखने वाले इस ]यrNव को शनै:-शनै: वःमृत 8य0 करते जा रहे ह" । हमार( यह( कमजोर( . ःवाथ ह" और ये सब मानवीय भावना और संवेदना से जुड़े ह" । 8या इसे हम िशा क नई संभावना क तरह नह(ं दे ख सकते? अगर हमने भावनाओं क सह( िशा दे द(. मनुंय का सह( मूितकार. कYटरता है .िगजुभाई ने यह कोिशश अपने ढं ग से क थी। ताराबेन मोडक ने भी क थी। रवी:िनाथ. गाँधी. उनके जा!हर होने क भी और उन पर संयम या िनयंऽण क भी. नफरत ह" . तो मनुंय को बेहतर मनुंय बनाने. जाितवाद और वगवाद है . हनर का ]यापार है । जब 5ान और हनर दोन0 का ]यापार ु ु है तो भावना का 8या कर ? भावना से !कन संभावनाओं क खोज कर ? हमारे सामने आतंकवाद है . दं गे-फसाद ह" . सांूदाियकता है . वनोबा और जा!कर हसै ु न साहब ने अपने ढं ग से क। ले!कन ःकूल क मूित बदलने या नई बनाने के पहले िशक को अपनी मूित से मुr होना होगा। अब िशक क ज7रत है कहाँ? 5ान उपल{ध है .

एक बेजोड़ िमसाल है । . जो 5ान-पपासा क hयोित को बुझने से बचा सकती है । !हटलर के यातना िशवर से जान बचाकर लौटे हए ु एक अमे[रक ःकूल के ूाचाय ने अपने िशक0 के नाम पऽ िलखकर बताया !क 'िशवर0 म जो कुछ म"ने अपनी आँख0 से दे खा. आपके िलए ऽे{ली:का जाना ज7र( नह(ं है '. जब तक !क वे हमारे बBच0 को 'अBछा मनुंय' बनाने म सहायता करते ह" ।' यातना िशवर का दसरा िशकार अनाथ बBच0 को पढ़ाने वाला एक उBच मानवीय सरोकार0 से ओतूोत ू डॉ8टर (िच!कNसक) है । 'हम जानते ह" आप अBछे डॉ8टर ह" . गेःटापो के एक अफसर ने उससे कहा। 'म" अपने ईमान का सौदा नह(ं करता' यह यानुश कोचाक का जवाब था। यानुश कोचाक पौल"ड क वतमान राजधानी वारसा क यहद( ू बःती के अनाथालय म बBच0 का पालन और िशण करते थे। !हटलर के द[र:द0 ने इन अभागे बBच0 को ऽे{ली:का मृNयु िशवर क भYटय0 म झ0कने का फैसला करिलया था। जब यानुश कोचाक से यह पूछा गया !क वे 8या चुनगे : 'बBच0 के बना जंदगी या बBच0 के साथ मौत?' तो कोचाक ने बना !हचक और दवधा के तुरंत कहा !क वे 'बBच0 के साथ ु मौत' को ह( चुनगे। नैितक स˜दय के धनी यानुश कोचाक ने वीरोिचत भाव से मौत का आिलंगन इसिलए !कया था !क वे जीवन के अंितम ण तक सBचे िशक क तरह बBच0 के साथ रहकर उ:ह धीरज बँधाते रह । कह(ं बBचे घबरा न जाएँ और उनके न:हे एवं कोमल ˆदय0 म मौत के इं तजार काकाला डर समा न जाए। यानुश कोचाक का नैितक बल और अंतःकरण क अन:य िनमलता आज के िशक के िलए ूेरणा ह( नह(ं.आज हमारे िलए घातक िस_ हो रह( है । जहाँ से हम 5ान िमलता है . म" िशा को संदेह क नजर0 से दे खने लगा हँू । आपसे मेर( ूाथना है !क आप अपने छाऽ0 को 'मनुंय' बनाने म सहायक बन। आपके ूयास ऐसे ह0 !क कोई भी िशाथW 'िशत दानव' नह(ं बने। पढ़ना-िलखना और िगनना तभी तक साथक है .'=यारे िशक0. वह !कसी को नह(ं दे खना चा!हए। वहाँ के गैस च"बस वRान इं जीिनयर0 ने बनाए थे। बBच0 को जहर दे ने वाले लोग सुिशत िच!कNसक थे। म!हलाओं और बBच0 को गोिलय0 से भूनने वाले कॉलेज म उBच िशा ूाO ःनातक थे। इसिलए. उससे िशा को लेकर मेरा मन गंभीर संदेह से भर गया।' ूाचाय ने पऽ म िलखा. !फर चाहे वह लौ!कक हो या आHयाNमक। हम हमेशा ह( उसका आदर करना चा!हए। सBचे िशक म एक माँ क वNसलता होती है 5ान के दग ु म माग पर अमसर होते रहने क चेतना और अनुभूित के समय य!द िशक का हाथ छाऽ क पीठ पर है तो सफलता उसे पास ह( खड़( हई ु !दखाई दे ती है । िशक का यह ूोNसाहन ह( वह ूाणवायु है . म" एक यातना िशवर से जैस-े तैसे जीवत बचकर आने वाला ]यr हँू । वहाँ म"ने जो कुछ दे खा.

उसका सबसे िनणायक लण है बBच0 से गहरा लगाव. उनके ˆदय को िनरं तर झकझोरा नह(ं जाना चा!हए। बBच0 को थोड़(-सी बात ह( बताइए. बBचा अपने िशक ू म इं सािनयत का कैसा आदश दे खता है . उसक जो वलण िशण-संःकृ ित होनी चा!हए. उनके ूित माता जैसी अनुरr और आसr। िशक के िलए आवँयक अनेक गुण0 म सबसे पहला है बालक के अंतःकरण के ःतर तक ऊँचा उठना. आNमसात करलेने पर अHयापक वाःतव म 'सBचा िशक' बन जाता है । ऐसा िशक जो बाल-आNमा को सदš. उसके मन क दिनया म पैठने क मता ह( ]यr को उBच को!ट का िशक बनाती है । िशक बनने वाले ]यr ु को यह कभी नह(ं भूलना चा!हए !क वह खुद भी कभी बBचा और !कशोर था। यानुश कोचाक ने पोिलश भाषा म छपी मटमैले आवरण वाली अपनी छोट(-सी पुःतक : जब म" !फर छोटा हो जाऊँगा म भावना से भींगे ऐसे तमाम वचार ूःतुत !कए ह" . hवाला के मास बनते समय.पछले !दन0 कुंभकोणम के एक ःकूल म सुरा ]यवःथा के अभाव म लगभग सौ बBचे आग का ™धन बन गए। ूNयदिशय0 ने बताया !क आग क लपट0 से बचने के िलए द(वार पर चढ़ने क कोिशश म कुछ बBच0 ने अपने नाखून तोड़ िलए और उनक अँगुिलयाँ लहलु ू हान हो ग™। संचालक0 और िशक0 क लापरवाह( तथा िनममता के िशकार वे बBचे. उनके मन-मःतंक म अपने िशक0 क छब और ःमृित !कतनी बूर एवं दाहक रह( होगी? 8या उनके िशक0 को बBच0 से वमुख होकर पलायन करने के बजाए यानुश कोचाक क तरह उनके पास नह(ं होना था? 8या मृNयु के काले डर से उनक रा करते हए ु उ:ह उनके साथ ःवाहा नह(ं हो जाना था? बBच0 के बना जीवत रहकर. ले!कन इस तरह!क वे इसम नैितक मू‡य0 का स˜दय दे ख ल। बBच0 के मनोमःतंक म जो भावनाओं और वचार0 का बवंडर उठता है . ज:ह समझ लेने पर. न !क उसे कृ पा-q` से दे खना। बBचे के आंत[रक जगत म. उस पर उ:ह सोचने द(जए। बBच0 के ˆदय म बात उतर जाने द(जए।' िशक का उतावलापन बBच0 को अपनी शr आजमाने के एहसास और आNमवMास सेवंिचत कर दे ता है । आNमस/मान क भावना कुचल दे ने से अिधक अनैितक बात भला और 8या हो सकती है ? 5ान ूािO क ू!बया म मानव ग[रमा और गव क अनुभूित करना ूNयेक छाऽ का ज:मिस_ अिधकार है । िशक का काम छाऽ0 को केवल प[रवेश और दिनया का 5ान ूदान करना नह(ं है । बBच0 या छाऽ0 को ु यह एहसास भी कराया जाना चा!हए !क वे इस संसार के रचियता. सृजनकता ह" । िशक केवल दरवाजा . च[रऽ िनमाण के वे बुिनयाद( और ज!टल िनयम.ये ह( ह" िशण के. गमW. आँधी-तूफान तथा आतंक-अNयाचार से बचाने के िलए ःने!हल सुरा ूदान कर सके और इस ूकार आNमस/मानपूवक  अपनी लड़ाई ःवयं लड़ने के िलए उसे समथ बना सके। 7सी िशाव› वसीली सुखो/ली:ःक कहते ह" !क 'बBच0 को सब कुछ नह(ं बताया जा सकता। न:हे बBच0 पर िचऽ0 और ब/ब0 क तैयार( क बौछार नह(ं क जानी चा!हए. िशक और िशाथW का एक-दसरे !कतनी अटट पर !कतना वMास है . जो आज भी ूेरक और ूासंिगक ह" । बBच0 के जीवन म ूाथिमक काओं के िशक0 क भूिमका इतनी आNमीय और वशद है !क उसक तुलना केवल माता क वNसलता से ह( क जा सकती है । बBच0 के साथ िशक का ःनेह िनंकपट होने के साथ-साथ उसम माता-पता क वांछनीय स|ती और qढ़ता भी होनी चा!हए। न:हा छाऽ अHयापक म ू आःथा रखता है . 8या कुंभकोणम के िशक0 ने िशक जाित के मःतक पर कलंक का ट(का नह(ं लगा !दया है ? कहा गया है !क 'सBचा िशक' बनने के िलए मनुंय का जो आNमक ःतर होना चा!हए.

खोलता है . य!द िशक उसक अिभलाषा को अनदे खा करता है तो इसका आशय यह( होगा !क िशक अपने छाऽ0 के वतमान और भवंय के ूित एक नैितक उ‡लास और दाियNव से [रr है । 5ान के दग ु म माग पर अमसर होते रहने क चेतना और अनुभूित के समय य!द िशक का हाथ छाऽ क पीठ पर है तो सफलता उसे पास ह( खड़( हई ु !दखाई दे ती है । िशक का यह ूोNसाहन ह( वह ूाणवायु है . 5ान के माग पर तो हर कदम ःवयं बBचे ह( उठाते ह" । बौ_क ौम एक िनतांत ]यrगत ू!बया है . जो बBच0 क दिनया को आलो!कत करती है । यह hयोित कटता या ु उदासीनता के जरा-से झ0के से बुझ सकती है । बBचा असीम वMास के साथ िशक के पास आता है . जो सामा:यतः !दखाई नह(ं दे ती। बBचा यह कभी सहन नह(ं कर सकता !क कोई उसे आलसी या िनक/मा समझे।अBछf तरह पढ़ने क उसक इBछा ु उस hयोित के समान होती है . ूवेश तो ःवयं छाऽ0 को ह( करना चा!हए। िशा चाहे समूह म संप:ना होती हो. जो न केवल छाऽ क योQयता ब‡क उसके चा[रऽक झान0 तथा अ:य ऐसी बहत ु -सी प[रःथितय0 पर भी िनभर करती है . जो 5ान-पपासा क hयोित को बुझने से बचा सकती है । .

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