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Hindi poems by Nagarjun

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Hindi poems by Nagarjun : Gulaabi churiyaa and Baadal ko girte dekha hain
Hindi poems by Nagarjun : Gulaabi churiyaa and Baadal ko girte dekha hain

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05/09/2014

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गुलाबी चूिड़याँ

ूाइवेट बस का साइवर है तो क्या हआ, ु सात साल की बच्ची का िपता तो है ! सामने िगयर से उपर हक से लटका रक्खी हैं ु

काँच की चार चूिड़याँ गुलाबी बस की रझतार क मुतािबक े िहलती रहती हैं … झुककर मैंने पूछ िलया खा गया मानो झटका अधेड़ उॆ का मुच्छड़ रोबीला चेहरा आिहःते से बोला: हाँ सा’ब टाँगे हए है कई िदनों से ु अपनी अमानत लाख कहता हँू नहीं मानती मुिनया

यहाँ अब्बा की नज़रों क सामने े मैं भी सोचता हँू क्या िबगाड़ती हैं चूिड़याँ

िकस ज़ुमर् पे हटा दँ ू इनको यहाँ से? और साइवर ने एक नज़र मुझे दे खा और मैंने एक नज़र उसे दे खा

छलक रहा था दिधया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में ू तरलता हावी थी सीधे-साधे ूश्न पर

और अब वे िनगाहें िफर से हो गईं सड़क की ओर और मैंने झुककर कहा हाँ भाई, मैं भी िपता हँू

वो तो बस यूँ ही पूछ िलया आपसे वनार् िकसे नहीं भाएँगी? नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूिड़याँ!

बादल को िघरते दे खा है
अमल धवल िगिर क िशखरों पर, े बादल को िघरते दे खा है । छोटे -छोटे मोती जैसे

उसक शीतल तुिहन कणों को, े मानसरोवर क उन ःविणर्म े कमलों पर िगरते दे खा है , बादल को िघरते दे खा है । तुंग िहमालय क कधों पर े ं छोटी बड़ी कई झीलें हैं , उनक ँयामल नील सिलल में े समतल दे शों ले आ-आकर ितक्त-मधुर िबसतंतु खोजते हं सों को ितरते दे खा है । बादल को िघरते दे खा है । पावस की उमस से आकल ु

ऋतु वसंत का सुूभात था

मंद-मंद था अिनल बह रहा बालारुण की मृद ु िकरणें थीं एक-दसरे से िवरिहत हो ू सारी रात िबतानी होती, अगल-बगल ःवणार्भ िशखर थे अलग-अलग रहकर ही िजनको िनशा-काल से िचर-अिभशािपत बेबस उस चकवा-चकई का उस महान ् सरवर क तीरे े शैवालों की हरी दरी पर बंद हआ बदन, िफर उनमें ं ु

ूणय-कलह िछड़ते दे खा है । बादल को िघरते दे खा है । दगर्म बफार्नी घाटी में ु

शत-सहॐ फट ऊचाई पर ु ँ

अलख नािभ से उठने वाले क पीछे धािवत हो-होकर े

िनज क ही उन्मादक पिरमले तरल-तरुण कःतूरी मृग को अपने पर िचढ़ते दे खा है , बादल को िघरते दे खा है ।

कहाँ गय धनपित कबेर वह ु कहाँ गई उसकी वह अलका नहीं िठकाना कािलदास क े व्योम-ूवाही गंगाजल का, मेघदत का पता कहीं पर, ू

ढँू ढ़ा बहत िकन्तु लगा क्या ु कौन बताए वह छायामय

बरस पड़ा होगा न यहीं पर, मैंने तो भीषण जाड़ों में

जाने दो वह किव-किल्पत था, नभ-चुंबी कलाश शीषर् पर, ै महामेघ को झंझािनल से गरज-गरज िभड़ते दे खा है , बादल को िघरते दे खा है । शत-शत िनझर्र-िनझर्रणी कल मुखिरत दे वदारु कनन में, छाई हई कटी क भीतर, ु े ु रं ग-िबरं गे और सुगंिधत इं िनील की माला डाले शोिणत धवल भोज पऽों से

फलों की कतल को साजे, ू ुं शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, कानों में कवलय लटकाए, ु

शतदल लाल कमल वेणी में, पान पाऽ िाक्षासव पूिरत रखे सामने अपने-अपने

रजत-रिचत मिण खिचत कलामय

लोिहत चंदन की िऽपटी पर, नरम िनदाग बाल कःतूरी मृगछालों पर पलथी मारे

मिदरारुण आखों वाले उन

उन्मद िकन्नर-िकन्निरयों की मृदल मनोरम अँगुिलयों को ु वंशी पर िफरते दे खा है । बादल को िघरते दे खा है ।

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