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जैसे सूयज की गभी से जरते हुए तन को मभर जामे तरुवय कक छामा ऐसा ही सुख भेये भन को मभरा है

भैं जफसे शयण तेयी आमा, भेये याभ बटका हुआ भेया भन था कोई मभर ना यहा था सहाया रहयों से रड़ती हुई नाव को

जैसे मभर ना यहा हो ककनाया, मभर ना यहा हो ककनाया उस रड़खड़ाती हुई नाव को जो ककसी ने ककनाया ददखामा ऐसा ही सुख ... शीतर फने आग चंदन क जैसी े याघव कृऩा हो जो तेयी उजजमारी ऩनभ की हो जाएं यातें ू मुग मुग से प्मासी भरुबूमभ ने जैसे सावन का संदेस ऩामा ऐसा ही सुख ... जजस याह की भंज़िर तेया मभरन हो उस ऩय कदभ भैं फढाऊ ं परों भें खायों भें , ऩतझड़ फहायों भें ू ऩानी क प्मासे को तक़दीय ने े जैसे जी बय क अभत पऩरामा े ृ ऐसा ही सख ... ु भैं न कबी डगभगाऊ, भैं न कबी डगभगाऊ ं ं

जो थीं अभावस अंधेयी, जो थीं अभावस अंधेयी