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डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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छत्तीसगढ़ की पूर्व
ररयासतें
और
जमीन्दाररयााँ
(ISBN: 81-89244-96-5, र्ैभर् प्रकाशन, रायपुर)

- डा.संजय ऄलंग

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ऄनुक्रमणणका

छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ
एक- ररयासतें
छत्तीसगढ़ में सम्मणलत पूर्व ररयासतें

नागपुर जमीन्दारी की छत्तीसगढ़ जमीन्दारी
बस्तर
कााँकेर
कर्धाव

नागपुर जमीन्दारी की खलारी जमीन्दारी

(राज)नााँदगााँर्
खैरागढ़
छु इखदान

सम्बलपुर गढ़जात
रायगढ़
सारं गढ़
सणि

णसरगुजा या झारखण्ड़ या छोटा (चुरटया )नागपुर समूह
सरगुजा
ईदयपुर
जशपुर
कोररया
चााँगभखार
दो- जमीन्दाररयााँ
छत्तीसगढ़ की जमीन्दाररयााँ

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ईपरोड़ा
के न्दा
कोरर्ा
कं तेली (मदनपुर)
चाम्पा
छु री
माणतन
पेण्ड़रा
पंड़ररया
लाफा
णर्द्रानर्ागढ़
देर्री
फफगेश्वर
कटगी
कौणड़या
खररयार
भटगााँर्
णबलाइगढ़
नराव
फु लझर
सुऄरमाल
औन्धी
बरबसपुर
डोंड़ी-लोहारा
गण्ड़इ
गुण्ड़रदेही
खज्जी
कोरांचा
पनर्ाड़ा
परपौड़ी
सहसपुर-लोहारा
णसल्हेंटी
ठाकु र टोला

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छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ

- डा.संजय ऄलंग

एक - ररयासतें:छत्तीसगढ़ में सम्मणलत पूर्व ररयासतें:1941 में भारत में 562 ररयासतें णचणन्हत की गईं थीं। आसमें से, डलहौज़ी की हड़प नीणत के तहत्,
कु छ ररयासतें भारत का ऄंग बना ली गईं थीं ऄथावत ऄंग्रेजों द्वारा सीधे शाणसत भूणम (खालसा) में सम्मणलत
कर ली गईं थीं। ररयासतें भी ईपणनर्ेशर्ाददयों के ऄधीन थीं, पर र्े आन पर ईनके कणथत शासकों के माध्यम
से णनयंत्रण और शासन करते थे।
1858 की घोषणा में कु छ ररयासतें पुनः ईनके शासकों को लौटा दी गईं थीं। ररयासतों की नीणतयों
और शासकों पर ऄंग्रेजों का ही णनयंत्रण बना रहता था। ईत्तरणधकारी, दीर्ान, बड़े ऄणधकारी, नीणतगत
णनणवय अदद ऄंग्रेजों की आच्छा से ही णनयत होते थे। आनकी सेना णिरटश सेना का ही ऄंग होती थी।
ऄंग्रेजों ने 5681 से णजन ररयासतों के शासकों को रूललग चीफ या ररयासत प्रमुख कहा 1947 में
ईनमें से मात्र 51 ररयासतें ही छत्तीसगढ़ क्षेत्र में थीं। आन ररयासत क्षेत्रों के ऄलार्ा ईपणनर्ेशर्ाददयों के
सीधे शासन ऄथावत खालसा से पृथ्क ऄन्य शेष क्षेत्र सामान्य जमीन्दार ही माने गए, णजन पर पृथ्क चचाव
ररयासतों की चचाव ईपरााँत की गइ है।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में 14 ररयासतें थीं- सरगुजा, जशपुर, कोररया, चााँगभखार, रायगढ़, सारं गढ़,
सणि, (राज)नााँदगााँर्, छु इखदान (सभी 9 प्रथम श्रेणी में र्गीकृ त थीं), बस्तर, कााँकेर, कर्धाव, ईदयपुर, और
खैरागढ़ (यह 5 णद्वतीय श्रेणी में र्गीकृ त थीं)।1 आनका क्षेत्रफल 31,188 र्गवमील और जनसंख्या
1,631,140 थी। बस्तर सबसे बड़ी और सणि सबसे छोटी थी। आनका क्षेत्रफल क्रमशः 13,072 और 138
र्गवमील था। यह सभी भी छत्तीसगढ़ में सम्मणलत थीं और ऄंग्रेज सत्ता को
243,000/- लगान (कर या
रटकोली) देती थीं।
यह ररयासतें कल्चुरी प्रशासणनक आकाइ गढ़ का भाग नहीं रहीं थीं और आसी कारण से ईसके
छत्तीसगढ़ नामकरण का भी भाग नहीं रही। यही कारण है दक, कणथत छत्तीसगढ़ी भार्ना और बोली भी
ररयासत क्षेत्र से छत्तीसगढ़ में सम्मणलत भाग में ऄपेक्षाकृ त कम है।
यहााँ आस बात का ईल्लेख कर लेना भी ईणचत होगा दक गढ़ क्या थे और र्े ररयासत तथा जमीन्दारी
से कै से णभन्न थे एर्ं आनमें छत्तीस क्या था?
णत्रपुरी ऄथावत जबलपुर या महाकोसल क्षेत्र पर कल्चुरी सत्ता थी। ईनकी सत्ता का प्रभार् क्षेत्र
कोसल कहलाता था। जब यह प्रभार् क्षेत्र ऄणधक णर्कणसत हुअ तो णर्स्ताररत क्षेत्र की र्ृणि को दशावने के
णलए कोसल को महाकोसल कहा गया। आस महाकोसल का दणक्षणण भाग दणक्षणकोसल कहा गया। यह
दणक्षण कोसल छत्तीसगढ़ का क्षेत्र था और महाकोसल का भाग था।
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C.P.Directory,1941

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महाकोसल का दणक्षणण भाग कल्चुररयों की णत्रपुरी सत्ता से पृथ्क हो गया। शासन कल्चुरी लोगों की
ही एक ऄन्य शाखा का रहा। तब णत्रपुरी से शाणसत सत्ता महाकोसल ही कहलाती रही।
ऄब दणक्षण कोसल की सत्ता रत्न या रतन पुर से शाणसत हुइ। यह भाग दणक्षण कोसल कहलाया। आसे
ही कोसल कहा जाने लगा। ऄतः छत्तीसगढ़ क्षेत्र का नाम कोसल हुअ। जब प्रारम्भ में पाली से सोम लोगों
को कल्चुररयों ने पराणजत दकया तब भी कोसल संज्ञा ही व्यर्हार में थी।
हालााँदक ग़ज़नी सुल्तान सुबुिगीन और महमूद अक्रमणों को णर्फल करने हेतु पंजाब के जयपाल
और अनन्दपाल द्वारा अहुत ईत्तर भारत के राजाओं में कल्चुरीयों का ईल्लेख नहीं है। जहााँगीरनामा में यहााँ
के शासक हेतु ‘रतनपुर के जमीन्दार’ की संज्ञा ही प्रयुि हुइ है।
ऄतः यह तो ईल्लेख रहा कोसल नाम का। ऄब आससे छत्तीसगढ़ कै से हुअ, ईस पर चचाव कर ली
जाए।
रतनपुर की कल्चुरी सत्ता में तीन प्रकार की भूणमयााँ सम्मणलत थीं। यह थीं:(क) खालसा भूणम:- खालसा भूणम कल्चुरी सत्ता द्वारा शाणसत ईस भूणम को कहते थे, जो सीधे
रतनपुर की कल्चुरी शासकों द्वारा शाणसत होती थी। बाद में जब ऄंग्रेज ईपणनर्ेशर्ादी अए, तो आसी भूणम
से प्रारणम्भक णजले बने थे।
(ख) ररयासत भूणम:- आस भूणम पर कल्चुररयों का सीधा णनयंत्रण नहीं था। आन्हें कल्चुररयों ने ऄपने
ऄधीन कर, ईनके शासकों से ऄधीनता स्र्ीकर करा, ईन्हें र्ापस कर ददया था। यह ररयासतें थीं और आनकी
संख्या सदा14 ही रहीं। यह थीं- सरगुजा, जशपुर, कोररया, चााँगभखार, रायगढ़, सारंगढ़, सणि,
(राज)नााँदगााँर्, छु इखदान, बस्तर, कााँकेर, कर्धाव, ईदयपुर, और खैरागढ़। हालााँदक सरगुजा, ईदयपुर,
जशपुर, कोररया और चााँगभखार 1905 के बंग-भंग में आस क्षेत्र में अईं। आसके पूर्व कालीहााँड़ी, पटना,
रे ड़ाखोल, बामड़ा और सोनपुर आस क्षेत्र में थी।
(ग) जमीन्दारी भूणम:- कल्चुरी सत्ता में सम्मणलत जमीन्दारी भूणम पर भी कल्चुरी शासकों का
सीधा णनयंत्रण नहीं था। यह भूणम भी, ररयासतों की तरह, ऄधीन की जाकर और ऄधीनता स्र्ीकार कराइ
जाकर स्थाणनय जमीन्दार के माध्यम से ही शाणसत की जाने को ईसे दी गइ थी। यह भूणम खालसा और
ररयासत क्षेत्र, दोनों, से बाहर थी। जब दकसी जमींन्दारी को जप्त दकया जाता तो ईसे खालसा में णमला कर
खालसा कर ददया जाता था और जब दकसी को पुरस्कार, आनाम अदद में भूणम दी जाती, तो ईसे जमीन्दारी
बना ददया जाता। ररयासतों के ऄधीन जो खरपोशदार, जमीन्दार अदद थे, र्ह आस जमीन्दारी भूणम से ऄन्य
थे। आन जमीन्दाररयों की संख्या भी ऄणस्थर रही। फारे न पाणलरटकल करस्पांडस
ें फाइल के ऄनुसार
छत्तीसगढ़ क्षेत्र की जमीन्दाररयााँ 33 थीं। यह थीं- ईपरोड़ा, के न्दा, कोरर्ा (जो बाद में कोरबा कहलाया),
कं तेली (मदनपुर), चाम्पा (जो बाद में चााँपा कहलाया), छु री, माणतन, पेंडरा (पेंड्रा), पंडररया, लाफा,
णर्न्द्रानर्ागढ़, देर्री, फफगेशर्र, कटगी, कौणड़या, खररयार, भटगााँर्, णबलाइगढ़, नराव, फु लझर,
सुऄरमाल, औंधी, बरबसपुर, डोंडी-लोहारा, गंडइ, गुंडरदेही, खुज्जी, कोमचा, पनर्ाड़ा, परपौड़ी,
सहसपुर-लोहारा, णसल्हेंटी और ठाकु र टोला।
छत्तीसगढ़ संज्ञा के ईत्पन्न होने में मात्र ईि खालसा भूणम की भूणमका है। ररयासत और जमीन्दारी
भूणमयों की नहीं। ऄब र्ह कै से आस पर भी चचाव कर ली जाए।
आस क्षेत्र की कल्चुरी सत्ता द्वारा सीधे शाणसत भूणम खालसा कहलाती थी। आस खालसा भूणम पर
शासन करने के णलए, ईसे छोटी-छोटी प्रशासणनक आकाइयों में बााँटा गया था। यह छोटी-बड़ी भी की जाती
रही। यह प्रशासणनक आकाइ तहसील णजतनी बड़ी थी और आसी कारण से मराठों द्वारा शाणसत होने पर आसी
आकाइ को परगना और ताल्लुका तथा ऄंग्रेजों द्वारा शाणसत होने पर तहसील कहा गया। कल्चुरी लोगों ने
खालसा क्षेत्र का प्रशासन चलाने के णलए णजस छोटी-छोटी प्रशासणनक आकाइयों का गठन दकया था, ईस एक
आकाइ का नाम था ‘गढ़’। आस गढ़ संज्ञा का ईस गढ़ संज्ञा से कोइ साम्य नहीं है, णजसका ऄथव दकला, दुगव
अदद होता है। गढ़ खालसा क्षेत्र की तहसील जैसी प्रशासणनक आकाइ थी। आनकी संख्या छत्तीस ऄथावत 36
थी। यह 18-18 णशर्नाथ नदी के ईत्तर और दणक्षण में थे। आनकी संख्या में भी पररर्त्तवन होता था।
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सामान्यतः गढ़ क्षेत्र आनाम में दे जमीन्दारी बनाए जाते या जमीन्दारी जप्त कर गढ़ बना दी जाती। आन गढ़ों
का ईल्लेख सभी सैटेल्मेंट ररपोटों, गजेरटयरों, प्रशासणनक प्रणतर्ेदनों अदद में हुअ। यह गढ़ थे- णशर्नाथ
नदी के ईत्तर में रतनपुर राज्य में- रतनपुर, मारो, णर्जयपुर, खरौद, कोटगढ़, नर्ागढ़, सोंढी, ओखर,
पंडरभठा, सेमररया, मदनपुर(चांपा), कोसगंइ(छु री), लाफा, कें दा, भाणतन, ईपरोड़ा, कं करी(पेंड्रा) और
करकट्टी(बघेलखण्ड में) तथा णशर्नाथ नदी के दणक्षण में रायपुर राज्य के ऄंत्तवगत रायपुर, पाटन, णसमगा,
लसगारपुर, लर्न, ऄमीरा, दुगव, सारधा, णसरसा, मोहदी, खलारी, णसरपुर, फफगेश्वर, राणजम, लसगारगढ़,
सुऄरमांर, टैगनागढ़ और ऄकलबाड़ा। ईत्तर र्ाले क्षेत्र में 3,586 और दणक्षण र्ाले क्षेत्र में 2,136 ग्राम
ऄथावत कु ल 5,722 ग्राम थे। खालसा क्षेत्र ही छत्तीसगढ़ का प्रणतणनणध प्रतीक बना रहा। आस क्षेत्र को ईि
5,722 ग्रामों का प्रणतणनणधत्र् करता हुअ माने तो यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है दक, अज जब 2011 की
जनगणना हुइ तब छत्तीसगढ़ के 182 नगर और 20,126 ग्राम जनगणना में णलए गए। ऄतः स्पष्ट है दक,
ररयासत और जणमन्दारी क्षेत्र भी छत्तीसगढ़ के प्रणतध्र्णन या गूाँज में ईतने ही महत्र्पूणव हो कर ईभरते हैं।
छोटी प्रशासणनक आकाइ का गठन कर ईसका नाम गढ़ रखना जबलपुर क्षेत्र से अया। आसी से
गढ़ामण्ड़ला, देर्गढ़ अदद प्रख्यात ररयासतों के नाम पड़े थे।
छत्तीसगढ़ के नाम को समझने के णलए कल्चुरी शासन व्यर्स्था, र्ह भी खालसा क्षेत्र की, को
समझा जाना ऄत्यार्श्यक है, क्योंदक आसी व्यर्स्था के कारण छत्तीसगढ़ संज्ञा का जन्म हुअ।
कल्चुरी शासन व्यर्स्था का ज्ञात स्रोत कल्याण सहाय कृ त राजस्र् की पुस्तक है। आसे ही अधार
बना कर 1868 में बन्दोबस्त ऄणधकारी णचशम ने ईल्लेख ददए हैं और बाद के सभी ईल्लेख आसी के अधार
पर बनाए गए।
रतनपुर और बाद में रायपुर की कल्चुरी शासन व्यर्स्था में राजा राज्य प्रमुख और सर्ोच्च
ऄणधकारी था। ईसकी सहायता हेतु और ईसकी ऄधीनस्थता में कइ ऄणधकारी होते थे। राज्य स्तर पर मंत्री
अदद थे। दकले अदद के प्रभाररयों की णनयुणि पृथक से की जाती थी। यह दकले ईि गढ़ नहीं थे। पृथ्क से
दकले हेतु णनयुणि का एक ईल्लेख बाहार साय के ईल्लेख के साथ अया है, जो कोसगंइ (र्तवमान कोसंगा,
छु री,णबलासपुर) और ईसका प्रभार घाट्म देर् को सौंपने से सम्बणन्धत है। प्रथम ईल्लेख रतनपुर महामाया
मणन्दर का है। यहााँ कोष हेतु दकला बनर्ाया गया, आससे दूसरी राजधानी का भ्रम पैदा हुअ। बाहर साय ने
घाट्म देर् को कोसगंइ दकले का प्रबन्ध सौंपा। ईसे भी णर्णभन्न राज र्ंश का बताया जाता है, णजसका
अमत्य गोरक्ष था।
तदुपरांत राज्य गढ़ों में णर्भि था। आन गढ़ो का ररयासत या जमीन्दार भूणम से कोइ सम्बन्ध नहीं
था। यह खालसा भूणम का प्रशासणनक णर्भाजन था। गढ़ का प्रभारी दीर्ान कहलाता था। एक गढ़ में 84
ग्राम या 7 बारहों होते थे। आसीणलए आसे चौरासी भी कहते थे। यह संख्या कम या ऄणधक हो सकती थी, पर
गढ़ हेतु सामान्यतः 84 गााँर् (7 बारहों) रखे जाते थे। यह अदशव णस्थणत थी, पर आससे अधे से कम ग्रामों
र्ाले गढ़ भी रहे हैं।
दीर्ान के बाद दाउ का पद था। दाउ के ऄधीन 12 गााँर् होते थे। यह समूह बारहों कहलाता था
और आस कारण से दाउ बारहों के ऄणधकारी कहे जाते थे।
प्रशासन की सबसे छोटी आकाइ ग्राम थी। ईसका एक ग्राम मुणखया होता था। र्ह गौंरटया कहलाता
था। आन सभी का कायव लगान र्सूली था। ईन्हे एक ऄंश मेहनताने के रूप में रखने का ऄणधकार था।
धीरे -धीरे यह पद र्ंशानुगत ज्येष्ठाणधकार में चले गए। सभी पदाणधकाररयों को णनयुणि और
पदच्युत करने का ऄणधकार था। ऄतः पद मात्र ररश्तेदारों को ददए जाने लगे। राजा स्र्यं भी यही करता था।
आस कारण से के न्द्रीय शणि के कमज़ोर होते ही क्षेत्रीय शणियााँ तत्काल सर ईठाने लगती थीं।

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राजा

मंत्री आदद

ककऱों के प्रभारी
आदद

गढ़ प्रभारी(दीर्ान)
7 बारहों=84ग्राम
बारहों प्रभारी(दाऊ)
(12 ग्राम)

ग्राम प्रभारी
(गौंदिया)

स्पष्ट है दक, गढ़ तहसील जैसी एक प्रशासणनक आकाइ थी, न की दकले के समांतर प्रयुि होने
र्ाला शब्द और न ही ररयासतों या जमीन्दारीयों के णलए प्रयुि शब्द। मराठा काल में आसी से छत्तीसगढ़
संज्ञा को बल णमलना प्रारम्भ हुअ।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र का मध्यकाल आस क्षेत्र के पुराने णनर्ाणसयों को सत्ता से सदा के णलए बाहर कर ददए
जाने का काल था। मध्यकाल से यह सुणनणित होने लगा दक, छत्तीसगढ़ पर प्रचीनतम और मूल णनर्ाणसयों
के स्थान पर प्रर्ास कर यहााँ अए लोगों का ही र्चवस्र् होगा और यह णनरंतर है भी। यह ऄभी तक राज,
प्रशासन, ऄथव अदद सभी तंत्रों पर लागू है।
छत्तीसगढ़ नाम ईत्पणत्त का सर्ावणधक सहज तथ्य यह है दक, जब मराठा भोंसलों के लोग आस क्षेत्र से
चौथ र्सूल कर र्ापस जाते थे और यह बताते थे दक, ईन्होने कोसल या रतनपुर राज्य के छत्तीस (36) गढों
में से कु छ (कोइ संख्या) गढ़ों से चौथ र्सूली गइ है, तब ईन्हे पूरे गढ़ों ऄथावत छत्तीसों से र्सूलने को कहा
जाता था और यहीं से छत्तीसगढ़ संज्ञा र्ास्तणर्क रूप से प्रचणलत हुइ तथा ईनकी चौथ र्सूलने की सनदों में
आसका ईल्लेख होने लगा।
जब छत्तीसगढ़ संज्ञा बोलचाल में अइ तो साणहत्य में अना ही था, पर ईसका अणधकाररक ईपयोग
मराठों ने ही दकया। कु छ ईदाहरण यह हैं:- साबाजी ने भाइ परसोजी को बरार तथा गोंड़र्ाना से चौथ
र्सूली हेतु भेजा। र्ह णशर्ाजी की सेना में घुड़सर्ारों का सरदार भी था। र्ह णशर्ाजी के काल में ही बरार
पहुाँच गया। 1669 में णशर्ाजी के देहांत ईपारााँत आन प्रदेशों से चौथ बसूली के ऄणधकार-पत्र को
ईत्तराणधकारी से नर्ीनीकृ त्त करा ईसमें छत्तीसगढ़ का भी ईल्लेख करा कु छ ऄन्य क्षेत्र भी जुड़र्ा णलए गए।
आस तरह छत्तीसगढ़ संज्ञा अणधकाररक रूप से प्रयुि होने लगी। एक ऄन्य ईदाहरण यह है दक, जब 1728
में रघुजी सतारा से चला। शाहू ने ईसे देर्ार और र्इ के मोक्ष भी दे ददए। ईसे सेना-साहब-सूबा के पद के
साथ बरार और गोंडर्ाना की सनद छत्तीसगढ़, पटना,आलाहाबाद और मकसूदाबाद (बंगाल) से चौथ र्सूली
के ऄणधकार के साथ णमली। आस प्रकार मराठों या भोंसलों ने ही छत्तीसगढ़ व्यर्हाररक संज्ञा का अणधकाररक
प्रयोग भी प्रारम्भ दकया।
ऄतः गढ़ संख्या में 36 थे और मराठे ऄणधकारी (णचटणनस ऄथावत सणचर् और फड़नर्ीस ऄथावत
णर्त्त प्रभारी) ऄणधकार, ऄणधपत्य और र्सूली हेतु ईनकी णगनती करते। आस णगनती में र्े छत्तीस-गढ़ शब्द
का व्यर्हार करने लगे। धीर-धीरे यह शब्द ही बन गया और ईनकी सनदों में आसका अणधकाररक ईपयोग
होने लगा। यहीं से यह शब्द प्रचणलत हुअ।
हालााँदक छत्तीसगढ़ नाम की ईत्पणत्त पर णर्द्वानों में ऄत्यणधक मत णभन्नता है। हीरालाल चेदद से,
टालेमी ऄणधष्ठ्रान से, जे.डी.बेगलेर 36 ऄंत्यज पररर्ारों से अदद छत्तीसगढ़ शब्द की व्युत्पत्ती बताते रहे हैं,
पर यह सभी ऄनुमान ही ऄणधक हैं। कलनघम,आस क्षेत्र का पुराना नाम,महाकौसल मानते हैं।
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आस छत्तीसगढ़ संज्ञा में ररयासत और जमीन्दारी क्षेत्रों का प्रणतणनणधत्र् नहीं होता है। बस्तर क्षेत्र
महाकांतार या दण्ड़कारण्य था और सरगुजा क्षेत्र झारखण्ड़। सरगुजा क्षेत्र को भी दण्ड़कारण्य कहा गया।
यहााँ प्रसंगर्श ईल्लेख है दक, छत्तीसगढ़ क्षेत्र में सर्वप्रथम बैगा जनजाणत के लोग अए और सभी लोग ईनके
पिात ही अए। सर्वप्रथम अने र्ाले बैगा लोग छोटा (चुरटया) नागपुर क्षेत्र से अए थे और छत्तीसगढ़ के
सरगुजा क्षेत्र में ही सर्वप्रथम बसे थे। ‘छत्तीसगढ़ की जनजाणतयााँ और जाणतयााँ’ नाम से मेरी एक पृथ्क पुस्तक
है, ऄणधक चचाव हेतु ईसे देखा जा सकता है।
ऄब जब कल्चुररयों के ईपरााँत मराठे आस क्षेत्र पर शासन करने अए, तब ईन्होंने आस क्षेत्र को
छत्तीसगढ़ णजल्हा कहा। णजल्हा ऄथावत णजला। हालााँदक आसका प्रभारी सूबा साहब ही कहा गया। ऄब
छत्तीसगढ़ नाम पूणवतः अणधकाररक हो गया।
जब मराठों के ईपरााँत ऄंग्रेज सत्ता में अए तब छत्तीसगढ़ णजल्हा, जो सूबे की तरह माना जाता था,
छत्तीसगढ़ णजले के रूप में सामने अया। ऄब छत्तीसगढ़ खालसा क्षेत्र को अठ तहसीलों में बााँटा गया।
ररयासतें और जमीन्दाररयााँ यथार्त रहीं। तहसील के लगान र्सूली ऄणधकारी णनयुि हुए और तहसीलदार
कहलाए। 1854-57 के मध्य बस्तर भी आस क्षेत्र में सम्मणलत दकया गया।(देखें मेरा लेख- कोसल से छत्तीसगढ़ तक)
ऄब पुनः ररयासत और जमीन्दाररयों के मूल मुद्दे पर लौटा जाए। आनके णर्र्ाद आस्टनव स्टेट एजेंसी
द्वारा हल दकए जाते थे। आनसे आकरारनामा कराया जाता था। सभी ररयासतों से ऄंग्रेज र्ार्षषक कर रटकोली -लेते थे।
यहााँ यह बताना भी ईणचत होगा दक, 1905 में बंगाल का णर्भाजन (बंग-भंग) हुअ। सम्बलपुर
और जबलपुर को छत्तीसगढ़ क्षेत्र से ऄलग कर ददया गया। जबलपुर को मध्य प्रााँत के ही ऄन्य क्षेत्र में
सम्मणलत कर ददया गया। सम्बलपुर का प्रााँत भी बदल गया और ईसे ईणड़या भाषी होने के कारण बंगाल में
णमलाया गया। बंगाल प्रााँत के छोटा नागपुर क्षेत्र ऄथावत तत्कालीन रााँची कमीश्नरी की पााँच ररयासतें 16
ऄक्टूबर 1905 को छत्तीसगढ़ क्षेत्र में सम्मणलत की गईं।2 यह णसरगुजा या झारखण्ड समूह की ररयासतें
कहालाती थीं, क्योंदक बहुत पहले सरगुजा ही प्रमुख ररयासत थी और ईसका ऄणधकांश भाग (पर सम्पूणव
नहीं) पर ऄणधपत्य रहा था और यह ररयासतें छोटा (या चुरटया) नागपुर या झारखण्ड़ से ही मध्य प्रााँत और
बरार में अईं थीं। यह ररयासतें ऄभी तक बंगाल प्रााँत में थीं। यह थीं- सरगुजा, ईदयपुर, जशपुर, कोररया
और चााँगभखार। पहले यह झारखण्ड ही कहलाता था।3 आनका कु ल क्षेत्रफल 11,607 र्गवमील, कु ल
जनसंख्या 704,523 और अय लगभग 1,415,500 रूपए थी।
चााँगभखार कोररया से ऄलग हो कर बनी। आस पर कोररया के राज पररर्ार की ही एक शाखा
काणबज हुइ। ऐसे ही ईदयपुर पर सरगुजा राज पररर्ार की एक शाखा ही काणबज हुइ। जशपुर तो रटकोली
भी सरगुजा के माध्यम से ही देता रहा। यह ररयासतें छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह ही मराठों के
ऄणधपत्य में रही थीं और मराठों ने जब ऄंग्रेजों को सत्त्ता सौंपी, तो यह ररयासतें भी ऄंग्रेज प्रभार् में अ
गईं। 1819-20 की प्रथम ऄंग्रेज सनद में आन्हें जमीन्दार कहा गया। 1905 में जब यह छत्तीसगढ़ से पुनः
णमलीं तब आन्हें भी छत्तीसगढ़ के ऄन्य ररयासत नरे शों जैसी बराबरी दी गइ। हालांदक 1899 की सनद में
आन्हें भी फ्युडटे री चीफ माना गया था। 1905 में यह सनद ही नर्ीनीकृ त्त हुइ। कोररया और चााँगभखार को
खणनज रायल्टी का ऄणधकार ऄपील ईपरााँत ही णमला था।

2

Marten-Report of the administration of C.P. & Berar,1910-11

3

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड झनकार,पृ.11

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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10
आसी के साथ ऄन्य पााँच ररयासतें भी थीं। यह ऄन्य पााँच ररयासतें ईणड़या भाषी होने के कारण
बंगाल प्रााँत के ईणड़या भाषी क्षेत्र में णमलाईं गईं। यह थीं- कालीहााँड़ी, पटना, रे ड़ाखोल, बामड़ा और
सोनपुर।
1905 के बंग-भंग के ईपरााँत छत्तीसगढ़ मे 14 ररयासतें हुईं। ररयासत प्रमुख 1921 तक फ्युडटे री
चीफ और ईसके ईपरााँत रूललग चीफ कहलाते थे। संयोग से बंग-भंग के पूर्व भी संख्या 14 ही थी। पर
ररयासतें थीं- कालाहााँडी, पटना, रेराखोल, बामड़ा, सोनपुर, बस्तर, कााँकेर, राजनााँदगााँर्, खैरागढ़,
छु इखदान, कर्धाव, रायगढ़, सणि और सारं गढ़।
जब यह ररयासतें जमीन्दारी कहलाती थीं, तब आनकी संख्या 115 तक जा पहुाँची थी।
आन ररयासतों का चार प्रचणलत सहज समूह भी थे। जेणन्कन्स4 और ररचडव टेम्पल5 की ररपोटव में भी
यह समूह नाम ही अए हैं।
नागपुर जमीन्दारी समुदाय के दो समूह,

प्रथम

छत्तीसगढ़ जमीन्दारी समूह की तीन ररयासतें- बस्तर, कााँकेर और कर्धाव।

ईि तीन में से प्रथम दो कै से ऄणस्तत्र् में अईं यह स्पष्ट नहीं है, पर कर्धाव कल्चुररयों द्वारा सैणनक
सेर्ा के ईपलक्ष में दी गइ थी।6 आस समूह की ररयासतें णद्वतीय श्रेणी में थीं।

णद्वतीय आसी नागपुर जमीन्दारी समुदाय में तीन ररयासतें खलौटी जमीन्दारी समूह की- खैरागढ़,
नााँदगााँर् और छु इखदान।
खलौटी समूह की ररयासतों के प्रमुखों को, छत्तीसगढ़ी में, खाल्हेराज कहा जाता था। यह क्षेत्र ईनके
पूर्वजों को दकसी सहायता या सेर्ा के कारण पुरस्कार में णमले थे।7आस समूह से खैरागढ़ मात्र णद्वतीय श्रेणी में
रखी गइ।

तृतीय समूह में सम्बलपुर गढ़ जात की तीन ररयासतें- रायगढ़, सणि और सारं गढ़।
पहले यह पटना के ऄधीन थे। दफर 1755 में मराठों के ऄधीन हुए और ईनसे 1818 में ऄंग्रेज सत्ता
के ऄधीन अए।

चतुथव - छोटा (चुरटया) नागपुर ऄंतगवत णसरगुजा या झरखण्ड़ समूह की पााँच ररयासतें- सरगुजा,
ईदयपुर, जशपुर, कोररया और चााँगभखार।8

4मराठों

की भू प्रणाली की णर्णर्चना ररपोटव जेणन्कन ने 1819 में बनाइ, जो 1827 में प्रकाणशत हुइ।

5

1862-63 में ररचडव टेम्पल ने ररयासत जमीन्दारों के पद ऄणधकारों का ऄनुसन्धान परीक्षण दकया था।

6

जेंफकसन ररपोटव। लााँजी की र्ैनगंगा जमीन्दारी भी आसी प्रकार ऄणस्तत्र् में अइ थी।

7

जेंफकसन ररपोटव

8

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.3

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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आसमें से ईदयपुर णद्वतीय श्रेणी में रखी गइ। आन ररयासतों के ऄधीन छोटे आलाके दार, जमीन्दार और
खरपोशदार भी रहे। आन्हें झारखण्ड़ समूह भी कहा गया।
छत्तीसगढ़ की सभी ररयासतों के शासक मण्डला-देर्गढ़ (णछन्दर्ाड़ा)(गोंड़), चााँदा (गोंड़) और
रतनपुर (कल्चुरी) के माण्डणलक ऄथावत छोटे सरदार रहे थे। बस्तर ऄणधकााँश काल आससे मुि रहा। मराठा
धार्े 1740-1755 में होते रहे और धीरे -धीरे बस्तर को भी ऄधीन होना पड़ा।9
ईपणनर्ेश काल में ररयासतों के शासन की सभी शतें सनद से णनधावररत होती थीं। सनद समय-समय
पर नर्ीनीकृ त्त होती थी। सामान्यतः फयुडटे री या रूणलग चीफ होने की णस्र्कृ णत ऄंग्रज
े शासन ही देता था
और सनद में ईल्लेणखत शतों के तहत शासन करना होता था। ऄंग्रेजों के णलए र्ार्षषक कर रटकोली,
नज़राना, अदेश पालन, शााँणत और ऄधीनता बनाए रखना अदद शतें ऄणधक महत्र् की थीं। सात साल से
उपर की सजा के मामले में पाणलरटकल एज़ेंट और फााँसी के मामले में गर्नवर की भी सहमती र्ााँणछत होती
थी।। ईसे ऄंग्रेज न्यायालय सुनते थे। सभी मामलों की ऄपील ऄंग्रेज पाणलरटकल एजेंट को की जा सकती थी।
भारत की ररयासतों की णस्थणत ईनकों दी गइ तोप सलामी के ऄणधकार की संख्या से होती थी।
छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतों को यह ऄणधकार नहीं था और यदद था भी तो स्पष्ट नहीं है। कााँकेर को 9 तोपों
की सलामी का एक ईल्लेख, धानू लाल श्रीर्ास्तर् की पुस्तक में, अता है।10 ऄतः आससे यह ऄनुमान दकया
जा सकता है दक, ऄन्य को भी सलामी से मान णमलता हो। बड़ी ररयासतों को 21 तदुपरांत 19, 17, 15,
13, 11 और तोपों की सलामी के ऄणधकार बााँटे गए थे।
यह ररयासतें 1882 तक छत्तीसगढ़ के सम्भागीय कमीश्नर या णजले के णडप्टी कमीश्नर द्वारा
णनरीक्षण के ऄधीन थीं। 1882 से आन्हें रायपुर के पाणलरटकल एजेंट के णनरीक्षण के ऄधीन दकया गया। सभी
ररयासतों हेतु णिरटश रे सीडेंट स्थानीय स्तर पर णनयुि थे। ररयासतों के रूललग चीफ ऄंग्रेज सत्ता की कृ पा
पयंत ही शासक रह सकते थे। धीरे -धीरे सभी ररयासतों में णिरटशों द्वारा प्रर्र्षतत शासन पिणत ही ऄपना
ली गइ।
छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें मध्य प्रााँत और बरार (C.P. & Berar) नामक राज्य में थीं। आसका,
णजलों और ररयासतों सणहत, नक्शा अगामी पृष्ठ पर है।
रायपुर के ऄंग्रेज पाणलरटकल एजेंट यह थे।:सारणी 1 - रायपुर में छत्तीसगढ़ की ररयासतों हेतु णनयुि ऄंग्रेज पोणलरटकल एजेंट
स्रोत-धानूलाल श्रीर्ास्तर् कृ त ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज और रघुर्ीर प्रसाद कृ त झारखण्ड झनकार
क्रमााँक
1

नाम
बेरी

कब से

कब तक

ऄप्रैल’1887

मइ’1889

2

फ्रेजर (दो बार)

मइ’1889

जुलाइ’1889 और

मइ’1892

जून’1892

जुलाइ’1889

ददसम्बर’1889

3

9

णस्कनर

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.3-4

10

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.32

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4

गुडररज

ददसम्बर’1889

ददसम्बर’1891

5

मेकल जान (दो बार)

ददसम्बर’1891

मइ’1892 और

जून’1896

ऄप्रैल’1897

6

प्रीस्ट

जून’1892

मइ’1893

7

र्ामक (पााँच बार)

मइ’1893

नर्म्बर’1893

ऄप्रैल’1901

णसतम्बर’1901

नर्म्बर’1901

मइ’1904

जून’1904

जून’1905 और

जुलाइ’1905

माचव’1906

नर्म्बर’1893

जुलाइ’1895

णसतम्बर’1895

ऄप्रैल’1896

ऄप्रैल’1897

मइ’1897 और

जून’1898

णसतम्बर’1898

8

यंग हस्बैंड (चार बार)

9

एल.ए.जी.क्लाकव

जुलाइ’1895

णसतम्बर’1895

10

(कनवल) टेम्पल

ऄप्रैल’1896

जून’1896

11

चैपमैन (दो बार)

मइ’1897

जून’1898 और

णसतम्बर’1898

फरर्री’1899

फरर्री’1899

ऄगस्त’1900 और

ऄिू बर’1900

फरर्री’1901

12

स्याल (दो बार)

13

पी.हेलमग्र्े

ऄगस्त’1900

ऄक्टू बर’1900

14

प्र्ाआं टटग

फरर्री’1901

ऄप्रैल’1901

15

(सर) ब्लेनर हेसेट

णसतम्बर’1901

नर्म्बर’1901

16

बैचेलर

मइ’1904

जून’1904

17

एच.इ.हेलमगर्े

16 जून’1904

27 जून’1904

18

एच.एम.लारी (दो बार पर लगातार)

जून’1905

जुलाइ’1905 और

माचव’1906

ऄप्रैल’1907

19

दफणलप

ऄप्रैल’1907

मइ’1907

20

नेणपयर

मइ’1907

जुलाइ’1907

21

इ.ए.डीिेट

जुलाइ’1907

13 माचव’1910

22

इ.एच. ब्लैकस्ली (तीन बार पर लगातार)

14 माचव’1910

31 जुलाइ’1911

9 ऄक्टू बर’1911

15 जून’1912 और

1 जुलाइ’1912

10 मइ’1914

23

सी

1 ऄगस्त’1911

8 ऄिू बर’1911

24

बटवन

16 जून’1912

30 जून’1912

25

एफ.एल.क्राफडव (दो बार पर लगातार)

11 मइ’1914

6 ऄक्टू बर’1917 और

29 ऄक्टू बर’1917

9 नर्म्बर’1920

26

ब्लेफकसाय

7 ऄक्टू बर’1917

28 ऄक्टू बर’1917

27

डब्ल्यु.इ.ली

10 नर्म्बर’1920

1925

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13
28
29

के .एल.बी.हेमल्टन
डी.एच.सी.ड्रेक

1925
1928

1928

(ऄभी यह सूणच ऄपूणव है। आसके अगे की सूची पूणव की जानी है।)

मानणचत्र 1 - 1909 में मध्य प्रााँत और बरार [ररयासतें सम्मणलत (णजलों सणहत)]
स्रोत-http://en.wikipedia.org/wiki/Bastar_state#History

छत्तीसगढ़ की सभी ररयासते, 1 ऄप्रैल’1933 को गरठत, इस्टनव स्टेट एजेंसी11 से प्रशाणसत होती
थीं।

11

The Eastern States Agency was an administrative unit of British India. The agency was created on

April 1, 1933. This agency was composed of a number of princely states in eastern India, located in
the present-day Indian states of Chhattisgarh, Jharkhand, Orissa, West Bengal, and Tripura. Before
the creation of the Eastern States Agency in 1933, 23 states of erstwhile Orissa Tributary States and
Chhota Nagpur States were under the authority of the British provinces of Bihar and Orissa and 16
states were under the authority of Central Provinces and Berar. Cooch Behar and Tripura were
transferred from Bengal province to the Eastern States Agency 0n December 1, 1936. On December
1, 1944 the status of this agency was raised to that of a first class residency. These states were

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भारत स्र्तंत्रता के ईपरााँत णर्लीनीकरण के समय, छत्तीसगढ़ के शेष भाग की तरह, आन ररयासतों
पर भी छत्तीसगढ़ के मूल या स्थाणनय णनर्ाणसयों का शासन नहीं था और यह भी बाहर से अए कणथत
शासकों के णनयंत्रण में ही थीं, जो आस क्षेत्र की शाश्वत णनयती बनी।
भारत के स्र्तंत्र होने पर ररयासतों का णर्लीनीकरण महत्र्पूणव मुद्दा था। जो ररयासतें ऄंग्रेजों द्वारा
भारत का भाग बना ली गईं थीं, ईनमें यह मुद्दा प्रश्नगत ही नहीं हुअ। बस्तर अदद कु छ ररयासतों को छोड़
शेष ने राजकु मार कालेज़, रायपुर में बैठक कर पूर्ी राज्य संघ बनाया। सरदार बल्ल्भ भाइ पटेल नें 15
ददसम्बर’1947 को छत्तीसगढ़ का दौरा कर ररयासत प्रमुखों से भेंट की। कोररया ने प्रीर्ी पसव की मााँग की।
जशपुर णबहार में णमलना चाहा, आसमें रााँची में इसाइ णमशनरी मुख्यालय होना प्रमुख कारण था। कु छ
ररयासतों ने भारत में णर्लीन होने का णर्रोध भी दकया। पटेल ने भारत के सणर्धान के ऄंतगवत सभी की
णहत रक्षा को ऄश्वस्त दकया। ऄंततः छत्तीसगढ़ की सभी ररयासतें भारतीय संघ में णमलीं। 1 जनर्री’1948
को ईन्हे मध्य प्रााँत में णमला ददया गया।
छत्तीसगढ़ की ईि 14 ररयासतों का पृथक-पृथक सणन्क्षप्त णर्र्रण णनम्ांदकत है।:नागपुर जमीन्दारी की छतीसगढ़ जमीन्दारी
आसके ऄंतगवत तीन ररयासतें अती थीं। आनका र्णवन णनम्ााँदकत है।:बस्तर
बस्तर ररयासत का णर्स्तार 170 46/ से 200 14/ ईत्तरी ऄक्षांश और 800 15/ से 820 15/ पूर्ी
देशांतर के मध्य णस्थत था। तत्समय आसके ईत्तर में कााँकेर ररयासत, दणक्षण में मद्रास प्रााँत का गोदार्री
णजला, पणिम में चााँदा णजला, हैदराबाद राज्य और गोदार्री नदी तथा पूर्व में जैपुर (ईड़ीसा) ररयासत थी।
1901 की जनगणना में मुख्यालय जगदलपुर की जनसंख्या 4,762 थी और ररयासत की
306,501। ररयासत में 2,525 ग्राम, 5 तहसीलें और 7 जमीन्दारीयााँ थीं।12 ररयासत की जनसंख्या 1941
में 633,888 हो गइ थी।13 आसे, ऄंग्रेजों द्वारा, ररयासत र्गीकरण की णद्वतीय श्रेणी में रखा गया था।
बस्तर संज्ञा की व्युत्पत्ती ऄणधक स्पष्ट नहीं है और आस हेतु दकर्न्दंणतयों पर ही णनभवरता है।
grouped into three political agencies, under the "Resident" in Calcutta. The headquarters of the Orissa
States Agency was at Sambalpur, the headquarters of the Chhattisgarh States Agency was at Raipur
and the headquarters of the Bengal Saates Agency was at Calcutta. After Indian Independence in
1947, the states acceded to the Government of India, and were integrated into the Indian states of
Madhya Pradesh, Bihar, West Bengal and Orissa. The eastern portion of Madhya Pradesh and the
southern portion of Bihar became the states of Chhattisgarh and Jharkhand, respectively, in 2001.
(http://en.wikipedia.org/wiki/Chhuikhadan) और Columbia-Lippincott Gazeteer (New York: Columbia
University Press, 1952) p. 389:- It had an area of 153 square miles (400 km2). In 1941 the state had a
population of 32,731 people.
12

Imperial Gazetteer of India, Vol. 7, P. 121,123,124

13

http://en.wikipedia.org/wiki/Bastar_state

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एक तथ्य बस्तर राज्य संस्थापकों का बााँस तले णनर्ास से बााँस-तर और ईससे बस्तर शब्द की
व्युत्पत्ती का है।
दूसरा तथ्य यह है दक, काकतीय जब दंतेशर्री देर्ी की शरण में अए तो र्ह ईत्तर में गईं और
ईनके राज्य णर्स्तार और ईसके णचन्हााँकन हेतु ऄपने र्स्त्र फै ला ददए। जहााँ तक र्स्त्र फै ले, र्हााँ तक
काकतीयों का शासन क्षेत्र हुअ। जहााँ तक दंतेशर्री के र्स्त्र फै ले र्ह क्षेत्र, र्स्त्र से, बस्तर कहलाया।14
अख्यानों में यह भू भाग दण्डकारण्य और महाकााँतार कहलाता था। आसे आणतहास में दणक्षणापथ भी
कहा गया। आसका मुख्यालय जगदलपुर रहा और है।
बस्तर और बस्तनार नामक ग्रामों का भी ऄणस्तत्र् पृथक से है।
दण्डकारण्य नामाकरण का प्रसंग भी फकर्न्दंती अधाररत है और यह बताया जाता है दक, आक्ष्र्ाकु
आस क्षेत्र के राजा थे। ईनके तृतीय पुत्र दण्ड थे। आक्ष्र्ाकु के गुरू शुक्राचायव थे। शुक्राचायव दण्डकारण्य में रहते
थे। ईनके साथ ईनकी रूपर्ती कन्या ऄरचा थी। दण्ड णशकार के दौरान, शुक्राचायव की ऄनुपणस्थणत में,
अश्रम अ गए। ईन्होने ऄरचा से बालात्कार दकया। बाद में शुक्राचायव की सूचना में यह तथ्य अने पर
ईन्होने ईसे श्राप ददया। आस श्राप के कारण दण्ड का राज्य ऄरण्य (र्न) मय हो गया और दण्डकारण्य
कहलाया।
दण्डकारण्य में ही णर्श्वाणमत्र का अश्रम माना जाता है, जहााँ राजा दशरथ राम-लक्ष्मण को लेकर
अए थे। यहीं ईन्होने ईपद्रर्ी ऄनायों को मारा था। अयव-ऄनायव संघषव को अयव बनाम बनर्ासी जनजाणत
और अयव संस्कृ णत णर्स्तार प्रसंग से भी, यह प्रसंग, देखा जाता है।
छत्तीसगढ़ की समस्त ररयासतों का ऄणधकााँश आणतहास ऄभी ऄन्र्ेणषत नहीं हो पाया है। बस्तर भी
ईसी श्रेणी में है। आस ररयासत के आणतहास का क्रमबि ईल्लेख अगामी पैराओं में है।
बस्तर के णलमड़ररहा में कन्दरा मानर् के प्रमाण णमलें हैं। यहााँ कन्दरा णचत्र णमले हैं, जो ईनके स्थाइ
णनर्ास को आंणगत करते हैं। आसमें मानर् और पशु अकृ णतयााँ बनाइ गइ हैं।15
यह ऄनुमान दकया गया है दक, यूनानी या ग्रीक सम्पकव 2000 र्षव पूर्व तक आस क्षेत्र में रहा हो
सकता है। ईसका कारण यह ददया जाता है दक, 25 इ.पू. में रोम शासक अगस्टस को भेजी गइ भेंटों में
बोलने र्ाली मैना भी थी। यह बस्तर में ही पाइ जाती है।16
छत्तीसगढ़ के र्त्तवमान णचणन्हत भू-भाग का ऄणधकांश भाग सातर्ाहनों के ऄधीन था। ऄतः बस्तर
क्षेत्र भी ईसका भाग माना जा सकता है। ईसके कु छ प्रमाण भी णमले हैं। ईनका काल लगभग 230 इसा पूर्व
से लगभग 220 इस्र्ी तक का माना जाता है।17
सातर्ाहन राजा णशर् श्री ऄणपलक की ताम्र मुद्राएाँ बस्तर क्षेत्र में णमली हैं। ईसने बारह र्षव शासन
दकया था। र्ह कण्र् लोगों का क्षत्रप भी माना गया है।18 सातर्ाहन अन्र के थे, परं तु र्े ऄपने को दणक्षणपथ-स्र्ामी कहते थे। आनका के न्द्र जुन्नार (पुणे), प्रणतष्ठान (पैठन) और कोरटललगाला (करीमनगर, अन्र,
गोदार्री तट) थे।19 यह लोग मौयो के पिात णर्देणशयों को रोकने और शााँणत स्थाणपत करने के णलए जाने
14

मदन लाल गुप्त-छत्तीसगढ़ ददग्दशवन

15

छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)

16

http://bastercg.blogspot.com/

17

http://en.wikipedia.org/wiki/Satavahana_dynasty

18

http://en.wikipedia.org/wiki/Satavahana_dynasty (1.Apilaka, ruled 12 years.2. Many small rulers

succeeded Satakarni, such as Lambodara, Apilaka, Meghasvati and Kuntala Satakarni, who are
thought to have been under the suzerainty of the Kanva dynasty) और
http://en.wikipedia.org/wiki/Shalivahana_era
19

http://en.wikipedia.org/wiki/Satavahana_dynasty

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16
जाते हैं। गौतमी पुत्र सातकणी ने सीणथयनों, आण्डो-ग्रीकों और आण्ड़ो-पार्षथयन पल्लर्ों को हराया। कु छ
स्रोतों में20 ईसे भारतीय राष्ट्रीय शालीर्ाहन शक सम्र्त का सन्स्थापक माना गया है। यह 78 इस्र्ी में
स्थाणपत सूयव अधाररत र्ैज्ञाणनक कै लेंडर है। सूयव अधाररत कै लेण्ड़र श्रेष्ठ माने जाते हैं। चन्द्र अधाररत
कै लेण्ड़रों में गणना की सटीकता नहीं होती और णतणथ तक की गणना हेतु णर्शेषज्ञ की अर्श्यकता पड़ती
है। शक सम्र्त की स्थापना का कायव णर्क्रमाददत्य नामक या ईपाणध धारक शक राजा को हराने के ईपरााँत
दकया गया। ऄतः छतीसगढ़ शक सम्र्त से सीधा तादातम्य स्थाणपत करता है, परं तु यह आस क्षेत्र में
सर्ावणधक कम या नगण्य प्राय मनाए जाने र्ाला नर् र्षव है।
नाणसक ऄणभलेख, जो गौतमी पुत्र सातकणी की माता गौतमी बालाश्री द्वारा बनर्ाया गया था, में
गौतमी पुत्र सातकणी को णर्न्ध्य ऊक्षर्त, मलय, महेन्द्र, श्वेतणगरी और चकोर पर्वतों का स्र्ामी माना गया
है। आनमें से कु छ पर्वत्त बस्तर में णचणन्हत होते हैं। चकोर पर्वत्त का तादातम्य बस्तर के णचत्रकू ट पर्वत्त से
स्थाणपत दकया गया है। यह ऄनुमाणनत दकया जाता है दक, ईसने चेदद शासक महामेघर्ाहन को परास्त कर
आस क्षेत्र पर ऄणधकार दकया।
गुप्त काल का स्पष्ट प्रमाण और बस्तर या महाकााँतार एर्ं छत्तीसगढ़ या कोसल क्षेत्र का ईल्लेख
प्रयाग प्रशणस्त (Allahabad piller inscription) में णमलता है। आसकी ईन्नीसर्ीं पंणि में ईल्लेणखत है दक,
महान सम्राट द्वारा दणक्षण णर्जय ऄणभयान में जो प्रथम दो राज्य हस्तगत दकए गए। यह राज्य राजा महेन्द्र
से कोसल (छतीसगढ़) और राजा व्याघ्रराज से महाकााँतार (बस्तर) ईल्लेणखत हैं।21 कु छ आणतहासकार महेन्द्र
को र्ाकाटकों का करद सामंत (माण्डणलक) मानते हैं।22 यहााँ यह तथ्य ईभरता है दक, बस्तर (महाकााँतार)
और छतीसगढ़ (कोसल) पृथक-पृथक थे।
बस्तर के आणतहास में लगभग 400-500 इस्र्ी में नल र्ंश की ईणस्थणत रही। आस र्ंश के भर्दत्त
र्मवन ने 450 इ. के असपास शासन दकया और पड़ोसी र्ाकाटक नरे श नरे न्दरसेन (440-460) पर अक्रमण
हेतु जाना गया।23
नल शासन काल को र्ाकाटकों का समकालीन और इस्र्ी की तृतीय से पााँचर्ीं शताब्दी के मध्य
काल का माना गया है।24 आनके प्रभार् क्षेत्र में बस्तर का भाग था।25
बस्तर क्षेत्र में नलर्ंश के शासकों की स्र्णव मुद्राएं प्राप्त हुइ है। आनमें भर्दत्त, ऄथवपणत, स्तंभ एर्ं
नंदनराज प्रमुख हैं। ये णसक्के र्जन में ऄत्यंत कम हैं। ऄग्रभाग में बैठे हुए नंदी की अकृ णत है और ईसके नीचे
राजा का नाम ईल्लेणखत है।26 यह मुद्राएाँ बस्तर क्षेत्र के एड़ेगा और कोंड़ागााँर् से णमली हैं।27
नल र्ंश के ऄन्य सन्दभव भी णमले हैं। प्रथम ईि णसक्के हैं। णद्वतीय ईड़ीसा में प्राप्त दो ईल्लेख हैं।
तृतीय ऄमरार्ती (बरार) से और चौथा रायपुर णजले के राणजम से णमला है।
कसररबेड़ (णजला कोरापुट, ईड़ीसा) में प्राप्त ईत्कीणव लेख में ऄथवपणत मट्टारक का ईल्लेख है।28
20

http://en.wikipedia.org/wiki/Satavahana_dynasty

21

Corpus Fleet-Inscriptionum Indicarm,Vol. III,P.12-13

22

मदन लाल गुप्त-छत्तीसगढ़ ददग्दशवन,भाग-I,पृ.142

23

http://en.wikipedia.org/wiki/Bastar_state#History

24

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.52

25

http://kanker.gov.in/history.htm

26

http://www.cgculture.in/english/archaelogy/coins.htm

27

Allen-Catlog of Coins in Britsh musium

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एक खणण्डत णशलालेख है। आसमें िाह्मणों को दान देन,े भर्दत्त र्मवन के पुत्र स्कन्द र्मवन द्वारा नल
र्ंश की पुनः स्थापना और पुष्करी (भोपाल-पट्नम) को राजधानी बनाने का ईल्लेख है।29 बस्तर में
छत्तीसगढ़ (बस्तर) और अन्र प्रदेश की सीमा पर णस्थत भोपाल-पट्नम को पुष्करी के रूप में णचणन्हत दकया
गया है।30
स्कन्द र्मवन नें शत्रुओं को परास्त कर खोया राज्य पुनः पाया था। ईसने पोढ़ागढ़ (ईड़ीसा) में णर्ष्णु
मणन्दर का णनमावण कराया था। ईसने ऄंणतम र्ाकाटक से नागपुर-बरार क्षेत्र को भी हस्तगत दकया था।
र्ाकाटकों ने आसे पुनः भी प्राप्त कर णलया था। तथाणप नल बस्तर और कोसल में पूर्वत्त रहे।
नल र्ंश से सम्बणन्धत चौथा लेख राणजम के राणजर् लोचन मणन्दर में लगा है। आसमें पृथ्र्ीराज के
पुत्र णर्रुपाक्ष के ईत्तराणधकारी णर्लासतुंग के द्वारा ऄपने स्र्गीय पुत्र के पुण्य की र्ृणि के णलए णर्ष्णु मणन्दर
णनमावण का ईल्लेख है।31
नल दण्डकारण्य में थे। आनके र्ंशजों को अज, धारकोट के पूर्व जलमदार के र्ंशजों के रूप में
णचणन्हत दकया जाता है।32
नल शासकों की सुची णनम्ांदकत सारणी में दर्षशत है।:सारणी 2 - छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य क्षेत्र के नल शासक
स्रोत-डा.भगर्ान लसह र्माव कृ त्त छत्तीसगढ़ का आणतहास,पृ.26
क्रमांक

नाम

काल (इस्र्ी में)

1

णशशुक (संस्थापक)

290-330

2

व्याघ्रराज

330-370

3

र्ृषध्र्ज

370-400

4

र्राहराज

400-435

5

भर्दत्त र्मवन

435-465

6

ऄथवपणत

465-480

7

स्कन्द र्मवन

480-515

8

स्तम्भ

515-550

9

नन्दराज

550-585

10

पृथ्र्ीराज

585-625

11

णर्रूपराज

625-660

12

णर्लासतुंग

660-625

13

पृथ्र्ी व्याघ्र

700-740

14

भीमसेन देर्

900-935

15

नरे न्द्र धर्ल

935-960

28

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.52

29

र्ही

30

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.52

31

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.53

32

मदन लाल गुप्त-छत्तीसगढ़ ददग्दशवन,भाग-I,पृ.159

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नल काल के ऄणभलेखों में कु छ स्थानों और नामों को आंणगत दकया गया है। र्े हैं- नणन्दर्िवन,
कादम्बणगरी ग्राम, पुष्करी, के सेलक ग्राम, भीमपुर, कू मवतला ग्राम, तरभ्रमरक ग्राम, प्रस्तर र्ाटक, पर्वत्त
द्वारा, देर् भोगक, पलाश पद्रक।
ईस समय मण्डलों की व्यर्स्था भी प्रचणलत रही हो सकती है। ईसके भी संकेत हैं। यह करद थे या
स्र्तंत्र स्पष्ट नहीं है। यह मण्डल थे- चक्रकोट, भ्रमरकोट्ट, ररर्णडडर ऊाँग, कमल, र्ड़ाणड, शूल्य, नलर्ाड़ी,
कमलण्डलपट्ट।
एक मंत्री प्रेगदा का भी ईल्लेख णमलता है।
नल लोगों की राजधानी पोड़ागढ़ रही थी।
पुनः लगभग 500 र्षव तक का आणतहास णतणमरमय है। हालांदक आस काल को राष्ट्रकू ट, चाल्कु य, गंग
(ईड़ीसा के ) अदद के प्रसार ऄणभयानों से जोड़ा जाता है। गंग लोगों की ही कु छ जानकारी ईपलब्ध होती है।
गंग लोग बस्तर क्षेत्र में थे। आनका काल इस्र्ी की पााँचर्ी शताब्दी के सामापन काल से सातर्ीं
शताब्दी तक का माना जाता है।
यह तथ्य बताया जाता है दक, जगन्नाथपुरी के गंग राजा की छः संतानें थीं। ईसने ईन्हे ईत्तराणधकार
नहीं ददया और एक ऄन्य ऄर्ैध संतान, जो दासी पुत्र था, को सत्ता दे दी। र्ैध छः संतानें आधर-ईधर भटकीं।
आन छः र्ैध संतानों में से एक नें बस्तर के बारसूर में सत्ता स्थाणपत की। स्पष्ट है दक, आनका क्षेत्र भी
दण्डकारण्य में ही था। यह साथ में णर्द्वानों और कलाकारों को भी लाया था। ईनकी सहायता से मणन्दर,
तालाब अदद बनर्ाए।
एक जनश्रुणत यह है दक, एक गंग राजा के एक भााँजे ने ईत्कल कारीगरों को अहुत कर मणन्दर
णनमावण प्रारम्भ कराया। मामा-भााँजा की लड़ाइ हुइ। मामा खेत रहा। भााँजे ने मृत्तक मामा के अकार का
मुण्ड और ऄपनी मूती भी बनर्ा दी। ऄब यह मणन्दर मामा-भााँजा मणन्दर-गुड्डी कहलाताहै। यह बारसूर में
णस्थत है और संरणक्षत स्मारक है।33 मामा-भााँजा मंददर मूलत: णशर्-मंददर है। मामा-भााँजा मंददर दो गभवगृह
युि मंददर है। आनके मंडप अपस में जुड़े हुये हैं। यहााँ के भग्न मंददरों में मैथुनरत प्रणतमाओं का ऄंकन भी
णमलता है।
यह माना जाता है दक, एक संरणक्षत स्मारक- दंतेश्वरी मणन्दर- में गंगों द्वारा बनर्ाए गए मणन्दरों से
ली गइ कइ मूर्षतयााँ, पत्थर, स्तम्भ अदद लगे हैं। एक ग्राम का नाम भी गंगमालूर है।
गंगों के ऄणधकार क्षेत्र- णत्रकललग- को ईड़ीसा के कोरापुट, कालाहांड़ी और बस्तर या दण्डकारण्य के
ऄंश पहाड़ी भाग के रूप में णचणन्हत दकया जाता है।
गंग आन्द्र र्मवन के एक दानपत्र में र्ह स्र्यं को णत्रकललगाणधपणत कहता है। ईसकी राजधानी समुद्र
तट पर णस्थत दंतपुर थी। र्ह णमत र्मवन का पुत्र था। एक ऄन्य दानपत्र से ज्ञात होता है दक, ईससे कु रू का
33

http://www.cgculture.in/english/archaelogy/CENTER_PROTECTED_MONUMENTS/CENTER_PROTE
CTED_INDEX.htm

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आन्द्र भटारक पराणजत हुअ था। फ्लीट आसे पूर्ी चालुक्य जय लसह प्रथम का ऄनुज और कीलहानव बेगी का
णर्ष्णु कु णण्डन राजा मानते हैं। आसके ईपरााँत गंग राजा सामंत र्मवन ने सौम्य र्न को ऄपनी राजधानी
बनाया। आसने पोन्नुतुरु दानपत्र ज़ारी दकया था। ईसने आन्हे पराणजत कर सकल कललगाणधपणत की ईपाणध
धारण की। ईसने कललग नगर को राजधानी बनाया। आसके ईपरााँत आन्द्र र्मवन शासक रहा।
गंग लोगों के ईपरााँत, बारासूर या बस्तर क्षेत्र पर, नाग र्ंश का ऄणधपत्य रहा। आस काल में, यह
क्षेत्र, चक्रकोट (णचत्रकोट), भ्रमरकोट, भ्रमर भद्र अदद नामों से जाना गया। राज्य णर्स्तार हेतु रतनपुर के
कल्चुरी भी आन्ही से टकराए थे। तब चक्रकोट राज्य की राजधानी बारासूर थी। बारासुर प्राचीन राजधानी
नगर रहा है। बारसूर नाग राजाओं एर्ं काकतीय शासकों की राजधानी रहा है। यहााँ ग्यारहर्ीं एर्ं बारहर्ीं
शताब्दी के मंददर के हैं। मामा-भााँजा मणन्दर का ईल्लेख उपर अ चुका है। डा.के .के .झा के ऄनुसार यह नगर
प्राचीन काल में र्ेर्श्वतपुर के नाम से जाना जाता था। चन्द्राददत्य मंददर का णनमावण नाग राजा चन्द्राददत्य
ने करर्ाया था एर्ं ईन्हीं के नाम पर आस मंददर को जाना जाता है। बत्तीस स्तंभों पर खड़े बत्तीसा मंददर का
णनमावण बलुअ पत्थर से हुअ है। आसका णनमावण गुण्डमहादेर्ी ने सोमेश्वर देर् के शासन काल में
दकया। बारासुर में बड़ी गणेश प्रणतमा भी है। नाग लोगों का एक णशलालेख सम्र्त 945 (1023 इ.) का है।
चक्रकोट में नाग लगभग 300 र्षव रहे। आन पर दणक्षण गोदार्री पार से भी धार्े हुए। आन्हे णछन्दक नाग
कहा जाता है। चक्रकोट में आसका संस्थापक नृपणत भूषण माना जाता है। आस र्ंश के एक ऄन्य शासक- धारा
र्षव- का ईल्लेख भी अता है।
नृपणत भूषण, जगदेर् भूषण अदद आस र्ंश से सम्बणन्धत शासक थे। जगदेर् भूषण के पुत्र सोमेश्वर
देर् अन्नद ने दणक्षण के बड़े भू-भाग पर ऄणधपत्य दकया।
नाग र्ंश की तीन शाखाओं का ईल्लेख णमलता है। आनके प्रतीक क्रमशः मुकुट पर सपवध्र्ज के साथ
शार्क, धनुव्याघ्र और ईभय लक्षण युि णचणन्हत हुए हैं। प्रथम दो बस्तर क्षेत्र से और तृतीय राजनााँदगााँर्
णजले के भैरर्गढ़ से सम्बणन्धत है।
बस्तर में नाग र्ंश का प्रथम शासक ऄथावत संस्थापक गोपाल देर् माना जाता है। आस र्ंश का काल
935 से 1324 इस्र्ी माना गया है। यह भी माना जाता है दक, बस्तर में 24 नाग र्ंशी शासक हुए। ऄथावत
ईनके र्ंश ने लम्बे समय तक शासन दकया।
बस्तर का नाग र्ंश णछन्दक और कर्धाव का फणी कहलाता है। कर्धाव के चौरा में मण्डर्ा मणन्दर
और भोरमदेर् का णशर्ललग ईनके द्वारा बनर्ाया गया।
णमथकों में नाग कन्याएाँ सुन्दर मानी गइ हैं। सभी णमथकीय कथाओं के णर्र्ाह नाग कन्याओं से होने
पाए जाते हैं या कभी-कभी ग्र्ाल या गोली कन्याओं से।
नाग र्ंश को सूयव र्ंशी क्षत्री माना जाता है। सूयवर्ंशी क्षत्रीय भारत के मूल क्षत्री माने जाए हैं और
आस कारण से नाग लोग भी।34 लाल प्रद्युमन लसह ईन्हे सूयव णपता कश्यप से ईत्पन्न मानते हैं।35 िाह्मण

34

http://en.wikipedia.org/wiki/Nagavanshi

35

Lal Pradaman Singh: The history of Nagavansh

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कश्यप की चार पणत्नयों में से तीसरी-कदरो- से आनकी ईत्पत्ती मानी गइ है। प्रथम दो से देर् और गरुण तथा
चौथी से दत्यों की।36 र्े माता के नाम पर कदरोजा भी कहे जाते हैं।
डा. नर्ल णर्योगी यह मानते हैं दक, नाग र्ंश ने णर्णभन्न कालों में राष्ट्र के कइ भागों पर शासन
दकया।37
आनके भी कइ र्ंश हुए। यथा- कारकोटका, तक्षक, शेष, र्ासुकी, ऄणह, मणहभंडारा अदद। आसमें भी
धाराएाँ बनीं। यथा- बैस, णसद, कु षाण, सैधर् अदद।38
दणक्षण के नणम्बयार, दकयावणथल नायर, बुाँट39 [बुाँट समुदाय तुलु-नाडू (तुलु भाषी) में है। राजा कृ ष्णदेर्
राय,एश्वयव राय-बच्चन, णशल्पा शेट्टी अदद आसी समुदाय से हैं। ] अदद को भी आनसे जोड़ा जाता है।40 जाटों में भी आसके
कइ र्ंश हुए। पद्मार्ती क्षेत्र में नाग लोग भारणशर् कहलाए।
महाभारत में तो आनके कइ सन्दभव हैं। यथा- चेर (के रल), नेर्ार (नेपाल), दकरात (कश्मीर) अदद।
ऄजुवन पणत्न ईलूपी आस र्ंश से थी।
नाग र्ंश का प्रथम शासक ऄनंत माना जाता है। तदुपरांत र्ासुदक, तक्षक अदद अते हैं। कु रु
जनमेजय द्वारा आन्हे सर्ावणधक अहत दकया गया। आसे िाहमण अणस्तक द्वारा रोका गया। ईसकी माता नाग
कन्या थी। र्ह र्ासुदक की बहन जरातकरु थी। परम्परा में यह लोग पाताल लोक के शासक कहे गए हैं।
आनसे सम्बणन्धत एक श्लोक का ईिरण णनम्ांदकत है।41

36

दैणनक जागरण,25 जुलाइ’2006 और http://en.wikipedia.org/wiki/Naga_(clan)

37

Dr Naval Viyogi: Nagas the Ancient Rulers of India, p.228 [They were the indigenous Kshatriyas of

India. They ruled all over India during various periods of history and pre-historic time. Some of the
Naga Kings and families can be enumerated as under: Ahivritra, Ashwasena, Takshaka, Gonanda,
Lohara, Karkota of North; Brahamadutta of Kashi, Sishunaga of Magadha, Nagas of North east;
Nagas of Padmavati (Bhaarshiva भारणशर्), Vidisa, Eran, Mathura, Ahichchhattra, Kausambi, Malava,
Chakrakot, Bhogwati, in Central India; Andhra or Satvahanas (235 BC -225 AD) Chuttus, Chalukya,
Pallava, Kadamba, Chhindaka, Chera, Chola of South India etc. Most of the above Naga families
ruled between 500 BC and 500 AD and some of them onward up to the Mughal period. http://en.wikipedia.org/wiki/Nagavanshi
38

http://en.wikipedia.org/wiki/Nagavanshi

39

बुाँट समुदाय तुलु-नाडू (तुलु भाषी) में है। राजा कृ ष्णदेर् राय,एश्वयव राय-बच्चन, णशल्पा शेट्टी अदद आसी समुदाय से हैं।

http://en.wikipedia.org/wiki/Bunt_(community)
40

Ramananda Chatterjee (1907). The Modern Review. Prabasi Press Private, Ltd. p. 695. और Dr.

Hermann Gundert, Keralolpathiyum Mattum, (Band 4, Hermann Gundert Series, Eight works
published during 1843-1904) (Kottayam: Current Books, 1992), p 185
41

दैणनक भास्कर,30 जुलाइ’2006 और http://en.wikipedia.org/wiki/Naga_(clan)

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ऄनन्तं र्ासुफक शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् ।
शंखपालं धातवराष्ट्रं तक्षकं काणलयं तथा ।।
एताणन नर्नामाणन च महात्मनाम् ।
नाग पंचमी, नागौर (नगर), नागौर (िाहमण), नागपुर, ऄनंत नाग (नाग राजा ऄन्नत) , तक्षणशला
(तक्षक से), नागालैण्ड, नाग पूजा अदद को आनसे जोड़ा जाता है।
ऄब बस्तर में णचत्रकोट नाम से प्रणसि जल प्रपात है।

णचत्र 1 - णचत्रकोट

णचत्र 2 - दंतश्व
े री

स्रोत- http://bastercg.blogspot.com/ और http://www.sahityashilpi.com/2009/03/2.html

नाग र्ंश के ईपरााँत काकतीय र्ंश का ईल्लेख अता है। र्ारं गल में काकतीय र्ंश की अठर्ीं
शाणसका महारानी रूद्रांबा के बड़े नाती प्रतापरुद्र देर् आस क्षेत्र में काकतीय र्ंश के संस्थापक थे।
काकतीय र्ंश को चालुक्य र्ंश के नाम से भी जाना जाता रहा है। काकतीय र्ंश का ईदय दणक्षण
भारत के तेलंगाना राज्य से माना जाता है। अाँर का प्राचीन नाम णत्रलंग था और ईसका कारण र्हााँ णशर् के
ललग की तीन पीठों-श्रीशैल,श्रीकालेशर्र और द्राक्षाराम-का होना था। यह ही ऄपभ्रंणशत हो कर तेलंगाना
बना। यहााँ के योिा साहसी लड़ाके हुए और णतलंग कहलाए और कु छ जाणतगत णर्शेषण यथा-तैलंग अदद
भी आसी से बने। तेलंगाना के काकतीपुर में आस र्ंश ने प्रथम नगर की स्थापना की और आसी नगर से आस र्ंश
ने ऄपना र्ंशनाम काकतीय प्राप्त दकया। काकतीय दुगाव का पयावयर्ाची है।
यह माना जाता है दक, दंतेशर्री माइ ने ही ईन्हे राज प्रदान दकया और ईन्होंनें यह अणशर्ावद ददया
दक र्स्त्र (अाँचल) छोर पकड़ कर, जहााँ तक जा सकें गें र्ह राज्य का णर्स्तार होगा। यह र्स्त्र ही बस्तर की
व्युत्पणत का कारण माना गया। आन्होंने राजा के दैणर्य णसिांत को ऄपने पक्ष में प्रयुि दकया।
प्रतापरूद्र देर् ऄपने णपता द्वारा युर्राज पद प्रदान ईपरााँत णर्जय ऄणभयान हेतु भेजा गया था। आस
णर्जय ऄणभयान का र्णवन नाटक- प्रतापाददत्य णर्जय- में है। जब कइ अक्रमणों के ईपरााँत मुणस्लम ऄक्रांता,
ईसे, र्ारं गल से भगाने में सफल हुए, तब र्ह एक छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ बस्तर पहुाँचा और ईसने
स्थानीय छोटे-छोटे शासकों को पराणजत कर ईन पर ऄपना ऄणधकार स्थाणपत कर र्ारं गल र्ापस चला
गया। र्ह र्हााँ शासक हुअ।

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प्रताप रूद्र की मृत्यु ईपरााँत, ईसका भाइ ऄन्नमदेर् (1313-1358) र्ारं गल से अया और ईसने
बस्तर क्षेत्र में शासन सम्हाला। आसे बस्तर ररयासत और छत्तीसगढ़ के ऄपेक्षाकृ त पुराने शासक पररर्ार का
प्रारम्भ कह सकते हैं।
अन्नम देर् ने लगभग 42 र्षव शासन दकया और 77 र्षव की अयु में मृत्यु को प्राप्त हुअ। ईस ने
बारसूर तथा दण्तेर्ाड़ा पर णर्जय प्राप्त कर, नागर्ंशी राजाओं की राजधानी रहे चक्रकू ट, पर णर्जय प्राप्त
की।
देर्ी र्रदान और राजा के दैर्ीय णसिाँत को आस से भी जोड़ा गया और यह कहा गया दक, आसका
राज्य ईनके चलते रहने से ईत्पन्न पायल ध्र्णन के सुनाइ देने तक साथ चलते रहने की दूरी तक जाएगा, जब
तक र्ह पीछे न मुड़।े र्ह नदी रे त में देर्ी के पैर धंसने के कारण बन्द हुइ ध्र्णन के कारण मुड़ा और राज्य
र्हााँ सीणमत हुअ। र्ह नदी पैर से पैरी कहलाइ।
ऄन्नम देर् के पिात हमीरदेर् (1358-1379) शासक रहा। तदुपरांत ईसके पुत्र मयराज देर्
(1379-1408) ने शासन दकया। मयराज देर् ने नागर्ंशी राजाओं की बची-खुची शणि को भी समाप्त दकया
और बड़े डोंगर का क्षेत्र भी ईनसे हस्तगत करने में सफल रहा।
मयराज देर् का पुत्र पुरूषोत्तम देर् (1408-1439) ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। र्ह महत्र्ाकााँक्षी
था। ईसने रायपुर के कल्चुररयों पर ऄसफल अक्रमण दकया।
पुरूषोत्तम देर् ने पैदल जगन्नाथ पुरी तीथव की यात्रा की और भगर्ान जगन्नाथ के मंददर में सोनाचांदी , हीरे -जर्ाहरात ऄर्षपत दकए। स्र्प्न में भगर्ान जगन्नाथ ने ईन्हें रथपणत कहा। यह पुनः राजा के
दैणर्य णसिांत को प्रयुि करना था। आस कारण, तब से, बस्तर के प्रणसि दशहरे में णर्शाल काष्ठ रथ की
पररक्रमा की नींर् पड़ी और ईस पर राजा णर्राजने लगे। ऄब मााँ दंतेश्वरी का छत्र रथ पर रखा जाता है और
साथ में पुजारी णर्राजते हैं। आस र्ंश ने राजा के दैर्ीय शणि णसिांत का पूणव दोहन दकया।
पुरूषोत्तम देर् के शासन काल में राजधानी मंधोता से बस्तर लाइ गइ।
पुरूषोत्तम देर् के पिात ईसका पुत्र जयलसह देर् ने (1439 -1457) शासक हुअ। तदुपरांत ईसके
पुत्र नरलसह देर् (1457-1501) ने 44 र्षों तक शासन दकया।
नरलसहदेर् की मृत्यु के पिात प्रताप राज देर् णसहांसनारूढ़ हुअ। ईसने पड़ोसी राज्य गोलकु ण्डा
पर ऄसफल अक्रमण दकया और पराणजत हो र्नों में जा णछपा। दुगवम और सघन ऄरण्य़ के कारण गोलकु ण्डा
की सेना को र्ाणपस जाना पड़ा और काकतीय र्ंश एर्ं प्रताप राज देर् का णसहााँसन बच गया।
प्रतापदेर् के पिात ईनका पुत्र जगदीश राय देर् (1524-1538) और तदुपरांत ईसका पुत्र र्ीर
नारायण देर् (1538- 1553 ) ईत्तराणधकारी हुए।
र्ीर नारायण देर् का पुत्र र्ीर लसह देर् (1553-1620) ऄगला ईत्तराणधकारी हुअ। ईसके काल में
कल्चुरी राजा णत्रभुर्न साय42 की बस्तर पर णर्जय बताइ जाती है। पर आस णर्जय ने ररयासत का ऄणस्तत्र्
नष्ट नहीं दकया।
यह काल मुगल शासन काल भी रहा है, फकतु मुगलों ने भी कभी बस्तर पर णर्जय के प्रयास नहीं
दकए।
पन्द्रहर्ीं शताब्दी में ही दकसी समय कााँकेर ररयासत का ऄणस्तत्र्, बस्तर से पृथक हो, सामने अया।
बस्तर का ऄगला शासक दृगपाल देर् (1620-1649) था। ईसका शासन काल के र्षव ऄणधक स्पष्ट
नहीं हो पाए हैं।
दृगपाल देर् की ऄल्प अयु में मृत्यु के कारण ईसका 13 र्षीय ऄव्यस्क पुत्र राज(या रक्ष)पाल देर्
(1649-....) सत्ता में अया। आसके काल में गोलकुं डा के मुणस्लम शासक ने बस्तर पर अक्रमण दकया।

42

कल्चुरी आणतहास में आसका काल 1622 के असपास का बताया गया है। पर ऄन्य तथ्य ऄन्र्ेणषत और ईल्लेणखत नहीं हैं।

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राज(या रक्ष)पाल देर् को गुप्त स्थान पर जाना पड़ा। र्हीं रानी रुद्र कुं र्र को एक िाह्मण के घर शरण लेनी
पड़ी, जहााँ दलपत देर् का जन्म हुअ।
राज(या रक्ष)पाल देर् की मृत्यु के पिात सत्ता का संघषव गहरा गया एर्ं ईसके ज्येष्ठ पुत्र दलपत देर्
की ऄनुपणस्थणत का लाभ ईठाकर ईसकी सौतेली मााँ (बघेल) ने ऄपने भाइ को गद्दी सौंप दी। आस तरह
शासन बघेल राजपूत र्ंश के पास चला गया।
कइ र्षों के ईपरााँत दलपत देर् ने जैपुर राजा की सहायता से खोया हुअ राज्य पुन: प्राप्त दकया
और र्ह सही मायनों में 1722 में ही शासक बन पाया।
आसके काल में नागपुर के भोंसला मराठों का हस्तक्षेप बस्तर राज्य में प्रारम्भ हो गया था। दलपत
देर् के छोटे भाइ प्रताप देर् ने मराठों की सहायता से दलपत देर् को हटाने और स्र्यं शासक बनने का भी
प्रयास दकया। आसके ही काल में हैदराबाद के णनज़ामों ने भी बस्तर पर अक्रमण दकया। दलपत देर् के द्वारा
बनाया गया णर्शाल तालाब-दलपत सागर- जगदलपुर में है।
दलपत देर् के पुत्र दररयार् देर् ने सन् 1775 में राजपाट की बागडोर संभाली। ऄब दररयार् देर् के
भाइ ऄजमेर लसह ने भी अपना दार्ा प्रस्तुत दकया। ऄजमेर लसह, 7 राणनयों में, पटरानी (कााँकेर के गोर
साय देर् की पुत्री) का पुत्र था, फकतु ईम्र में र्ह दररयार् देर् से छोटा था। ऄत: णद्वतीय रानी का पुत्र होने
के बार्जूद ज्येष्ठ पुत्राणधकार के तहत राजपाट दररयार् देर् को ही प्राप्त हुअ।
दार्े में ऄसफल ऄजमेर लसह ने बड़े डोंगर क्षेत्र पर ऄणधकार कर ऄपने अप को र्हााँ का राजा
घोणषत कर ददया। ऄजमेर लसह कााँकेर के शासक का दामाद भी था। ऄत: ईसने कााँकेर के राजा के साथ
णमल कर दररयार् देर् पर अक्रमण कर परास्त कर ददया। दररयार् देर् को भाग कर जैपुर शासक के पास
शरण लेनी पड़ी। ऄब ऄजमेर पूरे बस्तर का शासक था।
यह णस्थणत लगभ दो र्षों तक रही। दररयार् देर् ने जैपुर राजा और रतनपुर/रायपुर के मराठा
सरदार णबम्बाजी भोंसले के साथ संणध की और आस सणम्मणलत सैणनक सहायता से, र्ह, ऄजमेर लसह को
परास्त करने में सफल रहा। ऄजमेर लसह बड़े डोंगर भाग गया। यहााँ से ईसने पुन: दररयार् देर् पर अक्रमण
दकया। दररयार् देर् ने संणध करने के बहाने ईसे बुलाया और ऄचानक अक्रमण कर घायल कर ददया।
तत्पिात ईसकी मृत्यु, घार्ों के कारण, हो गइ।
आस प्रकार दररयार् देर् के काल में बस्तर का द्वार मराठों और जैपुर राज्य द्वारा देख णलया गया
और ईनकी घुसपैठ और हस्तक्षेप प्रारम्भ हो गए।
दररयार् देर् के शासन काल के पिात से, बस्तर, दकसी ना दकसी रूप में बाहरी हस्तक्षेप का
णशकार रहा।
बड़े डोंगर क्षेत्र के हलबा लोगों ने कभी दररयार् देर् का समथवन नहीं दकया। ऄत: दररयार् देर् ने
बड़े डोंगर के हलबा लोगों का क्रूरता के साथ दमन दकया। र्े णचत्रकोट प्रपात से नीचे फें क ददए गए। कहते हैं
र्हााँ से मात्र एक हलबा व्यणि ही भाग कर ऄपनी जान बचा पाया।43
बस्तर में डोंगर का क्षेत्र हल्बा जनजाणत के लोगों का स्र्तंत्र क्षेत्र था, जो बस्तर ररयासत के ऄधीन
अ गया था। बस्तर शासक दलपत लसह ने भी ईसे ईपराजधानी बना, ऄपने पुत्र ऄजमेर लसह को ही ईस
क्षेत्र का प्रभार ददया। दलपत के ईपरााँत 1774 में दररयार् देर् बस्तर का शासक हुअ। ईसने डोंगर क्षेत्र की
ईपेक्षा का मागव ऄपनाया। ऄजमेर को दबार् में रखा। डोंगर में ऄकाल भी फै ल गया। ऄराजकता की णस्थणत
बन गइ। दररयार् ने ड़ोंगर पर अक्रमण भी कर ददया। आस समय डोंगर की रक्षा हेतु कााँकेर ररयासत की
सेना भी सहायता कर रही थी। बस्तर शासक दररयार् ही हारा और र्ापस जगदलपुर अ गया। ऄब डोंगर
के हल्बा जनजाणत के लोग णर्द्रोह को ईदत्त हुए और बस्तर को ही हस्तगत करना चाहा। णर्द्रोही सफल हुए
43

http://www.scribd.com/doc/20206344/Halba-Tribe

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और दररयार् जैपुर भाग गया। इस्ट आणण्डया कम्पनी ऐसा नहीं चाहती थी। दररयार् ने सणन्धयों द्वारा
कम्पनी, मराठा (नागपुर भोसले) और जैपुर शासक से पृथक-पृथक सेना एकत्र की और सेना की संख्या
20,000 तक कर णर्द्रोणहयों से सत्ता र्ाणपस लेने में सफल रहा। ऄब ईसने डोंगर क्षेत्र पर पुनः अक्रमण कर
हल्बाओं को पराणजत दकया। ऄजमेर भी मारा गया। हल्बाओं को मौत के घाट ईतारा गया। व्यापक नर
संहार दकया गया। हल्बा क्रााँणत समाप्त कर दी गइ, पर बस्तर शासक की णस्थणत कमज़ोर हुइ। ईसे 6
ऄप्रैल’1778 की सणन्ध द्वारा मराठा भोंसलों की ऄधीनता माननी पड़ी। जैपुर को सहायता के बदले
कोटपाड़ परगना देना पड़ा।
दररयार् देर् ने ऄपनी राजधानी जगदलपुर से के सलूर स्थानांतररत कर दी थी।
1795 का ऄंग्रेज प्रर्ेश णर्रोध या णर्द्रोह के संकेत या अधार के रूप में णलया जाता हैं। कै प्टन
जे.टी.ब्लंट का बस्तर सीमा पर पहुाँचने पर बस्तर प्रर्ेश कर जगदलपुर जाने का णर्रोध दकया गया और
र्ह कलकत्ता लौटने को बाध्य हुअ। कहीं-कहीं आसे भोपालपट्नम संघ्रषव कहा गया है, पर क्यों यह स्पष्ट
नहीं है।
दररयार् देर् की मृत्यु के पिात ईसका ऄर्यस्क पुत्र मणहपाल देर्, जो दक ईस समय मात्र 9 र्षव
का था, लसहासनारूढ़ हुअ। राज काज का संचालन, ईसके चाचा ईमरार् लसह के हाथ में था। बाद में,
ईमरार् लसह ने मराठों की सहायता से बस्तर पर अक्रमण भी दकया। रामचन्द्र बाध के नेतृत्र् में मराठों ने
मणहपाल लसह को परास्त दकया और ईमरार् लसह शासक बन गया। मराठा सेना की र्ापसी के पिात
मणहपाल राज्य पुनः प्राप्त करने में सफल रहा। पूर्व में कोटपाड़, पोड़ागढ़ (नल र्ंश की राजधानी),
रायगढ़, ईमरकोट अदद क्षेत्र संणध द्वारा जैपुर को दे ददए दए थे। ऄब ईमरार् ने ईन्हें पुन: प्राप्त करने का
प्रयास दकया, पर ऄसफल रहा। यह क्षेत्र सदा के णलए ररयासत से णनकल गए और ऄब ईड़ीसा राज्य का
ही भाग हैं।
बस्तर पर,काकतीय र्ंश के पहले कभी नलर्ंश का भी शासन रहा था। नल लोगों की राजधानी
पोड़ागढ़ ही रही थी।
1825 का परलकोट के ऄबूझमाणड़या जनजातीय लोगों का णर्द्रोह बाहरी लोगों- ऄंग्रेज और
मराठों- की बस्तर क्षेत्र में ईपणस्थणत के प्रणत णर्द्रोह था। साथ ही मराठों द्वारा लागाए गए नए करों का
णर्रोध था। पूर्व में परलकोट बस्तर शासकों का मुख्यालय रहा था। यह बस्तर के ईत्तर में है। यह ऄब
जमीन्दारी था और ईसमें 165 ग्राम थे। ऄबूझमाणड़या जनजाणत के जणमन्दार कालीद्र लसह को भुणमक राजा
की ईपाणध थी। आस णर्द्रोह का नेतत्ृ र्कताव गेन्द लसह था। ईसके नेतृत्र् में ऄबूझमाणड़या लोगों ने बाहरी
ऄंग्रेज और मराठों पर अक्रमण दकए। जो लोग जनजाणतय र्गव में नहीं थे, र्े ईनके णनशाने पर थे। हजारों
लोग पारम्पररक हणथयारों के साथ अते और अक्रमण कर चले जाते। इस्ट आणण्डया कम्पनी के प्रशासक
एग्न्यु ने णर्द्रोह को कु चलने के णलए चााँदा से ऄधुणनक हणथयार युि मराठा सेना भेजी। ऄबूझमाणड़या
छापामार अक्रमण करने लगे। 10 जनर्री’1825 को परकोट घेर गेन्द लसह को णगरफ़्तार कर महल के
सामने क्रूर सार्वजणनक फााँसी पर लटका ददया गया। गेन्द लसह को ऄभी सोनाखान के नारायण लसह जैसा
सम्मान नहीं है। क्या आस घटना से भी नाक्सलर्ाद के मूल कारणों और ईभारों के णलए कोइ संकेत जाता
है? क्या बस्तर क्षेत्र के सभी णर्द्रोहों में मूल स्र्र भी यह ही हैं? यथा- बाहरी हस्ताक्षेप और बसाहट, कर,
दोहन, शोषण, दबार् (सभ्यता,सांस्कृ णतक,कर, भूणम सणहत), णर्कास हेतु भूणम-र्न-जल-पररर्ेश-अराध्य
का छीना जाना, मूल क्षेत्र से पलायन को मजबूर करना अदद?44
44

देखें जनसत्ता और हंस (जनर्री’2010,पृ.37-40) में प्रकाणशत ऄरुन्धती राय का लेख -अंतररक सुरक्षा या युि।

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नागपुर में भोंसलों के पराभार् और ऄंग्रेज इस्ट आंणण्डया कम्पनी के प्रभार् में र्ृणि के कारण
मणहपाल देर् ने ऄंग्रेज सत्ता के प्रणतणनणध मेजर पी.र्ाय. एग्न्यू के साथ संणध की। संणध में मणहपाल देर् ने
नागपुर राज्य के ऄधीन रहना स्र्ीकार दकया। ऄब णिरटश रे ज़ीडेन्ट का हस्तक्षेप बढ़ना ही था। 1836 से
बस्तर में दीर्ान णनयुणि पर ऄंग्रेज रे ज़ीडेंट की णस्र्कृ णत को ऄणनर्ायव बना ददया गया, साथ ही दीर्ान के
ऄणधकार राजा के बराबर होने लगे और दोनों में टकरार् की णस्थणत भी बनने लगी। र्ास्तर् में राजा के
ऄणधकार ऄंग्रेजों के हाथ में जाने लगे।
मणहपाल देर् की मृत्यु के पिात ईसका पुत्र भूपाल देर् (1842-1853) सत्ता में अया। ईसका
सौतेले भाइ लाल दलगंजन लसह से जीर्न पयंत संघषव चलता रहा। भूपाल लसह ने लाल दलगंजन लसह को
ऄणधकार भी ददए, पर र्ह ऄसंतुष्ट ही रहा। ईसने नागपुर के मराठा शासकों और ऄंग्रेजों के साथ णमल कर
भूपाल के णर्रूि णशकायतें खड़ी की। प्रजा को भी भड़काया।
तारापुर का णर्द्रोह 1842-45 में हुअ। बस्तर के शासक भूपल देर् थे। ईनका भाइ दलगंजन लसह
तारापुर का प्रशासक था। आस स्थान का ईपयोग जैपुर के णर्रुि सेना को रखने के णलए दकया जा रहा था।
मराठा भोंसले शासकों द्वारा तारापुर परगने से णलए जाने र्ाले र्ार्षषक रटकोली कर की र्ृणि कर दी गइ।
दलगंजन का णर्रोध नहीं णस्र्कार हुअ, तो जनजातीय लोगों ने णर्द्रोह की सलाह दी। कइ ऄनेक करों और
हस्ताक्षेपों से जनजातीय लोग त्रस्त थे। आसका प्रतीक मराठा दीर्ान जगबन्धु माना जाता था। ईसे स्र्तः
प्रेररत जनजातीय जनता ने पकड़ णलया और दलगंजन के समझ प्रस्तुत दकया। दलगंजन ने ईसे मुि कर
ददया। जगबन्धु ने नागपुर जा णशकायत की। नागपुर से सेना भेजी गइ। जनता ने युि दकया, पर पराणजत
हुइ। दलगंजन को अत्म समपवण करना पड़ा। ईसे नागपुर ले जा कर छः माह का कारार्ास ददया गया।
ईत्तेणजत जनजातीय भार्ना को सम बनाए रखने के णलए दीर्ान को यहााँ से हटा णलया गया और ईन पर
लादे गए कर हटाए गए। क्या आस घटना में भी ईपरोि णर्द्रोह जैसे साम्य और कारण ददखते है?
भूपालदेर् के शासन काल का ऄणधकांश समय ऄपने सौतेले भाइ के साथ संघषव में ही णनकला।
भूपाल ने ऄपने शासन काल में बहुत से तालाब बनर्ाए। ईनमें से कु छ अज भी सुरणक्षत हैं।
ईसकी की मृत्यु 47 र्षव की अयु में हुइ।
भूपाल की ऄपेक्षाकृ त कम अयु में मृत्यु के कारण ईसका ऄर्यस्क पुत्र भैरम देर् सत्ता में अया।
भूपाल देर् की णशकायत पर नागपुर में जेल की सजा काट रहे, ईसके चाचा को, शासन की देखभाल के णलए
बस्तर भेजा गया।
आसी समय लाडव डलहौजी की हड़पनीणत के तहत नागपुर का मराठा राज्य सीधे ऄंग्रजों के णनयंत्रण
में चला गया, क्योंदक भोंसले राजा रधुजी तृतीय 1853 में णनःसंतान फौत हुए।
ऄब छत्तीसगढ़ के ऄंग्रेज णडप्टी कमीश्नर बस्तर दौरे पर भी अने लगे। यथा- 1855 जाजव आणलयट
और 1862 में ग्लासफोडव।
1861 में बस्तर ऄंग्रेजों के मध्य प्रााँत और बरार राज्य में सम्मणलत कर णलया गया।
दन्तेर्ाड़ा के माणड़या अददर्ाणसयों का णर्द्रोह 5642- 86 में हुअ। ऄंग्रेजों ने दणक्षण बस्तर के
दंतेर्ाड़ा मणन्दर में नर बणल प्रथा का णनषेध करने के णलए बस्तर ररयासत के शासक को णनदेणशत दकया।
बस्तर शासक के अदेश ईपरााँत भी प्रथा ज़ारी रही। ऄतः नागपुर से सेना भेजी गइ ,जो दंतेर्ाड़ा मणन्दर में
नर बणल रोकने के ईद्देश्य से तैनात की गइ। जनजातीय लोगों ने णर्द्रोह कर ददया। दंतर्
े ाड़ा को णनणषि क्षेत्र
घोणषत कर रायपुर से तहसीलदार शेर खााँ को दंतेर्ाड़ा भेजा गया। पुजारी श्याम सुन्दर ने णर्रोध को और
हर्ा दी। णहड़मा मांझी के नेतृत्र् में सेना हटाने की मााँग की गइ। मााँग ऄणस्र्कार कर मुणस्लम सैणनकों को
अगे कर ददया गया। जनजातीय लोग छापामार अक्रमण करने लगे। ऄणतररि सेना बुला ली गइ। णर्द्रोह
को क्रूरतापूरर्क कु चल ददया गया। णर्द्रोणहयों पर ऄत्याचार दकए गए। नर बणल रोक का पालन कराया
गया। यहााँ प्रसंगर्श ईल्लेख यह भी है दक1830 से 1854 मध्य जब भोंसला शासन छत्तीसगढ़ में पुनः अया
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था ,तब नागपुर भोंसला शासक पर ऄंग्रेजों का प्रभार् पूरा समाप्त नहीं हुअ था। र्े ईसे णनदेश दे पाते थे।
ईसे दकसी सीमा तक णनयंणत्रत भी करते थे। आसका स्पष्ट प्रमाण नर बणल ईन्नमूलन से णमलता है। बस्तर
ररयासत करोन्द जणमन्दारी की जनजाणतयों में नर बली प्रथा थी। ऄंग्रेजों ने आसे रोकना चाहा45 और
भोंसला शासक से ऄपने प्रभार् का ईपयोग करने का अग्रह दकया, णजस पर नागपुर राजा ने ईन्हे पूरी तरह
ऄस्र्स्त दकया46। आसके णलए ऄंग्रेज एजेंट को पुणलस और फौजदारी के सभी ऄणधकार ददए गए। कनवल
कैं म्पबैल नर बली सपाणप्त हेतु णर्शेष रूप से तैनात दकए गए। करौन्द में आन ऄणधकारों का प्रयोग दकया
गया।47 यहााँ सैणनक व्यर्स्था कायम की गइ। जैसा दक, उपर ईल्लेख अ चुका है, बस्तर में भी पैदल सेना
की एक टुकड़ी भेजी गइ और आस प्रथा को रोका गया।
कु इ णर्द्रोह 1859 में हुअ। भेजी, कोतापल्ली और फोतके ल के जनजातीय लोग कु इ कहे जाते थे।
कोन्ध जनजाणत की बोली को भी कु इ कहा जाता है। ऄंग्रेज र्न नीणत के तहत साल र्ृक्षों की कटाइ का
णर्रोध, र्नों का दोहन और आस हेतु बाहरी तत्र्ों का प्रर्ेश णर्रोध का कारण थे। यही र्न नीणत ऄभी भी
लागू है। आस णर्द्रोह को र्न सत्याग्रह / णर्द्रोहो की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। भेजी, कोतापल्ली और
फोतके ल के जमीन्दारों ने 1859 में साल र्ृक्ष कटाइ णनषेध का णनणवय णलया। ईसकी कटाइ का ठे का ददया
गया था। यह ठे का हैदराबाद के व्यापारी हररदास भगर्ानदास को णमला था। र्ह क्रूर और शोषक व्यर्सायी
था। र्ह काटी गइ काष्ठ का मूल्य और मज़दूरी भी नहीं चुकाता था ऄथावत चोरी और सीनाज़ोरी, जो बस्तर
सणहत जनजाणतयों के शोषण का अम ईपकरण है। ऄंग्रेज शासक ईसके णर्रुि की गइ णशकायत ऄनसुनी
करते थे। ऄपराधी व्यापारी-ऄफसर-शासक गठजोड़ से शोषण और लाभ मुख्य हो जाता है। ऄतः जमीन्दार
एकजुट हो णर्रोध पर अ गए। ऄंग्रेज शासन, र्ृक्ष कटाइ हेतु, श्रणमकों के साथ बन्दूकधारी णसपाही भेजने
लगा। मतलब दोहन हेतु बन्दूक भी जायज़ हणथयार के रूप में भेजी गइ। जनजातीय लोग मशाल और
पारम्पररक हणथयारों- भाले, तलर्ार, तीर-धनुष अदद- के साथ र्नों में अ गए। एक साल र्ृक्ष के णलए एक
व्यणि णनयत कर एक साल-एक णसर का नारा ददया गया। जनजातीय लोग र्ृक्ष और पयावर्रण रक्षा हेतु
जान देने को तैयार हो गए। जुग्गा, जुम्मा, राजू, दोरा, पामभोइ अदद नेतृत्र्कताव थे। कइ ठे केदार मारे गए।
ऄंततः णर्र्श हो ठे केदारी को समाप्त करना पड़ा। पर क्या र्ृक्ष-स्थानीय तत्र्ों-अददर्ाणसयों का दोहन और
ठे केदार व्यर्साइयों का प्रर्ेश रूक पाया? क्या दोहन और शोषण की णर्णधयााँ बदल गइ?
आस पर एक कणर्ता यह है।:-

बस्तर का कु इ णर्द्रोह’1859
बस्तर में र्न रक्षा के णलए हुअ था- कु इ णर्द्रोह
णमली संज्ञा आसे, णर्द्रोह की ही
कणथत सभ्यता के णलए बना मील का पत्थर
प्रेरणा पाइ उाँचे सभ्य लोगों ने, आससे
ऄब बदले तरीके ,णर्णध बदली और ऄन्दर तक घुसे
ऄब नहीं करते हररदास-भगर्ानदास जैसी क्रूर ठे केदारी
सभ्य रहो,मज़दूरी दो,णर्कास ददखाओ

45

कलकत्ता ररव्यु में ईद्धृत एम.एस.ररकाडवस

46

Foreign political correspondence file no.120 of 1851

47

Foreign political correspondence file no.97 of 1852

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पैसा फें को,तमाशा देखो
ऄभी तो पूरा र्न,पूरा खणनज,पूरे अददर्ासी श्रणमक पड़े है-खोदने को,दोहन को
भेजी,कोतापल्ली,फोतके ल के अददर्ासी रोकते नहीं
ऄब साल र्ृक्ष को कटने से
रोका तो सेना सामने अइ ही थी
हुअ था, कु इ णर्द्रोह
ऄब खणनज को क्यों रोकें गें?
ऄब तो बड़ी सुसणज्जत सेना है साथ
खणनज महत्र्पूणव है दक, अददर्ासी
महाँगे से महाँगा खणनज है र्ो तो
देर्ता क्यों माने अदमी पहाड़ और र्न को
ईसे ईपकरण की तरह तो शासक ही करता है ईपयोग
तुम क्यो?
लाभ खणनज से, खनन अददर्ासी से
णर्रोधी जुग्गा,जुम्मा,राजू,दोरा,पामभोइ सब तो खो गए
हैं तो ईद्योगपणत,मंत्री,सरकार और बन्दूकें
आनका घालमेल ही सब कु छ कराएगा
प्रत्येक बार की नइ पोटली में भी
यह तंत्र ही अएगा
सरकार तो सदा र्ही, जो सभ्य आच्छा को कानून कह आठलाएगी
णजसमें नहीं होगा कु इयों का नाराएक साल,एक णसर
सभ्य अदमी ही सब ओर अएगा-जाएगा
कोइ प्रणतरोध तो णर्द्रोह ही कहलाएगा और
पुस्तक में ही रह जाएगा
र्न हो, खणनज हो, जन हो
ईसका दोहन पूणव हो जाएगा
एक और धरती, एक और समुदाय
मुख्य धारा में, णमल जाएगा48
जैपुर से णर्र्ाददत चल रहा भू भाग-कोटपाड़ अदद- को भी 1863 में ऄंणतम रूप से जैपुर में
सम्मणलत कर ददया गया।49
भैरम देर् की पुत्री कााँकेर के नाहर देर् को ब्याही गईं।

48

‘सर्वनाम’ में प्रकाणशत कणर्ता।

49

http://en.wikipedia.org/wiki/Bastar_state

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1878-82 की रानी के कोप की घटना भी णर्द्रोह के संकेत या अधार के रूप में ली जाती हैं।
1878-82 में रानी जुगराज कुाँ र्र के राजा और पणत भैरम देर् के कणथत गलत कायों का णर्रोध हुअ। आसमें
जनजातीय लोग दो दुश्मन समूहों में बाँट गए थे। आसमें ऄंग्रेजों के षड्यंत्र का शक दकया जाता है। रानी राजा
को सही रास्ते पर लाने में सफल हुइ थी।
1876 में भू राजस्र् और ईससे जुड़े ऄत्याचार के मुद्दो पर मुणड़याओं का सफल बस्तर णर्द्रोह हुअ।
ऄंग्रेजों द्वारा भू राजस्र् (लगान) र्सूली हेतु कइ प्रयोग- जमीन्दारी, रै यतर्ारी, ठे केदारी अदद- दकए गए।
कृ णष पर णर्परीत प्रभार् तो पड़ा ही णशल्प और कु टीर ईद्योग भी बैठ गए। महार णशल्पी भी बेरोज़ग़ार हो
गए। जनजातीय लोग ररयासत और ऄंग्रेजों के णर्रूि ईठ खड़े हुए। आसे कृ षक णर्द्रोहों की श्रेणी में भी रखा
जा सकता है। ऄंग्रेज ररयासत के शासक को जो णनदेश देते थे ईनसे व्यणिगत जीर्न और भार्नाएाँ भी
अहत होती थीं। राजा को जब लप्रस अफ र्ेल्स के सम्मान में ददल्ली दरबार में ईपणस्थत रहने हेतु कहा गया
तो ईसे जबरदस्ती और राजा को क्षेत्र से ऄनुपणस्थत रखने का षडयंत्र माना गया। यह अशंका हुइ दक
प्रधानमंत्री गोपीनाथ र्ैसे भी राजा को कठपुतली बनाने में सफल हो गया है और र्ह ऄत्याचारी, क्रूर तथा
बदमाश है। ऄतः राजा की ऄनुपणस्थणत का लाभ ईठा शोषण और ऄत्याचार से र्सूली की जाएगी। आसी
बीच ऄंग्रेजों की बस्तर और जैपुर के जनजातीय शासकों के मध्य दुश्मनी बनाए रखने (फू ट डालो,शासन
करो) की नीणत से भी जनजातीय लोग ऄप्रसन्न थे। बाहरी लोग भी लगातार अ कर बेग़ार लेते और भूणम
हड़पते थे। राज दरबार की अंतररक राजनीणत के तहत भी ऄसंतोष को बना कर रखती थी। राजगुरू
लोके न्द्र नाथ मुणड़या अददर्ासीयों को भड़काता भी रहता था। ररयसत का शासन णभरमदेर् के पास था।
एक गुट ईसे हटा, ईसके चचेरे भाइ लाल कालीन्द्र लसह को शासक बनाना चाहता था। बस्तर शासक
भैरमदेर् ऄंग्रेज अज्ञानुसार लप्रस अफ र्ेल्स के सम्मान में अयोणजत ददल्ली दराबार में भाग लेने के णलए
रर्ाना हुए और मारें गा पाहुाँचे, तबा मुणड़या अददर्ाणसयों ने ईनसे पुनः ददल्ली नहीं जाने का अग्रह दकया।
ईन्हे घेर णलया गया। दीर्ान गोपी नाथ ने गोली चलर्ा दी। कु छ मारे गए और कु छ कै द कर णलए गए।
शासक भैरम देर् को र्ापस लौटन पड़ा। गोपीनाथ ने ऄत्याचार और दबार् क्रूर श्रृंखला खड़ी कर दी।
णगरफ़्ताररयााँ, मकान जलर्ा देना, सम्पणत कु की और लूट, अददर्ाणसयों को मरर्ाना अदद ऐसे ही ईपकरण
थे। अददर्ाणसयों ने णगरफ़्तार लोगों को छु ड़ा णलया। गोपीनाथ भाग गया। झाड़ा णसरहा णर्द्रोह का नेता
चुन णलया गया। प्रत्येक गााँर् में तीर भेज णर्द्रोह का सन्देश प्रसाररत दकया गया। आसमें शाणमल लोग ऄपने
खणलहान में अम की डाल लगाने लगे। प्रत्येक खणलहान में अम डगाल लग गइ। अरपुर में पारम्पररक
हणथयारों के साथ अददर्ासी लोग एकत्र हो गए। यह संख्या 700 से उपर थी। राजा भैरमदेर् स्र्यं
समाझाने पहुाँचा, पर ऄसफल रहा। णर्द्रोही राजा की सेना पर टूट पड़े। छः णर्द्रोही मारे गए। ररयासत द्वारा
हाथी सैणनको को बुलाए जाने पर णर्द्रोही भाग गए। राज दकले की सुरक्षा कड़ी कर दी गइ। झाड़ा णसरहा के
नेतृत्र् में राज मुख्यालय को 2 माचव’1876 को घेर णलया गया। ऄसहाय होने के कारण राजा ने ऄंग्रेजों से
सहायता की पुकार लागाइ। लसचोरा के णडप्टी कमीश्नर को यह प्रभार सौंपा गया। मेकनाज़व के नेतृत्र् में
ऄंग्रेज सेना भेजी गइ। मेकनाजव ने णर्द्रोहोयों से चचाव कर णर्द्रोह का कारण जाना तो पाया दक, णर्द्रोह
राजा के णर्रूि नहीं है, र्रन दीर्ान गोपीनाथ और मुंशी अददत प्रसाद के णर्रूि है। ऄतः 8 ऄप्रैल’1876
को सयुंि दरबार कर ईनकी मााँगें मान लीं। दोनों को हटा ददया गया। णर्द्रोह सफल हुअ। आस सफल णर्द्रोह
और झाड़ा णसरहा को कम ही याद दकया जाता है। ऄभी आस घटना और आसके नायकों को ईणचत सम्मान
णमलना शेष है।
भैरम देर् की मृत्यु के पिात 6 र्षव की अयु में रूद्र प्रताप देर् 29 जुलाइ’1891 को लसहासनारूढ़
हुए।

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आन्होनें रायपुर राजकु मार कालेज से ऄंग्रेजी की भी पढ़ाइ की। पं.रणर्शंकर शुक्ल ने भी ईन्हें ट्डुशन
दी थी। आनके दो णर्र्ाह हुए । आन्होने राजा रूद्र प्रताप देर् पुस्तकालय की स्थापना की जो दक अज भी
संचाणलत है। आन्हीं के शासन काल में अधुणनक राजमहल का णनमावण भी दकया गया।
आन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में सुणनयोणजत नगर णनर्ेश का प्रारम्भ दकया50 और समकोण चौराहों,
चौकोर समान क्षेत्रों र्ाली कालोणनयों, णनकासी और कं टूर ढ़लान का ध्यान रख जगदलपुर नगर का णर्कास
प्रारम्भ कराया।
ऄब तक दीर्ान और पालीरटकल ऐजेंट के ऄणधकार ऄत्यणधक बढ़ गए थे और राजा द्वारा स्र्तंत्र
रूप से णनणवय लेना ऄसंभर् हो गया था, आससे र्े र्ास्तणर्क शासक की तरह व्यर्हार करने लगे थे।
प्रथम णर्श्व युि में रूद्र प्रताप देर् ने ऄंग्रजों की सहायता की और ईन्हें सेंट जाजव अफ जेरूसलम
पदक ददया गया।
रूद्र प्रताप देर् का प्रथम णर्र्ाह ईड़ीसा णस्थत बामड़ा के शासक सूढ़ल देर् की पुत्री कु सुमलता देर्ी
से हुअ था। आनसे राजा रूद्र प्रताप देर् को पुत्री प्रफु ल्ल कु मारी देर्ी की प्राणप्त हुइ जो बस्तर राज्य की
एकमात्र मणहला शाणसका हुईं। हालांदक, आनसे ईत्पन्न एक पुत्र का ऄल्प अयु में ही देहांत हो गया था।
णद्वतीय णर्र्ाह चन्द्र कु मारी से हुअ था।
1910 में भूमकाल णर्द्रोह हुअ। यह ऄणधक प्रचाररत णर्द्रोह है। आसके साथ भी महान णर्शेषण
लगाया जाता है। आस णर्द्रोह का ध्येय र्ाक्य- बस्तर, बस्तर के मूल लोगों (बस्तरर्ाणसयों) का है- था। आसमें
सभी स्थाणनय जनजाणतयों के लोग सम्मणलत हुए। ऄणधकारी और जमीन्दार दूर ही रहे। आसकी पयावप्त
तैयारी भी की गइ थी। णर्द्रोह के णलए तैयार रहने और आसके प्रचार के णलए सभी गााँर्ों में तीर, लाल णमचव,
णमट्टी का टुकड़ा, धनुष या भाले की ऄनुकृणत भेजी गइ। तब बस्तर का शासक रूद्र प्रताप देर् थे। ईनकी
सहायता हेतु ऄंग्रेजों द्वारा णनयुि दीर्ान और रातपुर में पाणलरटकल एज़ेंट था। बस्तर की जनजाणतयों में
राजा के णलए ऄत्यणधक सम्मान था। ऄतः ईसका ऄन्य पर अणश्रत रहना गर्ारा नहीं था और करे ला नीम
तब चढ़ जाता था दक, र्े लोग बस्तर के बाहर के होते थे। राजा स्पष्टतः कठपुतली होता जा रहा था और
दीर्ान सशि। शासक रूद्र प्रताप देर् के चाचा कालीन्द्र लसह भी जनजाणतयों में लोकणप्रय थे और ईनकी
सहायता से ररयासत के दकसी मत्र्पूणव या शासक पद पर अना चाहते थे। ईनकी यह आच्छा आस णर्द्रोह के
जन्म हेतु महत्र्पूणव कारक बनी। राजा रूद्र प्रताप देर् की सौतेली मााँ रानी सुर्णव कुाँ र्ार भी ऄसंतुष थीं। र्ह
भी अन्दोलनकाररयों की ओर रही। 1908 से बैजनाथ पण्डा दीर्ान थे। राजा को ऄगले तीन र्षव ईसकी
सहायता से ही शासन करना था। राज पररर्र और अददर्ासीयों- दोनों को- यह व्यर्स्था नागर्ार गुजरती
थी। दीर्ान के द्वारा अरणक्षत र्न पिणत को बढ़ार्ा देने से जनजाणतय लोग और नाराज़ हो गए। बेग़ार और
भूणम णर्र्ादों ने णस्थणत को और णबगाड़ा। दीर्ान को ही ईत्तरदायी माना गया। स्थाणनय अददर्ाणसयों को
राजा से प्रत्यक्ष भेंट करने से रोका गया। ऄणधकाररयों से णमलने पर दुव्यवर्हार और नाज़ायज़ मााँगें अम थीं।
जनजातीय लोग सीधे राजा का शासन चाहते थे और र्तवमान दुव्यवर्स्था के णलए ऄंग्रज
े ों को सीधा कारण
माना जाता था। 2 फरर्री’1910 को पुसपाल बाज़ार की लूट से णर्द्रोह प्रारम्भ हुअ और लगभग ढ़ाइ माह
चला। अन्दोलन की सूचना ऄंग्रेज ऄणधकारीयों को दी गइ। गेयर और डीिे को णर्द्रोह दम का दाणयत्र् सौंपा
गया। ईन्हे मद्रास और पंजाब से 500 सैणनक भी ददए गए। 16 फरर्री’1910 ऄंग्रेज सेना के खड़कघाट
पहुाँचने पर णर्द्रोणहयों ने ईसे घेर णलया। गोली चालन में पााँच अदीर्ासी मारे गए। सेना जगदलपुर पहुाँच
गइ। 25 फरर्री को लाल कालीन्द्र लसह णगरफ़्तार कर णलए गए। कइ शासकी कायावलय, णर्द्यालय, पुणलस
चुदकयााँ जला दी गईं। शासकीय कमवचाररयों को पीटा गया। कु छ मारे भी गए। कु छ ने पलायन दकया। कु छ
की सम्पणत जला दी गइ। व्यापारी नूर बख्श खााँ मारा गया। णर्द्रोही दीर्ान दौरे पर थे। णर्द्रोही ईनकी
50

बाद में कोरबा में NTPC की टाईनणशप भी अधुणनक नगर णनर्ेश णसिांतों पर बनी और ऄब नए रायपुर में भी लागू होंने की

सम्भार्ना है।

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हत्या हेतु प्रणस्थत हुए। दीर्ान दौरे से ही चााँदा णजले में भाग गया। 9 माचव को ऄंग्रेज सेना से ऄगला टकरार्
छोटे डोंगर क्षेत्र में हुअ। बारह जनजातीय लोग खेत रहे। ऄलनार के जंगलों में णर्श्राम कर रही
अददर्ासीयों की टुकड़ी पर ऄंग्रेज सेना द्वारा 26 माचव को अक्रमण कर 21 लोगों को मार डाला गया और
सैकड़ो घायल हुए। यह माना जाता है दक, आसमें पााँच सौ से ऄणधक लोगों को मार डाला गया था। णर्द्रोह
कु चल डाला गया। आस णर्द्रोह में लाल कालीन्द्र लसह, रानी सुर्णव कुाँ र्र, गुण्डा धूर, कुाँ र्र बहादुर लसह,
बाला प्रसाद नाणज़र, दुलार लसह अदद सदक्रय रहे थे। ऄब मात्र गुण्डा धूर को स्मरण दकया जाता है।
फरर्री’2010 में आस णर्द्रोह की शताब्दी बस्तर में मनाइ गइ। आस णर्द्रोह का शमन करने में

60.000/-

व्यय दकए गए। णजन प्रमुख लोगों ने प्रशासन और ऄंग्रेजों का साथ ददया, ईन्हे पुरस्कृ त दकया गया। रानी
सुर्णव कुाँ र्र को णनर्ावणसत दकया गया। लाल कालेन्द्र लसह को एणलचपुर जेल में में नज़रबन्द रखा गया।
गुण्डा धूर भाग गया। र्ह अददर्ाणसयों में सबसे ऄणधक स्थाणपत हुअ और 1825 के परलकोट के
ऄबूझमाणड़या जनजातीय लोगों के णर्द्रोह के नायक गेन्द णसह तथा 1876 के सफल नायक झाड़ा णसरहा को
ऄभी यादों में लाया जाना शेष है।
राजा रूद्रप्रताप देर् के कोइ पुत्र नहीं था। ऄत: ईनकी मृत्यु के पिात 1921 में 11र्षव की ऄव्यस्क
पुत्री प्रफु ल्ल कु मारी देर्ी गद्दी पर बैठीं। 1933 में ऄंग्रेज सरकार ने महारानी का दज़ाव प्रदान दकया।
ईन्होंने 1935में भारत के र्ायसराय से मुलाकात की। साथ ही आन्होनें यूरोप के कइ नगरों का भी
भ्रमण दकया।
प्रफु ल्ल कु मारी देर्ी का णर्र्ाह मयूरभंज के लाल साहब प्रफु ल्ल चन्द्र भंजदेर् के साथ 22 जनर्री
1927 को सम्पन्न हुअ। आनकी दो पुणत्रयााँ कमला देर्ी और गीता देर्ी तथा दो पुत्र प्रर्ीर चन्द्र एर्ं णर्जय
चन्द्र हुए।
रानी का देहांत 28 फरर्री 1936 को लन्दन में हुअ।

णचत्र 3 - बस्तर ररयासत का ध्र्ज51

51

स्रोत- http://www.crwflags.com/fotw/Flags/in-basta.html

Flag:-"The flag of the Principality of Bastar is of two vertical parts, blue and white. On the dividing

line the trident of Shiva is placed in the inverted colors. In the canton there is a crescent moon facing
the fly. The flag is for the use of all the inhabitants of Bastar. "Blas Delgado Ortiz, 11 January 2003- (
http://www.crwflags.com/fotw/Flags/in-basta.html)

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ऄब बस्तर में स्र्भाणर्क तौर पर ईणड़या भंजदेर् र्ंश सत्ता में अया। यह कहा जाता है दक, यह
लोग मथुरा से मुणस्लम अक्रमणों के कारण दणक्षण पलायन कर गए थे और णर्जयनगरम के कृ ष्ण देर् राय के
सेना में प्रमुख पद भी पाने में सफल रहे थे। यहााँ भी मुणस्लम धार्ों के ईपरााँत, यह लोग, बस्तर की ओर
अए तथा दंतश्व
े री को कु ल देर्ी मान स्थाणपत हुए।
राजा के दैर्ीय णसिांत का दंतेश्वरी के र्स्त्र र्ाला प्रसंग आस र्ंश से भी जोड़ा जाता है और साथ ही
यह भी दक, देर्ी ने ऄन्य राजा-राजर्ाड़ों, जमीन्दारों को बस्तर से बाहर चले जाने को अदेणशत दकया।
प्रफु ल्ल कु मारी देर्ी की मृत्यु के पिात 6 र्षीय ऄव्यस्क ज्येष्ठ पुत्र प्रर्ीर चन्द्र भंजदेर् गद्दी पर
बैठे। जब र्े गद्दी पर बैठे, तब बस्तर के एडणमणनस्रेटर इ.सी.हाआड थे। आनके द्वारा णनयुि सणमणत के द्वारा
शासन संचाणलत दकया जाता था।
महाराजा प्रर्ीर की णशक्षा राजकु मार कालेज रायपुर और आंदौर तथा देहरादून की णमलेरी
ऄकादमी में हुइ। कनवल जे.सी.णगप्सन को ईनका ऄणभभार्क बनाया गया था। ईनका णर्र्ाह पटना के
शासक ईदय लसह की पुत्री शुभराज कु मारी से हुअ।
15 ऄगस्त’1947 में राष्ट्र स्र्तंत्र हुअ। प्रर्ीर चन्द्र भंजदेर् ने 1 जनर्री’1948 को बस्तर राज्य का
णर्लय भारत गणराज्य में कर ददया। आस तरह र्े बस्तर के ऄंणतम शासक हुए।
25 माचव 1966 को जगदलपुर राजमहल में पुणलस गोली चालन में प्रर्ीर चन्द्र भंजदेर् ऄनेक
अददर्ाणसयों के साथ मारे गए, णजसे, कणथत रूप से, हत्या तक कहा गया। अज भी ईन्हे, बस्तर का
जनजातीय समुदाय, अराध्य मानता है। यह भी णर्रोध की श्रेणी में रखा जाता है।
बस्तर जनजातीय, र्न, जल, खणनज अदद से समृि है। हालााँदक जनजातीय लोग र्नर्ासी हैं और
ग़रीबी में हैं। ऄब प्रचुर बहुमूल्य खणनज कणथत मुख्य धारा के लोगों का मुख्य अकषवण बना हुअ है।
बस्तर का जनजीर्न नक्सल और माओर्ाद के कारण प्रभाणर्त है। आस कारण कणथत मुख्य धारा के
लोगों को खणनज और र्न दोहन रूक जाने से त्रास हुअ है और ऄब तंत्र के णलए नक्सल खात्मा मुख्य ध्येय
हो गया है।

कााँकेर
ऄंग्रेजों द्वारा कााँकेर ररयासत भी णद्वतीय श्रेणी में रखी गइ थी। कााँकेर ररयासत की णस्थणत 200 6/ से
200 24/ ईत्तरी ऄक्षांश और 800 48/ से 810 48/ पूर्ी देशांतर के मध्य थी। आसका क्षेत्रफल 1,429
र्गवमील और 1901 और 1921 में आसकी जनसंख्या क्रमशः 103,536 और 125,172 थी।52 आसके ईत्तर में
रायपुर और दुगव णजले, पूर्व में रायपुर णजला, दणक्षण में बस्तर ररयासत और पणिम में चााँदा णजला है।
कााँकेर नगर दूध नदी के तट पर णस्थत है। यह ररयासत भी, बस्तर की तरह, ऄणधकााँशतः र्नच्छाददत
पहाणड़यों से युि और दुगवम है।
कााँकेर को प्राचीन ऄणभलेखों में काकरय और कं कण भी णलखा गया है। आसे संस्कृ त के काकख़ से
सम्बणन्धत दकया गया है, णजसका ऄथव- कौए के शोर र्ाला स्थान- से है। कांकै एक स्थानीय र्ृक्ष है। जच्चा

52

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को, प्रसूती ईपरााँत, 5-6 ददन आसकी छाल के ईबालने से प्राप्त लाल रस को णपलाते हैं। यह काढ़ा भी कांकै
कहलाता है। गोंड़ी में कांकै+एर (पानी) से भी कााँकेर शब्द बना हो सकता है।53
कााँकेर ररयासत का अणधकााँश आणतहास ज्ञात नहीं है, पर ईसके संकेत कन्दरा मानर् काल से णमलने
लगते हैं। कन्दरा णचत्र णमलने से यह आंणगत होने लगता है दक, ईसका स्थाइ णनर्ास यहााँ रहा।
सारणी 3 - और णचत्र 4, 5, 6 और 7 कााँकेर ररयासत के गुफा णचत्र स्थल और ईनके हस्त णनर्षमत णचत्र
स्रोत-छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)
क्र.

स्थान

ररयासत

अकृ णतयााँ और णचत्र (णचत्र क्र. 4 से 7 )
हाथ और पााँर् की छाप, पशु णचत्र।

ईदकु ण्ड़ा
1

क) देर्ता की कचहरी

कााँकेर (चरामा

ख) चन्दा पठार और

तहसील)

णच.4

ग) ऄद्या पहाड़
2

गड़ा गोरआ

कााँकेर

पशु और मानर् अकृ णतयााँ,

खेरखेड़ा
3

क) बालेरार्
ख) नौकर गुदरा और

पशु णचत्र

हथेली की छाप. Late
कााँकेर

Historical period. णच.5

कााँकेर

Human figure, Animal figures

ग) गणड़या गुदरा

4

कान्हा गााँर्

Scene Pertaining to relation (Ram, Sita, Laksman etc.)
Figures of tree leaves,

गोतीतोला
5

क) पााँच पााँण्ड़र् और

Palm impressions. णच.6

कााँकेर

ख) टांक के समीप

6

सीता रामगुड़ा

कााँकेर

Human Figures
Animal figures, Human
figures drawn in white and

7

कु लगााँर्

कााँकेर

yellow. The paintings belong
to Upper Palaeolithic period.

53

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.30

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णच.7

मानर् 4,000 से 3,000 र्षों पूर्व तक ऄंणतम संस्कार में प्रस्तर स्तम्भ का प्रयोग करता था। आन
बड़े प्रस्तरों को Megalithic कहा गया। ऐसी सभी अकृ णतयााँ हस्त णनर्षमत हैं। ऐसे स्थान कााँकेर ररयासत में
णमले हैं।
हालााँदक ऐसे स्थान दुगव णजले में ऄणधक णमले हैं। आसके ऄणतररि रायपुर, ,राजनााँदगााँर्, धमतरी,
ईत्तर बस्तर अदद णजलों में यह स्थान णमले हैं। आनके नाम हैं:- करकाभाट, करहीभादर, धनोरा, कु णलअ,
भुजगहना, सोरर, णचरचरी, णललार (सभी दुगव णजला), खल्लारी, टेंगना, बारारटया भाटा, भन्र्रमारा,
ऄरोद, परोन्द, नन्दागुड़ा, मोतेजकरी, गोदमा (पचरी पारा), णततरर्ांड़, दुगल र्ेंगल, मरहीपार, गम्मेर्ाड़ा,
नेलाकांकर, णतम्मेलर्ाड़ा, संकन्पाली, गाड़ा गौरी (कााँकेर), छोटा पण्ड़ार मुण्ड़ा और मेथे।54
आनमें से कु छ मेगाणलणथक हस्तणशल्प प्रस्तरों के णचत्र णनम्ााँदकत हैं।:-

णचत्र 8, 9, 10, 11 और 12 - सोरार-करकाभाट, कु णलया, टेंगना, धनोरा और महुजगहना के मेगाणलणथक हस्तणशल्प प्रस्तर
स्रोत- http://cgculture.in/ArchaeologyMegalithicMonuments.htm

नाणसक ऄणभलेख, जो गौतमी पुत्र सातकणी की माता गौतमी बालाश्री द्वारा बनर्ाया गया था, में
गौतमी पुत्र सातकणी को णर्न्ध्य ऊक्षर्त, मलय, महेन्द्र, श्वेतणगरी और चकोर पर्वतों का स्र्ामी माना गया
है। आनमें से कु छ पर्वत्त छत्तीसगढ़ में णचणन्हत होते हैं। चकोर पर्वत्त का तादातम्य बस्तर सम्भाग के णचत्रकू ट
पर्वत्त से स्थाणपत दकया गया है। यह ऄनुमाणनत दकया जाता है दक, ईसने चेदद शासक महामेघर्ाहन को
परास्त कर आस क्षेत्र पर ऄणधकार दकया।
बाद में नल बस्तर में रहे, णजन पर बस्तर ररयासत की चचाव के समय णर्र्रण ददया जा चुका है।
अगे सम्भर्तः राष्ट्रकू ट प्रभार् भी रहा।
कााँकेर का कु छ आणतहास सोमर्ंश के राजपूत शासकों के ररयासत कालीन शासन पर ही ज्ञात है।
सोम चन्द्र शब्द का पयावयी शब्द है। कााँकेर में आस र्ंश की स्थापना जगन्नाथ पुरी (ईड़ीसा) के शासक
कान्हार देर् द्वारा की गइ थी।
यह कहा जाता है दक, कान्हरदेर् को कु ष्ठ रोग हो जाने के कारण राज्य त्याग करना पड़ा था। ईन्हे
अरोग्य लाभ और अरोग्यर्धवक स्थान की खोज हेतु नाना स्थानों का भ्रमण करना पड़ा। स्र्ास्थ्यकर स्थान
माहानदी के ईदगम णसहार्ा (धमतरी) पर णमला।

54

http://cgculture.in/ArchaeologyMegalithicMonuments.htm

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महानदी (णचत्रोत्पला) के ईद्गम, णसहार्ा पर्वत्त में श्रृाँगी श्रृणष का अश्रम माना गया है।55 आस क्षेत्र
को तपोभूणम भी कहते थे और आस संज्ञा का कारण 28,000 श्रृणषयों में महाज्ञानी र्ेद व्यास के पुत्र शुकदेर्
और सप्त श्रृणषयों सणहत कइ ऄन्य श्रृणषयों यथा- मुचकु न्द, ऄंणगरा, कु म्भज, लोमस, गगव अदद के अश्रमों का
होना माना गया है। आसे श्रृाँगी श्रृणष पर्वत्त भी कहलाते है।
कान्हर देर् को समीप णस्थत जलीय स्थल पर स्नान का स्र्प्न अया। आसका पालन करने पर रोग
जाता रहा। णसहार्ा र्ाणसयों ने आस चमत्कार से प्रभाणर्त हो ईन्हे राजा बना णलया।
णसहार्ा से प्राप्त शक सम्र्त् 1114 ऄथावत 1192 इस्र्ी के णशलालेख से भी यह तथ्य ईभरता है
दक, यह र्ंश र्हााँ रहा था। यह आस सोम राजपूत र्ंश की 18 पीढ़ी के शासन का ईल्लेख करता है।
यह माना जाता है दक, आस र्ंश के तीसरे शासक ने कााँकेर क्षेत्र हस्तगत दकया और कााँकेर को
मुख्यालय बनाया।56 ईसके ईत्तराणधकारी धमतरी क्षेत्र को भी हस्तगत करने में सफल रहे।57 कल्चुरी
ऄणभलेख, आन्हें, सहायक णमत्र और शासन ऄणधकार प्राप्त नरे श बताते हैं।
रतनपुर के कल्चुरी शासक पृथ्र्ी देर् णद्वतीय (5561 – 1165) ने कइ णर्जयें की। ईसके सेनापणत
जगपाल द्वारा राणजम के राणजर् लोचन मणन्दर का जीणोिार कराया गया। यहााँ लगे 1144 के णशलालेख में
ईसे सरहरागढ़ (सारं गढ़) और मचका णसहार्ा (णसहार्ा) दकला णजतने र्ाला बताया गया है।58 ईसने
भ्रमरर्द्र (बस्तर) क्षेत्र का भाग, [कांतार ,कु सुमभोग ,कााँदाडोंगर और काकरय (कााँकेर) ] भी पृथ्र्ी देर्
णद्वतीय हेतु जीता। पृथ्र्ी देर् णद्वतीय ने चक्रकोट ऄथावत बस्तर पर अक्रमण कर ईसे नष्ट दकया। तदुपरांत
चोड़गंग के अक्रमण का बदला लेने हेतु कललग का रुख दकया। ऄब चोड़गंग के देहार्सान के ईपरााँत ईसका
पुत्र जटेश्वर मधुकामणवर् शासक था। र्ह बन्दी बनाया गया। यह कायव लगभग 1150 इ. में हुअ। ऄब कााँकेर
कल्चुररयों के ऄधीन करद राज्य बन गया। कााँकेर क्षेत्र के लेखों में कलचुरर संर्त् का प्रयोग होने लगा।
कु छ ताम्र पत्रों59 में बोप देर्, सोमराज, पंपराजा अदद शासकों के ईल्लेख अए हैं। 1320 के
णशलालेख से क्रमशः लसहराज, व्याघ्रराज, बोपदेर्, कृ ष्ण, जैतराज, सोमचन्द्र और भानुदर्
े के नाम णमलते
हैं। आसमें नायक र्ासुदर्
े प्रधान मंत्री के द्वारा तीन मणन्दर, प्रत्ताणल (द्वार), पुरतोभद्र (भर्न) अदद बनर्ाने
और ईसकी चार पीदढ़यों का ईल्लेख है।
कााँकेर ररयासत के शासकों पर कल्चुरी लोगों के ईपरााँत मराठों का णनयंत्रण रहा। र्े ईनकी
सहायता हेतु 500 सैणनक रखने लगे।
कााँकेर के एक शासक रूद्र प्रताप द्वारा धमतरी महानदी तट पर महादेर् मणन्दर बनर्ाया गया, जो
ईसके नाम पर रूद्रेश्वर महादेर् कहलाया। ईसने रूद्री ग्राम बसाया और धमतरी में दकला60 बनर्ाया।
आसकी तीसरी पीढ़ी में गोर साय देर् हुए, जो 1729 में स्र्गवर्ासी हुए।
आनके पुत्र हरपाल देर् (1729-1775) ने ऄपनी कन्या बस्तर नरे श दलपत देर् को ब्याही और
णसहार्ा क्षेत्र ईन्हे दे ददया।
1775 में धीरज लसह देर् शासक हुए। तदुपरांत राम राज लसह देर् और ईनके ईपरााँत श्याम राज
लसह देर् सत्ता में अए।

55

मदन लाल गुप्त-छत्तीसगढ़ ददग्दशवन(I),पृ.12

56

http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/chgr0049.htm

57

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.31

58

Epigraphia Indica,Vol. XXVIII,P.160 और Hira Lal-Inseription in C.P. and Berar,P.107

59

पंपराज के कल्चुरी सम्र्त 965 और 966 (1213-14 इ.) के दो ताम्रपत्र।

60

आसकी बाहरी खाइ के ऄर्शेष ही शेष हैं।

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भूपदेर् लसह देर् 1802 में शासक हुए।61 मराठों के बस्तर अक्रमण के समय यह ईनके सहायक रहे।
प्रारणम्भक सफलता के ईपरााँत, आन्हें, राज्य छोड़ कर भागना पड़ा। र्े सपररर्ार धमतरी के ग्राम झेररया में
रहे, जहााँ पद्य लसह का जन्म हुअ। र्ह 1809 से 1817 तक र्हीं रहा। 1818 में नागपुर रे ज़ीडेंट द्वारा
500 र्ार्षषक कर णनयत करने के ईपरााँत ररयासत ईन्हें लौटा दी गइ। 1823 में जमीन्दारी स्र्त्र् लेकर
राज्य कर माफ कर ददया गया।62
भूप देर् के पिात, 1839 में, पद्य लसह शासक हुअ और 1853 तक रहा। ईसने एक दुगाव मणन्दर
बनर्ाया।63
पद्य लसह के ईपरााँत, 5 ददसम्बर’1853 से मइ’1903 तक, ऄथावत 50 र्षव तक नरहरर देर् शासक
हुए। जो न्याय णप्रयता और सौजन्यता के कारण णचणन्हत होते हैं।64 1854 से ऄंग्रेजों का प्रत्यक्ष णनयंत्रण
स्थाणपत हो चुका था। आनका जन्म 13 मइ’1850 को हुअ था और र्ह 5 ददसम्बर 1853 को णसहांसनारूढ़
हुए।65
ईन्होंने कााँकेर के समीप नाहरपुर बसाया। कइ मणन्दर बनर्ाए। एक पुस्तकालय और एक महल
बनर्ाया। ईनका णर्र्ाह बस्तर के शासक बणहरम देर् की कन्या पद्मालया देर्ी से हुअ।66
1900 में बड़ा ऄकाल पड़ा। ईनके दो पुत्र हुए, जो दकशोरार्स्था में ही काल कणल्र्त हो गए।
नरहरर के तीन भाइ थे- लक्ष्मण देर्, णशर् चरण देर् और घनश्याम लसह देर्। आन्हीं में से एक का
पुत्र ऄगला शासक हुअ।
कोमल देर् (मइ’1903- 8 जनर्री’1925) कााँकेर के ऄगले शासक हुए। कााँकेर शासकों को
महाराजाणधराज की पदर्ी दी गइ थी और ईन्हे 9 तोपों की सलामी दी जाती थी।67

61

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/kanker.html

62

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.32

63

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/kanker.html

64

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.32

65

Roper Lethbridge-The Golden book of India,Macmillan-1893,P.230

66

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67

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.32

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णचत्र 13 - कााँकेर ररयासत का ध्र्ज

स्रोत-http://www.crwflags.com/fotw/Flags/in-kanke.html

कोमल ने सम्बलपुर और कााँकेर में णचकत्सालय, एक हाइ स्कू ल, एक कन्या शाला अदद बनर्ाए।
आन्होंने एक नगर गोणर्न्दपुर बसाया, णजसे र्ह राजधानी बनाना चाहता था।68
1918 में आंफ्लुएज
ं ा, दुर्षभक्ष और णर्श्व युि जणनत महाँगाइ की मार रही।1918 के आंफ्लुएज
ं ा से पूरे
छत्तीसगढ़ में मौत का तांडर् हुअ। 1920 में पुनः ऄकाल से णस्थणत और भयार्ह हुइ।
ईनके तीन णर्र्ाह हुए। ईनकी एक पुत्री हुइ, णजसके नाम पर नगर बसाया गया।
आस समय ररयासत की औसत र्ार्षषक अय
282,106/- रूपये अाँकी गइ थी, जो 1918 में
342,577 थी।69
ऄगला शासक ईनका कोइ ररश्तेदार, सम्भर्तः भतीजा, हुअ ऐसा माना जाता है।70
8 जनर्री’1925 को कोमल देर् के देहांत ईपरााँत, भानु प्रताप देर् शासक हुए और भारत की स्र्तंत्रता
प्राणप्त के ईपरााँत ररयासत राष्ट्र में णर्लीन होने तक रहे। आन्हें छोटा नागपुर से गोद णलया गया था। आनके
व्यस्क होते और णशक्षा प्राणप्त71 तक रघुर्ीर प्रसाद यादर् संरक्षक प्रशासक रहे। आन्हें 1944 में शासन के
ऄणधकार णमले। आसी र्षव ईनका णर्र्ाह सोनपुर की राजकु मारी ऄमूल्यप्रभा देर्ी से हुअ।
आन्होंने भानुप्रतापपुर नगर बसाया। आनके एक पुत्र ईदय प्रताप और एक पुत्री मंजुश्री देर्ी हुए। मंजु
का णर्र्ाह सायल के सुरेन्द्र लसह से हुअ।
ररयासत में शासक की सहायता हेतु दीर्न, नायब दीर्न, दो तहसीलदार, एक आंस्पैक्टर, 4 सब
आंस्पैक्टर अदद थे। भूणम का बन्दोबस्त दकया जाने लगा था और ऄंणतम 1921 में समाप्त हुअ।

कर्धाव
ऄंग्रेजों द्वारा कर्धाव ररयासत भी णद्वतीय श्रेणी में रखी गइ थी। कर्धाव ररयासत की णस्थणत 210 30/
से 290 50/ ईत्तरी ऄक्षांश और 800 50/ से 810 26/ पूर्ी देशांतर के मध्य थी। आसका क्षेत्रफल 798
र्गवमील और जनसंख्या क्रमशः 77,654 थी।72
आसके चारो ओर सतपुड़ा पहाड़ों का पूर्ी भाग है। ररयासत का पिमी भाग पहाड़ और र्नों से
अच्छाददत है। पूर्व में मैदान है। ईत्तर में मैकल पहाड़ है। कइ दुगवम घाट हैं। यथा- के समधी, बेल, दकलदकला,
बीजापानी, राजाढार और णचल्फी। रबदा पहाड़ सबसे उाँचा णशखर है, णजसकी उाँचाइ 3,058 फीट है।73

68

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/kanker.html

69

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.32

70

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71

राजकु मार कालेज,रायपुर; मेयो कालेज,ऄजमेर; आं गलैंड अदद

72

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.90

73

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.90

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कर्धाव का शुि नाम कबीरधाम है।74 आसी कारण से , ऄब, कर्धाव मुख्यालय र्ाले णजले का नाम
कबीरधाम ही रखा गया है। कबीर के प्रधान णशष्य धमव दास द्वारा, यहााँ गद्दी स्थाणपत की गइ थी। ऄब यह
ईनके र्ंशजों की गद्दी है। यह स्थान कबीर पंथ के ऄनुयायीयों का तीथव है।
आसके पूर्व, यह पौरागढ़ तालुका कहा जाता था।
आसका भी पूर्व आणतहास ज्ञात नहीं है।
पहले यहां पर नागर्ंशी और हैहय र्ंश के शासकों का शासन था। नाग र्ंश पर सणन्क्षप्त चचाव बस्तर
ररयासत के णर्र्रण के समय की गइ है। ईन्होंने यहां पर ऄनेक मणन्दर और दकले बनर्ाए थे। आन मणन्दरों
और दकलों के ऄर्शेष अज भी देखे यहां जा सकते हैं।75
मड़र्ा महल में 37 पंणियों के लेख में एक णशर् मणन्दर फणण नाग र्ंश के रामचन्द्र, णजसका णर्र्ाह
हैहय ऄणम्बका देर्ी से हुअ था, द्वारा बनर्ाने का ईल्लेख है। साथ ही नाग र्ंश ईत्तपणत की कथा भी
ईत्तकीणव की गइ है।
ऄणहराज से कीर्षतपल तक नौ राजा हुए। कीर्षतपाल की णनःसंतान मौत पर ईसका भाइ जयत्र पाल
दसर्ााँ राजा हुअ। आसके ईपरााँत 12 और शासक हुए। बारहर्ााँ भोज था। ईसके ईपरााँत ईसके णपतामह के
भाइ के नाती का पुत्र ऄथावत पंथी- लक्ष्मण- शासक हुअ। लक्ष्मण का पुत्र रामचन्द्र ऄगला शासक था। यह
ऄणहराज की बीसर्ीं पीढ़ी थी। स्पष्ट है दक, फणण नाग र्ंश 500 से भी ऄणधक र्षों तक शासक रहा ऄथावत
9 र्ीं शताब्दी से कल्चुररयों के अने तक। ऄभी आनके आणतहास पर शोध होना है। यह लोग कल्चुररयों के
करद शासक हो कर भी कइ र्षव शासन करते रहे। गोपा (या गोपाल) देर् और यशोराज का ईल्लेख
णशलालेखों में अता है। एक णशलालेख कल्चुरी सम्र्त 934 ऄथावत 1182 का है। आनके मध्य 8 और राजाओं
के नाम अते हैं। चर्रा (चौरा गााँर्- जहााँ यह मणन्दर है), शांकरी (संकरी नदी), राजपुर (देर्ता के भोग राग
हेतु प्रदत्त ग्राम) और कु म्भी पुरी भौगोणलक नामों और पद्य रचना कार णर्ट्ठल नायक तथा दन ग्रणहता महेश
िाह्मण का भी ईल्लेख अता है।
फणी नाग र्ंश के काल में ही भोरम देर् मणन्दर बना। चौरागॉंर् मे एक हजार र्षव पुराना मंददर है
णजसे भोरमदेर् मंददर के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है दक, मंददर को ग्यारहर्ीं शताब्दी में
नागर्ंश के सम्भर्तः छठे राजा देर्राय ने बनर्ाया था। यह कहा जाता है दक, गोड़ राजाओ के देर्ता
भोरमदेर् थे, जो दक, णशर्जी का ही एक नाम है। जनरल कलनगम हाम आसे पुरोणहत की मूर्षत मानते हैं। यहााँ
ऄंदकत प्रथम लेख में मणन्दर बनर्ाने र्ाले पुरोणहतों का नाम और णद्वतीय पर ईनकी पणत्न, पुत्र और पुणत्रयों
के नाम हैं। तृतीय में गोपाल देर् के शासन का सम्र्त 840 ऄंदकत है। यह सम्भर्तः कल्चुरी सम्र्त है और
1088 इ. के लगभग होता है। गोपाल सम्भर्तः कल्चुररयों के ऄधीन था। ईसे और पुजारी पाली के गोपाल

74

र्ही

75http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A7%

E0%A4%BE

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णचत्र 14 – भोरमदेर्
स्रोत-http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5

में साम्य देखा जाता है। चौथे पर णशल्पकारों के नाम हैं। मणन्दर में मूर्षत लक्ष्मी-नारायण की है। ईसके नीचे
मगर ध्र्ज योगी और 7000 ऄंदकत है। दीर्र पर सम्र्त 1608 (1551 इ.) का लेख है। पहले आसे 160
(103 इ.) पढ़ा गया था और गोंड़ काल से जोड़ा गया था। यहााँ सती चीरें भी हैं। एक पर सम्र्त 1430 और
दूसरी पर 1445 ऄंदकत है। यह फकर्न्दंती है दक, समीप की ददयार्र पहाड़ी पर पर मणन्दर के णनमावण काल
में ऄनर्रत प्रकाश णनकलता रहा था। चैत सुदी दस से पूनम तक और कुं अर ग्यारस से पूर्षणमा तक मेला
भरता है।76 माचव में भोरम देर् ईत्सर् मनाया जाता है।
भोरमदेर् मंददर का णनमावण एक सुंदर और णर्शाल सरोर्र के दकनारे दकया गया है, णजसके चारों
ओर पर्वत श्रृंखलाएं और हरी-भरी घारटयां हैं। आसे मूलतः णशर् मणन्दर कहा जाता है। नागर्ंशी शासकों के
समय यहां सभी धमो को समान महत्र् प्राप्त था णजसका जीता जागता ईदाहरण आस स्थल के समीप से प्राप्त
शैर्, र्ैष्णर्, बौि और जैन प्रणतमाएं हैं। स्थापत्य चंदल
े शैली का है और णनमावण योजना की णर्षय र्स्तु
खजुराहो और सूयव मंददर के समान है। बाहरी दीर्ारों पर, तीन समानांतर क्रमों में, णर्णभन्न प्रणतमाओं को
ईके रा गया है। आनमें, णशर् की णर्णर्ध लीलाओं, णर्ष्णु के ऄर्तारों, देर्ी देर्ताओं की णर्णभन्न प्रणतमाओं
और गोर्धवन पर्वत ईठाए श्रीकृ ष्ण का ऄंकन है। जैन तीथवकरों की भी ऄंकन है। तृतीय स्तर पर नाणयकाओं,
नतवकों, र्ादकों, योिाओं, णमथुनरत युगलों और काम कलाओं को प्रदर्षशत करते नायक-नाणयकाओं का भी
ऄंकन है। नृत्य रत स्त्री पुरुषों का ऄंकन नृत्य कला का संकेत है। आनके ऄणतररि पशुओं के भी कु छ ऄंकन
देखने को णमलते हैं, णजनमें प्रमुख रूप से गज और शादुल
व (लसह) की प्रणतमाएं हैं। मंददर के पररसर में णर्णभन्न
देर्ी देर्ताओं की प्रणतमाएं, सती स्तंभ और णशलालेख संग्रणहत दकए गए हैं, जो आस क्षेत्र की खुदाइ से प्राप्त
हुए थे। आसी के साथ मंददरों के बाइ ओर इटों से णनर्षमत एक भग्न प्राचीन णशर् मंददर भी णस्थत है, जो ईंट
ईपयोग को भी रे खांदकत करता है।77
भोरमदेर् मंददर से एक दकलोमीटर की दूरी पर, चौरा ग्राम के णनकट, एक ऄन्य णशर् मंददर णस्थत
है। आसे मडर्ा महल या दूल्हादेर् मंददर के नाम से जाना जाता है। आस मंददर का णनमावण लगभग 1349
इस्र्ी में फणीनागर्ंशी शासक रामचंद्र देर् ने करर्ाया था। यह मंददर ईन्होंने ऄपने णर्र्ाह के ईपलक्ष्य में
बनर्ाया था। हैहयर्ंशी राजकु मारी ऄंणबका देर्ी से ईनका णर्र्ाह संपन्न हुअ था। मडर्ा का ऄथव णर्र्ाह
मंडप से है। मंददर की बाहरी दीर्ारों पर 54 कलात्मक णमथुन मूर्षतयों का ऄंकन दकया गया है, जो दक
अंतररक प्रेम और सुंदरता को प्रदर्षशत करती हैं। आसके माध्यम से समाज में स्थाणपत गृहस्थ जीर्न की
ऄंतरं गता को प्रदर्षशत करने का प्रयत्न दकया गया है।78

76

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.102-103

77

http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_375.html

78

http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_375.html

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भोरमदेर् मंददर के दणक्षण पणिम ददशा में, एक दकलोमीटर की दूरी पर, एक ऄन्य णशर् मंददर
णस्थत है णजसे छेरकी महल के नाम से जाना जाता है। आस मंददर का णनमावण भी फणीनागर्ंशी शासनकाल
में 14र्ीं शताब्दी में हुअ। ऐसा कहा जाता है दक, यह मंददर बकरी चराने र्ाले चरर्ाहों को समर्षपत कर
बनर्ाया गया था। स्थानीय बोली में बकरी को छेरी कहा जाता है। मंददर का णनमावण इटों के द्वारा हुअ है।
मंददर के द्वार को छोडकर ऄन्य सभी दीर्ारें ऄलंकरण णर्हीन हैं। आस मंददर के समीप बकररयों के शरीर से
अने र्ाली गंध णनरं तर अती रहती है। पुरातत्र् णर्भाग द्वारा आस मंददर को भी संरणक्षत स्मारकों के रूप में
घोणषत दकया गया है।79
कर्धाव ररयासत के साथ पंड़ररया जमीन्दारी का ईल्लेख अर्श्यक है। क्योंदक, आसी से कर्धाव के
शासक सामने अए और दोनों की घणनष्ठता ऐसी थी दक, यदद ररयासत का शासक णनःसंतान हो तो र्ह आस
जमीन्दारी के र्ंशज को ही ईत्तराणधकारी बनाता था। यह जमीन्दारी, तब के , णबलासपुर णजले में थी।
पहले, पंड़ररया जमीन्दारी को, मुकुटपुर प्रतापगढ़ कहते थे। यह जमीन्दारी कल्चुरी राज्य से पृथक
रही और आस कारण से छत्तीसगढ़ के नामों के ईल्लेख में यह ईल्लेणखत नहीं होती है। यह गढ़ (तहसील जैसी
आकाइ) मण्डला के गोंड़ शासक संग्राम शाह के बार्न गढ़ों में से एक रहा हो सकता है।
पण्ड़ररया के जमीन्दार चन्द्रपुर से अए थे और पुलस्तगोत्री राजगोंड़ थे। यह र्ंश करकट राय से
प्रारम्भ हुअ। र्ह चन्द्रपुर से गढ़ा मण्डला अ गया था और ईसे मकड़ाइ का शासक बनाया गया था।
करकट राय की 29 र्ीं पीढ़ी में हट्टे राय हुए। आनके सात पुत्र थे। बड़ा पुत्र प्रताप शाह मकड़इ का
शासक हुअ। कणनष्ठ पुत्र श्याम चन्द्र मण्डला चला गया। मण्डला के शासक द्वारा, श्याम चन्द्र को, पण्डररया
जमींदारी दी गइ और र्ह पण्डररया जमीन्दारी के आस र्ंश का संस्थापक हुअ। यह र्ंश मण्डला के गोंड
शासकों से ऄपने सम्बन्ध जोड़ता है।
श्याम चन्द्र की अठर्ीं पीढ़ी में दल शाह हुए। आनके तीन पुत्र- पृथ्र्ी लसह, महाबली लसह और हरी
लसह- थे। महाबली लसह द्वारा कर्धाव ररयासत की स्थापना की गइ थी।80
महाबली लसह पृथ्र्ी लसह के दीर्ान थे। सागर के शासक द्वारा मण्डला के णनज़ाम शाह पर अक्रमण
दकया गया। महाबली को सहायता करने र्ाली सेना का प्रभार ददया गया था। णनज़ाम शाह ने सागर के
अक्रमण पर णर्जय पाइ। मण्डला के णनज़ाम शाह ने 1760 में महाबली लसह को कर्धाव का ऄणधकार ददया।
एक तथ्य यह भी ईल्लेख में अता है दक, भोंदों जमीन्दारी के पूर्व की पीढ़ी के के लोग कर्धाव के प्रभार में थे
और ईि अक्रमण के समय सरदार लसह सत्ता में था। ईसने भी णनज़ाम को सहायता दी थी। युि में णर्जय
ईपरााँत, जब णनज़ाम ने दोनो को पुरस्कार हेतु बुलाया, तब महाबली ने धमका कर सरदार को नहीं जाने
ददया और कह ददया दक, र्ह भाग गया है। यह सुन मण्डला शासक द्वारा कर्धाव का शासन ही ईसे पुरस्कार
में दे ददया गया।81 एक यह तथ्य भी अता है दक, महाबली को यह सैणनक सेर्ा के बदले नागपुर के भोंसला
रघुजी के द्वारा ददया गया था। एक यह तथ्य भी ददया जाता है दक, सरदार लसह मण्डला से बागी हो गए थे
और हटा ददए गए। ईन्हे णनर्ावह हेतु 12 ग्राम की जमीन्दारी दी गइ। यह लोग टीकोली कर्धाव के माध्यम से
देने लगे।82 महाबली लसह 50 र्षव (1751-1801) शासक रहे।83
79

http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_375.html

80

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.91-92 की पाद रटप्पणी सणहत

81

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.91-92

82

बंशी लाल-णसजरै खानदान कर्धाव (धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.92 में ईल्लेणखत)

83

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/kawardha.html

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महाबली लसह के पुत्र ईणजयार लसह (1801-1848) ऄगले शासक थे। ईन्होनें ईणजयार सागर
नामक तालाब और राधा-कृ ष्ण मणन्दर बनर्ाया। मणन्दर में भूणमगत ईपसना कक्ष बनर्ाए गए। र्ह न्याय
णप्रय भी माने जाते हैं। आनके काल में खैरागढ़ से खमररया प्राणप्त हेतु तनार् बनाया गया। पर ऄंत में णमत्रता
हो गइ। पारीगााँर् के भोरमदेर् मणन्दर के सामने णमत्रता का प्रतीक स्तम्भ स्ताणपत दकया गया। र्े 46 र्षव
शासक रहे।
ईणजयार के ईपरााँत ईनका पुत्र लोक (या टोक) लसह (1848-1852) शासक हुए। र्ह 4 र्षव
शसनोपरांत 39 की ईम्र में णनःसंतान स्र्गव णसधारे । पहले ईनकी माता बदन कुाँ र्र और बाद में णर्धर्ा धूप
कुाँ र्र द्वारा शासन सम्हाला गया।
पंडररया के ग्यारहर्ें जमीन्दार जर्ाणहर लसह के छोटे पुत्र बहादुर लसह को 1854 में गद्दी पर
बैठाया गया। ररयासत को, ऄंग्रेजों द्वारा, फ्युडटे री स्टेट बना णलया गया। र्ह भी 1866 में णनःसंतान मृत्त
हुए।

णचत्र 15 - कर्धाव ररयासत का ध्र्ज

स्रोत- http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/kawardha.html

पुनः पंडररया के जमीन्दार राम लसह के छोटे पुत्र रज पाल लसह को ईत्तराणधकारी बनाया गया।
ईनकी ऄल्पव्यस्कता में णर्धर्ा रूप कुाँ र्र शासन चलाती रहीं। रज पाल को सत्ता सूत्र 1875 में णमला।
आसके 9 र्षव ईपरााँत ररयासत कोटव में अ गइ। 1892 में र्े भी णनःसंतान स्र्गव णसधारे । र्ह दानी थे। ईन्होंने
शास्त्रों में ईल्लेणखत दानों को कइ बार दकया।
पंडररया जणमन्दार गजपाल लसह के णद्वतीय पुत्र यदुनाथ लसह 1892 में ईत्तराणधकारी बनाए गए।
नागपुर की 1908 की प्रदशवनी में आनका राज्याणभषेक दकया गया। 1912 में शासन का पूणव ऄणधकार प्रदत्त
दकया गया।
1896 के ऄकाल के कारण बस्तर से
25 हजार कजव लेने पड़े,
7 हजार आणण्डयन ररलीफ
फण्ड से ददए गए। कइ लोग काल कलणर्त हुए। 1899-1900 में भी ऄल्प र्ृणष्ट रही। 1907 में भी ऄकाल
रहा। 1918 और 1920 के बड़े ऄकाल भी पड़े। राजा को णनजी कोष से भी धन देना पड़ा। राहत कायव पर
व्यय दकया गया। आंफ्लुएज
ं ा से लगभग तीन हजार लोग मर गए। र्े 1920 में र्े भी स्र्गव णसधारे ।
यदुनाथ लसह के ईपरााँत, आनका पुत्र धमव राज लसह ईत्तराणधकारी हुअ। आसकी ऄल्प व्यस्कता में
ऄंग्रेज सरकार ने प्रबन्ध सम्हाला। यह भारत की स्र्तंत्रता ईपरााँत ररयासत के राष्ट्र णर्लय तक सत्ता में रहे।
आटली के मरमर पत्थरों से बना मोती महल फ्रांसीसी आन्जीनीयर की देख-रे ख में बनर्ाया 193639 में गया। यह महल सुन्दर है। यह महल 11 एकड़ में णर्स्ताररत है। गुम्बद पर सोने और चांदी से
नक्काकाशी की गइ है। आसकी सीदढ़यां और बरामदे भी बहुत खूबसूरत हैं। आसके सुन्दर प्रर्ेश द्वार का नाम
हाथी दरर्ाजा है।
यहााँ के शासकों को ठाकु र की पदर्ी थी। 1918 में अय 170,676/- रूपये थी। पााँच र्षों की अय
का औसत
216,717 था।
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कर्धाव ररयासत में तीन जमीन्दारीयााँ, कबीर पंथ की गद्दी और बैरागीयों के प्रमुख महत्र्पूणव हैं।
रें गाखार के जमीन्दार के पूर्वज गंडइ जमीन्दारी में रहते थे। ईणजयार ने पहले ईन्हे छः ग्राम णबना लगान के
ददए। भोंदा में गोंड जमीन्दार थे। आनके पूर्वज ररयासत के शासक रह चुके थे और यह जमीन्दारी च्युत होने
पर भरण-पोषण हेतु णमली थी। बोररया में राज गोंड़ हैं। ईणजयार ने आसे जैत लसह को ददया था, जो ईसका
साला भी था।
दसर्ीं से तेरहर्ीं-चौदहर्ीं शती तक भणि का अन्दोलन दणक्षण में शास्त्रीय रूप धारण करके तथा
अध्याणत्मक पक्ष में दृढ़ होकर पुन: ईत्तर की ओर अया और चौदहर्ीं शताब्दी से ईन्नीसर्ीं शताब्दी तक
प्रबल र्ेग के साथ देश के णर्स्तृत भूभाग में महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यदेश, मगध, ईत्कल, ऄसम और
र्ंगदेश में फै लकर व्यापक लोकधमव बन गया। ईत्तरभारत में आसका नर्ीन रूप में प्रचार करने र्ाले सबसे
प्रथम और सबसे ऄणधक शणिशाली स्र्ामी रामानन्द हुए, णजन्होंने अध्याणत्मक दृणष्ट से रामानुज के
णर्णशष्टाद्वैत को ही मानते हुए भणि का पृथक् सम्प्रदाय स्थाणपत दकया, णजसमें दाणक्षणात्य श्रीर्ैष्णर्ों की
तरह स्पशावस्पशव के णनयम कठोर नहीं थे। लक्ष्मीनारायण के स्थान पर ईन्होंने सीताराम को ईपास्य देर्
बनाया। रामानन्दी र्ैष्णर् र्ैरागी र्ैष्णर् कहे जाते हैं। रामानन्द की दो प्रकार की णशष्य-परम्पराए और थीं।
एक में णनम् जाणतयों के लोग थे और दूसरी में सर्णव लोग। मध्ययुग में भणि का प्रचार करने र्ाले भिकणर्यों में एक के प्रणतणनणध कबीरदास और दूसरी के तुलसीदास हुए।84 आन्होंने ही छत्तीसगढ़ में र्ैष्णर्
प्राचार दकया और णर्रि मत की स्थापना की, जो बैरागी कहलाया। यहााँ आनके कइ मठ बने। दो ररयासतों
में सत्ता रही। आनके णशष्य कबीर हुए, णजनका कबीर पंथ भी छ्त्त्तीसगढ़ में व्यापक प्रचणलत हुअ।
तेरहर्ीं शताब्दी में राघर्ानन्द के णशष्य रामानन्द ने छत्तीसगढ़ में र्ैष्णर् मत का प्रचार दकया।
ईन्होंने णस्त्रयों और गैर-िाह्मणों को भी दीणक्षत दकया। आन्होंने ही छत्तीसगढ़ में णर्रि दल का गठन दकया,
जो ऄब बैरागी कहलाता है। बैरागी और दशनामी सन्याणसयों मठ छत्तीसगढ़ में स्थाणपत हुए, जो अज तक
हैं। गरीब दास (जन्म 1560) पौनी (णजला-बण्ड़ारा) में, ईनके णशष्य बलभद्रदास का रायपुर में दूधाधारी
मठ (राजा जैतलसहदेर् के काल में) स्थाणपत हुअ। बलभद्रदास मात्र दूध का अहार लेते थे। ऄतः दूधाधारी
मठ का नाम बना। मराठा णबम्बाजी भोंसले ईनसे णमलने गए और ज़ागीर भी प्रदान की। आस मठ के र्ैश्णर्
दास ने दूधाधारी संस्कृ त महाणर्द्यालय स्थाणपत दकया। ग्र्ाणलयर से अए द्याराम ने णशर्रीनारायन मठ
स्थाणपत दकया। हैहय राजा आसी गद्दी से सम्बि हुए। रायपुर में ही बैराणगयों के चार मठ थे। कइ बैरागी
मालगुजार और साहूकार भी थे। राज्य में कइ स्थानों पर और भी मठ बने। राजनााँदगााँर् और छु इखदान की
सत्ता भी बैरागी लोगों को णमली। कबीर रामानन्द के प्रमुख णशष्य थे, दकनके कबीर पंथ का प्रचार
छ्त्त्तीसगढ़ में पयावप्त हुअ।

84

िज णडस्कर्री

(http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%B7%E0%A5%8D%
E0%A4%A3%E0%A4%B5_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%8D
%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF)

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कबीरपंथ की स्थापना 15र्ीं शताब्दी में प्रगणतशील संत कणर् कबीर द्वारा की गइ।85 आसके दो भाग
हुए। एक का मुख्यालय काशी (र्ाराणसी) में और दूसरे का छत्तीसगढ़ के कर्धाव, णजसे ऄब कबीर धाम भी
कहा जाता है और यहााँ से दामाखेड़ा में हुअ। आसके ऄनुयायी णहन्दू के ऄणतररि ऄन्य भी हुए और णर्देशों
तक फै ले। कबीर पंथ में ईसकी बनारस शाखा को बाप और कर्धाव शाखा को माइ कहा जाता है। दोनों का
ऄणस्तत्र् पृथ्क-पृथ्क है।
छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ की स्थापना धमवदास ने की। र्ह कबीर के पणट्शष्य थे। धरमदास का जन्म
णर्क्रमी संर्त 1472 के कार्षतक मास की पुर्षणमा णतणथ को बांधर्गढ़ (ईमररया, मध्यप्रदेश) के कसौधा में
कसौन्धन बणनया पररर्ार में हुअ था। आनके णपताजी का नाम था मनमहेश और माता का नाम था
सुधमावर्ती। धनी धरमदास के बचपन का नाम था– जुड़ार्न। जुड़ार्न का ऄथव होता है जो जोड़े या मन को
ठं डा करे , शाणन्त दे। ईनका णर्र्ाह अणमन नाम की स्री से हुअ था। र्े कबीर के पट णशष्य हुये और ईन्होंने
कबीर की मौणखक रचनाओं से अगे जा कर रचनाओं को णलखा। र्ह भी छत्तीसगढ़ी में। ईनकी रचनाओं में
कबीरदास जी की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। यह माना जाता है दक, ईनकी मृत्यु जगन्नाथ पुरी में 1569
में हुइ। छत्तीसगढ़ में आनके प्रभार् से ऄणधकााँश कसौन्धन बणनया भी कबीर पंथी हो गए। एक तथ्य यह भी
ददया जाता है दक, ईनका काल सत्रहर्ीं शतब्दी में था। कबीर ने ईन्हें झीना-दरस ददखाया।
धमवदास के कु छ छतीसगढ़ी पदःमैं तो तेरे भजन भरोसो ऄणर्नाशी
णतरथ व्रत कछु नाही करे हो
र्ेद पड़े नाही कासी

अज धर अये साहेब मोर।
हुणल्स हुणल्स घर ऄाँगना बहारौं,

जन्त्र मन्त्र टोटका नहीं जानेर्

मोणतयन चउाँक पुराइ।

णनतददन दफरत ईदासी

चरन घोय चरनामररत ले हैं

ये धट भीतर र्णधक बसत हे

लसधासन् बआ ठाइ।

ददये लोग की ठाठी
धरमदास णर्नमय कर जोड़ी

पााँच सखी णमल मंगल गाहैं,

सत गुरु चरनन दासी

सबद्र मा सुरत सभाइ।

सत गुरु चरनन दासी

संइया महरा, मोरी डाणलया फं दार्ों।
काहे के तोर डोणलया, काहे के तोर
पालकी
काहै के ओमा बााँस लगाबो
अर् भार् के डोणलया पालकी
संत नाम के बााँस लगार्ो
परे म के डोर जतन ले बांधो,
उपर खलीता लाल ओढ़ार्ो
ज्ञान दुलीचा झारर दसाबो,
नाम के तदकया ऄधर लगार्ो
धरमदास णर्नर्ै कर जोरी,
गगन मंददर मा णपया दुलरार्ौ।

ईनका पुत्र मुिमणण छत्तीसगढ़ के कोरबा के कु दुरमाल में बसा। आस काल में णर्र्ाद हुए और चााँपा
में कबीर पररषद बुलाइ गइ और दो पीठे खरणसया और दामाखेड़ा स्थाणपत की गईं। आसके महंत पद पैतृक
हुए।

85

http://en.wikipedia.org/wiki/Kabir_Panth

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कर्धाव में पुनः णर्र्ाद ईठा। यह णर्र्ाद धीरज नाम और ऄगर नाम नामक दो महंतों के नाम था।
न्यायायलय से धीरज नाम को महंती णमली, क्योंदक ऄगर नाम मरार जाणत की स्त्री का पुत्र था, परं तु र्ह
ही ऄणधक स्थाणपत और प्रणसि हुअ। आसने कोरबा के कु दुरमाल में पीठ स्थाणपत की।86
यह माना जाता है दक कबीर और नानक देश घूम कर ऄलख जलाते थे और एक ईल्लेख में तो यह
तक कहा गया दक दोनों गौरे ला, णबलासपुर में णमले भी।87 हालााँदक आसकी सत्यता की पुणष्ट होनी है। यहााँ
कबीर चौरा ऄर्श्य बना। तभी धमवदास कबीर से प्रभाणर्त हो ईनके ऄनुयायी हुए और ऄपनी सम्पूणव
सम्पणत दान की। आसकी र्ंश गद्दी बनी। कहते हैं यहााँ ऄब तक 42 र्ंश पद और 15 गुरू हो चुके हैं। शाखाएाँ
हुईं। अश्रम सामने अए।

नागपुर जमीन्दारी की खलारी जमीन्दारी
आसके तहत भी तीन ररयासतें थीं आनका र्नवन णनम्ााँदकत है।
(राज)नााँदगााँर्
राजनााँदगााँर् ररयासत को ऄंग्रेजों ने प्रथम श्रेणी में रखा था। यह ररयासत 200 50/ से 210 22/
ईत्तरी ऄक्षााँश और 800 26/ से 810 13/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी। आसका क्षेत्रफल 871 र्गव मील
और जनसंख्या 147,919 थी।88
आसमें पााँच परगने थे- नाद गााँर्, डोंगर गढ़, पााँडादाह, पाटा और मोहगााँर्। प्रथम दो और ऄंत के
तीन परगने ऄलग-ऄलग थे। बीच में खैरागढ़ और छु इखदान ररयासत तथा दुगव89 णजले के भाग थे। पाटा
और पााँडादाह पहाड़ और र्नों से अच्छाददत थे। राजनााँदगााँर् और मोहगााँर् ईपजाउ काली णमट्टी के क्षेत्र
थे।
राजनााँदगााँर् का मूल नाम नाद या नााँद गााँर् था। यहााँ बंगाल-नागपुर रे ल (BNR) अने पर यह
नाम बदला, क्योंदक आसी नाम का एक रे ल्र्े स्टेशन ग्रेट आंणडयन पैणननसुला रे ल्र्े (GIPR) में भी अ गया
था।90

86

Robert Vane Russell and Raibhadur Hira Lal-The Tribes and Castes of the Central Provines of

India
87

http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/kabir012.htm

88धानू
89

लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.44

1948 में यह ररयासत आस दुगव णजले में णमला दी गइ।-

http://www.britannica.com/EBchecked/topic/490024/Rajnandgaon
26 जनर्री’1973 को आसे दुगव से पृथक कर णजला बनाया गया और 1 जुलाइ’1978 को आससे कर्धाव को पृथक कर ऄलग णजला
बनाया गया। -http://rajnandgaon.gov.in/
90

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.44

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नादगााँर् या नााँदगााँर् को नन्दग्राम से व्युत्पन्न माना जाता है। यहााँ दीघव काल तक र्ैष्णर् बैराणगयों
का राज था। आन पर सणन्क्षप्त चचाव कर्धाव ररयासत के णर्र्रण में की गइ है। ईन्हों ने अराध्य कृ ष्ण के णपता
नन्द के नाम पर या ईनके गााँर्- नन्दग्राम- के नाम पर यह नाम रखा हो सकता है। नाद को जल पात्र नांद
(कठोणतया) से भी जोड़ा जाता है। छत्तीसगढ़ी में बमीठा (लचरटयों की बाम्बी) को नादगांर् भी कहते हैं। नाद
को स्र्र-नाद से भी सम्बि दकया जा सकता है।91
ऄन्य ररयासतों की तरह राजनााँदगााँर् ररयासत का भी प्राचीन और ऄणधकााँश आणतहास ऄज्ञात है।
पहले गोंड़ शासन आंणगत होता है। गोंड़ शासक जीत राय के कु छ सोटे और लट्ठ राजनााँदगााँर्
राजमहल प्रर्ेश द्वार के समीप रखे हैं।
यहााँ पर शासक रहे मुणस्लम जमीन्दार की कि भी यहााँ है। आन्ही से बैरागीयों ने सत्ता ली थी।
बैराणगयों के सत्ता में अने से ही कु छ आणतहास ज्ञात है।
ऄठारहर्ीं शताब्दी के ऄर्सान काल में सोहागपुर पंजाब से शाल (दुशाले) के घुमंतु व्यापारी
बैरागी प्रहलाद दास रतनपुर रूक गए। तब रतनपुर में नागपुर के भोंसले मराठा णबम्बाजी का राज था।
प्रहलाद दास को यहााँ बहुत व्यार्साणयक लाभ हुअ।
तब बैरागी ऄणर्र्ाणहत ही रहते थे। प्रहालद दास का णशष्य (चेला) महंत हरर दास सम्पणत का
ईत्तराणधकारी हुअ। णबम्बाजी की कइ राणनयों मे से सात या अठ राणनयों ने महंत हरर दास से दीक्षा ले ली।
ऄब महंत राजगुरू कहलाने लगे और ईन्हें रतनपुर राज्य के प्रत्येक ग्राम से दो रूपये भेंट बसूली (गुरू
दणक्षणा) का ऄणधकार ददया गया। आस धन से महाजनी (चल/ऄचल सम्पणत बन्धक/णगरर्ी रख धन ब्याज
पर ईधार देना) का कायव भी प्रारम्भ कर ददया गया। यह व्यर्साय भी बहुत लाभप्रद रहा। आस प्रकार र्े
णर्पुल धन के स्र्ामी हो गए।92
पाड़ादाह जमीन्दार ने, हररदास के पास जणमन्दारी णगरर्ी रख कर, धन ईधार णलया और ऊण
पटाने में ऄसमथव रहा। ऄतः जमीन्दारी हररदास के पास अ गइ।93 आस प्रकार छत्तीसगढ़ में पंजाबी सत्ता के
स्र्ामी हुए और अगे जाकर राजनााँदगााँर् ररयासत के भी। पंजाबी सणि में भी सत्ता में रह चुके थे।
हररदास की मृत्यु ईपरााँत ईनके णशष्य (चेले) महंत रामदास पाड़ादाह जणमन्दारी के ईत्तराणधकारी
हुए। तब (राज)नााँदगााँर् में जमीन्दार आस्लाम धमावर्लम्बी थे। (राज)नााँदगााँर् जमीन्दारी भी, ईि प्रकार से
ही, रामदास के पास अ गइ।
रामदास के ईपरााँत महंत रघुर्र दास और ईनके ईपरााँत णहमंचलदास णशष्य परम्परा में
ईत्तराणधकारी हुए। आसके काल में ऄणधक व्यय या दान अदद से कोष ररि हो गया। ररयासत पर नागपुर के
भोंसलों का णनयंत्रण था। ईनका णनयत र्ार्षषक राजस्र् भी भुगतान नहीं दकया जा सका। णहमंचलदास को
नागपुर अहुत दकया गया। र्ह प्रर्ीण गायक थे। ईनके गायन ने भोंसले शासक को प्रसन्न कर ददया। सभी
बकाया माफी के साथ ईपहार स्र्रूप मोहगााँर् परगना भी ईन्हे दे ददया गया और र्ह भी णबना लगान के ।

91

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.44

92

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.45 और छत्तीसगढ़ ददग्दशवन

93

र्ही

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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णहमंचलदास के ईपरााँत महंत मौजी रामदास सत्ता में अए। ईन्होंने खैरागढ़ के साथ णमल कर,
नागपुर दरबार के णर्द्रोही, डोंगरगढ़ जमीन्दार और ईसके भाइ को परास्त दकया।94 ईन्हे अधा डोंगरगढ़
(अधा लसगारपुर, छु ररया और डोंगरगढ़ परगने) पुरस्कार में दे ददया गया।95 आन्होंने णशष्य महंत घासीदास
को दत्तक पुत्र बनाया। बाद में रामदास गृहस्थ हो गए और णर्र्ाह से औरस पुत्र हुअ।
बैराणगयों में प्रथम बार मौजी रामदास का औरस पुत्र घनाराम दास ईत्तराणधकारी हुअ। पर आसकी
कोइ र्ैध संतान नहीं होने से ऄन्ततः महंत घासीदास ही सत्ता में अए। महंत घासीदास को, ऄंग्रेज सरकार
ने, 1865 में फ्यूडटे री चीफ बनाया और सनद दी गइ।96 सनद में र्े दत्तक लेने के पात्र माने गए, जबकी
ईन्हे णर्र्ाह से र्ैध संतान थी। 1879 में ऄंग्रेजों की भारत सरकार द्वारा यह सूणचत दकया गया दक, ऄब
मात्र र्ैध संतान ही ईत्तराणधकारी मानी जएगी।
महंत घासीदास चतुर और परीश्रमी माने जाते हैं। ईन्होंने दो बाग़ और राजमहल बनर्ाया।
ररयासत की अय बढ़ाइ। ररयासत में व्यापार णर्कास के कायव दकए। (राज)नााँदगााँर् में बाज़ार स्थाणपत
कराया। ऄफगान युि में ऄंग्रज
े सरकार को रूपये एक लाख दस हज़ार मूल्य की राशन सामग्री भेंट दी। र्े
1883 में मृत्त हुए।
महंत घासीदास का ईत्तराणधकारी ईनका ऄल्पव्यस्क पुत्र महंत बलराम दास हुअ और राज प्रबन्ध
ईसकी मााँ को ददया गया। 1883 में एक ददर्ान भी णनयुि दकया गया और आस पद पर लाला भगर्ंत राय
णनयुि हुए।97 आसी र्षव यहााँ के शासकों को और महंत बलराम दास को राजा की पदर्ी दी गइ। ईन्हे 1891
में प्रशासन करने का ऄणधकार ऄथावत राज्याणधकार भी दे ददया गया।98

94

छत्तीसगढ़ ददग्दशवन में यह ईल्लेख है दक, (सम्भर्तः) डोंगरगढ़ के घासीदास द्वारा छत्तीसगढ़ से नागपुर में ऄंग्रेजों और मराठों

हेतु जा रहे कर संग्रह के खाजाने को रोका और लूटा गया था। र्ह बन्दी बनाया गया।
95छत्तीसगढ़

ददग्दशवन में यह ईल्लेख है दक, (सम्भर्तः) खैरागढ़ को ऄन्य ईपहारों के साथ लसह की ईपाणध लगाने का भी

ऄणधकार ददया गया।
96

Dale Hoiberg & Indu Ramchandani- Students' Britannica India, Volumes 1-5 By Britannica, P. 258

और
http://books.google.co.in/books?id=ISFBJarYX7YC&pg=PA258&lpg=PA258&dq=Rajnandgaon+princ
ely+state&source=bl&ots=1wWJvFStpw&sig=_Bt8bepZumYe6DbVd2sYPLIgCxU&hl=en&ei=aLmPS6
nTIcfBrAetlNiRCw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=4&ved=0CA4Q6AEwAw#v=onepage&q
=Rajnandgaon%20princely%20state&f=false
97

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.46

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Dale Hoiberg & Indu Ramchandani- Students' Britannica India, Volumes 1-5 By Britannica, P. 258

और
http://books.google.co.in/books?id=ISFBJarYX7YC&pg=PA258&lpg=PA258&dq=Rajnandgaon+princ
ely+state&source=bl&ots=1wWJvFStpw&sig=_Bt8bepZumYe6DbVd2sYPLIgCxU&hl=en&ei=aLmPS6
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=Rajnandgaon%20princely%20state&f=false

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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आस काल में ररयासत ईन्नतशील रही। एक ऄंग्रेजी णमणडल स्कू ल, णनधवन णर्द्यार्षथयों हेतु छात्रर्ृणत,
रायपुर और राजनााँदगााँर् में नल-जल योजना, एक ईत्तम पाकव (रानी बाग़), सूत कातने और कपड़ा बुनाइ
का कारखाना अदद जैसे कायव हुए। ऄंग्रेजों ने ईन्हे राजा बहादुर की व्यणिगत ईपाणध दे दी। र्े 1897 में
णनःसंतान मृत्त हुए। आन्होंने महंत राजेन्द्र दास को गोद णलया था।
महंत बलराम दास के ईपरााँत ईनका दत्तक पुत्र महंत राजेन्द्र दास ईत्तराणधकारी हुए। पर र्े
राजकु मार कालेज, रायपुर में ऄध्ययन के दौरान ही 25 मइ’1912 को परलोक णसधार गए। ऄब
ईत्तराणधकार ऄणनणित हो जाने से णर्र्ाद की णस्थणत बन गइ। ऄनतः दाउ श्याम चरण दास के ज्येष्ठ पुत्र
महंत लाल सर्ेश्वर दास के पक्ष में फै सला हुअ। आन्हों ने भी ईि णर्द्यालय से ही ऄध्ययन दकया। राज्य
प्रबन्ध में सहायता हेतु पाणलरटकल एज़ेण्ट के पयवर्ेक्षण में एक एक्स्रा ऄणसस्टेंट कमीशनर रहे (रार् बहादुर)
सीताराम पंणडत को सुपटरटेंडटें बना खैरागढ़ से भेजा गया। आनकी सहायता हेतु एक ऄणससटेंट सुपटरटेंडटें ,
एक तहसीलदार और एक नायब तहसीलदार था। छः पुणलस स्टेशन थे। ररयासत में ईदूव स्कू ल भी था।

णचत्र 16 - राजनााँदगााँर् ररयासत का ध्र्ज

स्रोत -http://www.crwflags.com/FOTW/FLAGS/in-rajna.html

राजनााँदगााँर् के शासकों की पदर्ी महंत थी। 1922 के असपास ररयासत की औसत अय
810,018/- थी।99
यह ररयासत ऄपेक्षाकृ त्त प्रगणतशील मानी जाती थी। यहााँ णर्द्या और व्यापार की, ऄपेक्षाकृ त,
ऄणधक ईन्नणत हुइ। बाद में गजानन माधर् मुणिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी और बल्देर् प्रसाद णमश्र
जैसे साणहत्यकार भी राजनााँदगााँर् से सम्बध रहे। पं.रणर्शंकर शुक्ल खैरागढ़ मे णशक्षक और राजनााँदगााँर् में
र्कील रहे।1880 तक कनारी और मोहड़ा ग्राम ईत्कृ ष्ठ और महंगी साणड़यों हेतु जाने जाते थे। खादी और
उनी कम्बल भी ईत्पाददत होते थे। यहााँ का बीड़ी व्यर्साय भी स्थाणपत था। आसका प्रारम्भ एक मुणस्लम
व्यापारी ने दकया था। यहााँ अकर बसे मुणस्लम तेल पेरने र्ाले भी तेली ही कहलाने लगे थे। सेंरल प्रालर्स
काटन णमल, जो अगे चल कर बंगाल नागपुर काटन णमल कहलाया, स्थाणपत हुअ था। आसमें 480 करघे
और 28,224 कताइ यंत्र लगे थे। बुरहानपुर के एक बोहरा मुणस्लम द्वारा लगाइ गइ णजलनग फै क्टरी भी थी,

99

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.47

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णजसे भी बंगाल नागपुर काटन णमल ने ही क्रय कर णलया था। ऄन्न व्यापार भी प्रणसि था। 1920 में
3,870,000/- का णनयावत और
4,161,500/- का अयात हुअ।
कााँकेर ररयासत खण्ड में ईल्लेणखत णर्पणत्तयााँ यहााँ भी अइ। यहााँ से 1828, 1835, 1845, 1868,
1897, 1900 और 1918 के अकाल के णर्र्रण णमलते हैं। 1907 और 1912 में प्लेग का प्रकोप रहा। एक
बार में ही तीन-तीन सौ लोग काल कलणर्त हुए। 1918 के कु ख्यात आऄंफ्लुएज
ं ा में पााँच हजार के लगभग
लोग काल कलणर्त हुए।
त्रैसाला र्न्दोबस्त ऄपनाया गया। परगने में 8-10 ग्राम तक थे। मुणखया को परगणनहा कहते थे और
र्सूली ठे केदारों का पयवर्ेक्षण करते थे। ठे केदार गौंरटया कहलाते थे। पटर्ारी को बुतकर कहते थे।
र्ैष्णर् साधुओं और मठों को ररयासत सहायता दी जाती थी। मठ प्रमुख को महंत कहते थे। आसके
उपर आनकी पंचायत थी और प्रमुख महंत आसके पंच थे। करठन णर्र्ाद राजा हल करता था। हालााँदक शतव
यह थी दक, ईसका णनणवय ऄयोध्या, मथुरा और बनारस के मध्यस्थ (Central Authority) भी णस्र्कार ले।
महंत बनने हेतु मठ में रह कर न्युनतम 12 र्षव बैरागी का कायव ऄथावत सेर्ा अदद करनी ऄणनर्ायव थी। यह
लोग चौमास छोड़ देशाटन पर रहते थे। महंत णनशान रखता था, जो सूरत में बना सरतरी का मुल्यर्ान
र्स्त्र होता था। आस पर हनुमान कसीदे से बने होते थे। पट नामक सन्दूक में, यह र्स्त्र, रखा जाता था और
यह मात्र महंत को ही णर्क्रय दकया जा सकता था। भेंट पाने हेतु यह र्स्त्र ऄणनर्ायव था।
कु छ ऄन्य तथ्यओडारबन्ध आस ररयासत में प्रणसि तालाब है। यह माना जाता है दक, दुगव शासक मोहन देर् यहााँ
की ईणड़या भाषी रानी ऄसमत ओड़नी पर रीझ कर ईसके सबल ऄपहरण पर अमादा हो गया। रानी ने
सणतत्र् रक्षा हेतु एक लाख ईणड़या लोगों द्वारा एक रात में ही तालाब खुदर्ाया और सबको समेट ईसमें
समा गइ।
दूसरे - खोबा के समीप डोंगरगााँर् के गोंड़ जमीन्दार और ररयासत के शासक के मध्य डोंगरगढ़ के
भोंसलों से णर्द्रोह हो जाने के कारण युि हुअ था और र्े पराणजत दकए गए थे।
तीसरे - पांडादाह में महंतों की कु छ समाणधयााँ हैं। आन पर शंख, चक्र, तूम्बा, सूयव और चन्द्र बने हैं।
चतुथ-व बंजारी में मणन्दर है, जो बंजारा र्गव की सशि ईपणस्थणत ददखाता है। हालााँदक छत्तीसगढ़ के
सभी णजलों में बंजारों की ईपणस्थणत को णसि करती आस संज्ञा से ली गइ ऄन्य ऄन्य संज्ञाएाँ बनाइ गइ हैं।
पंचम- सुरही तट पर मण्डला राजा णनज़ामशाह के स्मरण में मोहगााँर् नामक ग्राम है।
षष्ठम- सोमानी ग्राम में राजनााँदगााँर् के प्रथम बैरागी राजा महंत रामदास रहे थे। ऄतः ईसे महंतपुर कहा
जाने लगा।

खैरागढ़

खैरागढ़ ररयासत को ऄंग्रेज शासन ने णद्वतीय श्रेणी में रखा था। यह ररयासत 210 4/ से 210 34/
ईत्तरी ऄक्षााँश और 800 27/ से 800 22/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी।100 आसका क्षेत्रफल 931 र्गव मील
और जंसंख्या 155,471 थी, जो 124,770 हो गइ थी।101
आसे ज़ागीर या जमीन्दारी से लप्रसली स्टेट 1898 में बनाया गया।102

100

Chhattisgarh fudatery state Gazetteer

101

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.62

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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यह ररयासत तीन भागों में णर्भि थी। प्रथम में खैरागढ़ और ड़ोंगरगढ़ तहसीलें थीं। आनके मध्य
राजनााँदगााँर् ररयासत का पााँडादाह परगना था। आस भाग के ईत्तर में छु इखदान ररयासत और परपोड़ी
जणमन्दारी, पूर्व में दुगव णजला और राजनााँदगााँर् ररयासत, दणक्षण में राजनााँदगााँर् ररयासत और भंडारा
णजला तथा पणिम में भंडारा और बालाघाट णजले थे। णद्वतीय में खम्हररया तहसील है। यह भाग छु इखदान,
कर्धाव ररयासत की णसल्हेटी जमीन्दारी और राजनााँदगााँर् ररयासत के मोहगााँर् परगने के बीच था। तृतीय
लघु भाग खोलर्ा का था। यह भाग लोहारा, गंडइ और णसल्हेटी जणमन्दारी, दुगव और बालाघाट णजलों और
छु इखदान ररयासत से णघरा था।103
खैर र्ृक्षों की बहुलता ने खैरागढ़ संज्ञा को जन्म ददया।104 आस संज्ञा को शासक खङराय से भी जोड़ा
जाता है।105
छत्तीसगढ़ राज्य की ऄन्य ररयासतों की तरह खैरागढ़ ररयासत का प्राचीन आणतहास ज्ञात नहीं है।
कु छ तथ्य ऄर्श्य सामने अते हैं।
ईज्जैन के राजा णर्क्रमाददत्य के समकालीन राजा काम सेन का नाम डोंगरगढ़ बोमलाइ मणन्दर
णनमावण में सामने अता है।
भांडर्ा कोल लोगों से सत्ता हस्तगत करने का ईल्लेख नागर्ंश के आणतहास में अता है।
यह ररयासत ऄणधकााँशतः नााँदगााँर् के आणतहास से प्रभाणर्त या सम्बि रही।
सभी ररयासतों का आणतहास छत्तीसगढ़ के आणतहास के साथ-साथ ही रहा है। कल्चुरी, मराठे और
ऄंग्रेजों से सभी ररयासते प्रभाणर्त रहीं हैं।
खैरागढ़ ररयासत के का ऄंणतम शासक र्ंश ही ज्ञात रहा है, जो छोटा (चुरटया) नागपुर का
नागर्ंशी राजपूत क्षणत्रय था।106 र्े पुंडरीक नाग से ऄपनी व्युत्पणत मानते हैं।107
आस र्ंश के फाणी मुकुट राय द्वारा, भांडर् कोल लोगों को हटा कर, सम्र्त 219 में छोटा (चुरटया)
नागपुर में सत्ता स्थापना की गइ।108
आसी र्ंश की 63 र्ीं पीढ़ी में पालकोट का नर्ल दकशोर शाह हुअ, णजसने खैरागढ़ के शासक लाल
बहादुर लसह को बहन के णर्र्ाह के समय स्र्यं ईपणस्थत हो कर सहायता दी थी।
आस र्ंश की 38 र्ें पीढ़ी में पृणथ्र्कणव राय हुए। खैरागढ़ का र्ंश पृथ्र्ीकणव या सभा लसह को मूल
पुरूष मानता था। आनके दो पुत्रों में नहीं बनी। ऄनतः कणनष्ठ लक्ष्मीणनणध खोलर्ा अ कर बसा।109 सम्भर्तः
ईसे मण्डला के संग्राम लसह ने मंत्री भी बनाया था और ईसे खोलर्ा सम्र्त 1544 में बुन्देला अक्रमण रोकने
पर ददया गया।110 आसके साथ ही कणर् दलराम रार् अए, णजनका एक पद छत्तीसगढ़ नाम चचाव के समय
ईल्लेणखत हुअ है। लक्ष्मीणनणध सम्र्त 1561 में परलोकर्ासी हुए।
यह माना जाता है दक, साणहत्य में छत्तीसगढ़ संज्ञा या नाम का प्रथम प्रयोग खैरागढ़ ररयासत के
चारण या भाट कणर् दलराम रार् ने राजा लक्ष्मीणनणध राय की प्रशणस्त में, 1497 इ. में, दकया।111 1497
102

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/khairagarh.html

103

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.62

104र्ही
105

लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

106

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.62

107

लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

108

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.62

109

लगभग सम्र्त 1541।- लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

110

लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

111

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.40

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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की आस कणर्ता में छत्तीसगढ़ शब्द का प्रयोग आस संज्ञा के पूर्व से प्रचणलत रहे होने का भी संकेत माना जाता
है।:लणक्ष्म णनणध राय सुनौ णचत्त दै,
गढ़ छत्तीस में न गढ़ैया रही
मरदुम रही नलह मरदन के ,
फे र णहम्मत से न लड़ैया रही।
भय भार् भरे सब कााँप रहे,
भय है नहीं जाय डरै या रही
दलराम भनै सरकार सुनौ,
नृप कोड न टाल ऄड़ैया रही। 112
लक्ष्मीणनणध के पुत्र सगुन राय सम्र्त 1573 तक और ईसका पुत्र भीमराय सम्र्त 1592 तक
शासक रहा।
भीम राय का पुत्र घनश्याम ऄगला शासक था। एक गोंड़ सेना मण्डला णर्जय हेतु खोलर्ा हो कर
जा रही थी। घनश्याम ने दलपणत का शीश कलम कर मण्डला शासक को प्रस्तुत दकया और बोदागढ़ परगना
भी पुरस्कार में पा णलया।113 ईसने यहााँ एक दकला भी बनर्ाया।
घनश्याम के ईपरााँत ददणग्र्जय राय सम्र्त 1630 तक और दुणनयापणत राय सम्र्त 1654 तक
शासक रहे। तदुपरांत आन्द्र सेन शासक हुए, जो णनःसंतान मृत्त हुए।
आन्द्र सेन के णनःसंतान मृत्त थे। ऄतः ऄगला शासक, ईनका भाइ, णर्ददत सेन हुअ। णर्ददत के
ईपरााँत रूद्र सेन सम्र्त 1687 तक, धमव जय राय सम्र्त 1700 तक और औघड़ राय सम्र्त 1728 तक
सत्ता में रहे।
औघड़ ने बोदागढ़ राजधानी छोड़ कर णपपररया को राजधानी बनाया।
औघड़ राय का पुत्र श्यामघन 1740 में खोलर्ा का जमीन्दार था। ईसने सम्र्त 1748 तक शासन
दकया। आसने लााँजी जणमन्दार को मण्डला शासक महाराज शाह के णर्रूि सहायता दी थी। युि में लााँजी
जणमन्दार हारा था, परं तु महाराज शाह ने श्यामघन का ऄपराध क्षमा कर ददया। साथ ही ईसे सैणनक
सरदार बना राज्य णर्स्तार की ऄनुमणत भी दे दी।114
श्यामघन का ईत्तराणधकारी पुत्र दररयार् राय हुअ, पर र्ह ऄणधक काल तक जीणर्त नहीं रहा और
ईसका पुत्र ऄनुप राय ईत्तराणधकारी हुअ। तब ईसके पास 132 ग्राम थे, बाद में यह ग्राम खोलर्ा, खैरागढ़
और लछना परगनों में सम्मणलत हुए। मण्डला शासक महाराज शाह के ईत्तराणधकारी पुत्र णशर्राज शाह ने
भी ऄनूप के स्र्त्तर् की णस्थती को बनाए रखा।
ऄनूपराय का पुत्र माधर् राय और तुपरांत ईसका पुत्र खङराय ईत्तराणधकारी हुए। खङराय पर
लााँजी जमीन्दार ने भोंसलों की सहायता से चढ़ाइ की और ईसे पकड़ कर नागपुर दरबार में प्रस्तुत दकया।
नागपुर दरबार ने 500/- नागपुरी रूपयों का णखराज़ (कर) लगा, ईसकी ज़ागीरदारी णस्र्कार कर णखलऄत
दे दी।
ऄब खैरागढ़ जागीरदार मण्डला के स्थान पर नागपुर के भोंसलों के ऄधीन हो गए।
खङराय ने खोलर्ा, जहााँ ईसने राजघाट अदद बनर्ाए थे, के स्थान पर खैरागढ़ को मुख्यालय या
राजधानी बना णलया। आसे खङराय के नाम पर खङगढ़ नाम ददया गया, जो ऄब खैरागढ़ कहलाता है।
112

प्यारे लाल गुप्त-प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.40-41

113

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.62

114

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.63

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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नागपुर में ईत्तराणधकार बदलने पर, 1755 में, णखराज़ (कर) 1,500/- नागपुरी रूपये कर ददया
गया। खङराय का देहांत 1759 में हुअ था।
खङराय के ईपरााँत ईसका पुत्र रटकै त राय लसहांसनारूढ़ हुअ। रटकोली पुनः बढ़ा कर 5,000/नागपुरी रूपये कर दी गइ। आसे, दस र्षव ईपरााँत, सुबेदार भास्कर रार् ने 8,000/- नागपुरी रूपये कर
ददया। 1784 में ररयासत में कइ नर्ीन कर लगाकर अय में
3,000/- की र्ृणि की गइ। 1784 में ही
कर्धाव के शासक ईणजयार लसह और सरदार लसह के मध्य खम्हररया परगने के ऄणधकार को लेकर णर्र्ाद
हुअ। रटकै त ने सरदार को धन और सेना की सहायता ईपलब्ध कराइ और खम्हररया पर सरदार का
ऄणधकार हो गया। रटकै त ने, पूर्व में ददए गए ऊण के बदले ईसे ले णलया और आसे नागपुर से भी पक्का करा
णलया। राज्य कर भी 1814 में
35,000/- तक पहुाँच गया।

णचत्र17 - खैरागढ़ ररयासत का ध्र्ज

स्रोत-http://www.crwflags.com/FOTW/flags/in-khair.html

1816 में डोंगरगढ़ जणमन्दार घासीदास बैरागी द्वारा नागपुर से बगार्त की गइ। आसके शमन हेतु,
नागपुर भोंसलों और ऄंग्रेज ररचडव जेंफकसन द्वारा, रटकै त को कहा गया। ईसने (राज)नााँदगााँर् की सहायता
से सफलता पाइ। ऄब डोंगरगढ़ भी ईसे दे ददया गया और लसह की पदर्ी दी गइ। तब से खैरागढ़ के शासक
लसह का प्रयोग करने लगे। राज्य कर 44,000/- नागपुरी रूपये कर ददया गया।
एक तथ्य यह भी अता है दक, सम्र्त 1845 मॆ6 धमधा शासक भर्ानी लसह द्वारा भाइ बणहरर्
लसह के नेतत्ृ र् में सेना भेज, रटकै त की ऄनुपणस्थणत में, अक्रमण दकया गया। कछु अणहन रानी ने ईसे परास्त
दकया। भैरर् भी मारा गया। ऄब भर्ानी स्र्यं अया। रानी ने रटकै त के अने तक ईसे रोके रखा। भर्नी
दकले का दरर्ाजा ईखाड़ कर ले गया। रटकै त ने पलट चढ़ाइ कर दी। ईसे परास्त दकया तोप और नौबत ईठा
लाया और खैरागढ़ में स्थाणपत कर दी। धन दण्ड़ भी णलया।
रटकै त राय के दोनों पुत्र ढ़लती ईम्र में, महात्मा रूखड़स्र्ामी के अणशर्ावद से प्राप्त हुए थे। आनका
मणन्दर भी स्थाणपत दकया गया। ईनकी धूनी की राख सुरणक्षत रखी गइ। रूखड़स्र्ामी ने जीणर्त समाणध ली
थी।
रटकै त राय, लगभग 64 के शासन ईपरााँत, 75 र्षव की अयु में स्र्गवर्ासी हुए।
रटकै त राय के ईपरााँत ईसका ऄल्पव्यस्क पुत्र दृगपाल लसह ईत्तराणधकारी हुअ। (राज)नााँदगााँर्
जणमन्दार डोंगरगढ़ णर्जय में बराबर का सहभागी रहा था। ऄतः ईसने डोंगरगढ़ के अधे भाग का दार्ा
दकया। नागपुर ने आसे णस्र्कार कर णलया। डोंगरगढ़, पाथरी और अधा णसगारपुर खैरागढ़ को और शेष
अधा लसगारपुर, डोंगरगााँर्, छु ररया (राज)नााँदगााँर् को ददए गए। ऄब रटकोली से 9,000/-नागपुरी रूपये
कम कर ददए गए। णद्वगपाल का देहांत 1833 में हुअ।
डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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लाल प्रद्युमन णसह का लेख है दक, खैरागढ़ की नददयों में बाढ़ से जल प्लार्न को बचाने के णलए
ईन्होनें नदद जल में पैर डु बों मन्नत की दक, नदी ईतर जाए और मेरे प्राण चले जाएाँ। और यह दोनों कायव हो
गए। नदी ईतरी और दृगपाल के प्राण दो माह में चले गए।115
णद्वगपाल लसह का भाइ मणहपाल लसह ऄगला शासक हुअ। र्ह कु छ माह ईपरााँत ही सम्र्त 1894
में स्र्गवर्ासी हो गया।
मणहपाल लसह के तीन पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र लाल फतह लसह (1833-1874) 11 र्षव की अयु में ईसका
ईत्तराणधकारी हुअ। 1854 में नागपुर राज्य ऄंग्रेजी राज्य में णमला णलया गया। तब खैरागढ़ का णखराज
39,000/- कलदार रूपये णनयत दकया गया।
1865 में आसे भी, ऄन्य 14 ररयासतों की तरह, फ्युडटे री स्टेट बना ददया गया और गोद लेने के
ऄणधकार की सनद दी गइ। णखराज को 1867 में
47,000/- और 1888 में
70,000/- दकया गया।
1909 में
80,000/- तीस र्षव हेतु दकया गया।
फतह ने रायपुर में ऄपने दो सरदारों के साथ रह कर कमीश्नर आणलयट को सहायता की।116 फतह
का देहांत 1874 में डोंगरगााँर् में हुअ।117
लाल फतह लसह का पुत्र लाल ईमरार् लसह (1874-1890) ऄगला शासक हुअ। राज्य प्रबन्ध
1883 तक ऄंग्रेज शासन के हाथ में रहा। 1887 में ईमरार् को राजा की व्यणिगत पदर्ी दी गइ। ईसका
देहांत 1890 को हुअ।118
लाल ईमरार् का ईत्तराणधकारी ईसका ज्येष्ठ पुत्र कमल नारायण लसह हुअ। ईसका जन्म 1879 में
हुअ था।119 1896 में आसे भी राजा की व्यणिगत्त पदर्ी दी गइ, णजसे दो र्षव ईपरााँत 1898 में र्ंशानुगत
(या ररयासत के शासक हेतु) कर ददया गया।120 र्ह 6 फु ट 2 आंच की कद्दार्र उाँचाइ के साथ सुन्दर और
सुडौल माने जाते थे।
कमल नारायण लसह शास्त्रीय संगीतानुरागी भी थे। आन्होंने नर्ीन राग बनाए और आस पर ग्रंथ भी
णलखे। यथा- कमल नारायण हषव, कमल प्रकाश माला, कमल नारायण णर्नोदा, शीतला यश मणलका और
ददल्ली दरबार र्णवन।
कमल की एक छोटी बहन णर्क्रम सम्र्त 1956 में भागलपुर ऄंतगवत्त बरबारी के सुरेन्द्र नारायण
लसह के पुत्र राजेन्द्र नारयण लसह से और दूसरी छोटी बहन ईसी णजले के शाहपुर के हंसजी महाराज121 के
पौत्र संत प्रसाद को ब्याही गईं। णर्क्रम सम्र्त 1962 में पुत्र लाल बहादुर लसह का णर्र्ाह नेपाल के
महाराणा के पुत्र पद्यजंग बहादुर की णद्वतीय पुत्री के साथ हुअ।
कमल नारायण लसह का देहांत 7 ऄक्टूबर’1908 को हुअ।
1908 में कमल नारायण लसह के ऄव्यस्क पुत्र लाल बहादुर लसह ऄगले ईत्तराणधकारी हुए। बहादुर
का जन्म जून 1889 में हुअ था। ऄव्यस्कता के कारण प्रबन्ध ऄंग्रेज सरकार के पास रहा। आसे 13
115

लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

116

लाल प्रद्युमन लसह रइस-खैरागढ़ राज्य र्ृतांत और नाग र्ंशार्ली

117

Chhattisgarh fudatery state Gazetteer

118

The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893 , p.244; में लाल ईमरार् लसह

का देहांत November 1890 और धानू लाल श्रीर्ास्तर् की ऄष्ट राज्य ऄम्भोज,पृ.65 ईमरार् का देहांत 1890 बताया गया है,
परं तु http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/khairagarh.html में यह ददनांक 19 फरर्री’1891 ददया गया है।
119

The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893, p.244 और

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/khairagarh.html
120

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.65

121

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.65में आन्हें महापुरूष णलखते हैं।

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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ददसम्बर’1912 को राज्य करने और 1915 में शासन करने का ऄणधकार ददया गया। आनकी बहन भुर्नेश्वरी
कु मारी सनुि प्रााँत में मांडा शासक रामगोपाल लसह से 1918 में ब्याही गईं। आस णर्र्ाह में णर्घ्न भी डाले
गए। ईन्हें छोटा नागपुर के गढ़ पालकोट के लाल नर्ल दकशोर शाह से सहायता णमली। सम्भर्तः आनकी
एक ऄन्य बहन ईनकी पत्नी के भाइ खड़ग जंग बहादुर राणा से नेपाल ब्याही गईं।122 र्े 30 र्षव की ऄल्प
अयु में 22 ऄक्टूबर’1918 को चल बसे।
लाल बहादुर लसह का ऄल्पव्यस्क ज्येष्ठ पुत्र र्ीरे न्द्र बहादुर लसह ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। आनका
जन्म 9 नर्म्बर’1914 को हुअ था। ऄतः पुनः राज्य प्रबन्ध ऄंग्रेज शासन के हाथ रहा। र्ीरे न्द्र की णशक्षा
राजकु मार कालेज, रायपुर; इरलर्ग दक्रणियन कालेज आलाहाबाद और मेयो कालेज, ऄजमेर में हुइ।
र्ीरे न्द्र बहादुर लसह का णर्र्ाह सन्युि प्रााँत के प्रतापगढ़ के शासक प्रताप बहादुर लसह की पुत्री
पद्मार्णत से हुअ। पद्मार्णत का जन्म 17 जुलाइ’1918 को हुअ था। ईन्होंने 1956 में कला और संगीत
णर्श्वणर्द्यालय स्थाणपत दकया।
खैरागढ़, आंददरा संगीत और कला णर्श्वणर्द्यालय के कारण ही प्रणसि हैं । कमल णर्लास पैलेस में
आंददरा संगीत णर्श्वणर्द्यालय की स्थापना हुइ थी। संस्कृ णत के प्रणत ईनका लगार् आतना गहरा था दक र्े एक
ऐसे णर्श्वणर्द्यालय की स्थापना कर गईं, जो पूरे णर्श्व में संगीत एर्ं लणलत कलाओं का ऄग्रणी णर्श्व
णर्द्यालय माना बना।123

णचत्र 18 - णर्श्वणर्द्यालय
स्रोत- http://www.helloraipur.com/headerimg/.68jpg

1922 में र्ार्षषक अय

णचत्र 19 - णर्श्वणर्द्यालय मोनो
और

bibschoolsurvey.com

676,950/- थी।

ईमरार् लसह, जो नााँदगााँर् में थे, यहााँ भी एक्स्रा ऄणसस्टेंट कमीश्नर रहे।
प्रणसि साणहत्य सेर्ी बख्शी कायस्थ लोग यहीं सेर्ा में रहे। ईमरार् बख्शी कणर् थे। ईनके पुत्र
पुन्नालाल के मझले पुत्र पद्मलाल प्रणसि साणहणत्यक पणत्रका सरस्र्णत के सम्पादक हुए और पद्मलाल
पुन्नालाल बख्शी के नाम से ख्यात हुए।
122

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/khairagarh.html

123

http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/chgr0010.htm

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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1896, 1897-98, 1899, 1907, 1918 और 1920 में ऄकाल रहा। 1818 के आंफ्लुएज
ं ा का
सर्ावणधक प्रकोप आस ररयासत में हुअ और कइ लोग काल कणल्र्त हुए।
आस ररयासत के ड़ोंगरगढ़ में बमलाइ देर्ी का मणन्दर है। आसे ईज्जैन के णर्क्रमाददत्य के समकालीन
राजा काम सेन द्वारा बनर्ाया गया था। ईसने नतवकी प्रेयसी कामकन्दला के नाम से तालाब भी बनर्ाया।
बोमलइ पहाड़ी पर एक बड़ा पत्थर है, आसके णर्षय में यह कहा जाता है दक, एक बार 147 नतवदकयााँ (सात
अगर सात कोरी मोणतयाररन) नााँदगााँर् ररयासत में कला प्रदशवन हेतु अईं। रानी को भय हुअ दक
राजकु मार ईन पर मोणहत न हों जाएाँ। ईन्होंनें हणल्द णमणश्रत जल ईसे दे नतवदकयों पर णछड़कने को कहा।
ईसने यह जल णछड़का, पर र्ह एक नतवकी पर ही णछड़क पाया। र्ह पत्थर की हो गइ। यही र्ह पत्थर
है।124
मोणतयार्ीर तालाब पर फारसी लेख के साथ स्तम्भ णमला था। आसे नागपुर ले जाया गया। ऄब
सम्भर्तः यह ईपलब्ध नहीं है। दूसरा प्रस्तर स्तम्भ बोमलाइ पहाड़ी पर णमला था। अठर्ें जैन तीथांकर
चन्द्रप्रभु की मूर्षत भी णमली थी। स्पष्ट है दक, डोंगरगढ़ प्राचीन स्थल रहा है।
आस ररयासत से ऄत्यणधक लकड़ी भी काटी गइ। आस ररयासत की काष्ठ प्रणसि था।

छु इखदान
छु इखदान ररयासत को ऄंग्रेज शासन ने प्रथम श्रेणी में रखा था। यह ररयासत 210 30/ से 210 38/
ईत्तरी ऄक्षााँश और 800 53/ से 810 11/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी।125 आसका क्षेत्रफल 154 र्गव मील
और जनसंख्या 31,151 थी, जो अगे चलकर 26,140 रह गइ थी।126 1941 में जनसंख्या 32,731 थी।127
आस ररयासत में 107 ग्राम थे।128
यह ररयासत भी छोटे-छोटे चार भागों में बाँटी थी- छु इखदान, बोरतरा, णबदौरा और णसमइ।129
पहले आस क्षेत्र को कोंडका आलाका कहा जाता था।130
छु इखदान ररयासत के ईत्तर में लोहरा और णसल्हेटा जमीन्दारी तथा खैरागढ़ ररयासत, पणिम में
णसल्हेटी और ठाकु रटोला जमीन्दारी एर्ं खैरागढ़ तथा नााँदगााँर् ररयासत, दणक्षण में परपोड़ी जमीन्दारी और
खैरागढ़ ररयासत तथा पूर्व में नााँदगााँर् ररयासत थी। समाइ नामक ग्राम इशान ददशा में नााँदगााँर् ररयासत
के क्षेत्र में था।131

124

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.76

125

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.78

126

र्ही

127

Columbia-Lippincott Gazeteer (New York: Columbia University Press, 1952) p. 389

128http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9B%E0%A5%81%E0%A4%88%E0%A4%96%E0%A4%A6%

E0%A4%BE%E0%A4%A8
129

Chhattisgarh fudatery state Gazetteer

130

छत्तीसगढ़ ददगदशवन

131

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.78

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दीर्ार अदद की पुताइ में ईपयोगी श्वेत छु इ ऄथावत छू ही णमट्टी और ईसकी खदानों की सहज
ईपलब्धता और बाहुल्यता के कारण छु इखदान नाम प्रचणलत हुअ।132
छु इखदान ररयासत का भी प्राचीन आणतहास ईपलब्ध नहीं है। हालााँदक यह ररयासत ऄठारहर्ीं
शताब्दी के मध्य से ही ऄणस्तत्र् में अनी प्रारम्भ हुइ। यह एक छोटी ररयासत थी।
छु इखदान ररयासत के ऄंणतम शासक र्ंश का संस्थापक एक र्ैष्णर् बैरागी महंत रूप दास को माना
जाता है।133 बैराणगयों पर सणक्षप्त चचाव कर्धाव ररयासत के णर्र्रण में की गइ है। यह णचतौड़ के राजपूत
महाराणा के ररश्तेदार थे और आनका नाम रूप लसह था। र्े पाररर्ाररक र्ैमनस्यों के कारण, पानीपत में
दीक्षा लेकर, र्ैष्णर् बैरागी हो गए थे। ईन्होंने ऄपने भतीजों- िह्म लसह और तुलसी लसह- को भी िह्म दास
और तुलसी दास के नाम से दीक्षा ददलर्ाइ और साथ रखा। र्े ऄठारहर्ीं शताब्दी में नागपुर अ गए और
भोंसलों के एक सरदार हो गए। आसी समय कोकड़ा जमीन्दारी, जो छु इखदान क्षेत्र का पुराना नाम था, ने
णर्द्रोह कर ददया। नागपुर शासक द्वारा रूप दास को आसका दमन करने हेतु भेजा गया। दोनों में युि हुअ।
कोकड़ा का जमीन्दार मारा गया। नागपुर राजा आस कायव से प्रसन्न हुअ और 1750 में रूप दास को कोकड़ा
की ज़ागीर दे दी।134
रूप दास के स्र्गवर्ास के ईपरााँत ईनका भतीजा महंत िह्म दास ज़ागीर का कायव देखने लगा।
परपोड़ी के जमीन्दार दुजवन साय और ईसके भाइ डोमन साय ने, शत्रुतार्श, िह्म दास को मार डाला।
िह्म दास के भाइ तुलसी दास ने ऄपने भाइ के ईि दोनो हत्यारों को मार डाला। छु इखदान के
णबड़ोरा परगने के खजरी ग्राम में दुजवन की समाणध है। बोरतरा ग्राम में एक चबूतरा है णजसे डोमन चौरा
कहते हैं। कहा जाता है दक, आन्हीं समाणधयों में दोनो भाइयों के णसर गाड़े गए थे। 1780 में महंत तुलसी
दास को, नागपुर के शासक रघुजी रार् णद्वतीय द्वारा, कोकड़ा जमीन्दारी की सनद दे र्हााँ का जमीन्दार
बना ददया गया। ईि दो पूर्ावणधकारी तो ऄणर्र्ाणहत रहे थे, पर तुलसी दास ने यह व्रत्त भंग कर णर्र्ाह
दकया।
महंत तुलसी दास का पुत्र बाल मुकुन्द दास ईनका ईत्तराणधकारी हुअ। आनके चार पुत्र हुए।
महंत बाल मुकुन्द दास का ज्येष्ठ पुत्र महंत लक्ष्मण दास, 1845 में, ऄगला ईत्तराणधकारी हुअ।
लक्ष्मण का जन्म 1810 में हुअ था। ऄंग्रेज शासन द्वारा ईन्हें 1865 में गोद लेने और 1867 में फ्युडटे री
चीफ का ऄणधकार ददया गया। र्ह ऄच्छे कणर् थे। आन्होंने कइ ग्रंथ णलखे, णजसमें कृ ष्ण लीला का र्णवन था।
आसने 42 र्षव शासन दकया और 1887 में परलोकर्ासी हुए।135
1887 में लक्ष्मण दास का एकमात्र पुत्र महंत श्याम दकशोर दास ईनका ईत्तराणधकारी हुअ। ईसके
दो णर्र्ाह हुए। प्रथम से महंत राधा र्ल्लभ दकशोर दास और णद्वतीय से राधा र्ृजेन्द्र दास अदद तीन पुत्र
थे। ईसने 9 र्षव शासन दकया और 1896 में परलोक णसधारा।136
महंत श्याम दकशोर दास की मृत्यु ईपरााँत भाइयों में सत्ता संघषव हो गया। ऄंत में राधा र्ल्लभ
दकशोर दास ईत्तराणधकारी हुए। आनके चार पुत्र- ददणग्र्जय युगल दकशोर दास, लालमीन के तन दास, लाल
132

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.78; छत्तीसगढ़ ददग्दशवन और

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9B%E0%A5%81%E0%A4%88%E0%A4%96%E0%A4%A6%E0
%A4%BE%E0%A4%A8
133

छु इखदान के आस ऄंणतम शासक र्ंश का सणन्क्षप्त आणतहास यहााँ के पूर्व दीर्ान भागीरथ के नोट के अधार पर ईनके पौत्र धानू

लाल श्रीर्ास्तर् ने ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज में णलखा और ऄभी तक र्ह ही प्रयुि हो रहा है।
134

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.78-79

135

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.79

136

र्ही

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भूधर दकशोर दास और लाल णर्कम दास- थे। दो र्षव ईपरााँत ईन्हे और लालमीन के तन दास को णर्ष देकर
मार डाला गया। हत्यारों को न्यायालय द्वारा दण्ड भी णमला।137
राधा र्ल्लभ दकशोर दास का ईत्तराणधकारी ईनका ज्येष्ठ पुत्र ददणग्र्जय जुगल दकशोर दास हुअ।
आसका जन्म 1885 में हुअ था। र्ह 1903 में 18 र्षव की अयु में ही स्र्गव णसधार गया।138
ददणग्र्जय युगल दकशोर दास का ईत्तराणधकारी ईसका भाइ भूधर दकशोर दास हुअ। आसका जन्म
ऄप्रैल’1891 में हुअ था। आसने 1899 से 1910 तक राजकु मार कालेज, रायपुर में णशक्षा ली। 1910 में में
ही आसका णर्र्ाह हुअ। ऄंग्रज
े शासन द्वारा, 1915 में, आसे राज्य करने का ऄणधकार ददया।139
आस ररयासत के शासक महंत पदर्ी का ईपयोग करते थे। यहााँ की र्र्षषक अमदनी लगभग एक
लाख रूपया थी। यहााँ से पान का ईत्पादन होता था। यहााँ त्रैपन (1897) और छप्पन (1900) के अकालों
का ईल्लेख णमलता है। 1918 और 1920 में ऄकाल पड़े। आंफ्लुएज
ं ा में भी तीन हजार लोग काल कणल्र्त
हुए।
आस ररयसत पर राजनााँदगााँर् और खैरागढ़ के पूर्व प्रभार् के कारण र्ैसा ही बन्दोबस्त रहा।
छु इखदान का पूर्व मुख्यालय कोकड़ा था। यहााँ गढ़ी के ऄर्शेष हैं। गभरा के असपास लौह ऄयस्क
पाया जाता था। गढ़बंजा में, पहले, गोंड़ जमीन्दारी थी। पहले यह बंजा ही कहलाता था, दफर गढ़ी के
कारण गढ़बंजा हुअ। यहााँ पाषाण काल के ऄर्शेष और समाणधया होने के संकेत थे। बोरतरा में परपोड़ी
जमीन्दार के मारे गए भाइ डोमन शाह का चबुतरा- डोमन चौरा है। यहााँ के तालाब में और ईसके पास
मूर्षतयों के भग्नार्शेष णमलते रहे।
समाइ छोटी नामक ग्राम को राजनााँदगााँर् के शासक ने परपोड़ी को सुअ नाच के णलए दे ददया था। बाद में
यह छु इखदान के पास अ गया। यह कहा जाता है दक, यहााँ का तालाब और मणन्दर दकसी मोहन लसह ने
बनर्ाया था। यहााँ णशल्प मूर्षतयााँ भी स्थाणपत हैं। एक णसगनगढ़ नामक ग्राम भी है। हो सकता है दक, यह
कल्चुररयों के समय ईल्लेणखत लसगनपुर हो। यहााँ गढ़ी के णचन्ह भी हैं।140
सम्बलपुर गढ़जात
आसके तहत तीन ररयासतें थी, णजनका र्णवन णनम्ााँदकत है।:रायगढ़
रायगढ़ ररयासत को ऄंग्रेज शासन ने प्रथम श्रेणी में रखा था। यह ररयासत 210 42/ से 220 33/
ईत्तरी ऄक्षााँश और 820 57/ से 830 52/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी। आसका क्षेत्रफल 1,486 र्गवमील
था। जनसंख्या 218,860 थी, जो 241,619 हो गइ थी। ररयासत की लम्बाइ 56 मील और चौड़ाइ 38
मील थी।

137

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.79

138

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.79-80

139

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.80

140

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.86 से 89

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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रायगढ़ ररयासत के दणक्षण में महानदी और ईसके पार सारं गढ़ ररयासत; ईत्तर में ईदयपुर, जशपुर
और गांगपुर ररयासतें; पूर्व में गांगपुर ररयासत और पणिम में णबलासपुर णजला था।141
राय का ऄथव सर्ोच्च या प्रधान या बड़ा होता है। आसे राजा से भी जोड़ा जा सकता है। ऄतः रायगढ़
का सामान्य ऄथव राजा का गढ़ हो सकता है। राय एक जंगली र्ृक्ष भी होता है। णजन जामुन के र्ृक्षों में बड़े
फल होते हैं ईन्हें छत्तीसगढ़ में राय जाम कहा जाता है और छोटे फल र्ाले र्ृक्ष को णचरइ जाम। ऄतः राय
को आससे भी जोड़ा जाता है। अज भी खरणसया-रायगढ़ को रायजाम हेतु जाना जाता है। राय नाम को आन
र्ृक्षों से जोड़ा जाता है।142 हो सकता है दक, बड़ा गढ़ बताने हेतु राय शब्द का ईपयोग दकया गया हो।
ऄन्य ररयासतों की तरह रायगढ़ ररयासत का भी प्रारणम्भक और पूर्व आणतहास ज्ञात नहीं है।
रायगढ़ ररयासत क्षेत्र में ही गुफा मानर् के कन्दरा णचत्र सर्ावणधक पाए गए हैं, णर्श्व का एक
प्राचीनतम शैलाश्रय लसघनपुर और काबरा की पहाणड़यों मे णस्थत हैं। यहां प्रागैणतहाणसक मानर्, णशकार,
पशु-पक्षी अदद के णचत्र गहरे लाल रं ग मे है।
ररयासत में पूर्व पाषाण युग के हस्त णनर्षमत औजार या ईपकरण महानदी घाटी से प्राप्त हुए हैं।
ईत्तर पाषाण काल के औजार भी महानदी घाटी में णमले हैं। यह भी लसघनपुर से प्राप्त हुए हैं। यह
णबलासपुर के धनपुर से भी णमले हैं।
रायगढ़ णजले के लसघनपुर और काबरा पहाड़ में हस्तणशल्प के कन्दरा शैल णचत्र णमलते हैं। काबरा
पहाड़ के शैल णचत्रों में लाल रं ग का प्रयोग है। णछपकली, घणड़याल, सांभर, मानर् समूह अदद णचणत्रत हैं।
छत्तीसगढ में कन्दरा णचत्रों को सर्वप्रथम बंगाल-नागपुर रे ल्र्े के एक आंजीणनयर की.डब्ल्यु.एंड़रसन
और ईनके सहायक सी.जे.र्ेलल्लगटन ने 1910 के असपास पुनः खोजा। ईन्होंने लसघनपुर का ईल्लेख 1918
में दकया।
कन्दरा णचत्र सर्ावणधक रायगढ़ ररयासत में ही हैं। आसके ऄणतररि सरगुजा, कोररया, ईत्तर बस्तर
और बस्तर णजलों में यह णमले हैं। यह Palaeolithic से Historical काल के हैं।
रायगढ़ ररयासत में णस्थत कन्दरा शैल और णभत्ती णचत्रों की सुची णनम्ााँदकत है।:सारणी 4 और णचत्र 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 एर्ं 29 - रायगढ़ ररयासत के गुफा णचत्र स्थल और ईनके हस्त
णनर्षमत णचत्र
स्रोत-छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)
क्र.

स्थान

ररयासत

अकृ णतयााँ और णचत्र (णचत्र क्र. 20 से 29)
Ladder men, Mermaid, Animal

1

लसघनपुर

रायगढ़

figures, Hunting scenes,
Kangaroo, Giraffe?
णच.20

141

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.115-116

142

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.115

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57

Tortoise, Bison, Male
2

काबरा पहाड़

Figures, Geometric patterns.

रायगढ़

णच.21

300 से ऄणधक णचत्र।Elephant,
3

बसनाझर

Geometric patterns Animal

रायगढ़

Hunting scenes . णच.22

Man with head gear
4

ओंगना (बानी पहाड़)

रायगढ़(धमवजयगढ़

Geometrical drawings.100 से

तह.)

ऄणधक णचत्र। णच.23

कु ल 325 णचत्र।Geometric
patterns, Paintings in
5

करमगढ़

रायगढ़

multicolours.
णच.24

6

खैरपुर

रायगढ़

Dancing scenes, Animal figures. Historical period.
Animal patterns, Human Fighting
scenes. Generally of Historical

7

चापामाड़ा

रायगढ़

period. णच.25

Animals, Hunting scenes,
8

बोतल्दह

रायगढ़

Mermaid.Ranging from
Mesolithic to Historical
period. णच.26

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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58

9

भंर्रखोल(शरं गखला
पहाड़)

रायगढ़
Bison, Mermaid, Bear, Hunting scenes, Geometric pattern,
Swastik. णच.27

10

ऄमरगुफा और
चेरीगोड़री

रायगढ़

Animal patterns, Hunting scenes, Human figures.

11

सूतीघाट

रायगढ़

Agriculture and Animals figures

12

टीपाखोल

रायगढ़

Geometric Design

13

नर्ागड़ी

रायगढ़

14

बैनीपाट

रायगढ़

Religious symbols like Sun, Moon, Animal figures, Human
figures, Hunting scenes
Geometric patterns
Human figures, Hunting scenes, Palm impressions. This
Rock Shelter site, geographically located in 83003’, 04.4’’
East and 21038’, 09.6’’ North, is carved in sand stone rock

15

णसरोली ड़ोंगरी

रायगढ़

belonging to
Chandrapur groups of
Chhattisgarh
Supergroup (Pande2006). णच.28
मानर् और पशु अकृ णतयााँ।
णच.29

16

पोरटया

रायगढ़

17

गीधा

रायगढ़

Rock Painting Engraving

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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बोतल्दा में गुप्तकालीन सूयव मंददर है।143
ऄन्य ररयासतों की तरह रायगढ़ के ऄंणतम शासक र्ंश का ही आणतहास ही ज्ञात है। यह कहा जाता
है दक, आस र्ंश की ईत्पणत्त चााँदा के प्राचीन गोंड़ राजर्ंश से है। चााँदा भी गढ़ामण्डला की तरह प्राचीन गोंड़
राज्य रहा है।
रायगढ़ का र्ंश बैरागढ़ के मदन लसह से ऄपनी ईत्पणत्त मानता है। बैरागढ़ चााँदा का एक ग्राम था
और है। मदन लसह ऄपने मामा के साथ फु लझर अया। दफर र्े बुनगा गए। बुनगा रायगढ़ ररयासत का ही
ग्राम था। दकसी कारण र्श, बुनगा (बुलगा) से, र्े रायगढ़ अए। यह 1625 के पूर्व का काल माना जाता
है।144 र्ह यहााँ का शासक कै से हुअ, यह ज्ञात नहीं है।145 तब से ईन्होंने और ईनके र्ंशजों ने आस गााँर् में
पााँर् नहीं रखा। यह माना गया दक, आससे र्हााँ स्थाणपत कु ल देर्ी ऄप्रसन्न हो जाएाँगी।146
मदन लसह के ईपरााँत तखत लसह, ईसके ईपरााँत र्ेट लसह और तदुपरांत दृप लसह शासक हुए।147
दकसी-दकसी स्रोत में दयावओ लसह का भी ईल्लेख है, णजसे सम्बलपुर के राजा द्वारा 1625 के असपास,
रायगढ़ का राजा, बनाया गया।148
दृप लसह के ईपरााँत ईसके ज्येष्ठ पुत्र जुझार लसह का ईल्लेख है। ईसने 1800 में इस्ट आणण्डया
कम्पनी से सणन्ध की थी। ईसे सम्बलपुर रानी द्वारा पदमपुर परगना णमला था। आस संणध द्वारा ईसे छोड़ना
पड़ा।
जुझार के काल में कइ िाहम्ण अए । सन्युि प्रााँत से पााँडे और बेहार लोग अए। बेहार लोग मथुरा
से अए। दकसी एक बेहार की बुणिमानी से मराठे र्ापस चले गए और आस कारण से ईसे कइ ग्राम माफी में
ददए गए। आसमें से तीन ग्राम ऄंत तक बने रहे। ईणड़या िाहम्ण पन्ड़ा लोग पुरी से गढ़ौऄमररया होते हुए
अए।
जुझार लसह का ज्येष्ठ पुत्र देर् नाथ लसह ऄगला ईत्तराणधकारी हुअ। 1833 में बरगढ़ के शासक
ऄजीत लसह नें ऄंग्रेज इस्ट आणण्डया कम्पनी के शासन के प्रणत णर्द्रोह दकया। देर् नाथ लसह ने ईसे, ऄंग्रेजों के
णलए पराणजत दकया। ऄतः ऄंग्रेजों ने ईसे बरगढ़ की जमीन्दारी भी, 1833 में, दे दी। देर्नाथ लसह ने 1857
की क्रााँणत के समय भी ऄंग्रेजों की सहायता की। ईसने क्रााँणतकारी और णर्द्रोही सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय और
ईदयपुर के णशर्राज लसह149 को साणथयों सणहत पकड़ कर ऄंग्रेजों के हर्ाले कर ददया।
होणशयारपुर, पंजाब से अकर एक णसक्ख- र्ीर लसह- ररयासत में बसे थे। ईसके र्ंशजों ने बरगढ़
को हराने में सहायता की। आसीका एक र्ंशज शमशेर लसह हुअ। र्ह नेटनागढ़ ग्राम का माफीदार और ऄन्य
दो ग्रामों का मालगुज़ार था।150 आस तरह पंजाबी छत्तीसगढ़ के ऄणधकारी र्गव में भी अ गए। पंजाबी भाषी
लोग राजनााँदगााँर् ररयासत के स्र्ामी तो हो ही चुके थे और सणि के भी स्र्ामी रहे थे । पर रायगढ़ में यह
पंजाबी भाषी लोग णसक्ख थे। देर्नाथ लसह 1862 में स्र्गवर्ासी हुए।
143

http://anusandhanhira.blogspot.com/2008/09/blog-post_26.html

144

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raigarh.html

145

छत्तीसगढ़ ददगदशवन

146

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117

147

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117

148

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raigarh.html

149

ईदयपुर छत्तीसगढ़ की ररयासत थी। बाद में यह धमवजयगढ़-पत्थलगााँर् का क्षेत्र कहलाया। 1857 क्रांणत से सम्बध, आस

णशर्राज लसह के र्ारे में ऄभी णलखा नहीं गया है और छत्तीसगढ़ के 1857 के आणतहास में ईन्हें ऄणधक ईल्लेणखत नहीं दकया जाता
है।(देखें मेरा लेख- छत्तीसगढ़ में 1857 का णर्द्रोह
150

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.118-119

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णचत्र 30 - रायगढ़ ररयासत का ध्र्ज

स्रोत- http://www.crwflags.com/FOTW/FLAGS/in-raiga.html

देर्नाथ लसह के ईपरााँत ईसका ज्येष्ठ पुत्र घनश्याम लसह 1862-63 में लसहांसनारूढ़ हुअ। आसे
ऄंग्रेज सरकार द्वारा 1865 में दत्तक पुत्र लेने और 1867 में फ्युडटे री चीफ होने की सनद दी गइ। देर् नाथ
का देहांत 1890 में हुअ।
देर् नाथ लसह का ज्येष्ठ पुत्र भूप देर् लसह ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। आसके दो और भाइ थेनारयण लसह और गजराज लसह। दो ऄलग-ऄलग स्रोतों में देर् नाथ का जन्म 1867 और 1869 बताया
गया है, णजसमें 1869 ऄणधक सही जान पड़ता है।151 र्ह 7 जून’1890 को सत्ता में अया।152 परं तु आसे,
ऄंग्रेज सरकार द्वारा, 1895 में राज्य करने का ऄणधकार और राजा-बहादुर की व्यणिगत ईपाणध दी गइ।153
कृ पाराम णमश्र आनके दीर्ान थे, णजन्हे रायबहादुर की ईपाणध थी। आसके पूर्वज रीर्ा से सारं गढ़ अए
थे।
भूप देर् का णनधन 22 माचव’1917 को हुअ।154
देर् नाथ लसह का ज्येष्ठ पुत्र लाल नटर्र लसह ऄगला ईत्तराणधकारी हुअ। आसके भाइ लाल चक्रधर
लसह और लाल बल भद्र लसह थे। आसे ईत्तराणधकार पर पणलरटकल एजेंट द्वारा एक तलर्ार और खरीता
ददया गया। शासन योग्य नहीं होने के कारण, ईसे राज्य करने का ऄणधकार कभी भी नहीं ददया गया। र्ह
32 र्षव की अयु में 5 फरर्री’1924 को णनःसंतान स्र्गव णसधारा।155
नटर्र की णनःसंतान मृत्यु के कारण, ऄंग्रेज सरकार द्वारा, ईसके भाइ लाल चक्रधर लसह को
ईत्तराणधकार ददया। ईसे बंशानुगत राजा की ईपाणध दी गइ। ईसका जन्म 19 ऄगस्त’1905 को हुअ था

151

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117 में 1869 और http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raigarh.html

में 1867 ददया है। आसमें श्रीर्ास्तर् का ईल्लेख (1869) ऄणधक समीचीन जान पड़ता है।
152

"The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893 p. 433 और

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raigarh.html
153

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117

154

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117

155

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.117-118

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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और ईसे सत्ता 23 ऄगस्त’1924 को णमली।156 राजकु मार कालेज, रायपुर में ऄध्ययन काल में शासन ऄंग्रेज
सरकार के पास रहा। एक्स्रा ऄणसस्टेंट कमीश्नर157 गौरी शंकर ऄणग्नहोत्री एडणमणनस्रेटर थे। चक्रधर लसह के
अजा जगमोहन लसह एक जमीन्दार भी थे तथा आसके दीर्ान भी रहे। चक्रधर का णर्र्ाह सारं गढ़ के शासक
जर्ाहर लसह की पुत्री बसंतमाला से हुअ। आनके दो पुत्र और सात पुणत्रयााँ हुईं।158
चक्रधर शास्त्रीय नृत्य कथक में पारं गत थे। ईन्होंने आस पर पुस्तकें भी णलखीं। यथा- मूरत परन
पुष्पाकर ताल-तोयणनणध, राग-रत्न मंजष
ू ा, नतवन-स्र्गवस्र्म् अदद।159 ईनके र्ंशजों द्वारा आन पुस्तकों को
प्रकाणशत नहीं कराया गया है। आस काल में रायगढ़ पूरे भारत में संगीत, नृत्य और गायन के के न्द्र के रूप में
णर्कणसत हुअ। कथक नृत्य शैली में रायगढ़ घराना ऄणस्तत्र् में अया। छत्तीसगढ़ शासन प्रणत र्षव गणेश
ईत्सर् पर, रायगढ़ में, गायन, संगीत और नृत्य का चक्रधर समारोह अणयणजत करती है और ईनके नाम पर
सम्मान भी प्रदान करती है।160
आसी काल में पट्टानन्दी का णर्रोध हुअ। मुकुन्द राम ऄघररया, हरर पंड़ा अदद को देश णनकाला
ददया गया।
19 णसतम्बर’1947 को चक्रधर द्वारा ही ररयासत णर्णलनीकरण पत्र णस्र्कार दकया गया।161
चक्रधर का णनधन 7 ऄक्टूबर’1947 को रायगढ़ में हुअ।
रायगढ़ ररयासत में नौ जमीन्दार थे। सभी पर गोंड़ लोग थे। एक तो दीर्ान भी रहे, णजनका
ईल्लेख उपर के पैरा में अया है। गुदाव में कं र्र जमीन्दार थे।
रायगढ़ ररयासत की औसत अय
432,514 थी। ररयासत टसर कोसा रे शम हेतु प्रणसि थी।
यहााँ का चार्ल व्यर्साय भी णचणन्हत हुअ। पड़ीगााँर् में कोठी खोली गइ। 1891 में रायगढ़ ररयासत में रेल
अइ, आससे, यह व्यापर के न्द्र के रूप में बढ़ा। सारं गढ़ का सन यहााँ से णबकने लगा।162
रायगढ़ ररयासत में 1868 में करठन ऄकाल पड़ा। 1896 और 1900 के ऄकाल ईतने घातक नहीं
रहे। 1919 और 1920 के ऄकाल में रायगढ़ ररयासत के व्यापाररयों ने ऄन्य स्थानों को ऄन्न बेच लाभ
कमाया। आंफ्लुएज
ं ा से भी तीन हजार के लगभग लोग काल कणल्र्त हुए।
सारं गढ़
सारं गढ़ ररयासत को ऄंग्रेज शासन द्वारा प्रथम श्रेणी में श्रेणीबि दकया गया था। यह ररयासत 210
21/ से 210 45/ ईत्तरी ऄक्षााँश और 320 56/ से 330 56/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी। आसका क्षेत्रफल
540 र्गवमील था।
सारं गढ़ ररयासत के ईत्तर में महानदी और चन्द्रपुर जमीन्दारी; दणक्षण में फु लझर जमीन्दारी; पूर्व में
सम्बलपुर णजला और पणिम में भटगााँर् और णबलाइगढ़ जमीन्दाररयााँ थीं।163 आसमें 455 ग्राम थे।164

156

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157

र्तवमान राज्य प्रशासणनक सेर्ा के णडप्टी कलेक़्टर पद का पूर्व नाम।

158

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/r/raigarh.html

159

http://www.cgculture.in/hindi/Samman/rajachakradharsingh.htm

160

http://www.cgculture.in/hindi/Samman/rajachakradharsingh.htm

161

छत्तीसगढ़ ददगदशवन

162

आस सन को जान णमलर कम्पनी खरीदती थी।- धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.120

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सारं ग का ऄथव बााँस और बााँस र्न से लगाया जाता है। फु लझर ररयासत के एक हस्तणलणखत
आणतहास में सारं गढ़ को सारंगपुर कहा गया है।165
छत्तीसगढ़ प्रााँत की ऄन्य ररयासतों की तरह सारं गढ़ का भी प्राचीन आणतहास ऄज्ञात है। गुप्त शासन
का एक मणन्दर और पुजारीपाली का नाग ऄणभलेख ही कु छ आणतहास आंणगत करते हैं।
मात्र ऄंणतम शासक र्ंश का ही कु छ आणतहास ईपलब्ध है। ऄंणतम शासक र्ंश गोंड़ (राजगोंड़) था।
यह कहा गया दक, यह लोग भण्डारा के लााँजी से अए थे, परं तु आससे ऄन्य तथ्य यह सामने लाया गया दक,
जब भोंसले राजा कटक जा रहे थे, तब फु लझर के लोगों द्वारा णसहोरा घाटी में ईन पर अक्रमण दकया गया।
आन अक्रमणकाररयों को परास्त करने में सारं गढ़ के स्थाणनय शासक ने सहायता की। भोंसले शासक
(सम्भर्तः रघुजी) ने सारं गढ़ को ऄपने रतनपुर क्षेत्र के ऄधीन एक भाग बना णलया। बाद में आसे सम्बलपुर
के ऄठारह गढ़ जात में से, एक गढ़ जात बना, सम्मणलत कर ददया गया (सम्भर्तः कल्याण साय के
समय)।166 ऄब यह सम्बलपुर द्वारा शाणसत होने लगा। कल्याण साय को, मराठों ने, राजा की ईपाणध दी
थी।
कल्याण के पूर्व नरे न्द्र साय, धारह मीर, बबवर साय, धंग जी, ईदय भान, र्ीर भान और उधो साय
(....-1736) शासक हुए। कल्याण साय का काल 1736-1777 का था।
कल्याण साय के ईपरााँत ईसका पुत्र णर्श्व नाथ साय (1778-1808) शासक हुअ। र्ह शूरता,
दयालुता और प्रशंसनीय कायों से ख्यात हुअ।
1778 में बंगाल के ऄंग्रेज गर्नवर जनरल द्वारा एलेक्ज़ेंडर आणलयट को कोलकाता से नागपुर रर्ाना
दकया गया। र्ह रास्ते में ज्र्रग्रस्त हो गया और छत्तीसगढ़ सीमा में, 23 र्षव की ईम्र में, 12 णसतम्बर’1778
को परलोक णसधार गया। ईसे दफनाने की भूणम देने को कोइ तैयार नहीं हुअ। तब णर्श्वनाथ साय ने ही आस
हेतु भूणम दी। ईसे सरं गढ़ के सलार ग्राम में समाणधस्थ दकया गया, जहााँ ईसकी मृत्यु हुइ थी। आसकी मरम्मत
अदद की णजम्मेदारी भी ररयासत द्वारा ली गइ। यह समाणध ऄभी भी है। ऄंग्रेज गर्नवर जनरल ने णर्श्व नाथ
को एक हाथी और र्स्त्र दे कर सम्माणनत दकया।
आस समय सम्बलपुर में जयणत लसह का शासन था। ईसे भी णर्श्व नाथ साय ने सैन्य सहायता दी।
जयणत ने प्रसन्न हो कर 84 ग्राम र्ाला सररया परगना ईसे दे ददया।
णर्श्व नाथ साय ने नागपुर के भोंसलें मराठा शासकों को भी कइ ऄर्सरों सहायता पहुाँचाइ। मराठों
ने ईसे एक सुसणज्जत घोड़ा, एक डंका और एक मोटा सोटा प्रदान दकया।
णर्श्व नाथ साय की मृत्यु 1808 में हुइ।
णर्श्व नाथ साय का पुत्र सुभद्र साय (1808-1815) 7 र्षव सत्ता में रहा। तदुपरांत ईसके पुत्र भीषम
साय (1815-1827) और टीकम साय (1827-1828) सत्ता में रहे, पर णनःसंतान मृत्त हुए। ऄतः ईनके
चाचा गज राज लसह (1828-1829/30) को सत्ता णमली।
गज राज लसह का पुत्र संग्राम लसह (1829/30-1872) ने लगभग 42-43 र्षव शासन दकया। आसे
ऄंग्रेज णिरटश शासन द्वारा फ्युडटे री चीफ का ऄणधकार ददया गया। आसकी मृत्यु 1872 में हुइ।

163

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.129

164

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165

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.129

166

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.129, छत्तीसगढ़ ददग्दशवन और

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गज राज लसह की मृत्यु के समय ईसका ज्येष्ठ पुत्र भर्ानी प्रताप लसह (1872-1888/89) 10 र्षव
का था। ऄतः राज्य कायव का संचालन ईसकी मााँ और चचेरे भाइ लाल रघुर्र लसह द्वारा दकया गया, जो
गजराज लसह के कणनष्ठ पुत्र राम लसह का पुत्र था।167
भर्ानी प्रताप लसह की मृत्यु ईपरााँत ईि चचेरे भाइ रघुर्र लसह (1889-1890) को ही सत्ता
168
णमली।

Figure 31 - सारं गढ़ ररयासत का ध्र्ज

स्रोत- http://www.crwflags.com/FOTW/flags/in-saran.html

रघुर्र लसह का ज्येष्ठ पुत्र जर्ाहर लसह (1890-1946) ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। आसका जन्म 3
ददसम्बर’1888 में हुअ था। र्ह ऄक्टूबर 1890 को सत्ता में अया, एक स्रोत में यह ददनांक 5 ऄगस्त 169 है
और दूसरे 170 में 2 ऄक्टूबर। आसकी णशक्षा राजकु मार कालेज, रायपुर में हुइ। आसे राज्याणधकार 3 नर्म्बर’
1909 को, ऄंग्रेजों द्वारा, ददया गया। 1918 में आसे राजाबहादुर की व्यणिगत ईपाणध भी दी गइ। र्ह मध्य
प्रााँत और बरार की व्यर्स्थाणपका सभा के सभासद और नरे श-मण्डल के सदस्य रहे।171 आनकी बहन मान
कुाँ र्री पंडररया जमीन्दार को और पुत्री बसंत माला रायगढ़ के चक्रधर लसह को ब्याही गईं थीं। जर्ाहर लसह
की मृत्यु 11 जनर्री’1946 को हुइ।172
जर्ाहर लसह का पुत्र नरे श चन्द्र लसह ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। ईसका जन्म 21 नर्म्बर’1908
को हुअ था। आसकी णशक्षा राजकु मार कालेज, रायपुर में हुइ। आनके काल में ही ररयासत का णर्लय भारत
राष्ट्र में हुअ। र्ह 1969 में ऄणर्भाणजत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, हालााँदक मात्र 13 ददर्स हेतु। आनका
प्रथम णर्र्ाह फतेहपुर के जमीन्दारी के ददर्ान नारायण लसह की पुत्री तुलसी मंजरी से 15 ऄप्रैल’1935 को
और दूसरा णर्र्ाह 1945 में फु लझर की लणलता से हुअ। र्ह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की एक मात्र

167

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.131

168

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.132 और 130

169

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170

"The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893 p. 480

171

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.132

172

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/sarangarh.html

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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णनर्षर्रोध णनर्ावणचत णर्धायक रहीं। नरे श के एक पुत्र और चार पुणत्रयााँ हुईं। ईनकी मृत्यु 11
णसतम्बर’1987 को हुइ।173
सारं गढ़ ररयासत की अय, 1918 में,
211,569 थी। 1922 में पााँच र्षॉं की अय का औसत
293,822/- था। आस ररयासत में भी टसर कोसा रे शम का कायव होता था। एक अियवजनक तथ्य यह
ईल्लेणखत दकया गया है दक, आस ररयासत में चमव णशल्प कम है, क्योंदक लगभग तीन-चौथाइ ऄथावत लगभग
66% लोग जूते नहीं पहनते हैं।174
1897 (णतरे पन) और 1900 (छप्पन), ऄकाल रहा। 1900 में महामारी भी फै ली। 1905 में ज्र्र
फै लने से लगभग पौने दो हजार लोग काल कणल्र्त हुए। यहााँ की अबो-हर्ा को रोगकारी माना गया।
1918 के आंफ्लुएज
ं ा में लगभग तीन हजार लोग काल कणल्र्त हुए।
सारं गढ़ ररयासत में जन-जाग्रणत और अन्दोलन का प्रभार् नगण्य प्राय था।
गांधी जी के सणर्नय ऄर्ज्ञा अंदोलन के समय, 1930 में, सारं गढ़ ररयासत में भी अंदोलन का
प्रभार् पड़ा। यहााँ जंगल सत्याग्रह हुअ और ईसमें भाग लेने के कारण दणलत धनीराम और कुं र्रमान को
णगरफ़्तार दकया गया। 1931 में गांधी-आरणर्न समझौते के बाद, जब सुखदेर्, भगतलसह और राजगुरु को
ऄसम्बेली में कणथत बम फें कने के कारण फांसी दी गइ तो, आस समाचार के फै लने के ईपरााँत, लुकराम गुप्ता
के नेतृत्र् में कु छ लोगों ने णर्रोध प्रदशवन दकया था। 1930 में नगर सुधार सणमणत और 1937 में नर्-युर्क
सुधार सणमणत भी बनाइ गइ। 1937 में गरठत युर्क संघ ने ईमंग शीषवक से हस्तणलणखत पणत्रका
णनकाली।175
सररया के देर्गााँर् में स्लेटे बनती थीं।
सररया का पुजारीपाली ग्राम के रानी जूला मणन्दर से प्राप्त 11 र्ीं शताब्दी के णशलालेख को रायपुर
ऄणभलेखाग़ार में रखा गया है। आसमें बाराही (बरहा) देर्ी की स्तुणत है। प्रत्येक श्लोक में भि गोपाल का
ईल्लेख है। आसी ने एक मणन्दर बनर्ाया था, णजसमें यह णशलालेख लगर्ाया था। आसमें के दार (णहमालय),
प्रयाग, पुष्कर, पुरूषोत्तम (पुरी), भीमेश्व (ऄपर गोदार्री), नमवदा, गोपालपुर (सम्भर्तः पुजारीपाली के
समीप), र्ाराणसी, प्रभास (आलाहाबाद के समीप प्रभोसा), गंगासागर, श्री र्ैराग्य मठ पेंडार ग्राम (पेंड्रा)
अदद का ईल्लेख है।176 गोपाल देर् का नाम भोरमदेर् (कर्धाव) णशलालेख में भी अता है।177 आस णशलालेख
से मातृ और देर्ी पूजा के भी संकेत णलए गए हैं, क्योंदक आसमें अन्य देणर्यों के साथ सात माताओं की
ईपासना का भी ईल्लेख है।178 र्ह नाग राजा हो सकता है।
पुजारीपाली में ही महाप्रभु मणन्दर और कें र्टीन मणन्दर भी प्राचीन हैं।
पुजारीपाली में लाल ईंटॉं से बना गुप्तकालीन णर्ष्णु मंददर भी है।
173

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/sarangarh.html

174

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.133

175

http://chhattisgarhkaeatihas.blogspot.com/2008/04/blog-post.html

176

A. Sreedhara Menon, K. K. Kusuman- A Panorama of Indian culture: Professor A. Sreedhara

Menon felicitation volume. P.164-65

177

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.138

178

Vibhuti Bhushan Mishra- Religious beliefs and practices of North India during the early mediaeval

period, P.27

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पुजारीपाली का पूर्व नाम शणशनगर था।179
सणि
क्षेत्रफल ऄनुसार सणि छतीसगढ़ की सबसे छोटी ररयासत थी। आस ररयासत को ऄंग्रेज शासन द्वारा
प्रथम श्रेणी में श्रेणीबि दकया गया था। सणि ररयासत 210 55/ से 220 21/ ईत्तरी ऄक्षााँश और 820 45/ से
830 2/ पूर्ी देशांतर के मध्य णस्थत थी। आसका क्षेत्रफल 138 र्गवमील था।
सणि ररयासत के ईत्तर, दणक्षण और पणिम में णबलासपुर णजला और पूर्व में रायगढ़ ररयासत थी।
यहााँ की जनसंख्या 41,595 थी। सणि से बरइ नदी जाती है।180
सणि का ऄथव शणि-बल से है। कहा जाता है दक, ऄंणतम शासक र्ंश के दकसी पूर्वज द्वारा णशकार के
समय यह दृश्य देखा दक, एक णहरण द्वारा एक कु त्ते का पीछ दकया जा रहा है। तब ईसने यहााँ की भूणम को
शणिशाली मान शणि नामाकरण दकया, जो सणि कहलाया।181
छतीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह सणि का प्राचीन आणतहास ऄज्ञात है।
गुंजी ग्राम के डमरू-दहरा कु ण्ड के पास से, इसा पूर्व 200 से भी प्राचीन, पाली प्रस्तर लेख णमला
है। ऄंणतम शासक र्ंश के हरर और गूजर भी पहले यहीं बसे थे। प्रस्तर णशलालेख के प्रथम भाग में इश्वर
स्तुणत और णमती श्री कु मार बसंत नामक राजा के शासन के पााँचर्े र्षव की हेमंत ऊतु के चतुथव पक्ष का
पन्द्रहर्ााँ ददर्स ऄंदकत है। आसमें भगर्ती ईमस णतथी और थेरा गोडच तथा णर्णशठपुत्त नाम भी हैं।
णर्णशठपुत्त नाम ऄजंता के कन्दरा णशलालेख में भी है। दोनों की समानता होने पर 200 इसा पूर्व की पुणष्ट
ही होगी। डा.भंडारकर आसे इसा पूर्व प्रथम शताब्दी का मानते हैं। णशलालेख के णद्वतीय भाग में कु मार बसंत
के शासन के अठर्ें र्षव की ग्रीष्म ऊतु के छठे पक्ष का णद्वतीय ददर्स ऄंदकत है। डमरू-दहरा को बौि
णभक्षुओं के णनर्ास से भी जोड़ा जाता है।
ऄंणतम शासक गोंड़ र्ंश के पूर्व दीर्ान णनमवल लसह के पूर्ज
व पुरूषों का शासन था। यह र्ंश पंजाब
से यहााँ अया था। आस र्ंश को दीर्ान ईपाणध सम्बलपुर राजा द्वारा दी गइ थी। आस तरह राजनााँदगााँर् के
पूर्व सणि में भी पंजाबी शासक रहे।
सणि का ऄंणतम शासक र्ंश भी गोंड़ (राजगोंड़) था। यह कहा गया दक, सम्बलपुर के शासक
कल्याण शाह के दो णसपाही थे- हरर और गूजर। र्े काठ के खांडे (तलर्ार) रखते थे। जब यह भेद खुल गया,
तब राजा द्वारा दशहरे में, खांड़े से ही, बली के भैंसों को मारने का णनदेश ददया गया। दोनों लचणतत हुए, पर
देर्ी ने स्र्प्न में लचता नहीं करने की बात कही। दोनों खांड़े से भैंसे की बली करने में सफल हुए, र्ह भी एक
ही अघात में। राजा ने पुरस्कार मााँगने को कहा। तो ईन्होंने एक ददन में णजतनी भूणम पैदल चली जा सके ,
र्ह देने को कहा। तब दोनों ने दौड़कर ईतना चक्कर लगाया, णजतनी सणि ररयासत थी। र्े ही ऄंणतम शासक
र्ंश के पूर्व पुरूष हुए।
ईस खांड़े (तलर्ार) को सुरणक्षत रखा गया, णजससे बणल र्ध दकया गया था। ईसे दशहरे में पूजा भी
जाता था। यह लोग पहले गुज
ं ी-दमरू-दहरा और जुड़गा में रहे। जुड़गा में कु छ ररश्तेदार बाद में भी रहते
रहे।
हरर से र्ंश अगे चला। गूजर णनःसंतान था।

179

http://anusandhanhira.blogspot.com/2008/09/blog-post_26.html

180

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.107

181

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.107

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हरर और गूजर के ईपरााँत हरर का पुत्र तार माझी और ईसके पिात लाल साय, धन साय, बैज
नाथ साय, दूध साय और गदइ साय शासक हुए।
गदइ णनःसंतान मृत्त हुए। ऄतः ईनका भाइ णशर् लसह शासक हुअ। र्ह भी णनःसंतान मृत्त हुअ।
णशर् लसह की णनःसंतान मृत्यु ईपराण्त ईसकी णर्धर्ा रानी तेज कुाँ र्री द्वारा णशर् लसह के भतीजे
कलन्दर लसह को गोद ले कर ईत्तराणधकारी बनाया गया। कलन्दर के शासन काल में ही सणि ररयासत को,
ऄंग्रेजों द्वारा, फ्युडटे री स्टेट बनाया गया।
कलन्दर लसह का पुत्र रणजीत लसह ऄगला शासक हुअ। ईसका जन्म 20 ऄक्टूबर’1836 को हुअ
था। र्ह 19 जून’1850 को सता में अया और 1875 तक शासक रहा।182 1875 से 1892 तक का शासन
ऄंतररम व्यर्स्था में रहा।183 तदुपरांत रणजीत लसह का ज्येष्ठ पुत्र रूप नारायण लसह, 1892 में, शासक
हुअ। ईसका णनधन 1913 में हुअ।184
नारायण लसह के णनधन के ईपरााँत ईसका भतीजा लीलाधर लसह ईत्तराणधकारी हुअ। ईसका जन्म
3 फरर्री’1892 को हुअ था। र्ह 4 जुलाइ’1914 को लसहासनारूढ़ हुअ। ईसकी णशक्षा राजकु मार कालेज,
रायपुर में हुइ। ईसे 1918 में, ऄंग्रेजों द्वारा, राज्य शासन का ऄणधकार ददया गया। ईसका णर्र्ाह आन्दुमणत
से हुअ।185
आस समय दीर्ान णनमवल लसह भी ख्यात थे, णजनके पूर्वज पंजाब से अए थे और आस र्ंश के पूर्व
सणि के शासक रहे थे। आस तरह स्पष्ट है दक, राजनााँदगााँर् के ऄणतररि सणि में भी पंजाबी शासक रहे।
आसी के काल में सणि ररयासत को भारत में णर्लीन दकया गया।
यहााँ के शासकों की पदर्ी राजा थी।186 र्े ऄपने-अप को राणा भी णलखते थे।187
1918 में ररयासत की अय
81,052/- और पााँच र्षों की औसत अय
84,563 थी।
आस ररयासत में भी आंफ्लुएज
ं ा से तीनक हजार लोग काल के गाल में समा गए थे।
रै न कोल में हणथनी दहरा कु ण्ड़ के णर्षय में यह कहा जाता है दक, आसमें हाथी पानी पीने अते थे।
यह भी कहा जाता है दक, हरर-गुजर ने यहााँ से हाथी पकड़ कर सम्बलपुर राजा की पुत्री के णर्र्ाह ऄर्सर
पर दाहेज में ददया था।
सणि में हरर और गूजर की समाणधयााँ हैं।
सुलौनी ग्राम का गौंरटया कबीर पंथी था। यहााँ कबीरपंथ के लोग अते थे।
उपर नागपुर जमीन्दारी के तहत अने र्ाली छत्तीसगढ़ जमीन्दारी और खलारी जमीन्दारी तथा
सम्बलपुर गढ़ जात की 9 ररयासतों का र्णवन दकया गया है। ईनमें से बस्तर को छोड़ शेष 8 ररयासतों के
मानणचत्र णनम्ांदकत हैं।
सभी ररयासतों का एकीकृ त्त मानणचत्र क्रमांक 1 में अ चुका है।:-

182

"The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893 p. 475

183

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/sakti.html

184

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.109

185

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/sakti.html

186

धानूलाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.109

187

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मानणचत्र 2 - छतीसगढ़ की 8 ररयासतों के मानणचत्र

स्रोतः- धानूलाल श्रीर्ास्तर् कृ त्त ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज

णसरगुजा या झारखण्ड या छोटा (चुरटया) नागपुर समूह
आस समूह में छत्तीसगढ़ की शेष पााँच ररयासतें सम्मणलत थीं, णजनका र्णवन णनम्ााँदकत है।:सरगुजा
ऄंग्रेज शासन द्वारा सरगुजा ररयासत को प्रथम श्रेणी में रखा गया था। आस ररयासत का क्षेत्रफल
6,055 र्गवमील था। आसकी जनसंख्या 502,058 थी।188
188

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

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आसके ईत्तर में णमजावपुर णजला और रीर्ााँ ररयासत, दणक्षण में जशपुर और ईदयपुर ररयासत तथा
णबलासपुर णजला, पूर्व में पलामू (पालामउ) और रााँची णजले एर्ं पणिम में कोररया ररयासत थी।189
सरगुजा के आणतहास से हमे यह पता चलता है दक, सरगुजा कइ नामों से जाना जाता रहा है। एक
ओर जहााँ रामायण युग में आसे भी दण्डकारण्य190 कहा गया, तो र्हीं दूसरी ओर दसर्ीं शताब्दी में डांडोर
के नाम से भी जाना जाता था। यह कहना करठन है दक, आस ऄंचल का नाम सरगुजा कब और क्यों पड़ा।
र्ास्तर् में सरगुजा दकसी एक स्थान णर्शेष का नाम नहीं है, र्रन् आस क्षेत्र का णर्स्तृत भू-भाग सरगुजा
कहालाता है। आसके नामाकरण हेतु णनम्ांदकत ऄनुमान लगाए गए हैं।:सुरगुजा - सुर + गजा - ऄथावत देर्ताओं या सुर-संगीत और हाणथयों र्ाली धरती।
 स्र्गवजा - स्र्गव + जा - स्र्गव के समान भू-प्रदेश
 सुरगुंजा - सुर + गुंजा - अददर्ाणसयों के लोकगीतों का मधुर गुंजन।

ऄंग्रेजी में आसे Surguja णलखा जाता है।191
छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह सरगुजा ररयासत का भी प्राचीन आणतहास ऄनुपलब्ध है।
आसे कोरर्ा और पंडो जैसी अददम जनजाणतयों की मूल भूणम माना जाता है।
आस क्षेत्र को राम के बनर्ास से भी सम्बि दकया जाता है। यह पाया गया है दक, कालीदास द्वारा
मेघदूत जैसी काव्य रचना आस क्षेत्र में ही की गइ और ईसके नाटकों का मंचन यहााँ हुअ। इसा पूर्व काल के
ऄर्शेष पाए गए हैं। रामगढ़ से पाली ऄणभलेख और बौि संस्कृ णत के णचन्ह णमले हैं।
सीताबोंगरा कन्दरा (गुफा) की ईत्तरी छत के नीचे पाली भाषा में ईत्तकीणव पंणियााँ णनम्ांदकत हैं।:अदद पयंणत हदयं (ह्रदय को अलोदकत करते हैं।)
सभार्गरू कर्यो ये रातयं-दुले ऄबसंणतया।(स्र्भार् से महान ऐसे कणर्गण णमत्र-बासंती दूर है।)
हासार्नुभत
ू े।(हास्य और संगीत से प्रेररत।)
कु दस्पीतं एर्ं ऄलंगेणत।(चमेली और पुष्प की मोटी मालाओं का ही अललगन करता है।) 192
जोगीमारा कन्दरा 30 फु ट लम्बी और 15 फु ट चौड़ी है। आसका द्वार पूर्व में है। यहााँ पाली में
ईत्तकीणव पंणियााँ णनम्ांदकत हैं।
शुतनुक नाम (सुतनुका नाम की)
देर्दाशर्ककय (देर्दासी थी।)
तं कमणयथ बलन शेये {ईसे प्रेमासि दकया गंगा के दणक्षण के मणन्दरों के नगर (र्ाराणसी) णनर्ासी}
देर्ददने नम नम।लुपदखे {देर्दीन नामक रूपदक्ष (कलाकार) ने।}193

189

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.24

190

यह नाम बस्तर से भी जोड़ा जाता है।

191http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%

E0%A4%BE_%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE
192

प्यारे लाल गुप्त कृ त प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.36 में कोसल-प्रशणस्त-रत्नार्ली (लोचन प्रसाद) और ऄनुर्ाद डा.कटारे के सन्दभव के

साथ ईद्धृत।
193

प्यारे लाल गुप्त कृ त प्राचीन छत्तीसगढ़,पृ.36 में कोसल-प्रशणस्त-रत्नार्ली (लोचन प्रसाद) और ऄनुर्ाद डा.कटारे के सन्दभव के

साथ ईद्धृत।

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यह पूणवतः भारतीय मुिाकाशी रं गमंच (Open air theater) है। आसे एणशया की प्रथम
नाट्डशाला माना जाता है।
ईि पाली सन्दभव के अधार पर कणतपय आणतहासकार194 (J.Bloch और A.L.Basham) आसे
देर्दासी प्रथा का प्रथम णलणखत प्रमाण मानते हैं। कु छ195 (जोग शंकर) यह मानते हैं दक, ऐसे ईल्लेख से पूर्व
से नहीं हैं।

णचत्र 32 - कन्दरा
स्रोत- http://www.surguja.com/

णचत्र 33 - प्राप्त पुरा ऄर्शेष
स्रोत- http://surguja.nic.in/tourist.htm

सरगुजा की यह कन्दराएाँ कनवल अईसुले (1848) और डा.ब्लास (1904) (जमवन) द्वारा पुनवप्रकाश
में अईं।196
गुप्त समकालीन कालीदास के रचना स्थल और ईनके द्वारा णलणखत नाटकों के मंचन से भी आन्हे
सम्बणन्धत दकया गया है। ईनके द्वारा ईल्लेणखत रामणगरी को रामगढ़ भी माना जाता है।197
मुिाकाशी रं गमंच (Open air theater) मूल भारतीय णचन्ह है। कलाओं की मंच प्रस्तुणत के
दौरान पदाव (परदा) लागाने की प्रथा के णचन्ह बाद के हैं। सम्भर्तः यर्नो (ग्रीक) के अगमन के ईपरााँत के ,
क्योंदक आस हेतु प्रयुि संज्ञा यर्णनका है। मुिाकाशी रं गमंच (Open air theater) की परम्परा भारत से
ग्रीक (युनान) गइ और ईनके द्वारा आसका अकार-प्रकार भी यहीं से णलया गया। कु छ ऄसचेत शोिाथी और
आणतहासकार ए.एल.बाशम198 के पूणवतः अधारहीन ऄनुमानों (बाशम की शब्दार्ली- ‘हो सकता है’, यह
प्रमाणों से पुष्ट नहीं है’, ‘हालांदक आसके पुष्ट प्रमाण नहीं णमलते’ अदद- है) के कारण गलत तथ्यों को प्रस्तुत
करते हैं।
194

J.Bloch और A.L.Basham

195

Joga Shankara

[ http://ambedkar.org/jamanadas/RiseAnd.htm- An inscription of Ashokan times found in a cave at
Ramagarh in Vindhya hills, as referred by J. Bloch, mentions a word "Sutanuka", which in later period
was used to denote temple dancer. But this is no "clear reference to devadasis in early sources"
(Joga Shankar, p. 39)]
196

मदन लाल गुप्ता-छत्तीसगढ़ ददग्दशन(I),पृ.118

197

डा.बल्देर् प्रसाद णमश्र,मदन लाल गुप्त

198

A.L.Basham-Wonder that was India

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ग्रीकों और पािात्य णर्श्व पर भारतीय प्रभार् सुस्थाणपत है। जैसा दक पूर्व में ईल्लेख अ चुका है दक,
सरगुजा णजले के मेनपाट के ग्राम सरभंजा में अगस्त्य मुणन का अश्रम माना गया था।199 यह माना जाता है
दक, अगस्त्य मुणन ने ही णर्न्ध्य और नमवदा पार कर दणक्षण में णहन्दु धमव या िाहम्णर्ाद को प्रचाररत और
स्थाणपत दकया। ईन्होनें ही, र्हााँ के लोगों के णलए, नइ तणमल भाषा भी प्रचलन में लाइ।
तत्समय का ग्रीक आणतहासकार णप्लणन यह तथ्य आंणगत करता है दक, व्यापार संतुलन भारत के पक्ष
में है और ग्रीक सोना तथा स्र्णव मुद्राएाँ भारत जा रही हैं। व्यापार संतुलन ईसी देश के पक्ष में होता है, जो
ऄणधक णर्कणसत हो और ऄन्य राष्ट्र ईसकी संस्कृ णत और गणतणर्णधयों को ऄपनाने की कोणशश करते हैं। ऄभी
भी ग्रीक स्र्णव मुद्राएाँ तटीय खुदाइयों में णमलती हैं।
ईस समय ग्रीक से भारत अने र्ाले व्यापारी जब र्ापस लौटे, तब तत्काणलन परम्परा ऄनुसार,
राजा के समक्ष नज़राने और ईपहार प्रस्तुणत के साथ णर्स्तररत यात्रा र्ृतांत भी बताया गया। आसमें तत्समय
अयवर्ाद को दणक्षण ले जाने र्ाले प्रणसि नाम अगस्त्य का प्रशंसनात्मक ईल्लेख अना स्र्भाणर्क था,
क्योंदक यह व्यापारी ईसी क्षेत्र (दणक्षण) से ही व्यापार कर र्ापस लौटे थे और ईनके प्रचार, व्यणित्र् और
अयवर्ाद यथा-णहन्दु धमव और संस्कृ णत से प्रभाणर्त थे। अगस्त्य नाम से सीज़र (राजा) भी प्रभाणर्त हुअ और

णचत्र 34 - अगस्त्य

स्रोत- http://en.wikipedia.org/wiki/Agastya

ईसने ऄपने पुत्र का नाम यह ही रख ददया। आसका ईच्चरण अगस्टस हुअ। आसी से ग्रेगोररयन (दक्रणियन)
कै लेंडर के अठर्ें माह का नाम ऄगस्त पड़ा।
आण्डो-ग्रीक (या पािात्य) सम्बन्धों में संस्कृ णत ग्राह्यता का प्रर्ाह भारत से युनान की ओर रहा है
और ईि ईल्लेख से छतीसगढ़ ईससे सीधे जुड़ता है। बाशम, टाड अदद जैसे कइ आणतहासकार और लेखक
जानबूझ कर ऄपुष्ट धारणाएाँ रचते हैं और ऄसचेत शोिार्षथ और आणतहासकार ईसे कोट (ईद्धृत) कर
प्रणतपाददत कर देते हैं। आस तरह के तथ्यों पर पृथक शोध भी दकया जा सकता है। हारे हुए योिाओं को हीरो
के रूप में स्थाणपत करना, ऄलगार् हेतु अधारों को तैयार करना, जाणत को कमतर ददखाना अदद ऐसे कइ
ईदाहरण हैं।

199

मदन लाल गुप्त-छत्तीसगढ़ ददग्दशवन(I),पृ.12

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मौयव राजा चन्द्र गुप्त मौयव ने ग्रीक णसकन्दर (एलेक्ज़ेंडर) सेनापणत सेल्युकस को पराणजत कर ईसकी
पुत्री हेलेना से णर्र्ाह दकया था।
सारणी 5 और णचत्र क्रमााँक 35 - सरगुजा ररयासत के गुफा णचत्र स्थल और ईनके हस्त णनर्षमत णचत्र
स्रोत-छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)
क्र.
1

स्थान
सीतालेकहनी (ओड़गी)

ररयासत
सरगुजा

अकृ णतयााँ और णचत्र (णचत्र क्र. 35)
Geometric pattern
Human figures and faded geometrical design. णच.35

2

रामगढ़

सरगुजा

छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह सरगुजा का भी प्राचीन आणतहास णतणमरमय ही है।
सरगुजा ररयासत में भी मात्र ऄंणतम शासक र्ंश की, ऄंणतम कु छ शताणब्दयों का ही कु छ आणतहास
ज्ञात हो पाता है। सरगुजा का यह ऄंणतम शासक र्ंश (रकसेल राजपूत) छत्तीसगढ़ का प्राचीनतम शासक
र्ंश था। र्ह आणतहास के काल णर्भाजन के प्राचीन काल से ही सरगुजा में सत्तारूढ़ रहा ऄथावत लगभग
इस्र्ी सम्र्त प्रारम्भ होने की लगभग णद्वतीय से चौथी शताब्दी से ही। हालााँदक कु छ लोग आस तथ्य से
ऄसहमणत भी रखते हैं।
आसके पूर्व नंद और मौयव शासन का ईल्लेख अता है।200
सरगुजा क्षेत्र के कणतपय भागों पर बालन्द और कोल शासकों का भी ईल्लेख अता है। यह दोनों
कोररया क्षेत्र में भी रहे। कु दरगढ़ मणन्दर बालन्द शासकों द्वारा ही बनर्ाया गया। यह तथ्य ही रकसेलों के
ईि तथ्य को खणण्ड़त करता है।
यह कहा जाता है दक, सरगुजा क्षेत्र तीन या छोटे-छोटे कइ भागों में णर्भि था और ईस पर ऄलगऄलग शासकों का शासन था।201
सरगुजा के ऄंणतम शासक र्ंश का णचन्हााँकन, छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों के ऄंणतम शासक र्ंशों
से ऄणधक पुराना है। लगभग 1,750 से 1817 या कु छ ऄणधक र्षों पूर्व, णजसे 194 इ. का समय ऄनुमाणनत
दकया गया है, पालामउ (पलामू, झारखण्ड राज्य) के कुं डरी ग्राम से एक राकसेल राजपूत ने अकर सरगुजा
क्षेत्र पर ऄणधपत्य स्थाणपत दकया।202 तब की स्थाणनय जनजाणतयााँ सत्ता में थीं, जो ऄब सत्ता से पृथ्क की
जानी स्र्भाणर्क थीं।।

200

http://surguja.gov.in/historical_background.htm#history

201

http://surguja.gov.in/historical_background.htm#history

202

छत्तीसगढ़ फ्युडेटरी स्टेट गज़ेरटयर 1909

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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यह ईल्लेख भी अता है दक, आसी र्ंश के , कु टपुर ग्राम के , णर्ष्णु प्रताप लसह द्वारा सापनी लसह और
ईसके पुत्र को पराणजत कर राज्य णर्स्तार दकया गया और रामगढ़ में दकले का णनमावण दकया गया।203 र्ह
35 र्षव सत्ता में रहा।
णर्ष्णु प्रताप लसह की मृत्यु ईपरााँत ईसका पुत्र देर्राज लसह 230 इ. में लसहांसनारूढ़ हुअ।
आस क्षेत्र में, आसी र्ंश ने, जागीरदारी प्रथा प्रारम्भ की।
यह तो ऄनुमान लगाया जाता है दक, सरगुजा का णनयंत्रण णर्स्तृत्त भू-भाग पर रहा होगा, पर यह
बहुत स्पष्ट नहीं है दक, आस समूह की शेष चार ररयासतों पर सरगुजा का णनयंत्रण था। हालााँदक बाद में
ईदयपुर और जशपुर ही आस प्रभार् क्षेत्र में हो सकते हैं, क्योंदक णिरटश सरकार को, 1860 तक ईदयपुर की
रटकोली तथा जशपुर की तो लगातार सरगुजा के ही माध्यम से जाती थी।204
हंटर राकसेल को भी कोल और गोंड़ जनजाणत से जोड़ता है, न दक क्षणत्रय से।205
पलामू का एक ईल्लेख यह बताता है दक, र्े 1613 तक शासन में रहने के ईपरााँत खदेड़ ददए गए।
1612 में चैनपुर से भाग कर चेरर्ा प्रधान भगर्त राय ने पलामू के राकसेल शासक मान लसह के यहााँ
नौकरी कर ली। 1613 में मान लसह सरगुजा के प्रधान की पुत्री से ऄपने पुत्र का णर्र्ाह करने के णलए गया।
भगर्त ने ऄनुपणस्थणत का लाभ ईठा ईसके पररर्ार को मार सत्ता हणथया ली और चेर सत्ता स्थाणपत कर
दी। मान लसह ने सत्ता र्ापसी की कोणशश नहीं की और सरगुजा में ही सरगुजा के प्रधान को मार कर
सरगुजा का शासक बन गया।206
सरगुजा से सोम र्ंश के भी संकेत णमले हैं। महेशपुर गांर् में पुरातत्र्ीय ईत्खनन कायव दकए गए हैं।
ईत्खनन से णसरपुर के सोमर्ंशीय शासकों के समय में इटों से णनर्षमत स्थापत्य कला पर अधाररत अठर्ीं
सदी की ताराकृ णत तल पर णनर्षमत भग्न मंददर के ऄर्शेष णमले हैं।207
सरगुजा रतनपुर की कल्चुरी सत्ता के भी ऄधीन रहा। डीपाडीह में नौर्ीं से तेरहर्ीं शताब्दी के
ऄर्शेष णमले हैं। यह कहा जाता है दक, पाटलीपुत्र के शासक टाँगीनाथ ने जब सरगुजा पर अक्रमण दकया
था, तो ईससे युि यहााँ पर ही हुअ था, णजसमें सरगुजा शासक ने हार के ईपरााँत यहााँ के तालाब में कू द कर
अत्महत्या कर ली थी।208 आससे आस क्षेत्र में पाटलीपुत्र के पाल शासकों के ऄणधपत्य के भी संकेत णमलते हैं।
पास के रानी पोखर में तीन राणनयों की अत्महत्या भी कही जाती है।
यह मत भी है दक, कल्चुरी ऄर्सान काल में ही सरगुजा और कोररया जैसी ररयासतें ऄणस्तत्र् में
अईं।209
आणतहास के मध्य काल में 1346 इ. में खलीफा नाम के अक्रमणकारी का ईल्लेख आस तथ्य के साथ
अता है दक, ईसने णर्जय ईपलक्ष्य में तााँबे की मुद्राएाँ णर्तररत की थीं। ईसके र्ापस जाने पर सरगुजा
शासक द्वारा प्रजा से आस मुद्रा की र्ापसी की ऄपील की गइ और आस ऄपील को जनता ने णस्र्कार कर णसक्के
र्ापस कर ददए तथा आनका प्रचलन बन्द कर ददया गया। आसके दो णसक्के सरगुजा ररयासत में सुरणक्षत रखे
गए हैं।
आस काल में सरगुजा पर मुंगेर, पटना, मुर्षशदाबाद और ददल्ली से कइ चढ़ाइयााँ हुईं।210
203

छत्तीसगढ़ ददगदशवन

204

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.26

205

हंटर-एस्टेरटस्कल एकाईं ट अफ बंगाल

206

छत्तीसगढ़ ददगदशवन

207

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/chattishgarh/4_12_4713235.html

208

http://manojrajsingh.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

209

समर बहादुर लसहदेर्-सरगुजा का एणतहाणसक पृष्ठ,पृ.20

210

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.26

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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एक स्रोत211 में सरगुजा में राकसेल राजपूत र्ंश के भइया दादू लसह (1678-1709), 104 र्ें
शासक के रूप में ईल्लेणखत दकया गया है। तदुपरांत बलभद्र लसह प्रथम (1709-1728), जशर्ंत लसह
(1728-1749), बहादुर लसह (1749-1758), णशर् लसह (1760-..), ऄजीत लसह (1792-1799) का
ईल्लेख दकया गया है।212 यह ईल्लेख और सन एकदम सही हों यह नहीं कहा जा सकता। एक ऄन्य स्रोत213
में दादू के पूर्व प्रताप रुद्र लसह का ईल्लेख है।
ईि में ईल्लेणखत सन बहुत सही और स्पष्ट नहीं हैं। क्योंदक, 1758-59 में मराठा अक्रमण के समय
णशर् लसह214 या ऄजीत लसह215 का ही ईल्लेख दकया जाता है। मराठा अक्रमण के ईपरााँत सरगुजा ररयासत
नागपुर मे भोंसला मराठों को कर देने लगी थी और ईनके ऄधीन हो गइ थी।216
1702 के असपास ऄजीत लसह ने ऄंग्रेजों के णर्रूि, पलामू में, बलर्ा प्रेररत दकया। र्ह स्र्यं भी
ईसमें सम्मणलत हुअ और रााँची णजले के बरर्े परगने को हणथया णलया। आस समय मराठा शासन बरार से
संचाणलत था। ऄंग्रेजों ने ईसके माध्यम से हस्तक्षेप दकया। ऄस्थाइ शााँणत हुइ, पर हल नहीं णनकला। आस
कलह और ऄंग्रेज हस्तक्षेप से राज पररर्ार के सदस्यों में भी णर्र्ाद हो गया, जो ऄजीत लसह के जीणर्त
रहते नहीं सुलझा।
ऄजीत लसह के भाइ संग्राम लसह की सदक्रयता बढ़ गइ। ईसने ऄजीत लसह की णर्धर्ा की धोखे से
हत्या करा दी और सत्ता हणथया ली। ऄब ऄशााँणत और ऄराजकता बढ़ गइ। ऄब ऄंग्रेज कनवल जोन्स को भेजा
गया। संग्राम लसह भाग गया और ऄजीत लसह के ऄव्यस्क पुत्र बलभद्र लसह णद्वतीय को सत्ता सौंप दी गइ।
ऄव्यस्क बलभद्र लसह णद्वतीय का राज्य प्रबन्ध ऄजीत लसह के ररश्ते के एक ऄन्य भाइ जगन्नाथ लसह
को ददया गया। ऄंग्रेज सेना की र्ापसी पर संग्राम लसह पुनः अ गया। ऄब ईसने जगन्नाथ को भगा ददया और
1813 तक ऄव्यस्क बलभद्र के नाम से शासन करता रहा। जगन्नाथ पुत्र सणहत ऄंग्रेज शासन ऄधीन राज्य में
चला गया। 1813 में ऄंग्रेज पोणलरटकल एज़ेंट रफसेज सरगुजा गया और राज्य प्रबन्ध दीर्ान को सौंप
ददया। आस दीर्ान को भी मार डाला गया। बलभद्र को दोनों पणत्नयों सणहत बन्दी बनाने का प्रयास दकया
गया, रफसेज द्वारा छोड़े गए णसपाणहयों ने आस षडयंत्र को ऄसफल दकया।
बरार से संचाणलत मराठा शासन के माधोजी (मूढ़ोजी) द्वारा 1818 में सरगुजा भी ऄंग्रेजों को
हस्तांतररत कर ददया गया। आससे व्यर्स्था भी स्थाणपत हो गइ।
1818 में ऄंग्रेज णनयंत्रण होने पर लाल जगन्नाथ लसह का पुत्र ऄमर लसह शासक बना ददया गया।
1819-20 में ऄंग्रेजों द्वारा प्रथम सनद दी गइ। आसमें र्े जमीन्दार ईल्लेणखत दकए गए। ऄमर लसह को
1826 में महाराजा की ईपाणध दी गइ।217
ईत्तराणधकार ऄनुक्रम में क्रम लाल ऄमर लसह, बलभद्र लसह णद्वतीय (प्रथम बार, 1799-1800),
लाल संग्राम लसह (1800-1813) बलभद्र लसह णद्वतीय (भतीजा, णद्वतीय बार, 1813-1816), लाल ऄमर
लसह (1820-1851) ददया गया है।218
211

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

212

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

213

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.10

214

छत्तीसगढ़ ददग्दशवन

215

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.26

216

Imperial Gazetteer of India, v. 23, p. 171

(http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V23_177.gif)
217

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25 और Imperial Gazetteer of India, v. 23, p. 171

(http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V23_177.gif)

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ऄमर की दो पणत्नयााँ थीं। छोटी पणत्न के पुत्र लाल णबन्धेश्वरी प्रसाद लसह ही राजकाज देखते थे।
ऄमर लसह की मृत्यु के ईपरााँत बड़ी पत्नी का णर्णक्षप्त पुत्र आद्रजीत लसह (1851-1879) शासक
हुअ। ऄब भी प्रबन्ध णर्न्धेश्वरी के ही पास रहा। र्ह ही र्ास्तणर्क शासक था। र्ह प्रतापपुर से प्रबन्ध
देखता था। ईसने ररयासत के ईपजाउ और ऄच्छे भाग ऄपने और ऄपने ररश्तेदारों के नाम जणमन्दारी में कर
ददए। ईदयपुर का शासन ऄलग होने के बाद भी श्रीनगर, प्रतापपुर, लबझपुर और चलगली नाममात्र की
रटकोली पर ईनका खोरपोशदारी आलाका बना रहा। यह क्षेत्र णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह ने जीर्कोपाजवन हेतु
ऄपने नाम करा णलए थे। ईसने आन्द्रजीत के पुत्र जन्म के समय ऄंग्रेजों को कन्या जन्म की सूचना आस कारण
से दी दक, र्ह स्र्यं समय अने पर शासक बन सके ।
1857 की क्रााँणत के समय सरगुजा, ईदयपुर (दोनों छत्तीसगढ़) और पलामू ररयासतें, एक
प्रशासणनक आकाइ के रूप में, प्रशासणनक देखरे ख के ऄधीन थीं। 1852 से 1869 तक, करोन्धा ग्राम
(जमीरापाठ पर खजूरी के समीप, कु समी) में सब णडर्ीजनल अदफसर का कायावलय और अर्ास स्थाणपत
दकया गया था। आसे साईथ-र्ेस्ट फ्रंरटयर एजेंसी की संज्ञा दी गइ और करोन्धा को मुख्यालय बनाया
गया।219 1857 की क्रााँणत काल में सब णडर्जनल अदफसर का करोन्धा कायावलय महत्र्पूणव हो गया था।
करोन्धा ग्राम कु समी, छेछारी, महुअडांड, चैनपुर, रााँची मागव पर सरगुजा और पलामू की सीमा पर है। आस
क्षेत्र में णर्द्रोह की ऄर्णध लम्बी भी रही। तब राजधानी प्रतापपुर थी और 1858 में ऄल्प काल हेतु णर्द्रोही,
ईस पर कब्जा करने में सफल भी रहे थे।220
णर्न्धेश्वरी ने 1857 के णर्द्रोह में ऄंग्रेजों की बहुत सहायता की और ऄनतः, आसे, ईदयपुर ररयासत
का शासक बना ददया गया।
आन्द्रजीत लसह का देहांत 25 माचव’1879 को हुअ था।221
यहााँ 1857 की क्रााँणत का भी कु छ ईल्लेख अर्श्यक हो जाता है, क्योंदक ईससे सरगुजा क्षेत्र की
ररयासतें प्रभाणर्त रहीं।आनका प्रभार् सरगुजा, कोररया, जशपुर, ईदयपुर, पलामउ या पलामू अदद पर
रहा।
सरगुजा क्षेत्र में भी 1857 का णर्द्रोह हुअ। आस पर भी तथ्य सामने अए है।222 सरगुजा क्षेत्र
झारखण्ड क्षेत्र की छोटा (या चुरटया) नागपुर ऄथावत रााँची कमीश्नरी का भाग था। यह क्षेत्र भी छोटा या
चुरटया नागपुर कहलाता था। छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में ही 1857 का णर्द्रोह सर्ावणधक लम्बा चला और
ईसमें क्रााँणत और णर्देशी सत्ता से मुणि हेतु संगरठत णर्द्रोह के तत्र् ददखे, पर ऄभी आस पूरे सन्दभव को
छत्तीसगढ़ के आणतहास में ईणचत महत्र् नहीं णमला पाया है।

218

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

219

सोन के पानी का रं ग,प्र.244

220

http://www.aksharparv.com/vichar.asp?Details=245 (र्ेद प्रकाश ऄग्रर्ाल-आणतहासः1857 के स्र्तंत्रता संग्राम में

सरगुजांचल के महान योिा)
221

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

222

यह णर्र्रण http://www.aksharparv.com/Vichar.asp?details=247 में र्ेद प्रकाश ऄग्रर्ाल के लेख आणतहासः1857

के स्र्तंत्रता संग्राम में सरगुजांचल के महान योिा पर अधाररत है।

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छोटा नागपुर में 1831-31 में जनजातीय कोल णर्द्रोह हुअ था। आसका नेतृत्र्, संगठन कायव में
प्रर्ीण, छत्तीसगढ़ क्षेत्र की सरगुजा ररयासत के बुद्धु भगत, ईदयपुर ररयासत के जोअ भगत और जशपुर
ररयासत के के शर् भगत द्वारा दकया गया था।223 आसे आस क्षेत्र में क्रााँणत की लचगारी के रूप में णलया जा
सकता है।
1857 की क्रााँणत के समय सरगुजा, ईदयपुर (दोनों छत्तीसगढ़) और पलामू ररयासतें, एक प्रशासणनक
आकाइ के रूप में, प्रशासणनक देखरे ख के ऄधीन थीं। आस हेतु, 1852 से 1869 तक, करोन्धा ग्राम
(जमीरापाठ पर खजूरी के समीप, कु समी) में सब णडर्ीजनल अदफसर का कायावलय और अर्ास स्थाणपत
दकया गया था। आसे साईथ-र्ेस्ट फ्रंरटयर एजेंसी की संज्ञा दी गइ और करोन्धा को मुख्यालय बनाया
गया।224 ऄतः सरगुजा के साथ पलामू की घटनाओं का ईल्लेख स्र्भाणर्क क्रमबिता को बनाए रखने हेतु
दकया जा रहा है। 1857 की क्रााँणत काल में सब णडर्जनल अदफसर का करोन्धा कायावलय महत्र्पूणव हो
गया था। करोन्धा ग्राम कु समी, छेछारी, महुअडांड, चैनपुर, रााँची मागव पर सरगुजा और पलामू की सीमा
पर है। आस क्षेत्र में णर्द्रोह की ऄर्णध लम्बी भी रही।
छत्तीसगढ़ में 1857 की क्रंणत की सही प्रणतध्र्नी सरगुजा के असपास ही सुनाइ दी। यह प्रणतरोध
लम्बा और संगरठत था। आसमें र्े ही तत्र् थे णजस हेतु क्रााँणत को रे खांदकत दकया जाता है। हालााँदक छत्तीसगढ़
के आणतहास में बहुप्रचाररत णर्द्रोह मात्र रायपुर और ईसके असपास का ही रहा है।
1857 की क्रंणत काल में सरगुजा क्षेत्र में हलचल रही। 1857 की क्रााँणत में भोजपुर क्षेत्र में शाहबाद
के जगदीशपुर के र्योर्ृि जमीन्दार कुाँ र्र लसह जनता के साथ थे और क्रााँणतकाररयों को संगरठत कर नेतृत्र्
कर रहे थे। आस हेत,ु ईन्होंने, व्यापक भ्रमण भी दकया। यथा- शाहबाद, अरा, हजारीबाग, पलामू(पलामउ),
णमजावपुर, रीर्ा के कइ भाग, बााँदा, ऄर्ध के कइ भाग अदद।
र्ह 26 ऄगस्त’1857 को दानापुर और रामगढ़ छार्नी के णर्द्रोही सैणनको के साथ णमजावपुर के
समीप णर्जयपुर पहुाँचा। यह लोग कु छ ददन यहााँ रूके और णमजावपुर के दणक्षण भाग में, जमीन्दारों के णर्रूि
चल रहे अक्रोश को ईत्प्रेररत दकया। आससे जन प्रणतरोध तीव्र ही हुअ।225 ऄब कुाँ र्र लसह रीर्ा पहुाँचे। रीर्ा
ररयासत के शासक ऄंग्रेजों के साथ थे। ऄतः सहयोग नहीं णमला। तदुपरांत र्ह बााँदा, कालपी, कानपुर,
लखनउ अदद की ओर बढ़ गया। कुाँ र्र लसह के णर्जयगढ़ और सरगुजा, कोररया, चााँगभखार अदद ररयासतों
के सीमा क्षेत्र के भ्रमण से जागृणत की लहर ईत्पन्न हुइ।
रीर्ा पर अणश्रत णसगरौली के रघुर्ीर लसह ने णर्द्रोणहयों को साथ दे ददया। आसके हजारो सैणनक
सरगुजा ररयासत की तात्काणलक मुख्यालय प्रतापपुर की ओर बढे।226 सरगुजा के शासक ऄंग्रेजों के साथ थे।
प्रतापपुर में सरगुजा ररयासत के तात्काणलन प्रबन्धक णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह पहले से सचेत थे और
णर्द्रोणहयों से णनपटने की तैयारी कर रखे थे। ईसकी तैयारी देख णर्द्रोहीयों ने रास्ता बदल ददया और पलामू
(पलामाउ) क्षेत्र में ऄन्य णर्द्रोणहयों से जा णमले।227

223

हाब्सबाम-णप्रणमरटर् ररबेलस मानचेस्टर 1959,पृ.13

224

सोन के पानी का रं ग,प्र.244

225

जनरल एस.के .णसन्हा-र्ीर कुाँ र्र लसह-1857 के महान योिा,प्र.82

226

एस.बी.चौधरी-णसणर्ल ररबेणलयन आन दी आं णडयन म्युटनीज़-1857,पृ.189

227

सरगुजा गज़ेरटयर 1998,पृ.50

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जब सरगुजा के शासक ऄमर लसह थे और ईन्होंने राज-काज की णजम्मेदारी छोटी रानी के पुत्र
णर्न्धेश्वरी को दे रखी थी।228 ऄमर के ईत्तराणधकारी बड़ी रानी के णर्णक्षप्त पुत्र आद्रजीत के काल में भी
प्रबन्ध णर्न्धेश्वरी के हाथ में ही रहा था। 1818 में सरगुजा पर सीधा ऄंग्रेज णनयंत्रण अने पर सत्ता, ऄंग्रेजों
द्वारा ही, ऄमर को दी गइ थी।229 णर्न्धेश्वरी ने लगातर ऄंग्रेजों को सहयोग ददया और बाद में आसी कारण
ईन्हें ईदयपुर ररयासत का शासक बनाया गया। आसी समय छोटा नागपुर कमीश्नरी के स्थानापन्न कमीश्नर
द्वारा सरगुजा ररयासत के प्रबन्धक णर्न्ध्येश्वरी लसह को पलामू सीमा पर लेणफ्टनेंट ग्राहम की सहायता हेतु
200 णसपाणहयों को तैयार रखने अदेश ददया गया।230 सरगुजा प्रबन्धक द्वारा ऄंग्रेजों को ऄश्वस्त दकया गया
दक, र्े ररयासत से णर्द्रोणहयों को अर्ागमन का मागव नहीं देंगें। हालााँदक, ऄगस्त 1857 के तृतीय सप्ताह तक
कइ णर्द्रोही कोररया और सरगुजा ररयासत से होकर डोरंड (रामगढ़-रााँची) पहुाँच गए थे।231
जशपुर ररयासत में शेख पहलर्ान और दुखू ऄपनी टुकड़ी के साथ णर्द्रोही सेना से जा णमले। आस
णर्द्रोही सेना का नेतृत्र् नाग र्ंश के शासक का पूर्व दीर्ान भौरो पाण्डेय गणपत राय कर रहे थे। यह सेना
हजारीबाग पर अक्रमण हेतु ईदत्त थी।232
छत्तीसगढ़ और छोटा नागपुर क्षेत्र जनजातीय शासन के क्षेत्र थे, णजसे धीरे -धीरे समाप्त दकया गया।
पलामू के चेरो शासक चुड़ामन को भी हटा ददया गया। कइ जनजाणतयााँ णर्द्रोणहयों का साथ देने लगीं।
खैरर्ार जनजाणत की शाखा बोगता (भोगता) द्वारा नेतृत्र् ददया गया। ऄंग्रेजों द्वारा भंडररया (रं का-गढ़र्ा)
के समीप णस्थत सनेया के भोगता जमीन्दार चेमू लसह को कणथत झूठे के स में फं सा णनर्ावणसत कर ददया गया।
णनर्ावसन काल में ही र्ह काल के गाल में समा गया। आससे अक्रोश बढ़ गया।
ईसके पुत्र द्वय नीलाम्बर और पीताम्बर अगे अए। डोरं डा के णर्द्रोह से णर्देशी राज की समाणप्त की
अशा जाग ईठी। ईन्होंने स्र्तंत्रता की घोषणा कर दी। डोरं ड णर्द्रोह के सैणनकों ने ऄणधकाररयों को मारा
और लूटा तथा बैरकों को जलाया। यह सैणनक कुाँ र्र लसह की सेना से जा णमलने हेतु पलामू के रास्ते अगे
बढ़े। नीलाम्बर और पीताम्बर ने अगे बढ़ कर ईनका स्र्ागत दकया और ऄपने साथ णमला णलया।233
ईन्होंने ऄन्य जनजाणतयों यथा- खैरर्ार, भोगता, चेर अदद को भी संगरठत करने का प्रयास दकया।
ईन्हें भी णर्द्रोह में सम्मणलत होने का अव्हान दकया।
शाहपुर का ऄंणतम चेरो शासक चूरामन राय णनःसंतान मृत हुअ था। आस चेरो पररर्ार की तीन ऄन्य
शाखाएाँ थीं- णर्श्रामपुर का भर्ानी बक्श राय, चुकला का राम बक्श राय और लुकना का देर्ी बक्श राय।
आन्होंने चुरामन की णर्धर्ा के महल में, 26 णसतम्बर’1957 को, चेर जमीन्दारों की सभा बुलाइ। आसमें
भोगताओं और खैरर्ारों का साथ देने का णनिय हुअ। आस सन्युि सेना ने शाहपुर दकले पर, 21
ऄक्टूबर’1857 को, अक्रमण कर णर्धर्ा रानी की चार तोपें छीन लीं। शाहपुर थाने को जला ददया।
228

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25

229

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25 और Imperial Gazetteer of India, v. 23, p. 171

(http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V23_177.gif)
230

पार्षलयामेंटरी पेपसव अन म्युटनीज़ आन आं णडया-फरदर पेपसव क्र.-9,पृ.181

231

डा.व्ही.र्ीरोत्तम-झारखण्ड आणतहास और संस्कृ णत,पृ.287

232

जुणडणशयल कं सलटेंस 6 णसतम्बर’1857 क्र.478

233

द म्युटेनी अफ 1857-58 एण्ड द पलामू जागीरदारस,द जनरल अफ द णबहार ररसचव सोसाइटी,खण्ड-12,ददसम्बर’1955

पाटव-4,पृ.525से571

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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पीताम्बर भोगता के नेतृत्र् में ठाकु र रघुर्र दयाल लसह के चैनपुर गढ़ पर अक्रमण दकया गया। रघुर्र पूर्व
से ही सचेत था। ऄतः अक्रमण ऄसफल रहा।234
तभी लेस्लीगंज पर लगभग 500 णर्द्रोही सैणनकों ने अक्रमण दकया। र्हााँ के स्थाणनय प्रशासन के
लोग- तहसीलदार और दरोगा- भाग गए। तहसील, कचहरी, थाना, अबकारी भर्न, कु छ णनजी भर्न अदद
जला ददए गए। समीप के पााँच ग्राम लूटे और जलाए गए।
5 नर्म्बर को ग्राहम 60 सैणनकों के साथ लेस्लीगंज और 7 नर्म्बर को चैनपुर पहुाँचा। भोगता लोगों
का एक दल सरगुजा की ओर बढ़ चला था, परंतु ग्राहम के चैनपुर पहुाँचने का समाचार पाकर र्ापस चैनपुर
लौट अया।235 ग्राहम को चैनपुर गढ़ में घेर णलया गया। र्ह ठाकु र रघुबर दयाल लसह के णनर्ास में णछप कर
ऄणतररि सहायता की प्रतीक्षा करने लगा। णर्द्रोही आसे घेर चुके थे और ईनकी संख्या 2,000 से 6,000 हो
गइ थी। र्े असपास लूट मचाते रहे।236
आस बीच णर्द्रोणहयो ने, पीताम्बर भोगता के नेतृत्र् में, रं कागढ़ पर अक्रमण दकया। ठाकु र दकसुन
दयाल लसह के कु छ खणलहान अग के हर्ाले कर ददए गए। 27 नर्म्बर को लगभग 5,000 णर्द्रोणहयों ने
राजहरा कोयला खान पर अक्रमण कर ईसे जला ददया और कु छ मशीने ले गए। आसमें स्थाणनय िाहम्ण भी
सम्मणलत थे।
ऄब णर्द्रोणहयों का एक भाग चैनपुर को के न्द्र बना कर रूका और शेष लोग पलामू की ओर बढ़ चले।
ईदेश्य था रााँची से अने र्ाली सरकारी ऄंग्रेज सेना को रोकना।237
आस बीच तेरहर्ीं लाइट आंफैंरी की दो कम्पणनयााँ मेजर काटवर के नेतृत्र् में ग्राहम की सहायता हेतु
भेजी गईं। र्ह सासाराम के णडप्टी मणजस्रेट को साथ ले, सेना के साथ, 8 ददसम्बर को शाहपुर पहुाँचा और
देर्ी बक्श राय को बन्दी बनाने में सफल रहा।
ग्राहम ने छोटा नागपुर के कमीश्नर से भी सहायता मााँगी थी। कमीश्नर ने सरगुजा और देर् के शासकों
को सेना सणहत पहुाँचने का णनदेश ददया। सरगुजा के प्रबन्धक णर्न्धेश्वरी प्रसाद लसह 800 सैणनकों और देर्
के फतह बहादुर लसह 600 बन्दूकणचयों और 100 घुड़सर्ारों के साथ ग्राहम की सहायता को अ पहुाँचे। ऄब
णिरटश ईच्च ऄणधकारी ग्राहम को णस्थणत सम्हाल लेने की णस्थणत में पा रहे थे, आसणलए काटवर को सासाराम
लौटने को कहा गया।238
ऄंग्रेज सेना को एकत्र होते देख कु छ चेरो सरदार णर्द्रोह से ऄलग हो शांत हो गए। शेष णर्द्रोणहयों ने
मणनका और छतरपुर थाना लूटा और जला ददया। ग्राहम ने खेरर्ार के आलाके दार परमान्द को साणथयों
सणहत पकड़ णलया। तब तक पलामू दकला णर्द्रोणहयों के कब्जे में अ चुका था।

234

पर्षलयामेंटरी पेपसव, भाग-44,क्र.-एक

235

डा.व्ही.र्ीरोत्तम-झारखण्ड आणतहास और संस्कृ णत,पृ.299

236

डा.जगदीश नारायण सरकार-द म्युरटनी अफ 1857-58 एण्ड पलामू जागीरदासव,-द जनरल अफ णबहार ररसचव सोसाइटी

खण्ड ददसम्बर’1958,पाटव -4,पृ.529 से 571
237

पी.पी. णजल्द-70,2 जनर्री’1858

238

पी.पी.णजल्द-44,पृ.8, संलग्न घटनाओं का णर्शद णर्र्रण 22 जनर्री’1858

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21 जनर्री’1858 को कनवल डाल्टन, मेजर मैकडोनल और परगनैत जगत पाल लसह की सन्युि
सेना मणनक पहुाँची। ऄब मणनक से णर्द्रोही भाग गए। कनवल डाल्टन की सेना पलामू दकले तक पहुाँच गइ।
सेना को तीन भागों में बााँट कर धार्ा दकया गया। भोगता और चेरो णर्द्रोणहयों से युि हुअ। णर्द्रोणहयों के
पैर ईखड़ गए और र्े र्नों की ओर भाग गए।
डाल्टन लेस्लीगंज अकर डट गया और पलामू के सभी जमीन्दारों को अहुत कर णलया। णर्द्रोह दमन
तीव्र दकया गया। रंका के ठाकु र दकसुन दयाल लसह को एक सन्य टुकड़ी देकर शाहपुर-बममारा घाट की ओर
भेजा गया। नीलम्बर और पीताम्बर बच णनकले, पर ईनके तीन प्रमुख साथीयों पकड़ कर फााँसी पर लटका
ददया गया।239 13 फरर्री’1858 को डाल्टन कोयल नदी पार कर चेमों पहुाँचा। बड़ी सेना के तोप के
अक्रमण से णर्द्रोही चेमो और सेनया से भी खदेड़ ददए गए। डाल्टन को यहााँ से खाद्यान्न का भण्डार हाथ
लगा। ऄंग्रेजों ने सभी गााँर्ों को जला ददया। सम्पणतयााँ और जागीरें जप्त कर लीं। कइ णर्द्रोही और सामान्य
जन मौत के घाट ईतार ददए गए।
नीलाम्बर गुररल्ला धार्ों द्वारा बााँसडीह, चन्या और रं का में लूटपाट करता रहा। लगातार दबार्
और घटती संख्या के कारण नीलाम्बर और पीताम्बर को ऄत्मसमपवण करना पड़ा। ईन्हे लेस्लीगंज में
ऄप्रैल’1859 में फााँसी पर लटका ददया गया। ईनके साथ 150 ऄन्य लोग भी मौत की सजा के भागीदार
हुए, आनमें णशर् चरण मााँझी, रूदन, भानु प्रताप लसह अदद सम्मणलत थे।240
डाल्टन, पलामू में णर्द्रोह शांत कर, लोहरदगा में णर्श्वनाथ शाही और गणपत रार् से णनपटने को बढ़
गया, पर बचे खुचे भोगता लोग पुनः संगरठत होने का प्रयास करते रहे और शाबाद णर्द्रोणहयों का दल सोन
के बााँय तट से और चौरासी घाट हो कर पलामू प्रर्ेश का प्रयास करता रहा।241
पलामू में णर्द्रोही पााँच तोपे बना चुके थे और पााँच ऄन्य बना रहे थे। र्े रोहतास में भी णछपे हुए थे।
ऄतः डाल्टन ने कै प्टन नेशन को ग्राहम की सहायता हेतु सैणनक लेस्लीगंज भेजने को णलखा।242 आस लचता का
कारण, कुाँ र्र लसह के भाइ ऄमर लसह का, घुड़सर्ार और पैदल सेना सणहत सोन पार कर 24 नर्म्बर को
खरौधी (मणझगााँर् के समीप) पहुाँचना भी था।
ग्राहम चैनपुर जाने हेतु रामकु न्ड लौटा। शाहबाद से अए लगभग 1,100 णर्द्रोणहयों का नेतत्ृ र्
सीधर्ास लसह और रम बहादुर लसह के पास था। ददसम्बर’1858 में ग्राहम को और 300 सैणनक णमल गए
थे। कप्तान देणर्स छेछारी (महुअडाण्ड) में था। ईसे सरगुजा के शासक णर्न्िेश्वरी से सहायता णमल रही
थी।243 ऄंग्रेज धान कटाइ के पूर्व छेछारी और चैनपुर- दोनों ओर से- अक्रमण करना चाहते थे। ऄमर लसह
भी गढ़र्ा तक अ गया था और भोगता क्षेत्र में प्रर्ेश को ईदत्त था।244 छेछारी के भइया ईपाणध धारक
जमीन्दार, भोज, भरत अदद के नेतृत्र् में णर्द्रोणह संगठन बन गया। छेछारी से 19-20 दकलोमीटर दूर
चुनचुणनया घाट की रक्षा हेतु सरगुजा प्रबन्धक को तैनात दकया गया, पर र्ह आस संगठन से घबराकर
239

णमलीटरी प्रापर प्रोसीलडग्स क्र.9 संलग्नक घटनाओं का र्णवन, 27 फरर्री’1858

240

ओ.अर.करसपांडेंस क्र.282 पत्र दद. 6 मइ, 18 फरर्री और 18 माचव’1859

241

हो.प्रो. जुलाइ 23’1858 क्र. 50 शेरघाटी के णडप्टी मणजस्रेट का टे लीग्राम

242

णम.प्रो. ऄिू बर 29’ 1858 क्र. 164 डाल्टन का पत्र, चाइबासा णसतम्बर 30

243

डा.व्ही.र्ीरोत्तम-झारखण्ड आणतहास और संस्कृ णत,पृ.304

244

होम पं. प्रो. ददसम्बर 10’ 1858 क्र.22 ग्राहम का टेलीग्राम दद. चैनपुर 2 ददसम्बर’1858

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अक्रमण हेतु ईदत्त नहीं हुअ।245 ऄब कै प्टन डेणर्स ने सेनया (चेचरी के पास) की ओर और लेणफ्ट. ग्राहम
घूमकर दणक्षण से रामकु ण्डा की ओर से अगे बढ़ा। णर्द्रोणहयों से डरकर बरजर थाने के रक्षकों ने, 18
नर्म्बर’1858 को, सरगुजा की ओर पीछे हटने की योजना की। भोज और भरत के नेतत्ृ र् में भोगता लोगों
ने आस थाने को नष्ट कर ददया। कन्हर नदी पार कर सरगुजा की ओर भाग रहे थाना रक्षकों ने दो कोल लोगों
की सहायता ली।246 ऄंग्रेज सेनाओं ने णर्द्रोणहयों पर अक्रमण कर भारी नुकसान पहुाँचाया। 16 णर्द्रोही मारे
गए, 30 घायल हुए और 3 बन्दी बनाए गए तथा ऄंग्रेजों की ओर से 3 व्यणि ही घायल हुए।247
णर्द्रोही लगातार स्थान बदलते थे। कै प्तन ड़ाल्टन ने जुलाइ’1858 की णस्थणत को णनयंणत्रत करने हेतु
कोरन्धा सबणडर्ीजन बरही सबणड़र्ीजन को णिगेणड़यर ड़गलस के सैन्य प्रभार से जोड़ने का प्रस्तार्
ददया।248 आस प्रस्तार् के लागू होने तक णर्द्रोही सशि हो चले थे। 27 ददसम्बर’1858 तक ईनकी णस्थणत
ऄच्छी हो गइ थी। र्े ददसम्बर’1858 तक कु छ पाने की णस्थणत में भी अ गए।
ऄंग्रेजों को कइ सूचनाएाँ भी अने लगी। कोरन्धा के एक्स्रा जूणनयर ऄणस्सस्टेंत कमीश्नर से सूचना
णमली दक लगभग 800 णर्द्रोही सैणनक क्षेत्र में लूट के साथ अगे बढ़ रहे हैं। णसन्धर्ास लसह और रामबहादुर
लसह के नेतत्ृ र् में 200 सैणनकों के अगे बढ़ने की भी सूचना अइ। कोरन्धा सब-णडर्ीज़न के एक्स्रा ऄणसस्टेंट
कमीश्नर द्वारा यह भी सूणचत दकया गया दक सरगुजा के पणिम में एक ऄन्य णर्द्रोही दल भी दबार् बनाए
हुए है और लगभग 600 सैणनक सरगुजा में परतापपुर में णस्थत णर्ध्येश्वरी प्रसाद पर दबार् बनाने हेतु अगे
बढ़ रहे हैं।249 लगभग 100 णर्द्रोही शेर घाटी की ओर भी बढ़ रहे थे।
शेरघाटी के णडप्टीकलेक्टर ने सूणचत दकया दक, लगभग 700 णर्द्रोही सैणनक पलामू से कोरन्धा के
दणक्षण-पणिम के समीप के र्नों में अ गए हैं और ईत्तर को बढ़ रहे हैं। माणनक दओगा ने बताया दक णर्द्रोही
5,000 हैं और अगे बढ़ते जा रहे हैं। ड़ेणर्स ने सूणचत दकया दक, पलामू के ईत्तरी-पिमी क्षेत्र के सोनपुरा के
राजा और हुसैनाबाद के नर्ाब भी णर्द्रोणहयों का साथ दे रहे हैं। लोहरदगा के ऄणसस्टेंट कमीश्नर की सूचना
थी दक, पलामू का लगभग 65 दकलोमीटर का र्नीय क्षेत्र णर्द्रोणहयों के हाथ अ गया है। पलामू, सरगुजा
और लोहरदागा के भोगता, कै रर्ार और भुईंया अदद लोग भी णर्द्रोणहयों से णमल गए हैं।
ऄब कोरन्धा के सबणड़र्ीजन के कणनष्ठ साहायक अयुि ने सूणचत दकया दक, सरगुजा ररयासत की
राजधानी प्रतापुर णर्द्रोणहयों के कब्जे में चली गइ है और सरगुजा पर बाणगयों का कब्जा हो गया है।250
छत्तीसगढ़ के आणतहास में यह ईल्लेख ऄभी तक महत्र् नहीं पा सका है। तत्काल ग्राहम द्वारा णबखरी सेना को
लामबन्द कर प्रतापपुर के पास ले अइ गईं। आसमें ऄंग्रेज और णसक्ख सैणनक भी थे। प्रतापपुर और सरगुजा
को शीघ्र ही मुि करा णलया गया।251
स्पष्ट है दक, जनर्री’1859 तक पूरा सरगुजा-पलामू क्षेत्र णर्द्रोणहयों द्वारा ईद्वेणलत था और लगभग
ईनके प्रभार् या णनयंत्रण में अ चुका था। र्े गुररल्ला युि कर रहे थे। हमला और लूट ईनका हणथयार था।
245

डा.व्ही.र्ीरोत्तम-झारखण्ड आणतहास और संस्कृ णत,पृ.304-305

246

पलामू णजला गज़ेरटयर 1961,पृ.76-77 और सरगुजा णजला गजेरटयर 1989,पृ.51

247

पर्षलयामेंटरी पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव,पृ.77

248

पर्षलयामेंटरी पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव,पृ.83

249

पर्षलयामेंटरी पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव,पृ.79-80

250

http://www.aksharparv.com/vichar.asp?Details=245 (र्ेद प्रकाश ऄग्रर्ाल-आणतहासः1857 के स्र्तंत्रता संग्राम में

सरगुजांचल के महान योिा)
251

पर्षलयामेंटरी पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव -9,पृ.334; पलामू णजला गज़ेरटयर 1961,पृ.80; डा.सणचन

मणन्दलर्ार-सरगुजा दशवन,पृ.29;

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कनवल डाल्टन लचणतत था। ऄब कै प्टन नेशन पलामू अ गया था और ग्राहम को सहायता कर रहा था।
णिगेणडयर डोग्लाज़ भी, शाहबाद में णर्द्रोणहयों से फाररग़ हो, पलामू अ गया था। कनवल टनवर को कै मूर
पहाणड़यों के मुहाने पर तैनात दकया गया।
ऄब डाल्टन द्वारा कै प्टन डेणर्स, सरगुजा प्रबन्धक णर्न्धेश्वरी प्रसाद लसह, कोररया की रानी कदम
कुाँ र्र (पणत्न ऄमोल लसह), जशपुर शासक प्रताप नारायण लसहदेर् को भोगता और ऄन्य बाणगयों का दमन
कर परास्त करने हेतु अदेणशत दकया गया।252 कोररया का ऄमोल लसह कमजोर शासक था और ररयासत
का राज-काज रानी कदम कुाँ र्र ही चलाती थी।253 सरगुजा में भी यही हाल था। लाल ऄमर लसह (18201851)254 की दो पणत्नयााँ थीं। छोटी पणत्न के पुत्र लाल णबन्धेश्वरी प्रसाद लसह ही राजकाज देखते थे। ऄमर
लसह की मृत्यु के ईपरांत बड़ी पत्नी का णर्णक्षप्त पुत्र आद्रजीत लसह (1851-1879) शासक हुअ। ऄब भी
प्रबन्ध णर्न्धेश्वरी के ही पास रहा। र्ह ही र्ास्तणर्क शासक था। र्ह प्रतापपुर से प्रबन्ध देखता था। ईसने
ररयासत के ईपजाउ और ऄच्छे भाग ऄपने और ऄपने ररश्तेदारों के नाम जणमन्दारी में कर ददए। ईदयपुर
का शासन ऄलग होने के बाद भी श्रीनगर, प्रतापपुर, लबझपुर और चलगली नाममात्र की रटकोली पर
ईनका खोरपोशदारी आलाका बना रहा। यह क्षेत्र णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह ने जीर्कोपाजवन हेतु ऄपने नाम
करा णलए थे। ईसने आन्द्रजीत के पुत्र जन्म के समय ऄंग्रेजों को कन्या जन्म की सूचना आस कारण से दी दक,
र्ह स्र्यं समय अने पर शासक बन सके ।
णिगेणडयर डगलस और लेणफ्ट. ग्राहम के नेतृत्र् में कु छ ऄंग्रेज और णसक्ख सेना शाहपुर, चैनपुर,
लेस्लीगंज, गढ़र्ा और मणझगााँर् भेजी गइ। कइ भोगता, खैरर्ार अदद नेता पकड़ कर फााँसी पर लटका ददए
गए। कइ सघषव में मार डाले गए। कइ र्नों और पहाड़ो पर भाग गए।
8 से 23 फरर्री’1859 के दो सप्ताहों में, भोगता-खैरर्ार, णर्द्रोणहयों की णस्थणत खराब हो गइ और
चेरो-भोगता गठबन्धन ऄंततः टूट ही गया। माचव’1859 तक पलामू, सरगुजा, शाहाबाद, लोहरदगा के सभी
प्रमुख णर्द्रोही नेता या तो मार डाले गए या कै द कर णलए गए।255 सरगुजा-पलामू क्षेत्र में 1857 का णर्द्रोह
लम्बा चलने के बाद समाप्त हो गया।
1857 के णर्द्रोह की समाणप्त के ईपरांत भी ईसका प्रभार् कु छ समय रहा। कु छ समांतर घटनाएाँ
साथ-साथ भी हुईं।
ऄंग्रेजों द्वारा ईदयपुर ररयासत को 1860 में सरगुजा शासक आन्द्रजीत लसह के छोटे भाइ लाल
णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह देर् को ददया गया। ईसने ऄंग्रेजों की क्राणन्त दमन हेतु पयावप्त मदद की थी। यह
ईसका पुरस्कार था। जब आसने क्योंझर में क्रंणतकाररयों को दबाने में मदद की थी तब आसे ऄंग्रेज सरकार
द्वारा सुनहरा कामदार झुला, एक हाथीं, एक स्र्णव घड़ी और जंज़ीर भी धन्यर्ाद के साथ दी गइ थी। बाद
में आसे राजा बहादुर और णसतारे णहन्द (C.S.I.) की ईपाणधयााँ भी दी गईं।256 र्ह राजकायव दक्ष, चतुर और
योग्य प्रशासक माना जाता था।

252पर्षलयामेंट

पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव -8 और 9,पृ.80, पलामू णजला गज़ेरटयर 1961,पृ.79-80,

सरगुजा णजला गज़ेरटयर 1989,पृ.52
253

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.11

254

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

255

पर्षलयामेंट पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव -8,9;पृ.81

256

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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81
आन्द्रजीत लसह का पुत्र रघुनाथ शरण लसह देर् (1879-1917/18) सरगुजा ररयासत का ऄगला
ईत्तराणधकारी हुअ। ईसका जन्म 1862 में हुअ था।257 र्ह पूणव व्यस्क होने पर 1882 में गद्दी पर बैठा।258
यह भी कहा जाता है दक, णर्न्धेश्वरी प्रसाद लसह द्वारा आसी रघुनाथ के जन्म के समय ऄंग्रेज सरकार को
कन्या जन्म लेने का प्रणतर्ेदन ददया गया था, णजससे समय अने पर, र्ह स्र्यं शासक बन सके ।259 ऄंग्रेजों
द्वारा, 1895 में, रघुनाथ को महाराज बहादुर व्यणिगत की ईपाणध दी गइ। ऄंग्रेजों को ददया जाने र्ाला
र्ार्षषक कर
2,500 णनयत दकया गया।260 ऄंग्रेज-ररयसत सम्बन्ध 1899 की सनद, जो 1905 में
नर्ीनीकृ त्त कर सुधारी गइ, द्वारा णनधावररत दकए गए।
आसी के काल में सरगुजा ररयासत को, 1905 में, बंगाल प्रााँत की छोटा नागपुर (रााँची) कमीश्नरी से
हटा सेंरल प्रोलर्स और बेरार प्रााँत की छत्तीसगढ़ (रायपुर) कमीश्नरी में णमलाया गया। यह प्रणसि बंग-भंग
का ही एक भाग था।
शासक या राजा पर ईसका सामान्य णनयंत्रण रहता था। ररयासत के शासकों पर ऄंग्रेज सरकार
ईसके माध्यम से णनयंत्रण करती थी।
रघुनाथ शरण लसह देर् के दीर्ान पं. गणेश प्रसाद दुबे (1905-1918) थे।
रघुनाथ शरण लसह देर् 1918 में स्र्गव णसधारे ।261
रघुनाथ शरण लसह देर् के ईपरााँत ईनका पुत्र रामानुज शरण लसह देर् ईत्तराणधकारी हुए। आसका
जन्म 4 नर्म्बर’1893 (या 1895) को हुअ।262 र्ह 1918 में गद्दी पर बैठे। ऄंग्रेजों ने ईन्हे, 1918 में,
महाराज की263 और 1919 में C.B.E. की264 ईपाणध दी। 1920 की सनद में रटकोली को 17 र्षों के णलए
3,500 र्ार्डषक दकया गया।

257

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25। यह सन http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html में 1860

ददया है।
258

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25। यह ददनांक The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper,

MacMillan & Co., 1893 p. 481 में 25 माचव’1879 ददया है।
259

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.26-27

260

Imperial Gazetteer of India, v. 23, p. 172

(http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V23_177.gif)
261

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.27 । http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html में यह ददनांक 31

ददसम्बर’1917 बताइ गइ है।
262

The Golden Book of India"; LETHBRIDGE, Roper, MacMillan & Co., 1893 p. 481 और

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html ; परं तु N.N.Nitra की Indiana annual registera
(Calcutta,1945) में यह सन 1895 ददया है।
263

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/s/surguja.html

264

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.27

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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82

णचत्र 36 - सरगुजा ररयासत का ध्र्ज

स्रोत- http://www.crwflags.com/FOTW/FLAGS/in-surgu.html

आन्होंने णत्रपुरी कााँग्रेस के ऄणधर्ेशन में जलूस हेतु हाथी और रसद हेतु णर्ष्णु-भोग चार्ल भेजा था।
आसकी बहन चन्द्रकााँता का णर्र्ाह बानेर के ऄमर लसह से हुअ। रामानुज के दो णर्र्ाह हुए।
आसके दीर्ान णबनोद लाल णसन्हा (1918-1919) और डी.डी.दादीमास्टर थे।
सामान्यतः ररयासत के प्रधानमंत्री णिरटश सरकार के सेर्ाणनर्ृत्त एक्स्रा ऄणसस्टेंट कमीश्नर (णडप्टी
कलेक्टर) होते थे।
ररयासत का भारत में णर्लय आसी के काल में दकया गया।
1,170 से भी ऄणधक बाघों के णशकार के कारण प्राकृ णत और पशु णर्दों की अलोचना के पात्र बने।
पड़ोसी कोररया ररयासत में आन्ही सहनाम (रामानुज प्रताप) शासक थे। णशकार में ईनसे आनकी प्रणतद्वणन्दता
थी।
सरगुजा ररयासत का राज-णचन्ह काली की मूर्षत थी।
ईदयपुर का शासन ऄलग होने के बाद भी श्रीनगर, प्रतापपुर, लबझपुर और चलगली नाममात्र की
रटकोली ईनका खोरपोशदारी आलाका बना रहा। यह क्षेत्र णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह ने जीर्कोपाजवन हेतु ऄपने
नाम करा णलए थे।
आनके ऄलार्ा दो और बड़े आलाके दार थे।
एक- णझलणमली के चौहान, णजनकी एक शाखा कोररया ररयासत की शासक बनी। आनके पूर्वजों ने
कभी सरगुजा रानी की, स्थाणनय णर्द्रोही अक्रमणकाररयों से रक्षा की थी और आस कारण से ईन्हे णझलणमली
का आलाका ददया गया था और रानी की भाइ की तरह रक्षा करने के कारण आन्हे भइया की ईपाणध दी गइ।
आन भइया लोगों का स्थान ही भइयाथान कहलाने लगा।265 आसका पूरा णर्र्रण कोररया ररयासत की चचाव
में अगे ईल्लेणखत दकया गया है, पर सणन्क्षप्त णर्र्रण यहााँ अगे ईल्लेणखत है। अगे चलकर जब कोररया से
चााँगभखार ऄलग हुअ तो यहााँ के कु नबे से ही एक को गोद ले कर ईत्तराणधकार ददया गया था।
मोहम्मद गोरी से पराणजत होने के ईपरााँत पृथ्र्ीराज चौहान के र्ंशज मैनपुरी (अगरा के समीप)
अ बसे थे।266 ददल्ली और ऄजमेर से हटने के ईपरााँत चौहान सत्ता मैनपुरी में के णन्द्रत हो गइ थी। यहााँ के
चौहान कु नबे से दो भाइ, जो दक, तत्काणलन मैनपुर शासक के भी कणजन भाइ कहे जाते हैं, थे- दलथम्मन

265

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.9

266

नेत्र पाल लसह-मैनपुरी का र्ह खूनी ददन,पृ.54-55

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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(दलयमन) शाही और धारामल शाही (धौरे ल साही)।267 1750 इ. के असपास यह दोनों मैनपुरी से
र्ाराणसी, णमजावपुर, सीधी, सरगुजा, छोटा-नागपुर, सम्बलपुर अदद होते हुए जगन्नाथ पुरी तीथव यात्रा पर
गए।268 आनके साथ एक छोटी सन्य टुकड़ी भी थी। र्ापसी पर यह लोग सरगुजा की राजधानी णर्श्रामपुर में
जोड़ा तालाब के समीप रूके । बाद में णर्श्रामपुर का ही नाम ऄणम्बकापुर हुअ।
सरगुजा शासक मुख्यालय से ऄन्यत्र (सम्भर्तः रााँची) गया हुअ था। सरगुजा शासक की
ऄनुपणस्थणत ने कु छ स्थाणनय सरदरों को णर्द्रोह के णलए प्रेररत दकया। ईन्होंने शासक णनर्ास को घेर णलया।
णघर चुकी रानी ने ऄपने को ऄसहाय पाया, तो ऄन्य णर्कल्पों पर णर्चार दकया जाना स्र्भाणर्क था और
जब ईसे यह ज्ञात हुअ दक, दो चौहान भाइ ऄपनी छोटी टुकड़ी सणहत जोड़ा तालाब के समीप डेरा ड़ाले
हुए हैं, तो ईसने ईन्हे राखी भेज कर रक्षा की ऄपेक्षा की। दोनों ने णर्द्रोही सरदरों को भगा ददया और रानी
को सुरणक्षत णनकाल णलया, परं तु ईनकी टुकड़ी के ऄणधकांश लोग खेत रहे।
सरगुजा शासक को मुख्यालय र्ापसी पर सब बातें ज्ञात हुईं। ईसने, धन्यर्ाद स्र्रूप, चौहान
भाइयों में से ज्येष्ठ दलथम्मन साही को णझलणमली आलाके की ज़ाग़ीर दे दी।269 तब णझलणमली क्षेत्र का कु छ
भाग बालन्द लोगों के ऄणधकार में भी था।
दोनों चौहान भाइ रे ण नदी तट पर के सके ला ग्राम में बसे।270 यह अर्श्यक भी था, क्योफक आस
बीच मैनपुरी से चौहानों को फारूखाबाद के सुल्तान ने आटार्ा की ओर खदेड़ ददया था और आनकी यहााँ से
र्ापसी ऄज्ञात भणर्ष्य की ओर होती। हालााँदक आटार्ा की ओर खदेड़े गए चौहान लोग पुनः मैनपुरी की
सत्ता र्ापस पाने में सफल भी हुए थे। सरगुजा अए आन भाइयों ने आटार्ा में रह रहे, आंन सम्बणन्धयों को,
मैनपुरी र्ापस पाने में सहायता दी हो सकती है, क्योंदक आस बार की र्ापसी में ईनके साथ र्ह तलर्ारें भी
थीं, जो मोहम्मद गोरी से पृथ्र्ी राज चौहान की पराजय में खेत रहे दो सेनापणतयों- चामुण्ड राय और
कमन्द राय- की बताइ जाती हैं।271 यह तलर्ारें भइयाथान के दलथम्मन शाह के र्ंशजों के पास रहीं। आनके
पास पृथ्र्ीराज रासो की एक प्रणत भी है, जो 15 र्ीं शताब्दी में ईदयपुर मेर्ाड़ शासक द्वारा बनर्ाइ गइ
तीन प्रणतयों में से एक हो सकती है।272
चौहान दलथम्मन (दलयमन) शाही ने के सके ला में एक गढ़ी भी बनार्ाइ, णजसके भग्नार्शेष र्हााँ
हैं। र्ह लोग सरगुजा शासक को र्ार्षषक कर देते थे। ईन्हों ने बालन्द लोगों को आस क्षेत्र से हटा ददया और
ईन णर्द्रोही पखाड़ी लोगों का भी दमन करने में सफल रहे, जो सरगुजा शासक के णर्रोधी और थे।273
ईन्नीसर्ीं शताब्दी के प्रथम भाग में चौहान र्ंशजों को, रानी की राखी के कारण, सरगुजा शासक
ऄमर लसह द्वारा भइया की ईपाणध दी गइ।274 णझलणमली क्षेत्र को भइया-स्थान कहा जाने लगा, जो ऄब
भइयाथान कहलाता है।275

267

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.5

268

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.6

269

http://korea.nic.in/history.htm

270

http://koreakumar.com/

271

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

272

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

273

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.7

274

http://korea.nic.in/history.htm

275

http://koreakumar.com/

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दलथम्मन शाही का छोटा भाइ धारामल शाही (धौरे ल साही) कु छ समय के सके ला में रहा,
तदुपरांत र्हा ऄन्य क्षेत्रों की तलाश में ईदत्त हुअ और कोररया क्षेत्र में अया। र्ह कोररया के ऄंणतम शासक
र्ंश का प्रथम शासक हुअ। यह काल मुगल पतन और मराठा ईदय का था। कोररया में शुभंकर के रूप में
मछली णचन्ह का ईपयोग भी, चौहानों के , ईत्तर प्रदेश से अने का संकेत करता है, क्योफक यह शुभंकर ईस
क्षेत्र में व्यापक प्रयुि होता है।276
धारामल शाही (धौरे ल साही) ने सेना एकत्र की और कोररया पर धार्ा दकया। र्ह पहले णचरमी
ग्राम में रूका और दफर ईसने अक्रमण दकया। ईसने कोररया के कोंच कोल शासक को युि में पराणजत कर
कोररया की सत्ता हणथया ली।
बाद में जब कोररया के चौहान र्ंश की एक शाखा कोररया से ही पृथ्क हुए चााँग भखार की शासक
हुइ और ईसमें जब एक समय कोइ ईत्त्राणधकारी नहीं रहा तो णझलणमली के ही चौहान र्ंश से एक को गोद
ले सता दी गइ। आसका णर्रोध तात्काणलन कोररया शासक द्वारा दकया गया और आसका र्ाद भी चला।
दूसरे - लखनपुर के रकसेल क्षत्री खोरपोशदार। आनके पूर्वजों को रामपुर और महरी टप्पे
जीर्कोपाजवन हेतु णमले थे।
लुदरा, कतसरीर्ारी अदद ऄन्य छोटी जमीन्दाररयााँ थीं।277
ईदयपुर
ईदयपुर ररयासत को णिरटश सरकार द्वारा णद्वतीय श्रेणी में रखा गया था। यह रायगढ़ णजले
धमवजयगढ़ और जशपुर णजले के पत्थलगााँर् का क्षेत्र है। आस ररयासत का क्षेत्रफल 1,052 र्गवमील था।
आसके ईत्तर में णसरगुजा ररयासत, पूर्व में जशपुर और रायगढ़ ररयासतें, दणक्षण में रायगढ़ ररयासत
और पणिम में णबलासपुर णजला था। आसकी राजधानी धमवजयगढ़ थी।
छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह ईदयपुर का भी प्राचीन आणतहास ज्ञात नहीं है। यह ऄर्श्य
कहा जाता है दक, यह सरगुजा के ही प्रभार् क्षेत्र में था।
ईदयपुर ररयासत को सरगुजा के राकसेल क्षत्री र्ंश की एक ऄन्य शाखा को सौंपे जाने के पूर्व आसी
र्ंश के कल्याण लसह के पूर्वजों के र्ंश का शासन था। यह र्ंश भी सरगुजा के राकसेल राजपूत र्ंश की ही
एक शाखा थी।
यह कहा जाता है दक, लगभग 1,750 से 1817 या कु छ ऄणधक र्षों पूर्व, णजसे 194 इ. का समय
ऄनुमाणनत दकया गया है, पालामउ (पलामू, झारखण्ड राज्य) के कुं डरी ग्राम से एक राकसेल राजपूत ने
अकर सरगुजा क्षेत्र पर ऄणधपत्य स्थाणपत दकया,278 तब सरगुजा शासक द्वारा ऄपने छोटे भाइ को ईदयपुर
का क्षेत्र दे ददया गया था और यह सरगुजा ररयासत के तहत जागीरदारी हो गइ थी। आस प्रकार कल्याण
लसह तक यह र्ंश भी छत्तीसगढ़ के प्राचीन शासक र्ंश में अ जाता है। हालााँदक बाद में र्ंश राकसेल
राजपूत ही रहा पर शाखा बदल गइ।
कल्याण लसह के पूर्वज शासकों के नाम ज्ञात नहीं हो पाए हैं।
यह ररयासत भी रतनपुर के कल्चुरी और तदुपरांत नागपुर के मराठा भोंसलों के ऄधीन रही।
मराठों को र्ार्षषक कर रटकोली सरगुजा के माध्यम से ही जाता था।
मराठों द्वारा जब 1818 में ऄंग्रेज सरकार को सत्ता हस्तांतररत की गइ, तो यह क्षेत्र भी ऄंग्रेज
ईपणनर्ेश का भाग बन गया।
276

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

277

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.39-40

278

छत्तीसगढ़ फ्युडेटरी स्टेट गज़ेरटयर 1909

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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1818 में ईदयपुर ररयासत जब मराठों से ऄंग्रेजों को गइ, तब र्े रटकोली सरगुजा के माध्यम से दे
रहे थे।
ईदयपुर का आणतहास 1857 की क्रााँणत से स्पष्ट होना प्रारम्भ होता है। 1857 की क्रााँणत के समय
ईदयपुर ररयासत में भी णर्द्रोह हुअ। यह रााँची के णर्द्रोह, सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय और रायपुर से भी
जुड़ा। हालााँदक आसकी चचाव कम ही है।
1852 में हत्या279 के ऄरोप में ईदयपुर शासक कल्याण लसह को दो भाइयों- धीरज लसह और
णशर्राज लसह सणहत, सजा दे, रााँची जेल में बंद कर ददया गया।280 ईदयपुर ररयासत का णर्लय सीधे ऄंग्रेज
प्रशासन के तहत कर, तहसीलदार की णनयुणि कर, ईसे प्रशासन का कायव दे ददया गया।
जैसा दक, उपर ईल्लेख अ चुका है दक, तब सरगुजा, ईदयपुर और पलामू ररयासतों हेतु एक
ऄनुणर्भाग भी कोरन्धा (कु समी) में बना, एक्स्रा ऄणसस्टेंट कमीश्नर को ऄनुणर्भागीय ऄणधकारी (S.D.O.)
बना, प्रशासन दे ददया गया था।
1857 की क्रााँणत के समय जब णर्श्वनाथ शाही और पंणडत गणपत राय के नेतृत्र् में णर्द्रोही दल
द्वारा रााँची कचहरी जला दी गइ। ऄणभलेख और काग़ज़ात कु एाँ में डाल ददए गए। खजाना लूट णलया गया।
जेल का दरर्ाज़ा तोड़ सभी कै दी ररहा कर ददए गए। ऄंग्रेज रााँची से पलायन कर गए। तब ईदयपुर के कै द
तीनो भाइ ररयासत र्ापस अ गए।281 र्े ऄपनी खोइ ररयासत पाना चाहते थे। जनता भी ईन्हें सहायता दे
रही थी। ईन्होंने तहसीलदार को भगा ददया। शासकीय खजाने के
500 जप्त कर णलए। ईदयपुर पर पुनः
सत्ता प्राप्त कर, ईदयपुर की स्र्तंत्रता घोणषत कर दी। यह घटना भी, ऄभी छत्तीसगढ़ के आणतहास में
महत्र्पूणव स्थान नहीं पा पाइ है।
छोटा नागपुर के स्थानापन्न कमीश्नर द्वारा ईदयपुर की जनता को चेतार्नी ज़ारी की गइ दक, र्े
ऄंग्रेज शासन के द्वारा णनयुि ऄणधकारीयों को छोड़ दकसी ऄन्य को राजस्र् और कर का भुगतान नहीं करें
तथा दकसी ऄन्य की सत्ता को भी नहीं स्र्ीकारें ।282
एक सन्य टुकड़ी ईदयपुर भेजी गइ। ईसका प्रणतरोध दकया गया। शासक कल्याण लसह और ईसका
एक भाइ धीरज लसह मारा गया।
ऄन्य साथी णर्द्रोणहयों द्वारा शेष बचे भाइ णशर्राज लसह को शासक णस्र्कार णलया गया और
प्रणतरोध ज़ारी रखा गया।283
कइ स्थानों पर णर्द्रोही गणतणर्णधयों के संचालन से ऄंग्रेज सेना को भी कइ मोचे एक साथ सम्हालने
पड़ते थे। आससे, ईनकी भी णस्थणत कमज़ोर हुइ।
ऄतः ईदयपुर के णर्द्रोह दमन हेतु रायगढ़ के गोंड़ शासक देर्नाथ लसह को कहा गया। रायगढ़ के
देर्नाथ लसह को कु छ ऄन्य लोगों का भी सहयोग णमला। णशर्राज लसह पकड़ णलया गया। देर्नाथ ने
सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय को भी पकड़ कर ऄंग्रेजों के हर्ाले दकया। णशर्राज लसह को मानर् र्ध और
ऄराजकता के अरोप284 में अजीर्न कालापानी कारार्स की सजा देकर ऄंडमान भेज ददया गया।285

279

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53

280

दद िेथ 1909,पृ.261

281

पार्षलयामेंरी पेपसव ररगार्डडग म्युटनीज़ आन आं णडया 1857-58 सं.-1,पृ.302, रायगढ़ णजला गज़ेरटयर 1979,पृ.53

282

रायगढ़ णजला गज़ेरटयर 1979,पृ.54

283पार्षलयामेंरी

पेपसव ररगार्डडग म्युटनीज़ आन आं णडया 1857-58 सं.-1,पृ.302

284

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53

285

दद िेथ,पृ.261; छतीसगढ़ फ््डेटरी स्टेट गज़ेरटयर,पृ.262

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ऄब ऄंग्रेजों द्वारा ईदयपुर ररयासत को 1860 में सरगुजा शासक आन्द्रजीत लसह के छोटे भाइ लाल
णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह देर् को ददया गया। र्ह प्रतापपुर में रहता था और र्हााँ का खरपोशदार था।
सरगुजा का र्ास्तणर्क णनयंत्रण और प्रबन्ध आसी के हाथ में था। जब सरगुजा के शासक ऄमर लसह थे और
ईन्होंने राज-काज की णजम्मेदारी छोटी रानी के पुत्र णर्न्धेश्वरी को दे रखी थी।286 ऄमर के ईत्तराणधकारी
बड़ी रानी के णर्णक्षप्त पुत्र आद्रजीत के काल में भी प्रबन्ध णर्न्धेश्वरी के हाथ में ही रहा था। ईसने सरगुजा
ररयासत के ईपजाउ और ऄच्छे भाग ऄपने और ऄपने ररश्तेदारों के नाम जणमन्दारी में कर ददए। ईदयपुर
का शासन ऄलग होने के बाद भी श्रीनगर, प्रतापपुर, लबझपुर और चलगली नाममात्र की रटकोली पर
ईनका खोरपोशदारी आलाका बना रहा। यह क्षेत्र णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह ने जीर्कोपाजवन हेतु ऄपने नाम
करा णलए थे। ईसने आन्द्रजीत के पुत्र जन्म के समय ऄंग्रेजों को कन्या जन्म की सूचना आस कारण से दी दक,
र्ह स्र्यं समय अने पर शासक बन सके । ईसने ऄंग्रेजों की क्राणन्त दमन हेतु पयावप्त मदद की थी। ईदयपुर
ईसका पुरस्कार था। आसने क्योंझर में क्रंणतकाररयों को दबाने में मदद की थी और आसे ऄंग्रेज सरकार द्वारा
सुनहरा कामदार झूला, एक हाथीं, एक स्र्णव घड़ी और जंज़ीर धन्यर्ाद के साथ दी गइ थी। बाद में आसे
राजा बहादुर और णसतारे णहन्द (C.S.I.) की ईपाणधयााँ भी दी गईं। ईसे योग्य, चतुर और राज कायव दक्ष
प्रशासक माना जाता था।287 र्ह 1876 में स्र्गवर्ासी हुअ।288
1857 के णर्द्रोह काल में लाल णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह देर् ऄंग्रेजों का प्रमुख सहयोगी था। आस पर
चचाव उपर सरगुजा ररयासत के णर्र्रण में की गयी है।

णचत्र 37 - ईदयपुर ररयासत का ध्र्ज

स्रोत-http://www.crwflags.com/fotw/flags/in-udaip.html

लाल णर्न्ध्येश्वरी प्रसाद लसह देर् का पुत्र धमव लसह देर् ऄगला शासक हुअ। आसने राबकोब ग्राम में
राजधानी बनाइ और ईसका नाम ऄपने नाम पर धमवजयगढ़ कर ददया। आसकी मृत्यु 1900 में हुइ।289
धमव लसह देर् का पुत्र चन्द्र शेखर प्रसाद लसह देर् ईत्तराणधकारी हुअ। र्ह तब 13 र्षव का था। ऄतः
राज्य कायव ऄंग्रेजों ने ऄपने हाथ में रखा। र्ह राजकु मार कालेज, रायपुर में णशक्षा ग्रहण कर रहा था। 1905
286

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.25

287

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53

288

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53-54

289

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.54

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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में यह ररयासत बंगाल प्रााँत की छोटा नागपुर कमीश्नरी से मध्य प्रााँत और बरार की छत्तीसगढ़ कमीश्वनरी में
की गइ। चन्द्र शेखर ने 1912 से राजकाज सम्हाला। आसे ऄंग्रेजों द्वारा, 1919 में, O.B.E. की ईपाणध दी
गइ। र्ह 39 र्षव की ईम्र में 1925 में, णनःसंतान परलोकर्ासी हुअ।290 आसने मृत्यु पूर्व सरगुजा शासक के
तृतीय पुत्र चन्द्रचूड़ प्रसाद लसह देर् को गोद णलया था।
चन्द्र शेखर प्रसाद लसह देर् की मृत्यु ईपरााँत ईसका दत्तक पुत्र चन्द्रचूड़ प्रसाद लसह देर्, जो सरगुजा
शासक का तृतीय पुत्र था, लसहासनारूढ़ हुअ। तब र्ह मात्र 5 र्षव का था।
ईदयपुर ररयासत में जी.के .णमअसव (1905-8), डी.अर.डैली (1908), ऄब्दुल गफू र खााँ (19089), बी.अर.बखले (1909-13 और 1921-23), रायबहादुर ऄनंत लाल (1913-18), शाह ज़ाणहर अलम
(1818-19), डी.एन.राय (1919-20), पी.बनजी (1920-21), गोरे लाल पाठक (1923-...) अदद दीर्ान
रहे।
ईदयपुर में छाल और बागबहार अदद जमीन्दाररयााँ थीं।
कौंर लोग यहााँ के मूल णनर्ासी माने जाते हैं। बागबहार जमीन्दार ईनके मुणखया माने जाते थे।291

जशपुर
जशपुर ररयासत को ऄंग्रेजों द्वारा प्रथम श्रेणी में रखा गया था। आसका क्षेत्रफल 1,948 र्गवमील था।
यह सरगुजा ररयासत के दणक्षण की ओर थी।
आसके ईत्तर और पणिम में सरगुजा ररयासत, पूर्व में रााँची णजला और दणक्षण में गााँगपुर, ईदयपुर
और रायगढ़ ररयासतें थीं।
आसकी राजधानी जशपुर नगर थी। आसे जगदीशपुर भी कहा जाता था।
1921 में जनसंख्या 154,153 थी और लगभग 570 ग्राम थे। 1927 में अय
338,977 और
व्यय
284,182 था।
छत्तीसगढ़ की सभी ररयासतों की तरह जशपुर ररयासत का भी प्राचीन आणतहास ज्ञात नहीं है।
लोड़म में एक गढ़ी है, पर ज्ञात नहीं है दक, कब और दकसके द्वारा बनर्ाइ गइ।
स्थानीय स्तर पर, ऄंणतम शासक र्ंश चौहान के ठीक पूर्व का शासक र्ंश डोम (या सोम) माना
जाता है।
यह कहा जाता है दक, सोम (या डोम) र्ंश का ऄंणतम शासक राय भान डोम था। तब बेने राजधानी
थी। आसे ही हटा कर सूयव र्ंश का चौहान सुजान राय जशपुर का शासक हुअ।292
यह चौहान राजपुताना के बााँसर्ाड़ा के थे। यह लोग पहले सोनपुर को ऄणधपत्य में लेने में सफल
हुए।293
यह कहा जाता है दक, सुजान राय का णपता जब सोनपुर का शासक था, तब ईसका देहांत ईस
समय हुअ, जब ज्येष्ठ पुत्र सुजान णशकार यात्रा पर था। लसहासन खाली नहीं छोड़ने की परम्परा के तहत
कणनष्ठ पुत्र को सत्ता पर बैठा ददया गया। जब र्ह णशकार से र्ापस अया तो कणनष्ठ भ्राता ने ईसे लसहासन

290

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.53

291

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.54 और 65

292

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.73

293

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.73

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देना चाहा। सुजान ने आंकार दकया और सन्यास ले र्न प्रस्थान कर गया। र्ह खुररया पहुाँचा। र्हााँ ईसने
पीणड़त जनता को डोम शासक के नाश का प्रयत्न करते पाया। ईसने ईन्हे नेतृत्र् दे ददया। राय डोम भान को
युि में हरा मार डाला और सत्ता पर स्र्यं काणबज हो गया।294 ईसने नारायनपुर को मुख्यालय बनाया था।
जशपुर भी कल्चुरी प्रभार् में रहा होगा तभी तो यह तदुपरांत मराठों के प्रभार् में अया। र्े ईन्हें
र्ार्षषक कर के रूप में 21 भैंसे (ईबारी) देते थे।295
1818 में मुढ़ोजी भोंसले ने यह ररयासत भी ऄंग्रेज सत्ता को सौंपी। तब यह क्षेत्र सरगुजा के ही
ऄधीन मानी जाती जाता था। ऄतः रटकोली, जो 1899 में
1,250 और 1921 में
2,000 थी,
सरगुजा के माध्यम से ही दी जाती थी। आसके ऄणतररि ऐसा और कोइ सम्बन्ध या कृ त्य सरगुजा के साथ
नहीं था, जो ऄधीनता दशावए।
जशपुर में यह कहा जाने लगा दक, पहले रटकोली पृथक ही दी जाती थी, परं तु 1826 में जशपुर के
ऄल्पव्यस्क शासक को सरगुजा णनमंणत्रत कर कै द दकया गया और ऄणधपत्य स्र्ीकारने पर ही छोड़ा गया।
तब से रटकोली सरगुजा के माध्यम से दी जाने लगी।296
सुजान राय के ईपरााँत छोटे राय देर्, रै या राय देर्, मकसूदन राय देर्, तेज राय देर्, भाधो लसह
देर्, ऄनूप लसह देर्, ऄमर लसह देर्, रण लसह देर्, द्वीप लसह देर्, णतल णर्क्रम लसह देर्, भीम कणव लसह देर्,
सुन्दर लसह देर्, डु मराज लसह देर्, रनजीत लसह देर् (मृत्यु लगभग 1813), राम लसह देर् (1826), प्रताप
नारायण लसह देर् बहादुर C.I.E (जन्म 1822, राज्यारोहण 24 ऄक्टूबर’1845, CIE ल.1890, मृत्यु
1900), णर्ष्णु प्रसाद लसह देर् बहादुर (जन्म 16 ददसम्बर’1864, राज्यारोहण ऄप्रैल’1900, मृत्यु 1924),
देर् शरण लसह देर् (1924-26) और णबजय भूषण लसह देर् (जन्म 11 जनर्री’1926, राज्यारोहण 8
फरर्री’1926) शासक हुए।297
1857 के णर्द्रोह काल के समय जशपुर भी प्रभाणर्त हुइ। आस पर णर्र्रण सरगुजा ररयासत पर
चचाव के समय ईल्लेणखत दकया गया है।

294

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.73 और 74

295

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.74

296

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.75

297

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.70, http://unconnect.net~zzhsoszy/ips/j/jashpur.html और Indian

Princes & Ruling Chiefs,P.1345

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णचत्र 38 - जशपुर ररयासत का ध्र्ज

स्रोत- http://flagspot.net/flags/in-jashp.html

जशपुर ररयासत में दीर्ान थे- दीर्ान लसह (1905-16), कृ ष्ण सेर्क (1916-20), डी.एन.घोष
(1920), एस.के .ऄगस्ती (1921), राय बहादुर ओपेन्द्र नाथ घोष (1921), नरे न्द्र चन्द्र णसन्हा (1921-22),
खााँ साहब ऄब्दुल ग़फ्फार खााँ (1922-...) अदद।298
यहााँ पहाड़ी कोरर्ा, ईरााँर् अदद प्रमुख जनजाणतयााँ हैं।
आस ररयासत में खुररया रानी का मणन्दर प्रणसि है। ईच्च सम भूणम के कोरर्ा, आसी से ऄपनी ईत्पणत
मानते हैं। यह णजस चट्टान पर बना है, र्ह दुगवम है। प्राचीन काल में आस कायव का दकया जाना ईच्च तकनीदक
योग्यता दशावता है। यहााँ स्थाणपत मूर्षत बुि जैसी प्रतीत होती है। यहााँ खुररया आलाके दार के गद्दी पर बैठते
समय ही पूजा होती है।299
ऄराव (28 ग्राम, रौणतया जाणत, नायक पद), कदकया (बगीचा) (पहाड़ी कोरर्ा आलाके दार की
ऄराजकता के कारण यह आलाका जप्त कर खालसा कर ददया गया था), खेतराडीह ( रौणतया, पद-बराआक),
खुररया (सबसे बड़ी, पद-दीर्ान, 79 ग्राम, कोरर्ा/हालााँदक र्े ऄपने को बघेल राजपूत और कल्चुररयों के
सम्बणन्ध बताते हैं) , फरसाबहार (8 ग्राम, गोंड़) अदद जमीन्दाररयााँ थीं।
इब नदी रानी झूला से णनकलती है। भारत में, ऄंग्रेजी में णलखे जाने पर, Ib ऄंग्रेजी शब्द की सबसे
छोटी संज्ञा है और आस हेतु ररकाड़व के रूप में दजव होती है।। आसमें स्र्णव पाया जाता था।

कोररया
कोररया छत्तीसगढ़ की सर्ावणधक प्रगणतशील ररयासत थी। ईद्योग-खनन, सहकाररता, णशक्षा,
णर्द्यालय भोजन, बाणलका णशक्षा, ररयासत का अर्षथक और ईपयोणगता सर्ेक्षण, र्न णर्कास, न्यूनतम
मजदूरी दर अदद कइ क्षेत्र थे, णजस पर छत्तीसगढ़ ने सोचना भी प्रारम्भ नहीं दकया था, और कोररया ईस
पर कायव करने लगा था।
ऄंग्रेजों द्वारा कोररया ररयासत को प्रथम श्रेणी में र्गीकृ त्त दकया गया था। आसका णर्स्तार 220 56/
से 230 48/ तक ईत्तरी ऄक्षााँश में और 810 56/ से 820 47/ तक पूर्ी देशांतर में था।300 ककव रे खा ररयासत
के सोनहत नामक स्थान से जाती थी और है।301
भारत में णर्लीन होते समय, कोररया ररयासत का क्षेत्रफल 1,647302 (या 1,631)303 र्गवमील
था। आसे 4,224 र्गव दकलोमीटर ईल्लेणखत दकया गया है304, जो 1,630.464 ही होता है, और यह 1,631
298

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.71

299

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.76

300

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.4

301

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.1

302

कोररया महल के ददर्ंगत महल ऄणधकारी सुखदेर् प्रसाद गुप्त का साक्षात्कार दद.17 ऄगस्त’1992 और डा.संजय ऄलंग-

कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.4 के ईिरण में ईल्लेणखत तथा Dr.Ram Chandra Sing deo-Socioeconomic History and Administrative set-up of Korea state,P.1

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के ऄणधक णनकट है। कोररया से चााँगभखार ररयासत के पृथक होने तक एकीकृ त कोररया का यह क्षेत्रफल
2,535 र्गवमील था।305
कोररया ररयासत की जनसंख्या 1848 में17,200 थी, जो 1941 में 126,874 हो गइ थी।
1872 में 225 ग्राम और 5,538 घर थे।306
1941 में अय

1,566,474 थी।307 1848 में अय ₤ 300 थीं, जो 1947-48 में

4,400,000 हो गइ थी।308
यहााँ के मूल णनर्ासी भुाँआहार और धनुहार हैं।
कोररया ररयासत के ईत्तर में रीर्ााँ ररयासत, पूर्व में णसरगुजा (सरगुजा) ररयासत, दणक्षण में मध्य
प्रााँत और बरार का णबलासपुर णजला और पणिम में चााँगभखार और रीर्ााँ ररयासत थी।309
कोररया ररयासत का ऄणधकांश भाग सघन र्नों और दुगवम पहाणड़यों से अच्छाददत था। आन र्नों में
कइ र्न जीर् थे। भारत और छत्तीसगढ़ राज्य का ऄंणतम चीता, कोररया ररयासत में णर्गत शताब्दी के चौथे
दशक (1930 से 1940) के मध्य मारा गया था और आस कृ त्य की अलोचना ख्यात पणक्षणर्द्
(Ornithologist और Naturalist) पद्म णर्भूषण डा.साणलम (मोइन्नूद्दीन ऄब्दुल) ऄली ने ऄपनी पुस्तक
‘द फाल अफ ए स्पैरो310’ में भी की।311 रामचन्द्र लसहदेर् आनका मारा जाना 1952 में बताते हैं और कहते
हैं दक, आन चीतों के माता-णपता के जीणर्त होने के कारण आन्हें ऄंणतम चीते का मारा जाना नहीं कहा जा
सकता। कहीं-कहीं यह णशकार दकए दो चीते भी दुलवभ काले चीते भी बताए जाते रहे हैं। चीता शब्द संस्कृ त
के णचत्र शब्द से बना है, जो चीते के णचत्तीदार होने से सम्बणन्धत है। ऄब चीता प्रजाणत भारत से णर्लुप्त हो
चुकी है। कणर्, शायर और प्रेमा पणत्रका के सम्पादक रामानुजलाल श्रीर्ास्तर् भी कोररया के दरबार में
पसवनल सेक्रेटरी रहे। आन्होंने ‘जंगल की कहाणनयााँ’ पुस्तक में यहााँ के णशकार का णर्र्रण ददया है।
आस ररयासत के चार भौगोणलक णर्भाग- श्रीनगर का मैदान, सोनहत का ईच्च भाग, पठार
(चााँगभखार का पणिम) और पहाड़ी (सोनहत क्षेत्र)- हो सकते हैं।
कोररया ररयासत की सबसे उाँची चोटी (3,370 फीट) देर्गढ़ थी।
आस ररयासत से णनकलने र्ाली हसदो नदी, णजसका ऄणधकााँश जल कोररया के प्रर्ाह तंत्र से ही
एकत्र होता है, पर कोरबा णजले में बने बााँध ही सम्पूणव छत्तीसगढ़ की मुख्य जीर्न रेखा हैं। आन्हीं पर पूरे
छत्तीसगढ़ का णर्द्युत्त ईत्पादन अणश्रत है और ईस पर छत्तीसगढ़। हसदो नाम को ईत्तर भारत के शासक
हषवदर्
े के नाम से भी जोड़ा जाता है।
कोररया में गंगा और महानदी बेणसन (द्रोणण) का प्रर्ाह तंत्र है। यह कु ल 6605.23 र्गव दकलोमीटर
में है, णजसमें से महानदी बेणसन का प्रर्ाह तंत्र 2,562.87 र्गव दकलोमीटर और गंगा बेणसन का 4,042.36
र्गव दकलोमीटर है।
303

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.94

304

http://uqconnect.net/~zzhsoszy/ips/k/korea.html

305

http://koreakumar.com/

306

W.W.Hanter द्वारा ईल्लेख

307

Indian Princes & Ruling Chiefs,P.1345

308

ररयासत के ऄणभलेख

309

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.94

310

Solim Ali-The Fall of a Sparrow (Oxford University Press. Delhi, 1985) (ISBN 1521895985)

311

कााँणतकु मार जैन कृ त बैकुण्ठपुर में बचपन, पृ.58 में ईद्धृत।

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कोररया में गंगा बेणसन से सम्बणन्धत गोबरी नदी पटना के ईत्तर से णनकलती है, जो रेण नदी से
णमलती है।312
गंगा बेणसन की ही गोपथ सोन की प्रमुख सहायक नदी है। यह कोररया के मेण्रा ग्राम से 10 मील
ईत्तर में णनकलती है। मेण्रा से हसदो णनकलती है, जो महानदी द्रोणी (बेणसन) की नदी है।313
महानदी बेणसन की हसदो नदी कोररया के मेण्रा ग्राम से णनकलती है। कोररया और कोरबा का
कोयला क्षेत्र और जााँजगीर का मैदान आसका भाग है। ईद्गम स्थल से णनकलकर यह मातवन (या माणतन) एर्ं
ईपरोड़ा की चट्टानों एर्ं सघन र्नाच्छाददत धरातल में प्रर्ेश करती है, जो कठघोरा के णनकट णस्थत मैदानी
भाग का ईत्तर-पूर्व दकनारा है।
हसदो कोररया से णनकलकर णबलासपुर णजले में प्रणर्ष्ट होने पर 29 र्ें दकलोमीटर पर गेज नदी
अकर णमलती है। गेज छत्तीसगढ़ी शब्द है। आसका अशय फे न या गेजा से है, जो झाग का पयावय है। हसदो से
झुमका और बणनया नददयााँ भी णमलती हैं। कोररया मुख्यालय के दोनों ऄलंग पर नददयााँ हैं। एक ऄलंग पर
गेज और दूसरे पर झुमका। झुमका पर झुमका बााँध है, णजसे रामानुज प्रताप सागर का नाम ददया गया है।
हसदो का ईत्तरी भाग संकरा एर्ं गहरा है। यह नदी चोर या चीर बालू के णलए भी जानी जाती है,
जो दलदली बालू है। बााँगो के समीप आसमें तीन नददयााँ अकर णमलती हैं। आस संगम के पिात नदी का तल
चौड़ा, रे तीला एर्ं दीपयुि हो गया है। हसदो एर्ं ईसकी सहायक नददयों के प्रर्ाह क्षेत्र के नीचे गोण्डर्ाना
का चट्टानी धरातल है। ऄतएर् चट्टानी संरचना की अयताकार सणन्धयों एर्ं णर्भागों का ऄनुसरण करने के
कारण यह साधारणतः अयताकार प्रर्ाह प्रणाली की रचना करती है। कु छ र्ृताकार प्रर्ाह प्रणाणलयााँ भी
बनती हैं। यह प्रौढ़ नदी णनष्कोण र्क्र भी बनाती है। यह नदी ईबड़-खाबड़ भी है।
हसदो की सहायक नददयााँ, बेणसन में ईतरते ही छोटे प्रपात बनाती हैं। कोररया णजले में आसका
प्रर्ाह क्षेत्र 3,710 र्गव दकलोमीटर है। यह कु ल प्रर्ाह का 17% है।
कोररया को ऄंग्रेजी में Korea णलखा जाता है।
छत्तीसगढ़ की ऄन्य ररयासतों की तरह कोररया का भी प्राचीन आणतहास ऄज्ञात है।
यह माना जाता है दक, भगर्ान राम र्नर्ास काल में कोररया अए थे। राम ने खरबत पहाड़ में
सीता हेतु गुफा बनाइ, णजसे सीतामढ़ी कहते हैं। सीता ने यहीं रह कर जनजाणतय के शणर्न्यास के तहत
खोपा (जूड़ा) बनाना सीखा। बााँस हस्तणशल्प से णनर्षमत जनजातीय कं घी- ककइ- करने पर के श ईसमें अ
जाते। सीता द्वारा आन्हें णनकाल कर फें क ददया जाता था। कहते हैं दक, सीता जी के थूकने से आस में प्राण अ
जाते थे। यह छोटे सााँप बने। आन्हें सीता की लट नाम ही ददया गया। ऄब सीता लट के बााँस खपची से नहीं
छू ने की परम्परा है। बााँस को रामजी का र्रदान है दक, तुम सदैर् सीता लट की रक्षा करोगे।
सीता से ही सीताफल, सीता (हल रे खा), सीता छीता (प्रसर् ईपरााँत ईदर पर बनी रे खाएाँ),
रमके ररया (लभड़ी ऄथावत राम णजससे के णल करते थे ईनकी सुन्दर ईन्गणलयों जैसी) अदद शब्द आस क्षेत्र में
प्रचणलत हुए।
आस पूरे प्रााँतर को ही राम के बनर्ास काल व्यतीत करने से भी जोड़ा जाता है। रामगढ़ को णचत्रकू ट
मानने का, कणनघम का, मत भी है।314
एकीकृ त कोररया ररयासत में भी कन्दरा मानर् के णचन्ह णमलते हैं। कन्दरा णचत्र णमलने से सुणनणित
होता है दक, र्ह यहााँ णनर्ास करने लगा था। ऄब यह चााँगभखार ररयासत में अता है।

312

ड़ा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.5

313

ड़ा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.5

314

कणनघम-अर्ककयालाणजकल सर्े ररपोटव अफ आणण्डया,भाग-8

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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सारणी 6 और णचत्र 39 - कोररया ररयासत के गुफा णचत्र स्थल और ईनके हस्त णनर्षमत णचत्र
स्रोत-छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)
क्र.
1

स्थान
कोह्बहुर

ररयासत
कोररया (भरतपुर
तहसील)

अकृ णतयााँ और णचत्र (णचत्र 39)
Geometric pattern

Human figures and geometrical
design. णच.39

2

मुरेलगढ़

कोररया (जनकपुर
तहसील)

कोररया ररयासत के ऄंणतम शासक र्ंश से ठीक पहले कोंच कोल जनजाणत के र्ंश का शासन था।
ईनकी राजधानी कोररयागढ़ पहाड़ी पर थी। यहााँ ऄभी भी कु छ भग्नार्शेष हैं। आसी से कोररया नाम अया।
कोररया पहाड़ ऄब णचरणमरी क्षेत्र में है और ईसके समीप कोररया कालरी के नाम से कोयला खनन
होता है। आसी कोररया गढ़ी के नाम से क्षेत्र और ररयासत का नाम कोररया पड़ा, णजसका मुख्यालय या
राजधानी, अगे चलकर बैकुण्ठपुर हुइ और ऄब यह णजला मुख्यालय है। कोररया शब्द कररया (काला) या
कोयला या कोल र्ंश के शब्द कोल से बने कोणलया शब्द से बना लगता है।
कोररया पहाड़ और णचरणमरी-कोरबा का क्षेत्र कोयला सम्पन्न है और यह कइ स्थानों पर सतह पर
ही है। आससे णमट्टी तक काली हो जाती है। आस कारण से मनेन्द्रगढ़-झगराखाण्ड क्षेत्र का पूर्व नाम कारीमाटी
था। णचरणमरी क्षेत्र में ऄत्यणधक कोयला खदानें है। आस कारण से ऄत्यणधक खुदाइ भी और ईससे बनी
ऄत्यणधक सीदढ़यााँ और मेड़।ें ऄतः छेड़ी-मेड़ी शब्द बना और ईससे क्रमशः चेड़ीमेड़ी और ईससे णचरणमरी।
णचरणमरी शब्द को सती-माइ से भी जोड़ा जाता है।
डा.हीरालाल, आस प्रााँतर को मगध राज्य का ऄंग मानते हैं।
दफर जैन खारर्ेल और सातर्ाहनों के प्रभार् क्षेत्र का णर्स्तार आस प्रााँतर तक माना जा सकता है।
समुद्र गुप्त द्वारा महाकोसल शासक महेन्द्र से क्षेत्र णर्णजत कर लेने में, यह प्रााँतर भी, ईसके ऄणधकार
क्षेत्र में सम्मणलत हो सकता है। गुप्त काल के महाकणर् कालीदास आस प्रााँतर में अना और मेघदूत की रचना
दकया जाना तो माना भी गया है।
दफर प्रणतहार लोगों का ऄणधकार माना जा सकता है। डा.हीरालाल राणजम णशललेख के अधार पर
रतनपुर के कल्चुरी जगपाल के काल में जमीन्दाररयों के ईदय को आंणगत करते हैं।
बगरोड़ी ग्राम में कन्दरा णशल्प णमला है। यहााँ गुफा में मूर्षतयााँ बनी हुइ हैं। णचड़णमड़ी (णचरणमरी)
खड़गर्ााँ जमीन्दारी में 1351 का णशला लेख पाया गया है। आसमें गोणर्न्द चूड़ देर् का ईल्लेख है।315
कै लाशपुर के समीप जोगीमठ में बुि प्रणतमा भी णमली है। चााँगी देर्ी (चााँगभखार) में कल्चुरी मूर्षतणशल्प है।
चााँगभखार के हरचौका ग्राम के समीप मर्इ में चट्टान काट कर बनाइ गइ कन्दराएाँ और प्रस्तर प्रणतमाएाँ हैं।
यहााँ सभी प्रस्तर खम्बों पर लेख ईत्त्कीणव हैं, णजसमें से दो कल्चुररयों के और एक चौहान के जान पड़ते हैं।
315

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.98

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कोररया का आणतहास भी मुगल और कल्चुरी काल से स्पष्ट होना प्रारम्भ होता है।
सीधी (मध्य प्रदेश) में बालन्द लोग शासक थे और बालन्द लोगों की सत्ता का णर्स्तार कोररया क्षेत्र
पर भी थी। ऄथावत कोररया पर बालन्द शासकों का राज था। आस मत का प्रणतपादक डाल्टन है।316 ऄब
ईनके र्ंशज सीधी के मड़र्ास में रहते हैं।
बालन्दों ने ही कोररया क्षेत्र में कु दरगढ़ (सरगुजा णजले में भइयाथान के समीप) की महामाया देर्ी
का मणन्दर बनर्ाया। आन्होंने सभी ग्रामों में तालाब बनर्ाने की ऄच्छी प्रथा की नींर् डाली। ईनके काल में
पटना अदद क्षेत्र में कइ ग्रामों में तालाब बनर्ा कर, जल संग्रहण को बढ़ार्ा दे, जल स्तर को ईन्नत बनाया
गया। ऄके ले पटना क्षेत्र में 160 से ऄणधक तालाब बनर्ाए गए। सोनहत के समीप णस्थत मेंड्रा ग्राम के ईत्तर
में बालन्द पहाड़ भी है।317
डाल्टन के ही ऄनुसार, बालन्द लोगों को आस क्षेत्र से जनजातीय कोंच कोल लोगों ने, जनजातीय गोंड़
जणमन्दारों को साथ लेकर, हटाया। बालन्द लोग सीधी की ओर धके ल ददए गए। तब भी, कोररया क्षेत्र का,
धुर ईत्तरी भाग ईनके प्रभार् क्षेत्र में बना रहा।
बालन्द लोगों के ईपरााँत कोंच कोल लोग सत्ता में अए। कोररया क्षेत्र का ऄणधकााँश भाग ईनके पास
था। कोंच कोल लोगों की ग्यारह पीदढ़यों ने कोररया क्षेत्र की सत्ता सम्हाली।
प्रारम्भ में कोंच कोल बचरा (पोंड़ी के समीप) में के णन्द्रत हुए। यहााँ भग्नार्शेष भी हैं। जैसेखण्डहरनुमा णमट्टी का टीला। आसे ईनके णनर्ास का स्थान माना जाता रहा है।318 तदुपरांत आनका मुख्यालय
या राजधानी कोररयागढ़ में रही, णजससे ररयासत का कोररया नाम प्रचणलत हुअ। यहााँ कु छ भग्नार्शेष भी
हैं। जैस-े तालाब, गढ़े हुए आमारती पत्थर और सीढ़ीदार कु अाँ।319 कोररयागढ़ णचल्मीगााँर् के पणिम में
था।320
ऄब, र्तवमान कोररया क्षेत्र का ऄणधकांश भाग और सम्पूणव दणक्षणी भाग कोंच कोलों और ईत्तर का
कु छ भाग बालन्द लोगों के प्रभार् क्षेत्र में था।
कोंच कोल लोगों को ही सत्ता से हटा कर कोररया ररयासत का ऄंणतम शासक र्ंश, जो ऄणग्नकु ल
क्षत्री या राजपूत कु ल का चौहान र्ंश था, सत्ता में अया।
तब तक सरगुजा क्षेत्र में खलीफा के अक्रमण और रतनपुर के कल्चुरी कल्याण साय के जहााँगीर
द्वारा पकड़े जाने321 से धीरे -धीरे रतनपुर की कल्चुरी सत्ता पतन की ओर बढ़ चली थी।
मुगलों द्वारा जब कल्याण साय को जमीन्दार से राजा की ईपाणध दी गइ तब सरगुजा क्षेत्र ईसके
प्रभार् क्षेत्र में सम्मणलत था।
ऄकबर के काल में यह क्षेत्र आलाहाबाद सूबे में था, जो ईसने महाकोसल के गोंड़ और रतनपुर के
कल्चुरी लोगों से प्राप्त दकया था। असफ खााँ प्रथम सूबेदार हुअ। ईसने आस क्षेत्र के मणन्दरों को भी तोड़ा।
मुग़लों का ऄणधकार आस क्षेत्र पर रहा और र्े रतनपुर के कल्चुररयों के माध्यम से आसे णनयंणत्रत
करते थे।
रतनपुर के कल्चुरी शासकों का प्रभार् कोररया क्षेत्र पर भी रहा, क्योंदक जब कल्चुरी लोगों से
भोंसलों को सत्ता गइ तो कोररया भी ईसमें सम्मणलत था और कोररया से भी चौथ र्सूली गइ थी।322
316

डाल्टन (1857 में रााँची कमीश्नरी का प्रशासक रहा था, णजसका ईल्लेख क्रााँणत काल के लेखन में, पूर्व पृष्ठों में सरगुजा पर

चचाव करते समय भी अया है। ईसने आस क्षेत्र का शोध कर पुस्तक णलखी।)
317

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.1

318

http://korea.nic.in/history.htm

319

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.6

320

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.96

321

Memoirs of Jahaangir,Vol. II ( Rodgers and Beveridge)

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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रतनपुर के कल्चुरी सत्ता के ऄर्सान काल में ही कोररया और सरगुजा जैसी ररयासतें या
जमीन्दाररयााँ ऄणस्तत्र् बनाने लगीं।323
आसी समय कोररया में चौहान लोग अए और आसका लाभ ईन्हें भी णमला। चौहान लोग पहले
सरगुजा अए और दफर कोररया।
मोहम्मद गोरी से पराणजत होने के ईपरााँत पृथ्र्ीराज चौहान के र्ंशज मैनपुरी (अगरा के समीप)
अ बसे थे।324 ददल्ली और ऄजमेर से हटने के ईपरााँत चौहान सत्ता मैनपुरी में के णन्द्रत हो गइ थी। यहााँ के
चौहान कु नबे से दो भाइ, जो दक, तत्काणलन मैनपुर शासक के भी कणजन भाइ कहे जाते हैं, थे- दलथम्मन
(दलयमन) शाही और धारामल शाही (धौरे ल साही)।325
1750 इ. के असपास दलथम्मन (दलयमन) शाही और धारामल शाही (धौरे ल साही) मैनपुरी से
र्ाराणसी, णमजावपुर, सीधी, सरगुजा, छोटा-नागपुर, सम्बलपुर अदद होते हुए जगन्नाथ पुरी तीथव यात्रा पर
गए।326 आनके साथ एक छोटी सन्य टुकड़ी भी थी। र्ापसी पर यह लोग सरगुजा की राजधानी णर्श्रामपुर में
जोड़ा तालाब के समीप रूके । बाद में णर्श्रामपुर का ही नाम ऄणम्बकापुर हुअ।
सरगुजा शासक मुख्यालय से ऄन्यत्र (सम्भर्तः रााँची) गया हुअ था। सरगुजा शासक की
ऄनुपणस्थणत ने कु छ स्थाणनय सरदरों को णर्द्रोह के णलए प्रेररत दकया। ईन्होंने शासक णनर्ास को घेर णलया।
णघर चुकी रानी ने ऄपने को ऄसहाय पाया, तो ऄन्य णर्कल्पों पर णर्चार दकया जाना स्र्भाणर्क था और
जब ईसे यह ज्ञात हुअ दक, दो चौहान भाइ ऄपनी छोटी टुकड़ी सणहत जोड़ा तालाब के समीप ड़ेरा ड़ाले
हुए हैं, तो ईसने ईन्हे राखी भेज कर रक्षा की ऄपेक्षा की। दोनों ने णर्द्रोही सरदरों को भगा ददया और रानी
को सुरणक्षत णनकाल णलया, परं तु ईनकी टुकड़ी के ऄणधकांश लोग खेत रहे।
सरगुजा शासक को मुख्यालय र्ापसी पर सब बातें ज्ञात हुईं। ईसने, धन्यर्ाद स्र्रूप, चौहान
भाइयों में से ज्येष्ठ दलथम्मन साही को णझलणमली आलाके की ज़ाग़ीर दे दी।327 तब णझलणमली क्षेत्र का कु छ
भाग बालन्द लोगों के ऄणधकार में भी था।
दोनों चौहान भाइ रे ण नदी तट पर के सके ला ग्राम में बसे।328 यह अर्श्यक भी था, क्योफक आस
बीच मैनपुरी से चौहानों को फारूखाबाद के सुल्तान ने आटार्ा की ओर खदेड़ ददया था और आनकी यहााँ से
र्ापसी ऄज्ञात भणर्ष्य की ओर होती। हालााँदक आटार्ा की ओर खदेड़े गए चौहान लोग पुनः मैनपुरी की
सत्ता र्ापस पाने में सफल भी हुए थे। सरगुजा अए आन भाइयों ने आटार्ा में रह रहे, आन सम्बणन्धयों को,
मैनपुरी र्ापस पाने में सहायता दी हो सकती है, क्योंदक आस बार की र्ापसी में ईनके साथ र्ह तलार्ारें भी
थीं, जो मोहम्मद गोरी से पृथ्र्ी राज चौहान की पराजय में खेत रहे दो सेनापणतयों- चामुण्ड राय और
कमन्द राय- की बताइ जाती हैं।329 यह तलर्ारें भइयाथान के दलथम्मन शाह के र्ंशजों के पास रहीं। आनके
पास पृथ्र्ीराज रासो की एक प्रणत भी है, जो 15 र्ीं शताब्दी में ईदयपुर मेर्ाड़ शासक द्वारा बनर्ाइ गइ
तीन प्रणतयों में से एक हो सकती है।330

322

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7-8

323

समर बहादुर लसह देर्-सरगुजा का एणतहाणसक पृष्ठ,पृ.20

324

नेत्र पाल लसह-मैनपुरी का र्ह खूनी ददन,पृ.54-55

325

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.5

326

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.6

327

http://korea.nic.in/history.htm

328

http://koreakumar.com/

329

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

330

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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चौहान दलथम्मन (दलयमन) शाही ने के सके ला में एक गढ़ी भी बनार्ाइ, णजसके भग्नार्शेष र्हााँ
हैं। र्ह लोग सरगुजा शासक को र्ार्षषक कर देते थे। ईन्हों ने बालन्द लोगों को आस क्षेत्र से हटा ददया और
ईन णर्द्रोही पखाड़ी लोगों का भी दमन करने में सफल रहे, जो सरगुजा शासक के णर्रोधी थे।331
ईन्नीसर्ीं शताब्दी के प्रथम भाग में चौहान र्ंशजों को, रानी की राखी के कारण, सरगुजा शासक
ऄमर लसह द्वारा भइया की ईपाणध दी गइ।332 णझलणमली क्षेत्र को भइया-स्थान कहा जाने लगा, जो ऄब
भइयाथान कहलाता है।333
दलथम्मन शाही का छोटा भाइ धारामल शाही (धौरे ल साही) कु छ समय के सके ला में रहा,
तदुपरांत र्हा ऄन्य क्षेत्रों की तलाश में ईदत्त हुअ और कोररया क्षेत्र में अया। र्ह कोररया के ऄंणतम शासक
र्ंश का प्रथम शासक हुअ। यह काल मुगल पतन और मराठा ईदय का था। कोररया में शुभंकर के रूप में
मछली णचन्ह का ईपयोग भी, चौहानों के , ईत्तर प्रदेश से अने का संकेत करता है, क्योफक यह शुभंकर ईस
क्षेत्र में व्यापक प्रयुि होता है।334
धारामल शाही (धौरे ल साही) ने सेना एकत्र की और कोररया पर धार्ा दकया। र्ह पहले णचरमी
ग्राम में रूका और दफर ईसने अक्रमण दकया। ईसने कोररया के कोंच कोल शासक को युि में पराणजत कर
कोररया की सत्ता हणथया ली। र्ह कु छ समय णचरमी में ही रहा, दफर ईसने नगर ग्राम को मुख्यालय
बनाया। अगे चलकर यह राजधानी क्रमशः रजौली और सोनहत के ईपरााँत बैकुंठपुर हुइ335, जहााँ अने के
पूर्व तत्कालीन शासक पररर्ार कु छ समय शासक पररर्ार धौरारटकु रा में भी रहा।
कोररया का धुर ईत्तरी भाग ऄभी भी सीधी के बालन्द लोगों के ऄणधकार में था। बाद में धारामल
शाही (धौरे ल साही) ने या ईसके र्ंशजों ने मुदरे गढ़ (चााँगभखार) और सम्भर्तः कोररयागढ़ से भी बालन्द
लोगों को हटाया। बालन्द कोररया क्षेत्र से पूरी तरह ईसके र्ंशजों द्वारा ही हटाए जा सके ।
धारामल को बड़े भाइ दलथम्मन ने कोररया का शासक बनने की औपचाररकता पूरी की और ईन्हें
12 ग्राम- बसर्ाही, माऔरा, बरघर, करी, णर्रारी, खड़गााँर्, ढ़ोढ़ा, देर्री, सचीपारा, बरपारा, मैमइ
(नरलसघपुर) और कोटा- रटकासी हक़ में ददए गए। अगे चल कर यह 12 ग्राम णर्र्ाद का कारण भी बने
और आन्हें र्ापस ले णलया गया। और अगे चलकर 26 ददसम्बर’1901 की सनद द्वारा णशर् मंगल लसह ने
पुनः णझलणमली को भेंट कर ददया।336
धारामल शाही (धौरे ल साही) के तीन पुत्र थे- देर् राज शाही, ऄधोराय देर् और राघोराय देर्।337
धारामल शाही (धौरे ल साही) का ज्येष्ठ पुत्र देर्राज शाही ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। र्ह
णनःसंतान मृत्त हुअ।
देर्राज साही के ईपरााँत ईसके छोटे भाइ ऄधो राय देर् का ज्येष्ट पुत्र नरलसह देर् ऄगला शासक
हुअ।
तदुपरांत ईत्तराणधकार णपता से पुत्र को जाता रहा। कोररया में ,आस ऄनुक्रम में, शासक हुए- जीत
राय देर्, सागर साही देर्, ऄफहार साही देर्, ज़हान साही देर्, सार्ल साही देर् और गजराज लसह देर्।338

331

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332

http://korea.nic.in/history.htm

333

http://koreakumar.com/

334

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

335

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.96

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डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.10

337

http://koreakumar.com/

338

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.7-8

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गजराज लसह देर् ने लसह देर् णलखने की परम्पारा डाली, जो लगातार चली। आसे ही सम्मान पूर्वक
लसह जू देर् कहा जाने लगा। गज राज लसह देर् णनःसंतान मृत्त हुअ।
गज राज लसह देर् की णनःसंतान मृत्यु से ऄधो राय देर् के सीधे र्ंशजों के शासन का ऄंत हो गया।
ऄब ऄगला शासक गरीब लसह देर् था, जो गज राज का भतीजा था। गरीब का जन्म नगर, जो
कोररया ररयासत का मुख्यालय (राजधानी) था, में 1745 में हुअ था। गरीब पूर्व शासक ज़हान शाही देर् के
कणनष्ठ पुत्र घासी राम देर् के पुत्र दलीप साही का ज्येष्ठ पुत्र था। आसका कायवकाल लम्बा और घटना प्रधान
था। आसी के काल में णनयंत्रण मराठों और ऄंग्रेजों को गया। आससे स्पष्ट होता है दक, पहले णनयंत्रण रतनपुर के
कल्चुरी लोगों का था।
गरीब लसह देर् के भाइ लाल मान लसह और जोरार्र लसह थे। गरीब ने भाइ लाल मान लसह को
चााँगभखार की ज़ाग़ीर दी, णजसका मुख्यालय भरतपुर था।
लगभग 1765 के असपास नागपुर की भोंसला मराठा सेना ने कोररया पर धार्ा दकया और चौथ
339
र्सूली। ईसने कु छ समय तक चौथ की णनयणमता बनाए रखी और दफर बंद कर दी। र्ह आन धार्ों से
बचने के णलए मुख्यालय (राजधानी) को पहले रजौली और दफर सोनहत ले गया, जो ऄपेक्षाकृ त्त उाँचाइ पर
थी। पर तब भी र्ह सुरणक्षत नहीं रहा।
ऄब तक रतनपुर में णबम्बाजी स्थाणपत हो चुका था।340 भोंसलों का धार्ा गुलाब खान के नेतृत्र् में,
1897 में सोनहत पर ही हुअ। पुनः चौथ देनी पड़ी। गुलाब खान नागपुर के मराठा भोंसलों का, रतनपुर में
पदस्थ, ऄणधकारी था। ईसके साथ 200 पैदल और 30 ऄश्वारोणहयों की टु कड़ी थी, णजनके पास तोड़ेदार
बन्दूके भी थीं। ईसे, आसके ऄणतररि, सरगुजा के शासक द्वारा सैन्य सहायता भी णमली थी, णजसमें पैदल
सैणनक और 80 ऄश्वारोही सैणनक सम्मणलत थे। गुलाब की सेना ने ऄन्दरूनी भागों में लूट भी की।
र्ाणपस होती हुइ गुलाब खान की भोंसला सेना पर लटमा ग्राम (सोनहत के समीप) में पटना के
(राज) गोंड़ जमीन्दार की सेना ने हमला दकया और मराठा सेना सरगुजा ररयासत की ओर चली गइ। पटना
जमीन्दारों ने आस णर्जय में जप्त तलर्ार और नगाड़े को प्रतीक स्र्रूप रखा।341
यहााँ पर मराठों का ईल्लेख भी अर्श्यक हो जाता है, क्योंदक ऄब छतीसगढ़ की ररयासतें मराठों के
ऄणधकार में अ गइ थीं और 1818 में ईन्हीं के माध्यम से ऄंग्रेज या णिरटश इस्ट आंणडया कम्पनी को गईं।
बरार के आलीचपुर के समीप देर्लगााँर् में 17 ददसम्बर’ 1803 को नागपुर के रघुजी भोंसले णद्वतीय
को सणन्ध करनी पड़ी। आसमें छत्तीसगढ़ आस रूप में प्रभाणर्त हुअ दक, भोंसलो को यह मनना पड़ा दक,
ईड़ीसा और छत्तीसगढ़ की फ्युणडएटरी ररयासतों से ऄंग्रेजों द्वारा की गइ सणन्धयों को भोंसले मान्यता देंगें।
आसमें कोररया स्र्भाणर्क रूप से अता था। भोंसलों की व्यर्हाररक स्र्तंत्रता जाती रही। 1803 की आस
सणन्ध से छत्तीसगढ़ भी तकनीदक रूप से ऄंग्रेज हाथों में चला गया, णजसमें कोररया भी सम्मणलत था। स्टुऄटव
एणलफफस्टन नागपुर में प्रथम रे णज़डेंट बनाया गया। ईसने नागपुर के पूर्व की ओर के भाग पर प्रभुसत्ता
छोड़ने हेतु रघुजी णद्वतीय पर दबार् बनाया और बदले की भार्ना से रघुजी द्वारा होल्करों से सम्पकव के
प्रयास को रोके रखा। ऄब लपडारीयों को भी बढ़ार्ा णमला।
ऄंग्रेजों ईड़ीसा पर ऄणधकार करने के पिात 1804 में छत्तीसगढ़ के ओर र्ास्तणर्क ऄणधकार हेतु
बढ़े। रघुजी छत्तीसगढ़ क्षेत्र और ईसकी अय हाथ से जाती देख घबरा गया। ईसने रे णज़डेंट स्टुऄटव से 1803
की सणन्ध की ईस कं णडका को समाप्त कराना चाहा, णजसका सम्बन्ध छत्तीसगढ़ से था। ईसकी एक नहीं सुनी
गइ। र्रन ईसे 9 जून’1804 को छत्तीसगढ़ की फ्युणडएटरी ररयासतों की सूची देकर 24 घंटे का समय ददया
गया दक, र्ह आसकी शतें माने या युि करे । ईसे 11 जून’1804 को मन्यता के हस्ताक्षर करने पड़े। सरगुजा,
339

http://korea.nic.in/history.htm

340

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.10

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सारं गढ़, खररयार अदद जैसी फ्युणडएटरी ररयासतों पर ऄग्रेजों का र्स्तणर्क ऄणधकार हो गया। कोररया भी
आसमें सम्मणलत था। नागपुर से लगभग साढ़े तीन लाख रूपयों की र्ार्षषक अय भी जाती रही।342
1803 की सणन्ध के स्थान पर 1806 में नइ सणन्ध होनी थी। आसमें ऄंग्रेजों द्वारा भोंसलों की यह
बात मानी जानी थी दक, ईन्हे छत्तीसगढ़ की फ्युणडएटरी ररयासतें र्ापस कर दी जाएाँ। आस बीच छत्तीसगढ़
की फ्युणडएटरी ररयासतों ने रघुजी णद्वतीय को लगान या कर भुगतान बन्द कर ददया था।343 जब रघुजी ने
ऄंग्रेजो से यह चाहा दक, र्े फ्युणडएटरी ररयासतों को भुगतान हेतु बाध्य करें तो ऄंग्रेजों ने आस बात को
मानने के णलए कू टनीणतज्ञयता के साथ शतव लगा दी दक, भोंसले सहायक सणन्ध कर, ऄंग्रज
े ों हेतु सहायक
सेना रखें।
ऄंग्रेजों ने रघुजी के कै द भाइ व्यंकोजी को भी छोड़ ददया। र्ह ईनसे युि हेतु ईदत्त हुअ और सेना
संगरठत करने लगा। ईसे रघुजी का समथवन नहीं णमला और र्ह दुःखी और नाराज़ हो काशी चला गया और
1811 में मृत्यु को प्राप्त हुअ। ऄब रघुजी व्यंकोजी के ऄव्यस्क पुत्र ऄप्पाजी को नागपुर ले अया। ईसे चााँदा
और छत्तीसगढ़ का सूबा भी णलख ददया।
आस बीच छत्तीसगढ़ की कइ फ्युणडएटरी ररयासतों यथा- सम्बलपुर (रानी रतन कुाँ ऄर), सारं गढ़
(णर्श्वनाथ लसह), रायगढ़ (जुझार लसह), सणि (ददर्ान लसह), बरगढ़ (रणजीत लसह), सोनपुर (रानी) अदद
ने गर्नवर जनरल को अर्ेदन ददया दक, र्े मराठों की ऄपेक्षा ऄंग्रेजों की ऄणधनता में रहना ऄणधक पसन्द
करें गे।344
रघुजी बणनया राजा कहलाता था। र्ह कं जूस था। सैणनकों तक से साहूकारी करता था। ईनके र्ेतन
से ब्याज काटता। र्ेतन देर से देता। युि अदद के पूर्व सैणनक बकाया भुगतान की मााँग के साथ धरने पर
बैठते तब भुगतान हो पाता था। 22 माचव’1816 को रघुजी का देहांत हुअ।
रघुजी के ईपरााँत ईसका पुत्र परसोजी नागपुर में शासक हुअ। र्ह लकर्ाग्रस्त, मन्दबुणि और
ऄन्धा प्राय था। ईसकी ईम्र 38 र्षव थी और र्ह ऄयोग्य था। मराठों का एक गुट ईसको बनाए रखना
चाहता था और दूसरा गुट व्यंकोजी के 30 र्षीय पुत्र ऄप्पा साहब को। ऄप्पा चालक और धूतव था। ईसे
रे णजडेंट जेंदकसन का समथवन भी हाणसल था। ईसने 6 जनर्री 1818 को ऄंग्रेजो से जो सणन्ध की ईसमें कइ
स्थानों के साथ सरगुजा और जशपुर की ररयासतों से ऄणधकार त्याग का ईल्लेख था।345 आसमें कोररया भी
था। ऄतः लगता है दक, कोररया को सरगुजा समूह से सम्बि माना गया। हालााँदक 1819 की प्रथम
कबूणलयत ही, कोररया से, पृथ्क से ही की गइ और चााँगभखार को कोररया के माध्यम से कर भुगतान योग्य
माना गया। ऄब सत्ता ऄंग्रेजों के ही हाथ अ गइ थी।
ऄप्पा की धूतवता से ऄंग्रेज भी ईससे दूर हो गए और र्ह कै द कर णलया गया। र्ह ऄंग्रेज कै द से भाग
पणिम में णछपता रहा और जोधपुर में 1829 में काल कलणर्त हुअ।

342

Nagpur Residency records

343

National Archives ,10May’1806,No.53

344

National Archives,1811

345

http://www.nagpuronline.com/history/appa.html

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रे जीडेंट जेंफकसन ने ऄप्पा की कै द के ईपरााँत रघुजी णद्वतीय की पुत्री बानु बाइ के पुत्र बाजीबा को
रघुजी तृतीय का नाम रख 26 जून’1818 को गद्दी सौंपी। ईसकी ऄव्यस्कता में रेजीडेंट ने सत्ता ऄपने हाथ
रखी। 1 ददसम्बर’ 1826 के दरबार में पढ़ी गइ सणन्ध की शतों के ऄनुसार छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ की
ररयासतों पर ऄंग्रेजों का पूणव ऄणधकार हो गया। आसमें कोररया भी था। हालााँदक गर्नवर जनरल बेंटटग ने आसे
नहीं माना और छत्तीसगढ़ क्षेत्र र्ापस कर ददया गया, पर तब तक सीमा ही नहीं सत्ता भी जाती रही।
जेंफकसन ने 29 ददसम्बर’1826 को ऄपना प्रभार कै प्टन हैणमल्टन को ददया। र्ह लगभग 10 र्षव
नागपुर में रहा और नागपुर को पूणवतः ऄंग्रेज शासन में ले जाने में सफल रहा और साथ ही खजाने को भरने
में भी।
1818 में छत्तीसगढ़ का प्रशासन सीधा ऄंग्रेजों के हाथ में अ गया। कै प्टन एडमंड छत्तीसगढ़ के
पहले सुपटरटेंडटें थे और सरगुजा, जशपुर और सम्बलपुर जैसी ररयासतों हेतु ऄन्य ऄणधकारी रफशीड था।
रफशीड को सरगुजा में हस्तक्षेप भी करना पड़ा था। ईसके ऄणधकार क्षेत्र में कोररया भी था। एडमंड कम
समय ही रहा। मराठा सूबा के ऄणधकार समाप्त हो गए। परगना, कमाणर्सदार अदद समाप्त कर ददए गए।
कनवल एग्न्यु (1818-1825) को छत्तीसगढ़ का सुपटरटेंडटें बनाया गया। मराठा शुकराना, रसद, बेगार,
र्सूली, दानाचारा अदद को बन्द दकया जाना प्रारम्भ हुअ। बेगार, शुकराना, रसद ऄन्य रूपों में पुनः लौटी।
रायपुर और रतनपुर में सेना छार्नी बनाइ गइ। ररयासतों को छेड़ा नहीं गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यालय
रतनपुर से हटा कर रायपुर ले अया गया।
1818 में कोररया भी भोंसलों के माध्यम से ऄंग्रेज इस्ट आणण्डया कम्पनी के ऄणधकार में अ गया।
कोररया के शासक गरीब लसह से 24 ददसम्बर’1819 को कबूणलयत सम्पाददत कराइ गइ। यह णनधावररत
हुअ दक, कोररया प्रणत र्षव

400/- का कर योगदान ईन्हे देगा346 और चााँगभखार कोररया की अणश्रत

जमीन्दारी के रूप में £ 38.12 sh. (

386/-) का र्ार्षषक कर कोररया के माध्यम से देगा। तब णसनाक

णसरगुजा मामलों का सुपटरटेंडटें था। आस तरह से चााँगभखार पृथक आकाइ के रूप में ईभरा, भले ही कोररया
की अणश्रत जमीन्दारी के रूप में। र्ह अगे चल कर पृथक ररयासत के रूप में मान्य हुअ, णजस पर कोररया
के चौहान र्ंश की ही एक शाखा शासक थी।
छत्तीसगढ़ णजल्हा, जो सूबे की तरह माना जाता था, छत्तीसगढ़ णजले के रूप में सामने अया।
छत्तीसगढ़ को अठ तहसीलों में बााँटा गया। ररयासतें यथार्त रहीं, णजसमें कोररया भी थी। तहसील के
लगान र्सूली ऄणधकारी णनयुि हुए और तहसीलदार कहलाए। आन्हें सीणमत फौज़दारी और दीर्ानी
ऄणधकार भी थे। ररयासतें, ईनके शासकों द्वारा, ऄंग्रेज सत्ता के ऄधीन, शाणसत होती रहीं। कोररया भी ईनमें
थी। एग्न्यु ने मराठा ऄणधकाररयों के लेखों और काग़ज़ातों का परीक्षण कराया और अर्श्यक कायवर्ाही की।
गरीब लसह देर् का ईत्तराणधकारी ईसका पुत्र ऄमोल लसह देर् हुअ। आसका जन्म 1785 में हुअ था।
र्ह जून’1828 में सत्ता में अया। आसका कायवकाल भी पयावप्त लम्बा था। र्ह कमजोर शासक था। ईसे कु छ
णर्णक्षप्त भी बताया जाता है। ईससे 1848 में, इस्ट आंणण्डया कम्पनी ने, समझौता नर्ीनीकृ त्त दकया। र्ार्षषक
कर
400/- ही बना रहा, पर ऄब चााँगभखार को पृथक कर ईससे सीधा कर णलया जाने लगा।

346

एटफकस-कलेक्शन अफ ररटीज़, आं गेज़मेंटस एण्ड सनदस,र्ाल्यूम-1,पृ.176

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ऄमोल का सत्ता पर णनयंत्रण भी कम था। ऄमोल की योग्य पणत्न रानी कदम कुाँ र्र ही र्ास्तणर्क
शासक थी। ऄंग्रेज शासन द्वारा ऄमोल को कड़ा णनदेश पत्र ज़ारी दकया गया और कु छ सीमाएाँ बना कर
चेतार्नी दी गइ थी।347
कदम कुाँ र्र राज अदेशों और पट्टों पर भी हस्ताक्षर करती थी। नगर जमीन्दारी पत्र को, मायके से
अए राज पंणड़त नान्हू णतर्ारी को, कदम द्वारा ही हस्ताक्षररत और प्रदत्त दकया गया था। यहााँ तक की
कम्पनी सत्ता भी, करठन समय पर, ईससे ही सीधा संर्ाद करती थी।
कदम कुाँ र्र की प्रशासणनक योग्यता ने ऄमोल की ऄयोग्यता को ढ़क णलया। ऐसा समय 1857 की
क्रााँणत का काल था, जब पलामू-सरगुजा ऄणधक ईद्वेणलत थे और णर्द्रोही लगातार सदक्रय बने हुए थे। आस
पर, उपर के पृष्ठों में, सरगुजा ररयासत के णर्र्रण के दौरान चचाव की गइ है। ऄंग्रेजों द्वारा सीधे कदम कुाँ र्र
को क्रााँणत दमन में सहायता हेतु णनदेशन देने की अर्श्यकता क्यों पड़ी, यह जानने के णलए ईसका पूर्व
णर्र्रण अर्श्यक हो जाता है।
ऄगस्त’1857 से ही क्रााँणत की अहट सुनाइ देने लगी थी। 1857 की क्रााँणत में भोजपुर क्षेत्र में
शाहबाद के जगदीशपुर के र्योर्ृि जमीन्दार कुाँ र्र लसह जनता के साथ थे और क्रााँणतकाररयों को संगरठत
कर नेतृत्र् कर रहे थे। आस हेतु, ईन्होंने, व्यापक भ्रमण भी दकया। यथा- शाहबाद, अरा, हजारीबाग,
पलामू(पलामउ), णमजावपुर, रीर्ा के कइ भाग, बााँदा, ऄर्ध के कइ भाग अदद। र्ह 26 ऄगस्त’ 1857 को
दानापुर और रामगढ़ छार्नी के णर्द्रोही सैणनको के साथ णमजावपुर के समीप णर्जयपुर पहुाँचा। यह लोग कु छ
ददन यहााँ रूके और णमजावपुर के दणक्षण भाग में, जमीन्दारों के णर्रूि चल रहे अक्रोश को ईत्प्रेररत दकया।
आससे जन प्रणतरोध तीव्र ही हुअ।348 ऄब कुाँ र्र लसह रीर्ा पहुाँचे। रीर्ा ररयासत के शासक ऄंग्रेजों के साथ
थे। ऄतः सहयोग नहीं णमला। तदुपरांत र्ह बााँदा, कालपी, कानपुर, लखनउ अदद की ओर बढ़ गया।
कुाँ र्र लसह के णर्जयगढ़ और कोररया, सरगुजा, चााँगभखार अदद ररयासतों के सीमा क्षेत्र के भ्रमण
से जागृणत की लहर ईत्पन्न हुइ।
कोररया और सरगुजा द्वारा ऄंग्रेजों को ऄश्वस्त करना ही था दक, र्े ररयासत से णर्द्रोणहयों को
अर्ागमन का मागव नहीं देंगें। हालााँदक, ऄगस्त 1857 के तृतीय सप्ताह तक कइ णर्द्रोही कोररया और
सरगुजा ररयासत से होकर डोरं ड़ (रामगढ़-रााँची) पहुाँच गए थे।349
1857 की क्रााँणत के समय सरगुजा, ईदयपुर (दोनों छत्तीसगढ़) और पलामू ररयासतें, एक
प्रशासणनक आकाइ के रूप में, प्रशासणनक देखरे ख के ऄधीन थीं। आस हेतु, 1852 से 1869 तक, करोन्धा ग्राम
(जमीरापाठ पर खजूरी के समीप, कु समी) में सब णडर्ीजनल अदफसर का कायावलय और अर्ास स्थाणपत
दकया गया था। आसे साईथ-र्ेस्ट फ्रंरटयर एजेंसी की संज्ञा दी गइ और करोन्धा को मुख्यालय बनाया

347

नीलमणी सेनापणत-गज़ेरटयर अफ आणण्डया-ईड़ीसा णडणस्रक्ट गज़ेरटयसव-सम्बलपुर,1971,पृ.176

348

जनरल एस.के .णसन्हा-र्ीर कुाँ र्र लसह-1857 के महान योिा,प्र.82

349

डा.व्ही.र्ीरोत्तम-झारखण्ड आणतहास और संस्कृ णत,पृ.287

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गया।350 1857 की क्रााँणत काल में सब णडर्जनल अदफसर का करोन्धा कायावलय महत्र्पूणव हो गया था।
करोन्धा ग्राम कु समी, छेछारी, महुअडांड, चैनपुर, रााँची मागव पर सरगुजा और पलामू की सीमा पर है। आस
क्षेत्र में णर्द्रोह की ऄर्णध लम्बी भी रही।
1859 की जनर्री तक पूरा सरगुजा-पलामू क्षेत्र णर्द्रोणहयों द्वारा ईद्वेणलत हो चुका था और लगभग
ईनके प्रभार् या णनयंत्रण में अ चुका था। आस क्षेत्र की जनजाणतयााँ- खैरर्ार, खैरर्ार-भोगता (बोगता), चेरो
अदद, आसमें ऄग्रणी थीं।
णर्द्रोही गुररल्ला युि कर रहे थे। हमला और लूट ईनका हणथयार था। कनवल डाल्टन की लचता
बढ़ती जा रही थी। र्ह रााँची क्षेत्र देख रहा था। कोररया भी झारखण्ड की छोटा नागपुर (रााँची) कमीश्नरी के
प्रभार् णर्स्तार का ही ऄंग था। ऄब कै प्टन नेशन भी पलामू अ गया था और र्हााँ पहले से डटे ग्राहम को
सहायता कर रहा था। णिगेणडयर डोग्लाज़ भी, शाहबाद में णर्द्रोणहयों से फाररग़ हो, पलामू अ गया था।
कनवल टनवर को कै मूर पहाणड़यों के मुहाने पर तैनात दकया गया।
ऄब डाल्टन द्वारा कै प्टन डेणर्स, सरगुजा प्रबन्धक णर्न्धेश्वरी प्रसाद लसह, कोररया की रानी कदम
कुाँ र्र (पणत्न ऄमोल लसह), जशपुर शासक प्रताप नारायण लसहदेर् को जनजातीय भोगता और ऄन्य बाणगयों
का दमन कर परास्त करने हेतु अदेणशत दकया गया।351 सरगुजा पर भी, आस समय शासक के स्थान पर
प्रबन्धक णर्न्धेश्वरी ही र्ास्तणर्क सत्ता सम्हाल रहा था। कोररया में ऄंग्रेजों ने यह सम्र्ाद भी सीधे कदम
कुाँ र्र से ही दकया गया था। ईसने ऄंग्रेज सत्ता को क्रााँणत से णनपटने में सहायता की।
णिगेणडयर डगलस और लेणफ्ट. ग्राहम के नेतृत्र् में कु छ ऄंग्रेज और णसक्ख सेना शाहपुर, चैनपुर,
लेस्लीगंज, गढ़र्ा और मणझगााँर् भेजी गइ। कइ भोगता, खैरर्ार अदद जनजातीय नेता पकड़ कर फााँसी पर
लटका ददए गए। कइ सघषव में मार डाले गए। कइ र्नों और पहाड़ो पर भाग गए। 8 से 23 फरर्री’1859
के दो सप्ताहों में, भोगता-खैरर्ार, णर्द्रोणहयों की णस्थणत खराब हो गइ और चेरो-भोगता गठबन्धन ऄंततः
टूट ही गया। माचव’1859 तक पलामू, सरगुजा, शाहाबाद, लोहरदगा के सभी प्रमुख णर्द्रोही नेता या तो
मार डाले गए या कै द कर णलए गए।352 सरगुजा-पलामू क्षेत्र में 1857 का णर्द्रोह लम्बा चलने के बाद
समाप्त हो गया। 353
1854 में नागपुर पूणवतः ऄंग्रेजों के हाथ में चला गया और भोंसला शासन समाप्त हो गया। कोररया
भी ईस प्रभार् में अया। ऄंग्रेज भोसला खजाने से 136 बैगों को भर ऄपने खजाने में ले गए, जानर्र णनलाम
दकए गए और अभूषण कलकत्ता भेज ददए गए, भोंसला लोगों को पेंशन दे दी गइ।

350

सोन के पानी का रं ग,प्र.244

351पर्षलयामेंट

पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव -8 और 9,पृ.80, पलामू णजला गज़ेरटयर 1961,पृ.79-80,

सरगुजा णजला गज़ेरटयर 1989,पृ.52
352

पर्षलयामेंट पेपसव ररगार्डडग म्युरटनीज आन आं णडया फरदर पेपसव -8,9;पृ.81

353

http://www.aksharparv.com/Vichar.asp?details=247 (र्ेद प्रकाश ऄग्रर्ाल का लेख आणतहासः1857 के स्र्तंत्रता

संग्राम में सरगुजांचल के महान योिा)

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13 माचव’1854 को रे णजडेंट मंसेल को ही नागपुर का कणमश्नर बनाया गया। 1854 से 1857 तक
कै प्टन एलेक्ज़ेंडर आणलयट छत्तीसगढ़ के णडप्टी कमीश्नर के प्रभार में रहा। ऄब बस्तर भी छत्तीसगढ़ में णमला
ददया गया। प्रशासणनक व्यर्स्था र्ह ही रही, जो एग्न्यु ने बनाइ थी।
1857 की क्रााँणत की समाणप्त के ईपरााँत इस्ट आणण्डया कम्पनी के शासन को समाप्त कर ददया गया।
ऄब णिरटश सरकार का सीधा शासन और णनयंत्रण स्थाणपत दकया गया। कोररया भी आस व्यर्स्था का ऄंग
रहा।
1861 में नइ प्रशासणनक आकाइ- सेंरल प्रोलर्स (मध्य प्रााँत)- का गठन दकया गया। नागपुर
राजधानी रही। आसमें छत्तीसगढ़ और बस्तर भी सम्मणलत थे। 1861 में ही छत्तीसगढ़ में णबलासपुर को नया
णजला भी बनाया गया।
ऄमोल लसह का णनधन ऄप्रैल’1864 में हुअ।354
ऄमोल लसह देर् के ईपरााँत ईसका ऄल्पव्यस्क णद्वतीय पुत्र प्राण लसह ऄप्रैल’1864 में लसहासनारूढ
हुअ। प्रथम पुत्र ईददत नारायण लसह को क्यों सत्ता नहीं णमली, यह ऄस्पष्ट है। हालााँदक अगे चल कर जब
ईत्तराणधकार णर्र्ाद ईठा तब ईसके बच्चों को भी सत्ता नहीं णमल पाइ थी। आन दोनों णबन्दुओं पर शोध
र्ााँणछत है।
र्ह ऄल्पव्यस्क था और रााँची में पढ़ रहा था। ऄतः सत्ता और शासन की देखरे ख का भार लाल भैरों
लसह को ददया गया। अगे चल कर ईसे आसका ऄत्यणधक लाभ हुअ। दफलहाल र्ह दीर्ान रहा। ईसके पास
ईदारी टप्पा की ज़ागीर थी।
व्यस्क होने पर, 18 र्षव की ईम्र में, प्राण लसह ने 1875 में स्र्यं सत्ता सम्हाल ली। ऄब, ऄंग्रेजों
द्वारा, ररयासत को कोटव अफ र्ाडव से मुि दकया गया। भैरों लसह दीर्ान बना रहा।
1874-75 में कोररया ररयासत की अय £ 815-12-9 और व्यय £ 801-2-3 था। तब 1 £ (पौण्ड़)
का मूल्य 10 रूपया था।355 बंजारा या लर्ण लोग ही अयात-णनयावत में रत थे। पड़ोसी क्षेत्रों से चराइ हेतु
पशु अते थे। ईनसे कर (खरचारी) णलया जाता था। हंटर ने अय-व्यय का पूणव णर्र्रण भी प्रस्तुत दकया
है।356
आस समय सोनहत मुख्यालय या राजधानी था। शासक का णनर्ास कच्ची णमट्टी की मोटी ददर्ारों से
बना था। सोनहत में एक जेल भी थी। प्राण लसह ऄपने णशकार कायों के णलए जाना गया। र्ह बाघ के
णशकार हेतु प्रणसि हुअ। ईसने सोनहत में पक्की ईंटों का अर्ास बनर्ाना प्रारम्भ दकया। आसने ही ऄष्ट धातु
की र्ह तोप बनर्ाइ, जो कोररया में र्ंशानुगत णनशान के रूप में रखी गइ और बाद में बैकुण्ठपुर के
रामानुज णर्लास महल में स्थाणपत की गइ। आस पर ही र्ह शुभंकर मछणलयााँ बनी हैं, णजन्हें मैनपुरी क्षेत्र के
पारम्पररक शुभंकर से जोड़ा जा सकता है। ईसके दो पुत्र हुए, परं तु स्माल-पाक्स के कारण जीणर्त नहीं रहे।
प्राण लसह 1897 में णनःसंतान मृत्त हुअ।
354

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.9

355

W.W.Hunter-Statistical record of Bengal, Vol.-17, P.217 to 219

356

W.W.Hunter-Statistical record of Bengal, Vol.-17, P.217 to 219

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कोररया में चौहान र्ंश के संस्थापक धारामल शाही (धौरेल साही) के ईत्तराणधकारी और ज्येष्ठ पुत्र
का र्ंश णनःसंतान मृत्त होने के कारण अगे नहीं चल पाया था। ऄतः ईसके णद्वतीय पुत्र ऄधो राय देर् का
र्ंश सत्ता में रहा था। ऄब धारामल शाही (धौरे ल साही) के णद्वतीय पुत्र ऄधो राय देर् के र्श का भी ऄंत हो
गया। हालााँदक कु छ लोग आससे ऄसहमत भी हैं। ऄब ईत्तराणधकार णर्र्ाद सामने अया। यह णर्र्ाद दो र्षव
तक चला। आसका लाभ दीर्ान भैरों लसह को हुअ।
प्राण लसह की णनःसंतान मृत्यु के ईपरााँत ईठे ईत्तराणधकार णर्र्ाद के कारण ऄंग्रेजों द्वारा राज्य का
प्रबन्ध पटना के (राज)गोंड़ जमीन्दार को 1897 में ददया गया।
पटना में आस (राज)गोंड़ जमीन्दार र्ंश की जमीन्दारी कोररया में चौहान र्ंश की सत्ता की स्थापना
के पूर्व से ही थी। र्े र्ररष्ठ और स्थाणपत जमीन्दार माने जाते थे। ईनका मानना है दक, र्ह लोग गढ़ामण्डला के प्रणसद्द शासक दलपत शाह के र्ंशज हैं और रानी दुगावर्ती की मुगलों से पराजय के ईपरााँत
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अए। र्ह लोग पहले देर्गढ़ अए और दफर रतनपुर और ईसके पिात पटना। सम्भर्तः
यह लोग कोंच कोल शासकों के भी जमीन्दार रहे। यह ईपजाउ क्षेत्र था और है। आसके 64 ग्राम आस
जमीन्दारी में थे। यह जमीन्दारी कोररया ररयासत को
650 की र्ार्षषक रटकोली और
5,000 का
र्ार्षषक ऄर्ाब देती थी।
पटना जमीन्दारी ने दो बार मराठों से युि कर ईन्हें आस क्षेत्र से बाहर भगाया था। एक युि का
णर्र्रण उपर अ चुका है, जो मराठा सेना की र्ापसी के समय, गरीब लसह के काल में सोनहत के समीप
लटमा ग्राम में हुइ थी और ईनसे नगाड़ा और तलर्ार छीन कर खदेड़ ददया गया था। यह दोनों णर्जय
णनशाणनयााँ पटना जमीन्दारी में रखी गईं। दूसरा युि पटना के ही समीप हुअ। मराठे पुनः भगाए गए। पटना
के समीप हुइ लड़ाइ का मैदान रण कहलाया। बाद में यहााँ बसा ग्राम रनइ कहा गया।
पटना में 1600 के असपास ठाकु र दामादेर् शाह ने आस (राज)गोंड़ जमीन्दारी की स्थापना की थी।
ईसके पिात ठाकु र ऄन्नू लसह, ठा.दकनार लसह, ठा.खररयास लसह, ठा.णगरर्र लसह, ठा.राम लसह,
ठा.पुरषोत्तम लसह, दीर्ान ऄचल लसह, दीर्ान धीर शाह, ठा.लगन शाह, दीर्ान दुरजन शाह, दीर्ान
दररयो लसह, दीर्ान जीत राज लसह, दीर्ान बाल मुकुन्द लसह, दीर्ान कृ ष्ण चन्द्र प्रताप लसह (णनःसंतान
मृत्त-1918), दीर्ान जगदीश प्रसाद लसह (भाइ) और लाल गोपाल शरण लसह (मृत्यु-1948) जमीन्दार रहे।
पटना जमीन्दारी के कु नबे के दाम देर् शाह के दो पुत्र- लाल रूद्र प्रताप लसह और लाल चन्द्र प्रताप
लसह- सरगुजा ररयासत में बड़ी जमीन्दाररयों रमकोला (350 ग्राम) और णपल्खा (250 ग्राम) के ज़ागीरदार
रहे।
पटना के कु छ जमीन्दार ररयासत के दीर्ान भी रहे।
कोररया ररयासत के ईत्तराणधकार णर्र्ाद काल में पटना के जमीन्दार, 1897 से 1899 तक,
कोररया के शासक रहे।
(राज)गोड़ों के अने के पूर्व पटना जमीन्दारी क्षेत्र पर बालन्द लोगों का णनयंत्रण था। ईन्होंने ग्रामग्राम में तालाब बनर्ाए। आसकी संख्या 106 से भी ऄणधक थी।
कोररया ररयासत का यह ईत्तराणधकार णर्र्ाद बंगाल प्रााँत की छोटा नागपुर(रााँची) कमीश्नरी में
चला। आसका पूणव ऄध्ययन र्हााँ ईपलब्ध कोटव फाइलों से दकया जा सकता है।
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यहााँ भैरों लसह का ईल्लेख अर्श्यक है, जो णनःसंतान मृत्त प्राण लसह का दीर्ान था और ईसकी
ऄव्यस्कता और णशक्षा काल में ररयासत का प्रबन्धक रह चुका था। र्ह ईदारी टप्पा का ज़ागीरदार था और
शासक र्ंश का सम्बन्धी था।357
भैरों लसह, चौहान र्ंश के कोररया में संस्थापक धारामल शाही (धौरे ल साही) के तृतीय पुत्र, लाल
राघो राय देर् का र्ंशज था। लाल राघो देर् राय के र्ंशज क्रमशः लाल माधो राय देर्, लाल दान (या र्ान)
लसह देर्, लाल थान लसह देर् थे। थान के दो पुत्र थे- लाल कामासुर राय देर् और लाल दखगार देर्। णद्वतीय
दखगार से तीन पुत्र थे- लाल ऄजमेर शाह, लाल प्रताप शाह और लाल लल्लू गारू। णद्वतीय प्रताप से दो पुत्र
थे- लाल लगन शाह और जय गारू। आस जय गारू से लाल सरर्र लसह, लाल ऄजीत लसह से भैरों लसह तक
र्ंश अया। आस तरह दीर्ान भैरों लसह चौहान धारामल शाही (धौरे ल साही) के तृतीय पुत्र राघो देर् राय
का र्ंशज था।358
ऄभी णनःसंतान मृत्त प्राण लसह के णपता ऄमोल लसह के एक भाइ लाल मान लसह चााँगभखार चले
गए थे और ईनके र्ंशज र्हााँ की सत्ता पर थे। ऄमोल लसह के तीसरे भाइ लाल जोरार्र लसह के र्ंशज यहााँ
थे। पर र्े पीछे रह गए। सबसे बढ़कर यह दक, आसी णनःसंतान मृत्त प्राण लसह के भाइ ईददत नारायण लसह के
पुत्र भी दर दकनार कर ददए गए। ऄब र्े र्ंशार्ली सूणच तक में सम्मणलत नहीं हैं। ज्येष्ठ होने बार्जूद ईददत
और ईत्तराणधकार में ईसके पुत्र को सता नहीं णमलने का क्या कारण था? आस पर शोध होना शेष है। आसका
ईणचत स्रोत्त रााँची कमीशनरी की ईत्तराणधकार णर्र्ाद के मुकद्दमें की फाइल हो सकती है।
कोररया की गद्दी का दार्ा कइ लोगों ने प्रस्तुत दकया। यह दार्ेदार कौन-कौन थे, ऄभी स्पष्ट नहीं है,
जो दक ईि नणस्त के ऄध्ययन से ही सामने अ पाएगा। यह दार्ा दकसी न दकसी के पक्ष में तो जाना ही था।
णनःसन्देह भैरों लसह, दीर्ान होने के कारण, सभी चीजों के णनकट था।
भैरों लसह की एक बहन बाइ देर् कुाँ र्र और तीन पुत्र- लाल चन्द्र भान लसह, लाल ईदय भान लसह
और लाल णशर् मंगल लसह- थे। प्रथम दो पहले ही काल कणल्र्त हो चुके थे। चन्द्र भान णनःसंतान मृत्त हुअ
था और ईदय भान की तीन पुणत्रयााँ थीं। भैरों लसह की बहन देर् कुाँ र्र णमजावपुर में ब्याहने के ईपरााँत णर्धर्ा
थी और ऄपने भतीजों के साथ रहती थी। र्ह साहसी पर ककव शा और चलाक थी।
ऄंग्रेजों की हुकू मत में कोररया ररयासत बंगाल प्रााँत के झारखण्ड की छोटा (चुरटया) नागपुर
कमीश्नरी के तहत अती थी। छोटा (चुरटया) नागपुर कमीश्नरी का मुख्यालय रााँची में था। कोररया, सरगुजा,
चााँगभखार, ईदयपुर (धमवजयगढ़), जशपुर, गंगपुर और बोनइ की ररयासतें चुरटया(या छोटा)नागपुर की
फ्युडटे री स्टेट कही जाती थीं। रााँची में कमीश्नरी का पाणलरटकल णर्भाग आनके मामले देखता था। यहााँ ही
गद्दी की दार्ेदारी का र्ाद चला। सभी दार्ेदारों को र्हााँ जाकर ऄपना दार्ा प्रस्तुत करना पड़ा।
ददर्ान भैरों लसह का कणनष्ठ पुत्र णशर् मंगल लसह भी दार्ेदार था। ईसकी चतुर-चलाक बुअ बाइ
देर् कुाँ र्र, डोली में करठन यात्रा कर, स्र्यं ईत्तराणधकार तकव प्रस्तुणत हेतु रााँची गइ। ईसके साथ जुन्दरा
महतो, ठाकु र महतो, राजा राम णतर्ारी अदद भी गए। रााँची में, मणहला होने के कारण, पाणलरटकल एजेंट
ने देर् कुाँ र्र से णमलने और ईसके द्वार तकव प्रस्तुत दकए जाने की मांग से आंकार कर ददया। तब देर् ने यह तकव
प्रस्तुत कर, पाणलरटकल एजेंट को ईत्तराणधकार तकव श्रर्ण हेतु बाध्य दकया दक, जब आंग्लैंड की शाणसका एक
357

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.96

358

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea

state,P.9,14,15 and 280

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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मणहला हो सकती है, तो र्ह कोइ कारण नहीं देखती दक, एक मणहला को न्यायलय में तकव प्रस्तुत करने से
रोका जाए। आस तकव के अगे पाणलरटकल एजेंट को झुकना पड़ा। ऄतः णशर् मंगल लसह की ओर से बुअ बाइ
देर् कुाँ र्र ने तकव प्रस्तुत दकए। दीर्ान का पुत्र होना प्रमुख तकव था। आस कारण से सुसंगत ऄणभलेखों तक देर्
की पहुाँच ऄन्य दार्ेदारों से ऄणधक थी। ऄन्य दार्ेदारों ने भी तकव प्रस्तुत दकए।
ऄंग्रेजों ने णशर् मंगल लसह के तकव णस्र्कार दकए और ईसे 1899 में कोररया का शासक घोणषत कर
ददया। रााँची के पाणलरटकल एजेंट के अदेश को कोलकाता णस्थत गर्नवर जनरल के एजेंट, जो बंगाल की
फ्युडटे री स्टेट का प्रभारी था, से पुष्ट कराया जाना अर्श्यक था। ऄतः पुनः बाइ देर् कुाँ र्र राजा राम
णतर्ारी को साथ लेकर कोलकाता भी गईं और अदेश कं फमव करा कर र्ापस अईं।
बाइ देर् कुाँ र्र ने 1899 में कोलकाता से र्ापस लौट कर मुख्यालय या राजधानी सोनहत में णशर्
मंगल लसह का राज णतलक दकया। हालााँदक, रघुर्ीर प्रसाद णलखते हैं दक, धारमल शाह का र्ंश समाप्त हो
गया।359 ऄंग्रेजों द्वारा ईसे ईसी र्षव सनद भी दे दी गइ। ईसे औपचाररक तौर पर कोररया का राजा और
शासक णस्र्कार कर णलया गया। र्ार्षषक कर
400/- ही रहा।
1903 में मध्य प्रााँत में बरार भी णमला ददया गया और प्रााँत का नाम सेंरल प्रोलर्स एण्ड बेरार
(C.P. & Berara-मध्य प्रााँत और बरार) कर ददया गया।
1905 में बंगाल का णर्भाजन (बंग-भंग) हुअ। आससे कोररया भी प्रभाणर्त हुअ। सम्बलपुर और
जबलपुर को छत्तीसगढ़ से ऄलग कर ददया गया। सम्बलपुर का प्रााँत भी बदल गया और ईसे ईणड़या भाषी
होने के कारण बंगाल में णमलाया गया। बंगाल प्रााँत के छोटा नागपुर क्षेत्र ऄथावत तत्कालीन रााँची कमीश्नरी
की पााँच ररयासतें 16 ऄक्टूबर 1905 को छत्तीसगढ़ में सम्मणलत की गईं।360 यह णसरगुजा समूह की
ररयासतें कहलाती थीं, क्योंदक ऐसा माना जाता था दक, बहुत पहले आन पर सरगुजा ररयासत का ही
ऄणधपत्य रहा था। यह ररयासतें ऄभी तक बंगाल प्रााँत में थीं। यह थीं- सरगुजा, ईदयपुर, जशपुर, कोररया
और चााँगभखार। आसी के साथ ऄन्य पााँच ररयासतें भी थीं। यह ऄन्य पााँच ररयासतें ईणड़या भाषी होने के
कारण बंगाल प्रााँत में णमलाईं गईं। यह थीं- कालीहााँड़ी, पटना, रे ड़ाखोल, बामड़ा और सोनपुर।
हालााँदक छात्तीसगढ़ क्षेत्र में ररयासतों की संख्या 14 ही बनी रही। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में, ऄब, 14
ररयासतें यह थीं- सरगुजा, जशपुर, कोररया, चााँगभखार, रायगढ़, सारं गढ़, सणि, (राज)नााँदगााँर्,
छु इखदान (सभी 9 प्रथम श्रेणी में र्गीकृ त थीं), बस्तर, कााँकेर, कर्धाव, ईदयपुर, और खैरागढ़ (यह 5
णद्वतीय श्रेणी में र्गीकृ त थीं)।361 आनका क्षेत्रफल 31,188 र्गवमील और जनसंख्या 1,631,140 थी। बस्तर
सबसे बड़ी और सणि सबसे छोटी थी। आनका क्षेत्रफल क्रमशः 13,072 और 138 र्गवमील था। यह सभी भी
छत्तीसगढ़ में सम्मणलत थीं और ऄंग्रेज सत्ता को
243,000/- लगान (कर या रटकोली) देती थीं। यह
ररयासतें कल्चुरी प्रशासणनक आकाइ गढ़ (तहसील जैसी आकाइ, जो कल्चुरी सीधे शासन का भाग थी। आसमें
ररयासतों के भाग नहीं थे।) का भाग नहीं रहीं थीं और आसी कारण से ईसके नामकरण और भार्ना से भी
ऄलग थीं।
1899 की सनद को कु छ संशोधनों के साथ पुनः 1905 में ददया गया। यह संशोधन बंगाल से मध्य
प्रााँत में अने के कारण अर्श्यक हो गए थे। ऄब र्ार्षषक रटकोली या कर, 20 र्षों हेत,ु
500/- कर

359

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड झनकार,पृ.92 की पाद रटप्पणी और पृ.96

360

Marten-Report of the administration of C.P. & Berar,1910-11

361

C.P.Directory,1941 ( देखें मानणचत्र क्रमांक-15)

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ददया गया। ऄब कोररया ररयासत सेंरल प्रोलर्स और बरार की रायपुर णस्थत छत्तीसगढ़ कमीश्नरी के रायपुर
णस्थत पाणलरटकल एजेंट के ऄधीन अ गइ।
1900 में णशर् मंगल लसह ने राजधानी को सोनहत से बैकुण्ठपुर ले अया गया। ईत्तराणधकार के
ऄन्य दार्ेदार भी सोनहत में रहते थे। ऄतः ईन्हें दूर रखना बेहतर समझा जाना ही था। सोनहत के राजारानी का देहांत 1918 में हुअ और तब ही ईनके ऄधीन ग्रामों को पुनः ररयासत के ऄधीन लाया गया और
कर र्सूला जा सका।362 आन दोनों का णर्र्रण दफलहाल ईपल्ब्ध नहीं है।
बैकुण्ठपुर अने के पूर्व कु छ समय धौरारटकु रा में गढ़ी बना कर णनर्ास दकया गया। आन्हों ने महल
णनमावण का स्थान चयन कर ईसके सामने जोड़ा (दो) तालाब और एक मणन्दर बनर्ाया। यह सब कायव देर्
कुाँ र्र द्वारा ज्योणतष अधार पर दकया और कराया गया। आस समय र्ह ही शाणसका थी। धौरारटकु रा से
महल ज्योणतष द्वारा चयणनत स्थान पर लाया गया।
बाइ देर् कुाँ र्र चालाक थी। र्ह लोगों को पहचानने में माणहर थी। ज्योणतष जानती थी। र्ह कु शल
राजनीणतज्ञ और कू टनीणतज्ञ भी थी। र्ह धौरारटकु रा, पचरा और बस्ती ग्रामों में रूकी रही। ईसे तृतीय श्रेणी
मणजस्रेट के ऄणधकार ददए गए। आस तरह र्ह राज्य की ऄणधकारी (Officer) भी बनी। र्ह णशर् मंगल को
राज्य कायव में सहायता करती थी। ईसका णनधन 1905 में हुअ। आसे ही बाइ साहब कहा जाता था। र्ह
प्रजा र्ात्सल्य का भार् रखती थी। ऄतः एक तालाब बनर्ाया गया और ईसका नाम बाइ सागर रखा गया।
ऄब आसे बेच कर व्यार्साणयक स्थल में बदल ददया गया है।
णशर्मंगल ने ददर्ंगत भाइ लाल चन्द्रभान की तीनों कन्याओं का णर्र्ाह रीर्ााँ ररयासत की कै थहा,
चचाइ और कु अाँ जागीरदाररयों में दकए। ईनके दोनों बड़े भाइ- लाल चन्द्र भान और लाल ईदय भान
णमजावपुर (सन्युि प्रााँत) में ब्याहे थे। णशर् मंगल का णर्र्ाह सन्युि प्रााँत में रायबरे ली णजले में ईचेहरा के
समीप णस्थत फ़रीदपुर ग्राम में हुअ।
णशर् मंगल के तीन पुत्र हुए- 1901 में रामानुज प्रताप लसह देर्, 1906 में रामशरण लसह देर् और
1908 में हररशरण लसह देर्।
ठे केदारी की गौंटीया लगान र्सूली प्रचणलत रही। उाँची बोली लगाने र्ाला गौंरटया बन सकता था।
1905 में लगभग अय
18,500/- थी। आसमें भू राजस्र्
6,000 और र्न राजस्र्
5,000 था। व्यय
17,500 था।
1908 में अय
38,117/- और व्यय
42,968/- था।
णशर् मंगल लसह देर् के दीर्ान मुर्षतजा हुसैन (1901-07) रहे। तदुपरांत गोरे लाल पाठक (190716) दीर्ान हुए। नर्म्बर’1908 में ईनके साथ रायपुर पाणलरटकल एजेंट से णमलने की यात्रा से लौटने के
ईपरााँत रूग्ण होने पर डा.णबहारी लाल की णचदकत्सकीय देख रे ख में रहे, परंतु ईसी ददन ऄथावत 18
नर्म्बर’1909 को स्र्गव णसधार गए। शरीर नीला पड़ जाने के कारण णर्ष ददए जाने की अशंका भी की
गइ, पर पुणष्ट नहीं हो पाइ। ऄन्य णबमाररय़ों से भी ऐसा हो सकता है, यह माना गया।
णशर् मंगल लसह का ज्येष्ठ पुत्र रामानुज प्रताप लसह देर् ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। र्ह 18
नर्म्बर’ 1909 को ही लसहासनारूढ़ कर ददया गया, तब र्ह 8 र्षव का था। ईसका जन्म 18 नर्म्बर’1901
को हुअ था। ईसने बैकुण्ठपुर (प्रारणम्भक णशक्षा); राजकु मार कालेज, रायपुर (ददसम्बर’1911-1920)
(तदुपरांत णर्र्ाह) और Muir सेंरल कालेज, आलाहाबाद (आलाहाबाद णर्श्वणर्द्यालय) (1922-1924) से
णशक्षा पाइ और 1924 में स्नातक हुए।

362

सेंरल प्रालर्स ररपोटव

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आलाहाबाद में डी.पी.णमश्र, ईमा शंकर दीणक्षत, राम कु मार र्माव (साणहत्यकार) ईनके साथ थे। र्ह
पंणड़त मदन मोहन मालर्ीय के संरक्षण में र्हााँ थे।363 ईन्होंने लन्दन से M.R.A.S. की ईपाणध भी ली।364
र्ह दक्रके ट, बाडी णबलल्डग और शास्त्रीय संगीत की रूणच हेतु भी जाने गए। ईन्होंने सी.के .नायडू अदद के
साथ भी दक्रके ट खेली।
रामानुज की ऄल्पव्यस्कता के कारण ऄंग्रेज सरकार ने णनयंत्रण ऄपने हाथ में रखा। दीर्ान गोरे
लाल पाठक को ररयासत का ऄधीक्षक (सुपटरटेंडटें ) बना सत्ता का प्रभार और ऄल्पव्यस्क शासक की संरक्षता
दी गइ। यह व्यर्स्था कोटव अफ र्ाडव कही गइ। 1909 से 1925 तक कोररया ररयासत कोटव अफ र्ाडव
व्यर्स्था के ऄधीन रही। णशर् मंगल लसह की णर्धर्ा भी राज कायव की ज़ानकारी लेने को प्रणत पखर्ाड़े
दीर्ान से णमलने लगी।
कोटव अफ र्ाडव व्यर्स्था के ऄधीन गोरे लाल पाठक 1907 से 1916 तक दीर्ान रहे। यह कायवकाल
ढीलाढाला ही रहा। रामानुज ने 13 ददसम्बर’1912 के चीफ कमीश्नर द्वारा नागपुर में अयोणजत ईपाणध
णर्तरण दरबार में भाग णलया।365
तदुपरांत 1916 से 1918 तक पंणडत गंगादीन शुक्ला सुपटरटेंडटें रहे। र्ह योग्य और इमानदार
प्रशासक था। प्रथम णर्श्व युि के दौरान लोगों की अय भी बढ़ी।
आसके पिात 1918 से 1925 तक रघुर्ीर प्रसाद र्माव सुपटरटेंडटें रहे। र्ह णर्कास कायों और ऄथव
व्यर्स्था पर ध्यान देने र्ाला णसि हुअ। ईसने ऄपनी पत्नी प्रेमा के नाम पर गेज़ नदी तट पर बैकुण्ठपुर
मुख्यालय में बाग़, कु ण्ड और णशर् मणन्दर बनर्ाया। यह बाग़ प्रेमाबाग़ और कु ण्ड प्रेमा कु ण्ड कहलाया। गेज
का ऄथव झाग या फे न से है, णजसे गेजा कहा जाता है। आसी रघुर्ीर प्रसाद ने णसरगुजा समूह की ररयासतों पर
के णन्द्रत झारखण्ड-झनकार पुस्तक णलखी। र्ह ऄपनी पृथक पहचान स्थाणपत कर पाया।
1920 में रामानुज का णर्र्ाह छोटा नागपुर के गढ़रातू (णजला रााँची) की कणनष्ठ राजकु मारी से
हुअ।
प्रथम णर्श्व युि के ईपरााँत रेल्र्े का णर्स्तार तीव्र हुअ। कोररया की खड़गर्ााँ जमीन्दारी से ठे केदार
भोलानाथ बरूअ ने साल र्ृक्ष की काष्ठ से बंगाल-नागपुर रे ल्र्े (B.N.R.) को रे ल स्लीपर की अपूर्षत की
गइ। र्ह प्रणत स्लीपर साढ़े छः अने की रायल्टी देता था। पेंड्रा रोड मुख्य सम्पकव रे ल स्टेशन था। यहााँ से
व्यापर भी सम्बध हो गया था।
व्यस्क और णशणक्षत होने के ईपरााँत रामानुज प्रताप लसह देर् को राजकाज का प्रभार 5
जनर्री’1925 को मध्य प्रााँत और बरार के गर्नवर सर फ्रैंक स्ले द्वारा ददया गया और कोटव अफ र्ाडव की
व्यर्स्था समाप्त कर दी गइ।
रघुर्ीर प्रसाद र्माव 1925 तक दीर्ान रहे। तदुपरांत 1925 से 1927 में पंणडत राम सहा णमश्र,
1927 से 1928 तक हर प्रसाद र्माव, 1928 से 1942 तक ए.एन.एंडले, 1942 से 1943 तक
बी.सी.सेनगुप्ता (कलकत्ता हाइ कोटव के सेर्ाणनर्ृत्त जज) और 1943 से 1947 तक राय बहादुर सोहन लाल
श्रीर्ास्तर् (आलाहाबाद के सेर्ाणनर्ृत्त कलेक्टर और णजला दण्दाणधकारी। र्े कणर् भी थे।) दीर्ान रहे।
रामानुज ने ईणचत प्रशासणनक संकेतों के सम्प्रेषण हेतु राज णचन्ह में लैरटन सूणि Justitia
Regnorum Fundamentum (Justice is the basis of Government) ऄथावत न्याय ही शासन का
अधार है- को ऄपनाया। यह मोनो णनम्ांदकत है।

363

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.250

364

Indian Princes & Ruling Chiefs,P.1345

365

Report on the Administration of C.P. & Berara.Yr.1912-13,P.-1

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Figure 40 - कोररया ररयासत का राज णचन्ह (मोनो)

स्रोत-कोररया गज़ट

रामानुज प्रताप लसह देर् ने 1931 के गोलमेज़ सम्मेलन की णद्वतीय बैठक में नरे न्द्र मण्डल
(Chamber of princes) के प्रणतणनणध के रूप में भाग णलया। र्ह णर्णभन्न पत्र-पणत्रकाओं में लेख भी
णलखते थे। आन्होंने भारत की प्रथम न्युनतम र्ेतन व्यर्स्था लागू की।
1935 में बैकुंठपुर में रामानुज हाइ स्कू ल खोला गया। आसमें प्रधान पाठक गोकु ल चन्द्र शुक्ल बने।
र्ह मूधवन्य णर्द्वान और साणहत्यकार अचायव राम चन्द्र शुक्ल के पुत्र थे। ईनसे णमलने रामचन्द्र शुक्ल अए
थे।366 अचायव शुक्ल को णहन्दी साणहत्य सम्मेलन आन्दौर में ‘काव्य के ऄणभव्यंजनार्ाद’ नामक णनबन्ध को
पढ़ने जाना था। तब र्े साणहत्य पररषद के ऄध्यक्ष थे और आन्दौर जाते हुए बैकुण्ठपुर में सप्ताह भर रहे।
अगे चल कर रामानुज प्रताप लसह देर् के भाइ राम शरण लसह देर् छत्तीसगढ़ क्षेत्र से प्रथम I.C.S.
ऄणधकारी हुए।
1928 में मध्य प्रााँत और बरार के गर्नवर बटलर का बैकुण्ठपुर दौरा हुअ। ईनके णशणर्र स्थल को
बटलर पाकव कहा गया। पहले यह बसोर लोगों का तुररयापारा था। ऄब ईसी मैदान पर राजस्र् ऄनुणर्भाग
और तहीसल कायावलय बना ददया गया है। कचहरी सड़क पर आसी बटलर पाकव के सामने सम्मान द्वार के
स्तम्भ बनर्ाए गए, र्तवमान सर्ककट हाउस के सामने थे। यह ऄब णगर गए हैं।
अगे चल कर पूर्व की ररयासतों को इस्टनव स्टेट एजेंसी के तहत लाया गया। आनके णर्र्ाद आस्टनव
स्टेट एजेंसी द्वारा हल दकए जाते थे। आनसे आकरारनामा कराया जाता था। छत्तीसगढ़ की सभी ररयासते, 1
ऄप्रैल’1933 को गरठत, इस्टनव स्टेट एजेंसी367 से प्रशाणसत होने लगीं। रामानुज आसके भी ऄध्यक्ष रहे।

366

कुं तल गोयल-सरगुजा दशवन,पृ.260

367

The Eastern States Agency was an administrative unit of British India. The agency was created on

April 1, 1933. This agency was composed of a number of princely states in eastern India, located in
the present-day Indian states of Chhattisgarh, Jharkhand, Orissa, West Bengal, and Tripura. Before
the creation of the Eastern States Agency in 1933, 23 states of erstwhile Orissa Tributary States and
Chhota Nagpur States were under the authority of the British provinces of Bihar and Orissa and 16

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एक ऄसहज णर्र्ाद चााँगभखार को लेकर भी ईभरा। चााँगभखार के भैया महार्ीर लसह के पुत्र नहीं
था। ऄतः ईसने पूर्वज भैयाथान (णझलणमली) के चौहान भैया बहादुर पररर्ार से क़ृ ष्ण प्रताप लसह को
लगभग 1929-30 में गोद णलया। आससे नया णर्र्ाद जन्मा। कोररया के चौहान चााँगभखार और र्हााँ के
पररर्ार पर ऄपना ऄणधकार समझते थे, जो स्र्भाणर्क भी था, क्योंदक यह शाखा कोररया राज पररर्ार की
ही एक शाखा थी। ऄतः कोररया के शासक चौहान पररर्ार द्वारा ऄंग्रेजों के समझ र्ाद प्रस्तुत कर ऄपना
दार्ा प्रस्तुत दकया गया। यह णर्र्ाद लन्दन की प्रीर्ी काईं णसल तक गया और ऄंततः कोररया का दार्ा
ऄमान्य हुअ।
बीसर्ीं शताब्दी के प्रथम ईत्तराधव में कोररया ररयासत प्रगणतशील पहल कताव के रूप में ईभरी। नया
कचहरी भर्न 31 माचव’1923 को ईदघारटत हुअ। न्युनतम मजदूरी दर लागू की गइ। स्कू ल खोले गए।
बाणलका णशक्षा को बढ़ार्ा ददया गया। दीघव काणलक योजना बि णर्कास लागू दकया गया। पूणव अर्षथक
सर्ेक्षण कराया गया। आस हेतु ददल्ली के द ब्युरो अफ आकोनामी ररसचव के डायरे क्टर इ.व्ही.एस.मणनरम
अए।368 प्रणत र्षव नए णर्द्यालय खोले जाने लगे। आनमें पुस्तकालय और खेल मैदान भी बनाए गए।
छात्रर्ृणत्तयााँ दी गईं। णर्द्यार्षथयों की स्र्ास्थ परीक्षण योजना लागू की गइ। छात्रार्ास बनाए गए। प्रौढ़ और
तकनीदक णशक्षा को भी प्रोत्साणहत दकया गया। र्न प्रबन्धन के तहत ररजर्व और प्रोटैक्टेड फारे स्ट व्यर्स्था
लागू की गइ। ग्राणमणों के र्न णनस्तारी ऄणधकार ददए गए। र्न मानणचत्र बनाए गए। बैकुण्ठपुर और
मनेन्द्रगढ़ में नगर म्युणनस्पल्टी बनाइ गइ। णचरणमरी नगर णर्कास सणमणत बनी। भू बन्दोबस्त कराया गया।
भूणम की मुख्य तीन श्रेणी बनी- बहरा, चंर्र और डांड। सहकाररता को बढ़ार्ा ददया गया। णर्कास खण्ड
बनाए गए। चुनी हुइ राज सभा (दरबार) ऄणस्तत्र् में लाया गया। आस हेतु कोररया सरकार ऄणधणनयम
पाररत दकया गया। पंचायत और नगरपाणलका ऄणधणनयम बनाया गया। इस्टनव स्टेट एजेंसी (E.S.A.) का
ईच्च न्यायालय स्थाणपत दकया गया। यह सम्भर्तः रयगढ़ में था। गौंरटयाइ पट्टा लागू दकया गया। भू नक्शे
बनाए गए। खसरा जमाबन्दी लागू की गइ। राजस्र् और कर कानून बनाया गया, पर यह णर्लीनीकरण के
कारण ऄणस्तत्र् मॆं नहीं अ पाया। पुणलस ऄणधणनयम बनाया गया। टीकाकरण कायवक्रम लागू दकया गया।
णनयुणियों हेतु लोक सेर्ा सणमणत बनाइ गइ। अलोक नामक साप्ताणहक पत्र प्रकाशन प्रारम्भ दकया गया।
ईि कायव ऄणधकााँशतः रामानुज के कायवकाल में हुए। ऄतः महल (रामानुज णर्लास), णर्द्यालय
(रामानुज स्कू ल) (1935), क्लब (रामानुज क्लब) (1935)अदद ईन्हीं के नाम पर बने। जहााँ महल बना र्ह
ठाकु रपारा था और महल बनने के ईपरााँत महलपारा कहलाने लगा। मध्यप्रदेश काल में झुमका नाला पर
states were under the authority of Central Provinces and Berar. Cooch Behar and Tripura were
transferred from Bengal province to the Eastern States Agency 0n December 1, 1936. On December
1, 1944 the status of this agency was raised to that of a first class residency. These states were
grouped into three political agencies, under the "Resident" in Calcutta. The headquarters of the Orissa
States Agency was at Sambalpur, the headquarters of the Chhattisgarh States Agency was at Raipur
and the headquarters of the Bengal Saates Agency was at Calcutta. After Indian Independence in
1947, the states acceded to the Government of India, and were integrated into the Indian states of
Madhya Pradesh, Bihar, West Bengal and Orissa. The eastern portion of Madhya Pradesh and the
southern portion of Bihar became the states of Chhattisgarh and Jharkhand, respectively, in 2001.
(http://en.wikipedia.org/wiki/Chhuikhadan ) और Columbia-Lippincott Gazeteer (New York: Columbia
University Press, 1952) p. 389 ( It had an area of 153 square miles (400 km2). In 1941 the state had a
population of 32,731 people.)
368

डा.संजय कु मार ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.35

डा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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बना बााँध भी ईनके नाम पर- रामानुज सागर- रखा गया और छत्तीसगढ़ के गठन पर एक राज्य पुरस्कार
का नाम भी ईनके ही नाम पर रखा गया। स्र्तंत्रता ईपरााँत बना झुमका बााँध कोररया में णर्कासोन्मुख
व्यर्स्था का प्रतीक भी बना। आस पर एक कणर्ता यह है।:-

झुमका बााँध
ऄल्हड़ गदराइ युर्ती सा बहता
ऄलमस्त बरसाती नाला है-झुमका
लगा बनने ईस पर बााँध
स्थाइ सन्नाटे में पसरे
मेरे कस्बे में शोर मच गया
कस्बे से से झुंड के झुंड ईसे देखने जाने लगे
आंजीणनयर, ठे केदारों की फ़ौज़ अने लगी
कस्बे का व्यापार बढ़ णनकला
बातों का भी
नए-नए लोग अए
लोगों को शगल णमला
बेरोज़गारों को काम
व्यापाररयों को दाम
कस्बा फै लने लगा
नगर बनने लगा
शराब अइ
चाकू अया
गुंडे अए
लोग फु टबाल भूले
रामलीला भूली
दक्रके ट अया, कालेज़ अया
णर्णडयो पालवर खुले
कस्बा सम्पन्न ददखने लगा
कु छ र्षव चहल-पहल रही
बााँध पूणव हुअ
आंजीणनयर गए, ठे केदार गए
पैसा गया, फु टबाल गइ
शराब रह गइ
ढ़ाबे रह गए
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बेरोज़गारी रह गइ
झुमका पर राजा का नाम चढ़ा
कस्बा चीज़ों का अदी हो गया
सरकार काम देने की नहीं369
रामानुज प्रताप ने र्ाइसराय से भेंट कर बंगाल-नागपुर रेल के कोररया तक णर्स्तार की मााँग की।
कोयला णनक्षेप दोहन आसकी प्राथणमकता था। 1928 में रेल पथ णनमावण प्रारम्भ हुअ। ऄच्छी सड़कों का
णनमावण कराया जाने लगा। बैकुण्ठपुर-मनेन्द्रगढ़ पक्की सड़क 1941 में बननी प्रारम्भ हुइ और 1946 में पूणव
हुइ।
कोररया ररयासत ने अधुणनक खनन कायव प्रारम्भ कर छत्तीसगढ़ में औद्योणगक णर्कास के प्रथम कु छ
कायों की नींर् डाली। संगरठत और योजनाबि औद्योणगक णर्कास को अधार णमला। कोररया ररयासत में
कोयला णनक्षेपों के सर्ेक्षण का कायव बीसर्ीं शताब्दी के णद्वतीय दशक के प्रथम भाग में हुअ। णचरणमरी और
कारीमाटी (झगराखााँड) ऄच्छे कोयले के प्रथम दो क्षेत्र णचणन्हत दकए गए। 1905 की सनद में कोररया को भू
गभीय खणनज के ऄणधकार नहीं ददए गए थे। कोटव अफ र्ाडव के काल में सुपटरटेंडटें द्वारा णलखने पर भारत
की ऄंग्रेज सरकार द्वारा कोररया और चााँगभखार को ऄपने क्षेत्रों के खणनज से अय का अधा भाग ददया
जाना णस्र्कार कर णलया। जब रामानुज को प्रभार अया तो ईन्होंने आसकी ऄपील की और पूणव अय का
ऄणधकार दे ददया गया। 1913 से खनन प्रयास प्रारम्भ हुए। आसी बीच 1928 में णबजुरी-णचरणमरी रे ल
लाइन णबछनी प्रारम्भ हुइ और 1931 में पूणव कर ली गइ। 1928 में कोयला ईत्खनन प्रारम्भ हुअ। मात्र बड़े
ईद्योगपणतयों को अमंणत्रत दकया गया। 1928 में टाटा द्वारा कु राणसया में और बंशी लाल ऄबीर चन्द
(नागपुर) (महेश्वरी बणनया) द्वारा णचरणमरी में कोयला ईत्खनन प्रारम्भ दकया गया। कोररया ररयासत में
प्रथम लीज र्ंशीलाल ऄबीरचन्द को णमली थी। 1928 में ही णचरणमरी में डब्ल्यु.एम.णपट ने ईत्खनन प्रारम्भ
दकया। डाल चन्द बहादुर (कलकत्ता) द्वारा कारीमाटी (नाथव और साईथ झगराखाण्ड), णबड़ला द्वारा साजा
पहाड़, करम चन्द्र थापर (दकलोस्कर) द्वारा नाथव णचरणमरी कालरी, सरदार आन्दर लसह (भारत के प्रथम रक्षा
मंत्री सरदार बल्देर् लसह के णपता) द्वारा र्ेस्ट णचरणमरी में कोयला ईत्खनन प्रारम्भ दकया गया। आसी काल
में पोंड़ी पहाड़ी पर भी खनन प्रारम्भ हुअ। मूल्य से रायल्टी जोड़ने की पिणत लागू की गइ। ऐसा भारत में
पहली बार हुअ। आससे रायल्टी 4 से 5% हो गइ। 1947 में न्युनतम मजदूरी दर भी लागू की गइ। श्रम
गणतणर्णधयााँ भी प्रारम्भ हुईं। अर.के .मालर्ीय, राम कु मार दुबे अदद श्रणमक नेता सामने अए। मालर्ीय
भारत के श्रम ईप मंत्री भी रहे।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में र्तवमान स्र्रूप के अधुणनक औद्योणगक णर्कास का प्रारम्भ 1957 में णभलाइ
आस्पात संयंत्र की स्थापना से माना जाता है। आसे भारत सरकार ने रूस के सहयोग से स्थाणपत दकया था।
यह संयंत्र 22 फरर्री’1961 को पूणव हुअ। आसमें लगभग 60 हजार से उपर लोग प्रत्यक्ष रूप से कायवरत
है।370 हालांदक 1900 के दशक में रे ल्र्े लाइन (णबलासपुर-कटनी) भी ऄणस्तत्र् में अने लगी थी।371 अगे
आसका णर्स्तार कोररया के णचरणमरी तक हुअ, णजसका ईल्लेख उपर अ चुका है। प्रसंग र्श ईल्लेख है दक,
प्रणसध्द बांग्ला लेखक णर्मल णमत्र भी आसी दौरान कोररया और णबलासपुर में रहे और छत्तीसगढ़ क्षेत्र तथा
रे ल्र्े को अधार बना कथा लेखन भी दकया। ईनकी कहानी लेड़ी ड़ाक्टर क्षेत्र और कायव की दुरूहता को
दशावती है। रे ल्र्े णर्स्तार से, ररयासत और छत्तीसगढ़ क्षेत्र के र्नों से, रे ल्र्े स्लीपर की मााँग बढ़ी। कोररया के
369

प्रगणतशील र्सुधा में प्रकाणशत

370

छत्तीसगढ़ णर्कास,2008 (राज्य योजना मण्डल),पृ.315

371

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खडगर्ााँ से आसकी मांग पूरी की गइ। आसके ठे के ददए गए। भोलानाथ बरूअ आसके ठे केदार हुए। र्ह साढ़े छः
प्रणतशत रायल्टी देते थे।
कोररया ररयासत (र्तवमान णजला) में कोयला का प्रारणम्भक ईत्खनन 1913 में ही प्रारम्भ हो चुका
था। 1928 में प्रथम लीज नागपुर के बंशीलाल ऄबीरचन्द और टाटा को दी गइ। टाटा ने कु राणसया में
ईत्खनन हेतु थामसन को मैनज
े र रखा। टाटा द्वारा कु राणसया का एक कोल ब्लाक कणप्टर् रूप में बाम्बे
बरोदा और सेंरल आंणडयन रे ल्र्े (B.B. & C.I.) को सब लीज दकया गया। डब्ल्यू.एम.णपट, करम चन्द थापर
(दकलोस्कर), णबड़ला, दादा भाइ माणनकचन्द तथा बंशीलाल, सर आन्दर लसह, डाल चन्द बहादुर अदद भी
आस कायव में अए।372
दोनों णर्श्व युध्दों ने, छत्तीसगढ़ क्षेत्र में, व्यापार को भी प्रोत्साणहत दकया। आसी समय, छतीसगढ़
क्षेत्र में, र्णणक समुदाय के लोग अए। ऄब यह राज्य का सबसे सशि दर्ाब समूह है। ठे केदारी भी ऄणस्तत्र्
में अइ। णपट ने बी.बी.लाणहड़ी, मुखजी, जयराम, रघु, मोहम्मद याकू ब, कपूर लसह अदद को कोयला
ईत्खनन हेतु ठे केदार बनाया।373 णद्वतीय णर्श्व युि के काल में ऄंग्रेज सरकार ने ईत्पादन बढ़ाने में सहयोग
दकया। णचरणमरी में बी.बी.लहड़ी ऐसे ही सलाहाकारों में से एक थे। रे ल्र्े के णनमावण में भी ठे केदारी प्रथा
अइ।
यह माना जा सकता है दक, र्ास्तर् में छत्तीसगढ़ क्षेत्र में रे ल का णर्कास और कोररया ररयासत
(ऄब णजला) में कोयला ईत्खनन ही राज्य में ईद्योगों की प्रथम अहट थी।
स्पष्ट है दक, छत्तीसगढ़ प्रदेश के , र्नों, भूणम, खणनजों और ऄयस्कों का दोहन ही औद्योणगक णर्कास
का अधार बना और अज भी यही है। ररयासत की अय में ऄत्यणधक र्ृणि हुइ।
1927 में कारीमाटी में अग लग गइ। आस कारण से 1930 में नया नगर बसाया गया। आसे कु मार
महेन्द्र प्रताप लसह देर् के नाम पर णर्कणसत दकया गया। यह ऄब मनेन्द्रगढ़ कहलाता है। यहााँ रे ल पहुाँचने से,
यह कोररया का व्यापाररक नगर बना और ररयासत का प्रर्ेश द्वार भी।
भारत और छत्तीसगढ़ राज्य का ऄंणतम चीता, कोररया ररयासत में णर्गत शताब्दी के चौथे दशक
(1930 से 1940) के मध्य मारा गया था और आस कृ त्य की अलोचना ख्यात पणक्षणर्द् (Ornithologist
और Naturalist) पद्म णर्भूषण डा.साणलम (मोइन्नूद्दीन ऄब्दुल) ऄली ने ऄपनी पुस्तक ‘द फाल अफ ए
स्पैरो374’ में भी की।375 णशकार दकए गए यह दो चीते भी दुलवभ काले चीते थे। रामचन्द्र लसहदेर् का मानना
है दक, यहा चीते 1952 में मारे गए थे और काले नहीं थे तथा ईनके माता-णपता के जीणर्त होने के कारण
ईनकों ऄंणतम चीता नहीं कहा जा सकता। चीता शब्द संस्कृ त के णचत्र शब्द से बना है, जो चीते के णचत्तीदार
होने से सम्बणन्धत है। ऄब चीता प्रजाणत भारत से णर्लुप्त हो चुकी है। कणर्, शायर और प्रेमा पणत्रका के
सम्पादक रामानुजलाल श्रीर्ास्तर् भी कोररया के दरबार में पसवनल सेक्रेटरी रहे। आन्होंने ‘जंगल की
कहाणनयााँ’ पुस्तक में यहााँ के णशकार का णर्र्रण ददया है। बाघ णशकार णप्रय शौका था। ईसका हााँका प्रणसि
था।
कोररया की पड़ोसी ररयासत सरगुजा के सहनाम (रामानुज शरण) शासक की 1,170 बाघों को
मारने के कारण अलोचना की जाती है, णजनसे आनकी (रामानुज प्रताप) प्रणतद्वणन्दता णशकार को लेकर थी।
कोररया में कृ ष्ण मृग भी राज-णशकार में ही समाप्त हुए। बाघ को भी णनश्शेष कर ददया गया। हाथी भी
धीरे -धीरे गायब हो गए।
372

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.5-7

373

http://koreakumar.com/

374

Solim Ali-The Fall of a Sparrow (Oxford University Press. Delhi, 1985) (ISBN 0195621271)

375

कााँणतकु मार जैन कृ त बैकुण्ठपुर में बचपन, पृ.58 में ईद्धृत।

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णचत्र 41 – कोररया ररयासत में तात्काणलन ररयासत प्रमुख रामानुज प्रताप लसहदेर् द्वारा णशकार दकए गए भारत के ऄंणतम तीन
चीते
स्रोत:http://en.wikipedia.org/wiki/File:Maharajah_Ramanuj_Pratap_Singh_Deo_with_cheetah_kill_1948_BN
HS.jpg

कोररया में मलेररया का प्रकोप ऄणधक था।
आस ररयासत णभखारी नहीं होने का ईल्लेख अता है। स्र्च्छताकमी भी तब नहीं थे।
णर्जयदशमी पर्व ररयासत की ओर से धूमधाम से मनाया जाता था।
यह ईल्लेख अता है दक, रामानुज प्रताप को कोइ व्यसन नहीं था।
रामानुज णर्द्यालय में प्रातः तो ‘शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं’ गाया जाता और सााँय जलज
रणचत ‘णबखरी पड़ी जहााँ शोभा ऄपार भारी, हम कोररया पुजारी, है कोररया हमारी’।
कोररया ररयासत में स्र्तंत्रता अन्दोलन का प्रभार् कम था। णर्लय अन्दोलन ऄर्श्य सदक्रय रहा।
दुगवमता ने ऄखबार, णनयणमत बस, नेता, गााँधी टोपी, णतरंगा अदद सभी को कोररया से दूर ही रखा था।
र्ाराणसी के एक क्रााँणतकारी रमशंकर शमाव ‘काक’ 1942 की कााँणत के बाद भूणमगत होने के पिात
रामानुज स्कू ल के हैड़-मास्टर ठाकु र गंगादयाल लसह के पास कोररया में णछपे और आसी स्कू ल में गंगादयाल
द्वारा णहन्दी णशक्षक भी बना ददए गए।
बैकुण्ठपुर के बाबू लाल गुप्त और ईदय भान णतर्ारी गोर्ा मुणि अन्दोलन में सम्मणलत हुए और
गोर्ा की पुतवगाली सरकार द्वारा बन्दी भी बनाए गए। यह दोनो अन्दोलनकारी समाजर्ादी दल से सम्बि
रहे।
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स्र्तंत्रता अन्दोलन की गूाँज कोररया ररयासत में भी सुनी गइ। कोररया शासक रामानुज प्रताप लसह
देर् द्वारा स्र्तंत्रता अन्दोलन के दमन का रास्ता ऄपनाया गया। गााँधी जी की जय, जय णहन्द जैसे स्र्तंत्रता
से सम्बणन्धत नारे प्रणतबणन्धत कर ददए गए। गााँधी जी की जय का नारा लगाने के कारण राम शरण पााँडे को
कै द कर जेल में डाल ददया गया। ईनकी मृत्यु जेल में ही हुइ। बी.डी.गुप्त को दीर्ार पर जय णहन्द का नारा
णलखने के कारण छः बेंत की सजा दी गइ। 1946 में बाबू लाल गुप्त ने बैकुण्ठपुर कोटव में झण्डा फहराया
(कु छ का मानना है दक, महल के सामने) और जय णहन्द के नारे लगाए। ईनका देहांत कैं सर से हुअ।
बैकुण्ठपुर, पटना, मनेन्द्रगढ़ अदद में जलूस णनकाले गए। जुलूसों का यह णसलणसला अगे भी चला। कोररया
ररयासत में स्र्तंत्रता के प्रणत झुकार् रखने र्ालों के प्रणत नापसन्दगी रही। ईन्हें सजाएाँ दी गईं।
ऄसहयोग के णलए लगानबन्दी अन्दोलन को भी ईपयोग में लाया गया। आसका ऄणधक णर्र्रण
ईपलब्ध नहीं हो पाया है।
णर्लय अन्दोलन को ऄणधक नेतृत्र् णमला। ईसमें ऄणधक लोग भी सम्मणलत हुए। 1946-47 में
मनेन्द्रगढ़ के रतन लाल मालर्ीय और पटना के ज्र्ाला प्रसाद ईपाध्याय ने आसे नेतृत्र् ददया। पटना में 3
ददसम्बर’1947 को णर्लय अन्दोलन को गणत देने के ईद्देश्य से सभा अयोणजत की गइ। आस सभा में जलूस
लेकर ऄणम्बकापुर जाने का णनिय दकया गया। ऄतः कोररया शासक रामानुज प्रताप लसह देर् द्वारा रक और
गाणड़योंब से लोगों को ले जाना प्रणतबणन्धत कर ददया गया। आस प्रणतबन्ध के कारण 500 लोगों का जत्था
पैदल ही चल पड़ा। लगभग 35 दकलोमीटर दूर चलने पर सूरजपुर में रतन लाल मालर्ीय, ज्र्ाला प्रसाद
ईपाध्याय, धीरे न्द्र नाथ शमाव अदद ने जत्थे को सम्बोणधत दकया। दो ददन की पैदल यात्रा ईपरााँत जत्था
ऄणम्बकापुर पहुाँचा। यहााँ सभा अयोणजत कर णर्लय के पक्ष में भाषण ददए गए।
स्र्तंत्रा ईपरााँत 15 ऄगस्त को मुरली लसह ने कु छ लड़कों के साथ, दकसी तरह बनाए गए णतरं गे के
साथ और गााँधी टोपी पहन, भारत माता की जय, आंकलाब णजन्दाबाद, अज़ादी ऄमर रहे अदद के नारे
लगाए। एस.ड़ी.एम. , भर्ानी प्रसाद णमश्र (प्रणसि साणहत्यकार) के बड़े भाइ, दुगाव प्रसाद णमश्र थे। आनके
छोटे भाइ णगरजा प्रसाद णमश्र रामानुज स्कू ल में णशक्षक थे। ईन्होंने ध्र्ज और टोपी जप्त की। धूप में खड़े
रहने की सजा दी, णजसमें मुरली बेहोश भी हुए। पहले ईन्हें झूठी गर्ाही का णर्शेषज्ञ माना जाता था। ऄब
र्े, सेनानी थे।
हाट के णनकट बने हनुमान मणन्दर में रहने र्ाले गोणर्न्द ने 15 ऄगस्त को स्कू ल में णतरंगा लहराया।
दीर्ारों पर गेरू से भारत माता की जय, जय णहन्द, आंकलाब णजन्दाबाद अदद णलखा। हेड़मास्टर गंगादयाल
लसह ने खूब णपटाइ कर ररस्टीके ट कर ददया।
कटक में ईड़ीसा और छत्तीसगढ़ की ररयासतों के णर्लय सम्मेलन में रतन लाल मालर्ीय ने भाग
णलया।
ईड़ीसा और छत्तीसगढ़ की ररयासतों ने ऄलग प्रााँत बनाने का प्रयास दकया, पर ऄसफल रहे। यह
राज्यों में णमला दी गईं। कोररया शासक रामानुज प्रताप लसह देर् द्वारा 15 ददसम्बर’1947 को कोररया
ररयासत के भारत में णर्लय के ऄणभलेख को हस्ताक्षररत दकया गया376, णजसके अधार पर कोररया की ओर
से दीर्ान (मुख्यमंत्री) राय बाहदुर सोहन लाल श्रीर्ास्तर् ने 1 जनर्री’1948 को णर्लय पत्र पर हस्ताक्षर
दकए गए। कोररया ररयासत मध्य प्रााँत और बरार राज्य में णमला दी गइ। साथ ही एक करोड़ दो लाख रूपए
का शासकीय खजाना मध्य प्रााँत और बरार की सरकार को सौंपा गया। रामानुज णर्लास पैलेस को छोड़
सभी भर्न भी सौप ददए गए।
कोल, भुईंहार (पंडो), धनुहार, गोंड़ अदद जनजाणतयााँ कोररया की प्राचीनत णनर्ासी हैं। कोल संज्ञा
से चाइबासा के समीप कोलहान नामक स्थान भी है। चौहानों के अने पर ऄणधकााँश कोल ररयासत से चले
गए। सर एच.ररसली कोरर्ा, खैआरा, कोड़ाकू , खैरर्ार अदद को भी कोल मानता है। भुईंहार (पंडो) लोग
376

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कोल र्ंश के ही हैं। यह लोग णनम् जाणत में नहीं णगने जाते थे और कहीं-कहीं राजणतलक भी आनसे ही कराया
जाता है।377
ऄन्य सभी जाणतयााँ, बाद में, बाहर से अईं, णजसमें चेरर्ा पहली थी। यह लोग पलामू से अए थे
और बैगा (पुजारी) बने। पलामू को चेरोगढ़ भी कहते हैं।378 कु दरगढ़ और महामाया मणन्दर में यह लोग ही
पुजारी हुए।
रजर्ार, तेली, ऄहीर और ग्र्ाल, ईरााँर्, गरणड़या, कोरी, बरगाह, घणसया, कहार, के र्ट, बणनया
(गुप्ता, ऄग्रर्ाल, जैन), कलार (जैसर्ाल और णशर्हरे ), हररजन अदद जाणतयााँ और मुणस्लम, जैन, णसक्ख
और इसाइ धमावबलम्बी बाद में अए।
बंजारा लोग ही अयात-णनयावत करते थे। नमक लाने के कारण लर्न भी कहे जाते थे। लर्ड़ोइ
(रामगढ़ के समीप) और बंजारीडााँड आनसे ही सम्बणन्धत सज्ञाएाँ हैं।
कोयला खदानों के खुलने से ईच्च ऄणधकारी, तकनीणशयन, श्रणमक, ठे केदार, व्यापारी अदद भी
बाहर से अए।
णहन्दू बहुसंखयक थे।
बोलचाल की भाषा पर सरगुणझया, छत्तीसगढ़ी और बघेलखण्डी का प्रभार् रहा।
कोररया के णर्द्यालयों में यह गीत गाया जाता था- ‘हम कोररया पुजारी, है कोररया हमारी’।
कोररया ररयासत में लगभग 20 जमीन्दाररयााँ थीं और जमीन्दाररयों की जनसंख्या खालसा ऄथावत
र्ह क्षेत्र जो जमीन्दाररयों के ऄंश नहीं था और सीधे ररयासत द्वारा शाणसत होता था, से ऄणधक थी।
खड़गर्ााँ और पटना प्रमुख जमीन्दारी थीं। दोनों (राज) गोंड़ जनजाणत के पास थीं।
पटना जमीन्दारी का ईल्लेख उपर अ गया है।
खड़गर्ााँ की जमीन्दारी महत्र्पूणव, बड़ी और पुरानी थी। यह भी (राज)गोंड़ जनजाणत के लोगों के
पास थी। यह कहा जाता है दक, यह लोग भोपाल के समीप णस्थत बैरागढ़ से कोररया अए। आसमें 86 ग्राम
थे। 1947 में आसकी अय एक लाख रूपए र्ार्षषक थी। यह लोग कोररया ररयासत को 1,000 की र्ार्षषक
रटकोली और
7,000 ऄब्र्ाब र्ार्षषक देते थे, जो पटना से भी ऄणधक था। यह ररयासत की जमीन्दाररयों
द्वारा ददया जाने र्ाला सर्ावणधक योगदान था। साल स्लीपर काष्ठ और णचरणमरी कोयला क्षेत्र आसी
जमीन्दारी क्षेत्र में था।
नगर जमीन्दारी राज पंणडत नान्हू राम णतर्ारी को कदम कुाँ र्र ने िह्म शााँणत पाठ कराने के एर्ज में
दी। र्े यह कायव बाद में भी करते रहे। नान्हू कदम के साथ णमजावपुर के बधार राज (मायके ) से अया था।
रटकोली
7/- र्ार्षषक थी। नान्हू के ईपरााँत भगर्त प्रसाद णतर्ारी, हरबंश प्रसाद णतर्ारी, रघुनाथ प्रसाद
णतर्ारी और कमला प्रसाद णतर्ारी ईत्तराणधकारी हुए।
रनइ जमीन्दारी को पटना जमीन्दारों द्वारा पंणडत राम कु बेर राम शुक्ला को प्रदान दकया गया। र्ह
रीर्ााँ के मउगंज से अए थे। आसके ईत्तराणधकारी राम कु बेर राम शुक्ला, के दार नाथ शुक्ला और हनुमान
प्रसाद शुक्ला हुए।
घुघरा जमीन्दारी रजर्ाड़ कररया और लोहररया को दकसी प्रणसि पहलर्ान को हराने पर दी गइ।
हो सकता है दक, यह कोररया शासक को मराठों के णर्रोध में सहायता का ही कथन हो। तभी तो यह लोग
पुश्तैनी तलर्ार रखे हैं। आनका ईत्तराणधकार कररया-लोहररया से कन्हाइ मांजी, भंर्र मांजी, णपला मांजी,
बरुणन मांजी, प्रसाद मांजी, प्रेम साय, काशी राम और नारायण प्रसाद का है।
के लहारी की जमीन्दारी पबइ जनजाणत के लोगों के पास थी। यह कब दी गइ यह ज्ञात नहीं है। हो
सकता है दक, यह जनजाणतयों की पुरानी जमीन्दारी हो। यह लोग भी पुराने समय से थे।

377

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.99

378

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.22

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कचोड़ जमीन्दारी के लहारी के समीप थी। यह जमीनदारी रीर्ााँ से अए (राज)गोंड़ जनजाणत के
लोगों के पास थी। आसमें मात्र कचोड़ ग्राम था।
तेलीमुंड़ा जमीन्दारी ईत्तर प्रदेश के कु नबी भर्न बक्श को दी गइ थी। आसका ईत्तराणधकार देर्ी
दयाल, हीरालाल, रूद्र-रणर् प्रसाद रहा।
सोनहत से प्राण लसह द्वारा के सगर्ााँ की गौरटयाइ लसगरौली के पणन्डत के दार नाथ को दी गइ।
लब्जी ग्राम णसगरौली के महापात्र पणन्डतों को ददया गया। आनका ईत्तराणधकार यह था- पंणडत मनधारीणगरधारी, पं.ज्ञान दत्त, पं.श्याम लाल। कचेर के पंणडत 1856 में अए। ऄमोल लसह ने ईन्हें यह ग्राम ददया।
पं.धीरजमन, पं.राजमन, पं.रामाकांत र्ंशज रहे। बरहोंखोल के गौंरटया कलार जाणत के थे। र्ह र्ाराणसी से
अए थे। ईत्तर में पाल में चेर जाणत के गौंरटया थे। तेन्दुअ ग्राम की गौंरटयाइ र्ैश्य ऄग्रहरी ऄयोध्या प्रासद
गुप्ता को दी गइ।

चााँगभखार
चााँगभखार ररयासत को ऄंग्रेजों द्वारा प्रथम श्रेणी में र्गीकृ त्त दकया गया था। पहले यह कोररया
ररयासत की जमीन्दारी थी। यह छत्तीसगढ़ का ईत्तरी कोना था। आसका क्षेत्रफल 906 र्गव मील था।
आसके ईत्तर, पणिम और दणक्षण में रीर्ा ररयासत और पूर्व में कोररया ररयासत थी। आस ररयासत
की जनसंख्या 1891 में 18,526 थी, जो 1921 में 21,826 हो गइ थी। ररयासत में 129 ग्राम थे।
यहााँ गोंड़ और कोल ही प्रमुख जनजाणतयााँ थीं। कोल लोग हो कहलाते थे। आन्हें कहीं-कहीं मुंडा भी
कहा जाता था। यहााँ कु ड़ाकू लोग भी थी, णजन्हें मुर्ासी कहा जाता था। मुर्ासी का ऄथव चोर-लुटेरा से था।
यह लोग तब भी यह कायव करते थे।
ररयासत की भूणम पथरीली होने से कृ णष नाममात्र को थी। मुकद्दमे भी नहीं थे। 1927 में मात्र 1
दीर्ानी और 21 फौजदारी मुकद्दमें प्रस्तुत हुए।
1927 में अय
25,220/- और व्यय
22,851 था।
यहााँ आतने ऄणधक र्न और हाथी पाए जाते थे दक, बसना करठन था। सभी को मार डाला गया या
पकड़ णलया गया। गौर, शेर और चीते भी ऄत्यणधक थे। र्ह भी मार डाले गए।
छत्तीसगढ़ की समस्त ररयासतों की तरह चााँगभखार का भी प्राचीन आणतहास ज्ञात नहीं है।
कु छ प्राचीन णचन्ह ऄर्शय णमले हैं। दोना नदी तट पर णस्थत गोगरा ग्राम में सीतामढ़ी गुफा में
महादेर् प्रणतमा है। कं णजया और णछतदोना के समीप भी ऐसी मदढ़यााँ हैं। हरचौका ग्राम के समीप मर्इ में
चट्टान काट कर बनाइ गइ कन्दराएाँ और कइ प्रस्तर प्रणतमाएाँ हैं। यहााँ सभी प्रस्तर खम्बों पर लेख ईत्त्कीणव हैं,
णजसमें से दो कल्चुररयों के और एक चौहान के जान पड़ते हैं। यहााँ का ऄंणतम शासक र्ंश कोररया के ऄंणतम
शासक र्ंश की ही एक शाखा थी, जो दक चौहान थे।
सारणी 7 और णचत्र 42 - चााँगभखार ररयासत के गुफा णचत्र स्थल और ईनके हस्त णनर्षमत णचत्र
स्रोत-छत्तीसगढ़ संस्कृ णत णर्भाग (http://cgculture.in/ArchaeologyRockArtSiteInChhattisgarh.htm)
क्र.
1

स्थान
कोह्बहुर

ररयासत
चााँगभखार (भरतपुर
तहसील)

अकृ णतयााँ और णचत्र (णचत्र क्र.41)
Geometric pattern

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Human figures and geometrical
design. णच.क्र.41

2

मुरेलगढ़

चााँगभखार(जनकपुर
तहसील)

चााँगभखार कोररया ररयासत की जमीन्दारी थी। जब गरीब लसह कोररया का शासक हुअ, तब
ईसने चााँगभखार जमीन्दारी का प्रभार ऄपने भाइ मान लसह को ददया। गरीब लसह देर् के भाइ लाल मान
लसह और जोरार्र लसह थे। कोररया में गज राज लसह देर् की णनःसंतान मृत्यु से ऄधो राय देर् के सीधे
र्ंशजों के शासन का ऄंत हो गया। ऄब ऄगला शासक गरीब लसह देर् था, जो गज राज का भतीजा था।
गरीब कोररया के पूर्व शासक ज़हान शाही देर् के कणनष्ठ पुत्र घासी राम देर् के पुत्र दलीप साही का ज्येष्ठ पुत्र
था।गरीब ने भाइ लाल मान लसह को चााँगभखार की ज़ाग़ीर दी, णजसका मुख्यालय भरतपुर था।
1818 में कोररया भी भोंसलों के माध्यम से ऄंग्रेज इस्ट आणण्डया कम्पनी के ऄणधकार में अ गया।
कोररया के शासक गरीब लसह से 24 ददसम्बर’1819 को कबूणलयत सम्पाददत कराइ गइ। यह णनधावररत
हुअ दक, कोररया प्रणत र्षव

400/- का कर योगदान ईन्हे देगा379 और चााँगभखार कोररया की अणश्रत

जमीन्दारी के रूप में £ 38.12 sh. (

386/-) का र्ार्षषक कर कोररया के माध्यम से देगा। तब णसनाक

णसरगुजा मामलों का सुपटरटेंडटें था। आस तरह से चााँगभखार पृथक आकाइ के रूप में ईभरा, भले ही कोररया
की अणश्रत जमीन्दारी के रूप में। र्ह अगे चल कर पृथक ररयासत के रूप में मान्य हुअ, णजस पर कोररया
के चौहान र्ंश की ही एक शाखा शासक थी।
1848 में ऄंग्रेजों ने चााँगभखार से नइ और कोररया से पृथ्क सनद की और आस प्रकार चााँगभखार
एक नइ ररयासत बन गया। यहााँ के चौहान जमीन्दार को शासक स्र्ीकार कर णलया गया और ईसे भैया की
ईपाणध दी गइ।
चााँगभखार की ररयासत के रूप में पृथक पहचान बनने पर चौहान र्ंश ही एक मात्र शासक र्ंश
रहा।
मोहम्मद गोरी से पराणजत होने के ईपरााँत पृथ्र्ीराज चौहान के र्ंशज मैनपुरी (अगरा के समीप)
अ बसे थे।380 ददल्ली और ऄजमेर से हटने के ईपरााँत चौहान सत्ता मैनपुरी में के णन्द्रत हो गइ थी। यहााँ के
चौहान कु नबे से दो भाइ, जो दक, तत्काणलन मैनपुर शासक के भी कणजन भाइ कहे जाते हैं, थे- दलथम्मन
(दलयमन) शाही और धारामल शाही (धौरे ल साही)।381 1750 इ. के असपास यह दोनों मैनपुरी से
र्ाराणसी, णमजावपुर, सीधी, सरगुजा, छोटा-नागपुर, सम्बलपुर अदद होते हुए जगन्नाथ पुरी तीथव यात्रा पर
379

एटफकस-कलेक्शन अफ ररटीज़, आं गेज़मेंटस एण्ड सनदस,र्ाल्यूम-1,पृ.176

380

नेत्र पाल लसह-मैनपुरी का र्ह खूनी ददन,पृ.54-55

381

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.5

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गए।382 आनके साथ एक छोटी सन्य टुकड़ी भी थी। र्ापसी पर यह लोग सरगुजा की राजधानी णर्श्रामपुर में
जोड़ा तालाब के समीप रूके । बाद में णर्श्रामपुर का ही नाम ऄणम्बकापुर हुअ।
सरगुजा शासक मुख्यालय से ऄन्यत्र (सम्भर्तः रााँची) गया हुअ था। सरगुजा शासक की
ऄनुपणस्थणत ने कु छ स्थाणनय सरदारों को णर्द्रोह के णलए प्रेररत दकया। ईन्होंने शासक णनर्ास को घेर णलया।
णघर चुकी रानी ने ऄपने को ऄसहाय पाया, तो ऄन्य णर्कल्पों पर णर्चार दकया जाना स्र्भाणर्क था और
जब ईसे यह ज्ञात हुअ दक, दो चौहान भाइ ऄपनी छोटी टुकड़ी सणहत जोड़ा तालाब के समीप डेरा ड़ाले
हुए हैं, तो ईसने ईन्हे राखी भेज कर रक्षा की ऄपेक्षा की। दोनों ने णर्द्रोही सरदरों को भगा ददया और रानी
को सुरणक्षत णनकाल णलया, परं तु ईनकी टुकड़ी के ऄणधकांश लोग खेत रहे।
सरगुजा शासक को मुख्यालय र्ापसी पर सब बातें ज्ञात हुईं। ईसने, धन्यर्ाद स्र्रूप, चौहान
भाइयों में से ज्येष्ठ दलथम्मन साही को णझलणमली आलाके की ज़ाग़ीर दे दी।383 तब णझलणमली क्षेत्र का कु छ
भाग बालन्द लोगों के ऄणधकार में भी था।
दोनों चौहान भाइ रे ण नदी तट पर के सके ला ग्राम में बसे।384 यह अर्श्यक भी था, क्योफक आस
बीच मैनपुरी से चौहानों को फारूखाबाद के सुल्तान ने आटार्ा की ओर खदेड़ ददया था और आनकी यहााँ से
र्ापसी ऄज्ञात भणर्ष्य की ओर होती। हालााँदक आटार्ा की ओर खदेड़े गए चौहान लोग पुनः मैनपुरी की
सत्ता र्ापस पाने में सफल भी हुए थे। सरगुजा अए आन भाइयों ने आटार्ा में रह रहे, आंन सम्बणन्धयों को,
मैनपुरी र्ापस पाने में सहायता दी हो सकती है, क्योंदक आस बार की र्ापसी में ईनके साथ र्ह तलार्ारें भी
थीं, जो मोहम्मद गोरी से पृथ्र्ी राज चौहान की पराजय में खेत रहे दो सेनापणतयों- चामुण्ड राय और
कमन्द राय- की बताइ जाती हैं।385 यह तलर्ारें भइयाथान के दलथम्मन शाह के र्ंशजों के पास रहीं। आनके
पास पृथ्र्ीराज रासो की एक प्रणत भी है, जो 15 र्ीं शताब्दी में ईदयपुर मेर्ाड़ शासक द्वारा बनर्ाइ गइ
तीन प्रणतयों में से एक हो सकती है।386
चौहान दलथम्मन (दलयमन) शाही ने के सके ला में एक गढ़ी भी बनार्ाइ, णजसके भग्नार्शेष र्हााँ
हैं। र्ह लोग सरगुजा शासक को र्ार्षषक कर देते थे। ईन्हों ने बालन्द लोगों को आस क्षेत्र से हटा ददया और
ईन णर्द्रोही पखाड़ी लोगों का भी दमन करने में सफल रहे, जो सरगुजा शासक के णर्रोधी और थे।387
ईन्नीसर्ीं शताब्दी के प्रथम भाग में चौहान र्ंशजों को, रानी की राखी के कारण, सरगुजा शासक ऄमर लसह
द्वारा भइया की ईपाणध दी गइ।388 णझलणमली क्षेत्र को भइया-स्थान कहा जाने लगा, जो ऄब भइयाथान
कहलाता है।389
दलथम्मन शाही का छोटा भाइ धारामल शाही (धौरे ल साही) कु छ समय के सके ला में रहा,
तदुपरांत र्हा ऄन्य क्षेत्रों की तलाश में ईदत्त हुअ और कोररया क्षेत्र में अया। र्ह कोररया के ऄंणतम शासक
र्ंश का प्रथम शासक हुअ। यह काल मुगल पतन और मराठा ईदय का था। कोररया में शुभंकर के रूप में

382

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.6

383

http://korea.nic.in/history.htm

384

http://koreakumar.com/

385

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

386

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

387

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.7

388

http://korea.nic.in/history.htm

389

http://koreakumar.com/

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मछली णचन्ह का ईपयोग भी, चौहानों के , ईत्तर प्रदेश से अने का संकेत करता है, क्योफक यह शुभंकर ईस
क्षेत्र में व्यापक प्रयुि होता है।390
धारामल शाही (धौरे ल साही) ने सेना एकत्र की और कोररया पर धार्ा दकया। र्ह पहले णचरमी
ग्राम में रूका और दफर ईसने अक्रमण दकया। ईसने कोररया के कोंच कोल शासक को युि में पराणजत कर
कोररया की सत्ता हणथया ली। र्ह कु छ समय णचरमी में ही रहा, दफर ईसने नगर ग्राम को मुख्यालय
बनाया। बाद में यह राजधानी रजौली और सोनहत के ईपरााँत बैकुंठपुर हुइ391, जहााँ अने के पूर्व कु छ समय
शासक पररर्ार धौरारटकु रा में भी रहा। कोररया का धुर ईत्तरी भाग ऄभी भी सीधी के बालन्द लोगों के
ऄणधकार में था। बाद में ईसने या ईसके र्ंशजों ने मुदरे गढ़ (चााँगभखार) और सम्भर्तः कोररयागढ़ से भी
बालन्द लोगों को हटाया। बालन्द कोररया क्षेत्र से पूरी तरह ईसके र्ंशजों द्वारा ही हटाए जा सके । धारामल
को बड़े भाइ दलथम्मन ने कोररया का शासक बनने की औपचाररकता पूरी की और ईन्हें 12 ग्राम- बसर्ाही,
माऔरा, बरघर, करी, णर्रारी, खड़गााँर्, ढ़ोढ़ा, देर्री, सचीपारा, बरपारा, मैमइ (नरलसघपुर) और कोटारटकासी हक़ में ददए गए। बाद में यह णर्र्ाद का कारण बने। अगे चल कर आन्हें र्ापस ले णलया गया। और
अगे चलकर 26 ददसम्बर’1901 की सनद द्वारा णशर् मंगल लसह ने पुनः णझलणमली को भेंट कर ददया।392
धारामल शाही (धौरे ल साही) के तीन पुत्र थे- देर् राज शाही, ऄधोराय देर् और राघोराय देर्।393
धारामल शाही (धौरे ल साही) का ज्येष्ठ पुत्र देर्राज शाही ईसका ईत्तराणधकारी हुअ। र्ह
णनःसंतान मृत्त हुअ। देर्राज साही के ईपरााँत ईसके छोटे भाइ ऄधो राय देर् का ज्येष्ट पुत्र नरलसह देर्
ऄगला शासक हुअ। तदुपरांत ईत्तराणधकार णपता से पुत्र को जाता रहा। कोररया में ,आस ऄनुक्रम में, शासक
हुए- जीत राय देर्, सागर साही देर्, ऄफहार साही देर्, ज़हान साही देर्, सार्ल साही देर् और गजराज
लसह देर्।394 आसने लसह देर् णलखने की परम्परा डाली, जो लगातार चली। आसे ही सम्मान पूर्वक लसह जू देर्
कहा जाने लगा। गज राज लसह देर् णनःसंतान मृत्त हुअ।
गज राज लसह देर् की णनःसंतान मृत्यु से ऄधो राय देर् के सीधे र्ंशजों के शासन का ऄंत हो गया।
ऄब ऄगला शासक गरीब लसह देर् था, जो गज राज का भतीजा था। गरीब पूर्व शासक ज़हान शाही देर् के
कणनष्ठ पुत्र घासी राम देर् के पुत्र दलीप साही का ज्येष्ठ पुत्र था। आसका कायवकाल लम्बा और घटना प्रधान
था। आसी के काल में णनयंत्रण मराठों और ऄंग्रेजों को गया। आससे स्पष्ट होता है दक, पहले णनयंत्रण रतनपुर के
कल्चुरी लोगों का था। गरीब लसह देर् के भाइ लाल मान लसह और जोरार्र लसह थे। गरीब का जन्म नगर,
जो कोररया ररयासत का मुख्यालय (राजधानी) था, में 1745 में हुअ था। गरीब ने भाइ लाल मान लसह को
चााँगभखार की ज़ाग़ीर दी, णजसका मुख्यालय भरतपुर था।
चौहान भैया मान लसह चााँगभखार का प्रथम शासक हुअ। आसके ईपरााँत भैया जंजीत लसह, भैया
बलभद्र लसह और भैया महार्ीर लसह (भतीजा) शासक हुए।
1896 में बलभद्र का णनधन होने पर ईनका भतीजा महार्ीर लसह चााँगभखार का शासक हुअ।
ईसका जन्म 1879 में हुअ था। ईसका एक ऄन्य चाचा लाल बजरं ग लसह राजकाज देखता था। बजरं ग का
प्रशासन ढु लमुल था। 1899 में ऄंग्रेजों ने महार्ीर को सनद दी और फ्युडटे री चीफ माना। महार्ीर ने व्यस्क

390

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.7

391

रघुर्ीर प्रसाद-झारखण्ड-झनकार,पृ.96

392

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन,पृ.10

393

http://koreakumar.com/

394

Dr.Ram Chandra Sing deo-Socio-economic History and Administrative set-up of Korea state,P.7-8

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होने पर 1900 में शासन का प्रभार ऄपने हाथ में णलया। 1899 की सनद को कु छ संशोधनों के साथ पुनः
1905 में ददया गया। यह संशोधन बंगाल से मध्य प्रााँत में अने के कारण अर्श्यक हो गए थे। ऄब
चााँगभखार ररयासत बंगाल प्रााँत की छोटा नागपुर (रााँची) कमीश्नरी से सेंरल प्रोलर्स और बरार की रायपुर
णस्थत छत्तीसगढ़ कमीश्नरी के रायपुर णस्थत पाणलरटकल एजेंट के ऄधीन अ गइ।
भैया महार्ीर लसह के पुत्र नहीं था। ऄतः ईसने पूर्वज भैयाथान (णझलणमली) के चौहान भैया
बहादुर पररर्ार से क़ृ ष्ण प्रताप लसह को लगभग 1929-30 में गोद णलया। आससे नया णर्र्ाद जन्मा।
कोररया के चौहान चााँगभखार और र्हााँ के पररर्ार पर ऄपना ऄणधकार समझते थे, जो ईनकी शाखा के
र्हााँ जाने से स्र्भाणर्क भी था। ऄतः कोररया के शासक चौहान पररर्ार द्वारा ऄंग्रेजों के समझ र्ाद प्रस्तुत
कर ऄपना दार्ा प्रस्तुत दकया गया। यह णर्र्ाद लन्दन की प्रीर्ी काईं णसल तक गया और ऄंततः कोररया का
दार्ा ऄमान्य हुअ।
भैया महार्ीर लसह के ईपरााँत ईनका दत्तक पुत्र कृ ष्ण प्रताप लसह शासक हुअ। र्ह ररयासत के
भारत में णर्लीन होने तक शासक रहा।
चााँगभखार ररयासत के 129 ग्रामों में से 85 ग्राम पंचर्षीय एकमुश्त लगान ठे के में ददए गए थे।
शेष ग्रामों में 3 जमीन्दारी, 7 खोरपोशदारी, 5 ज़ाग़ीर और 18 मुअफी के थे। शेष 8 खाम और 3 ईजर थे।
भरतपुर से पहले राजधानी या मुखयालय जनकपुर था।

णसरगुजा [या छोटा (चुरटया) नागपुर या झारखण्ड] समूह की ररयासतों का मानणचत्र णनम्ांदकत है।

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मानणचत्र 3 - छतीसगढ़ की 5 ररयासतों के मानणचत्र

स्रोतः- डा.संजय ऄलंग कृ त्त कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन

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दो- जमीन्दाररयााँ:छत्तीसगढ़ की जमीन्दाररयााँ:छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जमीन्दाररयों की संख्या भी ऄणधक थी। आनका आणतहास राज्य और ररयासत के
शासकों से णभन्न होता था। आनका शासन और प्रशासन भी णभन्न होता था। आनमें से तो कइ ईनसे भी ऄणधक
प्राचीन थे। ऄतः स्पष्ट है दक, छत्तीसगढ़ के आणतहास पर चचाव यहााँ की जमीन्दाररयों की चचाव के णबना ऄधूरी
है। यह र्ह जमीन्दाररयााँ नहीं हैं जो ररयासतों के ऄधीन थीं और णजनका उपर ररयासतों के साथ ईल्लेख
अया है। यह ररयासतों से पृथक आकाइयााँ थीं। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में ईनका णर्कास तो हुअ ही और र्े स्थाणपत
भी हुईं।
जब कल्चुरी लोग छत्तीसगढ़ अए, तब ईन्होंने खुले क्षेत्रों को तो ऄपने ऄणधकार में कर णलया, परं तु
र्ह क्षेत्र जहााँ दकसी का ऄणधकार था, ईसे ऄधीन ला कर समान्यतः ऄपदस्थ नहीं दकया और ईससे
ऄधीनता णस्र्कार करा जमीन्दारी के रूप में छोड़ ददया।395
प्रमुख सत्ता (जैसे कल्चुरी) के सीधे शासन का क्षेत्र खालसा कहलाया और शेष क्षेत्र जमीन्दारों द्वारा
शाणसत था। र्े ही कानून और व्यर्स्था तथा प्रशासन बनाए रखने और लगान र्सूली हेतु ईत्तरदायी होते
थे। कु छ लोग र्सूली का एक ऄंश प्रमुख सत्ता को देते थे और आस प्रकार ईसकी ऄधीनता स्र्ीकरते थे, पर
ऄणधकांश जमीन्दार ऐसा नहीं करते थे और ऄधीनता स्र्ीकरते थे। ऐसे जमीन्दार मुख्य सत्ता को
अर्श्यकता पड़ने पर सहायता करने को प्रणतबि थे।396
आस प्रकार जमीन्दाररयााँ स्र्तंत्र आकाइ बनी रहीं। आससे परम्परा, रीणत और भूणम व्यर्स्था बनी
रहती थी और णर्द्रोह की णस्थणत नहीं बन पाती थी। हालााँदक मुख्य सत्ता के कमजोर होते ही जमीन्दार
स्र्तंत्र होने को छटपटाने लगते थे।
सरगुजा में भी जब राकसेलों ने स्थाणनय जनजाणतयों यथा- खैरर्ार, गोंड़, कं र्र अदद को हटा कर
सत्ता हणथया ली तब ईसके ईपरााँत र्हााँ के स्थाणनय प्रमुखों के ऄणधकारों में दखल या पररर्त्तवन नहीं
दकया।397 कोररया क्षेत्र में चौहानों ने भी ऐसा ही दकया।398
जब मराठे छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अए तो ईन्होंने जमीन्दारी क्षेत्र को खालसा में लाना प्रारम्भ दकया,
पर र्े स्थाणनय पररणस्थणतयों में पररर्त्तवन नहीं कर पाए और स्र्यं ईसमें ढ़ल गए। ईन्होंने (राज)नााँदगााँर्,
खुज्जी और छु इखदान की तीन नइ जमीन्दाररयााँ सृणजत कर दीं और पुरानी जमीन्दाररयों को बने तो रहने
ददया, पर ईन्हे कर देने र्ाले अणश्रत क्षेत्र में बदल ददया। आस कर को रटकोली की संज्ञा दी गइ।399
कल्चुरी काल में जमीन्दारी सैणनक सेर्ा के बदले दी गईं थी और मराठा काल में रटकोली के
बदले।400 ऄतः र्े कर देने र्ाला अणश्रत क्षेत्र हो गईं। ऄब बड़ी राणश भेंट देने की परम्परा प्रारम्भ हुइ, जो
बढ़ती ही गइ।401 ऄतः अपसी सम्बन्ध सहज न हो कर व्यार्साणयक हो गए। जमीन्दार कानून और व्यर्स्था
से भी णर्मुख से होने लगे। ऄशााँणत और ऄव्यर्स्था का बोलबाला हो गया। आससे राजस्र् बसूली को

395

Dr.Hira Lal-History of M.P.

396

Chisham setelment report

397

D.E.Bret-Fudetery state of Chhattisgarh और रफशीड ररपोटव

398

डा.संजय ऄलंग-कोररया ररयासत का प्रशासणनक ऄध्ययन

399

Jenkinson report

400Chisham
401

setelment report

Chisham setelment report

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णपछड़ना ही था। ऄतः अय में कमी हो गइ।402 मराठा सूबा (सूबेदार) से जमीन्दार सम्बन्ध खराब हो
णर्रोधी के हो गए। के शर् गोपाल के सूबा काल में तो मुखर रूप से सामने भी अ गए।403 जमीन्दारों पर
रटकोली की दकस्तें बकाया ही रहतीं और सैन्य बल का प्रयोग करना पड़ता था। रटकोली णनधावरण और र्ृणि
भी, नागपुर से, मनमानी से होती थी, जो ऄसंतोष का कारण था।
जब प्रथम बार ऄंग्रेज मराठों के एजेंट के रूप में शासन करने अए तो, ईन्होंने मुख्य सत्ता और
जमीन्दारों के सम्बन्ध को णलणखत बना स्पष्ट और णनयणमत करने का प्रयत्न दकया। आससे सुस्पष्ट कानूनी
सम्बन्ध प्रारम्भ हुए। मराठों से जमीन्दारों का सम्बन्ध रटकोली देने का था और र्े ऄपने क्षेत्र में स्र्तंत्र प्राय
होते थे। परंतु एग्न्यु ने आसे णनयणमत और ऄणभणलणखत कर हस्ताक्षररत दस्तार्ेज में बदल ददया। णलणखत,
स्पष्ट और कानूनी दस्तार्ेज की नींर् पड़ी। आसे आकरारनामा कहा गया।
कणथत कानूनी आकरारनामा में णनष्ठार्ान रहना प्रमुख शतव थी। अक्रमण और ऄणनयणमताओं पर
रोक लगा दी गइ। णिरटश सेना के दबार् से अज्ञाकाररता को स्थान णमला। जमीन्दारों के न्याय ऄणधकार
सीणमत और स्पष्ट कर ददए गए। ऄपील का प्रार्धान दकया गया, जो ऄंग्रेज न्यायालयों या ऄणधकाररयों को
थी। करों और ईसकी र्सूली की स्पष्टता बनाइ गइ।404 ऄब र्े के णन्द्रय शणि पर अणश्रत हो गए। हालााँदक
परम्परागत र्सूली जमीन्दारों के ही पास रही। धीरे -धीरे ऄणधकााँश कर ऄंग्रेजों को चले गए। करों को युणियुि ऄर्श्य दकया गया, परं तु णिरटश णहतों को ध्यान में रख कर।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र का लगभग एक णतहाइ भाग जमीन्दारी क्षेत्रों में था। सभी की रटकोली पृथक थी,
जो र्े ऄंग्रेज सत्ता को देती थीं।405 जमीन्दाररयों की संख्या भी ऄणस्थर रही। फारेन पाणलरटकल करस्पांडस
ें
फाइल के ऄनुसार छत्तीसगढ़ क्षेत्र की जमीन्दाररयााँ णनम्ााँदकत (कु ल 33) थी।:1.ईपरोड़ा, 2.के न्दा, 3.कोरर्ा (जो बाद में कोरबा कहलाया), 4.कं तेली (मदनपुर),
5.चाम्पा (जो बाद में चााँपा कहलाया), 6.छु री, 7.माणतन, 8.पेंडरा (पेंड्रा), 9.पंडररया,
10.लाफा, 11.णर्न्द्रानर्ागढ़, 12देर्री, 13फफगेशर्र, 14.कटगी, 15.कौणड़या, 16.खररयार,
17.भटगााँर्, 18.णबलाइगढ़, 19.नराव, 20.फु लझर, 21.सुऄरमाल, 22.औंधी, 23.बरबसपुर, 24.डोंडीलोहारा, 25.गंडइ, 26.गुंडरदेही, 27.खुज्जी, 28.कोमचा, 29.पनर्ाड़ा, 30.परपौड़ी, 31.सहसपुरलोहारा, 32.णसल्हेंटी और 33.ठाकु र टोला।
आनका पृथ्क-पृथक णर्र्रण णनम्ांदकत है।406:ईपरोड़ाःईपरोड़ा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 448 र्गवमील था। आसमें 86 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार ऄपने नाम
के पूर्व दीर्ान लगाते थे। आसे ईपरोड़ा-चौरासी भी कहा जाता था।
पहले यह जमीन्दारी दकसी िाह्मण पररर्ार के पास थी।
कल्चुरी काल में सोलहर्ीं शताब्दी के णद्वतीय भाग में पेंडरा (पेंड्रा) जमीन्दार णहन्दु लसह (बाद में
आस पेंड्रा जमीनदार के कु नबे से ही लोग कइ जमीन्दाररयों यथा- के न्दा, ईपरोड़ा और माणतन अदद पर
402

युरोणपयन यात्री फारे स्टर का णर्र्रण

403

कोलिुक ररपोटव

404

टेम्पल ररपोटव और एटफकस-कलेक्शन अफ ररटीज़, आं गेज़मेंटस एण्ड सनदस,र्ाल्यूम-1

405

फारे न पाणलरटकल करस्पांडेंस फाइल

406

छत्तीसगढ़ ददग्दशवन

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काणबज़ हुए) के दो पुत्रों में से एक पूरनमल के पुत्र णहम्मत राय ईपरोड़ा पर अक्रमण कर िाह्मण जमीन्दार
का णसर कमल कर जमीन्दारी पर ऄणधकार कर णलया। कल्चुरी शासक ने आस ऄपराध पर णहम्मत को कै द
कर काराग़ार में डाल ददया।
णहम्मत राय का सेर्क मोहररया गाड़ा स्र्ामीभि और मोहरी बजाने में प्रर्ीण था। लगभग 1584
इ. (1641 णर्.सं.) के , ईसने कल्चुरी शासक के णनर्ास के नीचे मधुर तान बजा, ईसे मोणहत और प्रसन्न कर
ददया। तब ईसने कल्चुरी शासक से णहम्मत की ररहाइ मााँगी, जो दे दी गइ। साथ ही ईपरोड़ा चौरासी की
जमीन्दारी भी दे दी गइ।
मराठा काल में णहम्मत के र्ंशज ऄजमेर लसह और णशर् लसह जमीन्दार थे। तब रटकोली
1,200
की गइ, जो प्राथवना करने पर
480 कर दी गइ।
के न्दाःके न्दा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 299 र्गवमील था। आसमें 92 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार ऄपने नाम के
पूर्व ठाकु र लगाते थे। यह भी पेंड्रा के ईक्त्त णहन्दु लसह से सम्बणन्धत थी।
यह कहा जाता है दक, रतनपुर के कल्चुरी शासक द्वारा रीर्ााँ पर कू च दकया गया। राणत्र में घने र्न
में मशालें बुझ गईं। घनघोर ऄन्धेरे छा गया। तब णहन्दु लसह के पुत्र र्ीर जसकरन ने हथेणलयों से णतल मसल
कर तेल णनकाला और ईससे मशालें जलाइ गईं। जब कल्चुरी शासक को यह ज्ञात हुअ तो ईसने जसकरन
को कें दा जमीन्दारी दे कर पुरस्कृ त्त दकया। एक ऄन्य तथ्य यह भी कहा जाता है दक, पेंड्रा के णहन्दु लसह की
तीसरी पीढ़ी के जमीन्दार के दो पुत्र थे। आनमें से कणनष्ठ संर्त लसह को कल्चुरी तख्त लसह ने 1691 में कें दा
की जमीन्दारी दी। तदुपरांत ईसका ही र्ंश जमीन्दार रहा।
कें दा बेलगहना के समीप कोमोघाट के नीचे है।
मराठों द्वारा
427 की रटकोली णनयत की गइ थी।
कोरर्ाःकोरर्ा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 856 र्गवमील था। आसमें 341 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार भी ऄपने
नाम के पूर्व दीर्ान लगाते थे। यह एक बड़ी जमीन्दारी थी।
कोरर्ा शब्द, णजसे बाद में कोरबा कहा जाने लगा, जनजाणत कोरर्ा से बना। यह कोररया के
णर्स्ताररत भू पट्टी का भाग माना जा सकता है। कभी यह सरगुजा-कोररया के प्रभार् क्षेत्र में था। बहुत बाद
में आसे रतनपुर में भी णमला णलया गया था।
चीज़म के ऄनुसार, लगभग 1520 में कल्चुरी बहार साय ने सरगुजा से कोरर्ा को छीना। ईसी
समय आसने पठानों को कोसगइ-छु री में हराया था।
कोरर्ा के जमीन्दार सदा णर्द्रोह को लालाणयत रहते थे। मराठों ने आन्हें खूब तंग दकया। णबम्बा ने
रटकोली नहीं पटाने पर जमीन्दारी तक जप्त कर ली थी, पर ईसके कमवचारी शीघ्र ही कोरर्ा से भगा ददए
गए। जब णबम्बाजी को
2,000 की भेंट दी गइ तो र्ह मान गया और जमीन्दारी भरत लसह को र्ापस
407
कर दी।
आस जमीन्दारी की ऄंणतम जमीन्दार मणहला धनराज कुाँ र्र थी।
आस जमीन्दारी का कु दुरमाल कबीरपंणथयों का तीथव है, जहााँ ईनके गुरू की गद्दी है। आस पर, उपर,
कर्धाव ररयासत के णर्र्रण के समय चचाव की गइ है।
407

Chisham setelment report

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कं तेली (मदनपुर):कं तेली छोटी जमीन्दारी थी। आसका क्षेत्रफल 25 र्गवमील और आसमें सम्मणलत ग्राम संख्या 44 थी।
यहााँ के जमीन्दार भी ऄपने नाम के पूर्व ठाकु र लगाते थे।
आस जमीन्दारी के पूर्वजों के पास मुाँगेली की जमीन्दारी रही थी।
लगभग 1798 के नागपुर के भोंसला शासक रघुजी प्रथम का भाइ नानाजी जगन्नाथ पुरी यात्रा के
पड़ार् में मुंगेली रूके । ईसके कादफ़ले में से एक साथी ने जमीन्दार फ़तह लसह का ऄश्व छीना चाहा। आससे
झगड़ा होना ही था। आस झगड़े के कारण फ़तह कै द कर मुख्यालय रतनपुर भेज ददया गया। रतनपुर में सूबा
के शर् पंत ने ईसे तोप से ईड़र्ा ददया और जणमन्दारी जप्त कर ली। बाद में ईसके पररर्ार को जीर्कोपाजवन
हेतु मदनपुर का क्षेत्र दे ददया गया। बाद में आसमें लोरमी क्षेत्र भी जुड़ा। ऄब तत्कालीन जमीन्दार संतोष
लसह ने लोरमी से अकर मुंगेली को ऄणधकार में लेना चाहा और घेर णलया। तब तक ऄंग्रेज सत्ता प्रधान हो
चुकी थी। ईन्होंने संतोष को कै द में डाल ददया, जहााँ ईसकी मृत्यु हुइ। हालााँदक मदनपुर (कं तेली) की
जमीन्दारी ईसके पररर्ार को ही दे दी गइ।
स्पष्ट है दक कं तेली (मदनपुर) मुंगेली जमीन्दारी का एक ऄंश थी।
मुंगेली जमीन्दरी कल्चुरी कल्याण साय द्वारा तखत लसह को दी गइ थी। आसका एक जमीन्दार
पुखराज लसह था।
चाम्पाःचाम्पा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 105 र्गवमील था। आसमें 64 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार भी ऄपने
नाम के पूर्व दीर्ान लगाते थे।
आस जमीन्दारी का पूर्व नाम मदनपुर चौरासी था और मुख्यालय हसदो तट पर मदनपुर था। यहााँ
दकला खण्डहर भी हैं।
ऄंणतम जमीन्दार की 17 र्ीं पीढ़ी चल रही थी।
चाम्पा संज्ञा हेतु तीन तथ्य ददए जाते हैं। प्रथम- चम्पा र्ैश्या। णद्वतीय- हसदो का चाप बना
कर बहना। तृतीय- चम्पक पुष्प बहुलता।
आसे ऄब चााँपा कहा जाता है।
1780 तक चाम्पा जमीन्दारी में 23, 1867 में 44 और बाद में 64 ग्राम थे।
यह जमीन्दारी कल्चुरी बहार साय द्वारा राम लसग को दी गइ थी। तब यह और बड़ी जमीन्दारी
कही जाती है।
तदुपरांत जब रतनपुर में भोंसला णबम्बाजी था, तब ईसका खासगी सरदार मुहम्मद खााँ तारान
200 ऄश्वारोही और 500 पदाणत सैणनकों का ऄणधकारी था। ईसकी सेर्ा से प्रसन्न हो, ईसे ऄकलतरा,
लर्न, दककरदा, खरौद और मदनपुर के क्षेत्र ददए गए। र्ह आन पर ऄणधकार करने हेतु ऄपनी टुकड़ी सणहत
मदनपुर परगने के जााँजगीर में अ गया। मदनपुर जमीन्दार छत्रसाल दोनों पुत्र सणहत ईसके पास दौड़ा
अया और ऄपनी जमीन्दारी छीने जाने का कारण जानना चाहा। तब मुहम्मद ने कहा दक, ईसे यह सब नहीं
मालूम। ऄब छत्रसाल णबम्बा के पास गया। णबम्बा ने बाँटर्ार कर ददया और थोड़े से गााँर् (26) ईसे दे ददए।
ईसी समय ऄथावत लगभग 1780 में मुहम्मद ने आस मदनपुर चौरासी के दो बरहों ईमरे ली और कोठारी
कोरर्ा जमीन्दारी को दे ददए।

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छु रीःछु री जमीन्दारी का क्षेत्रफल 339 र्गवमील था। आसमें 143 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार ऄपने नाम के
साथ प्रधान लगाते थे। । यह जमीन्दारी, कं र्र लोगों की ऄणधकता के कारण, कं र्रान कही जाती थी।
आस जमीन्दारी क्षेत्र में कोसगाइ दकला है। आसे कल्चुरी बहार साय ने सोलहर्ीं शताब्दी में या तो
बनर्ाया या ईसका जीणोिार कराया था। यहााँ ईसका कोषाग़ार बनाया गया था। यहााँ से ही बहार साय के
दो णशलालेख णमले थे। एक में णतथी नहीं है और दूसरे में अणश्वन बदी 13 सम्र्त 1570 णर्क्रणम ऄंदकत है।
कोसगंइ (र्तवमान कोसंगा, छु री, णबलासपुर) में कोष हेतु दकला बनर्ाने से दूसरी राजधानी का भ्रम पैदा
हुअ। लूट अदद द्वारा धन भरने और पठानो की भूणम छीन ईन्हे सोन तक खदेड़ने में एक मंत्री माधर् का
ईल्लेख अता है।408
1741 में तत्कालीन जमीन्दार राधे लसह मराठों के हाथ मारा गया था, जब र्ह रतनपुर दकले की
रक्षा कर रहा था।
मराठों द्वारा
800 की रटकोली णनयत की गइ थी, णजसे 1797 में
1,200 दकया गया था।
ऄंणतम जमीन्दार भुर्न पाल लसह था।
माणतनःमाणतन जमीन्दारी का क्षेत्रफल 534 र्गव दकलोमीटर था। आसमें 109 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार भी
ऄपने नाम के साथ दीर्ान लगाते थे। यह भी पेंड्रा के पूर्व में ईल्लेणखत णहन्दु लसह से सम्बणन्धत थी। यह
सघन र्नाच्छददत्त क्षेत्र था। कहा जाता था दक,
ज़हर ददये न माहुर खाये ,
मरै ला होय तो माणतन409 जाये। 410
आसका प्रभार् स्थाणनय जन जीर्न पर भी पड़ा। र्नों और र्न जीर्ों ने ग्रामों के नाम णनधावरण में
भी ऄपनी भूणमका णनभाइ। यथा- परसा-भाटा, हाथी दुअरी, हाथी मोड़, हाथी परर्ाना, हाथीबाड़ी अदद।
पेंड्रा के णहन्दू लसह के र्ंशजों के हाथ अने के पूर्व 22 पीदढ़यों तक एक (राज)गोंड़ पररर्ार के पास,
यह जमीन्दारी, रही। ऄब आनके र्ंशज णसरी ग्राम में हैं। आनकी चौरासी (7 बरहों= गढ़) णछन जाने पर मात्र
एक बरहों (12 ग्राम) रह गया।
णर्.सं. 1699 में ईपरोड़ा जमीन्दार णहम्मत राय के कणनष्ठ पुत्र कल्याण लसह ने माणतन पर
ऄणधकार कर णलया। तब णसरी के तरफान गोंड़ ने ईसे मार कर बदला णलया, परं तु कल्चुरी राज लसह ने
कल्याण के र्ंशजों को ही जमीन्दार माना। तब से यह र्ंश माणतन का जमीन्दार हुअ।
मराठों द्वारा
700 की र्र्षषक रटकोली णनयत की गइ।

408

बा.च.जैन-ईत्कीणव लेख,पृ.27,138

409

यह कु छ स्थानों पर कोररया भी प्रयुि हुअ है।

410

मदन लाल गुप्ता- छतीसगढ़ ददग्दशवन(2),पृ.95। हालााँदक यह ईणि कोररया हेतु भी कही गइ।

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पेंडराःपेंडरा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 774 र्गवमील था। आसमें 225 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार ऄपने नाम
के पूर्व लाल लगाते थे।
पेंड़रा नाम लपड़ारी से बना है।
कहा जाता है दक, कल्चुरी अश्रय में दो भाइ थे- णहन्दू लसह और णछन्दू लसह। आन्हें एक सड़क के
दकनारे बोरा भर द्रव्य णमला। ईन्हों ने आसे कल्चुरी शासक को दे ददया। आस इमानदारी का आनाम पेंडरा
जमीन्दारी के रूप में ददया गया। आसके ईपरााँत ईनकी 12 पीदढ़यााँ यहााँ जमीन्दार रहीं।
अगे चल कर णहन्दू लसह के र्ंशज, पेंडरा के ईपरााँत, के न्दा, ईपरोड़ा और माणतन की जमीन्दाररय़ााँ
पाने में भी सफल रहे।
मराठों के अगमन के समय यह जमीन्दारी णहन्दू लसह के र्ंशजों के पास थी। 1798 में मराठों की
दृणष्ट टेढ़ी हुइ। आसके पूर्व मराठे मुंगेली और नर्ागढ़ पर कु दृणष्ट डाल चुके थे, णजसमें से मुंगेली का ईल्लेख
उपर अ चुका है। ऄतः जब मराठा सूबा के शर् पंत द्वारा जमीन्दार पृथ्र्ी लसह को रतनपुर अने का बुलार्ा
अया तो र्ह पहले ही अशंदकत हो सचेत हो गया। र्ह नहीं गया। ऄतः सूबा के शर् पंत ने जमीन्दारी जप्त
कर ली। पृथ्र्ी तीथव यात्रा का णनणमत्त कर भाग गया।
ऄब पेन्डरा जमीनदारी एक गोंड़ जमीन्दार को दी गइ।
1804 में सुहागपुर जमीन्दार द्वारा पेंडरा पर अक्रमण कर ददया गया। गााँर् को जला ददया गया।
तब भोंसला जमीन्दार धन लसह ने डट कर मुकाबला दकया और अक्रमणकाररयों को र्ापस भगा ददया। धन
लसह को आस र्ीरता के पुरस्कार स्र्रूप पेंडरा की जमीन्दारी दी गइ।
1818 में जब ऄंग्रेज सत्ता अइ और एग्न्यु छत्तीसगढ़ का सुपटरटेंडटें बना तो धन लसह के र्ंशज
ऄजीत लसह को जमीन्दारी दी गइ थी।
पंडररयाःपन्डररया जमीन्दारी का क्षेत्रफल 487 र्गवमील था और ईसमें 359 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार भी
ऄपने नाम के पूर्व ठाकु र लगाते थे।
पंडररया जमीन्दारी के साथ कर्धाव ररयासत का भी ईल्लेख अना स्र्भाणर्क है। क्योंदक, आसी से
कर्धाव के शासक सामने अए और दोनों की घणनष्ठता ऐसी थी दक, यदद ररयासत का शासक णनःसंतान हो
तो र्ह आस जमीन्दारी के र्ंशज को ही ईत्तराणधकारी बनाता था। आस पर, उपर, कर्धाव ररयासत के
णर्र्रण के समय चचाव की गइ है।
यह जमीन्दारी, तब के , णबलासपुर णजले में थी। पहले, पंड़ररया जमीन्दारी को, मुकुटपुर प्रतापगढ़
कहते थे।
यह जमीन्दारी कल्चुरी राज्य या ऄणधकार क्षेत्र से पृथक रही और आस कारण से छत्तीसगढ़ के नामों
के ईल्लेख में यह ईल्लेणखत नहीं होती है। यह गढ़ (तहसील जैसी आकाइ) मण्डला के गोंड़ शासक संग्राम
शाह के बार्न गढ़ों में से एक रहा हो सकता है।
यहााँ के जमीन्दार चन्द्रपुर से अए थे और पुलस्तगोत्री राजगोंड़ थे।
यह र्ंश करकट राय से प्रारम्भ हुअ। र्ह चन्द्रपुर से गढ़ा मण्डला अ गया था और ईसे मकड़ाइ का
शासक बनाया गया था।
करकट राय की 29 र्ीं पीढ़ी में हट्टे राय हुए। आनके सात पुत्र थे। बड़ा पुत्र प्रताप शाह मकड़इ का
शासक हुअ। कणनष्ठ पुत्र श्याम चन्द्र मण्डला चला गया। मण्डला के शासक द्वारा, ईसे, पण्डररया जमींदारी
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दी गइ और र्ह पण्डररया जमीन्दारी के आस र्ंश का संस्थापक हुअ। कहा जाता है दक, लगभग 1546 में
तब के पण्डररया जमीन्दार के णर्द्रोह को दबाने के कारण ईसे यह जमीन्दारी दी गइ थी।
यह र्ंश मण्डला के गोंड शासकों से ऄपने सम्बन्ध जोड़ता है। आन्ही की अठर्ीं पीढ़ी में दल शाह
हुए। आनके तीन पुत्र- पृथ्र्ी लसह, महाबली लसह और हरी लसह- थे। महाबली लसह द्वारा ही, लगभग 1760
में, कर्धाव ररयासत की स्थापना की गइ थी।411
पंडररया के गोंड़ और रतनपुर के भोंसलों में सदा लड़ाइ ही रही। जब नागपुर से ऄप्पा पलायन कर
गए और ईपद्रर्ों को बल णमला, तब भी पण्डररया का झुकार् ईपद्रर् की ओर रहा। यह भी सन्देह बना रहा
दक, ईनके सम्बन्ध सोहागपुर के णर्द्रोणहयों से हैं। आसी कारण से करद क्षेत्रों के हक णनधावरण के समय
पण्डररया को ररयासत का स्तर नहीं ददया गया।
मराठों द्वारा र्ार्षषक रटकोली
300 णनधावररत की गइ थी, णजसे 1798 में
800 कर ददया
गया।
लाफाःलाफा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 359 र्गवमील था। आस जमीन्दारी में 86 ग्राम थे। यहााँ के जमीन्दार
भी ऄपने नाम के पूर्व दीर्ान लगाते थे। यहााँ गढ़ी, मणन्दर (पाली), खण्डहर (तुम्माण) अदद प्राचीन णचन्ह
हैं।
यह कहा जाता है आस जमीन्दारी के जमीन्दार ददल्ली से अए राजपूत क्षत्रीय थे।
एक ताम्रपत्र के ऄनुसार, णजसे हीरा लाल सच्चा ही नहीं मानते हैं, राजा पृथ्र्ी देर् द्वारा लुंग रार्
को 120 ग्राम ददए गए का ईल्लेख णलखा गया है। आस पर 809 सन् ऄंदकत दकया गया है। ताम्रपत्र को झूठा
मानने का बल आस बात से भी णमलता है दक, लाफा कल्चुरी प्रशासणनक आकाइ गढ़ भी रहा था, न दक
जमीन्दारी।
लाफा से होकर णमजावपुर-रतनपुर का व्यापार मागव था।
मराठों द्वारा पहले
300 और बाद में
630 र्ार्षषक रटकोली णनयत की गइ थी।
णर्न्द्रानर्ागढ़:णर्न्द्रानर्ागढ़ का क्षेत्रफल 1,559 र्गवमील था। आसमें 446 ग्राम थे। यह बड़ी जमीन्दारी थी।
यह भी कल्चुरी प्रशासणनक आकाइ गढ़ रहा था और जमीन्दारी बाद में हुअ। तब आसे नर्ागढ़ कहा
जाता था, परं तु यह नाम आकाइ पहले से ऄणस्तत्र् में होने के कारण ईससे पृथ्क ददखाने को बेंदरा जोड़ा
गया, जो णर्न्द्रा हो गया। बेंदरा शब्द बन्दरों की बाहुल्यता से णलया गया।
पहले यह पटना के महाराज (?) के पास था, दफर (राज)गोंड़ जनजाणत के लोगों के प्रभार में अया।

देर्रीःदेर्री जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 82 र्गवमील था। आस जमीन्दारी में मात्र 37 ग्राम थे। यहााँ
लबझर्ार जनजाणत के जमीन्दार थे।
सोनाखान जमीन्दार भी आसी जनजाणत के थे, णजससे र्ीर नारायण लसह सम्बणन्धत रहे।
411

धानू लाल श्रीर्ास्तर्-ऄष्ट-राज्य-ऄम्भोज,पृ.91-92 की पाद रटप्पणी सणहत

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यह देर्री जमीन्दारी र्ह ही थी, णजसने ऄंग्रेजों को नारायण के णर्रूि सहायता दी थी। देर्री का
जमींदार ररश्ते में नारायण लसह का काका लगता था। सोनाख़ान और देर्री के जमींदारों की खानदानी
शत्रुता थी। नर्म्बर 1857 में देर्री में, नारायण लसह के णर्रूि, रायपुर के णडप्टी कणमश्नर णस्मथ को पूरी
मदद णमली और देर्री के प्रभाररयों द्वारा ही पथ प्रदशवन दकया गया। णस्मथ 30 नर्म्बर’ 1857 को खरौद
से देर्री पहुाँचा। देर्री का जमींदार ररश्ते में नारायण लसह का काका लगता था। सोनाख़ान और देर्री के
जमींदारों की खानदानी शत्रुता थी। देर्री में रहकर, णस्मथ ने, सोनाखान की ओर जाने र्ाले सभी मागों को
बन्द करने का प्रयास दकया णजससे नारायण लसह को बाहर से मदद नहीं णमल सके । सोनाखान र्ैसे भी र्नों
और पहाड़ो से णघरा हुअ था। देर्री में नारायण लसह के बदले णस्मथ को पूरी मदद णमली और देर्री के
तात्काणलन प्रभाररयों द्वारा ही मागव प्रदशवन दकया गया।412
देर्री में नारायण का भतीजा महराज साय ही ऄंग्रेजों का सहायक हुअ था और ईसे ही सोनाखान
भी दे ददया गया था। ऄतः नारायण लसह के पुत्र गोणर्न्द लसह ने कै द से छू टने के ईपरााँत, बदले की भार्ना
से प्रेररत हो, ईस पर अक्रमण कर हत्या कर दी।413
आसी ऄनुक्रम में सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय का णर्द्रोह भी महत्र्पूणव है, क्योंदक र्ह ऄंग्रेजों से लोहा
लेते हुए रायपुर तक अ पहुाँचे थे। गोणर्न्द लसह ने ईनके ही सहयोग से ऄंग्रेजों के सहयोगी देर्री जमीन्दार,
जो सोनाखान का पारम्पररक र्ैरी और नारायण लसह का भतीजा तथा ईसका कणज़न था, को तलर्ार से दो
टूक दकया था। तब सुरेन्द्र साय और गोणर्न्द लसह एक साथ ऄंग्रेजों से लोहा लेने लगे।
ईि सभी पर णर्र्रण णनम्ााँदकत है।:छत्तीसगढ़ में ऄणधक प्रचाररत णर्रोध सोनाखान के नारायण लसह का है ,णजसे बाद में र्ीर कहा
गया।
1819 में सोनाखान के जमींदार राम राय ने णर्रोधी स्र्भार् का प्रदशवन दकया। राम राय, नरायण
लसह के णपता थे। रामराय ने इस्ट आंणडया कम्पनी की साम्राज्यर्ादी अकांक्षा को भांप कर णर्रोध दकया था,
पर णर्रोध प्रभार्ी नहीं रहा। राम राय रायपुर णजले के बलौदा बाजार तहसील में सोनाखान नामक छोटे
रठकाने के लबझार्र जनजातीय के जमींदार थे। ऄतः यह प्रमुख णर्रोध भी जनजाणतय र्गव से ही ईठा।
छत्तीसगढ़ की ‘ररयासतों और जमीन्दाररयों’ तथा ‘जनजाणतयों और जाणतयों’ पर ऄणधक चचाव हेतु मेरे द्वारा
णलणखत आन णर्षयों की पुस्तकें पृथ्क से देखी जा सकती हैं।
स्र्तंत्रता के प्रणत लालसा और गुलामी का णर्रोध पररर्ार की परम्परा में था। रामराय के णपता
फतेनारायण लसह के समय में नागपुर के भोंसले ने छत्तीसगढ़ के कल्चुररयों को पदच्युत दकया था। तब
फतेनारायण लसह ने भोंसले के शासन को स्र्ीकार नहीं दकया था।
ईसी तरह जब सन् 1818 में भोंसले शासन और इस्ट आंणडया कम्पनी के बीच संणध के ऄनुसार
छत्तीसगढ़ की शासन व्यर्स्था इस्ट आंणडया कम्पनी को सौंप दी गइ, तो भी रामराय ने ऄंग्रेजों का णर्रोध
दकया था। सोनाखान की जणमन्दारी की सीमा में ईन्होंने ऄंग्रेजी सत्ता के कानून तथा अदेशों का पालन करने
से आंकार दकया। रामराय का प्रभार् सोनाखान जमींदारी और ईसके बाहर भी था और आसी कारण ऄंग्रेजों ने
रामराय पर यह अरोप लगाया दक, रामराय अतंक फै ला रहे हैं और ऐसे लोगों को शरण दे रहे हैं जो
412Rajendra
413

Verma-Raipur district Gazetteer,P.75

Chhattisagarh divisional records,Vol.-XIV of 1857

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ऄंग्रेजी सत्ता को नहीं मानते। ऄंग्रेजों ने 1819 में सोनाखान पर अक्रमण कर णर्रोध कु चल ददया। ऄंग्रेजों ने
संणध द्वारा सोनाखान जमींदारी की भूणम का भाग जप्त दकया और जमीन्दार के ऄणधकार भी सीणमत कर
ददए।
1795 में नारायण लसह लबझार्ार का जन्म हुअ था। र्ह णपता रामराय की मृत्यु ईपरांत सोनाखान
का प्रभारी हुअ।414
1856. में छत्तीसगढ़ में ऄकाल पड़ा। नारायण लसह व्यापाररयों द्वारा की जा रही, ऄन्न की
जमाखोरी से, णखन्न था। तब नारायण लसह ने एक व्यापारी के गोदाम का सारा ऄनाज छीन कर नागररकों
में बांट ददया। ईसने ऄंग्रेज णडप्टी कणमश्नर को भी, यह सूणचत, दकया। ऄंग्रेजी सत्ता तो नारायण लसह के
णर्रुि कारव र्ाइ करने के णलये बहाना ढू ंढ़ ही रही थी। ऄतः णर्परीत णस्थणत देख, र्ह भाग गया। व्यापारी
की लूट की ईि णशकायत पर नारायण लसह को 24 ऄक्टूबर 1856 को, सम्बलपुर में कै द कर, रायपुर जेल
में डाल ददया गया। ऄंग्रेजी सत्ता ने ऄकालग्रस्त दकसानों के बारे में सोचने र्ाले नारायण लसह पर लूटपाट
और डकै ती का अरोप लगाया।415 नारायण लसह को जेल की कोठरी में बंद कर ददया गया और शोषक
व्यापाररयों को संरक्षण ददया गया।
रायपुर के सैणनकों ने जेल में बन्द नारायण लसह को ऄपना नेता चुना और ईसकी सहायता भी की,
णजससे नारायण लसह 28 ऄगस्त 1857. को जेल से भाग णनकला।416
ईस र्ि सम्बलपुर के क्राणन्तकारी सुरेन्द्र साय हजारीबाग जेल में थे। आसके 28 ददन पहले सुरेन्द्र
साय भी 30 जुलाइ 1857 को जेल से भाग णनकले थे।
नारायण रायपुर जेल से भागकर सोनाखान पहुाँचे। ईसने 500 सैणनकों की एक टुकड़ी बनाइ। यह
सूचना जब रायपुर के णडप्टी कणमश्नर णस्मथ के पास पहुाँची तो र्ह नारायण लसह के णर्रूि सैणनक
कायवर्ाही करने को ईदत्त हुअ। लगभग 3 सप्ताह आस तैयारी में लग गए।
20 नर्म्बर 1857 को ऄंग्रेज सेना सोनाखान के णलये चल पड़ी। यह सेना पहले खरोद पहुाँची, यहााँ
पुणलस थाना था। यहााँ पहुाँच कर कटंगी, भटगांर्, णबलाइगड़ और देर्री के जमींदारों को सहायता के णलये
बुला भेजा गया। 26 नर्म्बर को णस्मथ को नारायण लसह का एक पत्र णमला णजसे ईसने पास बैठे एक
जमींदार से पढ़र्ाया। पढ़ते ही णस्मथ गुस्से से अग-बबूला हो ईठा। 28 नर्म्बर तक णस्मथ तैयारी करता
रहा। 29 नर्म्बर को णस्मथ की सेना खरोद से सोनाखान के णलए चली। णस्मथ आतना सचेत था दक, ईसने
रायपुर से जो सैणनक बुलर्ाये र्े मात्र ऄंग्रेज घुड़सर्ार थे। णबलासपुर से भी जो 50 सैणनक बुलर्ाये गये थे,
र्े भी ऄंग्रेज ही थे। ईनकी सेना में 80 बेलदार ही स्थानीय थे और ईन्हें सोनाखान पर अक्रमण के णर्षय में
बताए जाते ही, ईनमें से 30 बेलदारों ने सोनाखान जाने से मना कर ददया। णस्मथ 30 नर्म्बर को खरौद से
देर्री पहुाँचा। देर्री का जमींदार ररश्ते में नारायण लसह का काका लगता था। सोनाख़ान और देर्री के
जमींदारों की खानदानी शत्रुता थी। देर्री में रहकर, णस्मथ ने, सोनाखान की ओर जाने र्ाले सभी मागों को
बन्द करने का प्रयास दकया णजससे नारायण लसह को बाहर से मदद नहीं णमल सके । सोनाखान र्ैसे भी र्नों

414

Rajendra Verma-Raipur district Gazetteer,P.74

415

History of freedom movement in Madhya Pradesh,P.83

416

History of freedom movement in Madhya Pradesh,P.83

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और पहाड़ो से णघरा हुअ था। देर्री में नारायण लसह के बदले णस्मथ को पूरी मदद णमली और देर्री के
प्रभाररयों द्वारा ही पथ प्रदशवन दकया गया।417 1 ददसम्बर को यह सेना देर्री से सोनाखान हेतु चली।
सोनाखान के कु छ पहले, एक नाले के समीप नारायण लसह टूट पड़ा। अरणम्भक बौखलाहट के ईपरांत णस्मथ
ही सफल रहा। ईसे बाहरी सहायता भी णमली।
णस्मथ जब ऄपनी फौज के साथ सोनाखान पहुाँचा और देखा दक सारा गााँर् खाली पड़ा है तो ईसने
खाली घरों पर ही गोणलयााँ चलर्ाइ और ईसके बाद मकानों में अग लगा दी गइ। सुबह तक सोनाखान राख
के ढेर में बदल गया था।
नारायण लसह ने ऄणग्नकाण्ड की कल्पना नहीं की थी। र्ह एक पहाड़ी पर जा णछपा। सोनाखान के
मकानों में अग लगाकर णस्मथ जब ऄपने खेमे की ओर र्ापस जा रहा था, तभी एक पहाड़ी के पीछे णछपे
नारायण लसह ने गोलीबारी प्रारम्भ कर दी। 2 ददसम्बर को, णस्मथ को, कटंगी से भी मदद अ णमली और
पहाड़ी को घेर णलया गया। गोणलयााँ समाणप्त पर नाराय़ण लसह कै द कर णलया गया और ईन्हें पुनः रायपुर
जेल में डाल ददया गया।418 ईस पर राजद्रोह का र्ाद चला। 10 ददसम्बर’ 1857 को र्ीर नारयण लसह को
सुरक्षा व्यर्स्था के मध्य जय स्तम्भ चौक रायपुर में सार्वजणनक ऄमानर्ीय फााँसी पर चढ़ा मृत्युदण्ड ददया
गया।419
र्ीर नारायण लसह छत्तीसगढ़ का प्रथम ख्यात व्यणि हुअ, णजसने णर्देशी सत्ता के णर्रोध में शहादत
पाइ। हालााँदक कु छ ऄज्ञात लोग आस युि में ही शहीद हुए थे। स्पष्ट है दक, स्र्तंत्रता की प्रथम लचगारी
जनजातीयों से ही ईठी।
नारायण के पुत्र गोणर्न्द लसह को भी कै द दकया गया और र्ह नागपुर में 1860 तक कै द रहा।
सोनाखान को देर्री जमीन्दारों को दे ददया गया।

णचत्र 43 - जयस्तम्भ चौक, रायपुर

छत्तीसगढ़ में र्ीर नारायण लसह लोक अख्याणनक नायक बना। ईसके णलए लोक गीत भी प्रचणलत
हुए। यथाः-

417Rajendra

Verma-Raipur district Gazetteer,P.75

418

मध्य प्रदेश सन्देश,17 जून’1967,पृ.24

419

http://chhattisgarh.nic.in/profile/corigin.htm#history

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धधके लाणगस र्ीर बंगाल
ददल्ली के रं ग होंगे लाल
माणचस रकत होले फाग
अज़ादी की पहली राग
कांणपस ऄंगरे जी शासन
डोणलस लन्दन के असन
टूट पररस जर्ा हमर जर्ान
भाणगस दफरं गी ले के प्रान
छत्तीसगढ़ भी ठोदकस ताल
ऄठरा सौ सत्तार्न साल
गरणजस र्ीर नरायेन लसह
मेंरटस गए दफरं गी णचन्ह
मेंरटस सर्ै दफरं गी णचन्ह ।420
देर्री में नारायण का भतीजा महराज साय ही ऄंग्रेजों का सहायक हुअ था और ईसे ही सोनाखान
भी दे ददया गया था। ऄतः नारायण लसह के पुत्र गोणर्न्द लसह ने कै द से छू टने के ईपरांत, बदले की भार्ना
से प्रेररत हो, ईस पर अक्रमण कर हत्या कर दी।421
स्र्यं गोणर्न्द लसह भी सम्बलपुर के क्रााँणतकारी सुरेन्द्र साय से जा णमला और ऄंग्रेजों का णर्रोध करने
लगा और ऄब आसकी गूाँज रायपुर से बस्तर तक हो गइ। ऄंग्रेजों द्वारा दोनों पर पुरस्कार घोणषत दकया गया।
23 जनर्री’1864 को सुरेन्द्र णघर गए और कै द कर ऄसीरगढ़ दकले में रखे गए, जहााँ यातनाओं के
मध्य मृत्युपयंत रहे। र्ह ऄन्धे हो गए और 28 फरर्री’1884 को काल कलणर्त हुए। गोणर्न्द ने ऄंग्रेजों से
सणन्ध कर ली। हालााँदक गोणर्न्द के णर्द्रोह को कम ही याद दकया जाता है।
आसी ऄनुक्रम में सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय का णर्द्रोह भी महत्र्पूणव है, क्योंदक र्ह ऄंग्रेजों से लोहा
लेते हुए रायपुर तक अ पहुाँचे थे। गोणर्न्द लसह ने ईनके ही सहयोग से ऄंग्रेजों के सहयोगी देर्री जमीन्दार,

420

समकालीन भारतीय साणहत्य (साणहत्य ऄकादेमी,ददल्ली),ऄंक-132,जुलाइ-ऄगस्त’2007,पृ.8

421

Chhattisgarh divisional records,Vol.-XIV of 1857

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जो सोनाखान का पारम्पररक र्ैरी और नारायण लसह का भतीजा तथा ईसका कणज़न था, को तलर्ार से दो
टूक दकया था।
तब सुरेन्द्र साय और गोणर्न्द लसह एक साथ ऄंग्रेजों से लोहा लेने लगे। यह प्रणतरोध, रायपुर से
बस्तर तक, गूाँजने लगा। दोनों को ऄपराधी घोणषत कर आनाम रखा गया। 23 जनर्री’1864 को सुरेन्द्र साय
घेरने के ईपरांत कै द कर णलए गए।
रायगढ़ के शासक देर्नाथ लसह ने 1857 की क्रााँणत के समय ऄंग्रेजों की सहायता की। ईसने
क्रााँणतकारी और णर्द्रोही सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय और ईदयपुर के णशर्राज लसह को साणथयों सणहत पकड़
कर ऄंग्रेजों के हर्ाले कर ददया।
ईदयपुर छत्तीसगढ़ की ररयासत थी। बाद में यह धमवजयगढ़-पत्थलगााँर् का क्षेत्र कहलाया। 1857
क्रााँणत से सम्बध, आस णशर्राज लसह के र्ारे में ऄभी णलखा नहीं गया है और छत्तीसगढ़ के 1857 के आणतहास
में ईन्हें सामन्यतः ईल्लेणखत नहीं दकया जाता है।
सुरेन्द्र साय को साणथयों सणहत असीरगढ़ दकले में कै द रखा गया। यातनाएाँ दी गईं। र्ह ऄन्धे भी हो
गए। गोणर्न्द ने हार मान ऄंग्रेजों से सणन्ध कर ली। 28 फरर्री’1884 को प्रातः दस बजे सुरेन्द्र साय
ऄसीरगढ़ में ही मृत्यु को प्राप्त हुए।

फफगेश्वरःफफगेश्वर जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 179 र्गवमील था। आसमें मात्र 86 ग्राम थे।
यहााँ का जमीन्दार र्ंश कइ शताणब्दयों से जमीन्दार था। 16 र्ीं शताब्दी में कल्चुरी शासकों ने
जमीन्दारों की सूणच बनर्ाइ थी, ईसमें आसका भी नाम था। ऄतः आसे छत्तीसगढ़ क्षेत्र का प्राचीनतम
जमीन्दार भी कह सकते हैं। यहााँ के जमीन्दार गोंड़ जनजाणत के थे।
मराठों द्वारा फफगेश्वर जमीन्दारी की र्ार्षषक रटकोली
300 णनयत की गइ थी।
कटगीःकटगी जमीन्दारी क्षेत्रफल मात्र 57 र्गवमील था। आसमें मात्र 42 ग्राम थे।
यह जमीन्दारी लगभग ऄठारहर्ीं शताब्दी के प्रारम्भ में कल्चुरी शासक द्वारा गोंड़ जनजाणत के
मांझी भरर्ार को दी गइ थी। ईसे यह णजम्मेदारी दी गइ थी दक, र्ह कटगी जमीन्दारी से हो कर जगन्नाथ
पुरी जाने र्ाले मागव से यात्रा करने र्ाले तीथव याणत्रयों की रक्षा करे गा। णबलाइगढ़ भी आसी कायव हेतु साथ में
ददया गया था, णजसका ईल्लेख अगे अएगा। भरर्ार और ईसके र्ंश माणझयों ने आसका पालन दकया।
भरर्ार मांझी की मृत्यु के ईपरााँत ईसके पुत्रों- गुमान लसह और सुखी राम- में लड़ाइ हो गइ और
बाँटर्ारा हो गया। गुमान को कटगी और सुखी को णबलाइगढ़ णमला। बाद में गुमान के र्ंश में कोइ नहीं रहा
और पुनवएकीकरण हो गया। हालााँदक बाद में, मराठों के समय, दोनों जमीन्दाररयााँ ऄलग-ऄलग ही रही और
ऄलग-ऄलग ही रटकोली ली गइ।
मराठों ने कटगी हेतु र्ार्षषक रटकोली
300 णनयत की थी।

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कौड़ीयाःकौणड़या जमीन्दारी का क्षेत्रफल 295 र्गवमील था। आसमें 155 ग्राम थे।
कौणड़या खालसा ताल्लुका था। आसे कल्चुरी लोगों ने ऄपने ही पास रखा था। हैहय र्ंश के लोग ही
यहााँ ऄणधकारी हुए। जब यह ताल्लुका कइ र्षों तक ईनके पास रहा तो जमीन्दारी में तब्दील हो गया और
ताल्लुकेदार जमीन्दार कहलाने लगे, जो कइ पीढ़ी रहे।
ऄंत में रञीत लसह और तदुपरांत ईनकी णनःसंतान मृत्यु पर ईनकी णर्धर्ा णर्ष्णुणप्रया देर्ी
जमीन्दार रहे।
मराठों द्वारा र्ार्षषक रटकोली
300 णनयत की गइ थी।
खररयारःखररयार जमीन्दारी का क्षेत्रफल 1,489 र्गवमील था। आसमें 606 ग्राम थे। यह बड़ी जमीन्दारी थी।
यह माना जाता है दक, णबहार के जयपुर के महाराज ने पुत्री का णर्र्ाह पटना के महाराज प्रताप
देर् के कणनष्ठ राजकु मार से दकया था और खररयार जमीन्दारी को दहेज में ददया गया था। तब यह
जमीन्दारी चौहान क्षणत्रयों के ही पास रही।
आसमें खोलागढ़, गौरागढ़ और कु मारगढ़ भी सम्मणलत थे।
भटगााँर्ःभटगााँर् जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 64 र्गवमील था। आसमें मात्र 60 ग्राम थे। यह छोटी जमीन्दारी
थी।
भटगााँर् जमीन्दारी का जमीन्दार पररर्ार लम्बे काल से आस जमीन्दारी में रहे। यह जमीन्दारी भी
लबझर्ार जनजाणत के पास थी।
17 र्ीं शताब्दी में जब यह जमीन्दारी कल्चुरी प्रभार् में अइ, तो कल्चुरी लोगों ने यहााँ की
जमीन्दारी से पााँच पीढ़ी तक कोइ कर नहीं णलया। आस प्रसन्नता का कारण ऄभी ज्ञात नहीं है। छठी पीढ़ी
मराठों के समय अइ और रटकोली णनयत की गइ।
भटगााँर् जमीन्दारी के जमीन्दार पररर्ार का एक पूर्वज जोगीराम, कल्चुरी कल्याण साय के साथ
ददल्ली तक गया था, जब कल्याण को जहााँगीर के दरबार ले जाया गया था।
हालााँदक कु छ समय ईपरााँत कल्चुरी आनसे कु णपत भी हो गए। यह लबझर्ार जमीन्दार पररर्ार
महानदी पार कर सम्बलपुर क्षेत्र के र्नों में भाग गया।
बाद में आसमें दककररदा ताल्लुका भी जुड़ा।
मराठों द्वारा र्ार्षषक रटकोली
400 णनयत की गइ थी, णजसे 1819 में घटा कर
300 दकया
गया।
णबलाइगढ़ःणबलाइगढ़ जमीन्दारी का क्षेत्रफल 112 र्गवमील था। आसमें 74 ग्राम थे।
पहले आसके जमीन्दार मैना जनजाणत के रहे थे। मैना लोगों धमतरी की णबलाइ माता को आष्ट देर्ी
मानते हैं। आस्से से नाम णबलाइगढ़ पड़ा।
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पहले यह बरहों था और फु लझर जमीन्दारों के प्रभार् क्षेत्र में था, जो गोंड़ जनजाणत के थे।
फु लझर जमीन्दार गोंड़ पररर्ार से छत्तीसगढ़ के ऄणधकांश गोंड़ शाखाएाँ पल्लणर्त हुइ थीं।
कल्चुरी सत्ता के स्थाणपत होने पर ईन्हे लगातार यह णशकायत पहुाँचने लगी दक, णबलाइ गढ़ क्षेत्र से
जगन्नाथ पुरी हेतु जो रास्ता जाता है, ईससे जाने र्ाले तीथव याणत्रयों को पहाड़ो पर रहने र्ाले गोंड़ लोग
बहुत परे शान करते हैं। ऄतः कल्चुरी सत्ता द्वारा भरर्ार मांझी को, तीथव याणत्रयों की रक्षा की शतव के साथ,
णबलाइगढ़ और कटगी के क्षेत्र ददए गए। कटगी का ईल्लेख उपर अ चुका है। आसका पररणाम ठीक णनकला
माझी लोगों ने यह कायव बखूबी ऄंजाम ददया और र्े दो शताब्दी से भी ऄणधक आस प्रभार में बने रहे।
भरर्ार मांझी की मृत्यु के ईपरााँत ईसके पुत्रों- गुमान लसह और सुखी राम- में लड़ाइ हो गइ और
बाँटर्ारा हो गया। गुमान को कटगी और सुखी को णबलाइगढ़ णमला। बाद में गुमान के र्ंश में कोइ नहीं रहा
और पुनवएकीकरण हो गया। हालााँदक बाद में, मराठों के समय, दोनों जमीन्दाररयााँ ऄलग-ऄलग ही रही और
ऄलग-ऄलग ही रटकोली ली गइ।
मराठों द्वारा र्ार्षषक रटकोली
660 णनयत की गइ थी, णजसे 1819 में घटाकर
500 दकया
गया था।
नरावःनराव जमीन्दारी बहुत छोटी थी। आसका क्षेत्रफल मात्र 29 र्गवमील था। आसमें मात्र 16 ग्राम थे।
पहले यह क्षेत्र खररयार जमीन्दारी में था। लगभग 330 र्षव पूर्व यह क्षेत्र खररयार जमीन्दार द्वारा
पुत्री के णर्र्ाह में दहेज में ददया गया।
मराठों द्वारा 1883 में र्ार्षषक रटकोली
75 णनयत की गइ थी।
फु लझरःफु लझर जमीन्दारी का क्षेत्रफल 842 र्गवमील था। आसमें 527 ग्राम थे। यह महत्र्पूणव जमीन्दारी
थी।
यहााँ के जमीन्दार चााँदा के जनजातीय गोंड़ राजपररर्ार से थे। कोइ 400 र्षव पूर्व गोंड हटराज
साय ने दकसी जनजातीय शासक को पराणजत कर आस क्षेत्र पर ऄणधकार दकया था।
हटराज साय की चौथी पीढ़ी में णत्रभुर्न साय हुअ। आसके काल में आस र्ंश की ऄन्य (लहुरी या
कणनष्ठ) शाखाएाँ सारं गढ़, रायगढ़, सिी, सुऄरमाल अदद स्थानों पर भी बसीं।
छत्तीसगढ़ के कइ शासक और जमीन्दार पररर्ार फु लझर को ही ऄपना र्ंश स्रोत्त मानते हैं।
सुऄरमालःसुऄरमाल जमीन्दारी का क्षेत्रफल 199 र्गवमील था। आसमें 102 ग्राम थे।
कल्चुरी काल में यह खालसा ताल्लुका थी। लगभग 300 र्षव पूर्व ताल्लुकेदार णर्द्रोह हेतु ईदत्त
हुअ। ऄतः यह क्षेत्र जमीन्दारी बना कर गोंड़ जनजाणत के ईस व्यणि को दी गइ, णजसने णर्द्रोह दमन में
सहायता की थी। ईसका नाम पूरन राय था। तब से आस र्ंश की 13-14 पीदढ़यााँ यहााँ जमीन्दार रहीं।
यह कहा जाता है दक, एक भयानक सुऄर द्वारा आस क्षेत्र में ईपद्रर् कर अतंक फै लाया गया था। ईसे
पूरन द्वारा मार डाला गया। आससे सुऄरमाल नाम प्रचणलत हुअ।

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एक ऄन्य तथ्य यह कहा जाता है दक, पहले यह क्षेत्र साँर्रा जनजाणत के ऄधीन था। आससे साँर्रमाल
नाम पड़ा, जो बाद में सुऄरमाल हो गया।
मराठों द्वारा 1775 में, र्ार्षषक रटकोली,
500 णनयत की गइ थी।
औंधीःऔंधी जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 81 र्गवमील था। आसमें मात्र 43 ग्राम थे।
पहले यह क्षेत्र पनर्ाड़ा जमीन्दारी का भाग था और बाँटर्ारे मे पृथ्क हुअ था।
यहााँ के जमीन्दारों का र्ंश अगे नहीं चल पाने के कारण यह क्षेत्र पुनः मूल जमीन्दारी पनर्ाड़ा में
ही समाणहत कर ददया गया।
बरबसपुरःबरबसपुर जमीन्दारी का क्षेत्रफल ऄत्यणधक कम ऄथावत मात्र 32 र्गवमील था। आसमें मात्र 23 ग्राम
थे।
पहले यह क्षेत्र गड़इ जमीन्दारी का भाग था। जमीन्दार गोंड़ जनजाणत का था। बाजी रार् भोंसला
के काल में आसे गड़इ क्षेत्र से ऄलग कर, जमीन्दार को ठाकु र की पदर्ी दी गइ।
मराठों द्वारा र्ार्षषक रटकोली
124 णनयत की गइ थी।
डोंड़ी-लोहाराःडोंड़ी-लोहारा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 280 र्गवमील था। आसमें 147 ग्राम थे।
पहले यह गोंड़ जनजाणत के जमीन्दार कटंगा के ऄणधकार में थी। र्ह ठीक प्रबन्ध नहीं कर पाया।
ऄतः णनकटर्ती क्षेत्र कााँकेर के (राज)गोंड़ जनजाणत के दल साय को दी गइ। र्ह कााँकेर का दीर्ान था।
कााँकेर शासक द्वारा ईसकी कायव क्षमता से प्रसन्न हो कर लोहतुर परगना पुरस्कार में ददया गया था। 1538
में, जब दल साय ने देखा दक, जमीन्दार कटंगा रटकोली नहीं पटा पा रहा है, तो ईसने रतनपुर के कल्चुरी
शासक को पूणव रटकोली पटा कर जमीन्दारी ऄपने नाम णलखर्ा ली।
मराठों द्वारा, र्ार्षषक रटकोली,
500 णनयत की गइ थी।

गंडइःगंडइ जमीन्दारी का क्षेत्रफल 163 र्गवमील था। आसमें 86 ग्राम थे।
यह एक प्राचीन जमीन्दारी थी। यहााँ का र्ंश भी प्राचीनतम था। तब यह गढ़ा-मण्डला (या मण्डल)
के ऄणधकार क्षेत्र में था। लगभग 675 र्षव पूर्व गढ़ा-मण्डला (या मण्डल) के गोंड़ शासक द्वारा ऄपने एक
सम्बन्धी ललगाधर धुर गोंड को यह जमीन्दारी दी गइ थी। असपास के लोगों ने आसे राजा की पदर्ी दे दी।
अगे चल कर आस जनजातीय गोंड र्ंश के मुखी ठाकु र ने, आस जमीन्दारी के तीन भाग कर, ऄपने
पुत्रों में बााँट ददए। 1828 में आस बाँटर्ारे को पुष्ट भी कर ददया गया। ऄब तीन जमीन्दाररयााँ हो गईं- गंडइ,
बरबसपुर और णसलहटी।
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मराठा काल में जमीन्दार बख्त लसह रटकोली पटाने में ऄसमथव रहा। ऄतः नागपुर के भोंसला
शासक ने ईस पर अक्रमण कर ददया। बख्त भाग कर कर्धाव चला गया।
कु छ र्षों ईपरााँत, जब राजा तरर्र लसह की माता जमीन्दारी सम्हालती थी, खैरागढ़ शासक ने
अक्रमण कर ददया। ईसने यह अक्रमण णर्फल कर ददया।
तरर्र लसह की मृत्यु के ईपरााँत ईसके ऄर्ैध पुत्र रणधीर लसह ने जमीन्दारी पाने का दार्ा दकया,
जो ऄणस्र्कार कर ददया गया। अगे चल कर रणर्ीर के पुत्र ने आस दार्े का मुकदमा दकया और र्ह जीत
गया।
गड़इ जमीन्दारी के खोलर्ा क्षेत्र के 29 ग्राम खैरागढ़ के ऄणधकार में सुअ नाच के ईपलक्ष में अ गए
थे।
मराठों द्वारा, र्ार्षषक रटकोली,
2,500 णनयत की गइ थी, णजसे बाद में
3,000 दकया गया।
गुंडरदेहीःगुंडरदेही जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 83 र्गवमील था। आसमें मात्र 48 ग्राम थे।
यहााँ के जमीन्दार काँ र्र क्षत्रीय थे। जब 1525 में, बस्तर द्वारा, रतनपुर सीमा पर अक्रमण दकया
गया तो आस र्ंश की पूर्व पुरूष ने रतनपुर की सहायता की और यह जमीन्दारी तथा राय की पदर्ी पाइ।
बाद में बालोद परगना भी आसमें णमलाया गया। 1540 में डकु ओं को मार भगाने के कारण चार ताल्लुकेराजोली, ऄसमोरी, ऄजुवन्दा और गुरेड़ा- भी जमीन्दार को पुरस्कार स्र्रूप ददए गए। आन प्रत्येक तल्लुके में
12-12 ग्राम थे।
तात्काणलन जमीन्दार माखन लसह र्ार्षषक रटकोली एक ऄशफी ददया करता था। यह व्यर्स्था
भीखम राय दीर्ान तक चली।
जब मराठे सत्ता में अए तो ईन्होंने ईि चारों ताल्लुके आस जमीन्दारी से णनकाल कर ऄपने क्षेत्र में
णमला णलए।
मराठों द्वारा, 1819 में, र्ार्षषक रटकोली
5,020 कर दी गइ थी। यह जमीन्दारी की सर्ावणधक
रटकोली थी।
खुज्जीःखुज्जी जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 63 र्गवमील था। आसमें मात्र 33 ग्राम थे।
लगभग 250 र्षव पूर्व गोंड जनजातीय शासकों द्वारा यह जमीन्दारी एक मुणस्लम सैणनक के दी गइ
थी। ईसने ईन्हें नागपुर के भोंसला शासक रघुजी के अक्रमण के णर्रूि सहायता की थी।
व्यंकोजी भोंसले के समय र्ार्षषक रटकोली
60 से
1,500 कर दी गइ थी।
कोरांचाःकोरांचा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 204 र्गवमील था। आसमें 77 ग्राम थे। यहााँ का जमीन्दार भी
मुणस्लम था। पहले यह पनर्ाड़ा जमीन्दारी में था।

पनर्ाड़ाःडा.संजय अऱंग-छत्तीसगढ़ की पूर्व ररयासतें और जमीन्दाररयााँ ISBN 81-89244-96-5[Type text]

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पनर्ाड़ा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 345 र्गवमील था। आसमें 263 ग्राम थे।
यह पुरानी जमीन्दारी थी। आसे चााँदा के गोंड़ जनजातीय शासकों द्वारा प्रदान दकया गया था। यह
दकसी समय रतनपुर के कल्चुररयों के भी ऄणधकार क्षेत्र में रही।
यह कहा जाता है दक, आस जमीन्दार के र्ंश के एक जमीन्दार धाम शाह ने ददल्ली की सेना की ओर
से र्ीरता ददखाइ थी और बादशाह ने प्रसन्न हो बैरागढ़ का ऄणधकार दे ददया और दज़ाव बढ़ा ददया था।
1818 में जब नागपुर के ऄप्पा साहब भोंसले ने ऄंग्रेजों का णर्रोध दकया, तब यहााँ के तात्काणलन
जमीन्दार णनज़ाम शाह ने ऄन्य जमीन्दारों के साथ भोंसलों का ही पक्ष णलया। एक ऄर्सर पर तो ईन्होंने
रांगी के समीप णगलगााँर् में 700 सैणनकों की ऄंग्रेज टुकड़ी को घेर कर मार डाला। पर णनज़ाम शाह पीछे
खदेड़ ददया गया और भाग गया। ईसे कााँकेर में शरण लेनी पड़ी। अगे चल कर ईसे क्षमा प्रदान कर दी गइ
और जमीन्दारी भी र्ापस कर दी गइ।
छत्तीसगढ़ ददग्दशवन में यहााँ के जमीन्दारों को चतुर, छली और कपटी माना जाना बताया गया
है।422
परपौड़ीःपरपौड़ी जमीन्दारी का क्षेत्रफल ऄत्यणधक कम ऄथावत मात्र 28 र्गवमील था। आसमें मात्र 24 ग्राम
थे।
पहले यहााँ के जमीन्दार गोंड़ जनजाणत के थी और धमधा के गोंड़ शासक के र्ंशज थे। 18 र्ीं
शताब्दी में ईनके दकसी णर्द्रोह के कारण ईन्हे हटा कर राजपूत लोगों को जमीन्दारी दे दी गइ।
मराठों द्वारा, 1800 में, र्ार्षषक रटकोली
1,800 णनयत की गइ थी।
सहसपुर-लोहाराःसहसपुर-लोहारा जमीन्दारी का क्षेत्रफल 146 र्गवमील था और ईसमें 88 ग्राम थे।
पहले यह जमीन्दरी कर्धाव ररयासत का भाग थी। आसे कर्धाव के शासक महाबली लसह द्वारा
बैजनाथ सोन लसह को जीर्कोपाजवन हेतु प्रदान दकया गया था। र्ह ईन्ही के र्ंश (बोलकररया गोंड़
जनजाणत) से थे।
सहसपुर और लोहार नामक दो ग्रामों के मध्य दो मील लम्बा तालाब था। यह कहा जाता है दक,
सहसपुर ग्राम को कल्चुरी हैहय लोगों के अदद पूर्व पुरूष सहस्राजुन
व के नाम पर बसाया गया था। यहााँ से
प्राप्त एक प्रणतमा को ईसी की बताया जाता है। आसके ऄधो भाग पर ईत्तकीणव लेख में राजा यशोराज, ईसकी
पत्नी (रानी) लक्ष्मी देर्ी और ईनकी संतान भोज देर् तथा कु मारी जसल्ला देर्ी का ईल्लेख है।
मराठों ने 1799 में सहसपुर-लोहारा जमीन्दारी से
800 र्ार्षषक रटकोली ली जानी णनयत की
थी।

422

छत्तीसगढ़ ददग्दशवन

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णसल्हेंटीःणसल्हेंटी जमीन्दारी का क्षेत्रफल मात्र 55 र्गवमील था और आसमें 30 ग्राम सम्मणलत थे।
पहले यह जमीन्दारी गंडइ जमीन्दारी का भाग थी। ऄंग्रेज शासन काल में यहााँ के जमीन्दार ने
ऄपने पररर्ार में दकसी को यह क्षेत्र जीर्कोपाजवन हेतु ददया और तब से यह पृथ्क जमीन्दारी हो गइ।
ठाकु र टोलाःठाकु र टोला जमीन्दारी में 81 ग्राम थे और आसका क्षेत्रफल 187 र्गवमील था।
आसमें पूर्व के जमीन्दार को अचरण हीनता के कारण ईसे हटाया गया था। 1842 में मराठों ने आसे
ऄन्य को ददया, जो दक, नरलसहपुर णजले के ददलहरी और पतेहरा के (राज)गोंड़ जनजाणत के पररर्ार से
सम्बन्ध रखते थे। आसमें एक जमीन्दार चमार राय था।
भारत के स्र्तंत्र होने पर सभी जमीन्दाररयों का णर्लय भारत में दकया गया और र्े मध्य प्रााँत और
बरार राज्य में सम्मणलत कर दी गईं।
-

डा.संजय ऄलंग
75, एश्वयव रे सीडेंसी
तेलीबााँधा, P.O.-रणर्ग्राम
रायपुर, छत्तीसगढ़, 492006

Sanjay.alung@nic.in

+91 9425307888

पररचय : · नाम – संजय ऄलंग
· णपता- स्र्. श्री ऄशोक कु मार ऄलंग , माता- स्र्. श्रीमती लज्या ऄलंग
पत्नी श्रीमती सुणमता ऄलंग , पुत्र द्वय – सर्वज्ञ और सौहादव ऄलंग
· जन्म – णभलाइ, जुलाइ’8, 1964
· णशक्षा – बैकुण्ठपुर, ऄणम्बकापुर, ददल्ली
· सेर्ा – राज्य प्रशासणनक
· पदस्थापना – भोपाल, रीर्ा, रतलाम, णसर्नी, ग्र्ाणलयर, कोरबा, रायगढ़, रयपुर
अदद णजले
· लेखन – कइ पत्र-पणत्रकाओं में शोध अलेख, कणर्ताएाँ, लेख, समीक्षाएाँ अदद-अदद
प्रकाणशत। यथा – र्सुधा, बया, पणब्लक एजेण्ड़ा, पााँड़ुणलणप अददअदद। साथ ही
‘कणर्ता छत्तीसगढ़’ और ‘णहन्दी णसनेमा/र्सुधा’ में सम्मणलत लेखन। ‘छत्तीसगढ़
की जनजाणतयााँ और जाणतयााँ’ तथा ‘छत्तीसगढ़ की ररयासतें और जमीन्दाररयााँ’
प्रकाणशत। आनका और णर्स्तृत स्र्रूप अन-लाइन भी ईपलब्ध। पृथ्क से
‘छत्तीसगढ़ के पंजाबी’ पुणस्तका प्रकाणशत और अन लाइन
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A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B8%E
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A4%AC%E0%A5%80-On-line पर ईपलब्ध। कु छ पुस्तकें यथा ‘छत्तीसगढ़ का हस्तणशल्प’ ‘छत्तीसगढ़ का आणतहास और संस्कृ णत’, ‘छत्तीसगढ़ के
लोक णर्श्वास’ अदद प्रकाशनाधीन। कु छ पुस्तकें यथा -‘बाल कणर्ताएाँ’, ‘कणर्ताएाँ’,
अदद पााँड़ुणलणप सम्पादन में।
· सम्मान राष्ट्रीय पंजाबी महासभा का णर्षय-णर्शेषज्ञ सम्मान।
· यात्रा – भारत के कइ प्रााँतों की, णजसमें सूदरू ऄण्ड़मान सम्मणलत, कु छ णर्देश
यातराएाँ भी, णजसमें दणक्षण एणशया, पूर्व एणशया, पणिम एणशया (पूर्-व मध्य),
ऄफ्रीका के कु छ देश सम्मणलत।
· प्रणशक्षण – अपदा प्रबन्धन, प्रशासन, प्रबन्धन, इगर्नेंस अदद
· सम्पकव -75 एश्वयव रे सीड़ेंसी, तेलीबााँधा, ड़ाकघर – रणर्ग्राम, रायपुर, छत्तीसगढ़,
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सुऄ छके हकाबस्र्-एणर्ऄ(रासके णर्समे)-1.3
17.4.10,रा,सऄ/-/ -/रा./30.9.11न.रा.

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