-रामधार सं ह "दनकर

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9ेम
(१)
9ेम क| आकु लता का भेद
Îछपा रहता भीतर मन म ,
काम तब भी अपना मधु वेद
सदा अं Íकत करता तन म ।

(२)
सु न रहे हो Í9य?
तु +ह म ¯यार करती हूँ।
और जब नार| Íकसी नर से कहे ,
Í9य! तु +ह म ¯यार करती हूँ ,
तो उÎचत है , नर इसे सु न ले ठहर कर,
9ेम करने को भले ह| वह न ठहरे ।
(३)
मं× तु मने कौन यह मारा
Íक मेरा हर कदम बे होश है सु ख से ?
नाचती है रñ क| धारा,
वचन कोई Îनकलता ह| नह|ं मु ख से।
(४)
पु ³ष का 9ेम तब उ£ाम होता है ,
Í9या जब अंक म होती।
Í×या का 9ेम ि1थर अÍवराम होता है ,
सदा बढता 9तीHा म ।

(५)
9ेम नार| के (दय म ज7म जब लेता,
एक कोने म न ³क
सारे (दय को घेर लेता है ।
पु ³ष म िजतनी 9बल होती Íवजय क| लालसा,
नाÍरय| म 9ीÎत उससे भी अÎधक उ£ाम होती है ।
9ेम नार| के (दय क| 7योÎत है ,
9ेम उसक| िज7दगी क| साँस है ;
9ेम म Îन*फल Í×या जीना नह|ं Íफर चाहती।
(६)
श«द जब Îमलते नह|ं मन के ,
9ेम तब इं Îगत Íदखाता है ,
बोलने म लाज जब लगती,
9ेम तब Îलखना Îसखाता है ।

(७)
पु ³ष 9ेम संतत करता है , पर, 9ायः, थोड़ा-थोड़ा,
नार| 9ेम बहु त करती है , सच है , लेÍकन, कभी-कभी।
(८)
1नेह Îमला तो Îमल| नह|ं 4या व1तु तु +ह ?
नह|ं Îमला यÍद 1नेह ब7धु !
जीवन म तु मने 4या पाया।
(९)
फू ल| के Íदन म पौध| को ¯यार सभी जन करते ह ,
म तो तब जानूँगी जब पतझर म भी तु म ¯यार करो।
जब ये के श +े त हो जाय और गाल मु रझाये ह|,
बड़ी बात हो रसमय चु +बन से तब भी सcकार करो।
(१०)
9ेम होने पर गल| के +ान भी
का¯य क| लय म गरजते, भूँकते ह ।

(११)
9ातः काल कमल भेजा था शु Îच, Íहमधौत, समु 7जवल,
और साँझ को भेज रहा हूँ लाल-लाल ये पाटल।
Íदन भर 9ेम जलज सा रहता शीतल, शु H, असंग,
पर, धरने लगता होते ह| साँझ गु लाबी रं ग।
(१२)
उसका भी भा¹य नह|ं खोटा
िजसको न 9ेम-9Îतदान Îमला,
छू सका नह|ं , पर, इ75धनु ष
शोÎभत तो उसके उर म है ।



चु +बन
सब तु मने कह Íदया, मगर, यह चु +बन 4या है ?
"¯यार तु +ह करता हूँम ", इसम जो "म " है ,
चु +बन उसपर मधु र, गु लाबी अनु 1वार है ।
चु +बन है वह गूढ़ भेद मन का, िजसको मु ख
÷ु Îतय| से बच कर सीधे मु ख से कहता है ।

कÍवता और 9ेम
ऊपर सु नील अ+बर, नीचे सागर अथाह,
है 1ने ह और कÍवता, दोन| क| एक राह।
ऊपर ÎनरH शु Hता 1व¯छ अ+बर क| हो,
नीचे गभीरता अगम-अतल सागर क| हो।

सौ7दय
(१)
Îन1सीम शÍñ Îनज को दप ण म दे ख रह|,
तु म 1वयं शÍñ हो या दप ण क| छाया हो?
(२)
तु +हार| मु 1कु राहट तीर है के वल?
धनु ष का काम तो मादक तु +हारा Fप करता है ।
(३)
सौ7दय Fप ह| नह|ं , अT°य लहर भी है ।
उसका सव|ôम अं श न ÎचÍ×त हो सकता।
(४)
Íव+ म सौ7दय क| मÍहमा अगम है
हर तरफ ह Íखल रह| फु लवाÍरयाँ।
Íक7तु मेरे जानते सब से अपर ह
Fप क| 9ÎतयोÎगता म नाÍरयाँ।
(५)
तु +हार| माधु र|, शु Îचता, 9भा, लावÞय क| समता
अगर करते कभी तो एक के वल पु *प करते ह ।
तु +ह जब दे खता हूँ , 9ाण, जान , 4यो Íवकल होते ,
न जान , क~पना से 4य| जु ह| के फू ल झरते ह ।
(६)
Fप है वह पहला उपहार
9कृ Îत जो रमणी को दे ती,
और है यह| व1तु वह िजसे
छ|न सबसे पहले लेती।

वातायन
Îनज वातायन से तु +ह दे खता म बेसु ध,
जब-जब तु म रे Îलं ग पकड़ खड़ी हो जाती हो,
चाँदनी तु +हार| Íखड़क| पर Îथरक| Íफरती,
तु म Íकसी और के सपने म मँडराती हो।

नर-नार|
(१)
4या पूछा, है कौन ÷े8 सहधÎम णी?
कोई भी नार| िजसका पÎत ÷े8 हो।
(२)
कई लोग नार|-समाज क| Îन7दा करते रहते ह ।
म कहता हूँ , यह Îन7दा है Íकसी एक ह| नार| क|।
(३)
पु ³ष चूमते तब जब वे सु ख म होते ह ,
हम चूमती उ7ह जब वे दु ख म होते ह ।
(४)
तु म पु ³ष के तु ~य हो तो आcमगु ण को
छोड़ 4य| इतना cवचा को ¯यार करती हो?
मानती नर को नह|ं यÍद ÷े8 Îनज से
तो Íरझाने को Íकसे ÷ृ ंगार करती हो?

(५)
क¯ची धूप-सTश Í9य कोई धूप नह|ं है ,
यु वती माता से बढ़ कोई Fप नह|ं है ।
(६)
अ¯छा पÎत है कौन? कान से जो बहरा हो।
अ¯छ| पõी वह, न िजसे कु छ पड़े Íदखायी।
(७)
नर रचते कानून, नाÍरयाँ रचती ह आचार,
जग को गढ़ता पु ³ष, 9कृ Îत करती उसका ÷ृ ंगार।
(८)
रो न दो तु म, इसÎलये , म हँस पड़ी थी,
Í9य! न इसम और कोई बात थी।
चाँदनी हँस कर तु +ह दे ती रह|, पर,
िज7दगी मेर| अँधेर| रात थी।

(९)
औरत कहतीं भÍव*यत क| अगर कु छ बात,
नर उ7ह डाइन बताकर दं ड दे ता है ।
पर, भÍव*यत का कथन जब नर कह|ं करता,
हम उसे भगवान का अवतार कहते ह ।

Îशशु और शैशव
(१)
न तो सोचता है भÍव*य पर, न तो भूत का धरता ²यान,
के वल वत मान का 9ेमी, इसीÎलए, शैशव छÍवमान।
(२)
4या तु +ह संतान है कोई,
िजसे तु म दे ख मन ह| मन भरे आन7द से रहते ?
भÍव*यत का मधु र उपमान है कोई,
िजसे तु म दे खकर सब आपदाएँ शा7त हो सहते ?
अगर हाँ , तो तु +ह म भा¹यशाल| मानता हूँ ,
तु +हार| आपदाओं को यदÍप म जानता हूँ।
(३)
ब¯च| को दो 9ेम और स+मान भी।
आव°यक िजतना है उससे अÎधक बनो मत बाप।
जब-तब कु छ एका7त चाÍहए ब¯च| को भी,
पहरा दे ते समय रखो यह ²यान भी।
(४)
सू+म होता तृ ÎB-सु ख माता-Íपता का,
सू+म ह| होते Íवरह, भय, शोक भी।
(५)
के वल Íखला-Íपलाकर ह| पालो मत इनको,
इ7ह वH से अÎधक नयन का Hीर चाÍहए।
(६)
ब¯च| को नाहक संयम Îसखलाते हो।
वे तो बनना वह| चाहते ह जो तु म हो।
तो Íफर िज[ा को दे कर Íव÷ाम जरा-सा
अपना ह| T8ा7त न 4य| Íदखलाते हो?

Íववाह
(१)
शाद| वह नाटक अथवा वह उप7यास है ,
िजसका नायक मर जाता है पहले ह| अ²याय म ।
(२)
शाद| जादू का वह भवन Îनराला है ,
िजसके भीतर रहने वाले Îनकल भागना चाहते ,
और खड़े ह जो बाहर वे घु सने को बेचैन ह ।
(३)
«याह के कानून सारे मानते हो?
या Íक आँख मूँद के वल 9ेम करते हो?
1वाद को नूतन बताना जानते हो?
पूछता हूँ , 4या कभी लड़ते -झगड़ते हो?

9फु ~लता
(१)
धूप चाहते हो घर म तो हँसो-हँसाओ, म¹न रहो,
हरदम 7ानी बने रहे यÍद तो बदल| Îघर जाये गी।
(२)
9साधन कौन-सा है Îन*कपट आन7द से बढ़कर?
9फु ि~लत पु *प-सी हँसती रहो, इतना अलम है ।
मसाले लेप कर 4य| गाल को पंÍकल बनाती हो?

यौवन
(१)
वय क| गभीरता से ÎमÎ÷त यौवन का आदर होता है ,
वा@4य शोभता वह िजसम जीÍवत हो जोश जवानी का।
(२)
जवानी का समय भी खूब होता है ,
Îथरकता जब उँ गÎलय| पर गगन क| आँख का सपना,
Íक जब 9cये क नार| नाÎयका-सी भ¯य लगती है ,
Íक जब 9cये क नर लगता हम 9ेमी परम अपना।

जवानी और बु ढ़ापा
(१)
जो जवानी म नह|ं रोया, उसे बब र कहो,
जो बु ढ़ापे म न हँसता है , मनु ज वह मूख है ।
(२)
जब म था नवयु वक, वृ @ ÎशHक थे मेरे ,
भूतकाल क| कथा गूढ़ बतलाते थे वे।
म पढ़ने को नह|ं , वृ @ होने जाता था,
आग बु झा कर शीतल मु झे बनाते थे वे।
पर, अब म बूढ़ा हूँ , ÎशHक नौजवान ह ,
उ7ह दे ख Îनज सोयी वÍ[ जगाता हूँ म ।
भूत नह|ं , अब पÍरचय पाने को भÍव*य का
यौवन के Íव²ा-मि7दर म जाता हूँ म ।


9Îतभा
कै से समझोगे Íक कौन 9Îतभाशाल| है ?
9Îतभा के लHण अनेक ह , Íक7तु , कभी जब
सभी गधे Îमल एक ¯यÍñ पर लात चलाय ,
अजब नह|ं , वह ¯यÍñ महा9Îतभाशाल| हो।

आलोचक
(१)
रचना म 4या-4या गु ण होने चाÍहए,
कू द-फाँदकर भी तु म नह|ं बताते हो।
पर, रचना के दु गु ण अपनी ह| कृ Îत म
कदम-कदम पर खूब Íदखाये जाते हो।
(२)
म अगर कु छ बोलता हूँ ,
तु म उसे अपराध 4य| कहते ?
मि4खयाँ जब बैठती ह ,
Îसं ह भी रोय Íहलाता है ।

फू ल
Îचं ताओं से भरा हु आ जीवन वह भी Íकस काम का,
Íवरम सके दो घड़ी नह|ं यÍद हम फू ल| के सामने।

पु 1तक
पु 1तक है वह वाÍटका सु ग7ध| से पूÍरत,
हम िजसे जेब म Îलए घूमते -Íफरते ह ।

क~पना
आcमा क| है आँख, बु Í@ क| पाँख है ,
मानस क| चाँदनी Íवमल है क~पना।

सेतु
त³ से त³ तक र7जु बाँध कर,
वातायन से वातायन तक बाँध कु सु म के हार,
उडु से उडु तक कु मु दब7धु क| रि°म तानकर
आँख| से आँख| तक फै ला कर रे शम के तार;
सेतु म ने रच Íदये सव× ह ।
क~पने ! चाहो जहाँ भी नाच सकती हो।

Íखलनमग
यह Îशखर नगराज का है ,
दूर है भूतल, Îनकट बैकु ं ठ है ।
जोर से मत बोल, नीरवता डरे गी,
1वग क| इस शाि7त म बाधा पड़े गी।
प×कार
जोड़-तोड़ करने के पहले त³य समझ लो,
प×कार, 4या इतना भी तु म नह|ं करोगे ?

अÎभनेता
अÎभनेता का सु यश शाम क| लाल| है ,
चमक घड़ी भर Íफर गहर| अँÎधयाल| है ।

मु ñछ7द
मु ñ छ7द कु छ वैसा ह| बेतु का काम है ,
जैसे कोई Íबना जाल के टे Îनस खेले।

अनु वाद
"जेरे Îमया" अवतार थे , वे दूत थे 9भु के ।
रहे वे Íक7तु , जीवन भर Íवलपते , शीश धु नते ह|।
तु +ह मालूम है , 4य| वे Íबचारे शीश धु नते थे?
उ7ह था 7ात, म ने आग से जो कु छ Îलखा है ,
उसे अनु वादक| का दल Íकसी Íदन Hार कर दे गा।


धम
(१)
दश न मा× Íवचार, धम ह| है जीवन।
धम दे खता ऊपर नभ क| ओर,
²ये य दश न का मन।
हम चाÍहए जीवन और Íवचार भी।
अ+बर का सपना भी, यह संसार भी।
(२)
Îसकता के कण म Îमला Íव+ संÎचत सारा,
9¯छ7न पु *प म दे व| का संसार Îमला।
मु §ी मे भीतर ब7द Îमला अ+बर अन7त,
अ7तÍह त एक घड़ी म काल अपार Îमला।

(३)
अ7ात, गहन, धूÎमल के पीछे कौन खड़े
शासन करते तु म जगq¯याÍपनी माया पर?
Íदन म सूरज, रजनी म बन नH× कौन
तु म आप दे रहे पहरा अपनी छाया पर?

(४)
बहु त पूछा, मगर, उôर न आया,
अÎधक कु छ पूUने म और ड़रते ह ।
असंभव है जहाँ कु छ Îस@ करना,
नयन को मूँद हम Íव+ास करते ह ।

(५)
सोचता हूँ जब कभी संसार यह आया कहाँ से ?
चÍकत मेर| बु Í@ कु छ भी कह न पाती है ।
और तब कहता, "(दय अनु मान तो होता यह| है ,
घट अगर है , तो कह|ं घटकार भी होगा।"
(६)
रोट| के पीछे आटा है Hीर-सा,
आटे के पीछे च4क| क| तान है ,
उसके भी पीछे गेहूँ है , वृ Í8 है ,
वषा के पीछे अब भी भगवान है ।

हु ं कार (कÍवता)
Îसं ह क| हु ं कार है हु ं कारÎनभ य वीर नर क|।
Îसं ह जब वन म गरजता है ,
ज7तु ओं के शीश फट जाते ,
9ाण लेकर भीत कु ं जर भागता है ।
योÎगय| म , पर, अभय आन7द भर जाता,
Îसं ह जब उनके (दय म नाद करता है ।


1वग
1वग क| जो क~पना है ,
¯यथ 4य| कहते उसे तु म?
धम बतलाता नह|ं सं धान यÍद इसका?
1वग का तु म आप आÍव*कार कर लेते।

9ाथ ना
(१)
9ाथ ना म शÍñ है ऐसी Íक वह Îन*फल नह|ं जाती।
जो अगोचर कर चलाते ह जगत को,
उन कर| को 9ाथ ना नीरव चलाती है ।
(२)
9ाथ ना से जो उठा है पूत होकर
9ाथ ना का फल उसे तो Îमल गया।
(३)
अथ नीचे ह| यÍद रह गया,
श«द 4या उड़ते जाते ह ?
अथ के Íबना श«द हे Îम×!
1वग तक पहु ँ च न पाते ह ।


भगवान क| ÍबH|
लोगे कोई भगवान? टके म दो दूँ गा।
लोगे कोई भगवान? बड़ा अलबेला है ।
साधना-फक|र| नह|ं , खूब खाओ, पूजो,
भगवान नह|ं , असल| सोने का ढे ला है ।

मि7दर
जहाँ मनु ज का मन रह1य म खो जाये,
जहाँ ल|न अपने भीतर नर हो जाये,
भूल जाय जन जहाँ 1वक|य इयôा को,
जहाँ पहु ँ च नर छु ए अगोचर सôा को।
धमालय है वह| 1थान, वह हो चाहे सु नसान म ,
या मि7दर-मि1जद म अथवा जूते क| दूकान म ।

सं7यासी और गृ ह1थ
तेरा वास गगन-मं डल पर, मेरा वास भु वन म ,
तू Íवरñ, म Îनरत Íव+ म , तू तट1थ, म रण म ।
तेर|-मेर| Îनभे कहाँ तक, ओ आकाश 9वासी?
म गृ ह1थसबका दु ख-भोगी, तू अÎलB सं7यासी।


राजनीÎत
(१)
सावधान रखते 1वदे श को और बढ़ाते मान भी,
राजदूत ह आँख दे श क| और रा7य के कान भी।
(२)
तु +ह बताऊँ यह Íक कू टनीÎत7 कौन है ?
वह जो रखता याद ज7मÍदन तो रानी का,
लेÍकन, उसक| वयस भूल जाता है ।
(३)
लगा राजनीÎत7 रहा अगले चु नाव पर घात,
राजपु ³ष सोचते Íक7तु , अगल| पीढ़| क| बात।
(४)
हो जाता नरता का तब इÎतहास बड़ा,
बड़े लोग जब पवत से टकराते ह ।
नर को द गे मान भला वे 4या, जो जन
एक दूसरे को नाहक धÍकयाते ह ?
(५)
’हाँ ’ बोले तो ’शायद’ समझो, 1यात कहे तो ’ना’ जानो।
और कहे यÍद ’ना’ तो उसको कू टनीÎतÍवद मत मानो।
(६)
मंÍ×य| के गु ड़ अनोखे जानते हो?
वे न तो गाते , बजाते , नाचते ह ,
और खबर| के Îसवा कु छ भी नह|ं पढ़ते ।
हर घड़ी Îच7ता उ7ह इस बात क| रहती
Íक कै से और लोग| से जरा ऊँ चे Íदख हम।
इसÎलये ह|, बात मु द| क| तरह करते सदा वे
और ये धनवान Íर4श| पर नह|ं चढ़ते।
(७)
शÍñ और Îस@ा7त राजनीÎत7 जन| म
खूब चमकते ह जब तक अÎधकार न Îमलता।
मं×ी बनने पर दोन| ह| दब जाते ह ।
(८)
शासन के यं ×| पर र4खो आँख कड़ी,
Îछपे अगर ह| दोष, उ7ह खोलते चलो।
9जातं× का Hीर 9जा क| वाणी है
जो कु छ हो बोलना, अभय बोलते चलो।

(९)
मं×ी के शासन क| यह मÍहमा ÍवÎच× है ,
जब तक इस पर रहो, नह|ं Íदखलाई दे गी
शासन क| ह|नता, न H8ाचार Íकसी का।
Íक7तु , उतरते ह| उससे सहसा हो जाता
सारा शासन-चH भयानक पु ँज पाप का,
और शासक| का दल चोर नजर आता है ।
(१०)
जब तक मं×ी रहे , मौन थे , Íक7तु , पद¯यु त होते ह|
जोर| से टूटने लगे ह भाई H8ाचार| पर।
(११)
मं×ी के पावन पद क| यह शान,
नह|ं द|खता दोष कह|ं शासन म ।
भूतपूव मं×ी क| यह पहचान,
कहता है , सरकार बहु त पापी है ।

(१२)
Íकसे सु नाते हो, शासन म पग-पग पर है पाप Îछपा?
Íकया न 4य| 9Îतकार अघ| का जब तु म Îसं हासन पर थे ?
(१३)
छ|न ल| मं×ीगीर| तो घूँस को भी रोक दो।
अब ’कर¯शन’ ÍकसÎलए म ह| न जब माÎलक रहा?
(१४)
जब तक है अÎधकार, ढ|ल मत दो पाप| को,
सु नते हो मंÍ×य|! नह|ं तो लोग हँस गे ,
कल को मं×ी के पद से हट जाने पर जब
H8ाचरण| के Íव³@ तु म Îच~लाओगे।
(१५)
9जातं× का वह जन असल| मीत
सदा टोकता रहता जो शासन को।
जनसôा का वह गाल| संगीत
जो ÍवरोÎधय| के मु ख से झरती है ।


Hाि7तकार|
Hाि7तकार| म जवानी भर न हो पाया,
Îसफ इस भय से , कह|ं म भी बु ढ़ापे म
Hाि7त म फँ सकर न दÍकयानूस हो जाऊँ ।

बु Îनयाद| ताल|म
गरज-तरज कर कहा एक वñा ने उस Íदन
"बु Îनयाद| ताल|म cयाÎगय| क| ÎशHा है ।"
म कहता हूँ , अरे cयाÎगय|! मु झे बता दो,
कौन Íपता ऐसा है जो अपने ब¯चे को
भोग-मु ñ कर सं 7यासी करना चाहे गा।

अबंध ÎशHा
ÎशHा जहाँ अबंध, मु ñ है ,
उन दे श| के लोग| को
साथ लगा ले जो चाहे , पर,
कोई हाँक नह|ं सकता।



मु ñ दे श
मु ñ दे श का यह लHण है Îम×!
क8 अ~प, पर, शोर बहु त होता है ।
तानाशाह| का पर, हाल ÍवÎच×,
जीभ बाँध जन मन-ह|-मन रोता है ।

अ~पसंEयक
अ~पसंEयक| के आँसू यÍद पु छे नह|ं ,
वृ था दे श म तो कायम सरकार है ।
बहु मत को तो अलम 1वयं अपना बल है ,
अ~पसंEयक| का शासन पर भार है ।

यु @
यु @ को वे Íद¯य कहते ह िज7ह|ने ,
यु @ क| 7वाला कभी जानी नह|ं है ।

पागलपन
जब-तब ह| दे खते ¯यÍñय| म हम पागल,
पर, समूह का तो पागलपन Îनcय धम है ।
7ान
7ान अिजत कर हम Íफर 9ाB 4या होता?
Îसफ इतनी बात, हम सब मूख ह ।

Îच7ता
सोचना है मूल सार| वेदना का,
छोड़ दो Îच7ता, बड़े सु ख से िजयोगे ।
शाि7त का उcसंग तब होगा सु लभ, जब
मानÎसक Îन1त«धता का रस Íपयोगे।

Îनःश«दता
श«द जो Îनःश«द, नीरव ह ,
समय पाकर वह| पÍरप4व होते ह ।
घूÍण जब आती नह|ं Íदन भर ठहरती है ।
और वह वषा नह|ं भरती सरोवर को,
पटपटा कर जो बहु त आवाज करती है ।



पंथ
पंथ लौट कर पहु ँ चे गाÍफर वहाँ
जहाँ से शु F हु आ था।
घर जाने के Îलए बहु त आतु र मत होओ।
बहु त तेज मत चलो, न ठहरो, यह| बहु त है ।

आग और बफ
कु छ कहते ह , Íव+ एक Íदन जल जाएगा,
कु छ कहते ह , Íव+ एक Íदन गल जाएगा।
मु झे द|खता, दोन| ह| सच हो सकते ह ।
तृ *णा वÍ[ है , जगती उसम जल सकती है ।
घृ णा बफ है , दु Îनया उसम गल सकती है ।

बीता हु आ कल
यु ग मरे , सÍदयाँ ग( मर, Íक7तु , ओ बीते हु ए कल!
4या हु आ तु मको Íक तु म अब भी नह|ं मरते ?
घेरते हर रोज 4य| मु झको मÎलन अपने ÍHÎतज से ?
Îनcय सु ख को आँसु ओं से Îसñ 4य| करते?

कानून और आचार
वे रचते कानून Íक सबके उ7जवल रह सदा आचार,
हम आचरण शु @ रखकर Íव÷ाम Îनयम को दे ते ह ।
समझौते क| शाि7त
7वर म Îसर पर बफ रखा करते ह,
यह| बहु त कु छ समझौते क| शाि7त है ।
Íक7तु , कभी 4या 7वर भागा है बफ से ?
Íहम को 7वर क| दवा समझना Hाि7त है ।

9शंसा
बु Í@मान क| करो 9शंसा जब वह नह|ं वहाँ हो,
पर, नार| क| करो बड़ाई जब वह खड़ी जहाँ हो।

9ÎसÍ@
(१)
मरणोपरा7त जीने क| है यÍद चाह तु झे ,
तो सु न, बतलाता हूँ म सीधी राह तु झे ,
Îलख ऐसी कोई चीज Íक दु Îनया डोल उठे ,
या कर कु छ ऐसा काम, जमाना बोल उठे ।
(२)
िजस 07थ म Îलखते सु धी, यश खोजना अपकम है ,
उस 07थ म ह| वे सु यश Îनज आँक जाते ह ।


दे शभÍñ
दे शभÍñ Íकसक| सबसे उôम है ?
उसक| जो गाता 1वदे श क| उôमता का गान नह|ं ,
Íक7तु , उसे उôम से उôम रोज बनाये जाता है ।

पÍरवार
हÍर के क³णामय कर का िजस पर 9सार है ,
उसे जगत भर म Îनज गृ ह सबसे ¯यारा लगता है ।

आशा
(१)
सार| आशाएँ न पूण यÍद होती ह|,
तब भी अंचल छोड़ नह|ं आशाओं के ।
(२)
मर गया होता कभी का
आपदाओं क| कÍठनतम मार से ,
यÍद नह|ं आशा ÷वण म
Îनcय यह संदे श दे ती ¯यार से --
"घूँट यह पी लो Íक संकट जा रहा है ।
आज से अ¯छा Íदवस कल आ रहा है "।


(३)
सभी दु ख| क| एक महौषÎध धीरज है ,
सभी आपदाओं क| एक तर| आशा।

आcमÍव+ास
(१)
गौण, अÎतशय गौण है , ते रे Íवषय म
दूसरे 4या बोलते , 4या सोचते ह ।
मु Eय है यह बात, पर, अपने Íवषय म
तू 1वयं 4या सोचता, 4या जानता है ।
(२)
उलटा समझ लोग, समझने दे तू उनको,
बहने दे यÍद बहती उलट| ह| बयार है ,
आज न तो कल जगत तु झे पहचानेगा ह|,
अपने 9Îत तू आप अगर ईमानदार है ।

Îनि°ंत
¯योम म बाक| नह|ं अब बदÎलयाँ ह ,
मोह अब बाक| नह|ं उ+मीद म ,
आह भरना भूल कर सोने लगा हूँ
ब7धु ! कल से खूब गहर| नींद म ।

चीनी कÍव
वेणु वन क| छाँह म बैठा अके ला
म कभी बंसी, कभी सीट| बजाता हूँ।
खूब खु श हूँ , आदमी कोई नह|ं आता।
चाँद के वल रात म आ झाँकता है ।
सूय , पर, Íदन म चला जाता Íबना दे खे।
कौन दे उसको खबर इस कु ं ज म कोई Îछपा है ?

आcमÎशHण
Íव+ म सबसे वह| ह वीर,
है िज7ह|ने आप अपने को गढ़ा।
और वे 7ानी अगम गं भीर,
है िज7ह|ने आप अपने से पढ़ा।

सcय
(१)
शु H नभ Îनमघ, स7जन सcयवाद|,
ईश के ये अ9Îतम वरदान ह ।
(२)
यÍद अयो¹य है तो Íफर मत वह काम करो,
यÍद असcय है तो वह बात नह|ं बोलो।
(३)
जो असcयभाषी ह उनसे अपने जन भी डरते ह ,
Íक7तु , सcयवाद| मानव का अÍर भी आदर करते ह ।

पÍरचय
सबके 9Îत सौज7य और बहु त| से र4खो राम-सलाम,
मेलजोल थोड़े लोग| से , मै ×ी Íकसी एक जन से।

सु ख और आन7द
(१)
जीवन उनके Îलए मधु रता क| उ7जवल रसधार है ,
िजनक| आcमा Îन*कलंक है और Íकसी से ¯यार है ।
(२)
सु खी जीवन अÎधकतर शा7त होता है ।
जहाँ हलचल बढ़| आन7द चल दे ता वहाँ से।
(३)
सु ख का रह1य जानोगे 4या?
जीवन म ह जो शूल उ7ह सह लेते ह ,
अनÍबं धे कं टक| म जो जन रह लेते ह ,
सब उ7ह सु खी कहते , अब पहचानोगे 4या?




(४)
आगे के सु ख क| तैयार| क| एक राह,
जोगो कल के Íहत, अगर कभी कु छ जोग सको।
पर, आज 9ाB है िजतना भी आन7द तु +ह ,
भोगो उसको Îन§ 7§ जहाँ तक भोग सको।

आँख और कान
दे ख रहे हो जो कु छ उसम भी सब का मत Íव+ास करो,
सु नी हु ई बात तो के वल गूँज हवा क| होती ह ।

आल1य
मेल बैठता नह|ं सदा दश न-जीवन का।
कहते ह , आल1य बड़ा भार| दु गु ण है ।
Íक7तु , आलसी हु एÍबना कब सु ख Îमलता है ?
और मोददाÎयनीं व1तु एँ सभी ¯यथ ह ।
फू ल और तारे , इनका उपयोग कौन ह ?



7ान और अ7ान
Íव+ म दु ःशाि7त यह 4य| छा रह| है ?
आग पर 4य| आग लगती जा रह| है ?
एक है कारण Íक जो है मूख वह तो
हर Íवषय म ठ|क Îनज को ह| समझता है ।
Íक7तु , जो 7ानी पु ³ष ह ,
वे Îघरे ह हर तरफ स7दे ह से।
मूख क| ललकार वे Íदन-रात सहते ह ।
जोर से लेÍकन, न कोई बात कहते ह ।

मूख
9cये क मूख को उससे भी
कु छ बड़ा मूख Îमल ह| जाता,
जो उसे समझता है पंÍडत,
जो उसका आदर करता है ।

Îम×
(१)
श×ु से म खु द Îनबटना जानता हूँ ,
Îम× से पर, दे व! तु म रHा करो।

(२)
वातायन के पास खड़ा यह वृ H मनोहर
कहता है , यÍद Îम× तु +ह छोड़ने लगे ह ,
तो ÍवपÍô 4या? इससे तु म न तÎनक घबराना।
कÍव को कौन असंग बना सकता है भू पर?
लो, म अपना हाथ बढ़ाता हूँ Íखड़क| से ,
मै×ी म तु म भी अब अपना हाथ बढ़ाओ।

ई*या
सब क| ई*या , §े ष, जलन का
भाजन के वल मा× हूँ ,
Íफर भी, हÍर को ध7यवाद है ,
म न दया का पा× हूँ।

संकट
(१)
भी³ पूव से ह| डरता है , कायर भय आने पर,
Íक7तु , साहसी डरता भय का समय Îनकल जाने पर।
(२)
संकट से बचने क| जो है राह,
वह संकट के भीतर से जाती है ।
समु 5
चूण तरं ग| से शोÎभत जब सागर लहराता है ,
लगता है , मान|, अ+बर का दप ण टूट गया हो।

वृ H
(१)
पहल| पंÍñ Îलखी ÍवÎध ने िजस Íदन कÍवता क|,
उस Íदन पहला वृ H 1वयं उcप7न हो गया।
9थम का¯य है वृ H Íव+ के पहले कÍव का।
(२)
5ु म| को ¯यार करता हूँ।
9कृ Îत के पु × ये
माँ पर सभी कु छ छोड़ दे ते ह ,
न अपनी ओर से कु छ भी कभी कहते ।
9कृ Îत िजस भाँÎत रखना चाहती
उस भाँÎत ये रहते ।

4वाँरा
4वाँरा कहते उसे , पु ³ष जो मेले म जाता तो है ,
मू~य पूछता Íफरता, लेÍकन, कु छ भी मोल नह|ं लेता।

परोपदे श
(१)
और| को उपदे श सु नाना चु +बन-सा ह| है यह काम,
खच नह|ं इसम कु छ पड़ता, मन को मीठा लगता है ।
(२)
आयु के दो भाग ह , पहल| उमर म
आदमी रस-भोग म आन7द लेता है ।
और जब ÍपUल| उमर आर+भ हो जाती,
वह सभी को cयाग का उपदे श दे ता है ।

Íखलौने
दस के ह| Íक पचास साल के ,
सभी खेलते ह| तो ह ,
हाँ , वय के अनु सार चाÍहए
उ7ह Íखलौने अलग-अलग।




ल7जा
जीव| म है एक जीव
मानव ह| जो लि7जत होता,
या Íक िजसे लि7जत होने क|
आव°यकता होती है ।

जनमत
करो वह| जो ते रे मन का ñH कहे ,
और Íकसी क| बात| पर कु छ ²यान न दो।
मु ँह Íबचकाय लोग अगर तो मत दे खो,
बजती ह| ताÎलयाँ, अगर तो कान न दो।

÷म
(१)
1वग क| सु ख-शाि7त है आराम म ,
Íक7तु , पृ ³वी क| अहÎनश काम म ।
(२)
सु ख 4या है , पूछ ÷म-Îनरत Íकसान से ;
पूछता है बात 4या तू बाबू-बबु आन से ?

अ²ययन
जब साÍहcय पढ़ो तब पहले पढ़ो 07थ 9ाचीन,
पढ़ना हो Íव7ान अगर तो पोथी पढ़ो नवीन।

Íव7ान
बढ़ गया है दूर तक Íव7ान,
बढ़ गयी है शÍñ यातायात क|।
Íक7तु , 4या ग7त¯य कोई 1थान
है बढ़ा सारे जगत म एक भी?

Îन7दा
(१)
स7त क| बात बहु त कर सcय होती ह ।
एक का तो सा+य Íकं Îचत हम 1वयं भरते ;
उ7ह भी Îन7दा-÷वण म रस उपजता है ,
जो Íकसी क| भी 1वयं Îन7दा नह|ं करते।
(२)
सब िजसक| Îन7दा करते ह ,
उसम भी कु छ गु ण ह ,
सब सराहते िजसे , बड़े
उसम भी कु छ दु गु ण ह ।
पाप
मानव है वह जो Îगरा है पाप-पंक म ,
स7त है जो रो रहा ¹लाÎन-पÍरताप से।
Íक7तु , जो पतन को समझ ह| न पाता है ,
राHस है , दोष कर रोष भी Íदखाता है ।

साहस
सब कहते ह , जाँच साहसी क| है 9ाण गँवाने म ;
कभी-कभी जीÍवत रहने म Íह+मत दे खी जाती है ।

सcय और त³य
आँख मूँद कर छू ता हूँ जब Îशला-खÞड को,
मन कहता है आप ह| आप, यह त³य है ।
आँख मूँद कर छू ता हूँ जब नभ अखÞड को,
मन कहता है आप ह| आप, यह सcय है ।



दद
दद को तु म फे न क| धारा बनाओ।
फे न तो बह जाएगा;
नीर Îनम ल Îस7धु म रह जाएगा।

वायु
चाहता हूँ , मानव| के हे तु अÍपत
आयु यह हो जाय।
आयु यानी वायु जो छू कर सभी को
शू7य Íव1मृ Îत-कोष म खो जाय।

भूल
भूल जो करता नह|ं कोई, असल म ,
दे वता है , वह न कोई काम करता है ।
शू7य को भजता सदा सु नसान म रहकर,
मनसद| पर लेटकर आराम करता है ।



अनु भव
(१)
सबसे बड़ा Íव+Íव²ालय अनु भव है ,
पर, इसको दे नी पड़ती है फ|स बड़ी।
(२)
अनु भवी Íकसको कहोगे ?
उस पु ³ष को जो बहु ÷ु त, वृ @ है , बहु T8 है ?
या उसे जो अनु भव| का रस जु गाना जानता है ?
(३)
अनु भव वह कं घी है जो Îमलती मनु *य को
तब जब हो चु कता उसका Îसर पूण खाÞडु है ।

Íवकास
H8 दे वता कहलाने म कौन सु यश है ?
4या कलंक है उ7नत शाखामृ ग होने म ?

यती
जहाँ-जहाँ है फू ल, वहाँ 4या साँप है ?
जहाँ-जहाँ है Fप, वहाँ 4या पाप है ?
शूल| म 4या है Íक 9ेम से चु नते हो?
पर, फू ल| को दे ख शीश 4य| धु नते हो?
नाटक
समय तु रत 4य| हो जाता उqडीन,
9ेमी का अÎभनय जब हम करते ह ?
और मंच 4य| हो जाता संक|ण ,
कभी स7त का बाना यÍद धरते ह ?
Íक7तु , Íवदूषक बनने पर भगवान!
जान , 4य| यह जगह फै ल जाती है !
और हमारा करने को स+मान
सभा रात भर बैठ| रह जाती है !

ÎगरÎगट
पथ क| जलती हु ई भूÎम पर
म ने दे खा ²यानम¹न बूढ़े ÎगरÎगट को
(ÎगरÎगट यानी एक बूँद घÍड़याल क|)
खड़ा, दे ह को ताने पहने हरा कोट,
गरदन पर कालर क| उठान,
सब ठ|क-ठाक।
ऐसा लगता था, 7य| कोई पादड़ी खड़ा हो,
या कोई बूढ़ा 9ा²यापक
खड़ा-खड़ा कु छ सोच रहा हो
Îनज म डूबा हु आ भूल कर सारे जग को।

कÍव
(१)
इतना भी है बहु त, िजयो के वल कÍव होकर;
कÍव होकर जीना यानी सब भार भु वन का
Îलये पीठ पर म7द-म7द बहना धारा म ;
और साँझ के समय चाँदनी म मँडलाकर
÷ा7त-4ला7त वसु धा पर जीवन-कण बरसाना।
हँसते हो हम पर! पर7तु , हम नह|ं Îचढ़ गे !
हम तो तु +ह िजलाने को मरने आये ह ।
Îमले जहाँ भी जहर, हमार| ओर बढ़ा दो।
(२)
यह अँधेर| रात जो छायी हु ई है ,
छ|ल सकते हो इसे तु म आग से ?
दे वता जो सो रहा उसको Íकसी Íवध
तु म जगा सकते 9भाती राग से ?

अ7वेषी
रोट| को Îनकले हो? तो कु छ और चलो तु म।
9ेम चाहते हो? तो मंिजल बहु त दूर है ।
Íक7तु , कह|ं आलोक खोजने को Îनकले हो
तो ÍHÎतज| के पार ÍHÎतज पर चलते जाओ।

आँसू
Íखड़क| के शीशे पर कोई बूँद पड़ी है ;
अ@राÍ× म यह आँसू Íकसका टपका है ?
दे ख न सकता तु +ह , Íक7तु , ओ रोनेवाले !
रजनी हो द|घायु भले , पर, अमर नह|ं है ।
अ³ण-Íब7दु -धाÍरणी उषा आती ह| होगी।

नाव
9cये क नया Íदन नयी नाव ले आता है ,
लेÍकन, समु द है वह|, Îस7धु का तीर वह|।
9cये क नया Íदन नया घाव दे जाता है ,
लेÍकन, पीड़ा है वह|, नयन का नीर वह|।

1मृ Îत
श«द साथ ले गये , अथ िजनसे Îलपटे थे।
छोड़ गये हो छ7द, गूँजता है वह ऐसे ,
मानो, कोई वायु कु ं ज म तड़प-तड़प कर
बहती हो, पर, नह|ं पु *प को छू पाती हो।


9काश
Íकरण| क| यह वृ Í8! द|न पर दया करो,
धरो, धरो, क³णामय! मेर| बाँह धरो।
कोने का म एक कु सु म पीला-पीला,
छाया से मेरा तन गीला, मन गीला।
अ7तर क| आ5 ता न कह|ं गँवाऊँ म ,
बीच धूप म पड़ कर सूख न जाऊँ म ।
छाया दो, छाया दो, मु झे Îछपाओ हे !
इस 9काश के Íवष से मु झे बचाओ हे !

समपण
धधका दो सार| आग एक झ|के म ,
थोड़ा-थोड़ा हर रोज जलाते 4य| हो?
Hण म जब यह Íहमवान Íपघल सकता है ,
Îतल-Îतल कर मेरा उपल गलाते 4य| हो?
म चढ़ा चु का Îनज अहं कार चरण| पर,
हो Îछपा कह|ं कु छ और, उसे भी ले लो।
चाहो, मु झको लो Íपरो कह|ं माला म ,
चाहो तो क7दु क बना पाँव से खे लो।




आधु Îनकता

आधु Îनकता क| बह| पर नाम अब भी तो चढ़ा दो,
नायलन का कोट हम Îसलवा चु के ह;
और जड़ से नोचकर बेल|-चमेल| के 5ु म| को
कै 4टस| से भर चु के ह बाग हम अपना।
उôर
ठ|क है , लेÍकन, 9योगी का¯य भी कु छ जोड़ते हो?
और घर म Îच× ह Íकतने Íपकासो के ?

भारत
(१)
वृ Í@ पर है कर, मगर, कल-कारखाने भी बढ़े ह ;
हम 9गÎत क| राह पर ह, कह रहा संसार है ।
Íक7तु , चोर| बढ़ रह| इतनी Íक अब कहना कÍठन है ,
दे श अपना 1व1थ या बीमार है ।
(२)
Fस म ई+र नह|ं है ,
और अमर|क| खु दा है बु जु आ।
याद है ÍहरोÎशमा का काÞड तु मको?
और दे खा, हं गर| म जो हु आ?

रह सको तो तु म रहो समदूर दोन| क| पहु ँच से
और अपना आcमगु ण ÍवकÎसत Íकये जाओ।
आप अपने पाँव पर जब तु म खड़े होगे ,
आज जो Fठे हु ए ह,
आप ह| उठकर तु +हारे साथ हो ल गे।

खींचते ह जो तु +ह दाय Íक बाय, मूख ह ।
ठ|क है वह Íब7दु , दोन| का Íवलय होता जहाँ है ,
ठ|क है वह Íब7दु , िजससे फू टता है पथ भÍव*यत का।
ठ|क है वह माग जो 1वयमेव बनता जा रहा है
धम औ’ Íव7ान
नूतन औ’ पु रातन
9ा¯य और 9ती¯य के संघष से।

जब चलो आगे,
जरा-सा दे ख लो मु ड़ कर Îचर7तन Fप वह अपना,
अÍखल पÍरवत न| म जो अपÍरवÎत त रहा है ।
करो मत अनु करण ऐसे
Íक अपने आप से ह| दूर हो जाओ।
न बदलो य| Íक भारत को
कभी पहचान ह| पाये नह|ं इÎतहास भारत का।
(३)
सीखो Îनत नूतन 7ान, नई पÍरभाषाएँ,
जब आग लगे , गहर| समाÎध म रम जाओ।
या Îसर के बल हो खड़े पÍरHम म घूमो,
ढब और कौन ह चतु र बु Í@-बाजीगर के ?

गाँधी को उ~टा Îघसो, और जो धूल झरे
उसके 9लेप से अपनी कु ं ठा के मु ख पर
ऐसी न4काशी गढ़ो Íक जो दे खे , बोले ,
"आÍखर बापू भी और बात 4या कहते थे ?"

डगमगा रह ह| पाँव, लोग जब हँसते ह|,
मत Îचढ़ो, ²यान मत दो इन छोट| बात| पर।
क~पना जगÿु ³ता क| हो िजसके Îसर पर
वह भला कहाँ तक ठोस कदम धर सकता है ?


औ’ Îगर भी जो तु म गये Íकसी गहराई म ,
तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी?
यह पतन नह|ं, है एक दे श पाताल गया
¯यासी धरती के Îलए अमृ त-घट लाने को।

जवाहरलाल
(१)
तु म न होगे , कौन तब इस नाव का म~लाह होगा?
दे श म हर ¯यÍñ को Íदन-रात इसका सोच है ।
दे श के बाहर हम तु मने 9Îत8ा तो Íदला द|,
दे श के भीतर बहु त, पर, बढ़ गया उcकोच है ।
(२)
एक कहता है Íक मूँदो आँख, अमर|का चलो सब,
दूसरा कहता, तु +ह हम Fस ह| ले जायँगे।
म चÍकत हूँ सोचकर 4य| भाग जाना चाहते ह
Íह7द को लेकर हमारे लोग Íह7दु 1तान से ?

जय9काश
लोग कहते ह Íक तु म हर रोज भटके जा रहे हो,
और यह सु न कर मु झे भी खेद होता है ।
पर, तु रत मेरे (दय का दे वता कहता,
चु प रहो, मं Í×cव ह| सब कु छ नह|ं है ।

Íवनोबा
Íवनोबा रात-Íदन बेचैन होकर चल रहे ह ,
अभी ह भींगते पथ म , अभी Íफर जल रहे ह ।
हमीं ह खूब सं²या को Îनकल सं सद-भवन से
Íक7ह|ं रं गीÎनय| के पास म¹न टहल रहे ह ।

Íदनकर
पूछता हूँ म तु झे Íदनकर! Íक तू 4या कर रहा है ?
राजनगर| म पड़ा 4यो Íदन गँवाता है ?
दौड़ता Íफरता समूचे दे श म Íकस फे र म तू ?
छाँह म अब भी नह|ं 4य| बैठ जाता है ?

मा4स और 9ायड
9ेम के नै रा°य क| कÍवता Îलखो तो
मा4स कहते ह Íक यह सब बु जु आपन है ।
यु वÎतय| को दे ख कर दे खो मु कु र तो
9ायड इसको "ओÍडपस कं ¯ले4स" कहते ह ।



गाँधी
(१)
Îछपा Íदया है राजनीÎत ने बापू! तु मको,
लोग समझते यह| Íक तु म चरखा-तकल| हो।
नह|ं जानते वे , Íवकास क| पीड़ाओं से
वसु धा ने हो Íवकल तु +ह उcप7न Íकया था।
(२)
कौन कहता है Íक बापू श×ु थे Íव7ान के ?
वे मनु ज से मा× इतनी बात कहते थे ,
रे ल, मोटर या Íक पु *पक-यान, चाहे जो रचो, पर,
सोच लो, आÍखर तु +ह जाना कहाँ है ।
(३)
सcय क| संपूणता दे ती न Íदखलाई Íकसी को,
हम िजसे ह दे खते, वह सcय का, बस, एक पहलू है ।
सcय का 9ेमी भला तब Íकस भरोसे पर कहे यह
म सह| हूँ और सब जन झूठ ह ?
(४)
चलने दो मन म अपार शंकाओं को तु म,
Îनज मत का कर पHपात उनको मत काटो।
4य|Íक कौन ह सcय, कौन झूठे Íवचार ह,
अब तक इसका भेद न कोई जान सका है ।
(५)
सcय है सापे+य, कोई भी नह|ं यह जानता है ,
सcय का Îनण|त अि7तम Fप 4या है ? इसÎलए,
आदमी जब सcय के पथ पर कदम धरता,
वह उसी Íदन से दु रा0ह छोड़ दे ता है ।
(६)
हम नह|ं मार , न द गाल| Íकसी को,
मत कभी समझो Íक इतना ह| अलम है ।
बु Í@ क| Íहं सा, कलु ष है , Hू रता है कृ cय वह भी
जब कभी हो Hु @ Îचं तन के धरातल पर
हम ÍवपHी के मत| पर वार करते ह ।
(७)
शाि7त-ÎसÍ@ का ते ज तु +हारे तन म है ,
खqग न बाँह| को न जीभ को ¯याल करो।
इससे भी ऊपर रह1य कु छ मन म है ,
Îचं तन करते समय न Tग को लाल करो।
(८)
तु म बहस म लाल कर लेते Tग| को,
शाि7त क| यह साधना Îन°छल नह|ं है ।
शाि7त को वे खाक द गे ज7म िजनक|
जीभ संकोची, (दय शीतल नह|ं है ।
(९)
काम ह िजतने जFर|, सब 9मु ख ह ,
तु ¯छ इसको औ’ उसे 4य| ÷े8 कहते हो?
म समझता हूँ Íक रण 1वाधीनता का
और आलू छ|लना, दोन| बराबर ह ।
(१०)
लो शोÍणत, कु छ नह|ं अगर यह आँसू और पसीना,
सपने ह| जब धधक उठ तब 4या धरती पर जीना?
सु खी रहो, दे सका नह|ं म जो कु छ रो-समझा कर,
Îमले तु +ह वह कभी भाइय|-बहन|! मु झे गँवा कर।
(११)
जो कु छ था दे य, Íदया तु मने , सब लेकर भी
हम हाथ पसारे हु ए खड़े ह आशा म ;
लेÍकन, छ|ंट| के आगे जीभ नह|ं खु लती,
बेबसी बोलती है आँसू क| भाषा म ।
वसु धा को सागर से Îनकाल बाहर लाये ,
Íकरण| का ब7धन काट उ7ह उ7मु ñ Íकया,
आँसु ओं -पसीन| से न आग जब बु झ पायी,
बापू! तु मने आÍखर को अपना रñ Íदया।
(१२)
बापू! तु मने होम Íदया िजसके ÎनÎमô अपने को,
अÍप त सार| भÍñ हमार| उस पÍव× सपने को।
Hमा, शाि7त, Îनभ|क 9ेम को शतशः ¯यार हमारा,
उगा गये तु म बीज, सींचने का अÎधकार हमारा।
ÎनÍखल Íव+ के शाि7त-य7 म Îनभ य हमीं लग गे ,
आये गा आकाश हाथ म , सार| रात जग गे ।
(१३)
बड़े-बड़े जो वृ H तु +हारे उपवन म थे ,
बापू! अब वे उतने बड़े नह|ं लगते ह ;
सभी ठूँ ठ हो गये और कु छ ऐसे भी ह
जो अपनी ि1थÎतय| म खड़े नह|ं लगते ह ।
(१४)
कु ता -टोपी फ क कमर म भले बाँध लो
पाँच हाथ क| धोती घु टन| से ऊपर तक,
अथवा गाँधी बनने के आकु ल 9यास म
आगे के दो दाँत डा4टर से तु ड़वा लो।
पर, इतने से मूÎत मानगाँधीcव न होता,
यह तो गाँधी का ÍवFपतम ¯यं ¹य-Îच× है ।
गाँधी तब तक नह|ं , 9ाण म बहने वाल|
वायु न जबतक गं धमु ñ, सबसे अÎलB है ।
गाँधी तब तक नह|ं , तु +हारा शोÍणत जब तक
नह|ं शु @ गै रे य, सभी के सTश लाल है ।
(१५)
1थान म संघष हो तो Hु5ता भी जीतती है ,
पर, समय के यु @ म वह हार जाती है ।
जीत ले Íदक म “िजना”, पर, अ7त म बापू! तु +हार|
जीत होगी काल के चौड़े अखाड़े म ।
(१६)
एक दे श म बाँध संकु Îचत करो न इसको,
गाँधी का कत ¯य-Hे× Íदक नह|ं , काल है ।
गाँधी ह क~पना जगत के अगले यु ग क|,
गाँधी मानवता का अगला उͧकास ह ।

ेम
(१) ेम क आकलता का भेद ु छपा रहता भीतर मन म, काम तब भी अपना मधु वेद सदा अं कत करता तन म।

(२) सु न रहे हो य?

तु ह म यार करती हू ँ । और जब नार कसी नर से कहे , य! तु ह म यार करती हू ँ, तो उ चत है, नर इसे सु न ले ठहर कर, ेम करने को भले ह वह न ठहरे । (३) मं तु मने कौन यह मारा क मेरा हर कदम बेह ोश है सु ख से? नाचती है र क धारा,

वचन कोई नकलता ह नह ं मु ख से। (४) पु ष का ेम तब उ ाम होता है , या जब अंक म होती।

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