प.प.

ौीवासुदेवानंदसरःवितिवरिचतं

योगरहःयम।्

ःमृतोS यवित यो िव नं िन नम बासुतः ःतुतः। ग धवःथः स िह कलौ मलौघ नोSःतु मे

िद।।

नमिम शारदां दे वीं वीणावादनत पराम।् सरःवती जग माता सा मे बुि ं ूचोदयात।।

वासुदेवयितं व दे वामनं मम स ु म।् कवी रं च द ा यं याचे मितूकाशनम।।

वासुदेवमयं िच ं यःय भ ािभव सलम।् अवधूतSवधू

तं तं ौीरं गं ूणमा यहम।।

उपो ात
योगरहःय यह केवल 42

ोक का ूकरण ि साहॐी गु च रतम ् के अंत म समािव

एक है । ि साहॐी प.प.ौीवासुदेवानंदसरःवती ःवामी महाराज का आ

मंथ है ,

दो रहःय म से

जस क रचना पूवाौम म

माणगांव म हई।
उस पर ट का महाराजौी ने सं यासाौम म, कर ब 15 वष बाद, ूभास और

िलखी है । ःव पतः यह मंथ मराठ ौीगु च रऽ का सं

ारका

ेऽ म

संःकृ त अनुवाद है । परं तु अनेक ूकार से यह मंथ

बहत
ु ह मह वपूण है । ौीगु च रऽ क कथाओं का अनुवाद तो उस म है ह । उ ह ं के साथ महाराजौी ने इस
मंथ म और क

मह वपूण तथा गूढ िवषय का उ ाटन िकया है । मंथ के आरं भ म ौीगु ःतुित, मंथ के बीच

आते ह। इन के

ारा महाराजौी ने मराठ गु च रऽ म जो िवषय संक ण और संिद ध

चौथा अ याय ( जसे महाराजौी ःप

प से

ेपक कहते है ), और अंत म योग और बोध नाम के दो रहःय
प से ह ल

त हए
ु ह,

उन को िवशद िकया है । उदाहरणाथ, ौीगु च रऽ म ौीद ज म क कथा आती है और ौीपादौीव लभ तथा

ौीनृिसंहसरःवती को ौी द

भगवान के अवतार कहा गया है । परं तु इन दो महापु ष के काय और त व ान

का ौीद परं परा से संबंध ूायः संिद ध है । ौीगु ःतुित तथा चौथे अ याय म ौीद
ौीद परं परा का ता वक आधार और उपसनाप ती सुःप

भगवान का ःव प,

क गई है । तथा द संूदाय का ौीभागवत परं परा से

नाता ल

त िकया है । उसी तरह से जगह जगह पर, िवशेष कर बोधरहःय म, ौीद परं परा के शांकर अ ै त

योगशा

का द परं परा म िवशेष ःथान िवशद िकया गया है । इस मंथ को ःवयं द भगवान ् ने “संिहता” कह

वेदांत से घिन

संबध
ं पर ूकाश डाला गया है । उसी ूकार योगरहःय के

ारा मराठ गु च रऽ म अ या त

कर इस के मंऽःव प होने का संकेत िदया है । महाराजौी के समम वा य का अवलोकन करने पर ऐसा जान

पडता है िक उस मे ूितपािदत सभी िस ांत का सूऽपात ि साहॐी म ह हआ
है । इस से यह ःप

ि साहॐी मंथ म महाराजौी के सभी त व और िस ांत का संमह है ।

रहःय

होता है िक

यूँ

इसे रहःय

यूँ कहा गया है इस का थोडा िचंतन करना चािहए। इस रहःय के अंत म महाराजौी

कहते ह िक यह परम रहःय है और जस िकसी को नह बताना चािहए। इदं रहःयं परमं न ॄूयात ् यःय

कःयिचत।् यिद ऐसा है तो इसक रचना ह

यूँ क गई। इस से यह ूतीत होता है िक अिधकार

ज ासू के

मागदशन के िलए इस को अंशतः ूकट िकया गया है । ौीम गव ता म भी अंत म ौीकृ ंण भगवान अजुन से
कहते ह िक यह म ने तुझे गु
ोक उस गु

से भी गु तर

ान बता िदया है । इस से यह संकेत िमलता है िक गीता के

का आवरणमाऽ ह। केवल उन के पढने से या उन का श दाथ जान लेने से उस गूढ आशय का

आकलन नह हो सकता। वह बात योग और बोध इन रहःय क भी है । एक तो अ ांगयोग और

रहःय म सूऽ प से कहा गया है । अ यथा 42 और 44

ोक म इन िवषय का कथन नह हो सकता। इस से

भी बड बात यह है िक वेद, शा , पुराणािद इन मंथ को समझने के िलए केवल भाषा का

जैसे िक

ेता तर उपिनष

ान पया

म कहा गया है , यह कहे गये अथ या आशय उसी महा मा क बु

होते ह जस के मन म ई र और ई रािभ न ौीगु

तथा गुरौ। तःयैते किथता

ानयोग इन

के िलए परा भि

नह है ।

म ूकािशत

है । यःय दे वे परा भि यथा दे वे

थाः ूकाश ते महा मनः।। माऽ यु पि

और तक से इन बात को

1

िफर 13 अ याय (37 तक) कम और 14 अ याय भि कांड माने जाते ह। इन तीन क आवँयकता यूँ होती है यह अगले ोक म ःप भि ं िवना न साफ यं कमणः कमणा िवना। न च ानं िवना ानान ् न मो ो यःय कःयिचत।। ् 2।। इस म ूमुख िस ांत भ.पू. लयं नयेत। यःतौ. यह मंथ के अ ययन के िलए अिधकार क बात कह जाती है । अनिधकार के िलए िकतने भी िववरण के होते हए ु भी यह रहःय.जान पाना असंभव है । इसी िलए. वे तब तक िनंकाम नह हो सकते जब तक वे ई रापण बु से नह होते। परमे र के ूीित के उ े ँय से िकया गया कम ह िनंकाम हो सकता है । यह तो या या भि क भी है । सा तु अ ःमन ् परमूेमःव पा। इस से यह ःप होता है िक कम भि के सिहत होना चािहए। इस कारण से यह तीन योग का ूितपादन ि साहॐी म िकया है । इस के बाद योग का ूयोजन ःप न करते ह। ानं जीवित ूाणे मनःयिप. महाराजौी ने ौीद पुराण के सातव वे तथा आठव अ याय म िकया है । इस से यह िवषय महाराज को िकतना मह वपूण लगता है इस का पता चलता है । भूिमका इस रहःय क भूिमका ूारं िभक कुछ ोक म बताई है । पहले ोक म महाराज कहते ह ौे पुंज मसाफ यं काय योगऽयाौयात।् समा याति साहॐी-संिहतासंमहः वयम।। ् 1।। दो हजार ोक क इस संिहता का सार बताया गया है । वह यह है िक ौे भि . िफर पांच अ याय म का िन पण योगीराज द ूभू ने कराया है । ौीगु च रऽ क यह िऽकांडा मक रचना ःवामी महाराज का ह योगदान है । इस के अनुसार मराठ गु च रऽ म पथम 24 अ याय ानकांड.पाद ौी आिदशंकराचायजी का ह शंका उप ःथत िकया है । होती है िक यिद ान ह से मो ूा होता है तो दसरे दो योग का िन पण िकस कारण ू िकया गया है ? इस का कारण वाितकसार म यह बताया गया है िक क आवँयकता है । इस को पाना केवल िच शुि ानादे व तु कैव यं यह है । ःवाभािवक ान क ूाि से ह संभव है । और िच शुि के िलए शमािद ष का एकमाऽ साधन िन यािद िविहत कम का िनंकाम अनु ान ह है । इसी िलए यहाँ महाराजौी कहते ह कमणा िवना न च कमयोग से िच शुि कमणः साफ यं न। भि होती है तो िफर भि क क आवँयकता ानम ्। या आवँयकता है ? तो कहते ह भि ं के िबना कम क सफलता नह होती। कम क सफलता िच शुि अ याय क ट का म महाराजौी ने भि संपत ् िवना है । उ नीसवे यूँ होती है इस का िवःतार से िववेचन िकया है । िन यािद िविहत कम यिद संप न हो भी जाएँ. दसरा कोई भी नह । बा ू नािसका से चलने वाली इडा और दािहनी नािसका से चलने वाली िपंगला इन दो नािडय म ूवािहत होना ह ूाण का जीवन है । िनरं तर संक प और िवक प ारा अनेक िवषयाकार वृि य 2 . ग छित मो ं स योगी. रहःय ह रह जाते ह। इस रहःय का िवःतारपूवक िववेचन ौीगु चरण ूातःःमरणीय योगीराज ौी वामनरावजी गुळवणीमहाराज ने िकया है । उसी के आधार पर हम इस योगरहःय का प रचय माऽ कराने जा रहे ह। इस ूवचन के सुनने से ौोतागण म यह िववेचन के िवषय म ज ासा जाग यह इस का मयािदत उ े ँय है । योगरहःय म कुछ प रवतन कर के हठयोग का अिधक िवःतारपूवक कथन. कम और मानवज म क सफलता ान इन तीन योग के आौय से क जानी चािहए। ि साहॐी म यह तीन योग िकस ूकार ानं ऽयोदशा यायैः कमयोगं च मिथत ह यह बोधरहःय के प ात ् मंथ के अंत म महाराजौी कहते ह। पंचिभः। पंचिभभि योगं च कारयामास योिगरा ।। पहले तेरह अ याय म कम (14-18) और शेष पांच अ याय म भि ान. ना यः कथचन।।3।। ूाण और मन के जीिवत रहते (आ म) ान नह होता। इन दोन का लय करनेवाला योगी ह मो पाता है .

ू याहार. चांिायणािद से शर र का शोषण। ई रू णधान ौवण. िनयम. कम और भि अनुःयूत ह। आरं भ म मो ूा ी के िलए भि . क तन आिद नविवध करणभि या साधनभि समािधिसि र का ह नाम है । इस का फल योगशा रू णधानात।् अथात ् पतंजिलूणीत िबयायोग म अंतभाव होता है । भि शा म साधनभि के साथ फल प भि म समाधी क िसि ान. मनन और िनिद यासन। इन म से ौवण और मनन अ ांगयोग के िनयम ःवा याय म िनिहत है । शौच-संतोष-तपःवा याये रू णधानािन िनयमाः। िस ांत तथा वेदांत के ौवण से ह ता पयाथ का िनणय होता है । यह ःवा याय है । मो शा का अ ययन तथा ता पयाथ क िन ित के िलये उस का िचंतन यह ःवा याय ह का अंग है । इसी ूकार िवजातीय ू यय के िनरोध के साथ सजातीय ू यय मे िच करते हए ु उस को तप. कम और ान इन तीन का अंतभाव अ ांगयोग म होता है । इस तरह से िवरोध क कोई बात ह नह रहती। यह तो सूऽ प से महाराजौी ने बता िदया। परं तु इस का िवःतार से ःप ीकरण हठयोगूद िपका क ॄ ानंदजी ने िकया है । यहाँ उसे सं प से दे खते ह। योग के आठ अंग ये ह। यम. कम तथा ोक म िकया गया है । भि िबया ानयोगा मुि से आ गया? इस आशंका का समाधान पांचव तत ् ऽयम।् ेयं सा ांगयोगांतगतं ान क आवँयकता कह गई। िफर यह अ ांगयोग कहाँ ािप ै धमतोऽ नो।।5।। महाराजौी का कहना है िक भि . कृ ल. ःमृित. समािध दो ट का म यान और समािध। इस म ूकार क है . पुराण आिद के बहत ृ िकए ह। ज ासू ु से अवतरण उ त स जन उसे मूल मंथ म दे ख सकते ह। यहाँ योग श द से महाराजौी को अ ांगयोग अिभूेत है । अ ांगयोग म ान. उपिनषद म एवं पतंजिलूणीत योगशा का ल ण बताया गया है । आज भी इस अवःथा को ूा भारतभूमी म िव मान ह। म यह करने-करानेवाले महा मा इस पिवऽ मन और ूाण एक दसरे से जुडे हए ू ु ह। ूाण चलता है तो मन भी चंचल हो जाता है । वैसे ह ूाण ःथर होता है तो मन भी ठहर जाता है । चले ूाणे चलं िच ं िन ले िन लं तयोः। न एकतरे नाशो योरिप. ूाणायाम. स योगतः।।4।। दोन म से एक का नाश हो गया तो दोनो का नाश होता है । यह योग से ह संभव है । यह बात भगवान ौीकृ ंण गीता म इस ूकार कहते ह। यु ज नेव सदा मानं योगी िनयतमानसः। शांितं िनवाणपरमां म संःथामिधग छित।।6-15।। ॄ ानंदजी ने हठयोगूद िपका क ट का म मो के िलए योग क आवँयकता का ूितपादन करने वाले ौुित. धारणा. आसन. स य क पुि योगतारावली. योगिस ासो ाने र जैसे सहॐावधी िस मंथ म. संू ात और असंू ात। संू ात समािध योग आठवा अंग है तथा असंू ात समािध अंगी अथात ् योग है । पहले ानमाग का िवचार करते ह। ानमाग के मु य साधन ह.का िनमाण ह मन का जीवन है । उसी तरह अपने अपने िवषय का महण इं िियो का जीवन है । जब पूर तरह क जाएगा और उस के साथ मन िनिवचार हो जाएगा तब ह आ म ान पी मो होती है । सामा यतः यह तो जीते जी संभव नह लगता। परं तु यहाँ महाराजौी योगशा रहे ह जस का अनुभव वे कर चुके ह। और भी अनिगनत महा माओं ने इस योगशा वास क िसि का एक िस ांत बता के अनु ान ारा इस अपने अनुभव से क है । इसी अनुभूती को योग का परम सा य बताया गया है । हठयोगूद िपका. ौवण. येयाकार करना िनिद यासन है । यह अ ांगयोग का सातवा अंग ःवा याय तथा ई रू णधान इन तीन को िमला तपःवा याये रू णधानािन िबयायोगः। इस म कम तथा भि कर पतंजिल ूवािहत यान होता है । िबयायोग कहते है । इन दोन का समावेश होता है । तप का अथ है उपवास. कम और भि बताया गया है । इन तीन का का भी ूितपादन है । नारायणतीथजी 3 .

घूमना-िफरना मयािदत होना चािहए। आजकल ःवयंचिलत वाहन के युग म यह वैसे भी बहत ु कम हो गया है । और थोडा बहत ु तो चलना आवँयक होने क बात पर बल िदया जा रहा है । इसी तरह जीवनयापन के िलए आवँयक उतना ह शार रक या मानिसक काम करना चािहए। इस से योग सुखकर होता है । अ याहारः ूयास ूज पो िनयममहः। 4 . परं तु उस म आलःय का ूादभाव न ह वह आहार यु ु है । शा ढ और का कहना है िक आधा पेट अ न से और चौथाई पानी से भरना चािहए। चौथा िहःसा वायुसच ं लन ते िलए खाली छोडना चािहए। िनिा से जुडे हए जो बात आहार क है वह िनिा क भी है । िनिा और आहार एक दसरे ू ु ह। अिधक िनिा भूख बढाती है और आहार बढने से िनिा अिधक आती है । गित अथात ् चलना.ई रचरणकमल म अन य उ कट ूेमूवाह को फलभि आचाय मधुसूदन सरःवती इस क या परा भि या या ूेम से िवीभूत िच कहते ह। अ य भि शा ई राकार होना ऐसी करते है । दोन ह या याएँ सिवक प समािध के ल ण से िमलती ह। अथात ् जहाँ साधनभि वहाँ परा भि सिवक प समािध का ह योग म समािव ह। के प है । इस तरह से कम. कम या ान का अ यास िनतांत ान म से िकसी एक का अनु ान शेष दो माग के िवना नह हो सकता। इसी िलए महाराजौी ि साहॐी के 19वे अ याय के आरं भ म कहते ह. भि िबयायोग म िनिहत है और ान तीन उपाय अ ांग यहाँ एक बात जानना आवँय है िक का इस िस ांत से महाराजौी योग का एकांितक समथन नह करते है । शेष सब साधन छोड कर केवल अ ांगयोग का ह आौय करने को महाराज नह कहते ह। महाराज के कहने का आशय यह है िक योग के साधक को भी भि . िव ानमय और आनंदमय कोश का उसे ान तक नह है । केवल ू य ूमाण मानने से. िनिा. मानव दे ह के इन कोश का उसे आकलन नह है । योगा यासी के िलए अ नमय कोश से भी इन कोश के िवकास पर अिधक यान दे ना आवँयक है । अ न से केवल रसपुि िलए हािनकारक िस हो सकती है । मन भी तो अ न से ह बनता है । हमारे शा का है । तप माना है । हर यि िवधान िकया षोडशार यवािसनः। के िलए एक ह ूकार का आहार यु आहार के िवषय म म तो शर र के शोषण को नह होता। इसी िलए भारतीय शा ःमृितकार बताते है – अ ौ मासा ने वणाौम मुनेभआयाः ािऽंश ु गृहःथःय यथे ं ॄ चा रणाम।। ् यह वचन केवल िदशा िदखाता है । हर एक साधक को अपना अपना आहार िवचारपूवक िन श हो जाएँ तो वह साधक के त करना है । जस से शर र िन यकम के िलए हो. िऽिभय गपथैरेव परःपरसहायकैः। ॄ ा ं ं समं शांतं ग यते नैकयोगतः।।3।। यह तीन माग को िमला कर ह योग अथात ् अ ांगयोग होता है ऐसी ौीमहाराज क मा यता है । जीवनशैली पाँच ोक म भूिमका िवशद करने के बाद अब अ ांगयोग का िन पण आरं भ करते ह। अगले चार ोक का िवषय केवल योग के अ यासक के िलए ह नह तो सभी क याणकामी जन के िलए उपयु ह। ना य तोSन तोSितसु ःयैष न जामतः। यु चे ाहारिनिागतेय गो भवे सुखः। यह गीता के ‘यु ाहारिवहारःय’ इ यािद ोक का अनुवाद है । जसे योगा यास करना है उस क जीवनशैली कैसी हो इस का िद दशन यहाँ िकया है । आहार. कम तथा आवँयक है । उसी ूकार भि . मनोमय. गित और चे ा इन चार का संतुलन शर र के ःवःथ और काय म रखने के िलए बहत ु आवँयक ह। आहार आहारशा आधुिनक आरो यशा ी भी अब इन के संतुलन का मह व जान चुके ह। िकंतु यहाँ आधुिनक क मयादाओं को जानना आवँयक है । आधुिनक आहारशा केवल ःथूल या अ नमय कोश का ह िवचार करता है । ूाणमय.

खासूखा खा (उदा. लोग धािमक ह.जीव ती. भि आिद 5 . इं ििय को संयिमत कर के ॅूम य म ू रखने से िस नाम का आसन होता है । और भी आसन कर सकते ह पर यह अ छा है । यहाँ महाराजौी ने एक ह आसन का वणन िकया है । हठयोगूद िपका म भी अनायास तीन कहा है िक एक िस ासन ह ढता से िस होने से बंध लग जाते ह और उ मनी कला अपने आप ूकट होती है । उ प ते अनायासात ् ःवयमेवो मनीकला। तथैक ःम नेव ढे िस े िस ासने सित। बंधऽयमनायासा ःवयमेवोपजायते।।1:42।। द पुराण (7:8-12) म ःव ःतक. अपनी बु हठयोग के मागदशन से अ यास करने म खतरा है । यहाँ अ ांगयोग न कहते हए ु ःवामीमहाराज हठयोग श द का ूयोग करते ह। इस पर ट का म ं उ यत’ इित तयोः ूाणापानयोय गः हठयोगः। महाराजौी कहते ह – ‘हकार उ यते सूय कार ि ह का अथ सूय अथात ् ूाण है तथा ठ का अथ चंि अथात ् अपान होता है । इन ूाण और अपान का योग ह हठयोग कहलाता है । गीता को चौथे अ याय म ‘अपाने जु ित ूाणं ूाणेSपानं तथाSपरे ’ ऐसा वणन हठयोग का ह है । इन दोनो का योग करने से ूाण प ममाग अथात ् सुषु ना नाड म ूवेश करता है । इसी को कुंडिलनी शि का जागरण कहा जाता है । आगे 32 वे ोक तक महाराजौी हठयोग सं ेप म बताते ह। यह सूऽ प िद दशन माऽ है । इस का अनु ान करने के िलए िस सा न य अिनवाय है । गु का मागदशन एवं आसन आरं भ म 10व ोक म आसन िन िपत है । गुदमे हो वःथगु फमासीनो यतगुः समः। ॅूम य ि वाS यपीठै ः िस ं तऽाS यदोS ःत सत।। ् एक एड गुद ार के ऊपर और दसर वृषण के ऊपर रख कर. म ःया ी (छछमछर ). शुिच िभ ा जहाँ िमलती है . उडद आिद). प . लुटेरे आिद उपिव से रिहत. मूँग और च ंु य स जी (उदा. कडवी और तीखी चीज. एक धनुंय तक जहाँ िशला. घी. ःवपरचब. स जी इन का ूयोग खाने म करने से तथा अित र कामसेवन. वःतु- हे तुया. श कर.जनसंग लौ यं च ष भय गो िवनँयित। जनसंगप र यागात ् ष भय गः ूिस उ साहा साहसा ै या व ाना च यित।।(हठयोगूद िपका) िन यात।् या य और से य अगले ारा लित कटु ोक म आहारािद म कद नशाक य न वभा या य और न से य या है यह लभतेSकुशलभतेSकुशलोSःय बताते ह। िसि म।् शुंठ िसतासुमनशािलसद नमु च ंु यशाकघृतद ु धसद बु प यम।। ् 8।। खार . िसंह. गेहूँ . ख ट . अ न और किठन भूमी (जल) न ह ऐसे दे श म छोट सी कुिटयाँ बनानी चािहए। उस म गु से हठयोग का अ यास करना चािहये। पुःतक पढ कर. पुननवा(करला). चवराई. अ नसंपक व याऽा करने से तथा अ यास म कुशल न होने से इस योग क िसि क िसि नह होती। योग म प यकारक चीज ह अिक. जवार. मयूर. चाँवल. दध ू और शु ःथान पानी। इस ूकार अनुशािसत साधक को योगा यास िकस ःथान पर करना चािहए यह बताते ह। स े शे मिठकाम ये िन तो गु िश तः। कुशा जनांशुकेंवेव हठयोगं सम यसेत।। ् 9।। स े शे का आशय हठयोगूद िपका म ऐसा कहा गया है । सुरा ये धािमके दे शे सुिभ े िन पिवे। धनुःूमाणपयतं िशला नजड(ल)व जते।। एका ते मिठकाम ये ःथात यं हठयोिगना। जहाँ अ छा शासन है . वरई.

चौबीस माऽा का म यम और छ ीस माऽा का उ म माना गया है । िनिावःथा के नाड शुि ासो वास के काल क एक माऽा समझी जाती है । गंत यमागःथशि चालना ॐया भवेत।् नाड शुि ऊपर बताए हये ु ूाणायम.आसन का वणन िकया है । आगे कहा गया है िक आसनजय से सवजय हो जाता है । इन म से कोई भी आसन करने क शि न ह तो शवासन करने के िलये कहा है । ूाणायाम अगले तीन वायुं श ोक से ूाणायाम सं येडयाSSपूय वणन करते ह। िद ःथा य हनुं जपन।् हं सं श या कुंभिय वा प ादाकिषतोदरः।। शनैिवरयचेदेष ूाणायामः सुिसि दः। पंच याअ यअ यशी यं यैः ूितसं यसुयामकैः।।12।। अपनी श के अनसार वायु को इडा ारा पूरण कर के श यनुसार कुंभक करना चािहए। कुंभक करते समय हनु सीने को (जालंधर बंध) लगा कर गायऽी या सोSहं का जप करना चािहए। अथात ् यह ूाणायाम सबीज होता है । कुंभक के बाद पेट अंदर खींच कर (उ डयान बंध) धीरे धीरे िपंगला नाड से वायु का रे चन करना चािहए। इस ूाणायाम से उ म ूकार क िसि चािहए। इस ूकार के तीन बंध सिहत ूाणायाम ूा होती है । यहाँ तीसरा मुलबंध उपल त जानना िदन म तीन सं याकाल म करने चािहएँ। उन क क सं या ूितिदन पांच से बढा कर अःसी करने को कहा है । हठयोगूद िपका के अनुसार ये तीन सं याकाल के अित र म यराऽी म भी ूाणायाम करना चािहए। ादश माऽा का ूाणायाम किन . िस ादश िदन का समािध बहत है । योग के पाँच अंग क यह ु ु दलभ हठयोगूद िपका क ट का म ॄ ानंद भी इसे दोहराते ह। होते ह। यह या या ःकंदपुराण म पायी जाती है । भिॐका ूाणायाम आगे चार ोक म महाराजौी भिॐका ूाणायाम का वणन करते ह। समासीनो यताःयोS तः ूाणं द लोहकारःय भॐाव छ णया यजेत।् सारं लगित कंठकपोलाव यसौ यथा।।1 या ापूय रे चयेत।् वामां म यानािमका यां धृ वा जाते ौमे िवधेः।। पी वा ूाणं कु भिय वा धृ वांगु ेन द णम।् वामया रे चये मंदं तथाSथ ूा वदाचरे त।। ् 18।। ि ना य यासा ामाध शि माग ददा यरम।् भॐेयं सवदोष नी पाप यिप िसि दा।।19।। हठयोगूद िपका म आठ ूकार ते कुंभक बताये ह। सूयभेदनमु जायी सी कार भिॐका ॅामर मूछा लािवनी य सीतली तथा। कुंभकाः।। महाराजौी ने यहाँ भिॐका का ह वणन िवशेष ःव प से 6 . भिॐका से तथा इ मासो व ूाणो याित लयं स त।। ् 13।। माग म शि चालन करने से तीन मह न म नाड शुि हो कर ूाण और मन दोन का लय होता है ऐसा महाराजौी का कहना है । भिॐका और शि चालन का वणन आगे आता है । ूितिदन िऽकाल 80 ूाणायाम करने से तीन मह ने म 21600 ूाणायाम होते ह। अथात ् हमारे एक िदन के ासो वास क सं या पूर होती है । यह ूाणायाम का एक पुर रण हो जाता है । ूाण और अपान क एकता होने से वि मंडल म अ न ूद होता है । उसी से संत हो कर सोई हई ु कुंडिलनी जग जाती है और सीधी हो कर ॄ नाड म ूवेश करती है । यह सब वणन हठयोगूद िपका म िवःतार से दे खने म आता है । शि तालू म ॄ रं ी म ूिव होती है । का चालन सुषु णा म करने से वह धीरे धीरे म यममाग को शु करते हए ु लीनः सपंचिवपलि पलं सोSसुयामकः। ॄ रं ीे वधमानः ू याहारादयः स तु।।14।। ःवकाल ादशगुणो रकालाविधः ःमृतः। समािध ादशिदनसा यः परमदलभः।। 15।। ु ॄ रं ी म दो पल और पांच िवपल (50 सेकंद) तक जब ूाण लीन होता है तो ूाणायाम िस हआ ु माना जाता है । यह काल बढ कर पचीस पल (10 िमनट) ूाण के लीन होने से ू याहार. 60 घट अथात ् एक अहोराऽ होने से यान. और 12 िदन होने से समािध. पांच घट (दो घंटे) होने से धारणा.

कफ दोष का. मृ यु आिद छते वह ऊ वरे ता हो जाता है । यास. जीह के मूल क िशरा का रोममाऽ छे दन करने को और उस जगह प या (िहरडा) और सधव (शद लोण) से मदन करने को कहा है । इस से छह मास म ज ा को नीचे बांधनेवाली िशरा न हो जाती है । इस के बाद ज ा उलटे घुमा कर तालू के ऊपर के िछि म. दालना है । इस म ज ा के चालन तथा दोहन से इतनी ल बी करना है .िकया है । यह ूाणायाम दोन नाड य से ूितिदन अधूहर (डे ढ घंटा) करने से शि भिॐका वात. ीसंपक से भी उस के वीय का ःखलन नह होता। कभी हआ भी तो योिनमुिा से बांध कर वह वीय को ऊपर खींच कर योिनमंडल म ःथत रज से िमला कर उस का ु ओज म पांतर करता है । ऐसा योगी. ू ह। नींद. जस से वह खेचर मुिा का फल स म य तक पहँु च सक। ज ा चर यःय खे कदािप ःपृश त नो। िवषाित या ेिषतःयािप िब दन ु जरा ु ृ निा तंिामृितिबयाः।। र यू वमेित सः। चिलत े ोिनमुिाब ो मु ः स भो यिप।28। अब खेचर मुिा का फल कहते ह। ज ा जब ॅूम य म ूवेश करती है तब योगी का िच भी वहाँ के आकाश म अथात ् आ ाचब म ःथर हो जाता है । उस को िवष क बाधा नह होती। ना ह उसे भूख. भोगी हो कर भी मु यहाँ वळोली मुिा का िनदश और फल कहा है । उस का वणन नह िकया है । होता है । 7 . जस ने योिन(वळोली)मुिा िस क है . यािधय का तथा पाप का नाश कर के िसि शि चालन आगे शि चालन का िविध ःप िकया है । िश ना यंतःथकंदं सित वळासने पदौ। धृ वा समाकुंिचतनािभिा कुया छि इन करानेवाली है । ढं ूपी यारं भॐां िस ासन ःथतः।।20।। ल यतः। यामाधा यासतो धैया म यना यां समु ता।।21।। ऊ वाकृ ा भवे कंिच छि नाड मुखं चालना सविस ूा शीय माग दे ती है । यह यजेत।् ततः ःवतो ोज यू व ूाणोSतःतां िवचालयेत।। ् याि मडला ोिगनो न तु। यो भयं यमा चािप नेतोS य नािडशोधनम।। ् ोक म िलंग और नाभी के बींच ःथत कंद का वळासन म बैठ कर पैर से ताडन करने को कहा का चालन है । उसके प ात ् िस ासन पर बैठ कर नाभी के आकुंचन के साथ ित ु गती से भॐा करने से शि होता है । अधूहर तक यह अ यास करने से सुषु ना म ूिव कुंडिलनी शि ऊपर क ओर खींची जाती है और वह नाड का मुख खोल दे ती है । इस से ूाणवायु अपने आप ऊपर उठ कर ॄ रं ी म ूवेश करता है । इस िलए शि को चलाना चािहए। शि चालन से योगी चालीस िदन म सभी िसि य क ूाि को रोग से या यम से तक भय नह रहता। शि चालन जैसा नाड शुि हठयोगूद िपका म दस मुिाओं का उ लेख है । महामुिा महाबंधो महावेध खेचर । उ कर लेता है । ऐसे योगी का कोई अ य साधन नह है । यानं मूलबंध बंधो जालंधरािभधः।। करणी िवपर ता या वळोली शि चालनम।् इदं िह मुिादशकं जरामरणनाशकम।। ् आता है । इन म तीन बंध और शि चालन अब तक हम दे ख चुके ह। आगे खेचर और िवपर तकरणी का वणन खेचर मुिा इस तरह से शि को गितशील करने के प ात ् ूाणवायु सुख से सहॐार का भेद करते हए ु सभी िसि याँ और राजयोग क ूाि कराएँ इस के िलये खेचर मुिा का िवधान करते ह। चािलतायामिप ूाणो ब ा चेिसना सुखम।् ोज यू व िसि पूव राजयोगपदूदम।। ् 24।। ज ां मूलिशरां िछ वा रोममाऽं ूघषयेत।् प यासधवचूणगा ूा व स िदनैमहः।। ु ु 25।। ष मासािदित ज ाधः िशराबंधो िवनँयित। मुिा ःयात ् खेचर इन य वे यो जताSवा ुखी कला।। ोक म ज ाछे दन क कृ ित समझाई है । बहत ु ह सावधानी से ह ते म एक िदन. िप . जहाँ तीन नािडयाँ िमलती ह.

िनरोगता. शर र का काँय. ॅांितदशन. िविवधा उपसगाः ूा संभव यऽ योिगनः। सदगु ु रो ढभ इन बाधाओं के अनेक वणन शा ारा न करने होते ह। या ते ूणँय त न चा यथा।।32।। म पाए जाते ह। पतंजली महष के सूऽ म यािध ः यान. अिवरित. अल धभूिमक व आिद अंतराय का िनदश आता है । िविवध ूकार क िसि याँ भी योगी के पतन का कारण होने से िव न प ह ह। महाराजौी क मा यता से इन सब से बच िनकले का एक ह उपाय है । वह है ई रािभ न स ु म उपयोगी नह होता। िसि है । के चरण म ढ भि । दसरा कोई उपाय इन िव न का नाश करने ू के उपरा त योगी का कत य इस तरह से हठयोग क िसि कारण कमा होने के प ात ् योगी का या कत य है वह 33 व ोक म ः िकया ोय िगनो योगमु मम।् शमः कारणमःयामे योगा ढःय योिगनः।।33।। यह भगव ता के छठे अ याय के तीसरे ोक का अनुवाद है । हठयोग को कमयोग का ह अंग इस ोक से माना गया है । योग म आ ढ होने के िलये इस क आवँयकता है । जब हठयोग क िसि धारणा.यान-समािध प राजयोग क ूाि करता है तो उसे कम से िनवृ का साधन करना है ऐसा भगव पाद शंकराचाय का मानना है । उसी क पुि पा कर वह हो कर – सं यास ले कर. आलःय. िनद ष ी और िबंद ु का जय यह आठ ल ण हठयोग क िसि मु य है । शेष सब ल ण उस के प रणामःव प ह। योगिसि म बाधाएँ इस क योग िसि म अनेकानेक बाधाएँ होती ह। के माने गये ह। इन म नाड शुि भगवान ौीकृ ंण का वचन है िक अनेकज मसंिस ःततो याित परां गितम।् अथात ् योग का माग बहत ु ह लंबा है । उस का बमण करते करते अनेकानेक ज म बीत जाते ह। िपछले अनिगनत ज म के संिचत कम योग के इन कम के आशय म ह योग के िव न के बींज होते ह। इस िलए महाराजौी कहते ह.िवपर तकरणी मुिा अगले दो ोक म िवपर तकरणी मुिा क कृ ित और फल सं प म कहा है । सुधा तःॐवती दोःतां मस यकःततो जरा। अधःशीष वपाि याममाऽं ततः िसि े ाहारः शनैः शनैः।।29।। यःतेयं करणी दा। वलीपिलतवेप नी मृ युहऽ सुधाूदा।।30।। तालूमूल म ःथत चंिमा से अमृतॐाव होता है । परं तु नािभ म ःथत सूय उसे खा जाता है । यह बुढापे का कारण है । ऊपर बताई गई खेचर मुिा से इस अमृत का पान योगी कर सकता है । इसी अमृत को सूय से बचा कर उस का पान करने के िलए एक और मुिा का हठयोग म िवधान है । कांधे से नीचे का पूरा शर र हाथ से ऊपर उठा कर िसर नीचे रखने से सूय ऊपर हो जाता है और चंिमा नीचे। इस से अमृत बचा रहता है और बुढापा क जाता है । इसे आरं भ म एक इस का अ यास करने से िवपर तकरणी िस आवँयक है । अमृत क ूाि कहते ह। हो जाती है । इस मुिा के अ यास के समय आहार अिधक करना करानेवाली यह िवपर तकरणी शर र क झू रयाँ. अनाहत नाद का ूाक य. कंप और गंजापन िमटाती है तथा मृ यू से भी बचाती है । हठयोगिसि ण तक करना चािहए और धीरे धीरे बढाना चािहए। एक ूहर तक के ल ण यहाँ पर हठयोग का िन पण पूरा होता है । हठयोग िस होने के ल ण अब महाराज एक ोक म ःवाःयेS नौ द ेS गसादे नाड शु ावनामये। नादःफुट वे सु ं याः िसि िबदौ जते सित।। कांितयु मुख. जठरा न का ूद पन. नािडय क शुि . ूमाद. महाराजौी यहाँ करते ह। ानयोग 8 .

संसारतापहर भगवान द ाऽेय के ःव प पर िटकाने को कहते ह। ूादे शमाऽ ऊँचे ूभुजी. और म उस का यान यह िऽपुट बनी रहती है । महाराजौी यहाँ यान का दे श कंठ बताते ह। िस ासन म बैठ कर िदगंबर द ाऽेय क अंगु माऽ मूित का को वे कहते ह। एक िदन और एक रात तक ःथर होने पर को उपसमािध कहते ह। यान यान िस यान करने हो जाता है । ट का म महाराजौी यान समािध सहॐदलप ःथं सुसआ ू मं शांतमु यान इतना ूगाढ हो जाएँ वलम।् समािधना िक उस का ादशाSहं त मयो भावये परम।। ् 38।। िवःमरण हो तो वह समािध कहलाता है । तदे वाथमाऽिनभासं ःव पशू यिमव समािधः। जब केवल अथ अथात ् येय माऽ का भान रह जाता है 9 . सीना. कोई कर के वे मु समािधना। आ मानमेवमा वेमां िसि ं मु ो भव यसौ।।35।। यान से और कोई समाधी से आ मा क उपासना ते ह। इस ूकार िसि हो जाते ह। आगे के तीन ूा ोक म इन तीन का कथन है । प ु ाःयो धारणया वराभयकरो ह रः। ूादे शमाऽः सुिस ः खेचर मुिया युतः।।36।। पतंजिल का सूऽ है . प यान म म िस यानम।् इस सूऽ के यान कहलाता है । इस म यवधान का सवथा अभाव होता है करता हँू यह भान योगी को होता है । अथात ् येय. अ दल अनाहत चब म. याता और यान का िवषय येय है . ॅूम य. परं तु िव छ न प म िच इतना िनब यान धारणा ह प रप व हो कर याये स ासनासीनं िु नशं कंठसं ःथतम।् ।37।। यान म प रणत होती है । तऽ ू ययैकतानता येयाकार िच वृ ी का अिव छ न तथा अ य वृि याँ उिदत नह होतीं। यवधान तो आते ह. कंठ. याता हँू . अ य वृि याँ येयाकार वृ ी बनी रहती है । अगु माऽं पु षं द ाऽेयं िदगंबरम।् अनुसार हो जाना चािहए िक संसार के काय करते हए ु या या है . मुख. वर तथा अभय मुिा धारण िकए दो हाथ ह। इन ौे भगवान ने खेचर मुिा बांधी है । इस भी वहां से ना िहल। धारणा क भी आती जाती ह. एकाम करने से धारणा होती है । ेया य च ं तऽ धायते।। दय दे श म. मू न (िसर) और थोडे उस के ऊपर। इन दे श िवंणुपुराण के अनुसार धारणा भगवान ् के सगुण मूत भगवतो िच महाराजौी यहाँ म िच प म भी हो सकती है । पं सव पाौयिनःःपृहम।् एषा वै धारणा दय.ू याहार 34 व ोक से राजयोग का ूितपादन आरं भ होता है । पहले ू याहार के ल ण बताए गये ह। ौोऽािद पांच इं ििय को अपने अपने िवषय से खींच कर िच अंतमुख करने को ू याहार कहते ोक म अंत क् श द से इसी का िनदश महाराजौी करते ह। इसी को कठोपिनषत ् म ह। अगले आवृ च ु कहा है । क् या च ु यह पांच इं िेय का उपल ण है । कामवेगसहोS त क् सुखारामोSिभतो यितः। ॄ िनवाणमे येव ॄ भूतोSमलः समः।।34।। काम का वेग सहना ू याहार का फल ह है । श नोतीहै व यः सोढंु ूा शर रिवमो णात।् कामबोधो वं वेगं स यु ः स सुखी नरः।।5-23।। केवल अतींििय बुि मा वह सुखाराम कहलाता है । सुखमा यंितकं य सुख म ह जो मगन है बुि मा मती ियम।् वेि यऽ न चैवायं ःथत लित त वतः।।6-21।। ऐसा यित अथात ् सं यासी सम ं ातीत हो कर ॄ ःव प हो कर मो ूा कर लेता है । गृहःथ के िलए यह ःथित दंूा य है ऐसा यहाँ सूिचत िकया है । ु क ारणयोपाःते याना क कोई धारणा से . नेऽ. ऐसी िवषयाकार वृ ी जस म प से ह सह . दे शबंध यह दे श बा ःय धारणा। िच को वृ ी ारा एक दे श म बांधे रखना ह धारणा है । या आंतर हो सकते ह। ग डपुराण म यह दे श दस कहे गये ह। नाभी.

सूआमतर. तेजो प भगव ःव प से तिप ू होना ह समािध है । बारह िदन तक ःथर होने से समािध िस होती है । इस से योगी सभी श मु से अव य.ि इन तीन मंिथय का भेद करनेवाला विन सुनता है उसे समािधलाभ होता है । इस ूकार से सभी िबल को बंद करने को क चार अवःथाएँ योगशा म बताई गई ह। आरं भावःथा म परा ुखी मुिा के नाम से भी जाना जाता है । इस मुिा से सुषु णा म नाद क अिभ यि होती है । इस नाद दय ःथत अनाहत चब म भूषण के विनस श नाद आता है । प ात ् कंठ ःथत िवंणुमंथी का भेद हो कर भेर का नाद ूकट होता है । यह घटावःथा है । तीसर प रचयावःथा म ॅूम य ःथत िमंथी का भेद होता है तब िविश वा का नाद सुनने म आता है । इस से योगी के िच वृ ी प आनंद का लोप होता है और सहज आ मानंद क अिभ यि जरा. और म यामाओं से नाक यह िबल को बंद कर के. मु अथात ् िनिवक पानंद राित अथात ् ूाि कराती है वह मुिा। दे हािद से शू य अथात ् उपािधरिहत परं तु िनषेध से भी जो परे है ऐसा अशू य। यह दोन जस के ल ण ह उस वैंणवा य पद को ूा योगतारावली म 17वे मन करानेवाली यह मुिा महाराजौी बता रहे ह। इसी का वणन ोक म भगव पाद करते ह। नेऽे ययो मेषिनमेषशू ये वायुयया व जतरे चपूरः। संक पिवक पशू यं मनो मनी सा मिय स नध ाम।। ् 17।। यहाँ इस को मनो मनी और आगे 21 वे ोक म अमनःकमुिा कहा है । नादानुसध ं ान त ान ् ढासनो द कण िबलो विनम।् िऽमंिथभेदं शृणय ु ात ् सुसआ ू मं स समािधभाक।। ् 40।। यह शांभवी मुिा धारण कर के दोन हाथ के अंगूठ से कान. ढ आसन म बैठ कर. ु 10 . खुली आँख िनमेषो मेषरिहत बाहर िटक ह। शं=सुख भुवित होता है जस से वह शंभू अथात ् आ मा है । उस क मुिा. हो जाता है । चौथी िनंप ी अवःथा म ूाण ॄ रं ी म ःथर हो जाता है और दािहने कान म बाँसुर जैसा सूआम नाद सुनने म आता है । िच क अतीव एकामता से यु इसी ःथित को राजयोग कहते ह। भगव पाद का कहना है िक सदािशवो ािन सपादल लयावधानािन वस त लोके। नादानुसध ं ानसमािधमेकं म यामहे मा यतमं लयानाम।् इस ूकार ौीःवामीमहाराज ने आसन से ले कर समािध तक छह अंग का िववेचन िकया। पहले िस ासन ढ कर के तीन बंध के साथ ूाणायाम क िविध बताई। इस म शि चालन के िलये भिॐका कुंभक का और उस के साथ कंदताडन का िवशेष ूितपादन िकया है । शि के ॄ॑रं ी तक सुचा प से आवागमन के िलये खेचर मुिा को ूाधा य िदया। चंि से ॐवते अमृत का पान करने के िलये खेचर के साथ ह िवपर तकरणी का िवधान िकया। इस ूकार ूाणजय और िबंदजय करने के बाद राजयोग म बमशः ू याहार. सभी मंऽ तथा यंऽ को अमा हो जाता है । अव यः सवश समािधना।। तथा सभी ूा णय के परे और ाणामश यः सवदे िहनाम।् अमा ो मंऽयंऽाणां योगी मु ः शांभवी मुिा और उ मनी अवःथा अ तल नस ूाणोSपँय नचल बिहः। मुिेSयं शांभवी शू याSशू यलआमपदूदा।।39।। ूाण और मन अंतराकाश म लीन हो गये ह. तजनीय से आँख. िनिा से मु होती है । वह दःख ु . ूशांत. तृषा. ॄ -िवंणु. ुधा. दािहने कान म जो अितसूआम.तब यान का ःव प शू य हो जाता है । वह समािध कहलाता है । इस म िवःमृित हो जाती है और येयमाऽ का भान होता है । याता याता को अपनी और यान क भी येय म लीन हो जाता है । सहॐदल कमल म.

झूठ न बोले. ूातःःमरणीय ौीगु चरण के िववरण के ूकाश म यथामित यथाशि यह िन पणसेवा उ ह ं क चरण म समिपत है । इस म यिद कोई य कंिचत ् ूबोधन हो तो वह ौीगु महाराजजी क कृ पा है । शेष सब अ ान इस सेवक का है । प. वासुदेवानंदसरःवती(टबे) ःवामी महाराज क कृ पा का ह आिवंकार है । वह इसी ूकार विधंणु रह यह ौीगु चरण यागीराज प. उपा य प. धी भाईजी जोशी. पाप और पू य से छट अंत म इस योग को परम रहःय बताते हए ु जस िकसी अनिधकार को कहने का िनषेध िकया है । इदं रहःयं परमं ना येयं यःयकःयिचत।। ् इस योगरहःय को समझने म यह लेखक सवथा अिकंचन है । प. पू. चोर ना कर इ यािद। िनयम गुण के संमह का नाम ह। इन का िनदश योगरहःय के अंत म करने का महाराजौी का संभवतः यह अिभूाय है िक जैसे योगा यास के आरं भ म इन का पालन आवँयक है वैसा ह िसि पर भी योगी को लोकसंमह क ी से इन का आचरण करना मह वपूण है । ूा होने अब इस अ ांगयोग क फलौुित कहते ह। फलौुित एतेना ांगयोगेन ूबु ः ःव पसंिवदा। शुभाशुभिविनमु ो दे ह ॄ मयो भवेत।। ् 42।। ॄ इस आठ अंग के योग से जीव सूआमतर ॄ प हो जाता है । का भी ान ूा ू कर कर. डॉ. यह सेवा करने का अवसर मुझे दे कर ौीवासुदेव-ूबोिधनी के महासचीव ूा. दे व तथा अ य पदािधका रय और ौीद पदािौत महानुभाव का िन पचा रक ःनेह. ौीनारायणकाका ढे कणे महाराज.पू.पू.पू. इस ौीरं गवािटका म.प. ौी. गुळवणी महाराज के चरणकमल म ूाथना है । ौीगु दे व द । 11 .ौी. शहापूरकरजी ने मेरा बहमान िकया है । उस के िलए म उन का अ यंत कृ त ु हँू । मेर यो यता के अभाव म भी उ ह ने केवल आ मीयता से मुझ पर यह अनुमह िकया है । उन का तथा ूबोिधनी के अ य उपा य पू. प.धारणा.पू. ौी. ौीरं ग अवधूत महाराज क इस तपोभूिम म. यान और समािध सूऽ प से बताए। अब अंत म पहले दो अंग का िनदश माऽ कर के यह अ ांगयोग का रहःय पूरा करते ह। यम और िनयम यमेन दशधा नूनं दशधा िनयमेन च। आसना ेन ष केन योगोS ांगोSयमु यते।।41।। यम और िनयम यहाँ दशधा बताते ह। अिहं सा स यमःतेयं ॄ चय मा धृितः। दयाजवं िमताहारः शौचं चैव यमा दश।। तपः संतोष आ ःत यं दानमी रपूजनम।् िस ांतवा यौवणम ् ॑ मती च तपो हतम। ् ु िनयमा दश संूो ा योगशा िवशारदै ः।। पातंजल सूऽ म यम और िनयम पांच पांच ह िगनाए ह। उन म बढौती कर के हठयोग म दस यम और दस िनयम का िवधान है । यम दोष से बचने को कहते ह। िहं सा न कर.