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गायती महामं त और उसका अथर :
ॐ भूभर व
ु ः सवः ततसिवतुवररणे यं भगो देवसय धीमिह

िधयो यो नः पचोदयात्।

उस पाणसवरप, दःु खनाशक, सुखसवरप, शेष, तेजसवी, पापनाशक, देवसवरप परमातमा को हम अपनी
अंतःकरण मे धारण करे. वह परमातमा हमारी बुिद को सनमागर मे पेिरत करे. -ऋगवेद ३/६२/१०, सामवेद १४६२,
यजुवेद ३/३५, २२/९, ३०/२, ३६/३.

Gayatri Mantra and its meaning:
Om bhurbhuvaha swaha

tatsaviturvarenyam

bhargo devasya dhimahi

dhiyo yo naha prachodayat.
We embrace that supreme being, the effulgent divine sun, the ultimate life force, omnipresent
and omnipotent, the destroyer of all sins and sufferings and the bestower of bliss. May he inspire and
enlighten our intellect to follow righteous path. -Rigveda 3/62/10, Samveda 1462, Yajurveda 3/35,
22/9, 30/2, 36/3.

पजावतार की िवसतार पिकया - (कािनतधमी सािहतय पुस तकमाला - 09)
सार-सं के प
अितवादी अवांछनीयता, जो आज छाई िदखाई देती है और कुछ नही, अिधकांश लोगो दारा अिचंतय िचनतन
और न करने योगय िकयाकृतय अपना िलए जाने का ही पितफल है। यिद यह बहु मत उलट जाए तो िफर पिरिसथितयाँ
बदलने मे कणमात की भी देर नही होगी। ‘युगसिनध महापुरशचरण’ ऐसे ही महापयोजन के िलए अवतिरत हु ई एक
दैवी योजना है, िजसे सन् २००० तक समपन िकया जाना है। पजावतार की मतसयावतार की तरह बढती यह पिकया
एक ही संकलप व लकय िलए हु ए है-युगपिरवतर न के िलए उपयुक वातावरण एवं पिरवतर न पसतुत करना। दो करोड
पितभाओं को यजमान के रप मे शािमल कर एक अभूतपूवर महापूणारहुित समपन हो, यह लकय रखा गया है।
पजा पिरवार जो ‘अखणड जयोित’ पितका के माधयम से जुडकर इतना िवराट् बना है, इककीसवी सदी के
उतकृष आदशर वादी मोचे पर जुझार सतर पर लडने वाले पचणड योदाओं का पिरवार है। सभी के िलए यह महाकाल
की चेतावनी है िक अब यह समय चूकने का है नही । ऐसे समय िवशेष पर भगवान् सवयं भको व समिपर त िशषयो के
पास जाकर युगधमर मे पवृत होने की अपनी इचछा वयक करते है। हर जागत, जीवनत और पाणवान् को उस
महाअिभयान से जुडकर इस पुणयवेला का लाभ उठाना चािहए।

अनुक मिणका
1. यु ग सं ि ध-महान पिरवतर न की बे ल ा
2. पयोजन के अनुर प दाियतव भी भारी
3. कु छ अितिरक पूछ -ताछ
4. दै व ी सहायता भी अपे ि कत
5. भगवान के िवशे ष अनुग ह और अनुद ान की उपलिबध
6. पातता की तातकािलक आवशयकता
7. यह समय चूक ने का है नही
8. उठाने वाले के साथ जुडे

यु ग सं ि ध-महान् पिरवतर न की वे ल ा

धरती मे दबे और ऊपर िबखरे बीज वषार के आरमभ होते ही अंकुर फोडने लगते है। अंकुर पौधे बनते और
पौधे बढकर पिरपकव वृक का रप धारण कर लेते है। वृक भी चैन से नही बैठते , बसनत आते ही वे फूलो से लद जाते
है। फूल भी िसथर कहाँ रहते है वे फल बनते है, अनेको की कुधा बुझाते और उनमे से नए बीजो की उतपित होती है।
उनहे बाद मे अंकुिरत होने का अवसर िमले तो एक ही पेड की पिरणित कुछ ही समय मे इतनी अिधक िवसतृत हो
जाती है, िजनसे एक उदान बनकर खडा हो जाए।
मतसयावतार की कथा भी ऐसी ही आशचयर मयी है। बहा जी के कमणडल मे दशयमान होने वाला छोटा कीडा
मतसयावतार के रप मे िवकिसत हु आ और समूचे भूमणडल को अपने िवसतार मे लपेट िलया। इनही कथाओं का एक
नया पतयावतर न इनही िदनो होने जा रहा है। संभव है, २१वी सदी का िवशालकाय आं दोलन एक छोटे से शािनतकुञ
आशम से पकटे और ऐसा चमतकार उतपन करे िक उसके आँ चल मे भारत ही नही, समूचे िवशव को आशय िमले।
दिु नया नया रप धारण करे और िवकृत िवचार पिरषकृत होकर दरू दशी िववेकशीलता के रप मे अपना सुिवसतृत
पिरचय देने लगे।

यह बहु मत का युग है-संघशिक का। िमल-जुलकर पकी एक साथ जोर लगाते है तो मजबूत जाल को एक ही
झटके मे उखाड लेने और उडा ले जाने मे सफल हो जाते है। ईटं े िमलकर भवय भवन खडा कर देती है। बूँद-बूँद से
घडा भरता है। ितनके िमलकर हाथी बाँधने वाला रससा बनाते है। धूिलकण अनधड बनकर आकाश पर छाते देखे गए
है। रीछ-वानरो और गवाल-बालो के संयक
ु पुरषाथर की कथा-गाथा युग-युगो से कही-सुनी जाती रही है। इन िदनो भी
यही होने जा रहा है।
इन िदनो वैयिकक और सामूिहक जीवन मे छाई हु ई अितवादी अवांछनीयता और कुछ नही, अिधकांश लोगो
दारा अिचंतय-िचनतन और अकरणीय िकयाकृतय अपना िलए जाने का ही पितफल है। यिद यह बहु मत उलट जाए तो
िफर पिरिसथितयो के बदल जाने मे देर न लगे। पुरातन सतयुग की वापसी के दशय पुन : मूितर मान होकर सामने आ
खडे हो। यही होने भी जा रहा है। पाचीनकाल मे ऋिषकलप वयिकयो का बाहु लय था। हर िकसी की ललक समाज से
कम से कम लेने और अिधक से अिधक देने की रहा करती थी। वह बचत ही परमाथर -पयोजनो मे लगकर ऐसा
माहौल बना िदया करती थी, िजसका समरण अभी भी लोग सतयुगी परमपरा के रप मे िकया करते है , वह समय िफर
वापस लौट आने की कामना िकया करते है। दैतय कोई आकार-िवशेष नही होता, वे भी मनुषयो की ही शकल-सूरत के
होते है, अनतर केवल इतना ही होता है िक दैतय दस
ू रो से, संसार से लूटते-खसोटते अिधक है और अपने समय, शम,
िचनतन तथा वैभव का नयूनतम भाग सतकमो ं मे लगाते है। यही है वह अनतर, िजसके कारण देवता पूजे जाते और
दैतय सवर त भतसर ना के भाजन बनते है।
पसतुत पिरवतर न इसी रप मे अवतिरत होने वाला है िक दैतय-वगर अपनी हठवािदता से पीछे हटेगे और देवतव
की सतपवृितयो को अपनाने के िलए उनमुख होगे। यह हलचल असंखयो के अनतराल मे अनायास ही उठे गी। उस
चमतकार को हम सब इनही आँ खो से देखेगे। दिषकोण मे सुधार-पिरवतर न होते ही पिरिसथितयाँ बदलेगी, वातावरण
बदलेगा और पचलन मे ऐसा हेर-फेर होगा, िजसे युगपिरवतर न के नाम से समझा, देखा और परखा जा सके।
इस पयोजन के िलए एक सुिनयोिजत योजना दैवी चेतना के संकेतो पर इनही िदनो अवतिरत हु ई है। इस
साधना और पयास-पिकया का नाम ‘युगसिनध महापुरशचरण’ िदया गया है। उसका िवसतार भी आशचयर जनक गित
से हो रहा है। अमरकणटक से नमर दा की धारा के पसफुटन की तरह शािनतकुञ, हिरदार से युगसिनध-संकलप उभरा
है। िनजी पयोजनो के िलए तो पूजा-पाठ के, पचार-पसार के अनेक आयोजन आए िदन होते रहते है, पर इस साधना
का संकलप एवं लकय एक ही है-युगपिरवतर न के िलए उपयुक वातावरण एवं पिरवतर न पसतुत करना। िजनकी इस
महान् पयोजन मे तिनक भी रिच है, वे इस आतमीय आमनतण का पिरचय पाप करते ही दौडे चले आ रहे है और इस
महाकािनत के पवाह मे उतसुकतापूवरक सिममिलत हो रहे है।
पुरशचरण की तप-साधना का पारिमभक रप एक लाख दीपयजो की साकी मे एक करोड पितभाओं को
यजमान रप मे सिममिलत करने का था; पर अब लोगो की शदा, सदावना और आतुरता को देखते हु ए उसे ठीक
दन
ू ा कर िदया गया है, तािक कम समय मे अिधकािधक पितफल की उपलिबध हो सके। इसी उदेशय से संकलप
जोशीला हो गया है। पारिमभक िनशचय था िक महापुरशचरण की पूणारहुित सन् २००० मे बीसवी सदी का अनत होतेहोते होगी। अब लकय दन
ू ा हो जाने से संकलप को दो िहससो मे बाँट िदया गया है। अब ५-५ वषर मे एक-एक करोड
करके सन् २००० तक पूरी पूणारहुित मे दो करोड भागीदार बनाने का लकय है। दीप यजायोजन भी एक लाख के
सथान पर दो लाख हो जाएँ गे।
आरमभ मे सोचा गया था िक यह आयोजन हिरदार या पयाग के कुमभपवर के सथान पर समपन िकया जाए
और एक ही सथान पर सभी भागीदार एकितत हो और उस समारोह को अभूतपूवर समारोह के रप मे पसतुत करे। पर
अब अिधक केतो की जनता को अपने-अपने समीपवती केनदो मे एकत होने की सुिवधा रहेगी और दो सथानो की
अपेका लाखो सथानो पर एकितत होने का अवसर िमलेगा। सिममिलत होने वालो को दरू जाने -आने का िकराया-भाडा
भी खचर न करना पडेगा और समीपवती सथान मे ठहरने की, भोजन आिद की वयवसथा भी बन पडेगी। इस
महापयास की जानकारी अिधक वयापक केत मे सुिवधापूवरक पहु ँच सकेगी, जो इस पुरशचरण का मूलभूत उदेशय है।
समरण रहे यह संकलप महाकाल का है, केवल जानकारी पहु ँचाने और आवशयक वयवसथा जुटाने का काम
शािनतकुञ के संचालको ने अपने कनधो पर धारण िकया है। मौिलक शेय तो उसी महाशिक का है , िजसने मनुषय
जैसे पाणी की सीिमत शिक से िकसी भी पकार न बन पडने वाले कायो ं को करने की पेरणा दी है और काम मे जुट
जाने के िलए आगे धकेल कर बािधत िकया है। वही इस पयोजन को पूणर भी करेगी, कयोिक युगपिरवतर न का िनयोजन
भी उसी का है।

शािनतकुञ के संचालक पाय: अससी वषर के होने जा रहे है। उनका शरीर भी मनुषय-जीवन की मयारदा के
अनुरप अपने अिनतम चरण मे है, िफर िनयंता ने उनके िजममे एक और भी बडा तथा महतवपूणर कायर पहले से ही
सुपुदर कर िदया है, जो िक सथूल शरीर से नही, सूकम शरीर से ही बन पडेगा। वतर मान शरीर को छोडना और नए
सूकम शरीर मे पवेश करके पचणड शिक का पिरचय देना ऐसा कायर है, जो सशक आतमा के दारा ही बन पड सकता
है। इतने पर भी िकसी को यह आशंका नही करनी चािहए िक िनधारिरत ‘युगसिनध महापुरशचरण’ मे कोई बाधा
पडेगी। महाकाल ने ही यह संकलप िलया है और वही इसे समग रप मे पूरा कराएगा, िफर उजवल भिवषय के िनमारण
हेतु अगले दस वषो ं तक शािनतकुञ के वतर मान संचालक भी आवशयक वयवसथा बनाने और तारतमय िबठाते रहने के
िलए भी तो वचनबद है।
पयोजन के अनुर प दाियतव भी भारी
‘अखणड जयोित’ िहनदी मािसक तथा अनय भाषाओं मे उसके संसकरणो के सथाई सदसयो की संखया पाय:
पाँच लाख है। ‘अखणड जयोित’ के पाठको के साथ िवगत पचास वषो ं से समपकर, िवचार-िविनमय और परामशर का
कम चलता रहा है। इनमे से अिधकांश ऐसे है, जो कई-कई बार याताएँ करके यहाँ आते और घिनषता समपादन करते
रहे है। इस आधार पर इनहे पिरवार के सदसय और पिरजन माना जाता रहा है। िशकक भी अिभभावको की गणना मे
आते है। गोत वंश-परमपरा से भी िमलते है और अधयापक-परमपरा से भी। इतना बडा पिरवार अनायास ही कैसे जुट
गया? समभवत: पूवर जनमो के संिचत िकनही संसकारो ने यह िमलन-संयोग सतर का सुयोग बना िदया हो।
महतवपूणर पसंगो पर सवजन-समबनधी ही याद िकए जाते है। उनहे ही हँसी-खुशी एवं द ु:ख ददर के पसंगो मे
याद िकया जाता है। सहभागी भी पाय: वे रहते है। बाहर के लोग तो कौतुक-कौतूहल भर देखने के िलए इकटे हो
जाते है। इसिलए उनसे कोई बडी आशा- अपेका भी नही की जाती। महाभारत मे कृषण का पयोजन पूरा करने के
िलए पाँच पाणडव ही आगे रहे। पंच पयारे िसख धमर मे भी पिसद है। महाकाल के सौपे हु ए नवसृजन का दाियतव भी
भारी है और उसमे भाग लेने वालो को शेय भी असाधारण िमलने वाला है। इसिलए हर िकसी से बडी आशा भी नही
की जा सकती। पाँच मे से एक उभर आए, तो बहु त है। पाँच लाख की िसथित देखते हु ए यिद एक लाख कदम से
कदम िमलाकर चल सके, तो बहु त है। इतनो के सहारे सौपा हु आ दाियतव भी िनभ जाएगा।
मनुषय शरीर पाँच ततवो का बना है। अनय शरीरधािरयो की तरह उसकी भी संरचना है , इसिलए अनय
पािणयो की तरह शारीिरक दिष से उसमे भी सीिमत सामथयर ही पाई जाती है। उचचसतरीय मनोबल तो केवल मनुषय
को ही पाप है, िजसके बल पर गाँधी जैसा ५ फीट २ इंच और ९६ पौड वजन का वयिक भी संसार को िहला देने
वाले काम कर सकता है। बुद, परशुराम जैसो मे ऐसे ही लोगो की गणना होती है।
मनोबल कुछ तो शरीर मे भी होता है, िजसके आधार पर वह थोडी िहममत िदखाता और िकसी सीमा तक
साहस का पिरचय देता है। असाधारण मनोबल जो पवाह को उलट सके और वातावरण को उलट कर िकसी नए
ढाँचे मे बदल सके, इतना अनुदान दैवी चेतना के िवशेष अनुगह से ही पाप होता है। उस पकार की उपलिबध न होने
पर मात काियक पुरषाथर कुछ थोडा-बहु त ही कर या चल पाता है। कंकड-पतथर जहाँ-तहाँ पडे रहते है; पर सोनाचाँदी जैसी बहु मूलय वसतुओं को कीमती ितजोिरयो मे संिचत कर रखा जाता है। शरीरगत सवलप पिरशम या पुरषाथर
तो िकसी सीमा तक हर िकसी को पाप होता है; पर उसके सहारे बन पाय: इतना ही पडता है िक शारीिरक
आवशयकताएँ या िकयाएँ पूरी हो सके। कान, संगीत से लेकर चापलूसी भरी पशंसा सुनने भर के िलए लालाियत
रहता है। आँ खो को सुनदर-सुहावने दशयो मे रची होती है। जीभ को नए-नए सवाद चािहए। जननेिनदय का पवाह भी
पाय: अधोगामी होता है। मन को गयारहवी इिनदय माना गया है, उसे संगह की तृषणा और बडपपन की पशंसा चािहए।
इतनी ही पिरिध के पुरषाथर पाय: शरीर कर पाता है, पर िजसमे आतमबल की आवशयकता पडती है, वह दैवी वरदान
की तरह पाप होता है। उसके िलए िछटपुट कमर काणड या िचह-पूजा जैसे उपहार-मनुहार पसतुत करने से भी काम
नही चलता, उसके िलए आवशयक पातता चािहए।
िकसी बरतन मे िकतना पानी भरा जा सकता है, यह उसकी गहराई और चौडाई से िविदत होता है। शरीर
का बाहरी कलेवर तो इिनदयजनय आवशयकता तक के काम आकर समाप हो जाता है , िकनतु िजसे तेजसवी पितभा
कहा जाता है, वह तो मनोबल या आतमबल से संगह होती है। उसे पाप करने के िलए ऐसे आदशर वादी पुरषाथर करने
पडते है, जो शारीिरक सुिवधा तक सीिमत न हो वरन् पुणयपरमाथर जैसे अभयासो मे अपना पयोजन िसद कर सके।
यही अनतराल की वह गहराई है, िजसे माप कर दैवी अनुगह बरसते है और ओजसवी, तेजसवी व मनसवी सतर की
उचच उपलिबधयाँ हसतगत की जाती है।

रहने का छोटा-सा घर बनाने के िलए िकतना समय, शम और पैसा लगता है, इसे सभी जानते है, िफर िवशव
का नविनमारण करने के िलए िकतना मनोबल, िकतना शम, िकतने साधन चािहए, उसका अनुमान लगाना िकसी के
िलए भी किठन नही होना चािहए। इतना वचर सव िकसी मनुषय-तनधारी मे नही हो सकता। इसके िलए ईशवरीय
आतमबल एवं सुसंसकािरत दारा संिचत मनोबल की बहु त बडी माता चािहए और उसे पाप कर सकना िकसी के िलए
भी किठन नही होना चािहए। आवशयकता एक ही बात की है और वह है-आदशो ं का पिरपालन िनषापूवरक िकया
जाए। आिसतकता, आधयाितमकता और धािमर कता के पित गहरी आसथा हो, अपना मूलय और महतव समझा जाए
और जो कमता जनमजात रप से उपलबध है, उसका समुिचत उपयोग िकया जाए।
मनुषय के पूवरसंिचत संसकारो का संगह तथा उसके फिलत होने का अवसर मोटे तौर से हसतरेखाओं का
सूकम िनरीकण करके जाना जा सकता है। अँगूठे की छाप वयिक की हसतरेखाओं की तरह ही िभन होती है। िजसकी
इनहे समुिचत जानकारी है, वे मनुषय की भावी समभावनाओं, उनकी रोकथाम तथा बढोतरी करने के समबनध मे भी
बहु त कुछ जान सकते है। अिनषो को रोकने तथा अशुभ समभावनाओं की रोकथाम करने के समबनध मे कया उपाय
िकया जाए, इस सनदभर मे भी अनुमान लगाने तथा उपाय खोजने मे समथर हो सकते है।
फोटोगाफी से मात आकृित समबनधी जानकारी ही नही िमलती वरन् उससे गुण, कमर , सवभाव के समबनध मे
भी बहु त कुछ जाना समझा जा सकता है। ये जानकािरयाँ मात वसतुिसथित को ही नही बताती वरन् भावी
समभावनाओं एवं बीते हु ए घटनाकमो का भी आभास देती है। साधारणतः तो यह अंकन िभनतासूचक िचत-िविचत
जानकािरयाँ ही दे पाते है, पर िजनहे इनके सूकम दशर न का जान है, वे यह पता भी लगा लेते है िक अगले िदनो कया
कुछ शुभ-अशुभ घटनाकम घिटत होने जा रहा है। इस आधार पर किठनाइयो का िनवारण-िनराकरण ही नही, सुखद
समभावनाओं के अिधक अचछी तरह फिलत होने के समबनध मे भी मागर दशर न िकए जा सकते है। कोई भी घटनाकम
अिनवायर या अकाट नही है। उन सभी के उपाय-उपचार है।
कई रोग असाधय या कषसाधय समझे जाते है, पर ऐसा नही है िक उनका उपाय-उपचार हो ही न सकता
हो? मनुषय को अपने भागय का िवधाता इसी दिष से कहा गया है िक वह जहाँ भिवतवयता से पेिरत रहता है , वहाँ
उसमे उस कमता के बीज भी मौजूद है िक िनवारण-िनराकरण के उपाय खोज सके, भिवतवयता को टाल सके और
पितकूलता को अनुकूलता मे बदल सके। यिद बदलाव समभव न हो तो मनुषय भागयचक की कठपुतली मात बनकर
ही रह जाएगा।
कु छ अितिरक पूछ -ताछ
इककीसवी सदी की अविध अनेकानेक चुनौितयो से भरी है। नदी का बहाव और हवा का रख बदल देना
सहज नही होता। उस किठनाई से भी मनुषय ही पार पाता है; पर इतना िनिशचत है िक उसकी पितभा असाधारण
होनी चािहए, साधारण योगयता के रहते तो वैसा कर गुजरना दसु साहस ही माना जाएगा और जोिखम भरा भी।
‘अखणड जयोित’ पिरजनो की इतनी बडी भीड आकिसमक रप से ही इकटी नही हो गई है। अमुक रिच का पठनपाठन करने का कौतूहल ही इनही समवेत होने या एक सूत मे बँधने का कारण नही है वरन् इसके पीछे कुछ रहसयमय
कारण भी काम कर रहे है। गोताखोर गहरे पानी मे डु बकी लगाकर मोितयो का संगह करता है। मिण-मुकक पाए तो
खदानो मे ही जाते है, पर उनहे कोई कही से भी झट से खुदाई कर एकितत नही कर सकता । दल
ु र भ जडी-बूिटयाँ
बडी खोज के बाद, िकनही िवशेष केतो मे ही पाई जाती है।
िनकट भिवषय मे िकतनो को ही िकतनी ही बडी भूिमका िनभा सकने की कमता से समपन बनाया जाना है।
हर काम हर आदमी नही करता है। भारी वजन हाथी जैसे समथर पाणी ही उठा सकने मे सफल होते है। छोटे कद के
पाणी उसे उठा सकना तो दरू , दबाव की अिधकता से अपना ही कचूमर िनकाल बैठेगे। हर मनुषय हर कमता से
समपन नही है। रामायण मे हनुमान की और महाभारत मे अजुरन की जो भूिमका रही, उसे उन िदनो उपिसथत जनो मे
से अनय आसानी से पूरा नही कर सकते थे। मनुषय की समथर ता मे सनदेह नही; पर िबना संिचत सुसंसकािरता,
पितभा और तप-समपदा के हर कोई चाहे जो कर गुजरे, ऐसा भी नही है। यही कारण है िक हर पयोजन के िलए
पातता तलाशी जाती है और जो काम िजसके करने योगय है, उसी को सौपा जाता है। सेनापित के पद पर हर िकसी
की िनयुिक नही की जा सकती, उसकी बिलषता, िहममत, कौशल एवं पितभा आिद गुणो को भी परखा जाता है।
अगले िदनो अनेकानेक ऐसे केत सामने खडे होगे, िजनमे िवशेष पुरषाथर िदखाने की आवशयकता पडेगी; उनहे
साधारण लोग न कर सकेगे। इस साधारण और असाधारण के चयन का अभी से धयान रखना होगा। एकाकी बडे
िनणर य नही िकए जा सकते है। पितभाओं की परख पितसपधारओं की कसौटी पर होती रहती है और जो अनेक बार

अपनी विरषता का पिरचय दे चुके होते है, उनहे ही दर
ु ह मोचार समभालने के िलए िनयुक िकया जाता है। शेष हलके
दजे के मोचे पर हलके लोगो को लगाकर िकसी पकार काम चलाया जाता है। अगले िदन, ऐसी ही अनेक कसौिटयाँ
और चुनौितयाँ साथ लेकर आ रहे है।
इस सनदभर मे अखणड जयोित पिरजनो की जाँच-पडताल अभी से आरमभ की जा रही है। यो उस पिरकर
को सामानय लोगो की तुलना मे असामानय समझते हु ए ही एकितत िकया गया है। इन िदनो उथले सािहतय मे , उथले
सतर के, उथली अिभरिच के लोगो का आकषर ण है। उनहे उतकृषता का महतव समझने मे उतसाह ही नही उभरता,
कहने-समझाने पर भी यह तथय गले नही उतरता। यही कारण है िक उचचसतरीय िववेकशीलता का पितपादन करने
वाला सािहतय पाय: नही के बराबर ही िबकता-खरीदा जाता है। लोग उसे आगहपूवरक देने पर भी मुफत पढने तक को
तैयार नही होते। िजसमे रिच न हो, उसके िलए समय कौन लगाए? माथा-पचची कौन करे? यही कारण है िक अखणड
जयोित वाले िवषय की अनय पितकाएँ कुछ िदन िनकलने के बाद ही बनद हो जाती है। जो िनकलती है, उसकी सदसय
संखया कुछ सौ तक ही सीिमत रहती है, सो भी िवजापन छापने की नीित अपनाने के बाद ही िकसी पकार उसकी
नाव पर लगती है, पर अखणड जयोित के बारे मे बात ही दस
ू री है। गिरष िवषय का पितपादन रहने पर भी उसके
पाठक इतनी बडी संखया मे है िक उसकी तुलना ततसम पितकाओं मे से िकसी के साथ भी कदािचत ही की जा सके।
यह चमतकार अनायास ही नही हु आ है। िकसी आकषर ण -शिक ने अपने चुमबकतव के सहारे उनहे ढू ँ ढा खोजा
और पयतनपूवरक एकितत िकया है। इसका कारण सामियक घटनाकमो मे ही नही खोजा जाना चािहए। संिचत
सुसंसकािरता और िवलकणता उनहेेे अपने आकषर ण केनद के साथ जोडती रही है। सशक चुमबक के इदर -िगदर लौहकण आकिषर त हो, िखंचे चले आते है और उस सथान पर एकितत-एक जुट हो जाते है। ऐसा ही कुछ अखणड जयोित
पाठको के समबनध मे भी हु आ है।
इस पसंग को लेखन, पकाशन, वाचन के सािहितयक केत भर तक सीिमत नही करना चािहए। यह िकसी बडे
मोचे पर जूझने वाले बिलष योदाओं का पिरकर है, जो अनेक परीकाओं मे उतीणर होते-होते इस शिकशाली
अकौिहणी मे एकितत हु आ है।
इसे सािहतय की गहराई मे उतरकर समझना हो, तो इसी िनषकषर पर पहु ँचना पडेगा िक कुछ िवशेष कमता
समपन मधुमिकखयाँ ही इस छते मे रानी मकखी के अनुशासन मे रहने के िलए िखंचती चली आई है और इस पकार
सघनतापूवरक गुँथ गई है, मानो कई जनम-जनमानतरो से एक सूत मे बँधी आ रही हो, जैसे-सनेह-सूत मे बँधे हु ए
आतमीय जन होते है। इसका िनरनतर परीकण भी होता रहा है। पिरजनो को उनकी शिक-सामथयर देखते हु ए समयसमय पर ऐसे आदशर वादी काम सौपे जाते रहे है , िजसमे औसत आदमी की रिच पाय: नही ही होती। उनहे भी इतनी
ततपरता और तनमयता के साथ करते रहना इस तथय का पिरचायक है िक यह रासता चलती भीड नही है , वरन् यह
िकसी िवशेष उदेशय के िलए िविशष पिरजनो का समुचचय है।
सपष है िक इककीसवी सदी के उतकृष आदशर वादी मोचे पर जुझार सतर पर लडने वाले पचणड योदाओं का
यह पिरवार है। उसकी टर ेिनंग लमबे समय से होती रही है। पितका पाय: ५२ साल से िनकलती रही है, इनके पाठको
मे अिधकांश ऐसे है, जो आरमभ से लेकर अब तक िमशन के साथ घिनषतापूवरक जुडे हु ए है और एकरस पिशकण
एकागतापूवरक पाप करते रहे है। उतकृेृष आदशर वािदता की िवचारधारा जनम-घूँटी की तरह पीते रहने के कारण
उनकी नस-नस मे रम गई है।
यो अखणड जयोित का सथाई सदसय होना भी इस बात का पतयक पमाण है िक इककीसवी सदी के साथ
जुडे हु ए उजवल भिवषय के साथ उनका अपना िवषय भी कही न कही घिनषतापूवरक जुडा हु आ है। उनहे कुछ ऐसा
करना और बनना है, िजनहे जनसामानय को अनुकरणीय और अिभननदनीय कहना पडे।
असतु, पिरजनो के पतो के साथ तीन और िदवय आधार संकिलत िकए जा रहे है - (१) जनम ितिथ, सथान
तथा समय, (२) वतर मान समय का फोटो, (२) वतर मान समय का फोटो, (३) हसतरेखाओं का अंकन। यह तीन आधार
िकसी को भिवषय-फल बताने के िलए संगह नही िकए जा रहे है। इनका उदेशय मात इतनी ही है िक इस आधार पर
पिरजनो की िविशषता आँ की जा सके और उनहे जब जो करना है, उसके िलए संकेत एवं मागर दशर न िकया जा सके।
इसके साथ ही िवशेष पयोजनो मे अपना िनजी िवशेष योगदान देना भी है , िजससे किठनाइयो को सरल और
सुसमभावनाओं को अिधक उतसाहपूवरक अगगामी बनाया जा सकना समभव हो सके।
दै व ी सहायता भी अपे ि कत

मनुषय के अपने पुरषाथर , जान, सूझ-बूझ आिद का महतव है। पाय: उसी के आधार पर लोग ऊँचे उठते या
कमी रहने पर नीचे िगरते है; पर कभी-कभी ऐसा भी होता है िक िकनही दस
ू रे समथो ं की सहायता से भी रकी हु ई
गाडी चलने लगती है और किठनाइयो का दबाव हलका हो जाता है। िजनका वयापार-वयवसाय पूँजी की कमी के
कारण रक गया है, उनहे यिद बैक आिद की तातकािलक सहायता िमल जाए, तो रका काम चलने लगता है और
िलया हु आ ऋण बयाज समेत चुक जाता है।
िमत, सहायक, समबनधी भी कभी-कभी ऐसी सहायता कर देते है, िजसकी पहले से कोई समभावना या आशा
न थी। दैवी अनुगह का तो कहना ही कया? कभी वयापार-धनधे के सहारे अकसमात िकसी बडे लाभ का सुयोग िमल
जाने मे, लाटरी खुल जाने आिद के रप मे भी ऐसे लाभ हसतगत हो जाते है , िजनकी पहले से ऐसी कोई आशा न
थी। जब वरदान फलता है, तो उसका लाभ िवदा, पौरष आिद से भी बढकर िमल जाता है। उतरािधकार मे एवं
दान-दिकणा के रप मे िमली हु ई उपलिबधयो को भी दैवी सहायता के रप मे ही िगना जाता है।
पुरषाथर हो या दैवी अनुगह, उनका िमलना-सुरिकत रहना और िकसी दर
ु पयोग से नष हो जाना जैसी
पिरिसथितयाँ भी कई बार मनुषयो के सामने आती रहती है। यही बात किठनाइयो, आपितयाँ
बचाव होने के समबनध मे भी है। कई बार तो पयास, पिरशम भी इसमे अपनी भूिमका िनभाते है। कई बार ऐसा भी
होता है िक िबना पयास के या सवलप पयतन से भी बडे लाभ हसतगत हो जाते है। समय िवपरीत हो, तो सारी चाले
उलटी पड जाती है और भरपूर मेहनत तथा अपनाई गई सूझ-बूझ भी काम नही देती। कई बार तो की गई आशा से
िवपरीत फल सामने आ खडा होता है। िकसान का वयवसाय एक बीज के बदले सौ दाने उतपन करने जैसा
लाभदायक है; पर उसमे भी कई बार अितवृिष, अनावृिष, ओला, पाला, कडी ठणड आिद ऐसे संकट बीच मे ही आ
जाते है िक जो समभावना गिणत के आधार पर आँ की गई थी, वह सीधी से उलटी पड जाती है। कई बार इससे ठीक
उलटा भी होता है। दाँव सीधा पड जाने पर ऐसी सफलता भी िमल जाती है, िजसके समबनध मे न तो कोई आशा थी,
न समभावना। यदिप ऐसा अपवाद सवरप जब-तब ही होता है; पर यिद कभी ऐसा बन पडे, तो उसे असंभव नही कहा
जा सकता है।
अपवाद भले ही कम होते हो; पर अवशय होते है। ऐसे अपवादो को दैवी कृपा या अनुगह के नाम से जाना
जाता है। अपतयािशत पिरणामो को भागय या समय का फेर भी कहते है। िकसी बालक का धनवान् वगर मे जनम लेना
और अनायास ही िवपुल धन का सवामी बन जाना, िकसी िसदानत िवशेष पर आधािरत नही है; इसे भागयोदय ही कह
सकते हैेै। संसार मे ऐसे भी अनेक मनुषय हु ए है, िजनके आरमभ मे िशका की, समपदा की, पिरिसथितयो की सवर था
पितकूलता थी; पर एक के बाद एक ऐसे सुयोग िमलते और बनते गए िक वह असाधारण कायो ं और पयासो मे एक के
बाद एक बडी सफलताएँ पाते गए और अनतत: मूधरनय सौभागयवानो मे िगने गए।
दघ
ु र टनाओं, िवपितयो, हािनयो, पितकूलताओं के भी कभी-कभी ऐसे कुयोग आ धमकते है, िजनमे कोई दोष
पतयकत: दीखता नही, िफर भी न जाने कहाँ से और कयो ऐसे संकट आ खडे होते है िक सब कुछ चौपट हो जाता है।
बनने जा रहे काम िबगड जाते है। ऐसे घटनाकमो को दभ
ु ारगय, दैवी पकोप, भागय, पूवर संसकार, भिवतवयता आिद
कहकर मन को समझाया जाता है। वसतुत: इस संसार मे अनायास नाम की कोई चीज नही है। सृिष के िनयमो की
अकाटता पिसद है। िफर भी अपवाद जैसे आकिसमक बहु त कुछ होते रहते है। इसके पीछे भी कुछ कारण होते है ,
भले हम जानते न हो। जानने को तो हम बहु त-सी बाते नही जानते, िफर भी वे अनायास ही हो गई ं-ऐसा नही कहा
जाता। िकसका असली िपता कौन है? इसकी सही जानकारी अपने आप तक को नही होती; पर इस समबनध मे माता
के कथन को ही पामािणक मान िलया जाता है। दस
ू रा कोई चारा भी तो नही।
आकिसमक लाभ और आकिसमक हािन के पीछे अकसर भागय का फेर कहा जाता है; पर इसके पीछे भी कुछ
िनयम िनधाररण काम करते है। पूवर जनमो के संगिहत संसकार समयानुसार फिलत होते है। इसका समुिचत िवधान
जान न पाने के कारण उसे भागय कह देते है। एक दस
ू रा िवधान संसार मे ऐसा भी है, िजसे उदार अनुदान कहते है।
आकिसमक सहायताएँ भी इसी शेणी मे आती है। िजनके पास फालतू पैसा होता है , वे उसे बैक मे जमा कर देते है।
िनयत अविध के उपरानत वह बयाज समेत वापस िमल जाता है, यदिप जमा करने और िनकालने के समय मे लमबी
अविध का अनतर होता है; पर वह है िकसी िनयम-वयवसथा पर ही आधािरत।
संसार मे ऐसी आतमाएँ भी है, िजनके पास पुणयफल का पचुर भणडार भरा पडा है। धन को घर मे रखना
जोिखम भरा समझा जाता है, इसिलए सुरका और िनिशचंतता की दिष से उसे बैक मे जमा कर िदया जाता है। पुणय-

परमाथर मे ऐसी ही िवदा है, िजसे उदारचेता समय पर जररतमनदो को देते रहते है। इसमे दहु रा लाभ है-एक तो
िजसका काम रक गया था, उसका काम चल जाता है, दस
ू रा िजसने जमा िकया था, उसे आवशयकतानुसार वापस
िमल जाता है। पुणय-परमाथर का, दान-अनुदान का यह कम भी उसी आधार पर चलता है, िजसके आधार पर बैको
का, बीमा का, शेयरो का कारोबार चलता रहता है। अनुदान के चक भी इसी आधार पर चलते है।
इककीसवी सदी मे दहु रे कारोबार बडे रप मे चलेगे। एक यह िक जो अवांछनीयताएँ इन िदनो बुरी तरह छाई
है, उनहे उलट देना, तािक छाए हु ए संकटो को िनरसत िकया जा सके । दस
ू रा यह िक नव-िनमारण की दिष से बहु त
कुछ िकया जाना है। कितपूितर के िलए िवशालकाय कारोबार खडे िकए जाने है। इसके िलए भी पूँजी एवं साधनसामगी चािहए। यह सृजन-कायर िकनही वयिकयो के माधयम से ही होगा। संकटो से जूझने के िलए सशक योदा ही
लडाई की अिगम पंिक मे खडे होगे दोनो ही उदेशय इनही वयिकयो के िकया-कलापो के माधयम से ही समपन होगे।
आवशयक नही िक यह सारे कायर उसी के हो, िजसे िक शेय िमला हो। मोचे पर लडते तो सैिनक ही है, पर उनहे जो
वाहन, हिथयार, रसद, आहार िमला है, वह उस सैिनक के सवयं के नही, वरन् संचालक सूत से ही उपलबध होते है।
अगले िदनो भयंकर िवभीिषकाओं को िनरसत होकर रहना है, साथ ही अभावो का जो भी भारी तास छाया
हु आ है, उसे भी परासत करना है। उस कायर को सिकय पिरजन किटबद होकर करेगे ही; पर वसतुत: इस पयोजन के
िलए िजतनी पचुर शिक सूझ-बूझ और साधन-सामगी चािहए, उतनी पूँजी एकितत रप मे सीधी हसतगत नही हो
सकती, वरन् बैक जैसे समथर माधयम से उधार लेनी पडेगी। सभी जानते है िक ठे केदारो को िनमारण की ठे केदारी भर
िमलती है, उस समूचे कायर मे जो लाखो-करोडो की पूँजी लगती है, उसका पबनध सूत -संचालक को ही करना पडता
है।

भगवान् के िवशे ष अनुग ह और अनुद ान की उपलिबध
शरीर उन पंचततवो का बना है, िजसे जड कहा जाता है। चेतना ही उसमे पाण रप है। यिद वह िनषफल
जाए, तो पाँच ततवो का बना घोसला िनजीव बनकर रह जाता है। उसके िलए कुछ कर सकना तो दरू , अपनी रका
तक नही कर सकता, तुरनत सडने-गलने लगता है और जीव-जनतुओं का आहार बनकर, अपनी शकल-सूरत तक
गँवा बैठता है। पाण रहते ही िकसी को जीिवत कहा जाता है। जीवन, वायु की तरह वयापक और अननत है। फेफडो मे
िजतनी जगह होती है, वायु उतनी ही माता मे गहण की जाती है। शरीर-कलेवर के समबनध मे भी यही बात है। साँस
लेते समय उसकी िजतनी आवशयकता पडती है, उतनी ही गहण कर ली जाती है, शेष अननत आकाश मे ही भरी
रहती है। उसे अिधक माता मे गहण-उपलबध करने की कला मे पवीण लोग उसे ‘पाणायाम’ से अितिरक माता मे
गहण कर लेते है और आवशयकतानुसार िवशेष समय पर पयुक करते है। ऐसे ही लोग पाणवान् कहलाते है और उस
संचय से अपना तथा दस
ू रो का भला करते है।
शरीर-बल पाय: इतना ही होता है, िजतनी सीिमत माता मे पाण-शिक िवदमान रहती है; पर जो
आशचयर जनक-अदत
ु असाधारण कायर कर पाते है, उनकी चेतना ही िवशेष रप से सिकय होती और चमतकार सतर
के काम करती देखी जाती है। शरीर मनुषयकृत है। वह नर-नारी के गुण सूतो के माधयम से िवकिसत होता है; िकनतु
पाण देवता है। उसकी असीम माता इस िवशव-बहाणड मे भरी पडी है। वह अपने वगर के साथ असाधारण माता मे
एकितत भी हो सकता है और एक से दस
ू रे मे पवेश करके , अपनी िदवय कमता का हसतानतरण भी कर सकता है।
इस पकार के पयोगो को ‘शिकपात’ नाम से जाना जाता है। छाया-पुरष सतर मे भी उसी का िवशेष कतृरतव देखा
जाता है। मरणोपरानत उसका सवतनत अिसततव भूत-पेत आिद के रप मे बना रहता है। जीिवत िसथित मे भी
अतीिनदय कमताओं के रप मे उसके चमतकारी करतब देखे जा सकते है। पाणयोग के अभयास से इसका अितिरक
पवाह, शरीर से बाहर िनकलकर भी सुषुिप, तुरीया समािध आिद मे अपनी सता बनाये रहकर, िबना शारीिरक साधनो
के अपने अिसततव तथा सशक िवशेषताओं का पिरचय दे सकता है।
पाण की सता हसतानतरण के उपयुक भी है। कोई समथर वयिक अपनी िदवय कमता का एक भाग दस
ू रे को
देकर उसकी सहायता भी कर सकता है। आिद शंकराचायर की कथा पिसद है, िजसके अनुसार वे कुछ समय के िलये
अपने शरीर से िनकल कर िकसी दस
ू री काया मे पवेश कर गये थे और लमबी अविध तक उसी मे बने रहे थे।
अनय िविशष शिकयाँ भी मनुषय के साथ अपना ताल-मेल िबठाती और उसके शरीर दारा अपने अभीष
पयोजन पूरे करती रही है। कुनती-पुत मनुषय शरीरधारी होते हु ए भी िवशेष देवताओं के अंश थे। उसी सतर के वे काम
भी करते रहे, जैसे िक साधारण मानवी काया मे रहते हु ए कर सकना समभव नही है। रामायण काल मे हनुमान, अंगद
आिद के पराकमो को भी ऐसे ही देवोपम माना जाता है। मनुषय शरीरधारी सामानय पाण वाले पाय: वैसा कायर नही
कर सकते। अवतारी सताये मनुषय-शरीर मे रहकर ही अपने िवशेष कृतय करती और ‘यदा यदा िह धमर सय’ वाली
पितजा की रका करती है।
भगवान् िजनहे िवशेष कायो ं के िलये चुनते, िनयुक करते है, उनमे इस िदवय पाण की माता ही अिधक होती
है, िजसके सहारे वे नर-वानरो की पिरिध से ऊँचा उठकर सोचने, ऐसा साहस करने और आदशर उपिसथत करने मे
समथर होते है। भू-बनधनो की रजजुओं से जकडे हु ए सामानय मनुषय न तो वैसा सोच ही सकते है और न िदवय
आदशो ं को अपना पाते है। दैवी-पयोजनो को िसद करने के िलये अितिरक आतमबल का, मनोबल का पिरचय वे दे
नही पाते। िछट-पुट िवघन ही उनहे पहाड िजतने भारी दीखते है और जब कुछ कर-गुजरने का समय आता है, तो
भयभीत होकर िकसी अनथर की आशंका करने लगते है। कायरता न जाने कहाँ से आकर दौड पडती है और कभी
की हु ई पितजाये-िलये हु ये संकलपो को एक पकार भूल ही जाते है।
दैवी अनुगह के समबनध मे भी लोगो की िविचत कलपनाये है। वे उनही छोटी समभावनाओं को दैवी अनुकमपा
मानते रहते है, जो सामानय पुरषाथर से अथवा अनायास ही संयोगवश लोगो को उपलबध होती रहती है।
मनोकामनाओं तक ही उनका नाक रगडना िगडिगडाना सीिमत रहता है, िजसे वे दैवी अनुकमपा मानते है। आतमबलआतमिवशवास न होने से जो कुछ पाप होता, है, उसे पुरषाथर का पितफल मानकर उनका मन सनतुष ही नही होता,
उनके िलये हर सफलता दैवी अनुगह और हर असफलता दैवी पकोप मात पतीत होती है। ऐसे दबु र ल चेताओं की
बात छोड दे, तो यथाथर ता समझ मे आ जाती है; पर अनतत: एक ही तथय सामने आता है िक मनुषय जब आदशर वादी
अनुकरणीय-अिभननदनीय कायो ं को करने के िलए उमंगो-तरंगो से भर जाता है, तो वह असाधारण कदम उठाने
लगता है। रावण की सभा मे अंगद का पैर उखाडना तक असमभव पतीत होने लगा था। औसत आदमी को तो हर
काम असमभव लगता है। ऐसे छोटे तयाग करना भी उसे पहाड उठाने जैसा भारी पडता है, जो वसतुत: हलके-फुलके
ही होते है और िहममत के धनी आदशर वादी, िजनहे आये िदन करते रहते है।

दैवी अनुगह का एक ही िचह है-आदशर वािदता की िदशा मे साहसपूवरक बडे कदम उठाना और उस पयास मे
आने वाली किठनाइयो को हँसते-हँसते दरगुजर कर देना। भगवान् का अनुगह एक ही है-आदशो ं के पिरपालन मे बढीचढी साहिसकता का पदशर न करते रहना। कायरो और हेयजनो के िलये यही पवर त उठाने जैसा अडंगा पतीत होता है;
िकनतु िजनमे मनोबल की कमी नही, उनके िलये तो यह सब खेल-िखलवाड जैसा लगता है। संसार का इितहास
साकी है िक िजस िकसी पर भगवान् की पाणचेतना की अनुकमपा बरसी है, उनको एक ही वरदान िमला है, ऐसे
सतकमर करने का साहस िमला है, ऐसा उतसाह मानस मे िवचरता रहा है िक अनुकरणीय और अिभननदनीय कायर
सतत करने की लगन उठती रहे। अवांछनीय और अनौिचतय जहाँ भी दीखता है , वहाँ लड पडने का इतना शौयर साहस उभरता है िक उसे चिरताथर िकये िबना वयिक शािनत से बैठ ही नही सकता।
इककीसवी सदी मे ऐसी ही पितभाये सवर त उभरेगी। िजनके िपछले िकये िकया-कलाप देखने से िनराशा होती
थी, उनमे से भी िकतने ही ऐसे उभरेगे, जो अपने को धनय बनायेगे-अपने इदर -िगदर के लोगो को भी पार करके िनहाल
कर देगे। पैसा, औलाद, सवासथय और बडपपन तो बुरे लोग भी अपने बलबूते अिजर त कर लेते है, पर आदशो ं की िदशा
मे साहसपूवरक चल पडना मात उनही के िलये समभव होता है, िजन पर भगवान् की िवशेष अनुकमपा बरसती है; िजसे
परमिपता कृपापूवरक अपने उचचसतरीय पाण का वह भाग पदान करते है, िजसके सहारे नर-वानर को नर से नारायण
बनने का अवसर होता है।
पातता की तातकािलक आवशयकता
परमातमा ने, पकृित ने मनुषय मात को बहु त कुछ ऐसा असाधारण िदया है, िजसके आधार पर वह सुखसौभागय पगित सवयं पाप करने के साथ-साथ औरो के िलये भी सहायक िसद हो सकता है, परनतु मनुषय की दबु र िु द
कहे या माया का भटकाव, िजसके पभाव से सुख-सौभागय के सथान पर वह अपने तथा औरो के िलये समसयाये एवं
िवडमबनाये ही रचता रह जाता है-लालसा वासना और अहनता के चक मे मनुषय सवयं को दयनीय िसथित तक पहु ँचा
देता है।
इस सविनिमर त दगु र ित से पार िनकलना कैसे हो? िगरना तो िकसी के िलये भी सरल हो सकता है; पर उबरने
और ऊँचा उठने के िलये मात अपने पुरषाथर से भी काम नही चलता; उसके िलये िकसी समथर सहायक की जररत
पडती है। यह सहायता भी िकसी को अकसमात अपतयािशत रप से मुफत मे नही िमलती। उधार देकर समथर सता
भी उसका कुछ बदला चाहती है। मुफत मे तो यहाँ िकसी को कुछ भी नही िमलता ।
पातता का िनयम मनुषय पर तीन पकार से लागू होते है-एक उतसाह और सफूितर भरी शमशीलता; दस
ू री
तनमयता, ततपरता भरी अिभरिच; तीसरी, उतकृषता के िलए गहरी लगन और ललक। यह तीनो जहाँ-कही भी
सिममिलत रप से पाई जायेगी, समझना चािहये िक सफलता तक दौडकर जा पहु ँचने का अवसर िमला। पात हो तो
पानी से न सही, हवा से वह जरर भर जायेगा, खाली तो कभी रहेगा ही नही। ईशवर की अनुकमपा भी ऐसे ही लोगो
पर बरसती है। उचच पदो पर िनयुिक उनही की होती है, जो िनधारिरत पितसपदारओं मे बाजी मारते है।
यो ईशवर के िलए सभी समान और सभी िपय है; पर उनके साथ बेइनसाफी भी तो नही की जा सकती,
िजनहोने अथक पिरशम करके अपनी योगयता का पिरचय िदया है। कोई बडा कारखाना खडा िकया जाना होता है
और उसके िनमारण मे जलदी करनी होती है, तो एक ही उपाय रह जाता है िक सुयोगय एवं अनुभवी अिधकािरयो की
बडी संखया मे िनयुिक की जाये। अिधक कारीगर खोजे और जुटाए जाएँ । यही अगले िदनो होने जा रहा है।
पितभावान वयिक जहाँ-तहाँ मारे-मारे नही िफरते। गुणवानो, पितभावानो को कभी खाली नही पाया जाता।
इस पर भी यह आपितकाल है। गरज कारीगरो को उतनी नही पडी है, िजतनी िक िनमारणकतारओं को अपने अचछे
और भवय काम समय रहते करा लेने की है।
भक भगवान् से सदा अनुगह माँगते रहते है पर अब की बार इन िदनो ऐसा समय है, िजसमे िनमारणकतार को
ही बडी बेचन
ै ी से सतपातो की खोजबीन करनी पड रही है। काम तो िनयनता का ही रका पडा है। उसे ही उतावली
है। जैसी सडी-गली पिरिसथितयाँ आज है, वैसी अिधक िदनो नही रहने दी जा सकती। बदलाव मे बढ-चढकर जो
भूिमका िनभाई जानी है, उसके िलए सतपात तेजी से ढू ँढे जा रहेेे है। िवशेष अनुदान और उपहार भी उनही को
अिवलमब िमलने वाले है। औसत सतर के वयिकयो से लेकर पितभावानो तक को इस अिभनव सृजन मे भाव-भरा
योगदान पसतुत करने के िलये समुिचत अनुदान उदारतापूवरक िदये जाने है।

साधारण और औसत दजे का वयिक भी यिद सामानय चाल और धीमी गित से पगित-पथ पर आगे बढता
चले, तो इसका पिरणाम भी ऐसा हो सकता है, िजससे उजवल भिवषय का सवपन साकार होते देखा-समझा जा सके।
पितभाशािलयो का समुदाय इसके अितिरक है। िजनमे शारीिरक सफूितर , मानिसक साहिसकता और अनत:करण मे
उमंग भरी रहती है, वे पिरिसथितयो की दिष से सामानय होने पर भी इतना कुछ कर सकते है , िजसे अदत
ु कहा जा
सके । जटायु जैसे अपनी आदशर वादी उमंगो के आधार पर इतना कुछ कर सके , िजतना िक हीन मनोबल वाले
तरण और बिलष भी नही कर सके। ऐसी कृितयाँ सदा समरण की जाती रहेगी। अषावक जैसे टू टे -फूटे शरीर वालो ने
ऐसे इितहास की संरचना की, िजसका समरण करने मात से मन उलास से भर जाता है। लकमीबाई जैसी लडिकयाँ
शतुओं के दाँत खटे करके, अपने पौरष का पिरचय दे सकी। भामाशाह की थोडी-सी पूँजी ने राणा पताप की हारती
बाजी को िजता िदया। संसार ऐसी पितभाओं की कथा-गाथाओं से भरा पडा है।
सािहतय, कला, लगन, संगठन, सुिनयोजन जैसे िकतने ही गुण मनुषय मे ऐसे है, िजनका आं िशक उपयोग हो
सके तो वैयिकक और सामूिहक केतो मे आशचयर जनक चमतकार सामने आ सकते है। ऐसे लोगो मे वे साधन-समपन
भी आते है, िजनहे साधारण लोगो की तुलना मे कही अिधक उपलिबधयाँ पाप है। पैसे वाले ऐसे वयापक वयवसाय
खडे कर देते है, िजसके उतपादन से अनेको बहु मुखी आवशयकताये पूरी होती है। वकील, इंजीिनयर, डॉकटर,
वैजािनक आिद बुिदजीवी अपने कला-कौशल के आधार पर इतनी बडी सफलताये अिजर त करते है , िजतनी की
साधारण लोगो से तो कलपना करते भी नही बनती। गायक, वादक व अिभनेता सतर के कलाकार इतना यश और
पैसा कमा लेते है, िक साधारण लोगो की दिष मे वह कोई वरदान जैसा पतीत होता है। िकतने ही ऐसे िवशवासपात
पितभावान होते है िक वे िजस काम को भी हाथ मे लेते है, उसे सफलता के उचच िशखर पर पहु ँचा देते है।
देखा गया है िक ऐसे िवभूितवान भी मात िलपसा, लालसा, तृषणा, वासना, अहनता और संकीणर सवाथर परता
जैसे हेय पयोजनो मे ही अपनी उन उपलिबधयो को खपा देते है, िजनका उपयोग यिद लोक कलयाण के िलये हो
सका होता, तो उतने पौरष से िनमारण की िदशा मे इतना कुछ बन पडा होता, उनकी कीितर -गाथा िचरकाल तक गाई
जाती और उनका अनुकरण करके, िकतने ही लोग अनुकरणीय आदशर उपिसथत कर सके होते।
भगवान् ने िजनको ऐसी सदिु द, सतपेरणा और सतसाहिसकता पदान की है, उनहोने अपने साधनो को
िवलािसता, अहनता और मोहजनय वासना मे न लगाकर, ऐसे महान् पयोजनो मे लगाया है, िक उनसे पेरणा पाकर,
अनेको लोग उसी मागर पर चल पडे। तब उस समुदाय के सिममिलत िकया-कलाप इतने बडे होते है, िजनकी कलपना
मात से लोगो का हदय हु लसने लगता है और देखा-देखी वे भी ऐसा कुछ कर बैठने के िलये किटबद हो जाते है ,
िजससे असंखयो का िहत-साधन हो। जब सामानय साधनो और सामानय-पिरिसथितयो के लोगो ने इतने भर से बडे
कायर कर िदखाये, तो िजनके पास साधन है, शिक है, संगठन है, मनोबल है, सूझबूझ है, वे कुछ अितिरक उचचसतर
के काम न कर सके, ऐसी कोई बात नही ।
मनुषय की कृपणता, कायरता, संकीणर ता ही ऐसा अिभशाप है, जो उसे समथर रहते हु ए भी कुछ करने नही
देती, किठनाइयो के जैसे-तैसे बहाने गढ लेती है। इसी को िधककारते हु ए गीताकार ने कहा था िक-कुदं हदय दौबर लयं
तयतवंितष परंतप’’। हदय की इस कुदता, कृपणता से कोई अपना पीछा छुडा सके, तो आदशर वादी उदारता उसके
ऐसे पुष आधार बना देती है, िजसके बलबूते वह महामानवो की पंिक मे बैठ सके और अपने साथ अनयो को भी
िनहाल कर सके।
यह समय चूक ने का है नही
आमतौर से भकजन भगवान् को पुकारते और उनकी सहायता के िलये िवनयपूवरक िगडिगडाते रहते है, पर
कभी-कभी ऐसे समय भी आते है, जब भगवान् उन भक जनो से आवशयक याचना करते है और बदले मे उनहे इतना
महतव देना पडता है, जो उनका अपने महतव से भी बढ-चढकर होता है।
हनुमान की विरषता के समबनध मे जानकारी पाप करने पर राम-लकमण उनहे खोजने ऋषयमूक पवर त पर
पहु ँचे थे और येन-केन पकारेण उनहे सीता की खोज मे सहायता करने के िलये सहमत िकया था। गंगाघाट पार करने
के िलये केवट की सहायता आवशयक हो गई थी, इसिलये केवट को उनहोने आगहपूवरक सहायता करने के िलये
िकसी पकार मनाया। आडे समय मे काम आने वाले जटायु को छाती से लगाकर कृतजता वयक की, उसकी अनुभूित
हर सुनने वाले को भाव-िवभोर कर देती है। समुद का पुल बाँधने मे िजन िनहतथे रीछ-वानरो ने सहायता की, उनकी
उदार चेतना को हजारो-लाखो वषर बीत जाने पर भी कथाकारो ने भुलाया नही है।

महाभारत अभीष था। उसकी बागडोर सँभालने के िलये अजुरन जैसे मनसवी की आवशयकता थी। अजुरन से
पूछा गया तो वह अचकचाने लगा। कभी भीख माँगकर खा लेने , कभी कुटु िमबयो पर हिथयार न उठाने का
िसदानतवाद तकर रप मे पसतुत करने लगा। भगवान् ने उसके मन की कमजोरी पढी और भतसर नापूवरक कटु शबदो मे
दबाव डाला िक उसे उस कठोर कायर मे उदत होना ही चािहये। यो भगवान् सवर शिकमान् होने से महाभारत को
अकेले भी जीत सकते थे, पर अजुरन को शेय देना था, जो सचची िमतता का तकाजा था। उसे यशसवी भी तो बनाना
था, इसिलये संगाम के मधय खडे होकर अजुरन को सुिवसतृत दशर नशास समझाते हु ए अपने पयोजन मे भागीदार बनने
के िलये सहमत करना ही पडा। अजुरन घाटे मे नही, नफे मे ही रहा।
सुदामा बगल मे दबी चावल की पोटली देना नही चाहते थे , सकुचा रहे थे, पर उनहोने उस दरु ाव को
बलपूवरक छीना और चावल देने की उदारता परखने के बाद ही सुदामापुरी को दािरकापुरी मे रपानतिरत िकया। भक
और भगवान् के मधयवती इितहास की परमपरा यही रही है। पातता जाँचने के उपरानत ही िकसी को कुछ महतवपूणर
िमला है। जो आँ खे मटकाते आँ सू बहाते, रामधुन की ताली बजाकर बडे-बडे उपहार पाना चाहते है, उनकी अनुदारता
खाली हाथ ही लौटती है। भगवान् को ठगा नही जा सकता है । वे गोिपयो तक से छाछ पाप िकये िबना अपने अनुगह
का पिरचय नही देते थे। जो गोवधर न उठाने मे सहायता करने की िहममत जुटा सके, वही कृषण के सचचे सखाओं मे
िगने जा सके।
यह समय युग पिरवतर न जैसे महतवपूणर कायर का है। इसे आदशर वादी कठोर सैिनको के िलये परीका की घडी
कहा जाये, तो इसमे कुछ भी अतयुिक नही समझी जानी चािहये। पुराना कचरा हटता है और उसके सथान पर
नवीनता के उतसाह भरे सरंजाम जुटते है। यह महान् पिरवतर न की-महाकािनत की वेला है। इसमे कायर, लोभी,
डरपोक और भाँड आिद जहाँ-तहाँ िछपे हो, तो उनकी ओर घृणा, ितरसकार की दिष डालते हु ए, उनहे अनदेखा भी
िकया जा सकता है। यहाँ तो पसंग हिथयारो से सुसिजजत सेना का चल रहा है। वे ही यिद समय की महता,
आवशयकता को, न समझते हु ए, जहाँ-तहाँ मटरगसती करते िफरे और समय पर हिथयार न पाने के कारण समूची
सेना को परासत होना पडे तो ऐसे वयिकयो पर तो हर िकसी का रोष ही बरसेगा, िजनने-आपात िसथित मे भी पमाद
बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मिटयामेट करके रख िदया।
जीवनतो, जागतो और पाणवान् मे से पतयेक को अनुभव करना चािहये िक यह ऐसा िवशेष समय है जैसा िक
हजारो-लाखो वषो ं बाद कभी एक बार आता है। गाँधी के सतयागही और बुद के पिरवाजक बनने का शेय, समय
िनकल जाने पर अब कोई िकसी भी मूलय पर नही पा सकता। हनुमान और अजुरन की भूिमका हेतु िफर से लालाियत
होने वाला कोई वयिक िकतने ही पयतन करे, अब दबु ारा वैसा अवसर हसतगत नही कर सकता। समय की पतीका तो
की जा सकती है, पर समय िकसी की भी पतीका नही करता। भगीरथ, दधीिच और हिरशचनद जैसा सौभागय अब
उनसे भी अिधक तयाग करने पर भी पाया नही जा सकता ।
समय बदल रहा है। पभातकाल का बहमुहूतर अभी है। अरणोदय के दशर न अभी हो सकते है। कुछ घणटे ऐसे
है उनहे यिद पमाद मे गँवा िदये जाये, तो अब वह गया समय लौटकर िफर िकस पकार आ सकेगा? युग-पिरवतर न की
वेला ऐितहािसक, असाधारण अविध है। इसमे िजनका िजतना पुरषाथर होगा, वह उतना ही उचच कोिट का शौयर पदक
पा सकेगा। समय िनकल जाने पर, साँप िनकल जाने पर लकीर को लािठयो से पीटना भर ही शेष रह जाता है।
इन िदनो मनुषय का भागय और भिवषय नये िसरे से िलखा और गढा जा रहा है। ऐसा िवलकण समय कभी
हजारो-लाखो वषो ं बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते है और जो उसका सदपु योग कर लेते है,
वे अपने आपको सदा-सवर दा के िलये अजर-अमर बना लेते है। गोवधर न एक बार ही उठाया गया था। समुद पर सेतु
भी एक ही बार बना था। कोई यह सोचता रहे िक ऐसे समय तो बार-बार आते ही रहेगे और हमारा जब भी मन
करेगा, तभी उसका लाभ उठा लेगे, तो ऐसा समझने वाले भूल ही कर रहे होगे। इस भूल का पिरमाजर न िफर कभी
कदािचत् ही हो सके।
लोग अपने पुरषाथर से तो अपने अनुकूल पिरिसथितयाँ उतपन करते ही रहते है ; पर भगवान् के उपायो का
शेय मनुषय को अनायास ही िमल जाये, ऐसा कदािचत ही कभी होता है। अजुरन का रथ एक बार ही कृषण ने चलाया
था। वे उसके केवल, मात सारथी नही थे िक जब हु कुम चलाया, तभी उनसे वह काम करा िलया। भगवान् राम और
लकमण को कनधो पर उठाये-िफरने का शेय हनुमान को एक ही बार िमला था। वे जब चाहते तभी हनुमान हठी
बनकर, उनहे कनधो पर िबठाते और सैर कराते; ऐसे अवसर चाहे कभी भी िमल जाते रहेगे, ऐसी आशा सदा-सवर दा
िकसी को भी नही करनी चािहये।

बहा ने सृिष एक बार ही रची थी। उसके बाद तो वह ढरार जयो-तयो करके अपने ढंग से चलता ही आ रहा
है। नये युग का सृजन इनही िदनो हो रहा है। समुद-मनथन एक बार ही हु आ और उसमे से १४ रतन एक बार ही
िनकले थे। वैसी घटनाये जब मन आये तभी घिटत कर दी जायेगी, यह आशा नही करनी चािहये।
अवांछनीयता के पलायन का, औिचतय की संसथापना का बह मुहूतर, यह एक बार ही आया है। िफर कभी
हम लोग इसी मनुषय जनम मे ऐसा देख सकेगे , इसकी आशा करना एक पकार से अवांछनीय ही होगा। अचछा यही हो
िक ऐसी पुणय वेला का लाभ उठाने मे आज के िवचारशील तो चूक करे ही नही।
उठाने वाले के साथ जुडे
इन िदनो नव िनमारण का पयोजन भगवान् की पेरणा और उनके मागर दशर न मे चल रहा है। उसे एक तीव
सिरता-पवाह मानकर चलना चािहये, िजसकी धारा का आशय पकड लेने के बाद कोई कही-से कही पहु ँच सकता है।
तूफान के साथ उडने वाले पते भी सहज ही आसमान चूमने लगते है। ऊँचे पेड का आसरा लेकर दबु ली बेल भी
उतनी ही ऊँची चढ जाती है, िजतना िक वह पेड होता है। ‘नव िनमारण’ महाकाल की योजना एवं पेरणा है। उसका
िवसतार तो उतना होना ही है, िजतना िक उसके सूत संचालक ने िनधारिरत कर रखा है। इस िवशवास को जमा लेने
पर अनय सारी समसयाये सरल हो जाती है। नव िनमारण का कायर ऐसा नही है, िजसके िलये िक घर-गृहसथी काम
धनधा छोडकर पूरा समय साधु-बाबािजयो की तरह लगाना पडे। यह कायर ऐसा है, िजसके िलये दो घणटे िनतय लगाते
रहने भर से असाधारण पगित समभव है। लगन हो तो कुछ घणटे ही परमाथर पयोजन मे लगा देने भर से इतना अिधक
पिरणाम सामने आ उपिसथत हो सकता है, िजसे आदरणीय, अनुकरणीय और अिभननदनीय कहा जा सके।
इस युगधमर के िनवारह के िलये अपने पिरवार को पेिरत िकया जा रहा है। आरमभ मे िवचार था अपने पिरजनो
के बलबूते ही सन् २००० मे होने वाली पूणारहुित मे एक करोड भागीदार बनाये जा सकेगे, िकनतु पिरजनो का उतसाह
तथा समय की महता और आवशयकता देखते हु ए गितचक को दन
ू ा बढा िदया गया है। अब पाँच-पाँच वषर मे दो
पूणारहुितयाँ होगी एक सन् १९९५ मे, दस
री
सन्
२०००
मे

इन
दोनो
मे एक-एक लाख वेिदयो के दीप यज होगे।

इसी पकार एक करोड याजक इसमे सिममिलत होगे। लोगो के अनत:करण मे िजस कम से उतसाह उभरा है, उसे
देखते हु ए पतीत होता है िक िजतना संकलप िकया गया है, उससे कई गुनी गित बढेगी और लकय से कही अिधक
आगे पहु ँचेगे।
यह मात कलपना नही है। वरन् िदवय संरकण मे सिकय होने वाला उतसाह बूँद -बूँद से सागर की उपमा
चिरताथर करता है। अपने वतर मान पाँच लाख पिरजनो मे से , एक लाख जीवनत-विरषो को अगदत
ू ो की भूिमका के
िलये छाँटा जा रहा है। उनहे एक हलका-सा काम सौपा गया है। वे पितिदन पाँच-दस पिरिचतो को नव पकािशत
इककीसवी सदी समबनधी पुसतके एक-एक करके पढाये-सुनाये घणटे-दो-घणटे समयदान देने वाले के िलये यह कायर
बहु त आसान है।
यिद औसतन १० िदनो मे नयूनतम ५ वयिकयो को भी यह सैट पढाया जाये, तो एक माह मे १५ तथा एक
वषर मे १८० वयिकयो तक एक ही पिरजन नव चेतना का सनदेश पहु ँचा सकता है। इस पकार पाँच वषर मे यह संखया
९०० हो जायेगी। इस कम से एक लाख पिरजनो दारा, पाँच वषर मे ९ करोड वयिकयो को युग चेतना से अनुपािणत
िकया जा सकेगा। यह संखया आशचयर जनक लगती है, पर यह नयूनतम आँ कडे है। नैिषक पुरषाथी १० िदन मे १०
वयिकयो को भी पढा-सुना सकता है। तब यह संखया दो गुनी हो जाएगी अथारत् पाँच वषर मे १८ करोड। अगले पाँच
वषर मे नैिषको की संखया बढेगी ही असतु उस पाँच वषीय पुरषाथर से और भी अिधक लोगो को अनुपािणत िकया जा
सकेगा। सफलता का पितशत िकतना भी घटे, हर पाँच वषर मे करोड-दो-करोड भागीदारी खडे कर लेना जरा भी
किठन नही है।
इस संबद पिरकर को दैिनक जीवन मे कई काम सुपुदर िकये गये है। इनमे से एक है-१०८ बार गायती मंत
का जाप। उतने ही समय तक पात:कालीन सूयोदय का धयान, िजसमे अनुभव करना िक वह तेजस् अपने कण-कण
मे, रोम-रोम मे समािवष होकर समूची काया को ओजसवी, तेजसवी और वचर सवी बना रहा है। यह अनुभव साधक के
उतसाह एवं साहस को कई गुना बढा देता है।
इसी साधक का एक पक यह है िक उदगम-केनद शािनतकुञ की एक मानिसक पिरकमा लगा ली जाये और
िवगत ६५ वषर से अखणड लौ मे जल रहे दीपक के समीप बैठकर उससे िन:सतृत होने वाली पाण चेतना का अपने मे
अवधारण करते रहा जाये।

िवचारकािनत जानयज है, इसका हर िदन अवगाहन िकया जाये। इककीसवी सदी समबनधी जो पुसतके है , जो
इन िदनो छपती जा रही है, उस कम मे हर महीने छह पुसतके छापने की योजना है। बीस पैसा िनतय का अंशदान
िनकालने रहने पर एक महीने मे छह रपये की रािश जमा हो जाती है। इसी पैसे से हर महीने का नया पकाशन एक
लाख पाठको को िमलता रहेगा। इनहे एक से लेकर दस तक को पढा देना या सुना देना ऐसा किठन काम नही है ,
िजसे िक दो घणटे समयदान करने वाला पूरा न कर सके। यह पढाने या सुनाने का कम िनयिमत रप से चलता रहे
तो एक वषर मे ही वह संखया पूरी हो सकती है, जो पाँच वषर के िलये िनधारिरत की गई है। ‘अिधकसय अिधक फलम्’
की सूिक के अनुसार युगचेतना का सवरप िजतने अिधक लोग समझ सके हदयंगम कर सके और वयावहािरक जीवन
मे उतार सके, उतना ही उतम है।
सन् १९९० की बसनत पंचमी से यह जान यज आरमभ िकया जा रहा है। सन् १९९५ मे महायज की अधर
पूणारहुित होगी। उस िनिमत एक लाख वेिदयो के यज वसनत पंचमी से समपन हो जायेगे। इस पकार एक लाख दीप
यज और एक करोड के जान यज का, जप यज का संकलप तब तक भली पकार पूरा हो जायेगा।
यह पथम पाँच वषर की योजना हु ई। सन् 2000 मे अभी दस वषर शेष है। दो लाख दीपयज और दो करोड
जान यज सरलता से पूरे हो सकेगे। वतर मान पिरजनो की बढी हु ई संखया और उमंग को देखते हु ए पितफल उससे
जयादा ही होने की समभावना है।
उपरोक बात िकयाकृतय से समबिनधत रही। िनधाररणो को जीवन मे उतारने का पितफल तो और भी अिधक
पभावशाली होगा। शारीिरक सफूितर , मानिसक उलास और भावनातमक संवेदना की योग साधना हर िकसी को िनतयिनयम के रप मे करनी होगी। िमतवयियता का अभयास और बचे हु ए समय तथा पैसे को जीवनचयार मे युग चेतना का
समावेश करने के कम मे लगाये रहने वाला पुणयातमा और अिधक धमर परायण बनता चला जायेगा। जलता हु आ
दीपक दस
ू रे बुझे दीपको को जलाता है। एक लाख से आरमभ हु आ युग चेतना अिभयान, पाँच-पाँच वषो ं मे करोडो को
अपने पभाव से पभािवत कर डाले तो उसे कुछ भी असाधारण नही मानना चािहये। यह कम आगे भी बढता रहे , तो
वह िदन दरू नही, जब समूची मनुषय जाित इस पभाव केत मे होगी, पगितशीलता का माहौल बनता दीख पडेगा,
मानवीय गिरमा के अनुरप उतकृष आदशर वािदता अपनाते हु ए जन-जन िदखाई देगे।
िपछले एक शताबदी मे कुिवचारो और कुकमो ं की बाढ जैसी आ गयी। लोग भष-िचनतन और दषु कमो ं के
अभयासी बनने लगे। पतन का कम कहाँ से कहाँ पहु ँचा? लोग िगरने और िगराने मे पितसपधार मानने लगे। इसी पवाह
को यिद उलट िदया जाये तो अगली शताबदी मे सदाशयता की उतसाहपूवरक अिभवृिद भी हो सकती है। िगरने और
िगराने वाले यिद अपनी गितिविधयो को उलटकर उठने और उठाने मे लगा दे तो उजवल भिवषय की समभावनाओं
को मूितर मान बनने मे कुछ भी सनदेह न रह जायेगा।

पसतुत पुसतक को जयादा से जयादा पचार-पसार कर अिधक से अिधक लोगो तक पहु ँचाने एवं पढने के िलए
पोतसािहत करने का अनुरोध है।
- पकाशक

* १९८८-९० तक िलखी पुसतके (कािनतधमी सािहतय पुसतकमाला) पू० गुरदेव के जीवन का सार है- सारे जीवन
का लेखा-जोखा है। १९४० से अब तक के सािहतय का सार है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत
करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नही है। पयुक आँ कडे उस समय के अनुसार है। इनहे वतर मान के अनुरप
संशोिधत कर लेना चािहए।

कािनतधमी सािहतय-यु ग सािहतय महता

कािनतधमी सािहतय-युग सािहतय नाम से िवखयात यह पुसतकमाला युगदषा-युगसृजेता पजापुरष पं. शीराम
शमार आचायर जी दारा १९८९-९० मे महापयाण के एक वषर पूवर की अविध मे एक ही पवाह मे िलखी गयी है। पाय:
२० छोटी -छोटी पुिसतकाओं मे पसतुत इस सािहतय के िवषय मे सवयं हमारे आराधय प.पू. गुरदेव पं. शीराम शमार
आचायर जी का कहना था- ‘‘हमारे िवचार, कािनत के बीज है। ये थोडे भी दिु नयाँ मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका
कर देगे। सारे िवशव का नकशा बदल देगे।..... मेरे अभी तक के सारे सािहतय का सार है।..... सारे जीवन का लेखाजोखा है।..... जीवन और िचंतन को बदलने के सूत है इनमे।..... हमारे उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है।..... अभी
तक का सािहतय पढ पाओ या न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना भगवान के इस िमशन को न तो तुम
समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते हो।..... पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन
मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ..... यह इस युग की गीता है। एक
बार पढने से न समझ आए तो सौ बार पढना और सौ लोगो को पढाना। उनसे भी कहना िक आगे वे १०० लोगो को
पढाएँ । हम िलखे तो असर न हो, ऐसा हो ही नही सकता। जैसे अजुरन का मोह गीता से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा
मोह इस युग-गीता से भंग होगा।..... मेरे जीवन भर के सािहतय इस शरीर के वजन से भी जयादा भारी है। मेरे जीवन
भर के सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और कािनतधमी सािहतय को दस
ू रे पलडे पर, तो इनका वजन जयादा
होगा।..... महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।..... इनहे लागत मूलय पर छपवाकर
पचािरत-पसािरत शबदश:-अकरश: करने की सभी को छूट है, कोई कापीराइट नही है। ..... मेरे जान शरीर को मेरे
कािनतधमी सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’

ॐ ‘‘बेटे ! कािनतधमी सािहतय मेरे अब तक के सभी सािहतय का मकखन है। मेरे अब तक का सािहतय पढ पाओ या
न पढ पाओ, इसे जरर पढना। इनहे समझे िबना िमशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही िकसी को समझा सकते
हो।’’.....
ॐ ‘‘बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढने से न समझ आये तो सौ बार पढना। जैसे अजुरन का मोह गीता
से भंग हु आ था, वैसे ही तुमहारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।
ॐ ‘‘हमारे िवचार बडे पैने है, तीखे है। हमारी सारी शिक हमारे िवचारो मे समािहत है। दिु नया को हम पलट देने का
जो दावा करते है, वह िसिदयो से नही, अपने सशक िवचारो से करते है। आप इन िवचारो को फैलाने मे हमारी
सहायता कीिजए। हमको आगे बढने दीिजए, समपकर बनाने दीिजए।’’.....
ॐ ‘‘मेरे जीवन भर का सािहतय शरीर के वजन से जयादा भारी है। यिद इसे तराजू के एक पलडे पर रखे और
कािनतधमी सािहतय को (युग सािहतय को) एक पलडे पर, तो इनका वजन जयादा होगा।
ॐ ‘‘आवशयकता और समय के अनुरप गायती महािवजान मैने िलखा था। अब इसे अलमारी मे बनद करके रख दो।
अब केवल इनही (कािनतधमी सािहतय को-युग सािहतय को) िकताबो को पढना। समय आने पर उसे भी पढना।
महाकाल ने सवयं मेरी उँ गिलयाँ पकडकर ये सािहतय िलखवाया है।’’.....
ॐ ‘‘ये उतरािधकािरयो के िलए वसीयत है। जीवन को-िचनतन को बदलने के सूत है इसमे। गुर पूिणर मा से अब तक
पीडा िलखी है, पढो।’’ .....
ॐ ‘‘हमारे िवचार, कांित के बीज है, जो जरा भी दिु नया मे फैल गए, तो अगले िदनो धमाका करेगे। तुम हमारा काम
करो, हम तुमहारा काम करेगे।’’.....

ॐ १९८८-९० तक िलखी पुसतके जीवन का सार है- सारे जीवन का लेखा-जोखा है १९४० से अब तक के
सािहतय का सार है।’’.....
ॐ ‘‘जैसे शवण कुमार ने अपने माता-िपता को सभी तीथो ं की याता कराई, वैसे ही आप भी हमे (िवचार रप मे कािनतधमी सािहतय के रप मे) संसार भर के तीथर पतयेक गाँव, पतयेक घर मे ले चले।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, गायती महािवजान एक तरफ रख दो, पजापुराण एक तरफ रख दो। केवल इन िकताबो को पढना-पढाना व
गीता की तरह िनतय पाठ करना।’’.....
ॐ ‘‘ये गायती महािवजान के बेटे-बेिटयाँ है, ये (इशारा कर के) पजापुराण के बेटे-बेिटयाँ है। बेटे, (पुरानो से) तुम सभी
इस सािहतय को बार-बार पढना। सौ बार पढना। और सौ लोगो को पढवाना। दिु नया की सभी समसयाओं का
समाधान इस सािहतय मे है।’’.....
ॐ ‘‘हमारे िवचार कांित के बीज है। इनहे लागत मूलय पर छपवाकर पचािरत पसािरत करने की सभी को छूट है।
कोई कापीराइट नही है।’’.....
ॐ ‘‘अब तक िलखे सभी सािहतय को तराजू के एक पलडे पर रखे और इन पुसतको को दस
ू री पर, तो इनका वजन
जयादा भारी पडेगा।’’.....
ॐ शािनतकुञ अब कािनतकुञ हो गया है। यहाँ सब कुछ उलटा-पुलटा है। सातो ऋिषयो का अनकूट है।’’.....
ॐ ‘‘बेटे, ये २० िकताबे सौ बार पढना और कम से कम १०० लोगो को पढाना और वो भी सौ लोगो को पढाएँ । हम
िलखे तो असर न हो, ऐसा न होगा।’’.....
ॐ ‘‘आज तक हमने सूप िपलाया, अब कािनतधमी के रप मे भोजन करो।’’.....
ॐ ‘‘पतयेक कायर कतार को िनयिमत रप से इसे पढना और जीवन मे उतारना युग-िनमारण के िलए जररी है। तभी
अगले चरण मे वे पवेश कर सकेगे। ’’.....
ॐ वसंत पंचमी १९९० को वं. माताजी से - ‘‘मेरा जान शरीर ही िजनदा रहेगा। जान शरीर का पकाश जन-जन के
बीच मे पहु ँचना ही चािहए और आप सबसे किहयेगा - सब बचचो से किहयेगा िक मेरे जान शरीर को- मेरे कािनतधमी
सािहतय के रप मे जन-जन तक पहु ँचाने का पयास करे।’’.....

कािनतधमी सािहतय की पुस तके :

1 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग १
2 इककीसवी सदी बनाम उजवल भिवषय-भाग २
3 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग १
4 युग की माँग पितभा पिरषकार-भाग २
5 सतयुग की वापसी

6 पिरवतर न के महान कण
7 जीवन साधना के सविणर म सूत
8 महाकाल का पितभाओं को आमंतण
9 पजावतार की िवसतार पिकया
10 नवसृजन के िनिमत महाकाल की तैयारी
11 समसयाएँ आज की समाधान कल के
12 मन: िसथित बदले तो पिरिसथित बदले
13 सषा का परम पसाद-पखर पजा
14 आद शिक गायती की समथर साधना
15 िशका ही नही िवदा भी
16 संजीवनी िवदा का िवसतार
17 भाव संवेदनाओं की गंगोती
18 मिहला जागृित अिभयान
19 जीवन देवता की साधना-आराधना
20 समयदान ही युग धमर
21 नवयुग का मतसयावतार
22 इककीसवी सदी का गंगावतरण

अपने अं ग अवयवो से
(परम पूजय गुरदेव दारा सूकमीकरण से पहले माचर 1984 मे लोकसेवी कायर कतार-समयदानी-समिपर त िशषयो
को िदया गया महतवपूणर िनदेश। यह पतक सवयं परमपूजय गुरदेव ने सभी को िवतिरत करते हु ए इसे पितिदन पढने
और जीवन मे उतारने का आगह िकया था।)

यह मनोभाव हमारी तीन उँ गिलयाँ िमलकर िलख रही है। पर िकसी को यह नही समझना चािहए िक जो
योजना बन रही है और कायारिनवत हो रही है, उसे पसतुत कलम, कागज या उँ गिलयाँ ही पूरा करेगी। करने की
िजममेदारी आप लोगो की, हमारे नैिषक कायर कतारओं की है।
इस िवशालकाय योजना मे पेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई िदवय सता बता या िलखा रही है। मिसतषक और
हदय का हर कण-कण, जरार-जरार उसे िलख रहा है। िलख ही नही रहा है , वरन् इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन
रहा है। योजना की पूितर मे न जाने िकतनो का-िकतने पकार का मनोयोग और शम, समय, साधन आिद का िकतना
भाग होगा। मात िलखने वाली उँ गिलयाँ न रहे या कागज, कलम चुक जाये, तो भी कायर रकेगा नही; कयोिक रक का
पतयेक कण और मिसतषक का पतयेक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नही, वह दैवी सता भी सतत
सिकय है, जो आँ खो से न तो देखी जा सकती है और न िदखाई जा सकती है।
योजना बडी है। उतनी ही बडी, िजतना िक बडा उसका नाम है- ‘युग पिरवतर न’। इसके िलए अनेक विरषो
का महान् योगदान लगना है। उसका शेय संयोगवश िकसी को भी कयो न िमले।
पसतुत योजना को कई बार पढे। इस दिष से िक उसमे सबसे बडा योगदान उनही का होगा, जो इन िदनो
हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समिनवत शिक का नाम ही वह वयिक है , जो इन पंिकयो
को िलख रहा है।
कायर कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँ गे? इसकी िचनता आप न करे। िजसने करने के िलए कहा है ,
वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो िसफर एक बात सोचे िक अिधकािधक शम व समपर ण करने मे एक दस
ू रे मे
कौन अगणी रहा?
साधन, योगयता, िशका आिद की दिष से हनुमान् उस समुदाय मे अिकंचन थे। उनका भूतकाल भगोडे सुगीव
की नौकरी करने मे बीता था, पर जब महती शिक के साथ सचचे मन और पूणर समपर ण के साथ लग गए, तो लंका
दहन, समुद छलांगने और पवर त उखाडने का, राम, लकमण को कंधे पर िबठाये िफरने का शेय उनहे ही िमला। आप
लोगो मे से पतयेक से एक ही आशा और अपेका है िक कोई भी पिरजन हनुमान् से कम सतर का न हो। अपने कतृरतव
मे कोई भी अिभन सहचर पीछे न रहे।
काम कया करना पडेगा? यह िनदेश और परामशर आप लोगो को समय-समय पर िमलता रहेगा। काम बदलते
भी रहेगे और बनते-िबगडते भी रहेगे। आप लोग तो िसफर एक बात समरण रखे िक िजस समपर ण भाव को लेकर घर
से चले थे, पहले लेकर आए थे (हमसे जुडे थे), उसमे िदनो िदन बढोतरी होती रहे। कही राई-रती भी कमी न पडने
पाये।
कायर की िवशालता को समझे। लकय तक िनशाना न पहु ँचे, तो भी वह उस सथान तक अवशय पहु ँचेगा, िजसे
अदत
ु , अनुपम, असाधारण और ऐितहािसक कहा जा सके। इसके िलए बडे साधन चािहए, सो ठीक है। उसका भार
िदवय सता पर छोडे। आप तो इतना ही करे िक आपके शम, समय, गुण-कमर , सवभाव मे कही भी कोई तुिट न रहे।
िवशाम की बात न सोचे, अहिनर श एक ही बात मन मे रहे िक हम इस पसतुतीकरण मे पूणररपेण खपकर िकतना
योगदान दे सकते है? िकतना आगे रह सकते है? िकतना भार उठा सकते है? सवयं को अिधकािधक िवनम, दस
ू रो को
बडा माने। सवयंसेवक बनने मे गौरव अनुभव करे। इसी मे आपका बडपपन है।
अपनी थकान और सुिवधा की बात न सोचे। जो कर गुजरे, उसका अहंकार न करे, वरन् इतना ही सोचे िक
हमारा िचंतन, मनोयोग एवं शम िकतनी अिधक ऊँची भूिमका िनभा सका? िकतनी बडी छलाँग लगा सका? यही
आपकी अिग परीका है। इसी मे आपका गौरव और समपर ण की साथर कता है। अपने सािथयो की शदा व कमता घटने
न दे। उसे िदन दन
ू ी-रात चौगुनी करते रहे।

समरण रखे िक िमशन का काम अगले िदनो बहु त बढेगा। अब से कई गुना अिधक। इसके िलए आपकी
ततपरता ऐसी होनी चािहए, िजसे ऊँचे से ऊँचे दजे की कहा जा सके। आपका अनतराल िजसका लेखा-जोखा लेते
हु ए अपने को कृत-कृतय अनुभव करे। हम फूले न समाएँ और पेरक सता आपको इतना घिनष बनाए, िजतना की
राम पंचायत मे छठे हनुमान् भी घुस पडे थे।
कहने का सारांश इतना ही है, आप िनतय अपनी अनतरातमा से पूछे िक जो हम कर सकते थे , उसमे कही
राई-रती तुिट तो नही रही? आलसय-पमाद को कही चुपके से आपके िकया-कलापो मे घुस पडने का अवसर तो नही
िमल गया? अनुशासन मे वयितरेक तो नही हु आ? अपने कृतयो को दस
ू रे से अिधक समझने की अहंता कही छद रप
मे आप पर सवार तो नही हो गयी?
यह िवराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है िक इस अिग परीका की वेला मे आपका शरीर, मन
और वयवहार कही गडबडाया तो नही। ऊँचे काम सदा ऊँचे वयिकतव करते है। कोई लमबाई से ऊँचा नही होता, शम,
मनोयोग, तयाग और िनरहंकािरता ही िकसी को ऊँचा बनाती है। अगला कायर कम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम
न पडने पाए, यह एक ही आशा, अपेका और िवशवास आप लोगो पर रखकर कदम बढ रहे है। आप मे से कोई इस
िवषम वेला मे िपछडने न पाए, िजसके िलए बाद मे पशचाताप करना पडे।
-पं ० शीराम शमार आचायर , माचर
1984

हमारा यु ग -िनमारण सतसं क लप
(युग-िनमारण का सतसंकलप िनतय दहु राना चािहए। सवाधयाय से पहले इसे एक बार भावनापूवरक पढना और
तब सवाधयाय आरंभ करना चािहए। सतसंगो और िवचार गोिषयो मे इसे पढा और दहु राया जाना चािहए। इस
सतसंकलप का पढा जाना हमारे िनतय-िनयमो का एक अंग रहना चािहए तथा सोते समय इसी आधार पर
आतमिनरीकण का कायर कम िनयिमत रप से चलाना चािहए। )

1.

हम ईशवर को सवर वयापी, नयायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन मे उतारेगे।

2.

शरीर को भगवान् का मंिदर समझकर आतम-संयम और िनयिमतता दारा आरोगय की रका करेगे।

3.

मन को कुिवचारो और दभ
ु ारवनाओं से बचाए रखने के िलए सवाधयाय एवं सतसंग की वयवसथा रखे रहेगे।

4.

इंिदय-संयम अथर -संयम समय-संयम और िवचार-संयम का सतत अभयास करेगे।

5.

अपने आपको समाज का एक अिभन अंग मानेगे और सबके िहत मे अपना िहत समझेगे।

6.

मयारदाओं को पालेगे, वजर नाओं से बचेगे, नागिरक कतर वयो का पालन करेगे और समाजिनष बने रहेगे।

7.

समझदारी, ईमानदारी, िजममेदारी और बहादरु ी को जीवन का एक अिविचछन अंग मानेगे।

8.

चारो ओर मधुरता, सवचछता, सादगी एवं सजजनता का वातावरण उतपन करेगे।

9.

अनीित से पाप सफलता की अपेका नीित पर चलते हु ए असफलता को िशरोधायर करेगे।

10.
मनुषय के मूलयांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योगयताओं एवं िवभूितयो को नही, उसके सिदचारो और
सतकमो ं को मानेगे।

11.

दस
ू रो के साथ वह वयवहार न करेगे, जो हमे अपने िलए पसनद नही।

12.

नर-नारी परसपर पिवत दिष रखेगे।

13.
संसार मे सतपवृितयो के पुणय पसार के िलए अपने समय, पभाव, जान, पुरषाथर एवं धन का एक अंश
िनयिमत रप से लगाते रहेगे।
14.

परमपराओं की तुलना मे िववेक को महतव देगे।

15.

सजजनो को संगिठत करने, अनीित से लोहा लेने और नवसृजन की गितिविधयो मे पूरी रिच लेगे।

16.
राषरीय एकता एवं समता के पित िनषावान् रहेगे। जाित, िलंग, भाषा, पानत, समपदाय आिद के कारण परसपर
कोई भेदभाव न बरतेगे।
17.
मनुषय अपने भागय का िनमारता आप है, इस िवशवास के आधार पर हमारी मानयता है िक हम उतकृष बनेगे
और दस
ू रो को शेष बनायेगे, तो युग अवशय बदलेगा।
18.

हम बदलेगे-युग बदलेगा, हम सुधरेगे-युग सुधरेगा इस तथय पर हमारा पिरपूणर िवशवास है।